शोध प्रारूप
[ ResearchDesign ]
https://clipartstation.com/wp-content/uploads/2017/11/research-design-clipart-12.j
pg
द्वारा- डॉक्टर ममता उपाध्याय
एसोसिएट प्रोफ
े सर, राजनीति विज्ञान
क
ु मारी मायावती राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय
बादलपुर, गौतम बुध नगर
यह सामग्री विशेष रूप से शिक्षण और सीखने को बढ़ाने क
े शैक्षणिक उद्देश्यों क
े लिए है। आर्थिक / वाणिज्यिक अथवा
किसी अन्य उद्देश्य क
े लिए इसका उपयोग पूर्णत: प्रतिबंध है। सामग्री क
े उपयोगकर्ता इसे किसी और क
े साथ वितरित,
2.
प्रसारित या साझानहीं करेंगे और इसका उपयोग व्यक्तिगत ज्ञान की उन्नति क
े लिए ही करेंगे। इस ई - क
ं टेंट में जो
जानकारी की गई है वह प्रामाणिक है और मेरे ज्ञान क
े अनुसार सर्वोत्तम है।
उद्देश्य-
● सामाजिक राजनीतिक अनुसंधान में शोध प्रारूप क
े महत्व की जानकारी
● शोध प्रारूप क
े प्रकारों का ज्ञान
● शोध प्रारूप की विषय वस्तु का ज्ञान
● शोध प्रारूप निर्मित करने की क्षमता का विकास
सामाजिक अनुसंधान को व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध रूप प्रदान करने की दृष्टि से शोध
प्रारूप का निर्माण किया जाता है। किसी भी कार्य की सफलता बहुत क
ु छ सावधानीपूर्वक
बनाई गई योजना पर निर्भर करती है। जिस प्रकार एक शिल्पी या एक फ
ै शन डिजाइनर
भवन बनाने या फ
ै शन का निर्धारण करने से पूर्व उपलब्ध ज्ञान अनुभव एवं तथ्यों क
े
आधार पर पूर्व में ही योजना बना लेता है, वैसे ही एक सामाजिक अनुसंधान कर्ता
अनुसंधान से पूर्व उसकी एक रूपरेखा तैयार करता है, जो उसक
े कार्य में उसका मार्गदर्शन
करती है और शोध कार्य को व्यवस्थित रुप प्रदान करने में सक्षम होती है। शोध की इस
रूपरेखा को ही शोध प्रारूप या शोध प्ररचना कहते हैं। यह शोध प्रारूप शोध क
े उद्देश्यों क
े
अनुसार निर्धारित किया जाता है। एकोफ ने शोध प्रारूप क
े संबंध में लिखा है कि ‘’
निर्णय क्रियान्वित करने की स्थिति आने से पूर्व ही निर्धारित करने की प्रक्रिया को प्ररचना
कहते हैं। यह संभावित स्थिति को नियंत्रण में लाने की दिशा में एक निश्चय पूर्ण प्रक्रिया
है। ‘’
परिभाषाएं-
विभिन्न विद्वानों क
े द्वारा शोध प्रारूप की परिभाषाएं अपने अपने दृष्टिकोण से दी गई
हैं। जिनमें से क
ु छ प्रमुख इस प्रकार हैं-
बर्नार्ड फिलिप्स क
े अनुसार,’’ शोध प्रारूप तथ्यों क
े संकलन मापन एवं विश्लेषण क
े लिए
एक ब्लू प्रिंट का कार्य करता है। ‘’
3.
पॉलिन एंड यंगक
े अनुसार, ‘’ शोध प्रारूप किसी शोध कार्य का तार्कि क एवं व्यवस्थित
आयोजन है जो शोध कार्य को दिशा प्रदान करता है। ‘’
फ्र
ें ड एन करलिंगर क
े अनुसार- ‘’ शोध प्रारूप किसी अन्वेषण की एक योजना, संरचना
और रणनीति है,जिसका निर्माण इस उद्देश्य से किया जाता है कि शोध प्रश्नों क
े उत्तर
प्राप्त किये जा सक
े और परिवर्त्यों को नियंत्रित किया जा सक
े । ‘’
सेंफोर्ड लेबोबीज एवं रोबर्ट हैगडॉर्न ने ‘इंट्रोडक्शन टू सोशल रिसर्च’ में लिखा है ,’’एक
अनुसंधान रचना उच्च तार्कि क ढंग को प्रस्तुत करती है जिसमें व्यक्तियों एवं अन्य
इकाइयों की तुलना एवं विश्लेषण किया जाता है। यह आंकड़ों क
े विवेचन का आधार है।
प्ररचना का उद्देश्य ऐसी तुलना का आश्वासन दिलाना है जो विकल्प विवेचना से प्रभावित
न हो। ‘’
शोध प्रारूप का निर्माण आवश्यक क्यों-
शोध कार्य से पूर्व उसका प्रारूप बनाने क
े निम्नांकित लाभ है-
1. शोध कार्य को सहजता पूर्वक संपन्न करने में सहायक होता है।
2. कम समय और लागत क
े साथ विषय से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं एकत्रित
की जा सकती है।
3. शोध प्रारूप क
े माध्यम से एकत्रित तथ्यों क
े अनुसार जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं,
उनक
े वैज्ञानिक एवं विश्वसनीय होने की संभावना ज्यादा होती है।
4. इसक
े माध्यम से शोध कार्य में किसी भी तरह क
े पूर्वाग्रह की संभावना कम से कम
होती है।
5. अनुसंधान कार्य को निश्चित विषयों तक सीमित करता है एवं शोधकर्ता क
े भटकाव को
रोकता है।
4.
अच्छे अनुसंधान प्रारूपकी विशेषताएं-
● किसी शोध प्रारूप का संबंध किसी विशेष अनुसंधान कार्य से होता है, अर्थात प्रत्येक
शोध कार्य क
े लिए पृथक -पृथक शोध प्रारूप का निर्माण किया जाता है।
● शोध प्रारूप अनुसंधानकर्ता का उसक
े कार्य में मार्गदर्शन करता है।
● यह शोध समस्या की जटिल प्रकृ ति को सरल रूप में प्रस्तुत करता है।
● शोध प्रारूप अनुसंधान की रूपरेखा है जो शोध कार्य प्रारंभ करने से पूर्व निर्मित की
जाती है।
● शोध प्रारूप किसी शोध विशेष क
े अधिकतम उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक
होती है।
● शोध प्रारूप क
े प्रकार का चयन अनुसंधान की समस्या और उपकल्पना की प्रकृ ति
क
े आधार पर किया जाता है।
● शोध प्रारूप समस्या क
े चयन से लेकर शोध प्रतिवेदन तैयार करने क
े अंतिम चरण
तक उपलब्ध सभी विकल्पों क
े बारे में व्यवस्थित रूप से श्रेष्ठ निर्णय लेने में
सहायक होता है।
● शोध प्रारूप को कठोर न होकर लचीला होना चाहिए,अर्थात शोध कार्य क
े दौरान
शोधकर्ता को परिस्थितियों क
े अनुसार उसमें परिवर्तन करने की गुंजाइश रहनी
चाहिए, क्योंकि सामाजिक घटनाओं और व्यवहारों की प्रकृ ति ऐसी नहीं होती जिसे
पूरी तरह नियंत्रित रख क
े अध्ययन किया जा सक
े ।
शोध प्रारूप की विषय वस्तु
5.
शोध प्रारूप कीविषय वस्तु का तात्पर्य उन विषयों या संदर्भ से है जिनका
उल्लेख शोध प्रारूप में किया जाता है। सामान्यतः शोध प्रारूप में निम्नांकित
विषयों का उल्लेख किया जाता है-
1. शोध का विषय-
शोध प्रारूप का निर्माण करते समय सर्वप्रथम उस विषय का उल्लेख किया जाता
है, जिस पर शोध कार्य किया जाना है। ऐसा करने से अध्ययन का विषय स्पष्ट
होता है और उसक
े क्षेत्र एवं सीमाओं का पता चलता है। विषय का चयन उपलब्ध
साहित्य पत्र-पत्रिकाओं क
े अध्ययन एवं सरकारी तथा गैर सरकारी दस्तावेजों का
अध्ययन करक
े किया जाता है। इनका अध्ययन करने से विषय क
े संबंध में
प्रारंभिक जानकारी शोधकर्ता को प्राप्त हो जाती है।
2. प्रस्तावना-
शोध प्रारूप क
े प्रारंभ में शोधकर्ता को शोध- विषय की पृष्ठभूमि बतानी पड़ती है,
जिससे पता चलता है कि शोधकर्ता की रूचि विषय में किस प्रकार उत्पन्न हुई तथा
समस्या का विद्यमान स्वरूप क्या है, अभी तक उस समस्या पर किन शोधकर्ताओं
ने शोध किया है। उस विषय क
े संबंध में उपलब्ध संबंधित साहित्य की क्या
कमियां और त्रुटियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना आगामी शोध में किस प्रकार संभव
होगा।
3. अध्ययन का उद्देश्य एवं प्रकृ ति-
शोध प्रारूप बनाते समय अध्ययन करता अध्ययन का उद्देश्य बताता है जिसमें
वह अध्ययन का मुख्य उद्देश्य एवं सह उद्देश्यों को स्पष्ट करता है।
उद्देश्य को स्पष्ट करने क
े साथ-साथ शोध प्रारूप में ही शोध क
े स्वरूप या प्रकृ ति
को भी स्पष्ट किया जाता है। शोध की प्रकृ ति सांख्यिकीय , व्यक्तिगत
,तुलनात्मक, प्रयोगात्मक, विश्लेषणात्मक, अन्वेषणात्मक या मिश्रित किसी भी
प्रकार की हो सकती है।
4. सामाजिक ,सांस्कृ तिक ,राजनीतिक और भौगोलिक संदर्भ-
6.
कोई भी सामाजिकशोध कार्य विशेष प्रकार की सामाजिक, सांस्कृ तिक राजनीतिक
और भौगोलिक परिस्थितियों क
े संदर्भ में किया जाता है। ऐसे में शोधकर्ता को
प्रारूप बनाते समय यह स्पष्ट करना होता है कि वह संबंधित अध्ययन को किस
प्रकार की सामाजिक- सांस्कृ तिक परिस्थितियों में संपन्न करेगा। जिस समाज में
वह रह रहा है, उस समाज क
े मूल्य, परंपराएं ,मान्यताएं ,स्थानीय मान्यताएं, रीति
रिवाज आदि क्या है? साथ ही शोधकर्ता यह भी स्पष्ट करता है कि उनकी
राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप क्या है एवं राजनीतिक व्यवहार तथा मूल्य किस
दिशा की ओर उन्मुख है। भौगोलिक वातावरण जो मानवीय व्यवहार को प्रभावित
करता है, अर्थात जलवायु ,भू आकृ ति तथा उत्पादन वस्तुओं आदि का उल्लेख भी
किया जाता है। आर्थिक परिवेश का परिचय भी अपेक्षित होता है, क्योंकि यह सभी
परिवेश शोध कार्य को, शोधकर्ता क
े आचरण एवं तथ्य संकलन हेतु चयनित
उत्तरदाताओं को प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
5. प्रकल्पना- [Hypothesis]
किसी भी विषय पर शोध कार्य प्रारंभ करने क
े पूर्व शोधकर्ता क
े द्वारा विषय क
े
संबंध में अपने प्रारंभिक ज्ञान क
े आधार पर क
ु छ पूर्व निष्कर्ष या आधारभूत
सिद्धांत परिकल्पित कर लिए जाते हैं, जिन्हें प्रकल्पना कहते हैं। शोध प्रारूप का
निर्माण करते समय शोधकर्ता क
े द्वारा परिकल्पनाओं का उल्लेख भी किया जाता
है, जिनका निर्माण उसने किया है। जैसे- भारतीय महिलाओं की राजनीतिक
जागरूकता ज्ञात करने हेतु शोध विषय का चयन किए जाने पर उसक
े संबंध में क
ु छ
उपकल्पनाए इस प्रकार बनाई जा सकती हैं-
1. शिक्षित महिलाओं में जागरूकता का स्तर अच्छा है।
2. ग्रामीण महिलाओं की तुलना में शहरी महिलाएं राजनीतिक रूप से अधिक
जागरूक हैं।
7.
3. संचार माध्यमोंएवं सत्ताधारी राजनीतिक दल क
े कार्यकर्ताओं क
े द्वारा घर-घर
सरकारी योजनाओं का प्रचार प्रसार किए जाने क
े कारण ग्रामीण महिलाएं भी अपने
अधिकारों, सुरक्षा संबंधी उपायों क
े प्रति जागरूक हुई है।
इस प्रकार निर्मित कल्पनाएं शोध कार्य को निश्चित रूप प्रदान करती हैं और
उसकी दिशा, सीमा एवं क्षेत्र आदि का निर्धारण करती है।
6. कॉल निर्देश-
शोध कार्य को समय बद्ध बनाने क
े लिए शोध प्रारूप में उस समय सारणी का
उल्लेख भी किया जाता है, जिसक
े अनुसार शोध से संबंधित प्रत्येक कार्य को
संपन्न किया जाता है। यथा- शोधकर्ता क
े द्वारा कितने समय तक विषय क
े
संबंध में उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया जाएगा, कितना समय निदर्शन एवं
तथ्य संकलन की प्रविधियों क
े चयन में दिया जाएगा और कितने समय में तथ्य
संकलित कर उनका वर्गीकरण और विश्लेषण किया जा सक
े गा। हालांकि शोध
प्रारूप में लचीलापन रखते हुए प्रत्येक कार्य क
े लिए निर्धारित समय में थोड़ा बहुत
परिवर्तन आवश्यकता क
े अनुसार किया जा सकता है, किं तु काल -निर्धारण शोध
कार्य को समय सीमा क
े अंतर्गत संपन्न करने में सहायक होता है। वर्तमान में
विभिन्न शोध संस्थानों क
े द्वारा शोध परियोजनाएं आवंटित करते समय काल
निर्देश का विशेष ध्यान रखा जाता है। शोध प्रारूप में यह भी बताया जाता है कि
शोध किस समय काल या परिवेश से संबंधित है।
7. तथ्य संकलन की प्रविधियां -
शोधकर्ता द्वारा किया जाने वाला शोध कार्य प्राथमिक तथ्यों पर आधारित होगा या
द्वितीयक अथवा दोनों, इस बात का उल्लेख शोध प्रारूप में किया जाता है। प्राथमिक
तथ्यों क
े संकलन हेतु किन प्रविधियां का प्रयोग शोधकर्ता क
े द्वारा किया जाएगा-
प्रश्नावली ,अनुसूची, अवलोकन या साक्षात्कार? द्वैतीयक तथ्य किन स्रोतों से संकलित
किए जाएंगे, इसका भी उल्लेख शोध प्रारूप में किया जाता है। संबंधित शोध हेतु कौन सी
8.
प्रविधियां अधिक उपयुक्तहोंगी, इसका निर्णय शोधकर्ता स्वयं अपने विषय क
े उद्देश्य
एवं प्रकृ ति क
े आधार पर करता है।
8. तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण-
तथ्य संकलन की प्रवृत्तियों का उल्लेख करने क
े पश्चात शोध प्रारूप में तथ्यों क
े विश्लेषण
और व्याख्या में किन विधियों का प्रयोग किया जाएगा इसका भी उन उल्लेख किया जाता
है। शोधकर्ता सारणी का प्रयोग करेगा या अन्य किसी पद्धति क
े आधार पर तथ्यों का
संक
े त करण एवं वर्गीकरण करना चाहेगा। वह जिन पद्धतियों का प्रयोग करेगा उनकी
प्रमाणिकता की मात्रा क्या होगी, आदि बातों का उल्लेख कमोबेश मात्रा में किया जा
सकता है।
शोध प्रारूप का वर्गीकरण
शोध कार्य की प्रकृ ति, प्रयुक्त प्रविधियों , अध्ययन स्रोतों एवं उद्देश्यों क
े आधार
पर शोध प्रारूप कई प्रकार क
े हो सकते हैं। क्लेयर ,सेलिज एवं अन्य ने अपनी
पुस्तक ‘रिसर्च मेथड्स इन सोशल रिलेशंस’ में अनुसंधान प्रारूप का वर्गीकरण तीन
रूपों में किया है। यह है -
1. अन्वेषणात्मक अध्ययन
2. विवरणात्मक या निदानात्मक अध्ययन
3. प्रयोगात्मक अध्ययन
सनफोर्ड लेबो ब्रिज एवं रोबर्ट हंडोरन क
े अनुसार अनुसंधान प्ररचनाओं को 3 वर्गों
में रखा जा सकता है-
1. वैयक्तिक अध्ययन
9.
2. सर्वेक्षण प्रारूप
3.प्रयोगात्मक प्रारूप
संक्षेप में शोध अभिकल्प क
े निम्नांकित प्रकार बताए जा सकते हैं-
1. अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प-[ Exploratory or Formulative
Research Design]
जिस शोध का उद्देश्य नए तथ्यों की खोज क
े माध्यम से मानवीय ज्ञान में वृद्धि
करना होता है उसक
े लिए निर्मित शोध रचना अन्वेषणात्मक अनुसंधान
अभिकल्प कहलाता है। ऐसे शोध प्रारूप में शोध कार्य की रूपरेखा इस प्रकार प्रस्तुत
की जाती है कि घटना की प्रकृ ति एवं प्रक्रियाओं की वास्तविकता ओं को ढूंढा जा
सक
े । सामाजिक विज्ञान क
े क्षेत्र में जहां शोध कार्य द्वारा अर्जित ज्ञान सीमित है
एवं वैज्ञानिक सिद्धांतों का विकास भी कम ही हुआ है, वहां शोध कार्य क
े विषय में
उपकल्पना क
े निर्माण हेतु अन्वेषणात्मक शोध पर जोर दिया जाता है। जैसे-
भारत में अपराध क
े आरोपी बंदियों क
े मानवाधिकार हनन की घटनाओं का पता
लगाने क
े लिए उपकल्पना क
े
निर्माण हेतु इस प्रकार का अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप तैयार किया जाना वांछित
होगा।
अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप निर्माण की विधियां-
अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप का निर्माण करते समय शोधकर्ता को निम्नांकित
विधियों का अनुसरण करना होता है-
● संबंधित साहित्य का अध्ययन-
10.
मानवीय सभ्यता क
ेविकास क
े विद्यमान दौर में सामाजिक जीवन का शायद ही कोई
ऐसा क्षेत्र हो जिस पर क
ु छ काम न हुआ हो। ऐसी स्थिति में शोध की रूपरेखा बनाने से
पहले शोधकर्ता को सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि उस विषय पर क्या-क्या कार्य
हुआ है। विषय क
े संबंध में उपलब्ध साहित्य का सर्वेक्षण करना चाहिए। साहित्य क
े
अध्ययन से स्पष्ट होगा कि उस विषय से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत कौन से हैं और उन
सिद्धांतों क
े संदर्भ में उसे नई उपकल्पनाए भी सूझेंगी । संबंधित साहित्य क
े अध्ययन
क
े लिए वर्तमान में अनेक उपकरण प्रचलित है। जैसे-
1. संदर्भ ग्रंथ सूची
2. लेखों क
े सारांश
3. अनुक्रमणिका
आज लगभग सभी विषयों की विभिन्न शाखाओं से संबंधित साहित्य की सूचियां,
अनुक्रमणिका, संदर्भ ग्रंथ सूची आदि पुस्तकालयों में उपलब्ध हो जाती हैं, जिनकी
सहायता से शोधकर्ता को अपने विषय क
े लगभग क
ु ल प्रकाशित साहित्य क
े विषय में पता
लग जाता है। टिप्पणियों क
े आधार पर वह पढ़ने योग्य पुस्तक
ें और लेखों को चुन सकता
है। क
ु छ संस्थाएं अनुसंधान लेखों और ग्रंथों क
े सारांश पत्रिकाओं में प्रकाशित करती हैं
जिनमें से शोधकर्ता आवश्यकतानुसार सामग्री का चयन कर सकता है।
● अनुभवी व्यक्तियों से वार्तालाप-
समाज विज्ञान की प्रयोगशाला संपूर्ण समाज है जिसमें कार्य करते समय या जीवन जीते
समय अनुभव अर्जित किए जाते हैं। किसी भी सामाजिक विषय का परिचय प्राप्त करने
का सबसे प्रभावी एवं लोकप्रिय ढंग है अनुभवी व्यक्तियों से बातचीत। अनुभव से कई बार
ऐसी जानकारियां प्राप्त होती है जो लिखित रूप में कहीं उपलब्ध नहीं थी और जिनक
े बारे
में शोधकर्ता सोच भी नहीं सकता था।
● एकल विषय अध्ययन [ case study ] शोध प्रारूप क
े अन्वेषणात्मक प्रकार की
एक महत्वपूर्ण पद्धति एकल विषय अध्ययन की है, जिसका तात्पर्य है कि किसी
एक मामले, समूह, व्यक्ति, संस्था या घटना का सर्वांगीण एवं गहन अध्ययन।
11.
इस प्रकार किसीएक विषय को चुनकर शोधकर्ता विषय से संबंधित रूपरेखा का
निर्माण कर सकता है।
2. विवरणात्मक अथवा निदानात्मक शोध प्रारूप-[ Descriptive or Co-relational
And Diagnostic Research Design]
विवरणात्मक अनुसंधान प्ररचना किसी समूह या परिस्थिति क
े विशुद्ध वर्णन का
उद्देश्य रखती है। विषय का क्रमिक विवेचन ज्ञान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और
यह ज्ञान गुणात्मक एवं मात्रात्मक दोनों ही प्रकार का हो सकता है । ऐसी अनुसंधान रचना
को किसी विषय क
े ऐसे पक्ष क
े बारे में ज्ञान प्राप्त करने क
े उद्देश्य से बनाया जाता है,
जिस पक्ष पर अब तक कोई शोध नहीं हुआ है। साथ ही अनुसंधान कार्य में विभिन्न चरों
क
े आपसी संबंधों का पता लगाने क
े लिए भी ऐसी अनुसंधान रचना बनाई जाती है। जैसे
आर्थिक समृद्धि और शिक्षा जैसे चर में एक धनात्मक सहसंबंध पाया जाता है अर्थात
सामान्यतया देखा जाता है कि अमीर व्यक्ति अधिक शिक्षित होते हैं।
निदानात्मक अनुसंधान रचना किसी सामाजिक समस्या क
े निदान का लक्ष्य रखती है।
इसमें शोध की रूपरेखा इस तरह निर्मित की जाती है कि किसी सामाजिक समस्या का हल
ढूंढा जा सक
े । विवरणात्मक एवं निदानात्मक अनुसंधान प्ररचना एक ही नहीं है बल्कि
उनमें निम्नांकित आधारों पर अंतर पाया जाता है-
1. विवरणात्मक शोध प्रारूप विषय से संबंधित तथ्यों का वर्णन प्रस्तुत करने का
उद्देश्य रखती है, जबकि निदानात्मक शोध संरचना समस्या का वास्तविक स्वरूप
पता कर उसक
े समाधान का उद्देश्य रखती है।
2. विवरणात्मक शोध प्रारूप क
े आधार पर किए गए अध्ययन उपकल्पनाओं द्वारा
पूर्ण रूप से निर्देशित नहीं होते, जबकि निदानात्मक अनुसंधान रचना क
े अनुसार
अध्ययन कार्य पूरी तरह उपकल्पनाओं परआधारित होता है।
3. विवरणात्मक अनुसंधान रचना का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति होता है, जबकि
निदानात्मक का उद्देश्य समाज की विद्यमान समस्याओं का कारण सहित
समाधान प्रस्तुत करना होता है।
12.
4. विवरणात्मक शोधप्रारूप ऐसे शोध की रूपरेखा होता है, जिस पर ज्यादा अनुसंधान
कार्य नहीं हुए हैं, जबकि निदानात्मक शोध प्रारूप ऐसे शोध को प्रोत्साहित करता है
जहां पर समस्याओं का स्पष्ट रूप पहले ही प्रकट हो चुका है।
5. विवरणात्मक अध्ययन प्रारंभिक स्तर क
े अध्ययन होते हैं, जबकि निदानात्मक
अध्ययन उच्च स्तरीय होते हैं।
● प्रयोगात्मक अनुसंधान अभिकल्प-[ Experimental Research Design]
यद्यपि सामाजिक विज्ञानों की विषय वस्तु विशुद्ध प्रयोग क
े योग्य नहीं होती, किं तु
समसामयिक दौर में वैज्ञानिक पद्धति को अपनाते हुए प्रयोगात्मक अनुसंधान भी किए
जा रहे हैं। इस प्रकार क
े अनुसंधान में किसी अध्ययन समूह क
े व्यवहार को नियंत्रित कर
उस पर किसी नई परिस्थिति क
े प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। जब अनुसंधान
रचना का निर्माण प्रयोगात्मक अनुसंधान क
े संचालन की दृष्टि से किया जाता है, तो उसे
प्रयोगात्मक अनुसंधान अभिकल्प कहते हैं। हालांकि सामाजिक विज्ञान में प्रयोग की सभी
शर्तों को पूरा करना संभव नहीं होता है, इसलिए शोधकर्ता आवश्यकता एवं सुविधा क
े
अनुसार प्रयोग क
े ढंग में क
ु छ फ
े रबदल कर सकता है। प्रयोग क
े बदले ढंग क
े आधार पर
प्रयोगात्मक अनुसंधान की रूपरेखा भी दो प्रकार की हो जाती है। यह है-
1. पश्चात परीक्षण [ After Experiment ] -
इस प्रकार क
े प्रयोगात्मक शोध में व्यक्तियों क
े दो ऐसे समूहों को चुन लिया जाता है,
जिन की विशेषताएं एक समान होती है। इनमें से एक समूह को स्वाभाविक रूप से छोड़
दिया जाता है और दूसरे समूह को नियंत्रित करक
े किसी ‘चर’ का प्रभाव डाला जाता है।
क
ु छ समय पश्चात दोनों समूहों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है और यह देखा
जाता है की नियंत्रित समूह पर प्रयोग हेतु प्रयुक्त किए गए चर का कितना और क
ै सा
प्रभाव हुआ है। जैसे- सरकारी दफ्तरों में कार्य करने वाले कार्मिकों की उत्पादकता पर
उनकी कार्य दशाओं का प्रभाव ज्ञात करने क
े लिए दो सरकारी दफ्तरों को चुनना होगा,
जिनकी कार्मिक संख्या, कार्यभार, कार्मिकों का आयु वर्ग समान विशेषताओं से युक्त
होगा। एक दफ्तर को उसक
े स्वाभाविक अवस्था में छोड़ दिया जाएगा और दूसरे दफ्तर
को नियंत्रित कर वहां कार्य करने की अच्छी दशाएं यथा- आधारभूत संरचनाओं की
उपस्थिति, उच्च वेतन, कार्मिकों का मनोबल बढ़ाने वाला नेतृत्व, क्षमता निर्माण प्रक्रिया ,
13.
प्रोत्साहन पुरस्कार व्यवस्थाआदि उपलब्ध कराई जाएंगी। तत्पश्चात यह देखा जाएगा
कि अच्छी कार्य दशाओं क
े कारण नियंत्रित समूह कि कार्य उत्पादकता कितनी बढ़ी है।
यदि उसमें प्रभावी परिवर्तन आया है, तो शोधकर्ता का निष्कर्ष इस विषय में यह होगा कि
अच्छी कार्य दशाएं कार्मिकों की कार्य उत्पादकता को बढ़ाती है।
2. पूर्व पश्चात परीक्षण [ Before After Experiment ]
इस प्रकार क
े शोध में अध्ययन क
े लिए एक ही समूह को चुना जाता है, जिसका अध्ययन
2 भिन्न समय में किया जाता है। पूर्व में समूह क
े स्वाभाविक स्वरूप का अध्ययन किया
जाता है, बाद में किसी ‘ चर’ क
े प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। जैसे- किसी आईटी
क
ं पनी क
े कार्मिकों की मनः स्थिति पर कार्य क
े स्थान का अध्ययन करने क
े लिए पहले
क
ं पनी क
े कार्यालय में कार्य करने वाले कार्मिकों का अध्ययन किया जाएगा, तत्पश्चात
उसी क
ं पनी क
े कार्मिकों को घर से कार्य करने का आदेश दिया जाएगा। दोनों कार्यस्थलों
का तुलनात्मक अध्ययन करने क
े बाद यह देखने का प्रयास किया जाएगा कि कौन सा
कार्य स्थल- क
ं पनी का कार्यालय या कार्मिक का घर उसकी मनोदशा को नकारात्मक या
सकारात्मक रूप में प्रभावित कर रहा है ।
मुख्य शब्द-
शोधप्रारूप,प्रकल्पना,विवरणात्मक, निदानात्मक,अन्वेषणात्मक,प्रयोगात्मक ,संदर्भ सूची
References and Suggested Readings
● Prabhat Kumar Pani , Research Methodology ,Principles and
Practices
● Research Design and Research Methods,http//us.sagepub.com
14.
● Key Elementsof a Research Proposal-Quantitative
Design,http//www.wssu.e
● https://www.researchgate.net/profile/Asif_Kamran3/publication/2
78715788/figure/fig7/AS:327520651104266@1455098416662/Rese
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प्रश्न-
● निबंधात्मक-
1. शोध प्रारूप को परिभाषित कीजिए एवं एक अच्छे शोध प्रारूप की विशेषताओं का
उल्लेख कीजिए ।
2. शोध प्रारूप का वर्गीकरण किन रूपों में किया जाता है, विवेचना कीजिए।
3. शोध प्रारूप का निर्माण करते समय उसकी विषय वस्तु में किन विषयों का उल्लेख
किया जाता है, विवेचना कीजिए।
● वस्तुनिष्ठ
1. सामाजिक राजनीतिक शोध कार्य को संपन्न करने हेतु शोध प्रारूप का निर्माण
शोध क
े किस स्तर पर किया जाता है?
[ अ ] शोध कार्य प्रारंभ करने से पूर्व
[ ब ] शोध क
े मध्य में
[ स ] शोध क
े बाद
[ द ] शोध प्रारूप का निर्माण शोध क
े लिए आवश्यक नहीं है।
2. शोध प्ररचना क
े विषय में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है-
[ अ ] यह शोध कार्य का पूर्व निष्कर्ष होता है।
[ ब ] यह शोध की पूर्व रूपरेखा होती है।
[ स ] यह शोधकर्ता की मार्गदर्शक होती है।
[ द ] ‘ ब ‘ और ‘ स ‘ दोनों सही है।
3. निम्नलिखित में से क्या शोध प्रारूप की विषय वस्तु में सम्मिलित नहीं है?
15.
[ अ ]शोध विषय
[ ब ] शोध का उद्देश्य
[ स ] तथ्य संकलन की प्रविधियां
[ द ] शोध का निष्कर्ष
4. अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप का उद्देश्य क्या होता है?
[ अ ] नवीन ज्ञान की प्राप्ति
[ ब ] शोध कार्य हेतु उपकल्पना ओं का निर्माण
[ स ] उपर्युक्त दोनों
[ द ] उपर्युक्त में से कोई नहीं
5. सामाजिक समस्याओं क
े समाधान हेतु कौनसी शोध प्ररचना निर्मित की जाती
है ?
[ अ ] अन्वेषणत्मक [ ब ] निदानात्मक [ स ] विवरणात्मक [ द ] प्रयोगात्मक
6. सामाजिक राजनीतिक घटनाओं का प्रयोगात्मक अध्ययन क
ै से किया जाता है?
[ अ ] व्यक्ति समूह को नियंत्रित कर [ ब ] अनियंत्रित भीड़ क
े माध्यम से
[ स ] प्रयोगशाला क
े उपकरणों की सहायता से [ द ] सामाजिक घटनाओं का
प्रयोगात्मक अध्ययन संभव नहीं है।
7. शोध प्रारूप क
े प्रकार का चयन किन तत्वों क
े आधार पर किया जाता है?
[ अ ] अध्ययन का उद्देश्य [ ब ] विषय की प्रकृ ति [ स ]उपलब्ध संसाधन
[ द ] उपर्युक्त सभी
8. शोध प्रारूप का निर्माण करने से पूर्व शोधकर्ता विषय क
े संबंध में प्रारंभिक
जानकारी कहां से प्राप्त करता है?
[ अ ] संबंधित साहित्य क
े अध्ययन से [ ब ] क
े स स्टडी क
े माध्यम से
[ स ] अनुभवी व्यक्तियों से वार्तालाप क
े माध्यम से [ द ] उपर्युक्त सभी से
9. शोध प्रारूप क
े निर्माण की उपयोगिता क्या है?
[ अ ] विषय का व्यवस्थित अध्ययन
[ ब ] समय और संसाधन की बचत
16.
[ स ]शोध कार्य में पक्षपात एवं पूर्वाग्रह से मुक्ति
[ द ] उपर्युक्त सभी
10. शोध कार्य में विषय से संबंधित साहित्य क
े अध्ययन की कौन सी प्रणालियां
उपयोगी होती है।
[ अ ] संदर्भ ग्रंथ सूची का अध्ययन
[ ब ] प्रकाशित लेखों क
े सारांश
[ स ] अनुक्रमणिका
[ द ] उपर्युक्त सभी
उत्तर- 1. अ 2. द 3. द 4. स 5.ब 6. अ 7.द 8. द 9. द 10. द