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प य के सामा य रोग एवं नदान
अनु म णका
इकाई सं. इकाई का नाम पृ ठ सं या
इकाई -1 कु कु ट रोग – ववे चत अ ययन 5—16
इकाई -2 मु गय के सं ामक रोग, उनक रोकथाम एवं बचाव छू तदार रोग 17—28
इकाई -3 जीवाणु ज नत प ी रोग एवं उपचार 29—40
इकाई -4 वषाणु ज नत प ी रोग एवं उपचार 41—56
इकाई -5 प य के परजीवी एवं फफूँ द ज नत रोग 57—71
इकाई -6 ोटोजोआ ज नत बीमा रयाँ 72—79
इकाई -7 इमिजग कु कु ट रोग 80—86
इकाई -8 ए वयन इंफलूएंजा – व भ न नवीन अवधारणाएँ एवं नराकरण 87—101
इकाई -9 कु कु ट पालन म ट काकरण क मह ता एवं व भ न कार के
ट काकरण के दौरान मु गय का रखरखाव
102—115
इकाई -10 कु कु ट शव पर ण एवं रोग नदान क उपयो गता कु कु ट रोग म
पेथो नो मक ल जन
116—126
इकाई -11 भारत म कु कु ट रोग नदान एवं आहार व लेषण योगशालाएँ 127—141
इकाई -12 कु कु ट पालन म योग म ल जाने वाल व भ न औष धयाँ एवं
उनका फामकोलोिजकल व लेषण
142—154
इकाई -13 व भ न मौसमी रोग एवं बचाव 155—174
इकाई -14 व भ न रोग से जुड़ी जै वक सुर ा एवं नरोगी प ी पालन 175—188
इकाई -15 व भ न पोषक त व क कमी से होने वाले रोग एवं अ य मेटाबो लक
डसओडर
189—207
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इकाई : कु कु ट रोग - ववे चत अ ययन
इकाई – 1
1.0 उ े य
1.1 तावना
1.2 रोग के कारण
1.3 अ व य रोगी के ल ण
1.4 व भ न कु कु ट रोग एवं उनका वग करण
1.4.1 सं ामक रोग
1.4.2 आयु आधा रत
1.4.3 रोग ऋतु आधा रत रोग
1.4.4 संतु लत आहार क कभी से होने वाले
1.4.5 रोग यां क रोग
1.4.6 रसाय नक रोग
1.4.7 आनुवां शक रोग
1.4.8 अ य व वध प ी रोग
1.5 रोग का सारण
1.6 रोग के रोकथाम के उपाय
1.7 रोग नरोधी काय म एवं रोग नदान
1.8 सारांश
1.0 उ े य :
कु कु ट उ योग म प ी मृ यु दर, इसके पालन म यह एक गंभीर सम या है । तवष लगभग
20-30% मु गयाँ व भ न कारण , िजसम प ी रोग वशेष है, के कारण मर जाती है । कु कु ट
के शर र का उ च ताप 40.6 से 41.6o
C होने के कारण रोग क अव था म व भ न शार रक
याओं के कारण भी यह एक अ य त मह वपूण कारक स होती है । व य प ी लाभ द
कु कु ट यवसाय क आधार शला है । रोग क अव था जो सामा य से भ न हो, िजसम प ी
सु त हो जाए, उ पादन म कमी आ जाए अथवा व भ न द शत रोग के ल ण, अ व थ
प ी क पहचान है । देश म कु कु ट उ पादन वृ के साथ कु कु ट उ पाद संबंधी वकास
योजनाओं म कु कु ट रोग क रोकथाम एवं इससे जुड़े काय म को पया त मह व दया जा
रहा है । आधु नक युग म कु कु ट रोग क रोकथाम, आहार, जनन एवं ब ध क सफल
व धय को अपनाने के कारण मु गयाँ वष क अ धकांश अव ध म अ डा देती रहती है, िजसके
प रणाम व प उसक पया त शि त न ट हो जाती है और सं चत शि त म भी कमी हो जाती
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है । उन पर रोग परजी वय के आ मण तथा अ य कारण से मृ यु क संभावना बढ़ जाती
है । इसी उ े य को यान म रखते हु ए यह आव यक हो जाता है, क हम व भ न रोग
के वषय म एवं उनक रोकथाम का पया त ान व ववे चत अ ययन ात हो ।
1.1 तावना :
मु गय म, रोग क वषम ि थ त, उसके होने वाले व तृत कारण, िजनमे सं ामक रोग
मुख है, सं मण का सारण, व वध भौगो लक प रि थ तयाँ, कु कु ट समूह क व भ न
क म, द शत ल ण आ द अ य त मह वपूण होते ह । चूँ क मु गयाँ समूह म रहती ह एवं
व भ न बीमा रय के ल ण भी ाय: एक जैसे ह द शत हो सकते ह । अत: यह आव यक
है क रोग वशेष म द शत ल ण के आधार पर हम रोग क जाँच एवं नदान कर सक
। समूह म एक रोगी प ी वारा थम द शत ल ण अ य व य प य म रोग फै लने
क पहचान कर एवं उसे समूह से पृथक कर अ य प य म रोग सारण को रोका जा सकता
है ।
इस इकाई म रोग, उससे जुडे कारण, रोग सारण, ल ण क पहचान एवं भे दत ल ण
का व तृत ववेचन कया गया है। रोग का वग करण, सं मण के अलावा अ य कारण से
होने वाले प ी रोग, योगशाला म उनके नदान, उपचार, बचाव एवं रोकथाम के लए अपनाए
जाने वाले व भ न उपाय के वषय म भी व तृत चचा का समावेश कया गया है।
1.2 रोग के कारण :
प ी रोग व भ न कारण से हो सकते ह, िजसम मुखता से सं मण एक मह वपूण कारण
है ।
(i) ल ण के आधार पर कु कु ट रोग, अ त ती (Acute), अनुती (Sub acute) चरकार
(Chronic) तथा ल णह न हो सकते ह । य य प कसी कु कु ट समूह क रोग सत
मु गय क यि तगत पर ा करना च लत नह ं है, तथा प उस समूह क वंशावल ात
करना, मृ यु दर का ान होना और मृ युपरा त पर ण, रोग के नदान म बहु त सहायक
होते ह । अत: अनेक मामल म ती (acutely) रोग सत प य म कु छ को मार
कर रोग का नदान कया जाता है, चाहे उसका उपचार भले ह संभव न हो । रोग के
व श ट कारण म व भ नता पाई जाती है, और रोकथाम तथा उपचार क सफलता इनके
व श ट ल ण पर नभर करती ह । रोग के लए उ तरदायी सं मण का वणन न न
कार से कया जा सकता है ।
(ii) वषाणु सं मण (Virus Infections)
(iii) जीवाणु सं मण (Bacterial Infections)
(iv) परजीवी सं मण (Parasitic Infections)
(v) फं फू द (कवक) सं मण (Fungus Infections)
(vi) वषैले पदाथ का योग (Toxic Substance / Poisoning toxemia)
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(vii) आनुवां शक कारण (Hereditory Factors)
(viii) नयो ला म अथवा कसर (Neoplasm(s)
(ix) व छता क कमी के कारण होने वाले रोग / यव था म कमी (Managemental
problems)
(x) मौसमी रोग
1.3 अ व थ रोगी के ल ण:
(i) वजन म कमी, सु त एवं उदासी, वास म आवाज या याकु लता, शार रक तापमान कम
या अ धक ।
(ii) पेट फू ला, ना सका म यूकस, ने सु त, चेहरा सूखा हु आ ।
(iii) कॉ ब सकु ड़ी हु ई, पील अथवा र त र हत, बैटल म सूजन ।
(iv) पंख झुके हु ये, मैले, अ यवि थत, चमड़ी बना चमक तथा खुरदर ।
(v) टांगे सूजी हु ई, लंगड़ापन, के ल लैग ।
(vi) आहार उपयोग कम या ब द तथा अ धक अथवा कम यास लगना ।
(vii) हरे, पीले, सफे द रंग क बीट, द त के प क ।
1.4 व भ न कु कु ट रोग एवं उनका वग करण:-
1.4.1 सं ामक रोग:
(अ) सं ामक एवं संस गत रोग(Infectious and Contagious Diseases):
1. वषाणु रोग (Virus Diseases)
(i) रानीखेत
(ii) चेचक
(iii) लकवे का रोग
(iv) वसन न लका का रोग (Laryngotrachietis)
(v) वसन शोध (Bronchitis)
(vi) मेरे स रोग (Mareks Disease)
2. जीवाणु रोग (Bacterial Diseases)
(i) जुकाम (Coryza)
(ii) द घकाल न वसन शोध
(iii) कु कु ट कॉलरा
(iv) च चड़ी रोग (Spirochaetosis)
(v) सालमो नलो सस
(vi) य रोग (Tuberclosis or T.B.)
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3. फफूं द रोग
(i) ए परिजलो सस (Aspergilosis) / एफलाटोि सको सस
(ii) नील कलगी (Favus)
(ब) परजीवी रोग (Parasitic Diseases)
1. बा य परजीवी रोग (External Parasitic Diseases)
(i) जूँ पड़ जाना (Lice infestation)
(ii) चचड़ी पड़ जाना (Tick infestation)
(iii) माईट, बा य परजीवी कोप (Mite infestation)
2. आ त रक परजीवी रोग (Internal Parasitic Diseases)
(i) गोल कृ म (Round worms)
(ii) फ ताकृ म (Tape worm)
(iii) सीकल कृ म (Caecel worm)
(iv) धागेनुमा क ड़े (Thread worm)
(v) का सी डयो सस
(स) पोषक ह नता के रोग (Dietary Deficiency Diseases)
(i) ए वटा मनो सस “ए”
(ii) रके स (Rickets)
(iii) पीरो सस (Perosis)
(iv) ि ल ट टडन (Slipped Tendon)
1.4.2 आयु के अनुसार वग करण:-
(अ) नगमन कए चूज के रोग :
(i) अ भशीतन (Chilling)
(ii) पीतक का चूण य न होना (Unabsorbed yolk)
(iii) ए वयन एन सफे लोमाइलाइ टस, सालमो नला आ द
(ब) छ: स ताह क आयु के चूज के रोग :
(i) सीकल को सी डयो सस (Caecal Coccidiosis)
(ii) रानीखेत (Ranikhet or New Castle)
(iii) सं ामक वसन शोध (Infectious Bronchitis)
(स) छ: से आठ स ताह क आयु के चूज के रोग :
(i) सं ामक ले रंगो कयाइ टस
(ii) कृ म (worms)
(iii) च चड़ी वर (Spirochaetosis)
(द) आठ स ताह तथा अ धक आयु के चूज के रोग:
(i) लकवे का रोग (Avian Leucosis complex)
(ii) आँत क कॉ सी डयो स (Intestinal coccidiosis)
(iii) जुकाम (Infectious coryza)
(iv) द घकाल न वसन शोध (Chronic Respirtory infection)
(य) युवा कु कु ट के रोग
(i) कु कु ट कॉलरा (Fowl cholra)
(ii) सं ामक ले रंगो े कयाइ टस (Infectious Laryngo tracheitis)
(iii) लकवे का रोग (Avian Lcucosis complex)
(iv) कृ म (worms)
1.4.3 ऋतु के अनुसार वग करण
(अ) शरद ऋतु के रोग
(i) अ भशीतन (chilling)
(ii) कोल से ट सी मया
(iii) सालमो नला
(iv) द घकाल न वसन शोध (Chronic Respiratory Diseases)
(ब) ी म ऋतु के रोग
(i) कु कु ट चेचक (Fowl Pox)
(ii) च चड़ी वर (Spirochaetosis)
(iii) का सी डयो सस
(iv) कृ म रोग
(v) ए वटा मनो सस “ए”
रानीखेत, चेचक, का सी डयो सस तथा कृ म रोग कसी भी आयु के प ी को वष के
कसी भी समय हो सकते ह । कसी नि चत थान म आव यकता से अ धक प ी रखने
से वजा त भ ण (cannabalism) जुकाम (coryza) तथा कॉ सी डयो सस इ या द रोग
हो सकते है ।
1.4.4 संतु लत आहार क कमी से होने वाले रोग
कु कु ट आहार म आव यकतानुसार ोट न, वसा, काब हाइ ेट, ख नज पदाथ एवं वटा मन
क मा ा होनी चा हए । इससे आहार स तु लत हो जाता है । इसके अ त र त उसम
आ सीकरण रोधी (antioxident), तजीवी (antibiotics) एवं का सी डयो टेट
(Coccidiostat) इ या द भी सि म लत कये जाते ह, िजससे प य को रोग के कोप
से बचाया जा सके ।
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1.4.5 यां क रोग (Accidents) :
चोट लगने से मृ यु हो जाती है अथवा घाव हो जाते ह ।
1.4.6 रासाय नक रोग (Chemical Diseases) :
आहार म कोई ऐसा खा य खा लेना जो क वषैला हो, प य म वष या त हो जाता है।
1.4.7 आनुवां शक रोग (Hereditory Diseases) :
नि चत गुण के संर ण के लए योग कये जा रहे सघन अ त: जनन के कारण अ भावी
वषय यु मजी कारक संयु मी हो सकते है । अत: यह आव यक है क इन वषययु मजी जीव
को अलग कर दया जाये, िजससे क यह घातक गुण संतान म थाना त रत न ह । घरेलू
कु कु ट म 26 घातक अथवा आं शक घातक कारक का वणन मलता है, पर तु सामा य
कु कु ट-पालक के लए इनम से कोई भी कारक मह वपूण नह ं है ।
1.4.8 अ य व वध प ी रोग (Miscellaneous Diseases) :
(i) अ डा फं स जाना (Egg Bound)
(ii) शर र के भीतर अ डा टूट जाना (Egg Peritonitis)
(iii) द त आना (Diarrhoea)
(iv) लू लगना (Heat stroke)
(v) पैर सड़ना (Bumble foot)
(vi) मल वार का सड़ना (Ventgleet)
उ त कार के रोग अनेक कारक उदाहरणाथ - र त ाव शोफ (Oedema) इ या द के कारण
उ प न होते ह और इनके नि चत कारण को ात करना संभव नह ं है । इनक रोकथाम
करने से इनके भाव को कम कया जा सकता है ।
1.5 रोग का सारण (Transmission of Diseases) :
सं मण का मह वपूण ोत ऐसे वाहक प ी (carrier bird) होते ह, िजनके क ल ण प ट
नह ं होते ह । रोग फै लाने वाले कारक का वणन न न कार से कया जा सकता है ।
(अ) संसग वारा (By contact)
मेरे स रोग एक प ी से दूसरे प ी तक य संसग अथवा सं पश वारा फै ल
सकता है । अ य प से वातावरण वारा भी यह रोग फै ल जाता है । अ ययन
वारा ात कया गया है क सं मत कु कु ट के व ठा म वषाणु के कु छ कार
के ेन (Strain) व ठा क अपे ा लार (Saliva) सं मण का अ धक मह वपूण
ोत तीत होता है । कु कु ट क पंख क वचा से झड़ी हु ई को शकाओं म भी ये
वषाणु पाया जाता है ।
आहार म पर-चूण (feather meal) खलाने पर इस रोग के फै लने क संभावना
रहती है I
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(ब) बछावन वारा (By Litter)
बछावन वारा रोग फै लने के लए वै ा नक म मतै य नह ं है, पर तु बछावन
म इस रोग का वषाणु 16 स ताह तक जी वत रह सकता है, इससे संके त मलता
है क रोगफै लने म बछावन भी एक मुख ोत हो सकता है ।
(स) रोग वाहक वारा (By vectors)
ए फ टो बअस-डाईआपे रनस (Alphitobius diaperinus) नामक बीटल (better)
के वारा फै लता है । इसके शर र म मेरे स रोग के वषाणु पाये जाते ह, िजसे यह
बटल अपने लाव म व ट कर देती है ।
(द) कु कु ट चीचड़ी वारा (By fowl tick)
कु कु ट चीचड़ी (अरगस परसीकस) भी इस वषाणु क वाहक पाई गई है ।
ऐसे मुगा-मुग क स तान, िजनम वयं मेरे स रोग का सं मण अ य धक हो, इस
रोग से कम भा वत होते ह । इससे कट है क ये मुगा-मुग अपनी संतान म अ ड
के वारा पया त मा ा म तरोधी (antibody) भेजते ह, िजससे ये चूजे उन चूज
क अपे ा, िज ह तरोधी ा त नह ं होते ह, अ धक सीमा तक इस रोग के कोप
से बच जाते ह । पैतृक तरोधी वाले चूज म मृ यु दर भी कम होती है ।
इसके अ त र त श य च क सा उदाहरणाथ च च काटना (De beaking)] ट का लगाना
(Vaccination), कु कु ट गृह म अ धक भीड़ होना (over crowding) अथवा गृह प रवतन
करना इ या द याओं का रोग क ा यता (Susceptibility) पर अनुकू ल भाव पड़ता है।
1.6 रोग क रोकथाम के उपाय (Prevention of Diseases)
रोग क रोकथाम करने के पूव, इसके फै लाव एवं अ भ यि त का ान होना परमाव यक है
। य य प रोकथाम के अनेक उपाय ह, पर तु आ थक एवं योगा मक मह व क ि ट से
मा कु छ ह उपाय उपयोगी हो सकते ह, जो क नीचे वणन कये गये ह ।
1. प य को अलगाव (Isolation) म रखना, रोग से बचाव क सुगम व ध है, पर तु
यापक प म इसका उपयोग करना योगा मक प से संभव नह ं है और इस कार
से प य को रखने से यय भी अ धक होता है ।
2. न न ल खत व छता एवं ब ध संबंधी याओं से लाभ होता है:-
(i) समय-समय पर कु कु ट समूह का मेरे स रोग से सत होने का पर ण करना
चा हए ।
(ii) कु कु ट गृह म वायु संचालन (Ventilation) क उ चत यव था होनी चा हए ।
(iii) कु कु ट के कायकता वारा कोई अ य कु कु ट फाम पर काय नह ं करना चा हए।
(iv) कु कु ट गृह पर काय करने वाल को न य वसं मण कया हु आ कोट (ए न) तथा
गमबूट पहन कर काय करना चा हए ।
(v) कसी अ य ोत से चूज को फाम पर न रख कर उ ह एक दन क आयु से ह
पालना चा हए।
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(vi) समय - समय पर पुरानी बछावन को हटाकर कु कु ट-फाम क सफाई करनी चा हए।
(vii) सं मत वषाणु रोग से सत कु कु ट को रोग का नदान होते ह न ट कर देना
चा हए, य क इन रोग का कोई संतोष द उपचार नह ं है ।
रोग फै लने पर सावधा नयाँ (Precautions for checking spread of diseases):
(i) सामा य कु कु ट पालन संबंधी नयम का पालन आव यक है ।
(ii) रोग से मरे हु ये प य को जला देना चा हये या गाड़ देना चा हए ।
(iii) रोगी प ी, मरे हु ए प य क जाँच पशु च क सक / कु कु ट वशेष से अव य कराय ।
(iv) पशु च क सालय / कु कु ट वशेष क सलाह रोग के ल ण दखाई देते ह ा त कर ।
(v) वटा मन तथा ए ट बायो टक पानी अथवा आहार म नधा रत मा ा म द ।
(vi) समय - समय पर कु कु टशाला म क टाणु-नाशक दवा का छड़काव कर ।
(vii) रोगी, दुबल प य को अलग रख ।
(viii) रोगी तथा व य प य क देखभाल के लये अलग यि त रख ।
(ix) अनाव यक यि तय को मुग शाला म न जाने द ।
(x) समय पर रोग नरोधक ट के लगवाते रह ।
(xi) या त ा त थान से ह चूज खर दे ।
(xii) व थ प य का काय पहले कर ल एवं बीमार प य का बाद म, िजससे बीमार प य
से सं मण व थ प य म न आये ।
रोग क रोकथाम के लए न न ल खत स ा त को ढ़ता से अपनाना चा हए:-
(i) कु कु ट फाम पर आने वाले सभी कार के नए प ी मा णत पुलोरम (Pullorum) एवं कु कु ट
टाइफाइड (Typhoid) मु त समूह से ह लाये जाने चा हए । इसके साथ ह साथ यह भी
आव यक है क इस कु कु ट समूह म सालमो नला, माइको ला मो सस एवं ए वयन यूको सस
रोग के भी कोई संके त न मलते होने चा हए । एक बार व य कु कु ट समूह था पत हो
जाने के प चात नए प ी य नह ं करना चा हए और य द बहु त आव यक हो जाये तो मा
व छ समूह से ह य करना चा हए । य कये गये प ी पुराने प य से अलग रखे जाय।
(ii) कु कु ट गृह सावज नक सड़क से लगभग 30 मीटर तथा अ य कु कु ट गृह से लगभग 50
मीटर क दूर पर ि थत होने चा हए ।
(iii) प ी रखे जाने वाले आवास म जंगल प य एवं पशुओं के वेश विजत होना चा हए ।
आग तुक को भी यहाँ आने क छू ट नह ं होनी चा हए ।
(iv) कु कु ट के लए योग कये जाने वाला आहार व वसनीय सू से य कया जाना चा हए
और संदूषण र हत तथा भल भाँ त संतु लत होना चा हए ।
(v) फाम पर प य क नई खेप (batch) य करते समय रोग नवारण के सभी उपाय अपनाने
चा हए । इ यूवेटर आ द य क व छता तथा वसं मण नयमानुसार एवं नय मत प
से करना चा हए ।
(vi) प य को व थ बनाए रखने के लए उनके पोषण, संवातन, आवासीय यव था तथा ब ध
को उ चत मह व दान करना भी अ त आव यक काय है ।
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य द कसी कु कु ट समूह म कोई सं ामक रोग फै ल चुका हो तो उसक रोकथाम के लए न न ल खत
अ त र त सावधा नयाँ अपनानी चा हए:-
(i) पूणत: व थ कु कु ट को रोगी कु कु ट से अलग करके, उनके खाने-पीने एवं कायकता का
अलग से ब ध होना चा हए ।
(ii) रोगी प य का र त अथवा शर र का कोई भी तरल पदाथ कु कु ट-गृह के फश पर नह ं पड़ना
चा हए।
(iii) सभी रोगी प य को मार कर, जला द अथवा भू म म दबा देना चा हए ।
(iv) रोगी अथवा मृतक प य को छू ने के प चात लोर न अथवा डटॉल से हाथ धोने चा हए ।
(v) कु कु ट के बाड़ , उपकरण और आहार तथा पानी के बतन को गम पानी से धोने के प चात
2 तशत लाइसोल अथवा 5 तशत फनाइल के वलयन से उपचा रत करना चा हए ।
(vi) पीने के पानी म पोटे शयम परमगनेट मलाना चा हए, पर तु इसक मा ा इतनी हो क पानी
का रंग ह का गुलाबी हो जाए ।
उपयु त सभी उपाय बड़े तथा सु यवि थत कु कु ट फाम पर ह अपनाये जा सकते है, पर तु ामीण
वातावरण म, जहाँ कु कु ट ाय: बाड़ म न रखे जाकर वत घूमते रहते है, वहां व भ न समूह
के चूजे तथा मु गयाँ पर पर वत तापूवक मलते जुलते ह । कु कु ट कू ड़ा के ढेर पर घूमते और एक
साथ पानी पीते ह । इन प रि थ तय म न न ल खत उपाय करना चा हए ।
(i) ामीण कु कु ट पालक को पर पर सहयोग से रोग क रोकथाम के यास करने चा हए ।
(ii) छ: स ताह से अ धक आयु वाले चूज को रानीखेत और आठ स ताह से अ धक आयु वाल
को चेचक के ट क लगवा देना चा हए ।
(iii) आवासीय तथा आहार य दशाओं म सुधार करना आव यक है ।
(iv) रोग ार भ होते ह नकटवत पशु च क सक को सू चत करना चा हए और आव यकतानुसार
उसक सहायता लेनी चा हए ।
1.7 रोग नरोधी काय म एवं रोग नदान :- (Prophylactic
Programme):
यह काय म देश, भौगो लक े एवं कु कु ट समूह क क म के अनुसार भ न- भ न होते
ह । पर तु यह सवमा य है क सभी चूजा आहार म का सी डयो टेट मलाये जाने चा हए
। का सी डयो टेट ज म से 3 माह क आयु तक आहार म मलाया जाना चा हए । कु कु ट
आहार म तजीवी का भाव ु टपूण ब ध म अ धक भावशाल होता है । ब ध याओं
एवं व छता म सुधार करने से अ धक अ छे प रणाम क संभावना रहती है ।
आयु के थम स ताह म सभी चूज को रानीखेत (Ranikhet) का ट का लगाया जाना चा हए
। रानीखेत एफ का ट का एक दन क आयु म एक काँच क पचकार (dropper) वारा
औष ध लेकर एक बूँद आँख और एक बूँद नाक म टपका देना चा हए । रानीखेत रोग का अ म
ट का 6-8 स ताह क आयु म लगाया जाना चा हए । य द सं ामक वसनीय शोध का रोग
था नक प से पाया जाता हो तो 2-4 स ताह क आयु म इसके ट क लगाने से लाभ होता
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है । आजकल अनेक कार के म त यापा रक ट के उपल ध है और प य के उ पादन
करने से पूव इनक अनुवधक मा ा (Booster dose) द जा सकती है । थम अनुवधक
क मा ा, थम बार ट के लगाने के लगभग एक माह प चात और दूसर अनुवधक मा ा थम
अनुवधक मा ा देने के लगभग तीन माह प चात ह द जानी चा हए । उ पादक आयु भर
के लए प य को रोग म बना देना, योग क जाने वाल वे सीन (Vaccine) क क म
पर नभर करता है । बॉयलर चूँ क लगभग 1 1
2 माह क आयु तक ह रखे जाते ह । अत:
इ ह मा एक बार ट का लगाना भी पया त होगा । कु कु ट म चेचक (fowl pox) के ट के
लगभग एक माह क आयु म लगाए जाते ह और य द आव यक समझा जाता है तो उ पादन
ार भ करने के पूव एक बार और ट के लगा दए जाते है ।
माइको ला मो सस, कॉ सी डयो सस एवं कृ म (worms) क उपि थ त म रोग मी
वक सत करने म बाधा पड़ती है और ट के के वपर त भी भाव पड़ सकता है । अत: ट का
लगाने का काय म ार भ करने से पूव यह नि चत कर लेना परमाव यक है क इस कार
के सं मण को नयि त कर लया गया है । पैतृक रोग मी लगभग 2-3 स ताह तक रहती
है और इससे ाकृ तक रोग मी उ प न करने म बाधा पड़ती है । अत: बहु त अ धक आव यक
न होने तक युवा चूज को ट के नह ं लगाए जाने चा हए । ट का लगाने के लए वै सीन का
चयन उसके भाव एवं म दपन (Mildness) पर नभर करता है । वै सीन का योग कई
कार से कया जा सकता है, पर तु पानी के वारा इसका उपयोग अ या धक सुलभ है ।
य द कु छ प ी इस कार के पानी को न पीयगे तो उनम रोग मी वक सत न हो सके गी
। य य प यि तगत प से प य को ट का लगाना अ धक भावशाल है, पर तु यह बहु त
अ धक समय लगने वाला होने के कारण क ठन एवं प र मी है ।
अत: यह तीत होता है क रानीखेत, चेचक और सं ामक वसनीय शोध नामक रोग य द
था नक प से पाये जाते हो तो थान एवं कु कु ट समूह के यान को न रखते हु ए भी उनम
रोग मी का वकास करना चा हए । ज म से लगभग तीन माह तक क आयु तक कु कु ट
आहार म कॉ सी डयो टेट मलाया जाना चा हए ।
रोग नदान :-मानव एवं अ य पशुओं क भाँ त ह प य म रोग नदान एक ज टल तकनीक
या होती है । आमतौर पर व भ न प ी रोग का नदान कु कु ट पालक वारा ल ण
के आधार पर कर लया जाता है । कु छ रोग म वशेष द शत ल ण ह रोग वशेष क पहचान
होते ह । इनके आधार पर उ ह अ य रोग से वभे दत कया जा सकता है । इन ल ण
म वसन संबंधी दोष, ति का णाल का भा वत होना, सांस लेने म परेशानी आना, खाँसी
आना ( वसन संबंधी रोग जैसे कौराइजा स.आर.डी, आई.बी, आई.एलट . इ या द) इसी कार
पंख अथवा पैर क पे शय का लकवा हो जाना (मेरे स), हरे अथवा सफे द रंग के द त लगना
(आर.डी. अथवा रानीखेत, बी. ड यू .डी.) आ द है ।
15
इसके अ त र त सं ामक रोग को पहचान जीवाणु / वषाणु / परजीवी वभाव, इसके फै लने
क ती ग त, अ धक प य के सत होने तथा उ च मृ यु दर आ द द शत ल ण के
आधार पर क जा सकती है । योगशाला म रोग क जाँच के लए बीट के नमूने, र त पर ण,
ाव क जाँच आ द योगशाला पर ण कर रोग नदान कया जा सकता है । र त पर ण
म खून के अ दर परजीवी क जाँच के साथ सं मण क अव था म उसक ती ता, गुणन
के वषय म जानकार ा त होती है । इसी कार बीट क जाँच म व भ न अ त: परजीवी
पर ण कर परजीवी क कृ त का शान हो जाता है । प य म व भ न वषाणुज नत रोग
एवं कु छ जीवाणुज नत रोग क सीरम पर ण कर ए ट जन, ए ट बॉडी जाँच जैसे ए लु टनेशन
(Agglutination Test – Plate & Tube Agglutination), सीरम यू लाईजेशन
(Serum Neutrilization) एवं एलाइजा जाँच (Elisa) कर रोग का पता लगाया जाता है
। प ी चूँ क समूह म रहते ह । समूह के एक प ी क मृ यु होने पर शव पर ण कर पाये
जाने वाले वशेष लजन (Pathognomic Lesions) के आधार पर शी जाँच क जा सकती
है । अ धक मृ यु दर क ि थ त म शव पर ण एक वशेष कारगर पर ण स होता है
एवं शी नदान कर उपचार कया जा सकता है । कु कु ट पालक को चा हए क वह शी
अ तशी मृत प ी का योगशाला म शव पर ण कराकर उपचार ार भ कर देव, ता क
रोग के फै लाव को अ य व थ प य म फै लने से रोका जा सक । अ य योगशाला पर ण
म जीवाणु ज नत सं मण क ए ट बायो टक स स ट वट जाँच (Antibiotic Sensitivity
Test) कर, सं मण के कार एवं उपचार म योग लये जाने वाल ए ट बायो टक औष ध
के चयन म सु वधा रहती है, िजससे शी उपचार के साथ रोग के बचाव म होने वाल आ थक
हा न को रोका जा सकता है ।
1.8 सारांश :
इकाई म व णत सभी ब दुओं का व तृत अ ययन करने के प चात यह न कष आसानी
से नकाला जा सकता है क कु कु ट पालक को व भ न रोग क पूण जानकार जैसे कारण,
ल ण आ द के वषय म ान है, तो वह ना सफ कु कु ट शाला म रोग के सारण एवं फै लाव
को रोक सकता है, अ पतु समय रहते उसके बचाव एवं रोकथाम के यापक एवं पु ता ब ध
भी कर सकता हे, िजससे कु कु ट पालन म रोग से होने वाल आ थक हा न को रोका जा सकता
है । कु कु ट शाला म व छता, हाइिजन के उपाय, जै वक सुर ा ब धन एवं सं ामक रोग
का ट काकरण कर होने वाल त काफ हद तक कम क जा सकती है ।
16
17
इकाई – मु गय के सं ामक रोग, उनक रोकथाम एवं बचाव
छू तदार रोग
इकाई - 2
2.0 उ े य
2.2 तावना
2.3 व भ न सं ामक रोग एवं बचाव
2.4 ल ण के आधार पर वभे दत वणन
2.5 शव पर ण के आधार पर वभे दत वणन
2.6 सं ामक रोग क पहचान एवं नदान हेतु भेजे जाने वाले नमून का वणन एवं जरवे टव
2.7 छू तदार रोग एवं योगशाला पर ण
2.8 सारांश
2.0 उ े य :
सं ामक रोग सं मण से फै लते है । सभी सं मण प य के व भ जै वक अंग को भा वत
करते है, उ ह त पहु ँचाते है तथा यह मृ यु का कारण भी बनते है । ईकाई म मुख प
से सं ामक रोग के कार, उनके सार, ल ण, शव पर ण एवं कारण का व तृत क तु
वभे दत नदान यु त (Differential Diagnosis) ववेचन कया गया है, ता क प ीपालक
व भ न रोग क पहचान सह कार से कर सक, कोई म ना रहे, साथ ह ईकाई का उ े य
सं मण क अव था म रोगी प ी से कौन से नमूने ा त कये जा सकते है । उ ह कै से संधा रत
/ संर त (Preserve) कया जावे तथा नदान हेतु नमून को कै से े षत कया जावे,
इसकाभी वणन कया गया है, ता क बचाव एवं रोकथाम के समय रहते बेहतर उपाय कये
जा सके ।
2.1 तावना
सभी छू तदार रोग सं मण से फै लते ह,यह आव यक नह ं है क सभी सं ामक रोग छू ने से
ह फै ले । इस मूल मं को यान म रखते हु एइकाई म सं ामक एवं छू तदार रोग क या या
क गई है । सं मण कसी भी कार का हो, चाहे वह जीवाणु या वषाणु हो अथवा परजीवी
या फफूं द हो, उसे सारण हेतु कसी ना कसी मा यम क आव यकता होती है । सं मण
परो प से सीधा स पक म आने अथवा अपरो प से हवा, दू षत वातावरण, म खी,
म छर, जूँ चीचड़ी अथवा अ य क ट के कारण या अ य कसी भी कारण से हो सकता है
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। सीधा स पक, या न रोगी प ी के वारा ा वत पदाथ जैसे सं मत लार, बीट, आँसू पंख
आ द जब कसी व थ प ी के दाना-पानी, बतन, लटर, मुग शाला के उपकरण आ द के
स पक म आते ह उ ह ये ाव दू षत कर देते है एवं जैसे ह व य प ी इनका योग
करता है अथवा स पक म आता है, रोगी बन जाता है । इसी कार कई सं ामक जीवाणु
एवं वषाणु पोर बनाते ह एवं उनके अ दर कई दन तक, कई बार कई वष तक जी वत
रहते ह, क तु जैसे ह अनुकू ल वातावरण (जैसे उ चत तापमान, जलवायु, शु कता, नमी)
इ ह ा त होता है, ये पोर से वघ टत होकर हवा, पानी, मनु य, पशु, प ी अथवा अ य
मा यम से एक थान से दूसरे थान पर दूर थ थान पर या आवागमन करते है तथा एक
ह साथ, थान वशेष पर वकट रोग उ प न करते है तथा महामार का प ले लेते है ।
अ धकांश वषाणुज नत प ी रोग इसी ेणी म आते है एवं कु कु ट पालन को भार आ थक
हा न उठानी पड़ती है । रोग क ती ता, मा यम, कारण एवं सारण के आधार पर सं मत
प य क कु ल सं या (Morbidity Rate) साथ ह सं मत प य क कु ल सं या म से
मृत प य क सं या (Mortality Rate) नधा रत होती है । जब कसी रोग वशेष से सभी
सं मत प य क मृ यु हो जाये, तो रोग अ य त घातक रोग क ेणी म आता है, जैसे
रानीखेत, ग बोरो, पुलोरम इ या द ।
(i) ए डे मक (Endemic) - कसी िजले अथवा थान वशेष पर जब कोई रोग बार-बार
एवं लगातार थाई प से फै ले तो ऐसे रोग Endemic Diseases कहलाते है ।
(ii) ए पडे मक (Epidemic) प जब कोई वशेष रोग एक थान पर एक साथ अ धक
प य को भा वत कर तथा जो एक थान से दूसरे थान पर सा रत हो जावे
और अ धक मृ यु का कारक बने तो उसे Epidemic कहते है । इस रोग क व तार
सीमा बहु त अ धक होती है ।
(iii) पे डे मक रोग (Pandemic) :-Wide spread epidemic जब कोई रोग एक
थान से दूसरे थान पर या न अपे ाकृ त बहु त बड़े भाग म सा रत हो, कई बार
यह रोग एक देश से दूसरे देश म (overseas) फै ल जाते है, रोग सारण क इस
ेणी को Pandemic कहा गया है । जैसे वतमान म बड लू।
(iv) पोरे डक (Sporadic) :- जब कसी रोग वशेष से कु छ एक अथवा कम प ी
भा वत या सं मत हो, ऐरने रोग Sporadic Diseases क ेणी म रखे जाते
है । जैसे- तं से संबंधी रोग, Egg bound condition / canabalism आ द।
इस इकाई म सभी सं ामक एवं छू तदार रोग का समावेश कया गया है तथा उ ह
Differential Diagnosis के आधार पर व णत कया गया है, य क इ ह व तृत ववे चत,
जीवाणुज नत / वषाणुज नत / परजीवीज नत / फफूं द ज नत आ द अ याय म पृथक से कर
दया गया है ।
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2.2 व भ न सं ामक रोग एवं बचाव :
2.2.1 जीवाणुज नत रोग-कारण
(i) ई. कोलाई सं मण - E. Coli
(ii) पुलोरम रोग - Salmonella. pullorum
(iii) कोराईजा रोग - aemophilus. gallinarium
(iv) फाउल कॉलरा - asteurella. multocida
(v) बोटु लज - Clostridium. botulinum
(vi) ा नक रे पाइरे
डजीज (C.R.D.)
– Mycoplasma. Gallisepticum
2.2.2 वषाणुज नत रोग
(i) रानीखेत रोग(R.D) - रानीखेत रोग वषाणु ( म सो वायरस)
(ii) ग बोरो रोग (I.B.D) - ग बोरो रोग वषाणु ( रयो वायरस ( रयो))
(iii) मेरे स रोग (M.D.) - मेरे स रोग वषाणु (हरपीज़ वाइरस)
(iv) ल ची रोग - ऐ डनो वाइरस
(v) इ फे सीयस ो ाइ टस - इ0 ो0 वषाणु ( मकस वायरस)
(vi) इ फे सीयस लैरेज ेकाइ टस - आई.एल.ट . वषाणु (हरपीज़ वाइरस)
(vii) फाउल पॉ स - फाउल पॉ स वषाणु पॉ स वाइरस
2.2.3 परजीवी ज नत रोग
(i) गोल कृ म सं मण - Heterakis. gallinae
(ii) गेप व स - yngamus. tracheal
(iii) फ ता कृ म - Rallietina. sps
(iv) कॉ सी डयो सस - Eimeria. sps
2.2.4 ोटोजोआ ज नत रोग
(i) ह टोमो नऐ सस - Histomonas. melegridis
(ii) टो सो लाजमो सस - Toxoplasma. gondii
(iii) पाईरो कटो सस - Borrelia. anserina
(iv) पाइरो लाजमो सस - Aegyptianella. pullorum
(v) पेनोसोमो सस - Trypanosoma. avium
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2.2.5 फफूँ द ज नत रोग
(ii) ए परिजलो सस - Aspergillus. fumigatus
Aspergillus. flavus
2.3 ल ण के आधार पर वभे दत वणन :
2.3.1 जीवाणुज नत रोग
(i) ई. कोलाई सं मण - एयर सै युलाई टस, ओमफे लाई टस,
पे रटोनाई टस, एि टराइ टस, काँल
से ट समीया, कोल ेनुलोमा, ( लवर व
आँत पर युमर), अ डा उ पादन कम,
द त लगना ।
(ii) पुलोरम रोग - पँख लटकना, द त लगना, चूज म सफे द
पतले द त, ूडर म एक होना, अ धक
मृ यु दर ।
(iii) कोराइजा रोग - छ ंक आना, नाक से बदबूदार चप चपा
गाढ़ा पदाथ (Mucus) आना, चेहरा सूजा,
आँख ब द, बैटल सूजे हु ए ।
(iv) फाउल कालरा - बैचेन होना, माँस पे शय का घटना,
उ पादन कम, हरे द त, सर काला पड़ना,
लकवा होना ।
(v) बाटु ल म - पँख व पैर का लकवा होना, गदन का ल बी
होना, आँख धंसी रहना, पँख ढ ले होना एवं
कोमा क ि थ त ।
(vi) ा नक रेि परेटर डजीज
(CRD)
- साँस म क ठनाई, नाक से ड चाज, े कया
म रेट लंग क आवाज, े ट का कमजोर
होना ।
(vii) ग ीनस डरमेटाइ टस - पैर म एवं वचा पर घाव व बदबू आना,
वचा पर छ होना, कानावा ल म पँख
नोचना, एनी मया आ द ।
2.3.2 वषाणुज नत रोग :
(i) रानीखेत रोग (R.D) - हरे पतले द त लगना, अ या धक मृ यु दर,
वास लेने म क ठनाई एवं वशेष आवाज
(Rales) आना, उ पादन म भार कमी,
21
गेस पंग, खांसी आना, अ डे का छलका
कमजोर होना ।
(ii) ग बार रोग (I.B.D) - प ी का सु त होना, कं पकं पी आना,
अ यवि थत पंख, बरसा म सूजन और
पतले द त लगना ।
(iii) मेरे स रोग - मु गय म लकवा पाया जाता है, ेआई
अथवा पल आई, तीन माह के उ के
प य म ल ण दखाई देते ह, एक पैर
आगे तथा एकमुड़ा हु आ, पँख गरे हु ए, पैर
व पँख सूजे हु ए ।
(iv) ल फाइड यूको सस (L.L.) - 16 स ताह या अ धक आयु पर युमर या
गाठ पाई जाती है । पैर म लड़खड़ाहट,
क तु लकवा नह ं बरसा म युमर
(Tumors)
(v) ल ची रोग - अ डा उ पादन म कमी, बॉयलर म अ धक
ती ता, माँसपे शय एवं अवयव म हैमरेज
एनी मया आ द, 3-6 स ताह के चूज म
अ धकI
(vi) इं फे सीयस ां काइ टस - स दय म अ धक पाया जाता है, कम उ
क मु गयाँ अ धक भा वत, साँस म
गेि पंग रे स, नाक म युकस, युमो नया,
आँखे नम व सूजी हु ई, आहार कम ।
(vii) इं फे सीयस लै रंगो ेकाइ टस
(I.L.T.)
- समय गदन ल बी होना, नाक से ड चाज,
वेटर पर सूजन, खाँसी के साथ खून भरा
यूकस आना ।
(viii) फाउल पॉ स - को ब चेहरा, वेटल पर दाने, प पल अथवा
के ब (Scab) पाये जाते ह । मुँह क अ दर
क ले मा पर भी दाने पाया जाना, 2-4
स ताह क उ पर अ धक भावशाल ,
अ डा उ पादन कम ।
2.3.3 परजीवी ज नत रोग
(i) गोला कृ म - खून क कमी होना, प ी कमजोर, सु त
व कभी-कभी लंगड़े होना, बीट पतल ,
खूनी द त लगना
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(ii) फ ता कृ म - खूनी पे चस, लंगड़ापन, कमजोर आ द
2.3.4 ोटोजोआ ज नत रोग
(i) लू काँ ब - कलंगी का नीला पड़ना, नई फसल (गेहू ँ)
आने पर रोग क संभावना, अ धक ठंड
लगना, वजन घटना, र तवा हनीयाँ
उभर हु ई, सफे द पानी जैसे द त, कम
उ पादन, मृ यु दर अ धक व मृ युपूव
काँपना ।
(ii) ह टोमो नऐ सस रोग ( लैक हेड) - वजन म कमी, बीट का रंग गंधक जैसा
पतल बीट व चीजी पदाथयु त
(iii) टा सो लाजमो सस - मनु य म फै लने का खतरा, वजन म
कमी, क ल बोन का दखना, े ट क
माँसपे शयाँ कम होना, तापमान बढ़ना
आ द ।
(iv) ( पाइरोक टो सस - तापमान बढ़ना, पैर पर सूजन, को ब का
पीला पड़ना, सु त व हरे द त लगना,
लकवा होना तथा खून क कमी होना ।
(v) पायरो लाजमो सस / - कमजोर होना, वजन म कमी, ताप म
बढ़ना, लकवा पेनोसोमो सस क तु
र त पर ण करने पर तुर त पहचान
संभव
(vi) का सी डयो सस - सफे द द त, खूनी द त लगना,
एनी मया, वजन मे कमी, अ धक मृ यु
दर (50- 100 %) ,लड़खड़ाना, धीरे-धीरे
मृ यु होना, अ डा उ पादन म भार
गरावट होना, बीट के साथ खून आना ।
2.3.5 फफूं द ज नत रोग
(i) ए परिजलो सस - खाना-पीना छोड़ देते है, वास म
क ठनाई, भार आवाज, रेट लंग क
आवाज, तथा अंधापन आना ।
23
2.4 शव पर ण के आधार पर वभे दत वणन :
(i) ई. कोलाई सं मण - आँत म सूजन, भ ती मोट होना,
दय म Straw रंग का य अथवा
ल वर व आँत म यूमर
(ii) पुलोरम रोग - दय क झ ल म पीला पानी भरना,
डशे ड या बगड़ी आकृ त के ओवा
(ova), आँत पर दाने एवं पील -सफे द
बीट
(iii) कोराइजा रोग - च च दबाने पर ना सका से चीजी
यूकस आना, े कया म क जेशन व
चीजी पदाथ
(iv) फाउल कॉलरा - गजाड ोवे ट कू लस, दय एवं आँत
पर पट क यल ( पन पाउ ट) हेमोरेज
एवं Necrotic Foci पाया जाना।
(v) ा नक रेस परेटर डजीज(C.R.D) - वास क नल म युकस, ल वर के
भाग से लेकर दय तक सफे द झ ल ,
े कया म हेमोरेज एवं चीजी पदाथ
(vi) रानीखेत रोग (R.D) - ोवे ट कु लस क भ ती मोट तथा
उसम पेपील पर पट क यल ( पन
पाउ ट) हेमोरेज या लाल दाने, आँत
सूजी हु ई तथा उनम हर पतल बीट ।
(vii) ग बोरो रोग (I.B.D.) - पेर क माँसपे शय म लाल च क ते
अथवा हेमोरेज बरसा फे कस बढ़ा
हु आ तथा सूजन व सये टक नव क
धा रयाँ (striations) का नह ं
दखलाई देना ।
(viii) मेरे स रोग (M.D) - पँखे क जड़ म Nodules, नायु
सूजे हु ए व Nodules या गाठ ।
(ix) ल फाइड यूको सस (L.L.) - ल वर का आकार कई गुना बढ़ा हु आ व
त ल आकार म दुगनी होना ।
(x) ल ची रोग - दय ल ची समान दखलाई देता है ।
(xi) इं फे सीयस ां काइ टस - फे फड़ म सूजन व क जेशन वसन
न लका म मुकरा अथवा चीजी पदाथ
(xii) कृ म रोग - आँत सुजी हु ई तथा उनम परजीवी के
24
लावा दखलाई देना ।
(xiii) पाइरोक टो सस - पील न व ल वर बढ़े हु ए,
पेर कारडाई टस एनी मया आ द
(xiv) कॉ सी डयो सस - आँत तथा सीकम म सूजन व र त
पाया जाना, योगशाला पर ण म
Oocysts का पाया जाना ।
(xv) ए परिजलो सस - फे फड़ म फोड़े अथवा Abscess,
Airsac म cheese पदाथ पाया
जाता है । Comb पर ध बे, सफे द
च ह ।
2.5 सं ामक रोग क पहचान एवं नदान हेतु भेजे जाने वाले नमून
का वणन एवं जरवे टव :
(i) रानीखेत रोग – Pieces of liver, spleen
trachea, bronchi lungs,
Proventiculus in 50%
buffered Glycerine saline or
on ice, 10% neutral formol
saline.
(ii) ग बोरो डजीज - Bursa of Fabricious, paired
serum, cut Pieces of
visceral organs, in
Transport Media or on ice,
10% neutral formol Saline.
(iii) मुग चेचक-फाउल पॉ स - छोटे-छोटे दान के Scabs को 50%
ि लसर न सेलाइन (Glycerine
Saline) या PBS के घोल म भेज
I
(iv) ए.एल.सी (A.L.C.) - िजगर, त ल तथा या टक नव को
10% फारमेल न घोल म।
(v) Infectious Bronchitis (IB) - Swabs from Exudate and
lungs paired serum,
25
Trachea and bronchi in 50%
buffered Glycerine.
(vi) Marek’s disease - Feather follicles from chest
and neck, Paired serum,
Pieces of visceral organ
and peripheral nerve in
Transport media or on ice,
10% formalin.
(vii) ा नक रे पाइरे डसीज (CRD) - सीरम के नमूने बफ म ।
(viii) टक फ वर (Tick Fever) - त ल तथा ल वर को 10%
फारमोल न घोल म, र त क लाईड
बनाकर मथाइल ए कोहल म टेन
के उपरा त भेज ।
(ix) Pullorum Diseases
(B.W.D)
- Blood in EDTA, paired sera
samples cut pieces of
visceral organs on ice or in
10% formalin in sterile vial,
faecal swabs.
(x) मुग हैजा (Fowl Cholera) - र त लाईड बनाकर एवं िजगर,
त ल , आँत के ऊपर भाग को 10%
फारमोल न के घोल म भेज ।
(xi) राउ ड वम - गोलक ड़े
टेप-वम - ल बे क ड़े
- ताजे मल 'बीट' को 10%' फारमेल न
के
घोल म भेज अथवा नमक के संतृ त
घोल म । क ड़ को 10% फारमेल न
अथवा ऐ कोहॉल म भेज ।
(xii) खूनी द त (Coccidiosis) - आंत तथा सीकम से ा त र त
रंिजत बीट को 20% पोटे शयम
डाइ ोमेट (Potassium
Dichromate)के घोल म भेज ।
2.6 छू तदार रोग एवं योगशाला पर ण :
छू तदार रोग - योगशाला पर ण
(i) रानीखेत रोग - वायरस यू लाईजेशन टे ट
26
ह मए लूट नेशन इनह वशन टे ट
(H.I.), लोरोसट ए ट बॉडी टे ट
(FAT), ए जाइम लं ड
ईमुनोएवसोरवट ऐसे ELISA के
लए Diagnostic Kit (EISA)
उपल ध है ।
(ii) ग बोरो रोग - एनीमल इनाकु लेशन टे ट EISA:
Commercially available kit
is present For EISA
(iii) मेरे स रोग - इनडायरे ट ह मए लूट नेशन
इनह वशन (Indirect HI) टे ट
अगार जेल स पटेशन टे ट
(AGPT) या अगार जेल
इमुनो ड युजन टे ट मेरे स रोग के
लए AGID टे ट लगाने के लए
मेरे स हाइपरइ युन ए ट सीरा
उपल ध है।
(iv) पुलोरम रोग - (i) सालमोनेला - कलड ए ट जन से
लेट टे ट लगाते है, िजसम
सं मत प ी क र त को लाइड
के ऊपर ए ट जन के साथ मलाने
पर र त फट जाता है ।
(Agglutination) - रोग नह ं होने
क अव था म ए ट जन और र त
मल जाते है ।
(ii) सालमोनेला पुलोरम लेन
ए ट जन - इस पर ण म सीरम के
व भ न Dilutions के साथ टे ट
यूब म लेन ए ट जन मलाते है ।
सं मत प ी के सीरम म यूब म
अव ेपन (Agglutination) पाया
जाता है । ( व थ प ी के
Agglutination नह ं आता)
(v) कॉ सी डयो सस - बीट का पर ण करने पर High
Power Microscope के योग
27
से Slide के ऊपर आइमे रया के
Oocyst दखलाई दे जाते है ।
(vi) बड लू - ELISA
AGID
HI
Chick embryo Inoculation
Test
(vii) फाउल पॉ स - HA, HI Tests,
Virus Nentrillazation Test.
(viii) फाउल कालरा - Rapid whole Blood –
Agglutination Test AGID
2.7 सारांश
सं ामक एवं छू तदार रोग का इलाज क अपे ा बचाव एवं रोकथाम के उपाय कया जाना
अ धक सुर त होता है, य क एक तो इन रोग से मृ युदर अ धक एवं इतनी शी होती
है क समु चत ईलाज का समय नह ं मल पाता, दूसरे ईलाज पर कया जाने वाला यय भी
काफ अ धक होता है । अत: बेहतर यह है क इन रोग क समय रहते पहचान कर (ल ण
के आधार पर) अथवा शव पर ण कराके या योगशाला के से पल भेजकर जाँच करा ल
जाव एवं तदनुसार समय पर रोग वशेष का ट काकरण मय बू टर डोज के कर लया जावे
। सं ामक एवं छू तदार रोग के लए इस तरह के बंधन को ह ाथ मकता द जानी चा हए।
2.8 नावल :
.1 सं ामक एवं छू तदार रोग म भेद क िजए?
.2 सं ामक रोग का सारण कन- कन मा यम से हो सकता है? छू तदार रोग कै से फै लते
है ।
.3 सं ामक रोग को ल ण के आधार पर कै से पहचाना जा सकता है?
.4 शव पर ण के आधार पर रोग का नदान कै से कया जा सकता है?
.5 छू तदार रोग मेरे स एवं पुलोरम क योगशाला म या- या पर ण कर पहचान क
जा सकती है?
.6 न न के पेथो नो मक वशेष ल जन या है?
(i) रानीखेत (ii) ग बोरो रोग (iii) सी.आर.डी.
.7 न न रोग म योगशाला पर ण कर कै से जाँच क जा सकती है?
(i) कॉ सी डयो सस (ii) पाइरोक टो सस (iii) रानीखेत
28
29
इकाई : जीवाणु ज नत प ी रोग एवं उपचार
इकाई - 3
3.0 उ े य
3.1 तावना
3.2 वग करण से संबं धत श द का ववरण
बै ट रया: जीवाणु
ए ट बायो टक: त जीवाणु पदाथ
3.3 ई. कोलाई सं मण (E. Coli Infection)
3.3.1 .कारण
3.3.2 सारण
3.3.3 ल ण
3.3.4 नदान, बचाव एवं उपचार
3.4 पुलोरम रोग, बेसीलर हाइट डाय रया (B.W.D.)
3.4.1 प रभाषा
3.4.2 कारण
3..4.3 सार
3.4.4 ल ण
3.4.5 शव पर ण
3.4.6 रोग नदान
3.4.7 उपचार एवं बचाव
3.5 कोराइजा इ फे शीयस कोराइजा (Infection Coryza)
3.5.1ल ण
3.5.2उपचार एवं नयं ण
3.6 कॉलेरा फाउल कॉलेरा (Fowl Cholera)
3.6.1 सारण
3.6.2 ल ण
3.6.3 शव पर ण
3.6.4 बचाव एवं उपचार
3.7 बोटू ल म (Botulism)
3.7.1 प रभाषा
3.7.2 ल ण
3.7.3 शव पर ण
30
3.7.4 बचाव एवं उपचार
3.8 ा नक रे पाइरे डजीज (C.R.D.)
3.81. सारण
3.8.2 ल ण
3.8.3 शव पर ण
3.8.4 बचाव एवं उपचार
3.9 ऑमफे लाई टस (Omphalitis)
3.9.1 ल ण
3.9.2 शव पर ण / बचाव एवं उपचार
3.10 ग ीनस डरमेटाई टस (Gangrenous Dermatitis)
3.10.1 सारण
3.10.2 ल ण
3.10.3 बचाव / उपचार
3.0 उ े य:
मु गय म सं मण से होने वाले रोग म जीवाणु ज नत सं मत रोग से होने वाल मृ युदर
काफ अ धक रहती है, भ न- भ न जीवाणु के सारण एवं सं मण को जीवाणु क कृ त
के वषय म जानकर, उनसे होने वाल त का आकलन कर, तजीवाणु औष धय
(Antibiotic) के योग से रोग से बचाव के साथ-साथ उसका इलाज कया जाना आसान रहता
है । भ न- भ न कृ त के जीवाणुओं पर वशेष कार के ए ट बायो टक औष ध का भाव
भी सट क रहता है एवं ए ट बायो टक सेि स ट वट पर ण योगशाला म कर शी ह रोग
का भावी उपचार संभव है, िजससे रोग के उपचार पर कये जाने वाले आ थक भार को भी
कम कया जा सकता है ।
ल ण के आधार पर जीवाणुज नत रोग क पहचान करने के साथ-साथ ह इन रोग का
योगशाला म पर ण आसानी से कया जा सकता है एवं शी ह भावी नतीजे सामने आ
जाते है ।
3.1 तावना :
इस इकाई म मु गय म होने वाले सभी मु य जीवाणुज नत रोग का समावेश कया गया
है । जीवाणुज नत रोग के सारण के तर के के वषय म जानकर उसका भावी नयं ण कया
जा सकता है । सामा यत: अ धकांश जीवाणुज नत प ी रोग मलते-जुलते ल ण द शत
करते है, िजसके कारण थम टया उनम भेद करना क ठन होता है, क तु यहाँ येक
जीवाणुज नत रोग के लए वशेष द शत ल ण का उ लेख कर शी नदान कये जाने
का यास कया गया है।
31
जीवाणु के कार के आधार पर एवं उसक Virulence या न बीमार पैदा करने क मता
के वषय म भी चचा क गई है, व भ न तं पर पड़ने वाले वपर त भाव का भी उ लेख
कया गया है ।
जीवाणु क कृ त के आकलन एवं उससे पड़ने वाले भावी भाव को जानकर रोग का समय
पर नय ण एवं उपचार कया जा सकता है । इन रोग से प ी क मृ यु होने पर अ य
प य म सं मण के सारण को, मृत प ी का शव पर ण कर रोका जा सकता है । इस
कार प ी गृह म होने वाल मृ युदर काफ कम हो जाती है ।
कु छ जीवाणुज नत प ी रोग जूनो टक रोग होते ह, जैसे सालमोनेला सं मण (पुलोरम रोग)
मनु य म भी सं मत अ ड अथवा सं मत मुग वारा दये गये अ ड के उपयोग से फै ल
सकते ह एवं मनु य म रोग का कारण बनते ह । इन रोग का प य के र त अथवा सीरम
पर ण कर समय पर मनु य म सा रत होने से रोका जा सकता है ।
इकाई म सभी आव यक वै ा नक जानका रय का समावेश इन रोग के प ी एवं मनु य
म पड़ने वाले दु भाव को कम करने के उ े य से कया गया है ।
3.2 वग करण से संबं धत श द का ववरण
बै ट रया : जीवाणु
ए ट बायो टक : त जीवाणु पदाथ
3.3 ई. कोलाई स मण:
प य का यह एक जीवाणु ज नत रोग है, िजससे कई कार के सं मण प य म हो सकते
ह । इस जीवाणु वारा कोल बेसीले सस, एगपेर टोनाइ टस, एयरसे यूलाइ टस,
साल पंगजाई टस, हजारे डजीज, कोल से ट सी मया आ द रोग के ल ण देखे जा सकते ह
।
सामा यत: यह जीवाणु पशुओं, प य एवं मनु य आ द के पेट एवं आंत म पाया जाता
है । ेस एवं अ य अव थाओं म हो ट को सं मत कर व भ न रोग कट करता है ।
3.3.1 कारण एवं सारण:
 इ चेरे शया . कोलाई, ाम नेगे टव रोड शेप जीवाणु, ये जीवाणु रोग उ प न करने म
स म होते ह और ये वष (Toxin) भी बनाते ह, िजससे द त लग जाते ह ।
 यह जीवाणु एक वशेष कार के मी डया ई .एम.बी. अगार पर वृ करता है एवं इसक
कोलोनी अगार लेट पर धातु जैसी चमक पैदा करती है, िजससे इस जीवाणु को आसानी
से पहचाना जा सकता है। यह ले टोज नामक शकरा का उपयोग कर अ ल उ प न करता
है।
 इस रोग का सार अ ड के मा यम से हो सकता है, िजससे चूज म अ य धक मृ यु
दर देखी जा सकती है ।
32
3.3.2 सारण :
 लटर व बीट रोग को फै लाने म सहायक है, जब क पो फाम म पाया जाने वाला ड ट
(धूल कण) िजसम अनुमा नत 105
से 108
' तक ई. कोलाई के जीवाणु पाये जा सकते
ह, जो क सं मण के लये पया त है ।
 दू षत पानी वारा यह रोग अ धक फै लता है ।
 मुँह एवं हवा के मा यम से यह सं मण फै ल सकता है ।
3.3.3 ल ण:
 कॉल से ट सी मया - र त म जीवाणु के मलने से यह अव था कट होती है एवं इसम
सव थम गुद एवं दय क झ ल म सूजन तथा दय म ा कलर का तरल पदाथ
मलता है ।
 एयरसे यूलाइ टस - र त से अथवा सीधे ह वास नल से यह जीवाणु फे फड़ म पहु ँच
कर एयरसे यूलाइ टस नामक रोग कट करता है, िजसम उ पादन कम होना, खाँसी आना
तथा रेट लंग आ द ल ण दखलाई देते ह । इसम नमो नया नामक रोग भी हो जाता
है ।
 से ट समीया के कारण ओवीड ट म भी यह सं मण पहु ँच जाता है, िजससे अ डा उ पादन
कम हो जाता है एवं सं मत अ ड का उ पादन होने लगता ह i
 चूजे क ना भ वारा सं मण वेश कर ओमफलाइ टस रोग के ल ण दखलाता है, जब क
एयरसे यूलाइ टस के भाव के साथ पेरेटो नयम झ ल म सूजन पाई जाती है, िजसे
एगपेर टोनाइ टस कहते ह ।
 एंटेराइ टस - ई. कोलाई का आंत म सं मण एं ाइ टस नामक रोग पैदा करता है, िजससे
आंतो के अ दर क सतह पर सूजन पाई जाती है व प ी पतल बीट जैसे ल ण कट
करता है । इस अव था म आंत म अ य सं मण जैसे क आइमे रया जा त के लगने
क संभावना रहती है ।
 कोल े यूलोमा अथवा हजारे डजीज - आंत एवं ल वर पर जगह जगह यूमर या गांठे
दखाई पड़ती ह । इस अव था को कोल े यूलोमा कहते ह I
3.3.4 नदान, बचाव एवं उपचार:
 कु कु ट शाला के ब धन एवं हाइजीन का वशेष यान रख । मुग गृह क सफाई, आहार
व पीने के पानी के बतन, क टाणु नाशक औष ध का योग कर साफ करने चा हए ।
 ेस क अव था जैसे डीवी कं ग डीबीक म थान प रवतन आ द म वशेष सतकता बरतते
हु ए ए ट बाइयो टक व वटा मन का योग उ चत रहेगा ।
 मुग गृह म वे ट लेशन उपयु त रहे एवं नमी न रहने पाये ।
 यथासमय लटर बदल देव, वशेषकर येक सं मण के प चात् ऐसा करना आव यक
है ।
 साफ पानी पलाये । यह रोग दू षत पानी वारा भी उ प न होता है ।
33
3.4 पुलोरम रोग, बेसीलर हाईट डाय रया (B.W.D.):
3.4.1 प रभाषा:
पुलोरम रोग सभी प य मेम स (खरगोश, ब दर, लोमड़ी) आ द के अ त र त मनु य म
भी होता है । जीवाणु ज नत यह रोग बेसीलर हाईट डाय रया के नाम से भी जाना जाता
है । चूज मे यह उ प से तथा बड़े प य म यह ो नक प म पाया जाता है । हाईट
लेग हॉन जा त इस रोग से अपे ाकृ त कम भा वत होती है।
3.4.2 कारण:
 सालमोनेला .पुलोरम नामक जीवाणु - इस रोग का पर ण ए ट जन टेि टंग के आधार
पर कया जाता है ।
3.4.3 सार:
 सं मत प य से ा त अ ड से यह रोग उ प न चूज तथा मनु य म फै ल सकता
है । (एग ांस मशन)
 बीट से दू षत दाना पानी अथवा ो पं स, सं मत लटर वारा इस रोग का सार होता
है ।
 सं मत प य वारा उ प न चूजे इस रोग के सार म अ य त मह वपूण भू मका
नभाते ह तथा भा वत प ी व थ होने के उपरा त भी उ भर सं मण का सार करते
ह ।
 अ डे ाय: दू षत वातावरण म सं मत बीट एवं बछावन वारा एग शैल के मा यम
से सं मत होते ह ।
3.4.4 ल ण:
 रोग से त छोटे चूज म योक अवशोषण नह ं होता है एवं वह हे चंग के बाद ह मर
जाते ह ।
 2-3 स ताह के दौरान मृ युदर अ धक होती है । अ धकतर चूजे ऊँ घते हु ए तीत होते
ह । चूजे ूडर के पास एक त हो जाते ह एवं दाना उठाना ब द कर देते ह ।
 चूज म सफे द भूरे द त लगना एवं ए स शन के दौरान प ी का दद से च लाना ( ल
ाई) दखाई पड़ता है
 रोग त बड़े प य म थकावट, पंख , बैटल, सर व कान ढलका रहना, बखरे- बखरे
पंख, कॉ ब म पीलापन आना, सफे द, हरे-भूरे द त लगना सामा य ल ण है ।
 माँस पे शय क वाटर लॉ ड कं डीशन एवं चमड़ी वारा व क उिजंग (बाहर नकलना)
होने के कारण प ी नहाया हु आ तीत होता है ।
 एरोसोल इंफे शन क ि थ त म प ी क वसन म तकल फ एवं गेि पंग मूवमे ट (मुँह
खोल खोल कर सांस लेना) देखे जा सकते ह ।
34
3.4.5 शव पर ण:
 प ी का ॉप खाल मलना, ल वर पर ईट के समान लाल धा रयाँ पाई जाना ।
 दय क झ ल म सूजन के अलावा छोटे-छोटे हरे नो यू स मलना ।
 फे फड़ व आंत म छोटे बड़े सलेट फोकाई का मलना ।
 प ी क चमड़ी के नीचे व ए डो मनल के वट म िजलेट नस पदाथ एक त होने से सूजी
हु ई एपीयरे स का मलना ।
 बड़े प य के शव पर ण म ओवर सामा य क तु अ नय मत सकु ड़े हु ए ओवा(को ड
अपीयरे स ऑफ योक) मलते ह ।
 नर प य के टे ट स, वास डेफरे स आ द म सूजन मलना ।
3.4.6 रोग नदान:
 रोग का नदान लेट एकलूट नेशन एवं यूब एगलूट नेशन टे ट वारा कया जाता है ।
रोग नदान क सु वधा े ीय रोग नदान के म उपल ध ह ।
3.4.7 उपचार एवं बचाव:
 सं मक प य को तुर त लाटर कर गाड़ने अथवा जलाने क व ध वारा न ट कर
देना चा हए।
 उपचार हेतु स फोनामाइड (0.5%) /कलोरमफे नकोल (0.5%, 6-10 दन),
नाइ ो यूरांस (0.4%) क दर से दाने म 10-15 दन तक द जा सकती है ।
 रोग से बचाव के लये हेचर से पुलोरम लॉक ह ल एवं इस लॉक को देसी / जंगल
/ वासी प य अथवा उसी हेचर के दूसरे लॉक से भी दूर रख
 फामस / ूडर इ या द को यूमीगेशन (पोटे शयम परमगनेट (75gm) एवं फ म डीहाइड
(150cc) वारा डसइंफे ट करना आव यक है ।
 फामस आ द म पुलोरम रोग क नय मत जांच (25 प य क ) आव यक प से कराव
एवं य द टे ट नेगे टव भी मले तो 2-4 स ताह अंतराल पर इस जाँच को दुबारा कराते
रहना चा हए।
 सं मण पाये जाने क दशा म पेटे ट टॉक क जाँच कराना अ त आव यक है I
3.5 इ फे शीयस कोराइजा (Infectious Coryza)
यह रोग छोट उ के प य म बहु धा पाया जाता है । रोग ठ क होने के बाद भी मुग बीमार
का वाहक अथवा के रयर बनी रहती है । सामा यत: जहाँ सभी उस के प ी एक साथ पाले
जाते हो, वहां पर इनका सारण अ धक होता है । यह रोग “ हमो फल स गैल ने रयम”
(Hemophilus. gallinarium) नामक बै ट रया वारा होता हैI
35
3.5.1 ल ण:
छ ंक आना, तथा ना सका वार का ब द होना । नाक पर बदबूदार चपकना तरल
पदाथ पाया जाता है, जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, वैसे-वैसे यह तरल पदाथ “चीजी” होता
जाता है तथा साइनस म और आँख पर इक ा होता जाता है इस कारण चेहरा सूजा
हु आ नजर आता है । आँख ब द एवं सूजी हु ई नजर आती है । कभी “वेटल''
(Wattles) भी बढ़े हु ए नजर आते ह । यह रोग‘ ेस' (Stress) के कारण उ प
धारण कर सकता है । तेज हवा, ठ डी हवा, नमी, वै सीनेशन, थान प रवतन,
पेट म क ड़े आ द कारण से ेस होने के फल व प कोराइजा हो जाता है । आहार
उपभोग म तथा उ पादन म भी कमी पायी जाती है । वटा मन 'ए' क कमी इस
रोग के उ प न होने म सहायक होती है ।
3.5.2 उपचार एवं नयं ण:
इ फे टेड लॉक से चूज को अलग पालना चा हये । स फा तथा ऐ ट बायो ट स
वारा उपचार कया जाना संभव है।
3.6 फाउल कॉलेरा (Fowl Cholera):
यह छू त का रोग है, जो पास यूरेला, म टो सडा (Pasteurella.multocida) नामक जीवाणु
बै ट रया के कारण होता है । ती अव था म अ धक मुग रोग सत होगी तथा मृ यु दर
भी अ धक होगी । ॉ नक प म मुग के मुंह पर तथा वेटल पर सूजन आ जायेगी, वैटल
लाल सुख तथा छू ने पर गम मालूम ह गे ।
3.6.1 सारण :
रोगी प य वारा जमीन, आहार, पानी म इस रोग के जीवाणु फै ल जाते ह तथा व य
प ी का इनसे स पक होते ह रोग फै ल जाता है । क ड़े, मकोड़े तथा जंगल प ी भी इस
रोग को फै लाने म मदद करते ह ।
3.6.2 ल ण :
ती (Acute) प म मुग समूह म से अनेक मुग एक ह साथ बीमार हो जाती
ह, तथा पानी नह ं पीती ह, माँस पे शयाँ घटने लग जाती है । हरे द त भी लग सकते
ह तथा उ पादन कम हो जाता है । सर काला पड़ जाता है तथा पैर के तलुवे और
जोड़ सूख जाते ह । पैरो म लकु आ हो जाता है तथा बहु त समय तक रोगी रहने पर
मुग को सांस लेने म भी क ठनाई महसूस होती है ।
36
3.6.3 शव पर ण ल ण :
ती (Acute) प म बहु धा कोई ल ण नह ं दखाई पड़ते ह । सामा य प म लवर,
दय, ोवे यूलस, गजाड एवं आंत म ‘' पन पाइ ट हैमरेज’' दखाई पड़ते ह
। लवर का कु छ ह सा ह के रंग का दखाई पड़ता है तथा भूरे रंग के ने ो टक
पॉट (Necrotic Spot) नजर आते ह । रोग सत मुग म, योक शर र के ह स
(Body Cavity) म पाया जाता है । आंत क अ दर क सतह लाल हो जाती है
। े ट क मांस पे शयाँ गहरे रंग क हो जाती है । इस रोग म बड़ी दुग ध पायी
जाती है ।
3.6.4 बचाव एवं उपचार :
फाम पर बहु त अ छा ब ध आव यक है । आहार एवं पानी यव था ठ क रख ।
मरे हु ए प य को ठ क कार से गाड़े । फाम को एवं उपकरण को समय-समय
पर क टाणु र हत करते रह । वै सीन का योग कर । 12 स ताह क उ पर ट का
लगाकर पुन: 4 - 5 स ताह बाद दूसरा ट का लगाया जा सकता है । य द संभव हो
तो लटर भी बदल दया जाना चा हए ।
3.7 बोटू ल म (Botulism):
3.7.1 इस रोग को ल बर नैक (Limber Neck) भी कहा जाता है । यह एक कार क
जहर या (Poisoning) है, जो गंदे, सड़े गले आहार के कारण होता है । मुग तथा टक
दोन म ह यह पाया जाता है । म ी म लो डयम.बोटूलाइनम (Clostridum
Botulinum) बै ट रया के पोर (Spore) रहते है जो आहार म मल जाते है । ये आहार
म मलकर एक टॉि सन (Toxin) पैदा करते ह जो मुग के लये घातक स होता है ।
के नेबे ल म से भी यह रोग फै ल सकता है ।
3.7.2 ल ण:
सड़ा गला आहार खाने के कु छ ह घंटे बाद मुग लंगड़ी हो जाती ह तथा पंख पर भी लकु आ
हो जाता है । फर गदन क मांस पे शय पर असर होता है तथा गदन या तो ल बी हो जाती
है या क धे पर झुक जाती है । बीमार क शु आत म आँखे धँसी हु ई रहती ह तथा ब द
सी रहती ह । बाद म पंख ढ ले हो जाते ह तथा आसानी से खचे जा सकते ह । बहु धा ती
रोग के कारण मुग “कोमा” (Coma) क टेज म हो जाती है तथा मर जाती है ।
3.7.3 शव पर ण च ह:
आँत के अ दर क लाइ नंग म सूजन या हेमोरेज पाया जाता है । ॉप म सड़ा हु आ दाना
अथवा माँस पाया जा सकता है ।
37
3.7.4 बचाव एवं उपचार:
अ छ यव था, अ छा आहार एवं पानी का ब ध इस रोग से बचाव म सहायक स हु ए
ह । मि खय से बचाव आव यक है । एक प ट मोलासेज, 5 गैलन पानी म मलाकर यह
म ण चार घ टे देकर हटा ल, फर व छ पानी द । मु गय को शांत, ठंडे वातावरण म
रख । आहार पानी बदल द । बीमार मु गय को अलग कर द । कै टरआयल, मैगस फ भी
लै से टव (जुलाब) के प म योग म लाये जा सकते ह । कु कु ट पालक, जो इस रोग से
सत प य का उपचार या देखभाल कर रहे ह , उ ह सावधानी बरतनी चा हये तथा सदैव
अपने हाथ धोते रहना चा हये । एक पौ ड मैगस फ त 75 प य के अनुपात से गीले दान
म मलाकर दया जाना चा हये । पानी मे देने के लए एक पौ ड मैगस फ 100 प य के
हसाब से द । मृत प ी को ग ढे म दाब द ।
3.8 ा नक रे पाइरे डजीज (Chronic Respiratory Disease
C.R.D.) :
इसे “माइको ला मा . इ फै शन” (Mycoplasma. Infection) भी कहते ह ।
“माइको ला मा. गैल सै ट कम (M.gallisepticum) सी.आर.डी. का मुख कारण था पर तु
आजकल “माइ ो ला मा” क एक और क म िजसे “माई. साइनोवी” (M. synoviae) कहते
ह, के कारण भी यह रोग फै ल सकता है ।
3.8.1 सारण:
रोग के कारक व थ प ी क नाक म रहते है । मु गय म माइ ो ला मा का इ फै शन
उस समय तक नह ं उभरता, जब तक कोई ेस (Stress) मु गय म नह ं हो जाता । नये
थान पर मुग ले जाना, वै सीन का असर इस रोग को उ सा हत करने म सहायक होते ह
। यह रोग बै ट रया के यूकस म ेन म गुणन के कारण बढ़ता है, इसम े कया, ना सक
देश एयर सैक भा वत होते ह । अ य बीमार जैसे ई. कोलाई (E.Coli) इ फै शन,
ो काइ टस (I.B) रानीखेत आ द के कारण भी यह रोग उ प धारण कर लेता है ।
3.8.2 ल ण:
इसके आर भ के ल ण रानीखेत एवं इ फे शीयस ोकाइ टस (I.B) से काफ मलते ह ।
आर भ म कु छ ह मुग रोगी होगी । इस रोग म वास क क ठनाई, नाक से ड चाज तथा
वायु क नल े कया म रेट लंग (Rattling) क आवाज पायी जाती है । आहार उपभोग कम
हो जाता है, मुग कमजोर एवं सूखी से हो जाती है । े ट (Breast) पतल हो जाती है ।
अंडा उ पादन कम हो जाता है । इस रोग म अ धक प ी सत नह ं होते है तथा फै लाव
धीरे-धीरे होता हे । यह रोग कई स ताह तक रहता है । इरा रोग का सारण रोगी मुग वारा
अ डे से चूज म भी हो जाता है । 11 - 18 दन म रोग के ल ण दखाई पड़ते लगते ह
। ायलस तथा 4-8 स ताह क उ के प य म शी असर होता है । आहार उपयोग कम
38
हो जाता है तथा मुगीं / ायलर टेबल के लये ठ क नह ं रहता । रोग 3 स ताह से 2 माह
तक चल सकता है । मृ यु दर 3% से अ धक नह ं होती है, पर तु य द अ य वघटन ह
तो मृ यु दर अ धक भी हो सकती ह ।
3.8.3 शव पर ण च ह:
आर भ क अव था म एयर सैक म झागदार पदाथ या सफे द ध बे पाये जाते ह । े कया
( वास नल ) म भी गाढ़ा पदाथ ( यूकस) पाया जा सकता है ।
लवर पर एक भाग पतल झ ल चढ़ दखाई पड़ती है । दय क झ ल मोट तथा सफे द
दखाई पड़ती है । शर र के भाग (Cavity) म भी “चीजी'' पदाथ पाया जाता सकता है । वास
संबंधी भी अनेक प रवतन पाये जा सकते ह । जैसे वास नल म अ धक यूकस, ौ काई
म “चीजी” पदाथ, एयर सैक म पीला अथवा धुंधलापन । े कया म हैमोरेज पाये जा सकते
ह ।
3.8.4 बचाव एवं उपचार :
सफाई का पूण यान रख । कोई रोगी प ी दखाई पड़े तो उसक छँटनी कर द । मुग छांटने
के बाद एक माह तक नये चूज को उस गृह म नह ं लाना चा हये । कै रयस (Carriers)
को फाम पर नह ं रख । इस रोग के ए ट जन (Antigen) उपल ध है । िजनके योग से
स पूण समूह क जाँच हो सकती है । नई मुग रखने से प हले उस े क सफाई पूण प
से क जानी आव यक है । आहार / पानी म ए ट बायो टक नाइ ो यूरॉन (Nitrofuran) का
योग भी रोगी मु गय म कया जा सकता है । रोग बहु धा स दय म फै लता है । रोग फै लने
म असंतु लत आहार, पेट म क ड़े, वटा मन 'ए' क कमी, अ धक घन व म मुग पालन, व छ
वायु क कमी तथा मुग गृह म नमी ये सभी कारण इसक उ ता को बढ़ाते ह । मुग को रोग
क अव था म अ धक वटा मन भी दया जाना आव यक है ।
यह छू तदार बीमार है । अत: रोग सत फाम से कोई भी यि त व थ फाम पर नह ं जाना
चा हये । वायु म डल से भी इस रोग का सारण होता है । मु यत: यह सीधे स पक से ह
सा रत होती है । भूख बढ़ाने के लये आहार म मोलासेज (राब-शीरा) मलाएँ । ए ट बायो ट स
के इ जे शनस भी लगाये जा सकते ह ।
3.9 ऑमफे लाइ टस (Omphalitis):
यह बै ट रयल सं मण है, जो ना भ देश म पाया जाता है । है चंग के बाद जब ना भ का
मुंह ब द नह ं हो पाता, तब कई बै ट रया चूजे के शर र म वेश कर जाते ह ।
3.9.1 ल ण:
इस रोग म सामा य कमजोर , ूडर के नीचे इक ा होना, तथा अनायास मृ यु जैसे
ल ण दखलाई देते है । चूजे को हाथ म लेने पर वह पल पला मालूम होगा- पेट
बढ़ा हु आ मालूम होगा । शी ह यह रोग बढ़ता है-ल ण दखने के एक दन म
ह मृ यु दर 50% तक हो सकती है ।
39
3.9.2 शव पर ण च ह
पेट क मांस पे शय म तरल पदाथ पाया जाता है । 'योक' अनएबजोबड
(Unabsorbed) पाया जाता है, शर र म सूजन पायी जाती है तथा दुग ध आती
है । इस रोग का इ युवेशन म असावधानी तथा सफाई क कमी से भी संबंध है
। इस रोग का सामा यत: कोई उपचार नह ं है ।
3.10 ग ीनस डरमेटाइ टस (Gangrenous Dermatitis)
3.10.1 लो डयम (Clostridium) नामक जीवाणु इसका मु य कारण हो सकता है ।
फर भी इस या ध के उन कारण क जांच आव यक है, िजसके कारण यह उ प धारण
करती है । जैसे:-
(1) वचा म छ होने के कारण तथा मुग के शर र म र त त व क कमी के कारण
यह रोग हो सकता है । कई प ी िजनम न चने क या –“कै नाब ल म” क आदत होती
है, इस रोग के शी शकार होते ह।
(2) ऐसा भी पाया गया क यह या ध “पेरे ट लॉक'' म या त रहती है । इसका कोई
“जेने ट स'' (Genetics) से सीधा स पक हो सकता है ।
(3) मुग के शर र म वटा मन ई तथा सेल नयम, इन दोन क कमी के कारण भी
“ग ीनस डरमेटाइ टस'' हो सकती ह या खराब रखरखाव ।
कई कार क औष धयाँ इसके योग म लाई जा चुक है, पर तु सफलता के वल पैनी सल न
को मल है । उपरो त कारण से बचाव करने से इस या ध के फै लने क कम संभावना होती
है ।
3.11 सारांश :
जीवाणुज नत प ी रोग क व तृत जानकार जीवाणु के कार, उसके सारण के तर के ,
भ न- भ न जै वक तं पर उसका दु भाव एवं वशेष ल ण व शव पर ण, ल ण के
आधार पर ना सफ इन रोग का भावी नयं ण कया जा सकता है, अ पतु समय पर वशेष
ए ट बायो टक औष ध के योग, हाइजे नक मापद ड अपनाकर मृ युदर काफ कम क जा
सकती है । प ीशाला के आस-पास जीवाणुओं को नह ं पनपने देने, समय-समय पर जीवाणुरोधी
औष धय का छड़काव एवं समय पर वै ा नक तर के से कये जाने वाले ट काकरण इन रोग
के भावी नय ण म वशेष कारगर स होते है ।
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41
इकाई - वषाणुज नत प ी रोग एवं उपचार
इकाई - 4
4.0 उ े य
4.1 तावना
4.2 इकाई म यु त श दाथ
4.3 रानीखेत रोग (आर.डी.)
4.3.1 कारण
4.3.2 सार
4.3.3 ल ण
4.3.4 शव पर ण
4.3.5 बचाव एवं उपचार
4.4 ग बोरो रोग (इंफे शीयस बसल डजीज या I.B.D.)
4.4.1 कारण
4.4.2 ल ण
4.4.3 शव पर ण
4.4.4 बचाव एवं उपचार
4.5 मेरे स रोग
4.5.1 कारण
4.5.2 सार
4.5.3 ल ण
4.5.4 शव पर ण
4.5.5 बचाव
4.6 ऐवीयन यूको सस कॉ पले स (A.L.C)
4.6.1 कारण
4.6.2 ल ण
4.6.3 शव पर ण
4.6.4 बचाव एवं उपचार
4.7 ल ची रोग
4.7.1 कारण
4.7.2 सारण
4.7.3 शव पर ण
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4.7.4 रोग नदान
4.8 इ फे सीयस ो ाइ टस (आई.बी)
4.8.1 कारण
4.8.2 ल ण
4.8.3 शव पर ण
4.8.4 बचाव
4.9 इ फे सीयस लैरजो ेक याइ टस ् (I.L.T.)
4.9.1 सारण
4.9.2 ल ण
4.9.3 शव पर ण
4.9.4 नयं ण
4.10 फाउल पॉ स (Fowl Pox)
4.10.1 सारण
4.10.2 ल ण
4.10.3 बचाव
4.11 एवीयन एनके फे लोमाइलाइ टस (Avian Encephalomylitis)
4.11.1 सार
4.11.2 ल ण
4.11.3 उपचार
4.12 सारांश
4.0 उ े य:
प य म सभी वषाणु रोग अ य त ती ता से फै लते ह । इन रोग के कारण कु कु टपालक
को अचानक ह भार आ थक हा न उठानी पड़ सकती है, य क वषाणुज नत रोग के ल ण
अचानक कट होते है एवं कभी-कभी तो बगैर ल ण द शत कये ह छोटे चूज व मु गय
म रोग क मृ युदर 100% तक पहु ँच सकती है ।
इकाई म इसी उ े य को यान म रखकर येक वषाणुज नत रोग क व तृत या या क
गई है तथा बचाव एवं रोकथाम के हर संभव यास का वशेष उ लेख कया गया है ।
4.1 तावना:
प ीशाला म प य क रोग के कारण होने वाल मृ यु म सबसे बड़ा कारण वषाणुज नत
रोग ह है । वषाणु क संरचना ज टल होती है एवं ए ट बायो टक औष धय का सीधा भाव
नह ं पड़ने के कारण वषाणु क बीमार पैदा करने क मता अ य त ती ता से बढ़ती है ।
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वषाणु रोग का एक नि चत सं मण काल (Incubation Period) होता है, उसके प चात
यह रोग वत: ह समा त हो सकते ह, क तु वषाणुज नत रोग म शर र क तरोधक मता
म ती गरावट एवं वतीय जीवाणु सं मण के कारण मृ युदर अ धक पाई जाती है ।
ए ट बायो टक (Antibiotic) औष ध का योग इ ह ं वतीय जीवाणु सं मण क रोकथाम
के लए कया जाता है I
वैसे तो वषाणुज नत रोग का कोई नि चत इलाज नह ं है, क तु समय रहते लए गए बचाव
के उपाय एवं योग कये गये ट काकरण से होने वाल मृ युदर एवं आ थक हा न से बचा
जा सकता है ।
इकाई म व भ न वषाणु ज नत रोग का वग कृ त अ ययन तुत कया गया है । साथ ह
व भ न रोग क वभे दत जाँच (Differential Diagnosis) का उ लेख शी नदान के
लए कया गया है । वषाणु ज नत रोग क जाँच ाय: योगशाला म क ठन एवं अ धक
समय लेने वाल होती है, क तु शव पर ण कर एवं वशेष शव पर ण जाँच के आधार
पर ल जन क पहचान कर शी नदान संभव है । इस इकाई म इ ह ं वशेष पेथो नो मक
पो टमाटम ल जन का उ लेख कया गया है ।
योगशाला म वषाणु रोग क आधु नकतम जाँच म अगार जेल इ मु युन ड यूजन टे ट.
(AGID) का पल मे ट फ शेसन टे ट (C.F.T.) पॉल मरेज चेन रए शन
(P.C.R),एस.डी.एस. पेज (SDS PAGE), इ जाइम लं ड ईमुनोएवसोरवट ऐसे (ELISA)
सीरम,- यु लाईजेन टे ट (S.N.T.) डी.एन.ए. ोव (DNA PROBE) जैसे पर ण वतमान
म काय म लये जा रहे है, फर भी कु कु ट पालक को चा हए क मुग शाला म अथवा
योगशाला म मृत प ी का शव पर ण (Post Mortem) कर शी जाँच करा ले तथा अ य
योगशाला जाँच के लए आव यकतानुसार से पल लेकर संबं धत वाइरोलॉजी लेब (Virology
Lab.) को भजवा देव ।
आजकल ए ट वायरल स (Drugs) भी योग म ल जा रह है, क तु इनसे इन रोग का
उपचार काफ महंगा होता है एवं कई बार आशातीत नतीजे सामने नह ं आ पाते ।
इसी कार क सभी ायो गक जानका रयाँ इस ईकाई म सि म लत क गई है ता क सरल
एवं सीधी भाषा म कु कु टपालक पूण तकनीक के साथ इन रोग से अपने प य का बचाव
कर सक ।
4.2 ईकाई म यु त श दाथ:
(i) वायरस - वषाणु
(ii) बे ट रया - जीवाणु
(iii) ल जन- रोग के घाव
(iv) पेथो नो मक ल जन -रोग के वशेष ल जन
(v) वे सीनेशन - ट काकरण
(vi) ो काइ टस - खाँसी आना
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(vii) व रयॉन (Virion) - वायरस क कायकार यू नट
4.3 रानीखेत रोग (आर.डी.) :
सव थम डोयल (Doyel) ने सन ् 1926 म इस रोग को यूकै सल देश (आ े लया) म पाया
था । अत: इसे यूकै सल डजीज (Newcastle Disease) भी कहते ह । इसम वास न
लेने के कारण 100% मृ यु हो सकती है । यह रोग एक वायरस (Virus) वषाणु वारा फै लता
है । अंडा देने वाल मुग ाय: ब कु ल अंडा देना ब द कर देती ह । इस रोग म 50% तक
मृ यु हो सकती है । यह रोग च कन एवं टक दोन म सामा य प से पाया जाता है । यह
रोग एक वषाणु (Virus) वारा होता है िजसे “मीइ सो वायरस म ट फोम ' (Myxo virus
Multiforme) कहते ह । यह वायरस बड़ा ह तरोधक है- अ छे म 255 दन, शैल म 288
दन तक, मुग म 255 दन तक यह जी वत रह सकता है ।
इस रोग के चार ा प बताये जाते है:-
(1) व ले ट फाम (Virulent Form) :- यह ती असर क अव था है तथा मृ यु दर 100%
तक हो सकती है । बीमार 3-4 दन रहती है तथा कभी-कभी एक दन म ह सब मुग मर
सकती है । इसके मु य ल ण है- वास लेने म वशेष आवाज (Rales), अ धक देर तक वास
लेने म क ठनाई, गदन ल बी, खुल हु ई च च, नाक से तरल पदाथ ( ड चाज), अ धक द त,
तापमान सामा य से 2-30
F अ धक तथा बाद म सामा य से कम तापमान तथा पेर ल सस
एवं कं पकं पी ।
(2) मसोज नक कार (Mesogenic Form):- इसम हा न कम होती है, मृ यु दर 5-15% होती
है, वास लेने म क ठनाई, हरे रंग का द त, अ ड के उ पादन म भार कमी पायी जाती है
। अंडा 'शैल' ( छलका) कमजोर, असाधारण श ल का हो सकता है । पंख तथा पैर का लकवा
हो सकता है ।
(3) ले टोजे नक कार (Lantogenic Form):- यह इस रोग का कम भाव वाला व प है।
ह के वास ल ण दखाई देते ह- अंडा देना कम हो जाता है । बड़ी मु गय म मृ यु दर बहु त
कम हो सकती है, पर छोट उ म यह 50% हो सकती है । इस अव था म े कया म के वल
ह क सूजन पायी जाती है ।
(4) ए स टोमे टक फाम (Asymptomatic Form):- कोई वशेष ल ण नह ं पाये जाते ह ।
सीरोलॉिजकल योग से यह अव था पहचानी जाती है । यह रोग कसी भी उ के प ी म
हो सकता है, पर तु छोट उ के प ी बहु धा अ धक सत होते ह ।
इस रोग म गैि पंग खांसी, गले क खराश, रैट लंग क आवाज मु यत: पाये जाते ह । आहार उपभोग
कम हो जाता है, यास अ धक हो जाती है, गम के पास अ धक चूजे इक े हो जाते ह तथा नायु
के ल ण अ धक दखाई पड़ते ह । पंख तथा पैर का लकवा पाया जा सकता है । सर दोन पैर के
बीच म अथवा कं ध के बीच म पाया जा सकता है । मुग पीछे चलती है, च कर खाती है, सर तथा
45
गदन को घुमाती है । बड़ी मु गय म गैि पंग तथा खांसी आना सामा य ल ण ह । मुग आहार उपयोग
ब द कर देती है । वकृ त प के अंडे पाये जा सकते ह । इस रोग क प क जांच हेतु योगशाला
का पर ण आव यक है ।
कु कु ट पालन म इस रोग को आर.डी. के नाम से जाना जाता है । यह एक अ य त घातक ती ग त
से फै लने वाला सं ामक छू तदार रोग है । इससे प य म मृ यु दर 100% तक हो सकती है ।
4.3.1 कारण:-
यह रोग चार प म पाया जाता है :-
1. व लट फाम - उ प
2. मसोजे नक फाम - अपे ाकृ त कम हा नकारक
3. ले टोजे नक फाम- कम भावी प
4. ए स टोमे टक प - वशेष ल ण नह ं पाये जाते है ।
4.3.2 रोग का सार
1. रोग के वाइरस सं मत प ी के सभी कार के ाव (बीट, आँसू, नाक एवं मुँह से
नकलने वाले ाव) वारा खाने पीने के बतन, लटर आ द सं मत हो जाते ह,
िजनके मा यम से यह रोग व थ प य म फै लता है।
2. ऐरोसोल या हवा के मा यम से रोग के वषाणु एक थान से दूसरे थान पर पहु ँच
कर प ी को सं मत करते ह ।
3. आगंतुक के मा यम से यह रोग एक फाम से दूसरे फाम पर शी फै लता है ।
4. जंगल प य म भी इस वाइरस को देखा गया है ।
5. इस रोग से सत प य / मृत प य के स पक म आने वाले मनु य जैसे कु कु ट
पालक / च क सक आ द सभी म इस वाइरस के कारण कं ज ट वाइ टस देखी जा
सकती है । (जूनो टक भाव)
4.3.3 ल ण
1. रोग अचानक कट होता है एवं इससे भा वत प ी म खाँसी, वसन म तकल फ,
गेि पंग के अ त र त वसन म वशेष कार क आवाज (रेट लंग) कट होते ह ।
2. प ी वारा आहार का उपभोग कम व पानी का उपभोग अ धक हो जाता है ।
3. प य को हरे द त लगना ।
4. इसके अ त र त लो नक पा म आना, कं पकं पी आना गदन क माँस पे शय म
अकड़न (टाट को लस)
5. प ी को च कर आना, पाँव , कं ध , पंख अथवा गदन क माँस पे शय म लकवा
मार जाना आ द ल ण दखते ह ।
6. वकृ त प के अंडे पाये जाना, अ ड के शैल ( छलका) कमजोर होना आ द ल ण
कट होते ह ।
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4.3.4 शव पर ण
1. वास नल म यूकस, हेमोरेज एयरसेक का धुंधला एवं फे फड़ का कं ज टेड होना।
2. प ी क आंत म हमोरेज बटन अ सर, सूजन मलना
3. ोवे यूलस एवं सीकल टॉि सल का हेमरेिजक मलना / पट क यल ( पन पोइ ट)
हेमरेज ।
4. ए डो मनल के वट म पानी के समान ऐग योग एवं कई एग फॉल क स का मलना।
4.3.5 बचाव एवं उपचार
1. प ी गृह क नय मत सफाई एवं समय-समय पर क टाणु र हत करना भोग के
वाइरस अ ावायलेट करण से एवं फाम लन से भा वत होते है)
2. रोग से बचाव हेतु वे सीन (ट के ) लगाना अ नवाय है ।
4.4 ग बोरो रोग (इंफे शीयस बसल डजीज या I.B.D.)
ये कम उ क मु गय का ती फै लने वाला छु आ-छू त का रोग है । इस रोग का इ युवेशन
पी रयड 18 से 36 घ टे है । ये रोग के वल मु गय म ह ाकृ तक प से होता है । च स
म पहले दो स ताह म रोग के ल ण दखाई नह ं देते ह, पर तु रोग से लड़ने क मता
50 तशत कम हो जाती है । इस रोग म ाय: 3 से 6 स ताह क आयु म रोग के ल ण
दख जाते ह, जैसे भूख क कमी, द त, उखड़े-उखड़े पंख, पानी क कमी एवं कं पकं पी इस
रोग म मुग 100 तशत भा वत होती है और मृ यु दर भी काफ अ धक रहती है । इस
रोग का कोस 4 से 7 दन का है । डीप ल टर म क गई ू डंग क अपे ाकृ त के ज म क
गई ू डंग क मु गय म मृ यु दर अ धक रहती है ।
(जांघ म जमा हु आ खून)
पो टमाटम म गुद खराब मलते ह और बसा नाम का अंग फू ल जाता है । सीने और आंख म खून
जमा हु आ दखता है ।
(मुग का सूजा हु आ बसा)
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ग बोरो का वायरस अ य त कठोर वायरस है, इसे मुग फाम से दूर करने म काफ परेशानी
आती है । लोर न डसइ फै टै ट से ये वायरस अ या धक भा वत होता है । इस रोग का
कोई उपचार नह ं है । अत: वै सीनेशन (ट काकरण) आव यक है ।
रोग क रोकथाम के लए 4 वै सीन ेन-माइ ड, इ टरमी डयेट (जारिजया) इ वे सव
इ टरमी डयेट (IV.95 लेयर के लए और बी2के ायलर के लए) एवम ् हॉट ेन वै सीन
का उपयोग होता है । रोग क रोकथाम के लए वै सीन ेन के चुनाव म अ या धक सावधानी
बरतनी चा हए एवम ् इसका नणय ए रया ( थान) वशेष म रोग क ि थ त के आधार पर
करना चा हए । साधारण प रि थ तय म हॉट ेन का योग हमारे देश म ग बोर रोग क
रोकथाम के लए नह ं करना चा हए ।
आर.डी. एवम ् ग बोरो रोग का वै सीनेशन शङॅयूल ए रया वशेष के अनुभवी पौ सलाहकार
क नगरानी म मैटरनल ऐंट बॉडी टाइटर (Mab) के आधार पर नधा रत करना चा हए और
स ती से योग म लाना चा हए । एम.एबी. टाइटर क जाँच एक दन के कम से कम 12
चूज के र त से क जाती है ।
4.5 मेरे स रोग (Marek’s Diseases)
वदेशी जा त के प ी के आयात के साथ-साथ यह रोग भी इस देश म आ गया है । आज
के मुग पालन युग म आ थक हा न के संदभ म संभवत: यह सबसे मह वपूण रोग है । पुलेट
म, ायलस म यह बहु त ह घातक स हु आ है । ाय: 16 स ताह क उ से कम के प ी
ह रोग सत होते है । ये रोग हरपीज वायरस (Herpes Virus) वारा होता है । इस रोग
म सतह क नायु (Nerve) तथा के य नायु णाल म (Central Nervous System)
म असाधारण “सैल ोथ” (Cell Growth) पायी जाती है अत: इस रोग के एक मुख कार
को “फाऊल पैरले सस' (Fowl Paralysis) क सं ा भी द गई है । नायु (Nerve) के
अलावा अ य अंग म भी इस रोग का भाव पड़ सकता है । पंख क जड (Follicle) म
भी रोग का असर हो सकता है । लवर, गुद, टे ट ज, (Testes), ओवा पील न (Spleen),
फे फड़े (Lungs) पर यूमर (गाठ) पायी जा सकती ह । इस अव था म नायु सूजन संभवत:
नह ं दखाई पड़े । इस रोग को ‘ यूरो लकोमटो सस’ (Neurolymphomatosis) या “रज
पैरले सस” (Range Paralysis) भी कहते हI
सारण :- संभवत: वास णाल से वायरस शर र म वेश करता है । अंड वारा चूज म
इस रोग का सारण अ धक मह व का नह ं है । इस कार के रोगी प ी समूह म
कॉ सी डयो सस रोग फै लने क अ धक संभावना रहती है । इस रोग क इ यूबेशन अव ध
7-28 दन है तथा 1 माह से 5 माह क उ के प ी रोग सत होते ह । लटर से भी यह
रोग फै लता है । कम उ क मादा प ी अ धक रोग सत होती है ।
4.5.1 कारण व सार:-
हरपीज वाइरस - यह रोग सं मत मुग के पंख वारा फै लता है । इसके अ त र त रोग
का सारण सं मत लार, मल एवं हवा वारा भी हो सकता है ।
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4.5.2 ल ण
1. रोगी प ी के पैर , पंख , गदन आ द भाग म आ शक अथवा पूण लकवा (पेराले सस)
देखने को मलता है ।
2. प ी लंगड़ा कर चलता है । दोन टांग अथवा एक टांग, पंख एवं गदन आ द क
मांस पे शय म लकवा हो जाने के कारण चल नह ं पाता एवं भूख व यास से मर
जाता है ।
3. रोग के वषाणु आँख क आइ रस को भा वत करते ह, िजससे आँखे सूजी व लेट
रंग क तीत होती ह । आइ रस म लं फ़ोसाइट जमा हो जाने के कारण इस अव था
को फश आई अथवा पल आई भी कहा जाता है ।
4. रोगी प ी के व भ न अंग जैसे लवर, ल न, आत, बसी एवं वचा पर यूमर
दखलाई देते है ।
5. मुग के एक पैर म लगवा होने से एक पैर आगे व एक पीछे मुड़ा हु आ रह जाता
है ।
6. गदन म लकवा होने के कारण प ी का आसमान क तरफ देखते रहना (टाट को लस)
अव था देखी जा सकती है ।
4.5.3 शव पर ण
1. पे टक नव को दन के काश म देखने पर उसक धा रयाँ ( ॉस ाएशन) दखलाई
नह ं देती ।
2. लवर ल न, बसा आ द भाग पर यूमर देखे जा सकते ह ।
4.5.4 बचाव एवं उपचार
1. यह एक छू तदार रोग है, अत: व थ प ी को रोगी प ी से दूर रख ।
2. रोग का तरोधक ट का ज म से ह अथवा शू य दवस पर चूज म लगाया जाना
आव यक है ।
3. रोग क ि थ त म फाम पर नय मत सफाई कर व झड़े हु ए पंख का जला देना चा हए,
य क रोग के वषाणु पंख क जड़ (फॉ लक स) मे व यमान रहते ह ।
4. व भ न उ के प य को साथ नह ं पाले एवं उस े म मुग पालन न कर, जहाँ
यह रोग फै ला हु आ है ।
5. ए ट बायो टक औष ध का योग कर तथा प य को ेस क अव था से बचाय।
4.6 ए वयन यूको सस कॉ पले स (A.L.C):
मु गय म अ य प य क अपे ा यह रोग अ धक होता है । वैसे अ य प य म भी यह
रोग होता है । अ धक उ क मु गय म ाय: यह रोग होता है । इस रोग म मुग कमजोर
हो जाती है, मुग क कलंगी सूखने लगती है तथा उसम खून क कमी हो जाती है । कु छ
मु गय का पेट फू ल जाता है तथा मृ यु से पहले उनम हरे द त लग सकते ह ।
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यह रोग माता- पता से अ डे वारा चूजे म आता है । यह रोग बीमार मुग म सीधे स पक
वारा या बीमार से दू षत वातावरण से फै लता है । यह रोग हवा वारा नह ं फै लता है । इस
रोग के यूमर ाय: कलेजी, ल न, कडनी म मलते ह । यह यूमर दय, पैन यास
ह डी म जा (बोन मैरो), जनानंग (ओवर गोनाड) आँत, आँत क झ ल और बसा फै ब र सयस
म भी मल सकते ह । यह यूमर फे फड़े, थाइमस या वचा म कभी-कभार ह मलते ह ।
ह टोपैथोलौजी टे ट के वारा मैरे स और ल फाइड यूको सस म अ तर कया जा सकता
ह ।
यह व भ न रोग का एक समूह है, िजसके अ तगत वाइरस ज नत रोग जैसे ल फाइड
यूको सस अथवा बग लवर डजीज, आि टयोपे ो सस एवं इ र ो ला टो सस जैसे घातक
रोग सि म लत है ।
मुग पालन म ए.एल.सी समूह का रोग ल फाइड यूको सस ह अ धक देखने को मलता
ह । यह रोग मेरे स रोग जैसा घातक नह ं है क तु अ डा उ पादन वाल मु गय म काफ
हा न पहु ंचाने वाला रोग है । इस रोग क सभी अव थाओं म लवर सामा य से बड़ा दखलाई
देता है ।
4.6.1 कारण:-
1. वाइरस अ डे के मा यम से चूजे म आ सकता है । अत: यह मु गयाँ के रयस कहलाती
ह एवं रोग सारण का काय करती है ।
4.6.2 ल ण
1. ल फाइड यूको सस नामक रोग सोलह स ताह या अ धक उस के प य म मलता
ह । अ डा देने वाल मु गय म बहु धा यह रोग देखा जा सकता है ।
2. प ी म कमजोर आना, भूख कम लगना तथा द त लग सकते है ।
3. प ी क कलंगी पील सकु ड़ी हु ई दखलाई देती ह ।
4.6.3 शव पर ण
1. ल वर व कडनी पर भाव देखने को मलता है ।
2. इस रोग म लवर आकार म सामा य से बड़ा एवं गुलाबी रंग का दखलाई देता है
एवं ाय: पूर के वट म सभी अंगो को ढके हु ये तीत होता है ।
3. लवर के ऊपर नो यू स अथवा अ धक सं या म यूमर देखे जा सकते है ।
4. गुद गहरे भूरे रंग के दखाई देते ह तथा बसा म यूमर पाये जाते है ।
5. शर र के अ य अवयव जैसे ल न म भी इसका भाव देखा जा सकता ह, िजससे
यह आकार म बढ़ जाती है ।
4.6.4 आि टयोपे ो सस – यह इस वायरस ज नत रोग क ह डयाँ से संबं धत है । इस रोग म ह डयां
बढ़ हु ई व स त नजर आती है । ह डी क मोटाई असामा य होती है तथा भावी े सु न
हो जाता ह । प ी झटके दे देकर चलता है ।
50
(v) मायलोइड यूको सस - इस अव था म सफे द चॉक के समान यूमरस वशेषतया
पस लय व टनम भाग क मांस पे शय पर पाये जा सकते ह ।
(vi) इ र ोइड यूको सस या इ रथो ला टो सस -
1. रोग क यह अव था कम ह देखने को मलती है । मुग सामा य दखलाई
देती है तथा पंख र हत थान पर पीलापन दखाई देता है ।
2. इस रोग म वशेषकर लवर व ल न आकार म बड़े व चेर रंग के दखाई
देते ह।
3. आंत म एवं लवर पर हेमरेज देखे जा सकते ह ।
(vii) बचाव एवं उपचार -
1. इस समूह के रोग का भावी उपचार एवं कोई भावी वे सीन नह ं है ।
2. जै वक सुर ा (बायो स यू रट ) नयम को यान म रखते हु ए फाम पर साफ सफाई
का वशेष यान रख।
3. रोग त प य क बीट का उ चत न तारण कया जाना चा हए ।
4. छोटे चूज का वय क प य के साथ पालन न कर ।
5. हेच रज पर इस कार का पेरे ट टॉक उपयोग कया जाना चा हये, िजनम ए.एल.सी.
रोग के त ाकृ तक प से रोग तरोधकता हो ।
4.7 ल ची रोग :
प य म पाया जाने वाला यह एक वषाणु ज नत रोग है जो क एडीनो वाइरस समूह के
सं मण के कारण वशेषकर ायलर समूह म अ धकता से पाया जाता है िजसके कारण वसन
रोग, अ डा उ पादन म कमी, मील पे शय और आंत रक अवयव म हेमरेज, र त क कमी
आ द जैसे र ण दखलाई पड़ते ह ।
4.7.1 कारण :
एडीनो वायरस समूह से FAV-1 ( ूप-1, ूप-2, ूप-3) - इस सं मण के कारण
प य म ती इ यून सं ेशन पाया जाता है ।
4.7.2 सारण :
ुप-1 एडीनो वाइरस समूह का सारण वट कल (सं मत प य से अ ड एवं चूज
मे) तथा होर जे टल (तीन स ताह क उ के प चात सं मत प य वारा एक
फाम से दूसरे फाम) म होता है । Avi Adenovirus Gr.III Egg. Drop
syndrome के कारण ।
4.7.3 ल ण एवं शव पर ण -
1. यह रोग मुखत: 3-6 स ताह के चूज म होना देखा गया है ।
51
2. रोगी प य म रोग तरोधकता अ य धक कम हो जाती है ।
3. IBH-HPS (इ लूजन बॉडी हपेटाइ टस - हाइ ोपेर का डयम सं ोम)
मलता है ।
4. पो ट माटम म मुग के दय के चार तरफ (पेर का डयम) म पानी
(साफ/लाल/भूरे रंग का) अथवा जैल क तरह का पदाथ जमा हो जाता है
तथा दय ल ची फल जैसा तीत होता है ।
5. ल वर सूजा हु आ, डसकलड (बेरंग) एवं उठाने पर बखरने वाला अथात् भंगुर
(Friable) हो जाता है।
6. कडनी (गुद) भी खराब सूजे हु ये एवं कं जे टड पाये जाते ह ।
7. रोग म ल न, बसी फे ीकस, थाइमस आ द भी भा वत हो सकती है ।
4.7.4 रोग नदान:
1. दय क पेर का डयम झ ल म पानी भर जाना । (हाइ ोपेर का डयम) एवं उसका
ह टोपेथोलोिजकल पर ण के दौरान ह पे ोसाई स म इ लूजन बॉ डज का पाया
जाना ।
2. एि यो चक लवर टशू क वर तकनीक
3. व छता का यान रख ।
4. IBH-HPS वाइरसआइस लेटेड फॉमलाइ ड आयल इम सीफाइड वे सीन से एक
स ताह क उ पर ट काकरण कया जा सकता है ।
च - 4.7 : दय म पानी व दय ल ची जैसा
4.8 इ फै ि शयस ा काइ टस (आई.बी.) रोग
आई.बी रोग मु गय म पूरे व व म पाया जाता है तथा कसी भी आयु क मुग म हो सकता
है । यह छु आछू त वाला वास का रोग है तथा मु गय म तेजी से फै लता है । इस रोग म
छोटे चूजे मुँह फाड़ कर साँस लेते ह तथा अ डे देने वाल मु गय म अ डा घट जाता है और
अ डे का छलका खराब हो जाता है । मु गयाँ क चे छलके वाले या खुरदरे छलके वाले अ डे
देती ह । इस रोग म अ डे का ऐ युमेन पानी जैसा पतला हो जाता है ।
आई.बी. वायरस के अनेक ेन है, िजनक बीमार पैदा करने क मता भ न है । टक
नामक प ी म यह रोग नह ं होता हे । इस रोग का वायरस बीमार मुग से रोग के लए
52
ससैपि टवल लाक (िजन मु गय म रोग रोधक मता नह ं हो) म सीधे स पक से या फर
बोर , जूते, अ डे क े, बुरादे आ द म फै लता है और ऐसी सभी मु गय म बीमार पैदा करता
है ।
आई.बी. रोग के साथ य द माइको ला मा या ई. कोलाई इ फै शन है तो इस रोग म 30-40
तशत मृ यु हो सकती है । मृ यु ाय : छोट उ क मु गय म अ धक होती है तथा सद
म और भी अ धक होती है ।
इस रोग म छोट उस के चूज म, ौ काई के लेवल पर ( े कया या न साँस क नल , जहाँ
ा कई वारा फे फड़ से मलती है) यूकस लग मलते ह और दम घुटन के कारण चूज
क मृ यु हो जाती है । इस रोग म मुग क वास नल लाल रंग क हो जाती है और नाक
म यूकस भर जाता है । रोग के ल बे समय तक चलने क ि थ त म ई. कोलाई नामक
बै ट रया के का ल के शन (रोग बगाड़ना) के कारण फे फड़े काम करना ब द कर देते ह ।
च 4.8 : े कया- ा काई म यूकस लग
4.8.1 कारण: यह कोरोना ुप के वाइरस से फै लने वाला वसन रोग है । रोग का सार
वायु वारा रोगी प ी से व थ प य म होता है ।
4.8.2 ल ण:
1. वास लेन म आवाज आना ( ेक यल रा स), प ी वारा गेि पंग करना, आँख व
नाक से पानी आना ।
2. प ी को भूख न लगना, वजन कम हो जाना ।
3. अ डा देने वाले प य म अ डा उ पादन 50% तक कम हो जाना, ले कन अ डा
उ पादन ब द नह ं होता ।
4. अ डे का आकार व कार भा वत होना । अ डा क चे छलके वाला आना, अ डे
क ए यू मन (सफे द भाग) पानी के समान हो जाना आ द ल ण पाये जाते ह ।
4.8.3 शव पर ण :
1. े कया एयर सेक, का सूजा होना, कं ज टेड (लाल) एवं यूकस पाया जाना ।
2. ा कयो स म चीजी (cheesy) ए सूडेट मलना ।
3. प ी क कडनी म सूजन एवं कं जेशन मलना ।
4. ओवर सामा य क तु ब द (इंपे टेड) ओवीड ट का मलना ।
5. शव पर ण के दौरान ए डो मनल के वट म पानी के समान पतला, टूटा हु आ अ डा
मलना ।
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4.8.4 बचाव एवं उपचार -
1. अ व थ प य को व थ प ी समूह से अलग रख ।
2. कमरे / ूडर का तापमान अ धक होना चा हए (रोग क अव था म लगभग 2o
C
अ धक कर दे) ले कन पेन म प ी घन व अ धक (ओवर ाउ डंग) न हो ।
3. प य को दाना चुर मा ा म दया जाना चा हए ।
4. सं ामक आई.बी.रोग का ट का उपल ध है िजसे 0-7 दन एवं 16 स ताह क आयु
पर पीने के पानी म दया जाना लाभकार रहता है ।
4.9 इ फे सीयस लैरजो ेक याइ टस् (Infectious Laryngotracheitis
I.L.T.):
वायरस (Virus) वारा यह रोग होता है तथा इसके कारण बहु त आ थक हा न हो सकती है
। मृ यु दर भी अ धक होती है । अ धक उ प म भी मुग उ पादन अ छा दे सकती है
। ायलस म आहार उपयोग कम हो जाता है ।
4.9.1 सारण: वायु, उपकरण, कपड वारा यह वायरस रोग फै लता है । मु यत: प य के आपसी
स पक वारा यह रोग फै लता है । नाक वारा हवा के साथ भी यह इ फै शन फै ल सकता
है । पानी वारा भी यह रोग फै लता है । ठ क हु ई मुग रोग का के रयर बनी रहती है ।
4.9.2 ल ण: रोग धीरे-धीरे फै लता है तथा लगभग 1 -2 स ताह म अ धकांश मु गय म हो जाता
है । आई.बी. रोग शी फै लता है । मु य ल ण है छ ंकना, खाँसी, वास म क ठनाई - ये
ल ण रा म अ धक होते ह । मुग कमजोर, सुला रहती है । अ सर बैठ रहती है । वास
लेते समय गदन को ल बी करती है, जो इस रोग का मुख ल ण है । एक वशेष कार
क आवाज भी मुग करती है तथा खाँसी के समय र त रंिजत यूकस बाहर आता है । कु छ
मु गय म नाक से भी ड चाज नकलता है, तथा मुँह तथा वैटल पर सूजन भी पायी जाती
है । अ धकांश मुग दो स ताह म ठ क हो जाती ह । िजतना ती इस बीमार का प होगा,
उतनी ह इसक अव ध कम होगी । 15% तक मृ यु दर हो सकती है ।
4.9.3 शव पर ण च ह: शव पर ण पर े कया म र त रंिजत “ यूकस” (Mucus) पाया जाता
है । “चीजी लग” (Cheesy Plug) े कया तथा “लैरे स (Larynx) के ऊपर भाग म
पाया जाता है । इस रोग क पूण जाँच के लये योगशाला से संबंध था पत कया जाना
चा हए ।
4.9.4 उपचार एवं नयं ण: इस रोग का बचाव वै सीन वारा होता है । अ य औष ध जैसे
ए ट बायो ट स आ द भी द जा सकती ह ।
4.10 फाउल पॉ स (Fowl Pox):
यह वायरल रोग है, माता (फाउल पॉ स) के दो प सामा यत: पाये जाते ह :-
(i) “ वचा प” इसम को ब, चेहरा, वैटल आ द पर प पल या ‘ के ब' (Scab) दाने
पाये जाते ह ।
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(ii) नम पॉ स (Wet Pox):- इसम मुँह के अ दर क मे ेन पर “दाने” पाये जाते ह
। वचा प का रोग अ धक पाया जाता ह । कसी भी उ के प ी इस रोग से सत
हो सकते ह । 2 से 4 स ताह तक यह रोग असर करता है । मृ यु दर अ धक नह ं
होती है, पर तु अ डा उ पादन कम हो जाता है ।
4.10.1 सारण: रोगी मुग के स पक से रोग फै लता है, म छर तथा जंगल प ी भी रोग
सारण म सहायक होते है।
4.10.2 ल ण: वचा प म इस रोग के ल ण छोटे सफे द दाने के प म शु होते ह तथा
फर यह पीले रंग के होकर गहरे भूरे रंग के ह जाते ह । 2-4 स ताह के बाद यह
दाने सूख जाते ह । ये ल ण को ब चेहरा, वैटल (गल क बल) पर अ धक पाये जाते
ह । कभी-कभी पैर पर भी पाये जा सकते ह । नम पॉ स म वास म क ठनाई, नाक
से य तथा आँख से भी पानी आ सकता है । चेहरे पर सूजन आ जाता है । मुँह
म तथा िज हा पर सफे द फफोले दखाई पड़ सकते ह ।
शव पर ण च ह : मुँह, वचा पर पाये जाने वाले ल ण (Canker) वारा यह
रोग पहचाना जा सकता है । ये ककर आसानी से छू टते ह तथा छू टने पर र त
नकलता है । फे फड़ म क जे शन तथा एयर सैक (Air sac) म धुंधलापन पाया
जाता है ।
4.10.4 बचाव: प य म वै सीन 8 से 10 स ताह क उस पर लगक लेना चा हए । “ ीडर”
मुग (चूजे ा त करने वाल / जनन यो य प ी) को साल म दो बार वै सीन लगाना
चा हए ।
4.11 ए वयन एनके फे लोमाइलाइ टस (Avian Encephalomylitis
A.E.):
इस रोग को ए पडे मक ेमर (Epidemic Tremor) भी कहते ह । यह बीमार वायरस
(virus) वारा होती है तथा च कन एवं टक म एक से तीन स ताह क उ तक होती है
और बड़ी मु गय म अ डा देने क अव ध म होती है । इस बीमार से बचाव न कया गया
तो न के वल शैशव वरन ् अंडा उ पादन काल म अ डे क कमी के कारण आ थक हा न हो सकती
है ।
4.11.1 सारण: रोग सत ‘पेरे ट टॉक’ से अ ड के वारा यह रोग फै लता है। स पक
तथा बीट वारा भी यह रोग फै लता है ।
4.11.2 ल ण: आँख सुला तथा लडखडाती चाल पायी जाती है । य - य अ धक मांस पे शय
पर रोग का भाव होता है, मुग टखन के बल बैठ रहती है । य द इ ह उठाया
खोये तो लड़खड़ा कर चलगी तथा फर टखने के बल बैठ जायगी अथवा एक ओर
गर जायगी । चूँ क ऐसी अव था म मुग आहार/पानी नह ं ा त कर पायेगी । अत:
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मृ यु अव य भावी है । य द इन मु गय को हाथ म पकड़ा जाये तो हाथ म थरकन
महसूस क जा सकती है ।
शव पर ण च ह: सामा य आँख से शव पर ा म कोई वशेष ल ण दखाई नह ं
दगे । ेन टशू को लैब म सू म दशक य (Microscope) से देखने पर ह इसक
पुि ट क जा सकती है । इस बीमार को इ ह ं कार के ल ण वाल अ य बीमा रय
जैसे रानी खेत, वटा मन ई क कमी, राइबोफले वन क कमी, रकै टस तथा
यूको सस से अलग समझा जाना चा हए ।
4.11.3 बचाव एवं उपचार: वदेश म इस रोग से बचाव हेतु वै सीन बन चुके ह । ए.ई. वै सीन
(Salsbury) का योग कया जाना चा हये । प य को 10 स ताह क उ पर
या अ डा उ पादन से चार स ताह पूव वै सीन लगा दया जाये तो रोग क संभावना
नह ं रहेगी । वै सीन पीने के पानी म दया जा सकता है । इसका कोई उपचार नह ं
है तथा रोग क पुि ट होने पर सम त मु गय को बेचना ह लाभदायक होता है ।
4.12 सारांश :
कसी भी वषाणु सं मण क ती ता प ी के शर र म वेश कर इस बात पर नभर करती
है क वषाणु क वि ट का मा यम या है तथा कतने मा ा (Quantam) म Virion
(Functional Unit of Virus) प ी को सं मत कर रहे है, वषाणु क कृ त तथा उसक
Virulence (बीमार पैदा करने क मता) रोग क ती ता को इं गत करती है । प ी क
वयं क ई यु नट ( तरोधक मता) एवं प ीशाला म प ी घन व भी ती ता के मापद ड
है । य द तरोधकता कम और प ी घन व अ धक है तो रोग क भयावहता बढ़ जाती है
तथा मृ युदर भी अ धक होती है । वषाणुज नत रोग अ धकांशत: छू तदार सं ामक रोग है
। जैसे ईकाई म व णत है, रानीखेत, ग बोरो पॉ स ऐसे रोग है, जो प य के रोग त होकर
सीधे स पक म आते ह ती ग त से फै लते है, इस लए वषाणुज नत रोग क अव था म
कड़े Biosecurity बंधन एवं एक कु कु टशाला से दूसरे कु कु टशाला म कु कु टपालक अथवा
आग तुक (Visitors) का वेश पूणतया: ब द कर देना चा हए । साथ ह समय-समय पर
एवं उपयु त आयु पर इन रोग का ट काकरण भी करा लेना चा हए । ट काकरण म बू टर
खुराक अव य समय पर ह कर देनी चा हए । इकाई म व णत सभी सावधा नयाँ एवं बचाव
के उपाय करने के उपरा त ह इन रोग से होने वाल आ थक हा न काफ हद तक रोक अथवा
56
57
इकाई : प य के परजीवी एवं फफूं द ज नत रोग:
इकाई – 5
5.0 उ े य
5.1 तावना
5.2 आ त रक परजीवी सं मण (Endo-parasitic Infestation)
5.2.1 गोल कृ म सं मण (Round Worms)
5.2.2 फ ता कृ म सं मण (Tape Worms)
5.2.3 सीकल कृ म सं मण (Caecal Worms)
5.2.4 का सी डयो सस (Coccidiosis)
5.3 बा म परजीवी सं मण (Ecto-parasitic Infestation)
5.3.1 जूँ (Lice)
5.3.2 चीचडी (Ticks)
5.3.3 ब थयाँ (Mites)
5.4 फफूं द ज नत प ी रोग
5.4.1 ए परिजलो सस (Aspergillosis)
5.4.2 फे वस (Favus)
5.4.3 माइकोटोि सन (Mycotoxins)
5.5 सारांश
5.0 उ े य:
अ धकांश परजीवी रोग कु कु टशालाओं म वातावरण संबंधी कारण , कु पोषण, अ व छता,
प ीशाला म साम य से अ धक प ी घन व, प ीशाला के आसपास पानी का जमाव, गंदगी
आ द अ य खराब हाइजीन का ह प रणाम होते है । परजीवी रोग का अ भ ाय ह दो के म य
एक का असंतुलन है, िजसम परजीवी एवं परपोषी (host) एक दूसरे पर जीवन-यापन के लए
नभर करते है । य द परजीवी अ धक तकारक होता है तो परपोषी का जीवन संकट म पड़
सकता है । भारतवष म जलवायु एवं भौगो लक वषमताऐं प रि थ तयाँ प य म परजीवी
रोग के सार के अनुकू ल है, िजससे यह और भी आव यक हो जाता है क व भ न कारक
का अ ययन कर इन परजीवी रोग के फै लाव को प ीशाला म पनपने से पूव ह न ट कर
दया जावे । इसी कार प य के दाने म नमी से उ प न वशेष कार क कवक (फफूं द )
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उ प न होने एवं उनसे ा वत वष (Mycotoxins) के भाव तले व भ रोग उ प न हो
सकते है तथा अ डा उ पादन पर वपर त भाव हो सकता है । गंभीर अव था म इन
फफूं द ज नत रोग से प य म मृ युदर भी अ धक हो सकती है । इसी उ े य को यान म
रखकर व भ परजीवी फफूं द ज नत रोग क इस ईकाई म व तृत चचा क गई है ।
5.1 तावना :
प य म य द बायो स यू रट मापद ड का समय रहते उपाय नह ं कये गये हो अथवा उनके
अ दर पनपने वाले व भ न आ त रक एवं बा य परजी वय का शी नदान एवं उपचार नह ं
कया जावे तो यह परजीवी प ीशाला म ना सफ उ पादन म गरावट के लए उ तरदायी
होते ह, वरन ्अ धक मृ युदर का कारण भी होते है । व भ न कार के कृ मय , िजनम नमेटोड
(Nematodes), Round worms, ससटोड (Costodes) लूक व स, मेटोड
(Trematodes) फ ता कृ म या (Tape worms) मुख है । व भ रोग को ज म देते
है । इन परजी वय क लाइफ साइ कल (Life Cycle) का कु छ भाग परपोषी के शर र के
अ दर स प न होता है, िजनसे व भ न रोग क ल ण कट होते ह ।
परजीवी एवं फफूं द ज नत रोग से बचाव के लए व भ न क टनाशक औष धय का छड़काव
नधा रत मा ा म औष ध का घोल बनाकर कया जाना उ चत रहता है । प ीशाला म एवं
प य के शर र पर उपि थत व भ बा य परजीवी भी वा य पर गंभीर प रणाम उ प न
करते है तथा कई अ य घातक सं ामक रोग का कारण भी बनते है । अत: आव यकता इनसे
समय रहते शी नजात पाने क है । कई बार कु कु टशाला म यह परजीवी थाई प से
भी कई मह न तक नवास कर अ य त आ थक हा न के कारण बनते है एवं आसानी से
प ीशाला से बाहर नह ं जाते है । ईकाई म इन सभी बात का वशेष यान रखते हु ए इनका
उ लेख पा यसाम ी म कया गया है । साथ ह नवीन Mycostatic औष धय का वणन
भी कया गया है ।
5.2 आ त रक परजीवी सं मण (Endoparasitic Infestation)
आ त रक परजी वय के न न ल खत मु य वग है -
(i) गोल कृ मयाँ (Round Worms):
जैसा क नाम से प ट है, इनक आकृ त गोलबेलनाकार होती है । इनक ल बाई
5-12.5 से ट मीटर तथा मोटाई पेि सल के सुरमे के बराबर होती है । इनके अ डे
कु कु ट के पेट म रहते ह तथा उनक व ठा (feces)के साथ बाहर आ जाते है ।
अ य प ी इन अ ड को खाने पर सं मत हो जाते ह । साधारणत: इनक तीन
जा तयाँ होती है :-
1. बड़ी गोल कृ मयाँ (Large round worms)
2. छोट गोल कृ मयाँ (Small round worms)
3. सीकल गोल कृ मयाँ (Caecal round worms)
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ये कृ मयाँ आँत म चौड़ी कृ मय के नीचे क ओर पाई जाती है । कभी-कभी इनके अ धक
सं या म एक त हो जाने के कारण आँत का नकास माग भी अव हो जाता है । ये परजीवी
आँत क द वार से चपकते नह ं है ।
5.2.1 गोल कृ म क ड़े (round Worms):
1. गेप व स (Syngamus Tracheae) - प य क वास न लका ( े कया) म पाया
जाने वाला लाल रंग का कृ म मादा के साथ Y श ल से जुड़ा होता है । मादा कृ म े कया
म अंडे देती है तथा खांसी के साथ ये अंडे मुँह म आते ह और फर प ी वारा नगलने
पर पाचन सं थान म पहु ंच जाते ह और बीट के साथ बाहर नकलते ह ।
बाहर अनुकू ल वातावरण म 1 से 4 स ताह म अंडे प रप व होते ह, इन अंड या लावा
के खाने से आंत म उ प न छोटे कृ म आती को भेद कर पहले फे फड़ म और वहाँ से
वास न लय म पहु ंचते ह । यहाँ ये 7 से 10 दन म पूरे कृ म बन जाते ह ।
1-3 माह क आयु वाले चूजे इस रोग से अ धक सत होते ह । कृ म वारा भेदने से
वास ना लका म गाढ़ा य (Mucous) जमा हो जाता है और प ी को वास लेने म
क ठनाई होती है । प ी छ ंकता व खांसता है तथा बैचनी से सर हलाता रहता है । शव
पर ण पर कृ म वास न लका म देखे जा सकते ह ।
2. बड़ी आंत के गोल कृ म (Ascaridia galli) : कृ म सत प य क बीट म कृ म
के अंडे पाये जाते ह । ये अंडे कर ब 10 दन म रोग उ प न करने लायक हो जाते ह
। प ी वारा खाये जाने पर कर ब 10 दन बाद अंड से लावा (Larva) नकल कर ये
आँत के ऊपर भाग (Duodenum) क आ त रक सतह को भेदते ह और वहाँ कर ब
7 दन रह कर फर आँत के यूमन (Lumen) म आ जाते ह । कर ब 35 से 55 दन
म आंत म ह ये लाव पूरे कृ म बन जाते है ।
ल ण : य द वटा मन ए और बी का पले स क कमी हो तो छोट आयु के प य को
गोल क ड़े हा न करते ह । चूज म खून क कमी हो जाती है और वे कमजोर, सु त और
कभी-कभी लंगड़े हो जाते ह । बीट म कभी-कभी खून दखाई देता है, बीट पतल हो जाती
ह । य क प य का अंडा उ पादन कम हो जाता है । शव पर ण कर आंत म सूजन
व कृ म पाये जाते ह ।
उपचार : पाइपरजीन क औष धयाँ 100-500 म. ा. के अनुपात से येक प ी को द।
5.2.2 फ ता कृ म (Type Worms):
मु गय म सबसे हा नकारक टेप वम “डेवे नयाँ” है । ‘राले टना’ भी काफ हद तक नुकसान
करते ह । छोटे चूजे, वशेषत: िजनका पालन अ छा नह ं हु आ हो, अ धक कृ म त होते
है । इनम खून क कमी हो जाती है और धीरे-धीरे ये कमजोर होते जाते है ।
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“डेवे नया” कृ म आँत को भेदता है तथा आं शोध (Enteritis) क अव था पायी जाती है
। प ी को पे चश और लंगड़ापन हो जाता है । अंड का उ पादन कम हो जाता है । रायलेट ना
इकायन ो ीडा से आंत म नो यूल (Nodules) हो जाते है ।
उपचार : 10-15 ेन कमाला त प ी दया जा सकता है । कारबन ेटा लोराइड भी योग
म लाते ह । कट हु ई सुपार व कमाला 1:10 ( ेन के अनुपात मे) दया जा सकता है ।
5.2.3 सीकल कृ मयाँ (Caecal Worms):
ये बड़ी आत के ऊपर भाग क कृ मयाँ है । इ ह “हैटरे कस गै लनी” (Heterakis Gallinae)
कहते ह । यह सामा य गोल कृ मयाँ ह और बड़ी आँत अथवा सीकम के ऊपर भाग म पाई
जाती ह । इनक ल बाई लगभग 1.25 से ट मीटर होती है ।
य य प ये कृ मयाँ हा नकर नह ं ह, पर तु काला सर (black head) नामक रोग के सार
का मा यम है । अत: इनसे रोग के फै लने क संभावना बनी रहती है ।
5.2.4 कॉ सो डयो सस (Coccidiosis):
एक कोशी ोटोजोअन परजीवी समूह, िजसे क कॉ सीडीया कहते ह, के कारण रोग फै ल जाता
है । रोग क इस अव था को कॉ सी डयो सस कहते है । इस रोग के कारण कु कु ट म भार
हा न होती है । इससे चूज क ाणशि त कम हो जाती है तथा वकास दर म द हो जाती
है । मु गयाँ देर से अ डा उ पादन ार भ करती है और कम सं या म अ डे देती ह । कभी-कभी
प य क मृ यु भी हो जाती है ।
कॉ सी डयो सस रोग फै लाने वाले परजीवी अ य त सू म होते है । ये परजीवी एक को शका
(Single Cell) वाले होते ह और पशु-प य के शर र म रहते ह । मु गय पर आ मण
करने वाले इन परजी वय क आठ जा तयाँ ह । इनम से दो जा तय के परजी वय का
कोप बहु त भयंकर होता है और इससे अनेक प ी मर जाते ह । इनम थम जा त“एमीर या
टेनेला” (Eimeria Tenella) कहलाती है और इसके परजीवी, बड़ी आँत के थम भाग (सीका)
को भा वत करते ह । इसके कारण सामा य रोग िजसे सीकल कॉ सी डयो सस (Caecal
Coccidiosis) कहते ह, हो जाता है । यह रोग ाय: 3-16 स ताह के आयु वाले चूज म
देखा गया है । परजीवी क दूसर जा त एमी रया माइट स (Eimeria Tenella) कहलाती
है । यह परजीवी सामा यत: वय क मुगा-मुग क छोट आँत के आ त रक भाग पर आ मण
करते ह ।
कु कु ट के चूज को दू षत घर, दालान , बाड़ व आँगन म रखने पर वे इस रोग के शकार
हो जाते ह । इसके न न ल खत कारण ह ।
1. चूज के शर र पर उ सिजत साम ी म कॉ सीडीया के यु मपुटक (Oocyst) होते है,
िजनसे चूज को यह रोग हो जाता है ।
2. बाड़ , आँगन इ या द थान पर पड़ी व टा तथा अ य उ सिजत साम ी से चूज म
कॉ सी डया का आ मण हो जाता है ।
61
3. दशक , सेवक , पशुओं तथा च ड़य वारा कॉ सी डया लाए जाकर चूज को सत कर
लेते ह ।
कॉ सी डया का जीवन च (Life cycle of Coccidia):
कॉ सी डया का जीवन च ज टल है । जब कोई चूजा सं ामक बीजाणुयु त यु मुपु टका
(Oocyst) को खा लेता है तो इसम या त आठ जा तय के परजीवी चूज क आ त रक
झ ल क कसी भी को शका म व ट कर जाते ह । इन सं ामक बीजाणुओं म येक
क वृ 16 बार होती है और ये झ ल क को शका से बाहर आकर पुन: 16 को शकाओं
को सं मत करता है । यह वृ लगातार होती रहती है । प रणाम व प नर तथा मादा परजीवी
उ प न हो जाते ह । इनके पर पर संगम होने से यु मपु टकाय (ऊओ स ट) बनती ह और
ये चूज क व ठा के साथ बाहर आ जाती ह । उन पु टकाओं पर ताप तथा अ य कसी कार
क क ट एवं जीवाणु नाशक औष ध का भाव नह ं होता है । ये भू म तथा जनक घर मे
कई वष तक जी वत रह सकते ह । तुर त उ प न हु ई यु मपु टका सं ामक नह ं होती है,
पर तु नमी और ताप क समु चत प रि थ तयाँ ा त होने पर लगभग 21 घ ट क अव ध
म इन पु टकाओं से बीजाणु बन जाते ह और सं मण ार भ कर देते है ।
(a) सीकल कॉ सी डयो सस (Caecal Coccidiosis):
यह एक घातक रोग है, पर तु जो प ी इसके आ मण से बच जाते ह, शी ह व थ हो
जाते ह । इसे एमी रया टेनेला (Eimeria tenella) जा त के परजीवी उ प न करते ह ।
रोग के ल ण (Symptoms of Disease):
1. कु कु ट के शर र म र त क कमी
2. चेहरे का पीला हो जाना ।
3. लोइका गुहा से र त आना ।
4. बड़ी आँत का ऊपर भाग बढ़ (Caecal enlargement) जाता है और उसम र त अथवा
पीले भूरे रंग का पस (pus) भर जाता है ।
5. प य क अक मात् मृ यु हो जाती है।
6. रोग के ती होने पर प ी मुरझा जाते ह और उनके दोन डैने नीचे लटक जाते ह ।
7. पंख बखर जाते ह तथा शर र ढ ला और लटका दखाई देता है ।
(b) आँत क कॉ सी डयो सस (Intestinal Coccidiosis) :
आँत क कॉ सी डयो सस परजी वय , क आठ परजी वय म, दूसर जा त क परजीवी
“एमी रया माइ टस” के कोप के कारण होती है ।
रोग के ल ण (Sympotoms of Coccidiosis):
1. शर र पीला हो जाता है ।
2. च च, पैर, पीले तथा सफे द हो जाते ह ।
शर र के अंग वशेष का भा वत होना तथा होने वाल हा नयाँ, कॉ सी डया क जा त
पर नभर करती है ।
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रोग का नदान (Diagnosis of Diseases):
उपयु त दोन कार के रोग का सह नदान करने के लए उनके ल ण क भल भाँ त पर ा
करनी चा हए । सू मदश क सहायता से प य क व ठा म यु मपु टकाओं (Oocyst) क
उपि थ त के बारे म ात कर लेना चा हए I
रोग क रोकथाम (Prevention of Diseases)
इन दोन रोग क रोकथाम के लए न न ल खत उपाय करने चा हए :-
व छता :
कु कु ट गृह के फश तथा व भ न उपकरण क समय-समय पर सफाई करते रहना चा हए
। उपकरण क सफाई के लए “लाई” के गम घोल का योग करना चा हए । य द चूज को
तार क बनी जाल के फश से हटाकर कसी ऐसे थान पर पहु ँचा दया जाए, जहाँ पहले प ी
न रखे गये हो अथवा उस थान पर प ी तो रखे गये ह , पर तु उस थान क खुदाई या
जुताई कर द गई हो, तो रखे जाने वाले प य को सं मत होने का डर नह ं रहता है ।
रोग रोधी औष धय का योग :
इन रोग क रोकथाम करने के लए कॉ सी डया रोधी (कॉ सी डयो टेट) स फ़ा औष धय को
उनके आहार तथा पीने के पानी म मला कर देना चा हए ।
बछावन का बंध :
बछावन के नम होने पर यु मपु टकाओं (Oocyst) क सं या ती ता से बढ़ती है, पर तु
इसके वपर त इसके शु क रहने पर इनक सं या कम हो जाती है । बछावन को ढेर म एक त
कर देती ह, इससे बछावन का ताप अ धक ऊँ चा 51.7o
सै ट ेड हो जाता है और अमो नया
गैस नकलने से बीजाणु न ट हो जाते ह ।
रोग का उपचार (Treatment of Diseases) :
इन दोन रोग से भा वत कु कु ट का स फरयु त औष धय से उपचार करने से लाभ होता
है । स फामैजाथीन, स फाकु नै सो लन इ या द औष धय को आहार अथवा पीने के पानी म
0.5 तशत क दर से 3-7 दन तक देने से सं मण क रोकथाम एवं उपचार कया जा सकता
है । ये औष धयाँ अ य औष धय क अपे ा कम वषैल ह । अत: कु कु ट को खलाने के
लए इनक सं तु त क जाती ह । औष धय का अ धक योग करना हा नकर है । अत: ऐसा
नह ं करना चा हए । इसके अ त र त उपचार हेतु एम ोजोल, वाइ यूरान, का नाल आ द
औष धयाँ भी पानी म अथवा फ ड म दये जाकर शी रोग पर नयं ण पाया जा सकता है
।
जा त आँत का भा वत भाग ल ण
आईमी रया
एस बुलाइना
छोट आंत का ऊपर भाग सफे दपैच, आंत मोट
E.E.A.)
आई. टेनेला सीकम (Caeca) खून से भर सीका ‘सीकलवाल'
E.tenella म हैमोरेज
63
आई. नके स बीच के आधार भाग से फू ल आते, सफे द ध बे, आँत म
E.nicatrix पूर छोट आंते हैमोरेज
आई. म सीमा छोट आत का बीच तथा सूजी हु ई आँत क सतह िजस
E.maxima नीचे का भाग पर खून भी पाया जा सकता है ।
जा त आंत का भा वत भाग ल ण
आई. मवाट
E.mivati
छोट आंत का ऊपर आधा भाग आंत क द वार पर गोलाकार सफे द
ध बे
आई. हैगानी
E.higani
छोट आत का ऊपर
आधा भाग
पनपाइ ट हैमोरेज, आंत म सूजन
आई. ू ट
E.brunetti
छोट आत का नीचे का भाग र त र त रंिजत तरल पदाथ तथा
गुदा वार, यो न वार रंिजत तरल पदाथ तथा
गुदा वार, यो न वार सूजन
आई. ीऐके स
E.precax
छोट आंत का ऊपर
तहाई भाग
कोई वशेष ल ण नह ं
आई. माइ टस
E.mitis
छोट आंत का ऊपर भाग कोई वशेष ल ण नह ं
5.3 बा य परजीवी सं मण (Ecto-parasitic Infestation):
मुग पालन म बा य परजी वय वारा अनेक संकटमय ि थ त पैदा हो जाती है । इस वषय
क पूण जानकार , पेरेसाइट का जीवनच , नदान का ान आ द सफल कु कु ट पालन के
लए आव यक है । बाजार म ाय: हर कार के ज तुओं को मारने हेतु औष ध उपल ध है
तथा नमाता के नदश के अनुसार ह उनका योग कया जाना चा हये । कु कु ट माँस एवं
अ ड क बढ़ती हु ई मांग (जो हमारे देश म अभी शहर तक ह सी मत है) के कारण मु गय
को “सघन वातावरण” म पालना होता है । इस कारण बा य परजी वय क वृ क संभावना
भी बहु त बढ़ जाती है ।
मु गय म मु यत: खून चूसने वाल के शार रक पीड़ा देती ह । वैसे म छर एवं खटमल भी
काफ पीड़ा देते ह, पर तु अपने जीवन क सार अव ध पशुओं-प य के शर र म चपटे नह ं
रहते । पर तु जुऐं मु गय के शर र पर ह अपना सारा जीवन यतीत करती ह । अत: येक
कु कु ट पालक के लये यह जानकार आव यक है क कौन सा परजीवी (जीव ज तु) कब कस
हालत म आ मण करता है एवं उसके नदान के या उपाय हो सकते ह? यह जानकार रखना
भी अ य त आव यक है क कु कु टशाला के कौन-कौन से थान म इनक सं या अ धक
पाई जाती है, कस कार व कन- कन दवाइय के योग से उ ह न ट कया जा सकता है
। यह यान रखना भी ज र है क दवाईय के योग से मु गय को कसी कार क शार रक
हा न नह ं पहु ंचे एवं न ह अ डे तथा मुग मांस खाने वाल को कोई हा न हो ।
64
परजी वय पर दवाईय वारा नयं ण पाने के तर के असर बदलते रहते ह । D.D.T. तथा
B.H.C. मु गय के शर र पर मलने क सफा रश क जा रह है, पर तु हाल के योग से
पता चला है क डी.डी.ट . को मु गय के शर र पर मलता हा नकारक है, इसका असर उनके
अ ड पर भी होता है तथा मलने से यह औष ध उनक चब म वेश कर इक ी हो जाती
है । ऐसी हा नकारक दवाईय के लगाने से अ ड के योग करने वाल पर इसका असर न
हो, इस लये आजकल यूवान, मले थयान रोट नोन इ या द के योग क सफा रश क जाती
है । ये अ डे उ पादन तथा मुग मांस के खाने वाल पर बुरा असर नह ं डालती है तथा प य
को भी कसी कार क हा न नह ं पहु ँचती है जहाँ तक मुग घर क सफाई अथवा हा नकारक
जीवन ज तुओं को न ट करने क बात है, डी.डी.ट , बी.एच.सी., लंडेन लॉरडेन टॉकसाफे न
इ या द का योग, कु छ आव यक सावधा नयाँ बरतने के साथ, हो सकता है । कु कु ट पर
असर करने वा कु छ परजी वय का यहाँ वणन कया जा रहा है ।
5.3.1 जूँ (Lice):
जूँ कु कु ट के सामा य परजीवी क ट है । यह एक छोटा, पंख र हत, भूरे अथवा कु छ-कु छ
पीले रंग का क ट होता है । इसके शर र क बनावट चपट और आगे तथा पीछे के भाग
बेलनाकार होते ह । इसके 6 टाँगे होती ह । जूँ अपना जीवन च परपोषी के शर र पर ह
पूरा करता है और इस अव ध म उनके शर र पर वत प से वचरण करता रहता है। इस
जा त के क ट क जनन मता बहु त अ धक होती है । इनके अ डे मु गय के पर अथवा
घोसल म चपके रहते ह और जूँ क एक जोड़ी कु छ ह माह म 1 लाख 20 हजार परजीवी
उ प न कर सकती है ।
जूँ दो कार क होती है, एक शर र पर रहने वाल तथा, दूसर सर पर रहने वाल जूँ । शर र
पर पायी जाने वाल जूँ अ धकतर पर, पंख और अवय क गुहा के चार ओर चपक रहती
ह । सर पर रहने वाल जूँ सर तथा गदन के भाग पर रहती है ।
रोग के ल ण : जूँओं के कारण कु कु ट को बड़ी बैचेनी तथा क ट होता है । जूँओं के आ मण
से प य क भूख कम हो जाती है और अ ड का उ पादन कम हो जाता है । जूँओं से सत
प य को रखना समय एवं धन को न ट करना होता है । जूँओं क अ धकता से छोटे चूज
क तो मृ यु ह हो जाती है ।
रोकथाम एवं उपचार : जूँओं को न ट करने के लए कई कार क क टनाशक औष धय का
योग कया जाता है और जब तक परजीवी तथा उनके अ डे न ट न हो जाये, येक दस
दन के प चात् उपचार दुहराते रहना चा हए । कु छ पर त दवाय यहाँ बतायी जा रह है।
1. नकोट न स फे ट (Nicotine Sulphate):
इसका 40 तशत का वलयन, सं या के समय जब प ी दड़ब म जा रहे हो, तो उनके
बैठने के थान पर छड़क देना चा हए । इस वलयन से नकलने वाला धुआँ जुऐं को
मारने म भावकार स होता ह । ी म ऋतु म शीत ऋतु क अपे ा अ धक अ छे
प रणाम ा त होते ह ।
2. सो डयम लुओराइड का वलयन (Sodium Fluoride Solution):
65
लगभग 5 ल टर गम पानी म 7.5-30 ाम सो डयम लुओराइड के तैयार कये हु ए
वलयन म कु कु ट को नहलाया जाता है । इसके लए कु कु ट को पंख के वारा पकड़
लया जाता है और वलयन म डूबो दया जाता है । सोते समय यह यान रखना चा हए
क प य का सर वलयन से ऊपर ह रहे । आधे से एक मनट तक डुबोना लाभ द
होता है । बाद मे सर को भी एक ण के लए वलयन म डूबो दया जाता है । यह
उपचार शु क मौसम के दन कया जाता है ।
3. डे रस वलयन
कु कु ट के जूँ को नयि त करने के लए न न ल खत क टनाशी औष धय का योग
कया जाता है:-
अ. 1% ल डेन का घोल अथवा 3% मला थयोन मुग शाला क सफाई हेतु ।
ब. लकड़ी क भ म तथा है सी लान अथवा गैम सीन 1000:1 के अनुपात म मलाकर
छड़कना ।
स. लकड़ी क भ म, त बाकू का चूण तथा गंधक 10:11 के अनुपात म मला कर योग
करना ।
द. लकड़ी क भ म एवं डी.डी.ट . 20:1 के अनुपात म मलाकर योग करना ।
य. लकड़ी क भ म तथा बी.एच.सी. का चूण व 1000:5 के अनुपात म मलाकर छड़कना
।
र. 1% मेला थयोन का घोल मुग घर क द वार या छत पर छड़काव ।
सत कु कु ट को पंख से पकड़कर उपयु त औष धय म से कसी एक क एक चुटक भरकर
सर के पर पर छड़क देना चा हए । एक ओर चुटक औष ध लेकर ीवा पर छड़क देना
चा हए । इसके प चात व , जांघ, अव करगुहा, पूँछ और पंख पर भी औष धयाँ छड़क कर
हाथ से रगड़ देना चा हए ।
जुँओं से भा वत कु कु ट का नर ण करते रहना चा हए और पुन: उनके शर र पर जूँ दखाई
द तो त 10 दन के प चात् इन औष धय का छड़काव करना चा हए । यह म उसी
समय तक बनाया रखा जाए, जब तक क अ ड स हत सभी जूँ पूण प से न ट न हो जाय।
इसके अ त र त, छड़काव कए जाने वाल औष धय को कसी छछले (Shallow) बतन
म भरकर और कु कु ट-गृह म रखकर “धूल नान” (Dustbath) का ब ध कया जा सकता
है ।
भ व य म जुँओं के आ मण को रोकने के लए प य को भल -भाँ त काश और संवातन
वाले गृह म रखना चा हए। नए प य को उस समय तक कु कु ट समूह म नह ं मलना चा हए,
जब तक क यह नि चत न कर लया जाए क इन प य क जुऐं न ट कर द गई ह ।
कु कु ट समूह म नर मुगा(Cocks) जुऐं फै ला देते ह । अत: जब तक चूजे उ प न न करना
हो, मु गय के साथ इन नर को नह ं रखना चा हए ।
सर क जूँ होने से प य को क ट होता है, उ ह न ट करना कु छ क ठन भी है । इन जुँओं
को न ट करने के लए 4 भाग बैसल न म एक भाग गंधक के फू ल मला कर भा वत अंग
66
पर यह मलहम लगानी चा हए । नहाने के लए लकड़ी के ब स म 4% मेला थयोन ड ट
रखना चा हए । मु गयाँ वयं उसम जाकर पंज से कु रेद कर पाउडर मलायेगी और औषधी
शर र पर लग जायेगी ।
5.3.2 चीचडी (Ticks) :
कु कु ट क चीचडी (एरगस पस कस) एक क टदायक परजीवी है । ये परजीवी द णी भारत
के अ त र त देश के अ य थान म पाये जाते ह । चीचडी प रपोषी का र त चूस कर उनम
र त क कमी उ प न कर देती ह और कु कु ट को वर हो जाता है I
चीच ड़याँ रा के समय अ धक स य होती ह । वे कु कु ट के शर र से चपक रहती है
और बना आहार कए भी 3 वष तक जी वत रह सकती ह । वष के बसंत तथा ी म ऋतु
म वे अ धक स य होती ह । चीच ड़य का सार उसी समय अ धक होता है जब क उ ह
पहले से उपि थत चीच ड़य वाले थान म रखा जाए अथवा समूह म कोई चीचडी यु त प ी
आ जाए ।
रोक क रोकथाम (Prevention of Disease): िजन थान म चीच ड़य क सम या हो,
वहाँ कु कु ट के लए चीचडी र हत कु कु ट-गृह (अ ड ) क यव था करनी चा हए । अ ड
के येक आधार त भ पर धातु क या लय म पानी एवं म ी का तेल मलाकर रखना
चा हए । प य के पास पहु ँचने के लए त भ पर चढ़ने वाल चीच ड़याँ इन यार म गर
कर मर जाती ह ।
चीच ड़य के लावा पाये जाने वाले प य को 1000 भाग पानी अथवा म ी म 5 तशत
यु त 1 भाग डी.डी.ट . का चूण अथवा गैमे सीन मलाकर उपचा रत करना चा हए । प रपोषी
के भा वत अंग पर नीम अथवा सरस के तेल म म ी का तेल मलाकर अथवा मैथीले टड
ि ट लगाने से लावा ऊपर आ जाते ह । इन छतराए हु ए लावा को कपड़े से रगड़ कर दूर
कया जा सकता है।
कु कु ट-गृह क दरार म चीच ड़याँ छपी रहती ह, इ ह न ट करना प के गृह म तो सुगम
है, य क आग क मसाल जलाकर उसक लौ से न ट कया जा सकता है, पर तु जो गह
लकड़ी आ द से बने हो, उ ह भल -भाँ त साफ करके न न ल खत वलयन छड़कना चा हए।
साबुन 1 भाग
म ी का तेल 3 भाग
फनायल 3 भाग
गम पानी 93 भाग
...............
योग 100 भाग
...............
इस वलयन को गम अव था म ह छड़कना चा हए ।
म ी तथा घासफू स से बने कु कु ट गृह क चीच ड़य को न ट करना और भी क ठन है ।
अत: इनम रहने वाले कु कु ट को अ य ले जाकर भा वत घर को जला कर न ट कर देना
ह चीच ड़य से छु टकारा पाने का एक मा उपाय है ।
67
5.3.3 ब थी (Mites) :
कु कु ट पर आ मण करने वाल ब थयाँ ाय: छोट होती है और इनके चार जोड़ी (आठ)
टांगे होती ह । भारत म सामा यत: ब थय क तीन जा तयाँ पायी जाती है ।
1. लाल ब थयाँ (Red Mites) : इन ब थय को कु कु ट के दड़बे क ब थी कहते ह
। आचार यवहार म ये चीच ड़यो से मलती-जुलती है और अ धकांश समय दड़ब क
दरार म छपी रहती है । ये अंधेरे म प य पर आ मण करती ह ।
इनक रोकथाम के उपाय चीच ड़य को न ट करने के उपाय जैसे है ।
2. काल टाँग वाल ब थयाँ (Mites with scaly legs) : ये ब थयाँ बहु त सू म
परजीवी क ट है । इ ह सू मदश के बना देखना संभव नह ं है ।
ये ब थयाँ प य क टांग पर चढ़ परत अथवा भूसी के नीचे छपी रहती ह और वहाँ
पर सूजन तथा जलन उ प न करती ह । इस अव था को टांग क परत अथवा भूसी
क चीचड़ी कहते ह । सामा यत: अ धक आयु वाल मु गयाँ इनसे पी ड़त होती ह ।
रोकथाम (Prevention) : कु कु ट क टांग को क चे पे ोल अथवा बराबर भाग म
मलाये गये म ी के तेल व इंजन म जले तेल (Crank case oil) म ण म डुबाया
जाता है । आव यकता पड़ने पर एक माह के प चात इस उपचार को दुबारा दोहराया जा
सकता है । कु कु ट क टांग को तेल अथवा म ण म डुबोते समय इस बात का यान
रखना चा हए क उनके पंख पर तेल न पड़े, य क इससे प य के शर र पर छाले
(फफोले) पड़ जाते ह । यह उपचार ात: काल कया जाता है िजससे क सं या क घोसल
म वेश करने के पूव प य क टांगे शु क हो जाय ।
3. पर न चने वाल ब थयाँ (Depluming Mites) : ये ब थयाँ बहु त सू महोती ह और
सू मदश य के बना नह ं देखी जा सकती ह । ब थयाँ पंख क जड़ के पास वचा
म छपी रहती ह । उनके कारण कु कु ट को बहु त बैचेनी तथा खुजल होती है । पी ड़त
कु कु ट बार-बार अपने पंख को च च से नोचती रहती ह ।
रोकथाम तथा उपचार (Prevention and Treatment) : उपचार के लए बैसल न
के 4 भाग म 1 भाग गंधक मलाकर मरहम तैयार करके भा वत अंग पर मलना चा हए।
ब थय का उपचार करने के लए गम मौसम म कु कु ट को 5 लटर पानी म 28 म लल टर
साबुन तथा 150 ाम गंधक को मलाकर वलयन तैयार कर उसम प य को डुबो कर करना
चा हए ।
5.4 फफूं द ज नत रोग:
5.4.1 एसपरिजलो सस ( ूडर यूमो नया):
यह कम उ के चूज म होने वाला एक मह वपूण फफूं द ज नत रोग है, जो क चकन एवं
टक दोन ह जा तय म पैदा होते है अथवा हे चंग के समय हो जाता है । यह रोग चूजा
68
वशेष का रोग है तथा ऐ पर लजस यूमीगेटस नामक फं गस से होता है । पूरे लॉक म भी
यह रोग हो सकता है । गरम एवम ् नमी वाले मौसम म यह रोग अ धक होता है।
यह रोग एै यूट एवम ् ौ नक दोन तरह का हो सकता है । ऐ यूट रोग म वास लेने म क ठनाई
होती है तथा फं गस क टॉि सन के मि त क पर भाव डालने के कारण चूज म कं पकं पी
होती है । रोग के ो नक हो जाने क अव था म (जब रोग कई दन चले) चूजे कमजोर हो
जाते ह, उ ह वास लेने म क ठनाई होती है तथा शर र के र त म ऑ सीजन क कमी हो
जाती है । अ त म चूजे नीले पड़ने लगते ह ।
इस रोग का फं गस डैजट कू लर क घास म हो सकता है । (ग मय म अ डे ठ डे रखने के
लए डैजट कू लर का योग कया जाता है), िजससे को ड म म रखे अ ड के भीतर ये फं गस
घुस सकता है । ऐसे अ डे हैचर म फट सकते ह, िजससे और अ धक अ डे एवम ् चूजे भा वत
होते ह । यह चूजे फं गस लेकर जब ूडर हाउस म पहु ंचते ह तो वहाँ के वातावरण को भा वत
करते ह और ूडर हाउस म फं गस का इ फै शन हो जाता है । इसके अलावा बुरादे के अ दर
मलने वाल लकड़ी क छाल म यह फं गस रहता है । कभी-कभी फ ड म भी यह फं गस हो
सकता है ।
(फे फड़े म फं गस के दाने)
अनुभव यह कहता है क यह रोग बुरादे से होता है, ाय: उस बुरादे से िजसम नमी और लकड़ी
क छाल अ धक हो । िजन फाम पर पहले 2 स ताह क ू डंग म बुरादे के थान पर चावल
क भूसी या बालू योग क जाती है । अत: जहाँ तक संभव हो, पहले 2 स ताह क ू डंग
म लकड़ी के बुरादे का योग नह ं करना चा हए, पर तु वशेष प रि थ तय म य द बुरादे
का योग करना ह पड़े तो 1000 वग फ ट ए रया म योग कए गए बुरादे म 2 कलो के यर-ट ,
5 कलो चूने क सफे द तथा 1 कलो बार क पसा नीला थोथा अ छ तरह मला देना चा हए
।
(चूजे के पेट म फं गस दाने)
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इस रोग म पहले 2 स ताह म 15 से 70 तशत तक मृ यु हो सकती है । जो चूजे बच
जाते ह, उनम बाद म जाकर पेट म पानी भरने लगता है, िजससे ऐसाई टस के कारण उनक
मृ यु होती है । पो ट माटम म चूजे के फे फड , एयर सैक, मि त क तथा पेट म खस के
दान के आकार के या आल पन के हैड क श ल के पीले-हरे दाने बनते ह िज ह लेक कहते
ह । यह दाने वास लेने म क ठनाई करते ह तथा दम घुटने के कारण चूज क मृ यु होती
है । इस रोग का कोई उपचार नह ं है । अत: बचाव म ह लाभ है ।
कारण :
 ए परिजलस यूमीगेटस नामक फं गस के वारा फे फड़ म सं मण होता है ।
 मौसम म एकाएक आयी नमी एवं बरसात के समय यह सं मण अ धक होता
ल ण :
 छोटे चूज म फै लने वाला यह एक वशेष रोग है िजससे प ी म यूमो नया के ल ण
द शत होते है ।
 वास म तकल फ तथा एक वशेष कार क व न, शर र के भार म कमी, अ धक
यास लगना एवं बुखार जैसे ल ण कट होते ह ।
 रोक क ए यूट अव था फं गस वारा उ प न टॉि सस के मि त क पर कु भाव
डालने से होती है िजससे प ी का अ या धक काँपते हु ए तीत होता है ।
 रोग क ो नक अव था म वसन म तकल फ, साथ ह ऑ सीजन क कमी आना
व चूजे नीले पड़ना जैसे ल ण देखे जा सकते है ।
5.4.2 फे वस (Favus) :
 फे वस नामक रोग जो क ाइकोफाइटोन मॅग ननी नामक फफूं द से होता है-
 का ब तथा चेहरे के अ य भाग पर इसका भाव देखा जा सकता है िजससे इन भाग
पर सफे द रंग के च ह ( पॉट) पाये जाते ह । बाद म यह पॉट कठोर व ट
हो जाते ह ।
5.4.3 माइकोटॉि सको सस (Mycotoxicosis) :
कई कार के 'मो ड मुग शर र म टॉि सन (toxin) पैदा करते ह, िजस कारण नुकसान हो
सकता है । इन मो ड म ए ल ने रया (Alternaria), पैनीसी लयम (Penicillium),
एसपरिजलस (Aspergillus), मु य ह । खराब अनाज (Grain) के खाने से इस कार के
टॉि सन (Toxin) पैदा हो सकते ह । पानी के समीप फै ला हु आ दाना खाने से भी 'मो ड पैदा
हो जाता है तथा उसे खाने पर टॉि सन के असर से रोग हो जाता है ।
4 से 8 स ताह क उस के प ी अ धक रोग सत होते ह । वे सु त हो जाते है तथा उ ह
द त लग जाते ह । कभी-कभी यह रोग ऐसी अव था पैदा कर देते ह, िजसम माँस पे शय
म हैमरेज (Haemorrhage) पाया जाता है जो े ट (Breast), पैर तथा आँत म अ धक
दखाई देता है । इस रोग म र त पतला तथा पीलेपन का हो जाता है । ह डयाँ भी अ दर
पील हो जाती है ।
70
बचाव : फाम पर अ छ यव था होनी चा हए । आहार का चयन उपरो त त य को यान
म रखते हु ए कया जाना चा हये । फफूं दनाशक औष ध से समय-समय पर छड़काव कया
जाना चा हये । लटर क यव था ठ क होनी चा हए । 0.5% नीले थोथे के घोर से सम त
फाम को धोय । इन रोग का कोई उपचार नह ं है ।
माइकोटोि सस पेड़ के वतीय मेटाबोलाइट होते ह । यह खा य पदाथ को न न कारक
के रहते अ धक सं मत करने म स म होते है । न न कारक माइकोटोि सन के ती उ पादन
को भी बढ़ावा देते है ।
1. सूखा, 2. ठंडक ( ो ट), 3. तेज तापमान 4. ती नमी
5. म ी का कार 6. देर से गुड़ाई 7. अ यवि थत भंडारण
माइकोटोि सन के भाव को नि य करने के लए न न पोषण व धयाँ अपनाई जानी चा हए
।
1. ू ड ोट न (Crude Protein) क मा ा बढ़ाई जानी चा हए ।
2. भोजन म वसा (Lipids) क अ धक मा ा वशेषकर लनो ल नक ऐ सड, खा य म
Aflaxoins से होने वाल चूज क मृ युदर म कमी लाता है ।
3. वटा मन स ल मट के प म दया जाना चा हए ।
4. ए ट ऑ सीडे ट (Antioxidants) वशेषकर BHT एवं BHA, अ लाटॉि सन के
वपर त भाव को कम करने म सहायक रहते है ।
5. कु कु ट दाना, पेलेट के प म िजसम ोपायो नक ऐ सड क मा ा हो, फफूं द से उ प न
जहर के भाव को कम करता है तथा एक मो ड इन ह वटर (Mould Inhibitors) के
प म स य रहता है ।
5.5 सारांश:
परजी वय का ह का सं मण (Mild) अ धक त नह ं करता है, क तु सं मण क ती ता
प ी के वा य पर वपर त भाव छोड़ती है, इस तरह प य म परजीवी रोग के कारण
होने वाल आ थक हा न कसी भी सफलता को पो इ ड क वफलता म बदलने म
स म है । प ी रोग काि स डयो सस लटर म नमी के कारण मुखता से होता है, जब क
अ धकांश फफूं द ज नत रोग म उनके भाव से उ प न Mycotoxins वशेष हा नकारक
भाव डालते है एवं मृ युदर भी अ धक होती है । मुग के दाने से फफूं द या माइकोटाि सन
को दूर करना आसान नह ं है । ले कन ए ट माइकोटोि सऐ ट का दाने म मलाये जाने से
71
72
इकाई - ोटोजोआ ज नत बीमा रयाँ
इकाई -6
6.0 उ े य
6.1 तावना
6.2 ह टोमो नऐ सस (Histomoniasis)
6.2.1 कारण
6.2.2 ल ण
6.2.3 इलाज
6.2.4 बचाव एवं रोकथाम
6.3 टो सो लाजमो सस (Toxoplasmosis)
6.3.1 कारण
6.3.2 सारण
6.3.3 ल ण
6.3.4 नदान
6.3.5 इलाज
6.4 ए वयन मले रया (Avian Malaria)
6.4.1 कारण
6.4.2 सारण
6.4.3 ल ण
6.5 ए वयन पायरो लाजमो सस (Avian Piroplasmosis)
6.5.1 कारण
6.5.2 ल ण
6.6 पाइरोक टो सस- टक फ वर (Spirochaetosis Tick Fever):
6.7 सारांश
6.0 उ े य :
प य के सभी सं ामक रोग म ोटोजोआ ज नत रोग व श ट थान रखते ह । जीवाणु
ज नत / फफूँ द ज नत प ी रोग से इनका भेद करना आसान नह ं है । अनुमानत: एक सौ
से अ धक ोटोजोआ जा तय वारा व भ न कु कु ट रोग उ प न होते है, िजनसे ती आ थक
त एवं उ पादन म गरावट देखी जा सकती है । ोटोजोआ ज नत प ी रोग के वषय म
73
अ धक जानकार इसके भावी नय ण एवं अ य प य म इसके सारण को रोकने के
उ े य से इकाई म आव यक त य का समावेश कया गया है ।
6.1 तावना:
य य प ोटोजोआ को एक को शक य ज तु के प म प रभा षत कया गया है, ले कन
ोटोजोआ का व श ट अंगीय संरचना (मेटाजोआ), परपोषी हो ट (Host) म जीवन च
स पादन इसे अ य जीवाणु एवं अ य फफुँ द से पृथक करती है । जीवाणु एवं फफुँ द म एक
कठोर पर मएबल को शका भि त पायी जाती है, जब क ोटोजोआ म अपे ाकृ त अ धक
लचील पेल कल अथवा ला मा मे ेन पायी जाती है । इस लए ोटोजोआ ज नत रोग का
नय ण एवं रोकथाम अ धक भावी ढंग से कया जाना चा हए । इस ेणी के प य के
लए अ य त घातक रोग को सी डयो सस, ह टोमो नऐ सस, टो सो ला मो सस, ए वयन
मले रया आते है, जो क प य क सभी जा तय चकन, डक, गज, टक को भा वत
करते ह । इसी कार से र त परजीवी सं मण जैसे क ए वयन पायरो लाजमो सस,
ेपेनोसोमो सस, आ द प य के लए अ य त घातक एवं मृ युपरक होते ह इन रोग से समय
रहते बचाव एवं अ य इ से ट वे टस (Insect vectors) वारा इनके सारण क रोकथाम
के लए समु चत ब धन आव यक है । साथ ह नय मत कु कु ट शाला पर ण, ल ण
क पहचान एवं योगशाला म बीट क जाँच, खून क जाँच अव य करायी जानी चा हए ।
जाँच के आधार पर बीट म को सी डयो सस के लए आइ म रया ऊ स ट का पाया जाना व
र त पर ण म र त परजी वय क पहचान (पाइरो ला मो सस, ेपेनोसोमो सस आ द) कर
शी रोग का पता लगाया जा सकता है । ोटोजोअन प ी रोग क पहचान कर इनके भावी
नय ण के उपाय समय रहते कए जा सके , साथ ह अ य सं ामक प ी रोग से इ ह
वभे दत कया जा सके , इसी त य को यान म रखते हुए इकाई म इन रोग क व तृत
ववेचना क गई है ।
6.2 ह टोमो नऐ सस (Histomoniasis):
इस रोग को लेक हेड डिजज के नाम से भी जाना जाता है । यह रोग मु यत: टक / चकन
तथा अ य प य म ल वर तथा सकम को भा वत करता है । सव थम इस रोग के वषय
म वै ा नक Rice (1982) एवं Cush man (1894) ने बताया । बाद म इ ह ने इस रोग
को ोटोजोअन रोग क सं ा द । टक के प चात इस रोग का सारण चक स म पाया
गया ।
6.2.1 कारण: Histomonas.meleagridis नाम ोटोजोआ यह दो प म पाया जाता
है: - (1) Tissue From, (2) LUMEN from यह एक कार का सकुलर / ओबल
8-14N यार डाइ मटर, आकार वह न तथा यू ल यस स हत ोटोजोआ है, िजसम
से ऊँ गल के समान आकृ तयाँ नकल रहती है । इस ोटोजोआ को ह टोमोनाड
(Histomonads) कहते है । यूमन फॉम म यह परजीवी लेिजला के मा यम
से लवर के अ दर व ट हो जाता है तथा लवर को त पहु ँचाता है ।
74
6.2.2 ल ण: इ यूवेशन पी रयड 4-5 दवस, प ी लड़खड़ाकर चलता है । दाना ठ क
से नह ं खाता है । सीकम म तथा बीट म ह टोमोनाड देखे जा सकते ह । सीकम
क झ ल लाल और मोट हो जाती है । सकम सूज जाता है तथा उसम यूकस
भर जाता है । पँख लटक जाते ह तथा आँखे ब द हो जाती है । बीट थोड़ी पतल
तथा उसम स फर क गंध आती है । प ी अपने सर को पंख के बीच ले जाकर
झुका देता है । बाद म प ी का ल वर भा वत होता है । ल वर का आकार बढ़
जाता है । टक म इसका आकार 10-15 तशत तक बढ़ सकता है । ल वर के
ऊपर भूरे सफे द या म कलर के रंग के समान ल जन पाये जाते ह । 10- 12
दन के प चात प ी क मृ यु हो सकती है ।
6.2.3 इलाज : योगशाला म सीकम से य लेकर मेयर बनाया जाता है तथा इस य
म ह टोमोनाड देखे जा सकते ह । ल वर से इ ेशन मेयर बनाकर बबल
(Bubble) के समान ह टोमोनास यू ल यस स हत देखे जा सकते है । इस रोग
का नदान नाइ ो यूरोन तथा यूराजोल डोन औष धय वारा कया जा सकता है
। ल वर को मजबूत करने के लए ल वर ए स े ट दया जाना चा हए ।
6.2.4 बचाव एवं रोकथाम -
(1) मुग शाला के आसपास साफ-सफाई तथा हाइिजन का यान रखा जावे ।
(2) आस-पास के े से क ट के नाश के लए क ट नाशक औष ध का योग कया
जाये । वशेषकर ह टेरेक स कृ मनाशक औष धयाँ द जाये, जैसे फ नोथाईिजन
मैबे डाजोल आ द।
6.3 टो सो लाजमो सस (Toxoplasmosis):
यह रोग तनधार (Mammals) एवं प ी दोन का ह रोग है जो क ोटोजोआ
Toxoplasma.gondii के वारा होता है । यह रोग मनु य , पशुओं एवं प य को समान
प से भा वत करता है । इस रोग के मुख ल ण लगातार कमजोर होना, कलंगी का पीला
पड़ा तथा सकु ड़ जाना एवं अंधापन होना है ।
6.3.1 कारण Toxoplasma.gondii
ोफोजोइड अपे ाकृ त कम गोल, एक सरे पर, दूसरे पर अ धक, यू ल यस
उपि थत, आकृ त 4-7 माइ ोन ले थ (Length) तथा 2-4 माइ ोन चौड़ा कोन
क आकृ त का होता है ।
6.3.2 सारण:- इस रोग का सारण सं मत भोजन एवं पानी वारा, जब क पशुओं एवं
मनु य म आनुवां शक के कारण हो सकता है । सं मत प ी अथवा पशु का माँस
सं मण के सारण म सहायक होते है । चीचड़ , जुओं, म छर , मि खय के खून
75
चूसने के कारण यह परजीवी इनके र त म मल जाता है तथा कसी व य प ी
अथवा पशु को काटने पर उसम सं मण फै ल जाता है ।
6.3.3 ल ण: लगातार कमजोर आना, भूख नह ं लगना, कलंगी सूख जाना तथा पील
पड़ना, द त लगना व प य म अ धापन । शव पर ण करने पर ल वर और
पल न पर ने ोट क फोकाई दय पर गांठे तथा पीलापन देखा जा सकता है ।
6.3.4 नदान:
1. ए नमल (Animal) इनोकु लेशन टे ट;
2. र त पर ण करने पर
3. भा वत अंग के इ ेशन मेयर को िज मा ेन से सू मदश य म ऑयल
इमरसन आ जे ट व का योग कर टॉ सो ला मा देखे जा सकते है ।
6.3.5 इलाज: इलाज के लए स फोनेमाइड, औष ध का योग कर जैसे क स फाडाईिजन,
स फामैथाजीन, स फा मराजीन आ द इसके साथ-साथ डेरा ीम अथवा ओ र ीम
औष धयाँ भी योग म लाई जा सकती है ।
6.4 ए वयन मले रया (Avian Malaria):
प य म ाकृ तक प से मले रया सव थम 1962 म युनाइटेड टे स (U.S) के वसको सन
(Wisconsin) ांत म मले रया परजीवी ला मो डयम (Plasmodium) सं मण के प
म देखा गया था । इस सं मण से कई प ी समूह भा वत पाये गये तथा उनम मृ यु भी
रकाड क गई । अनुमानत: 30 से अ धक ला मो डयम क जा तय वारा यह सं मण
होना व णत कया गया है । फर भी अ धकांश परजीवी अपे ाकृ त कम हो ट पे स फक
(Host Specific) पाये गये । कु छ जंगल जा त के प य के साथ-साथ यह सं मण टक ,
एवं कबूतर म भी पाया गया है ।
6.4.1 कारण:
Plasmodium.gallinaceum
Plasmodium.guxtanucleare
Plasmodium.relictum
Plasmodium.circumflexum
Plasmodium.lophurae
ला मो डयम परजीवी, ह मो ो टयस के समान ह घातक भाव छोड़ता है । अ तर
के वल मा जीवनच के दौरान ला मो डयम अपनी साइजा ट टेज (Asexual
- Schizonts) वा हत र त क लाल धर को शकाओं म पूण करता है, जब क
ह मो ो टयस एवं यूकोसाइटोजोअन म यह या आ त रक अंग ल वर, पल न,
फे फड़ अथवा वृ क म पूण होती है ।
76
6.4.2 रोग का सारण:- अ य मले रया रोग क भाँ त ह प य म मले रया का सारण
म छर के काटने से ह होता है । तनधार ा णय म यह एना फल ज नामक म छर
के काटने से होता है, क तु प य म यह युले स तथा ऐडीज जा त के म छर
वारा सा रत होता है । सव थम परजीवी को लाल धर क णकाओं म टेन वारा
रंिजत करने के उपरा त सगनेट रंग अव था (Signet Ring Stage) म देखा
जा सकता है ।
Fig. 6.4: Various stages of Plasmodium.gallinaceum
6.4.3 ल ण :- प य म वशेषकर जंगल फाउल म ती सं मण क अव था म कु छ
समय बीमार रहने के उपरा त मृ यु हो जाती है । वह ं कु छ प य म लकवा हो
जाता है । यह ए युट अव था म युवा प ी तथा Chronic अव था म य क प ी
को सं मत करता है । सं मत प ी के आँख के पास सूजन पाई जाती है । शव
पर ण म सव यूटे नयस वचा म हेमोरेज पाया जाता है । त ल (Spleen) का
आकार बढ़ जाता है, ल वर पर भी सूजन क अव था पाई जाती है । जी वत प ी
म र त प का पर ण म ला मो डयम क व भ न अव थाऐं देखी जा सकती है।
6.5 एवीयन पायरो लाजमो सस (Avian Piroplasmosis):
इस रोग को अ य कई नाम वारा भी जाना जाता है, जैसे टक फ वर आ द । क तु एवीयन
पाइरो लाजमो सस के अ तगत व भ न ोटोजोअन जा तय वारा अलग-अलग रोग एवं
उनके ल ण उ प न हो सकते है । मूलत: यह रोग एजेप सनेला .पुलोरम
(Aegyptianella.pullorum) ोटोजोआ वारा होता है तथा डक एवं गीज म म म पाया
गया तथा 1957 म इसे एक भारतीय कौआ के दय के र त म देखा गया । अ य पाईरोक ट
के समान ह इस रोग के ल ण तपा दत होते है ।
6.5.1 कारण:- Aegyptianella.pullorum - एक छोट ओवल, गोल अथवा पाइर फाम
आकार का र त परजीवी लाल धर को शकाओं म पाया जाता है । यह चकन, डक,
77
गीज, टक को समान प से सं मत करने म स म है । इस परजीवी ाटोजोआ
का सारण एक टक (चीचडी) अरगस . परसीकस के वारा होता है ।
6.5.2 ल ण:- यह सं मण ए युट, सब ए युट एवं ा नक सभी प म हो सकता है ।
इसम प य के पंख गंदे होना, भूख नह ं लगना, तेज जर होना, चलने- फरने म
असमथता, जोड़ म ती सूजन क अव था, अथवा लकवा होना, शव पर ण म
एनी मया (Anaemia) पाया जाना, त ल , ल वर, वृ क म सूजन व आकार म
बढ़ जाना, ह मोरेज पाया जाना जैसे ल ण दखलाई देते है । इस रोग के सभी प
म प य म र त क कमी या एनी मया अव य ह पाया जाता है ।
पाइरोक टो सस- टक फ वर (Spirochaetosis Tick Fever):
यह ती इ फे शीयस रोग है, िजसम शर र का तापमान बढ़ जाता है । चाल म प रवतन
तथा लकवा हो जाता है । यह “अरगस परसीकस'' (Argus. persicus) नामक टक वारा
होता है । “बोर लया ए सर ना” (Borrelia.anserina) एक पाइरोक ट है जो टक वारा
फै लता है । रोग अंडे वारा भी हो सकता है । म छर, म खी तथा अ य क ड़े इस रोग के
सारण म सहायक होते है । इ फे टेड टक लगभग 3 वष तक इ फे ि टव रह सकती है,
य द उसे उ चत तापमान (95
o
F) मलता रहे ।
(i) ल ण: - रोग का “इ यूबेशन पी रयड (Incubation Period) 5-9 दन होता है
तथा रोग क अव ध 5 दन होती है । ा नक फाम म रोग 21 दन तक रहता है
। आर भ म शर र का तापमान बढ़ जाता है, जो 110
o
F तक हो सकता है, पैर एवं
पंजे पर सूजन आ जाती है । को ब पीला पड़ जाता है, मुग सुला हो जाती है और
हरे द त हो जाते है । बाद म एनी मया हो जाता है तथा मृ यु से पूव मुग को लकवा
भी हो जाता है । मृ यु से पूव शर र का तापमान सामा य से कम हो जाता है ।
(ii) बचाव:- फाम पर टक नह ं होने द । इस रोग से बचाव हेतु वै सीन भी उपल ध
ह ।
(iii) उपचार :- मु गय को पैनी सल न के इ जे शन लगाय । फाम से टक समा त करने
हेतु समय-समय पर “ े” कर । आहार-पानी म भी ए ट बायो टक योग म लाय।
का सी डयो सस (Coccidiosis) : रोग का वणन अ त: परजीवी सं मण के साथ कया
गया है ।
6.6 पेनोसोमो सस (Trypanosomosis):
अ य तनधार ा णय के समान ह प य म र त परजीवी पेनोसोमा ाकृ तक प से
चकन, कबूतर, जंगल प ी एवं गनी फाउल को सं मत कर सकता है । ऐसा माना जाता
है क प य म र त परजीवी का सारण भी म छर वारा ह होता है । सं मत प ी के
शार रक भार म लगातार गरावट देखी जा सकती है । ती वर, आँख म सूजन के साथ
चाल म लड़खड़ाहट के साथ लकवा जैसे ल ण दखलाई दे सकते है । यह रोग न न जा तय
के कारण हो सकता है ।
78
1- Trypanosoma.avium
2- Trypanosoma.gallinarum
3- Trypanosoma.hannai
पेनोसोमो सस रोग का पर ण सं मत प ी क मे र जा (Bone Marrow) जांच वारा
कया जा सकता है । र त प का को टेन कर सू मदश यं वारा यह देखे जा सकते ह।
Fig 6.6: Trypanosoma Hannai
6.7 सारांश:
ईकाई म व णत र त परजीवी सं मण वारा व भ न रोग अव थाओं का व तृत वणन कया
गया है । प य म पाये जाने वाले अ धकांश सं ामक रोग म से ोटोजोआ ज नत रोग
अ य त घातक स हु ए है । इसका कारण एक तो इसक ल ण के आधार पर पहचान करना
क ठन है, दूसरा इनका नदान योगशाला जाँच वारा ह संभव है । र त पर ण एवं Bone
Marrow जाँच वारा ह ारं भक अव था म इन रोग का पता चल सकता है अ यथा ा नक
अव था म यह कु कु ट फाम को काफ आ थक हा न पहु ँचाते है । फर अ धकांश रोग का
सारण Mechanical Vectors वारा होता है, तो नदान एवं रोग ईलाज के साथ-साथ
म खी / म छर का नयं ण कया जाना अ तआव यक है, ता क रोग का सारण अ य व थ
प य म रोका जा सके । इनसे एकमा बचाव, अ छा बायो स यू रट ब धन, साफ-सफाई
79
80
इकाई - इमिजग कु कु ट रोग
इकाई - 7
7.1 तावना
7.2 ग बोरो रोग
7.3 ल ची रोग
7.4 सालमोनेलो सस रोग
7.5 मेरे स रोग
7.6 ए परिजलो सस
7.7 पाईरोक टो सस
7.8 टुबरकु लो सस
7.9 ए वयन इ फु लूए जा रोग (बड लू)
7.10 सारांश
7.11 नावल
7.12 स दभ पु तक
7.0 उ े य:
आया तत उ च गुणव ता के जम ला म के कु कु ट उ योग म योग म लये जाने के कारण
कु कु ट पालन आ थक प से सु ढ़ यापार बनता जा रहा है । अ छा वा य ब धन
बीमा रय का ान भी कु कु ट पालन को आ थक सु ढ़ता दान करता है । वतमान प रपे
म कु छ उभरते हु ए कु कु ट रोग(Emerging Disease) कु कु ट रखरखाव म खा मयाँ अथवा
ब धन ु टय क वजह से लगातार ना सफ कु कु ट उ पादन को भा वत कर रहे ह, अ पतु
कु कु ट मृ यु दर को भी बढ़ावा दे रहे है । इसी कार से अगर इमिजग कु कु ट रोग क या या
क जाए तो यह वह रोग है, जो च लत रोग म सामा य बदलाव अथवा बाहर से आया तत
कु कु ट के साथ देश म वेश कर जाते है । अत: यह वह रोग भी है, जो पूव म च लत
है, क तु अपनी ती ता एवं अ धक भावशीलता के कारण अपनी ओर यान आक षत कर
रहे है । अत: यह आव यक हो जाता है क वतमान म हम इन रोग क यापक समी ा कर
सक ता क बचाव एवं रोकथाम के उपाय भावी प से स पा दत कये जा सके ।
7.1 तावना:
ऐसा ाय: देखा गया है क M.D., I.B., R.D, माइको ला मो सस एवं कॉ सी डयो सस ऐसे
रोग है, जो लगातार वै ा नक का यान अपनी ओर आक षत करते रहे ह । अत: यह आव यक
हो जाता है क इन रोग वशेष पर अ धक यान दया जावे एवं िजतनी भी आव यक
जानका रयाँ है, वह जुटा ल जावे एवं त य के आधार पर इनका व तृत ए प ड मयोलॉिजकल
81
सव कया जा सके । साथ ह सव के आधार पर पूव म ह बचाव एवं रोकथाम के समु चत
उपाय कर लये जाऐ । अ धकांश रोग सम याओं के वषय म वै ा नक तौर पर यह त य
सा बत हो चुका है क व भ न सं ामक रोग म, िजसम MD, LL, को लबे सलोसीस RD,
आ द सि म लत है, तरोधक मता ती ता से घटती है तथा अ डा उ पादन भी घट जाता
है ।
वशेष कार क एना लसीस करके यह देखा गया है क उ नत पशुपालन तकनीक एवं सभी
आव यक सु वधाओं के बावजूद मुग पालन म वभ न रोग संबंधी सम याओं का आना लगा
रहता है, िजसके कई कारण हो सकते है ।
(i) रानीखेत रोग का ट काकरण कये हु ए लोक म बार-बार वापस आना, िजसका एक
कारण हो सकता है क रानीखेत वाइरस के कसी प रव तत ेन यूटे ट (Strains
Mutanat) वारा पुन: प य को सं मत करना भी एक संभावना हो सकती है
।
(ii) इसी तरह वसन तं से संबं धत रोग मेरे स का वाइरस भी वशेष प रि थ तय
म सं मत कर एलाम क प रि थ तयाँ पैदा करता है ।
(iii) ल फाइड यूको सस अ डा देने वाल मु गय म (21 स ताह एवं अ धक) अ य धक
घनी आवास णाल एवं अ य ेस फे टस के कारण आ थक त पैदा करती है
।
(iv) ग बोरो अथवा IBD रोग देश के कु छ रा य म जैसे महारा , उड़ीसा, गुजरात,
राज थान आ द म प य क तरोधक मता को बुर तरह भा वत करता है तथा
R.D./MD आ द अ य वाइरल सं मण म नि य ट काकरण से ि थ त ओर भी
भयावह हो जाती है । इस लए इस इमिजग रोग म अ धक Systemic Approach
क आव यकता होती है । ोइलस म Viral आथाईरा टस के लए स वले स क
आव यकता होती है, इसम ोइलर प ी के पैर म कमजोर आ जाती है ।
(v) जीवाणु ज नत सं मण वशेषकर E.coli म प ी पालक को यदाकदा आ थक हा न
उठानी पड़ सकती है, य क वतमान प रपे म ए ट बायो टक औष ध के लगातार
दु पयोग से उ प न ग रिज े स के कारण यह सं मण पुन: एवं बार-बार
कु कु टशाला म पाया जाता है । इस लए आव यक है क उपयु त ए ट बायो टक
का चयन कर ह औष ध का योग दाने के साथ कया जावे ।
(vi) कॉ सी डयो सस रोग वतमान म प ी पालक के लए एक वकट सम या है ।
भ न- भ न कार क जा तय के कारण उ प न ल ण भी भ न- भ न कार
के दखलाई दे सकते ह । कॉ सी डया उ स ट का नयं ण, उपयु त ट के का चयन
एवं लाईन ऑफ ए शन शी लया जाकर सम या का समाधान संभव है ।
(vii) टो सीको सस अथवा माइकोटो सी स उ पादन को बुर तरह भा वत करते है,
िजसके कारण उपापचय संबंधी वकार (Metabolic disorders) जैसे क फै ट
82
ल वर कडनी स ड म अथवा फे ट ल वर, हेमरेिजक स ड म जैसे रोग भी व भ न
कारण से उ प न हो रहे है । िजसका कारण इन रोग के त जानकार का अभाव
एवं ु टयु त ब धन हो सकता है।
7.2 ग बोरो रोग
इसे इ फे ल यस बरसल डजीज अथवा I.B.D. भी कहते है । इस रोग म मु गय का बरसा
सूज जाता है । प ी सु त हो जाते ह । कं पकं पी दखाई देती है । पतल बीट एवं कु छ समय
प चात् प ी क मृ यु हो जाती है । यह एक वायरल रोग है । शव पर ण करने पर माँस-पे शय
म हेमरोज दखलाई देते है, कडनी एवं बरसा फे स म सूजन पायी जाती है । ट काकरण
वारा इस रोग को रोका जा सकता है । कु कु ट फाम पर इस रोग का सार तेजी से हो
रहा है ।
7.3 ल ची रोग
मु गय म यह रोग ऐ डनो वायरस ुप-सीरोटाइप 4 एवम ् 8 के कारण होता है । यह रोग
ाय: 2-6 स ताह के ायलर म होता है । इस रोग म इ युनोस ेशन भी होता है, िजससे
मु गय म अ य रोग से लड़ने क मता कम हो जाती है।
च 7..3.1 दय म पाना व दय ल ची फल जैसा
पो ट माटम म मुग के दय म पानी मलता है तथा दय ल ची फल जैसा तीत होता है
। मुग का ल वर पीला हो जाता है । ल वर मे सूजन और हैमरेज साफ देखे जा सकते है ।
च 7.3.2. मुग के ल वर म सूजन व हैमरेज
83
मुग के गुद ( कडनी) भी खराब हो जाते है । इस रोग म 10-70 तशत तक मृ यु हो सकती
है । इस रोग म मृ यु दर रोग के वषाणु के अलावा इ युनोस ेशन, कसी कार का तनाव
तथा फ ड म माइकोटॉि सन क मा ा पर भी नभर करती है ।
कु छ थान म ल ची रोग क रोकथाम के लए लोकल ल वर ाइचूरेट का योग कया जा
रहा है । ये ाइचूरेट वै सीन के मापद ड को पूरा नह ं करते ह । अत: इनका योग उ चत
नह ं है । लोकल ल वर ाइचूरेट के योग से ल ची रोग के साथ-साथ अ य रोग के होने क
संभावना बढ़ जाती है । अत: एच.पी. वै स वै सीन का योग बचाव के प म अव य करना
चा हए ।
य द कसी लॉक म एच.पी. वै स (ल ची का बचाव ट का) नह ं लगा है और उस लॉक म
ल ची रोग हो जाता है तो ऐसी वशेष प रि थ त म लोकल ल वर ाइचूरेट का योग कया
जा सकता है । यह ल वर ाइचूरेट उसी लॉक से ा त ल ची रोग के ल वर से अनुभवी पौ
ैि टशनर वारा बनाना चा हए तथा रोग र हतता के मापद ड को पूरा करने के बाद ह योग
करना चा हए । फाम क अ य मु गय म आव यकतानुसार एच.पी. वै स का योग कया
जा सकता है ।
7.4 सालमोनेलो सस रोग:
इसे पुलोरम डिजज, फाउल टाईफोईड भी कहा जाता है । मुग फाम पर काम करने वाल
के लए यह एक घातक रोग है । अ डे वारा फै लने वाले इस रोग क पहचान ए ट जन पर ण
वारा आसानी से क जा सकती है । अ छ यव था एवं सफाई के साथ-साथ ए ट बायो टक
औष ध, स फा अथवा यूराजोल डोन के योग से बचाव एवं रोकथाम कया जा सकता है।
7.5 मेरे स रोग:
छ: स ताह या अ धक उ के प य म यह एक घातक तेजी से फै लने वाला रोग है, जो
हरपीज वाइरस वारा होता है । इसम तं का तं बुर तरह त त होता है तथा प ी
लंगड़ाकर चलता है । व भ न अंग पर यूमर अथवा गाँठे पाई जाती है । इस रोग का सारण
मुग के पँख अथवा लार वारा होता है । जीरो डे अथवा शी अ तशी ट काकरण कराकर
ह इस रोग से बचा जा सकता है । पैरे ट टोक से यह रोग चूज म आ जाता है तथा इस
रोग के फै लने क संभावना मनु य म भी रहती है । इस लए इसे जूनो टक रोग भी कहा जाता
है।
माइको ला मो सस :- यह रोग 'माइको लाजा-गैल से ट कम' जीवाणु वारा फै लता है । इसे
C.R.D. का रोग कहते है । आजकल यह रोग माइको ला मा क एक जा त, िजसे
“माइको- ला मा साइनोबी” कहते है, के कारण भी फै लता है । माइको ला मा का सं मण
तब तक नह ं उभरता है, जब तक कोई ेस मु गय म नह ं हो जाता । वसन तं से संबं धत
इस रोग क पहचान ल ण एवं शव पर ण के आधार पर आसानी से क जा सकती है ।
84
7.6 ए परिजलो सस:
ए पर िजलो सस यू मगेटस नामक “मो ड” से यह रोग होता है । चकन तथा टक दोन
म यह रोग होता है । चूजे पैदा होते ह अथवा है चंग के समय ह रोग सत हो जाते ह
तथा एक स ताह बाद उनम रेिज टे स आ जाती है । रोगी प ी खाना छोड़ देते है, वास
म क ठनाई महसूस करते है । आँख म भी अ सर रोग हो जाता है, वे सूज जाती ह तथा
अंधापन हो जाता है । य द रोग मुँह, े कया या “ ोकाई'' म हो तो भार आवाज क ठनाई
से सांस लेना तथा गले से रैट लंग क आवाज आती है ।
7.7 पाईरो कटो सस- टक फ वर:
यह ती इ फै शन रोग है, िजसम शर र का तापमान बढ़ जाता है । चाल म प रवतन तथा
लकु आ हो जाता है । यह “अरगस परसीकस'' (Agus.persicus) नामक टक वारा होता
है । “बोर लया ए सर ना” (Borrelia.anserina) एक पाईरोक ट है, जो टक वारा फै लता
है । रोग अ डे वारा भी हो सकता है । म छर, म खी तथा अ य क ड़े इस रोग के सारण
म सहायक होते है । इ फे टेड टक लगभग 3 वष तक इ फे ि टव रह सकती है, य द उसे
उ चत तापमान (95 ०
F) मलता रहे ।
कॉ सी डयो सस :- यह एक कार का घातक परजीवी रोग है । जो छोटे चूजे कम उ क
मु गय अथवा कसी भी उ पर देखा जा सकता है । यह रोग एक ोटोजोआ, िजसे
“आई म रया'' भी कहा जाता है, के वारा होता है । आई म रया क व भ न जा तयाँ इस
रोग को करने म स म है । आँत एवं सकम म कॉ सी डया उ स ट क वृ के कारण इन
अंग के अ द नी सतह म छ हो जाते ह, िजससे र त बहता है और यह र त बीट के
साथ मलकर दखाई देता है । ो नक कॉ सी डयो सस म मुग को खूनी द त लग जाते ह
। उ पादन कम हो जाता है तथा प ी क मृ यु हो जाती है । योगशाला म सं मत प ी
क नय मत बीट क जाँच वारा इस रोग का पता ारि भक अव था म लग सकता है ।
माइ ो कोप वारा पर ण करने पर आइ म रया उ स ट बीट म दखलाई देते ह । इस रोग
का भावी उपचार कॉ सी डयो टेट औष धयाँ देकर कया जा सकता है ।
7.8 मु गय मे यूबरकु लो सस:
इस बीमार को “ पोटेड लवर” भी कहा जाता है । यह एक कार क सं ामक बीमार है,
जो जीवाणु “माइको बै ट रयम-ए वयम” वारा होती है । इस रोग क पहचान इसक ो नक
अव था, ल बे समय तक लोप म बने रहना, अ डा उ पादन म लगातार गरावट एवं अ त
म कमजोर होकर मृ यु के प म होती है । इस रोग का सारण वा तव म दू षत वातावरण
के कारण माना जाता है । लटर अथवा म ी म इस जीवाणु के बे सलाई ल बे समय तक
पाये जा सकते है तथा कभी भी अपना उ त प धारण कर सकते है । बदलते मौसम एवं
वतमान पा रि थ तक के कारण यह रोग थान वशेष पर मुग शालाओं म तेजी से उभरकर
आ रहा है ।
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ल ण :- इस रोग के मुख ल ण शर र क हालत म लगातार गरावट, सुला रहन, वजन
म कमी होना, छाती क माँस-पे शयाँ कम होना अथवा समा त होना, छाती क ह डी (Breast
bone) उभरकर मुख प से दखाई देना है । रोग म पँख सूख जाते ह, र त क कमी हो
जाती है । को ब एवं वेटल नीले पड़ जाते ह । लवर कमजोर हो जाता है तथा मुग पील
दखाई देती है । शव पर ण करने पर मुग म भूरे-सफे द नो यूल आँत पर, त ल पर व
लवर पर देखे जा सकते है ।
नदान :- इस रोग का नदान ए ट जन पर ण कर कया जा सकता है, िजसम वेटल क
वचा म 0.05ml. यूबर कु ल न इंजे शन लगाकर, इंजे शन वाले थान पर 48 घ टे उपरा त
सूजन क अव था देखी जाती है, जो क 1 से 5 गुना आकार म बढ़ सकती है । इस पर ण
को यूब कु ल न टेि टंग कहते है । नरोगी प ी म कोई सूजन दखलाई नह ं देती । इस रोग
का कोई इलाज नह ं है । सं मत प ी को मार देना ह उपयु त रहेगा । असं मत प ी
को सं मत प ी से अलग रखे एवं फाम क अ छ तरह सफाई कर द जाव ।
7.9 ए वयन इ लूएंजा रोग (बड लू) :
वतमान म व व के कई वक सत एवं वकासशील देश म इस रोग का कोप अ य त ती ता
से बढ़ता जा रहा है । इस रोग को ए वयन इ लूएंजा रोग के नाम से भी जाना जाता है ।
मु गय म फै लने वाला यह एक वषाणुज नत रोग है, जो क म सो वायरस इ लूएंजा और
म सो वायरस पैरा इ लूएंजा वायरस वारा फै लता है, िजसके कारण मु गय म व भ न
कार के ल ण कट होते है । रोग से सत प ी व भ न कार के ल ण द शत कर
सकते है अथवा बगैर कोई ल ण द शत करे ह उनक मृ यु हो सकती है । प य म खांसी
उठने के साथ आँख म पानी आना, चेहरे और सर म सूजन होना, वास म घुर-घुर क आवाज
आना, प य म पँख खे दखाई देना एवं पँख झड़ना और पँख र हत थान पर नील पड़ना
अथवा खून नकलना, इसके अलावा प य म पतले द त होना सामा य है । साथ ह प य
म च कर खाकर गरना छ ंक आना आ द ल ण देखे जा सकते है । इस रोग का सारण
हवा अथवा सं मत बीट, सं मत प ी अथवा अ ड के बगैर गरम कये हु ए व अधपके माँस
के सेवन से मनु य म हो सकता है । अ छ तरह से पके हु ए माँस व अ ड वारा यह रोग
नह ं फै लता है ।
7.10 सारांश:
इमिजग रोग के वषय मे हो सकता है क इनके रोकने के लए कये गये सभी साथक यास
सह दशा म ना हो अथवा वशेष यास के बावजूद भी कु छ रोग आ थक त का कारण
बने, क तु कसी े वशेष म होने वाले इन रोग क रोकथाम के लए focused यास
कये जावे तथा कु कु ट इ ड ज को आव यकता इस बात क है क इन रोग क भावी
रोकथाम के उपाय कर सं मण को े वशेष से दूर कया जावे, य क इन रोग क बार-बार
उपि थ त नवीन सम याओं को ज म देगी । साथ ह नये वातावरण म भी इनका जमाव
(Adoptation) द घकाल न होगा।
86
87
इकाई : ए वयन इं लूएंजा - व भ न नवीन अवधारणाय
एवं नराकरण
इकाई- 8
8.0 उ े य
8.1 तावना
8.2 उ व
8.3 पडे मक इं लूएंजा
8.4 रोग के आऊट ेक
8.4.1 HPAL वारा
8.4.2 LPAL वारा
8.5 भा वत मुख प ी जा तयाँ एवं कार
8.5.1 HPAL वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट
8.5.2 LPAL वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट
8.6 रोग का सार एवं व भ न हो ट
8.6.1 सूअर
8.6.2 कु कु ट
8.6.3 वेल प ी
8.7 प य म रोग
8.7.1 सार
8.7.2 इ यूवेशन समय
8.7.3 ल ण
8.7.4 शव पर ण
8.8 प य म रोग क पहचान एवं से पल एक ीकरण
8.8.1 नमूने एक करना
8.8.2 व भ जाँच व धयाँ
8.9 उपचार एवं रोकथाम
8.9.1 उपचार
8.9.2 ट काकरण
8.10 रोग भा वत मु गय क हे ड लंग व क लंग (मारना)
8.10.1 इनहेलेटर एजे स
88
8.10.2 न चेतक इंजे शन वारा
8.10.3 भौ तक प से मारना
8.11 ड पोजल
8.11.1 इनसेनेरेशन
8.11.2 बु रयल मेथड
8.12 रोग से बचाव
8.13 चकन व अ डे का सुर त मानव उपयोग
8.14 सारांश
8.0 उ े य
इकाई का उ े य रोग क सम जानकार तुत कर कु कु ट पालक को हमारे देश म रोग
क संभावना एवं बचाव क जानकार देना है ।
8.1 तावना
ए वयन इं लूएंजा एक जूनो टक रोग है, जो कु छ lower chordate प य एवं मनु य म
फै ल सकता है । यह वायरस एक कार का RNAVIRUS है जो आथ म सोवाइ रडी family
का सद य है । इसके चार genera होते है । A,B,C,& Thogoto Virus
A - प य तथा जानवर तथा मनु य म इं लूएंजा
B - जल य सी स म इं लूएंजा
C - सूअर म इं लूएंजा
यह वायरस प ी क आँत क सतह को शकाओं म वृ करते है एवं प य क बीट वारा
फै लते है । जल व आहार के दूषण से फै लते ह । फाइलोजेने टक अ ययन से काश म आया
है क व भ न तनधा रय को भा वत करने वाले लू वायरस ताप ए वयन इं लूएंजा वायरस
से ह उ ा वत है ।
टाइप-ए वायरस ऐ ट जे नक कार (ह म ए लूटे नन एवं यूरा मनीडेज) के आधार पर व भ न
सबटाईप म वभ त कये जाते है । ह म ए लूटे नन के 15 कार (H1,H2,H3,………………H15)
तथा यूरा मनीडेज के नौ कार(N1,N2,N3,…………..N9) पहचाने गये है ।
8.2 उ व
य य प इं लूएंजा वायरस प य एवं तनधा रय के व भ न जा तय को भा वत कर
सकता है । ाकृ तक प से इस वायरस के हो ट जंगल जल य एवं समु प ी होते है ।
इसके एपेरे ट हो ट समूह चकन, टक , सुअर, घोड़े एवं मनु य होते है । इं लुएंजी वायरस
के ाकृ तक हो ट समूह म वकास एवं उ व ग त एपेरे ट हो ट समूह क अपे ा काफ कम
89
होती है । इसके अ य रोगकार नये प म उ व क दर तनधा रय म सवा धक होती है
।
ए वयन इं लूएंजा वायरस
1878 म सव थम इसे जीवाणु ज नत रोग से अलग पहचाना गया तथा फाऊल लेग का
नाम दया गया (इटल )
1900 म HPAI वायरस का इं लूएंजा A-वायरस होना बताया गया ।
1959 – म HPAL वायरस (H5, N1) क पहचान ( कॉटलै ड)
1961 - HPAL वायरस सबटाईप (H5, N3) क पहचान जंगल प य म (साउथ अ का)
1970 - जंगल / जातीय प य के रसरवॉयर हो ट होने क पहचान क गयी ।
8.3 पे डे मक इं लूऐ जा
रोग का वायरस - म यम आकार का व भ न प म द शत होने वाला वायरस है, िजसम
व भ ए ट जे नक वे रयेशन जो श ट ( मुख) ट (गौण) के प म होते है ।
मानव जा त म इं लूऐ जा ाय: येक वष महामार के प म कट होता है । ऐसा होने
का कारण ए ट जे नक ट ( यूटेशन) ह है, िजसक वजह से यह वायरस अपने सतह
लाईको ोट स को प रव तत कर नये-नये ऐ ट जे नक व प म उ वत होता है एवं इस
नये प के लये हो ट समूह म रोग तरोधकता अपे ाकृ त कम अथवा नह ं होती है । अत:
इं लूऐ जा -A वायरस के इन यूटेश स ( ट) के वारा ब कु ल नये सब टाईप, जो क
पे डे मक (पूर पृ वी पर फै लना) का प ले ले, म प रव तत होने क संभावना अ धक होती
है । यूमन इं लूएंजा वायरस एवं ए वयन इं लूऐंजा वायरस क जीनीय संरचना को मलने
के लए एक रसववॉयर हॉ ट क आव यकता होती है । तनधा रय एवं अ य जा तय म
रोग का सार (इंटर पीसीज ांस मशन) उ त कार के जीनीय एसोटमट को बढ़ावा देता है
। िजससे क यूमन इं लूऐंजा वायरस म ए वयन इंपक जा वायरस क भाँ त ह जी नय संरचना
देखी जा सकती है ।
इसी कार का सं मण ए वयन इं लूऐंजा -ए (H5NI) वायरस के वारा हाँगकाँग म 1997
म देखा गया, िजससे मनु य म इं लूऐंजा रोग (कं ज ट वाई टस, यूमो नया आ द) ल ण
द शत हु ए एवं 33 तशत क मृ यु दर द शत हु ई ।
य य प इस कार के आउट ेक पे डे मक का खतरा द शत करते है तथा प रोग का मनु य
से मनु य म सार नह ं देखा गया है ।
8.4 रोग के आऊट ेक
वगत म यह रोग HPAI (हाई पेथोजे नक ऐ वयन इं लूऐंजा) घरेलू प य का नह ं माना
जाता था, य क 40 वष म (1959 से 1998) रोग के के वल 17 (स ह) आऊट ेक ह
रपोट कये गये । 1999 म सात वष म आठ आऊट ेक रपोट कये गये, िजससे लगभग
बारह देश भा वत हु ए । वतमान म माच 2004 म LPAI के वारा भी आऊट ेक रपोट
कये गये है ।
90
8.4.1 HPAI वारा
.स. देश वष सब टाईप
1. मैि सको 1994, 2000 H5N2
2. पा क तान 1995, 2000 H7N3
3. आ े लया 1997 H7N4
4. इटल 1997-98 H5N2
5. इटल 1998 H5N9
6. आयरले ड 1998 H5N2
7. बेि जयम 1999 H5N2
8. इटल 1999, 2001 H5N2
9. स ल अमे रका 2000-200 1H5N2
10. यूनाईटेड टे स ऑफ अमे रका 1997, 2004 H7N2
11. कनाडा 2000 H7N1
12. जमनी 2001 H7N1
13. चल 2002 H7N3
14. इटल 2002-03 H7N3
15. नीदरलै ड 2003 H7N7
16. बेि जयम 2003 H7N7
17. जमनी 2003 H7N7
18. द ण पूव ए शया 2003-04 H5N1
19. ताईवान 2004 H5N2
20. कनाडा 2004 H7N3
21. यू एस ए (टे सास) 2004 H5N2
22. इं डया 2006 H5N1
8.4.2 LPAI वारा
ब तख, कु कु ट,
टक
1995,98 जमनी H9N2
फ से ट 1994,96 आयरलै ड
शुतुमुग 1995 द ण अ का
टक 1997-96 संयु त रा य अमे रका H9N2
91
कु कु ट 1994 चीन H9N3
ईरान, पा क तान H9N2
LPAI वायरस य य प कम पेथोजे नक होता है, फर भी इस वाइरस के H9N2 भेद से
यावसा यक/जंगल य/जल य/ घरेलू प य म रोग का सार देखा गया है । इस H9N3 भेद
के व पा क तान-ईरान व चीन म प य का ट काकरण कया गया है, ता क रोग के सार
को रोका जा सके ,
8.5 ए वयन लू - भा वत मुख प ी एवं कार
ए वयन इं लूऐंजा टाईप -4 वायरस ाकृ तक प से प य को सं मत करता है । इसके
प ह कार के ह मएग टे नस एवं 9 कार के यूरा मनीडेज तथा इनके संभा वत मेल
व भ न प ी जा तय म पहचाने गये ह । इनक रोग पैदा करने क मता के आधार पर
इ ह दो कार म बाँटा जाता है-
1. HPAL - हाईल पेथोजे नक ए वयन इं लूऐंजा (अ धक व लट)
2. LAPI - लो पेथोजे नक ए वयन इं लूऐ जा (कम व लट)
अ धक व लट वायरस म मृ यु दर 100% तक हो सकती है । ये ाय: H5 एवं H7
ह मएगलु ट नन के साथ देखे गये है । अ य अपे ाकृ त कम पेथोजे नक ि थ त पैदा करते
है एवं अ धकांशत: वसन तं म रोग के ल ण द शत करते है ।
HPAL वाइरस जंगल प य म ाय: नह ं मलते, जब क LPAI वाइरस गज व बतख
म 15% तक तथा अ य प य म लगभग 2% तक पाये जाते है ।
8.5.1 LPAI वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट
1. रोग द शत नह ं होना ।
2. अ डा उ पादन म कमी अथवा क जाना ।
3. ह क से म यम वसन तं के रोग ल ण, िजसम मृ यु दर 50% तक होती है, क तु
य द इसके साथ-साथ अ य जीवाणु रोग हो जाने पर ये मृ युदर 50% तक पहु ँच जाती
है ।
8.5.2 HPAI वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट
HPAI वाइरस से (H5&N7) अब तक 25 से अ धक आउट ेक देखे गये है । हाल ह म
द ण पूव ए शया म हु आ आऊट ेक, िजसम अ धक मृ युदर लगभग 100% तक होना
पायी गयी है । इस कार के आऊट ेक म मृ यु कई आंत रक दै हक अंग के काय कने
से होती है ।
पेथोजे न सट का कारण -
HPAI वाइरस क सतह पर पाया जाने वाला ह मएगलु ट नन दो कार से काय करता है ।
थम तो वायरस को हो ट को शकाओं क सतह पर जुड़ने तथा फर इसके प चात् को शका
भ ती को गलाकर वाइरस यूि लक अ ल के हो ट को शकाओं के यूि लक अ ल से मलने
92
म सहायता करता है । इस कार से ये ह मएगलु ट नन सं मण को फै लाने म मदद करते
है । यह लाइको ोट न एक ीकसर बनाता है, िजसे HAO कहते है । यह HAO ल वेज
वारा ( वभाजन थान) HA1 एवं HA2 बनाता है, जो नयी हो ट को शका से जुड़कर उसे
सं मत करते है ।
LPAI (कम पेथोजे नक) वाइरस म ल वेज साईट ( वभाजन का थान) पर के वल आिज नन
नामक अ मनोअ ल होता है । दूसरे अमीनो अ त ल वेज साइट से अलग 3/4 क ि थ त
पर होता है, जब क HPAI (अ धक पेथोजे नक) वाइरस म HAO क ल वेज साईट पर
व भ न बेस के अ मनो अ ल आिज नन व लाई सन मौजूद होते है ।
ल वेज साईट पर मोनो बे सक अमीनो अ ल होने से LPAI वाइरस के वल वसन तं तथा
आं को शकाओं वारा ह ाह होते है । अत: LPAI का सं मण मुखत: वसन तथा पाचन
तं तक ह सी मत रहता है, जब क HPAI म म ट पल बे सक अ मनो अ ल ल वेज साईट
पर मौजूद होते है, जो यू व यूटस ोट ऐज यू रन के वारा पचा दये जाते है व वाइरस का
यूि लक अ ल हो ट को शकाओं के यूि लक अ ल से आसानी से मल जाता है। इससे
HPAI सं मण शर र क स पूण को शकाओं म वेश कर सकता है ।
ल वेज साईट पर म ट पल बे सक अमीनो अ ल का एक ीकरण दो कार से होता है ।
1. उदासीन अथवा अ ल य अमीनो अ ल का बे सक अमीनो अ ल म यूटेशन होना ।
उदाहरणाथ लूटे मक अ ल (CAA) का लाई सन (AAA) म प रवतन होना ।
2. युि लओटाईड के वगुणन वारा उदाहरण AGA का AGA व AGA म गुणन ।
8.6 रोग का सार एवं व भ न हो ट
वे टर / रसवायर हा ट
8.6.1 सुअर
सूअर ए वयन इं लूऐंजा वायरस से भा वत होते है । ये मु गय एवं मनु य दोन
के स पक म आते है, िजन देश म म सड फा मग (एक ह फाम प रसर म प ी
तथा सुअर दोन का यावसा यक पालन) प त अपनायी जाती है, वहाँ ये रोग का
अंतर जातीय सार करने म सहायक होते है एवं यूमन लू वायरस तथा ए वयन
लू वायरस के लए मि संग वेसल ( मलाने वाले) का काय करते ह ।
8.6.2 कु कु ट
य य प ार भ म भी कु कु ट प ी से ए वयन इं लूऐंजा रोग वायरस का मनु य
म सार देखा गया था, क तु कसी कार के गंभीर रोग/मृ युदर नह ं होने से यह
माना जाता था क ए वयन इं लूऐंजा वायरस य द कु कु ट प ी से सीधे मनु य को
सं मत कर तो उसम गुणन (Multiply) एवं एडा टेशन क मता नह ं होती । अत:
कु कु ट से सीधे सं मण वारा मनु य म रोग फै लने क कोई संभावना नह ं मानी
जाती है ।
93
कु कु ट प ी मनु य म इं लूऐंजा फै लाने म एक इंटर म डयट हो ट के प म भी
काय करते है । वगत म यह माना जाता था क ए वयन इं लूऐंजा वायरस सुअर
म जेने टक एसोटमट के प चात ह मनु य को भा वत कर सकता है, ले कन
हाँगकाँग म हु ए लू के बाद यह प ट हो गया क कु कु ट से मनु य म यह रोग
सीधे ह आ सकता है एवं कसी मि संग वेसल जैसे क सुअर क कोई भू मका
होना आव यक नह ं है । हाँगकाँग म फै ले लू म 18 लोग क जान गई । यह व व
को एक झटका था, िजसम प ट हो गया था क ए वयन इं लूऐ जा वायरस बना
जेने टक एस टमट के भी मनु य म रोग फै लाने म स म होता है ।
अभी तक इस रोग का मनु य से मनु य म कोई सार नह ं देखा गया है । वै ा नक
का मानना है क उ त कार के सार के लए वायरस को व लट बनने हेतु मानवीय
ओ रजन के जीन क आव यकता होती है । य द ए वयन इं लूऐंजा वायरस का मानव
के यूमन इं लूऐंजा वायरस से कसी मि संग वेसल म पुन: जेने टक एसोटमट हो
तो यह वायरस मानव से मानव म सार क शि त भी ा त कर सकता है ।
8.6.3 वेल प ी
ए वयन इं लूऐंजा वाइरस क व भ न जा तय के लये वेल प ी कु कु ट क
अपे ा अ धक संवेदनशील होते है । जल य कु कु ट प य म रोग का सार
फ को-ओरल ट (बीट से खा य अथवा जल सं मण) वारा होता है, जब क वेल
म यह मनु य क भाँ त ऐरोसोल (वायुम डल म न ह ं बूँद के प मे) सं मण होता
है । वेल प ी पर कये गये अ ययन से पता चला है क ये इंटर म डयट हो ट
क तरह तो काय करते ह है । साथ ह ये ए वयन व यूमन इं लूऐ जा वायरस
के लए जेने टक एस टमट दान करने वाले मि संग वेसल का काय भी कर सकते
है, िजससे नये पेथोजे नक व लट भेद ( ेन) का उ व भी हो सकता है, जो मनु य
से मनु य म सार क मता रखता है । इस कार से ये वेल प ी ए वयन
इं लूऐ जा 4 वायरस को पे डे मक (पूरे व व म) के प म प रव तत कर सकते
है ।
8.7 प य म रोग
8.7.1 सार
रोग के वायरस का सार सं मत प ी क बीट , कं ज टाईवा वारा होता है । रोग
सं मत प य के सीधे अथवा अ य प से स पक म आने पर होता है । यह
रोग एरोसोल अथवा अ य फोमाईट पर वायरस के होने तथा बीट से फै लता है ।
94
8.7.2 इन यूवेशन समय
प य म सं मण के प चात रोग कट होने म कु छ घ ट से लगाकर 3 दवस
का समय लग सकता है । यह समय सं मण क मा ा, कार एवं णाल पर नभर
करता है |
8.7.3 ल ण
प य म द शत ल ण वाइरस के व लस, भा वत जा त, प ी क उ , लंग,
वातावरण तथा पहले से मौजूद कसी अ य सं मण आ द पर नभर करते है ।
 HPAI/ अ धक व लट भेद से भा वत प ी बना कोई ल ण द शत कये
अथवा ह का बुखार, सु ती, भूख न लगने जैसे अ त सामा य ल ण द शत
कर पाते है और मृ यु हो जाती है ।
 कु छ प ी लड़खड़ाने, अ डा उ पादन कम / ब द करने / पतले छलके वाले अ डे
देने जैसे ल ण दखाते है ।
 बीमार प ी लगभग बेहोशी क सी अव था म ( सर भू म को छू ता हु आ) खड़े
अथवा बैठे दखाई देते है ।
 प ी क कलंगी एवं वेटल सूजी हु ई तथा छोटे ( पन पॉइंट) अथवा बड़े
(इकाईमो टक) हेमोरेजेज (र त रंिजत) लये दखाई देती है ।
 प ड लय पर वचा के नीचे खून जमा हु आ दखाई पड़ता है । पंख र हत थान
पर हेमोरेजेज दखाई पड़ते है ।
 भा वत प ी को पानी जैसे पतले द त लगना तथा यास बढ़ना आ द ल ण
प रल त होते है ।
 वसन म क ठनाई, चेहरे व सर पर सूजन तथा अ या धक मृ युदर देखने को
मलती हे ।
 कम उ के प य म नवस ल ण, लड़खडाना, च कर खाना आ द द शत
होते है ।
 ब तख व गज म ड ेशन (सु ती व अवसाद) भूख न लगना, द त लगना आ द
ल ण ह मलते है, जब क चकन म वेटल व कलंगी भी सूजी तथा हेमोरेिजक
दखाई देती है ।
8.7.4 शव पर ण
 अ या धक व लट भेद वारा हु ए परए यूट सं मण म के वल माँसपे शय का
कं जेशन (ला लमा) एवं जल क कमी (डीहाइ ेशन) के ल ण देखने को मलते
ह ।
 अपे ाकृ त कम ए यूट सं मण म सर, गदन आ द पर सूजन, वास नल
( े कया) तथा क डनी (वृ क) पर सूजन व हेमोरेज पाये जाते है ।
95
 व भ न वसरल अंग पर पन पोइ ट हेमोरेज तथा क ल बोन के आंत रक ह से
क तरफ मांसपे शय म हेमोरेज मलता है ।
 दय पर फे नस पेर काडाइ टस मलना
शव पर ण पर उ त कार के ल जन दखाई पड़ते है ।
8.8 प य म रोग क पहचान एवं से पल एक ीकरण
8.8.1 नमूने एक करना
 वास नाल, ऐयर सेक, फु फु स, ल न, आँत व दमाग आ द अंग के टुकड़ को PSB
म से पल कलेि टंग वाय स म एक त कया जाना चा हये ।
 लोएका एवं े कया वारा वाब
 सीरम के नमूने
सीरम के अ त र त अ य नमून को आइसोटो नक फॉ फे ट बफर सेलाईन वलयन म एक
कया जाना चा हये, िजसक Ph7.0से 7.4 तक हो एवं इसम उ चत ए ट बाईओ टक मलाया
जाना भी आव यक है । उदाहरणाथ जे टा म सन 50mg/ml अथवा पे न स लन 200
यू नट/ml./ े टोमाइ सन 2mg/ml आ द हो सकते है ।
से पल एक ण के बाद 4
o
C ताप पर रखे जाने चा हये एवं प रवहन के दौरान बफ के इ तेमाल
वारा उ चत ठ डक बनायी जानी अ तआव यक है ।
8.8.2 व भ न जाँच व धयाँ
रोग क जाँच वाइरस क पहचान कर क जाती है, िजसके लए वसन तं व आँत के उ तक
ाव तथा ए स टा (बीट) आ द उपयोग म आते है ।
वायरस क पहचान अगार जेल इ यूनो ड यूजन टे ट (AGID) तथा एंजाइम लं ड
इ यूनोएबसारबट ऐसे (ELISA) वारा क जाती है ।
ह मएगलु ट नन क पहचान(HA) इसक पहचान ह मएगलु ट नन इन हबीशन टे ट (HI)
वारा क जाती है ।
यूरा मनीडेज क पहचान : यूरा मनीडेज इन हबीशन (NI-Assay) ऐसे वारा क जाती है।
मोल यूलर डाय नो सस व ध से रचड ांस शन पॉल मरेज चेन रए शन (RT-PCR)
वारा लू वाइरस क पहचान के साथ ह व श ट सब टाईप H5 अथवा H7 क पहचान क
जाती है ।
8.9 उपचार एवं रोकथाम
96
8.9.1 उपचार
रोग का कोई भावी उपचार नह ं है । एम टडीन हाइ ो लोराइड व रमटेडीन हाइ ो लोराइड
आ द दवाय मनु य म रोग से बचाव हेतु उपयोग क जाती है । ये दवाय प य म इ तेमाल
नह ं क जाती, य क दवा क कु छ मा ा (Traces) उपचा रत प ी क माँसपे शय , िजगर,
अ डे तथा योक म आ जाती है व प ी को सामा य मानव उपयोग के लए बेकार कर देती
है ।
8.9.2 ट काकरण
रोग क रोकथाम हेतु ट काकरण अ छा रा ता है । फर भी ट काकरण के अलावा अ य नी तय
जैसे ऑल इन आल आऊट, रोग का सघन स वले स आव यक है, ता क प य के ट काकरण
वारा मनु य म रोग सं मण क संभावना को कम कया जाए ।
रोग के उपल ध ट क
(i) होमोलोगस वे सीन :- ये ऑटोजीनस वे सीन क तरह ह बनाये जाते है अथात इनम
फ ड ेन ह उपयोग कया जाता है । उदाहरण के लए HPAI मैि सको म ेन
H5N2 वारा फै ला था और यह H5N2 ेन ह वे सीन म उपयोग कया गया ।
इसी कार पा क तान म HPAI आऊट ेक को रोकने के लए होमोलोगस वे सीन
योग कये गये ।
(ii) नि य हेटेरोलोगस वे सीन :- इस कार के वे सीन म फ ड वाइरस भेद से भ न
अथवा हेटेरोलोगस यूरा मनीडेज (N Type) उपयोग कया जाता है । उदाहरणाथ
HPAI के इटल म 2002 म हु ए आऊट ेक म फ ड ेन H7N1 था तथा उसको
रोकने के लये H7N3 ेन के ट के लगाये गये । इन प य म स वले स से पहचाना
जा सकता है क प ी वे सीनेटेड है अथवा सं मत है । हमारे देश म के य रजव
वारा दो कार क वे सीन टोर क गई है, जो न न है ।
H5N2 भेद/A/CK/ मैि सको/232/94/CPA
H7N1 भेद/A/CK/इटल /473/99
ये ए वयन इं लूऐंजा टाईप-A वायरस के व एि टव रोग तरोधकता देती है ।
(iii) रकॉ बीएंट वे सीन :- इस कार क वे सीन म एक साथ दो या अ धक रोग का
ट का लगाया जाता है। उदाहरणाथ फाऊलपॉ स वे सीन के साथ H5 भेद (ए वयन
लू वायरस) सफलतापूवक उपयोग कया गया। इस कार के ट के से हम फ ड ेन
उपयोग करने के बाद भी रकॉ बीनेशन के कारण वे सीनेटेड व इंफे टेड प ी क
पहचान कर सकते है ।
इस े म DNA वे सीन बनाये जाने क दशा म यास जार है ।
97
8.10 रोग भा वत मु गय क हे ड लंग व क लंग (मारना)
रोग के आऊट ेक क ि थ त म सं मत प ी अ य प य तथा मनु य म रोग फै लाने
का एक बड़ा ज रया होते है । अत: इन प रि थ तय म आव यक हो जाता है क उ ह मार
दया जाये । य द आव यक हो तो पूरे लॉक से लगा कर स पूण े को कु कु ट वह न
कया जाना चा हए । प य को मारने के लए काम ल गई व ध ऐसी होनी चा हए, जो
मानवीय हो, िजससे रोग के सार का खतरा कम हो तथा भावी हो ।
यह काय पशु च क सक क देखरेख म ड यि तय वारा कया जाना चा हए । यह
सु नि चत करना आव यक है क सभी मारे गये प ी कसी कार क दयग त अथवा वसन
नह ं दशा रहे हो एवं पूणतया मृत हो ।
8.10.1 इनहेलेटर एजे स
काबनडाईऑ साइड, काबन मोनो साइड, नाइ ोजन, आगन हेलोथेन, मीथॉ सी
लूरेन, आईसो लूरेन आ द ऐसे इनहेलेटर एजे स है, िजनके सूँघने से मृ यु हो
जाती है । इस व ध म सभी प य को चै बर म डालकर उ त कोई भी एक गैस
भर द जाती है व नि चत समय के बाद सभी प ी मर जाते है ।
हा न - ए वयन इं लूऐंजा रोग के संदभ म ये व ध उपयोगी नह ं होती, य क इसम
कई प य के बेहोश होकर रह जाने व पूण मृत नह ं होने क पया त संभावना होती
है |
8.10.2 न चेतक इंजे शन वारा
न चेतक को य द अ धक मा ा म उपयोग कया जाए तो वे भावी प से प य
को मार सकते है, क तु इस व ध म समय व म तो अ धक लगेगा ह, साथ ह
प ी के पूणतया: मृत न होने क संभावना भी रहेगी। इंजे शन के बार-बार योग
से जीवाणु सं मण वारा प ी शव के ज द सड़ने क ि थ त पैदा हो जायेगी। अत:
यह व ध वशेष भावी नह ं है ।
8.10.3 भौ तक प से मारना
इन व धय म येक प ी को अलग-अलग पकड़कर मारा जाता है । अत: उनक
मृ यु सु नि चत करना आसान होता है ।
(i) इले ोकॉशन :- इसम बजल के तार से ले प लगाकर प ी शर र के
वपर त बगल पर छु आ दया जाता है । करंट लगने से प ी क मृ यु हो
जाती है, क तु हजार लाख कु कु ट को मारने के लए यह व ध ठ क
नह ं है । इसम शाट स कट अथवा काय करने वाले यि तय के साथ दुघटना
क संभावना बनी रहती है ।
98
(ii) छोटे ब डजो वारा :- छोटे जानवर को खं सी करने वाले यं को प ी क
गदन पर लगाकर ले प चढ़ा द जाती है तथा तड़फड़ाने तक उसे वैसे ह
रखा जाता है । इस व ध से कॉप तथा े कया के कं ट स (सं मत व)
बाहर वातावरण म नह ं आ पाते है, क तु इसम कम से कम दो आदमी
(प ी क गदन पकड़ने तथा लेप लगाने के लये) आव यक होते है ।
(iii) े यूलाईजेशन वारा - हमारे देश म हु ए रोग कोप को फै लने से रोकने
के लए प य को मारने म इसी प त का योग कया गया है । यह
व ध अपे ाकृ त कम समय लेने वाल भावी व ध है, िजसम येक प ी
को बार-बार से मारने के कारण उसक मृ यु सु नि चत होती है । मारे जाने
वाले प य को मारने से पूव े यूलाईज कया जाता है, िजससे प य
को दद व ग त व ध कम हो, ता क उ ह मानवतापूण आसान मृ यु द जा
सक । इस हेतु सो डयम फ नोबारबीटो स का 80 म. ा. / 55 म.ल पीने
के पानी म इ तेमाल से 4 घ टे म प य को बेहोश कया जा सकता है
अथवा ए फा लोरेसोल को 2% से 6% तक दाने म मला देने से भी प ी
बेहोश हो जाते है एवं इन प य के लाि टक थै लय म दम घोटने से
भी मारा जाता है, क तु इससे प य के िजंदा रहने / तड़फड़ाने से थै लय
के फटने एवं सं मण का भय बना रहता है ।
(iv) डसलोकशन तथा डके पटेशन के लए प ी के दोन पंख को एक हाथ से
पीठ के उपर पकड़ कर दूसरे हाथ से तजनी एवं म यमा अंगुल के वारा
गदन को पकड़कर तेजी से आगे खींचे एवं आगे क तरफ मोड़ दे । प ी
एवं इसक गदन इस ि थ त म तब तक पकड़े रहे, जब तक क वह
तड़फड़ाये, ता क वास नाल एवं कॉप के पदाथ बाहर न आये एवं पंख के
फड़फड़ाने से लटर क धूल वातावरण म कम फै ले ।
8.11 ड पोजल
मृत प य के न तारण हेतु ऐसी जगह का चुनाव करना चा हये, जहाँ को हाई-वे न हो, कसी
कार क भू मगत पाईप लाईन, के बल / बजल के तार आ द न ह । थान नजन व आबाद
से दूर हो । मृत प य को जलाकर अथवा ग ढा खोदकर गाड़ा जाता है ।
8.11.1 इनसेनेरेशन
य द प ी शव को जलाया जा रहा है, तो इस बात का पूण यान रखा जाना चा हए क शव
पूर तरह जल जाये एवं जानवर वारा इधर-उधर न फै लाया जावे । इस हेतु 100 क. ा.
शव भार हेतु 500 क. ा. सूखी लकड़ी क आव यकता होती है ।
99
8.11.2 बु रयल मेथड
इस हेतु जे.सी बी मशीन क मदद से ल बे-ल बे े च खोदे जाते है एवं 2 मीटर ल बा x2
मीटर चोड़ा व 2 मीटर गहरा ग ढा लगभग तीन सौ प य के लये पया त होता है । य द
ग ढे को एक मीटर और गहरा कर दया जाये तो उसी म 600 प ी शव न ता रत कये
जा सकते है । इस हेतु ग ढे म पहले चूना बछाया जाता है । फर प ी शव को डालकर
पुन: चुने क मोट पत बछाई जाकर उसे म ी क मोट पत से ढक दया जाता है, ता क
जंगल जानवर उसे खोद न सक ।
8.12 रोग से बचाव
1. स पूण बाओ- स यू रट (जै वक सुर ा) के नयम का पालन कर ।
2. जंगल प ी / जल य प य को घरेलू तथा यावसा यक लॉक के स पक म नह ं आने
दे
3. रकवड व वे सीनेटेड प य को अ य प य से अलग रख ।
4. रोग क रोकथाम हेतु व र टाईन/ प य का लाटर वै ा नक र त से न तारण तथा
फाम पर सफाई बाबत पूण सतकता बरते ।
5. आऊट ेक वाले े से प ी व उनके उ पाद े म ब कु ल नह ं आने चा हए । साथ
ह उन े से आने वाले दाने/ दवाई आ द के वाहन का भी फाम पर वेश नषेध होना
चा हए।
6. हाई र क के े से रोग हेतु सघन स वले स तथा अ य यवसा यक लॉक से भी
नय मत स वले स कया जाना आव यक है ।
7. फाम पर को क वर अथात् सुअर, डक, टक , गाय आ द एक साथ नह ं पाले जाने चा हए।
8. फाम पर डसइंफे टड़ व े का योग कया जाना चा हए ।
8.13 चकन व अ डे का सुर त मानव उपयोग
1. भारत म को क चर नह ं देखने को मलते तथा पो प य को व श ट प से अलग
ह पाला जाता है, िजससे रोग फै लने क संभावना कम हो जाती है ।
2. चकन प ी क अपे ा HPAI के अ य जा तय जैसे ग स, गूज, ब तख म होने क
संभावना अ धक होती है ।
3. य द रोग का वायरस हो तो भी वह अ धकांशतया आहार नाल एवं अ य ाव म ह पाया
जाता है ।
4. तेज गम के समय वातावरण म रोग का वायरस िज दा नह ं रह पाता है ।
5. अ डे/ गो त को अ छ तरह से पका कर उपयोग करने (70o
C अथवा अ धक तापमान)
से रोग का वायरस मर जाता है एवं यह रोग ाय: गो त/ अ डा खाने से नह ं फै लता।
6. रोग का मानव से मानव म सार अभी तक नह ं देखा गया है ।
100
अत: पूण सावधानी रखी जाए तो चकन व अ डे का उपयोग कया जा सकता है ।
8.14 सारांश
ए वयन इं लूऐंजा एक वषाणुज नत जुनो टक रोग है, िजसके कारण मु गय म व भ न कार
के ल ण कट होते है । इस रोग का सारण प य म य अथवा अ य प से हो
सकता है । रोगी प ी के सीधा स पक म आने से एवं सं मत मु गय के अ ड एवं मांस
से यह रोग व थ मुग एवं मनु य म फै ल सकता है । इस रोग का वायरस सं मत प य
क बीट, यूकस अथवा ाव वारा हवा के मा यम से स पक म आये व थ प ी अथवा
मनु य म फै ल सकता है । अ छ तरह से पके हु ए पो मीट व पके हु ए अ ड को खाने
से यह रोग नह ं फै लता है ।
रोग से सत प ी व भ न कार के ल ण द शत कर सकते है अथवा बगैर कोई ल ण
द शत करे ह उनक मृ यु हो सकती है । खाँसी उठने के साथ-साथ आँख म पानी आना,
चेहरे और सर म सूजन होना, वास म धुर-धुर क आवाज आना, पंख झड़ना और पंख र हत
थान पर नीला पड़ना अथवा खून नकलना, प य म पतले द त होना सामा य ह साथ
ह प य म च कर खाकर गरना, छ ंक आना आ द ल ण देखे जा सकते है । मनु य म
रोग से सरदद, बुखार, बोडीएक (शर र टुटना) तथा कं ज ट वाई टस वसन म तकल फ आ द
ल ण प रल त होते है । रोग क पहचान हेतु व भ न तकनीक SGPT,HI,NI,ELISA
तथा मोल यूलर डाय नो सस आ द काम म ल जाती है । रोग से बचाव के लये ट काकरण
एवं क लंग के साथ ह जै वक सुर ा के तर के अपनाये जाने ज र है । हमारे देश म रोग
के दो आऊट ेक महारा एवं गुजरात म रपोट कये जा चुके है । अत: इस बाबत अ धक
सतकता बरतने क आव यकता है ।
101
102
इकाई : कु कु ट पालन म ट काकरण क मह ता एवं व भ कार
के ट काकरण के दौरान मु गय का रखरखाव
इकाई - 9
9.0 उ े य
9.1 तावना
9.2 रोग से सुर ा
9.2.1 ाकृ तक इ यु नट
9.2.2 ए वायड इ यु नट
9.2.3 पे सव इ यु नट
9.3 हे ड लंग वे सीन
9.4 वे सीनेशन क व भ न व धयाँ
9.4.1 इं ानेजल
9.4.2 इं ा ऑ यूलर
9.4.3 े मेथड
9.4.4 वंग वेब पं चर
9.4.5 इंजे शन वारा
9.5 व भ न कु कु ट रोग क वे सीन
9.5.1 मरे स रोग वे सीन
9.5.2 रानी खेत रोग वे सीन
9.5.3 फाऊल पो स वे सीन
9.5.4 इंफे ि शयस काइ टस वे सीन
9.5.5 ले रंिजयो ेकाइ टस वे सीन
9.5.6 ए वयन एंसेफे लोमालाई टस वे सीन
9.5.7 ग बोरो रोग वे सीन
9.5.8 ए वयन इं लूऐंजा
9.6 कु कु ट ट काकरण सारणी
9.7 अ भावी ट काकरण कारण एवं नवारण
9.7.1 वे सीन संबंधी कारक
9.7.2 ट काकरण संबंधी कारक
9.7.3 पे सव इ यु नट
103
9.7.4 शीतलन संबंधी कारक
9.7.5 इ यूनो कॉ पीटे स
9.7.6 आहार संबंधी कारक
9.8 वे सीनेशन के दौरान प य का रखरखाव एवं अ भावी ट काकरण से बचाव
9.9 कु कु ट ट का काड
9.10 सारांश
9.0 उ े य
व थ कु कु ट पालन हेतु उपयोगी ट काकरण क जानकार एवं मह व पर काश डालना ह
इस इकाई का उ े य है, ता क पाले जाने वाले कु कु ट को आरामदायक सुर त व रोग मु त
वातावरण उपल ध हो सके ।
9.1 तावना
अ धकांश रा य म पशुपालन वभाग म अपनी वयं क जै वक उ पाद इकाईयाँ ह, जो माँग
के अनुसार आव यक जै वक उ पाद का नमाण करती है । इसके अ त र त यावसा यक
तर पर इस कार के उ पाद का नमाण IVRI, इ जतनगर, बफ (पूने), बाईओ ड
गािजयाबाद आ द सं थान भी करते है । सं ामक रोग के सार से कु कु ट यवसाय म यापक
हा न हु ई, िजसका प रणाम यह रहा क इसको यापा रक प देना मुि कल हो गया । कई
बार बहु त कम समय म स पूण मुग समूह काल के च म समा कर समा त हो गया । इस
कार क क ठनाई से मुि त का सरल उपाय उ चत समय पर ट काकरण ह है ।
प य म एक बार रोग आने के बाद उपचार करना मँहगा तो पड़ता ह है, इसके अ त र त
व भ न वाइरल या वषाणुज नत रोग का कोई उपचार भी नह ं होता है । पूणत: उपचार करने
के बाद रोगमु त हु ई मुग अपने उ चतम उ पादन तर तक नह ं पहु ँच सकती है ।
अत: कु कु ट पालन म ट काकरण का मह वपूण थान है । अनेक रा य म के य तर
पर वे सीन उ पादन ारंभ कए जाने से इस यवसाय म काफ ि थरता आई है ।
9.2 रोग से सुर ा
व भ न कार क ऐ ट जन/ ए ट बॉडी से जानवर म रोग तरोधकता उ प न हो जाती है,
जो न न कार क होती है ।
9.2.1 ाकृ तक इ मु नट
वह तरोधकता, जो क ाणी म वत: एवं ाकृ तक प से ह व यमान रहती
है । इसे कसी भी जीवाणु, वषाणु या अ य सं मण के स पक म आने के उपरा त
ा त नह ं कया जा सकता है ।
104
9.2.2 ए वायड इ मु नट
यह शर र म उ प न वह तरोधकता है, जो क पेथोजन या सं मण के सीधा स पक
म आने के प चात्सं मण एवं शर र म उपि थत ए ट बॉडी के म य उ प न याओं
के फल व प पैदा होती है । यहाँ ए ट बॉडी वह वपर त पदाथ है, जो क शर र म
कसी भी बा य पदाथ, िज ह ए ट जन कहा जाता है अथवा सं मण के सीधा स पक
म आने के प चात शर र वारा वयं ह उ प न कया जाता है, यह पदाथ या
ए ट वॉडीज येक वशेष सं मण के लए वशेष होती है । ट काकरण के फल व प
उ प न तरोधकता एि टव ईमु नट के प म तपा दत होती है । यह वह रोग
तरोधकता है, जो क वयं के वारा सं मण के सीधे तौर पर भावशाल प
म स पक के फल व प उ प न हु ई है । यह सं मण का अ भ ाय: जीवाणु/ वषाणु
या सू मजी वय से है, जब ये सू मजीवाणु या इनके उ पाद (टॉि सन) सीधा शर र
के स पक म आते है, तो ि ल नकल या सब ि ल नकल रोग या भाव उ प न होता
है । यह तरोधकता धीरे-धीरे पैदा होती है तथा कु छ, फर कु छ स ताह और बाद
म वष तक कायम रह सकती है । सू म जीवाणु क बीमार पैदा करने क मता
या न Virulence को कम करके (Inactive) ख म करके (Killed) या कमजोर
करके (Attenuation) जब इनका इ जे शन लगाया जाता है, या न ट काकरण
(Vaccination) कया जाता है तो Active Immunity Acquired क जाती है
। जैसे Small Pox का ट काकरण, पो लयो का ट का या गलाघ टू का ट काकरण।
9.2.3 पे सव इ मु नट
इसका अ भ ाय उस Immunity या तरोधक मता से है, जो शर र वारा णक
प से (Temporary) सू म जीवाणुओं के त उ प न ए ट वॉडीज वारा शर र
म वेश कराये जाने के फल व प उ प न क जाती है । इसका भाव अ प समय
के लए ह होता है । या न कु छ स ताह, यह तरोधकता सं मण के भाव को
कम करने या न ट करने के लए सीरम या लोवु लन के योग से उ प न क जाती
सकती है । इसका भाव ए ट टाि सन के योग कये जाने के फल व प जैसे
टटनस, ए ट टाि सन गामा लोवु लन आ द टॉि सन क नि यता के लये कया
जाता है । यह माँ के वारा शशु म तरोधकता थाना तरण से भी ा त होती
है, िजसम मी के थम दूध या न काले म के वारा ए ट बॉडी ांसफर (Acquired)
होने के कारण शशु म ज म के कु छ माह प चात तक (4-6 माह) रह सकती है ।
9.3 हे ड लंग वे सीन
ाय: सभी वै सी स को बफ म या “रे जरेटर” म रखना चा हये व एक थान से दूसरे थान
पर लाने ले जाने के लए भी बफ का योग करना चा हये । वै सीन को ा त करने के थान
से ात कर लेना चा हये क ए यूल म कतने प य क औष ध है । वै सीन का घोल
105
कस म और कस अनुपात म तैयार करना है, यह भी ात करना आव यक है । डि ट ड
वाटर जो योग म लाये जाय, वह मा णत होना चा हए । वे सीन को उपयोग म लाते समय
भी बफ म या ठ डे पानी म रखा जाना चा हए । वै सीन के घोल को लगभग 1-2 घ टे म
ह उपयोग कर लया जावे । शेष बचे हु ए घोल को न ट कर देना चा हए ।
9.4 वे सीनेशन क व भ न व धयाँ
व भ न कार क वे सी स को लगाने के लए अलग-अलग तर के उपयोग म लये जाते
है ।
9.4.1 इं ानेसल ट
इस व ध म डाइ यूवट म मलाने के प चात प ी के नासा छ म 1-2 बूँद वे सीन
डाल देते है । इस व ध से वसन तं से संबं धत रोग का वे सीन भल कार कया
जा सकता है । जैसे यूके सल डसीज (आर.डी) Fstrain वे सीन, इंफे ि शयस
काइ टस
9.4.2 इं ा ऑ यूलर ट
इस व ध म रकां ट यूटेड वे सीन क एक-दो बूँद आँख म डाल जाती है व प ी
म रोग तरोधकता उ प न हो जाती है । इस व ध से रानीखेत, इंफे ि शयस
ोकाइ टस, ग बोरो आ द रोग का वे सीन कया जाता है।
9.4.3 े मेथड
इस व ध को छोटे च स म उपयोग कया जाता है । इसम रका ट यूटेड वे सीन
का े कर दया जाता है, िजससे प ी क आँख अथवा नाक म ये छोट बूँदे चल
जाती है ।
9.4.4 वंग वेब पं चर
इस हेतु वशेष कार क दो सुई, जो काक म लगी होती है, काम म ल जाती है,
िजसे वे सीन के घोल म डुबा कर पँख क अंद नी सतह पर चुभा दया जाता है
। यह व ध फाऊल पॉ स नामक ट काकरण म उपयोगी है ।
9.4.5 इंजे टेबल मेथड
इसम वे सीन क उ चत खुराक इंजे शन वारा प ी के शर र म पहु ँचायी जाती है ।
(i) सब यूटेनीयस ट :- यह इंजेकशन वचा को उठाकर उसके नीचे लगाया जाता है।
इस व ध से मरे स R2B आ द ट के लगाये जाते है ।
(ii) इं ाम कू लर ट :- यह माँसपेशी म लगाया जाता है । इस र त से ग बोरो (बू टर),
R2B आ द वे सीन लगाये जाते है ।
106
9.5 व भ न कु कु ट रोग क वे सीन
कु कु ट रोग म वे सीनेशन का व श ट थान है एवं इस दशा म नत-नये योग खोजे हो
रह ह । अ डे म ह वे सीन लगाना रसच का नया पहलू है । इस तकनीक म ूण वकास
के दौरान इन यूबेशन के 17 व अथवा 18 व दवस पर अ डे म ह वे सीन लगा द जाती
है । इससे जीरो दवस / थम दवस पर लगाये जाने वाले वे सीन (मरे स रोग) क आव यकता
नह ं रहती ।
यवसा यक ि ट से पाले जाने वाले प य म व भ न ट के नि चत समय पर लगने
आव यक है, जो न न कार है :-
9.5.1 मरे स रोग वे सीन
वगत वष म इस बीमार ने व व म बहु त हा न पहु ँचाई है । गत कु छ वष से हमारे
देश म भी इस बीमार ने उ प धारण कर रखा है तथा कई ा त म इस रोग
से अ य धक हा न हु ई है । इस वै सीन के कारण मु गय म मृ यु सं या म बहु त
कमी हु ई है । इस वै सीन के वारा अ डा उ पादन तथा मुग वा य म भी सुधार
हु आ है । प हले ऐसा समझा जाता था क इस बीमार क ती ता कॉ सी डयो सस
बीमार का मुग घर म होने पर नभर है, पर तु अब यह स हो गया है क बहु धा
मे र स रोग के कारण कॉ सी डयो सस बीमार अ धक उ प लेती है ।
मेरे स रोग वारा व व भर म कु कु ट पालन म वगत वष म ग तरोध आया है
। इस रोग से बचाव हेतु जो वै सीन योग म लाया जाता है, उसका उपयोग य द
सह कार से न कया जाये तो लाभ क बजाय हा न हो सकती है । मैरक ट काकरण
म कु छ सावधा नयाँ आव यक है, जो न न है:-
(i) वै सीन रखने के “क टेनर” म नाइ ोजन का तर नधा रत अंक से नीचे नह ं
जाना चा हये ।
(ii) नाइ ोजन उपयोग करते समय हाथ के द ताने पहनने अ नवाय ह, साथ ह आँख
को भी बचाना चा हए।
(iii) वै सीन के ए पूल को नाइ ोजन क टेनर म से शी नकाल ता क वै सीन योग
म आने से पूव खराब न हो जाये, य द 'थोड’ (Thawed) नजर आती हो तो
योग म न लाय । वै सीन संबंधी हदायत को अ छ कार पढ़े तथा उसी
कार काय कर ।
(iv) िजतने वै सीन क आव यकता हो, उतने ह क टेनर म से नकाले ।
(v) क टेनर म से वै सीन नकाल कर उसे पघलाने के बाद ह सील तोड़े । वै सीन
तथा डायलुऐ ट को त काल ह मलाये तथा स रंज भी तैयार रख ।
(vi) स रंज क (Syringe) क सुई (Needle) टारलाइज कर योग म लाय ।
स रंज, सुई तथा अ य साधन को रसाय नक य से साफ न कर ।
107
(vii) एक बार वै सीन बनाने के बाद जब तक स पूण वै सीन काम म नह ं आ
जाये, तब तक वै सीन का उपयोग करते रह ।
(viii) बनी हु ई वै सीन को हलाते रह । य द सुई को सह कार से नह ं लगाया
जाए तो उस थान पर थायी ज़ म होने का भय रहता है ।
(ix) बने हु ए वै सीन को जर म रखकर पुन: योग म नह ं लाये ।
(x) बचे हु ए वै सीन को अ छ कार ' ड पोज'' करने क कायवाह कर ।
आजकल देश म जो वै सीन ा त हो रह है, उसम नाइ ोजन के क टेनर क आव यकता
नह ं होती है । इस वै सीन को आयु के थम दन गदन पर सव यूटे नयस अथवा माँसपेशी
म लगाया जाता है । 0.2 म.ल . क खुराक त चूजा पया त होती है । इसे 2.8o
C पर
रखा जाता है । बाजार म यह 500 खुराक क पै कं ग म उपल ध है । 5 वष के बाद इसको
दुबारा लगाया जाना चा हए ।
9.5.2 रानी खेत रोग वे सीन
यह मु गय का भयंकर छू त का रोग है तथा इससे बचाव हेतु दो कार के वै सीन योग म
लाये जाते ह ।
(i) आर.डी.एफ. ेन (R.D.F.Strain or F.I) अंड से चूजे ा त होने से पूव यह
वै सीन उपल ध होना चा हये। इस वै सीन का “ भाव” या प ी म रोग से मुकाबला
करने क शि त (इ मु नट -Immunity) 10 स ताह तक रहती है तथा 48 घ टे
बाद इसका भाव शु हो जाता है । एक ए यूल (Ampoule) िजसम 100 खुराक
होती ह, उसे 15 एम.एल. नामल सेलाइन (Normal Saline) म अ छ कार
मलाकर ापर वारा एक-एक बूँद चूजे (एक दन क उ के ) क नाक या आंख
म डाल द । कभी-कभी एक बूंद आँख म और एक बूँद नाक म भी डाल जा सकती
है । आजकल इस वै सीन के घोल का े ( छड़काव) भी कया जाता है । ये चूज
के इ यूवेटर से नकलते ह कया जा सकता है ।
(ii) रानीखेत वै सीन -(R.D.M.) यह वै सीन बफ अथवा रे जरेटर म रखनी चा हये
। चूज म 6 से 8 स ताह क उ म रानीखेत रोग से बचाव हेतु यह वतीय ट का
लगा देना आव यक होता है । वै सीन घोल बनाने हेतु ए यूल तोड़कर पाउडर को
2-एम.एल. नॉमल सेलाइन एक याल म लेकर उसम मलाया जाता है तथा फर
ठंडा डि ट ड वाटर 98 एम.एल. डालकर अ छ कार मला कर वै सीन का घोल
तैयार कर लया जाता है । इसे थमस म रखना चा हये । इस घोल का 1 सीसी भाग
त प ी वचा के नीचे -सव यूटे नयस र त से लगाया जाता है । वै सीन
इं ाम कू लर र त से भी योग म लायी जा सकती है । इस वै सीन के बाद मुग
म आजीवन “इ मु नट ” (Immunity) आ जाती है । इस रोग के वै सीन लगाने
हेतु न न बात का यान रखना चा हए ।
(1) रानीखेत तथा अ य ट का एक साथ नह ं लगाना चा हए ।
(2) स ताह क उ से कम के प य म ट का न लगाय ।
108
(3) जहाँ तक संभव हो, मई/ जून म वै सीनेशन न कर- य द नता त आव यक
हो तो के वल रा अथवा ातःकाल म ह यह काय कर ।
(4) के वल व थ ब च के ह ट का लगाय, िजसम कोई रोग क आशंका हो
(कोराइजा, कॉ सी डयो सस व स आ द) उन ब च म ट का न लगाये ।
(5) ब च के ट का लगने के 1-3 दन पूव तथा 7 दन बाद तक “ए ट बायो ट स”
(Antibiotics) एवं वटा म स का योग लाभ द रहता है । कु छ ब चे वै सीन
लगने के बाद लंगड़े हो जाते ह । इ ह अलग कर वटा मन “बी” आहार/पानी
म 5-7 दन तक दया जाना चा हए ।
(6) वै सीन के घोल को बफ म ह रखना चा हए । दो घ टे क अव ध के बाद बचा
हु आ वै सीन काम म नह ं लाना चा हए। खाल ए यूल गाड़ दए जाने चा हए
।
(7) स रंज, सुई, याल आ द सब साफ तथा क टाणु र हत होने चा हए ।
आज कल िजन े म रानीखेत रोग फै ल जाता है, वहाँ 16 स ताह क आयु पर
पुन: आर.डी. एम. वै सीन लगाया जाता है- इसे “र आर.डी. एम” करना कहते ह।
9.5.3 फाऊल पो स वे सीन
वै सीन तैयार कर उसे दो सुई (जो काक म लगी रहती है) वारा पंख के अ द नी भाग म,
िजसे “ वंग वैब' (Wing Web) कहते ह, लगाया जाता है । आर.डी वै सीन के कम से कम
15 दन बाद यह ट का लगाया जाना चा हये । य द ट का सह लगा होगा तो 7-10 दन बाद
ट के के थान पर लाल या भूरे रंग क सूजन तीत होगी । यह सूजन 10-15 दन म ठ क
हो जाती है तथा यह न चय कया जा सकता है क रोग तका रता-इ यू नट (Immunity)
पैदा हो चुक है । आव यकता पड़ने पर 4-5 माह क उ पर यह ट का पुन: भी लगाया जा
सकता है । वै सीन के पाउडर को ‘ टेराइल’ (Sterile) खरल म 5 सीसी ि लसर न सैलाइन
घोल के साथ मलाये तथा अ छ कार घोल बनाने के बाद बफ म रख तथा इसे 3 घ टे
तक ह योग म लाय । यह ट का “सुई” वारा भी लगाया जा सकता है । बहु धा दो सुई या
न तर का ह योग कया जाता है । रोग तका रता का भाव 18 माह तक रहता है । रानीखेत
वै सीनेशन व ध म बतायी गयी सावधा नयाँ योग म लाय । यह एक ल वंग वे सीन है,
जो 200 एवं 500 खुराक क पै कं ग म उपल ध है ।
FowlPxBMStrian- इस वे सीन का उपयोग रोग के आऊट ेक म भी कया जा सकता
है । यह ट का 0.2ml. s/c अथवा इं ाम कू लर भी लगाया जा सकता है । थम ट का 3-6
स ताह एवं दूसरा ट का 16-18 स ताह क उस पर लगाया जाता है । इसे 4o
C पर रखा जाना
चा हए ।
109
9.5.4 इंफे ि शयस ोकाइ टस वे सीन
इस रोग का ट का रानीखेत वे सीन के 10-15 दन पूव अथवा बाद म लगाये जाते है । ये
ट के प य के पीने के पानी म अथवा नासा छ म दो बूँद डालकर लगाये जाते है । ये
100 एवं 500 खुराक वाल पै कं ग म उपल ध होते है । इसको बनाने म रोग का मासाचुसे स
भेद उपयोग म लया जाता है ।
9.5.5 ले रंिजयो ेकाइ टस वे सीन
कु कु ट म ए वयन ले रगो ेकाइ टस रोग से बचाव हेतु यह वै सीन लगाया जाता है । यह
रोग भारत म नह ं पाया जाता है । यह एक वाइरल या वषाणुज नत रोग है, िजसका कोई
भावी उपचार नह ं होता है । रोग से बचाव के ट के उपल ध है, िज ह थम बार आठ स ताह
क उ पर वे ट ॉप मेथड से एवं वतीय बार अ ारह स ताह क उ पर आँख म एक
बूँद डालकर कया जाता है । इस वै सीन क खुराक वे ट म दो बूँद व आँख म एक बूँद होती
है । रोग क वै सीन रे जरेटर म 4o
C पर रखी जा सकती है । यह 100 एवं 500 खुराक
म उपल ध है ।
9.5.6 ए वयन एंसेफे लोमाइलाई टस वे सीन
यह ट का प य म ए वयन एंसेफे लोमाइलाई टस रोग के त तरोधकता उ प न करता
है । ट काकरण पीने के पानी म वै सीन डालकर कया जाता है । वै सीन का टोरेज रे जरेटर
म 4
o
C पर कया जाता है । पै कं ग 100 एवं 500 खुराक म उपल ध है । यह रोग भी भारत
म ाय: कम देखने को मलता है ।
9.5.7 ग बोरो रोग वे सीन
बाजार म यह वे सीन उपल ध है । इसे दो बूँद मुँह अथवा पीने के पानी म डालकर उपयोग
कया जाता है । इसे 4
o
C पर रखा जाता है एवं यह 100 तथा 500 खुराक के पेक म उपल ध
है ।
9.5.8 ए वयन इं लूऐंजा
यह नि य कार क वे सीन है, जो प य म एि टव तरोधकता देती है । स ल रजव
ऑफ वे सीन ऑफ GOI के वारा भारत म दो कार क वे सीन संधा रत क गई है, िजनके
ए ट जे नक ेन H5-N2 एवं H7N1है । इस वे सीन का ट का सब यूटे नयसल अथवा
माँसपे शय म लगाया जाता है । इसके दो ट के लगाये जाते ह । पहला ट का 8-10 दवस
क उस तथा दूसरा ट का 6-10 स ताह क आयु पर लगाया जाता है । छ: स ताह क आयु
तक ट के क खुराक 0.25 म.ल . तथा उसके बाद 0.5 म.ल . होती है । ट काकरण का
उ पादन पर वपर त भाव पड़ता है ।
इसका भ डार 2-8
o
C ताप म पर कया जाता है । ये ट के बाजार म उपल ध नह ं है । के वल
रा य सरकार क माँग पर के सरकार वारा पू त कए जाने हेतु स ल रजव म भ डा रत
110
कये गये है । OIE(Office of International Epizooties) के वारा सफ घनी कु कु ट
आबाद वाले े म ह इसे अ त आव यक होने पर योग करने क सलाह द गई है ।
9.6 कु कु ट ट काकरण सारणी
सारणी 9.6
(प ी क आयु)
Disease Days Weeks
0 4-7 14-21 4 6 8 10 14 15 16 20
Marek’s
Disease

2 ml S/C
in neck
Ranikhet Disease ® F1
I/Nasal
One drop
in each
*Lasota
in DW
*R2B
0.5 ml
I/m
(Killed
vacc.)
*R2B
Booster
0.5 ml
I/m
IBD
(Gumboro)
Disease
One
drop in
each
eye I/
Occular
Or in D/W
0.5 ml.
I/muscular
Fowl Pox
Vaccination
Wing web
method
Repeat
by D/W
Infectious
Bronchitis (IB)
®One
drop in
each
eye
®One
Drop
Each
Eye
I/occular
9.7 अ भावी ट काकरण कारण एवं नवारण
कु कु ट पालन का मूल उ े य अ डा/ गो त व आ थक लाभ को ा त करना है । कु कु ट पालन
क स पूण यव था अ छे उ पादन एवं रोग के सार वारा होने वाल मृ यु दर व हा न
111
को कम करना है । यह के वल अ छे मेनेजमे ट एवं रोगमु त वातावरण वारा ह हो सकती
है । रोग से मुि त उपचार एवं रोकथाम वारा ह संभव है ।
रोग क रोकथाम का सव तम उपाय ट काकरण ह है । व श ट रोग के लए व श ट वे सीन
(ट के ) लगाये जाते है, जो संबं धत रोग के व रोग तरोधकता उ प न कर देता है एवं
प ी को रोग से सुर ा देता है।
वगत वष के दौरान ये अनुभव कया गया क ट काकरण के बाद भी रोग कट हु ए है ।
इस कार से ट काकरण अ भावी होने के व भ न कारण हो सकते ह, िजनम न न मुख
है:-
9.7.1 वे सीन संबंधी कारक
(i) कई बार अ ानता वश कु कु ट पालक ए सपायर (खराब) वे सीन का योग कर लेते
है, िजससे आव यक रोग तरोधकता उ प न नह ं हो पाती है । अत: ए सपायर दनांक
क वे सीन योग न कर ।
(ii) व भ न वषाणु ज नत वे सीन म ाय: अलग-अलग भेद के ट के उपल ध होते है ।
अत: रोग उ प न करने वाले ेन क वे सीन से ह ट काकरण भावी होता है । अ य
ेन के ट के ाय: अ भावी ह रहते है ।
(iii) वे सीन के साथ आये तनुकारक (डाइ यूवट) को ह योग करना चा हए अ यथा वे सीन
के अ भावी होने का खतरा बना रहता है ।
9.7.2 ट काकरण संबंधी कारक
(i) येक वे सीन के लगाने का तर का एवं खुराक नि चत होती है, िजसम बदलाव
करना अनु चत होता है।
(ii) ट काकरण हेतु टेराइल (क टाणुर हत) स रंज नीडल आ द योग करना आव यक
है अ यथा वे सीन क मता भा वत होती है ।
(iii) प ी सं या के हसाब से वे सीन खुराक क गणना सह करनी चा हए, ता क ट क
क कम या अ धक खुराक नह ं द जाव ।
(iv) अ व छ/ कं टा मनेटेड डाई यूटर यु त कये जाने से वे सीन क मता पर वपर त
भाव पड़ता है ।
(v) वे सीनेशन हेतु नल का व छ जल भी य द योग कर लया जाता है, तो उसम
घुल हु ई लोर न वे सीन को अ भावी कर देती है ।
(vi) िजन वे सीन म बू टर ट क क आव यकता होती है । उनसे ल बे समय तक रोक
तरोधकता ा त करने के लये बू टर ट के लगाये जाने आव यक होते है ।
112
9.7.3 पे सव इ मु नट
कई रोग से लड़ने के लए चूज को मुग से मैटरनल ए ट बॉ डज ा त होते है, जो क ारं भक
अव था म व भ न बीमा रय से चूज क र ा करते है । ये पे सव इ मु नट कहलाती है
। य द चूज म कसी व श ट रोग के व पे सव इ मु नट मौजूद है एवं उस रोग का
ट काकरण कया जाता ह, तो ाय: यह अ भावी हो जाता है ।
9.7.4 शीतलन संबंधी कारक
(i) सभी लाईव वे सीन का संधारण आव यक प से 4o
C तापमान पर कया जाना आव यक
है ।
(ii) वे सीन का प रवहन आईस बॉ स म बफ रख कर कया जाना आव यक है ।
(iii) वे सीन के तनुकरण से पूव तनुकारक को नि चत ताप पर ठ डा करना तथा तनुकृ त
वे सीन को भी बफ म रखना ज र होता है । साथ ह इस बात का यान रखा जाना
चा हए क वे सीनेशन पूण होने तक बफ क पया त मा ा बनी रहनी चा हए ।
(iv) जब वे सीन पीने के पानी म द जानी हो तो इस बात का यान रख क पानी पया त
ठ डा हो ता क वे सीन का भाव ख म नह ं हो ।
9.7.5 इ यूनो कॉ पीटे स संबंधी कारक
इ यूनोकॉ पीटे स वे सीन अथवा ए ट जन के त शर र वारा त या दशाने क कायकार
जै वक मता को कहते है । यह प य म पहले से मौजूद रोग तरोधकता पर नभर करता
है ।
इ यूनोकॉ पीटे स पोषण, रोग क ि थ त एवं अ छे मेनेजमे ट से भा वत होता है ।
आव यक एमीनो अ ल, मनरल एवं वटा म स क कमी प य के इ यूनोकॉ पीटे स को
कम करते है ।
तकू ल वातावरण उदाहरण अ य धक गम , सद व तेज वषा अथवा कोई अ य कार का
ेस जैसे कृ म रोग (IBD,RD,MD) आ द से रोग तरोधकता गर जाती है तथा लगाया
गया वे सीन अ भावी हो जाता है ।
9.7.6 आहार संबंधी कारक
प य को खाने के लए दया जाने वाला दाना भी प ी क जै वक याओं एवं रोग
तरोधकता को भा वत करता है ।
दाने म माइकोटॉि सन क मौजूदगी : य द दाने म सीलन या अ य कारण से फं गस आ जाती
हो, जैसे - मूँगफल क खल म ए परिजलस. ले स का उगना ाय: रोग का कारण बनता
है । इस फं गस से दाने म ऑफलोटॉि सन एवं इसी कार से अ य फं गस जा तय से
ऑफलोटॉि सन उ प न होता है । इस कार के माइकोटॉि सन य द Lower Permissible
Limit म भी है। तो ये टॉि सन वे सीन को भा वत करते ह एवं वां छत तरोधकता उ प न
नह ं होने देते ।
113
दाने म पे ट साई स (क ड़े मारने क दबा) के अवशेष होना : फसल पर योग कये जाने
वाले व भ न पे ट साई स य द पूणतया अपघ टत नह ं होते है, तो दान पर इनके अवशेष
शेष रह जाते है, जो क अ भावी वे सीन एवं रोग के आऊट ेक का कारण भी सा बत हो
सकते ह ।
भार धातु से दू षत आहार : भार धातु त व जैसे पारा, लेड, ताँबा आ द कई बार व भ न
औष धय जैसे (फं गीसाईड, हरबीसाईड), खाद, के मकल, चूहे मारने क दवा, रंग, ऑटोमोबाईल
के धुऐं आ द के वारा दाने को दू षत कर देते है । इस कार के दाने का योग वे सीनेशन
के दौरान करने से बनने वाल इ मून को शकाऐं न ट हो जाती है एवं रोग तरोधकता कम
होती है ।
9.8 वे सीनेशन के दौरान प य का रखरखाव एवं अ भावी ट काकरण
से बचाव
अ भावी ट काकरण से बचाव हेतु न न सावधा नयाँ रखी जानी आव यक ह -
(i) वे सीन का य सदैव ति ठत ोत से ह करना चा हए एवं य करने से पूव ह
सु नि चत कर लेना चा हए क वहाँ पर वे सीन को सुर ापूवक रखे जाने (शीतलन) क
पूण यव था है । य करने से पूव वायरल पर ए सपायर त थ का भल कार नर ण
करना चा हये । ल बी ए सपायर त थ वाल वे सीन ह य करनी चा हए ।
(ii) वे सीन का सूय के काश एवं उ मा से पूण बचाव आव यक होता है । अत: प रवहन
के लए ऑइक बॉ स अथवा थमस ला क का उपयोग करना चा हए । लाईव वे सीन
के प रवहन म शीतलन का वशेष यान रखना चा हए ।
(iii) उ पादक के दये नदशानुसार वे सीन का भ डार उ चत ताप पर कया जाना चा हए ।
ाय: वे सीन व डाइ यूवट (तनुकारक) अलग-अलग ताप म पर भ डा रत कये जाते
है ।
(iv) के वल व थ प य का वे सीनेशन श यूल के अनुसार ट काकरण कया जाना चा हए
। बीमार प य के ठ क होने के बाद ट काकरण अव य कर । ऐसे ह नह ं छोड़े, अ यथा
ये प ी रोग त हो सकते ह।
(v) प य को आहार म फं गस एवं भार धातु त व , पे ट साई स आ द से मु त दाना
मलना चा हए । इस हेतु समय-समय पर प ी आहार क योगशाला म जाँच करवा लेनी
चा हए ।
(vi) य द वे सीनेशन पीने के पानी वारा कया जाना हो तो प य का इसके 2 घ टे पूव
पानी नह ं दया जाना चा हये एवं उपयोग म आने वाले पानी क मा ा को सावधानीपूवक
नि चत करना चा हए ।
(vii) वे सीनेशन के लये योग आने वाला पानी लोर न मु त होना चा हए । इस हेतु
है डप प का पानी योग कर । य द नल का पानी योग लेना हो तो उपयोग से 10-12
घट पूव इसे खुला छोड़ दे, ता क म त लोर न नकल जाये । सूय के काश एवं उ मा
का ट क पर वपर त भाव पडता है । अत: योग कये जाने वाला पानी भी सूय के
114
काश म खुला नह ं छोड़ा जाना चा हये । ल चंग पाऊडर के भाव को समा त करने
के लए क म म क का योग कया जाना चा हये । इस हेतु 40Liter पानी म 100gm
Skim Milk मला देना उ चत होता है ।
(viii) ट काकरण का काय दन के ठ डे भाग (सुबह व शाम) को ह करना ेय कर रहता
है । इससे वातावरण के ेस से बचा जा सकता है |
(ix) य द आव यक हो तो ट काकरण के एक स ताह पूव प य को क ड़े मारने क दवा दे
दे ।
(x) प य म इ मुनोकॉ पीटे स को बढ़ावा देने के लए कु छ इ मुनोमो यूलेटरस उपयोग
कये जाते है । जैसे वटामीन A,D3,E,L एवं कु छ हबल औष धयाँ लवर टॉ नक आ द
रोग तरोधकता को बढ़ाने म सहायक होते है ।
(xi) ट काकरण के दौरान प य को आरामदायक ि थ त म रखते हु ए कसी भी कार के
ेस से बचाना अ त आव यक है ।
य द ट काकरण के पूव ट काकरण के समय एवं प चात पूण सावधा नयाँ रखी जाये तो
ट काकरण के अ भावी होने क संभावना लगभग नह ं होती है ।
9.9 कु कु ट ट का काड
ट काकरण म समय अव ध का वशेष यान रखा जाना चा हये । ता वत ट के नय मत
आयु पर लगने आव यक है । याददा त हेतु न न कार का काड बनाकर उसे उपयोग करना
चा हए
सारणी : 9.9
कु कु ट ट का काड
.
सं.
रोग ट का ट काकरण
हु आ/नह ं
य द हां तो
ट काकरण
क त थ
य द नह ं, तो
ता वत दनांक
बू टर डोज
क त थ
1 मरे स रोग हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
2 आर.डी. F1 हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
3 आई.बी.डी. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
4 आर.डी.एम. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
5 फाऊल पॉ स हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
6 पुना आर.डी. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
7 आई बी. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
115
9.10 सारांश
कु कु टशाला ार भ करने के पीछे मुग पालक का उ े य यवसाय तथा आ थक लाभ को बढ़ाना
होता है । सफल कु कु ट पालन के लए अ त आव यक है क अ छे थान से बेहतर न ल
के अ धक उ पादन देने वाले चूजे य कये जाये एवं उ ह रोगमु त वातावरण म पाला जाये
। मु गय क व भ न बीमा रयाँ (वायरल/ बै ट रयल) कसी भी समूह म य द एक बार भी
आ जाये तो व थ होने के बाद भी उ ह उ चतम उ पादन तर पर पहु ँचने म बाधा उ प न
करती है |
जीवाणु ज नत रोग का उपचार संभव होता है, क तु व भ न वषाणुज नत भयानक रोग,
जो महामार का प ले लेते है, जैसे- मरे स रोग, ग बोरो रोग, रानीखेत रोग आ द ऐसे रोग
है, िजनका कोई उपचार संभव नह ं होता है एवं पूरे के पूरे कु कु ट समूह या तो ख म हो जाते
है । य द जी वत भी रहे तो उ पादन क ि ट से बेकार होते है एवं इनको पालने का कोई
योजन नह ं रहता । अत: आव यक है क ट काकरण वारा रोग से बचाव कया जाए ।
उ पादन मता का स पूण दोहन करने के लए पाले जाने वाले कु कु ट म ट काकरण, उ चत
आहार एवं उ तम बंधन यव था अ त आव यक है ।
116
इकाई : कु कु ट शव पर ण एवं रोग नदान क उपयो गता
कु कु ट रोग म पैथो नोमो नक ल जन
इकाई -10
10.0 उ े य
10.1 तावना
10.2 शव पर ण एवं रोग नदान
10.2.1 शव पर ण का समय
10.2.2 शव पर ण से पूव जानकार एवं सावधा नयाँ
10.2.3 शव पर ण क तैयार व व ध
10.2.4 शव पर ण से स भा वत रोग ात करना
10.2.5 शव पर ण के समय नमूने एक करना
10.2.6 एक त नमून क रोग नदान म उपयो गता
10.3 पैथो नोमो नक ल जन
10.3.1 पैथो नोमो नक ल जन : एक प रभाषा
10.3.2 व भ न सामा य कु कु ट रोग व उनके पैथो नोमो नक ल जन
10.4 सारांश
10.0 उ े य:-
कु कु ट यवसाय क सफलता म मु य त भ कु शल ब धन, पौि टक आहार, अ छा जनन
व रोग से बचाव मु य है । थम तीन ब दुओं ( ब धन, आहार व जनन) म य द लापरवाह
हो तो पशु के के वल उ पादन पर ह वपर त भाव पड़ता है ले कन य द रोग से बचाव म
कमी हो तो प य क मृ यु दर म बढ़ोतर या disease outbreaks के कारण स पूण
यवसाय ह चौपट हो सकता है ।
इस कार कु कु ट यवसाय म मु य बाधा समय-असमय मु गय म उ च मृ यु दर माना
जाता है । मु गय का अ धक सं या म एक साथ मरना Disease outbreak कहलाता है
। क ह ं वशेष बीमा रय म कई बार फाम पर उपल ध सभी प ी बहु त कम समय म मर
जाते है । कई बार तो बीमार क अव था इतनी भयानक होती है क एक कु कु ट शाला ब धक
या पशु च क सक को इतना भी अवसर नह मल पाता क वह कसी बीमार प ी को देख
सके । ऐसी अव था म पशु रोग नदान का एक मा ज रया शव पर ण ह रह पाता है ।
117
पशु रोग नदान वशेष क इन प रि थ तय म एक मह ती भू मका रहती है और शव पर ण
ऐसी प रि थ तय म सव च उपयोगी रहता है ।
10.1 तावना :
कु कु ट रोग मु यत: outbreak के प म होते है । इन ि थ तय म रोग का कोई वशेष
कारण होता है । मृ यु का कारण या तो कोई एक हो सकता है अथवा कई कारण के एक
साथ मल जाने से भी मृ यु दर बहु त अ धक बढ़ जाती है ।
कु कु ट यवसाय को लाभ क अव था म रखने के लए यह आव यक है क मुग फाम म
सभी प ी व थ रहे । प य म कु छ तशत मृ यु सामा य मानी जाती है जो क
अलग-अलग फाम क प रि थ तय के अनुसर अलग-अलग हो सकती है ले कन मृ यु दर क
तशत असामा य प से यादा होना कु कु ट पालक के लए च ता का वषय होता है ।
ऐसी प रि थ तय म मृ यु का कारण जानना आव यक है ता क भ व य म इस रोग से कु कु ट
पालक अपने प य को बचा सके । इसके अ त र त मुग फाम म सामा य प से मरने
वाले प य का रोग नदान भी उतना ह मह वपूण है िजतना क disease outbreak
के समय । रोग नदान कई कार से कया जाता है ले कन रोग नदान म शव पर ण अ य त
मह वपूण है |
इस इकाई म शव पर ण से जुड़ी मह वपूण जानका रय जैसे शव पर ण का समय, शव
पर ण करते समय सावधा नयाँ व शव पर ण के समय या- या नमूने एक कये जा
सकते है, इ या द के बारे म बताया गया है । इसके अ त र त व भ न मु य रोग म पाये
जाने वाले पैथो नोमो नक ल ज स के बारे म भी बताया गया है ता क शव पर ण के मा यम
से ह इन रोग का नदान कया जा सके ।
10.2 शव पर ण एवं रोग नदान
10.2.1 शव पर ण का समय
कसी भी जीव क मृ यु के प चात उसके शर र से व भ न कार के ए जाइम
नकलते है । इन ए जाइम के भाव से मृत शर र म कु छ वशेष कार के बदलाव
आते है और कु छ समय बाद वातावरण म व यमान व भ न कार के जीवाणु मृत
शर र म वेश कर जाते है । इन जीवाणुओं क मृत शर र म वृ के कारण शव
सड़ने लगता है ओर शव के आ त रक अंग का आकार, रंग, कठोरता तथा अंग
क आ त रक संरचना म बदलाव आ जाता है । य द मृ यु के बाद समय यादा गुजर
जाता है तो अंग व उनके अवयव म आमूलचूल प रवतन आ सकते है । इस प रवतन
के कारण पशु च क सक के लए रोग से आये आ त रक ल ण क पहचान करना
मुि कल अथवा असंभव हो जाता है ।
118
अत: शव पर ण के वारा रोग नदान के लए यह अ य त आव यक है क मृ यु
के बाद शव पर ण शी त शी कया जाये ता क पशु च क सक को रोग के ल ज स
क सह जानकार मल सके और रोग का सह नदान हो सके ।
10.2.2 शव पर ण से पूव जानकार एवं सावधा नयां
शव पर ण करने से पूव कु छ मह वपूण जानका रय व सावधा नय का वशेष यान
रखना चा हए अ यथा या तो शव पर ण से रोग नदान म कोई मदद नह ं मलेगी
अथवा रोग नदान गलत भी हो सकता है । अत: मुग पालक तथा शवपर णकता
को शवपर ण के लए न न बाते यान म रखनी चा हए :-
1. य द आपको उस मुग फाम पर शवपर ण करना है जहां सभी प ी मर चुके है अथवा
आपके पहु ंचने पर वहां कोई प ी बीमार नह ं है अथवा मृत प ी शव पर ण के लए
आपक योगशाला म लाया गया है तो प ी के बीमार के समय दशाये ल ण, पीने के
पानी अथवा आहार, वातावरण कै ताप म म बदलाव, मुग फाम म नये चूजे या प ी
लाने, ट काकरण कृ ष नाशक दवाई पलाने, मुग घर म म छर क टनाशक दवाई के
छड़काव आ द के बारे म पूण जानकार ा त करना आव यक है । इसके साथ ह यह
जानना भी आव यक है क मुग घर म प ते, गंदगी आ द जलाकर धुंआ तो नह ं कया
गया अथवा मुग घर लू अथवा वषा से भा वत तो नह ं हु आ है । इन सभी जानका रय
से शव पर ण से रोग नदान क दशा नधा रत करने म आसानी रहती है ।
2. शव पर ण से पूव हम यह ात करना भी आव यक है क बीमार सबसे पहले कस
आयुवग म ार भ हु ई। अथवा ट काकृ त या ऐसा समूह िजसम ट काकरण नह ं कया गया
है उसम ार भ हु ई ।
3. शव पर ण से पूव मुग पालक से यह जानकार लेना भी आव यक है क मृत मु गयां
कस Posture म पड़ी मलती है । इससे भी कु छ बीमा रय के नदान म सहायता मलती
है ।
4. शव पर ण का मुग घर म एक नि चत थान तय होना चा हए जहाँ शव पर ण कया
जा सके ।
5. य द शव पर ण के लए प ी योगशाला म भेजे जा रहे हो तो उ हे पाल थीन के थैल
म अलग-अलग ब द कर व पहचान च ह लगा कर भेजना चा हए । यादा अ छा तो
यह रहता है क पाल थीन के थैल को आईस बा स म रखकर भेजा जाये ।
6. य द हम बीमार के बा य ल ण से बीमार का पता भी लग जाता है तो भी शव पर ण
आव यक प से करना चा हए य क शव पर ण से हम अ त र त जानका रयां तथा
बीमार क गंभीरता का पता चलता है।
7. शवपर ण मृ यु के तुर त प चात करना चा हए ता क शव म बा य या आंत रक अंग
अथवा इनके अवयव म सड़न ना हो और शव पर णकता को बीमार के पैथोलोिजकल
ल ज स क सह त वीर मल सके ।
119
8. िजतना संभव हो हम अ धक से अ धक शव का पर ण करना चा हए । यह आव यक
नह ं है क एक ह शव म बीमार के सारे पैथोलोिजकल ल ण हम मल जाये । अत:
एक से यादा शव पर ण कर, सभी ल ण को सि म लत कर रोग नदान करना चा हए
।
9. शव पर ण के प चात शव के न तारण के लए य द मुग घर योगशाला म इ सीनरेटर
नह ं है तो मुग घर योगशाला से दूर उसी े म एक थान तय होना चा हए जहां ग ढा
खोद कर शव को गाड़ा जा सके । ऐसे थान क तार ब द या द वारब द भी आव यक
है ता क कु ते अथवा अ य जंगल जानवर इन शव को ना नकाल सके और फाम पर
सं मण का फै लाव क संभावना न बन सके ।
10.2.3 शव पर ण क तैयार व व ध -
चूं क कु कु ट रोग नदान म शव पर ण क मह ती भू मका है अत: मृतप ी का शव पर ण
सह व ध से व स पूण करना चा हए ता क रोगी मृत प ी के सभी पैथोलोिजकल बदलाव
को जाना जा सके और बीमार के बारे म पूण जानकार मल सके ।
1. शव पर ण का थान पूण प से साफ सुथरा कर लेना चा हए ।
2. य द शव पर ण योगशाला म कया जाना है तो टेबल को 70 तशत ईथाइल ए कोहल के
फोहे से साफ कर लेना चा हए ।
3. त प चात मृत प ी को उ चत थान पर रखकर बा य पर ण करना चा हए । बा य पर ण
म न न ब दु अव य नोट करने चा हए :
(अ)मृत प ी क उ स ब धी जानकार (चूजा अथवा य क)
(ब)शार रक अव था (शर र उ ानुसार सामा य या कमजोर)
(स) ाकृ तक छ जैसे नाक छ , च च, आंख, कान छ या लोयका से असामा य ाव
(द)मृत प ी का वशेष पो चर
(य) कलंगी, वैटल अथवा कान क पा लय का रंग
(र) लोयका के आस-पास य द बींट लगी हो तो उसका रंग, तरलता या कठोरता
(ल) सर, कलंगी अथवा अ य शार रक अंग पर कसी कार का सूजन
4. मृत प ी के बा य शवपर ण के बाद प ी के पंख को साफ पानी से नम कर देना चा हए और
फर पंख को उखाड़ दे । पंख को नम करने से पंख इधर-उधर नह फै लते है और शव को खोलने
के बाद ना ह ये पंख आ त रक अंग को दू षत कर पाते है ।
5. पंख हटाने के बाद शव को पुन: अ छ तरह से साफ कर ले और त प चात आ त रक अंग के
पर ण के लए पूव म तैयार कर ल । इसके लए हम सामा यत: न न ल खत सामान क
आव यकता पड़ती है :-
(अ) नजम कृ त कची, बी.पी. है डल, लेड स हत, व भ न आकार क चम टयां
(ब) नजम कृ त, पै लेट, फोहा, कांच क प काएं ( लाईड), छोट बोतल इ या द
120
6. शव को पीठ क तरफ से शव पर ण सतह पर लटा दे ता क छाती वाला े ऊपर क ओर
रहे ।
7. कची व के ल लेड से उरोि थ (Setrnum) वाले े से वचा काटना शु करे और वचा को
च च के पछले ह से तक तथा लोयका तक दो भाग म वभािजत कर दोनो तरफ खसका दे
।
8. सबसे पहले मांस पे शय का वकास, आकार तथा रंग को नोट करे ।
9. मांस पे शय क जानकार के बाद सव थम वसन तं को खोले । इस तं म मु य प से े कया,
फे फड़े व वात थून (Air sacs) के बारे म जानकार लेना आव यक है । इसके लए असामा य
ाव, र त क उपि थ त, सूजन, मवाद आ द के बारे म जानकार होना आव यक है ।
10. वसन तं के साथ ह शव म दल का आकार, र त ाव अथवा दल के बाहर झ ल म कसी
कार के य के बारे म भी पूण प से जानकार ा त करना आव यक है ।
Proventriculus - ं थल जठर
Gizzad - पेषणी
Oesophagus - ास-नल
Corp - अ नपुट
Bileduct - प त वा हनी
Small intestine - छोट आंत
Large intestine - बड़ी आंत
Trachea - वास णाल
Liver - यकृ त
Gall Bladder - प ताशय
Pancreas - अ नाशय
Caeca - अ धनाल
Cloaca - अव कर
11. वसन तं के बाद शव के पाचन तं के बारे म जानकार एक करनी चा हए । इसके लए सव थम
पाचक तं के सभी अंग व इसके घटक का बाहर से पर ण करना चा हए । बाहर पर ण म
आहार नल (Oesophagus), ाप (Crop), ोवे ट कु लस (Proventriculus), गजाड
(Gizzard), यकृ त, प ताशय (Gallbladder), छोट आंत, सीका (Caeca), बड़ी आंत, रे टम
(Rectum) तथा लोयका (Cloaca) आ द पर असामा य सूजन, र त ाव, रंग प रवतन,
सड़न, घाव आ द के बारे म मह वपूण जानकार नोट करे । इसके प चात आहारनल ाप,
ोव कु लस, गजाड, छोट आत, सीका बड़ी आत, रे टम तथा लोयका क आ त रक सतह पर
सूजन, र त ाव घाव इ या द को नोट करे, इसके साथ ह इन अंग म कृ म क उपि थ त भी
देख । कु कु ट म बहु त सारे कृ म न नआंख से भी देखे जा सकते है । अ नाशय प ताशय व
प त वा हनी म भी इन सब के बारे म जानकार एक करे व नोट करे ।
121
12. इसके प चात मू सं थान म मु यत: वृ क क अव था म आये प रवतन को नोट करना चा हए
।
13. मू सं थान के बाद जनन सं थान के बारे म जानकार आव यक है । वैसे तो मादा व नर दोनो
लंग का पूण प से शव पर ण करना चा हए ले कन रोग नदान म मादा अंग वशेषत: अ डाशय
(Ovary) तथा अ डन लका (Oviduct) का पर ण यादा मह वपूण है । शवपर णकता को
अ डाशय व अ डन लका के सूजन, र त ाव अथवा मवाद होने के बारे म जानकार ा त कर
नोट करना चा हए ।
14. इसके प चात शवपर क को तं का तं के बारे म भी वशेष यान रखना चा हए य क कई
वषाणुज नत रोग म तं का त वशेष प से भा वत होता है । तं का तं म मु य यान
े कयल ले सस, सये टक तं का तथा कपाल खोलकर मि त क पर देना चा हए । शवपर क
को इन सब अवयव का आकार मोटाई, अ त र त व, र त ाव व इनक चमक म कमी इ या द
सभी प रवतन बहु त ह यानपूवक नोट करने चा हए ।
15. इन सबके अ त र त शवपर क को चा हए क बसी (Bursa of Fabricius) जो क प ी
म रोग तरोधक मता दान करने के लए एक अ य त मह वपूण अंग है, को अव य देख
। इस अंग के आकार, र त ाव व मोटापन अव य नोट करे
10.2.4 शव पर ण से स भा वत रोग ात करना
शव पर ण से स भा वत रोग ात करना
ल ण एवं पायी जाने वाल अव थाएँ स भा वत रोग
एयर सैक इंफे शन, लाइ नंग म मोटापन रानीखेत, आई. बी. पे रटोनाई टस
वास अवरोध नह ं, र त पानी जैसा माइको- लाजमो सस ई. कोलाई
आहारकमी, पाइरोक टो सस, यूको सस इ फै शन, कॉ पले स कॉ सी डयो सस
कॉ ब एवं चेहरे पर सफे द ध बे फे वस ।
अवशो षत योक पुलोरम रोग, सालमोनेलो सस
गजाड का इरोजन पोषक त व क कमी
बड़ा हु आ गाल लेडर फाउल टायफाइड, शीत, पुलोरम रोग,
वटा मन ए क कमी भूख
कोराइजा स ोम इ फे शस कोराइजा,
पॉ स सी.आर.डी,फाउल, वटा मन ए क कमी
सीकल हैमरेज कॉ सी डयो सस, लैकहैड ।
फे फड़ो मे नो यूल पुलोरम रोग, एसपरिजलो सस
छोट आंत म सूजन
रानीखेत, पाइरोक टो सस
कॉ सी डयो सस, टायफाइड,
122
10.2.5 शव पर ण के समय नमूने एक करना :-
रोग नदान के लए महामार व ान (Epidemiology), ला ा णक (Clinical Signs),
शव पर ण (Post-mortem examination), इलाज का भाव (Response to
treatment) इ या द मह वपूण है ले कन एक त नमून के योगशाला म व लेषण से रोग
का पु ता नदान कया जा सकता है ।
योगशाला म व लेषण के लए नमूने जी वत तथा मृत दोन तरह के प य से लये जा
सकते है और उनके लए जांच क दशा व तर के भी अलग-अलग होते है । ले कन मृतप ी
से नमून क सं या व कार यादा लेना स भव है । मृत प ी से आ त रक अंग व ाव
लए जा सकते है जो क जी वत प ी म सामा यत: स भव नह है ।
नमूने एक करते समय हम न न व तुओं क आव यकता होगी :
(क) नजम कृ त कची, लेड, चमट , परखनल , पै लेट, नमूना बोतल, फोहा कांच प का।
(ख) जीवाणु पृथ क करण व व लेषण के लए नजम कृ त जीवाणु ांसपोट मी डयम ।
(ग) वषाणु पृथ क करण व व लेषण के लए वायरस ांसपोट मी डयम
(घ) फफूं द के लए सैबरोड़ आगार मी डयम
(ड) 10 तशत फामल न घोल
शव पर ण के दौरान हम एक-एक सं थान का यान से अ ययन करना चा हए और उसी
समय उस सं थान के अंग का टुकड़ा या उसम एक वाद को पूण सावधानी बरतते हु ए
एक करना चा हए । आदश प म हम नमूना जीवाणु, वषाणु फफूं द, ोटोजोवा कृ म आ द
सभी के लए अलग-अलग नमूने बोतल म लेना चा हए ओर उस बोतल पर यह अव य अं कत
होना चा हए क कस बोतल के नमूने का योगशाला म या व लेषण करना है । बोतल
पर प ी क पहचान सं या व नमूना एक करने क तार ख भी आव यक प से अं कत होनी
चा हए ।
उ तक या धक पर ण के लए एक त अंग के नमूने क मोटाई-ल बाई-चौडाई का वशेष
यान रखना चा हए । नमून का आकर बड़ा होने क ि थ त म वह ठ क कार संर त नह ं
हो पाते है और उ तक या धक पर ण के लए सह नह ं माने जाते । आत क अ द नी
सतह अथवा कटे हु ए आ त रक अंग से कांच प का पर इ ेशन मीयर बना कर, अ छ
तरह हवा म सुखा कर सुर त रखना चा हए । नमूने एक करते समय इस बात का भी अव य
यान रखा जाना चा हए क अंग एक दूसरे के स पक म न आये और आपस म सं मत
ना हो ।
एक त नमून को आदश मानद ड के अनुसार शी ा तशी उस योगशाला म भेजना चा हए,
जो योगशाला इन जांच क स म अथवा मा णत हो । नमून को भेजने से पहले योगशाला
से पूव म अनुम त ा त करना हमशा बेहतर माना जाता है |
नमून के साथ आव यक प से भेजने वाले के ह ता र स हत प होना चा हए िजसम
महामार ला णक, शवपर ण ट काकरण, इलाज संबंधी जानकार सह सह द जानी चा हए।
123
10.2.6 एक त नमून क रोग नदान के उपयो गता
शवपर ण के समय एक त कये गये नमून का योगशाला म व लेषण कस कार कया
जाता है इस बात का ववरण सं ेप म नीचे दया जा रहा है ।
1. सभी अंग से कांच प का पर बनाये गये इ ेशन मीयर को अ भरंिजत कर उसका पर ण
जीवाणु, वषाणु क इ लूजन बॉडीज फफूं द क उपि थ त आ द इ नत करने के लये कया
जाता है ।
2. जीवाणु ांसपोट मी डयम, पै लेट या फोहे म लए गये नमूने से जीवाणु के बारे म पता
कया जाता है।
3. इसी कार वषाणु ांसपोट मी डयम, पै लेट या फोहे से लए गये नमूने से वषाणु क
पहचान योगशाला म क जाती है ।
4. अंग के ऊतक के नमूने 10 तशत फामल न म लेकर सुर त रखे जाते है । योगशाला
म इन ऊतक से से शन बनाकर और उ ह अ भरंिजत कर, बीमार के कारण ऊतक म आने
वाले प रवतन के आधार पर भी कु छ रोग का नदान कया जाता है ।
5. इन उ तक म जीवाणु या वषाणु क उपि थ त कु छ नई तकनीक जैसे लोरेसे स ए ट बॉडी
जांच आ द से भी कर रोग नदान कया जा सकता है ।
6. आंत से लए गये फोहे अथवा बींट से व भ न कार के परजी वय क पहचान क जा सकती
है ।
10.3 पैथो नोमो नक ल जन (Pathognomonic Lesion)
10.3.1 प रभाषा
शवपर ण वारा रोग नदान एक मह वपूण तर का है । शवपर क को इसके लए यह पया त
ान होना आव यक है क कस रोग म प ी के शर र का कौनसा अंग भा वत होता है तथा
भा वत अंग म कस तरह का प रवतन आता है । इन अंग म आये प रवतन के आधार
पर ह शवपर क रोग नदान कर पाता है । ले कन अंग म कु छ प रवतन इस कार के
होते है क वे एक से यादा रोग म पाये जा सकते है । इसके वपर त कु छ प रवतन इस
तरह के होते है क ये के वल एक वशेष रोग म ह मलते है । इस कार के प रवतन या
ल जन जो कसी एक ह रोग म मलते है उ हे पैथो नोमो नक ल जन कहते है । य द
शवपर क इन पैथो नोमो नक ल ज स को पहचान म सफल रहता है तो वह रोग नदान
म भी बहु त हद तक सफल माना जाता है |
10.3.2 व भ न कु कु ट रोग व उनम पैथो नोमो नक ल जन
ईकाई के इस भाग म के वल मु य रोग के पैथो नोमो नक ल जन के बारे म ह बताया गया
है । साथ ह रोग के कारण को भी सं ेप म बताया गया है ता क पाठक रोग का नाम, कारण
और पैथो नोमो नक ल जन एक साथ जान सके ।
124
(क) रानीखेत रोग :
यह एक वषाणुज नत रोग है । शवपर ण म वासनल म अ धक ले मा पाया जाता है ।
एयर सैक धुंधले हो जाते है तथा ोवे ट कु लस व गजाड म र त ाव पाया जाता ह । स पूण
पाचन णाल म याले नुमा फोडे दखाई देते है ।
(ख) सं ामक बसल बीमार (IBD) :
यह भी एक वषाणु ज नत बीमार है िजसम बसा ऑफ फै ी सयस मु य प से भा वत
होती है । बसा शु आत म आकार म बहु त बढ़ जाती है और कु छ समय बाद आकार म सामा य
से काफ छोट हो जाती है । टांग क मांसपे शय म र त ाव भी होता है ।
(ग) मुग माता (Fowlpox) :
यह क एक वषाणुज नत बीमार है िजसम कलंगी वैटल अथवा कान के लोब पर पॉ स के
ल जन बन जाते है । इसके अ त र त मुंह म पॉ स ल जन बन जाते है । पॉ स ल जन म
बो ल गर बॉडीज पाई जाती है । िज हे सू मदश से देखा जा सकता है ।
(घ) सं ामक ो काइ टस (IB) :
इस वायरस ज नत रोग म मु य प से ना सका व वास नल म सूजन पायी जाती है ।
एयर सैक म गाढ़ा चप चपा पदाथ मलता है ।
(ङ) मेरे स बीमार (MD) :
इस वायरस ज नत रोग म मुग एक वशेष अव था म पड़ी मलती है िजसम साधारणतया
एक पैर आगे और एक पैर पीछे अथवा मुड़ा हु आ रह सकता है । सये टक नव तथा े कयल
ले सस क मोटाई बढ़ जाती है तथा इनक सामा य चमक म कमी आ जाती है ।
(च) सं ामक लै र गो े कयाइ टस (ILT) :
इस वायरस ज नत रोग म वास नल म र त म त ले मा तथा लैरे स व वासनल
के ऊपर भाग म चीजी अवरोध (Cheesy Plug) बन जाता है ।
(छ) ल फोइड यूको सस (Lymphoid Leukosis) :
इस वायरस ज नत रोग को बडा यकृ त रोग (Big Liver disease)ए के नाम से भी जाना
जाता है । इस रोग म यकृ त इतना बड़ा हो जाता है क ाय: पूर बॉडी कै वट यकृ त से ह
भर दखाई देती है ।
(ज) सं ामक कोराइजा (Infectious coryza) :
इस जीवाणु ज नत रोग मं चेहरा सूजा हु आ दखाई देता है, नाक तथा आँख पर चप चपा
तरल पदाथ एक हो जाता है जो मृत प ी म चीज (cheese) जैसा दखाई देता है । कभी-कभी
शव के वैट स भी बड़े हो जाते है ।
(झ) पुलोरम रोग (Pullorum Disease) :
इस जीवाणुज नत (Salmmella pullorum) रोग म प ी के व भ न आ त रक अंग जैसे
यकृ त, वृ क, फे फड़े इ या द पर ल जन तथा दय, गजाड अ धनाल, बड़ी आंत आ द अंग
म ने ो टक फोकाई पायी जाती है ।
(ञ) कु कु ट टाईफॉइड (Fowl typhoid) :
125
इस जीवाणुज नत (Salmonella gallinarum) रोग म यकृ त, ल हा एवं वृ क को आकार
सामा य से बड़ा पाया जाता है।
(ट) कु कु ट य रोग (Fowl tuberculosis) :
इस जीवाणुज नत (Mycobacterium tuberculosis avium) रोग म यकृ त, ल हा, आंत
तथा फे फड़ म छोट -छोट गांठे बन जाती है िज हे आसानी से पहचाना जा सकता है |
(ठ) ल बर नैक या बोटू ल म (Botulism)
मु गय म यह बीमार एक जीवाणु (Clostridium botulinum) वारा बनाये गये जहर को
खाने से हो जाती है । शव पर ण म मुग के आंतो म सूजन व र त ाव पाया जाता है
। ाप म उड़ा दाना भी पाया जा सकता है ।
(ड) ो नक रेि परेटर बीमार (Chronic Respiratory Disease)
मु गय म यह रोग माइको ला मा ज नत है । शव पर ण म आर भ क अव था मे एयर
सैक म पीला झागदार पदाथ अथवा सफे द ध बे पाये जाते है । वास नल म गाढ़ा ले मा
पाया जाता है । साथ ह र त ाव भी पाया जा सकता है । दय क झ ल मोट तथा
धुंधल सफे द हो जाती है ।
(ढ) को सी डयो सस (Coccidiosis)
मु गय म यह रोग आईमे रया (Eimeria) नामक ोटोजोवा परजीवी से होता है जो क लगभग
सभी उ के प य के लए घातक है । शवपर ण के दौरान इस रोग म सीका (मु य प
तथा आंत (कई बार) र त से लगभग भर होती है और उनम सूजन मलती है ।
(ण) लैक हैड (Black Head)
यह रोग ह टोमोनास म लया ग डस (Histomonas meleagridis) नामक ोटोजोवा
परजीवी से होता है । शव पर ण के समय इस रोग म सीका म सूजन के साथ पीले रंग
का बदबूदार तरल पदाथ मलता है । यकृ त पर ार भ म सुई क नोक जैसे तथा यादा
भा वत प ी म गोल व बड़े पीले या हरे पीले ध बे बन जाते हे ।
(त) टक बुखार या पाइरोक टो सस (Tick Fever or Spirochaetosis)
मु गय म यह रोग बोरे लया ए सेर ना (Borrelia anserina) नामक पाईरोक ट के कारण
होता है जो क अरगस परसीकस (Argus persicus) नाम टक वारा फै लाया जाता है ।
शव पर ण म इस रोग म त ल व यकृ त बढ़ जाते है, यकृ त का रंग पीला पड़ जाता है
। इसके अ त र त दय क झ ल म पानी भी भर जाता है ।
(थ) एसपरिज लो सस (Aspergillosis)
यह रोग एसपरिज लस यूमीगेटस (Aspergillus fumigatus) नामक फफूं द से होता है ।
इस रोग म फे फड़े व एयर सैक भा वत होते है । शव पर ण पर फे फड़ म छोटे-छोटे घाव
(abscess)ए दखाई देते है और एयर सैक म पीले रंग का गाढ़ा पदाथ भरा मलता है |
(द) आंत रक कृ म रोग (Internal Parasites)
126
मु गय म ाय: कई कार के आंत रक कृ म रोग उ प न करते है । शव पर ण के दौरान
शव काफ कमजोर मलता है । आंतो म सूजन व कभी-कभी र त ाव भी मल सकता है
। आंत खोलने पर परजीवी भी मल जाते है ।
10.4 सारांश
इकाई म बताये गये सभी ब दुओं का अ ययन करने से यह ात होता है क कु कु ट यवसाय
म सबसे बड़ी बाधा रोग का होना है । इसके लए यह आव यक है क कु कु ट यवसाय को
लाभकार बनाने के लए रोग पर नय ण आव यक है । रोग पर नय ण के लए मह वपूण
होता है शी ा तशी रोग नदान । वैसे तो रोग नदान के कई तर के होत है ले कन शव पर ण
वारा रोग नदान एक आव यक एवं बहु त ह मह वपूण तर का है । तुत ईकाई म बताया
गया है क शी ा तशी और अ धकतम संभव प य का शव पर ण कर पैथो नोमो नक
ल जन क सहायता से रोग नदान क हर संभव को शश करनी चा हए । इसके साथ ह
शवपर ण के समय एसेि टक तर के से व भ न कार के नमूने एक कर योगशाला म
पु ता रोग नदान के लए भेजने चा हए । शव पर क को पैथो नोमो नक ल ज स का पया त
ान होना आव यक है ।
127
इकाई : कु कु ट रोग नदान एवं आहार व लेषण योगशालाएं
इकाई – 11
11.0 उ े य
11.1 तावना
11.2 भारत म कु कु ट रोग नदान
11.2.1 ह मेटोलोिजकल जाँच
11.2.2 सीरम क जाँच
11.2.3 कॉ सी डओ सस क जाँच
11.2.4 E.Coli क जांच
11.2.5 भावी जीवाणु नाशक औष ध
11.2.6 शव पर ण
11.3 आहार व लेषण
11.3.1 नमी/मोइ चर
11.3.2 टोटल ऐश
11.3.3 ए सड इनसो यूबल ऐश
11.3.4 ू ड ोट न
11.3.5 फे ट क जाँच
11.4 कु कु ट संबंधी सं थान एवं सं थाएं/ आहार व लेषण योगशालाएं
11.5 सारांश
11.0 उ े य
इकाई का उ े य कु कु ट म होने वाले व भ न रोग क जाँच तथा कु कु ट पालन के े म
योगशालाओं से मलने वाल मदद के वषय म जाग क करना है ।
11.1 तावना
रोगी प ी के उ चत उपचार क पहल ज रत है, रोग का सह नदान अथात् रोग के वा त वक
कारक का पता लगाना । पालक वारा बीमार के संबंध म द गई जानकार , बीमार के ल ण
एवं योगशाला जाँच के प रणाम, तीन के आधार पर रोग का सह नदान कया जा सकता
है | राज थान रा य म इस काय हेतु अ य त सु ढ़ योगशाला तं वक सत है । रा य के
येक िजले म एक िजला तर य रोग नदान योगशाला है । उदयपुर, कोटा, बीकानेर,
128
जोधपुर, अजमेर म संभाग तर पर े ीय रोग नदान योगशाला है व जयपुर म एक रा य
रोग नदान योगशाला है । इस कार उदयपुर संभाग म चार िजला तर य योगशालाएँ
च तोड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसम द म कायरत है ।
संभाग क रोग नदान योगशालाओं म उपल ध सु वधाओं का अ धकतम एवं समु चत उपयोग
हो एवं इन सु वधाओं का लाभ सुदूर पशुपालक तक पहु ँचे, इस उ े य को ि टगत रखते हु ए
इस अ याय का समावेश कया गया है । योगशाला जाँच हेतु कब, या से पल लेने है, कै से
भेजने है व योगशाला जाँच के प रणाम का आकलन कै से करना है आ द के संदभ म जानकार
उपल ध करवायी जा रह है ।
11.2 भारत कु कु ट रोग नदान
व थ प ी पालन ह कु कु ट यवसाय क आधार शला है । जी वत ा णय म बहु धा सं ामक
तथा अ य रोग होते रहते है । अ धक हा न होने से पूव ह रोग का नदान करना अ त आव यक
है । इस हेतु वशेष एवं योगशालाओं क मदद लेना ेय कर रहता है । योगशालाओं
के खून/ सीरम/ बीट / भावी दवा क जाँच एवं कु कु ट शव पर ण वारा भी रोग का नदान
कया जाता है ।
11.2.1 ह मेटोलोिजकल जाँच
र त य या अ य प से शर र म होने वाल सम त जैव रासाय नक एवं रोग
तरोधा मक याओं म भाग लेता है । अत: बीमार क ि थ त म इसम प रवतन
वाभा वक है । अत: र त क जांच कई कार के रोग मे करवाई जानी आव यक होती है|
जब भी प ी म बुखार, र त क कमी या एनी मया, ल वर, कडनी, हाट से संबं धत रोग,
र त परजीवी रोग आ द के ल ण दखाई दे या ऐसी बीमार हो, िजसका नदान नह ं हो पा
रहा हो तो र त क जांच करवानी चा हए । कई बीमा रय के ामा णक नदान हेतु भी र त
या सीरम क जाँच करवायी जाती है ।
र त क ह मेटोलोिजकल व बायोके मीकल जांच म र त के को शक य व रासाय नक अवयव
म होने वाले प रवतन के आधार पर रोग के कारण का पता लगाने म मदद मलती है । र त
के मीयर क जांच से रोग के कारक ोटोजोआ या बे ट रया को देखा जा सकता है । वशेषतौर
पर र त परजीवी रोग जैसे बबे सयो सस, थाइले रयो सस, पाईरोक टो सस, ला मो डयम,
पेनोसोमो सस आ द का पता लगाने के लए पंख के नीचले भाग से पे रफे रल र त मीयर
बनाना चा हए । सरोलोिजक जाँच म ए ट जन-ए ट बॉडी आधा रत जांच से रोग के संबंध
म प ट माण मल सकते है ।
हमोलो टकल जांच एवं उनका मह व :-
(i) Hb हमो लो बन क मा ा gm% म
(ii) Total leukocytic count (TLC) - एक यू बक म.ल . र त म वेत र त क णकाओं
क सं या।
129
(iii) Differential leukocytic count (DLC) - यह व भ न कार क वेत र त
क णकाओं क र त म तशत मा ा को दशाता है । र त म पाँच कार क वेत र त
क णकाएं पायी जाती है- यु ो फल, इयो सनो फल, बेसो फल, लं फ़ोसाइट एवं
मोनोसाइट ।
11.2.2 सीरम क जाँच
कई प ी रोग के मा णक नदान हेतु सीरम जाँच करवायी जाती है । सरोलोिजकल जाँच
म ए ट जन, ए ट बॉडी आधा रत टे ट कए जाते है, िजनसे रोग के कारक जैसे बै ट रया,
वायरस, ोटोजोआ आ द के संबंध म प ट माण मल सकते है । र त को बना
ए ट कोगुले ट डाले रखने से र त का थ का जम जाता है । बचा हु आ साफ तरल पदाथ ह
सीरम कहलाता है । सीरम ा त करने के लए मु गय का 5 म.ल . र त सीधे शराओं से
ल ।
11.2.3 बीट कृ म एवं कॉ सी डओ सस क जाँच
प ी म द त, क ज, उ पादन म कमी, कमजोर , कम खाना, मल के साथ खून आना आ द
ल ण दखने पर बीट क जाँच करवानी चा हए । बीट क जाँच वारा कृ म रोग का तथा
कॉ सीडायो सस का पता लगाया जा सकता है । मल क जाँच म परजीवी के अ डे, लावा,
उ स ट आ द देखकर अंत: परजीवी के कार क जानकार मल जाती है, िजससे उसके व
भावी दवा का अनुमान लगाया जा सकता है । इस लए अंत: परजीवी नाशक उपचार देने
से पहले बीट क जाँच करवा लेनी चा हए ।
से पल लेने क व ध :- जहाँ तक संभव हो, बीट के नमूने उठाते हु ए सीधे प ी के रे टम
से ह ले । आसपास क म ी आ द से पल के साथ न आये । लगभग 2 से 5 ाम तक
से पल को साफ छोटे पाल थीन बैग म लेकर उसम 8-10 बूंद 10% फोमल न क मला द
। से पल को सह तर के से चि हत कर द, िजससे पता चल सक क उ त से पल कस
प ी का है तथा इसे अ य आव यक जानका रय के साथ भेज ।
य द मल क जाँच काि स डयो सस या लंग व स हेतु क जानी है तो से पल म फोमल न
न मलाये । से पल जांच के लये तुर त भेजे, देर क ि थ त म से पल ज म रखे एवं
बफ पर भेज । को सी डयो सस रोग क जांच हेतु मल के नमूने म2.5% पोटे शयम डाइ ोमेट
घोल मलाया जा सकता है ।
11.2.4 ऐ चेरे चया कोलाई (E. coli) क जांच
इस हेतु इओ सन मथाईल न लू अगार; मे काँक अगार अथवा टज टॉल आगार लेट उपयोग
म ल जा सकती है । उ त व णत कसी भी मी डया क लेट पर सं मण वारा कं ग
कर द जाती है एवं इसे लगभग 48 घ टे 37oC पर इन यूबेटर म रखा जाता है । ारं भक
तौर पर E. coli क पहचान न नानुसार क जाती है । (i) EMB Agar गाढ़े रंग क कॉलोनी
130
जो धातु के समान चमक उ प न करती है । (ii) Mac-Conkey Agar- ईट के समान लाल
नारंगी रंग क कॉलोनी आना, (iii) Tergitol-7 Agar -पीले रंग क कॉलोनी आना।
E.coli क नि चत पहचान ामस टे नंग व अ य पर ण वारा संभव है । ये एक ाम
नेगे टव रोड (छड़) के आकार के जीवाणु है, जो इंडोल बनाते है, क तु H2S नह ं बना सकते,
साइ ेट मी डया पर वृ नह ं करते । इसके अ त र त िजले टन ल वीफ के शन जाँच, यू रया
फमटेशन जाँच Neg दशाते हो, ये पोिज टव मथाइल रेड व नेगे स वोगास पाडर रए शन
दखाने वाले बेि ट रया ह, जो लूकोज, मा टोज आ द को फम टेशन कर सकते है । E.coli
पहचान के लए योगशाला म IMVIC Reaction लगाई जाती है, िजसके न न प रणाम
ा त होने पर E.coli के सं मण का पता चलता है ।
I - Indol Test
M - Methyle Red Test
V - Voges Proskaur Reaction
C - Citrate Utilization
Indol Test :- E.coli क चर को पे टोन वाटर या यू एंट ोथ म 48 घ टे क वर करने
के प चात टयूब पर 1ml. ईथर या जाईलॉल डाला जाता है । अ छ तरह हलाने के प चात
0.5ml. इहर लक (Ehrlichis Solution) टे ट टयूब के साईड से डालने पर गुलाबी से लाल
रंग का घोल पॉिज टव रए शन दखाता है । E.coli बे ट रया INDOL पॉिज टव है ।
Methyle Red Test -
Methyle Red - 0.04gm
इथेनॉल – 40ml
डि टल वाटर - 100ml.
मथाइल रेड को इथेनॉल म घोलकर पानी मलाया जाता है एवं आयतन को 100ml. कर
लया जाता है ।
Reaction :- सव थम लूकोज फा फे ट अगार मी डयम म E.coli क चर इनो यूलेट करते
है । 37०
C ताप पर दो दवस इन यूबट करने के प चात उसम मथाइल रेड घोल क दो बूँदे
मलाने पर गहरा लाल रंग द शत होने पर टे ट पोिज टव आता है । MR-Positive
(पोिज टव)
VOGES Prosckaur Reaction (Actyle- Methyle Carbinol Production)
Methyle-Red पर ण लगाने के प चात Test Tube म 0.6 ml. ने थॉल (5% ने थॉल)
का घोल मलाया जाता है और फर 0.2ml.40% पोटे शयम हाइ ॉ साइड का जल य वलयन
मलाकर अ छ कार से हलाने के प चात 15 min से 1 घ टे के म य गहरे गुलाबी रंग
का आना V-P पोिज टव द शत करता है । जब क E.Coli जीवाणु VP-नेगे टव है, िजसम
कोई रंग नह ं आता है ।
131
Citrate Utilization (साई ेट यू टलाईजेशन) : कोचर साई ेट मी डयम म E.coli क वर
इनो यूलेट करने के प चात 7 दवस तक ट ब ड ट देखी जाती है । य द घोल म ट बट हो
तो टे ट पॉिज टव एवं ट ब ड ट दखलाई न दे तो टे ट नेगे टव होता है । E.coli साई ेट
नेगे टव दशाते है ।
11.2.5 भावी जीवाणु नाशक औष ध
यह जाँच इ फै शन या रोग के व भावी औष ध का पता लगाने के लए करवाई जाती
है । इस जाँच के वारा रोग के कारक के व भावी औष धय का पता लग जाता है,
िजससे उनके उपचार म मदद मलती है । इस हेतु पूणत: लाई ड तर क से मी डया ( यू
ऐंट अगार) बनाया जाता है । इसे लाई ड पे डशस म डालकर ठ डा करने उपरा त नमूने
से वाब लेकर इनो यूलेट कया जाता है, फर उस पर संभा वत भावी औष धय क ड क
लगाकर 48 घ टे तक इन यूबेट करने के उपरा त देखा जाता है, जो औष ध अ धक भावी
होती है, उसका यवहा रक तौर पर उपयोग कया जाता है ।
11.2.6 शव पर ण
येक कु कु ट पालक को चा हए क फाम पर मृत हरे प ी का शव पर ण कराये ता क
बीमार का पता लगाया जाकर सार पर नयं ण कया जा सके ।
जहाँ तक संभव हो, मृत प ी को शी अ वेशणालय ( योगशाला) म भेज द । य द फाम
पर असमय मुग क मृ यु हु ई हो तो शव को बफ म रखना चा हए ता क शव म राईगर मौ टस
नह ं हो व पर ण वारा सह न कष नकाला जा सक ।
पो अ वेशणालय म सु वधापूवक जाँच हो सके , इसके लए मुग फाम पर न न साम ी
सदैव उपल ध रहनी चा हए ।
10% फामल न का घोल
2% पोटे शयम डाइ ोमेट
50% ि लसर न सेलाईन
70% ए कोहॉल
नामल सेलाईन एवं चौड़े मुँह क लाई ड शी शयाँ ।
पो टमाटम के प चात मुख रोग क जाँच हेतु भेजे जाने वाले नमूने:-
1. रानीखेत रोग (Ranikhet Disease) मि त क तथा झ ल -50%
ि लसर न सेलाइन (Glycerine
Saline) म े कया ( वास नल ),
लैरे स फे फड़े (Lungs) व
ोव यूलस को 10% फारमेल न
घोल म |
2. मुग चेचक-फाउल पॉ स छोटे-छोटे दान के खुरड (Scab) को
132
50% ि लसर न सेलाइन (Glycerine
Saline) के घोल म भेज।
3. ए.एल.सी. (A.L.C.) िजगर, त ल , गुद तथा या टक नव
को 10% फारमेल न घोलम ।
4. ॉ नक रे पाइरेट डसीज (C.R.D.) र त के सीरम को अनवे ण हेतु भेज
।
5. टक फ वर (Tick Fever) (i) त ल तथा िजगर को 10%
फारमेल न घोल म ।
(ii) पी ड़त मु गय के र त क लाइड
(Slide) बनाकर मथाइल ए कोहल म
उपचार के उपरा त भेज ।
6. मुग हैजा (Fowl Cholera) (i) र त क लाइड बनाकर ए कोहल
(Alcohol) म उपचार कर भेज ।
(ii) िजगल त ल , आंत के ऊपर भाग
को 10% फारमेल न के घोल म भेज।
7. राउ ड वम गोलक ड़े/टेप वम (i) ताजे मल बीट को 10% फारमेल न
के घोल म भेज।
(ii) क ड़ को 10% फारमेल न अथवा
ऐ कोहॉल म भेज।
8. खूनी द त (Coccidiosis) अंत ड़य तथा सीकम से ा त र त
रंिजत बीट को 20% पोटे शयम
डाइ ोमेट (Potassium
Dichromate) के घोल म भेज ।
11.3 आहार व लेषण
कु कु ट को दये जाने वाले आहार म अलग-अलग आयु वग के अनुसार व भ न पोषक त व
का वां छत मा ा म होना अ त आव यक है । अ यथा इनक कमी या अ धकता से कु कु ट
म व भ न रोग अथवा रोग जैसी ि थ तयाँ उ प न हो जाती है । इसके लए आव यक है
क य द घर पर दाना बनाया जा रहा हो तो उसको व भ न योगशाला म भेज कर आहार
म ऊजा, ोट न, वसा, ऐश, नमी, फाइबर आ द का व लेषण करवा ल।
11.3.1 दाने म आदता (मोइ चर) ात करना
यह दाने म उपि थत नमी को दशाता है ।
उपकरण - हॉट एयर ओवन, डेसीके टर, इलेि क तुला
133
व ध - मोइ चर ात करने हेतु एक सुखी साफ छोट पै डश
ल व इसे तौल ल(W) । इसके प चात इसम 10gm
दाना(M) (नमूना) ले एवं इसे ओवन म 100०
C पर 6
घ ट के लए रख द । इसके बाद इसे ओवन से
नकालकर डेसीके टर म ठ डा कर एवं तौल ल । (W2)
गणना -
मोइ चर % 1 2
100
W W
M

 
उ त उदाहरण म
1 2
1 2
100
10
10
W W
W W
 
  
इस कार दाने म नमी क तशत ात करने के बाद पे डश को डेसीके टर म ह रखी रहने
देते ह तथा आगे के सम त पैरामीटर (E.E.,CF,) आ द नकालने हेतु इस नमी र हत दाने
( ाई मेटर बे सस) का योग करते है ।
11.3.2 टोटल ऐश
आव यक रसायन - तनु हाइ ो लो रक अ ल – 5N (445ml सां हाइ ो लो रक ए सड)
(36%HCl) को 1 ल टर पानी म मलाये ।
आव यक उपकरण - ु सबल, मफलफरनस, हॉट एयर ओवन आ द
व ध - ु सबल म िजसको क 100o
C पर पहले छ:
घ टे के लये खाया गया हो और िजसका पूव म
तौल कर लया गया हो, म 5-10 gm से पल
लेकर तौल लया जाए । इसके प चात ु सबल
को ह क आँच पर गम करके मफल फरनस
(Muffle Furnance) म रख । इसम 600o
C
तापमान पर ु सबल को दो घ टे के लए रखे ।
इसके प चात बाहर नकालकर डे सके टर म रख
एवं इसका तौल कर ल ।
उदाहरण के लए -
* खाल व ो सल 39.120gm.
* ु सबल का वजन
* ु सबल + से पल का भार 44.120gm
* ाई मेटर से पल म % 92.38gm
* से पल का वजन DM के आधार पर
4.62gm
92.38 5
100
 
 
 
92.38 5
100
 
 
 
134
* ऐश + ु सबल का वजन 39.690gm
* ऐश का कु ल वजन 0.570gm.(39.690-39.12
0)
* से पल म कु ल ऐश का तशत ऐश का भार x100
से पल का वजन (DM Basis
पर)
0.570 100
12.337%
462


11.3.3 ए सड इनसो यूबल ऐश
टोटल ऐश नकालने के प चात ु सबल म 25ml तनु हाइ ो लो रक ए सड 5N का घोल
मलाकर 10 मनट के लए बनर पर गम कर । म ण को ठ डा करके वा समैन फ टर
पेपर पर छान ल । फ टरप को पानी से धोय, जब तक क वो पूणतया ए सड मु त न
हो जाये एवं अघुलनशील ऐश ( फ टर प पर से) को ु सबल म लेकर बजल च लत ओवन
म 135o
C  2o
C के लए 3 घ टे के लये रखे ।
त प चात् इसे मफलफरनस म (600o
C  20o
C) पर एक घ टे के लए रख । ठ डा होने
के प चात् ु सबल को नकाल कर डेसीके टर म रखे एवं तौल ल । पुन: ु सबल को मफल
फरनस म 30 मनट के लए रख, ठ डा कर, पुन: तौल ले, ऐसा तब तक कर, जब तक
क लगातार दो भार के बीच अंतर 1mg. से कम हो जाए । यूनतम भार को रकाड कर
ल ।
 2
1
100
%
W W
gm
W W



W - खाल ु सबल का भार
W1 - से पल व ु सबल का भार
W2 - ए सड इनसो यूबल ऐश + ु सबल का भार
11.3.4 ू ड ोट न
आहार म आव यकता से अ धक ोट न देने से प य म वसरल गाऊट होने क बल संभावना
होती है । काब नक पदाथ को स यू रक अ ल म गम करके उनम उपि थत नाइ ोजन वारा
या करने से अमो नयम स फे ट बनता है एवं डि टलेशन वारा अमो नया गैस नकलती
है, िजसको मानक ए सड (अ ल) के वलयन वारा टाइ ेशन से ात कया जाता है ।
आव यक उपकरण-
-
माइ ोजे डाज ऐपेरेटस यूरेट 500 म.ल . ला क
- राउ ड बोटम ला क, लेट बोटम ला क
135
रसायन
-
पोटे शयम स फे ट, कापर स फे ट, बो रक अ ल, सां
स फयू रक अ ल, N/10 स फयू रक अ त, सो डयम
हाइ ो साइड, ोमो सोल ीन, मथाइल रेड इं डके टर
व ध :-
(i) ए ल येट तैयार करना – 2 gm से पल (D) (D.M आधार पर) ल एवं 10 gm डाइजेशन
म सचर मलाये (1 gm CUSO4 + 2 gm K2SO4 = डाइजेशन म सचर) एवं 40
म.ल . सां स यू रक अ ल एक ल बी गदन के गोल पदे वाले ला क म ल एवं उसे सहारे
से तरछा रखते हु ए धीरे-धीरे गम कर । जब तक क झाग आना ब द हो जाये । त प चात्
उसे और अ धक गम कर एवं उबलने द । इसे लगभग 2 घ टे के लए म यम आँच पर उबलने
द । फर इसे ठ डा कर ल । इसके बाद इस डाइजे टेड म सचर को चपटे पदे वाले 250
म.ल . वाले ला क म थाना त रत कर एवं उसे 2-3 बार डि टल वाटर से धोकर धोवन
को भी मला द, उसम शु पानी मलाकर 250 मल . (B) कर ल ।
(ii) बो रक ए सड इं डके टर तैयार करना - 10 gm बो रक अ ल म 100ml. ए कोहल मलाये
एवं उसम पानी मलाकर 500ml. घोल बनाल ।
(iii) म सड इं डके टर - ोमो सोल ीन 0.33%, मथाइल रेड 0.66%, ए कोहल म मलाये
। इसक कु छ बूँदे बो रक ऐ सड इं डके टर क मलाऐं ।
(iv) अमो नया एक ीकरण – 100ml. ए ल येट (C) जे डा ज ला क म ल । उसम 10ml. 45%
सो डयम हाइ ो साइड मलाये । नकलने वाल अमो नया को 10ml. 2% बो रक अ ल के
घोल म सं हत कर ल । जे डाल उपकरण म इस कार डि टलेशन वारा तब तक अमो नया
एक करते रहे, जब तक 10ml. बो रक अ ल का आयतन तीन गुना न हो जाये एवं बो रक
अ ल वलयन का रंग नीला काला हो जाये ।
(v) टाइ ेशन - इस हेतु माइ ो यूरेट का योग कर एवं N/10 H2
SO4 के मानक वलयन को
यूरेट म ल । बो रक अ ल व एक त अमो नया को टाई ेट कर ल; तथा मानक वलयन
(टाईटर) का काम म आया आयतन (A) नोट कर लेव ।
(vi) गणना = कु ल नाइ ोजन तशत / कु ल नाइ ोजन का भार
= टाईटर का आयतन (A) x 0.0014 x ए ल वेट का बनाया गया आयतन(B) x 100
-------------------------------------------------------------------------------------------
ए ल वेट का अमो नया x नमूने का काम म लया भार (D) ( ाईमेटर आधार पर) उ पादन
हेतु काम म लया आयतन(C)
टाईटर का आयतन Ax
0.0014 250
100
10 2
ml
x


उ त उदाहरण अनुसार नमूने म नाइ ोजन का तशत - A x 1.75
C.P. ू ड ोट न - नमूने म नाइ ोजन तशत x 6.25
136
उ त उदाहरण अनुसार C.P - A x 1.75 x 6.25 = A x 10.94gm%
डि टलेशन पूण होने के बाद जे डाल ला क म से नमूने को नेगे टव ेशर बनाकर नवातन
के वारा खाल कया जाता है ।
13.3.5 फै ट क जाँच (ईथर-ए स े ट)
आहार म अ धक फै ट देने से कु कु ट म फै ट डीजनरेशन ऑफ लवर ए ड कडनी होना देखा गया
है ।
स ा त - नमूने म फै ट (वसा) का ता पय साधारण वसा, वसा अ ल ,
ए टर, ाकृ तक वसा, ट रो स तथा थूल फै ट (वसा म
घुलनशील वटा म स, A,O,E) से होता है । ये सभी
पे ो लयम ईथर (B.P.400
C-600
C) म घुलनशील होते है
। इनको सॉ सलेट उपकरण म पे ो लयम ईथर वारा
ए स े शन से ात कया जाता है ।
उपकरण - सॉ सलेट ए स े शन ऐसे बल
- हॉटमैन फ टर प नं. 1 ( थ बल बनाने हेतु)
-हॉट एयर ओवन
-डेसीके टर
-इले ॉ नक तुला
-हॉट लेट
-Temperature Bath with Temperature
controlling device.
रऐजे ट एवं रसायन व ध - पे ो लयम ईथर कै ि सयम लोराईड व ध हाटमैन फ टर प
को चौड़ी परखनल के नीचले भाग पर लपेट कर धागे से बाँध द । इसे खींच कर नकाल ल
। यह थ बल तैयार है । इसे नॉन एबसॉरबट ई का लग लगाकर बंद कर द । इसे तौल
ल । त प चात्इसम दो ाम नमूना ाईमेटर बे सस पर लेकर लग स हत पुन: तोल ल ।(W1)
इसे सॉ सलेट उपकरण म इस कार डाल क इसक ऊँ चाई उपकरण के साइफ नंग पांइट से
अ धक न हो । सॉ सलेट ऐसे बल को जोड़कर ला क को पे ो लयम इथर से भर द ।
सॉ सलेट उपकरण क मता से लगभग डेढ़ गुना सालवट ईथर उपकरण म उपर से क प
वारा भर । उपकरण को ताप नयं क बाय पर 50-600
C पर चालू कर द । फे ट ए स े शन
को लगभग आठ घ टे अथवा 250 च पूरे होने तक चलने द ।
इसके प चात थ बल को नकाल कर हवा म सुखा ले । पूणतया सूखने के बाद इसे हॉट एयर
ओवन म 1000
C पर 6 घ टा रख । बाहर नकाल कर इसे डेसीके टर म ठ डा कर ल । थ बल
को पुन: तौल ल । (W2)
गणना –W = W1 – W2
ू ड फै ट का तशत = 1 2
100
W W
M


137
उ त उदाहरण म= 1 2
1 2
100
50
W W
W W
M
 
  
W - 2 gm दाने म ू ड फै ट ( ाई मेटर आधार पर)
W1 - थ बल + लग + 2gm, दाना ाईमेटर आधार पर
W2 - थ बल + लग + फे ट ए स े शन के बाद दाना
M - ाईमेटर आधार पर उपयोग कये गये नमूने का भार
11.4 कु कु ट संबंधी सं थान एवं सं थाएं
आहार व लेषण योगशालाऐ (Feed Anatical Labs)
 पशु आहार वभाग, बहार पशु च क सा महा व यालय, पटना – 800 014
 पशु आहार वभाग, रांची पशु च क सा महा व यालय, कांके , रांची - 834 007
 पशु पालन वभागा य , इलाहाबाद कृ ष सं थान, पो ट कृ ष सं थान, इलाहाबाद- 211 007
 कृ ष संकाय, बनारस ह दु व व व यालय बनारस – 221 001
 प ी आहार संभाग, के य प ी अनुसंधान सं थान, इ जत नगर (उ. .) 243 122
 अ य , पशुपालन एवं डेयर वभाग, आजाद कृ ष व व व यालय, कानपुर – 208 002
 कु कु ट व ान वभाग, पशु च क सा महा व यालय, मथुरा
 कु कु ट व ान वभाग, पशु च क सा महा व यालय, बीकानेर
 पशु आहार वभाग, पशु च क सा महा व यालय, द ण स वल लाइव, जबलपुर - 482 001
 पशु आहार वभाग, पशु च क सा महा व यालय, महु 453 441
 देवल टे ट हाउस, राश नंग द तर भवन, 9 / 7 शि तनगर, देहल
 व तार वशेष , व तार नदेशालय, ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 123 004
 पशु च क सा वभाग, पंत कृ ष व व व यालय, पंतनगर- 263 145
 सहायक नदेशक (आहार), राज0 कु कु टशला, एम.ए.सी.ट . रोड, भोपाल- 462 003
 आहार वशेष कु कु ट आहार योगशाला, पंजाब सरकार, औ यो गक े , चंडीगढ़- 160
002
 कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला पशु च क सालय, अजमेर- 305 001
 कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला, पशु च क सालय, मोखापाड़ा, कोटा
 कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला, राज0 कु कु ट शाला, रातानाडा जोधपुर
 कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला, चेतक स कल, उदयपुर
 आहार वशेष , पशुधन अनुसंधान के , ब सी 303 301, िजला - जयपुर ।
 के य कु कु टशाला, उ. . सरकार, चक गंजा रया लखनऊ, 226 007
 पशु आहार वभाग पंजाब कृ ष व व व यालय, लु धयाना 141 004
 ीराम टे ट हाउस, 19, यू नव सट माग, देहल - 110 007
138
 आहार व लेषण योगशाला, पंजाब सरकार, राज0 कु कु टशाला, लाडोवाल रोड, जलंधर
 ोगे सव पो फामस एसो सयेशन, SCF 9/10, सै टर 19-C, चंडीगढ़, 160 019
 े ीय आहार व लेषण योगशाला, इ डि यल ए रया, चंडीगढ़- 160 019
 उ टा लेबोरे ज ा. ल. आ टा भवन, बापट माग, ब बई – 400 028
 पशु पौि टक अनुसंधान योगशाला, आरे कालोनी, ब बई- 400 065
 ब बई पशु च क सा महा व यालय, क कण कृ ष व यापीठ, परेल ब बई, 400 012
 कु कु ट आहार पर ण योगशाला, गुजरात सरकार, वैटकॉल क पाउंड, आन द- 388 001
 महारा राजक य आहार व लेषण योगशाला वारा ऊन अनुसंधान के , भेड़ जनन फाम,
गोखले नगर, पुणे- 411 016
 गुजरात कृ ष व व व यालय, आन द कै पस, आन द’ 388 110, िजला खेडा
 इटालेब ा. ल मेहरा हाऊस, 15 कवासजी पटेल ., ब बई- 400 001
 कल कर क स टे टस ल., 917/19-A, शवाजी नगर, पुणे- 411 004
 कु कु ट अनुसंधान के ल., नातको तर सं थान, पंजाबराव कृ ष व यापीठ, आकोला
 े ीय आहार व लेषण योगशाला, के य कु कु ट जनन फाम आरे म क
कॉलोनी,ब बई-400 065
 आं देश रा य मांस एवं कु कु ट वकास नगम ल., शां तनगर, हैदराबाद- 500 028
 के य खा य तकनीक अनुसंधान सं थान, चेलुब बा मे शन, मैसूर- 570 013
 के य कु कु ट श ण सं थान, हसरग ा बगलौर- 56008
 म ास पशु च क सा महा व यालय, वैपेर म ास- 600 007
 कृ ष व ान महा व यालय- हैबल, पो. बैग नं. बगलोर - 560024
 इटातेब ा. ल माक टाइल भवन, 10 लाल बाजार ट, कलक ता- 700 001
 उड़ीसा कृ ष एवं तकनीक व व व यालय, भुवने वर- 751003
 े ीय आहार व लेषण योगशाला, भारत सरकार, वारा स ल पो ी डंग फाम, भुवने वर-
751 013 (उड़ीसा)
(इि डयन पो इ ड इयर बुक से साभार)
वै सीन उ पादन सं थान (Vety Biological Units)
 पशु जै वक एवं अनुसंधान प रष , शाि त नगर, हैदराबाद- 500 028
 पशु वा य एवं उ पादन सं थान, पटना- 800 014
 पशु ट का सं थान, तालाब के पास, सै टर-28, गांधीनगर, 382 028 गुजरात
 ह रयाणा पशु च क सा ट का सं थान, हसार, 125 004
 जै वक उ पादन संभाग, आर.एस.पुरा, ज मू- 181 102
 जै वक उ पादन सं थान, रसतपुरा मऊ- 453 446, म य देश
 भारतीय ए ो इ ड ज फाउ डेशन याह नगर, पुणे-नगर रोड के सामने, वाँघोल , पुणे-412
207
139
 पशु च क सा जै वक उ पादन सं थान, गणेश खंड औ ध पुणे- 41107
 ीनी जै वक योगशाला ा. ल. 13 / 6 माइल टोन, पा शेटरोड ो.आ. ग रनगर पुणे- 411
025
 उड़ीसा जै वक उ पादन सं थान, भुवने वर- 751 003
 पंजाब पशु च क सा ट का सं थान, पंजाब कृ ष व व व यालय, लु धयाना 141 004
 े ीय पशु च क सा जै वक इकाई, यू कॉलोनी, जयपुर- 302 001
 जै वक उ पादन संभाग, पशुपालन वभाग, बादशाह बाग, लखनऊ-226 007
 बायोमैड ा. ल. के वी-27, पुराना क वनगर, गािजयाबाद-21002
 भारतीय पशु च क सा अनुसंधान प रषद, इ जतनगर / मु ते वर (नैनीताल)
(इि डयन पोनी इ ड इयर बुक से साभार)
वेल जनन फाम (Quail Breeding Farms)
 के य प ी अनुसंधान सं थान, इ जतनगर- 243 122
 के य पो ी डंग फाम, औ यो गक े , च डीगढ़- 16002
 ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 125 004
 कृ ष व ान व व व यालय, हैबल, बगलोर- 560024
 टक ी डंग फाम (turkey Breeding Farms)
 ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 125004
 कृ ष व व व यालय, उदयपुर- 313001
डक जनन शाला (duck Breeding Farms)
 आं देश मीट एवं पो डेवलेपमे ट काप . डक ए सटशन से टर, कै कालुर- 521 333
 बरसा कृ ष व व व यालय, कांके , रांची- 834007
 के य डक जनन फाम- आसाम रा य, का लयाबोर, नोवगांग िजला । सलकोर सलचर,
हाजो तथा सबसागर म भी खाक कै पबेल डक उपल ध है ।
 के य डक जनन शाला, हैसरघ ा, बगलौर- 560088
 राजक य डक ी डंग फाम, बहार रा य, सुपोल िज0 सहरसा
 राजक य डक ी डंग फाम, ज मू एवं क मीर रा य, सु बल, सोनावाडी खाक , कै पुबैल,
हाइट पे कन
 के रला रा य डकफाम, नरानाम- 689621, अ लेपी, के रला
 उड़ीसा रा य डक फाम खापु रया, कटक- 753010
 ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 125004
 कृ ष व व व यालय, उदयपुर - 313001
(इं डयन पो इंड इयर बुक से साभार)
 रोग अनुसंधान के (Disease Diagnostic Centres)
 पशु च क सालय, मोतीबाग- 1, नई द ल - 110021
140
 पशु च क सा महा व यालय, हसार- 125 004
 रोग नदान योगशाला, हसार, अ बाला गुडगांव, करनाल, रोहतक (ह रयाणा कृ ष
व व व यालय)
 कै ग फाम ा. ल., एम-49 डी.एल.एफ. कालोनी, गुडगांव
 पशु च क सालय, सोनीपत- 131 001
 े ीय कु कु ट शाला, कमलाह शमला- 171004
 ज मू एवं क मीर रा य - डोडा, ज मू कथुआ, पूंछ, राजौर , उधमपुर, अन तनाग, बडगाम.
बरामुला, कार गल, कु पवाड़ा, लेह, पुलवामा
 शेरेक मीर कृ ष व व व यालय, नौशैरा ीनगर – 190 011
 पशु च क सा महा व यालय, द ण स वल लाइन, जबलपुर
 रोग नदान सं थान, म. . शासन, जहांगीराबाद, भोपाल
 पशु च क सा महा व यालय, महू- 453441
 पंजाब रा य कु कु टशाला, लाडोवाल रोड, जलंधर
 डॉ. चावला, 641 गु देव नगर, पखोवाल रोड, लु धयाना
 गेटवैल योगशाला, 248 सै टर 35-A चंडीगढ़
 नाथन हैचर च सरभा नगर, लु धयाना
 पंजाब कृ ष व व व यालय, लु धयाना
 पशु च क सा महा व यालय, बीकानेर- 334001
 कु कु ट रोग नैदा नक योगशालाएं -अजमेर, कोटा, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर (राज0)
 कृ ष व व व यालय, जोबनेर – 303 327
 इलाहबाद कृ ष सं थान, पो ट कृ ष सं थान, इलाहबाद -7
 पशु च क सा महा व यालय, पंतनगर- 263145
 पशुपालन वभाग, उ. . रोग नदान योगशाला, गोकरण नाथ रोड, बादशाह बाग,
लखनऊ-226006
 भारतीय पशु च क सा सं थान, इ जतनगर- 243122
 कु कु ट रोग नदान के , गुजरात रा य, अहमदाबाद, जूनागढ़, नवसार , सूरत पशु च क सा
महा व यालय, आन द- 388001
 महारा रा य रोग नदान योगशाला, अकोला, ओरंगाबाद, ब बई, चपलुन, को हापुर,
नागपुर, ना सक
 वै टे वरा हैचर ज 13 / 6 मील, पा शट रोड, पुणे-25
 पशु च क सा महा व यालय, पटना- 8000014
 रोग नदान योगशाला, चप लमा- 768 026
 उड़ीसा
(इि डयन पो इ ड से साभार)
141
11.5 सारांश
कु कु ट यवसाय म रोग नदान अ य त मह वपूण वषय है, य क कु कु ट के संबंध म
रोग का सार अ त ती व पूरे लॉक को चपेट म ले लेने वाला होता है । इसके अ त र त
रोग फै लने पर उपचार के वल रोगी प ी का न होकर रोग क संभावना को देखते हु ए पूरे के
पूरे लॉक या समूह का कया जाता है, जो आ थक ि ट से यवसाय पर बोझ बन जाता
है । व भ न सं ामक रोग के नदान से प ी का सह उपचार तो कया ह जा सकता है,
बि क े म होने वाले सामा य सं मण का अंदाजा भी लगाया जा सकता है, िजससे भ व य
म पाले जाने वाले कु कु ट का सं मण के व ट काकरण कया जा सके ।
कु कु ट पालन म लागत का लगभग 60% से 70% धन आहार पर ह खच होता है । अत:
संतु लत आहार देकर लागत को कु छ कम कया जा सकता है । इसके अ त र त य द व भ न
पोषक त व / मनरल / वटा मन आ द कम / अ धक दये जाये तो कु कु ट वा य एवं
उ पादन पर ाय: वपर त भाव डालते है । अत: िजससे संतु लत आहार का दया जाना और
भी ज र हो जाता है ।
142
इकाई : कु कट पालन म योग म ल जाने वाल व भ न
औष धयाँ एवं उनक फामकोलोिजकल व लेषण
इकाई – 12
12.0 उ े य
12.1 तावना
12.2 मु गय म काम आने वाल औष धयां
12.2.1 ए ट बायो ट स ( तजै वक)
12.2.2 स फोनेमाइ स
12.2. लोरो योनोल एवंम अ य ए ट बायो ट स
12.2.4 ए ट को सी डयलस
12.2.5 कृ मी नाशक औष धयाँ (आ तर क परजीवी के लये औष धयाँ)
12.2.6 बा य परजीवी के लए औष धयाँ
12.2.7 तनावनाशक औष धयाँ
12.3 सारांश
12.0 उ ेशय :-
कु कु ट पालन यवसाय म लाभ म कमी का एक मुख कारण है व भ न रोगो से मु गय
क मृ यु । उ चत समय पर रोग क पहचान कर आव यक उपचार करने से बीमा रय पर
नयं ण कया जा सकता है । मु गयां भी जीवाणु वषाणु परजीवी, ऋतुओं म बदलाव, ेस
तनाव) तथा आहार इ या द कारण से बीमार पड़ जाती है तथा मृ यु भी हो जाती है । मु गय
को बचाने के व भ न औष धय का योग कया जाता है । औष धय को काम लेने से पूव
हम उनक उपयो गता, योग मा ा तथा उपल धता के बारे म पूर जानकार होनी चा हये
। मुग पालक को कसी भी दवा का योग करते समय पशु च क सक क देखरेख म नमाता
वारा दये गये नदश का पालन अव यक कर ।
12.1 तावना :-
मुग पालन के यवसाय म आज भारत का व व म पांचवा थान है । कं तु यवसाय से
होने वाल आय का एक बड़ा ह सा रोग व उपचार पर यय हो जाता है । मु गय को सामू हक
143
र त से रखा जाता है । उनका खान-पान एक ह जगह पर होता है । इस ि थ त म ादुभाव
हो जाए तो उसका सार तुरंत होता है ।
मु गय म अनेक तरह क बीमा रयाँ होती है तथा मृ यु दर भी बहु त होती है । कु छ बीमा रय
म मृ यु नह ं होती पर वृ क जाती है तथा भार म कमी आ जाती है ।
मु गय म मृ यु दर पांच तशत से अ धक नह ं होनी चा हये । इस लये मृ यु दर पर नयं ण
रखना आव यक है । मु गय को लाते समय यातायात के कारण उन पर जो तनाव आता है
उसके कारण वे बीमा रय के शकारबनते है । इस लये उ ह तनाव नाशक दवा द जाती है
। आ त रक व बा य परजीवी के कारण मु गय का उ पादन तर या शार रक वकास क
जाता है I
कै ि शयम, फा फोरस, मैगनीज, िजंक सेले नयम और जीवनस व ए, बी1, बी2, बी12, डी3
पया त मा ा म न मलने के कारण कु पोषण के शकार हो जाते है । कु पोषण भी बीमार और
मृ यु का कारण हो सकता है । बीमा रय के अनुसार औष ध देनी चा हये । औष ध पानी या
दाने म मलाते समय इस बात का यान रखे क आपके पास कतने चूजे या मु गयाँ है तथा
उनको कतने पानी या दाने क आव यकता होती है । उसी के अनुसार दवा पानी या दाने
म मलाव।
12.2 मु गय म कम आने वाल औष धयाँ
12.2.1 ए ट बायो ट स ( तजै वक)
सू म जीव ज तुओं जैसे ई ट, मो ड इ या द वारा उ पा दत रसाय नक पदाथ शर र म या त
इ फे शन को आगे बढने म रोकने म सहायक होते ह या रोग के उपचार म सहायक होते
है । जीवाणु ज नत रोग के बचाव तथा उपचार हेतु एंवम वषाणु ज नत रोग हो जाने पर
वतीयक जीवाण क रोकथाम के लय ए ट बायो ट स का उपयोग कया जाता है । सु म
मा ा म ए ट बायो ट स का उपयोग मु गय म शार रक वृ तथा आहार उपभोग क मता
बढाने हेतु उपयोग म लया जाता है । एंट बायो ट स वलय काब नक पदाथ का समूह है
ए ट बायो ट स म त आहार खलाने से मु गय क आत म पोषक पदाथ का सं ले षत करने
वाले सू म जीव क सं या व याशीलता म वृ होती है । मु गय को समूह म पाला जाता
है तथा इनका इलाज भी समूह म कया जाता है । मु गय म न न ल खत ए ट बायो ट स
का योग कया जाता है । अगर दवा पानी या दान म मलाकर द जाती है तो उस दौरान
दवा यु त पीने का ह पानी तथा दवा यु त दाना ह देव ।
1. इर थरोमाइसीन थायोसाईनेट (Erythromycin thiocinate) - एक ाम पाउडर म 50
मल ाम दवा होती है ।
उपयोग:- वास स ब धी बीमार या जैसे ा नक रे पीरेटर डीिजज (Chronic respiratory
disease, CRD), इके सीयस कोराइज (Infectious coryza), ब यु को ब
(Blue comb), इ फे शीयस साइनुसाइ टस (Infectious sinusitis) तथा ेस
(तनाव) इ या द के बचाव व इलाज हेतु ।
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योग मा ा :- बचाव हेतु - 1 ाम दवा का पाउडर को एक ल टर पानी म घोल कर देवे ।
यह दवा 3-5 दन तक देते है । हमेशा दवा के ताजा घोल का योग कर ।
इलाज हेतु - 4 ाम दवा का पाउडर एक ल टर पानी म घोलकर रोजाना 3-5 दन तक देव।
उपल धता - 100 ाम के पैके ट
2. जे टा मसीन स फे ट इ जे सन - एक मल ल टर म 40 मल ाम दवा होती है ।
उपयोग :- इस दवा का उपयोग एक दन के चूज म ारि भक मृ यु दर कम करने के लये
कया जाता है । इसके अलावा सी.आर.डी., वंग रोट बीमा रय म उपयोग कया
जाता है । िजन अ ड से चूजे ा त करने हो उन अ ड को इस दवा म पहले भगोया
जाता है ।
योग मा ा :- पांच मल ल टर दवा को 495 मल ल टर पानी (Distilled water) मलाकर एक
दन के म आधा मल ल टर दवा मांस पे शय म द जाती है । मु गय म 2-5
मल ाम दवा द जाती है । अ ड को सेने से पहले दवा का घोल बनाकर 10 सैक ड
तक डुबोकर रखा जाता है । 1000 अ ड को भगोने के लये 7 मल ल टर दवा
493 मल ल टर पानी म डाले ।
उपल धता - यह दवा 30 मल ल टर क पे कं ग म मलती है तथा एक मल ल टर दवा म 40
मल ाम दवा क मा ा होती है ।
3. अमो सी सल न ाइहा ैट (Amoxycillin) 50% W/W
उपयोग :- इस दवा का उपयोग जीवाणु ज नत बीमा रयाँ जैसे – को लसे ट सीमीया, फाऊल कोलेरा
इ फे शीयस कोराइजा फाऊल टाईफाइड, पुलोरम रोग, वंग रोट रोग तथा ने ो टक
एं ाइ टस इ या द रोग के उपचार के लये कया जाता है ।
योग मा ा:- 40 मल ाम दवा त कलो भार पर द जाती है । एक ाम दवा को 1 ल टर
पानी म घोलकर रोजाना 5 दन तक दवा यु त पानी देव ।
उपल धता :- 50 ाम पैके ट
4. अपरामाइ सन स फे ट (Apramycin sulfate)
उपयोग :- इस दवा का योग ई कोलाई, सालमोनेला, कलेब स ला तथा ो टयस नामक जीवाणु
से ह ने वाल बीमा रय म कया जाता है ।
योग मा ा :- 20-40 मल ाम त कलो ाम शर र भार पर दवा का योग पीने के पानी म
3-5 दन तक करना चा हये ।
उपल धता:- 30 ाम, 100 ाम तथा 50 ाम के पैके ट म ।
5. लोरमफे नीकाल (Chloramphenicol 20% W/W)
उपयोग :- इस दवा का उपयोग जीवाणु से होने वाले द त, आत के रोग जैसे द त लगना इ या द
म काम लया जाता है ।
योगमा ा :- 20 ाम त ि वंटल मु गय के दाने म मलाकर दया जाता है ।
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उपल धता :- 200 ाम, 500 ाम पैके ट म
6. डो सीसाइ ल न हा ो लोराइड (Doxycycline HCL 100 mg/g)
उपयोग :- ाम नेगे टव जीवाणु तथा माइको लाजमा तथा ाम पोजी टव तथा रके ट सया नामक
जीवाणु से होने वाले रोग म बचाव व इलाज हेतु इस दवा का योग कया जाता है।
योग मा ा :- महामार के प म बीमार होने पर प हले दन 10 ाम पाउडर को 20 ल टर पानी
म घोल कर दया जाता है । तथा दूसरे दन से 5 दन तक 10 ाम पाउडर को 40
ल टर पानी म घोल कर दया जाता है । चूज म मृ यु दर को रोकने के लए 10 ाम
दवा को 80 ल टर पानी म घोल कर पहले 3-4 दन तक दया जाता है तथा 1 मह ने
क आयु म 4-6 दन तक दया जाता है ेस म इस दवा का योग कया जाता है
। 10 ाम दवा को 40 ल टर पानी म घोलकर देव ।
उपल धता :- 10 ाम, 50 ाम तथा 250 ाम पैके ट
7. सेफाले सीन - (Cephalexin 7.5% W/W)
उपयोग :- जीवाणु ज नत रोग से बचाव व इलाज के लये इस दवा का योग कया जाता है ।
योग मा ा :- बचाव हेतु - 20 ाम दवा 3000 चूज को 3-5 दन तक द जाती है । ोवर तथा
लेयर मु गय म 20 ाम दवा 250 मु गय के लये 3-5 दन तक द जाती है । इलाज
हेतु - यह दवा चूज म 20 ाम 1500 चुज म 3-5 दन तक द जाती है । ोवर
तथा लेयर मु गय म 20 ाम दवा 100 मु गय म 3-5 दन तक द जाती है ।
उपल धता - 20 ाम तथा 200 ाम पैके ट म ।
8. कलोर टासाइकल न (Chlortetracycline 5.5% W/W)
उपयोग - यह दवा साइनोसाइ टस ब यूको ब तथा जीवाणु ज नत रोग से बचाव व इलाज हेतु
काम आती है। योग मा ा - ो नक रे पीरेटर डीिजज के बचाव हेतु 30 ाम दवा
10 ल टर पानी म घोलकर दवा यु त पानी ह दया जाता है तथा रोग होने पर इलाज
हेतु 60 - 120 ाम दवा को 10 लटर पानी म घोलकर दवा यु त पानी पीने को दया
जाता है । चूज म ारि भक मृ युदर रोकने हेतु 60 ाम दवा 10 ल टर पानी म घोलकर
दो स ताह तक द जाती है तथा बाद म 30 ाम दवा 10 ल टर पानी म घोलकर लगातार
द जाती है ।
उपल धता :- 100 ाम तथा 1 कलो के पैके ट
9. कोल सट न स फे ट (Colistin sulphate) % & 100mg/g (0.1% W/W)
उपयोग :- ाम नेगे टव जीवाणुओं से होने वाले रोग के बचाव व उपचार हेतु, भार बढाने तथा
चूज म मृ यु दर कम करने हेतु ।
योग मा ा :- बचाव हेतु :- 50 ाम दवा त टन मु गय के दाने म मलाकर देव ।
इलाज हेतु :- 200 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर 20 दन तक देव या 2 ाम दवा 15 ल टर
म मलाकर 75-100 मु गय को 5 दन तक देव ।
शार रक वृ / भार बढाने हेतु - 50 ाम त टन दान म मलाकर चूज को देव ।
उपल धता :- 200 ाम पैके ट
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10. डो सीसाइ ल न (Doxycycline) 2.5% W/W :-
उपयोग :- चूज म ारि भक मृ यु रोकने हेतु, इ फे ि सयस कोरायजा, कोल से ट समीया, बेसीलर
हाइट डाय रया, सी.आर.डी रोग म
योग मा ा:-
बचाव हेतु :- 1 ाम दवा 2 ल टर पानी म घोलकर 5 दन तक देव ।
इलाज हेतु :- 2 ाम दवा 1 ल टर पानी म घोलकर पहले दन देव । अगले पांच दन व ाम
दवा व ल टर पानी म घोल कर पांच दन तक देव ।
ेस म - तनाव म 1 ाम दवा 1 ल टर पानी म 5 दन तक देव ।
उपल धता :- 50 ाम पैके ट म ।
11. टाइमूट न (Tiamutin 45%)
उपयोग :- मु गय म माइको लाजमा वारा सं मण के बचाव व इलाज हेतु ।
योग मा ा:- पहले स ताह - 1000 चूज के लए 5 ाम दवा 20 ल टर पानी म घोल कर तीन
दन तक देव ।
चौथे स ताह- 27.5 ाम दवा 60 ल टर पानी म घोलकर देव ।
छटे स ताह - 35 ाम दवा 60 ल टर पानी म घोल कर देव ।
नव स ताह - 506 ाम दवा 110 ल टर पानी म घोल कर देव ।
उपल धता - 30 ाम के पैके ट म ।
12. नयोमाइसीन स फे ट (25%) Neomycin sulphate
उपयोग :- ायलर तथा लेयर मु गय म ारि भक मृ यु दर रोकने, द त रोकने हेतु तथा द गई
खुराक को ज द मांस म तबद ल करना (better feed conversion) आहार उपभोग
क मता बढाने के लये
योग मा ा:- एक दन के ओ से 5 स ताह के चूज के लए - 1 ाम दवा 5-7 ल टर पानी म घोल
कर रोजाना देव । Breeders( डस) - एक ाम दवा 2-3 ल टर पानी म देव । दवा
का घोल हर रोज साफ पानी म बनाय।
उपल धता :- 50 ाम पैके ट
13. टे ासाई ल न पाउडर-200 मल ाम येक 4 ाम पाउडर म
उपयोग :- यह दवा चूजो म ारि भक मृ यु दर रोकने, फाउल टाईफाइड, फाउल कोलेरा ई कोलाई
इ फे ि शयस कोराइजा रोग म आंत तथा सांस क बीमा रय म सी.आर.डी तथा
माइको लाजमो सस रोग म उपयोग म ल जाती है ।
योग मा ा - 50 मल ाम त एक कलोभार 5-7 दन के लये द जाती है ।
उपल धता - 250 ाम के पैके ट म ।
14. टाईलो सन (Tylosin as tartrate) - 5 ाम त 10 ाम पाउडर
उपयोग :- यह दवा स.आर.डी रोग म तथा माइको लाजमा गे लसे ट कज तथा माइको लाजमा
साइनोवी नामक जीवाणु से होने वाले रोग म काम आती है ।
योगमा ा :- 220 मल ाम त कलो भार पर पीने के पानी म द जाती है ।
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इलाज हेतु - ायलर तथा लेयर मु गय म 500 मल ाम दवा एक ल टर पानी म घोल सुबह
तथा इतनी ह दवा शाम को द जानी चा हये । यह दवा तीन दन तक द जाती है ।
उपल धता :- 30 ाम, 100 ाम, 500 ाम तथा 5 कलो ाम पैके ट म ।
15. ल कोमाइसीन हा ो लोराइड (Lincomycin hel) - 8 ाम त एक कलो
उपयोग :- ायलर तथा लेयर मु गयो म ने ो टक ए ाइ टस(1Necrotic entrities) नामक
बीमार के बचाव एंवम इलाज हेतु योग कया जाता है ।
योग मा ा :- बचाव हेतु - 750 - 1000 ाम त टन दाने म मलाकर मु गय को तीन दन तक
दया जाता है ।
इलाज हेतु – 2.5 कलो दवा त टन दाने म मलाकर तीन दन तक दया जाना चा हये ।
उपल धता - 1 कलो ाम के पैके ट म ।
16. ए पी सल न ाइहाइ ेट (Amplcillin trihydrate)
उपयोग:- मु गय म जीवाणु से होने वाले रोग जैसे लो डीयल ए ाइ टस (Clostridail
entertis) ई कोलाई एं ाइ टस (E. Coli enteritis) सालमोनीला ए ाइ टस
(salmonella enteritis), शीगेला ए ाइ टस (Shigella enteritis), कोराईजा
(Coryza) एंव फाउल कोलेरा (Fowl cholera)
योग मा ा :- एक स ताह क उ के 3000 चूज के लए 100 ाम पाउडर को 165 ल टर पानी
म घोलकर देव ।
दो स ताह क उ के 1400 चूज के लये 100 ाम पाउडर 165 ल टर पानी म घोलकर
देव । तीन स ताह क उस के 880 चूज के लए 100 ाम पाउडर 165 ल टर पानी
म घोलकर देव । चार स ताह क उ के 670 चूज के लए 100 ाम पाउडर 165
ल टर पानी म घोलकर देव । इलाज 3-5 दन तक कर । पानी म दवा घोलने के बाद
7 दन के अ दर उपयोग कर ।
उपल धता - 100 ाम तथा 500 ाम पैके ट म ।
12.2.2 स फोनेमाइडस (Sulphonemides)
स फोनेमाइडस दवा भी व भ न कार के जीवाणु से होने वाले रोग म उपयोग ल जाती है
। यह बे ट र यो टे टक है। यानी जीवाणु का म ट पलाई करने से रोकती है । स कोनेमाइडस
दवा म अ धकतर स काडाईजीन, स फा लोर यार डेजोन तथा स कामीथेजोल, ाईमेथोपर म
(Triomethoprim) के साथ उपयोग मे ल जाती है।
1. स फाडाईजीन 10% एंवम ाइमेथोपर म 2% W/W
उपयोग :- इस दवा का म ण कोल बेसीलो सस(Colibacillosis)] इन सीयस कोराइजा
(Infectious coryza), बेसीलर लाइट डायी रया (Bacillary white
diarrhea)] सालमोनेलो सस(Salmonellosis) आ द जीवाणु ज नत रोग म
उपयोग होता है ।
योग मा ा :- 20 ाम दवा को 20 ल टर पानी म घोलकर रोजाना 100 मु गय को 3-5
दन तक दया जाता है ।
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उपल धता - 100 ाम पैके ट
12.2.3 लोरो योनोलो स एवं अ य एं टबे ट रयल दबा (Fluoroquinolones and other
antibacterial)
1. यूरालटोडोन (Furaltadone) 20% W/W
उपयोग - सालमोनेलो सस पुलोरम फाउल टाइफाइड सी.आर.डी, इ फे स सयस
साईनोसाइट स, ह टोमोनीय सस नामक रोग म उपयोग म ल जाती है ।
योग मा ा - चूज म 5 ाम दवा एक ल टर पानी म घोलकर 7-10 दन तक देते है ।
उपल धता :- 30 ाम पैके ट
2. स ो लो सासीन हाइ ो लोराइड (Ciprofloxacin hcl 10 %)
उपयोग :- जीवाणु ज नत रोग जैसे सालमोनेलो सस कोल बेसीलो सस फाउल कोलेरा सी.आर.डी
इ या द म इलाज हेतु उपयोग कया जाता है ।
योग मा ा :-10 मल ाम त कलो शर र भार पर त दन 5-7 दन तक दया जाता
है ।
उपल धता :- 100 ाम, 250 ाम पैके ट म ।
3. एनरो लो सा सन (Enrofloxacin) 100 मल ाम त मल ल टर
उपयोग :- कोल बे सलो सस, इ फे ि शयस कोरायजा, पा चुरेलो सस, सालमोनेलो सस फाउल
टाइफाइड फाउल कोलेरा नामक बीमार य के इलाज व बचाव हेतु ।
योग मा ा:- 50 मल ल टर दवा को 100 ल टर पानी म घोल कर 3-5 दन तक के वल दवा
यु त पानी देव ।
उपल धता :- 100 तथा 500 मल ल टर
4. एनरो लो से सन का घोल - (Enrofloxacin 10% W/V oral solutions)
उपयोग :- माइको लाजमा तथा िजवाणु ज नत रोग के बचाव व इलाज हेतु ।
योग मा ा:- बचाव हेतु :- 2.5 से 50 मल ाम त कलो शर र भार पर यानी 1 मल ल टर
दवा 4-8 ल टर पानी म डालकर 3-5 दन तक देव ।
इलाज हेतु :- 10 मल ाम त कलो शर र भार पर यानी 1 मल ल टर दवा 2 ल टर पानी
म घोलकर 3-5 दन तक देव ।
उपल धता - 500 मल ल टर पैक म ।
5. युराजोल डोन 5% मे थयोनीन के साथ (Furazolidone 5% with methionine)
उपयोग :- चूज म ारि भक मृ यु दर रोकने हेतु तथा जीवाणु ज नत रोग को रोकने हेतु
योग मा ा :- 8 कलो पाउडर को एक टन दाने म मलाकर दस दन तक देव ।
उपल धता :- 10 कलो पैक म ।
6. युरालटाडोन हा ो लोराइड (Fluraltadone hcl 20% W/W)
उपयोग :- जीवाणु ज नत रोग के उपचार हेतु
योग मा ा:- 1 ाम दवा एक ल टर पानी म घोल कर 10 दन तक देव ।
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उपल धता :- 30 ाम पैके ट म ।
7. लोरहाइ ो सी यूनोलाइन (Chlorhydroxy quinoline 3% W/W)
उपयोग :- ाम पोजी टव तथा ाम नेगे टव जीवाणु ज नत, फं गाई तथा ोटोजोआ से होने
वाले रोग म
योग मा ा:- ायलर चूज के लये (1 दन से 3 स ताह तक) 2 कलो त दन दाने म
मलाकर देव । (4 से 8 स ताह तक) एक कलो तटन दाने म मलाकर देव।
उपल धता :- एक कलो के पैक म ।
12.2.4 ए ट को सीडीयलस (Anticoccidials)
1. ड नटोलमाइड 25% W/W (Dinitolmide)
उपयोग :- यह सभी तरह के को सी डया को नाश करती है जो को सी डयो सस नामक बीमार
करते है । सभी तरह के का सी डयो सस के इलाज हेतु इस दवा का योग होता
है ।
योग मा ा - 500 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर 3-5 दन तक देव ।
उपल धता :- 1 कलो ाम व 25 कलो ाम पैके ट
2. ए ो लयम हाइ ो लोराइड 20% ओर युरालटाडोन 20% (Amprolium hcl 20% and
Furaltadone 20%)
उपयोग :- इस म त दवा का योग का सीडीया परोपजीवी तथा जीवाणु से होने वाले रोग
के बचाव व इलाज हेतु कया जाता है ।
बचाव हेतु :- 30 ाम पाउडर को 100 ल टर पानी म घोलकर 5-7 दन तक दया जाता है।
इलाज हेतु - 30 ाम पाउडर को 50 ल टर पानी म घोलकर 5-7 दन तक दया जाता है।
उपल धता :- 30 ाम पैक म ।
3. ए ो लयम हाइ ो लोराइड 20% पाउडर (Amprolium hydrochloride 20%)
उपयोग :- का सी डयो सस रोग के इलाज हेतु
योगमा ा :- 30 ाम पाउडर को 25 ल टर पानी म घोलकर 5-7 दन तक दया जाता है
। इलाज के दौरान दवा यु त ह पीने का पानी देना चा हए हमेशा दवा का ताजा
घोल बनाकर देना चा हए ।
उपल धता :- 30 ाम पैक म ।
4. ना ोफु राजोन 100 मल ाम तथा युराजोल डोन 14.5 मल ाम को गोल
(Nitropfurazone 100 mg, Furazolidone 14.5 mg per Tablet)
उपयोग :- मु गय म को सी डयो सस रोग के इलाज हेतु
योग मा ा:- रोजाना एक गोल एक ल टर पानी म घोलकर सात दन तक देव ।
उपल धता :- 50 गोल का पैके ट
5. का ीनाल (Codrinal powder)
उपयोग :- का सी डयो सस रोग के बचाव व इलाज हेतु इस पाउडर का योग कया जाता
है ।
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योगमा ा :- इलाज हेतु 4 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर 2-4 दन तक दया
जाता है ।
बचाव हेतु :- 1 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर 2-4 दन तक देव ।
उपल धता :- 100 ाम पाउडर का पैके ट
6. स फा लोरपाईरेजीन सो डयम - 30 ाम त 100 ाम पाउडर (Sulphachlor
pyrazine sodium 30 g per 100 g)
उपयोग - मु गय म का सी डयो सस रोग के इलाज हेतु ।
योग मा ा:- रोजाना 1 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर 3 दन तक देव ।
उपल धता :- 100 ाम पैके ट
7. स फा योनो सेल न सो डयम (Sulfaquinoxaline sodium) (7.5 ाम त 30 ाम
पाउडर म)
उपयोग :- का सी डयो सस रोग के इलाज हेतु
योग मा ा:- 1 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोल कर 3 दन तक देव ।
उपल धता - 30 ाम पैके ट
8. लोपीडोल (Clopidol 25 g per 100 g) 25 ाम त 100 ाम
उपयोग :- को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु
योग मा ा :- 500 ाम पाउडर को तटन दाने म मलाकर देवे । एक दन क आयु से
बेचे जाने से 3 दन पहले तक देव ।
उपल धता :- 1 कलो ाम तथा 50 कलो ाम के बैग म
9. लासालो सड सोडीयम 15% (Lasalocid sodium 15%)
उपयोग :- का सी डयो सस रोग से बचाव हेतु
योगमा ा :- 600 ाम पाउडर को एक टन दाने म मलाकर देवे ।
उपल धता :- 600 ाम पैके ट म ।
10. साल नोमाइ सन 6% (Salinomycin 6%)
उपयोग :- ायलर ओ म को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु
योग मा ा:- 1 कलो ाम दवा को एक टन दाने म मलाकर एक दन क आयु से बेचे जाने
तक देव ।
उपल धता :- 5 कलो ाम बैग म ।
11. डाइनोइ ो-ओथ टूलामाइड 25% W/W (Dinitro-ortho-Toluamide)
उपयोग :- मु गय म को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु ।
योग मा ा:- 500 ाम तटन दाने म मलाकर देवे ।
उपल धता :- 5 कलो ाम का जार
12. मादुरामाइ सन अमो नयम 1% (Maduramicin ammonium)
उपयोग :- को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु
योग मा ा:- 500 ाम दवा को एक टन दाने म मलाकर देव ।
उपल धता :- 5 कलो एवं 25 कलो के पैक म ।
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13. मोनेन सन (Monensim) :- 100 ाम त कलो ाम
उपयोग :- काकसी डयो सस रोग के बचाव हेतु
योग मा ा :-1 कलो दवा 1 टन दाने म मलाकर एक दन क आयु से बेचे जाने से 3 दन
पहले तक ।
उपल धता :- 1 कलो ाम एवं 5 कलो ाम पैक म ।
14. डाइ लाजु रल 0.5% (Diclazuril-0.5%)
उपयोग :- का सी डयो सस रोग के बचाव हेतु ।
योग मा ा:- 200 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर देवे ।
उपल धता :- 1 कलो ाम पैक म ।
15. हेलोफयुगीनोन (Halofuginone 6 mg per g)
उपयोग :- का सी डयो सस रोग के बचाव हेतु ।
योग मा ा :- 500 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर देव ।
उपल धता :- 1 कलो ाम पैक म ।
12.2.5 कृ म नाशक (Anthelmentics) (आ त रक परजीवी के लये औष धयाँ)
यवसा यक मुग पालन म डीप लटर णाल म बहु धा मु गय म आ त रक कृ म पाये जाते
है । मु गय म अ धकतर गोल या फ ता कार कृ म पाये जाते है । य द इनका नदान न कया
जाये तो उसका उ पादन तर तथा शार रक वकास क जायेगा । सफल कु कु ट पालन म
नि चत त थ को मुग समूह को औषध नमाताओं के नदशानुसार कृ मनाशक दवा देनी
चा हये । मु गय म आ त रक परजीवी को ख म करने के लए न न ल खत दवा का योग
कर ।
1. एलबे डेजोल 2.5% (Albendazole 2.5%)
उपयोग :- गोल व फ ताकृ मी के इलाज के लये
योग मा ा :- 30-45 मल ल टर दवा पीने के पानी म 100 मु गय के लए
उपल धता :- 30 मल ल टर, 160 मल ल टर, 500 मल ल टर तथा 1 व 5 ल टर पैक म
।
2. लवे मसोल हाइ ो लोराइड 300 मल ाम त ाम
(Levamisole hydrochloride)
उपयोग :- मु गय म गोल व फ ता कृ म के इलाज के लये
योग मा ा :- 5 ाम पाउडर को 4 ल टर पानी म घोलकर 80-100 मु गय के लये ।
उपल धता :- 5 ाम व 100 ाम पैके ट
3. टै ा मसोल हाइ ो लोराइड (Tetramisole hcl 30% W/W)
उपयोग :- गोल कृ म के इलाज हेतु ।
योगमा ा :- 100 ाम पाउडर को 40 ल टर पानी म घोलकर 1000 मु गय के लए काम
म ल ।
उपल धता :- 10 व 100 ाम पैक म ।
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4. डाइ लोरोफे न (Dichlorophen 100 mg/g)
उपयोग :- फ ता कृ म के इलाज के लए ।
योग मा ा :- 1 कलो पाउडर 50 कलो दाने म मलाकर 1000 मु गय को देव ।
उपल धता :- 1 कलो के पैक म ।
5. फै नबे डाजोल (Fenbendazole 2.5%)
उपयोग :- गोल कृ म एवं फ ता कृ म के इलाज हेतु ।
योग मा ा:- 5 मल ाम त कलो भार पर
उपल धता - 6 ाम एवं 120 ाम पैक म ।
6. पाइपरेजीन हाइ ेट (Piperazine hydrate 45%)
उपयोग - गोल कृ म के इलाज हेतु ।
योग मा ा:- 6 स ताह से बड़ी मु गय को 0.5 मल ल टर दवा द ।
6 स ताह से छोट मु गय को 0.25 मल ल टर दवा द ।
उपल धता :- 500 मल ल टर के पैक म ।
12.2.6 बाहय परजी वय (जूं ल ख, कलनी, चचंड) से बचाव के लये
न न ल खत दवाएं काम म लेते है । दवा का उपयोग नमाता के नदशानुसार करने पर अ छे
प रणाम मलते है ।
1. कु माफोस (Coumafos 50% W/W)
उपयोग :- बा य परजी वय के इलाज के लए (जुए, चीचड़, ब थी एवं प सू
योग मा ा :- 2 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर मु गय के शर र पर छड़क
देव । 4 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर मुग शाला क दवार , फश
एवं छत पर छड़के ।
उपल धता :- 15 ाम, 1 कलो ाम पैक म ।
2. डेलटामेथर न (Deltamethrin 12.5% EC)
उपयोग :- बा य परजी वय के नय हेतु ।
योग मा ा :- 2-4 मील लटर दवा को एक ल टर पानी म घोलकर े पंप से मु गय पर
े कर देव या मु गय को दवा के घोल म डुबोकर नकाल ल । यह दवा 12-15
दन बाद दुबारा छड़काव कर देव । मुग शाला क द वार , फश तथा छत पर
भी दवा का छड़काव कर देव ।
उपल धता :- 15 व 50 मल ल टर पैक म ।
3. सा मेथर न (Cypermethrin 100 mg/ml)
उपयोग :- बा य परजी वय के नय ण हेतु
योग मा ा:- 1 मल ल टर दवा को एक ल टर पानी म घोलकर जे कर देव ।मुग शाला के
फश, दवार तथा छत पर से करने के लये 20 मल ल टर दवा को एक ल टर
153
पानी म घोले । 5 ल टर दवा का घोल 100 कवायर मीटर े के लये उपयु त
है ।
4. फे नवलेरेट (Fenvalerate 20% W/V)
उपयोग :- बा य परजी वय के इलाज हेतु ।
योग मा ा:- आधा मल ल टर दवा एक ल टर पानी म घोल कर मु गय पर
छड़काव कर देव ।
12.2.7 तनावनाशक औष धयाँ
वै सीनेशन, ांसपोटशन, च च काटना, मौसम क खराबी, आहार म बदलाव, बीमार का
सं मण तथा रोग क अव थाएं इ या द ऐसे कारण ह िजनम तनाव होना वाभा वक है ।
अ य धक एवं लगातार तनाव का रहना पो फामर को आ थक हा न पहु ँचाता है ।
1. लोरटे ासाई ल न (Chlortetracycline 5.5% W/W)
उपयोग - मु गय म शार रक वृ तथा तनाव को कम करने के दाने म इस ए ट बायो टक
का उपयोग कया जाता है ।
योग मा ा:- 100 ाम दवा को एक टन दाने म मलाकर देव । यह दवा हर म हने एक
स ताह तक देव ।
उपल धता :- 20 कलो के पैक म ।
2. टे ासाइक लन हाइ ो लोराइड (Tetracycline Hcl 50 mg per gram)
उपयोग :- मु गय म तनाव को कम करने क लए ।
योग मा ा :- 5 ाम दवा को 45 ल टर पानी म घोलकर दवा यु त पानी देव ।
3. जी ेस (Zeetress)
उपयोग :- मु गय म तनाव कम करने हेतु ।
योग मा ा :- 5 से 10 ाम दवा को 5 ल टर पानी म घोलकर देव ।
उपल धता :- 10 ाम पैक म
12.3 सारांश :-
मु गय म जीवाणु ज नत, वषाणु ज नत, परोपजीवी तथा परजीवी रोग हो जाने पर व भ न
कार क ए ट बायो ट स कृ म नाशक दवा का योग नमाता वारा दये गये नदशानुसार
करना चा हये । अगर समय पर मु गय का इलाज न कया जाये तो मुग पालन का बहु त आ थक
नुकसान हो जाता है । मु गय क सं या के अनुसार दवा को पानी या दाने म मलाकर उ चत
मा ा म देना चा हये ।
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इकाई – व भ न मौसमी रोग एवं बचाव
इकाई - 13
13.0 उ े य
13.1 तावना
13.2 मौसमी रोग : यान देने यो य बात
13.3 मौसमी रोग
13.3.1 स दय म होने वाले रोग
(i) कोल से ट स मया
(ii) युमो नया
(iii) पुलोरम रोग
(iv) आई.बी.
(v) आई.एल.ट .
(vi) C.R.D. सी.आर.डी.
13.3.2 ग मय म पाये जाने वाले मुख रोग
(i) पाँ स
(ii) पाईरोक टो सस
(iii) ह ट ोक (Heat Stroke)
(iv) वटा मन A क कमी (अथवा A vitaminosis A)
(v) ेस अथवा तनाव का रोग
13.3.3 वषाज नत रोग
(i) फाउल कॉलेरा
(ii) कोराइजा
(iii) कृ म रोग अथवा अ त: परजीवी सं मण
(iv) कॉ सी डयो सस
(v) ए परिजलो सस
13.4 चूज पर मौसम का असर एवं अ य कारक
13.5 ायलर पर मौसम का असर
13.6 ग मय के मौसम म मु गय क देखभाल
13.7 स दय एवं बरसात म मु गय क देखभाल
13.8 सारांश
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13.0 उ े य :
प य म वातावरण का भाव परो एवं अपरो , दोन ह कार से पड़ता है । शर र पर
सीधा भाव वातावरण के ताप म, काश, वषा आ द का पड़ता है और अपरो प से
दाना-पानी आ द के खराब बंधन से पानी एवं दाने क उपल धता गम म घट जाती है, वह ं
इसका उपयोग भी प ी समु चत प से नह ं कर पाता है । व भ मौसमी भाव के कारण
उ पादन एवं उ पादन मता, दोन ह कम हो जाते ह । अत: यह आव यक है क प य
पर पड़ने वाले इन मौसमी भाव , उनसे जुड़े रोग एवं पड़ने वाले वपर त भाव एवं शार रक
याओं का व तृत अ ययन कर लया जावे, ता क ा त होने वाले हा नकारक प रणाम
को समय रहते ठ क कर लया जावे, साथ ह पूवानुमान आधा रत वशेष बचाव एवं रोकथाम
के ब ध पूण कये जा सके । इसी उ े य को इस ईकाई म सि म लत कर कु कु टपालक
को वै ा नक जानका रयाँ उपल ध कराई गई है ।
13.1 तावना :
कृ त ने ा णय के लए कु छ नयम बना रखे है । जैसे ह ाणी कृ त के वपर त आचरण
करता है, अथवा उनके नयम का उ लघंन करता है, वह बीमार हो जाता है । पशु-प ी भी
कृ त के इ ह ं नयम से नद शत होते ह । आव यकता यह है क इन नयम का ठ क
से पालन कया जावे, तो ाणी व थ रहते ह । अगर कु कु ट पालक पहले से सजग रहे,
समय-समय पर ज रत के मुता बक औष ध एवं ट के लगवाते रहे तो यह सब बात उन नयम
को पुन: था पत करने म सहायक होती है । िजससे प ी वापस त द त हो जाते ह और
िज दगी बगैर बीमार के बताने लगते है
रोकथाम के साधन पर, जैसे - सफाई, रोशनी, हवा, पानी, दाना, गम , सद का यान रखते
रहे तो रोग भी नह ं होगा, िजससे आ थक हत तो होगा ह , परेशा नय से भी बचा जा सके गा
। कु कु ट पालक को चा हए क वह रोज सुबह कु कु ट शाला म वेश कर तो अपनी ि ट
सब कु कु ट पर डालकर यह जानने क को शश कर क उनके यहाँ कोई कु कु ट रोगी तो
नह ं है । कु कु ट म सामा य रोग इन कारण से बहु तायत से होते ह, िजनम (1) मौसम के
बदलते व त पर सद , गम के एकदम कम या यादा होने क वजह से, (2) खाने म कसी
त व क कमी से खास तौर से वटा म स व ख नज पदाथ क कमी, (3) छू त क बीमा रयाँ,
जो रोगी प ी के छू ने अथवा सीधे स पक म आने क वजह से होती है । सामा यत: मौसमी
रोग से भा वत रोगी प ी के व भ न द शत ल ण को अगर यान म रखा जावे तो बीमार
प ी को पहचानने म भूल नह ं होगी । ल य म रोगी मुग या ब चे का झु ड से अलग बैठना,
सु त मालूम होना, साँस लेने म क ठनाई आना व प ी का मैला दखाई देना मुख है, जो
चमक व य प ी के पर म दखाई देती है, वह रोगी प ी के पर म नह ं होती है तथा
रोगी प ी के साँस के साथ घर-घर क आवाज आती है । वह पकड़ते व त दूर भागने क
को शश नह ं करेगा । कलंगी सकु ड़ी हु ई या मुरझाई हु ई नीले से रंग क दखलाई देगी ।
157
कभी-कभी ेटल म सूजन भी दखलाई देती है । ब चे चीं-चीं करते हु ए एक थान पर इक े
हो जाते ह । दाना चुगना ब द कर देते है तथा उसम सफे द रंग के द त हो जाते है । गुदा
का भाग आस-पास से गंदा दखलाई देता है । बड़े मुग-मु गय म भी द त होते ह, िजससे
पँख चपके व ग दे नजर आते ह । तापमान 1 से 20
F कम या यादा होता है । वशेष
बीमा रय म वशेष कार के ल ण प रल त होते है, जो बीमार क खास पहचान है एवं
इससे बीमार क पहचान होती है |
वातावरण का तापमान औसत से अ धक होने पर प ी दबाव क ि थ त म आ जाता है, उसक
शार रक शि त औसत से अ धक ताप म के दु भाव को कम करने म लग जाती है । ऐसी
ि थ त म अ डा उ पादन कम हो जाता है । वातावरण, पा रि थ तक बदलाव एवं सं मण
म सभी कारक भ न- भ न प म प य क भ न- भ न जा तय को भा वत करते ह,
िजससे अ डा एवं माँस दोन का ह उ पादन भा वत होता है, क तु थोड़ी सी सूझ-बूझ एवं
जानकार से आने वाल आ थक त रोक जा सकती है ।
13.2 मौसमी रोग : यान देने यो य बात :
मौसमी रोग के संबंध म न न ब दु यान रखने यो य है:-
जगह क तैयार -
(i) चूजे आने के 24 घ टे पहले िजस जगह चूके पालने है, पूर तरह से तैयार हो जाना
चा हए ।
(ii) बुखार आने के बाद ूडर का योग ख म सा हो गया है, ले कन इस का उपयोग
होना चा हए । एक ूडर 300-400 चूज के लए होना उपयु त होता है । िजतने
भी चूजे आये, उस हसाब से ूडर लगाने का थान शेड के एक और चुन ल ।
(iii) एक से डेढ़ इंच सूखा बुरादा, जो हर तरह से अ छा हो, म फफूं द नाशक दवा मलाकर
गाड के अ दर बराबर फै ला द । बुरादे पर एक अ छा से क टाणुनाशक का भी करा
द ।
(iv) अखबार क तीन परत से इस बुरादे को ढक द ।
(v) चूजे आने के एक रात पहले ूडर चालू कर द और रात का तापमान रकाड कर ल
। वशेष प से सुबह के चार बजे का । साथ ह य द ठ ड हो तो बुखार भी लगा
ल ।
(vi) तापमान को बनाने के लए पद का लगाना भी आव यक है, ले कन व छ हवा के
आदान- दान का भी यान रख । यह भी चूज क बढ़ोतर क खुराक है, िजसक
कोई लागत नह ं है । तापमान को बनाये रखते हु ए, िजतना अ धक से अ धक व छ
हवा का आवागमन होगा, उतना ह बेहतर है ।
चूजे आने के बाद –
(i) शेड के अ दर च स बा स को फै ला कर रख ।
(ii) चूजे क च च को एक बार पानी म डुबोकर ूडर के नीचे डाल ।
158
(iii) येक ूडर म बराबर गनकर चूजे डाल ।
(iv) चूजे आने पर उ ह तुर त डाल द ।
(v) शु के 3-6 घ टे तक के वल पानी ह पीने को दे, उसके बाद दो मु ी दाना त 100
चूज के सा हब से अखबार पर छड़क द और ख म होने लगे तो फर छड़क द । इस
तरह से संतु लत आहार ह खलाय । यान रहे, संतु लत आहार ताजा हो । इसके बाद
फ डर म फ ड ऊपर तक भर कर लगा द या छछले लेट या अ डे के नये फलर लेट
म दाना देते रहे ।
(vi) अगर चूज म फफूं द रोग आने क संभावना हो तो लगभग 0.5 क. ा. सूखे बुरादे म
200 ाम के यर ट और 100 ाम ल चंग पाऊडर पहले से मलाकर बुरादे म भल
भाँ त मला द । त 100 वगफु ट म ।
तापमान व वातावरण –
(i) तापमान एवं व छ वायु का चूज क सेहत और बढ़ोतर के लए सह रहना अ य त
आव यक है ।
(ii) ूडर का तापमान बुरादे से 2'' ऊपर एवं कनारे से 4-5'' अ दर लेना चा हये ।
(iii) कमरे का तापमान बुखार से हट कर बुरादे से 1/2 फु ट क ऊँ चाई पर लेना चा हए
(iv) तापमान को बनाये रखते हु ए आव यक व छ वायु अव य दान कर ।
(v) जब चूजे छोटे हो तो आ ता 60% तशत (Relative Humidity) से अ धक बेहतर
होगी ।
धीरे-धीरे उसे घटाते हु ये 60 तशत या इससे भी कम कर देन चा हए I
ल टर मैनेजमे ट (बुरादे क देख-रेख)
(i) इ तेमाल करने से पहले इसे संभा वत फफूं द और क टाणु से मु त कर ल । इसके लए
इसम फफूं द नाशक एवं क टाणुनाशक का े कर ।
(ii) शु म एक से डेढ इंच बुरादा बछाये । दूसरे स ताह इसम और मलाकर दो इंच कर
द । तीसरे-चौथे स ताह म धीरे-धीरे बढ़ाकर तीन इंच से साढ़े तीन इंच कर दे । इससे
बछावन म नमी क मा ा कम बढ़ेगी । अ यथा अमो नया का उ पादन होगा एवं क टाणु
बढ़ने क र तार बहु त तेज होगी । खूनी पे चश (Coxy) का कोप बढ़ जाता है ।
(iii) ार भ म अ छे बछावन म नमी 12-15 तशत से अ धक नह ं होनी चा हए । इसके
बाद 30 तशत से अ धक नमी नह ं होनी चा हए अ यथा वह बै टे रया जो बछावन
को सड़ने से बचाते ह, प ी क बीट को हजम करने का काम नह ं करगे ।
(iv) ल टर म के क (पपड़ी) बन रहा है तो हम गुड़ाई (रे कं ग) करके बछावन को सुधारना चा हए
। पपड़ी को नकालकर नया बुरादा मला द ।
(v) सह मा ा और सह नमी के बछावन म बै टे रया ( कटाणु) जो बीट को हजम करके
ल टर को बनाये रखते ह, ठ क तरह से अपना काम करते है । इस या म ल टर सूखा
बना रहता है और आव यक गम भी बनी रहती है, पर तु य द नमी 30 तशत से अ धक
हो जाये और कमरे का तापमान 500
F से कम हो तो क टाणु क या कमजोर पड़
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जाती है, िजससे ल टर जमना शु हो जाता है और शेड म क चड़ सा हो जाता है । अत:
ल टर को हमेशा सह बनाये रखना आव यक है ।
पानी
चूज को के वल वह पानी पलाये, जो आप वयं पी सकते हो ।
(i) पानी का तापमान ठ ड के मौसम म कमरे के तापमान से कम न हो, जब क गम म
िजतना ठ डा हो, उतना बेहतर है ।
(ii) पानी सदैव उपल ध हो और बतन क ऊँ चाई चूज क पीठ से न ऊँ ची हो न नीची । ऊँ चाई
को सदैव ठ क करते रह ।
(iii) आम भाषा म पानी खारा या नमक न न हो । न ह पानी ग दा, मटमैला हो, न ह उसम
कोई जीवाणु व क टाणु ह ।
(iv) आव यकतानुसार पानी के बतन क सं या पूर होनी चा हए, बि क गम म सं या बढ़ाकर
दुगुनी कर द । छोटे ब च म शु के 4-5 दन उ ह 3-4 फु ट से अ धक पानी के लए
चलना न पड़े ।
(v) पानी के बतन क सफाई दन म दो बार सुबह और शाम जूट या मूंज से रगड़ कर अव य
कर । बाद म लाल दवा (पोटे शयम परमेगनेट) या ि ल चंग पाऊडर या कसी अ छे
क टाणुनाशक म खंगाल ल । अगर दो सेट हो तो एक को रोज धूप म रख द ।
पानी कै सा हो?
कु ल क टाणु त एम.एल. 100 से कम
ई कोलाई त ल टर 0
जै वक अंश एम.जी. त ल टर 3 से कम
नाई ेटस एम.जी. त ल टर 30 से कम
आयरन एम.जी. त ल टर 0.3
मैगनीज एम.जी. त ल टर 0.1
कापर एम.जी. त ल टर 1
िजंक एम.जी. त ल टर 5
कै ल शयम एम.जी. त ल टर 75
मैग न शयम एम.जी. त ल टर 50
स फे टस एम.जी. त ल टर 200
लोराईडस एम.जी. त ल टर 200
पी.एच. 6.5-7.5
(i) पानी क टंक ढक हो और स ताह म एक बार अव य ठ क ढंग से साफ क जाये । ल चंग
पाऊडर थोड़े से पानी म मलाकर हर जगह रगड़ कर धो ल ।
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(ii) उ चत होगा, य द पानी म 0.2 ाम से 0.5 ाम ल चंग वाऊडर त यू बक फ ट
(26-27 ल टर) मलाकर पीने को दया जाये । जब भी टंक खाल हो, उसम नापकर
ल चंग पाऊडर डाल कर भर द । अब इसे दो घंटे बाद योग म लाय । इस तरह लगातार
पीने को द । इससे पानी के क टाणु जहाँ समा त ह गे, वह ं बहु त से त व का हा नकारक
असर कम हो जायेगा । यह पानी वै सीनेशन के समय न दया जाये । ल चंग पाऊडर
म 33 तशत लोर न होना चा हए । आज कई दूसरे वाटर सेनीटाइजर आ रहे ह, िजनका
असर देर तक रहता ह । यान रहे, सीधे पानी जो यूबवैल या है डप प से लया जाता
है, वह ज र नह ं दोषमु त हो । अत: समय-समय पर जांच करवाते रह ।
काश यव था
(i) शु के 14-15 दन तक काश यादा दया जा सकता है अथात् येक 100 वगफु ट
पर 40-60 वाट का बल इसके बाद इ ह 15-25 वाट का ह बल काफ है ।
(ii) 7 दन के बाद कु ल 23 घ टे ह काश द तो बेहतर होगा । शाम को सूरज डूबने के
एक घ टे बाद इ ह लाइट द ।
(iii) पकड़ते समय य द लाईट बुझाकर एक लाल या नीला बल लगाकर पकड़ा जाये जो ायलर
पर कोई असर नह ं होगा ।
(iv) एक समय म एक ह वाट के बल हर हो डर म लगाये । कह ं यादा, कह ं कम वाट
के बल लगाना हा नकारक है । अ धक वाट के बल लगाने से चूज म नोचने (Picking)
क सम या आ सकती है ।
13.3 मौसमी रोग
13.3.1 स दय म होने वाले रोग
(i) कोल से ट सी मया
ई. कोलाई (E. coli) नामक जीवाणु ाय: मुग के पेट व आँत म पाया जाता है तथा वशेष
प रि थ तय म प य म द त अथवा Enteritis नामक रोग करता है, क तु जब यह जीवाणु
र त म वृ करता है और व भ न शार रक याओं को बा धत कर प ी क मृ यु का
कारण बनता है तो इस अव था को “कोल से ट सी मया” कहते है । इस अव था म यह गुद
(Kidney) म वकार उ प न कर टॉि सन उ प न करता है, िजससे गुद आकार म बढ़ जाते
ह तथा दय भी कं ज टेड तथा इसम तरल पदाथ पाया जाता है । यह एक ा नक अव था
का रोग है ।
(ii) यूमो नया
मु गय म यूमो नया वसन तं का रोग है, जो जीवाणु अथवा वषाणु के सं मण से हो
सकता है । अ धक स दय के मौसम म भी यह छोटे चूज म कोराइजा अथवा बड़े प य
म फे फड़ के सं मण से हो सकता है तथा उपचार नह ं करने पर इससे प य म मृ यु भी
हो सकती है ।
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(iii) पुलोरम रोग
यह रोग चूज म ती प से पाया जाता है, पर तु वय क प ी भी इससे भा वत हो सकते
ह । वय क प य म यह रोग चरकाल य (Chronic) प म भी पाया जा सकता है । य य प
ती (acute) प भी अं कत कया गया है । चूज म, आयु के थम स ताह म इस रोग
से भार मृ यु दर देखी गयी है, जो क दूसरे स ताह उ चतम सीमा तक पहु ँच जाती है ।
रोग से सत मु गय के अ ड क उवरक और नगमन मता कम हो जाती है और उनसे
उ प न हु ए चूज म उ च मृ युदर पाई गई है । रोगी मु गय क अ डा उ पादन मता भी
व थ मु गय क अपे ा कम हो जाती है ।
(iv)आई.बी. (Infectious Bronchitis)
प य म पाये जाने वाला अ य त सं ामक छू तदार रोग है, जो क वषाणु वारा फै लता
है । वसन तं के इस रोग के मुख ल ण वांस म वशेष कार क आवाज आना, छ ंकना,
अ डा उ पादन म कमी एवं खराब क म के अ ड का उ पादन है । यह कोरोना ुप के वाइरस
से फै लने वाला वसन रोग है । रोग का सार वायु वारा रोगी प ी से व थ प य म
होता है ।
(v) आई.एल.ट . (Infectious Laryngotrachetis)
वायरस (Virus) वारा यह रोग होता है तथा इसके कारण बहु त आ थक हा न हो सकती है
। मृ यु दर भी अ धक
होती है । अ धक उ प म भी मुग उ पादन अ छा दे सकती है । ायलस म आहार उपयोग
कम हो जाता है ।
वायु, उपकरण, कपड़ वारा यह वायरस रोग फै लता है । मु यत: प य के आपसी स पक
वारा यह रोग फै लता है । नाक वारा हवा के साथ ह यह इ फै शन फै ल सकता है । पानी
वारा भी यह रोग फै लता है । ठ क हु ई मुग रोग का के बनी रहती है ।
(vi) C.R.D. सी.आर.डी.
यह रोग माइको ला मा गैल सै ट कम (एम.जी.) और ई. कोलाई के साथ-साथ इ फै शन के
कारण होता है । सी.आर.डी. रोग मु गय के ग दे शै स म िजसम भीड़, अमो नया, धुँआ,
धूल का वातावरण हो और वे ट लेशन कम हो, अ धक होता है ।
एम.जी. हर उस क मु गय म रोग पैदा करता है, पर तु मृ युदर कम उ क मु गय म
अ धक होती है । मुग के अलावा अ य प ी जैसे टक , बटेर, फ जै ट वैल, कबूतर, ब तख
आ द म भी यह रोग होता है । अत: ये प ी मु गय म रोग फै लाने म सहायक हो सकते
ह । इसी लए इस रोग क रोकथाम मुि कल है ।
इस रोग म नथुने गीले रहते ह, छ ंक आती है और वांस लेने म परेशानी होती है तथा बाद
म आँखे सूज जाती है ।
162
13.3.2 ग मय म पाये जाने वाले मुख रोग
फाउल पाँ स:
यह वायरल रोग है एवं दो प म पाया जाता है ।
(a) वचा प. इसम चेहरा, को ब वेटल आ द पर के ब (Scab)या दाने पाये जाते है ।
(b)नम पॉ स अथवा Wet Pox : इसम मुँह के अ दर क झ ल पर दाने पाये जाते है
। इस प म प ी अ धक सत होते है तथा यह कसी भी उ म हो सकता है । मृ युदर
अ धक नह ं होती है, क तु अ डा उ पादन कम हो जाता है ।
(i) पाईरोक टो सस
इस कार के जर म कु कु ट का र त दु षत हो जाता है । हमारे देश म इस रोग का
मह व रानीखेत रोग से कम नह ं है । वशेषकर म य तथा उ तर भारत के रा य म
जहाँ यह रोग अ धक यापक है, भार हा न हु ई है । द ण भारत के अ धकतर भाग
म यह रोग नह ं होता है । इसका कारण यहाँ इस रोग को फै लाने वाल चीच ड़य का
अभाव होता है ।
(ii) ह ट ोक (Heat Stroke)
ी म ऋतु म कु कु ट ह का तापमान अ धक बढ़ जाने से ह क न ल क अपे ा भार
न ल अ धक भा वत होती ह । लू लग जाने से उनके शर र का ताप 42.8-43.30
C तक
हो जाता है, साँस क ग त बढ़ जाती है तथा प ी मु छत होकर मर जाते ह । कु कु ट
राह म पया त वायु आगमन न होने पर लू का कोप होता है ।
रोकथाम (Prevention)
ी म ऋतु म प य के लए यथे ट थान, पया त छाया, वायु तथा पानी ा त होना
चा हए । इनसे प य को लू नह ं लगने पाती है । धातु क चादर अ दर ह क छत
के लए योग नह ं करनी चा हए । लू लगने वाले प य को ठ डे पानी म डुबोना चा हए।
अ ड क कावत (Egg Bound)
जब मु गयाँ थम बार अ डा उ पादन ार भ करती है तो उ ह अ डा कने का रोग
सामा य प से हो जाता है, इसका कारण यह है क मु गयाँ बड़े आकार का अ डा देने
का यास करती ह, पर तु अ डे आने का माग संकरा होने के कारण अ डा सुगमता से
नह ं नकल पाता है और प ी इस माग को चौड़ा करने का यास करता है । इसके
प रणाम व प इस भाग म जलन होती है और ग ट बन जाती है और अ डे क ठनाई
से बाहर नकलते ह अथात् अ डे कावट क ि थ त उ प न हो जाती है ।
रोग का ल ण (Symtoms of Disease)
रोग से सत प ी बेचैन होते ह और बार-बार घोसल म आते-जाते ह । प ी लगातार
क ठन प र म करते ह, िजससे उनक ड ब वा हनी बाहर नकल आती है और अ य
प ी इस ड ब वा हनी पर च च हार करते ह । य द अ डा बाहर नह ं नकलता है तो
प ी मर जाते ह ।
उपचार (Treatment)
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प य का उपचार संभव नह ं है । रोकथाम का मा उपाय यह है क अव करगुहा म
अंगु लयाँ डालकर नुक ले य से अ ड को तोड़ कर बाहर नकाल देना चा हए ।
(iii) वटा मन A क कमी (अथवा A vitaminosis A)
वटा मन A के काय - प य म बढ़ोतर म सहायक, अ छ ि ट नजर (Eye sight)
हेतु आव यक एवं अ द नी वचा का र क ।
कमी के ल ण - वटा मन A क कमी से कम अ डा उ पादन, अंधापन, कमजोर आना
एवं कम वृ या वकास जैसे ल ण दखलाई देते है ।
(iv) ेस अथवा तनाव का रोग
प य म ेस अथवा तनाव एक कार का कई कारण का मला-जुला दशन है । इनम
से कु छ तनाव के कारण बताये जा सकते है । जैसे अ धक आवाज, अ धक प ी घन व,
हलचल अथवा परेशान होना, अ धक गम अथवा सद आ द । इसके अ त र त ट काकरण,
क लंग, ए ट बायो टक का द घकाल न भाव आ द अ य कारण भी हो सकते है ।
अ धकांश कु कु टपालक ेस, जो गंभीर सम या है, उसे नग य मानकर हा न उठाते
ह, इसके लए जाग कता होना आव यक है । दो दन पूव अथवा 3-5 दन प चात्
वटा म स का जल म योग कया जाये तो तनाव का भाव मालूम कया जा सकता
है । ेस का भाव शी ह कम उ पादन या वृ म अवरोध के प म देखा जा सकता
है ।
ेस फे टर - असंतु लत आहार, च च काटना, लंग मालूम करना, इनकु वेटर म खराबी,
औष धयाँ या ए ट बायो टक का द घ उपयोग, दोषपूण वातावरण, अ धक नमी, डहाई ेशन
या पानी क कमी, अ धक गम / सद / वषा, थान प रवतन, ट काकरण, ब धन म
बदलाव, अ धक काश, सद हवाऐं,अ या धक शोर, उ तेजना, पेट क क ड़े, बा य परजीवी
सं मण, आग तुक या मुग शाला म वेश आ द ।
अत: कु कु टपालक को चा हए क इन बात का यान रख तथा असामा य याओं का योग
नह ं कर, सामा य कु कु ट ब धन को ाथ मकता देव । समय-समय पर वटा म स एवं
ओरल रहाइ ेशन घोल पानी म मलाकर पीने का द ।
13.3.3 वषाज नत रोग
(i) फाउल काँलेरा
यह रोग पा चुरेला म टो सडा के तीन सीरोटाइप (1,3 और 4) के वारा होता है । इन
सीरोटाइप क रोग पैदा करने क मता भ न है । फाउल कॉलरा हमारे देश के व भ न
थान म पाया गया है । इस रोग के जीवाणु कु त और चूह के मुँह म कई वष तक
जी वत रहते ह तथा मुग म रोग का कारण बनते ह । ये जीवाणु म ी और मुग के
खा य म भी कई माह तक जी वत रहते ह । यह रोग 8 स ताह से ऊपर क मु गय
म होता है । अत: ायलर म यह रोग नह ं मलता है ।
164
यह रोग पर-ऐ यूट, सब-ऐ यूट एवम ् ो नक कार म पाया जाता है । इस रोग म 80-90
तशत तक मृ यु हो सकती है । पर-ऐ यूट कार के रोग म रोग का कोई भी ल ण
दखाई नह ं देता है तथा अचानक मृ यु आर भ हो जाती है । सब-ऐ यूट एवं ौ नक
रोग काफ समय तक चलते ह, िजससे सर, कलंगी एवम ् वैटल म सूजन हो जाती है
तथा वे नीले पड़ जाते ह ।
(ii) कोराइजा
प य म होने वाला ए यूट सं ामक रोग है, जो जीवाणु से होता है तथा इसके मुख
ल ण छ ंक आना, नाक से बदबूदार तरल चप चपा पदाथ (चीजी) नकलना मुख है
। छोटे उ के प य (चूज ) म यह रोग अ धक होता है । यह रोग ह मो फलस.गे लनेरम
जीवाणु से होता है । इस रोग के न न ल ण है:-
* नाक से बदबूदार चीजी पदाथ नकलना तथा यह साइनस व आँख पर इक ठा
हो जाता है ।
* चेहरा व सर सूजा हु आ तीत होता है ।
* ेस क अव था म यह रोग ती ता से फै लता है ।
(iii) कृ म रोग अथवा अ त: परजीवी सं मण
अ त: परजीवी सं मण कई कार का हो सकता है । यह वशेष प से वातावरण म
नमी, ल टर के गीला होने, गंदगी एवं अ य अनहाइज नक कारण से हो सकता है । इसे
कृ म का रोग भी कहते है । यह नमेटोड, राउ ड वम, ससटोड, लूक वम एवं मेटोड
या फ ता कृ म के प म प य म कम वृ दर एवं कम उ पादन जैसे ल ण द शत
करता है ।
कृ म नाशक औष ध वारा जाँच करने के उपरा त इस रोग से मु त हु आ जा सकता है।
(iv) कॉ सी डयो सस
यह रोग एक ोटोजोआ वारा मुग क आँत म होता है, िजसे माइ ो कोप वारा शीशे
क लाइड पर देखा जा सकता है । का सी (का सी डयो सस) दो कार क होती है:-
1. सीकल का सी:- यह आइमे रया टनेला नामक ोटोजोआ वारा मुग के सीका म खून के प
म होती है तथा अ धक नुकसान करती
2. इ टैसटाइनल का सी - यह आइमे रया क व भ न पे सज वारा होती है तथा आंत के
अलग-अलग ह स म जमा खून के प म होती है ।
का सी ाय: 10 स ताह से कम उ क मु गय म होती है और 4 से 8 स ताह म अ धक
होती है । का सी 3 स ताह से कम उ क मु गय म तभी होती है, जब पूर तरह दू षत
का सी के वातावरण म चूज क ू डंग क गई है । का सी म मुग म खून क कमी हो जाती
है । मुग पील पड़ जाती है । मु गयाँ इक ी होकर बैठती है तथा दाना-पानी कम खाती ह
और उनम खूनी द त लग जाते ह ।
(v) ए परिजलो सस
यह बीमार आम तौर से चौथे-पाँचवे दन कट होती है । वशेष प से वहाँ, जहाँ बुरादे
पर अखबार बछाकर चूज को छोड़ा जाता है । जहाँ बना अखबार के ह छोड़ा जाता है
165
और बुरादा खराब या गीला हो तो 24 घ टे म ह मृ यु शु हो जाती है । य द सब कु छ
ठ क है और चूजे पहले ह दन से मरने लगते है । तो यह बीमार हैचर से भी आ सकती
है । य द ड बे म डाला हु आ बछावन खराब हो तो पहले दन से ह इस रोग के ल ण
मल सकते है ।
दाने म य द फफूं द या (Fungus) तो के वल फे फड पर ह इसके ल ण नह ं मलगे,
बि क दाने क थैल पथर और आँत म भी इसके ल ण मलगे । कलेजी से भी अ दाजा
लगाया जा सकता है ।
ायलर म अ धकतर यह सम या बुरादे से आती है और इसमे फे फड पर सफे द पीले या
गुलाबी गोल दाने से दखते ह । चूजे मुंह खोल कर ल बी साँस लेते ह । सीट से आवाज
भी हो सकती है ।
समय पर यान न दया गया तो मृ यु दर (Mortality) बहु त अ धक हो सकती है ।
इस बीमार को ूडर नमो नया के नाम से भी जाना जाता है । इसका इलाज तुर त होना
चा हए अ यथा सी.आर.डी. या पेट म पानी क बीमार बाद म हो सकती है ।
1. दाने म बार क पसा कापर स फे ट (नीला थोथा) 500 ाम / टन 5-7 दन द ।
2. पानी म यूमाईसीन + डा सीसाईकल न द ।
3. एक पानी म (B-Complex) द I
4. बुरादे म तुर त बार क चुना 5 ाम त वग फु ट 2 ाम ल चंग पाऊडर के साथ
ठ क से मला द ।
5. 10 ाम / ल टर के हसाब से कापर स फे ट का े बुरादे पर कर । य द सम या
बहु त अ धक हो तो पूरा बुरादा बदलकर अ छा बुरादा या धान क भूसी डाल द ।
13.4 चूज पर मौसम का असर एवं अ य कारक
कु छ कारण का यहाँ व तार से ववेचन कया गया है । यह वह कारण है, िजसक वजह
से चूज म शु के 5- 10 दन के बीच काफ मृ यु हो सकती है । कभी-कभी यादा समय
तक भी हो सकती है ।
(i) ठ डक (Chilling)
 *कम से कम मृ युदर के लये यह आव यक है क सह तापमान रखा जाये । चूज क मृ यु
ठ ड लगने से तो सीधे हो ह सकती है, पर तु य द यह सल सला चलता रहा तो कसी बीमार
का भी वेश हो सकता है, जो बहु त अ धक हा नकारक होगा ।
 ठ ड लगने पर चूजे एक दूसरे से सटते जाते ह और एक त होकर काफ चूजे वशेषकर जो
समूह म छोटे ह, दबकर मर जाते ह, िजसे हड लंग (Huddling) कहते हैI
 कोने म भी चूके एक त होकर दबने से मर सकते ह ।
 इसम चूजे मुि कल से सांस ले पाते ह । आगे चलकर पर को गरा लेते ह और इनक मृ यु
हो जाती है ।
166
 फ ड क खपत (Consumption) घट जाती है और ऐसी अव था म तापमान य द 600
से
नीचे हो तो बहु त अ धक मृ यु हो सकती है ।
(ii) बहु त अ धक गम
कभी-कभी तापमान पर सह नय ण न रख पाने के कारण इतनी अ धक हो जाती है क
चूज मुंह खोलकर सांस लेने (Panting) लग जाते ह । य द इस कार गम लगातार बनी
रहे तो मृ यु हो सकती है । इस कार य द तापमान अ धक हो और साथ मे वातावरण क
नमी (Humidity) भी बढ़ जाये तो हा न अ धक हो सकती है, य क ऐसी अव था म चूजे
अ धक गम को सहन कर पाने म असमथ हो जाते ह ।
िजन चूज म गम का असर हो जाता है, वह दाना कम खाने के साथ-साथ सु त हो जाते
ह और पानी के बतन पर भीड़ होने के कारण यासे ह मर सकते ह । वैसे तो यह अव था
उ प न होनी नह ं चा हए, पर तु य द हो भी जाये तो इसका तुर त नवारण करना चा हए।
जहाँ के वल बुखार के सहारे पूरे कमरे का गम करके ू डंग क जाती ह, वहां इसक संभावना
अ धक है । साथ म इले ोलाइट के साथ बी का पले स पानी म मलाकर पीने को देना चा हए।
(iii) चूज का नजल करण (Dehyderation):
जहाँ संतु लत आहार और साफ सुथरे संतु लत रख रखाव (Management) क इस उ योग
म सफलता के लए अ य त आव यक है, वह ं हर समय व छ सामा य जल क हर समय
आव यकता है । पानी क कमी से चूजे सूखने लगते है और फर मृ यु होने लगती है । य द
चूज को लगातार 4-5 दन पानी कम मले तो 75-100 तशत तक मृ यु 6-7 दन म हो
सकती है । िजन चूज म डहाई ेशन होता है, वह कमजोर होकर सूखने लगते ह । ब कु ल
सूखी बीट क ज (Constipation) के कारण होने लगी है और बाद म होती भी नह ं । चूज
को ट ी के लए जोर लगाना पड़ता है । आँखे ब द करते ह और आँखे अ दर ह सकु ड़ने
लगती है ।
पो टमाटम करने पर जब चमड़ा हटाते ह तो वह सूखी होने के कारण आसानी से नह ं हटती
। मांस से चपक रहती है । मांस गहरा लाल हो जाता है । ल वर सकु ड़ने लगता है और
प ताशय (Gall Bladder) बढ़ जाता है । गुद (Kidney) के बीच नल (Tubules) म सफे द
गाढ़ा तरल पदाथ (Urates) मलता है । दाने क थैल (Crop)म दाना नह ं मलता । य द
मलता भी है तो सूखा ।
चूजे का सूखना (Dehydration) न न कारण म से कसी एक से हो सकता है ।
* य द कोई बीमार चूज म हो ।
* य द पानी कसी कारणवश आव यकता से कम हो ।
* य द पानी के बतन ग दे ह और उसे त दन ठ क से साफ न कया जाता हो, िजसके
कारण उसम बदबू आ रह हो ।
* य द पानी का टोर ग दा हो, िजसम से बदबू आ रह हो ।
* य द पानी म कोई दवा आव यकता से कह ं अ धक मला द गई हो ।
167
* य द पानी के बतन ऐसी जगह पर ह , जहाँ बहु त अ धक गम हो; जैसे ूडर के बहु त
समीप और ूडर का तापमान आव यकता से काफ अ धक हो ।
* य द पानी के बतन क बनावट ऐसी हो क चूज को पानी तक अपनी च च ले जाना
क ठन हो, जैसे बहु त ऊँ चे या इतने संक ण क उनका सर झुकने पर इतना नीचे न
जा सके क च च पानी तक पहु ंचे ।
* य द पानी का तापमान कमरे के तापमान से अ धक हो ।
* य द ूडर हाउस म काश कम हो, वशेषकर जाड़ म, जब क चार ओर पदा लगा हो
और अ दर रोशनी न हो ।
इन सभी उपरो त कारण से हम भल भाँ त प र चत ह फर भी कु छ प रि थ तयाँ ऐसी उ प न
हो जाती है क हम छोट -छोट बु नयाद मु क ओर यान देने से वं चत रह जाते ह । इन
कारण क ओर यान देकर उ ह तुर त दूर कर देना चा हए । पानी चुर मा ा म हर समय
उपल ध होना चा हये । साथ म इले ोलाई स के साथ बी-कॉ पले स पानी म 5-6 दन देना
चा हए ।
(iv)भूख (Starvation):
न चय ह कोई भी फामर अपने चूज को भूखा नह ं रखना चाहता, पर तु कभी-कभी ऐसा
हो भी जाता है । इसम चूजे कमजोर हो जाते ह और उनका लगातार वजन घटता जाता है
। इसम पहले ह स ताह म काफ मृ यु हो सकती है । चूजे सूखने लगते ह और िजन चूज
पर असर होता है, वह दूसरे चूज से अलग एक त (Huddling) होते जाते ह । पर का म
बगड़ कर चूजे बदश ल लगने लगते ह ।
जैसे अपना ब चा भूखा होने पर रोकर माँ को बुलाता है, वैसे ह चूजे भी अपनी भाषा म “चींथीं”
करके शोर करते ह, जो उनके भूखे होने का अनूठा संके त ह ।
भूखा रहने का (Starvation) जो सबसे भयानक य है, वह उनका आपस म नोचना है
। पहले वह पैर नाखून के पास (Toe) से शु होता है, फर दुम के पास नोचना शु करते
ह । य द यान न दया गया तो फर आंत नकाल कर खाने लगते ह । बुरादा ( बछावन)
खाने लगते ह । यह सभी मृ यु का कारण है ।
पो टमाटम करने पर दाने क थैल खाल मलेगी या उसम बुरादा मलेगा । आंते खाल मलेगी
। ल वर छोटा हो जाता है और प ताशय बढ़ जाता है । गुद म सफे द तरल पदाथ (Urates)
मलता है, साथ ह गुद का रंग पीला पड़ने लगता है । चमड़ी के नीचे जेल के समान तरल
पदाथ मलता है ।
भूख के कारण (Starvation Death) हमार बहु त बड़ी भूल-चूक के कारण होती है । वे कारण
न न ल खत कार से हो सकते ह ।
* य द ी डंग टॉक िजनसे चूजे लये गये ह, उसके राशन म आव यक त व क कमी हो
(Nutritional Deficiency) और चूजे कमजोर ह ।
* दाने का कण बहु त मोटे हो और दाना पुराना हो ।
168
* फ डर क बनावट गलत हो ।
* दाना पुराना हो या उसम बदबू हो ।
इन सब कारण क सह जाँच करके उनका तुर त नवारण करना चा हए तथा चूज को ी डंग
करके अलग-अलग रखना चा हए । वटा मन बी का पले स (B- Complex) या वटा मन
यु त कोई भी ए ट बाय टक पानी म 5-7 दन पीने को द िजए ।
(v) दवाय देने म गलती (Wrong Medication)
कभी-कभी दवाय गलत ढंग से देने से भी मृ युदर बढ़ जाती है । कभी भी स फा दवाय अ धक
मा ा म या अ धक दन तक न द ।
सदैव यान रखना चा हए क कोई भी दवा योग करने से पहले उसके लेबल या (Literature)
को यानपूवक पढ़ लया जाए । कु छ दवाय दूसर दवाओं के साथ मलाकर नह ं द जा सकती
। मसाल के तौर पर कापर स फे ट के साथ कोई भी ए ट बाय टक । कोबान (Elancoban)
के साथ टाईमयु टन (Timutin)
यूराजाल डान के साथ जुआल न या डाट इसी कार और बहु त सी दवाओं क सामनज यता
(Compatability) देख लेनी चा हए ।
सदैव फ ड म जो दवाय मल ह, उनका पूरा ववरण र खये ता क य द कोई दवा देनी हो तो
उसी हसाब से यह देख कर द क अमुक दवा फ ड म मल दवा के साथ द जा सकती है
या नह ं ।
(vi)नोचना (Picking or Cannibalism)
अ सर देखा गया है क चूजे एक दूसरे को नोचने लगते ह, िजसम नोचे हु ए ब चे को समय
पर अलग नह ं कया गया तो उसक मृ यु हो जाती है । शर र के कसी भाग, नाखून (Toe)
या दुम (Tail) को न च (Pick) लेते ह, जहाँ से र त बहने लगता है । दूसरे सारे चूजे उसके
पीछे पड़ जाते ह, य क वहाँ से खून नकलने लगता है, उसको उस समय तक नोचते रहते
ह, जब तक उ ह लाल खून नकलता हु आ दखता है । अ त म उसक मृ यु हो जाती है ।
न न कारण से यह बात हो सकती है ।
* य द चूज को बहु त तेज काश दया जा रहा हो । इससे दूसरे चूजे के शर र के लाल दख
जाती है और उस जगह पर हमला हो जाता है ।
* य द चूज म भीड़ (Overcrowding) हो ।
* ूडर या कमरे का तापमान अ धक हो ।
* य द कमरे म नमी (Humidity) कम हो ।
* य द फ ड संतु लत न होकर नमक और ोट न वशेषकर अमीनो ए सड म कमी
(Deficient)हो ।
* य द फ ड चूज क आव यकता से कम मल रहा हो ।
* य द चूजे फ ड खा लेने के बाद बेकार (Ideal) ह तो भी प कं ग क सम या शु हो सकती
है ।
169
इन उपरो त कारण का नवारण ह इसका सह इलाज है । डी ब कं ग (Debeaking) से पूण
राहत मलती है।
(vii) हा नकारक गैस (Harmful Gases)
कभी-कभी अमो नया और काबन मोनो साईड या डाइ साईड गैस के कारण भी मृ यु हो सकती
है । अमो नया गैस हर उस शेड म कु छ न कु छ रहती है, जहाँ पो हो । पर जब यह बहु त
अ धक हो जाती है तो हा नकारक स होती है ।
जब भी कसी ऐसे शेड म चूजे पाले जाते ह, जहाँ साथ ह बड़ी मु गयाँ भी हो (जो गलत काम
है) या पुराने ल टर पर चूज को पाला जा रहा हो तो अमो नया क सम या हो सकती है ।
यह एक तीखी कड़वी गैस होती है, जो आँख और नाक म बुर तरह से महसूस होती है । इस
हालत म चूज के आँख से पानी नकलता है और अपने शर र से चूजे आँख को रगड़ते ह ।
इससे आँख म अ सर भी हो सकता है । कु छ चूज म अ धापन भी आ सकता है और बाद
म मृ यु ।
काबन मोनो साईड गैस काफ जानलेवा गैस है । जहाँ बुरादा, कोयले और लकड़ी क अगेती
जलाकर गम पैदा क जाती है, वहाँ इसक काफ संभावना है । य द ऐसे शेड को चार ओर
से लाि टक या बोर से ब कु ल ब द रखा गया हो और बुखार का धुंआ सीधे बाहर नकलने
के लए पाईप न लगा हो तो यह सम या अव य आएगी ।
सदैव यान रख, धुंआ हर हाल म बाहर नकले अ यथा बहु त अ धक सं या म मृ यु हो सकती
है । ऐसी हालत म चूके सु त पड़ जाते ह, लड़खड़ाते ह और अ त म मर जाते ह । पो टमाटम
करने पर फे फड़े गहरे लाल रंग के मलते है ।
13.5 ायलर पर का मौसम का असर
मौसम का ायलर पर काफ असर पड़ता है । मु यत: अपने यहाँ गम -बरसात-जाड़ा तीन
मौसम है, पर तु सच तो यह है क 365 दन म 365 मौसम है और यह नह ं, सुबह, दोपहर,
शाम और रात सब अलग-अलग ह । हम अपने रखरखाव म इसके अनु प प रवतन करना
आव यक है ।
(i) गम
य द कमरे का तापमान ( ू डंग के बाद) 650
से 800
F के बीच हो तो यह सबसे
अ छा समय है । ायलर ज द तैयार होगा ।
800
F से 900
F पर कोई सम या नह ं ।
950
F से 1000
F पर सचेत हो जाना चा हए ।
1000
F से ऊपर घर को ठ डा रखने का जतन कर ।
F.C.R. खराब होगा ।
1050
F से ऊपर मृ युदर बढ़ जायेगी ।
170
F.C.R. खराब होगा । तैयार होने म समय लगेगा तथा अवरोधक मता बीमा रय
से लड़ने क वशेष प से वायलर क कमजोर पड़ जायेगी । अत: हम शेड को और
चकन को ठ डा रखने क हर को शश को लागू करना चा हए ।
फ ड क खपत म काफ कमी तापमान के बढ़ने के साथ-साथ आती जायेगी । अत:
फ ड म 1 -2 तशत ोट न तेलयु त या वसायु त इनेज बढ़ा देनी चा हये । साथ
ह वटा म स एवं मनरल 25-30 तशत बढ़ा द । वटा म स एवं मनरल
150-175 ाम त टन फ ड म देना बहु त लाभ द होगा ।
बुरादे क गहराई कम रख । छोटे कसान तीन ह ते के बाद बुरादे क जगह बालू
का योग कर सकते ह और दन म गम के समय उस पर पानी छड़क कर ठ डा
बनाये रख सकते ह ।
शेड क छत पर ि कलर लगाकर पानी छड़के । छत पर फू स अलग से लगा हो
तो बेहतर होगा । िजस ओर से गम हवा अ दर आ रह हो, उधर प ल का पतला
पदा लगा द और छत से गरता हु आ पानी उसी पर गरे तो शेड म ठ डी हवा अ दर
जायेगी और साथ ह अ दर क गम हवा को लेकर दूसर खुले रा ते से बाहर नकल
जायेगी । इस कार शेड को आप आसानी से ठ डा रख सकते है ।
अगर गम हवा न चल रह हो तो पदा न लगाकर के वल छत को ठ डा कर । ठ डा
पानी ह पीने को द । साथ ह पानी के बतन बढ़ाकर कम से कम दुगना कर द
इले ोलाईट अगर पानी म दया जाये तो काफ कारगर होगा ।
यान रहे, आजकल काफ पानी क टंक शेड म ऊपर लगी होती है और यह वह
भाग है, जो गम म सबसे अ धक गम होता है । यह नह ं, पी.वी.सी. पाईप भी छत
के समीप ह लगी होती है । न चय इससे पानी का तापमान बढ़ता है । लाि टक
ऑटोमे टक कर म आकर यह ठ डा नह ं हो सकता है । अत: वा तव म पूण गम
भर या बरसात म जो पानी हम पलाते ह, वह अव य ठ डे पानी से अ धक तापमान
का होता है । हम इसम सुधार लाना होगा ।
जहाँ ायलर 1200-1300 ाम वजन से अ धक करने हो, उ ह दन म9- 10 बजे
के बाद फ ड न द । शाम 4-5 बजे से फ ड देना शु कर द । तैयार होने म कु छ
समय बढ़ सकता है, पर तु मृ यु कम होगी।
वैसे अब क ोल शेड भारत म भी बनने लगे ह, िजसम तापमान 800
– 850
F के
बीच बना रहता है ।
(ii) बरसात
यह मौसम देखने म सुहावना हो सकता है, पर तु ायलर या लेयस के लए काफ
घातक स हो सकता है । गम म आप थोड़ी सतकता से शेड को ठ डा रख सकते
ह । सूखे गम म जब हवा चल रह हो, नमी बढ़ाकर अथात् छत गील रखकर या
पद को नम करके । पर तु बरसात म जब क तापमान मई-जून के मुकाबले काफ
कम होता है । पर तु हवा म नमी (आ ता) अ धक होने के कारण ायलर पर बहु त
171
बुरा असर पड़ता है । जब तक हवा चल रह हो, तो ठ क रहता है, पर शाम को जब
3 बजे के बाद हवा क जाती है, िजसे आम भाषा म ‘गुम’ कहते ह, ायलर के
लये असहनीय हो जाता है, वशेष प से 1200- 1300 ाम से बड़े ायलर म
।
य द तापमान 950
F (350
C) हो और नमी 70 तशत तो ायलर पर तनाव या
ेस 1240
F(510
C) का पड़ेगा । अब आप खुद ह फै सला कर क ऐसी हालत म
ायलर को कै से जी वत रखा जाये । ऐसी अव था म हवा का आदान- दान िजतना
अ धक होगा, उतना ह लाभ द होगा । ऐसे पेड़-पौधे, िजनसे हवा शेड के आस-पास
कती हो, काट द । हवा के लए पंखे होने चा हए । दाने और पानी का वैसा ह
ब दोब त कर जैसा गम म कया गया था । रखने क जगह बढ़ा द अथात् जाड़े
के मुकाबले 15-20 तशत चूजे कम डाले । दोपहर बाद वशेष यान रख ।
(iii) जाड़ा
उ के हसाब से तापमान बनाये रखना अ य त आव यक है, ले कन इसके लए
शेड को पद से इतना ब द कर देना क चूज क ऑ सीजन क पू त न हो, जो बाहर
से आती हवा से मलती है, काफ हा नकारक है । साथ ह शेड के अ दर उ प न
काबन-डाईआ साईड मोनो-डाईआ साईड और अमो नया, जो एक हा नकारक जहर ल
गैस है, बाहर नकलती रहनी चा हए । यह तभी होगा, जब व छ वायु का आवागमन
होता रहे । इसके लए उ के हसाब से पद के ऊपर से हवा आने-जाने का रा ता
अव य छोड़ा जाय । यह उस के हसाब से तापमान को बनाये रखते हु ये वयं नणय
लेना है ।
आमतौर से देखा गया है क जाड़े म 3-4 ह ते पर बुखार या ूडर नकाल दया जाता
है । इसका नणय उ के हसाब से तापमान क आव यकता को देखकर करना चा हए
। 4 ह ते के चूज को 750
F ूडर के नीचे तापमान चा हये और कमरे का तापमान 650
F
होना चा हये । य द इससे कम ताप होता है तो आप ूडर या बुखार नह ं नकाल सकते
ह ।
ऐसा करने पर मृ यु दर बढ़ेगी । कसी बीमार का कोप भी हो सकता है । फ ड क
फालतू खपत तय बात है ।
13.6 ग मय के मौसम म मु गय क देखभाल:
(i) ग मय म 30 से 42 ड ी से ट ेड या उससे अ धक तापमान होने पर प य म न
के वल मृ यु दर अ धक होती है, वरन ् 5 से 20 तशत तक अ डा उ पादन भी कम
हो जाता है । इससे बचाव हेतु -
(a) 2.3 क ा. सो डयम बाई काब नेट या मीठा सोडा त टन आहार म मलाया
जा सकता है ।
172
(b) ह ट ोक से बचाव हेतु 454 ाम / त टन आहार क दर से वटा मन सी
अथवा अ धक गम म उ त दर से ह ए ीन आहार म मलाई जा सकती है
।
(c) अ या धक गम म जब मु गयाँ ताप नय ण के लए प टंग करना शु कर
देती ह तो पतले छलके के अ डे ा त होने लगते ह । इससे बचाव हेतु प य
को काब नेट पानी म दया जा सकता है ।
(ii) ये ायलर समूह जो ब यो य उस के हो, उ ह दोपहर म आहार नह ं दया जाना चा हये,
क तु यह सु नि चत करल क इस आहार यव था से शार रक भार कम न हो
(iii) गम के मौसम मे आहार का उपयोग कम हो जाता है, िजससे उ पादन मता भा वत
होती है । अत: ग मय म लेयर आहार म लगभग 25 तशत तक ोट न का समावेश
करद अथवा आहार उपयोग बढ़ाने हेतु ऐनज या काब हाइ ेड क मा ा कम कर द ।
(iv) साथ ह दाना गीला करके दया जाना चा हए ।
(v) मुग गह म अ धक गम और नम हवा नह ं रहनी चा हए । उसके नकालने हेतु सभी
वट लेटस खुले रह एवं उन पर टाट आ द के पद लगाये जाने चा हए, िजन पर दोपहर
के समय छड़काव कया जा सकता है । इसके अलावा पंख एवं कू लर का उपयोग भी
कया जा सकता है ।
(vi) गम के मौसम म 9- 10.8 प ी / वगमीटर से अ धक प ी घन व नह ं रखे ।
(vii) मु गय के पीने का पानी 10-13 ड ी से0 तापमान का इले ालाइट यु त पानी
दया जाना उपयु त रहता है ।
(viii) गम म 108 ड ी फॉरेनाइट से अ धक तापमान होने पर वयं मुग अथवा ल टर पर
भी छड़काव कया जा सकता है, ले कन यह उ पादन क ओर न सोच कर मुग को जी वत
रखने हेतु कया जाने वाला यास है ।
13.7 स दय एवं बरसात म मु गय क देखभाल :
माह जून-जुलाई एवं स दय के दौरान अ य मौसमी बीमा रय के साथ ह इ फे ि शयस
ो काइ टस व इ फे ि शयस बरसल डसीज (ग बोरो) के मले हु ए सं मण क संभावना अ धक
है । वशेषत: िजन प य म पहले सी.आर.डी कोराइजा या वसन तं क कोई अ य बीमार
ल नकल या सब ल नकल प म हो, उ ह अ धक सावधानी क आव यकता है । उ त
दोन ह बीमा रयाँ वषाणु ज नत है ।
ल ण : मु गयाँ -पतल बीट करना, वृ क एवं बरसा म सूजन, पैर क माँसपे शय म हेमोरेज
तथा साथ ह एअर सेक, े कया म ला लया सूजन आ द ल ण द शत करती है ।
बचाव : पूव म ह उ त से वे सीनेशन सु नि चत कर ल । प ी गृह म वे ट लेशन का वशेष
यान रखरोग होने पर ए ट बायो टक थेरेपी द व प य पर कसी कार का ेस न आने
दे ।
173
(ii) कोराइजा: यह रोग छोटे चूज म अ धक होता है । नाक, आँख से पानी आना, चेहरे पर
सूजन होना, फे फड़े व े कया म ला लमा तथा सूजन मलती है । उपचार हेतु पाँच दवस तक
उ चत ए ट बायो टक वटा मन क खुराक देनी चा हए।
(iii) कॉ सी डओ सस : यह रोग आइमे रया नामक परजीवी से फै लता है, जो आँत और सीका
को अपना नशाना बनाते है । इसके मु य ल ण है - दाना कम खाना, वजन कम होना,
बीट म खून आना, पंख फै लाकर बैठना, लंगड़े होना आ द । उपचार एवं बचाव हेतु ए ो लयम
सा स दये जा सकते है ।
(iv) कृ म रोग : कृ म रोग ज नत सम या इस मौसम म अ धक होती है । गोल व चपटे
कृ म आंत म पड़ जाते है । िजनसे मु गयाँ सु त, कलंगी काल पड़ना, उ पादन कम हो जाना
आ द ल ण द शत होते है । इसे रोग से बचाव हेतु समयब कृ मनाशक क खुराक द जानी
चा हए ।
(v) फफूं द ज नत रोग : यह रोग आहार व लटर म अ धक नमी के कारण उगी फफूं द एवं
उनके टॉि सन वारा होता है । बचाव हेतु उ चत ए ट फं गल औष धयाँ बचाव के तर तक
अथवा लहसुन या इसका तर आहार म 3 तशत के तर तक उपयोग कया जा सकता
है । साथ ह 0.5% नीले थोथे के घोल से फाम को धोया जा सकता है । (वषा ऋतु म फै लने
वाले व भ न रोग, ए परिजलो सस कोराइजा कॉ सी डओ सस कृ म रोग व अ य फफूं द
ज नत रोग से बचाव हेतु बछावन सदैव शु क रहना चा हए । इस हेतु आव यकतानुसार लकड़ी
के बुरादे आ द का योग कया जा सकता है । प ी गृह म वायु का उ चत आवागमन सु नि चत
कया जाना आव यक है ।
13.8 सारांश:
प य म मौसमी रोग क समु चत देखभाल, समय रहते उनका उ तम ब धन ह इन रोग
वारा कु कु ट पालन से बारहमास होने वाल आ थक त क भरपाई हो सकती है I
अ या धक गम के मौसम म प य म ेस (तनाव) एवं अ य ह ट ोक जैसे रोग से
उ पादन म ती गरावट के साथ-साथ शर र का तापमान अ नयि त प से बढ़ता जाता
है, िजससे प य म तापघात एवं लू लगने जैसे ल ण द शत होते है । शर र म पानी
क कमी होने से उ पादन म भार गरावट एवं प य म अ या धक मृ यु दर पाई जाती
है । िजसका कारण नजल करण एवं ख नज लवण क कमी होना है । अत: गरमी के
मौसम म प य को ठंडक क यव था एवं पीने का पानी ख नज लवण के साथ बार-बार
देना चा हए ।
सद के मौसम म ठ ड से बचाव हेतु परदे लगाए जाने चा हए तथा बफ ल हवाओं से कु कु ट
शाला के प य को दूर रखने का उ चत ब धन करना चा हए । वषा ऋतु म वशेष सावधानी
बरतते हु ए ल टर गीला ना होने दे । आव यकतानुसार बछावन बदल द । कु कु टशला के अ दर
एवं बाहर क टानुरोधी औष ध का छड़काव कर ।
174
इस कार उ े यपूण एवं लापरवाह र हत यव था को अपनाकर कु कु टपालक अपने प य
को अ या धक तापमान से बचा सकते ह तथा उनसे अ धक उ पादन (अंडा या मांस) लेकर
अपनी आ थक ि थ त सु ढ़ कर सकते ह ।
175
इकाई : व भ न रोग से जुड़ी जै वक सुर ा एवं नरोगी
प ीपालन
इकाई – 14
14.0 उ े य
14.1 तावना
14.2 जै वक सुर ा एवं संल न कारक
14.3 जै वक सुर ा के लए मुग फाम पर कये जाने वाले पूव ब धन
14.4 कु कु ट रोग एवं व भ न रोग सार मा यम
14.5 ग नरोधक स ा त
14.6 नसं मण काय म
14.7 दाना एवं पानी का शु करण
14.8 अ ड क जै वक सुर ा
14.9 सारांश
14.0 उ े य
जै वक सुर ा से अ भ ाय मुग पालन का सं मण र हत (जीवाणु/ वषाणु /परजीवी/फं फू द )
स पूण वकास एवं लाक के समु चत ब धन से है । जै वक सुर ा कु कु ट वकास को ऐसा
आधार दान करता है, िजसम वा य से जुड़ी सम याओं के नराकरण के साथ-साथ
मुग शाला क साफ-सफाई, उपकरण एवं अ य यु त साम ी को जीवाणु र हत बनाना
(Sanitation) व कु कु टशाला को Hygienic प रि थ तयाँ दान करने क याओं को
लागू करना है । इकाई म व णत अ ययन साम ी के समावेश का उ े य भी जै वक सुर ा
को आधार बनाकर नरोगी कु कु ट पालन करना ह है ।
14.1 तावना
भारत वतमान म कु कु ट पालन वकास क ग त म नर तर अ सर हो रहा है, िजसका एकमा
कारण आधु नक टे नोलॉजी के उपयोग के साथ-साथ रोग उ प न करने वाले व भ न सं मण
पर नय ण ह है । इसके साथ-साथ एक मह वपूण पहलू यह भी है क तवष कु कु टपालन
म होने वाल आ थक हा न का अ धकांश ेय कु कु टशाला के समु चत ब धन के अभाव
म आने वाले रोग जैसे, रानीखेत, ग बारो को लवेसीलो सस सालमे नलो सस
176
माइको लाजमो सस व अ य, योग म लये जाने वाले बचाव एवं रोकथाम के उपाय म बरती
जाने वाल श थलता एवं ु टय के कारण प य को रोगी बनाते है । अ धकाँश जीवाणु एवं
वषाणु सं मण व भ न मा यम से जस वायु, पानी, दाना, मुग शाला म काम करने वाले
कायकता एवं आसपास साफ-सफाई के अभाव म एक कु कु टशाला से दूसर कु कु टशाला एवं
एक थान से दूसरे थान पर फै लते है । अत: आव यकता इस बात क है क फै लने वाले
इन सं मण को रोका जाये, साथ ह कटाणुओं का मुग शाला म वेश नषे कया जावे
। जै वक सुर ा ह वह या है, िजसम हम व भ न मा यम के वारा यह काय पूण कर
सकते ह । इकाई म इ ह ं व भ न याओं का वणन कया गया है । व भ न रोग,
उ पादकता कम करते है । अत: यास यह हो क प ी नरोगी रह, रोग सं मण नह ं हो
तथा रोग का नवारण कया जावे । नरोगी प ी समूह ह आ थक संतुलन का आधार है ।
14.2 जै वक सुर ा एवं संल न कारक
जै वक सुर ा को रोग मुि त के प रपे म देखना होगा, इसे आ थक प से ा त करने के
लए कु कु ट गृह नमाण यव थाओं एवं सु वधाओं के उपयु त उपभोग तथा कायकताओं क
यो यता व काय मता पर यान देना होगा । पूव न मत कु कु टशालाओं पर हो सकता है,
सभी जै वक सुर ा उपाय पूण प से लागू न कए जा सके , क तु नये नमाण तथा नये
ोजे ट म इनका स पूण उपयोग अव य ह कया जा सकता है । नमाण के दौरान हवा
(Wind) का वाह एवं दशा इस तरह रखी जाव क जीवाणुओं का वेश यूनतम लेवल पर
कया जा सक, य क हवा के मा यम से ह सं मत त व जैसे - धूल, पंख, सं मत ाव
आ द आसानी से कु कु टशाला म वेश कर जाते है । इसी कार उ चत थान का चयन एवं
आसपास गंदगी र हत वातावरण रखना आ द ऐसे ब धन है, िजससे जै वक सुर ा के उपाय
को आसानी से लागू कया जा सकता है । इसके लए नमाण के दौरान न न ब धन आव यक
है ।
(i) मुग शाला के चार ओर कट लेतार क फे ि संग (Fencing) होनी चा हए ता क कु त ,
जानवर , सूअर , चूह का वेश रोका जा सके । पशु अपने साथ कई कार के सं मण
के वाहक होते है ।
(ii) अ य प य जैसे जंगल च ड़या, कबूतर, कौआ (Stray Birds) मुग य म व भ न
रोग सं मण ला सकते है । अत: इनके वेश को नषेध करने के लए ह क जा लयाँ
(Wires) लगाना उ चत रहेगा । इसी कार बरगद, आम, नल गर जैसे बड़े पेड भी
कु कु टशाला के आसपास नह ं होने चा हए अ यथा यह जंगल प य को जो रोग के
वाहक होते ह, आमं त करगे ।
(iii) दाना पूण प से सुर त थान पर ह सं हत (Store) कर । यह सूखे, हवादार पानी
र हत थान पर सं हत कये जावे, चूह का वेश नह ं हो, दाना पूण प से नमी मु ता
थान पर ह रखा जावे अ यथा फफूं द ज नत रोग क संभावना बनी रहती है ।
177
(iv) अ धकतर सं मण एक कु कु टशाला से दूसरे म आने वाले यि तय के मा यम से वेश
करते ह । अत: बाहर से आने वाले आग तुक का वेश पूण नषेध रहे, वाहन का
आवागमन ना हो तथा मुग शाला के कायकता ह साफ-सफाई का यान रखते हु ए Foot
Bath ( वेश के थान पर जीवाणुरोधी घोल) का योग कर मुग शाला म वेश कर ।
(v) मृत प य का न तारण, शी उ चत व ध जैसे जलाना, गाड़ना अथवा इन सनेरेटर
का योग कर ह करना चा हये । गाड़ने वाले ग ढे क गहराई 2-3 फ ट से कम ना हो
अ यथा कु ते व अ य पशु उसे नकाल कर पुन: सं मण का कारण बन सकते ह । ग ढे
म नमक का योग भी कर । आसपास के थान पर चूना डाले ।
(vi) वा य कायकता अथवा मुग शाला के कायकता भी वंय कसी सं मण से सत
नह ं होने चा हए । उ ह ट .बी., टायफाइड (Typhoid), Enteritis जैसे रोग नह ं होने
चा हए । साथ ह कायकता काय करते समय गमबूट व द ताने का योग कर ।
14.3 जै वक सुर ा के लए मुग फाम पर कये जाने वाले पूव ब ध
14.3.1 क ट पतंग (Insect & Pest) का नयं ण:- मुग फाम पर क ट-पतंग क
उपि थ त, रोग होने क गारंट होती है । इनके वेश से र त परजीवी रोग जैसे
पाईरोक टो सस कॉ सी डयो सस व अ य रोग तेजी से पनपते है । उपयु त
क टनाशक औष ध का चयन एवं उनक नधा रत मा ा का योग कर इन वे टर
परजी वय से नजात पाई जा सकती है । उदाहरणाथ Cythion – 8-16ml/ Lit.
9 Water- े के प म
List of Disinfectants
न न सभी जीवाणुरोधी औष धयाँ Bird Flu के रोकथाम एवं बचाव के लए भी कारगर एवं
उपयोगी स होती है ।
(a) रे ट फाइड ि ट या सेवलोन या डटोल (1%) का योग हाथ एवं पैर क सफाई के
योग म लाया जाता है । यह घोल फाम वकर के साथ - साथ आग तुक के योग के
लए भी उपयोगी रहेगा ।
(b) 2% सो डयम हाइ ो साइड का घोल मुग फाम के वेश वार पर जूत क सफाई के
योग म लाया जा सकता है ।
(c) सो डयम हाइपो लोराइट 2% घोल के योग से नकलने वाल लोर न (Active) वारा
मुग शाला के औजार को जीवाणुर हत कया जा सकता है ।
(d) वाटरनर अमो नया क पाउ ड 4% घोल मुग शाला क द वार , छत , फश एवं औजार
का सं मण र हत करने के लए पया त है ।
(e) कै ि शयम हाइ ो साइड 3% घोल द वार और फश के लये
(f) 2.2% घोल सो लक ए सड (Cresolic Acid 2.2% sol) फश क सफाई के लए
(g) फ नोल 2% घोल फश के लए
178
(h) वरकोन -एस (Vircon-S)एवं Trilocid Concentrate
(i) यु मगेशन के लए फाम लन (Farmalin) एवं पोटे शयम परमेगनेट (Pot.
Permaguate) योग म लया जावे।
14.3.2 ALL IN ALL OUT: कु कु ट उ योग म यह आव यक है क बना कसी बीमार
के पूरा लोक तैयार होकर बाहर नकल जाये, क तु आम तौर पर ऐसा होता नह ं
है । कोई न कोई बीमार कसी भी उ पर आ जाती है । ोयलर उ योग म तो
यह आम बात है । और बीमा रयाँ 5 से 6 स ताह क उस म आ जाती है एवं इलाज
कराना पड़ जाता है । इससे खच तो बढ़ता ह है, साथ ह वजन कम समय यादा
और फ ड क खपत बढ़ कर फ ड पा तरण (F.C.R.) खराब होता है । इससे उ पादन
क क मत इतनी बढ़ जाती है क ाय: नुकसान हो जाता है । यह सम या हर जगह
है और कोई भी फाम इससे बचा नह ं है । जो ऑल इन ऑल आऊट का स ा त
नह ं अपनाते, उ ह नुकसान उठाना पड़ सकता है । इस स ा त को अपनाने से भले
ह एक लौट साल म कम नकले, क तु त लाट उ पादन खच बहु त कम आयेगा
। बस यान रहे, वह पहला लाट जो आपने नकाला था । पूरा लाट तैयार होने के
बाद जब नकल जाये तो पूरे शेड (Shed) को भल भाँ त साफ करके 7-10 दन
का व ाम द । उसका पूरा अनुसरण कर बि क उससे भी बेहतर करने क को शश
कर । आने वाले दन म जब व व यापार खुल जायेगा, तो हम हर हाल म उ पादन
क मत म कमी लानी होगी, तभी हम वदेशी माल का मुकाबला कर सकगे । यह
कमी आयेगी, के वल एक समय म पूरे फाम पर एक ह उ के चूज से ALL IN
ALL OUT.
14.3.3 Cleaning & Disinfection Programme:
OBJECTIVES-
1. To avoid various bacterial, viral, fungal & protozooal diseases.
2. To enhance the performance of birds.
STEPS TO BE FOLLOWED:-
1. Remove all portable equipment’s clean & wash them with jet of
wash, Afterwards dip them in any suitable disinfectant as per
manufactures instructions & then sun dry for a day.
2. Remove all organic material preferably after spraying 5 to 10%
formalin & disposed it off away from farm premises.
3. Control of Rodents & Wild birds entry.
179
4. Cleaning of overhead tank with pipeline -5 to 10% sodium
hypochloride keep it over night & then flush the system with plain
water.
5. Heat treatment- Burning of floor, cages, side wiremesh with flame
fun to reduce coccidiosis, wing etc.
6. Chemical Treatment- Soak floor with strong solution caustic soda
flakes for 12 to 24 Hrs. with pH above 12 in order to kill IBD virus.
Dose of NaOH-11 to 12gms / lit of water, or 1.4kgs/1000sq.ft.
7. Control of Ticks, Mite and Lice infestation by spraying any
insecticide e.g. - Cythion – 8 to 16 ml/ lit of water.
8. White wash –Lime stone +2 to 5% formalin +1% Copper Sulphate.
9. Fumigation- 20gms of KMNO4+40 ml formalin for 100cu.ft.
10. Spray viricidal disinfectants.
11. Keep the house vacant for 7to15 days.
14.4 कु कु ट रोग एवं व भ न सार मा यम
मु गय म होने वाले कु छ रोग वशेष सार मा यम के वारा न न प से फै ल सकते है
। अत: रोग कारक वारा रोग के सार तथा रोग नषेध क व धय के व लेषण से ह रोग
होने क संभावनाओं को सी मत कया जा सकता है ।
. रोग सार का मा यम
1. कोराइजा य / अ य - यि त या उपकरण
2. फाउल –टायफाइड य / अ य - यि त या उपकरण,
व टकल, अंस-ओवे रयनआहार व बछावन
वारा, चूहे आ द ज तुओं वारा ।
3. इ फे ि शयस- ांकाय ट सवायु सारण, य / अ य स पक
4. मायको ला मो सस य / य सं मण, व टकल,
ाँस-ओवे रयन, आहार व बछावन वारा, चूहे,
जंगल प य व अ य कारक वारा
5. पैराटायफाइ ड य /अ य , व टकल, एग-क टे मनेशन,
आहार व बछावनसे स पक, चूहे, जंगल
प य व अ य कारक से
6. पा चुरेलो सस य / अ य स पक -आहार व बछावन
वारा चूहे, जंगल प य व अ य कारक से
7. पुलोरम (वी.ड लू.डी.) य / अ य स पक- यि त व उपकरण
वारा, व टकल, ांस-ओवे रयन, आहार व
180
बछावन वारा तथा चूहे आ द वारा
8. यू कै सल (आर.डी.) रोग वायु य / अ य , स पक
9. मेरे स- डजीज य / अ य - यि त या उपकरण वारा
10. ल फायड-
यूको ससव टकल,
ाँस-ओवे रयन
11. ले र जो- ेकाय टस वायु सारण, य अ य स पक
12. इ फे ि शयस बसल य
स पक,
अ य स पक
13. डजीज (ग बोरो)
14. रयो-वायरल आथराइ टस व टकल, ांस-ओवे रयन य स पक
15. रयो-वायरल-मालए ज वशन व टकल, ांस-ओवे रयन, य स पक
आहार व बछावन से स पक
16. ए डनोवायरस य (डायरे स) स पक
17. व टकल (अनुल ब) स पक
एग-क टे मनेशन (अ ड-सं मण)
अ य (इन-डायरे ट) सं मण- यि त या
उपकरण वारा
18.
19.
20.
21. ए पिजलो सस व टकल, एग क टे मनेशन
22. ए वयन
ए सेफलोमाइलाइ टस
व टकल, ांस ओवे रयन ( ड ब वारा), य
/ अ य
23. ए वयन इ लुए जा य / अ य -जंगल प य व अ य
कारक वारा
24. ए वयन पॉ स वायु सारण, य स पक
25. लोि यल-ए ाय टस आहार व बछावन वारा
26. कॉल बे सलो सस य स पक, आहार, जल तथा य
27. कॉ सी डयो सस य - आहार / बछावन वारा
जै वक सुर ा, कु कु ट ब ध यव था के अ तगत आने वाले व भ न ब ध काय क वृहत
ृंखला है, िजसम रोग के वेश पर रोक तथा रोग के अ य ईकाइय मे वतीयक या पा व
सार के खतरे को कम करना भी है ।
रोग के सार क आवृ त का मापद ड प ी घन व, ोत व सारक प य तथा प ी समूह
के व तारण के अलावा मानव सार वारा भी होता है ।
यावसा यक कु कु ट पालन म होने वाले रोग कु कु ट यवसाय को लाभ क संभावनाओं से
वं चत कर सकते ह, य क रोग से उ पादन मता व उ पाद के गुण म हास, मृ युदर म
वृ . आहार उपभोग म कमी तथा लागत-मू य का अवमू यन होता है ।
181
पार प रक प से रोग का उपचार यावसा यक लाभ क तुलना म अ या धक महंगा होता
है । अत: रोग क ती ता तथा उससे होने वाल हा न को कम करने म ‘इ यूनाइजेशन
( तका रता) का अ य त मह व एवं तथा यावहा रकता होती है । तथा प 'इ यूनाइजेशन'
- 'इ यून डे फ शएट' ( तका रता रोधी) सं ामक रोग जैसे वसल डजीज, आई.वी आ द म
प य को पूण प से व थ रखने म व वसनीय नह ं है ।
15.5 रोग नरोधक स ा त
1. सघन कु कु ट पालन अ भयान म पैतृक समूह से कम से कम 5 कमी. पैतृक समूह तथा
लेयर (अ डो पादक प ी) समूह को कम से कम 3 कमी. तथा लेयर व ायलर समूह
को कम से कम 1 क.मी. दूर कु कु ट गृह म पालन करके तथा कु कु ट पालन फाम से
यि तय व उपकरण के अनाव यक आवागमन को रोक कर रोग फै लने के खतरे को
कम कया जा सकता है ।
2. यावसा यक कु कु ट ईकाइयाँ 'ऑल इन- ऑल आउट' स ा त पर रखनी चा हए ।
' र लेसमे ट टॉक' व श ट रोग से पूणत: मु त तथा उ पादक प य म फै ले रोग
के त पूणत: ‘इ यूनाइज' होनी चा हए ।
3. ायलर, लेयर तथा पेरे ट कु कु ट के फाम उन थान पर था पत होने चा हए, जहाँ
यावसा यक कु कु ट-पालन का घन व कम हो तथा जहाँ अ यावसा यक व थानीय
कु कु ट न रखे जा रहे हो ।
4. कु कु ट पालन फाम मु य प रवहन माग के नकट होने चा हए ता क वहाँ सुगमता से
पहु ँचा जा सके ।
5. चोर अथवा रोग के वेश क संभावनाओं को रोकने क ि ट से येक कु कु ट पालन
फाम तथा क पृथक प से घेराब द कए हु ए ह । वेश के सभी माग विजत े ’
क चेतावनी से यु त व काय करने वाले कमचा रय क अनुपि थ त म पूण प से
तालाब द कए हु ए ह ।
6. कु कु ट पालन े म वेश के पूव सभी यि तय का ‘रोग-असं मण’ क ि ट से
नाना द करके व कु कु ट पालन ईकाइय के लए नधा रत व ा द धारण करने चा हए।
7. दू षत आहार से पैराटायफाइड, सालमोनेलो सस आ द रोग हो सकते ह । ‘ताप-दाब या’
से आहार के हा नकारक सू म जी वय को ख म कर, इसे 'पैलेट आहार’ (गो लयाँ) म
बदला जा सकता है ।
8. सामा यत: ायलर, पेरे ट व लेयर कु कु ट समूह के आहार लाने-ले जाने के लए
पृथक-पृथक वाहन का उपयोग उ चत रहता है । इन वाहन को वा पस आहार-संयं म
ले जाने के पूव धोकर जीवाणु मु त कर लेना चा हए।
9. येक कु कु ट पालन फाम व इकाई के उपयोग हेतु पृथक-पृथक उपकरण होने चा हए
। अ य उपयोग म आने वाले उपकरण को फाम म लाने से पूव पूण प से जीवाणु
182
र हत करने के लए जीवाणुनाशक घोल से अ छ तरह धो लेना अथवा ' यू मगेट' कर
लेना चा हए ।
10. अ ड को रखने हेतु लाि टक क े उपयोग म लेनी चा हए तथा उ ह योग करने के
पूव जीवाणुनाशक घोल से धो लेना चा हए ।
11. साफ, शु क व यावसा यक कु कु ट से स पक- वह न बछावन ( लटर) काम म लेना
चा हए । अ धक बछावन काम म लेना व यं ीकरण रोग सं मण क संभावनाओं को
कम करता है ।
12. ण व घायल कु कु ट, श त यि तय वारा व थ प य से पृथक कर न ट करने
हेतु कु कु ट आवास दूर एक के य वनाश थल पर ले जाने चा हए तथा समु चत प
से न ट कर देने चा हए ता क रोक फै लने क अ म संभावनाओं को रोका जा सके ।
इस हेतु आव यक वाहन व साधन सावधानीपूवक काम म लाने चा हए ।
13. कसी भी ि थ त म कु कु ट- य म प ी घन व अ या धक नह ं होना चा हए ।
14. कु कु ट आवास का नमाण, रखरखाव व पूण प से तकनीक सलाह पर आधा रत होना
चा हए । दोषयु त आवास कु कु ट पालन यव था म यवधान उ प न करते ह ।
14.6 नसं मण काय म
(i) येक कु कु ट आवास गृह व फाम से व उसके चार ओर से सम त म ी व लटर पूण
प से हटा द ।
(ii) काम म आने वाले सम त उपकरण को एक मु य थान पर एक करके व उसके मु य
भाग को पृथक करके आव यक व उपयु त व ध से जीवाणु मु त कर द ।
(iii) पुराने व बचे आहार को पूण प से हटा द ।
(iv) व युत आपू त यव था का अ छ तरह से नर ण कर ले ।
(v) कु कु ट गृह के बा य भाग को जीवाणु र हत व रोगमु त करने हेतु आय नक जीवाणुरोधक
डटज ट के घोल से 10 क ा. / सेमी. के दाब पर मश: छत, बाहर द वार , नकास
ना लय व काय थल को धोय ।
(vi) कु कु ट गृह के आ त रक भाग को साफ करने के लए छत, द वार , परद , वे ट लेटस
(संवातक), जमीन व आहार पा को साफ करना व उन पर पड़ी म ी को हटा देना
आव यक है । इस हेतु अनाय नक जीवाणुरोधी डटज ट घोल अथवा जल क बौछार उ च
दाब पर धोना चा हए । इस काय हेतु - वाटरनर -अमो नयम यौ गक' अथवा फ नो लक
जीवाणुरोधी घोल भी उपयोगी है । कु कु ट क को अ छ तरह जीवाणु र हत करने हेतु
फामि डहाइड- यौ गक से ा त 'फाम लन वा प’ से ‘ यू मगेट' (धू ीकृ त) करना अ य त
ह उपयोगी है ।
(vii) रोग मुि त व जीवाणु रोधन क तकनीक क मानक णाल अपानाने से जै वक सुर ा
काय म को उ च मता दान करते हु ए वां छत आ थक लाभ ा त कये जा सकते
है ।
183
14.7 दाना एवं पानी का शु करण
अ छे उ पादन के लए य द चूज को तीन तरह का अलग-अलग राशन दया जाये तो बेहतर
होगा ।
0- 10 दन तक ी टाटर - ायलर फ ड
11-24 दन तक टाटर - ायलर फ ड
25 दन से बाजार करने तक फनीशर - ायलर फ ड
(i) इन तीन राशन म ोट न और एनज क मा ा म - भ न होगी-
ोट न एनज
ी टाटर 23-24% 2900 K.Cal.
टाटर 21-22% 2950 K.Cal.
फनीशर 19-20% 3000 K.Cal.
(ii) एक फ ड से जब दूसरे फ ड म बदलना है तो धीरे-धीरे बदल । ी- टाटर म जाने के लए
पहले दन 3 भाग ी- टाटर और 1 भाग टाटर मलाकर खलाय और इसके बाद दोन
आधा-आधा आपस म मलाकर दो दन खलाव । अ त म 1 भाग ी टाटर और तीन
भाग टाटर मलाकर दो दन खलाये । इसके बाद के वल टाटर । इसी कार जब टाटर
से फ नसर म बदले तो धीरे-धीरे बदले, ऐसा नह ं करने पर वजन म कमी आ सकती
है और आँत म सूजन (Enteritis)
(iii) ोयलर उ योग म सफलता के लए कम समय, कम फ ड पर अ धक से अ धक वजन
ा त करना आव यक है । 4 स ताह म 1700 ाम फ ड पर 1 kg. वजन से अ धक
ा त करना सफलता होगी ।
(iv) ॉयलर उ पादन म फ ड अके ले खच का लगभग 50% भाग है । अत: हर हाल म इसका
संतु लत होना आव यक है । साथ ह फ ड को बरबाद होने से बचाना भी आव यक है।
(iv) ार भ के तीन-चार दन फ डर पूरे भरे होने चा हए । जो फ ड गरेगी, वह अखबार
पर गरेगी ।
(vii)इसके बाद दो स ताह तक आधा भाग ह फ ड भरे । तीसरे स ताह से अ त तक व
1/3 से यादा फ ड फ डर म न भर । इस तरह काफ फ ड को बेकार होने से बचाया
जा सकता है ।
पानी :- कु कु ट के शर र म पानी का बड़ा मह व है तथा यह एक आव यक पोषक त व
क तरह काय करता है । आयु के हसाब से च कन म 55 से 75% पानी, नवो दत चूजे म
80 से 82% पानी पाया जाता है । शर र म 10% पानी क त शार रक वकार पैदा करती
है, जब क शर र से 20% पानी का नकलना मृ यु का कारण बन सकता हे ।
पानी शर र क सभी उपापचयी याओं के लए आव यक है । अत: इसक हमेशा उपल धता
बनी रहना व व छ ताजा, ठ डा पया त मा ा म हमेशा उपल ध रहना चा हए । एक औसत
के हसाब से मु गय को दो एम.एल. (2ml) पानी क आव यकता त एक ाम दाने क
184
मा ा पर होती है, जो क बढ़कर ग मय म तीन से चार गुना हो सकती है । चूजे वय क
मु गय क अपे ा अ धक पानी पीते है । चूज को पानी क कमी डीहाइ ेशन, शर र के भार
म कमी, कम वृ एवं मृ यु का कारण हो सकती है । समय -समय पर पानी के बतन, फ टर,
टक, वाल, स लाई लाइन आ द को देखते रहना आव यक है । शर र म पानी के न न काय
होते ह ।
(i) पाचन या म सहायक
(ii) छोट आत म भोजन के अवशोषण के लए आव यक
(iii) शर र के व भ न भाग म पोषक त व को पहु ँचाना
(iv) शर र म अप श ट पदाथ को बाहर नकालना
(v) थम रेगुलेशन
(vi) जै वक अंग को होने वाल त को रोकना
(vii) व भ न जोड़ को कायशील बनाये रखना
(viii) पानी क PH 5.5 (औसत 6.8 से 7.2)
जल क वशेषताऐं :- जल म ख नज त व का म ण
(i)Hard Water – Very Soft (15PPM) से Very Hard (2000+PPM), प ी -1000
PPM तक के पानी को नह ं पीती है । अ धक कम होने पर पापी का के ि शयम पदाथ वा व
व नपल पर जम जाता है, िजससे वह अव हो जाते है एवं पानी उपल ध नह ं हो पाता।
(ii)खारा पानी (Saline Water) - ऐसा जल को टल े म जहाँ पर लोराईड और काब नेट
के सो डयम और पोटे शयम त व अ धक पाये जाते है, पाया जाता है ।
(iii) पानी म नाई ाइट और नाई ेट क उपि थ त वषा तता उ प न करती है ।
(iv)पानी म लोह त व (Iron Salt) क उपि थ त 0.3 PPM तक ह वीकाय होती है ।
पानी म स फर त व अ ड को लड़ाने का काय करते ह, जो पानी म Sulphides क
उपि थ त के कारण होता है ।
पानी का शु करण –
(i) अ ावायलेट रेडीयशन वारा (Ultra Violet Radiation,) -यह जीवाणुओं क सं या
को कम करता है, क तु अ धक खच ला है ।
(ii) गम करना एवं छानना (Boiling and Filtration) -यह व ध अ धक पानी के शु करण
के लए पया त नह ं है ।
(iii) रसाय नक व ध वारा (Chemical Purification) -यह व ध जीवाणुरोधी उ तम व ध
है । वशेषकर पानी के लोर नेशन से (Chlorination) सभी जीवाणुओं का खा मा हो
सकता है एवं यह एक स ती व ध भी है I
List of Chemical Water Purifier जो माकट म उपल ध है तथा काय म लए जा रहे है I
185
186
14.8 अ ड क जै वक सुर ा
अ ड का उ पादन उ चतम ेणी का होना आव यक है । इसके लए Candle व ध अपनायी
जानी चा हए ।
(a) अ ड क साफ सफाई एवं जीवाणुमु त बनाना -
ग दे अ ड को अ छ तरह से प छ ल । इसके लए अ ड को गम पानी (100०
) िजसम
4.5% डटोल अथवा 0.5% फोरमल डहाइड मला हो, से धोकर साफ कर ल ।
(b) अ ड को Sanitize करने के लए न न योग म लेव ।
-Formaldehyde Gas- Fumigation
100 Cubicft
Area के लए 20gm P.P+40ml formation (Ratio 1:2) योग म
लेव
Area= L x B x H=.......................Cubic ft. Area.
(c) Quaternary Ammonia –Spray -200 PPM
(d) Ozone (O3) effective at 100 PPM for hatching eggs.
वतमान म बड लू रोग संसार के व भ न भाग म इमिजग (Emerging) प म कट होकर
कु कु ट पालन को आ थक त पहु ँचा रहा है । वष 2006 म देश के महारा एवं गुजरात
रा य म इसक पुि ट हु यी है । अत: इस रोग के फै लाव को रोकने, प य को नरोगी रखने
एवं मनु य म इस रोग के फै लने क आशंका को म ेनजर इस रोग के वषय म पूण तैयार ,
बचाव एवं रोकथाम के समु चत उपाय का ब धन एवं कु कु ट पालक को वषय आधा रत
जै वक सुर ा के वषय म जानकार होना अ य त आव यक है ।
कु कु ट पालक को जै वक सुर ा के फाम पर न न उपाय आव यक प से करने चा हए
(i) प य को अ य पशु एवं जंगल प य से दूर पाले तथा फाम पर अ य प य व पशुओं
को सि म लत न होने देव ।
(ii) फाम पर साफ-सफाई का वशेष यान रख । जीवाणुओं को कु कु टशाला म वेश न करने
देव एवं इनक वृ रोकने के लए फाम पर डसइ फे टड का योग कर खाने एवं पीने
के बतन, के स, फश, द वार इ या द अ छ तरह से साफ कर ल ।
187
(iii) वयं भी व छ रहे तथा नये प य को सि म लत करने से पूव अलग रख । वयं
के कपड़े,. जूते, हाथ को अ छ तरह से जीवाणु र हत करने के प चात् ह कु कु टशाला
म वेश कर अथवा पश कर ।
(iv) बाहर से लायी हु ई उपकरण औजार अथवा कसी भी चीज के मा यम से रोग के क टाणु
कु कु टशाला म नह ं लाये ।
(v) प य पर लगातार नजर रख, देख - अ या धक मृ युदर अथवा बड पड़ रोग के कोई
भी ल ण जैसे- आँख के पास गदन एवं सर पर सूजन आना, कलंगी एवं वेटल का सूजना
आ द ।
(vi) सभी तरह के रोगी प ी क अचानक अ या धक मृ युदर क सूचना नकट थ पशु
च क सालय को देव एवं रपोट कर ।
(vii) एक बार म एक ह उ के प य को कु कु टशाला म पाले । इस तरह से ALL
IN ALL OUT स ा त क पालना करI
(viii) कसी भी अनाव यक आग तुक वेश को प ी शाला म रोके एवं आने एवं जाने के
पूव एवं प चात प ी शाला को, वयं को जीवाणु र हत करना सु नि चत कर
14.9 सारांश
ईकाई के अ ययन से यह प ट प रल त हो रहा है क बीमा रय के रोकथाम, उपयोग कये
जाने वाले दाना एवं पानी के जीवाणु र हत याओं एवं कु कु टशाला म साफ सफाई के
रखरखाव के बगैर व थ कु कु टपालन एवं उससे ा त होने वाले आ थक लाभ क क पना
नह क जा सकती है । जै वक सुर ा म अपनाये जाने वाल टे नोलॉजी एवं उसके या वयन
के लए जानकार का होना अ य त आव यक है । कु कु ट पालक को यह भी सु नि चत करना
ह होगा क चाहे कसी भी मा यम से हो, सं मण को कु कु टशाला तक नह ं पहु ँचने देना
है । साथ कु छ वशेष Zoonotic रोग के वषय म जैसे Bird Flu या Avian Influenza
जो मानव वा य क ि ट से भी मह वपूण है और वतमान म Emerging रोग के प
म उभर रहे है; व तृत वै ा नक जानकार हो तथा उसके रोकथाम एवं बचाव के समु चत
ब ध पूव म ह जै वक सुर ा के मापद ड को अपनाकर समय रहते कर लये जावे तो होने
वाल बड़ी आ थक हा न से बचा भी जा सके गा, साथ ह यह यवसाय एवं समाज दोन के
लए अ तमह वपूण होगा । इस तरह से यह न कष नकाला जा सकता है क जै वक सुर ा
ह नरोगी कु कु टपालन का आधार त भ है ।
188
189
इकाई - व भ न पोषक त व क कमी से होने वाले रोग एवं
अ य मेटाबो लक डसआडर
इकाई - 15
15.0 उ े य
15.1 तावना
15.2 कु कु ट पोषण के मुख कारक व उनक कमी से होने वाले रोग
152.1 ोट न व अमीनो अ ल
15.2.2 काब हाई ेट
15.2.3 वसा
15.2.4 वटा मन
15.2.5 मनरल (आव यक अकाब नक पदाथ)
15.2.6 जल
15.3 व भ न ता लकाऐं
15.3.1 वटा मन के काय/कमी के ल ण व ाि त का साधन
15.3.2 BSI वारा नधा रत मापद ड
15.3.3 मनरल के काय / कमी के ल ण
15.4 वटा मन एवं अ य आहार त व क कमी से होने वाले व श ट रोग एवं उपचार
15.4.1 राउप रोग
15.4.2 सूखा रोग
15.4.3 े जी चक अथवा इनसेफे लो मले सया
15.4.4 पादागुं लय क ऐंठन और लकवा
15.4.5 पैरो सस अथवा टांग क ह डी का अपने थान से हट जाना
15.4.6 वजा तभ ण
15.5 सारांश
190
15.0 उ े य
इकाई का उ े य व भ न आहारांश त व क कमी से होने वाले रोग क जानकार देना तथा
कु कु ट आहार म उनके ोत को बताना है, ता क कु कु ट पालक प य को संतु लत आहार
उपल ध करा सक ।
15.1 तावना
शर र क सामा य याय, कु कु ट वा य, वृ दर, उ पादन, अ ड क गुणव ता व अ धक
उ पादन अव ध (आयु) आ द कारक का सुचा प से ा त करने के लए आव यक होता
है क पया त पोषण, उ चत रखरखाव तथा रोग मु त वातावरण क आव यकता होती है ।
ु टपूण पोषण से प य को कई रोग उ प न हो जाते है ।
य द दये जाने वाले आहार म कसी वशेष पोषक त व क पूण अनुपि थ त होती है, तो
उससे संबं धत व श ट ल ण द शत होते ह, क तु य द आहार म पोषक त व क मा ा
कम होती है, तो सामा य कमजोर के ल ण जैसे क सु त रहना, प ी का उ पादन कम
देना । अ ड वा लट खराब होना आ द ल ण दखाई देते ह, िजनके वारा कारक का पहचाना
जाना काफ मुि कल होता है ।
15.2 कु कु ट पोषण के मुख कारक व उनक कमी सी होने से होने वाले
रोग
कु कु ट पोषण के मुख कारक न न है :-
(i) ोट न व अमीनो अ ल
(ii) काब हाइ ेट
(iii) फै ट
(iv) वटा मन
(a) चब म घुलनशील वटा मन
(b) पानी म घुलनशील वटा मन
(v) आव यक अकाब नक पदाथ
(vi) जल
उ त म से कसी भी एक अथवा अ धक कारक क नि चत से कम मा ा रोग जैसी ि थ त
उ प न कर देती ह ।
15.2.1 ोट न व अमीनो अ ल
आव यक ोट न एवं अ मनो अ ल क मा ा से अ भ ाय अ त आव यक अ मनो अ ल क
उपल धता एवं अ य अ मनो अ ल के स थे सस हेतु नाइ ोजन क उपल धता से है । देश
के कु छ थान म जहाँ सोयाबीन मील के थान पर बनौले क खल, सूयमुखी खल आ द
इ तेमाल कये जाते है, म थओ नन क कमी देखने को मल सकती है ।
191
म थओ नन एवं लाई सन क कमी से कम वृ दर, उ पादन म कमी एवं छोटे आकार के
अ डे का आना जैसे ल ण प रल त होते ह ।
फनाइलेलानीन टाईरो सन; म थयोनीन से स ट न (Cystine) और लाइसीन से
हाइ ो सीलाइसीन का सं लेषण होता है । य य प लाइसीन एवं सर न को अनाव यक वग
म रखा गया है पर तु कु छ प रि थ तय म इन दोन क मा ा वृ के लए अपया त हो
सकती है और आहार म इनका सि म लत करना आव यक हो जाता है । आव यक अमीनो
अ ल म से लाइसीन, म थयोनीन आरजीनीन लाइसीन एवं टोफे न को नाजुक अमीनो
अ ल (Critical amino acids) कहते ह, य क आम तौर पर दये जाने वाले कु कु ट
आहार म इनक ह नता पाई जाती है। अत: कु कु ट आहार म पशु- ोट न पूरक अथवा अ य
ोट न ोत सि म लत करना चा हए िजससे इन नाजुक अमीनो अ ल क पू त क जा सक।
नम चन (Moulting) के समय प य म स फर वाल अमीनो अ ल क अ धक आव यकता
होती है, य क पर क रचना म स ट न (Cystine) क अ धक मा ा होती है, य य प
स फर वाल अमीनो अ ल क आहार म अ धक मा ा देने से नम चन के समय क अव ध
को कम नह ं कया जा सकता है, पर तु इस समय होने वाल इन अमीनो अ ल क ह नता
को बचाया अव य जा सकता है । ोट न क कमी से पंख आना क जाता है तथा के नबा ल म
( वजा त भ ण) पंख नोचना, पूँछ नोचना जैसे प रणाम कट होते ह ।
15.2.2 काब हाई ेट
काब हाइ ेट काब नक यौ गक है । इनम हाइ ोजन और ऑ सीजन का वह ं अनुपात है जो
क पानी म होता है । काब हाइ ेट का मु य काय ऊजा दान करना है और आव यकता से
अ धक मा ा शर र म वसा के प म सं चत हो जाती है । अ न तथा उसके उपजात िजनक
आहार म लगभग 70 तशत मा ा होती है, काब हाइ ेट के मु य ोत है । काब हाई ेट र हत
आहार कु कु ट को दया जाना के वल ायो गक मह व का है । इससे इनम लकवा जैसे ल ण
उपि थत होते है । यवहा रक तौर पर ऐसा आहार दया जाना संभव नह ं है ।
15.2.3 वसा
वसा एक काब नक यौ गक है जो क ईथर लोरोफाम और वै जीन म वलयशील है तथा
ि लसरोल एवं वसीय अ ल से मलकर बना है । काब हाई ेट क भाँ त इसम भी तीन त व
अथात काबन, हाई ोजन एवं ऑ सीजन होते ह, पर तु इनम काब हाइ ेट क अपे ा काबन
अ धक एवं ऑ सीजन कम होती है । इस लए जब इनका आ सीडेशन होता है तो काब हाइ ेट
क अपे ा 2.25 गुनी अ धक ऊजा उ प न होती है । शर र म लगभग 17.0 तशत वसा
तथा अ ड म लगभग 16.8 तशत वसा होती है । कु कु ट आहार म अ धक मा ा म वसा
मलाने से उसम वकृ तगंध वक सत होने क संभावना रहती है, जो ी म ऋतु म हा नकारक
होते ह । वसा म घुलनशील वटा मन होती है जो प य को ा त हो जाती है । कु कु ट
आहार म योग कये जाने वाले खा य पदाथ म अनेक म अ धक वसा नह ं होती है और
192
बनौले, सोयाबीन आ द बीज म ह थोड़ी अ धक मा ा म वसा होती है । आहार क वसा कु कु ट
क ऊजा को दान करने के अ त र त आव यक वसीय अ ल क पू त भी करती है । चूज
क उ चत वृ एवं मु गय क अ डे देने क मता बनाये रखने के लए लनोल क अ ल
आहार म होना आव यक होता है । आहार म यह लनोल क अ ल 1.5 % के तर तक होना
अ नवाय है ।
15.2.4 वटा मन
वटा मन का ता पय वाइटल एमी स से होता है । ये वे काब नक पदाथ है, जो वृ , वकास
एवं उ पादन के लये अ त आव यक है । य य प ये बहु त ह कम मा ा म वां छत होते ह,
फर भी इनक कमी से प ी म संबं धत व श ट ल ण दखाई पड़ते है । इनक घुलनशीलता
के आधार पर ये दो कार के होते ह ।
(i) चब म घुलशील, जैसे वटा.A, वटा.B, वटा.K, वटा.E
(ii) पानी म घुलनशील जैसे वटा C, (एसका बक अ ल), वटा B कॉ पले स
(i) चब म घुलनशील वटा म स :-
(1) वटा मन – A:-
वटा मन A क कमी ाय: काफ पुराने वटा मन ी- म स का योग करने से होती है ।
काय:-
1. यह व भ न तं जैसे क पाचनतं , जननतं , उ सजन तं एवं ने आ द क
एपीथी लयल को शकाओं के सुचा प से बनने तथा काय करने के लए आव यक होता
है ।
2. यह सामा य वृ एवं ने यो त के लए आव यक होता है ।
3. यह यूकस मे ेन ( ले मा झ ल ) क ग त व ध म उपयोगी होता है I
4. यह सं मण वरोधी वटा मन है ।
कमी के ल ण:-
1. कम वृ दर
2. रोग तरोधकता का कम होना
3. आँख व नासा छ से ड चाज आना
4. अंधापन, जीरो थैि मया, आँख से गीड आना
5. प ी के पंख उखड़े रहना व कमजोर आना
6. अ डा उ पादन कम होना एवं अ ड से चूजे नकलने क दर भी कम हो जाती है।
7. जनन मता (सीमन म पम क सं या) कम हो जाना ।
8. अ ड म ूण क मृ युदर बढ़ जाना (इ यूबेशन के शु आती 48 घ ट म मृ यु)
9. गाऊट हो जाना, इसोफे गस व फै रं स म सफे द दाने व छाले हो जाना ।
प य म आव यक मा ा :-
(1) लेयर प य म 12000 IU / त कलो आहार
193
(2) ीडस टॉक 20000 IU / त कलो आहार
ाकृ तक उपल धता -
(ii) यह लवर ऑयल, फश ऑयल, हर घास, म का, रचका प त का आहार, मेज लू टन मील
आ द म पाया जाता है ।
(2) वटा मन D (Vita. D3 कॉल के सीफे रॉल) :-
इस वटा मन क कमी उन प य म होती है, िज ह ाय: संसीमन म रखा जाता है ।
काय:-
(1) यह शर र म ह डय क सामा य वृ के लए आव यक होता है ।
(2) यह आँत म कै ि शयम व फॉ फोरस के अवशोषण म सहायक होता है ।
कमी के ल ण
(1) चूज म इसक कमी से रके स (सूखा रोग) हो जाता है तथा पंख कम वक सत होते है।
(2) वय क ाइलर / लेयर प य म ह डय क कमजोर तथा आि टओपोरो सस नामक रोग
हो जाता है ।
(3) लेयर म मुलायमा / पतले छलके के अ डे आना ।
(4) उ पादन व हेचे ब लट दोन पर वपर त भाव पड़ना ।
(5) पाँव म कमजोर आना व कु कु ट का पगुईन क तरह पैर रखना जैसे ल ण दखाई देते है
।
(6) च च का अ दर क तरफ मुड़ना ।
वटा मन D2 क तुलना म D3 अ धक भावी होता है ।
ाकृ तक उपल धता :-
यह मछल के तेल, कॉड लवर ऑयल, ए ट वेटेड टेरॉल तथा सूय क पराबगनी करण से शर र
म बनाया जाता है ।
(3) वटा मन E:- यह वटा मन के ऑ सीकरण पर ा त होता है ।
काय -
1. ूण वकास के अलावा यह माँसपे शय के वकास के लए ज र होता है ।
2. यह रोग के त तरोधकता बढ़ाता है । यह ए ट ऑ सीडे ट क तरह काय करता है ।
कमी के ल ण
1. जनन मता तथा अ ड को हेचे ब लट कम हो जाती है ।
2. इसक कमी से बढ़े हु ए टखने एवं े जी चक रोग या एनसेफे लोमले सया होना देखा गया है
।
3. ए सूडे डव डाइथे सस अथात के पलर पारग यता को बढ़ा देता है । िजससे वचा के नीचे सूजन
व सेर बेलम म हेमोरेज दखाई देते है ।
आव यकता :-
ीडर – 120mg./kg. आहार
लेयर – 40mg/kg आहार
194
ाकृ तक उपल धता :- यह हरा चारा, रचका, वन पती तेल, साबुत व अंकु रत दाना आ द म
मलता है ।
(4) वटा मन K :- वटा मन K क कमी ाय: कॉ सी डओ सस के साथ देखने को मलती है, य क
ए ट कॉ सी डयल एवं स फा औष धय का शर र म इसक उपल धता पर वपर त भाव पड़ता
है ।
काय :-
1. र त के जमने के लए आव यक ो ोि बन बनाने के लए आव यक होता है ।
2. वसन णाल म सहायक
कमी के ल ण :-
1. खून का थ का जमने म अ धक समय लगना ।
2. सब यूटे नयस हेमे रज (खून का वचा के नीचे, पर व छाती के नीचे एक त होना)
3. एनी मयाँ (र त अ पता) होना
4. इन यूबेशन के दौरान ूण मृ यु
आव यक मा ा :-
ीडर - 4mg./kg. आहार
यावसा यक ाइलर एवं लेयर - 2mg./kg. आहार
ाकृ तक उपल धता :-
रचका के ला, हरा चारा, मीट, फश मील आ द म पाया जाता है ।
(ii) पानी म घुलनशील वटा मन
(1) वटा मन - C
सामा यत: यह कडनी (वृ क ) म बनता है, पर तु कसी बीमार या अ य ेस क ि थ त म
इसक कमी हो सकती है ।
काय:-
1. यह रोग तरोधकता को बढ़ाता है ।
2. यह ेस क ि थ त से बचाव करता है ।
3. कोलेिजनस उ तक के नमाण तथा अ डा बनाने म सहायक होता है ।
कमी के ल ण :-
1. वृ दर कम हो जाना ।
2. अ डा उ पादन कम, अ डा रॉल ( छलके ) क वा लट कमजोर होना ।
3. जनन मता तथा हे च ब लट कम हो जाना
4. सं मण से होने वाले ेस के व तरोधकता कम हो जाना आ द ल ण देखे जा सकते
ह ।
आव यक मा ा :-
सामा यत: - 50mg./ टन आहार
अ धक गम म - 100 – 150gm./ टन आहार अथवा
195
10gm./1000 प ी पीने के पानी म ।
वतमान म उ नत कु कु ट पालन तकनीक म वटा मन-सी क संथे टक ेशन को आहार
म मलाना उ चत रहता है।
उपल धता :-
यह नींबू के रस व अ य जूसी फल म मलता है ।
(2) बी-कॉ पले स - यह कई कार के वटा मन का समूह ह, िजसम B1 -थायमीन,
B2,-राइबोफले वन, B6-पाइर डॉ सीन,, नको ट नक ए सड, पे टोथे नक ए सड तथा बाओ टन
आ द सि म लत ह । इनम से येक क कमी से अलग-अलग ल ण द शत होते है ।
 वटा मन B1 थायमीन –
कमी के ल ण -
(1) वजन म कमी, उखड़े-उखड़े पँख तथा आहार उपभोग कम होना
(2) गदन क माँसपे शय का लकवा होने के कारण पीछे क ओर खंचा हु आ सर रहना अथवा
व श ट कार क टार ेिजंग पोजीशन (आसमान क तरफ देखते हु ए) म आना ।
(3) पाँव क माँसपे शय म लकवा हो जाने के कारण लंगड़ापन अथवा लड़खडाना, इसके अ त र त
पंख क माँसपे शय म भी लकवा पाया जाना ।
(4) वय क प य म कमी आ द ल ण प रल त होते है ।
आव यक मा ा :-
ीडर - 4mg/kg. आहार
यवसा यक प ी - 2-3mg./kg. आहार
 वटा मन B6 - पाइर डॉि सन
यह लाल र त क णकाओं के बनने के लए आव यक है ।
कमी के ल ण - इनक कमी से वृ दर, उ पादन, हेचे ब लट पर वपर त भाव पड़ता है।
आव यकता –
ीडर म - 6mg./kg. आहार
यावसा यक लॉक - 3mg/kg. आहार
 पे टोथे नक अ ल
कमी के ल ण -
1. वृ दर कम होना ।
2. च च, आँख व वे ट के आसपास क वचा मृत होना
3. लवर खराब होना
4. मुँह व ोवे कू लस म पस जैसे पदाथ आना ।
आव यकता मा ा -
यवसा यक प ी - 0-15mg./kg. आहार
ीडर - 30mg./kg. आहार
 नको ट नक अ ल -
196
कमी के ल ण -
1. हॉक जाँईट का सूजना एवं लकवा हो जाना ।
2. जीभ काल पड़ना तथा मुँह म सूजन होना ।
3. पँख कम आना
आव यकता -
यावसा यक पालन - 40mg./kg. आहार
ीडर म टॉक - 60mg./kg. आहार
 वटा मन H- बाइओ टन
कमी के ल ण -
1. पाँव तथा च च के आसपास क वचा मृत होना
2. आँख पर छोटे-छोटे ध बे पड़ना ।
3. फै ट लवर - कडनी, सं ोम होना
4. है च ब लट कम होना
आव यकता -
यावसा यक पालन - 0.1mg./kg. आहार
ीडर म - 0.2mg./kg. आहार
 फो लक अ ल - यह कोल न व मीथीओ नल बनाने म काम आता है ।
कमी के ल ण -
1. लकवा, वृ दर कम, पँख आना, कम हो जाना ।
2. एनीमीया र त अ पता
3. उ पादन व हेची ब लट कम हो जाना
आव यकता –
यावसा यक पालन – 3.4mg./kg. आहार
ीडर म - 4.5mg./kg. आहार
 वटा मन B12 - सायनोकोबालामीन
कमी के ल ण -
1. वृ दर कम होना, लकवा हो जाना
2. शर र म सूजन आना
3. फै ट ल वर व फै ट कडनी सं ोम होना
आव यक मा ा -
यावसा यक पालन - 0.012 to0.015 mg./kg. आहार
ीडर म - 0.3mg/kg. आहार
197
 वटा मन B4- कोल न :- यह मी थओ नन के बनाने म सहायक होता है । इसके अ त र त यह
नव म संदेश प रवहन के लये आव यक एसीटाईल कोल न (COA) बनाता है । यह लवर म
फे ट मेटाबो लजम म सहायक है तथा अ डे नमाण म सहायता करता है ।
कमी के ल ण -
1. प ी मोटे हो जाते है एवं वृ दर कम हो जाती है ।
2. आहार उपभोग व फ ड कनवसन मता कम हो जाती है ।
3. प य म फै ट लवर सं ोम हो जाता है तथा कभी-कभी पेरो सम देखा जा सकता है ।
आव यक मा ा -
च स हेतु - 800mg./kg. आहार
ोवर प ी - 500mg./kg. आहार
लेयर / ाइलर - 800-1000mg./kg. आहार
यावसा यक प ी ीडर - 1800mg./kg. आहार
ाकृ तक उपल धता –
वटा मन बी-कॉ पले स साबुत दान , गेहू ँ के बाई ोड स, यी ट, लवर मील, सोयाबीन क खल,
घास रचका चावल क बाई ोड स, लवर मील, मीट बाई ोड ट चापड़, दूध आ द म मलता
है ।
15.2.5 मनरल (आव यक अकाब नक पदाथ)
कु कु ट से उ पादन ा त करने हेतु मनरल भी वटा मन, ोट न क तरह ह आव यक है
। यह ह डय क आंत रक संरचना म मह वपूण योगदान देने के साथ ह अि थ तं को
मजबूती दान करते है । अि थय के अ त र त नरम शार रक उ तक क संरचना तथा
ऑ मो टक दबाव बनाने म भी ये मनरल मुख भू मका नभाते ह । मनरल कई ए जाईम
को याशील बनाने म माँसपे शय को कायरत रखने म भी उपयोगी होते है ।
ख नज पदाथ पशु शर र एवं पौध के आव यक अवयव होते ह । इ ह भ म (Ash तथा
अकाब नक पदाथ (inorganic matter) भी कहते ह । मु गय के शर र म लगभग 4.0
तशत ख नज पदाथ होते ह और कवच को छोड़कर शेष अ डे म लगभग 1.0 तशत ख नज
होते है । उ चत अनुपात म ख नज शर र क रचना, नवाह (Maintenance) एवं उ पादन
म सहायक होत है ।
मुख आव यक अकाब नक पदाथ मै नी शयम, कै ि सयम, फॉ फोरस, पोटे शयम, सो डयम,
लोर न आ द, जब क ेसेस (कम मा ा) म आव यक त व मै नीज आयोडीन, मॉल बडनम
एवं सले नयम आ द है ।
(A) कै ि सयम व फॉ फोरस -
1. इन त व का मेटाबो ल म म योगदान होता है । वशेषतया फॉ फोरस का काब हाइ ेट
व वसा के मेटाबो ल म म मह वपूण योगदान देता है ।
2. ह डय के नमाण म सहायक
198
3. अ ड के छलके बनाने हेतु आव यक होते है ।
4. र त का थ का जमने के लए आव यक होता है ।
5. सो डयम व पोटे शयम के साथ कै ि सयम भी दयग त को सामा य प से चलाने म
मह वपूण भू मका नभाता है ।
6. फॉ फोरस का कै ि सयम के प रवहन म भी योगदान होता है, ता क अ डे के छलके बनने
के लए कै ि सयम उपल ध हो सक ।
वटा मन-D का कै ि सयम व फॉ फोरस के अवशोषण म वशेष योगदान होता है । अत: इन
त व के अलावा वटा मन -D क कमी से भी रके स या सूखा रोग हो जाता है । लेयर
प य म इनक कमी से अ डा उ पादन कम, पतले छलके के अ डे आना । अ य धक कमी
से पस लय व अ य ह डय के टूटने क ि थ त पैदा हो जाती है ।
(B) मै नी शयम
काय –
1. यह काब हाइ ेट व ोट न मेटाबो ल म म सहायक है ।
2. काब नेट के प म यह ह डय को मजबूती दान करता है । इसक कमी से प ी म
अचानक च कर खाकर मृ यु हो जाती है । चूज म वृ दर कम, सु ती रहना आ द
ल ण दखाई पड़ते है ।
चूज म इसक मा ा 0.04 तशत एवं लेयर प य म इसक आव यकता 0.18 तशत
होती है । य द अ धक मा ा म मै नी शयम यु त आहार दया जाए तो प य म द त लगना,
उ पादन कम तथा पतले छलके यु त अ डे आने के अ त र त प ी डरे हु ए तीत होते ह
। इससे मु त होने के लए मनरल म सचर म चूना प थर मला दया जाता है ।
(C) सो डयम एवं लोर न (नमक) - सो डयम आयन लोराईड, काब नेट व फॉ फे ट के प म
र त म मौजूद होता है । इसके अ त र त सो डयम सामा य दयग त बनाये रखने के लए
आव यक त व है ।
काय -शार रक वृ , फ ड कनवजन मता, उ चत उ पादन के लए आव यक है ।
कमी के ल ण –
1. शार रक भार म कमी, उ पादन म कमी, अ ड के आकार म कमी आ जाना ।
2. प य म के नीबा ल म होना ।
3. ह डय कोमल हो जाना ।
4. जनन मता कम हो जाना ।
5. प ी का शॉक म आना ।
6. इसी कार लोराईड आयन क कमी से चूज म वृ दर कम, मृ यु दर अ धक हो जाना
।
7. ाय: जल क कमी या डहाइ ेशन होना ।
8. नवस ल ण द शत करना तथा चूज का चल न पाना (चलने क को शश से चूज का
आगे क ओर सर तथा पीछे क तरफ पैर करते हु ए ओंधे मूँह गरना)
199
प ी को य द 4mg/kg. शार रक भार से अ धक नमक दया जाता है तो इसक वषा तता
उ प न हो जाती है, िजसम प ी को यास अ धक लगना, माँसपे शय क कमजोर और प ी
का च कर खाकर गरना जैसे ल ण देखे जा सकते है ।
(D) मै नीज - ाय: इसक कमी कम थान म अ धक प ी पालने आ वा ओवर कराऊ डंग क
ि थ त म उ प न होती है ।
काय - यह सामा य वृ , अ छे उ पादन, माँसपे शय क मजबूती तथा अि थ तं क संरचना
एवं व भ न एंजाईम को याशील करने के लए आव यक होता है ।
कमी के ल ण - इसक कमी से ि लप टडन अथवा पेरो सस नामक रोग उ प न हो जाता
है, िजसम प ी के पैर के ट बीओ मेटाटारसस जोड़ क वकृ त होना तथा मेटाटारसल ह डय
क वि टंग व ब डग (मुड़ना) होने क ि थ त बन जाती है, िजससे गे ो नीमस टडन अपनी
सह ि थ त (काडाई स) से फसल जाता है व प ी म लंगड़ापन आ जाता है । इसक कमी
से उ पादन कम, तथा है चंग दर अ या धक कम हो जाती है तथा ूण मृ यु बढ़ जाती है ।
(E) आयो डन- एक ेस मनरल है, िजसक उपयो गता थाईरॉि सन नामक हॉरमोन को बनाने
म होती है ।
कमी के ल ण - इसक कमी से थाईरॉयड ंथी बढ़ने लगती ह, िजसे गॉयटर कहते ह । यह
फशमील आय टर शैल आ द के योग से दूर क जा सकती है ।
(F) लौह व तांबा - लौह त व शर र म वसन या म सहायक होता है तथा तांबा लौह त व
के शर र मे उपयोग तथा एंजाईम काय म सहायक होता है ।
इनक कमी से एनी मयाँ (र त अ पता) हो जाती है ।
(G)कोबा ट - यह वटा मन B12 के प म उपयोगी होता है तथा इसक कमी से कम बढ़ाव,
कम आहार उपयोग, मृ यु दर अ धक व कम है चंग प रणाम ा त होते है ।
उ त ख नज त व क कमी आहार म उ चत मा ा म मनरल म सचर, ट आ द देकर
पूर क जा सकती है । बाजार म ये बने-बनाये उपल ध है अथवा इ ह न नानुसार घर पर
भी बनाया जा सकता है ।
. खा य पदाथ भाग (भार के आधार पर)
1. वाि पत ह डी का चूरा1 100.0000
2. फे रक काब नेट 0.2100
3. मै नीज ऑ साईड 0.0194
4. कॉपर हाइ ो साईड 0.0194
5. पोटे शयम आयोडाईड 0.0088
6. कोबा ड काब नेट 0.0022
7. योग 00.4494
इस ख नज म ण को बने हु ए आहार म 2% दर से मलाने पर आहार म 0.6 कै ि सयम,
0.25% फॉ फोरस,32PPM लौहा,20PPM ताँबा, 2.5 PPM आयोडीन, 0.2 PPM
कोबा ट होगा ।
200
ख नज का स ता, साधारण व संतोषजनक म ण न न व ध से भी तैयार कया जा सकता
है ।
. खा य पदाथ भाग (भार के आधार पर)
1. ह डी का चूरा 27.99 क ा.
2. सीप खोला/चूना प थर 50.00 क ा.
3. साधारण नमक (आयोडाई ड) 20.00 क ा.
4. लोहा यु त स फे ट 2.00 क ा.
5. ताँबा स फे ट 0.01 क ा.
6. योग 100.00 क ा.
7. ह डी का चूरा 27.99 क ा.
उ त म ण आहार म 5% तक मलाया जा सकता है ।
15.2.6 जल
जल क कमी ाय: भीषण ग मय म हो जाती है । यह शर र म कई पदाथ के वलायक का
काय करता है । जल व भ न त व के लये वाहक का काय भी करता है । काब हाइ ेट, फै ट
व ोट न के मेटाबो ल म म मह वपूण थान रखता है । शर र से नकलने वाला जल उ सजन
तथा गम को बाहर नकालने का काय भी करता है । डहाइ ेशन या जल क कमी से मृ यु
हो जाती है ।
15.3 व भ न ता लकाऐं
15.3.1 वटा मन के काय/कमी के ल ण व ाि त का साधन
नाम वटा मन / काय कमी के ल ण कृ त उपल ध साधन
वटा मन ए
(Vitamin A)
बढ़ोतर म
सहायकअ छ ि ट
हेतु आव यक
अंद नी वचा का
र क
एसामा य कमजोर , शार रक वकास म ( कावट,
लड़खड़ाती चाल, अ यवि थत पंख, मृ यु, आँख म
पानी या गीढ़ जैरो थल मया, मुँह के अ दर ऊपर
तलुवे रचका, पर सफ़े द छाले, आहार नल
(इसोफे गस) म भी इस कार के छाले, छोटे एवंका
मील, आ द जवान प ी म आँख से चपकवां लेस
तथा नोि ल से भी इस कार का पदाथअंडा
उ पादन कम तथा अंडो से चूजे नकलने
के तशत म भी कमी
कॉड लवर ऑयलहर
अ य मछल तेल, हर
घास, म का,
आहार,मेज लू टन का
मील आ द
वटा मन डी रकै ट, पेर क कमजोर , स त पांव एवं चाल, कॉड ल वर आयल तथा
201
(Vitamin D)
कै ि सयम व
फॉ फोरस के पाचन
तथा ह डी क बनावट
म सहायक
पस लय म गाँठे, टखने सूजे हु ए, कमजोर हा ड़याँ,
सु त मुग, पंख का रंग उड़ा हु आ, मृ यु, पतले
छलके के अंडे, कम उ पादन एवं कम चूजा है चंग
अ य मछल तेल |
डए ट वेटेड ए टेरोल,
सूय करण,
अ ावायलट करण
आ द
वटा मन ई
(Vitamin E)
ए ट आ सीडट व
जनन णाल
मसहायक
े िज चक रोग, असंतु लत चाल, खड़े रहने mei
क ठनाई, च कर आना, वचा के नीचे सूजन,
सेर बेलम म हैमरेज
हारा चारा, वन प त
तेल, दाना, साबूत
अथवा अंकु रत, रचका
वटा मन के
(Vitamin K)
र त के जमने व
वास णाल
म सहायक |
र त जमने म अ धक समय लगना, तथा वचा के
नीचे र त
ाव वशेषतया पेर म, छाती पर, पेट पर, गदन
म, पंख के नीचे तथा आंत म |
रचका, के ला, हरा चारा,
मीट, फ़श मील |
वटा मन बी-1
(Vitamin B1)
पील यूराइल टस, पीछे क ओर खींचा हु आ सर,
बुखार म कमी, वकास म कमी, कमजोर , सूखापन,
पचनशि त म श थलता, दौरे पड़ना तथा मृ यु |
साबुत ेन, गेहू ं के
बाई ॉड ट, ई ट, ल वर
मील, मूँगफल क
खाल, सोयाबीन क
खाल, मोलासेज, घास,
रचका, चावल
बाई ॉड ट
वटा मन बी2
(Vitamin B2)
(राइबो ले वन)
एनज मेटाबो ल म
कालटो पेरे ल सस, पेर से लकु वा, वकास म
अवरोध, द त, टखन के बल चलना, े कयल तथा
या ट नस का मोटा होना, सुखी वचा, मुंह,
वे ट, आँख तथा पेर म वचा रोग (डरमेटाइ टस),
अंडा उ पादन म कमी, 11 दन क अव ध म
इं यूवेटर म एम य क मृ यु
लवर मील, ई ट, दु ध
पदाथ, रचका, घास,
कु छ म ल चूण आ द |
वटा मन बी6
(Vitamin B6)
(पाइर डोि सन)
नायू मेटाबो ल म म
सहायक
कमजोर प ी, बहु त चौकने क आदत, दौरा पड़ना,
कम-चूजा उतप त कम उ पादन, मृ यु, वजन कम
होना तथा मृ यु|
लवर मील, ई ट, राइस
ौन मीट, मोलासेज,
म ल , गेहू ँ तथा चावल
के बाई ॉड ट रचका
202
नाम वटा मन / काय कमी के ल ण कृ त उपल ध साधन
पे टोथे नक अ ल
(Panthotheएसएसnic
Acid)
ोट न/ फै ट/काब हाइ ेट म
सहायक
वकास म कमी, अ यवि थत पंख,
आँख लवरमील,ई ट
मुंह तथा गेट पर खुजल के ल ण,
लवरमोलासेज, दु ध
वकास, अंड के उ पादन एवं हैचे ब लट
म कमी
लवर मील, ई ट,
मेलासेज, दु धपदाथ, गेहू ँ
चावलका
मेटाबो ल म म चापड़,
सोयाबीन मल, रचका,
गोभी
ककड़ी,म का घास आ द
वटा मन बी 12
(Vitamin B12)
अनी मया, कमजोर प ी, अंडे म ह जीव
क मृ यु
नको ट नक ए सड
(Nicotinic Acid)
ोट न/फै ट/काब हाइ ेट
मेटाबो ल म म सहायक
कमजोर प ी, पंख का असाधारण
वकास, मुंह तथा जीभ का सूजना,
लड़खडाना, कम आहार उपयोग
ई ट, लवर मील चावल
चापड़, गेहू ँ दाथ,
मूँगफल ,हरा
चारा, मीट, म का
आ द
फो लक ए सड
(Folic acid)
र त को बनावट व ोट न
मेटाबो ल म म सहायक
शर र के वकास म कावट, पंख
अ यवि थत, अ धक मृ यु, लंगड़ापन,
खून क कमी, वजन कम, बड़ी मु गय म
कम उ पादन एवं हैचे ब लट
हरे प ते के पेड़
घास पालक।
रचका, ई ट,
लवर, कडनी
बायो टन
(Biotin)
ए ट डमटाई टस के प म
कमजोर प ी, लंगड़ापन, खुजल -पैर तथा
मुंह पर, कम हैचे ब ल ट कम उ पादन
लवर,ई ट,आलू
गुद,दु ध,मोलसेज,
रचका,घास,साबुत
अनाज आ द
कोल न
(Choline)
नायू णाल म सहाय
कमजोर प ी, लंगड़ापन, आहार
उपयोगकम, आँख को अ य लगने वाले
प ी
लवर,मील,मीट,
फश, पूरा अनाज
कदु ध पदाथ, मूँगफल
खल, सोयाबीन आइल
15.3.2 BSI वारा नधा रत मापद ड
न न ल खत मापद ड भारत म B.I.S. (भारतीय माणक सं थान-1964) वारा मुग आहार
के लए नधा रत कया गया है ।
नाम वटा मन यू नट चूजा ोवर लेयस
वटा मन ए I.U 40,00,000 4,00,000 8,00,000
वटा मन डी 3 I.U 6,00,000 6,00,000 1,20,000
203
थाय मन gm. 2 2 2
राइबो ले वन gm 5 5 5
पै टोथे नक ए सड gm. 10 10 15
नको ट नक ए सड gm. 20 20 20
बायो टन gm. 0.1 0.10 0.15
वटा मन बी 12 gm. 15 15 15
15.3.3 मनरल के काय / कमी के ल ण
.
सं.
नाम ख नज
त व
काय कमी के ल ण / रोग
1. कै ि सयम र त ाव रोकना,ह डी क बनावट व
अ डे का छलका मजबूत करना I
रके स,कमजोर ह डी व कमजोर
अ डा छलका
2. फॉ फोरस शार रक याओं म सहायक, ह डी
क बनावट म आव यक
रके स, कमजोर ह डी व कमजोर
अ डा छलका एवं है चंग दर कम
3. मै नी शयम काब हाइ ेट व ोट न मेटाबो ल म म
सहायक
अचानक च कर खाकर मृ यु
4. मैगनीज पाचन या म एनजाइम का काय
सुचा प से होना
कम है चंग प रणाम
5. आयरन वास या म योगदान एनी मया
6. कॉपर आयरन के शर र म उपयोग म
सहायक, एनजाइ मक काय
एनी मया
7. आयोडीन थाइरॉइड हारमोन के प म गोयटर
8. िज क एनजाइ मक काय असामा य पंख क बनावट छोट
ह डयाँ
कोबा ट वटा मन बी 12 के प म कम बढ़ाव, कम आहार उपयोग, मृ यु,
कम है चंग प रणाम
15.4 वटा मन एवं अ य आहार त व क कमी से होने वाले व श ट
रोग एवं उपचार
इसम न न ल खत रोग सि म लत ह :-
15.4.1 राउप रोग :-
यह रोग वटा मन ए क कमी के कारण उ प न होता है । सभी आयु के कु कु ट इससे भा वत
होते ह । ाय: ी म ऋतु म यह रोग फै ल जाता है ।
204
रोग के ल ण (Symptoms of Disease):- वय क कु कु ट के नथून तथा आँख म पानी
तथा पस नकलता है और आँख के नीचे सूजन आ जाती है । चूज म वृ दर कम होती
है । पँख अ यवि थत हो जाते ह, प य म लंगड़ापन हो जाता है, पूँछ टेड़ी हो हाती है और
उ च मृ यु दर पाई जाती है । अ धक उ प धारण कर लेने (Advance)क अव था म,
पाचन णाल तथा वसन णाल क लेि मका ( यूकोसा) म उ तक य (necrosis) एवं
करे टनीकरण (Keratinization) देखा गया है । इसके अ त र त यह रोग र नलगूट (renal
gout) के प म भी कट हो सकती है और इस दशा म वृ क (Kidneys)और गवीनी
(ureters) म यूरेटस एक त हो जाता है ।
रनडाल (Randall,1964) के अनुसार इस रोग से सत प ी शी ह कॉ सी डयो सस एवं
कृ म रोग से भा वत हो जाते ह ।
अ डे देने वाले प य म उ पादन कम हो जाता है । अ ड म र त के ध बे अ धक दखाई
देते ह । कं लगी एवं शैक पर उपि थत पीला वणक अ य हो जाता है । वटा मन क ह नता
से ऐि टबाँडी उ प न करने क मता म यवधान उ प न हो जाता
रोग क रोकथाम (Prevention of Disease) :- हरे चारे, पि तयाँ एवं पील म का इ या द
वटा मन के पूवगामी (Precursor) होते ह । अत: इ ह आहार म मलाकर देना चा हए ।
मछल के तेल को आहार म सि म लत करना लाभकार स होता है ।
15.4.2 सूखा रोग (Rickets): -
यह रोग वसा म वलेय (Water Soluble) वटा मन 'डी' क ह नता के कारण उ प न होता
है । चूज तथा अ डे देने वाल मु गय पर इसका भाव पड़ता है ।
ल ण (Symptoms) - अपया त वृ दर, लंगड़ापन तथा पैर घसीट कर चलना, पैर क
ह डी तथा जोड़ का मोटा हो जाना, र ढ़ तथा छाती क ह डी का चटक जाना आ द चूज
के रोग के ल ण है । अ डे देने वाल मु गय म अ डा उ पादन कम हो जाता है । अ धक
सं या म पतल कवच वाले अथवा कवच र हत अ डे उ प न होते ह । भा वत मु गय क
च च सामा य दशा अपे ा अ धक कोमल होती है ।
रोग क रोकथाम :- मछल के तेल म वटा मन डी क चूर मा ा होती है और इसे आहार
म सि म लत करने से चूज को इस वटा मन क ाि त हो जाती है । अ डे देने वाल मु गय
के आहार म ह डी का चूरा तथा पसी हु ई सपी (शंख) अथवा चूना प थर मलाकर देने से
प य को कै ि शयम क ाि त हो जाती है । प य के आहार म वटा मन D स ल मट
देने से के वारा भी भी वटा मन डी क पू त क जा सकती है I
15.4.3 े जी चक अथवा इनसेफे लो मले सया
यह रोग कु कु ट म वटा मन 'ई' क ह नता के कारण ाय: 8 स ताह तक क आयु वाले
चूज को हो जाता ह । भा वत चूजे या तो सोये से (Sleepy) अथवा उ तेिजत दखाई देते
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ह । ीवा एवं सर म ऐंठन होती ह और कु छ चूजे गर जाते ह तथा साइ कल चलाई जाने
क तरह ग त व ध करते ह ।
रोग का उपचार :- गेहू ं के जम आइल म सवा धक वटा मन “ई'' पायी जाती है । हरे चार ,
अंकु रत दाल एवं मछल चुरा म भी इस वटा मन क पया त मा ा होती है । अत: इसक
कु कु ट आहार म सि म लत करना चा हए ।
15.4.4 पादांगु लय क ऐंठन और लकवा
पादांगु लय म ऐंठन हो जाना और लकवा मार जाना वटा मन बी-2 क ह नता के कारण
उ प न होता है ।
रोग के ल ण :- आहार म वटा मन बी-2 (Riboflavin) क ह नता के कारण द त आने
लगते ह, वृ क जाती है और पैर का लकवा िजसे क “क डट पैरा ल सस कहते है, हो
जाता है । इससे टाँगे और पैर भा वत होते ह । ारि भक अव था म उपचार कए जाने
पर यह अ छा हो सकता है, पर तु ती प धारण कर लेने पर इसका ठ क होना क ठन हो
जाता है । इस रोग के कारण अंगु लयाँ अ दर क ओर हो जाती है और हाँक के सहारे प ी
चलता है । ति काऐं (Nerves) अपने सामा य, यास से 4-5 गुना अ धक बड़ी हो जाती
है ।
उपचार (Treatment) :- इस रोग का उपचार करना लाभ द नह ं है, पर तु आहार म ऐसे
खा य पदाथ सि म लत करना िजनम बी-2 वटा मन क चूर मा ा हो, रोकथाम क ि ट
से अ धक सफल स हु ई है ।
15.4.5 पैरो सस अथवा टांग क ह डी का अपने थान से हट जाना
यह रोग आहार म कोल न (Choline) बायोट न (Biotin) नयासीन (Niasin) वटा मन
तथा मगनीज (Manganese) और िजंक (ज ता) लवण क ह नता के कारण उ प न होता
ह ।
रोग के ल ण (Symptoms of Disease) :- इस रोग के कारण ट बयोमेटाटासल जोड
(Tibiomatatarsal) बड़ा हो जाता है, िजसके प रणाम व प ट बया का दूर वाला सरा तथा
मेटाटारसीस (Matatarsus) का नकट का सरा टेड़ा-मेढ़ा हो जाता है । पंडल क ह डी
अपने थान पर न रहकर एक और खसक जाती है तथा टाँग पर नयं ण नह ं रह पाता
है । एक अथवा दोन पैर इस रोग से भा वत हो सकते ह । पँख तथा पैर क ल बी ह डय
का छोटा हो जाना भी देखा गया है । मगनीज क ह नता रो उ प न होने वाला रोग आहार
म कै ि शयम एवं फा फो रस क अ धकता से अ धक उ हो जाता है ।
रोग का उपचार एवं रोकथाम :- रोग से छु टकारा पाने के लए, उपचार क अपे ा रोकथाम
करना अ धक आव यक है । ह डय के टेढ़ हो जाने के प चात् उपचार करना संभव नह ं
होता है । रोकथाम के लए यथे ट मा ा म मगनीज प य के आहार म मला कर खलाना
चा हए । आहार म पया त मा ा म राइस पॉ लश सि म लत करने से अलग से मगनीज देने
206
क आव यकता नह ं पड़ती है । इसी कार कोल न, नयासीन एवं बायोट न वटा मन को
आहार म उ चत मा ा म मलाकर खलाने से रोग से मुि त मल सकती ह ।
15.4.6 वजा तभ ण (Cannibalism):- मनर स क कमी से ाय: यह रोग उभर जाता है ।
कु कु ट समूह के कु छ कु कु ट को अ य प य क कलगी पँख पर अंगूठे उँगु लय तथा शर र
के अ य अंग के न चने क वृि त हो जाती है ।
उपचार(Treatment) उपयु त कारण को दूर कर देने से कु कु ट क पँख नोचने क वृ त
को रोका जा सकता है । कु कु ट के आहार म 2-3 दन तक नमक क मा ा अ धक देने
से वजा त भ ण क वृि त को कम कया जा सकता है । कु कु ट आहार म य द मा द लया
हो तो उसम 2 तशत नमक मला देना चा हए । अ न और द लया मले हु ए आहार म 4
तशत नमक मला देना लाभ द होता है । नमक का भाव ात: तीन म कट हो जाता
है । य द नमक के उपचार से वजा त भ ण क वृि त म सुधार न आव तो कु कु ट क
ऊपर च च के लगभग 2/3 भाग को तेज चाकू से अथवा च च काटने वाल मशीन
(Debeaker) से काट देना चा हए, कु कु ट का आहार ऐसा हो, िजससे क वे उसे पया त
मा ा म ा त कर । बंध यव था इस कार कु शलतापूवक करनी चा हए क प ी कु छ समय
तक इधर-उधर मण कर सक और भीड़ से बचे रह ।
15.5 सारांश
य द प य को संतु लत आहार सदैव दया जाए तो उनम आहार त व क कमी के कारण
पाये जाने वाले रोग नह ं होते है । ये असं ामक रोग होते ह, जो कारक को हटा दये जाने
पर ाय: वत: ह ठ क हो जाते है । अत: जब भी कसी वटा मन अथवा मनरल क कमी
पायी जाय, तुर त उस वां छत त व क समावेश आव यक है । कसी भी आहारांश क कमी
के ल ण ार भ म प ट नह ं दखाई पड़ते, क तु जब अ धक कमी हो जाती है । तो वकास
क जाता है व ल ण य दखाई देने लगते है । कसी भी अ य रोग क तरह आहारांश
त व क कमी से भी मुग आहार उपयोग कम कर देती हे और उस त व वशेष क शर र
म उपल धता और भी कम हो जाती है । इस ि थ त म वां छत वटा मन व मनरल का आहार
के साथ-साथ पानी म भी समावेश करना उपयोगी रहता है । अत: प ी समूह के सफल पालन
एवं उ पादन के लए आव यक है क उ ह संतु लत आहार नधा रत मापद ड के अनुसार दया
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मुर्गियों के रोग और उपचार की विस्तृत जानकारी

  • 1.
  • 2.
  • 3.
    3 प य केसामा य रोग एवं नदान अनु म णका इकाई सं. इकाई का नाम पृ ठ सं या इकाई -1 कु कु ट रोग – ववे चत अ ययन 5—16 इकाई -2 मु गय के सं ामक रोग, उनक रोकथाम एवं बचाव छू तदार रोग 17—28 इकाई -3 जीवाणु ज नत प ी रोग एवं उपचार 29—40 इकाई -4 वषाणु ज नत प ी रोग एवं उपचार 41—56 इकाई -5 प य के परजीवी एवं फफूँ द ज नत रोग 57—71 इकाई -6 ोटोजोआ ज नत बीमा रयाँ 72—79 इकाई -7 इमिजग कु कु ट रोग 80—86 इकाई -8 ए वयन इंफलूएंजा – व भ न नवीन अवधारणाएँ एवं नराकरण 87—101 इकाई -9 कु कु ट पालन म ट काकरण क मह ता एवं व भ न कार के ट काकरण के दौरान मु गय का रखरखाव 102—115 इकाई -10 कु कु ट शव पर ण एवं रोग नदान क उपयो गता कु कु ट रोग म पेथो नो मक ल जन 116—126 इकाई -11 भारत म कु कु ट रोग नदान एवं आहार व लेषण योगशालाएँ 127—141 इकाई -12 कु कु ट पालन म योग म ल जाने वाल व भ न औष धयाँ एवं उनका फामकोलोिजकल व लेषण 142—154 इकाई -13 व भ न मौसमी रोग एवं बचाव 155—174 इकाई -14 व भ न रोग से जुड़ी जै वक सुर ा एवं नरोगी प ी पालन 175—188 इकाई -15 व भ न पोषक त व क कमी से होने वाले रोग एवं अ य मेटाबो लक डसओडर 189—207
  • 4.
  • 5.
    5 इकाई : कुकु ट रोग - ववे चत अ ययन इकाई – 1 1.0 उ े य 1.1 तावना 1.2 रोग के कारण 1.3 अ व य रोगी के ल ण 1.4 व भ न कु कु ट रोग एवं उनका वग करण 1.4.1 सं ामक रोग 1.4.2 आयु आधा रत 1.4.3 रोग ऋतु आधा रत रोग 1.4.4 संतु लत आहार क कभी से होने वाले 1.4.5 रोग यां क रोग 1.4.6 रसाय नक रोग 1.4.7 आनुवां शक रोग 1.4.8 अ य व वध प ी रोग 1.5 रोग का सारण 1.6 रोग के रोकथाम के उपाय 1.7 रोग नरोधी काय म एवं रोग नदान 1.8 सारांश 1.0 उ े य : कु कु ट उ योग म प ी मृ यु दर, इसके पालन म यह एक गंभीर सम या है । तवष लगभग 20-30% मु गयाँ व भ न कारण , िजसम प ी रोग वशेष है, के कारण मर जाती है । कु कु ट के शर र का उ च ताप 40.6 से 41.6o C होने के कारण रोग क अव था म व भ न शार रक याओं के कारण भी यह एक अ य त मह वपूण कारक स होती है । व य प ी लाभ द कु कु ट यवसाय क आधार शला है । रोग क अव था जो सामा य से भ न हो, िजसम प ी सु त हो जाए, उ पादन म कमी आ जाए अथवा व भ न द शत रोग के ल ण, अ व थ प ी क पहचान है । देश म कु कु ट उ पादन वृ के साथ कु कु ट उ पाद संबंधी वकास योजनाओं म कु कु ट रोग क रोकथाम एवं इससे जुड़े काय म को पया त मह व दया जा रहा है । आधु नक युग म कु कु ट रोग क रोकथाम, आहार, जनन एवं ब ध क सफल व धय को अपनाने के कारण मु गयाँ वष क अ धकांश अव ध म अ डा देती रहती है, िजसके प रणाम व प उसक पया त शि त न ट हो जाती है और सं चत शि त म भी कमी हो जाती
  • 6.
    6 है । उनपर रोग परजी वय के आ मण तथा अ य कारण से मृ यु क संभावना बढ़ जाती है । इसी उ े य को यान म रखते हु ए यह आव यक हो जाता है, क हम व भ न रोग के वषय म एवं उनक रोकथाम का पया त ान व ववे चत अ ययन ात हो । 1.1 तावना : मु गय म, रोग क वषम ि थ त, उसके होने वाले व तृत कारण, िजनमे सं ामक रोग मुख है, सं मण का सारण, व वध भौगो लक प रि थ तयाँ, कु कु ट समूह क व भ न क म, द शत ल ण आ द अ य त मह वपूण होते ह । चूँ क मु गयाँ समूह म रहती ह एवं व भ न बीमा रय के ल ण भी ाय: एक जैसे ह द शत हो सकते ह । अत: यह आव यक है क रोग वशेष म द शत ल ण के आधार पर हम रोग क जाँच एवं नदान कर सक । समूह म एक रोगी प ी वारा थम द शत ल ण अ य व य प य म रोग फै लने क पहचान कर एवं उसे समूह से पृथक कर अ य प य म रोग सारण को रोका जा सकता है । इस इकाई म रोग, उससे जुडे कारण, रोग सारण, ल ण क पहचान एवं भे दत ल ण का व तृत ववेचन कया गया है। रोग का वग करण, सं मण के अलावा अ य कारण से होने वाले प ी रोग, योगशाला म उनके नदान, उपचार, बचाव एवं रोकथाम के लए अपनाए जाने वाले व भ न उपाय के वषय म भी व तृत चचा का समावेश कया गया है। 1.2 रोग के कारण : प ी रोग व भ न कारण से हो सकते ह, िजसम मुखता से सं मण एक मह वपूण कारण है । (i) ल ण के आधार पर कु कु ट रोग, अ त ती (Acute), अनुती (Sub acute) चरकार (Chronic) तथा ल णह न हो सकते ह । य य प कसी कु कु ट समूह क रोग सत मु गय क यि तगत पर ा करना च लत नह ं है, तथा प उस समूह क वंशावल ात करना, मृ यु दर का ान होना और मृ युपरा त पर ण, रोग के नदान म बहु त सहायक होते ह । अत: अनेक मामल म ती (acutely) रोग सत प य म कु छ को मार कर रोग का नदान कया जाता है, चाहे उसका उपचार भले ह संभव न हो । रोग के व श ट कारण म व भ नता पाई जाती है, और रोकथाम तथा उपचार क सफलता इनके व श ट ल ण पर नभर करती ह । रोग के लए उ तरदायी सं मण का वणन न न कार से कया जा सकता है । (ii) वषाणु सं मण (Virus Infections) (iii) जीवाणु सं मण (Bacterial Infections) (iv) परजीवी सं मण (Parasitic Infections) (v) फं फू द (कवक) सं मण (Fungus Infections) (vi) वषैले पदाथ का योग (Toxic Substance / Poisoning toxemia)
  • 7.
    7 (vii) आनुवां शककारण (Hereditory Factors) (viii) नयो ला म अथवा कसर (Neoplasm(s) (ix) व छता क कमी के कारण होने वाले रोग / यव था म कमी (Managemental problems) (x) मौसमी रोग 1.3 अ व थ रोगी के ल ण: (i) वजन म कमी, सु त एवं उदासी, वास म आवाज या याकु लता, शार रक तापमान कम या अ धक । (ii) पेट फू ला, ना सका म यूकस, ने सु त, चेहरा सूखा हु आ । (iii) कॉ ब सकु ड़ी हु ई, पील अथवा र त र हत, बैटल म सूजन । (iv) पंख झुके हु ये, मैले, अ यवि थत, चमड़ी बना चमक तथा खुरदर । (v) टांगे सूजी हु ई, लंगड़ापन, के ल लैग । (vi) आहार उपयोग कम या ब द तथा अ धक अथवा कम यास लगना । (vii) हरे, पीले, सफे द रंग क बीट, द त के प क । 1.4 व भ न कु कु ट रोग एवं उनका वग करण:- 1.4.1 सं ामक रोग: (अ) सं ामक एवं संस गत रोग(Infectious and Contagious Diseases): 1. वषाणु रोग (Virus Diseases) (i) रानीखेत (ii) चेचक (iii) लकवे का रोग (iv) वसन न लका का रोग (Laryngotrachietis) (v) वसन शोध (Bronchitis) (vi) मेरे स रोग (Mareks Disease) 2. जीवाणु रोग (Bacterial Diseases) (i) जुकाम (Coryza) (ii) द घकाल न वसन शोध (iii) कु कु ट कॉलरा (iv) च चड़ी रोग (Spirochaetosis) (v) सालमो नलो सस (vi) य रोग (Tuberclosis or T.B.)
  • 8.
    8 3. फफूं दरोग (i) ए परिजलो सस (Aspergilosis) / एफलाटोि सको सस (ii) नील कलगी (Favus) (ब) परजीवी रोग (Parasitic Diseases) 1. बा य परजीवी रोग (External Parasitic Diseases) (i) जूँ पड़ जाना (Lice infestation) (ii) चचड़ी पड़ जाना (Tick infestation) (iii) माईट, बा य परजीवी कोप (Mite infestation) 2. आ त रक परजीवी रोग (Internal Parasitic Diseases) (i) गोल कृ म (Round worms) (ii) फ ताकृ म (Tape worm) (iii) सीकल कृ म (Caecel worm) (iv) धागेनुमा क ड़े (Thread worm) (v) का सी डयो सस (स) पोषक ह नता के रोग (Dietary Deficiency Diseases) (i) ए वटा मनो सस “ए” (ii) रके स (Rickets) (iii) पीरो सस (Perosis) (iv) ि ल ट टडन (Slipped Tendon) 1.4.2 आयु के अनुसार वग करण:- (अ) नगमन कए चूज के रोग : (i) अ भशीतन (Chilling) (ii) पीतक का चूण य न होना (Unabsorbed yolk) (iii) ए वयन एन सफे लोमाइलाइ टस, सालमो नला आ द (ब) छ: स ताह क आयु के चूज के रोग : (i) सीकल को सी डयो सस (Caecal Coccidiosis) (ii) रानीखेत (Ranikhet or New Castle) (iii) सं ामक वसन शोध (Infectious Bronchitis) (स) छ: से आठ स ताह क आयु के चूज के रोग : (i) सं ामक ले रंगो कयाइ टस (ii) कृ म (worms) (iii) च चड़ी वर (Spirochaetosis)
  • 9.
    (द) आठ सताह तथा अ धक आयु के चूज के रोग: (i) लकवे का रोग (Avian Leucosis complex) (ii) आँत क कॉ सी डयो स (Intestinal coccidiosis) (iii) जुकाम (Infectious coryza) (iv) द घकाल न वसन शोध (Chronic Respirtory infection) (य) युवा कु कु ट के रोग (i) कु कु ट कॉलरा (Fowl cholra) (ii) सं ामक ले रंगो े कयाइ टस (Infectious Laryngo tracheitis) (iii) लकवे का रोग (Avian Lcucosis complex) (iv) कृ म (worms) 1.4.3 ऋतु के अनुसार वग करण (अ) शरद ऋतु के रोग (i) अ भशीतन (chilling) (ii) कोल से ट सी मया (iii) सालमो नला (iv) द घकाल न वसन शोध (Chronic Respiratory Diseases) (ब) ी म ऋतु के रोग (i) कु कु ट चेचक (Fowl Pox) (ii) च चड़ी वर (Spirochaetosis) (iii) का सी डयो सस (iv) कृ म रोग (v) ए वटा मनो सस “ए” रानीखेत, चेचक, का सी डयो सस तथा कृ म रोग कसी भी आयु के प ी को वष के कसी भी समय हो सकते ह । कसी नि चत थान म आव यकता से अ धक प ी रखने से वजा त भ ण (cannabalism) जुकाम (coryza) तथा कॉ सी डयो सस इ या द रोग हो सकते है । 1.4.4 संतु लत आहार क कमी से होने वाले रोग कु कु ट आहार म आव यकतानुसार ोट न, वसा, काब हाइ ेट, ख नज पदाथ एवं वटा मन क मा ा होनी चा हए । इससे आहार स तु लत हो जाता है । इसके अ त र त उसम आ सीकरण रोधी (antioxident), तजीवी (antibiotics) एवं का सी डयो टेट (Coccidiostat) इ या द भी सि म लत कये जाते ह, िजससे प य को रोग के कोप से बचाया जा सके ।
  • 10.
    10 1.4.5 यां करोग (Accidents) : चोट लगने से मृ यु हो जाती है अथवा घाव हो जाते ह । 1.4.6 रासाय नक रोग (Chemical Diseases) : आहार म कोई ऐसा खा य खा लेना जो क वषैला हो, प य म वष या त हो जाता है। 1.4.7 आनुवां शक रोग (Hereditory Diseases) : नि चत गुण के संर ण के लए योग कये जा रहे सघन अ त: जनन के कारण अ भावी वषय यु मजी कारक संयु मी हो सकते है । अत: यह आव यक है क इन वषययु मजी जीव को अलग कर दया जाये, िजससे क यह घातक गुण संतान म थाना त रत न ह । घरेलू कु कु ट म 26 घातक अथवा आं शक घातक कारक का वणन मलता है, पर तु सामा य कु कु ट-पालक के लए इनम से कोई भी कारक मह वपूण नह ं है । 1.4.8 अ य व वध प ी रोग (Miscellaneous Diseases) : (i) अ डा फं स जाना (Egg Bound) (ii) शर र के भीतर अ डा टूट जाना (Egg Peritonitis) (iii) द त आना (Diarrhoea) (iv) लू लगना (Heat stroke) (v) पैर सड़ना (Bumble foot) (vi) मल वार का सड़ना (Ventgleet) उ त कार के रोग अनेक कारक उदाहरणाथ - र त ाव शोफ (Oedema) इ या द के कारण उ प न होते ह और इनके नि चत कारण को ात करना संभव नह ं है । इनक रोकथाम करने से इनके भाव को कम कया जा सकता है । 1.5 रोग का सारण (Transmission of Diseases) : सं मण का मह वपूण ोत ऐसे वाहक प ी (carrier bird) होते ह, िजनके क ल ण प ट नह ं होते ह । रोग फै लाने वाले कारक का वणन न न कार से कया जा सकता है । (अ) संसग वारा (By contact) मेरे स रोग एक प ी से दूसरे प ी तक य संसग अथवा सं पश वारा फै ल सकता है । अ य प से वातावरण वारा भी यह रोग फै ल जाता है । अ ययन वारा ात कया गया है क सं मत कु कु ट के व ठा म वषाणु के कु छ कार के ेन (Strain) व ठा क अपे ा लार (Saliva) सं मण का अ धक मह वपूण ोत तीत होता है । कु कु ट क पंख क वचा से झड़ी हु ई को शकाओं म भी ये वषाणु पाया जाता है । आहार म पर-चूण (feather meal) खलाने पर इस रोग के फै लने क संभावना रहती है I
  • 11.
    11 (ब) बछावन वारा(By Litter) बछावन वारा रोग फै लने के लए वै ा नक म मतै य नह ं है, पर तु बछावन म इस रोग का वषाणु 16 स ताह तक जी वत रह सकता है, इससे संके त मलता है क रोगफै लने म बछावन भी एक मुख ोत हो सकता है । (स) रोग वाहक वारा (By vectors) ए फ टो बअस-डाईआपे रनस (Alphitobius diaperinus) नामक बीटल (better) के वारा फै लता है । इसके शर र म मेरे स रोग के वषाणु पाये जाते ह, िजसे यह बटल अपने लाव म व ट कर देती है । (द) कु कु ट चीचड़ी वारा (By fowl tick) कु कु ट चीचड़ी (अरगस परसीकस) भी इस वषाणु क वाहक पाई गई है । ऐसे मुगा-मुग क स तान, िजनम वयं मेरे स रोग का सं मण अ य धक हो, इस रोग से कम भा वत होते ह । इससे कट है क ये मुगा-मुग अपनी संतान म अ ड के वारा पया त मा ा म तरोधी (antibody) भेजते ह, िजससे ये चूजे उन चूज क अपे ा, िज ह तरोधी ा त नह ं होते ह, अ धक सीमा तक इस रोग के कोप से बच जाते ह । पैतृक तरोधी वाले चूज म मृ यु दर भी कम होती है । इसके अ त र त श य च क सा उदाहरणाथ च च काटना (De beaking)] ट का लगाना (Vaccination), कु कु ट गृह म अ धक भीड़ होना (over crowding) अथवा गृह प रवतन करना इ या द याओं का रोग क ा यता (Susceptibility) पर अनुकू ल भाव पड़ता है। 1.6 रोग क रोकथाम के उपाय (Prevention of Diseases) रोग क रोकथाम करने के पूव, इसके फै लाव एवं अ भ यि त का ान होना परमाव यक है । य य प रोकथाम के अनेक उपाय ह, पर तु आ थक एवं योगा मक मह व क ि ट से मा कु छ ह उपाय उपयोगी हो सकते ह, जो क नीचे वणन कये गये ह । 1. प य को अलगाव (Isolation) म रखना, रोग से बचाव क सुगम व ध है, पर तु यापक प म इसका उपयोग करना योगा मक प से संभव नह ं है और इस कार से प य को रखने से यय भी अ धक होता है । 2. न न ल खत व छता एवं ब ध संबंधी याओं से लाभ होता है:- (i) समय-समय पर कु कु ट समूह का मेरे स रोग से सत होने का पर ण करना चा हए । (ii) कु कु ट गृह म वायु संचालन (Ventilation) क उ चत यव था होनी चा हए । (iii) कु कु ट के कायकता वारा कोई अ य कु कु ट फाम पर काय नह ं करना चा हए। (iv) कु कु ट गृह पर काय करने वाल को न य वसं मण कया हु आ कोट (ए न) तथा गमबूट पहन कर काय करना चा हए । (v) कसी अ य ोत से चूज को फाम पर न रख कर उ ह एक दन क आयु से ह पालना चा हए।
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    12 (vi) समय -समय पर पुरानी बछावन को हटाकर कु कु ट-फाम क सफाई करनी चा हए। (vii) सं मत वषाणु रोग से सत कु कु ट को रोग का नदान होते ह न ट कर देना चा हए, य क इन रोग का कोई संतोष द उपचार नह ं है । रोग फै लने पर सावधा नयाँ (Precautions for checking spread of diseases): (i) सामा य कु कु ट पालन संबंधी नयम का पालन आव यक है । (ii) रोग से मरे हु ये प य को जला देना चा हये या गाड़ देना चा हए । (iii) रोगी प ी, मरे हु ए प य क जाँच पशु च क सक / कु कु ट वशेष से अव य कराय । (iv) पशु च क सालय / कु कु ट वशेष क सलाह रोग के ल ण दखाई देते ह ा त कर । (v) वटा मन तथा ए ट बायो टक पानी अथवा आहार म नधा रत मा ा म द । (vi) समय - समय पर कु कु टशाला म क टाणु-नाशक दवा का छड़काव कर । (vii) रोगी, दुबल प य को अलग रख । (viii) रोगी तथा व य प य क देखभाल के लये अलग यि त रख । (ix) अनाव यक यि तय को मुग शाला म न जाने द । (x) समय पर रोग नरोधक ट के लगवाते रह । (xi) या त ा त थान से ह चूज खर दे । (xii) व थ प य का काय पहले कर ल एवं बीमार प य का बाद म, िजससे बीमार प य से सं मण व थ प य म न आये । रोग क रोकथाम के लए न न ल खत स ा त को ढ़ता से अपनाना चा हए:- (i) कु कु ट फाम पर आने वाले सभी कार के नए प ी मा णत पुलोरम (Pullorum) एवं कु कु ट टाइफाइड (Typhoid) मु त समूह से ह लाये जाने चा हए । इसके साथ ह साथ यह भी आव यक है क इस कु कु ट समूह म सालमो नला, माइको ला मो सस एवं ए वयन यूको सस रोग के भी कोई संके त न मलते होने चा हए । एक बार व य कु कु ट समूह था पत हो जाने के प चात नए प ी य नह ं करना चा हए और य द बहु त आव यक हो जाये तो मा व छ समूह से ह य करना चा हए । य कये गये प ी पुराने प य से अलग रखे जाय। (ii) कु कु ट गृह सावज नक सड़क से लगभग 30 मीटर तथा अ य कु कु ट गृह से लगभग 50 मीटर क दूर पर ि थत होने चा हए । (iii) प ी रखे जाने वाले आवास म जंगल प य एवं पशुओं के वेश विजत होना चा हए । आग तुक को भी यहाँ आने क छू ट नह ं होनी चा हए । (iv) कु कु ट के लए योग कये जाने वाला आहार व वसनीय सू से य कया जाना चा हए और संदूषण र हत तथा भल भाँ त संतु लत होना चा हए । (v) फाम पर प य क नई खेप (batch) य करते समय रोग नवारण के सभी उपाय अपनाने चा हए । इ यूवेटर आ द य क व छता तथा वसं मण नयमानुसार एवं नय मत प से करना चा हए । (vi) प य को व थ बनाए रखने के लए उनके पोषण, संवातन, आवासीय यव था तथा ब ध को उ चत मह व दान करना भी अ त आव यक काय है ।
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    13 य द कसीकु कु ट समूह म कोई सं ामक रोग फै ल चुका हो तो उसक रोकथाम के लए न न ल खत अ त र त सावधा नयाँ अपनानी चा हए:- (i) पूणत: व थ कु कु ट को रोगी कु कु ट से अलग करके, उनके खाने-पीने एवं कायकता का अलग से ब ध होना चा हए । (ii) रोगी प य का र त अथवा शर र का कोई भी तरल पदाथ कु कु ट-गृह के फश पर नह ं पड़ना चा हए। (iii) सभी रोगी प य को मार कर, जला द अथवा भू म म दबा देना चा हए । (iv) रोगी अथवा मृतक प य को छू ने के प चात लोर न अथवा डटॉल से हाथ धोने चा हए । (v) कु कु ट के बाड़ , उपकरण और आहार तथा पानी के बतन को गम पानी से धोने के प चात 2 तशत लाइसोल अथवा 5 तशत फनाइल के वलयन से उपचा रत करना चा हए । (vi) पीने के पानी म पोटे शयम परमगनेट मलाना चा हए, पर तु इसक मा ा इतनी हो क पानी का रंग ह का गुलाबी हो जाए । उपयु त सभी उपाय बड़े तथा सु यवि थत कु कु ट फाम पर ह अपनाये जा सकते है, पर तु ामीण वातावरण म, जहाँ कु कु ट ाय: बाड़ म न रखे जाकर वत घूमते रहते है, वहां व भ न समूह के चूजे तथा मु गयाँ पर पर वत तापूवक मलते जुलते ह । कु कु ट कू ड़ा के ढेर पर घूमते और एक साथ पानी पीते ह । इन प रि थ तय म न न ल खत उपाय करना चा हए । (i) ामीण कु कु ट पालक को पर पर सहयोग से रोग क रोकथाम के यास करने चा हए । (ii) छ: स ताह से अ धक आयु वाले चूज को रानीखेत और आठ स ताह से अ धक आयु वाल को चेचक के ट क लगवा देना चा हए । (iii) आवासीय तथा आहार य दशाओं म सुधार करना आव यक है । (iv) रोग ार भ होते ह नकटवत पशु च क सक को सू चत करना चा हए और आव यकतानुसार उसक सहायता लेनी चा हए । 1.7 रोग नरोधी काय म एवं रोग नदान :- (Prophylactic Programme): यह काय म देश, भौगो लक े एवं कु कु ट समूह क क म के अनुसार भ न- भ न होते ह । पर तु यह सवमा य है क सभी चूजा आहार म का सी डयो टेट मलाये जाने चा हए । का सी डयो टेट ज म से 3 माह क आयु तक आहार म मलाया जाना चा हए । कु कु ट आहार म तजीवी का भाव ु टपूण ब ध म अ धक भावशाल होता है । ब ध याओं एवं व छता म सुधार करने से अ धक अ छे प रणाम क संभावना रहती है । आयु के थम स ताह म सभी चूज को रानीखेत (Ranikhet) का ट का लगाया जाना चा हए । रानीखेत एफ का ट का एक दन क आयु म एक काँच क पचकार (dropper) वारा औष ध लेकर एक बूँद आँख और एक बूँद नाक म टपका देना चा हए । रानीखेत रोग का अ म ट का 6-8 स ताह क आयु म लगाया जाना चा हए । य द सं ामक वसनीय शोध का रोग था नक प से पाया जाता हो तो 2-4 स ताह क आयु म इसके ट क लगाने से लाभ होता
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    14 है । आजकलअनेक कार के म त यापा रक ट के उपल ध है और प य के उ पादन करने से पूव इनक अनुवधक मा ा (Booster dose) द जा सकती है । थम अनुवधक क मा ा, थम बार ट के लगाने के लगभग एक माह प चात और दूसर अनुवधक मा ा थम अनुवधक मा ा देने के लगभग तीन माह प चात ह द जानी चा हए । उ पादक आयु भर के लए प य को रोग म बना देना, योग क जाने वाल वे सीन (Vaccine) क क म पर नभर करता है । बॉयलर चूँ क लगभग 1 1 2 माह क आयु तक ह रखे जाते ह । अत: इ ह मा एक बार ट का लगाना भी पया त होगा । कु कु ट म चेचक (fowl pox) के ट के लगभग एक माह क आयु म लगाए जाते ह और य द आव यक समझा जाता है तो उ पादन ार भ करने के पूव एक बार और ट के लगा दए जाते है । माइको ला मो सस, कॉ सी डयो सस एवं कृ म (worms) क उपि थ त म रोग मी वक सत करने म बाधा पड़ती है और ट के के वपर त भी भाव पड़ सकता है । अत: ट का लगाने का काय म ार भ करने से पूव यह नि चत कर लेना परमाव यक है क इस कार के सं मण को नयि त कर लया गया है । पैतृक रोग मी लगभग 2-3 स ताह तक रहती है और इससे ाकृ तक रोग मी उ प न करने म बाधा पड़ती है । अत: बहु त अ धक आव यक न होने तक युवा चूज को ट के नह ं लगाए जाने चा हए । ट का लगाने के लए वै सीन का चयन उसके भाव एवं म दपन (Mildness) पर नभर करता है । वै सीन का योग कई कार से कया जा सकता है, पर तु पानी के वारा इसका उपयोग अ या धक सुलभ है । य द कु छ प ी इस कार के पानी को न पीयगे तो उनम रोग मी वक सत न हो सके गी । य य प यि तगत प से प य को ट का लगाना अ धक भावशाल है, पर तु यह बहु त अ धक समय लगने वाला होने के कारण क ठन एवं प र मी है । अत: यह तीत होता है क रानीखेत, चेचक और सं ामक वसनीय शोध नामक रोग य द था नक प से पाये जाते हो तो थान एवं कु कु ट समूह के यान को न रखते हु ए भी उनम रोग मी का वकास करना चा हए । ज म से लगभग तीन माह तक क आयु तक कु कु ट आहार म कॉ सी डयो टेट मलाया जाना चा हए । रोग नदान :-मानव एवं अ य पशुओं क भाँ त ह प य म रोग नदान एक ज टल तकनीक या होती है । आमतौर पर व भ न प ी रोग का नदान कु कु ट पालक वारा ल ण के आधार पर कर लया जाता है । कु छ रोग म वशेष द शत ल ण ह रोग वशेष क पहचान होते ह । इनके आधार पर उ ह अ य रोग से वभे दत कया जा सकता है । इन ल ण म वसन संबंधी दोष, ति का णाल का भा वत होना, सांस लेने म परेशानी आना, खाँसी आना ( वसन संबंधी रोग जैसे कौराइजा स.आर.डी, आई.बी, आई.एलट . इ या द) इसी कार पंख अथवा पैर क पे शय का लकवा हो जाना (मेरे स), हरे अथवा सफे द रंग के द त लगना (आर.डी. अथवा रानीखेत, बी. ड यू .डी.) आ द है ।
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    15 इसके अ तर त सं ामक रोग को पहचान जीवाणु / वषाणु / परजीवी वभाव, इसके फै लने क ती ग त, अ धक प य के सत होने तथा उ च मृ यु दर आ द द शत ल ण के आधार पर क जा सकती है । योगशाला म रोग क जाँच के लए बीट के नमूने, र त पर ण, ाव क जाँच आ द योगशाला पर ण कर रोग नदान कया जा सकता है । र त पर ण म खून के अ दर परजीवी क जाँच के साथ सं मण क अव था म उसक ती ता, गुणन के वषय म जानकार ा त होती है । इसी कार बीट क जाँच म व भ न अ त: परजीवी पर ण कर परजीवी क कृ त का शान हो जाता है । प य म व भ न वषाणुज नत रोग एवं कु छ जीवाणुज नत रोग क सीरम पर ण कर ए ट जन, ए ट बॉडी जाँच जैसे ए लु टनेशन (Agglutination Test – Plate & Tube Agglutination), सीरम यू लाईजेशन (Serum Neutrilization) एवं एलाइजा जाँच (Elisa) कर रोग का पता लगाया जाता है । प ी चूँ क समूह म रहते ह । समूह के एक प ी क मृ यु होने पर शव पर ण कर पाये जाने वाले वशेष लजन (Pathognomic Lesions) के आधार पर शी जाँच क जा सकती है । अ धक मृ यु दर क ि थ त म शव पर ण एक वशेष कारगर पर ण स होता है एवं शी नदान कर उपचार कया जा सकता है । कु कु ट पालक को चा हए क वह शी अ तशी मृत प ी का योगशाला म शव पर ण कराकर उपचार ार भ कर देव, ता क रोग के फै लाव को अ य व थ प य म फै लने से रोका जा सक । अ य योगशाला पर ण म जीवाणु ज नत सं मण क ए ट बायो टक स स ट वट जाँच (Antibiotic Sensitivity Test) कर, सं मण के कार एवं उपचार म योग लये जाने वाल ए ट बायो टक औष ध के चयन म सु वधा रहती है, िजससे शी उपचार के साथ रोग के बचाव म होने वाल आ थक हा न को रोका जा सकता है । 1.8 सारांश : इकाई म व णत सभी ब दुओं का व तृत अ ययन करने के प चात यह न कष आसानी से नकाला जा सकता है क कु कु ट पालक को व भ न रोग क पूण जानकार जैसे कारण, ल ण आ द के वषय म ान है, तो वह ना सफ कु कु ट शाला म रोग के सारण एवं फै लाव को रोक सकता है, अ पतु समय रहते उसके बचाव एवं रोकथाम के यापक एवं पु ता ब ध भी कर सकता हे, िजससे कु कु ट पालन म रोग से होने वाल आ थक हा न को रोका जा सकता है । कु कु ट शाला म व छता, हाइिजन के उपाय, जै वक सुर ा ब धन एवं सं ामक रोग का ट काकरण कर होने वाल त काफ हद तक कम क जा सकती है ।
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    17 इकाई – मुगय के सं ामक रोग, उनक रोकथाम एवं बचाव छू तदार रोग इकाई - 2 2.0 उ े य 2.2 तावना 2.3 व भ न सं ामक रोग एवं बचाव 2.4 ल ण के आधार पर वभे दत वणन 2.5 शव पर ण के आधार पर वभे दत वणन 2.6 सं ामक रोग क पहचान एवं नदान हेतु भेजे जाने वाले नमून का वणन एवं जरवे टव 2.7 छू तदार रोग एवं योगशाला पर ण 2.8 सारांश 2.0 उ े य : सं ामक रोग सं मण से फै लते है । सभी सं मण प य के व भ जै वक अंग को भा वत करते है, उ ह त पहु ँचाते है तथा यह मृ यु का कारण भी बनते है । ईकाई म मुख प से सं ामक रोग के कार, उनके सार, ल ण, शव पर ण एवं कारण का व तृत क तु वभे दत नदान यु त (Differential Diagnosis) ववेचन कया गया है, ता क प ीपालक व भ न रोग क पहचान सह कार से कर सक, कोई म ना रहे, साथ ह ईकाई का उ े य सं मण क अव था म रोगी प ी से कौन से नमूने ा त कये जा सकते है । उ ह कै से संधा रत / संर त (Preserve) कया जावे तथा नदान हेतु नमून को कै से े षत कया जावे, इसकाभी वणन कया गया है, ता क बचाव एवं रोकथाम के समय रहते बेहतर उपाय कये जा सके । 2.1 तावना सभी छू तदार रोग सं मण से फै लते ह,यह आव यक नह ं है क सभी सं ामक रोग छू ने से ह फै ले । इस मूल मं को यान म रखते हु एइकाई म सं ामक एवं छू तदार रोग क या या क गई है । सं मण कसी भी कार का हो, चाहे वह जीवाणु या वषाणु हो अथवा परजीवी या फफूं द हो, उसे सारण हेतु कसी ना कसी मा यम क आव यकता होती है । सं मण परो प से सीधा स पक म आने अथवा अपरो प से हवा, दू षत वातावरण, म खी, म छर, जूँ चीचड़ी अथवा अ य क ट के कारण या अ य कसी भी कारण से हो सकता है
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    18 । सीधा सपक, या न रोगी प ी के वारा ा वत पदाथ जैसे सं मत लार, बीट, आँसू पंख आ द जब कसी व थ प ी के दाना-पानी, बतन, लटर, मुग शाला के उपकरण आ द के स पक म आते ह उ ह ये ाव दू षत कर देते है एवं जैसे ह व य प ी इनका योग करता है अथवा स पक म आता है, रोगी बन जाता है । इसी कार कई सं ामक जीवाणु एवं वषाणु पोर बनाते ह एवं उनके अ दर कई दन तक, कई बार कई वष तक जी वत रहते ह, क तु जैसे ह अनुकू ल वातावरण (जैसे उ चत तापमान, जलवायु, शु कता, नमी) इ ह ा त होता है, ये पोर से वघ टत होकर हवा, पानी, मनु य, पशु, प ी अथवा अ य मा यम से एक थान से दूसरे थान पर दूर थ थान पर या आवागमन करते है तथा एक ह साथ, थान वशेष पर वकट रोग उ प न करते है तथा महामार का प ले लेते है । अ धकांश वषाणुज नत प ी रोग इसी ेणी म आते है एवं कु कु ट पालन को भार आ थक हा न उठानी पड़ती है । रोग क ती ता, मा यम, कारण एवं सारण के आधार पर सं मत प य क कु ल सं या (Morbidity Rate) साथ ह सं मत प य क कु ल सं या म से मृत प य क सं या (Mortality Rate) नधा रत होती है । जब कसी रोग वशेष से सभी सं मत प य क मृ यु हो जाये, तो रोग अ य त घातक रोग क ेणी म आता है, जैसे रानीखेत, ग बोरो, पुलोरम इ या द । (i) ए डे मक (Endemic) - कसी िजले अथवा थान वशेष पर जब कोई रोग बार-बार एवं लगातार थाई प से फै ले तो ऐसे रोग Endemic Diseases कहलाते है । (ii) ए पडे मक (Epidemic) प जब कोई वशेष रोग एक थान पर एक साथ अ धक प य को भा वत कर तथा जो एक थान से दूसरे थान पर सा रत हो जावे और अ धक मृ यु का कारक बने तो उसे Epidemic कहते है । इस रोग क व तार सीमा बहु त अ धक होती है । (iii) पे डे मक रोग (Pandemic) :-Wide spread epidemic जब कोई रोग एक थान से दूसरे थान पर या न अपे ाकृ त बहु त बड़े भाग म सा रत हो, कई बार यह रोग एक देश से दूसरे देश म (overseas) फै ल जाते है, रोग सारण क इस ेणी को Pandemic कहा गया है । जैसे वतमान म बड लू। (iv) पोरे डक (Sporadic) :- जब कसी रोग वशेष से कु छ एक अथवा कम प ी भा वत या सं मत हो, ऐरने रोग Sporadic Diseases क ेणी म रखे जाते है । जैसे- तं से संबंधी रोग, Egg bound condition / canabalism आ द। इस इकाई म सभी सं ामक एवं छू तदार रोग का समावेश कया गया है तथा उ ह Differential Diagnosis के आधार पर व णत कया गया है, य क इ ह व तृत ववे चत, जीवाणुज नत / वषाणुज नत / परजीवीज नत / फफूं द ज नत आ द अ याय म पृथक से कर दया गया है ।
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    19 2.2 व भन सं ामक रोग एवं बचाव : 2.2.1 जीवाणुज नत रोग-कारण (i) ई. कोलाई सं मण - E. Coli (ii) पुलोरम रोग - Salmonella. pullorum (iii) कोराईजा रोग - aemophilus. gallinarium (iv) फाउल कॉलरा - asteurella. multocida (v) बोटु लज - Clostridium. botulinum (vi) ा नक रे पाइरे डजीज (C.R.D.) – Mycoplasma. Gallisepticum 2.2.2 वषाणुज नत रोग (i) रानीखेत रोग(R.D) - रानीखेत रोग वषाणु ( म सो वायरस) (ii) ग बोरो रोग (I.B.D) - ग बोरो रोग वषाणु ( रयो वायरस ( रयो)) (iii) मेरे स रोग (M.D.) - मेरे स रोग वषाणु (हरपीज़ वाइरस) (iv) ल ची रोग - ऐ डनो वाइरस (v) इ फे सीयस ो ाइ टस - इ0 ो0 वषाणु ( मकस वायरस) (vi) इ फे सीयस लैरेज ेकाइ टस - आई.एल.ट . वषाणु (हरपीज़ वाइरस) (vii) फाउल पॉ स - फाउल पॉ स वषाणु पॉ स वाइरस 2.2.3 परजीवी ज नत रोग (i) गोल कृ म सं मण - Heterakis. gallinae (ii) गेप व स - yngamus. tracheal (iii) फ ता कृ म - Rallietina. sps (iv) कॉ सी डयो सस - Eimeria. sps 2.2.4 ोटोजोआ ज नत रोग (i) ह टोमो नऐ सस - Histomonas. melegridis (ii) टो सो लाजमो सस - Toxoplasma. gondii (iii) पाईरो कटो सस - Borrelia. anserina (iv) पाइरो लाजमो सस - Aegyptianella. pullorum (v) पेनोसोमो सस - Trypanosoma. avium
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    20 2.2.5 फफूँ दज नत रोग (ii) ए परिजलो सस - Aspergillus. fumigatus Aspergillus. flavus 2.3 ल ण के आधार पर वभे दत वणन : 2.3.1 जीवाणुज नत रोग (i) ई. कोलाई सं मण - एयर सै युलाई टस, ओमफे लाई टस, पे रटोनाई टस, एि टराइ टस, काँल से ट समीया, कोल ेनुलोमा, ( लवर व आँत पर युमर), अ डा उ पादन कम, द त लगना । (ii) पुलोरम रोग - पँख लटकना, द त लगना, चूज म सफे द पतले द त, ूडर म एक होना, अ धक मृ यु दर । (iii) कोराइजा रोग - छ ंक आना, नाक से बदबूदार चप चपा गाढ़ा पदाथ (Mucus) आना, चेहरा सूजा, आँख ब द, बैटल सूजे हु ए । (iv) फाउल कालरा - बैचेन होना, माँस पे शय का घटना, उ पादन कम, हरे द त, सर काला पड़ना, लकवा होना । (v) बाटु ल म - पँख व पैर का लकवा होना, गदन का ल बी होना, आँख धंसी रहना, पँख ढ ले होना एवं कोमा क ि थ त । (vi) ा नक रेि परेटर डजीज (CRD) - साँस म क ठनाई, नाक से ड चाज, े कया म रेट लंग क आवाज, े ट का कमजोर होना । (vii) ग ीनस डरमेटाइ टस - पैर म एवं वचा पर घाव व बदबू आना, वचा पर छ होना, कानावा ल म पँख नोचना, एनी मया आ द । 2.3.2 वषाणुज नत रोग : (i) रानीखेत रोग (R.D) - हरे पतले द त लगना, अ या धक मृ यु दर, वास लेने म क ठनाई एवं वशेष आवाज (Rales) आना, उ पादन म भार कमी,
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    21 गेस पंग, खांसीआना, अ डे का छलका कमजोर होना । (ii) ग बार रोग (I.B.D) - प ी का सु त होना, कं पकं पी आना, अ यवि थत पंख, बरसा म सूजन और पतले द त लगना । (iii) मेरे स रोग - मु गय म लकवा पाया जाता है, ेआई अथवा पल आई, तीन माह के उ के प य म ल ण दखाई देते ह, एक पैर आगे तथा एकमुड़ा हु आ, पँख गरे हु ए, पैर व पँख सूजे हु ए । (iv) ल फाइड यूको सस (L.L.) - 16 स ताह या अ धक आयु पर युमर या गाठ पाई जाती है । पैर म लड़खड़ाहट, क तु लकवा नह ं बरसा म युमर (Tumors) (v) ल ची रोग - अ डा उ पादन म कमी, बॉयलर म अ धक ती ता, माँसपे शय एवं अवयव म हैमरेज एनी मया आ द, 3-6 स ताह के चूज म अ धकI (vi) इं फे सीयस ां काइ टस - स दय म अ धक पाया जाता है, कम उ क मु गयाँ अ धक भा वत, साँस म गेि पंग रे स, नाक म युकस, युमो नया, आँखे नम व सूजी हु ई, आहार कम । (vii) इं फे सीयस लै रंगो ेकाइ टस (I.L.T.) - समय गदन ल बी होना, नाक से ड चाज, वेटर पर सूजन, खाँसी के साथ खून भरा यूकस आना । (viii) फाउल पॉ स - को ब चेहरा, वेटल पर दाने, प पल अथवा के ब (Scab) पाये जाते ह । मुँह क अ दर क ले मा पर भी दाने पाया जाना, 2-4 स ताह क उ पर अ धक भावशाल , अ डा उ पादन कम । 2.3.3 परजीवी ज नत रोग (i) गोला कृ म - खून क कमी होना, प ी कमजोर, सु त व कभी-कभी लंगड़े होना, बीट पतल , खूनी द त लगना
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    22 (ii) फ ताकृ म - खूनी पे चस, लंगड़ापन, कमजोर आ द 2.3.4 ोटोजोआ ज नत रोग (i) लू काँ ब - कलंगी का नीला पड़ना, नई फसल (गेहू ँ) आने पर रोग क संभावना, अ धक ठंड लगना, वजन घटना, र तवा हनीयाँ उभर हु ई, सफे द पानी जैसे द त, कम उ पादन, मृ यु दर अ धक व मृ युपूव काँपना । (ii) ह टोमो नऐ सस रोग ( लैक हेड) - वजन म कमी, बीट का रंग गंधक जैसा पतल बीट व चीजी पदाथयु त (iii) टा सो लाजमो सस - मनु य म फै लने का खतरा, वजन म कमी, क ल बोन का दखना, े ट क माँसपे शयाँ कम होना, तापमान बढ़ना आ द । (iv) ( पाइरोक टो सस - तापमान बढ़ना, पैर पर सूजन, को ब का पीला पड़ना, सु त व हरे द त लगना, लकवा होना तथा खून क कमी होना । (v) पायरो लाजमो सस / - कमजोर होना, वजन म कमी, ताप म बढ़ना, लकवा पेनोसोमो सस क तु र त पर ण करने पर तुर त पहचान संभव (vi) का सी डयो सस - सफे द द त, खूनी द त लगना, एनी मया, वजन मे कमी, अ धक मृ यु दर (50- 100 %) ,लड़खड़ाना, धीरे-धीरे मृ यु होना, अ डा उ पादन म भार गरावट होना, बीट के साथ खून आना । 2.3.5 फफूं द ज नत रोग (i) ए परिजलो सस - खाना-पीना छोड़ देते है, वास म क ठनाई, भार आवाज, रेट लंग क आवाज, तथा अंधापन आना ।
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    23 2.4 शव परण के आधार पर वभे दत वणन : (i) ई. कोलाई सं मण - आँत म सूजन, भ ती मोट होना, दय म Straw रंग का य अथवा ल वर व आँत म यूमर (ii) पुलोरम रोग - दय क झ ल म पीला पानी भरना, डशे ड या बगड़ी आकृ त के ओवा (ova), आँत पर दाने एवं पील -सफे द बीट (iii) कोराइजा रोग - च च दबाने पर ना सका से चीजी यूकस आना, े कया म क जेशन व चीजी पदाथ (iv) फाउल कॉलरा - गजाड ोवे ट कू लस, दय एवं आँत पर पट क यल ( पन पाउ ट) हेमोरेज एवं Necrotic Foci पाया जाना। (v) ा नक रेस परेटर डजीज(C.R.D) - वास क नल म युकस, ल वर के भाग से लेकर दय तक सफे द झ ल , े कया म हेमोरेज एवं चीजी पदाथ (vi) रानीखेत रोग (R.D) - ोवे ट कु लस क भ ती मोट तथा उसम पेपील पर पट क यल ( पन पाउ ट) हेमोरेज या लाल दाने, आँत सूजी हु ई तथा उनम हर पतल बीट । (vii) ग बोरो रोग (I.B.D.) - पेर क माँसपे शय म लाल च क ते अथवा हेमोरेज बरसा फे कस बढ़ा हु आ तथा सूजन व सये टक नव क धा रयाँ (striations) का नह ं दखलाई देना । (viii) मेरे स रोग (M.D) - पँखे क जड़ म Nodules, नायु सूजे हु ए व Nodules या गाठ । (ix) ल फाइड यूको सस (L.L.) - ल वर का आकार कई गुना बढ़ा हु आ व त ल आकार म दुगनी होना । (x) ल ची रोग - दय ल ची समान दखलाई देता है । (xi) इं फे सीयस ां काइ टस - फे फड़ म सूजन व क जेशन वसन न लका म मुकरा अथवा चीजी पदाथ (xii) कृ म रोग - आँत सुजी हु ई तथा उनम परजीवी के
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    24 लावा दखलाई देना। (xiii) पाइरोक टो सस - पील न व ल वर बढ़े हु ए, पेर कारडाई टस एनी मया आ द (xiv) कॉ सी डयो सस - आँत तथा सीकम म सूजन व र त पाया जाना, योगशाला पर ण म Oocysts का पाया जाना । (xv) ए परिजलो सस - फे फड़ म फोड़े अथवा Abscess, Airsac म cheese पदाथ पाया जाता है । Comb पर ध बे, सफे द च ह । 2.5 सं ामक रोग क पहचान एवं नदान हेतु भेजे जाने वाले नमून का वणन एवं जरवे टव : (i) रानीखेत रोग – Pieces of liver, spleen trachea, bronchi lungs, Proventiculus in 50% buffered Glycerine saline or on ice, 10% neutral formol saline. (ii) ग बोरो डजीज - Bursa of Fabricious, paired serum, cut Pieces of visceral organs, in Transport Media or on ice, 10% neutral formol Saline. (iii) मुग चेचक-फाउल पॉ स - छोटे-छोटे दान के Scabs को 50% ि लसर न सेलाइन (Glycerine Saline) या PBS के घोल म भेज I (iv) ए.एल.सी (A.L.C.) - िजगर, त ल तथा या टक नव को 10% फारमेल न घोल म। (v) Infectious Bronchitis (IB) - Swabs from Exudate and lungs paired serum,
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    25 Trachea and bronchiin 50% buffered Glycerine. (vi) Marek’s disease - Feather follicles from chest and neck, Paired serum, Pieces of visceral organ and peripheral nerve in Transport media or on ice, 10% formalin. (vii) ा नक रे पाइरे डसीज (CRD) - सीरम के नमूने बफ म । (viii) टक फ वर (Tick Fever) - त ल तथा ल वर को 10% फारमोल न घोल म, र त क लाईड बनाकर मथाइल ए कोहल म टेन के उपरा त भेज । (ix) Pullorum Diseases (B.W.D) - Blood in EDTA, paired sera samples cut pieces of visceral organs on ice or in 10% formalin in sterile vial, faecal swabs. (x) मुग हैजा (Fowl Cholera) - र त लाईड बनाकर एवं िजगर, त ल , आँत के ऊपर भाग को 10% फारमोल न के घोल म भेज । (xi) राउ ड वम - गोलक ड़े टेप-वम - ल बे क ड़े - ताजे मल 'बीट' को 10%' फारमेल न के घोल म भेज अथवा नमक के संतृ त घोल म । क ड़ को 10% फारमेल न अथवा ऐ कोहॉल म भेज । (xii) खूनी द त (Coccidiosis) - आंत तथा सीकम से ा त र त रंिजत बीट को 20% पोटे शयम डाइ ोमेट (Potassium Dichromate)के घोल म भेज । 2.6 छू तदार रोग एवं योगशाला पर ण : छू तदार रोग - योगशाला पर ण (i) रानीखेत रोग - वायरस यू लाईजेशन टे ट
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    26 ह मए लूटनेशन इनह वशन टे ट (H.I.), लोरोसट ए ट बॉडी टे ट (FAT), ए जाइम लं ड ईमुनोएवसोरवट ऐसे ELISA के लए Diagnostic Kit (EISA) उपल ध है । (ii) ग बोरो रोग - एनीमल इनाकु लेशन टे ट EISA: Commercially available kit is present For EISA (iii) मेरे स रोग - इनडायरे ट ह मए लूट नेशन इनह वशन (Indirect HI) टे ट अगार जेल स पटेशन टे ट (AGPT) या अगार जेल इमुनो ड युजन टे ट मेरे स रोग के लए AGID टे ट लगाने के लए मेरे स हाइपरइ युन ए ट सीरा उपल ध है। (iv) पुलोरम रोग - (i) सालमोनेला - कलड ए ट जन से लेट टे ट लगाते है, िजसम सं मत प ी क र त को लाइड के ऊपर ए ट जन के साथ मलाने पर र त फट जाता है । (Agglutination) - रोग नह ं होने क अव था म ए ट जन और र त मल जाते है । (ii) सालमोनेला पुलोरम लेन ए ट जन - इस पर ण म सीरम के व भ न Dilutions के साथ टे ट यूब म लेन ए ट जन मलाते है । सं मत प ी के सीरम म यूब म अव ेपन (Agglutination) पाया जाता है । ( व थ प ी के Agglutination नह ं आता) (v) कॉ सी डयो सस - बीट का पर ण करने पर High Power Microscope के योग
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    27 से Slide केऊपर आइमे रया के Oocyst दखलाई दे जाते है । (vi) बड लू - ELISA AGID HI Chick embryo Inoculation Test (vii) फाउल पॉ स - HA, HI Tests, Virus Nentrillazation Test. (viii) फाउल कालरा - Rapid whole Blood – Agglutination Test AGID 2.7 सारांश सं ामक एवं छू तदार रोग का इलाज क अपे ा बचाव एवं रोकथाम के उपाय कया जाना अ धक सुर त होता है, य क एक तो इन रोग से मृ युदर अ धक एवं इतनी शी होती है क समु चत ईलाज का समय नह ं मल पाता, दूसरे ईलाज पर कया जाने वाला यय भी काफ अ धक होता है । अत: बेहतर यह है क इन रोग क समय रहते पहचान कर (ल ण के आधार पर) अथवा शव पर ण कराके या योगशाला के से पल भेजकर जाँच करा ल जाव एवं तदनुसार समय पर रोग वशेष का ट काकरण मय बू टर डोज के कर लया जावे । सं ामक एवं छू तदार रोग के लए इस तरह के बंधन को ह ाथ मकता द जानी चा हए। 2.8 नावल : .1 सं ामक एवं छू तदार रोग म भेद क िजए? .2 सं ामक रोग का सारण कन- कन मा यम से हो सकता है? छू तदार रोग कै से फै लते है । .3 सं ामक रोग को ल ण के आधार पर कै से पहचाना जा सकता है? .4 शव पर ण के आधार पर रोग का नदान कै से कया जा सकता है? .5 छू तदार रोग मेरे स एवं पुलोरम क योगशाला म या- या पर ण कर पहचान क जा सकती है? .6 न न के पेथो नो मक वशेष ल जन या है? (i) रानीखेत (ii) ग बोरो रोग (iii) सी.आर.डी. .7 न न रोग म योगशाला पर ण कर कै से जाँच क जा सकती है? (i) कॉ सी डयो सस (ii) पाइरोक टो सस (iii) रानीखेत
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    29 इकाई : जीवाणुज नत प ी रोग एवं उपचार इकाई - 3 3.0 उ े य 3.1 तावना 3.2 वग करण से संबं धत श द का ववरण बै ट रया: जीवाणु ए ट बायो टक: त जीवाणु पदाथ 3.3 ई. कोलाई सं मण (E. Coli Infection) 3.3.1 .कारण 3.3.2 सारण 3.3.3 ल ण 3.3.4 नदान, बचाव एवं उपचार 3.4 पुलोरम रोग, बेसीलर हाइट डाय रया (B.W.D.) 3.4.1 प रभाषा 3.4.2 कारण 3..4.3 सार 3.4.4 ल ण 3.4.5 शव पर ण 3.4.6 रोग नदान 3.4.7 उपचार एवं बचाव 3.5 कोराइजा इ फे शीयस कोराइजा (Infection Coryza) 3.5.1ल ण 3.5.2उपचार एवं नयं ण 3.6 कॉलेरा फाउल कॉलेरा (Fowl Cholera) 3.6.1 सारण 3.6.2 ल ण 3.6.3 शव पर ण 3.6.4 बचाव एवं उपचार 3.7 बोटू ल म (Botulism) 3.7.1 प रभाषा 3.7.2 ल ण 3.7.3 शव पर ण
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    30 3.7.4 बचाव एवंउपचार 3.8 ा नक रे पाइरे डजीज (C.R.D.) 3.81. सारण 3.8.2 ल ण 3.8.3 शव पर ण 3.8.4 बचाव एवं उपचार 3.9 ऑमफे लाई टस (Omphalitis) 3.9.1 ल ण 3.9.2 शव पर ण / बचाव एवं उपचार 3.10 ग ीनस डरमेटाई टस (Gangrenous Dermatitis) 3.10.1 सारण 3.10.2 ल ण 3.10.3 बचाव / उपचार 3.0 उ े य: मु गय म सं मण से होने वाले रोग म जीवाणु ज नत सं मत रोग से होने वाल मृ युदर काफ अ धक रहती है, भ न- भ न जीवाणु के सारण एवं सं मण को जीवाणु क कृ त के वषय म जानकर, उनसे होने वाल त का आकलन कर, तजीवाणु औष धय (Antibiotic) के योग से रोग से बचाव के साथ-साथ उसका इलाज कया जाना आसान रहता है । भ न- भ न कृ त के जीवाणुओं पर वशेष कार के ए ट बायो टक औष ध का भाव भी सट क रहता है एवं ए ट बायो टक सेि स ट वट पर ण योगशाला म कर शी ह रोग का भावी उपचार संभव है, िजससे रोग के उपचार पर कये जाने वाले आ थक भार को भी कम कया जा सकता है । ल ण के आधार पर जीवाणुज नत रोग क पहचान करने के साथ-साथ ह इन रोग का योगशाला म पर ण आसानी से कया जा सकता है एवं शी ह भावी नतीजे सामने आ जाते है । 3.1 तावना : इस इकाई म मु गय म होने वाले सभी मु य जीवाणुज नत रोग का समावेश कया गया है । जीवाणुज नत रोग के सारण के तर के के वषय म जानकर उसका भावी नयं ण कया जा सकता है । सामा यत: अ धकांश जीवाणुज नत प ी रोग मलते-जुलते ल ण द शत करते है, िजसके कारण थम टया उनम भेद करना क ठन होता है, क तु यहाँ येक जीवाणुज नत रोग के लए वशेष द शत ल ण का उ लेख कर शी नदान कये जाने का यास कया गया है।
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    31 जीवाणु के कारके आधार पर एवं उसक Virulence या न बीमार पैदा करने क मता के वषय म भी चचा क गई है, व भ न तं पर पड़ने वाले वपर त भाव का भी उ लेख कया गया है । जीवाणु क कृ त के आकलन एवं उससे पड़ने वाले भावी भाव को जानकर रोग का समय पर नय ण एवं उपचार कया जा सकता है । इन रोग से प ी क मृ यु होने पर अ य प य म सं मण के सारण को, मृत प ी का शव पर ण कर रोका जा सकता है । इस कार प ी गृह म होने वाल मृ युदर काफ कम हो जाती है । कु छ जीवाणुज नत प ी रोग जूनो टक रोग होते ह, जैसे सालमोनेला सं मण (पुलोरम रोग) मनु य म भी सं मत अ ड अथवा सं मत मुग वारा दये गये अ ड के उपयोग से फै ल सकते ह एवं मनु य म रोग का कारण बनते ह । इन रोग का प य के र त अथवा सीरम पर ण कर समय पर मनु य म सा रत होने से रोका जा सकता है । इकाई म सभी आव यक वै ा नक जानका रय का समावेश इन रोग के प ी एवं मनु य म पड़ने वाले दु भाव को कम करने के उ े य से कया गया है । 3.2 वग करण से संबं धत श द का ववरण बै ट रया : जीवाणु ए ट बायो टक : त जीवाणु पदाथ 3.3 ई. कोलाई स मण: प य का यह एक जीवाणु ज नत रोग है, िजससे कई कार के सं मण प य म हो सकते ह । इस जीवाणु वारा कोल बेसीले सस, एगपेर टोनाइ टस, एयरसे यूलाइ टस, साल पंगजाई टस, हजारे डजीज, कोल से ट सी मया आ द रोग के ल ण देखे जा सकते ह । सामा यत: यह जीवाणु पशुओं, प य एवं मनु य आ द के पेट एवं आंत म पाया जाता है । ेस एवं अ य अव थाओं म हो ट को सं मत कर व भ न रोग कट करता है । 3.3.1 कारण एवं सारण:  इ चेरे शया . कोलाई, ाम नेगे टव रोड शेप जीवाणु, ये जीवाणु रोग उ प न करने म स म होते ह और ये वष (Toxin) भी बनाते ह, िजससे द त लग जाते ह ।  यह जीवाणु एक वशेष कार के मी डया ई .एम.बी. अगार पर वृ करता है एवं इसक कोलोनी अगार लेट पर धातु जैसी चमक पैदा करती है, िजससे इस जीवाणु को आसानी से पहचाना जा सकता है। यह ले टोज नामक शकरा का उपयोग कर अ ल उ प न करता है।  इस रोग का सार अ ड के मा यम से हो सकता है, िजससे चूज म अ य धक मृ यु दर देखी जा सकती है ।
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    32 3.3.2 सारण : लटर व बीट रोग को फै लाने म सहायक है, जब क पो फाम म पाया जाने वाला ड ट (धूल कण) िजसम अनुमा नत 105 से 108 ' तक ई. कोलाई के जीवाणु पाये जा सकते ह, जो क सं मण के लये पया त है ।  दू षत पानी वारा यह रोग अ धक फै लता है ।  मुँह एवं हवा के मा यम से यह सं मण फै ल सकता है । 3.3.3 ल ण:  कॉल से ट सी मया - र त म जीवाणु के मलने से यह अव था कट होती है एवं इसम सव थम गुद एवं दय क झ ल म सूजन तथा दय म ा कलर का तरल पदाथ मलता है ।  एयरसे यूलाइ टस - र त से अथवा सीधे ह वास नल से यह जीवाणु फे फड़ म पहु ँच कर एयरसे यूलाइ टस नामक रोग कट करता है, िजसम उ पादन कम होना, खाँसी आना तथा रेट लंग आ द ल ण दखलाई देते ह । इसम नमो नया नामक रोग भी हो जाता है ।  से ट समीया के कारण ओवीड ट म भी यह सं मण पहु ँच जाता है, िजससे अ डा उ पादन कम हो जाता है एवं सं मत अ ड का उ पादन होने लगता ह i  चूजे क ना भ वारा सं मण वेश कर ओमफलाइ टस रोग के ल ण दखलाता है, जब क एयरसे यूलाइ टस के भाव के साथ पेरेटो नयम झ ल म सूजन पाई जाती है, िजसे एगपेर टोनाइ टस कहते ह ।  एंटेराइ टस - ई. कोलाई का आंत म सं मण एं ाइ टस नामक रोग पैदा करता है, िजससे आंतो के अ दर क सतह पर सूजन पाई जाती है व प ी पतल बीट जैसे ल ण कट करता है । इस अव था म आंत म अ य सं मण जैसे क आइमे रया जा त के लगने क संभावना रहती है ।  कोल े यूलोमा अथवा हजारे डजीज - आंत एवं ल वर पर जगह जगह यूमर या गांठे दखाई पड़ती ह । इस अव था को कोल े यूलोमा कहते ह I 3.3.4 नदान, बचाव एवं उपचार:  कु कु ट शाला के ब धन एवं हाइजीन का वशेष यान रख । मुग गृह क सफाई, आहार व पीने के पानी के बतन, क टाणु नाशक औष ध का योग कर साफ करने चा हए ।  ेस क अव था जैसे डीवी कं ग डीबीक म थान प रवतन आ द म वशेष सतकता बरतते हु ए ए ट बाइयो टक व वटा मन का योग उ चत रहेगा ।  मुग गृह म वे ट लेशन उपयु त रहे एवं नमी न रहने पाये ।  यथासमय लटर बदल देव, वशेषकर येक सं मण के प चात् ऐसा करना आव यक है ।  साफ पानी पलाये । यह रोग दू षत पानी वारा भी उ प न होता है ।
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    33 3.4 पुलोरम रोग,बेसीलर हाईट डाय रया (B.W.D.): 3.4.1 प रभाषा: पुलोरम रोग सभी प य मेम स (खरगोश, ब दर, लोमड़ी) आ द के अ त र त मनु य म भी होता है । जीवाणु ज नत यह रोग बेसीलर हाईट डाय रया के नाम से भी जाना जाता है । चूज मे यह उ प से तथा बड़े प य म यह ो नक प म पाया जाता है । हाईट लेग हॉन जा त इस रोग से अपे ाकृ त कम भा वत होती है। 3.4.2 कारण:  सालमोनेला .पुलोरम नामक जीवाणु - इस रोग का पर ण ए ट जन टेि टंग के आधार पर कया जाता है । 3.4.3 सार:  सं मत प य से ा त अ ड से यह रोग उ प न चूज तथा मनु य म फै ल सकता है । (एग ांस मशन)  बीट से दू षत दाना पानी अथवा ो पं स, सं मत लटर वारा इस रोग का सार होता है ।  सं मत प य वारा उ प न चूजे इस रोग के सार म अ य त मह वपूण भू मका नभाते ह तथा भा वत प ी व थ होने के उपरा त भी उ भर सं मण का सार करते ह ।  अ डे ाय: दू षत वातावरण म सं मत बीट एवं बछावन वारा एग शैल के मा यम से सं मत होते ह । 3.4.4 ल ण:  रोग से त छोटे चूज म योक अवशोषण नह ं होता है एवं वह हे चंग के बाद ह मर जाते ह ।  2-3 स ताह के दौरान मृ युदर अ धक होती है । अ धकतर चूजे ऊँ घते हु ए तीत होते ह । चूजे ूडर के पास एक त हो जाते ह एवं दाना उठाना ब द कर देते ह ।  चूज म सफे द भूरे द त लगना एवं ए स शन के दौरान प ी का दद से च लाना ( ल ाई) दखाई पड़ता है  रोग त बड़े प य म थकावट, पंख , बैटल, सर व कान ढलका रहना, बखरे- बखरे पंख, कॉ ब म पीलापन आना, सफे द, हरे-भूरे द त लगना सामा य ल ण है ।  माँस पे शय क वाटर लॉ ड कं डीशन एवं चमड़ी वारा व क उिजंग (बाहर नकलना) होने के कारण प ी नहाया हु आ तीत होता है ।  एरोसोल इंफे शन क ि थ त म प ी क वसन म तकल फ एवं गेि पंग मूवमे ट (मुँह खोल खोल कर सांस लेना) देखे जा सकते ह ।
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    34 3.4.5 शव परण:  प ी का ॉप खाल मलना, ल वर पर ईट के समान लाल धा रयाँ पाई जाना ।  दय क झ ल म सूजन के अलावा छोटे-छोटे हरे नो यू स मलना ।  फे फड़ व आंत म छोटे बड़े सलेट फोकाई का मलना ।  प ी क चमड़ी के नीचे व ए डो मनल के वट म िजलेट नस पदाथ एक त होने से सूजी हु ई एपीयरे स का मलना ।  बड़े प य के शव पर ण म ओवर सामा य क तु अ नय मत सकु ड़े हु ए ओवा(को ड अपीयरे स ऑफ योक) मलते ह ।  नर प य के टे ट स, वास डेफरे स आ द म सूजन मलना । 3.4.6 रोग नदान:  रोग का नदान लेट एकलूट नेशन एवं यूब एगलूट नेशन टे ट वारा कया जाता है । रोग नदान क सु वधा े ीय रोग नदान के म उपल ध ह । 3.4.7 उपचार एवं बचाव:  सं मक प य को तुर त लाटर कर गाड़ने अथवा जलाने क व ध वारा न ट कर देना चा हए।  उपचार हेतु स फोनामाइड (0.5%) /कलोरमफे नकोल (0.5%, 6-10 दन), नाइ ो यूरांस (0.4%) क दर से दाने म 10-15 दन तक द जा सकती है ।  रोग से बचाव के लये हेचर से पुलोरम लॉक ह ल एवं इस लॉक को देसी / जंगल / वासी प य अथवा उसी हेचर के दूसरे लॉक से भी दूर रख  फामस / ूडर इ या द को यूमीगेशन (पोटे शयम परमगनेट (75gm) एवं फ म डीहाइड (150cc) वारा डसइंफे ट करना आव यक है ।  फामस आ द म पुलोरम रोग क नय मत जांच (25 प य क ) आव यक प से कराव एवं य द टे ट नेगे टव भी मले तो 2-4 स ताह अंतराल पर इस जाँच को दुबारा कराते रहना चा हए।  सं मण पाये जाने क दशा म पेटे ट टॉक क जाँच कराना अ त आव यक है I 3.5 इ फे शीयस कोराइजा (Infectious Coryza) यह रोग छोट उ के प य म बहु धा पाया जाता है । रोग ठ क होने के बाद भी मुग बीमार का वाहक अथवा के रयर बनी रहती है । सामा यत: जहाँ सभी उस के प ी एक साथ पाले जाते हो, वहां पर इनका सारण अ धक होता है । यह रोग “ हमो फल स गैल ने रयम” (Hemophilus. gallinarium) नामक बै ट रया वारा होता हैI
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    35 3.5.1 ल ण: छंक आना, तथा ना सका वार का ब द होना । नाक पर बदबूदार चपकना तरल पदाथ पाया जाता है, जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, वैसे-वैसे यह तरल पदाथ “चीजी” होता जाता है तथा साइनस म और आँख पर इक ा होता जाता है इस कारण चेहरा सूजा हु आ नजर आता है । आँख ब द एवं सूजी हु ई नजर आती है । कभी “वेटल'' (Wattles) भी बढ़े हु ए नजर आते ह । यह रोग‘ ेस' (Stress) के कारण उ प धारण कर सकता है । तेज हवा, ठ डी हवा, नमी, वै सीनेशन, थान प रवतन, पेट म क ड़े आ द कारण से ेस होने के फल व प कोराइजा हो जाता है । आहार उपभोग म तथा उ पादन म भी कमी पायी जाती है । वटा मन 'ए' क कमी इस रोग के उ प न होने म सहायक होती है । 3.5.2 उपचार एवं नयं ण: इ फे टेड लॉक से चूज को अलग पालना चा हये । स फा तथा ऐ ट बायो ट स वारा उपचार कया जाना संभव है। 3.6 फाउल कॉलेरा (Fowl Cholera): यह छू त का रोग है, जो पास यूरेला, म टो सडा (Pasteurella.multocida) नामक जीवाणु बै ट रया के कारण होता है । ती अव था म अ धक मुग रोग सत होगी तथा मृ यु दर भी अ धक होगी । ॉ नक प म मुग के मुंह पर तथा वेटल पर सूजन आ जायेगी, वैटल लाल सुख तथा छू ने पर गम मालूम ह गे । 3.6.1 सारण : रोगी प य वारा जमीन, आहार, पानी म इस रोग के जीवाणु फै ल जाते ह तथा व य प ी का इनसे स पक होते ह रोग फै ल जाता है । क ड़े, मकोड़े तथा जंगल प ी भी इस रोग को फै लाने म मदद करते ह । 3.6.2 ल ण : ती (Acute) प म मुग समूह म से अनेक मुग एक ह साथ बीमार हो जाती ह, तथा पानी नह ं पीती ह, माँस पे शयाँ घटने लग जाती है । हरे द त भी लग सकते ह तथा उ पादन कम हो जाता है । सर काला पड़ जाता है तथा पैर के तलुवे और जोड़ सूख जाते ह । पैरो म लकु आ हो जाता है तथा बहु त समय तक रोगी रहने पर मुग को सांस लेने म भी क ठनाई महसूस होती है ।
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    36 3.6.3 शव परण ल ण : ती (Acute) प म बहु धा कोई ल ण नह ं दखाई पड़ते ह । सामा य प म लवर, दय, ोवे यूलस, गजाड एवं आंत म ‘' पन पाइ ट हैमरेज’' दखाई पड़ते ह । लवर का कु छ ह सा ह के रंग का दखाई पड़ता है तथा भूरे रंग के ने ो टक पॉट (Necrotic Spot) नजर आते ह । रोग सत मुग म, योक शर र के ह स (Body Cavity) म पाया जाता है । आंत क अ दर क सतह लाल हो जाती है । े ट क मांस पे शयाँ गहरे रंग क हो जाती है । इस रोग म बड़ी दुग ध पायी जाती है । 3.6.4 बचाव एवं उपचार : फाम पर बहु त अ छा ब ध आव यक है । आहार एवं पानी यव था ठ क रख । मरे हु ए प य को ठ क कार से गाड़े । फाम को एवं उपकरण को समय-समय पर क टाणु र हत करते रह । वै सीन का योग कर । 12 स ताह क उ पर ट का लगाकर पुन: 4 - 5 स ताह बाद दूसरा ट का लगाया जा सकता है । य द संभव हो तो लटर भी बदल दया जाना चा हए । 3.7 बोटू ल म (Botulism): 3.7.1 इस रोग को ल बर नैक (Limber Neck) भी कहा जाता है । यह एक कार क जहर या (Poisoning) है, जो गंदे, सड़े गले आहार के कारण होता है । मुग तथा टक दोन म ह यह पाया जाता है । म ी म लो डयम.बोटूलाइनम (Clostridum Botulinum) बै ट रया के पोर (Spore) रहते है जो आहार म मल जाते है । ये आहार म मलकर एक टॉि सन (Toxin) पैदा करते ह जो मुग के लये घातक स होता है । के नेबे ल म से भी यह रोग फै ल सकता है । 3.7.2 ल ण: सड़ा गला आहार खाने के कु छ ह घंटे बाद मुग लंगड़ी हो जाती ह तथा पंख पर भी लकु आ हो जाता है । फर गदन क मांस पे शय पर असर होता है तथा गदन या तो ल बी हो जाती है या क धे पर झुक जाती है । बीमार क शु आत म आँखे धँसी हु ई रहती ह तथा ब द सी रहती ह । बाद म पंख ढ ले हो जाते ह तथा आसानी से खचे जा सकते ह । बहु धा ती रोग के कारण मुग “कोमा” (Coma) क टेज म हो जाती है तथा मर जाती है । 3.7.3 शव पर ण च ह: आँत के अ दर क लाइ नंग म सूजन या हेमोरेज पाया जाता है । ॉप म सड़ा हु आ दाना अथवा माँस पाया जा सकता है ।
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    37 3.7.4 बचाव एवंउपचार: अ छ यव था, अ छा आहार एवं पानी का ब ध इस रोग से बचाव म सहायक स हु ए ह । मि खय से बचाव आव यक है । एक प ट मोलासेज, 5 गैलन पानी म मलाकर यह म ण चार घ टे देकर हटा ल, फर व छ पानी द । मु गय को शांत, ठंडे वातावरण म रख । आहार पानी बदल द । बीमार मु गय को अलग कर द । कै टरआयल, मैगस फ भी लै से टव (जुलाब) के प म योग म लाये जा सकते ह । कु कु ट पालक, जो इस रोग से सत प य का उपचार या देखभाल कर रहे ह , उ ह सावधानी बरतनी चा हये तथा सदैव अपने हाथ धोते रहना चा हये । एक पौ ड मैगस फ त 75 प य के अनुपात से गीले दान म मलाकर दया जाना चा हये । पानी मे देने के लए एक पौ ड मैगस फ 100 प य के हसाब से द । मृत प ी को ग ढे म दाब द । 3.8 ा नक रे पाइरे डजीज (Chronic Respiratory Disease C.R.D.) : इसे “माइको ला मा . इ फै शन” (Mycoplasma. Infection) भी कहते ह । “माइको ला मा. गैल सै ट कम (M.gallisepticum) सी.आर.डी. का मुख कारण था पर तु आजकल “माइ ो ला मा” क एक और क म िजसे “माई. साइनोवी” (M. synoviae) कहते ह, के कारण भी यह रोग फै ल सकता है । 3.8.1 सारण: रोग के कारक व थ प ी क नाक म रहते है । मु गय म माइ ो ला मा का इ फै शन उस समय तक नह ं उभरता, जब तक कोई ेस (Stress) मु गय म नह ं हो जाता । नये थान पर मुग ले जाना, वै सीन का असर इस रोग को उ सा हत करने म सहायक होते ह । यह रोग बै ट रया के यूकस म ेन म गुणन के कारण बढ़ता है, इसम े कया, ना सक देश एयर सैक भा वत होते ह । अ य बीमार जैसे ई. कोलाई (E.Coli) इ फै शन, ो काइ टस (I.B) रानीखेत आ द के कारण भी यह रोग उ प धारण कर लेता है । 3.8.2 ल ण: इसके आर भ के ल ण रानीखेत एवं इ फे शीयस ोकाइ टस (I.B) से काफ मलते ह । आर भ म कु छ ह मुग रोगी होगी । इस रोग म वास क क ठनाई, नाक से ड चाज तथा वायु क नल े कया म रेट लंग (Rattling) क आवाज पायी जाती है । आहार उपभोग कम हो जाता है, मुग कमजोर एवं सूखी से हो जाती है । े ट (Breast) पतल हो जाती है । अंडा उ पादन कम हो जाता है । इस रोग म अ धक प ी सत नह ं होते है तथा फै लाव धीरे-धीरे होता हे । यह रोग कई स ताह तक रहता है । इरा रोग का सारण रोगी मुग वारा अ डे से चूज म भी हो जाता है । 11 - 18 दन म रोग के ल ण दखाई पड़ते लगते ह । ायलस तथा 4-8 स ताह क उ के प य म शी असर होता है । आहार उपयोग कम
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    38 हो जाता हैतथा मुगीं / ायलर टेबल के लये ठ क नह ं रहता । रोग 3 स ताह से 2 माह तक चल सकता है । मृ यु दर 3% से अ धक नह ं होती है, पर तु य द अ य वघटन ह तो मृ यु दर अ धक भी हो सकती ह । 3.8.3 शव पर ण च ह: आर भ क अव था म एयर सैक म झागदार पदाथ या सफे द ध बे पाये जाते ह । े कया ( वास नल ) म भी गाढ़ा पदाथ ( यूकस) पाया जा सकता है । लवर पर एक भाग पतल झ ल चढ़ दखाई पड़ती है । दय क झ ल मोट तथा सफे द दखाई पड़ती है । शर र के भाग (Cavity) म भी “चीजी'' पदाथ पाया जाता सकता है । वास संबंधी भी अनेक प रवतन पाये जा सकते ह । जैसे वास नल म अ धक यूकस, ौ काई म “चीजी” पदाथ, एयर सैक म पीला अथवा धुंधलापन । े कया म हैमोरेज पाये जा सकते ह । 3.8.4 बचाव एवं उपचार : सफाई का पूण यान रख । कोई रोगी प ी दखाई पड़े तो उसक छँटनी कर द । मुग छांटने के बाद एक माह तक नये चूज को उस गृह म नह ं लाना चा हये । कै रयस (Carriers) को फाम पर नह ं रख । इस रोग के ए ट जन (Antigen) उपल ध है । िजनके योग से स पूण समूह क जाँच हो सकती है । नई मुग रखने से प हले उस े क सफाई पूण प से क जानी आव यक है । आहार / पानी म ए ट बायो टक नाइ ो यूरॉन (Nitrofuran) का योग भी रोगी मु गय म कया जा सकता है । रोग बहु धा स दय म फै लता है । रोग फै लने म असंतु लत आहार, पेट म क ड़े, वटा मन 'ए' क कमी, अ धक घन व म मुग पालन, व छ वायु क कमी तथा मुग गृह म नमी ये सभी कारण इसक उ ता को बढ़ाते ह । मुग को रोग क अव था म अ धक वटा मन भी दया जाना आव यक है । यह छू तदार बीमार है । अत: रोग सत फाम से कोई भी यि त व थ फाम पर नह ं जाना चा हये । वायु म डल से भी इस रोग का सारण होता है । मु यत: यह सीधे स पक से ह सा रत होती है । भूख बढ़ाने के लये आहार म मोलासेज (राब-शीरा) मलाएँ । ए ट बायो ट स के इ जे शनस भी लगाये जा सकते ह । 3.9 ऑमफे लाइ टस (Omphalitis): यह बै ट रयल सं मण है, जो ना भ देश म पाया जाता है । है चंग के बाद जब ना भ का मुंह ब द नह ं हो पाता, तब कई बै ट रया चूजे के शर र म वेश कर जाते ह । 3.9.1 ल ण: इस रोग म सामा य कमजोर , ूडर के नीचे इक ा होना, तथा अनायास मृ यु जैसे ल ण दखलाई देते है । चूजे को हाथ म लेने पर वह पल पला मालूम होगा- पेट बढ़ा हु आ मालूम होगा । शी ह यह रोग बढ़ता है-ल ण दखने के एक दन म ह मृ यु दर 50% तक हो सकती है ।
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    39 3.9.2 शव परण च ह पेट क मांस पे शय म तरल पदाथ पाया जाता है । 'योक' अनएबजोबड (Unabsorbed) पाया जाता है, शर र म सूजन पायी जाती है तथा दुग ध आती है । इस रोग का इ युवेशन म असावधानी तथा सफाई क कमी से भी संबंध है । इस रोग का सामा यत: कोई उपचार नह ं है । 3.10 ग ीनस डरमेटाइ टस (Gangrenous Dermatitis) 3.10.1 लो डयम (Clostridium) नामक जीवाणु इसका मु य कारण हो सकता है । फर भी इस या ध के उन कारण क जांच आव यक है, िजसके कारण यह उ प धारण करती है । जैसे:- (1) वचा म छ होने के कारण तथा मुग के शर र म र त त व क कमी के कारण यह रोग हो सकता है । कई प ी िजनम न चने क या –“कै नाब ल म” क आदत होती है, इस रोग के शी शकार होते ह। (2) ऐसा भी पाया गया क यह या ध “पेरे ट लॉक'' म या त रहती है । इसका कोई “जेने ट स'' (Genetics) से सीधा स पक हो सकता है । (3) मुग के शर र म वटा मन ई तथा सेल नयम, इन दोन क कमी के कारण भी “ग ीनस डरमेटाइ टस'' हो सकती ह या खराब रखरखाव । कई कार क औष धयाँ इसके योग म लाई जा चुक है, पर तु सफलता के वल पैनी सल न को मल है । उपरो त कारण से बचाव करने से इस या ध के फै लने क कम संभावना होती है । 3.11 सारांश : जीवाणुज नत प ी रोग क व तृत जानकार जीवाणु के कार, उसके सारण के तर के , भ न- भ न जै वक तं पर उसका दु भाव एवं वशेष ल ण व शव पर ण, ल ण के आधार पर ना सफ इन रोग का भावी नयं ण कया जा सकता है, अ पतु समय पर वशेष ए ट बायो टक औष ध के योग, हाइजे नक मापद ड अपनाकर मृ युदर काफ कम क जा सकती है । प ीशाला के आस-पास जीवाणुओं को नह ं पनपने देने, समय-समय पर जीवाणुरोधी औष धय का छड़काव एवं समय पर वै ा नक तर के से कये जाने वाले ट काकरण इन रोग के भावी नय ण म वशेष कारगर स होते है ।
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    41 इकाई - वषाणुजनत प ी रोग एवं उपचार इकाई - 4 4.0 उ े य 4.1 तावना 4.2 इकाई म यु त श दाथ 4.3 रानीखेत रोग (आर.डी.) 4.3.1 कारण 4.3.2 सार 4.3.3 ल ण 4.3.4 शव पर ण 4.3.5 बचाव एवं उपचार 4.4 ग बोरो रोग (इंफे शीयस बसल डजीज या I.B.D.) 4.4.1 कारण 4.4.2 ल ण 4.4.3 शव पर ण 4.4.4 बचाव एवं उपचार 4.5 मेरे स रोग 4.5.1 कारण 4.5.2 सार 4.5.3 ल ण 4.5.4 शव पर ण 4.5.5 बचाव 4.6 ऐवीयन यूको सस कॉ पले स (A.L.C) 4.6.1 कारण 4.6.2 ल ण 4.6.3 शव पर ण 4.6.4 बचाव एवं उपचार 4.7 ल ची रोग 4.7.1 कारण 4.7.2 सारण 4.7.3 शव पर ण
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    42 4.7.4 रोग नदान 4.8इ फे सीयस ो ाइ टस (आई.बी) 4.8.1 कारण 4.8.2 ल ण 4.8.3 शव पर ण 4.8.4 बचाव 4.9 इ फे सीयस लैरजो ेक याइ टस ् (I.L.T.) 4.9.1 सारण 4.9.2 ल ण 4.9.3 शव पर ण 4.9.4 नयं ण 4.10 फाउल पॉ स (Fowl Pox) 4.10.1 सारण 4.10.2 ल ण 4.10.3 बचाव 4.11 एवीयन एनके फे लोमाइलाइ टस (Avian Encephalomylitis) 4.11.1 सार 4.11.2 ल ण 4.11.3 उपचार 4.12 सारांश 4.0 उ े य: प य म सभी वषाणु रोग अ य त ती ता से फै लते ह । इन रोग के कारण कु कु टपालक को अचानक ह भार आ थक हा न उठानी पड़ सकती है, य क वषाणुज नत रोग के ल ण अचानक कट होते है एवं कभी-कभी तो बगैर ल ण द शत कये ह छोटे चूज व मु गय म रोग क मृ युदर 100% तक पहु ँच सकती है । इकाई म इसी उ े य को यान म रखकर येक वषाणुज नत रोग क व तृत या या क गई है तथा बचाव एवं रोकथाम के हर संभव यास का वशेष उ लेख कया गया है । 4.1 तावना: प ीशाला म प य क रोग के कारण होने वाल मृ यु म सबसे बड़ा कारण वषाणुज नत रोग ह है । वषाणु क संरचना ज टल होती है एवं ए ट बायो टक औष धय का सीधा भाव नह ं पड़ने के कारण वषाणु क बीमार पैदा करने क मता अ य त ती ता से बढ़ती है ।
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    43 वषाणु रोग काएक नि चत सं मण काल (Incubation Period) होता है, उसके प चात यह रोग वत: ह समा त हो सकते ह, क तु वषाणुज नत रोग म शर र क तरोधक मता म ती गरावट एवं वतीय जीवाणु सं मण के कारण मृ युदर अ धक पाई जाती है । ए ट बायो टक (Antibiotic) औष ध का योग इ ह ं वतीय जीवाणु सं मण क रोकथाम के लए कया जाता है I वैसे तो वषाणुज नत रोग का कोई नि चत इलाज नह ं है, क तु समय रहते लए गए बचाव के उपाय एवं योग कये गये ट काकरण से होने वाल मृ युदर एवं आ थक हा न से बचा जा सकता है । इकाई म व भ न वषाणु ज नत रोग का वग कृ त अ ययन तुत कया गया है । साथ ह व भ न रोग क वभे दत जाँच (Differential Diagnosis) का उ लेख शी नदान के लए कया गया है । वषाणु ज नत रोग क जाँच ाय: योगशाला म क ठन एवं अ धक समय लेने वाल होती है, क तु शव पर ण कर एवं वशेष शव पर ण जाँच के आधार पर ल जन क पहचान कर शी नदान संभव है । इस इकाई म इ ह ं वशेष पेथो नो मक पो टमाटम ल जन का उ लेख कया गया है । योगशाला म वषाणु रोग क आधु नकतम जाँच म अगार जेल इ मु युन ड यूजन टे ट. (AGID) का पल मे ट फ शेसन टे ट (C.F.T.) पॉल मरेज चेन रए शन (P.C.R),एस.डी.एस. पेज (SDS PAGE), इ जाइम लं ड ईमुनोएवसोरवट ऐसे (ELISA) सीरम,- यु लाईजेन टे ट (S.N.T.) डी.एन.ए. ोव (DNA PROBE) जैसे पर ण वतमान म काय म लये जा रहे है, फर भी कु कु ट पालक को चा हए क मुग शाला म अथवा योगशाला म मृत प ी का शव पर ण (Post Mortem) कर शी जाँच करा ले तथा अ य योगशाला जाँच के लए आव यकतानुसार से पल लेकर संबं धत वाइरोलॉजी लेब (Virology Lab.) को भजवा देव । आजकल ए ट वायरल स (Drugs) भी योग म ल जा रह है, क तु इनसे इन रोग का उपचार काफ महंगा होता है एवं कई बार आशातीत नतीजे सामने नह ं आ पाते । इसी कार क सभी ायो गक जानका रयाँ इस ईकाई म सि म लत क गई है ता क सरल एवं सीधी भाषा म कु कु टपालक पूण तकनीक के साथ इन रोग से अपने प य का बचाव कर सक । 4.2 ईकाई म यु त श दाथ: (i) वायरस - वषाणु (ii) बे ट रया - जीवाणु (iii) ल जन- रोग के घाव (iv) पेथो नो मक ल जन -रोग के वशेष ल जन (v) वे सीनेशन - ट काकरण (vi) ो काइ टस - खाँसी आना
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    44 (vii) व रयॉन(Virion) - वायरस क कायकार यू नट 4.3 रानीखेत रोग (आर.डी.) : सव थम डोयल (Doyel) ने सन ् 1926 म इस रोग को यूकै सल देश (आ े लया) म पाया था । अत: इसे यूकै सल डजीज (Newcastle Disease) भी कहते ह । इसम वास न लेने के कारण 100% मृ यु हो सकती है । यह रोग एक वायरस (Virus) वषाणु वारा फै लता है । अंडा देने वाल मुग ाय: ब कु ल अंडा देना ब द कर देती ह । इस रोग म 50% तक मृ यु हो सकती है । यह रोग च कन एवं टक दोन म सामा य प से पाया जाता है । यह रोग एक वषाणु (Virus) वारा होता है िजसे “मीइ सो वायरस म ट फोम ' (Myxo virus Multiforme) कहते ह । यह वायरस बड़ा ह तरोधक है- अ छे म 255 दन, शैल म 288 दन तक, मुग म 255 दन तक यह जी वत रह सकता है । इस रोग के चार ा प बताये जाते है:- (1) व ले ट फाम (Virulent Form) :- यह ती असर क अव था है तथा मृ यु दर 100% तक हो सकती है । बीमार 3-4 दन रहती है तथा कभी-कभी एक दन म ह सब मुग मर सकती है । इसके मु य ल ण है- वास लेने म वशेष आवाज (Rales), अ धक देर तक वास लेने म क ठनाई, गदन ल बी, खुल हु ई च च, नाक से तरल पदाथ ( ड चाज), अ धक द त, तापमान सामा य से 2-30 F अ धक तथा बाद म सामा य से कम तापमान तथा पेर ल सस एवं कं पकं पी । (2) मसोज नक कार (Mesogenic Form):- इसम हा न कम होती है, मृ यु दर 5-15% होती है, वास लेने म क ठनाई, हरे रंग का द त, अ ड के उ पादन म भार कमी पायी जाती है । अंडा 'शैल' ( छलका) कमजोर, असाधारण श ल का हो सकता है । पंख तथा पैर का लकवा हो सकता है । (3) ले टोजे नक कार (Lantogenic Form):- यह इस रोग का कम भाव वाला व प है। ह के वास ल ण दखाई देते ह- अंडा देना कम हो जाता है । बड़ी मु गय म मृ यु दर बहु त कम हो सकती है, पर छोट उ म यह 50% हो सकती है । इस अव था म े कया म के वल ह क सूजन पायी जाती है । (4) ए स टोमे टक फाम (Asymptomatic Form):- कोई वशेष ल ण नह ं पाये जाते ह । सीरोलॉिजकल योग से यह अव था पहचानी जाती है । यह रोग कसी भी उ के प ी म हो सकता है, पर तु छोट उ के प ी बहु धा अ धक सत होते ह । इस रोग म गैि पंग खांसी, गले क खराश, रैट लंग क आवाज मु यत: पाये जाते ह । आहार उपभोग कम हो जाता है, यास अ धक हो जाती है, गम के पास अ धक चूजे इक े हो जाते ह तथा नायु के ल ण अ धक दखाई पड़ते ह । पंख तथा पैर का लकवा पाया जा सकता है । सर दोन पैर के बीच म अथवा कं ध के बीच म पाया जा सकता है । मुग पीछे चलती है, च कर खाती है, सर तथा
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    45 गदन को घुमातीहै । बड़ी मु गय म गैि पंग तथा खांसी आना सामा य ल ण ह । मुग आहार उपयोग ब द कर देती है । वकृ त प के अंडे पाये जा सकते ह । इस रोग क प क जांच हेतु योगशाला का पर ण आव यक है । कु कु ट पालन म इस रोग को आर.डी. के नाम से जाना जाता है । यह एक अ य त घातक ती ग त से फै लने वाला सं ामक छू तदार रोग है । इससे प य म मृ यु दर 100% तक हो सकती है । 4.3.1 कारण:- यह रोग चार प म पाया जाता है :- 1. व लट फाम - उ प 2. मसोजे नक फाम - अपे ाकृ त कम हा नकारक 3. ले टोजे नक फाम- कम भावी प 4. ए स टोमे टक प - वशेष ल ण नह ं पाये जाते है । 4.3.2 रोग का सार 1. रोग के वाइरस सं मत प ी के सभी कार के ाव (बीट, आँसू, नाक एवं मुँह से नकलने वाले ाव) वारा खाने पीने के बतन, लटर आ द सं मत हो जाते ह, िजनके मा यम से यह रोग व थ प य म फै लता है। 2. ऐरोसोल या हवा के मा यम से रोग के वषाणु एक थान से दूसरे थान पर पहु ँच कर प ी को सं मत करते ह । 3. आगंतुक के मा यम से यह रोग एक फाम से दूसरे फाम पर शी फै लता है । 4. जंगल प य म भी इस वाइरस को देखा गया है । 5. इस रोग से सत प य / मृत प य के स पक म आने वाले मनु य जैसे कु कु ट पालक / च क सक आ द सभी म इस वाइरस के कारण कं ज ट वाइ टस देखी जा सकती है । (जूनो टक भाव) 4.3.3 ल ण 1. रोग अचानक कट होता है एवं इससे भा वत प ी म खाँसी, वसन म तकल फ, गेि पंग के अ त र त वसन म वशेष कार क आवाज (रेट लंग) कट होते ह । 2. प ी वारा आहार का उपभोग कम व पानी का उपभोग अ धक हो जाता है । 3. प य को हरे द त लगना । 4. इसके अ त र त लो नक पा म आना, कं पकं पी आना गदन क माँस पे शय म अकड़न (टाट को लस) 5. प ी को च कर आना, पाँव , कं ध , पंख अथवा गदन क माँस पे शय म लकवा मार जाना आ द ल ण दखते ह । 6. वकृ त प के अंडे पाये जाना, अ ड के शैल ( छलका) कमजोर होना आ द ल ण कट होते ह ।
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    46 4.3.4 शव परण 1. वास नल म यूकस, हेमोरेज एयरसेक का धुंधला एवं फे फड़ का कं ज टेड होना। 2. प ी क आंत म हमोरेज बटन अ सर, सूजन मलना 3. ोवे यूलस एवं सीकल टॉि सल का हेमरेिजक मलना / पट क यल ( पन पोइ ट) हेमरेज । 4. ए डो मनल के वट म पानी के समान ऐग योग एवं कई एग फॉल क स का मलना। 4.3.5 बचाव एवं उपचार 1. प ी गृह क नय मत सफाई एवं समय-समय पर क टाणु र हत करना भोग के वाइरस अ ावायलेट करण से एवं फाम लन से भा वत होते है) 2. रोग से बचाव हेतु वे सीन (ट के ) लगाना अ नवाय है । 4.4 ग बोरो रोग (इंफे शीयस बसल डजीज या I.B.D.) ये कम उ क मु गय का ती फै लने वाला छु आ-छू त का रोग है । इस रोग का इ युवेशन पी रयड 18 से 36 घ टे है । ये रोग के वल मु गय म ह ाकृ तक प से होता है । च स म पहले दो स ताह म रोग के ल ण दखाई नह ं देते ह, पर तु रोग से लड़ने क मता 50 तशत कम हो जाती है । इस रोग म ाय: 3 से 6 स ताह क आयु म रोग के ल ण दख जाते ह, जैसे भूख क कमी, द त, उखड़े-उखड़े पंख, पानी क कमी एवं कं पकं पी इस रोग म मुग 100 तशत भा वत होती है और मृ यु दर भी काफ अ धक रहती है । इस रोग का कोस 4 से 7 दन का है । डीप ल टर म क गई ू डंग क अपे ाकृ त के ज म क गई ू डंग क मु गय म मृ यु दर अ धक रहती है । (जांघ म जमा हु आ खून) पो टमाटम म गुद खराब मलते ह और बसा नाम का अंग फू ल जाता है । सीने और आंख म खून जमा हु आ दखता है । (मुग का सूजा हु आ बसा)
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    47 ग बोरो कावायरस अ य त कठोर वायरस है, इसे मुग फाम से दूर करने म काफ परेशानी आती है । लोर न डसइ फै टै ट से ये वायरस अ या धक भा वत होता है । इस रोग का कोई उपचार नह ं है । अत: वै सीनेशन (ट काकरण) आव यक है । रोग क रोकथाम के लए 4 वै सीन ेन-माइ ड, इ टरमी डयेट (जारिजया) इ वे सव इ टरमी डयेट (IV.95 लेयर के लए और बी2के ायलर के लए) एवम ् हॉट ेन वै सीन का उपयोग होता है । रोग क रोकथाम के लए वै सीन ेन के चुनाव म अ या धक सावधानी बरतनी चा हए एवम ् इसका नणय ए रया ( थान) वशेष म रोग क ि थ त के आधार पर करना चा हए । साधारण प रि थ तय म हॉट ेन का योग हमारे देश म ग बोर रोग क रोकथाम के लए नह ं करना चा हए । आर.डी. एवम ् ग बोरो रोग का वै सीनेशन शङॅयूल ए रया वशेष के अनुभवी पौ सलाहकार क नगरानी म मैटरनल ऐंट बॉडी टाइटर (Mab) के आधार पर नधा रत करना चा हए और स ती से योग म लाना चा हए । एम.एबी. टाइटर क जाँच एक दन के कम से कम 12 चूज के र त से क जाती है । 4.5 मेरे स रोग (Marek’s Diseases) वदेशी जा त के प ी के आयात के साथ-साथ यह रोग भी इस देश म आ गया है । आज के मुग पालन युग म आ थक हा न के संदभ म संभवत: यह सबसे मह वपूण रोग है । पुलेट म, ायलस म यह बहु त ह घातक स हु आ है । ाय: 16 स ताह क उ से कम के प ी ह रोग सत होते है । ये रोग हरपीज वायरस (Herpes Virus) वारा होता है । इस रोग म सतह क नायु (Nerve) तथा के य नायु णाल म (Central Nervous System) म असाधारण “सैल ोथ” (Cell Growth) पायी जाती है अत: इस रोग के एक मुख कार को “फाऊल पैरले सस' (Fowl Paralysis) क सं ा भी द गई है । नायु (Nerve) के अलावा अ य अंग म भी इस रोग का भाव पड़ सकता है । पंख क जड (Follicle) म भी रोग का असर हो सकता है । लवर, गुद, टे ट ज, (Testes), ओवा पील न (Spleen), फे फड़े (Lungs) पर यूमर (गाठ) पायी जा सकती ह । इस अव था म नायु सूजन संभवत: नह ं दखाई पड़े । इस रोग को ‘ यूरो लकोमटो सस’ (Neurolymphomatosis) या “रज पैरले सस” (Range Paralysis) भी कहते हI सारण :- संभवत: वास णाल से वायरस शर र म वेश करता है । अंड वारा चूज म इस रोग का सारण अ धक मह व का नह ं है । इस कार के रोगी प ी समूह म कॉ सी डयो सस रोग फै लने क अ धक संभावना रहती है । इस रोग क इ यूबेशन अव ध 7-28 दन है तथा 1 माह से 5 माह क उ के प ी रोग सत होते ह । लटर से भी यह रोग फै लता है । कम उ क मादा प ी अ धक रोग सत होती है । 4.5.1 कारण व सार:- हरपीज वाइरस - यह रोग सं मत मुग के पंख वारा फै लता है । इसके अ त र त रोग का सारण सं मत लार, मल एवं हवा वारा भी हो सकता है ।
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    48 4.5.2 ल ण 1.रोगी प ी के पैर , पंख , गदन आ द भाग म आ शक अथवा पूण लकवा (पेराले सस) देखने को मलता है । 2. प ी लंगड़ा कर चलता है । दोन टांग अथवा एक टांग, पंख एवं गदन आ द क मांस पे शय म लकवा हो जाने के कारण चल नह ं पाता एवं भूख व यास से मर जाता है । 3. रोग के वषाणु आँख क आइ रस को भा वत करते ह, िजससे आँखे सूजी व लेट रंग क तीत होती ह । आइ रस म लं फ़ोसाइट जमा हो जाने के कारण इस अव था को फश आई अथवा पल आई भी कहा जाता है । 4. रोगी प ी के व भ न अंग जैसे लवर, ल न, आत, बसी एवं वचा पर यूमर दखलाई देते है । 5. मुग के एक पैर म लगवा होने से एक पैर आगे व एक पीछे मुड़ा हु आ रह जाता है । 6. गदन म लकवा होने के कारण प ी का आसमान क तरफ देखते रहना (टाट को लस) अव था देखी जा सकती है । 4.5.3 शव पर ण 1. पे टक नव को दन के काश म देखने पर उसक धा रयाँ ( ॉस ाएशन) दखलाई नह ं देती । 2. लवर ल न, बसा आ द भाग पर यूमर देखे जा सकते ह । 4.5.4 बचाव एवं उपचार 1. यह एक छू तदार रोग है, अत: व थ प ी को रोगी प ी से दूर रख । 2. रोग का तरोधक ट का ज म से ह अथवा शू य दवस पर चूज म लगाया जाना आव यक है । 3. रोग क ि थ त म फाम पर नय मत सफाई कर व झड़े हु ए पंख का जला देना चा हए, य क रोग के वषाणु पंख क जड़ (फॉ लक स) मे व यमान रहते ह । 4. व भ न उ के प य को साथ नह ं पाले एवं उस े म मुग पालन न कर, जहाँ यह रोग फै ला हु आ है । 5. ए ट बायो टक औष ध का योग कर तथा प य को ेस क अव था से बचाय। 4.6 ए वयन यूको सस कॉ पले स (A.L.C): मु गय म अ य प य क अपे ा यह रोग अ धक होता है । वैसे अ य प य म भी यह रोग होता है । अ धक उ क मु गय म ाय: यह रोग होता है । इस रोग म मुग कमजोर हो जाती है, मुग क कलंगी सूखने लगती है तथा उसम खून क कमी हो जाती है । कु छ मु गय का पेट फू ल जाता है तथा मृ यु से पहले उनम हरे द त लग सकते ह ।
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    49 यह रोग माता-पता से अ डे वारा चूजे म आता है । यह रोग बीमार मुग म सीधे स पक वारा या बीमार से दू षत वातावरण से फै लता है । यह रोग हवा वारा नह ं फै लता है । इस रोग के यूमर ाय: कलेजी, ल न, कडनी म मलते ह । यह यूमर दय, पैन यास ह डी म जा (बोन मैरो), जनानंग (ओवर गोनाड) आँत, आँत क झ ल और बसा फै ब र सयस म भी मल सकते ह । यह यूमर फे फड़े, थाइमस या वचा म कभी-कभार ह मलते ह । ह टोपैथोलौजी टे ट के वारा मैरे स और ल फाइड यूको सस म अ तर कया जा सकता ह । यह व भ न रोग का एक समूह है, िजसके अ तगत वाइरस ज नत रोग जैसे ल फाइड यूको सस अथवा बग लवर डजीज, आि टयोपे ो सस एवं इ र ो ला टो सस जैसे घातक रोग सि म लत है । मुग पालन म ए.एल.सी समूह का रोग ल फाइड यूको सस ह अ धक देखने को मलता ह । यह रोग मेरे स रोग जैसा घातक नह ं है क तु अ डा उ पादन वाल मु गय म काफ हा न पहु ंचाने वाला रोग है । इस रोग क सभी अव थाओं म लवर सामा य से बड़ा दखलाई देता है । 4.6.1 कारण:- 1. वाइरस अ डे के मा यम से चूजे म आ सकता है । अत: यह मु गयाँ के रयस कहलाती ह एवं रोग सारण का काय करती है । 4.6.2 ल ण 1. ल फाइड यूको सस नामक रोग सोलह स ताह या अ धक उस के प य म मलता ह । अ डा देने वाल मु गय म बहु धा यह रोग देखा जा सकता है । 2. प ी म कमजोर आना, भूख कम लगना तथा द त लग सकते है । 3. प ी क कलंगी पील सकु ड़ी हु ई दखलाई देती ह । 4.6.3 शव पर ण 1. ल वर व कडनी पर भाव देखने को मलता है । 2. इस रोग म लवर आकार म सामा य से बड़ा एवं गुलाबी रंग का दखलाई देता है एवं ाय: पूर के वट म सभी अंगो को ढके हु ये तीत होता है । 3. लवर के ऊपर नो यू स अथवा अ धक सं या म यूमर देखे जा सकते है । 4. गुद गहरे भूरे रंग के दखाई देते ह तथा बसा म यूमर पाये जाते है । 5. शर र के अ य अवयव जैसे ल न म भी इसका भाव देखा जा सकता ह, िजससे यह आकार म बढ़ जाती है । 4.6.4 आि टयोपे ो सस – यह इस वायरस ज नत रोग क ह डयाँ से संबं धत है । इस रोग म ह डयां बढ़ हु ई व स त नजर आती है । ह डी क मोटाई असामा य होती है तथा भावी े सु न हो जाता ह । प ी झटके दे देकर चलता है ।
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    50 (v) मायलोइड यूकोसस - इस अव था म सफे द चॉक के समान यूमरस वशेषतया पस लय व टनम भाग क मांस पे शय पर पाये जा सकते ह । (vi) इ र ोइड यूको सस या इ रथो ला टो सस - 1. रोग क यह अव था कम ह देखने को मलती है । मुग सामा य दखलाई देती है तथा पंख र हत थान पर पीलापन दखाई देता है । 2. इस रोग म वशेषकर लवर व ल न आकार म बड़े व चेर रंग के दखाई देते ह। 3. आंत म एवं लवर पर हेमरेज देखे जा सकते ह । (vii) बचाव एवं उपचार - 1. इस समूह के रोग का भावी उपचार एवं कोई भावी वे सीन नह ं है । 2. जै वक सुर ा (बायो स यू रट ) नयम को यान म रखते हु ए फाम पर साफ सफाई का वशेष यान रख। 3. रोग त प य क बीट का उ चत न तारण कया जाना चा हए । 4. छोटे चूज का वय क प य के साथ पालन न कर । 5. हेच रज पर इस कार का पेरे ट टॉक उपयोग कया जाना चा हये, िजनम ए.एल.सी. रोग के त ाकृ तक प से रोग तरोधकता हो । 4.7 ल ची रोग : प य म पाया जाने वाला यह एक वषाणु ज नत रोग है जो क एडीनो वाइरस समूह के सं मण के कारण वशेषकर ायलर समूह म अ धकता से पाया जाता है िजसके कारण वसन रोग, अ डा उ पादन म कमी, मील पे शय और आंत रक अवयव म हेमरेज, र त क कमी आ द जैसे र ण दखलाई पड़ते ह । 4.7.1 कारण : एडीनो वायरस समूह से FAV-1 ( ूप-1, ूप-2, ूप-3) - इस सं मण के कारण प य म ती इ यून सं ेशन पाया जाता है । 4.7.2 सारण : ुप-1 एडीनो वाइरस समूह का सारण वट कल (सं मत प य से अ ड एवं चूज मे) तथा होर जे टल (तीन स ताह क उ के प चात सं मत प य वारा एक फाम से दूसरे फाम) म होता है । Avi Adenovirus Gr.III Egg. Drop syndrome के कारण । 4.7.3 ल ण एवं शव पर ण - 1. यह रोग मुखत: 3-6 स ताह के चूज म होना देखा गया है ।
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    51 2. रोगी पय म रोग तरोधकता अ य धक कम हो जाती है । 3. IBH-HPS (इ लूजन बॉडी हपेटाइ टस - हाइ ोपेर का डयम सं ोम) मलता है । 4. पो ट माटम म मुग के दय के चार तरफ (पेर का डयम) म पानी (साफ/लाल/भूरे रंग का) अथवा जैल क तरह का पदाथ जमा हो जाता है तथा दय ल ची फल जैसा तीत होता है । 5. ल वर सूजा हु आ, डसकलड (बेरंग) एवं उठाने पर बखरने वाला अथात् भंगुर (Friable) हो जाता है। 6. कडनी (गुद) भी खराब सूजे हु ये एवं कं जे टड पाये जाते ह । 7. रोग म ल न, बसी फे ीकस, थाइमस आ द भी भा वत हो सकती है । 4.7.4 रोग नदान: 1. दय क पेर का डयम झ ल म पानी भर जाना । (हाइ ोपेर का डयम) एवं उसका ह टोपेथोलोिजकल पर ण के दौरान ह पे ोसाई स म इ लूजन बॉ डज का पाया जाना । 2. एि यो चक लवर टशू क वर तकनीक 3. व छता का यान रख । 4. IBH-HPS वाइरसआइस लेटेड फॉमलाइ ड आयल इम सीफाइड वे सीन से एक स ताह क उ पर ट काकरण कया जा सकता है । च - 4.7 : दय म पानी व दय ल ची जैसा 4.8 इ फै ि शयस ा काइ टस (आई.बी.) रोग आई.बी रोग मु गय म पूरे व व म पाया जाता है तथा कसी भी आयु क मुग म हो सकता है । यह छु आछू त वाला वास का रोग है तथा मु गय म तेजी से फै लता है । इस रोग म छोटे चूजे मुँह फाड़ कर साँस लेते ह तथा अ डे देने वाल मु गय म अ डा घट जाता है और अ डे का छलका खराब हो जाता है । मु गयाँ क चे छलके वाले या खुरदरे छलके वाले अ डे देती ह । इस रोग म अ डे का ऐ युमेन पानी जैसा पतला हो जाता है । आई.बी. वायरस के अनेक ेन है, िजनक बीमार पैदा करने क मता भ न है । टक नामक प ी म यह रोग नह ं होता हे । इस रोग का वायरस बीमार मुग से रोग के लए
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    52 ससैपि टवल लाक(िजन मु गय म रोग रोधक मता नह ं हो) म सीधे स पक से या फर बोर , जूते, अ डे क े, बुरादे आ द म फै लता है और ऐसी सभी मु गय म बीमार पैदा करता है । आई.बी. रोग के साथ य द माइको ला मा या ई. कोलाई इ फै शन है तो इस रोग म 30-40 तशत मृ यु हो सकती है । मृ यु ाय : छोट उ क मु गय म अ धक होती है तथा सद म और भी अ धक होती है । इस रोग म छोट उस के चूज म, ौ काई के लेवल पर ( े कया या न साँस क नल , जहाँ ा कई वारा फे फड़ से मलती है) यूकस लग मलते ह और दम घुटन के कारण चूज क मृ यु हो जाती है । इस रोग म मुग क वास नल लाल रंग क हो जाती है और नाक म यूकस भर जाता है । रोग के ल बे समय तक चलने क ि थ त म ई. कोलाई नामक बै ट रया के का ल के शन (रोग बगाड़ना) के कारण फे फड़े काम करना ब द कर देते ह । च 4.8 : े कया- ा काई म यूकस लग 4.8.1 कारण: यह कोरोना ुप के वाइरस से फै लने वाला वसन रोग है । रोग का सार वायु वारा रोगी प ी से व थ प य म होता है । 4.8.2 ल ण: 1. वास लेन म आवाज आना ( ेक यल रा स), प ी वारा गेि पंग करना, आँख व नाक से पानी आना । 2. प ी को भूख न लगना, वजन कम हो जाना । 3. अ डा देने वाले प य म अ डा उ पादन 50% तक कम हो जाना, ले कन अ डा उ पादन ब द नह ं होता । 4. अ डे का आकार व कार भा वत होना । अ डा क चे छलके वाला आना, अ डे क ए यू मन (सफे द भाग) पानी के समान हो जाना आ द ल ण पाये जाते ह । 4.8.3 शव पर ण : 1. े कया एयर सेक, का सूजा होना, कं ज टेड (लाल) एवं यूकस पाया जाना । 2. ा कयो स म चीजी (cheesy) ए सूडेट मलना । 3. प ी क कडनी म सूजन एवं कं जेशन मलना । 4. ओवर सामा य क तु ब द (इंपे टेड) ओवीड ट का मलना । 5. शव पर ण के दौरान ए डो मनल के वट म पानी के समान पतला, टूटा हु आ अ डा मलना ।
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    53 4.8.4 बचाव एवंउपचार - 1. अ व थ प य को व थ प ी समूह से अलग रख । 2. कमरे / ूडर का तापमान अ धक होना चा हए (रोग क अव था म लगभग 2o C अ धक कर दे) ले कन पेन म प ी घन व अ धक (ओवर ाउ डंग) न हो । 3. प य को दाना चुर मा ा म दया जाना चा हए । 4. सं ामक आई.बी.रोग का ट का उपल ध है िजसे 0-7 दन एवं 16 स ताह क आयु पर पीने के पानी म दया जाना लाभकार रहता है । 4.9 इ फे सीयस लैरजो ेक याइ टस् (Infectious Laryngotracheitis I.L.T.): वायरस (Virus) वारा यह रोग होता है तथा इसके कारण बहु त आ थक हा न हो सकती है । मृ यु दर भी अ धक होती है । अ धक उ प म भी मुग उ पादन अ छा दे सकती है । ायलस म आहार उपयोग कम हो जाता है । 4.9.1 सारण: वायु, उपकरण, कपड वारा यह वायरस रोग फै लता है । मु यत: प य के आपसी स पक वारा यह रोग फै लता है । नाक वारा हवा के साथ भी यह इ फै शन फै ल सकता है । पानी वारा भी यह रोग फै लता है । ठ क हु ई मुग रोग का के रयर बनी रहती है । 4.9.2 ल ण: रोग धीरे-धीरे फै लता है तथा लगभग 1 -2 स ताह म अ धकांश मु गय म हो जाता है । आई.बी. रोग शी फै लता है । मु य ल ण है छ ंकना, खाँसी, वास म क ठनाई - ये ल ण रा म अ धक होते ह । मुग कमजोर, सुला रहती है । अ सर बैठ रहती है । वास लेते समय गदन को ल बी करती है, जो इस रोग का मुख ल ण है । एक वशेष कार क आवाज भी मुग करती है तथा खाँसी के समय र त रंिजत यूकस बाहर आता है । कु छ मु गय म नाक से भी ड चाज नकलता है, तथा मुँह तथा वैटल पर सूजन भी पायी जाती है । अ धकांश मुग दो स ताह म ठ क हो जाती ह । िजतना ती इस बीमार का प होगा, उतनी ह इसक अव ध कम होगी । 15% तक मृ यु दर हो सकती है । 4.9.3 शव पर ण च ह: शव पर ण पर े कया म र त रंिजत “ यूकस” (Mucus) पाया जाता है । “चीजी लग” (Cheesy Plug) े कया तथा “लैरे स (Larynx) के ऊपर भाग म पाया जाता है । इस रोग क पूण जाँच के लये योगशाला से संबंध था पत कया जाना चा हए । 4.9.4 उपचार एवं नयं ण: इस रोग का बचाव वै सीन वारा होता है । अ य औष ध जैसे ए ट बायो ट स आ द भी द जा सकती ह । 4.10 फाउल पॉ स (Fowl Pox): यह वायरल रोग है, माता (फाउल पॉ स) के दो प सामा यत: पाये जाते ह :- (i) “ वचा प” इसम को ब, चेहरा, वैटल आ द पर प पल या ‘ के ब' (Scab) दाने पाये जाते ह ।
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    54 (ii) नम पॉस (Wet Pox):- इसम मुँह के अ दर क मे ेन पर “दाने” पाये जाते ह । वचा प का रोग अ धक पाया जाता ह । कसी भी उ के प ी इस रोग से सत हो सकते ह । 2 से 4 स ताह तक यह रोग असर करता है । मृ यु दर अ धक नह ं होती है, पर तु अ डा उ पादन कम हो जाता है । 4.10.1 सारण: रोगी मुग के स पक से रोग फै लता है, म छर तथा जंगल प ी भी रोग सारण म सहायक होते है। 4.10.2 ल ण: वचा प म इस रोग के ल ण छोटे सफे द दाने के प म शु होते ह तथा फर यह पीले रंग के होकर गहरे भूरे रंग के ह जाते ह । 2-4 स ताह के बाद यह दाने सूख जाते ह । ये ल ण को ब चेहरा, वैटल (गल क बल) पर अ धक पाये जाते ह । कभी-कभी पैर पर भी पाये जा सकते ह । नम पॉ स म वास म क ठनाई, नाक से य तथा आँख से भी पानी आ सकता है । चेहरे पर सूजन आ जाता है । मुँह म तथा िज हा पर सफे द फफोले दखाई पड़ सकते ह । शव पर ण च ह : मुँह, वचा पर पाये जाने वाले ल ण (Canker) वारा यह रोग पहचाना जा सकता है । ये ककर आसानी से छू टते ह तथा छू टने पर र त नकलता है । फे फड़ म क जे शन तथा एयर सैक (Air sac) म धुंधलापन पाया जाता है । 4.10.4 बचाव: प य म वै सीन 8 से 10 स ताह क उस पर लगक लेना चा हए । “ ीडर” मुग (चूजे ा त करने वाल / जनन यो य प ी) को साल म दो बार वै सीन लगाना चा हए । 4.11 ए वयन एनके फे लोमाइलाइ टस (Avian Encephalomylitis A.E.): इस रोग को ए पडे मक ेमर (Epidemic Tremor) भी कहते ह । यह बीमार वायरस (virus) वारा होती है तथा च कन एवं टक म एक से तीन स ताह क उ तक होती है और बड़ी मु गय म अ डा देने क अव ध म होती है । इस बीमार से बचाव न कया गया तो न के वल शैशव वरन ् अंडा उ पादन काल म अ डे क कमी के कारण आ थक हा न हो सकती है । 4.11.1 सारण: रोग सत ‘पेरे ट टॉक’ से अ ड के वारा यह रोग फै लता है। स पक तथा बीट वारा भी यह रोग फै लता है । 4.11.2 ल ण: आँख सुला तथा लडखडाती चाल पायी जाती है । य - य अ धक मांस पे शय पर रोग का भाव होता है, मुग टखन के बल बैठ रहती है । य द इ ह उठाया खोये तो लड़खड़ा कर चलगी तथा फर टखने के बल बैठ जायगी अथवा एक ओर गर जायगी । चूँ क ऐसी अव था म मुग आहार/पानी नह ं ा त कर पायेगी । अत:
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    55 मृ यु अवय भावी है । य द इन मु गय को हाथ म पकड़ा जाये तो हाथ म थरकन महसूस क जा सकती है । शव पर ण च ह: सामा य आँख से शव पर ा म कोई वशेष ल ण दखाई नह ं दगे । ेन टशू को लैब म सू म दशक य (Microscope) से देखने पर ह इसक पुि ट क जा सकती है । इस बीमार को इ ह ं कार के ल ण वाल अ य बीमा रय जैसे रानी खेत, वटा मन ई क कमी, राइबोफले वन क कमी, रकै टस तथा यूको सस से अलग समझा जाना चा हए । 4.11.3 बचाव एवं उपचार: वदेश म इस रोग से बचाव हेतु वै सीन बन चुके ह । ए.ई. वै सीन (Salsbury) का योग कया जाना चा हये । प य को 10 स ताह क उ पर या अ डा उ पादन से चार स ताह पूव वै सीन लगा दया जाये तो रोग क संभावना नह ं रहेगी । वै सीन पीने के पानी म दया जा सकता है । इसका कोई उपचार नह ं है तथा रोग क पुि ट होने पर सम त मु गय को बेचना ह लाभदायक होता है । 4.12 सारांश : कसी भी वषाणु सं मण क ती ता प ी के शर र म वेश कर इस बात पर नभर करती है क वषाणु क वि ट का मा यम या है तथा कतने मा ा (Quantam) म Virion (Functional Unit of Virus) प ी को सं मत कर रहे है, वषाणु क कृ त तथा उसक Virulence (बीमार पैदा करने क मता) रोग क ती ता को इं गत करती है । प ी क वयं क ई यु नट ( तरोधक मता) एवं प ीशाला म प ी घन व भी ती ता के मापद ड है । य द तरोधकता कम और प ी घन व अ धक है तो रोग क भयावहता बढ़ जाती है तथा मृ युदर भी अ धक होती है । वषाणुज नत रोग अ धकांशत: छू तदार सं ामक रोग है । जैसे ईकाई म व णत है, रानीखेत, ग बोरो पॉ स ऐसे रोग है, जो प य के रोग त होकर सीधे स पक म आते ह ती ग त से फै लते है, इस लए वषाणुज नत रोग क अव था म कड़े Biosecurity बंधन एवं एक कु कु टशाला से दूसरे कु कु टशाला म कु कु टपालक अथवा आग तुक (Visitors) का वेश पूणतया: ब द कर देना चा हए । साथ ह समय-समय पर एवं उपयु त आयु पर इन रोग का ट काकरण भी करा लेना चा हए । ट काकरण म बू टर खुराक अव य समय पर ह कर देनी चा हए । इकाई म व णत सभी सावधा नयाँ एवं बचाव के उपाय करने के उपरा त ह इन रोग से होने वाल आ थक हा न काफ हद तक रोक अथवा
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    57 इकाई : पय के परजीवी एवं फफूं द ज नत रोग: इकाई – 5 5.0 उ े य 5.1 तावना 5.2 आ त रक परजीवी सं मण (Endo-parasitic Infestation) 5.2.1 गोल कृ म सं मण (Round Worms) 5.2.2 फ ता कृ म सं मण (Tape Worms) 5.2.3 सीकल कृ म सं मण (Caecal Worms) 5.2.4 का सी डयो सस (Coccidiosis) 5.3 बा म परजीवी सं मण (Ecto-parasitic Infestation) 5.3.1 जूँ (Lice) 5.3.2 चीचडी (Ticks) 5.3.3 ब थयाँ (Mites) 5.4 फफूं द ज नत प ी रोग 5.4.1 ए परिजलो सस (Aspergillosis) 5.4.2 फे वस (Favus) 5.4.3 माइकोटोि सन (Mycotoxins) 5.5 सारांश 5.0 उ े य: अ धकांश परजीवी रोग कु कु टशालाओं म वातावरण संबंधी कारण , कु पोषण, अ व छता, प ीशाला म साम य से अ धक प ी घन व, प ीशाला के आसपास पानी का जमाव, गंदगी आ द अ य खराब हाइजीन का ह प रणाम होते है । परजीवी रोग का अ भ ाय ह दो के म य एक का असंतुलन है, िजसम परजीवी एवं परपोषी (host) एक दूसरे पर जीवन-यापन के लए नभर करते है । य द परजीवी अ धक तकारक होता है तो परपोषी का जीवन संकट म पड़ सकता है । भारतवष म जलवायु एवं भौगो लक वषमताऐं प रि थ तयाँ प य म परजीवी रोग के सार के अनुकू ल है, िजससे यह और भी आव यक हो जाता है क व भ न कारक का अ ययन कर इन परजीवी रोग के फै लाव को प ीशाला म पनपने से पूव ह न ट कर दया जावे । इसी कार प य के दाने म नमी से उ प न वशेष कार क कवक (फफूं द )
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    58 उ प नहोने एवं उनसे ा वत वष (Mycotoxins) के भाव तले व भ रोग उ प न हो सकते है तथा अ डा उ पादन पर वपर त भाव हो सकता है । गंभीर अव था म इन फफूं द ज नत रोग से प य म मृ युदर भी अ धक हो सकती है । इसी उ े य को यान म रखकर व भ परजीवी फफूं द ज नत रोग क इस ईकाई म व तृत चचा क गई है । 5.1 तावना : प य म य द बायो स यू रट मापद ड का समय रहते उपाय नह ं कये गये हो अथवा उनके अ दर पनपने वाले व भ न आ त रक एवं बा य परजी वय का शी नदान एवं उपचार नह ं कया जावे तो यह परजीवी प ीशाला म ना सफ उ पादन म गरावट के लए उ तरदायी होते ह, वरन ्अ धक मृ युदर का कारण भी होते है । व भ न कार के कृ मय , िजनम नमेटोड (Nematodes), Round worms, ससटोड (Costodes) लूक व स, मेटोड (Trematodes) फ ता कृ म या (Tape worms) मुख है । व भ रोग को ज म देते है । इन परजी वय क लाइफ साइ कल (Life Cycle) का कु छ भाग परपोषी के शर र के अ दर स प न होता है, िजनसे व भ न रोग क ल ण कट होते ह । परजीवी एवं फफूं द ज नत रोग से बचाव के लए व भ न क टनाशक औष धय का छड़काव नधा रत मा ा म औष ध का घोल बनाकर कया जाना उ चत रहता है । प ीशाला म एवं प य के शर र पर उपि थत व भ बा य परजीवी भी वा य पर गंभीर प रणाम उ प न करते है तथा कई अ य घातक सं ामक रोग का कारण भी बनते है । अत: आव यकता इनसे समय रहते शी नजात पाने क है । कई बार कु कु टशाला म यह परजीवी थाई प से भी कई मह न तक नवास कर अ य त आ थक हा न के कारण बनते है एवं आसानी से प ीशाला से बाहर नह ं जाते है । ईकाई म इन सभी बात का वशेष यान रखते हु ए इनका उ लेख पा यसाम ी म कया गया है । साथ ह नवीन Mycostatic औष धय का वणन भी कया गया है । 5.2 आ त रक परजीवी सं मण (Endoparasitic Infestation) आ त रक परजी वय के न न ल खत मु य वग है - (i) गोल कृ मयाँ (Round Worms): जैसा क नाम से प ट है, इनक आकृ त गोलबेलनाकार होती है । इनक ल बाई 5-12.5 से ट मीटर तथा मोटाई पेि सल के सुरमे के बराबर होती है । इनके अ डे कु कु ट के पेट म रहते ह तथा उनक व ठा (feces)के साथ बाहर आ जाते है । अ य प ी इन अ ड को खाने पर सं मत हो जाते ह । साधारणत: इनक तीन जा तयाँ होती है :- 1. बड़ी गोल कृ मयाँ (Large round worms) 2. छोट गोल कृ मयाँ (Small round worms) 3. सीकल गोल कृ मयाँ (Caecal round worms)
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    59 ये कृ मयाँआँत म चौड़ी कृ मय के नीचे क ओर पाई जाती है । कभी-कभी इनके अ धक सं या म एक त हो जाने के कारण आँत का नकास माग भी अव हो जाता है । ये परजीवी आँत क द वार से चपकते नह ं है । 5.2.1 गोल कृ म क ड़े (round Worms): 1. गेप व स (Syngamus Tracheae) - प य क वास न लका ( े कया) म पाया जाने वाला लाल रंग का कृ म मादा के साथ Y श ल से जुड़ा होता है । मादा कृ म े कया म अंडे देती है तथा खांसी के साथ ये अंडे मुँह म आते ह और फर प ी वारा नगलने पर पाचन सं थान म पहु ंच जाते ह और बीट के साथ बाहर नकलते ह । बाहर अनुकू ल वातावरण म 1 से 4 स ताह म अंडे प रप व होते ह, इन अंड या लावा के खाने से आंत म उ प न छोटे कृ म आती को भेद कर पहले फे फड़ म और वहाँ से वास न लय म पहु ंचते ह । यहाँ ये 7 से 10 दन म पूरे कृ म बन जाते ह । 1-3 माह क आयु वाले चूजे इस रोग से अ धक सत होते ह । कृ म वारा भेदने से वास ना लका म गाढ़ा य (Mucous) जमा हो जाता है और प ी को वास लेने म क ठनाई होती है । प ी छ ंकता व खांसता है तथा बैचनी से सर हलाता रहता है । शव पर ण पर कृ म वास न लका म देखे जा सकते ह । 2. बड़ी आंत के गोल कृ म (Ascaridia galli) : कृ म सत प य क बीट म कृ म के अंडे पाये जाते ह । ये अंडे कर ब 10 दन म रोग उ प न करने लायक हो जाते ह । प ी वारा खाये जाने पर कर ब 10 दन बाद अंड से लावा (Larva) नकल कर ये आँत के ऊपर भाग (Duodenum) क आ त रक सतह को भेदते ह और वहाँ कर ब 7 दन रह कर फर आँत के यूमन (Lumen) म आ जाते ह । कर ब 35 से 55 दन म आंत म ह ये लाव पूरे कृ म बन जाते है । ल ण : य द वटा मन ए और बी का पले स क कमी हो तो छोट आयु के प य को गोल क ड़े हा न करते ह । चूज म खून क कमी हो जाती है और वे कमजोर, सु त और कभी-कभी लंगड़े हो जाते ह । बीट म कभी-कभी खून दखाई देता है, बीट पतल हो जाती ह । य क प य का अंडा उ पादन कम हो जाता है । शव पर ण कर आंत म सूजन व कृ म पाये जाते ह । उपचार : पाइपरजीन क औष धयाँ 100-500 म. ा. के अनुपात से येक प ी को द। 5.2.2 फ ता कृ म (Type Worms): मु गय म सबसे हा नकारक टेप वम “डेवे नयाँ” है । ‘राले टना’ भी काफ हद तक नुकसान करते ह । छोटे चूजे, वशेषत: िजनका पालन अ छा नह ं हु आ हो, अ धक कृ म त होते है । इनम खून क कमी हो जाती है और धीरे-धीरे ये कमजोर होते जाते है ।
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    60 “डेवे नया” कृम आँत को भेदता है तथा आं शोध (Enteritis) क अव था पायी जाती है । प ी को पे चश और लंगड़ापन हो जाता है । अंड का उ पादन कम हो जाता है । रायलेट ना इकायन ो ीडा से आंत म नो यूल (Nodules) हो जाते है । उपचार : 10-15 ेन कमाला त प ी दया जा सकता है । कारबन ेटा लोराइड भी योग म लाते ह । कट हु ई सुपार व कमाला 1:10 ( ेन के अनुपात मे) दया जा सकता है । 5.2.3 सीकल कृ मयाँ (Caecal Worms): ये बड़ी आत के ऊपर भाग क कृ मयाँ है । इ ह “हैटरे कस गै लनी” (Heterakis Gallinae) कहते ह । यह सामा य गोल कृ मयाँ ह और बड़ी आँत अथवा सीकम के ऊपर भाग म पाई जाती ह । इनक ल बाई लगभग 1.25 से ट मीटर होती है । य य प ये कृ मयाँ हा नकर नह ं ह, पर तु काला सर (black head) नामक रोग के सार का मा यम है । अत: इनसे रोग के फै लने क संभावना बनी रहती है । 5.2.4 कॉ सो डयो सस (Coccidiosis): एक कोशी ोटोजोअन परजीवी समूह, िजसे क कॉ सीडीया कहते ह, के कारण रोग फै ल जाता है । रोग क इस अव था को कॉ सी डयो सस कहते है । इस रोग के कारण कु कु ट म भार हा न होती है । इससे चूज क ाणशि त कम हो जाती है तथा वकास दर म द हो जाती है । मु गयाँ देर से अ डा उ पादन ार भ करती है और कम सं या म अ डे देती ह । कभी-कभी प य क मृ यु भी हो जाती है । कॉ सी डयो सस रोग फै लाने वाले परजीवी अ य त सू म होते है । ये परजीवी एक को शका (Single Cell) वाले होते ह और पशु-प य के शर र म रहते ह । मु गय पर आ मण करने वाले इन परजी वय क आठ जा तयाँ ह । इनम से दो जा तय के परजी वय का कोप बहु त भयंकर होता है और इससे अनेक प ी मर जाते ह । इनम थम जा त“एमीर या टेनेला” (Eimeria Tenella) कहलाती है और इसके परजीवी, बड़ी आँत के थम भाग (सीका) को भा वत करते ह । इसके कारण सामा य रोग िजसे सीकल कॉ सी डयो सस (Caecal Coccidiosis) कहते ह, हो जाता है । यह रोग ाय: 3-16 स ताह के आयु वाले चूज म देखा गया है । परजीवी क दूसर जा त एमी रया माइट स (Eimeria Tenella) कहलाती है । यह परजीवी सामा यत: वय क मुगा-मुग क छोट आँत के आ त रक भाग पर आ मण करते ह । कु कु ट के चूज को दू षत घर, दालान , बाड़ व आँगन म रखने पर वे इस रोग के शकार हो जाते ह । इसके न न ल खत कारण ह । 1. चूज के शर र पर उ सिजत साम ी म कॉ सीडीया के यु मपुटक (Oocyst) होते है, िजनसे चूज को यह रोग हो जाता है । 2. बाड़ , आँगन इ या द थान पर पड़ी व टा तथा अ य उ सिजत साम ी से चूज म कॉ सी डया का आ मण हो जाता है ।
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    61 3. दशक ,सेवक , पशुओं तथा च ड़य वारा कॉ सी डया लाए जाकर चूज को सत कर लेते ह । कॉ सी डया का जीवन च (Life cycle of Coccidia): कॉ सी डया का जीवन च ज टल है । जब कोई चूजा सं ामक बीजाणुयु त यु मुपु टका (Oocyst) को खा लेता है तो इसम या त आठ जा तय के परजीवी चूज क आ त रक झ ल क कसी भी को शका म व ट कर जाते ह । इन सं ामक बीजाणुओं म येक क वृ 16 बार होती है और ये झ ल क को शका से बाहर आकर पुन: 16 को शकाओं को सं मत करता है । यह वृ लगातार होती रहती है । प रणाम व प नर तथा मादा परजीवी उ प न हो जाते ह । इनके पर पर संगम होने से यु मपु टकाय (ऊओ स ट) बनती ह और ये चूज क व ठा के साथ बाहर आ जाती ह । उन पु टकाओं पर ताप तथा अ य कसी कार क क ट एवं जीवाणु नाशक औष ध का भाव नह ं होता है । ये भू म तथा जनक घर मे कई वष तक जी वत रह सकते ह । तुर त उ प न हु ई यु मपु टका सं ामक नह ं होती है, पर तु नमी और ताप क समु चत प रि थ तयाँ ा त होने पर लगभग 21 घ ट क अव ध म इन पु टकाओं से बीजाणु बन जाते ह और सं मण ार भ कर देते है । (a) सीकल कॉ सी डयो सस (Caecal Coccidiosis): यह एक घातक रोग है, पर तु जो प ी इसके आ मण से बच जाते ह, शी ह व थ हो जाते ह । इसे एमी रया टेनेला (Eimeria tenella) जा त के परजीवी उ प न करते ह । रोग के ल ण (Symptoms of Disease): 1. कु कु ट के शर र म र त क कमी 2. चेहरे का पीला हो जाना । 3. लोइका गुहा से र त आना । 4. बड़ी आँत का ऊपर भाग बढ़ (Caecal enlargement) जाता है और उसम र त अथवा पीले भूरे रंग का पस (pus) भर जाता है । 5. प य क अक मात् मृ यु हो जाती है। 6. रोग के ती होने पर प ी मुरझा जाते ह और उनके दोन डैने नीचे लटक जाते ह । 7. पंख बखर जाते ह तथा शर र ढ ला और लटका दखाई देता है । (b) आँत क कॉ सी डयो सस (Intestinal Coccidiosis) : आँत क कॉ सी डयो सस परजी वय , क आठ परजी वय म, दूसर जा त क परजीवी “एमी रया माइ टस” के कोप के कारण होती है । रोग के ल ण (Sympotoms of Coccidiosis): 1. शर र पीला हो जाता है । 2. च च, पैर, पीले तथा सफे द हो जाते ह । शर र के अंग वशेष का भा वत होना तथा होने वाल हा नयाँ, कॉ सी डया क जा त पर नभर करती है ।
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    62 रोग का नदान(Diagnosis of Diseases): उपयु त दोन कार के रोग का सह नदान करने के लए उनके ल ण क भल भाँ त पर ा करनी चा हए । सू मदश क सहायता से प य क व ठा म यु मपु टकाओं (Oocyst) क उपि थ त के बारे म ात कर लेना चा हए I रोग क रोकथाम (Prevention of Diseases) इन दोन रोग क रोकथाम के लए न न ल खत उपाय करने चा हए :- व छता : कु कु ट गृह के फश तथा व भ न उपकरण क समय-समय पर सफाई करते रहना चा हए । उपकरण क सफाई के लए “लाई” के गम घोल का योग करना चा हए । य द चूज को तार क बनी जाल के फश से हटाकर कसी ऐसे थान पर पहु ँचा दया जाए, जहाँ पहले प ी न रखे गये हो अथवा उस थान पर प ी तो रखे गये ह , पर तु उस थान क खुदाई या जुताई कर द गई हो, तो रखे जाने वाले प य को सं मत होने का डर नह ं रहता है । रोग रोधी औष धय का योग : इन रोग क रोकथाम करने के लए कॉ सी डया रोधी (कॉ सी डयो टेट) स फ़ा औष धय को उनके आहार तथा पीने के पानी म मला कर देना चा हए । बछावन का बंध : बछावन के नम होने पर यु मपु टकाओं (Oocyst) क सं या ती ता से बढ़ती है, पर तु इसके वपर त इसके शु क रहने पर इनक सं या कम हो जाती है । बछावन को ढेर म एक त कर देती ह, इससे बछावन का ताप अ धक ऊँ चा 51.7o सै ट ेड हो जाता है और अमो नया गैस नकलने से बीजाणु न ट हो जाते ह । रोग का उपचार (Treatment of Diseases) : इन दोन रोग से भा वत कु कु ट का स फरयु त औष धय से उपचार करने से लाभ होता है । स फामैजाथीन, स फाकु नै सो लन इ या द औष धय को आहार अथवा पीने के पानी म 0.5 तशत क दर से 3-7 दन तक देने से सं मण क रोकथाम एवं उपचार कया जा सकता है । ये औष धयाँ अ य औष धय क अपे ा कम वषैल ह । अत: कु कु ट को खलाने के लए इनक सं तु त क जाती ह । औष धय का अ धक योग करना हा नकर है । अत: ऐसा नह ं करना चा हए । इसके अ त र त उपचार हेतु एम ोजोल, वाइ यूरान, का नाल आ द औष धयाँ भी पानी म अथवा फ ड म दये जाकर शी रोग पर नयं ण पाया जा सकता है । जा त आँत का भा वत भाग ल ण आईमी रया एस बुलाइना छोट आंत का ऊपर भाग सफे दपैच, आंत मोट E.E.A.) आई. टेनेला सीकम (Caeca) खून से भर सीका ‘सीकलवाल' E.tenella म हैमोरेज
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    63 आई. नके सबीच के आधार भाग से फू ल आते, सफे द ध बे, आँत म E.nicatrix पूर छोट आंते हैमोरेज आई. म सीमा छोट आत का बीच तथा सूजी हु ई आँत क सतह िजस E.maxima नीचे का भाग पर खून भी पाया जा सकता है । जा त आंत का भा वत भाग ल ण आई. मवाट E.mivati छोट आंत का ऊपर आधा भाग आंत क द वार पर गोलाकार सफे द ध बे आई. हैगानी E.higani छोट आत का ऊपर आधा भाग पनपाइ ट हैमोरेज, आंत म सूजन आई. ू ट E.brunetti छोट आत का नीचे का भाग र त र त रंिजत तरल पदाथ तथा गुदा वार, यो न वार रंिजत तरल पदाथ तथा गुदा वार, यो न वार सूजन आई. ीऐके स E.precax छोट आंत का ऊपर तहाई भाग कोई वशेष ल ण नह ं आई. माइ टस E.mitis छोट आंत का ऊपर भाग कोई वशेष ल ण नह ं 5.3 बा य परजीवी सं मण (Ecto-parasitic Infestation): मुग पालन म बा य परजी वय वारा अनेक संकटमय ि थ त पैदा हो जाती है । इस वषय क पूण जानकार , पेरेसाइट का जीवनच , नदान का ान आ द सफल कु कु ट पालन के लए आव यक है । बाजार म ाय: हर कार के ज तुओं को मारने हेतु औष ध उपल ध है तथा नमाता के नदश के अनुसार ह उनका योग कया जाना चा हये । कु कु ट माँस एवं अ ड क बढ़ती हु ई मांग (जो हमारे देश म अभी शहर तक ह सी मत है) के कारण मु गय को “सघन वातावरण” म पालना होता है । इस कारण बा य परजी वय क वृ क संभावना भी बहु त बढ़ जाती है । मु गय म मु यत: खून चूसने वाल के शार रक पीड़ा देती ह । वैसे म छर एवं खटमल भी काफ पीड़ा देते ह, पर तु अपने जीवन क सार अव ध पशुओं-प य के शर र म चपटे नह ं रहते । पर तु जुऐं मु गय के शर र पर ह अपना सारा जीवन यतीत करती ह । अत: येक कु कु ट पालक के लये यह जानकार आव यक है क कौन सा परजीवी (जीव ज तु) कब कस हालत म आ मण करता है एवं उसके नदान के या उपाय हो सकते ह? यह जानकार रखना भी अ य त आव यक है क कु कु टशाला के कौन-कौन से थान म इनक सं या अ धक पाई जाती है, कस कार व कन- कन दवाइय के योग से उ ह न ट कया जा सकता है । यह यान रखना भी ज र है क दवाईय के योग से मु गय को कसी कार क शार रक हा न नह ं पहु ंचे एवं न ह अ डे तथा मुग मांस खाने वाल को कोई हा न हो ।
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    64 परजी वय परदवाईय वारा नयं ण पाने के तर के असर बदलते रहते ह । D.D.T. तथा B.H.C. मु गय के शर र पर मलने क सफा रश क जा रह है, पर तु हाल के योग से पता चला है क डी.डी.ट . को मु गय के शर र पर मलता हा नकारक है, इसका असर उनके अ ड पर भी होता है तथा मलने से यह औष ध उनक चब म वेश कर इक ी हो जाती है । ऐसी हा नकारक दवाईय के लगाने से अ ड के योग करने वाल पर इसका असर न हो, इस लये आजकल यूवान, मले थयान रोट नोन इ या द के योग क सफा रश क जाती है । ये अ डे उ पादन तथा मुग मांस के खाने वाल पर बुरा असर नह ं डालती है तथा प य को भी कसी कार क हा न नह ं पहु ँचती है जहाँ तक मुग घर क सफाई अथवा हा नकारक जीवन ज तुओं को न ट करने क बात है, डी.डी.ट , बी.एच.सी., लंडेन लॉरडेन टॉकसाफे न इ या द का योग, कु छ आव यक सावधा नयाँ बरतने के साथ, हो सकता है । कु कु ट पर असर करने वा कु छ परजी वय का यहाँ वणन कया जा रहा है । 5.3.1 जूँ (Lice): जूँ कु कु ट के सामा य परजीवी क ट है । यह एक छोटा, पंख र हत, भूरे अथवा कु छ-कु छ पीले रंग का क ट होता है । इसके शर र क बनावट चपट और आगे तथा पीछे के भाग बेलनाकार होते ह । इसके 6 टाँगे होती ह । जूँ अपना जीवन च परपोषी के शर र पर ह पूरा करता है और इस अव ध म उनके शर र पर वत प से वचरण करता रहता है। इस जा त के क ट क जनन मता बहु त अ धक होती है । इनके अ डे मु गय के पर अथवा घोसल म चपके रहते ह और जूँ क एक जोड़ी कु छ ह माह म 1 लाख 20 हजार परजीवी उ प न कर सकती है । जूँ दो कार क होती है, एक शर र पर रहने वाल तथा, दूसर सर पर रहने वाल जूँ । शर र पर पायी जाने वाल जूँ अ धकतर पर, पंख और अवय क गुहा के चार ओर चपक रहती ह । सर पर रहने वाल जूँ सर तथा गदन के भाग पर रहती है । रोग के ल ण : जूँओं के कारण कु कु ट को बड़ी बैचेनी तथा क ट होता है । जूँओं के आ मण से प य क भूख कम हो जाती है और अ ड का उ पादन कम हो जाता है । जूँओं से सत प य को रखना समय एवं धन को न ट करना होता है । जूँओं क अ धकता से छोटे चूज क तो मृ यु ह हो जाती है । रोकथाम एवं उपचार : जूँओं को न ट करने के लए कई कार क क टनाशक औष धय का योग कया जाता है और जब तक परजीवी तथा उनके अ डे न ट न हो जाये, येक दस दन के प चात् उपचार दुहराते रहना चा हए । कु छ पर त दवाय यहाँ बतायी जा रह है। 1. नकोट न स फे ट (Nicotine Sulphate): इसका 40 तशत का वलयन, सं या के समय जब प ी दड़ब म जा रहे हो, तो उनके बैठने के थान पर छड़क देना चा हए । इस वलयन से नकलने वाला धुआँ जुऐं को मारने म भावकार स होता ह । ी म ऋतु म शीत ऋतु क अपे ा अ धक अ छे प रणाम ा त होते ह । 2. सो डयम लुओराइड का वलयन (Sodium Fluoride Solution):
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    65 लगभग 5 लटर गम पानी म 7.5-30 ाम सो डयम लुओराइड के तैयार कये हु ए वलयन म कु कु ट को नहलाया जाता है । इसके लए कु कु ट को पंख के वारा पकड़ लया जाता है और वलयन म डूबो दया जाता है । सोते समय यह यान रखना चा हए क प य का सर वलयन से ऊपर ह रहे । आधे से एक मनट तक डुबोना लाभ द होता है । बाद मे सर को भी एक ण के लए वलयन म डूबो दया जाता है । यह उपचार शु क मौसम के दन कया जाता है । 3. डे रस वलयन कु कु ट के जूँ को नयि त करने के लए न न ल खत क टनाशी औष धय का योग कया जाता है:- अ. 1% ल डेन का घोल अथवा 3% मला थयोन मुग शाला क सफाई हेतु । ब. लकड़ी क भ म तथा है सी लान अथवा गैम सीन 1000:1 के अनुपात म मलाकर छड़कना । स. लकड़ी क भ म, त बाकू का चूण तथा गंधक 10:11 के अनुपात म मला कर योग करना । द. लकड़ी क भ म एवं डी.डी.ट . 20:1 के अनुपात म मलाकर योग करना । य. लकड़ी क भ म तथा बी.एच.सी. का चूण व 1000:5 के अनुपात म मलाकर छड़कना । र. 1% मेला थयोन का घोल मुग घर क द वार या छत पर छड़काव । सत कु कु ट को पंख से पकड़कर उपयु त औष धय म से कसी एक क एक चुटक भरकर सर के पर पर छड़क देना चा हए । एक ओर चुटक औष ध लेकर ीवा पर छड़क देना चा हए । इसके प चात व , जांघ, अव करगुहा, पूँछ और पंख पर भी औष धयाँ छड़क कर हाथ से रगड़ देना चा हए । जुँओं से भा वत कु कु ट का नर ण करते रहना चा हए और पुन: उनके शर र पर जूँ दखाई द तो त 10 दन के प चात् इन औष धय का छड़काव करना चा हए । यह म उसी समय तक बनाया रखा जाए, जब तक क अ ड स हत सभी जूँ पूण प से न ट न हो जाय। इसके अ त र त, छड़काव कए जाने वाल औष धय को कसी छछले (Shallow) बतन म भरकर और कु कु ट-गृह म रखकर “धूल नान” (Dustbath) का ब ध कया जा सकता है । भ व य म जुँओं के आ मण को रोकने के लए प य को भल -भाँ त काश और संवातन वाले गृह म रखना चा हए। नए प य को उस समय तक कु कु ट समूह म नह ं मलना चा हए, जब तक क यह नि चत न कर लया जाए क इन प य क जुऐं न ट कर द गई ह । कु कु ट समूह म नर मुगा(Cocks) जुऐं फै ला देते ह । अत: जब तक चूजे उ प न न करना हो, मु गय के साथ इन नर को नह ं रखना चा हए । सर क जूँ होने से प य को क ट होता है, उ ह न ट करना कु छ क ठन भी है । इन जुँओं को न ट करने के लए 4 भाग बैसल न म एक भाग गंधक के फू ल मला कर भा वत अंग
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    66 पर यह मलहमलगानी चा हए । नहाने के लए लकड़ी के ब स म 4% मेला थयोन ड ट रखना चा हए । मु गयाँ वयं उसम जाकर पंज से कु रेद कर पाउडर मलायेगी और औषधी शर र पर लग जायेगी । 5.3.2 चीचडी (Ticks) : कु कु ट क चीचडी (एरगस पस कस) एक क टदायक परजीवी है । ये परजीवी द णी भारत के अ त र त देश के अ य थान म पाये जाते ह । चीचडी प रपोषी का र त चूस कर उनम र त क कमी उ प न कर देती ह और कु कु ट को वर हो जाता है I चीच ड़याँ रा के समय अ धक स य होती ह । वे कु कु ट के शर र से चपक रहती है और बना आहार कए भी 3 वष तक जी वत रह सकती ह । वष के बसंत तथा ी म ऋतु म वे अ धक स य होती ह । चीच ड़य का सार उसी समय अ धक होता है जब क उ ह पहले से उपि थत चीच ड़य वाले थान म रखा जाए अथवा समूह म कोई चीचडी यु त प ी आ जाए । रोक क रोकथाम (Prevention of Disease): िजन थान म चीच ड़य क सम या हो, वहाँ कु कु ट के लए चीचडी र हत कु कु ट-गृह (अ ड ) क यव था करनी चा हए । अ ड के येक आधार त भ पर धातु क या लय म पानी एवं म ी का तेल मलाकर रखना चा हए । प य के पास पहु ँचने के लए त भ पर चढ़ने वाल चीच ड़याँ इन यार म गर कर मर जाती ह । चीच ड़य के लावा पाये जाने वाले प य को 1000 भाग पानी अथवा म ी म 5 तशत यु त 1 भाग डी.डी.ट . का चूण अथवा गैमे सीन मलाकर उपचा रत करना चा हए । प रपोषी के भा वत अंग पर नीम अथवा सरस के तेल म म ी का तेल मलाकर अथवा मैथीले टड ि ट लगाने से लावा ऊपर आ जाते ह । इन छतराए हु ए लावा को कपड़े से रगड़ कर दूर कया जा सकता है। कु कु ट-गृह क दरार म चीच ड़याँ छपी रहती ह, इ ह न ट करना प के गृह म तो सुगम है, य क आग क मसाल जलाकर उसक लौ से न ट कया जा सकता है, पर तु जो गह लकड़ी आ द से बने हो, उ ह भल -भाँ त साफ करके न न ल खत वलयन छड़कना चा हए। साबुन 1 भाग म ी का तेल 3 भाग फनायल 3 भाग गम पानी 93 भाग ............... योग 100 भाग ............... इस वलयन को गम अव था म ह छड़कना चा हए । म ी तथा घासफू स से बने कु कु ट गृह क चीच ड़य को न ट करना और भी क ठन है । अत: इनम रहने वाले कु कु ट को अ य ले जाकर भा वत घर को जला कर न ट कर देना ह चीच ड़य से छु टकारा पाने का एक मा उपाय है ।
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    67 5.3.3 ब थी(Mites) : कु कु ट पर आ मण करने वाल ब थयाँ ाय: छोट होती है और इनके चार जोड़ी (आठ) टांगे होती ह । भारत म सामा यत: ब थय क तीन जा तयाँ पायी जाती है । 1. लाल ब थयाँ (Red Mites) : इन ब थय को कु कु ट के दड़बे क ब थी कहते ह । आचार यवहार म ये चीच ड़यो से मलती-जुलती है और अ धकांश समय दड़ब क दरार म छपी रहती है । ये अंधेरे म प य पर आ मण करती ह । इनक रोकथाम के उपाय चीच ड़य को न ट करने के उपाय जैसे है । 2. काल टाँग वाल ब थयाँ (Mites with scaly legs) : ये ब थयाँ बहु त सू म परजीवी क ट है । इ ह सू मदश के बना देखना संभव नह ं है । ये ब थयाँ प य क टांग पर चढ़ परत अथवा भूसी के नीचे छपी रहती ह और वहाँ पर सूजन तथा जलन उ प न करती ह । इस अव था को टांग क परत अथवा भूसी क चीचड़ी कहते ह । सामा यत: अ धक आयु वाल मु गयाँ इनसे पी ड़त होती ह । रोकथाम (Prevention) : कु कु ट क टांग को क चे पे ोल अथवा बराबर भाग म मलाये गये म ी के तेल व इंजन म जले तेल (Crank case oil) म ण म डुबाया जाता है । आव यकता पड़ने पर एक माह के प चात इस उपचार को दुबारा दोहराया जा सकता है । कु कु ट क टांग को तेल अथवा म ण म डुबोते समय इस बात का यान रखना चा हए क उनके पंख पर तेल न पड़े, य क इससे प य के शर र पर छाले (फफोले) पड़ जाते ह । यह उपचार ात: काल कया जाता है िजससे क सं या क घोसल म वेश करने के पूव प य क टांगे शु क हो जाय । 3. पर न चने वाल ब थयाँ (Depluming Mites) : ये ब थयाँ बहु त सू महोती ह और सू मदश य के बना नह ं देखी जा सकती ह । ब थयाँ पंख क जड़ के पास वचा म छपी रहती ह । उनके कारण कु कु ट को बहु त बैचेनी तथा खुजल होती है । पी ड़त कु कु ट बार-बार अपने पंख को च च से नोचती रहती ह । रोकथाम तथा उपचार (Prevention and Treatment) : उपचार के लए बैसल न के 4 भाग म 1 भाग गंधक मलाकर मरहम तैयार करके भा वत अंग पर मलना चा हए। ब थय का उपचार करने के लए गम मौसम म कु कु ट को 5 लटर पानी म 28 म लल टर साबुन तथा 150 ाम गंधक को मलाकर वलयन तैयार कर उसम प य को डुबो कर करना चा हए । 5.4 फफूं द ज नत रोग: 5.4.1 एसपरिजलो सस ( ूडर यूमो नया): यह कम उ के चूज म होने वाला एक मह वपूण फफूं द ज नत रोग है, जो क चकन एवं टक दोन ह जा तय म पैदा होते है अथवा हे चंग के समय हो जाता है । यह रोग चूजा
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    68 वशेष का रोगहै तथा ऐ पर लजस यूमीगेटस नामक फं गस से होता है । पूरे लॉक म भी यह रोग हो सकता है । गरम एवम ् नमी वाले मौसम म यह रोग अ धक होता है। यह रोग एै यूट एवम ् ौ नक दोन तरह का हो सकता है । ऐ यूट रोग म वास लेने म क ठनाई होती है तथा फं गस क टॉि सन के मि त क पर भाव डालने के कारण चूज म कं पकं पी होती है । रोग के ो नक हो जाने क अव था म (जब रोग कई दन चले) चूजे कमजोर हो जाते ह, उ ह वास लेने म क ठनाई होती है तथा शर र के र त म ऑ सीजन क कमी हो जाती है । अ त म चूजे नीले पड़ने लगते ह । इस रोग का फं गस डैजट कू लर क घास म हो सकता है । (ग मय म अ डे ठ डे रखने के लए डैजट कू लर का योग कया जाता है), िजससे को ड म म रखे अ ड के भीतर ये फं गस घुस सकता है । ऐसे अ डे हैचर म फट सकते ह, िजससे और अ धक अ डे एवम ् चूजे भा वत होते ह । यह चूजे फं गस लेकर जब ूडर हाउस म पहु ंचते ह तो वहाँ के वातावरण को भा वत करते ह और ूडर हाउस म फं गस का इ फै शन हो जाता है । इसके अलावा बुरादे के अ दर मलने वाल लकड़ी क छाल म यह फं गस रहता है । कभी-कभी फ ड म भी यह फं गस हो सकता है । (फे फड़े म फं गस के दाने) अनुभव यह कहता है क यह रोग बुरादे से होता है, ाय: उस बुरादे से िजसम नमी और लकड़ी क छाल अ धक हो । िजन फाम पर पहले 2 स ताह क ू डंग म बुरादे के थान पर चावल क भूसी या बालू योग क जाती है । अत: जहाँ तक संभव हो, पहले 2 स ताह क ू डंग म लकड़ी के बुरादे का योग नह ं करना चा हए, पर तु वशेष प रि थ तय म य द बुरादे का योग करना ह पड़े तो 1000 वग फ ट ए रया म योग कए गए बुरादे म 2 कलो के यर-ट , 5 कलो चूने क सफे द तथा 1 कलो बार क पसा नीला थोथा अ छ तरह मला देना चा हए । (चूजे के पेट म फं गस दाने)
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    69 इस रोग मपहले 2 स ताह म 15 से 70 तशत तक मृ यु हो सकती है । जो चूजे बच जाते ह, उनम बाद म जाकर पेट म पानी भरने लगता है, िजससे ऐसाई टस के कारण उनक मृ यु होती है । पो ट माटम म चूजे के फे फड , एयर सैक, मि त क तथा पेट म खस के दान के आकार के या आल पन के हैड क श ल के पीले-हरे दाने बनते ह िज ह लेक कहते ह । यह दाने वास लेने म क ठनाई करते ह तथा दम घुटने के कारण चूज क मृ यु होती है । इस रोग का कोई उपचार नह ं है । अत: बचाव म ह लाभ है । कारण :  ए परिजलस यूमीगेटस नामक फं गस के वारा फे फड़ म सं मण होता है ।  मौसम म एकाएक आयी नमी एवं बरसात के समय यह सं मण अ धक होता ल ण :  छोटे चूज म फै लने वाला यह एक वशेष रोग है िजससे प ी म यूमो नया के ल ण द शत होते है ।  वास म तकल फ तथा एक वशेष कार क व न, शर र के भार म कमी, अ धक यास लगना एवं बुखार जैसे ल ण कट होते ह ।  रोक क ए यूट अव था फं गस वारा उ प न टॉि सस के मि त क पर कु भाव डालने से होती है िजससे प ी का अ या धक काँपते हु ए तीत होता है ।  रोग क ो नक अव था म वसन म तकल फ, साथ ह ऑ सीजन क कमी आना व चूजे नीले पड़ना जैसे ल ण देखे जा सकते है । 5.4.2 फे वस (Favus) :  फे वस नामक रोग जो क ाइकोफाइटोन मॅग ननी नामक फफूं द से होता है-  का ब तथा चेहरे के अ य भाग पर इसका भाव देखा जा सकता है िजससे इन भाग पर सफे द रंग के च ह ( पॉट) पाये जाते ह । बाद म यह पॉट कठोर व ट हो जाते ह । 5.4.3 माइकोटॉि सको सस (Mycotoxicosis) : कई कार के 'मो ड मुग शर र म टॉि सन (toxin) पैदा करते ह, िजस कारण नुकसान हो सकता है । इन मो ड म ए ल ने रया (Alternaria), पैनीसी लयम (Penicillium), एसपरिजलस (Aspergillus), मु य ह । खराब अनाज (Grain) के खाने से इस कार के टॉि सन (Toxin) पैदा हो सकते ह । पानी के समीप फै ला हु आ दाना खाने से भी 'मो ड पैदा हो जाता है तथा उसे खाने पर टॉि सन के असर से रोग हो जाता है । 4 से 8 स ताह क उस के प ी अ धक रोग सत होते ह । वे सु त हो जाते है तथा उ ह द त लग जाते ह । कभी-कभी यह रोग ऐसी अव था पैदा कर देते ह, िजसम माँस पे शय म हैमरेज (Haemorrhage) पाया जाता है जो े ट (Breast), पैर तथा आँत म अ धक दखाई देता है । इस रोग म र त पतला तथा पीलेपन का हो जाता है । ह डयाँ भी अ दर पील हो जाती है ।
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    70 बचाव : फामपर अ छ यव था होनी चा हए । आहार का चयन उपरो त त य को यान म रखते हु ए कया जाना चा हये । फफूं दनाशक औष ध से समय-समय पर छड़काव कया जाना चा हये । लटर क यव था ठ क होनी चा हए । 0.5% नीले थोथे के घोर से सम त फाम को धोय । इन रोग का कोई उपचार नह ं है । माइकोटोि सस पेड़ के वतीय मेटाबोलाइट होते ह । यह खा य पदाथ को न न कारक के रहते अ धक सं मत करने म स म होते है । न न कारक माइकोटोि सन के ती उ पादन को भी बढ़ावा देते है । 1. सूखा, 2. ठंडक ( ो ट), 3. तेज तापमान 4. ती नमी 5. म ी का कार 6. देर से गुड़ाई 7. अ यवि थत भंडारण माइकोटोि सन के भाव को नि य करने के लए न न पोषण व धयाँ अपनाई जानी चा हए । 1. ू ड ोट न (Crude Protein) क मा ा बढ़ाई जानी चा हए । 2. भोजन म वसा (Lipids) क अ धक मा ा वशेषकर लनो ल नक ऐ सड, खा य म Aflaxoins से होने वाल चूज क मृ युदर म कमी लाता है । 3. वटा मन स ल मट के प म दया जाना चा हए । 4. ए ट ऑ सीडे ट (Antioxidants) वशेषकर BHT एवं BHA, अ लाटॉि सन के वपर त भाव को कम करने म सहायक रहते है । 5. कु कु ट दाना, पेलेट के प म िजसम ोपायो नक ऐ सड क मा ा हो, फफूं द से उ प न जहर के भाव को कम करता है तथा एक मो ड इन ह वटर (Mould Inhibitors) के प म स य रहता है । 5.5 सारांश: परजी वय का ह का सं मण (Mild) अ धक त नह ं करता है, क तु सं मण क ती ता प ी के वा य पर वपर त भाव छोड़ती है, इस तरह प य म परजीवी रोग के कारण होने वाल आ थक हा न कसी भी सफलता को पो इ ड क वफलता म बदलने म स म है । प ी रोग काि स डयो सस लटर म नमी के कारण मुखता से होता है, जब क अ धकांश फफूं द ज नत रोग म उनके भाव से उ प न Mycotoxins वशेष हा नकारक भाव डालते है एवं मृ युदर भी अ धक होती है । मुग के दाने से फफूं द या माइकोटाि सन को दूर करना आसान नह ं है । ले कन ए ट माइकोटोि सऐ ट का दाने म मलाये जाने से
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    72 इकाई - ोटोजोआज नत बीमा रयाँ इकाई -6 6.0 उ े य 6.1 तावना 6.2 ह टोमो नऐ सस (Histomoniasis) 6.2.1 कारण 6.2.2 ल ण 6.2.3 इलाज 6.2.4 बचाव एवं रोकथाम 6.3 टो सो लाजमो सस (Toxoplasmosis) 6.3.1 कारण 6.3.2 सारण 6.3.3 ल ण 6.3.4 नदान 6.3.5 इलाज 6.4 ए वयन मले रया (Avian Malaria) 6.4.1 कारण 6.4.2 सारण 6.4.3 ल ण 6.5 ए वयन पायरो लाजमो सस (Avian Piroplasmosis) 6.5.1 कारण 6.5.2 ल ण 6.6 पाइरोक टो सस- टक फ वर (Spirochaetosis Tick Fever): 6.7 सारांश 6.0 उ े य : प य के सभी सं ामक रोग म ोटोजोआ ज नत रोग व श ट थान रखते ह । जीवाणु ज नत / फफूँ द ज नत प ी रोग से इनका भेद करना आसान नह ं है । अनुमानत: एक सौ से अ धक ोटोजोआ जा तय वारा व भ न कु कु ट रोग उ प न होते है, िजनसे ती आ थक त एवं उ पादन म गरावट देखी जा सकती है । ोटोजोआ ज नत प ी रोग के वषय म
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    73 अ धक जानकारइसके भावी नय ण एवं अ य प य म इसके सारण को रोकने के उ े य से इकाई म आव यक त य का समावेश कया गया है । 6.1 तावना: य य प ोटोजोआ को एक को शक य ज तु के प म प रभा षत कया गया है, ले कन ोटोजोआ का व श ट अंगीय संरचना (मेटाजोआ), परपोषी हो ट (Host) म जीवन च स पादन इसे अ य जीवाणु एवं अ य फफुँ द से पृथक करती है । जीवाणु एवं फफुँ द म एक कठोर पर मएबल को शका भि त पायी जाती है, जब क ोटोजोआ म अपे ाकृ त अ धक लचील पेल कल अथवा ला मा मे ेन पायी जाती है । इस लए ोटोजोआ ज नत रोग का नय ण एवं रोकथाम अ धक भावी ढंग से कया जाना चा हए । इस ेणी के प य के लए अ य त घातक रोग को सी डयो सस, ह टोमो नऐ सस, टो सो ला मो सस, ए वयन मले रया आते है, जो क प य क सभी जा तय चकन, डक, गज, टक को भा वत करते ह । इसी कार से र त परजीवी सं मण जैसे क ए वयन पायरो लाजमो सस, ेपेनोसोमो सस, आ द प य के लए अ य त घातक एवं मृ युपरक होते ह इन रोग से समय रहते बचाव एवं अ य इ से ट वे टस (Insect vectors) वारा इनके सारण क रोकथाम के लए समु चत ब धन आव यक है । साथ ह नय मत कु कु ट शाला पर ण, ल ण क पहचान एवं योगशाला म बीट क जाँच, खून क जाँच अव य करायी जानी चा हए । जाँच के आधार पर बीट म को सी डयो सस के लए आइ म रया ऊ स ट का पाया जाना व र त पर ण म र त परजी वय क पहचान (पाइरो ला मो सस, ेपेनोसोमो सस आ द) कर शी रोग का पता लगाया जा सकता है । ोटोजोअन प ी रोग क पहचान कर इनके भावी नय ण के उपाय समय रहते कए जा सके , साथ ह अ य सं ामक प ी रोग से इ ह वभे दत कया जा सके , इसी त य को यान म रखते हुए इकाई म इन रोग क व तृत ववेचना क गई है । 6.2 ह टोमो नऐ सस (Histomoniasis): इस रोग को लेक हेड डिजज के नाम से भी जाना जाता है । यह रोग मु यत: टक / चकन तथा अ य प य म ल वर तथा सकम को भा वत करता है । सव थम इस रोग के वषय म वै ा नक Rice (1982) एवं Cush man (1894) ने बताया । बाद म इ ह ने इस रोग को ोटोजोअन रोग क सं ा द । टक के प चात इस रोग का सारण चक स म पाया गया । 6.2.1 कारण: Histomonas.meleagridis नाम ोटोजोआ यह दो प म पाया जाता है: - (1) Tissue From, (2) LUMEN from यह एक कार का सकुलर / ओबल 8-14N यार डाइ मटर, आकार वह न तथा यू ल यस स हत ोटोजोआ है, िजसम से ऊँ गल के समान आकृ तयाँ नकल रहती है । इस ोटोजोआ को ह टोमोनाड (Histomonads) कहते है । यूमन फॉम म यह परजीवी लेिजला के मा यम से लवर के अ दर व ट हो जाता है तथा लवर को त पहु ँचाता है ।
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    74 6.2.2 ल ण:इ यूवेशन पी रयड 4-5 दवस, प ी लड़खड़ाकर चलता है । दाना ठ क से नह ं खाता है । सीकम म तथा बीट म ह टोमोनाड देखे जा सकते ह । सीकम क झ ल लाल और मोट हो जाती है । सकम सूज जाता है तथा उसम यूकस भर जाता है । पँख लटक जाते ह तथा आँखे ब द हो जाती है । बीट थोड़ी पतल तथा उसम स फर क गंध आती है । प ी अपने सर को पंख के बीच ले जाकर झुका देता है । बाद म प ी का ल वर भा वत होता है । ल वर का आकार बढ़ जाता है । टक म इसका आकार 10-15 तशत तक बढ़ सकता है । ल वर के ऊपर भूरे सफे द या म कलर के रंग के समान ल जन पाये जाते ह । 10- 12 दन के प चात प ी क मृ यु हो सकती है । 6.2.3 इलाज : योगशाला म सीकम से य लेकर मेयर बनाया जाता है तथा इस य म ह टोमोनाड देखे जा सकते ह । ल वर से इ ेशन मेयर बनाकर बबल (Bubble) के समान ह टोमोनास यू ल यस स हत देखे जा सकते है । इस रोग का नदान नाइ ो यूरोन तथा यूराजोल डोन औष धय वारा कया जा सकता है । ल वर को मजबूत करने के लए ल वर ए स े ट दया जाना चा हए । 6.2.4 बचाव एवं रोकथाम - (1) मुग शाला के आसपास साफ-सफाई तथा हाइिजन का यान रखा जावे । (2) आस-पास के े से क ट के नाश के लए क ट नाशक औष ध का योग कया जाये । वशेषकर ह टेरेक स कृ मनाशक औष धयाँ द जाये, जैसे फ नोथाईिजन मैबे डाजोल आ द। 6.3 टो सो लाजमो सस (Toxoplasmosis): यह रोग तनधार (Mammals) एवं प ी दोन का ह रोग है जो क ोटोजोआ Toxoplasma.gondii के वारा होता है । यह रोग मनु य , पशुओं एवं प य को समान प से भा वत करता है । इस रोग के मुख ल ण लगातार कमजोर होना, कलंगी का पीला पड़ा तथा सकु ड़ जाना एवं अंधापन होना है । 6.3.1 कारण Toxoplasma.gondii ोफोजोइड अपे ाकृ त कम गोल, एक सरे पर, दूसरे पर अ धक, यू ल यस उपि थत, आकृ त 4-7 माइ ोन ले थ (Length) तथा 2-4 माइ ोन चौड़ा कोन क आकृ त का होता है । 6.3.2 सारण:- इस रोग का सारण सं मत भोजन एवं पानी वारा, जब क पशुओं एवं मनु य म आनुवां शक के कारण हो सकता है । सं मत प ी अथवा पशु का माँस सं मण के सारण म सहायक होते है । चीचड़ , जुओं, म छर , मि खय के खून
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    75 चूसने के कारणयह परजीवी इनके र त म मल जाता है तथा कसी व य प ी अथवा पशु को काटने पर उसम सं मण फै ल जाता है । 6.3.3 ल ण: लगातार कमजोर आना, भूख नह ं लगना, कलंगी सूख जाना तथा पील पड़ना, द त लगना व प य म अ धापन । शव पर ण करने पर ल वर और पल न पर ने ोट क फोकाई दय पर गांठे तथा पीलापन देखा जा सकता है । 6.3.4 नदान: 1. ए नमल (Animal) इनोकु लेशन टे ट; 2. र त पर ण करने पर 3. भा वत अंग के इ ेशन मेयर को िज मा ेन से सू मदश य म ऑयल इमरसन आ जे ट व का योग कर टॉ सो ला मा देखे जा सकते है । 6.3.5 इलाज: इलाज के लए स फोनेमाइड, औष ध का योग कर जैसे क स फाडाईिजन, स फामैथाजीन, स फा मराजीन आ द इसके साथ-साथ डेरा ीम अथवा ओ र ीम औष धयाँ भी योग म लाई जा सकती है । 6.4 ए वयन मले रया (Avian Malaria): प य म ाकृ तक प से मले रया सव थम 1962 म युनाइटेड टे स (U.S) के वसको सन (Wisconsin) ांत म मले रया परजीवी ला मो डयम (Plasmodium) सं मण के प म देखा गया था । इस सं मण से कई प ी समूह भा वत पाये गये तथा उनम मृ यु भी रकाड क गई । अनुमानत: 30 से अ धक ला मो डयम क जा तय वारा यह सं मण होना व णत कया गया है । फर भी अ धकांश परजीवी अपे ाकृ त कम हो ट पे स फक (Host Specific) पाये गये । कु छ जंगल जा त के प य के साथ-साथ यह सं मण टक , एवं कबूतर म भी पाया गया है । 6.4.1 कारण: Plasmodium.gallinaceum Plasmodium.guxtanucleare Plasmodium.relictum Plasmodium.circumflexum Plasmodium.lophurae ला मो डयम परजीवी, ह मो ो टयस के समान ह घातक भाव छोड़ता है । अ तर के वल मा जीवनच के दौरान ला मो डयम अपनी साइजा ट टेज (Asexual - Schizonts) वा हत र त क लाल धर को शकाओं म पूण करता है, जब क ह मो ो टयस एवं यूकोसाइटोजोअन म यह या आ त रक अंग ल वर, पल न, फे फड़ अथवा वृ क म पूण होती है ।
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    76 6.4.2 रोग कासारण:- अ य मले रया रोग क भाँ त ह प य म मले रया का सारण म छर के काटने से ह होता है । तनधार ा णय म यह एना फल ज नामक म छर के काटने से होता है, क तु प य म यह युले स तथा ऐडीज जा त के म छर वारा सा रत होता है । सव थम परजीवी को लाल धर क णकाओं म टेन वारा रंिजत करने के उपरा त सगनेट रंग अव था (Signet Ring Stage) म देखा जा सकता है । Fig. 6.4: Various stages of Plasmodium.gallinaceum 6.4.3 ल ण :- प य म वशेषकर जंगल फाउल म ती सं मण क अव था म कु छ समय बीमार रहने के उपरा त मृ यु हो जाती है । वह ं कु छ प य म लकवा हो जाता है । यह ए युट अव था म युवा प ी तथा Chronic अव था म य क प ी को सं मत करता है । सं मत प ी के आँख के पास सूजन पाई जाती है । शव पर ण म सव यूटे नयस वचा म हेमोरेज पाया जाता है । त ल (Spleen) का आकार बढ़ जाता है, ल वर पर भी सूजन क अव था पाई जाती है । जी वत प ी म र त प का पर ण म ला मो डयम क व भ न अव थाऐं देखी जा सकती है। 6.5 एवीयन पायरो लाजमो सस (Avian Piroplasmosis): इस रोग को अ य कई नाम वारा भी जाना जाता है, जैसे टक फ वर आ द । क तु एवीयन पाइरो लाजमो सस के अ तगत व भ न ोटोजोअन जा तय वारा अलग-अलग रोग एवं उनके ल ण उ प न हो सकते है । मूलत: यह रोग एजेप सनेला .पुलोरम (Aegyptianella.pullorum) ोटोजोआ वारा होता है तथा डक एवं गीज म म म पाया गया तथा 1957 म इसे एक भारतीय कौआ के दय के र त म देखा गया । अ य पाईरोक ट के समान ह इस रोग के ल ण तपा दत होते है । 6.5.1 कारण:- Aegyptianella.pullorum - एक छोट ओवल, गोल अथवा पाइर फाम आकार का र त परजीवी लाल धर को शकाओं म पाया जाता है । यह चकन, डक,
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    77 गीज, टक कोसमान प से सं मत करने म स म है । इस परजीवी ाटोजोआ का सारण एक टक (चीचडी) अरगस . परसीकस के वारा होता है । 6.5.2 ल ण:- यह सं मण ए युट, सब ए युट एवं ा नक सभी प म हो सकता है । इसम प य के पंख गंदे होना, भूख नह ं लगना, तेज जर होना, चलने- फरने म असमथता, जोड़ म ती सूजन क अव था, अथवा लकवा होना, शव पर ण म एनी मया (Anaemia) पाया जाना, त ल , ल वर, वृ क म सूजन व आकार म बढ़ जाना, ह मोरेज पाया जाना जैसे ल ण दखलाई देते है । इस रोग के सभी प म प य म र त क कमी या एनी मया अव य ह पाया जाता है । पाइरोक टो सस- टक फ वर (Spirochaetosis Tick Fever): यह ती इ फे शीयस रोग है, िजसम शर र का तापमान बढ़ जाता है । चाल म प रवतन तथा लकवा हो जाता है । यह “अरगस परसीकस'' (Argus. persicus) नामक टक वारा होता है । “बोर लया ए सर ना” (Borrelia.anserina) एक पाइरोक ट है जो टक वारा फै लता है । रोग अंडे वारा भी हो सकता है । म छर, म खी तथा अ य क ड़े इस रोग के सारण म सहायक होते है । इ फे टेड टक लगभग 3 वष तक इ फे ि टव रह सकती है, य द उसे उ चत तापमान (95 o F) मलता रहे । (i) ल ण: - रोग का “इ यूबेशन पी रयड (Incubation Period) 5-9 दन होता है तथा रोग क अव ध 5 दन होती है । ा नक फाम म रोग 21 दन तक रहता है । आर भ म शर र का तापमान बढ़ जाता है, जो 110 o F तक हो सकता है, पैर एवं पंजे पर सूजन आ जाती है । को ब पीला पड़ जाता है, मुग सुला हो जाती है और हरे द त हो जाते है । बाद म एनी मया हो जाता है तथा मृ यु से पूव मुग को लकवा भी हो जाता है । मृ यु से पूव शर र का तापमान सामा य से कम हो जाता है । (ii) बचाव:- फाम पर टक नह ं होने द । इस रोग से बचाव हेतु वै सीन भी उपल ध ह । (iii) उपचार :- मु गय को पैनी सल न के इ जे शन लगाय । फाम से टक समा त करने हेतु समय-समय पर “ े” कर । आहार-पानी म भी ए ट बायो टक योग म लाय। का सी डयो सस (Coccidiosis) : रोग का वणन अ त: परजीवी सं मण के साथ कया गया है । 6.6 पेनोसोमो सस (Trypanosomosis): अ य तनधार ा णय के समान ह प य म र त परजीवी पेनोसोमा ाकृ तक प से चकन, कबूतर, जंगल प ी एवं गनी फाउल को सं मत कर सकता है । ऐसा माना जाता है क प य म र त परजीवी का सारण भी म छर वारा ह होता है । सं मत प ी के शार रक भार म लगातार गरावट देखी जा सकती है । ती वर, आँख म सूजन के साथ चाल म लड़खड़ाहट के साथ लकवा जैसे ल ण दखलाई दे सकते है । यह रोग न न जा तय के कारण हो सकता है ।
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    78 1- Trypanosoma.avium 2- Trypanosoma.gallinarum 3-Trypanosoma.hannai पेनोसोमो सस रोग का पर ण सं मत प ी क मे र जा (Bone Marrow) जांच वारा कया जा सकता है । र त प का को टेन कर सू मदश यं वारा यह देखे जा सकते ह। Fig 6.6: Trypanosoma Hannai 6.7 सारांश: ईकाई म व णत र त परजीवी सं मण वारा व भ न रोग अव थाओं का व तृत वणन कया गया है । प य म पाये जाने वाले अ धकांश सं ामक रोग म से ोटोजोआ ज नत रोग अ य त घातक स हु ए है । इसका कारण एक तो इसक ल ण के आधार पर पहचान करना क ठन है, दूसरा इनका नदान योगशाला जाँच वारा ह संभव है । र त पर ण एवं Bone Marrow जाँच वारा ह ारं भक अव था म इन रोग का पता चल सकता है अ यथा ा नक अव था म यह कु कु ट फाम को काफ आ थक हा न पहु ँचाते है । फर अ धकांश रोग का सारण Mechanical Vectors वारा होता है, तो नदान एवं रोग ईलाज के साथ-साथ म खी / म छर का नयं ण कया जाना अ तआव यक है, ता क रोग का सारण अ य व थ प य म रोका जा सके । इनसे एकमा बचाव, अ छा बायो स यू रट ब धन, साफ-सफाई
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    80 इकाई - इमिजगकु कु ट रोग इकाई - 7 7.1 तावना 7.2 ग बोरो रोग 7.3 ल ची रोग 7.4 सालमोनेलो सस रोग 7.5 मेरे स रोग 7.6 ए परिजलो सस 7.7 पाईरोक टो सस 7.8 टुबरकु लो सस 7.9 ए वयन इ फु लूए जा रोग (बड लू) 7.10 सारांश 7.11 नावल 7.12 स दभ पु तक 7.0 उ े य: आया तत उ च गुणव ता के जम ला म के कु कु ट उ योग म योग म लये जाने के कारण कु कु ट पालन आ थक प से सु ढ़ यापार बनता जा रहा है । अ छा वा य ब धन बीमा रय का ान भी कु कु ट पालन को आ थक सु ढ़ता दान करता है । वतमान प रपे म कु छ उभरते हु ए कु कु ट रोग(Emerging Disease) कु कु ट रखरखाव म खा मयाँ अथवा ब धन ु टय क वजह से लगातार ना सफ कु कु ट उ पादन को भा वत कर रहे ह, अ पतु कु कु ट मृ यु दर को भी बढ़ावा दे रहे है । इसी कार से अगर इमिजग कु कु ट रोग क या या क जाए तो यह वह रोग है, जो च लत रोग म सामा य बदलाव अथवा बाहर से आया तत कु कु ट के साथ देश म वेश कर जाते है । अत: यह वह रोग भी है, जो पूव म च लत है, क तु अपनी ती ता एवं अ धक भावशीलता के कारण अपनी ओर यान आक षत कर रहे है । अत: यह आव यक हो जाता है क वतमान म हम इन रोग क यापक समी ा कर सक ता क बचाव एवं रोकथाम के उपाय भावी प से स पा दत कये जा सके । 7.1 तावना: ऐसा ाय: देखा गया है क M.D., I.B., R.D, माइको ला मो सस एवं कॉ सी डयो सस ऐसे रोग है, जो लगातार वै ा नक का यान अपनी ओर आक षत करते रहे ह । अत: यह आव यक हो जाता है क इन रोग वशेष पर अ धक यान दया जावे एवं िजतनी भी आव यक जानका रयाँ है, वह जुटा ल जावे एवं त य के आधार पर इनका व तृत ए प ड मयोलॉिजकल
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    81 सव कया जासके । साथ ह सव के आधार पर पूव म ह बचाव एवं रोकथाम के समु चत उपाय कर लये जाऐ । अ धकांश रोग सम याओं के वषय म वै ा नक तौर पर यह त य सा बत हो चुका है क व भ न सं ामक रोग म, िजसम MD, LL, को लबे सलोसीस RD, आ द सि म लत है, तरोधक मता ती ता से घटती है तथा अ डा उ पादन भी घट जाता है । वशेष कार क एना लसीस करके यह देखा गया है क उ नत पशुपालन तकनीक एवं सभी आव यक सु वधाओं के बावजूद मुग पालन म वभ न रोग संबंधी सम याओं का आना लगा रहता है, िजसके कई कारण हो सकते है । (i) रानीखेत रोग का ट काकरण कये हु ए लोक म बार-बार वापस आना, िजसका एक कारण हो सकता है क रानीखेत वाइरस के कसी प रव तत ेन यूटे ट (Strains Mutanat) वारा पुन: प य को सं मत करना भी एक संभावना हो सकती है । (ii) इसी तरह वसन तं से संबं धत रोग मेरे स का वाइरस भी वशेष प रि थ तय म सं मत कर एलाम क प रि थ तयाँ पैदा करता है । (iii) ल फाइड यूको सस अ डा देने वाल मु गय म (21 स ताह एवं अ धक) अ य धक घनी आवास णाल एवं अ य ेस फे टस के कारण आ थक त पैदा करती है । (iv) ग बोरो अथवा IBD रोग देश के कु छ रा य म जैसे महारा , उड़ीसा, गुजरात, राज थान आ द म प य क तरोधक मता को बुर तरह भा वत करता है तथा R.D./MD आ द अ य वाइरल सं मण म नि य ट काकरण से ि थ त ओर भी भयावह हो जाती है । इस लए इस इमिजग रोग म अ धक Systemic Approach क आव यकता होती है । ोइलस म Viral आथाईरा टस के लए स वले स क आव यकता होती है, इसम ोइलर प ी के पैर म कमजोर आ जाती है । (v) जीवाणु ज नत सं मण वशेषकर E.coli म प ी पालक को यदाकदा आ थक हा न उठानी पड़ सकती है, य क वतमान प रपे म ए ट बायो टक औष ध के लगातार दु पयोग से उ प न ग रिज े स के कारण यह सं मण पुन: एवं बार-बार कु कु टशाला म पाया जाता है । इस लए आव यक है क उपयु त ए ट बायो टक का चयन कर ह औष ध का योग दाने के साथ कया जावे । (vi) कॉ सी डयो सस रोग वतमान म प ी पालक के लए एक वकट सम या है । भ न- भ न कार क जा तय के कारण उ प न ल ण भी भ न- भ न कार के दखलाई दे सकते ह । कॉ सी डया उ स ट का नयं ण, उपयु त ट के का चयन एवं लाईन ऑफ ए शन शी लया जाकर सम या का समाधान संभव है । (vii) टो सीको सस अथवा माइकोटो सी स उ पादन को बुर तरह भा वत करते है, िजसके कारण उपापचय संबंधी वकार (Metabolic disorders) जैसे क फै ट
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    82 ल वर कडनीस ड म अथवा फे ट ल वर, हेमरेिजक स ड म जैसे रोग भी व भ न कारण से उ प न हो रहे है । िजसका कारण इन रोग के त जानकार का अभाव एवं ु टयु त ब धन हो सकता है। 7.2 ग बोरो रोग इसे इ फे ल यस बरसल डजीज अथवा I.B.D. भी कहते है । इस रोग म मु गय का बरसा सूज जाता है । प ी सु त हो जाते ह । कं पकं पी दखाई देती है । पतल बीट एवं कु छ समय प चात् प ी क मृ यु हो जाती है । यह एक वायरल रोग है । शव पर ण करने पर माँस-पे शय म हेमरोज दखलाई देते है, कडनी एवं बरसा फे स म सूजन पायी जाती है । ट काकरण वारा इस रोग को रोका जा सकता है । कु कु ट फाम पर इस रोग का सार तेजी से हो रहा है । 7.3 ल ची रोग मु गय म यह रोग ऐ डनो वायरस ुप-सीरोटाइप 4 एवम ् 8 के कारण होता है । यह रोग ाय: 2-6 स ताह के ायलर म होता है । इस रोग म इ युनोस ेशन भी होता है, िजससे मु गय म अ य रोग से लड़ने क मता कम हो जाती है। च 7..3.1 दय म पाना व दय ल ची फल जैसा पो ट माटम म मुग के दय म पानी मलता है तथा दय ल ची फल जैसा तीत होता है । मुग का ल वर पीला हो जाता है । ल वर मे सूजन और हैमरेज साफ देखे जा सकते है । च 7.3.2. मुग के ल वर म सूजन व हैमरेज
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    83 मुग के गुद( कडनी) भी खराब हो जाते है । इस रोग म 10-70 तशत तक मृ यु हो सकती है । इस रोग म मृ यु दर रोग के वषाणु के अलावा इ युनोस ेशन, कसी कार का तनाव तथा फ ड म माइकोटॉि सन क मा ा पर भी नभर करती है । कु छ थान म ल ची रोग क रोकथाम के लए लोकल ल वर ाइचूरेट का योग कया जा रहा है । ये ाइचूरेट वै सीन के मापद ड को पूरा नह ं करते ह । अत: इनका योग उ चत नह ं है । लोकल ल वर ाइचूरेट के योग से ल ची रोग के साथ-साथ अ य रोग के होने क संभावना बढ़ जाती है । अत: एच.पी. वै स वै सीन का योग बचाव के प म अव य करना चा हए । य द कसी लॉक म एच.पी. वै स (ल ची का बचाव ट का) नह ं लगा है और उस लॉक म ल ची रोग हो जाता है तो ऐसी वशेष प रि थ त म लोकल ल वर ाइचूरेट का योग कया जा सकता है । यह ल वर ाइचूरेट उसी लॉक से ा त ल ची रोग के ल वर से अनुभवी पौ ैि टशनर वारा बनाना चा हए तथा रोग र हतता के मापद ड को पूरा करने के बाद ह योग करना चा हए । फाम क अ य मु गय म आव यकतानुसार एच.पी. वै स का योग कया जा सकता है । 7.4 सालमोनेलो सस रोग: इसे पुलोरम डिजज, फाउल टाईफोईड भी कहा जाता है । मुग फाम पर काम करने वाल के लए यह एक घातक रोग है । अ डे वारा फै लने वाले इस रोग क पहचान ए ट जन पर ण वारा आसानी से क जा सकती है । अ छ यव था एवं सफाई के साथ-साथ ए ट बायो टक औष ध, स फा अथवा यूराजोल डोन के योग से बचाव एवं रोकथाम कया जा सकता है। 7.5 मेरे स रोग: छ: स ताह या अ धक उ के प य म यह एक घातक तेजी से फै लने वाला रोग है, जो हरपीज वाइरस वारा होता है । इसम तं का तं बुर तरह त त होता है तथा प ी लंगड़ाकर चलता है । व भ न अंग पर यूमर अथवा गाँठे पाई जाती है । इस रोग का सारण मुग के पँख अथवा लार वारा होता है । जीरो डे अथवा शी अ तशी ट काकरण कराकर ह इस रोग से बचा जा सकता है । पैरे ट टोक से यह रोग चूज म आ जाता है तथा इस रोग के फै लने क संभावना मनु य म भी रहती है । इस लए इसे जूनो टक रोग भी कहा जाता है। माइको ला मो सस :- यह रोग 'माइको लाजा-गैल से ट कम' जीवाणु वारा फै लता है । इसे C.R.D. का रोग कहते है । आजकल यह रोग माइको ला मा क एक जा त, िजसे “माइको- ला मा साइनोबी” कहते है, के कारण भी फै लता है । माइको ला मा का सं मण तब तक नह ं उभरता है, जब तक कोई ेस मु गय म नह ं हो जाता । वसन तं से संबं धत इस रोग क पहचान ल ण एवं शव पर ण के आधार पर आसानी से क जा सकती है ।
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    84 7.6 ए परिजलोसस: ए पर िजलो सस यू मगेटस नामक “मो ड” से यह रोग होता है । चकन तथा टक दोन म यह रोग होता है । चूजे पैदा होते ह अथवा है चंग के समय ह रोग सत हो जाते ह तथा एक स ताह बाद उनम रेिज टे स आ जाती है । रोगी प ी खाना छोड़ देते है, वास म क ठनाई महसूस करते है । आँख म भी अ सर रोग हो जाता है, वे सूज जाती ह तथा अंधापन हो जाता है । य द रोग मुँह, े कया या “ ोकाई'' म हो तो भार आवाज क ठनाई से सांस लेना तथा गले से रैट लंग क आवाज आती है । 7.7 पाईरो कटो सस- टक फ वर: यह ती इ फै शन रोग है, िजसम शर र का तापमान बढ़ जाता है । चाल म प रवतन तथा लकु आ हो जाता है । यह “अरगस परसीकस'' (Agus.persicus) नामक टक वारा होता है । “बोर लया ए सर ना” (Borrelia.anserina) एक पाईरोक ट है, जो टक वारा फै लता है । रोग अ डे वारा भी हो सकता है । म छर, म खी तथा अ य क ड़े इस रोग के सारण म सहायक होते है । इ फे टेड टक लगभग 3 वष तक इ फे ि टव रह सकती है, य द उसे उ चत तापमान (95 ० F) मलता रहे । कॉ सी डयो सस :- यह एक कार का घातक परजीवी रोग है । जो छोटे चूजे कम उ क मु गय अथवा कसी भी उ पर देखा जा सकता है । यह रोग एक ोटोजोआ, िजसे “आई म रया'' भी कहा जाता है, के वारा होता है । आई म रया क व भ न जा तयाँ इस रोग को करने म स म है । आँत एवं सकम म कॉ सी डया उ स ट क वृ के कारण इन अंग के अ द नी सतह म छ हो जाते ह, िजससे र त बहता है और यह र त बीट के साथ मलकर दखाई देता है । ो नक कॉ सी डयो सस म मुग को खूनी द त लग जाते ह । उ पादन कम हो जाता है तथा प ी क मृ यु हो जाती है । योगशाला म सं मत प ी क नय मत बीट क जाँच वारा इस रोग का पता ारि भक अव था म लग सकता है । माइ ो कोप वारा पर ण करने पर आइ म रया उ स ट बीट म दखलाई देते ह । इस रोग का भावी उपचार कॉ सी डयो टेट औष धयाँ देकर कया जा सकता है । 7.8 मु गय मे यूबरकु लो सस: इस बीमार को “ पोटेड लवर” भी कहा जाता है । यह एक कार क सं ामक बीमार है, जो जीवाणु “माइको बै ट रयम-ए वयम” वारा होती है । इस रोग क पहचान इसक ो नक अव था, ल बे समय तक लोप म बने रहना, अ डा उ पादन म लगातार गरावट एवं अ त म कमजोर होकर मृ यु के प म होती है । इस रोग का सारण वा तव म दू षत वातावरण के कारण माना जाता है । लटर अथवा म ी म इस जीवाणु के बे सलाई ल बे समय तक पाये जा सकते है तथा कभी भी अपना उ त प धारण कर सकते है । बदलते मौसम एवं वतमान पा रि थ तक के कारण यह रोग थान वशेष पर मुग शालाओं म तेजी से उभरकर आ रहा है ।
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    85 ल ण :-इस रोग के मुख ल ण शर र क हालत म लगातार गरावट, सुला रहन, वजन म कमी होना, छाती क माँस-पे शयाँ कम होना अथवा समा त होना, छाती क ह डी (Breast bone) उभरकर मुख प से दखाई देना है । रोग म पँख सूख जाते ह, र त क कमी हो जाती है । को ब एवं वेटल नीले पड़ जाते ह । लवर कमजोर हो जाता है तथा मुग पील दखाई देती है । शव पर ण करने पर मुग म भूरे-सफे द नो यूल आँत पर, त ल पर व लवर पर देखे जा सकते है । नदान :- इस रोग का नदान ए ट जन पर ण कर कया जा सकता है, िजसम वेटल क वचा म 0.05ml. यूबर कु ल न इंजे शन लगाकर, इंजे शन वाले थान पर 48 घ टे उपरा त सूजन क अव था देखी जाती है, जो क 1 से 5 गुना आकार म बढ़ सकती है । इस पर ण को यूब कु ल न टेि टंग कहते है । नरोगी प ी म कोई सूजन दखलाई नह ं देती । इस रोग का कोई इलाज नह ं है । सं मत प ी को मार देना ह उपयु त रहेगा । असं मत प ी को सं मत प ी से अलग रखे एवं फाम क अ छ तरह सफाई कर द जाव । 7.9 ए वयन इ लूएंजा रोग (बड लू) : वतमान म व व के कई वक सत एवं वकासशील देश म इस रोग का कोप अ य त ती ता से बढ़ता जा रहा है । इस रोग को ए वयन इ लूएंजा रोग के नाम से भी जाना जाता है । मु गय म फै लने वाला यह एक वषाणुज नत रोग है, जो क म सो वायरस इ लूएंजा और म सो वायरस पैरा इ लूएंजा वायरस वारा फै लता है, िजसके कारण मु गय म व भ न कार के ल ण कट होते है । रोग से सत प ी व भ न कार के ल ण द शत कर सकते है अथवा बगैर कोई ल ण द शत करे ह उनक मृ यु हो सकती है । प य म खांसी उठने के साथ आँख म पानी आना, चेहरे और सर म सूजन होना, वास म घुर-घुर क आवाज आना, प य म पँख खे दखाई देना एवं पँख झड़ना और पँख र हत थान पर नील पड़ना अथवा खून नकलना, इसके अलावा प य म पतले द त होना सामा य है । साथ ह प य म च कर खाकर गरना छ ंक आना आ द ल ण देखे जा सकते है । इस रोग का सारण हवा अथवा सं मत बीट, सं मत प ी अथवा अ ड के बगैर गरम कये हु ए व अधपके माँस के सेवन से मनु य म हो सकता है । अ छ तरह से पके हु ए माँस व अ ड वारा यह रोग नह ं फै लता है । 7.10 सारांश: इमिजग रोग के वषय मे हो सकता है क इनके रोकने के लए कये गये सभी साथक यास सह दशा म ना हो अथवा वशेष यास के बावजूद भी कु छ रोग आ थक त का कारण बने, क तु कसी े वशेष म होने वाले इन रोग क रोकथाम के लए focused यास कये जावे तथा कु कु ट इ ड ज को आव यकता इस बात क है क इन रोग क भावी रोकथाम के उपाय कर सं मण को े वशेष से दूर कया जावे, य क इन रोग क बार-बार उपि थ त नवीन सम याओं को ज म देगी । साथ ह नये वातावरण म भी इनका जमाव (Adoptation) द घकाल न होगा।
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    87 इकाई : एवयन इं लूएंजा - व भ न नवीन अवधारणाय एवं नराकरण इकाई- 8 8.0 उ े य 8.1 तावना 8.2 उ व 8.3 पडे मक इं लूएंजा 8.4 रोग के आऊट ेक 8.4.1 HPAL वारा 8.4.2 LPAL वारा 8.5 भा वत मुख प ी जा तयाँ एवं कार 8.5.1 HPAL वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट 8.5.2 LPAL वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट 8.6 रोग का सार एवं व भ न हो ट 8.6.1 सूअर 8.6.2 कु कु ट 8.6.3 वेल प ी 8.7 प य म रोग 8.7.1 सार 8.7.2 इ यूवेशन समय 8.7.3 ल ण 8.7.4 शव पर ण 8.8 प य म रोग क पहचान एवं से पल एक ीकरण 8.8.1 नमूने एक करना 8.8.2 व भ जाँच व धयाँ 8.9 उपचार एवं रोकथाम 8.9.1 उपचार 8.9.2 ट काकरण 8.10 रोग भा वत मु गय क हे ड लंग व क लंग (मारना) 8.10.1 इनहेलेटर एजे स
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    88 8.10.2 न चेतकइंजे शन वारा 8.10.3 भौ तक प से मारना 8.11 ड पोजल 8.11.1 इनसेनेरेशन 8.11.2 बु रयल मेथड 8.12 रोग से बचाव 8.13 चकन व अ डे का सुर त मानव उपयोग 8.14 सारांश 8.0 उ े य इकाई का उ े य रोग क सम जानकार तुत कर कु कु ट पालक को हमारे देश म रोग क संभावना एवं बचाव क जानकार देना है । 8.1 तावना ए वयन इं लूएंजा एक जूनो टक रोग है, जो कु छ lower chordate प य एवं मनु य म फै ल सकता है । यह वायरस एक कार का RNAVIRUS है जो आथ म सोवाइ रडी family का सद य है । इसके चार genera होते है । A,B,C,& Thogoto Virus A - प य तथा जानवर तथा मनु य म इं लूएंजा B - जल य सी स म इं लूएंजा C - सूअर म इं लूएंजा यह वायरस प ी क आँत क सतह को शकाओं म वृ करते है एवं प य क बीट वारा फै लते है । जल व आहार के दूषण से फै लते ह । फाइलोजेने टक अ ययन से काश म आया है क व भ न तनधा रय को भा वत करने वाले लू वायरस ताप ए वयन इं लूएंजा वायरस से ह उ ा वत है । टाइप-ए वायरस ऐ ट जे नक कार (ह म ए लूटे नन एवं यूरा मनीडेज) के आधार पर व भ न सबटाईप म वभ त कये जाते है । ह म ए लूटे नन के 15 कार (H1,H2,H3,………………H15) तथा यूरा मनीडेज के नौ कार(N1,N2,N3,…………..N9) पहचाने गये है । 8.2 उ व य य प इं लूएंजा वायरस प य एवं तनधा रय के व भ न जा तय को भा वत कर सकता है । ाकृ तक प से इस वायरस के हो ट जंगल जल य एवं समु प ी होते है । इसके एपेरे ट हो ट समूह चकन, टक , सुअर, घोड़े एवं मनु य होते है । इं लुएंजी वायरस के ाकृ तक हो ट समूह म वकास एवं उ व ग त एपेरे ट हो ट समूह क अपे ा काफ कम
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    89 होती है ।इसके अ य रोगकार नये प म उ व क दर तनधा रय म सवा धक होती है । ए वयन इं लूएंजा वायरस 1878 म सव थम इसे जीवाणु ज नत रोग से अलग पहचाना गया तथा फाऊल लेग का नाम दया गया (इटल ) 1900 म HPAI वायरस का इं लूएंजा A-वायरस होना बताया गया । 1959 – म HPAL वायरस (H5, N1) क पहचान ( कॉटलै ड) 1961 - HPAL वायरस सबटाईप (H5, N3) क पहचान जंगल प य म (साउथ अ का) 1970 - जंगल / जातीय प य के रसरवॉयर हो ट होने क पहचान क गयी । 8.3 पे डे मक इं लूऐ जा रोग का वायरस - म यम आकार का व भ न प म द शत होने वाला वायरस है, िजसम व भ ए ट जे नक वे रयेशन जो श ट ( मुख) ट (गौण) के प म होते है । मानव जा त म इं लूऐ जा ाय: येक वष महामार के प म कट होता है । ऐसा होने का कारण ए ट जे नक ट ( यूटेशन) ह है, िजसक वजह से यह वायरस अपने सतह लाईको ोट स को प रव तत कर नये-नये ऐ ट जे नक व प म उ वत होता है एवं इस नये प के लये हो ट समूह म रोग तरोधकता अपे ाकृ त कम अथवा नह ं होती है । अत: इं लूऐ जा -A वायरस के इन यूटेश स ( ट) के वारा ब कु ल नये सब टाईप, जो क पे डे मक (पूर पृ वी पर फै लना) का प ले ले, म प रव तत होने क संभावना अ धक होती है । यूमन इं लूएंजा वायरस एवं ए वयन इं लूऐंजा वायरस क जीनीय संरचना को मलने के लए एक रसववॉयर हॉ ट क आव यकता होती है । तनधा रय एवं अ य जा तय म रोग का सार (इंटर पीसीज ांस मशन) उ त कार के जीनीय एसोटमट को बढ़ावा देता है । िजससे क यूमन इं लूऐंजा वायरस म ए वयन इंपक जा वायरस क भाँ त ह जी नय संरचना देखी जा सकती है । इसी कार का सं मण ए वयन इं लूऐंजा -ए (H5NI) वायरस के वारा हाँगकाँग म 1997 म देखा गया, िजससे मनु य म इं लूऐंजा रोग (कं ज ट वाई टस, यूमो नया आ द) ल ण द शत हु ए एवं 33 तशत क मृ यु दर द शत हु ई । य य प इस कार के आउट ेक पे डे मक का खतरा द शत करते है तथा प रोग का मनु य से मनु य म सार नह ं देखा गया है । 8.4 रोग के आऊट ेक वगत म यह रोग HPAI (हाई पेथोजे नक ऐ वयन इं लूऐंजा) घरेलू प य का नह ं माना जाता था, य क 40 वष म (1959 से 1998) रोग के के वल 17 (स ह) आऊट ेक ह रपोट कये गये । 1999 म सात वष म आठ आऊट ेक रपोट कये गये, िजससे लगभग बारह देश भा वत हु ए । वतमान म माच 2004 म LPAI के वारा भी आऊट ेक रपोट कये गये है ।
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    90 8.4.1 HPAI वारा .स.देश वष सब टाईप 1. मैि सको 1994, 2000 H5N2 2. पा क तान 1995, 2000 H7N3 3. आ े लया 1997 H7N4 4. इटल 1997-98 H5N2 5. इटल 1998 H5N9 6. आयरले ड 1998 H5N2 7. बेि जयम 1999 H5N2 8. इटल 1999, 2001 H5N2 9. स ल अमे रका 2000-200 1H5N2 10. यूनाईटेड टे स ऑफ अमे रका 1997, 2004 H7N2 11. कनाडा 2000 H7N1 12. जमनी 2001 H7N1 13. चल 2002 H7N3 14. इटल 2002-03 H7N3 15. नीदरलै ड 2003 H7N7 16. बेि जयम 2003 H7N7 17. जमनी 2003 H7N7 18. द ण पूव ए शया 2003-04 H5N1 19. ताईवान 2004 H5N2 20. कनाडा 2004 H7N3 21. यू एस ए (टे सास) 2004 H5N2 22. इं डया 2006 H5N1 8.4.2 LPAI वारा ब तख, कु कु ट, टक 1995,98 जमनी H9N2 फ से ट 1994,96 आयरलै ड शुतुमुग 1995 द ण अ का टक 1997-96 संयु त रा य अमे रका H9N2
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    91 कु कु ट1994 चीन H9N3 ईरान, पा क तान H9N2 LPAI वायरस य य प कम पेथोजे नक होता है, फर भी इस वाइरस के H9N2 भेद से यावसा यक/जंगल य/जल य/ घरेलू प य म रोग का सार देखा गया है । इस H9N3 भेद के व पा क तान-ईरान व चीन म प य का ट काकरण कया गया है, ता क रोग के सार को रोका जा सके , 8.5 ए वयन लू - भा वत मुख प ी एवं कार ए वयन इं लूऐंजा टाईप -4 वायरस ाकृ तक प से प य को सं मत करता है । इसके प ह कार के ह मएग टे नस एवं 9 कार के यूरा मनीडेज तथा इनके संभा वत मेल व भ न प ी जा तय म पहचाने गये ह । इनक रोग पैदा करने क मता के आधार पर इ ह दो कार म बाँटा जाता है- 1. HPAL - हाईल पेथोजे नक ए वयन इं लूऐंजा (अ धक व लट) 2. LAPI - लो पेथोजे नक ए वयन इं लूऐ जा (कम व लट) अ धक व लट वायरस म मृ यु दर 100% तक हो सकती है । ये ाय: H5 एवं H7 ह मएगलु ट नन के साथ देखे गये है । अ य अपे ाकृ त कम पेथोजे नक ि थ त पैदा करते है एवं अ धकांशत: वसन तं म रोग के ल ण द शत करते है । HPAL वाइरस जंगल प य म ाय: नह ं मलते, जब क LPAI वाइरस गज व बतख म 15% तक तथा अ य प य म लगभग 2% तक पाये जाते है । 8.5.1 LPAI वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट 1. रोग द शत नह ं होना । 2. अ डा उ पादन म कमी अथवा क जाना । 3. ह क से म यम वसन तं के रोग ल ण, िजसम मृ यु दर 50% तक होती है, क तु य द इसके साथ-साथ अ य जीवाणु रोग हो जाने पर ये मृ युदर 50% तक पहु ँच जाती है । 8.5.2 HPAI वारा रोग का दशन एवं पेथोजे न सट HPAI वाइरस से (H5&N7) अब तक 25 से अ धक आउट ेक देखे गये है । हाल ह म द ण पूव ए शया म हु आ आऊट ेक, िजसम अ धक मृ युदर लगभग 100% तक होना पायी गयी है । इस कार के आऊट ेक म मृ यु कई आंत रक दै हक अंग के काय कने से होती है । पेथोजे न सट का कारण - HPAI वाइरस क सतह पर पाया जाने वाला ह मएगलु ट नन दो कार से काय करता है । थम तो वायरस को हो ट को शकाओं क सतह पर जुड़ने तथा फर इसके प चात् को शका भ ती को गलाकर वाइरस यूि लक अ ल के हो ट को शकाओं के यूि लक अ ल से मलने
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    92 म सहायता करताहै । इस कार से ये ह मएगलु ट नन सं मण को फै लाने म मदद करते है । यह लाइको ोट न एक ीकसर बनाता है, िजसे HAO कहते है । यह HAO ल वेज वारा ( वभाजन थान) HA1 एवं HA2 बनाता है, जो नयी हो ट को शका से जुड़कर उसे सं मत करते है । LPAI (कम पेथोजे नक) वाइरस म ल वेज साईट ( वभाजन का थान) पर के वल आिज नन नामक अ मनोअ ल होता है । दूसरे अमीनो अ त ल वेज साइट से अलग 3/4 क ि थ त पर होता है, जब क HPAI (अ धक पेथोजे नक) वाइरस म HAO क ल वेज साईट पर व भ न बेस के अ मनो अ ल आिज नन व लाई सन मौजूद होते है । ल वेज साईट पर मोनो बे सक अमीनो अ ल होने से LPAI वाइरस के वल वसन तं तथा आं को शकाओं वारा ह ाह होते है । अत: LPAI का सं मण मुखत: वसन तथा पाचन तं तक ह सी मत रहता है, जब क HPAI म म ट पल बे सक अ मनो अ ल ल वेज साईट पर मौजूद होते है, जो यू व यूटस ोट ऐज यू रन के वारा पचा दये जाते है व वाइरस का यूि लक अ ल हो ट को शकाओं के यूि लक अ ल से आसानी से मल जाता है। इससे HPAI सं मण शर र क स पूण को शकाओं म वेश कर सकता है । ल वेज साईट पर म ट पल बे सक अमीनो अ ल का एक ीकरण दो कार से होता है । 1. उदासीन अथवा अ ल य अमीनो अ ल का बे सक अमीनो अ ल म यूटेशन होना । उदाहरणाथ लूटे मक अ ल (CAA) का लाई सन (AAA) म प रवतन होना । 2. युि लओटाईड के वगुणन वारा उदाहरण AGA का AGA व AGA म गुणन । 8.6 रोग का सार एवं व भ न हो ट वे टर / रसवायर हा ट 8.6.1 सुअर सूअर ए वयन इं लूऐंजा वायरस से भा वत होते है । ये मु गय एवं मनु य दोन के स पक म आते है, िजन देश म म सड फा मग (एक ह फाम प रसर म प ी तथा सुअर दोन का यावसा यक पालन) प त अपनायी जाती है, वहाँ ये रोग का अंतर जातीय सार करने म सहायक होते है एवं यूमन लू वायरस तथा ए वयन लू वायरस के लए मि संग वेसल ( मलाने वाले) का काय करते ह । 8.6.2 कु कु ट य य प ार भ म भी कु कु ट प ी से ए वयन इं लूऐंजा रोग वायरस का मनु य म सार देखा गया था, क तु कसी कार के गंभीर रोग/मृ युदर नह ं होने से यह माना जाता था क ए वयन इं लूऐंजा वायरस य द कु कु ट प ी से सीधे मनु य को सं मत कर तो उसम गुणन (Multiply) एवं एडा टेशन क मता नह ं होती । अत: कु कु ट से सीधे सं मण वारा मनु य म रोग फै लने क कोई संभावना नह ं मानी जाती है ।
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    93 कु कु टप ी मनु य म इं लूऐंजा फै लाने म एक इंटर म डयट हो ट के प म भी काय करते है । वगत म यह माना जाता था क ए वयन इं लूऐंजा वायरस सुअर म जेने टक एसोटमट के प चात ह मनु य को भा वत कर सकता है, ले कन हाँगकाँग म हु ए लू के बाद यह प ट हो गया क कु कु ट से मनु य म यह रोग सीधे ह आ सकता है एवं कसी मि संग वेसल जैसे क सुअर क कोई भू मका होना आव यक नह ं है । हाँगकाँग म फै ले लू म 18 लोग क जान गई । यह व व को एक झटका था, िजसम प ट हो गया था क ए वयन इं लूऐ जा वायरस बना जेने टक एस टमट के भी मनु य म रोग फै लाने म स म होता है । अभी तक इस रोग का मनु य से मनु य म कोई सार नह ं देखा गया है । वै ा नक का मानना है क उ त कार के सार के लए वायरस को व लट बनने हेतु मानवीय ओ रजन के जीन क आव यकता होती है । य द ए वयन इं लूऐंजा वायरस का मानव के यूमन इं लूऐंजा वायरस से कसी मि संग वेसल म पुन: जेने टक एसोटमट हो तो यह वायरस मानव से मानव म सार क शि त भी ा त कर सकता है । 8.6.3 वेल प ी ए वयन इं लूऐंजा वाइरस क व भ न जा तय के लये वेल प ी कु कु ट क अपे ा अ धक संवेदनशील होते है । जल य कु कु ट प य म रोग का सार फ को-ओरल ट (बीट से खा य अथवा जल सं मण) वारा होता है, जब क वेल म यह मनु य क भाँ त ऐरोसोल (वायुम डल म न ह ं बूँद के प मे) सं मण होता है । वेल प ी पर कये गये अ ययन से पता चला है क ये इंटर म डयट हो ट क तरह तो काय करते ह है । साथ ह ये ए वयन व यूमन इं लूऐ जा वायरस के लए जेने टक एस टमट दान करने वाले मि संग वेसल का काय भी कर सकते है, िजससे नये पेथोजे नक व लट भेद ( ेन) का उ व भी हो सकता है, जो मनु य से मनु य म सार क मता रखता है । इस कार से ये वेल प ी ए वयन इं लूऐ जा 4 वायरस को पे डे मक (पूरे व व म) के प म प रव तत कर सकते है । 8.7 प य म रोग 8.7.1 सार रोग के वायरस का सार सं मत प ी क बीट , कं ज टाईवा वारा होता है । रोग सं मत प य के सीधे अथवा अ य प से स पक म आने पर होता है । यह रोग एरोसोल अथवा अ य फोमाईट पर वायरस के होने तथा बीट से फै लता है ।
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    94 8.7.2 इन यूवेशनसमय प य म सं मण के प चात रोग कट होने म कु छ घ ट से लगाकर 3 दवस का समय लग सकता है । यह समय सं मण क मा ा, कार एवं णाल पर नभर करता है | 8.7.3 ल ण प य म द शत ल ण वाइरस के व लस, भा वत जा त, प ी क उ , लंग, वातावरण तथा पहले से मौजूद कसी अ य सं मण आ द पर नभर करते है ।  HPAI/ अ धक व लट भेद से भा वत प ी बना कोई ल ण द शत कये अथवा ह का बुखार, सु ती, भूख न लगने जैसे अ त सामा य ल ण द शत कर पाते है और मृ यु हो जाती है ।  कु छ प ी लड़खड़ाने, अ डा उ पादन कम / ब द करने / पतले छलके वाले अ डे देने जैसे ल ण दखाते है ।  बीमार प ी लगभग बेहोशी क सी अव था म ( सर भू म को छू ता हु आ) खड़े अथवा बैठे दखाई देते है ।  प ी क कलंगी एवं वेटल सूजी हु ई तथा छोटे ( पन पॉइंट) अथवा बड़े (इकाईमो टक) हेमोरेजेज (र त रंिजत) लये दखाई देती है ।  प ड लय पर वचा के नीचे खून जमा हु आ दखाई पड़ता है । पंख र हत थान पर हेमोरेजेज दखाई पड़ते है ।  भा वत प ी को पानी जैसे पतले द त लगना तथा यास बढ़ना आ द ल ण प रल त होते है ।  वसन म क ठनाई, चेहरे व सर पर सूजन तथा अ या धक मृ युदर देखने को मलती हे ।  कम उ के प य म नवस ल ण, लड़खडाना, च कर खाना आ द द शत होते है ।  ब तख व गज म ड ेशन (सु ती व अवसाद) भूख न लगना, द त लगना आ द ल ण ह मलते है, जब क चकन म वेटल व कलंगी भी सूजी तथा हेमोरेिजक दखाई देती है । 8.7.4 शव पर ण  अ या धक व लट भेद वारा हु ए परए यूट सं मण म के वल माँसपे शय का कं जेशन (ला लमा) एवं जल क कमी (डीहाइ ेशन) के ल ण देखने को मलते ह ।  अपे ाकृ त कम ए यूट सं मण म सर, गदन आ द पर सूजन, वास नल ( े कया) तथा क डनी (वृ क) पर सूजन व हेमोरेज पाये जाते है ।
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    95  व भन वसरल अंग पर पन पोइ ट हेमोरेज तथा क ल बोन के आंत रक ह से क तरफ मांसपे शय म हेमोरेज मलता है ।  दय पर फे नस पेर काडाइ टस मलना शव पर ण पर उ त कार के ल जन दखाई पड़ते है । 8.8 प य म रोग क पहचान एवं से पल एक ीकरण 8.8.1 नमूने एक करना  वास नाल, ऐयर सेक, फु फु स, ल न, आँत व दमाग आ द अंग के टुकड़ को PSB म से पल कलेि टंग वाय स म एक त कया जाना चा हये ।  लोएका एवं े कया वारा वाब  सीरम के नमूने सीरम के अ त र त अ य नमून को आइसोटो नक फॉ फे ट बफर सेलाईन वलयन म एक कया जाना चा हये, िजसक Ph7.0से 7.4 तक हो एवं इसम उ चत ए ट बाईओ टक मलाया जाना भी आव यक है । उदाहरणाथ जे टा म सन 50mg/ml अथवा पे न स लन 200 यू नट/ml./ े टोमाइ सन 2mg/ml आ द हो सकते है । से पल एक ण के बाद 4 o C ताप पर रखे जाने चा हये एवं प रवहन के दौरान बफ के इ तेमाल वारा उ चत ठ डक बनायी जानी अ तआव यक है । 8.8.2 व भ न जाँच व धयाँ रोग क जाँच वाइरस क पहचान कर क जाती है, िजसके लए वसन तं व आँत के उ तक ाव तथा ए स टा (बीट) आ द उपयोग म आते है । वायरस क पहचान अगार जेल इ यूनो ड यूजन टे ट (AGID) तथा एंजाइम लं ड इ यूनोएबसारबट ऐसे (ELISA) वारा क जाती है । ह मएगलु ट नन क पहचान(HA) इसक पहचान ह मएगलु ट नन इन हबीशन टे ट (HI) वारा क जाती है । यूरा मनीडेज क पहचान : यूरा मनीडेज इन हबीशन (NI-Assay) ऐसे वारा क जाती है। मोल यूलर डाय नो सस व ध से रचड ांस शन पॉल मरेज चेन रए शन (RT-PCR) वारा लू वाइरस क पहचान के साथ ह व श ट सब टाईप H5 अथवा H7 क पहचान क जाती है । 8.9 उपचार एवं रोकथाम
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    96 8.9.1 उपचार रोग काकोई भावी उपचार नह ं है । एम टडीन हाइ ो लोराइड व रमटेडीन हाइ ो लोराइड आ द दवाय मनु य म रोग से बचाव हेतु उपयोग क जाती है । ये दवाय प य म इ तेमाल नह ं क जाती, य क दवा क कु छ मा ा (Traces) उपचा रत प ी क माँसपे शय , िजगर, अ डे तथा योक म आ जाती है व प ी को सामा य मानव उपयोग के लए बेकार कर देती है । 8.9.2 ट काकरण रोग क रोकथाम हेतु ट काकरण अ छा रा ता है । फर भी ट काकरण के अलावा अ य नी तय जैसे ऑल इन आल आऊट, रोग का सघन स वले स आव यक है, ता क प य के ट काकरण वारा मनु य म रोग सं मण क संभावना को कम कया जाए । रोग के उपल ध ट क (i) होमोलोगस वे सीन :- ये ऑटोजीनस वे सीन क तरह ह बनाये जाते है अथात इनम फ ड ेन ह उपयोग कया जाता है । उदाहरण के लए HPAI मैि सको म ेन H5N2 वारा फै ला था और यह H5N2 ेन ह वे सीन म उपयोग कया गया । इसी कार पा क तान म HPAI आऊट ेक को रोकने के लए होमोलोगस वे सीन योग कये गये । (ii) नि य हेटेरोलोगस वे सीन :- इस कार के वे सीन म फ ड वाइरस भेद से भ न अथवा हेटेरोलोगस यूरा मनीडेज (N Type) उपयोग कया जाता है । उदाहरणाथ HPAI के इटल म 2002 म हु ए आऊट ेक म फ ड ेन H7N1 था तथा उसको रोकने के लये H7N3 ेन के ट के लगाये गये । इन प य म स वले स से पहचाना जा सकता है क प ी वे सीनेटेड है अथवा सं मत है । हमारे देश म के य रजव वारा दो कार क वे सीन टोर क गई है, जो न न है । H5N2 भेद/A/CK/ मैि सको/232/94/CPA H7N1 भेद/A/CK/इटल /473/99 ये ए वयन इं लूऐंजा टाईप-A वायरस के व एि टव रोग तरोधकता देती है । (iii) रकॉ बीएंट वे सीन :- इस कार क वे सीन म एक साथ दो या अ धक रोग का ट का लगाया जाता है। उदाहरणाथ फाऊलपॉ स वे सीन के साथ H5 भेद (ए वयन लू वायरस) सफलतापूवक उपयोग कया गया। इस कार के ट के से हम फ ड ेन उपयोग करने के बाद भी रकॉ बीनेशन के कारण वे सीनेटेड व इंफे टेड प ी क पहचान कर सकते है । इस े म DNA वे सीन बनाये जाने क दशा म यास जार है ।
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    97 8.10 रोग भावत मु गय क हे ड लंग व क लंग (मारना) रोग के आऊट ेक क ि थ त म सं मत प ी अ य प य तथा मनु य म रोग फै लाने का एक बड़ा ज रया होते है । अत: इन प रि थ तय म आव यक हो जाता है क उ ह मार दया जाये । य द आव यक हो तो पूरे लॉक से लगा कर स पूण े को कु कु ट वह न कया जाना चा हए । प य को मारने के लए काम ल गई व ध ऐसी होनी चा हए, जो मानवीय हो, िजससे रोग के सार का खतरा कम हो तथा भावी हो । यह काय पशु च क सक क देखरेख म ड यि तय वारा कया जाना चा हए । यह सु नि चत करना आव यक है क सभी मारे गये प ी कसी कार क दयग त अथवा वसन नह ं दशा रहे हो एवं पूणतया मृत हो । 8.10.1 इनहेलेटर एजे स काबनडाईऑ साइड, काबन मोनो साइड, नाइ ोजन, आगन हेलोथेन, मीथॉ सी लूरेन, आईसो लूरेन आ द ऐसे इनहेलेटर एजे स है, िजनके सूँघने से मृ यु हो जाती है । इस व ध म सभी प य को चै बर म डालकर उ त कोई भी एक गैस भर द जाती है व नि चत समय के बाद सभी प ी मर जाते है । हा न - ए वयन इं लूऐंजा रोग के संदभ म ये व ध उपयोगी नह ं होती, य क इसम कई प य के बेहोश होकर रह जाने व पूण मृत नह ं होने क पया त संभावना होती है | 8.10.2 न चेतक इंजे शन वारा न चेतक को य द अ धक मा ा म उपयोग कया जाए तो वे भावी प से प य को मार सकते है, क तु इस व ध म समय व म तो अ धक लगेगा ह, साथ ह प ी के पूणतया: मृत न होने क संभावना भी रहेगी। इंजे शन के बार-बार योग से जीवाणु सं मण वारा प ी शव के ज द सड़ने क ि थ त पैदा हो जायेगी। अत: यह व ध वशेष भावी नह ं है । 8.10.3 भौ तक प से मारना इन व धय म येक प ी को अलग-अलग पकड़कर मारा जाता है । अत: उनक मृ यु सु नि चत करना आसान होता है । (i) इले ोकॉशन :- इसम बजल के तार से ले प लगाकर प ी शर र के वपर त बगल पर छु आ दया जाता है । करंट लगने से प ी क मृ यु हो जाती है, क तु हजार लाख कु कु ट को मारने के लए यह व ध ठ क नह ं है । इसम शाट स कट अथवा काय करने वाले यि तय के साथ दुघटना क संभावना बनी रहती है ।
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    98 (ii) छोटे बडजो वारा :- छोटे जानवर को खं सी करने वाले यं को प ी क गदन पर लगाकर ले प चढ़ा द जाती है तथा तड़फड़ाने तक उसे वैसे ह रखा जाता है । इस व ध से कॉप तथा े कया के कं ट स (सं मत व) बाहर वातावरण म नह ं आ पाते है, क तु इसम कम से कम दो आदमी (प ी क गदन पकड़ने तथा लेप लगाने के लये) आव यक होते है । (iii) े यूलाईजेशन वारा - हमारे देश म हु ए रोग कोप को फै लने से रोकने के लए प य को मारने म इसी प त का योग कया गया है । यह व ध अपे ाकृ त कम समय लेने वाल भावी व ध है, िजसम येक प ी को बार-बार से मारने के कारण उसक मृ यु सु नि चत होती है । मारे जाने वाले प य को मारने से पूव े यूलाईज कया जाता है, िजससे प य को दद व ग त व ध कम हो, ता क उ ह मानवतापूण आसान मृ यु द जा सक । इस हेतु सो डयम फ नोबारबीटो स का 80 म. ा. / 55 म.ल पीने के पानी म इ तेमाल से 4 घ टे म प य को बेहोश कया जा सकता है अथवा ए फा लोरेसोल को 2% से 6% तक दाने म मला देने से भी प ी बेहोश हो जाते है एवं इन प य के लाि टक थै लय म दम घोटने से भी मारा जाता है, क तु इससे प य के िजंदा रहने / तड़फड़ाने से थै लय के फटने एवं सं मण का भय बना रहता है । (iv) डसलोकशन तथा डके पटेशन के लए प ी के दोन पंख को एक हाथ से पीठ के उपर पकड़ कर दूसरे हाथ से तजनी एवं म यमा अंगुल के वारा गदन को पकड़कर तेजी से आगे खींचे एवं आगे क तरफ मोड़ दे । प ी एवं इसक गदन इस ि थ त म तब तक पकड़े रहे, जब तक क वह तड़फड़ाये, ता क वास नाल एवं कॉप के पदाथ बाहर न आये एवं पंख के फड़फड़ाने से लटर क धूल वातावरण म कम फै ले । 8.11 ड पोजल मृत प य के न तारण हेतु ऐसी जगह का चुनाव करना चा हये, जहाँ को हाई-वे न हो, कसी कार क भू मगत पाईप लाईन, के बल / बजल के तार आ द न ह । थान नजन व आबाद से दूर हो । मृत प य को जलाकर अथवा ग ढा खोदकर गाड़ा जाता है । 8.11.1 इनसेनेरेशन य द प ी शव को जलाया जा रहा है, तो इस बात का पूण यान रखा जाना चा हए क शव पूर तरह जल जाये एवं जानवर वारा इधर-उधर न फै लाया जावे । इस हेतु 100 क. ा. शव भार हेतु 500 क. ा. सूखी लकड़ी क आव यकता होती है ।
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    99 8.11.2 बु रयलमेथड इस हेतु जे.सी बी मशीन क मदद से ल बे-ल बे े च खोदे जाते है एवं 2 मीटर ल बा x2 मीटर चोड़ा व 2 मीटर गहरा ग ढा लगभग तीन सौ प य के लये पया त होता है । य द ग ढे को एक मीटर और गहरा कर दया जाये तो उसी म 600 प ी शव न ता रत कये जा सकते है । इस हेतु ग ढे म पहले चूना बछाया जाता है । फर प ी शव को डालकर पुन: चुने क मोट पत बछाई जाकर उसे म ी क मोट पत से ढक दया जाता है, ता क जंगल जानवर उसे खोद न सक । 8.12 रोग से बचाव 1. स पूण बाओ- स यू रट (जै वक सुर ा) के नयम का पालन कर । 2. जंगल प ी / जल य प य को घरेलू तथा यावसा यक लॉक के स पक म नह ं आने दे 3. रकवड व वे सीनेटेड प य को अ य प य से अलग रख । 4. रोग क रोकथाम हेतु व र टाईन/ प य का लाटर वै ा नक र त से न तारण तथा फाम पर सफाई बाबत पूण सतकता बरते । 5. आऊट ेक वाले े से प ी व उनके उ पाद े म ब कु ल नह ं आने चा हए । साथ ह उन े से आने वाले दाने/ दवाई आ द के वाहन का भी फाम पर वेश नषेध होना चा हए। 6. हाई र क के े से रोग हेतु सघन स वले स तथा अ य यवसा यक लॉक से भी नय मत स वले स कया जाना आव यक है । 7. फाम पर को क वर अथात् सुअर, डक, टक , गाय आ द एक साथ नह ं पाले जाने चा हए। 8. फाम पर डसइंफे टड़ व े का योग कया जाना चा हए । 8.13 चकन व अ डे का सुर त मानव उपयोग 1. भारत म को क चर नह ं देखने को मलते तथा पो प य को व श ट प से अलग ह पाला जाता है, िजससे रोग फै लने क संभावना कम हो जाती है । 2. चकन प ी क अपे ा HPAI के अ य जा तय जैसे ग स, गूज, ब तख म होने क संभावना अ धक होती है । 3. य द रोग का वायरस हो तो भी वह अ धकांशतया आहार नाल एवं अ य ाव म ह पाया जाता है । 4. तेज गम के समय वातावरण म रोग का वायरस िज दा नह ं रह पाता है । 5. अ डे/ गो त को अ छ तरह से पका कर उपयोग करने (70o C अथवा अ धक तापमान) से रोग का वायरस मर जाता है एवं यह रोग ाय: गो त/ अ डा खाने से नह ं फै लता। 6. रोग का मानव से मानव म सार अभी तक नह ं देखा गया है ।
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    100 अत: पूण सावधानीरखी जाए तो चकन व अ डे का उपयोग कया जा सकता है । 8.14 सारांश ए वयन इं लूऐंजा एक वषाणुज नत जुनो टक रोग है, िजसके कारण मु गय म व भ न कार के ल ण कट होते है । इस रोग का सारण प य म य अथवा अ य प से हो सकता है । रोगी प ी के सीधा स पक म आने से एवं सं मत मु गय के अ ड एवं मांस से यह रोग व थ मुग एवं मनु य म फै ल सकता है । इस रोग का वायरस सं मत प य क बीट, यूकस अथवा ाव वारा हवा के मा यम से स पक म आये व थ प ी अथवा मनु य म फै ल सकता है । अ छ तरह से पके हु ए पो मीट व पके हु ए अ ड को खाने से यह रोग नह ं फै लता है । रोग से सत प ी व भ न कार के ल ण द शत कर सकते है अथवा बगैर कोई ल ण द शत करे ह उनक मृ यु हो सकती है । खाँसी उठने के साथ-साथ आँख म पानी आना, चेहरे और सर म सूजन होना, वास म धुर-धुर क आवाज आना, पंख झड़ना और पंख र हत थान पर नीला पड़ना अथवा खून नकलना, प य म पतले द त होना सामा य ह साथ ह प य म च कर खाकर गरना, छ ंक आना आ द ल ण देखे जा सकते है । मनु य म रोग से सरदद, बुखार, बोडीएक (शर र टुटना) तथा कं ज ट वाई टस वसन म तकल फ आ द ल ण प रल त होते है । रोग क पहचान हेतु व भ न तकनीक SGPT,HI,NI,ELISA तथा मोल यूलर डाय नो सस आ द काम म ल जाती है । रोग से बचाव के लये ट काकरण एवं क लंग के साथ ह जै वक सुर ा के तर के अपनाये जाने ज र है । हमारे देश म रोग के दो आऊट ेक महारा एवं गुजरात म रपोट कये जा चुके है । अत: इस बाबत अ धक सतकता बरतने क आव यकता है ।
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    102 इकाई : कुकु ट पालन म ट काकरण क मह ता एवं व भ कार के ट काकरण के दौरान मु गय का रखरखाव इकाई - 9 9.0 उ े य 9.1 तावना 9.2 रोग से सुर ा 9.2.1 ाकृ तक इ यु नट 9.2.2 ए वायड इ यु नट 9.2.3 पे सव इ यु नट 9.3 हे ड लंग वे सीन 9.4 वे सीनेशन क व भ न व धयाँ 9.4.1 इं ानेजल 9.4.2 इं ा ऑ यूलर 9.4.3 े मेथड 9.4.4 वंग वेब पं चर 9.4.5 इंजे शन वारा 9.5 व भ न कु कु ट रोग क वे सीन 9.5.1 मरे स रोग वे सीन 9.5.2 रानी खेत रोग वे सीन 9.5.3 फाऊल पो स वे सीन 9.5.4 इंफे ि शयस काइ टस वे सीन 9.5.5 ले रंिजयो ेकाइ टस वे सीन 9.5.6 ए वयन एंसेफे लोमालाई टस वे सीन 9.5.7 ग बोरो रोग वे सीन 9.5.8 ए वयन इं लूऐंजा 9.6 कु कु ट ट काकरण सारणी 9.7 अ भावी ट काकरण कारण एवं नवारण 9.7.1 वे सीन संबंधी कारक 9.7.2 ट काकरण संबंधी कारक 9.7.3 पे सव इ यु नट
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    103 9.7.4 शीतलन संबंधीकारक 9.7.5 इ यूनो कॉ पीटे स 9.7.6 आहार संबंधी कारक 9.8 वे सीनेशन के दौरान प य का रखरखाव एवं अ भावी ट काकरण से बचाव 9.9 कु कु ट ट का काड 9.10 सारांश 9.0 उ े य व थ कु कु ट पालन हेतु उपयोगी ट काकरण क जानकार एवं मह व पर काश डालना ह इस इकाई का उ े य है, ता क पाले जाने वाले कु कु ट को आरामदायक सुर त व रोग मु त वातावरण उपल ध हो सके । 9.1 तावना अ धकांश रा य म पशुपालन वभाग म अपनी वयं क जै वक उ पाद इकाईयाँ ह, जो माँग के अनुसार आव यक जै वक उ पाद का नमाण करती है । इसके अ त र त यावसा यक तर पर इस कार के उ पाद का नमाण IVRI, इ जतनगर, बफ (पूने), बाईओ ड गािजयाबाद आ द सं थान भी करते है । सं ामक रोग के सार से कु कु ट यवसाय म यापक हा न हु ई, िजसका प रणाम यह रहा क इसको यापा रक प देना मुि कल हो गया । कई बार बहु त कम समय म स पूण मुग समूह काल के च म समा कर समा त हो गया । इस कार क क ठनाई से मुि त का सरल उपाय उ चत समय पर ट काकरण ह है । प य म एक बार रोग आने के बाद उपचार करना मँहगा तो पड़ता ह है, इसके अ त र त व भ न वाइरल या वषाणुज नत रोग का कोई उपचार भी नह ं होता है । पूणत: उपचार करने के बाद रोगमु त हु ई मुग अपने उ चतम उ पादन तर तक नह ं पहु ँच सकती है । अत: कु कु ट पालन म ट काकरण का मह वपूण थान है । अनेक रा य म के य तर पर वे सीन उ पादन ारंभ कए जाने से इस यवसाय म काफ ि थरता आई है । 9.2 रोग से सुर ा व भ न कार क ऐ ट जन/ ए ट बॉडी से जानवर म रोग तरोधकता उ प न हो जाती है, जो न न कार क होती है । 9.2.1 ाकृ तक इ मु नट वह तरोधकता, जो क ाणी म वत: एवं ाकृ तक प से ह व यमान रहती है । इसे कसी भी जीवाणु, वषाणु या अ य सं मण के स पक म आने के उपरा त ा त नह ं कया जा सकता है ।
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    104 9.2.2 ए वायडइ मु नट यह शर र म उ प न वह तरोधकता है, जो क पेथोजन या सं मण के सीधा स पक म आने के प चात्सं मण एवं शर र म उपि थत ए ट बॉडी के म य उ प न याओं के फल व प पैदा होती है । यहाँ ए ट बॉडी वह वपर त पदाथ है, जो क शर र म कसी भी बा य पदाथ, िज ह ए ट जन कहा जाता है अथवा सं मण के सीधा स पक म आने के प चात शर र वारा वयं ह उ प न कया जाता है, यह पदाथ या ए ट वॉडीज येक वशेष सं मण के लए वशेष होती है । ट काकरण के फल व प उ प न तरोधकता एि टव ईमु नट के प म तपा दत होती है । यह वह रोग तरोधकता है, जो क वयं के वारा सं मण के सीधे तौर पर भावशाल प म स पक के फल व प उ प न हु ई है । यह सं मण का अ भ ाय: जीवाणु/ वषाणु या सू मजी वय से है, जब ये सू मजीवाणु या इनके उ पाद (टॉि सन) सीधा शर र के स पक म आते है, तो ि ल नकल या सब ि ल नकल रोग या भाव उ प न होता है । यह तरोधकता धीरे-धीरे पैदा होती है तथा कु छ, फर कु छ स ताह और बाद म वष तक कायम रह सकती है । सू म जीवाणु क बीमार पैदा करने क मता या न Virulence को कम करके (Inactive) ख म करके (Killed) या कमजोर करके (Attenuation) जब इनका इ जे शन लगाया जाता है, या न ट काकरण (Vaccination) कया जाता है तो Active Immunity Acquired क जाती है । जैसे Small Pox का ट काकरण, पो लयो का ट का या गलाघ टू का ट काकरण। 9.2.3 पे सव इ मु नट इसका अ भ ाय उस Immunity या तरोधक मता से है, जो शर र वारा णक प से (Temporary) सू म जीवाणुओं के त उ प न ए ट वॉडीज वारा शर र म वेश कराये जाने के फल व प उ प न क जाती है । इसका भाव अ प समय के लए ह होता है । या न कु छ स ताह, यह तरोधकता सं मण के भाव को कम करने या न ट करने के लए सीरम या लोवु लन के योग से उ प न क जाती सकती है । इसका भाव ए ट टाि सन के योग कये जाने के फल व प जैसे टटनस, ए ट टाि सन गामा लोवु लन आ द टॉि सन क नि यता के लये कया जाता है । यह माँ के वारा शशु म तरोधकता थाना तरण से भी ा त होती है, िजसम मी के थम दूध या न काले म के वारा ए ट बॉडी ांसफर (Acquired) होने के कारण शशु म ज म के कु छ माह प चात तक (4-6 माह) रह सकती है । 9.3 हे ड लंग वे सीन ाय: सभी वै सी स को बफ म या “रे जरेटर” म रखना चा हये व एक थान से दूसरे थान पर लाने ले जाने के लए भी बफ का योग करना चा हये । वै सीन को ा त करने के थान से ात कर लेना चा हये क ए यूल म कतने प य क औष ध है । वै सीन का घोल
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    105 कस म औरकस अनुपात म तैयार करना है, यह भी ात करना आव यक है । डि ट ड वाटर जो योग म लाये जाय, वह मा णत होना चा हए । वे सीन को उपयोग म लाते समय भी बफ म या ठ डे पानी म रखा जाना चा हए । वै सीन के घोल को लगभग 1-2 घ टे म ह उपयोग कर लया जावे । शेष बचे हु ए घोल को न ट कर देना चा हए । 9.4 वे सीनेशन क व भ न व धयाँ व भ न कार क वे सी स को लगाने के लए अलग-अलग तर के उपयोग म लये जाते है । 9.4.1 इं ानेसल ट इस व ध म डाइ यूवट म मलाने के प चात प ी के नासा छ म 1-2 बूँद वे सीन डाल देते है । इस व ध से वसन तं से संबं धत रोग का वे सीन भल कार कया जा सकता है । जैसे यूके सल डसीज (आर.डी) Fstrain वे सीन, इंफे ि शयस काइ टस 9.4.2 इं ा ऑ यूलर ट इस व ध म रकां ट यूटेड वे सीन क एक-दो बूँद आँख म डाल जाती है व प ी म रोग तरोधकता उ प न हो जाती है । इस व ध से रानीखेत, इंफे ि शयस ोकाइ टस, ग बोरो आ द रोग का वे सीन कया जाता है। 9.4.3 े मेथड इस व ध को छोटे च स म उपयोग कया जाता है । इसम रका ट यूटेड वे सीन का े कर दया जाता है, िजससे प ी क आँख अथवा नाक म ये छोट बूँदे चल जाती है । 9.4.4 वंग वेब पं चर इस हेतु वशेष कार क दो सुई, जो काक म लगी होती है, काम म ल जाती है, िजसे वे सीन के घोल म डुबा कर पँख क अंद नी सतह पर चुभा दया जाता है । यह व ध फाऊल पॉ स नामक ट काकरण म उपयोगी है । 9.4.5 इंजे टेबल मेथड इसम वे सीन क उ चत खुराक इंजे शन वारा प ी के शर र म पहु ँचायी जाती है । (i) सब यूटेनीयस ट :- यह इंजेकशन वचा को उठाकर उसके नीचे लगाया जाता है। इस व ध से मरे स R2B आ द ट के लगाये जाते है । (ii) इं ाम कू लर ट :- यह माँसपेशी म लगाया जाता है । इस र त से ग बोरो (बू टर), R2B आ द वे सीन लगाये जाते है ।
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    106 9.5 व भन कु कु ट रोग क वे सीन कु कु ट रोग म वे सीनेशन का व श ट थान है एवं इस दशा म नत-नये योग खोजे हो रह ह । अ डे म ह वे सीन लगाना रसच का नया पहलू है । इस तकनीक म ूण वकास के दौरान इन यूबेशन के 17 व अथवा 18 व दवस पर अ डे म ह वे सीन लगा द जाती है । इससे जीरो दवस / थम दवस पर लगाये जाने वाले वे सीन (मरे स रोग) क आव यकता नह ं रहती । यवसा यक ि ट से पाले जाने वाले प य म व भ न ट के नि चत समय पर लगने आव यक है, जो न न कार है :- 9.5.1 मरे स रोग वे सीन वगत वष म इस बीमार ने व व म बहु त हा न पहु ँचाई है । गत कु छ वष से हमारे देश म भी इस बीमार ने उ प धारण कर रखा है तथा कई ा त म इस रोग से अ य धक हा न हु ई है । इस वै सीन के कारण मु गय म मृ यु सं या म बहु त कमी हु ई है । इस वै सीन के वारा अ डा उ पादन तथा मुग वा य म भी सुधार हु आ है । प हले ऐसा समझा जाता था क इस बीमार क ती ता कॉ सी डयो सस बीमार का मुग घर म होने पर नभर है, पर तु अब यह स हो गया है क बहु धा मे र स रोग के कारण कॉ सी डयो सस बीमार अ धक उ प लेती है । मेरे स रोग वारा व व भर म कु कु ट पालन म वगत वष म ग तरोध आया है । इस रोग से बचाव हेतु जो वै सीन योग म लाया जाता है, उसका उपयोग य द सह कार से न कया जाये तो लाभ क बजाय हा न हो सकती है । मैरक ट काकरण म कु छ सावधा नयाँ आव यक है, जो न न है:- (i) वै सीन रखने के “क टेनर” म नाइ ोजन का तर नधा रत अंक से नीचे नह ं जाना चा हये । (ii) नाइ ोजन उपयोग करते समय हाथ के द ताने पहनने अ नवाय ह, साथ ह आँख को भी बचाना चा हए। (iii) वै सीन के ए पूल को नाइ ोजन क टेनर म से शी नकाल ता क वै सीन योग म आने से पूव खराब न हो जाये, य द 'थोड’ (Thawed) नजर आती हो तो योग म न लाय । वै सीन संबंधी हदायत को अ छ कार पढ़े तथा उसी कार काय कर । (iv) िजतने वै सीन क आव यकता हो, उतने ह क टेनर म से नकाले । (v) क टेनर म से वै सीन नकाल कर उसे पघलाने के बाद ह सील तोड़े । वै सीन तथा डायलुऐ ट को त काल ह मलाये तथा स रंज भी तैयार रख । (vi) स रंज क (Syringe) क सुई (Needle) टारलाइज कर योग म लाय । स रंज, सुई तथा अ य साधन को रसाय नक य से साफ न कर ।
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    107 (vii) एक बारवै सीन बनाने के बाद जब तक स पूण वै सीन काम म नह ं आ जाये, तब तक वै सीन का उपयोग करते रह । (viii) बनी हु ई वै सीन को हलाते रह । य द सुई को सह कार से नह ं लगाया जाए तो उस थान पर थायी ज़ म होने का भय रहता है । (ix) बने हु ए वै सीन को जर म रखकर पुन: योग म नह ं लाये । (x) बचे हु ए वै सीन को अ छ कार ' ड पोज'' करने क कायवाह कर । आजकल देश म जो वै सीन ा त हो रह है, उसम नाइ ोजन के क टेनर क आव यकता नह ं होती है । इस वै सीन को आयु के थम दन गदन पर सव यूटे नयस अथवा माँसपेशी म लगाया जाता है । 0.2 म.ल . क खुराक त चूजा पया त होती है । इसे 2.8o C पर रखा जाता है । बाजार म यह 500 खुराक क पै कं ग म उपल ध है । 5 वष के बाद इसको दुबारा लगाया जाना चा हए । 9.5.2 रानी खेत रोग वे सीन यह मु गय का भयंकर छू त का रोग है तथा इससे बचाव हेतु दो कार के वै सीन योग म लाये जाते ह । (i) आर.डी.एफ. ेन (R.D.F.Strain or F.I) अंड से चूजे ा त होने से पूव यह वै सीन उपल ध होना चा हये। इस वै सीन का “ भाव” या प ी म रोग से मुकाबला करने क शि त (इ मु नट -Immunity) 10 स ताह तक रहती है तथा 48 घ टे बाद इसका भाव शु हो जाता है । एक ए यूल (Ampoule) िजसम 100 खुराक होती ह, उसे 15 एम.एल. नामल सेलाइन (Normal Saline) म अ छ कार मलाकर ापर वारा एक-एक बूँद चूजे (एक दन क उ के ) क नाक या आंख म डाल द । कभी-कभी एक बूंद आँख म और एक बूँद नाक म भी डाल जा सकती है । आजकल इस वै सीन के घोल का े ( छड़काव) भी कया जाता है । ये चूज के इ यूवेटर से नकलते ह कया जा सकता है । (ii) रानीखेत वै सीन -(R.D.M.) यह वै सीन बफ अथवा रे जरेटर म रखनी चा हये । चूज म 6 से 8 स ताह क उ म रानीखेत रोग से बचाव हेतु यह वतीय ट का लगा देना आव यक होता है । वै सीन घोल बनाने हेतु ए यूल तोड़कर पाउडर को 2-एम.एल. नॉमल सेलाइन एक याल म लेकर उसम मलाया जाता है तथा फर ठंडा डि ट ड वाटर 98 एम.एल. डालकर अ छ कार मला कर वै सीन का घोल तैयार कर लया जाता है । इसे थमस म रखना चा हये । इस घोल का 1 सीसी भाग त प ी वचा के नीचे -सव यूटे नयस र त से लगाया जाता है । वै सीन इं ाम कू लर र त से भी योग म लायी जा सकती है । इस वै सीन के बाद मुग म आजीवन “इ मु नट ” (Immunity) आ जाती है । इस रोग के वै सीन लगाने हेतु न न बात का यान रखना चा हए । (1) रानीखेत तथा अ य ट का एक साथ नह ं लगाना चा हए । (2) स ताह क उ से कम के प य म ट का न लगाय ।
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    108 (3) जहाँ तकसंभव हो, मई/ जून म वै सीनेशन न कर- य द नता त आव यक हो तो के वल रा अथवा ातःकाल म ह यह काय कर । (4) के वल व थ ब च के ह ट का लगाय, िजसम कोई रोग क आशंका हो (कोराइजा, कॉ सी डयो सस व स आ द) उन ब च म ट का न लगाये । (5) ब च के ट का लगने के 1-3 दन पूव तथा 7 दन बाद तक “ए ट बायो ट स” (Antibiotics) एवं वटा म स का योग लाभ द रहता है । कु छ ब चे वै सीन लगने के बाद लंगड़े हो जाते ह । इ ह अलग कर वटा मन “बी” आहार/पानी म 5-7 दन तक दया जाना चा हए । (6) वै सीन के घोल को बफ म ह रखना चा हए । दो घ टे क अव ध के बाद बचा हु आ वै सीन काम म नह ं लाना चा हए। खाल ए यूल गाड़ दए जाने चा हए । (7) स रंज, सुई, याल आ द सब साफ तथा क टाणु र हत होने चा हए । आज कल िजन े म रानीखेत रोग फै ल जाता है, वहाँ 16 स ताह क आयु पर पुन: आर.डी. एम. वै सीन लगाया जाता है- इसे “र आर.डी. एम” करना कहते ह। 9.5.3 फाऊल पो स वे सीन वै सीन तैयार कर उसे दो सुई (जो काक म लगी रहती है) वारा पंख के अ द नी भाग म, िजसे “ वंग वैब' (Wing Web) कहते ह, लगाया जाता है । आर.डी वै सीन के कम से कम 15 दन बाद यह ट का लगाया जाना चा हये । य द ट का सह लगा होगा तो 7-10 दन बाद ट के के थान पर लाल या भूरे रंग क सूजन तीत होगी । यह सूजन 10-15 दन म ठ क हो जाती है तथा यह न चय कया जा सकता है क रोग तका रता-इ यू नट (Immunity) पैदा हो चुक है । आव यकता पड़ने पर 4-5 माह क उ पर यह ट का पुन: भी लगाया जा सकता है । वै सीन के पाउडर को ‘ टेराइल’ (Sterile) खरल म 5 सीसी ि लसर न सैलाइन घोल के साथ मलाये तथा अ छ कार घोल बनाने के बाद बफ म रख तथा इसे 3 घ टे तक ह योग म लाय । यह ट का “सुई” वारा भी लगाया जा सकता है । बहु धा दो सुई या न तर का ह योग कया जाता है । रोग तका रता का भाव 18 माह तक रहता है । रानीखेत वै सीनेशन व ध म बतायी गयी सावधा नयाँ योग म लाय । यह एक ल वंग वे सीन है, जो 200 एवं 500 खुराक क पै कं ग म उपल ध है । FowlPxBMStrian- इस वे सीन का उपयोग रोग के आऊट ेक म भी कया जा सकता है । यह ट का 0.2ml. s/c अथवा इं ाम कू लर भी लगाया जा सकता है । थम ट का 3-6 स ताह एवं दूसरा ट का 16-18 स ताह क उस पर लगाया जाता है । इसे 4o C पर रखा जाना चा हए ।
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    109 9.5.4 इंफे िशयस ोकाइ टस वे सीन इस रोग का ट का रानीखेत वे सीन के 10-15 दन पूव अथवा बाद म लगाये जाते है । ये ट के प य के पीने के पानी म अथवा नासा छ म दो बूँद डालकर लगाये जाते है । ये 100 एवं 500 खुराक वाल पै कं ग म उपल ध होते है । इसको बनाने म रोग का मासाचुसे स भेद उपयोग म लया जाता है । 9.5.5 ले रंिजयो ेकाइ टस वे सीन कु कु ट म ए वयन ले रगो ेकाइ टस रोग से बचाव हेतु यह वै सीन लगाया जाता है । यह रोग भारत म नह ं पाया जाता है । यह एक वाइरल या वषाणुज नत रोग है, िजसका कोई भावी उपचार नह ं होता है । रोग से बचाव के ट के उपल ध है, िज ह थम बार आठ स ताह क उ पर वे ट ॉप मेथड से एवं वतीय बार अ ारह स ताह क उ पर आँख म एक बूँद डालकर कया जाता है । इस वै सीन क खुराक वे ट म दो बूँद व आँख म एक बूँद होती है । रोग क वै सीन रे जरेटर म 4o C पर रखी जा सकती है । यह 100 एवं 500 खुराक म उपल ध है । 9.5.6 ए वयन एंसेफे लोमाइलाई टस वे सीन यह ट का प य म ए वयन एंसेफे लोमाइलाई टस रोग के त तरोधकता उ प न करता है । ट काकरण पीने के पानी म वै सीन डालकर कया जाता है । वै सीन का टोरेज रे जरेटर म 4 o C पर कया जाता है । पै कं ग 100 एवं 500 खुराक म उपल ध है । यह रोग भी भारत म ाय: कम देखने को मलता है । 9.5.7 ग बोरो रोग वे सीन बाजार म यह वे सीन उपल ध है । इसे दो बूँद मुँह अथवा पीने के पानी म डालकर उपयोग कया जाता है । इसे 4 o C पर रखा जाता है एवं यह 100 तथा 500 खुराक के पेक म उपल ध है । 9.5.8 ए वयन इं लूऐंजा यह नि य कार क वे सीन है, जो प य म एि टव तरोधकता देती है । स ल रजव ऑफ वे सीन ऑफ GOI के वारा भारत म दो कार क वे सीन संधा रत क गई है, िजनके ए ट जे नक ेन H5-N2 एवं H7N1है । इस वे सीन का ट का सब यूटे नयसल अथवा माँसपे शय म लगाया जाता है । इसके दो ट के लगाये जाते ह । पहला ट का 8-10 दवस क उस तथा दूसरा ट का 6-10 स ताह क आयु पर लगाया जाता है । छ: स ताह क आयु तक ट के क खुराक 0.25 म.ल . तथा उसके बाद 0.5 म.ल . होती है । ट काकरण का उ पादन पर वपर त भाव पड़ता है । इसका भ डार 2-8 o C ताप म पर कया जाता है । ये ट के बाजार म उपल ध नह ं है । के वल रा य सरकार क माँग पर के सरकार वारा पू त कए जाने हेतु स ल रजव म भ डा रत
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    110 कये गये है। OIE(Office of International Epizooties) के वारा सफ घनी कु कु ट आबाद वाले े म ह इसे अ त आव यक होने पर योग करने क सलाह द गई है । 9.6 कु कु ट ट काकरण सारणी सारणी 9.6 (प ी क आयु) Disease Days Weeks 0 4-7 14-21 4 6 8 10 14 15 16 20 Marek’s Disease  2 ml S/C in neck Ranikhet Disease ® F1 I/Nasal One drop in each *Lasota in DW *R2B 0.5 ml I/m (Killed vacc.) *R2B Booster 0.5 ml I/m IBD (Gumboro) Disease One drop in each eye I/ Occular Or in D/W 0.5 ml. I/muscular Fowl Pox Vaccination Wing web method Repeat by D/W Infectious Bronchitis (IB) ®One drop in each eye ®One Drop Each Eye I/occular 9.7 अ भावी ट काकरण कारण एवं नवारण कु कु ट पालन का मूल उ े य अ डा/ गो त व आ थक लाभ को ा त करना है । कु कु ट पालन क स पूण यव था अ छे उ पादन एवं रोग के सार वारा होने वाल मृ यु दर व हा न
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    111 को कम करनाहै । यह के वल अ छे मेनेजमे ट एवं रोगमु त वातावरण वारा ह हो सकती है । रोग से मुि त उपचार एवं रोकथाम वारा ह संभव है । रोग क रोकथाम का सव तम उपाय ट काकरण ह है । व श ट रोग के लए व श ट वे सीन (ट के ) लगाये जाते है, जो संबं धत रोग के व रोग तरोधकता उ प न कर देता है एवं प ी को रोग से सुर ा देता है। वगत वष के दौरान ये अनुभव कया गया क ट काकरण के बाद भी रोग कट हु ए है । इस कार से ट काकरण अ भावी होने के व भ न कारण हो सकते ह, िजनम न न मुख है:- 9.7.1 वे सीन संबंधी कारक (i) कई बार अ ानता वश कु कु ट पालक ए सपायर (खराब) वे सीन का योग कर लेते है, िजससे आव यक रोग तरोधकता उ प न नह ं हो पाती है । अत: ए सपायर दनांक क वे सीन योग न कर । (ii) व भ न वषाणु ज नत वे सीन म ाय: अलग-अलग भेद के ट के उपल ध होते है । अत: रोग उ प न करने वाले ेन क वे सीन से ह ट काकरण भावी होता है । अ य ेन के ट के ाय: अ भावी ह रहते है । (iii) वे सीन के साथ आये तनुकारक (डाइ यूवट) को ह योग करना चा हए अ यथा वे सीन के अ भावी होने का खतरा बना रहता है । 9.7.2 ट काकरण संबंधी कारक (i) येक वे सीन के लगाने का तर का एवं खुराक नि चत होती है, िजसम बदलाव करना अनु चत होता है। (ii) ट काकरण हेतु टेराइल (क टाणुर हत) स रंज नीडल आ द योग करना आव यक है अ यथा वे सीन क मता भा वत होती है । (iii) प ी सं या के हसाब से वे सीन खुराक क गणना सह करनी चा हए, ता क ट क क कम या अ धक खुराक नह ं द जाव । (iv) अ व छ/ कं टा मनेटेड डाई यूटर यु त कये जाने से वे सीन क मता पर वपर त भाव पड़ता है । (v) वे सीनेशन हेतु नल का व छ जल भी य द योग कर लया जाता है, तो उसम घुल हु ई लोर न वे सीन को अ भावी कर देती है । (vi) िजन वे सीन म बू टर ट क क आव यकता होती है । उनसे ल बे समय तक रोक तरोधकता ा त करने के लये बू टर ट के लगाये जाने आव यक होते है ।
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    112 9.7.3 पे सवइ मु नट कई रोग से लड़ने के लए चूज को मुग से मैटरनल ए ट बॉ डज ा त होते है, जो क ारं भक अव था म व भ न बीमा रय से चूज क र ा करते है । ये पे सव इ मु नट कहलाती है । य द चूज म कसी व श ट रोग के व पे सव इ मु नट मौजूद है एवं उस रोग का ट काकरण कया जाता ह, तो ाय: यह अ भावी हो जाता है । 9.7.4 शीतलन संबंधी कारक (i) सभी लाईव वे सीन का संधारण आव यक प से 4o C तापमान पर कया जाना आव यक है । (ii) वे सीन का प रवहन आईस बॉ स म बफ रख कर कया जाना आव यक है । (iii) वे सीन के तनुकरण से पूव तनुकारक को नि चत ताप पर ठ डा करना तथा तनुकृ त वे सीन को भी बफ म रखना ज र होता है । साथ ह इस बात का यान रखा जाना चा हए क वे सीनेशन पूण होने तक बफ क पया त मा ा बनी रहनी चा हए । (iv) जब वे सीन पीने के पानी म द जानी हो तो इस बात का यान रख क पानी पया त ठ डा हो ता क वे सीन का भाव ख म नह ं हो । 9.7.5 इ यूनो कॉ पीटे स संबंधी कारक इ यूनोकॉ पीटे स वे सीन अथवा ए ट जन के त शर र वारा त या दशाने क कायकार जै वक मता को कहते है । यह प य म पहले से मौजूद रोग तरोधकता पर नभर करता है । इ यूनोकॉ पीटे स पोषण, रोग क ि थ त एवं अ छे मेनेजमे ट से भा वत होता है । आव यक एमीनो अ ल, मनरल एवं वटा म स क कमी प य के इ यूनोकॉ पीटे स को कम करते है । तकू ल वातावरण उदाहरण अ य धक गम , सद व तेज वषा अथवा कोई अ य कार का ेस जैसे कृ म रोग (IBD,RD,MD) आ द से रोग तरोधकता गर जाती है तथा लगाया गया वे सीन अ भावी हो जाता है । 9.7.6 आहार संबंधी कारक प य को खाने के लए दया जाने वाला दाना भी प ी क जै वक याओं एवं रोग तरोधकता को भा वत करता है । दाने म माइकोटॉि सन क मौजूदगी : य द दाने म सीलन या अ य कारण से फं गस आ जाती हो, जैसे - मूँगफल क खल म ए परिजलस. ले स का उगना ाय: रोग का कारण बनता है । इस फं गस से दाने म ऑफलोटॉि सन एवं इसी कार से अ य फं गस जा तय से ऑफलोटॉि सन उ प न होता है । इस कार के माइकोटॉि सन य द Lower Permissible Limit म भी है। तो ये टॉि सन वे सीन को भा वत करते ह एवं वां छत तरोधकता उ प न नह ं होने देते ।
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    113 दाने म पेट साई स (क ड़े मारने क दबा) के अवशेष होना : फसल पर योग कये जाने वाले व भ न पे ट साई स य द पूणतया अपघ टत नह ं होते है, तो दान पर इनके अवशेष शेष रह जाते है, जो क अ भावी वे सीन एवं रोग के आऊट ेक का कारण भी सा बत हो सकते ह । भार धातु से दू षत आहार : भार धातु त व जैसे पारा, लेड, ताँबा आ द कई बार व भ न औष धय जैसे (फं गीसाईड, हरबीसाईड), खाद, के मकल, चूहे मारने क दवा, रंग, ऑटोमोबाईल के धुऐं आ द के वारा दाने को दू षत कर देते है । इस कार के दाने का योग वे सीनेशन के दौरान करने से बनने वाल इ मून को शकाऐं न ट हो जाती है एवं रोग तरोधकता कम होती है । 9.8 वे सीनेशन के दौरान प य का रखरखाव एवं अ भावी ट काकरण से बचाव अ भावी ट काकरण से बचाव हेतु न न सावधा नयाँ रखी जानी आव यक ह - (i) वे सीन का य सदैव ति ठत ोत से ह करना चा हए एवं य करने से पूव ह सु नि चत कर लेना चा हए क वहाँ पर वे सीन को सुर ापूवक रखे जाने (शीतलन) क पूण यव था है । य करने से पूव वायरल पर ए सपायर त थ का भल कार नर ण करना चा हये । ल बी ए सपायर त थ वाल वे सीन ह य करनी चा हए । (ii) वे सीन का सूय के काश एवं उ मा से पूण बचाव आव यक होता है । अत: प रवहन के लए ऑइक बॉ स अथवा थमस ला क का उपयोग करना चा हए । लाईव वे सीन के प रवहन म शीतलन का वशेष यान रखना चा हए । (iii) उ पादक के दये नदशानुसार वे सीन का भ डार उ चत ताप पर कया जाना चा हए । ाय: वे सीन व डाइ यूवट (तनुकारक) अलग-अलग ताप म पर भ डा रत कये जाते है । (iv) के वल व थ प य का वे सीनेशन श यूल के अनुसार ट काकरण कया जाना चा हए । बीमार प य के ठ क होने के बाद ट काकरण अव य कर । ऐसे ह नह ं छोड़े, अ यथा ये प ी रोग त हो सकते ह। (v) प य को आहार म फं गस एवं भार धातु त व , पे ट साई स आ द से मु त दाना मलना चा हए । इस हेतु समय-समय पर प ी आहार क योगशाला म जाँच करवा लेनी चा हए । (vi) य द वे सीनेशन पीने के पानी वारा कया जाना हो तो प य का इसके 2 घ टे पूव पानी नह ं दया जाना चा हये एवं उपयोग म आने वाले पानी क मा ा को सावधानीपूवक नि चत करना चा हए । (vii) वे सीनेशन के लये योग आने वाला पानी लोर न मु त होना चा हए । इस हेतु है डप प का पानी योग कर । य द नल का पानी योग लेना हो तो उपयोग से 10-12 घट पूव इसे खुला छोड़ दे, ता क म त लोर न नकल जाये । सूय के काश एवं उ मा का ट क पर वपर त भाव पडता है । अत: योग कये जाने वाला पानी भी सूय के
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    114 काश म खुलानह ं छोड़ा जाना चा हये । ल चंग पाऊडर के भाव को समा त करने के लए क म म क का योग कया जाना चा हये । इस हेतु 40Liter पानी म 100gm Skim Milk मला देना उ चत होता है । (viii) ट काकरण का काय दन के ठ डे भाग (सुबह व शाम) को ह करना ेय कर रहता है । इससे वातावरण के ेस से बचा जा सकता है | (ix) य द आव यक हो तो ट काकरण के एक स ताह पूव प य को क ड़े मारने क दवा दे दे । (x) प य म इ मुनोकॉ पीटे स को बढ़ावा देने के लए कु छ इ मुनोमो यूलेटरस उपयोग कये जाते है । जैसे वटामीन A,D3,E,L एवं कु छ हबल औष धयाँ लवर टॉ नक आ द रोग तरोधकता को बढ़ाने म सहायक होते है । (xi) ट काकरण के दौरान प य को आरामदायक ि थ त म रखते हु ए कसी भी कार के ेस से बचाना अ त आव यक है । य द ट काकरण के पूव ट काकरण के समय एवं प चात पूण सावधा नयाँ रखी जाये तो ट काकरण के अ भावी होने क संभावना लगभग नह ं होती है । 9.9 कु कु ट ट का काड ट काकरण म समय अव ध का वशेष यान रखा जाना चा हये । ता वत ट के नय मत आयु पर लगने आव यक है । याददा त हेतु न न कार का काड बनाकर उसे उपयोग करना चा हए सारणी : 9.9 कु कु ट ट का काड . सं. रोग ट का ट काकरण हु आ/नह ं य द हां तो ट काकरण क त थ य द नह ं, तो ता वत दनांक बू टर डोज क त थ 1 मरे स रोग हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........ 2 आर.डी. F1 हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........ 3 आई.बी.डी. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........ 4 आर.डी.एम. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........ 5 फाऊल पॉ स हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........ 6 पुना आर.डी. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........ 7 आई बी. हाँ/नह ं त थ...... होने क त थ........
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    115 9.10 सारांश कु कुटशाला ार भ करने के पीछे मुग पालक का उ े य यवसाय तथा आ थक लाभ को बढ़ाना होता है । सफल कु कु ट पालन के लए अ त आव यक है क अ छे थान से बेहतर न ल के अ धक उ पादन देने वाले चूजे य कये जाये एवं उ ह रोगमु त वातावरण म पाला जाये । मु गय क व भ न बीमा रयाँ (वायरल/ बै ट रयल) कसी भी समूह म य द एक बार भी आ जाये तो व थ होने के बाद भी उ ह उ चतम उ पादन तर पर पहु ँचने म बाधा उ प न करती है | जीवाणु ज नत रोग का उपचार संभव होता है, क तु व भ न वषाणुज नत भयानक रोग, जो महामार का प ले लेते है, जैसे- मरे स रोग, ग बोरो रोग, रानीखेत रोग आ द ऐसे रोग है, िजनका कोई उपचार संभव नह ं होता है एवं पूरे के पूरे कु कु ट समूह या तो ख म हो जाते है । य द जी वत भी रहे तो उ पादन क ि ट से बेकार होते है एवं इनको पालने का कोई योजन नह ं रहता । अत: आव यक है क ट काकरण वारा रोग से बचाव कया जाए । उ पादन मता का स पूण दोहन करने के लए पाले जाने वाले कु कु ट म ट काकरण, उ चत आहार एवं उ तम बंधन यव था अ त आव यक है ।
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    116 इकाई : कुकु ट शव पर ण एवं रोग नदान क उपयो गता कु कु ट रोग म पैथो नोमो नक ल जन इकाई -10 10.0 उ े य 10.1 तावना 10.2 शव पर ण एवं रोग नदान 10.2.1 शव पर ण का समय 10.2.2 शव पर ण से पूव जानकार एवं सावधा नयाँ 10.2.3 शव पर ण क तैयार व व ध 10.2.4 शव पर ण से स भा वत रोग ात करना 10.2.5 शव पर ण के समय नमूने एक करना 10.2.6 एक त नमून क रोग नदान म उपयो गता 10.3 पैथो नोमो नक ल जन 10.3.1 पैथो नोमो नक ल जन : एक प रभाषा 10.3.2 व भ न सामा य कु कु ट रोग व उनके पैथो नोमो नक ल जन 10.4 सारांश 10.0 उ े य:- कु कु ट यवसाय क सफलता म मु य त भ कु शल ब धन, पौि टक आहार, अ छा जनन व रोग से बचाव मु य है । थम तीन ब दुओं ( ब धन, आहार व जनन) म य द लापरवाह हो तो पशु के के वल उ पादन पर ह वपर त भाव पड़ता है ले कन य द रोग से बचाव म कमी हो तो प य क मृ यु दर म बढ़ोतर या disease outbreaks के कारण स पूण यवसाय ह चौपट हो सकता है । इस कार कु कु ट यवसाय म मु य बाधा समय-असमय मु गय म उ च मृ यु दर माना जाता है । मु गय का अ धक सं या म एक साथ मरना Disease outbreak कहलाता है । क ह ं वशेष बीमा रय म कई बार फाम पर उपल ध सभी प ी बहु त कम समय म मर जाते है । कई बार तो बीमार क अव था इतनी भयानक होती है क एक कु कु ट शाला ब धक या पशु च क सक को इतना भी अवसर नह मल पाता क वह कसी बीमार प ी को देख सके । ऐसी अव था म पशु रोग नदान का एक मा ज रया शव पर ण ह रह पाता है ।
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    117 पशु रोग नदानवशेष क इन प रि थ तय म एक मह ती भू मका रहती है और शव पर ण ऐसी प रि थ तय म सव च उपयोगी रहता है । 10.1 तावना : कु कु ट रोग मु यत: outbreak के प म होते है । इन ि थ तय म रोग का कोई वशेष कारण होता है । मृ यु का कारण या तो कोई एक हो सकता है अथवा कई कारण के एक साथ मल जाने से भी मृ यु दर बहु त अ धक बढ़ जाती है । कु कु ट यवसाय को लाभ क अव था म रखने के लए यह आव यक है क मुग फाम म सभी प ी व थ रहे । प य म कु छ तशत मृ यु सामा य मानी जाती है जो क अलग-अलग फाम क प रि थ तय के अनुसर अलग-अलग हो सकती है ले कन मृ यु दर क तशत असामा य प से यादा होना कु कु ट पालक के लए च ता का वषय होता है । ऐसी प रि थ तय म मृ यु का कारण जानना आव यक है ता क भ व य म इस रोग से कु कु ट पालक अपने प य को बचा सके । इसके अ त र त मुग फाम म सामा य प से मरने वाले प य का रोग नदान भी उतना ह मह वपूण है िजतना क disease outbreak के समय । रोग नदान कई कार से कया जाता है ले कन रोग नदान म शव पर ण अ य त मह वपूण है | इस इकाई म शव पर ण से जुड़ी मह वपूण जानका रय जैसे शव पर ण का समय, शव पर ण करते समय सावधा नयाँ व शव पर ण के समय या- या नमूने एक कये जा सकते है, इ या द के बारे म बताया गया है । इसके अ त र त व भ न मु य रोग म पाये जाने वाले पैथो नोमो नक ल ज स के बारे म भी बताया गया है ता क शव पर ण के मा यम से ह इन रोग का नदान कया जा सके । 10.2 शव पर ण एवं रोग नदान 10.2.1 शव पर ण का समय कसी भी जीव क मृ यु के प चात उसके शर र से व भ न कार के ए जाइम नकलते है । इन ए जाइम के भाव से मृत शर र म कु छ वशेष कार के बदलाव आते है और कु छ समय बाद वातावरण म व यमान व भ न कार के जीवाणु मृत शर र म वेश कर जाते है । इन जीवाणुओं क मृत शर र म वृ के कारण शव सड़ने लगता है ओर शव के आ त रक अंग का आकार, रंग, कठोरता तथा अंग क आ त रक संरचना म बदलाव आ जाता है । य द मृ यु के बाद समय यादा गुजर जाता है तो अंग व उनके अवयव म आमूलचूल प रवतन आ सकते है । इस प रवतन के कारण पशु च क सक के लए रोग से आये आ त रक ल ण क पहचान करना मुि कल अथवा असंभव हो जाता है ।
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    118 अत: शव परण के वारा रोग नदान के लए यह अ य त आव यक है क मृ यु के बाद शव पर ण शी त शी कया जाये ता क पशु च क सक को रोग के ल ज स क सह जानकार मल सके और रोग का सह नदान हो सके । 10.2.2 शव पर ण से पूव जानकार एवं सावधा नयां शव पर ण करने से पूव कु छ मह वपूण जानका रय व सावधा नय का वशेष यान रखना चा हए अ यथा या तो शव पर ण से रोग नदान म कोई मदद नह ं मलेगी अथवा रोग नदान गलत भी हो सकता है । अत: मुग पालक तथा शवपर णकता को शवपर ण के लए न न बाते यान म रखनी चा हए :- 1. य द आपको उस मुग फाम पर शवपर ण करना है जहां सभी प ी मर चुके है अथवा आपके पहु ंचने पर वहां कोई प ी बीमार नह ं है अथवा मृत प ी शव पर ण के लए आपक योगशाला म लाया गया है तो प ी के बीमार के समय दशाये ल ण, पीने के पानी अथवा आहार, वातावरण कै ताप म म बदलाव, मुग फाम म नये चूजे या प ी लाने, ट काकरण कृ ष नाशक दवाई पलाने, मुग घर म म छर क टनाशक दवाई के छड़काव आ द के बारे म पूण जानकार ा त करना आव यक है । इसके साथ ह यह जानना भी आव यक है क मुग घर म प ते, गंदगी आ द जलाकर धुंआ तो नह ं कया गया अथवा मुग घर लू अथवा वषा से भा वत तो नह ं हु आ है । इन सभी जानका रय से शव पर ण से रोग नदान क दशा नधा रत करने म आसानी रहती है । 2. शव पर ण से पूव हम यह ात करना भी आव यक है क बीमार सबसे पहले कस आयुवग म ार भ हु ई। अथवा ट काकृ त या ऐसा समूह िजसम ट काकरण नह ं कया गया है उसम ार भ हु ई । 3. शव पर ण से पूव मुग पालक से यह जानकार लेना भी आव यक है क मृत मु गयां कस Posture म पड़ी मलती है । इससे भी कु छ बीमा रय के नदान म सहायता मलती है । 4. शव पर ण का मुग घर म एक नि चत थान तय होना चा हए जहाँ शव पर ण कया जा सके । 5. य द शव पर ण के लए प ी योगशाला म भेजे जा रहे हो तो उ हे पाल थीन के थैल म अलग-अलग ब द कर व पहचान च ह लगा कर भेजना चा हए । यादा अ छा तो यह रहता है क पाल थीन के थैल को आईस बा स म रखकर भेजा जाये । 6. य द हम बीमार के बा य ल ण से बीमार का पता भी लग जाता है तो भी शव पर ण आव यक प से करना चा हए य क शव पर ण से हम अ त र त जानका रयां तथा बीमार क गंभीरता का पता चलता है। 7. शवपर ण मृ यु के तुर त प चात करना चा हए ता क शव म बा य या आंत रक अंग अथवा इनके अवयव म सड़न ना हो और शव पर णकता को बीमार के पैथोलोिजकल ल ज स क सह त वीर मल सके ।
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    119 8. िजतना संभवहो हम अ धक से अ धक शव का पर ण करना चा हए । यह आव यक नह ं है क एक ह शव म बीमार के सारे पैथोलोिजकल ल ण हम मल जाये । अत: एक से यादा शव पर ण कर, सभी ल ण को सि म लत कर रोग नदान करना चा हए । 9. शव पर ण के प चात शव के न तारण के लए य द मुग घर योगशाला म इ सीनरेटर नह ं है तो मुग घर योगशाला से दूर उसी े म एक थान तय होना चा हए जहां ग ढा खोद कर शव को गाड़ा जा सके । ऐसे थान क तार ब द या द वारब द भी आव यक है ता क कु ते अथवा अ य जंगल जानवर इन शव को ना नकाल सके और फाम पर सं मण का फै लाव क संभावना न बन सके । 10.2.3 शव पर ण क तैयार व व ध - चूं क कु कु ट रोग नदान म शव पर ण क मह ती भू मका है अत: मृतप ी का शव पर ण सह व ध से व स पूण करना चा हए ता क रोगी मृत प ी के सभी पैथोलोिजकल बदलाव को जाना जा सके और बीमार के बारे म पूण जानकार मल सके । 1. शव पर ण का थान पूण प से साफ सुथरा कर लेना चा हए । 2. य द शव पर ण योगशाला म कया जाना है तो टेबल को 70 तशत ईथाइल ए कोहल के फोहे से साफ कर लेना चा हए । 3. त प चात मृत प ी को उ चत थान पर रखकर बा य पर ण करना चा हए । बा य पर ण म न न ब दु अव य नोट करने चा हए : (अ)मृत प ी क उ स ब धी जानकार (चूजा अथवा य क) (ब)शार रक अव था (शर र उ ानुसार सामा य या कमजोर) (स) ाकृ तक छ जैसे नाक छ , च च, आंख, कान छ या लोयका से असामा य ाव (द)मृत प ी का वशेष पो चर (य) कलंगी, वैटल अथवा कान क पा लय का रंग (र) लोयका के आस-पास य द बींट लगी हो तो उसका रंग, तरलता या कठोरता (ल) सर, कलंगी अथवा अ य शार रक अंग पर कसी कार का सूजन 4. मृत प ी के बा य शवपर ण के बाद प ी के पंख को साफ पानी से नम कर देना चा हए और फर पंख को उखाड़ दे । पंख को नम करने से पंख इधर-उधर नह फै लते है और शव को खोलने के बाद ना ह ये पंख आ त रक अंग को दू षत कर पाते है । 5. पंख हटाने के बाद शव को पुन: अ छ तरह से साफ कर ले और त प चात आ त रक अंग के पर ण के लए पूव म तैयार कर ल । इसके लए हम सामा यत: न न ल खत सामान क आव यकता पड़ती है :- (अ) नजम कृ त कची, बी.पी. है डल, लेड स हत, व भ न आकार क चम टयां (ब) नजम कृ त, पै लेट, फोहा, कांच क प काएं ( लाईड), छोट बोतल इ या द
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    120 6. शव कोपीठ क तरफ से शव पर ण सतह पर लटा दे ता क छाती वाला े ऊपर क ओर रहे । 7. कची व के ल लेड से उरोि थ (Setrnum) वाले े से वचा काटना शु करे और वचा को च च के पछले ह से तक तथा लोयका तक दो भाग म वभािजत कर दोनो तरफ खसका दे । 8. सबसे पहले मांस पे शय का वकास, आकार तथा रंग को नोट करे । 9. मांस पे शय क जानकार के बाद सव थम वसन तं को खोले । इस तं म मु य प से े कया, फे फड़े व वात थून (Air sacs) के बारे म जानकार लेना आव यक है । इसके लए असामा य ाव, र त क उपि थ त, सूजन, मवाद आ द के बारे म जानकार होना आव यक है । 10. वसन तं के साथ ह शव म दल का आकार, र त ाव अथवा दल के बाहर झ ल म कसी कार के य के बारे म भी पूण प से जानकार ा त करना आव यक है । Proventriculus - ं थल जठर Gizzad - पेषणी Oesophagus - ास-नल Corp - अ नपुट Bileduct - प त वा हनी Small intestine - छोट आंत Large intestine - बड़ी आंत Trachea - वास णाल Liver - यकृ त Gall Bladder - प ताशय Pancreas - अ नाशय Caeca - अ धनाल Cloaca - अव कर 11. वसन तं के बाद शव के पाचन तं के बारे म जानकार एक करनी चा हए । इसके लए सव थम पाचक तं के सभी अंग व इसके घटक का बाहर से पर ण करना चा हए । बाहर पर ण म आहार नल (Oesophagus), ाप (Crop), ोवे ट कु लस (Proventriculus), गजाड (Gizzard), यकृ त, प ताशय (Gallbladder), छोट आंत, सीका (Caeca), बड़ी आंत, रे टम (Rectum) तथा लोयका (Cloaca) आ द पर असामा य सूजन, र त ाव, रंग प रवतन, सड़न, घाव आ द के बारे म मह वपूण जानकार नोट करे । इसके प चात आहारनल ाप, ोव कु लस, गजाड, छोट आत, सीका बड़ी आत, रे टम तथा लोयका क आ त रक सतह पर सूजन, र त ाव घाव इ या द को नोट करे, इसके साथ ह इन अंग म कृ म क उपि थ त भी देख । कु कु ट म बहु त सारे कृ म न नआंख से भी देखे जा सकते है । अ नाशय प ताशय व प त वा हनी म भी इन सब के बारे म जानकार एक करे व नोट करे ।
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    121 12. इसके पचात मू सं थान म मु यत: वृ क क अव था म आये प रवतन को नोट करना चा हए । 13. मू सं थान के बाद जनन सं थान के बारे म जानकार आव यक है । वैसे तो मादा व नर दोनो लंग का पूण प से शव पर ण करना चा हए ले कन रोग नदान म मादा अंग वशेषत: अ डाशय (Ovary) तथा अ डन लका (Oviduct) का पर ण यादा मह वपूण है । शवपर णकता को अ डाशय व अ डन लका के सूजन, र त ाव अथवा मवाद होने के बारे म जानकार ा त कर नोट करना चा हए । 14. इसके प चात शवपर क को तं का तं के बारे म भी वशेष यान रखना चा हए य क कई वषाणुज नत रोग म तं का त वशेष प से भा वत होता है । तं का तं म मु य यान े कयल ले सस, सये टक तं का तथा कपाल खोलकर मि त क पर देना चा हए । शवपर क को इन सब अवयव का आकार मोटाई, अ त र त व, र त ाव व इनक चमक म कमी इ या द सभी प रवतन बहु त ह यानपूवक नोट करने चा हए । 15. इन सबके अ त र त शवपर क को चा हए क बसी (Bursa of Fabricius) जो क प ी म रोग तरोधक मता दान करने के लए एक अ य त मह वपूण अंग है, को अव य देख । इस अंग के आकार, र त ाव व मोटापन अव य नोट करे 10.2.4 शव पर ण से स भा वत रोग ात करना शव पर ण से स भा वत रोग ात करना ल ण एवं पायी जाने वाल अव थाएँ स भा वत रोग एयर सैक इंफे शन, लाइ नंग म मोटापन रानीखेत, आई. बी. पे रटोनाई टस वास अवरोध नह ं, र त पानी जैसा माइको- लाजमो सस ई. कोलाई आहारकमी, पाइरोक टो सस, यूको सस इ फै शन, कॉ पले स कॉ सी डयो सस कॉ ब एवं चेहरे पर सफे द ध बे फे वस । अवशो षत योक पुलोरम रोग, सालमोनेलो सस गजाड का इरोजन पोषक त व क कमी बड़ा हु आ गाल लेडर फाउल टायफाइड, शीत, पुलोरम रोग, वटा मन ए क कमी भूख कोराइजा स ोम इ फे शस कोराइजा, पॉ स सी.आर.डी,फाउल, वटा मन ए क कमी सीकल हैमरेज कॉ सी डयो सस, लैकहैड । फे फड़ो मे नो यूल पुलोरम रोग, एसपरिजलो सस छोट आंत म सूजन रानीखेत, पाइरोक टो सस कॉ सी डयो सस, टायफाइड,
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    122 10.2.5 शव परण के समय नमूने एक करना :- रोग नदान के लए महामार व ान (Epidemiology), ला ा णक (Clinical Signs), शव पर ण (Post-mortem examination), इलाज का भाव (Response to treatment) इ या द मह वपूण है ले कन एक त नमून के योगशाला म व लेषण से रोग का पु ता नदान कया जा सकता है । योगशाला म व लेषण के लए नमूने जी वत तथा मृत दोन तरह के प य से लये जा सकते है और उनके लए जांच क दशा व तर के भी अलग-अलग होते है । ले कन मृतप ी से नमून क सं या व कार यादा लेना स भव है । मृत प ी से आ त रक अंग व ाव लए जा सकते है जो क जी वत प ी म सामा यत: स भव नह है । नमूने एक करते समय हम न न व तुओं क आव यकता होगी : (क) नजम कृ त कची, लेड, चमट , परखनल , पै लेट, नमूना बोतल, फोहा कांच प का। (ख) जीवाणु पृथ क करण व व लेषण के लए नजम कृ त जीवाणु ांसपोट मी डयम । (ग) वषाणु पृथ क करण व व लेषण के लए वायरस ांसपोट मी डयम (घ) फफूं द के लए सैबरोड़ आगार मी डयम (ड) 10 तशत फामल न घोल शव पर ण के दौरान हम एक-एक सं थान का यान से अ ययन करना चा हए और उसी समय उस सं थान के अंग का टुकड़ा या उसम एक वाद को पूण सावधानी बरतते हु ए एक करना चा हए । आदश प म हम नमूना जीवाणु, वषाणु फफूं द, ोटोजोवा कृ म आ द सभी के लए अलग-अलग नमूने बोतल म लेना चा हए ओर उस बोतल पर यह अव य अं कत होना चा हए क कस बोतल के नमूने का योगशाला म या व लेषण करना है । बोतल पर प ी क पहचान सं या व नमूना एक करने क तार ख भी आव यक प से अं कत होनी चा हए । उ तक या धक पर ण के लए एक त अंग के नमूने क मोटाई-ल बाई-चौडाई का वशेष यान रखना चा हए । नमून का आकर बड़ा होने क ि थ त म वह ठ क कार संर त नह ं हो पाते है और उ तक या धक पर ण के लए सह नह ं माने जाते । आत क अ द नी सतह अथवा कटे हु ए आ त रक अंग से कांच प का पर इ ेशन मीयर बना कर, अ छ तरह हवा म सुखा कर सुर त रखना चा हए । नमूने एक करते समय इस बात का भी अव य यान रखा जाना चा हए क अंग एक दूसरे के स पक म न आये और आपस म सं मत ना हो । एक त नमून को आदश मानद ड के अनुसार शी ा तशी उस योगशाला म भेजना चा हए, जो योगशाला इन जांच क स म अथवा मा णत हो । नमून को भेजने से पहले योगशाला से पूव म अनुम त ा त करना हमशा बेहतर माना जाता है | नमून के साथ आव यक प से भेजने वाले के ह ता र स हत प होना चा हए िजसम महामार ला णक, शवपर ण ट काकरण, इलाज संबंधी जानकार सह सह द जानी चा हए।
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    123 10.2.6 एक तनमून क रोग नदान के उपयो गता शवपर ण के समय एक त कये गये नमून का योगशाला म व लेषण कस कार कया जाता है इस बात का ववरण सं ेप म नीचे दया जा रहा है । 1. सभी अंग से कांच प का पर बनाये गये इ ेशन मीयर को अ भरंिजत कर उसका पर ण जीवाणु, वषाणु क इ लूजन बॉडीज फफूं द क उपि थ त आ द इ नत करने के लये कया जाता है । 2. जीवाणु ांसपोट मी डयम, पै लेट या फोहे म लए गये नमूने से जीवाणु के बारे म पता कया जाता है। 3. इसी कार वषाणु ांसपोट मी डयम, पै लेट या फोहे से लए गये नमूने से वषाणु क पहचान योगशाला म क जाती है । 4. अंग के ऊतक के नमूने 10 तशत फामल न म लेकर सुर त रखे जाते है । योगशाला म इन ऊतक से से शन बनाकर और उ ह अ भरंिजत कर, बीमार के कारण ऊतक म आने वाले प रवतन के आधार पर भी कु छ रोग का नदान कया जाता है । 5. इन उ तक म जीवाणु या वषाणु क उपि थ त कु छ नई तकनीक जैसे लोरेसे स ए ट बॉडी जांच आ द से भी कर रोग नदान कया जा सकता है । 6. आंत से लए गये फोहे अथवा बींट से व भ न कार के परजी वय क पहचान क जा सकती है । 10.3 पैथो नोमो नक ल जन (Pathognomonic Lesion) 10.3.1 प रभाषा शवपर ण वारा रोग नदान एक मह वपूण तर का है । शवपर क को इसके लए यह पया त ान होना आव यक है क कस रोग म प ी के शर र का कौनसा अंग भा वत होता है तथा भा वत अंग म कस तरह का प रवतन आता है । इन अंग म आये प रवतन के आधार पर ह शवपर क रोग नदान कर पाता है । ले कन अंग म कु छ प रवतन इस कार के होते है क वे एक से यादा रोग म पाये जा सकते है । इसके वपर त कु छ प रवतन इस तरह के होते है क ये के वल एक वशेष रोग म ह मलते है । इस कार के प रवतन या ल जन जो कसी एक ह रोग म मलते है उ हे पैथो नोमो नक ल जन कहते है । य द शवपर क इन पैथो नोमो नक ल ज स को पहचान म सफल रहता है तो वह रोग नदान म भी बहु त हद तक सफल माना जाता है | 10.3.2 व भ न कु कु ट रोग व उनम पैथो नोमो नक ल जन ईकाई के इस भाग म के वल मु य रोग के पैथो नोमो नक ल जन के बारे म ह बताया गया है । साथ ह रोग के कारण को भी सं ेप म बताया गया है ता क पाठक रोग का नाम, कारण और पैथो नोमो नक ल जन एक साथ जान सके ।
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    124 (क) रानीखेत रोग: यह एक वषाणुज नत रोग है । शवपर ण म वासनल म अ धक ले मा पाया जाता है । एयर सैक धुंधले हो जाते है तथा ोवे ट कु लस व गजाड म र त ाव पाया जाता ह । स पूण पाचन णाल म याले नुमा फोडे दखाई देते है । (ख) सं ामक बसल बीमार (IBD) : यह भी एक वषाणु ज नत बीमार है िजसम बसा ऑफ फै ी सयस मु य प से भा वत होती है । बसा शु आत म आकार म बहु त बढ़ जाती है और कु छ समय बाद आकार म सामा य से काफ छोट हो जाती है । टांग क मांसपे शय म र त ाव भी होता है । (ग) मुग माता (Fowlpox) : यह क एक वषाणुज नत बीमार है िजसम कलंगी वैटल अथवा कान के लोब पर पॉ स के ल जन बन जाते है । इसके अ त र त मुंह म पॉ स ल जन बन जाते है । पॉ स ल जन म बो ल गर बॉडीज पाई जाती है । िज हे सू मदश से देखा जा सकता है । (घ) सं ामक ो काइ टस (IB) : इस वायरस ज नत रोग म मु य प से ना सका व वास नल म सूजन पायी जाती है । एयर सैक म गाढ़ा चप चपा पदाथ मलता है । (ङ) मेरे स बीमार (MD) : इस वायरस ज नत रोग म मुग एक वशेष अव था म पड़ी मलती है िजसम साधारणतया एक पैर आगे और एक पैर पीछे अथवा मुड़ा हु आ रह सकता है । सये टक नव तथा े कयल ले सस क मोटाई बढ़ जाती है तथा इनक सामा य चमक म कमी आ जाती है । (च) सं ामक लै र गो े कयाइ टस (ILT) : इस वायरस ज नत रोग म वास नल म र त म त ले मा तथा लैरे स व वासनल के ऊपर भाग म चीजी अवरोध (Cheesy Plug) बन जाता है । (छ) ल फोइड यूको सस (Lymphoid Leukosis) : इस वायरस ज नत रोग को बडा यकृ त रोग (Big Liver disease)ए के नाम से भी जाना जाता है । इस रोग म यकृ त इतना बड़ा हो जाता है क ाय: पूर बॉडी कै वट यकृ त से ह भर दखाई देती है । (ज) सं ामक कोराइजा (Infectious coryza) : इस जीवाणु ज नत रोग मं चेहरा सूजा हु आ दखाई देता है, नाक तथा आँख पर चप चपा तरल पदाथ एक हो जाता है जो मृत प ी म चीज (cheese) जैसा दखाई देता है । कभी-कभी शव के वैट स भी बड़े हो जाते है । (झ) पुलोरम रोग (Pullorum Disease) : इस जीवाणुज नत (Salmmella pullorum) रोग म प ी के व भ न आ त रक अंग जैसे यकृ त, वृ क, फे फड़े इ या द पर ल जन तथा दय, गजाड अ धनाल, बड़ी आंत आ द अंग म ने ो टक फोकाई पायी जाती है । (ञ) कु कु ट टाईफॉइड (Fowl typhoid) :
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    125 इस जीवाणुज नत(Salmonella gallinarum) रोग म यकृ त, ल हा एवं वृ क को आकार सामा य से बड़ा पाया जाता है। (ट) कु कु ट य रोग (Fowl tuberculosis) : इस जीवाणुज नत (Mycobacterium tuberculosis avium) रोग म यकृ त, ल हा, आंत तथा फे फड़ म छोट -छोट गांठे बन जाती है िज हे आसानी से पहचाना जा सकता है | (ठ) ल बर नैक या बोटू ल म (Botulism) मु गय म यह बीमार एक जीवाणु (Clostridium botulinum) वारा बनाये गये जहर को खाने से हो जाती है । शव पर ण म मुग के आंतो म सूजन व र त ाव पाया जाता है । ाप म उड़ा दाना भी पाया जा सकता है । (ड) ो नक रेि परेटर बीमार (Chronic Respiratory Disease) मु गय म यह रोग माइको ला मा ज नत है । शव पर ण म आर भ क अव था मे एयर सैक म पीला झागदार पदाथ अथवा सफे द ध बे पाये जाते है । वास नल म गाढ़ा ले मा पाया जाता है । साथ ह र त ाव भी पाया जा सकता है । दय क झ ल मोट तथा धुंधल सफे द हो जाती है । (ढ) को सी डयो सस (Coccidiosis) मु गय म यह रोग आईमे रया (Eimeria) नामक ोटोजोवा परजीवी से होता है जो क लगभग सभी उ के प य के लए घातक है । शवपर ण के दौरान इस रोग म सीका (मु य प तथा आंत (कई बार) र त से लगभग भर होती है और उनम सूजन मलती है । (ण) लैक हैड (Black Head) यह रोग ह टोमोनास म लया ग डस (Histomonas meleagridis) नामक ोटोजोवा परजीवी से होता है । शव पर ण के समय इस रोग म सीका म सूजन के साथ पीले रंग का बदबूदार तरल पदाथ मलता है । यकृ त पर ार भ म सुई क नोक जैसे तथा यादा भा वत प ी म गोल व बड़े पीले या हरे पीले ध बे बन जाते हे । (त) टक बुखार या पाइरोक टो सस (Tick Fever or Spirochaetosis) मु गय म यह रोग बोरे लया ए सेर ना (Borrelia anserina) नामक पाईरोक ट के कारण होता है जो क अरगस परसीकस (Argus persicus) नाम टक वारा फै लाया जाता है । शव पर ण म इस रोग म त ल व यकृ त बढ़ जाते है, यकृ त का रंग पीला पड़ जाता है । इसके अ त र त दय क झ ल म पानी भी भर जाता है । (थ) एसपरिज लो सस (Aspergillosis) यह रोग एसपरिज लस यूमीगेटस (Aspergillus fumigatus) नामक फफूं द से होता है । इस रोग म फे फड़े व एयर सैक भा वत होते है । शव पर ण पर फे फड़ म छोटे-छोटे घाव (abscess)ए दखाई देते है और एयर सैक म पीले रंग का गाढ़ा पदाथ भरा मलता है | (द) आंत रक कृ म रोग (Internal Parasites)
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    126 मु गय माय: कई कार के आंत रक कृ म रोग उ प न करते है । शव पर ण के दौरान शव काफ कमजोर मलता है । आंतो म सूजन व कभी-कभी र त ाव भी मल सकता है । आंत खोलने पर परजीवी भी मल जाते है । 10.4 सारांश इकाई म बताये गये सभी ब दुओं का अ ययन करने से यह ात होता है क कु कु ट यवसाय म सबसे बड़ी बाधा रोग का होना है । इसके लए यह आव यक है क कु कु ट यवसाय को लाभकार बनाने के लए रोग पर नय ण आव यक है । रोग पर नय ण के लए मह वपूण होता है शी ा तशी रोग नदान । वैसे तो रोग नदान के कई तर के होत है ले कन शव पर ण वारा रोग नदान एक आव यक एवं बहु त ह मह वपूण तर का है । तुत ईकाई म बताया गया है क शी ा तशी और अ धकतम संभव प य का शव पर ण कर पैथो नोमो नक ल जन क सहायता से रोग नदान क हर संभव को शश करनी चा हए । इसके साथ ह शवपर ण के समय एसेि टक तर के से व भ न कार के नमूने एक कर योगशाला म पु ता रोग नदान के लए भेजने चा हए । शव पर क को पैथो नोमो नक ल ज स का पया त ान होना आव यक है ।
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    127 इकाई : कुकु ट रोग नदान एवं आहार व लेषण योगशालाएं इकाई – 11 11.0 उ े य 11.1 तावना 11.2 भारत म कु कु ट रोग नदान 11.2.1 ह मेटोलोिजकल जाँच 11.2.2 सीरम क जाँच 11.2.3 कॉ सी डओ सस क जाँच 11.2.4 E.Coli क जांच 11.2.5 भावी जीवाणु नाशक औष ध 11.2.6 शव पर ण 11.3 आहार व लेषण 11.3.1 नमी/मोइ चर 11.3.2 टोटल ऐश 11.3.3 ए सड इनसो यूबल ऐश 11.3.4 ू ड ोट न 11.3.5 फे ट क जाँच 11.4 कु कु ट संबंधी सं थान एवं सं थाएं/ आहार व लेषण योगशालाएं 11.5 सारांश 11.0 उ े य इकाई का उ े य कु कु ट म होने वाले व भ न रोग क जाँच तथा कु कु ट पालन के े म योगशालाओं से मलने वाल मदद के वषय म जाग क करना है । 11.1 तावना रोगी प ी के उ चत उपचार क पहल ज रत है, रोग का सह नदान अथात् रोग के वा त वक कारक का पता लगाना । पालक वारा बीमार के संबंध म द गई जानकार , बीमार के ल ण एवं योगशाला जाँच के प रणाम, तीन के आधार पर रोग का सह नदान कया जा सकता है | राज थान रा य म इस काय हेतु अ य त सु ढ़ योगशाला तं वक सत है । रा य के येक िजले म एक िजला तर य रोग नदान योगशाला है । उदयपुर, कोटा, बीकानेर,
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    128 जोधपुर, अजमेर मसंभाग तर पर े ीय रोग नदान योगशाला है व जयपुर म एक रा य रोग नदान योगशाला है । इस कार उदयपुर संभाग म चार िजला तर य योगशालाएँ च तोड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसम द म कायरत है । संभाग क रोग नदान योगशालाओं म उपल ध सु वधाओं का अ धकतम एवं समु चत उपयोग हो एवं इन सु वधाओं का लाभ सुदूर पशुपालक तक पहु ँचे, इस उ े य को ि टगत रखते हु ए इस अ याय का समावेश कया गया है । योगशाला जाँच हेतु कब, या से पल लेने है, कै से भेजने है व योगशाला जाँच के प रणाम का आकलन कै से करना है आ द के संदभ म जानकार उपल ध करवायी जा रह है । 11.2 भारत कु कु ट रोग नदान व थ प ी पालन ह कु कु ट यवसाय क आधार शला है । जी वत ा णय म बहु धा सं ामक तथा अ य रोग होते रहते है । अ धक हा न होने से पूव ह रोग का नदान करना अ त आव यक है । इस हेतु वशेष एवं योगशालाओं क मदद लेना ेय कर रहता है । योगशालाओं के खून/ सीरम/ बीट / भावी दवा क जाँच एवं कु कु ट शव पर ण वारा भी रोग का नदान कया जाता है । 11.2.1 ह मेटोलोिजकल जाँच र त य या अ य प से शर र म होने वाल सम त जैव रासाय नक एवं रोग तरोधा मक याओं म भाग लेता है । अत: बीमार क ि थ त म इसम प रवतन वाभा वक है । अत: र त क जांच कई कार के रोग मे करवाई जानी आव यक होती है| जब भी प ी म बुखार, र त क कमी या एनी मया, ल वर, कडनी, हाट से संबं धत रोग, र त परजीवी रोग आ द के ल ण दखाई दे या ऐसी बीमार हो, िजसका नदान नह ं हो पा रहा हो तो र त क जांच करवानी चा हए । कई बीमा रय के ामा णक नदान हेतु भी र त या सीरम क जाँच करवायी जाती है । र त क ह मेटोलोिजकल व बायोके मीकल जांच म र त के को शक य व रासाय नक अवयव म होने वाले प रवतन के आधार पर रोग के कारण का पता लगाने म मदद मलती है । र त के मीयर क जांच से रोग के कारक ोटोजोआ या बे ट रया को देखा जा सकता है । वशेषतौर पर र त परजीवी रोग जैसे बबे सयो सस, थाइले रयो सस, पाईरोक टो सस, ला मो डयम, पेनोसोमो सस आ द का पता लगाने के लए पंख के नीचले भाग से पे रफे रल र त मीयर बनाना चा हए । सरोलोिजक जाँच म ए ट जन-ए ट बॉडी आधा रत जांच से रोग के संबंध म प ट माण मल सकते है । हमोलो टकल जांच एवं उनका मह व :- (i) Hb हमो लो बन क मा ा gm% म (ii) Total leukocytic count (TLC) - एक यू बक म.ल . र त म वेत र त क णकाओं क सं या।
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    129 (iii) Differential leukocyticcount (DLC) - यह व भ न कार क वेत र त क णकाओं क र त म तशत मा ा को दशाता है । र त म पाँच कार क वेत र त क णकाएं पायी जाती है- यु ो फल, इयो सनो फल, बेसो फल, लं फ़ोसाइट एवं मोनोसाइट । 11.2.2 सीरम क जाँच कई प ी रोग के मा णक नदान हेतु सीरम जाँच करवायी जाती है । सरोलोिजकल जाँच म ए ट जन, ए ट बॉडी आधा रत टे ट कए जाते है, िजनसे रोग के कारक जैसे बै ट रया, वायरस, ोटोजोआ आ द के संबंध म प ट माण मल सकते है । र त को बना ए ट कोगुले ट डाले रखने से र त का थ का जम जाता है । बचा हु आ साफ तरल पदाथ ह सीरम कहलाता है । सीरम ा त करने के लए मु गय का 5 म.ल . र त सीधे शराओं से ल । 11.2.3 बीट कृ म एवं कॉ सी डओ सस क जाँच प ी म द त, क ज, उ पादन म कमी, कमजोर , कम खाना, मल के साथ खून आना आ द ल ण दखने पर बीट क जाँच करवानी चा हए । बीट क जाँच वारा कृ म रोग का तथा कॉ सीडायो सस का पता लगाया जा सकता है । मल क जाँच म परजीवी के अ डे, लावा, उ स ट आ द देखकर अंत: परजीवी के कार क जानकार मल जाती है, िजससे उसके व भावी दवा का अनुमान लगाया जा सकता है । इस लए अंत: परजीवी नाशक उपचार देने से पहले बीट क जाँच करवा लेनी चा हए । से पल लेने क व ध :- जहाँ तक संभव हो, बीट के नमूने उठाते हु ए सीधे प ी के रे टम से ह ले । आसपास क म ी आ द से पल के साथ न आये । लगभग 2 से 5 ाम तक से पल को साफ छोटे पाल थीन बैग म लेकर उसम 8-10 बूंद 10% फोमल न क मला द । से पल को सह तर के से चि हत कर द, िजससे पता चल सक क उ त से पल कस प ी का है तथा इसे अ य आव यक जानका रय के साथ भेज । य द मल क जाँच काि स डयो सस या लंग व स हेतु क जानी है तो से पल म फोमल न न मलाये । से पल जांच के लये तुर त भेजे, देर क ि थ त म से पल ज म रखे एवं बफ पर भेज । को सी डयो सस रोग क जांच हेतु मल के नमूने म2.5% पोटे शयम डाइ ोमेट घोल मलाया जा सकता है । 11.2.4 ऐ चेरे चया कोलाई (E. coli) क जांच इस हेतु इओ सन मथाईल न लू अगार; मे काँक अगार अथवा टज टॉल आगार लेट उपयोग म ल जा सकती है । उ त व णत कसी भी मी डया क लेट पर सं मण वारा कं ग कर द जाती है एवं इसे लगभग 48 घ टे 37oC पर इन यूबेटर म रखा जाता है । ारं भक तौर पर E. coli क पहचान न नानुसार क जाती है । (i) EMB Agar गाढ़े रंग क कॉलोनी
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    130 जो धातु केसमान चमक उ प न करती है । (ii) Mac-Conkey Agar- ईट के समान लाल नारंगी रंग क कॉलोनी आना, (iii) Tergitol-7 Agar -पीले रंग क कॉलोनी आना। E.coli क नि चत पहचान ामस टे नंग व अ य पर ण वारा संभव है । ये एक ाम नेगे टव रोड (छड़) के आकार के जीवाणु है, जो इंडोल बनाते है, क तु H2S नह ं बना सकते, साइ ेट मी डया पर वृ नह ं करते । इसके अ त र त िजले टन ल वीफ के शन जाँच, यू रया फमटेशन जाँच Neg दशाते हो, ये पोिज टव मथाइल रेड व नेगे स वोगास पाडर रए शन दखाने वाले बेि ट रया ह, जो लूकोज, मा टोज आ द को फम टेशन कर सकते है । E.coli पहचान के लए योगशाला म IMVIC Reaction लगाई जाती है, िजसके न न प रणाम ा त होने पर E.coli के सं मण का पता चलता है । I - Indol Test M - Methyle Red Test V - Voges Proskaur Reaction C - Citrate Utilization Indol Test :- E.coli क चर को पे टोन वाटर या यू एंट ोथ म 48 घ टे क वर करने के प चात टयूब पर 1ml. ईथर या जाईलॉल डाला जाता है । अ छ तरह हलाने के प चात 0.5ml. इहर लक (Ehrlichis Solution) टे ट टयूब के साईड से डालने पर गुलाबी से लाल रंग का घोल पॉिज टव रए शन दखाता है । E.coli बे ट रया INDOL पॉिज टव है । Methyle Red Test - Methyle Red - 0.04gm इथेनॉल – 40ml डि टल वाटर - 100ml. मथाइल रेड को इथेनॉल म घोलकर पानी मलाया जाता है एवं आयतन को 100ml. कर लया जाता है । Reaction :- सव थम लूकोज फा फे ट अगार मी डयम म E.coli क चर इनो यूलेट करते है । 37० C ताप पर दो दवस इन यूबट करने के प चात उसम मथाइल रेड घोल क दो बूँदे मलाने पर गहरा लाल रंग द शत होने पर टे ट पोिज टव आता है । MR-Positive (पोिज टव) VOGES Prosckaur Reaction (Actyle- Methyle Carbinol Production) Methyle-Red पर ण लगाने के प चात Test Tube म 0.6 ml. ने थॉल (5% ने थॉल) का घोल मलाया जाता है और फर 0.2ml.40% पोटे शयम हाइ ॉ साइड का जल य वलयन मलाकर अ छ कार से हलाने के प चात 15 min से 1 घ टे के म य गहरे गुलाबी रंग का आना V-P पोिज टव द शत करता है । जब क E.Coli जीवाणु VP-नेगे टव है, िजसम कोई रंग नह ं आता है ।
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    131 Citrate Utilization (साईेट यू टलाईजेशन) : कोचर साई ेट मी डयम म E.coli क वर इनो यूलेट करने के प चात 7 दवस तक ट ब ड ट देखी जाती है । य द घोल म ट बट हो तो टे ट पॉिज टव एवं ट ब ड ट दखलाई न दे तो टे ट नेगे टव होता है । E.coli साई ेट नेगे टव दशाते है । 11.2.5 भावी जीवाणु नाशक औष ध यह जाँच इ फै शन या रोग के व भावी औष ध का पता लगाने के लए करवाई जाती है । इस जाँच के वारा रोग के कारक के व भावी औष धय का पता लग जाता है, िजससे उनके उपचार म मदद मलती है । इस हेतु पूणत: लाई ड तर क से मी डया ( यू ऐंट अगार) बनाया जाता है । इसे लाई ड पे डशस म डालकर ठ डा करने उपरा त नमूने से वाब लेकर इनो यूलेट कया जाता है, फर उस पर संभा वत भावी औष धय क ड क लगाकर 48 घ टे तक इन यूबेट करने के उपरा त देखा जाता है, जो औष ध अ धक भावी होती है, उसका यवहा रक तौर पर उपयोग कया जाता है । 11.2.6 शव पर ण येक कु कु ट पालक को चा हए क फाम पर मृत हरे प ी का शव पर ण कराये ता क बीमार का पता लगाया जाकर सार पर नयं ण कया जा सके । जहाँ तक संभव हो, मृत प ी को शी अ वेशणालय ( योगशाला) म भेज द । य द फाम पर असमय मुग क मृ यु हु ई हो तो शव को बफ म रखना चा हए ता क शव म राईगर मौ टस नह ं हो व पर ण वारा सह न कष नकाला जा सक । पो अ वेशणालय म सु वधापूवक जाँच हो सके , इसके लए मुग फाम पर न न साम ी सदैव उपल ध रहनी चा हए । 10% फामल न का घोल 2% पोटे शयम डाइ ोमेट 50% ि लसर न सेलाईन 70% ए कोहॉल नामल सेलाईन एवं चौड़े मुँह क लाई ड शी शयाँ । पो टमाटम के प चात मुख रोग क जाँच हेतु भेजे जाने वाले नमूने:- 1. रानीखेत रोग (Ranikhet Disease) मि त क तथा झ ल -50% ि लसर न सेलाइन (Glycerine Saline) म े कया ( वास नल ), लैरे स फे फड़े (Lungs) व ोव यूलस को 10% फारमेल न घोल म | 2. मुग चेचक-फाउल पॉ स छोटे-छोटे दान के खुरड (Scab) को
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    132 50% ि लसरन सेलाइन (Glycerine Saline) के घोल म भेज। 3. ए.एल.सी. (A.L.C.) िजगर, त ल , गुद तथा या टक नव को 10% फारमेल न घोलम । 4. ॉ नक रे पाइरेट डसीज (C.R.D.) र त के सीरम को अनवे ण हेतु भेज । 5. टक फ वर (Tick Fever) (i) त ल तथा िजगर को 10% फारमेल न घोल म । (ii) पी ड़त मु गय के र त क लाइड (Slide) बनाकर मथाइल ए कोहल म उपचार के उपरा त भेज । 6. मुग हैजा (Fowl Cholera) (i) र त क लाइड बनाकर ए कोहल (Alcohol) म उपचार कर भेज । (ii) िजगल त ल , आंत के ऊपर भाग को 10% फारमेल न के घोल म भेज। 7. राउ ड वम गोलक ड़े/टेप वम (i) ताजे मल बीट को 10% फारमेल न के घोल म भेज। (ii) क ड़ को 10% फारमेल न अथवा ऐ कोहॉल म भेज। 8. खूनी द त (Coccidiosis) अंत ड़य तथा सीकम से ा त र त रंिजत बीट को 20% पोटे शयम डाइ ोमेट (Potassium Dichromate) के घोल म भेज । 11.3 आहार व लेषण कु कु ट को दये जाने वाले आहार म अलग-अलग आयु वग के अनुसार व भ न पोषक त व का वां छत मा ा म होना अ त आव यक है । अ यथा इनक कमी या अ धकता से कु कु ट म व भ न रोग अथवा रोग जैसी ि थ तयाँ उ प न हो जाती है । इसके लए आव यक है क य द घर पर दाना बनाया जा रहा हो तो उसको व भ न योगशाला म भेज कर आहार म ऊजा, ोट न, वसा, ऐश, नमी, फाइबर आ द का व लेषण करवा ल। 11.3.1 दाने म आदता (मोइ चर) ात करना यह दाने म उपि थत नमी को दशाता है । उपकरण - हॉट एयर ओवन, डेसीके टर, इलेि क तुला
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    133 व ध -मोइ चर ात करने हेतु एक सुखी साफ छोट पै डश ल व इसे तौल ल(W) । इसके प चात इसम 10gm दाना(M) (नमूना) ले एवं इसे ओवन म 100० C पर 6 घ ट के लए रख द । इसके बाद इसे ओवन से नकालकर डेसीके टर म ठ डा कर एवं तौल ल । (W2) गणना - मोइ चर % 1 2 100 W W M    उ त उदाहरण म 1 2 1 2 100 10 10 W W W W      इस कार दाने म नमी क तशत ात करने के बाद पे डश को डेसीके टर म ह रखी रहने देते ह तथा आगे के सम त पैरामीटर (E.E.,CF,) आ द नकालने हेतु इस नमी र हत दाने ( ाई मेटर बे सस) का योग करते है । 11.3.2 टोटल ऐश आव यक रसायन - तनु हाइ ो लो रक अ ल – 5N (445ml सां हाइ ो लो रक ए सड) (36%HCl) को 1 ल टर पानी म मलाये । आव यक उपकरण - ु सबल, मफलफरनस, हॉट एयर ओवन आ द व ध - ु सबल म िजसको क 100o C पर पहले छ: घ टे के लये खाया गया हो और िजसका पूव म तौल कर लया गया हो, म 5-10 gm से पल लेकर तौल लया जाए । इसके प चात ु सबल को ह क आँच पर गम करके मफल फरनस (Muffle Furnance) म रख । इसम 600o C तापमान पर ु सबल को दो घ टे के लए रखे । इसके प चात बाहर नकालकर डे सके टर म रख एवं इसका तौल कर ल । उदाहरण के लए - * खाल व ो सल 39.120gm. * ु सबल का वजन * ु सबल + से पल का भार 44.120gm * ाई मेटर से पल म % 92.38gm * से पल का वजन DM के आधार पर 4.62gm 92.38 5 100       92.38 5 100      
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    134 * ऐश +ु सबल का वजन 39.690gm * ऐश का कु ल वजन 0.570gm.(39.690-39.12 0) * से पल म कु ल ऐश का तशत ऐश का भार x100 से पल का वजन (DM Basis पर) 0.570 100 12.337% 462   11.3.3 ए सड इनसो यूबल ऐश टोटल ऐश नकालने के प चात ु सबल म 25ml तनु हाइ ो लो रक ए सड 5N का घोल मलाकर 10 मनट के लए बनर पर गम कर । म ण को ठ डा करके वा समैन फ टर पेपर पर छान ल । फ टरप को पानी से धोय, जब तक क वो पूणतया ए सड मु त न हो जाये एवं अघुलनशील ऐश ( फ टर प पर से) को ु सबल म लेकर बजल च लत ओवन म 135o C  2o C के लए 3 घ टे के लये रखे । त प चात् इसे मफलफरनस म (600o C  20o C) पर एक घ टे के लए रख । ठ डा होने के प चात् ु सबल को नकाल कर डेसीके टर म रखे एवं तौल ल । पुन: ु सबल को मफल फरनस म 30 मनट के लए रख, ठ डा कर, पुन: तौल ले, ऐसा तब तक कर, जब तक क लगातार दो भार के बीच अंतर 1mg. से कम हो जाए । यूनतम भार को रकाड कर ल ।  2 1 100 % W W gm W W    W - खाल ु सबल का भार W1 - से पल व ु सबल का भार W2 - ए सड इनसो यूबल ऐश + ु सबल का भार 11.3.4 ू ड ोट न आहार म आव यकता से अ धक ोट न देने से प य म वसरल गाऊट होने क बल संभावना होती है । काब नक पदाथ को स यू रक अ ल म गम करके उनम उपि थत नाइ ोजन वारा या करने से अमो नयम स फे ट बनता है एवं डि टलेशन वारा अमो नया गैस नकलती है, िजसको मानक ए सड (अ ल) के वलयन वारा टाइ ेशन से ात कया जाता है । आव यक उपकरण- - माइ ोजे डाज ऐपेरेटस यूरेट 500 म.ल . ला क - राउ ड बोटम ला क, लेट बोटम ला क
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    135 रसायन - पोटे शयम सफे ट, कापर स फे ट, बो रक अ ल, सां स फयू रक अ ल, N/10 स फयू रक अ त, सो डयम हाइ ो साइड, ोमो सोल ीन, मथाइल रेड इं डके टर व ध :- (i) ए ल येट तैयार करना – 2 gm से पल (D) (D.M आधार पर) ल एवं 10 gm डाइजेशन म सचर मलाये (1 gm CUSO4 + 2 gm K2SO4 = डाइजेशन म सचर) एवं 40 म.ल . सां स यू रक अ ल एक ल बी गदन के गोल पदे वाले ला क म ल एवं उसे सहारे से तरछा रखते हु ए धीरे-धीरे गम कर । जब तक क झाग आना ब द हो जाये । त प चात् उसे और अ धक गम कर एवं उबलने द । इसे लगभग 2 घ टे के लए म यम आँच पर उबलने द । फर इसे ठ डा कर ल । इसके बाद इस डाइजे टेड म सचर को चपटे पदे वाले 250 म.ल . वाले ला क म थाना त रत कर एवं उसे 2-3 बार डि टल वाटर से धोकर धोवन को भी मला द, उसम शु पानी मलाकर 250 मल . (B) कर ल । (ii) बो रक ए सड इं डके टर तैयार करना - 10 gm बो रक अ ल म 100ml. ए कोहल मलाये एवं उसम पानी मलाकर 500ml. घोल बनाल । (iii) म सड इं डके टर - ोमो सोल ीन 0.33%, मथाइल रेड 0.66%, ए कोहल म मलाये । इसक कु छ बूँदे बो रक ऐ सड इं डके टर क मलाऐं । (iv) अमो नया एक ीकरण – 100ml. ए ल येट (C) जे डा ज ला क म ल । उसम 10ml. 45% सो डयम हाइ ो साइड मलाये । नकलने वाल अमो नया को 10ml. 2% बो रक अ ल के घोल म सं हत कर ल । जे डाल उपकरण म इस कार डि टलेशन वारा तब तक अमो नया एक करते रहे, जब तक 10ml. बो रक अ ल का आयतन तीन गुना न हो जाये एवं बो रक अ ल वलयन का रंग नीला काला हो जाये । (v) टाइ ेशन - इस हेतु माइ ो यूरेट का योग कर एवं N/10 H2 SO4 के मानक वलयन को यूरेट म ल । बो रक अ ल व एक त अमो नया को टाई ेट कर ल; तथा मानक वलयन (टाईटर) का काम म आया आयतन (A) नोट कर लेव । (vi) गणना = कु ल नाइ ोजन तशत / कु ल नाइ ोजन का भार = टाईटर का आयतन (A) x 0.0014 x ए ल वेट का बनाया गया आयतन(B) x 100 ------------------------------------------------------------------------------------------- ए ल वेट का अमो नया x नमूने का काम म लया भार (D) ( ाईमेटर आधार पर) उ पादन हेतु काम म लया आयतन(C) टाईटर का आयतन Ax 0.0014 250 100 10 2 ml x   उ त उदाहरण अनुसार नमूने म नाइ ोजन का तशत - A x 1.75 C.P. ू ड ोट न - नमूने म नाइ ोजन तशत x 6.25
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    136 उ त उदाहरणअनुसार C.P - A x 1.75 x 6.25 = A x 10.94gm% डि टलेशन पूण होने के बाद जे डाल ला क म से नमूने को नेगे टव ेशर बनाकर नवातन के वारा खाल कया जाता है । 13.3.5 फै ट क जाँच (ईथर-ए स े ट) आहार म अ धक फै ट देने से कु कु ट म फै ट डीजनरेशन ऑफ लवर ए ड कडनी होना देखा गया है । स ा त - नमूने म फै ट (वसा) का ता पय साधारण वसा, वसा अ ल , ए टर, ाकृ तक वसा, ट रो स तथा थूल फै ट (वसा म घुलनशील वटा म स, A,O,E) से होता है । ये सभी पे ो लयम ईथर (B.P.400 C-600 C) म घुलनशील होते है । इनको सॉ सलेट उपकरण म पे ो लयम ईथर वारा ए स े शन से ात कया जाता है । उपकरण - सॉ सलेट ए स े शन ऐसे बल - हॉटमैन फ टर प नं. 1 ( थ बल बनाने हेतु) -हॉट एयर ओवन -डेसीके टर -इले ॉ नक तुला -हॉट लेट -Temperature Bath with Temperature controlling device. रऐजे ट एवं रसायन व ध - पे ो लयम ईथर कै ि सयम लोराईड व ध हाटमैन फ टर प को चौड़ी परखनल के नीचले भाग पर लपेट कर धागे से बाँध द । इसे खींच कर नकाल ल । यह थ बल तैयार है । इसे नॉन एबसॉरबट ई का लग लगाकर बंद कर द । इसे तौल ल । त प चात्इसम दो ाम नमूना ाईमेटर बे सस पर लेकर लग स हत पुन: तोल ल ।(W1) इसे सॉ सलेट उपकरण म इस कार डाल क इसक ऊँ चाई उपकरण के साइफ नंग पांइट से अ धक न हो । सॉ सलेट ऐसे बल को जोड़कर ला क को पे ो लयम इथर से भर द । सॉ सलेट उपकरण क मता से लगभग डेढ़ गुना सालवट ईथर उपकरण म उपर से क प वारा भर । उपकरण को ताप नयं क बाय पर 50-600 C पर चालू कर द । फे ट ए स े शन को लगभग आठ घ टे अथवा 250 च पूरे होने तक चलने द । इसके प चात थ बल को नकाल कर हवा म सुखा ले । पूणतया सूखने के बाद इसे हॉट एयर ओवन म 1000 C पर 6 घ टा रख । बाहर नकाल कर इसे डेसीके टर म ठ डा कर ल । थ बल को पुन: तौल ल । (W2) गणना –W = W1 – W2 ू ड फै ट का तशत = 1 2 100 W W M  
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    137 उ त उदाहरणम= 1 2 1 2 100 50 W W W W M      W - 2 gm दाने म ू ड फै ट ( ाई मेटर आधार पर) W1 - थ बल + लग + 2gm, दाना ाईमेटर आधार पर W2 - थ बल + लग + फे ट ए स े शन के बाद दाना M - ाईमेटर आधार पर उपयोग कये गये नमूने का भार 11.4 कु कु ट संबंधी सं थान एवं सं थाएं आहार व लेषण योगशालाऐ (Feed Anatical Labs)  पशु आहार वभाग, बहार पशु च क सा महा व यालय, पटना – 800 014  पशु आहार वभाग, रांची पशु च क सा महा व यालय, कांके , रांची - 834 007  पशु पालन वभागा य , इलाहाबाद कृ ष सं थान, पो ट कृ ष सं थान, इलाहाबाद- 211 007  कृ ष संकाय, बनारस ह दु व व व यालय बनारस – 221 001  प ी आहार संभाग, के य प ी अनुसंधान सं थान, इ जत नगर (उ. .) 243 122  अ य , पशुपालन एवं डेयर वभाग, आजाद कृ ष व व व यालय, कानपुर – 208 002  कु कु ट व ान वभाग, पशु च क सा महा व यालय, मथुरा  कु कु ट व ान वभाग, पशु च क सा महा व यालय, बीकानेर  पशु आहार वभाग, पशु च क सा महा व यालय, द ण स वल लाइव, जबलपुर - 482 001  पशु आहार वभाग, पशु च क सा महा व यालय, महु 453 441  देवल टे ट हाउस, राश नंग द तर भवन, 9 / 7 शि तनगर, देहल  व तार वशेष , व तार नदेशालय, ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 123 004  पशु च क सा वभाग, पंत कृ ष व व व यालय, पंतनगर- 263 145  सहायक नदेशक (आहार), राज0 कु कु टशला, एम.ए.सी.ट . रोड, भोपाल- 462 003  आहार वशेष कु कु ट आहार योगशाला, पंजाब सरकार, औ यो गक े , चंडीगढ़- 160 002  कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला पशु च क सालय, अजमेर- 305 001  कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला, पशु च क सालय, मोखापाड़ा, कोटा  कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला, राज0 कु कु ट शाला, रातानाडा जोधपुर  कु कु ट रोग नैदा नक एवं आहार व लेषण योगशाला, चेतक स कल, उदयपुर  आहार वशेष , पशुधन अनुसंधान के , ब सी 303 301, िजला - जयपुर ।  के य कु कु टशाला, उ. . सरकार, चक गंजा रया लखनऊ, 226 007  पशु आहार वभाग पंजाब कृ ष व व व यालय, लु धयाना 141 004  ीराम टे ट हाउस, 19, यू नव सट माग, देहल - 110 007
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    138  आहार वलेषण योगशाला, पंजाब सरकार, राज0 कु कु टशाला, लाडोवाल रोड, जलंधर  ोगे सव पो फामस एसो सयेशन, SCF 9/10, सै टर 19-C, चंडीगढ़, 160 019  े ीय आहार व लेषण योगशाला, इ डि यल ए रया, चंडीगढ़- 160 019  उ टा लेबोरे ज ा. ल. आ टा भवन, बापट माग, ब बई – 400 028  पशु पौि टक अनुसंधान योगशाला, आरे कालोनी, ब बई- 400 065  ब बई पशु च क सा महा व यालय, क कण कृ ष व यापीठ, परेल ब बई, 400 012  कु कु ट आहार पर ण योगशाला, गुजरात सरकार, वैटकॉल क पाउंड, आन द- 388 001  महारा राजक य आहार व लेषण योगशाला वारा ऊन अनुसंधान के , भेड़ जनन फाम, गोखले नगर, पुणे- 411 016  गुजरात कृ ष व व व यालय, आन द कै पस, आन द’ 388 110, िजला खेडा  इटालेब ा. ल मेहरा हाऊस, 15 कवासजी पटेल ., ब बई- 400 001  कल कर क स टे टस ल., 917/19-A, शवाजी नगर, पुणे- 411 004  कु कु ट अनुसंधान के ल., नातको तर सं थान, पंजाबराव कृ ष व यापीठ, आकोला  े ीय आहार व लेषण योगशाला, के य कु कु ट जनन फाम आरे म क कॉलोनी,ब बई-400 065  आं देश रा य मांस एवं कु कु ट वकास नगम ल., शां तनगर, हैदराबाद- 500 028  के य खा य तकनीक अनुसंधान सं थान, चेलुब बा मे शन, मैसूर- 570 013  के य कु कु ट श ण सं थान, हसरग ा बगलौर- 56008  म ास पशु च क सा महा व यालय, वैपेर म ास- 600 007  कृ ष व ान महा व यालय- हैबल, पो. बैग नं. बगलोर - 560024  इटातेब ा. ल माक टाइल भवन, 10 लाल बाजार ट, कलक ता- 700 001  उड़ीसा कृ ष एवं तकनीक व व व यालय, भुवने वर- 751003  े ीय आहार व लेषण योगशाला, भारत सरकार, वारा स ल पो ी डंग फाम, भुवने वर- 751 013 (उड़ीसा) (इि डयन पो इ ड इयर बुक से साभार) वै सीन उ पादन सं थान (Vety Biological Units)  पशु जै वक एवं अनुसंधान प रष , शाि त नगर, हैदराबाद- 500 028  पशु वा य एवं उ पादन सं थान, पटना- 800 014  पशु ट का सं थान, तालाब के पास, सै टर-28, गांधीनगर, 382 028 गुजरात  ह रयाणा पशु च क सा ट का सं थान, हसार, 125 004  जै वक उ पादन संभाग, आर.एस.पुरा, ज मू- 181 102  जै वक उ पादन सं थान, रसतपुरा मऊ- 453 446, म य देश  भारतीय ए ो इ ड ज फाउ डेशन याह नगर, पुणे-नगर रोड के सामने, वाँघोल , पुणे-412 207
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    139  पशु चक सा जै वक उ पादन सं थान, गणेश खंड औ ध पुणे- 41107  ीनी जै वक योगशाला ा. ल. 13 / 6 माइल टोन, पा शेटरोड ो.आ. ग रनगर पुणे- 411 025  उड़ीसा जै वक उ पादन सं थान, भुवने वर- 751 003  पंजाब पशु च क सा ट का सं थान, पंजाब कृ ष व व व यालय, लु धयाना 141 004  े ीय पशु च क सा जै वक इकाई, यू कॉलोनी, जयपुर- 302 001  जै वक उ पादन संभाग, पशुपालन वभाग, बादशाह बाग, लखनऊ-226 007  बायोमैड ा. ल. के वी-27, पुराना क वनगर, गािजयाबाद-21002  भारतीय पशु च क सा अनुसंधान प रषद, इ जतनगर / मु ते वर (नैनीताल) (इि डयन पोनी इ ड इयर बुक से साभार) वेल जनन फाम (Quail Breeding Farms)  के य प ी अनुसंधान सं थान, इ जतनगर- 243 122  के य पो ी डंग फाम, औ यो गक े , च डीगढ़- 16002  ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 125 004  कृ ष व ान व व व यालय, हैबल, बगलोर- 560024  टक ी डंग फाम (turkey Breeding Farms)  ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 125004  कृ ष व व व यालय, उदयपुर- 313001 डक जनन शाला (duck Breeding Farms)  आं देश मीट एवं पो डेवलेपमे ट काप . डक ए सटशन से टर, कै कालुर- 521 333  बरसा कृ ष व व व यालय, कांके , रांची- 834007  के य डक जनन फाम- आसाम रा य, का लयाबोर, नोवगांग िजला । सलकोर सलचर, हाजो तथा सबसागर म भी खाक कै पबेल डक उपल ध है ।  के य डक जनन शाला, हैसरघ ा, बगलौर- 560088  राजक य डक ी डंग फाम, बहार रा य, सुपोल िज0 सहरसा  राजक य डक ी डंग फाम, ज मू एवं क मीर रा य, सु बल, सोनावाडी खाक , कै पुबैल, हाइट पे कन  के रला रा य डकफाम, नरानाम- 689621, अ लेपी, के रला  उड़ीसा रा य डक फाम खापु रया, कटक- 753010  ह रयाणा कृ ष व व व यालय, हसार- 125004  कृ ष व व व यालय, उदयपुर - 313001 (इं डयन पो इंड इयर बुक से साभार)  रोग अनुसंधान के (Disease Diagnostic Centres)  पशु च क सालय, मोतीबाग- 1, नई द ल - 110021
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    140  पशु चक सा महा व यालय, हसार- 125 004  रोग नदान योगशाला, हसार, अ बाला गुडगांव, करनाल, रोहतक (ह रयाणा कृ ष व व व यालय)  कै ग फाम ा. ल., एम-49 डी.एल.एफ. कालोनी, गुडगांव  पशु च क सालय, सोनीपत- 131 001  े ीय कु कु ट शाला, कमलाह शमला- 171004  ज मू एवं क मीर रा य - डोडा, ज मू कथुआ, पूंछ, राजौर , उधमपुर, अन तनाग, बडगाम. बरामुला, कार गल, कु पवाड़ा, लेह, पुलवामा  शेरेक मीर कृ ष व व व यालय, नौशैरा ीनगर – 190 011  पशु च क सा महा व यालय, द ण स वल लाइन, जबलपुर  रोग नदान सं थान, म. . शासन, जहांगीराबाद, भोपाल  पशु च क सा महा व यालय, महू- 453441  पंजाब रा य कु कु टशाला, लाडोवाल रोड, जलंधर  डॉ. चावला, 641 गु देव नगर, पखोवाल रोड, लु धयाना  गेटवैल योगशाला, 248 सै टर 35-A चंडीगढ़  नाथन हैचर च सरभा नगर, लु धयाना  पंजाब कृ ष व व व यालय, लु धयाना  पशु च क सा महा व यालय, बीकानेर- 334001  कु कु ट रोग नैदा नक योगशालाएं -अजमेर, कोटा, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर (राज0)  कृ ष व व व यालय, जोबनेर – 303 327  इलाहबाद कृ ष सं थान, पो ट कृ ष सं थान, इलाहबाद -7  पशु च क सा महा व यालय, पंतनगर- 263145  पशुपालन वभाग, उ. . रोग नदान योगशाला, गोकरण नाथ रोड, बादशाह बाग, लखनऊ-226006  भारतीय पशु च क सा सं थान, इ जतनगर- 243122  कु कु ट रोग नदान के , गुजरात रा य, अहमदाबाद, जूनागढ़, नवसार , सूरत पशु च क सा महा व यालय, आन द- 388001  महारा रा य रोग नदान योगशाला, अकोला, ओरंगाबाद, ब बई, चपलुन, को हापुर, नागपुर, ना सक  वै टे वरा हैचर ज 13 / 6 मील, पा शट रोड, पुणे-25  पशु च क सा महा व यालय, पटना- 8000014  रोग नदान योगशाला, चप लमा- 768 026  उड़ीसा (इि डयन पो इ ड से साभार)
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    141 11.5 सारांश कु कुट यवसाय म रोग नदान अ य त मह वपूण वषय है, य क कु कु ट के संबंध म रोग का सार अ त ती व पूरे लॉक को चपेट म ले लेने वाला होता है । इसके अ त र त रोग फै लने पर उपचार के वल रोगी प ी का न होकर रोग क संभावना को देखते हु ए पूरे के पूरे लॉक या समूह का कया जाता है, जो आ थक ि ट से यवसाय पर बोझ बन जाता है । व भ न सं ामक रोग के नदान से प ी का सह उपचार तो कया ह जा सकता है, बि क े म होने वाले सामा य सं मण का अंदाजा भी लगाया जा सकता है, िजससे भ व य म पाले जाने वाले कु कु ट का सं मण के व ट काकरण कया जा सके । कु कु ट पालन म लागत का लगभग 60% से 70% धन आहार पर ह खच होता है । अत: संतु लत आहार देकर लागत को कु छ कम कया जा सकता है । इसके अ त र त य द व भ न पोषक त व / मनरल / वटा मन आ द कम / अ धक दये जाये तो कु कु ट वा य एवं उ पादन पर ाय: वपर त भाव डालते है । अत: िजससे संतु लत आहार का दया जाना और भी ज र हो जाता है ।
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    142 इकाई : कुकट पालन म योग म ल जाने वाल व भ न औष धयाँ एवं उनक फामकोलोिजकल व लेषण इकाई – 12 12.0 उ े य 12.1 तावना 12.2 मु गय म काम आने वाल औष धयां 12.2.1 ए ट बायो ट स ( तजै वक) 12.2.2 स फोनेमाइ स 12.2. लोरो योनोल एवंम अ य ए ट बायो ट स 12.2.4 ए ट को सी डयलस 12.2.5 कृ मी नाशक औष धयाँ (आ तर क परजीवी के लये औष धयाँ) 12.2.6 बा य परजीवी के लए औष धयाँ 12.2.7 तनावनाशक औष धयाँ 12.3 सारांश 12.0 उ ेशय :- कु कु ट पालन यवसाय म लाभ म कमी का एक मुख कारण है व भ न रोगो से मु गय क मृ यु । उ चत समय पर रोग क पहचान कर आव यक उपचार करने से बीमा रय पर नयं ण कया जा सकता है । मु गयां भी जीवाणु वषाणु परजीवी, ऋतुओं म बदलाव, ेस तनाव) तथा आहार इ या द कारण से बीमार पड़ जाती है तथा मृ यु भी हो जाती है । मु गय को बचाने के व भ न औष धय का योग कया जाता है । औष धय को काम लेने से पूव हम उनक उपयो गता, योग मा ा तथा उपल धता के बारे म पूर जानकार होनी चा हये । मुग पालक को कसी भी दवा का योग करते समय पशु च क सक क देखरेख म नमाता वारा दये गये नदश का पालन अव यक कर । 12.1 तावना :- मुग पालन के यवसाय म आज भारत का व व म पांचवा थान है । कं तु यवसाय से होने वाल आय का एक बड़ा ह सा रोग व उपचार पर यय हो जाता है । मु गय को सामू हक
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    143 र त सेरखा जाता है । उनका खान-पान एक ह जगह पर होता है । इस ि थ त म ादुभाव हो जाए तो उसका सार तुरंत होता है । मु गय म अनेक तरह क बीमा रयाँ होती है तथा मृ यु दर भी बहु त होती है । कु छ बीमा रय म मृ यु नह ं होती पर वृ क जाती है तथा भार म कमी आ जाती है । मु गय म मृ यु दर पांच तशत से अ धक नह ं होनी चा हये । इस लये मृ यु दर पर नयं ण रखना आव यक है । मु गय को लाते समय यातायात के कारण उन पर जो तनाव आता है उसके कारण वे बीमा रय के शकारबनते है । इस लये उ ह तनाव नाशक दवा द जाती है । आ त रक व बा य परजीवी के कारण मु गय का उ पादन तर या शार रक वकास क जाता है I कै ि शयम, फा फोरस, मैगनीज, िजंक सेले नयम और जीवनस व ए, बी1, बी2, बी12, डी3 पया त मा ा म न मलने के कारण कु पोषण के शकार हो जाते है । कु पोषण भी बीमार और मृ यु का कारण हो सकता है । बीमा रय के अनुसार औष ध देनी चा हये । औष ध पानी या दाने म मलाते समय इस बात का यान रखे क आपके पास कतने चूजे या मु गयाँ है तथा उनको कतने पानी या दाने क आव यकता होती है । उसी के अनुसार दवा पानी या दाने म मलाव। 12.2 मु गय म कम आने वाल औष धयाँ 12.2.1 ए ट बायो ट स ( तजै वक) सू म जीव ज तुओं जैसे ई ट, मो ड इ या द वारा उ पा दत रसाय नक पदाथ शर र म या त इ फे शन को आगे बढने म रोकने म सहायक होते ह या रोग के उपचार म सहायक होते है । जीवाणु ज नत रोग के बचाव तथा उपचार हेतु एंवम वषाणु ज नत रोग हो जाने पर वतीयक जीवाण क रोकथाम के लय ए ट बायो ट स का उपयोग कया जाता है । सु म मा ा म ए ट बायो ट स का उपयोग मु गय म शार रक वृ तथा आहार उपभोग क मता बढाने हेतु उपयोग म लया जाता है । एंट बायो ट स वलय काब नक पदाथ का समूह है ए ट बायो ट स म त आहार खलाने से मु गय क आत म पोषक पदाथ का सं ले षत करने वाले सू म जीव क सं या व याशीलता म वृ होती है । मु गय को समूह म पाला जाता है तथा इनका इलाज भी समूह म कया जाता है । मु गय म न न ल खत ए ट बायो ट स का योग कया जाता है । अगर दवा पानी या दान म मलाकर द जाती है तो उस दौरान दवा यु त पीने का ह पानी तथा दवा यु त दाना ह देव । 1. इर थरोमाइसीन थायोसाईनेट (Erythromycin thiocinate) - एक ाम पाउडर म 50 मल ाम दवा होती है । उपयोग:- वास स ब धी बीमार या जैसे ा नक रे पीरेटर डीिजज (Chronic respiratory disease, CRD), इके सीयस कोराइज (Infectious coryza), ब यु को ब (Blue comb), इ फे शीयस साइनुसाइ टस (Infectious sinusitis) तथा ेस (तनाव) इ या द के बचाव व इलाज हेतु ।
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    144 योग मा ा:- बचाव हेतु - 1 ाम दवा का पाउडर को एक ल टर पानी म घोल कर देवे । यह दवा 3-5 दन तक देते है । हमेशा दवा के ताजा घोल का योग कर । इलाज हेतु - 4 ाम दवा का पाउडर एक ल टर पानी म घोलकर रोजाना 3-5 दन तक देव। उपल धता - 100 ाम के पैके ट 2. जे टा मसीन स फे ट इ जे सन - एक मल ल टर म 40 मल ाम दवा होती है । उपयोग :- इस दवा का उपयोग एक दन के चूज म ारि भक मृ यु दर कम करने के लये कया जाता है । इसके अलावा सी.आर.डी., वंग रोट बीमा रय म उपयोग कया जाता है । िजन अ ड से चूजे ा त करने हो उन अ ड को इस दवा म पहले भगोया जाता है । योग मा ा :- पांच मल ल टर दवा को 495 मल ल टर पानी (Distilled water) मलाकर एक दन के म आधा मल ल टर दवा मांस पे शय म द जाती है । मु गय म 2-5 मल ाम दवा द जाती है । अ ड को सेने से पहले दवा का घोल बनाकर 10 सैक ड तक डुबोकर रखा जाता है । 1000 अ ड को भगोने के लये 7 मल ल टर दवा 493 मल ल टर पानी म डाले । उपल धता - यह दवा 30 मल ल टर क पे कं ग म मलती है तथा एक मल ल टर दवा म 40 मल ाम दवा क मा ा होती है । 3. अमो सी सल न ाइहा ैट (Amoxycillin) 50% W/W उपयोग :- इस दवा का उपयोग जीवाणु ज नत बीमा रयाँ जैसे – को लसे ट सीमीया, फाऊल कोलेरा इ फे शीयस कोराइजा फाऊल टाईफाइड, पुलोरम रोग, वंग रोट रोग तथा ने ो टक एं ाइ टस इ या द रोग के उपचार के लये कया जाता है । योग मा ा:- 40 मल ाम दवा त कलो भार पर द जाती है । एक ाम दवा को 1 ल टर पानी म घोलकर रोजाना 5 दन तक दवा यु त पानी देव । उपल धता :- 50 ाम पैके ट 4. अपरामाइ सन स फे ट (Apramycin sulfate) उपयोग :- इस दवा का योग ई कोलाई, सालमोनेला, कलेब स ला तथा ो टयस नामक जीवाणु से ह ने वाल बीमा रय म कया जाता है । योग मा ा :- 20-40 मल ाम त कलो ाम शर र भार पर दवा का योग पीने के पानी म 3-5 दन तक करना चा हये । उपल धता:- 30 ाम, 100 ाम तथा 50 ाम के पैके ट म । 5. लोरमफे नीकाल (Chloramphenicol 20% W/W) उपयोग :- इस दवा का उपयोग जीवाणु से होने वाले द त, आत के रोग जैसे द त लगना इ या द म काम लया जाता है । योगमा ा :- 20 ाम त ि वंटल मु गय के दाने म मलाकर दया जाता है ।
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    145 उपल धता :-200 ाम, 500 ाम पैके ट म 6. डो सीसाइ ल न हा ो लोराइड (Doxycycline HCL 100 mg/g) उपयोग :- ाम नेगे टव जीवाणु तथा माइको लाजमा तथा ाम पोजी टव तथा रके ट सया नामक जीवाणु से होने वाले रोग म बचाव व इलाज हेतु इस दवा का योग कया जाता है। योग मा ा :- महामार के प म बीमार होने पर प हले दन 10 ाम पाउडर को 20 ल टर पानी म घोल कर दया जाता है । तथा दूसरे दन से 5 दन तक 10 ाम पाउडर को 40 ल टर पानी म घोल कर दया जाता है । चूज म मृ यु दर को रोकने के लए 10 ाम दवा को 80 ल टर पानी म घोल कर पहले 3-4 दन तक दया जाता है तथा 1 मह ने क आयु म 4-6 दन तक दया जाता है ेस म इस दवा का योग कया जाता है । 10 ाम दवा को 40 ल टर पानी म घोलकर देव । उपल धता :- 10 ाम, 50 ाम तथा 250 ाम पैके ट 7. सेफाले सीन - (Cephalexin 7.5% W/W) उपयोग :- जीवाणु ज नत रोग से बचाव व इलाज के लये इस दवा का योग कया जाता है । योग मा ा :- बचाव हेतु - 20 ाम दवा 3000 चूज को 3-5 दन तक द जाती है । ोवर तथा लेयर मु गय म 20 ाम दवा 250 मु गय के लये 3-5 दन तक द जाती है । इलाज हेतु - यह दवा चूज म 20 ाम 1500 चुज म 3-5 दन तक द जाती है । ोवर तथा लेयर मु गय म 20 ाम दवा 100 मु गय म 3-5 दन तक द जाती है । उपल धता - 20 ाम तथा 200 ाम पैके ट म । 8. कलोर टासाइकल न (Chlortetracycline 5.5% W/W) उपयोग - यह दवा साइनोसाइ टस ब यूको ब तथा जीवाणु ज नत रोग से बचाव व इलाज हेतु काम आती है। योग मा ा - ो नक रे पीरेटर डीिजज के बचाव हेतु 30 ाम दवा 10 ल टर पानी म घोलकर दवा यु त पानी ह दया जाता है तथा रोग होने पर इलाज हेतु 60 - 120 ाम दवा को 10 लटर पानी म घोलकर दवा यु त पानी पीने को दया जाता है । चूज म ारि भक मृ युदर रोकने हेतु 60 ाम दवा 10 ल टर पानी म घोलकर दो स ताह तक द जाती है तथा बाद म 30 ाम दवा 10 ल टर पानी म घोलकर लगातार द जाती है । उपल धता :- 100 ाम तथा 1 कलो के पैके ट 9. कोल सट न स फे ट (Colistin sulphate) % & 100mg/g (0.1% W/W) उपयोग :- ाम नेगे टव जीवाणुओं से होने वाले रोग के बचाव व उपचार हेतु, भार बढाने तथा चूज म मृ यु दर कम करने हेतु । योग मा ा :- बचाव हेतु :- 50 ाम दवा त टन मु गय के दाने म मलाकर देव । इलाज हेतु :- 200 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर 20 दन तक देव या 2 ाम दवा 15 ल टर म मलाकर 75-100 मु गय को 5 दन तक देव । शार रक वृ / भार बढाने हेतु - 50 ाम त टन दान म मलाकर चूज को देव । उपल धता :- 200 ाम पैके ट
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    146 10. डो सीसाइल न (Doxycycline) 2.5% W/W :- उपयोग :- चूज म ारि भक मृ यु रोकने हेतु, इ फे ि सयस कोरायजा, कोल से ट समीया, बेसीलर हाइट डाय रया, सी.आर.डी रोग म योग मा ा:- बचाव हेतु :- 1 ाम दवा 2 ल टर पानी म घोलकर 5 दन तक देव । इलाज हेतु :- 2 ाम दवा 1 ल टर पानी म घोलकर पहले दन देव । अगले पांच दन व ाम दवा व ल टर पानी म घोल कर पांच दन तक देव । ेस म - तनाव म 1 ाम दवा 1 ल टर पानी म 5 दन तक देव । उपल धता :- 50 ाम पैके ट म । 11. टाइमूट न (Tiamutin 45%) उपयोग :- मु गय म माइको लाजमा वारा सं मण के बचाव व इलाज हेतु । योग मा ा:- पहले स ताह - 1000 चूज के लए 5 ाम दवा 20 ल टर पानी म घोल कर तीन दन तक देव । चौथे स ताह- 27.5 ाम दवा 60 ल टर पानी म घोलकर देव । छटे स ताह - 35 ाम दवा 60 ल टर पानी म घोल कर देव । नव स ताह - 506 ाम दवा 110 ल टर पानी म घोल कर देव । उपल धता - 30 ाम के पैके ट म । 12. नयोमाइसीन स फे ट (25%) Neomycin sulphate उपयोग :- ायलर तथा लेयर मु गय म ारि भक मृ यु दर रोकने, द त रोकने हेतु तथा द गई खुराक को ज द मांस म तबद ल करना (better feed conversion) आहार उपभोग क मता बढाने के लये योग मा ा:- एक दन के ओ से 5 स ताह के चूज के लए - 1 ाम दवा 5-7 ल टर पानी म घोल कर रोजाना देव । Breeders( डस) - एक ाम दवा 2-3 ल टर पानी म देव । दवा का घोल हर रोज साफ पानी म बनाय। उपल धता :- 50 ाम पैके ट 13. टे ासाई ल न पाउडर-200 मल ाम येक 4 ाम पाउडर म उपयोग :- यह दवा चूजो म ारि भक मृ यु दर रोकने, फाउल टाईफाइड, फाउल कोलेरा ई कोलाई इ फे ि शयस कोराइजा रोग म आंत तथा सांस क बीमा रय म सी.आर.डी तथा माइको लाजमो सस रोग म उपयोग म ल जाती है । योग मा ा - 50 मल ाम त एक कलोभार 5-7 दन के लये द जाती है । उपल धता - 250 ाम के पैके ट म । 14. टाईलो सन (Tylosin as tartrate) - 5 ाम त 10 ाम पाउडर उपयोग :- यह दवा स.आर.डी रोग म तथा माइको लाजमा गे लसे ट कज तथा माइको लाजमा साइनोवी नामक जीवाणु से होने वाले रोग म काम आती है । योगमा ा :- 220 मल ाम त कलो भार पर पीने के पानी म द जाती है ।
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    147 इलाज हेतु -ायलर तथा लेयर मु गय म 500 मल ाम दवा एक ल टर पानी म घोल सुबह तथा इतनी ह दवा शाम को द जानी चा हये । यह दवा तीन दन तक द जाती है । उपल धता :- 30 ाम, 100 ाम, 500 ाम तथा 5 कलो ाम पैके ट म । 15. ल कोमाइसीन हा ो लोराइड (Lincomycin hel) - 8 ाम त एक कलो उपयोग :- ायलर तथा लेयर मु गयो म ने ो टक ए ाइ टस(1Necrotic entrities) नामक बीमार के बचाव एंवम इलाज हेतु योग कया जाता है । योग मा ा :- बचाव हेतु - 750 - 1000 ाम त टन दाने म मलाकर मु गय को तीन दन तक दया जाता है । इलाज हेतु – 2.5 कलो दवा त टन दाने म मलाकर तीन दन तक दया जाना चा हये । उपल धता - 1 कलो ाम के पैके ट म । 16. ए पी सल न ाइहाइ ेट (Amplcillin trihydrate) उपयोग:- मु गय म जीवाणु से होने वाले रोग जैसे लो डीयल ए ाइ टस (Clostridail entertis) ई कोलाई एं ाइ टस (E. Coli enteritis) सालमोनीला ए ाइ टस (salmonella enteritis), शीगेला ए ाइ टस (Shigella enteritis), कोराईजा (Coryza) एंव फाउल कोलेरा (Fowl cholera) योग मा ा :- एक स ताह क उ के 3000 चूज के लए 100 ाम पाउडर को 165 ल टर पानी म घोलकर देव । दो स ताह क उ के 1400 चूज के लये 100 ाम पाउडर 165 ल टर पानी म घोलकर देव । तीन स ताह क उस के 880 चूज के लए 100 ाम पाउडर 165 ल टर पानी म घोलकर देव । चार स ताह क उ के 670 चूज के लए 100 ाम पाउडर 165 ल टर पानी म घोलकर देव । इलाज 3-5 दन तक कर । पानी म दवा घोलने के बाद 7 दन के अ दर उपयोग कर । उपल धता - 100 ाम तथा 500 ाम पैके ट म । 12.2.2 स फोनेमाइडस (Sulphonemides) स फोनेमाइडस दवा भी व भ न कार के जीवाणु से होने वाले रोग म उपयोग ल जाती है । यह बे ट र यो टे टक है। यानी जीवाणु का म ट पलाई करने से रोकती है । स कोनेमाइडस दवा म अ धकतर स काडाईजीन, स फा लोर यार डेजोन तथा स कामीथेजोल, ाईमेथोपर म (Triomethoprim) के साथ उपयोग मे ल जाती है। 1. स फाडाईजीन 10% एंवम ाइमेथोपर म 2% W/W उपयोग :- इस दवा का म ण कोल बेसीलो सस(Colibacillosis)] इन सीयस कोराइजा (Infectious coryza), बेसीलर लाइट डायी रया (Bacillary white diarrhea)] सालमोनेलो सस(Salmonellosis) आ द जीवाणु ज नत रोग म उपयोग होता है । योग मा ा :- 20 ाम दवा को 20 ल टर पानी म घोलकर रोजाना 100 मु गय को 3-5 दन तक दया जाता है ।
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    148 उपल धता -100 ाम पैके ट 12.2.3 लोरो योनोलो स एवं अ य एं टबे ट रयल दबा (Fluoroquinolones and other antibacterial) 1. यूरालटोडोन (Furaltadone) 20% W/W उपयोग - सालमोनेलो सस पुलोरम फाउल टाइफाइड सी.आर.डी, इ फे स सयस साईनोसाइट स, ह टोमोनीय सस नामक रोग म उपयोग म ल जाती है । योग मा ा - चूज म 5 ाम दवा एक ल टर पानी म घोलकर 7-10 दन तक देते है । उपल धता :- 30 ाम पैके ट 2. स ो लो सासीन हाइ ो लोराइड (Ciprofloxacin hcl 10 %) उपयोग :- जीवाणु ज नत रोग जैसे सालमोनेलो सस कोल बेसीलो सस फाउल कोलेरा सी.आर.डी इ या द म इलाज हेतु उपयोग कया जाता है । योग मा ा :-10 मल ाम त कलो शर र भार पर त दन 5-7 दन तक दया जाता है । उपल धता :- 100 ाम, 250 ाम पैके ट म । 3. एनरो लो सा सन (Enrofloxacin) 100 मल ाम त मल ल टर उपयोग :- कोल बे सलो सस, इ फे ि शयस कोरायजा, पा चुरेलो सस, सालमोनेलो सस फाउल टाइफाइड फाउल कोलेरा नामक बीमार य के इलाज व बचाव हेतु । योग मा ा:- 50 मल ल टर दवा को 100 ल टर पानी म घोल कर 3-5 दन तक के वल दवा यु त पानी देव । उपल धता :- 100 तथा 500 मल ल टर 4. एनरो लो से सन का घोल - (Enrofloxacin 10% W/V oral solutions) उपयोग :- माइको लाजमा तथा िजवाणु ज नत रोग के बचाव व इलाज हेतु । योग मा ा:- बचाव हेतु :- 2.5 से 50 मल ाम त कलो शर र भार पर यानी 1 मल ल टर दवा 4-8 ल टर पानी म डालकर 3-5 दन तक देव । इलाज हेतु :- 10 मल ाम त कलो शर र भार पर यानी 1 मल ल टर दवा 2 ल टर पानी म घोलकर 3-5 दन तक देव । उपल धता - 500 मल ल टर पैक म । 5. युराजोल डोन 5% मे थयोनीन के साथ (Furazolidone 5% with methionine) उपयोग :- चूज म ारि भक मृ यु दर रोकने हेतु तथा जीवाणु ज नत रोग को रोकने हेतु योग मा ा :- 8 कलो पाउडर को एक टन दाने म मलाकर दस दन तक देव । उपल धता :- 10 कलो पैक म । 6. युरालटाडोन हा ो लोराइड (Fluraltadone hcl 20% W/W) उपयोग :- जीवाणु ज नत रोग के उपचार हेतु योग मा ा:- 1 ाम दवा एक ल टर पानी म घोल कर 10 दन तक देव ।
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    149 उपल धता :-30 ाम पैके ट म । 7. लोरहाइ ो सी यूनोलाइन (Chlorhydroxy quinoline 3% W/W) उपयोग :- ाम पोजी टव तथा ाम नेगे टव जीवाणु ज नत, फं गाई तथा ोटोजोआ से होने वाले रोग म योग मा ा:- ायलर चूज के लये (1 दन से 3 स ताह तक) 2 कलो त दन दाने म मलाकर देव । (4 से 8 स ताह तक) एक कलो तटन दाने म मलाकर देव। उपल धता :- एक कलो के पैक म । 12.2.4 ए ट को सीडीयलस (Anticoccidials) 1. ड नटोलमाइड 25% W/W (Dinitolmide) उपयोग :- यह सभी तरह के को सी डया को नाश करती है जो को सी डयो सस नामक बीमार करते है । सभी तरह के का सी डयो सस के इलाज हेतु इस दवा का योग होता है । योग मा ा - 500 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर 3-5 दन तक देव । उपल धता :- 1 कलो ाम व 25 कलो ाम पैके ट 2. ए ो लयम हाइ ो लोराइड 20% ओर युरालटाडोन 20% (Amprolium hcl 20% and Furaltadone 20%) उपयोग :- इस म त दवा का योग का सीडीया परोपजीवी तथा जीवाणु से होने वाले रोग के बचाव व इलाज हेतु कया जाता है । बचाव हेतु :- 30 ाम पाउडर को 100 ल टर पानी म घोलकर 5-7 दन तक दया जाता है। इलाज हेतु - 30 ाम पाउडर को 50 ल टर पानी म घोलकर 5-7 दन तक दया जाता है। उपल धता :- 30 ाम पैक म । 3. ए ो लयम हाइ ो लोराइड 20% पाउडर (Amprolium hydrochloride 20%) उपयोग :- का सी डयो सस रोग के इलाज हेतु योगमा ा :- 30 ाम पाउडर को 25 ल टर पानी म घोलकर 5-7 दन तक दया जाता है । इलाज के दौरान दवा यु त ह पीने का पानी देना चा हए हमेशा दवा का ताजा घोल बनाकर देना चा हए । उपल धता :- 30 ाम पैक म । 4. ना ोफु राजोन 100 मल ाम तथा युराजोल डोन 14.5 मल ाम को गोल (Nitropfurazone 100 mg, Furazolidone 14.5 mg per Tablet) उपयोग :- मु गय म को सी डयो सस रोग के इलाज हेतु योग मा ा:- रोजाना एक गोल एक ल टर पानी म घोलकर सात दन तक देव । उपल धता :- 50 गोल का पैके ट 5. का ीनाल (Codrinal powder) उपयोग :- का सी डयो सस रोग के बचाव व इलाज हेतु इस पाउडर का योग कया जाता है ।
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    150 योगमा ा :-इलाज हेतु 4 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर 2-4 दन तक दया जाता है । बचाव हेतु :- 1 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर 2-4 दन तक देव । उपल धता :- 100 ाम पाउडर का पैके ट 6. स फा लोरपाईरेजीन सो डयम - 30 ाम त 100 ाम पाउडर (Sulphachlor pyrazine sodium 30 g per 100 g) उपयोग - मु गय म का सी डयो सस रोग के इलाज हेतु । योग मा ा:- रोजाना 1 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर 3 दन तक देव । उपल धता :- 100 ाम पैके ट 7. स फा योनो सेल न सो डयम (Sulfaquinoxaline sodium) (7.5 ाम त 30 ाम पाउडर म) उपयोग :- का सी डयो सस रोग के इलाज हेतु योग मा ा:- 1 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोल कर 3 दन तक देव । उपल धता - 30 ाम पैके ट 8. लोपीडोल (Clopidol 25 g per 100 g) 25 ाम त 100 ाम उपयोग :- को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु योग मा ा :- 500 ाम पाउडर को तटन दाने म मलाकर देवे । एक दन क आयु से बेचे जाने से 3 दन पहले तक देव । उपल धता :- 1 कलो ाम तथा 50 कलो ाम के बैग म 9. लासालो सड सोडीयम 15% (Lasalocid sodium 15%) उपयोग :- का सी डयो सस रोग से बचाव हेतु योगमा ा :- 600 ाम पाउडर को एक टन दाने म मलाकर देवे । उपल धता :- 600 ाम पैके ट म । 10. साल नोमाइ सन 6% (Salinomycin 6%) उपयोग :- ायलर ओ म को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु योग मा ा:- 1 कलो ाम दवा को एक टन दाने म मलाकर एक दन क आयु से बेचे जाने तक देव । उपल धता :- 5 कलो ाम बैग म । 11. डाइनोइ ो-ओथ टूलामाइड 25% W/W (Dinitro-ortho-Toluamide) उपयोग :- मु गय म को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु । योग मा ा:- 500 ाम तटन दाने म मलाकर देवे । उपल धता :- 5 कलो ाम का जार 12. मादुरामाइ सन अमो नयम 1% (Maduramicin ammonium) उपयोग :- को सी डयो सस रोग के बचाव हेतु योग मा ा:- 500 ाम दवा को एक टन दाने म मलाकर देव । उपल धता :- 5 कलो एवं 25 कलो के पैक म ।
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    151 13. मोनेन सन(Monensim) :- 100 ाम त कलो ाम उपयोग :- काकसी डयो सस रोग के बचाव हेतु योग मा ा :-1 कलो दवा 1 टन दाने म मलाकर एक दन क आयु से बेचे जाने से 3 दन पहले तक । उपल धता :- 1 कलो ाम एवं 5 कलो ाम पैक म । 14. डाइ लाजु रल 0.5% (Diclazuril-0.5%) उपयोग :- का सी डयो सस रोग के बचाव हेतु । योग मा ा:- 200 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर देवे । उपल धता :- 1 कलो ाम पैक म । 15. हेलोफयुगीनोन (Halofuginone 6 mg per g) उपयोग :- का सी डयो सस रोग के बचाव हेतु । योग मा ा :- 500 ाम दवा एक टन दाने म मलाकर देव । उपल धता :- 1 कलो ाम पैक म । 12.2.5 कृ म नाशक (Anthelmentics) (आ त रक परजीवी के लये औष धयाँ) यवसा यक मुग पालन म डीप लटर णाल म बहु धा मु गय म आ त रक कृ म पाये जाते है । मु गय म अ धकतर गोल या फ ता कार कृ म पाये जाते है । य द इनका नदान न कया जाये तो उसका उ पादन तर तथा शार रक वकास क जायेगा । सफल कु कु ट पालन म नि चत त थ को मुग समूह को औषध नमाताओं के नदशानुसार कृ मनाशक दवा देनी चा हये । मु गय म आ त रक परजीवी को ख म करने के लए न न ल खत दवा का योग कर । 1. एलबे डेजोल 2.5% (Albendazole 2.5%) उपयोग :- गोल व फ ताकृ मी के इलाज के लये योग मा ा :- 30-45 मल ल टर दवा पीने के पानी म 100 मु गय के लए उपल धता :- 30 मल ल टर, 160 मल ल टर, 500 मल ल टर तथा 1 व 5 ल टर पैक म । 2. लवे मसोल हाइ ो लोराइड 300 मल ाम त ाम (Levamisole hydrochloride) उपयोग :- मु गय म गोल व फ ता कृ म के इलाज के लये योग मा ा :- 5 ाम पाउडर को 4 ल टर पानी म घोलकर 80-100 मु गय के लये । उपल धता :- 5 ाम व 100 ाम पैके ट 3. टै ा मसोल हाइ ो लोराइड (Tetramisole hcl 30% W/W) उपयोग :- गोल कृ म के इलाज हेतु । योगमा ा :- 100 ाम पाउडर को 40 ल टर पानी म घोलकर 1000 मु गय के लए काम म ल । उपल धता :- 10 व 100 ाम पैक म ।
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    152 4. डाइ लोरोफेन (Dichlorophen 100 mg/g) उपयोग :- फ ता कृ म के इलाज के लए । योग मा ा :- 1 कलो पाउडर 50 कलो दाने म मलाकर 1000 मु गय को देव । उपल धता :- 1 कलो के पैक म । 5. फै नबे डाजोल (Fenbendazole 2.5%) उपयोग :- गोल कृ म एवं फ ता कृ म के इलाज हेतु । योग मा ा:- 5 मल ाम त कलो भार पर उपल धता - 6 ाम एवं 120 ाम पैक म । 6. पाइपरेजीन हाइ ेट (Piperazine hydrate 45%) उपयोग - गोल कृ म के इलाज हेतु । योग मा ा:- 6 स ताह से बड़ी मु गय को 0.5 मल ल टर दवा द । 6 स ताह से छोट मु गय को 0.25 मल ल टर दवा द । उपल धता :- 500 मल ल टर के पैक म । 12.2.6 बाहय परजी वय (जूं ल ख, कलनी, चचंड) से बचाव के लये न न ल खत दवाएं काम म लेते है । दवा का उपयोग नमाता के नदशानुसार करने पर अ छे प रणाम मलते है । 1. कु माफोस (Coumafos 50% W/W) उपयोग :- बा य परजी वय के इलाज के लए (जुए, चीचड़, ब थी एवं प सू योग मा ा :- 2 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर मु गय के शर र पर छड़क देव । 4 ाम पाउडर को एक ल टर पानी म घोलकर मुग शाला क दवार , फश एवं छत पर छड़के । उपल धता :- 15 ाम, 1 कलो ाम पैक म । 2. डेलटामेथर न (Deltamethrin 12.5% EC) उपयोग :- बा य परजी वय के नय हेतु । योग मा ा :- 2-4 मील लटर दवा को एक ल टर पानी म घोलकर े पंप से मु गय पर े कर देव या मु गय को दवा के घोल म डुबोकर नकाल ल । यह दवा 12-15 दन बाद दुबारा छड़काव कर देव । मुग शाला क द वार , फश तथा छत पर भी दवा का छड़काव कर देव । उपल धता :- 15 व 50 मल ल टर पैक म । 3. सा मेथर न (Cypermethrin 100 mg/ml) उपयोग :- बा य परजी वय के नय ण हेतु योग मा ा:- 1 मल ल टर दवा को एक ल टर पानी म घोलकर जे कर देव ।मुग शाला के फश, दवार तथा छत पर से करने के लये 20 मल ल टर दवा को एक ल टर
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    153 पानी म घोले। 5 ल टर दवा का घोल 100 कवायर मीटर े के लये उपयु त है । 4. फे नवलेरेट (Fenvalerate 20% W/V) उपयोग :- बा य परजी वय के इलाज हेतु । योग मा ा:- आधा मल ल टर दवा एक ल टर पानी म घोल कर मु गय पर छड़काव कर देव । 12.2.7 तनावनाशक औष धयाँ वै सीनेशन, ांसपोटशन, च च काटना, मौसम क खराबी, आहार म बदलाव, बीमार का सं मण तथा रोग क अव थाएं इ या द ऐसे कारण ह िजनम तनाव होना वाभा वक है । अ य धक एवं लगातार तनाव का रहना पो फामर को आ थक हा न पहु ँचाता है । 1. लोरटे ासाई ल न (Chlortetracycline 5.5% W/W) उपयोग - मु गय म शार रक वृ तथा तनाव को कम करने के दाने म इस ए ट बायो टक का उपयोग कया जाता है । योग मा ा:- 100 ाम दवा को एक टन दाने म मलाकर देव । यह दवा हर म हने एक स ताह तक देव । उपल धता :- 20 कलो के पैक म । 2. टे ासाइक लन हाइ ो लोराइड (Tetracycline Hcl 50 mg per gram) उपयोग :- मु गय म तनाव को कम करने क लए । योग मा ा :- 5 ाम दवा को 45 ल टर पानी म घोलकर दवा यु त पानी देव । 3. जी ेस (Zeetress) उपयोग :- मु गय म तनाव कम करने हेतु । योग मा ा :- 5 से 10 ाम दवा को 5 ल टर पानी म घोलकर देव । उपल धता :- 10 ाम पैक म 12.3 सारांश :- मु गय म जीवाणु ज नत, वषाणु ज नत, परोपजीवी तथा परजीवी रोग हो जाने पर व भ न कार क ए ट बायो ट स कृ म नाशक दवा का योग नमाता वारा दये गये नदशानुसार करना चा हये । अगर समय पर मु गय का इलाज न कया जाये तो मुग पालन का बहु त आ थक नुकसान हो जाता है । मु गय क सं या के अनुसार दवा को पानी या दाने म मलाकर उ चत मा ा म देना चा हये ।
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    155 इकाई – वभ न मौसमी रोग एवं बचाव इकाई - 13 13.0 उ े य 13.1 तावना 13.2 मौसमी रोग : यान देने यो य बात 13.3 मौसमी रोग 13.3.1 स दय म होने वाले रोग (i) कोल से ट स मया (ii) युमो नया (iii) पुलोरम रोग (iv) आई.बी. (v) आई.एल.ट . (vi) C.R.D. सी.आर.डी. 13.3.2 ग मय म पाये जाने वाले मुख रोग (i) पाँ स (ii) पाईरोक टो सस (iii) ह ट ोक (Heat Stroke) (iv) वटा मन A क कमी (अथवा A vitaminosis A) (v) ेस अथवा तनाव का रोग 13.3.3 वषाज नत रोग (i) फाउल कॉलेरा (ii) कोराइजा (iii) कृ म रोग अथवा अ त: परजीवी सं मण (iv) कॉ सी डयो सस (v) ए परिजलो सस 13.4 चूज पर मौसम का असर एवं अ य कारक 13.5 ायलर पर मौसम का असर 13.6 ग मय के मौसम म मु गय क देखभाल 13.7 स दय एवं बरसात म मु गय क देखभाल 13.8 सारांश
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    156 13.0 उ ेय : प य म वातावरण का भाव परो एवं अपरो , दोन ह कार से पड़ता है । शर र पर सीधा भाव वातावरण के ताप म, काश, वषा आ द का पड़ता है और अपरो प से दाना-पानी आ द के खराब बंधन से पानी एवं दाने क उपल धता गम म घट जाती है, वह ं इसका उपयोग भी प ी समु चत प से नह ं कर पाता है । व भ मौसमी भाव के कारण उ पादन एवं उ पादन मता, दोन ह कम हो जाते ह । अत: यह आव यक है क प य पर पड़ने वाले इन मौसमी भाव , उनसे जुड़े रोग एवं पड़ने वाले वपर त भाव एवं शार रक याओं का व तृत अ ययन कर लया जावे, ता क ा त होने वाले हा नकारक प रणाम को समय रहते ठ क कर लया जावे, साथ ह पूवानुमान आधा रत वशेष बचाव एवं रोकथाम के ब ध पूण कये जा सके । इसी उ े य को इस ईकाई म सि म लत कर कु कु टपालक को वै ा नक जानका रयाँ उपल ध कराई गई है । 13.1 तावना : कृ त ने ा णय के लए कु छ नयम बना रखे है । जैसे ह ाणी कृ त के वपर त आचरण करता है, अथवा उनके नयम का उ लघंन करता है, वह बीमार हो जाता है । पशु-प ी भी कृ त के इ ह ं नयम से नद शत होते ह । आव यकता यह है क इन नयम का ठ क से पालन कया जावे, तो ाणी व थ रहते ह । अगर कु कु ट पालक पहले से सजग रहे, समय-समय पर ज रत के मुता बक औष ध एवं ट के लगवाते रहे तो यह सब बात उन नयम को पुन: था पत करने म सहायक होती है । िजससे प ी वापस त द त हो जाते ह और िज दगी बगैर बीमार के बताने लगते है रोकथाम के साधन पर, जैसे - सफाई, रोशनी, हवा, पानी, दाना, गम , सद का यान रखते रहे तो रोग भी नह ं होगा, िजससे आ थक हत तो होगा ह , परेशा नय से भी बचा जा सके गा । कु कु ट पालक को चा हए क वह रोज सुबह कु कु ट शाला म वेश कर तो अपनी ि ट सब कु कु ट पर डालकर यह जानने क को शश कर क उनके यहाँ कोई कु कु ट रोगी तो नह ं है । कु कु ट म सामा य रोग इन कारण से बहु तायत से होते ह, िजनम (1) मौसम के बदलते व त पर सद , गम के एकदम कम या यादा होने क वजह से, (2) खाने म कसी त व क कमी से खास तौर से वटा म स व ख नज पदाथ क कमी, (3) छू त क बीमा रयाँ, जो रोगी प ी के छू ने अथवा सीधे स पक म आने क वजह से होती है । सामा यत: मौसमी रोग से भा वत रोगी प ी के व भ न द शत ल ण को अगर यान म रखा जावे तो बीमार प ी को पहचानने म भूल नह ं होगी । ल य म रोगी मुग या ब चे का झु ड से अलग बैठना, सु त मालूम होना, साँस लेने म क ठनाई आना व प ी का मैला दखाई देना मुख है, जो चमक व य प ी के पर म दखाई देती है, वह रोगी प ी के पर म नह ं होती है तथा रोगी प ी के साँस के साथ घर-घर क आवाज आती है । वह पकड़ते व त दूर भागने क को शश नह ं करेगा । कलंगी सकु ड़ी हु ई या मुरझाई हु ई नीले से रंग क दखलाई देगी ।
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    157 कभी-कभी ेटल मसूजन भी दखलाई देती है । ब चे चीं-चीं करते हु ए एक थान पर इक े हो जाते ह । दाना चुगना ब द कर देते है तथा उसम सफे द रंग के द त हो जाते है । गुदा का भाग आस-पास से गंदा दखलाई देता है । बड़े मुग-मु गय म भी द त होते ह, िजससे पँख चपके व ग दे नजर आते ह । तापमान 1 से 20 F कम या यादा होता है । वशेष बीमा रय म वशेष कार के ल ण प रल त होते है, जो बीमार क खास पहचान है एवं इससे बीमार क पहचान होती है | वातावरण का तापमान औसत से अ धक होने पर प ी दबाव क ि थ त म आ जाता है, उसक शार रक शि त औसत से अ धक ताप म के दु भाव को कम करने म लग जाती है । ऐसी ि थ त म अ डा उ पादन कम हो जाता है । वातावरण, पा रि थ तक बदलाव एवं सं मण म सभी कारक भ न- भ न प म प य क भ न- भ न जा तय को भा वत करते ह, िजससे अ डा एवं माँस दोन का ह उ पादन भा वत होता है, क तु थोड़ी सी सूझ-बूझ एवं जानकार से आने वाल आ थक त रोक जा सकती है । 13.2 मौसमी रोग : यान देने यो य बात : मौसमी रोग के संबंध म न न ब दु यान रखने यो य है:- जगह क तैयार - (i) चूजे आने के 24 घ टे पहले िजस जगह चूके पालने है, पूर तरह से तैयार हो जाना चा हए । (ii) बुखार आने के बाद ूडर का योग ख म सा हो गया है, ले कन इस का उपयोग होना चा हए । एक ूडर 300-400 चूज के लए होना उपयु त होता है । िजतने भी चूजे आये, उस हसाब से ूडर लगाने का थान शेड के एक और चुन ल । (iii) एक से डेढ़ इंच सूखा बुरादा, जो हर तरह से अ छा हो, म फफूं द नाशक दवा मलाकर गाड के अ दर बराबर फै ला द । बुरादे पर एक अ छा से क टाणुनाशक का भी करा द । (iv) अखबार क तीन परत से इस बुरादे को ढक द । (v) चूजे आने के एक रात पहले ूडर चालू कर द और रात का तापमान रकाड कर ल । वशेष प से सुबह के चार बजे का । साथ ह य द ठ ड हो तो बुखार भी लगा ल । (vi) तापमान को बनाने के लए पद का लगाना भी आव यक है, ले कन व छ हवा के आदान- दान का भी यान रख । यह भी चूज क बढ़ोतर क खुराक है, िजसक कोई लागत नह ं है । तापमान को बनाये रखते हु ए, िजतना अ धक से अ धक व छ हवा का आवागमन होगा, उतना ह बेहतर है । चूजे आने के बाद – (i) शेड के अ दर च स बा स को फै ला कर रख । (ii) चूजे क च च को एक बार पानी म डुबोकर ूडर के नीचे डाल ।
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    158 (iii) येक ूडरम बराबर गनकर चूजे डाल । (iv) चूजे आने पर उ ह तुर त डाल द । (v) शु के 3-6 घ टे तक के वल पानी ह पीने को दे, उसके बाद दो मु ी दाना त 100 चूज के सा हब से अखबार पर छड़क द और ख म होने लगे तो फर छड़क द । इस तरह से संतु लत आहार ह खलाय । यान रहे, संतु लत आहार ताजा हो । इसके बाद फ डर म फ ड ऊपर तक भर कर लगा द या छछले लेट या अ डे के नये फलर लेट म दाना देते रहे । (vi) अगर चूज म फफूं द रोग आने क संभावना हो तो लगभग 0.5 क. ा. सूखे बुरादे म 200 ाम के यर ट और 100 ाम ल चंग पाऊडर पहले से मलाकर बुरादे म भल भाँ त मला द । त 100 वगफु ट म । तापमान व वातावरण – (i) तापमान एवं व छ वायु का चूज क सेहत और बढ़ोतर के लए सह रहना अ य त आव यक है । (ii) ूडर का तापमान बुरादे से 2'' ऊपर एवं कनारे से 4-5'' अ दर लेना चा हये । (iii) कमरे का तापमान बुखार से हट कर बुरादे से 1/2 फु ट क ऊँ चाई पर लेना चा हए (iv) तापमान को बनाये रखते हु ए आव यक व छ वायु अव य दान कर । (v) जब चूजे छोटे हो तो आ ता 60% तशत (Relative Humidity) से अ धक बेहतर होगी । धीरे-धीरे उसे घटाते हु ये 60 तशत या इससे भी कम कर देन चा हए I ल टर मैनेजमे ट (बुरादे क देख-रेख) (i) इ तेमाल करने से पहले इसे संभा वत फफूं द और क टाणु से मु त कर ल । इसके लए इसम फफूं द नाशक एवं क टाणुनाशक का े कर । (ii) शु म एक से डेढ इंच बुरादा बछाये । दूसरे स ताह इसम और मलाकर दो इंच कर द । तीसरे-चौथे स ताह म धीरे-धीरे बढ़ाकर तीन इंच से साढ़े तीन इंच कर दे । इससे बछावन म नमी क मा ा कम बढ़ेगी । अ यथा अमो नया का उ पादन होगा एवं क टाणु बढ़ने क र तार बहु त तेज होगी । खूनी पे चश (Coxy) का कोप बढ़ जाता है । (iii) ार भ म अ छे बछावन म नमी 12-15 तशत से अ धक नह ं होनी चा हए । इसके बाद 30 तशत से अ धक नमी नह ं होनी चा हए अ यथा वह बै टे रया जो बछावन को सड़ने से बचाते ह, प ी क बीट को हजम करने का काम नह ं करगे । (iv) ल टर म के क (पपड़ी) बन रहा है तो हम गुड़ाई (रे कं ग) करके बछावन को सुधारना चा हए । पपड़ी को नकालकर नया बुरादा मला द । (v) सह मा ा और सह नमी के बछावन म बै टे रया ( कटाणु) जो बीट को हजम करके ल टर को बनाये रखते ह, ठ क तरह से अपना काम करते है । इस या म ल टर सूखा बना रहता है और आव यक गम भी बनी रहती है, पर तु य द नमी 30 तशत से अ धक हो जाये और कमरे का तापमान 500 F से कम हो तो क टाणु क या कमजोर पड़
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    159 जाती है, िजससेल टर जमना शु हो जाता है और शेड म क चड़ सा हो जाता है । अत: ल टर को हमेशा सह बनाये रखना आव यक है । पानी चूज को के वल वह पानी पलाये, जो आप वयं पी सकते हो । (i) पानी का तापमान ठ ड के मौसम म कमरे के तापमान से कम न हो, जब क गम म िजतना ठ डा हो, उतना बेहतर है । (ii) पानी सदैव उपल ध हो और बतन क ऊँ चाई चूज क पीठ से न ऊँ ची हो न नीची । ऊँ चाई को सदैव ठ क करते रह । (iii) आम भाषा म पानी खारा या नमक न न हो । न ह पानी ग दा, मटमैला हो, न ह उसम कोई जीवाणु व क टाणु ह । (iv) आव यकतानुसार पानी के बतन क सं या पूर होनी चा हए, बि क गम म सं या बढ़ाकर दुगुनी कर द । छोटे ब च म शु के 4-5 दन उ ह 3-4 फु ट से अ धक पानी के लए चलना न पड़े । (v) पानी के बतन क सफाई दन म दो बार सुबह और शाम जूट या मूंज से रगड़ कर अव य कर । बाद म लाल दवा (पोटे शयम परमेगनेट) या ि ल चंग पाऊडर या कसी अ छे क टाणुनाशक म खंगाल ल । अगर दो सेट हो तो एक को रोज धूप म रख द । पानी कै सा हो? कु ल क टाणु त एम.एल. 100 से कम ई कोलाई त ल टर 0 जै वक अंश एम.जी. त ल टर 3 से कम नाई ेटस एम.जी. त ल टर 30 से कम आयरन एम.जी. त ल टर 0.3 मैगनीज एम.जी. त ल टर 0.1 कापर एम.जी. त ल टर 1 िजंक एम.जी. त ल टर 5 कै ल शयम एम.जी. त ल टर 75 मैग न शयम एम.जी. त ल टर 50 स फे टस एम.जी. त ल टर 200 लोराईडस एम.जी. त ल टर 200 पी.एच. 6.5-7.5 (i) पानी क टंक ढक हो और स ताह म एक बार अव य ठ क ढंग से साफ क जाये । ल चंग पाऊडर थोड़े से पानी म मलाकर हर जगह रगड़ कर धो ल ।
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    160 (ii) उ चतहोगा, य द पानी म 0.2 ाम से 0.5 ाम ल चंग वाऊडर त यू बक फ ट (26-27 ल टर) मलाकर पीने को दया जाये । जब भी टंक खाल हो, उसम नापकर ल चंग पाऊडर डाल कर भर द । अब इसे दो घंटे बाद योग म लाय । इस तरह लगातार पीने को द । इससे पानी के क टाणु जहाँ समा त ह गे, वह ं बहु त से त व का हा नकारक असर कम हो जायेगा । यह पानी वै सीनेशन के समय न दया जाये । ल चंग पाऊडर म 33 तशत लोर न होना चा हए । आज कई दूसरे वाटर सेनीटाइजर आ रहे ह, िजनका असर देर तक रहता ह । यान रहे, सीधे पानी जो यूबवैल या है डप प से लया जाता है, वह ज र नह ं दोषमु त हो । अत: समय-समय पर जांच करवाते रह । काश यव था (i) शु के 14-15 दन तक काश यादा दया जा सकता है अथात् येक 100 वगफु ट पर 40-60 वाट का बल इसके बाद इ ह 15-25 वाट का ह बल काफ है । (ii) 7 दन के बाद कु ल 23 घ टे ह काश द तो बेहतर होगा । शाम को सूरज डूबने के एक घ टे बाद इ ह लाइट द । (iii) पकड़ते समय य द लाईट बुझाकर एक लाल या नीला बल लगाकर पकड़ा जाये जो ायलर पर कोई असर नह ं होगा । (iv) एक समय म एक ह वाट के बल हर हो डर म लगाये । कह ं यादा, कह ं कम वाट के बल लगाना हा नकारक है । अ धक वाट के बल लगाने से चूज म नोचने (Picking) क सम या आ सकती है । 13.3 मौसमी रोग 13.3.1 स दय म होने वाले रोग (i) कोल से ट सी मया ई. कोलाई (E. coli) नामक जीवाणु ाय: मुग के पेट व आँत म पाया जाता है तथा वशेष प रि थ तय म प य म द त अथवा Enteritis नामक रोग करता है, क तु जब यह जीवाणु र त म वृ करता है और व भ न शार रक याओं को बा धत कर प ी क मृ यु का कारण बनता है तो इस अव था को “कोल से ट सी मया” कहते है । इस अव था म यह गुद (Kidney) म वकार उ प न कर टॉि सन उ प न करता है, िजससे गुद आकार म बढ़ जाते ह तथा दय भी कं ज टेड तथा इसम तरल पदाथ पाया जाता है । यह एक ा नक अव था का रोग है । (ii) यूमो नया मु गय म यूमो नया वसन तं का रोग है, जो जीवाणु अथवा वषाणु के सं मण से हो सकता है । अ धक स दय के मौसम म भी यह छोटे चूज म कोराइजा अथवा बड़े प य म फे फड़ के सं मण से हो सकता है तथा उपचार नह ं करने पर इससे प य म मृ यु भी हो सकती है ।
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    161 (iii) पुलोरम रोग यहरोग चूज म ती प से पाया जाता है, पर तु वय क प ी भी इससे भा वत हो सकते ह । वय क प य म यह रोग चरकाल य (Chronic) प म भी पाया जा सकता है । य य प ती (acute) प भी अं कत कया गया है । चूज म, आयु के थम स ताह म इस रोग से भार मृ यु दर देखी गयी है, जो क दूसरे स ताह उ चतम सीमा तक पहु ँच जाती है । रोग से सत मु गय के अ ड क उवरक और नगमन मता कम हो जाती है और उनसे उ प न हु ए चूज म उ च मृ युदर पाई गई है । रोगी मु गय क अ डा उ पादन मता भी व थ मु गय क अपे ा कम हो जाती है । (iv)आई.बी. (Infectious Bronchitis) प य म पाये जाने वाला अ य त सं ामक छू तदार रोग है, जो क वषाणु वारा फै लता है । वसन तं के इस रोग के मुख ल ण वांस म वशेष कार क आवाज आना, छ ंकना, अ डा उ पादन म कमी एवं खराब क म के अ ड का उ पादन है । यह कोरोना ुप के वाइरस से फै लने वाला वसन रोग है । रोग का सार वायु वारा रोगी प ी से व थ प य म होता है । (v) आई.एल.ट . (Infectious Laryngotrachetis) वायरस (Virus) वारा यह रोग होता है तथा इसके कारण बहु त आ थक हा न हो सकती है । मृ यु दर भी अ धक होती है । अ धक उ प म भी मुग उ पादन अ छा दे सकती है । ायलस म आहार उपयोग कम हो जाता है । वायु, उपकरण, कपड़ वारा यह वायरस रोग फै लता है । मु यत: प य के आपसी स पक वारा यह रोग फै लता है । नाक वारा हवा के साथ ह यह इ फै शन फै ल सकता है । पानी वारा भी यह रोग फै लता है । ठ क हु ई मुग रोग का के बनी रहती है । (vi) C.R.D. सी.आर.डी. यह रोग माइको ला मा गैल सै ट कम (एम.जी.) और ई. कोलाई के साथ-साथ इ फै शन के कारण होता है । सी.आर.डी. रोग मु गय के ग दे शै स म िजसम भीड़, अमो नया, धुँआ, धूल का वातावरण हो और वे ट लेशन कम हो, अ धक होता है । एम.जी. हर उस क मु गय म रोग पैदा करता है, पर तु मृ युदर कम उ क मु गय म अ धक होती है । मुग के अलावा अ य प ी जैसे टक , बटेर, फ जै ट वैल, कबूतर, ब तख आ द म भी यह रोग होता है । अत: ये प ी मु गय म रोग फै लाने म सहायक हो सकते ह । इसी लए इस रोग क रोकथाम मुि कल है । इस रोग म नथुने गीले रहते ह, छ ंक आती है और वांस लेने म परेशानी होती है तथा बाद म आँखे सूज जाती है ।
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    162 13.3.2 ग मयम पाये जाने वाले मुख रोग फाउल पाँ स: यह वायरल रोग है एवं दो प म पाया जाता है । (a) वचा प. इसम चेहरा, को ब वेटल आ द पर के ब (Scab)या दाने पाये जाते है । (b)नम पॉ स अथवा Wet Pox : इसम मुँह के अ दर क झ ल पर दाने पाये जाते है । इस प म प ी अ धक सत होते है तथा यह कसी भी उ म हो सकता है । मृ युदर अ धक नह ं होती है, क तु अ डा उ पादन कम हो जाता है । (i) पाईरोक टो सस इस कार के जर म कु कु ट का र त दु षत हो जाता है । हमारे देश म इस रोग का मह व रानीखेत रोग से कम नह ं है । वशेषकर म य तथा उ तर भारत के रा य म जहाँ यह रोग अ धक यापक है, भार हा न हु ई है । द ण भारत के अ धकतर भाग म यह रोग नह ं होता है । इसका कारण यहाँ इस रोग को फै लाने वाल चीच ड़य का अभाव होता है । (ii) ह ट ोक (Heat Stroke) ी म ऋतु म कु कु ट ह का तापमान अ धक बढ़ जाने से ह क न ल क अपे ा भार न ल अ धक भा वत होती ह । लू लग जाने से उनके शर र का ताप 42.8-43.30 C तक हो जाता है, साँस क ग त बढ़ जाती है तथा प ी मु छत होकर मर जाते ह । कु कु ट राह म पया त वायु आगमन न होने पर लू का कोप होता है । रोकथाम (Prevention) ी म ऋतु म प य के लए यथे ट थान, पया त छाया, वायु तथा पानी ा त होना चा हए । इनसे प य को लू नह ं लगने पाती है । धातु क चादर अ दर ह क छत के लए योग नह ं करनी चा हए । लू लगने वाले प य को ठ डे पानी म डुबोना चा हए। अ ड क कावत (Egg Bound) जब मु गयाँ थम बार अ डा उ पादन ार भ करती है तो उ ह अ डा कने का रोग सामा य प से हो जाता है, इसका कारण यह है क मु गयाँ बड़े आकार का अ डा देने का यास करती ह, पर तु अ डे आने का माग संकरा होने के कारण अ डा सुगमता से नह ं नकल पाता है और प ी इस माग को चौड़ा करने का यास करता है । इसके प रणाम व प इस भाग म जलन होती है और ग ट बन जाती है और अ डे क ठनाई से बाहर नकलते ह अथात् अ डे कावट क ि थ त उ प न हो जाती है । रोग का ल ण (Symtoms of Disease) रोग से सत प ी बेचैन होते ह और बार-बार घोसल म आते-जाते ह । प ी लगातार क ठन प र म करते ह, िजससे उनक ड ब वा हनी बाहर नकल आती है और अ य प ी इस ड ब वा हनी पर च च हार करते ह । य द अ डा बाहर नह ं नकलता है तो प ी मर जाते ह । उपचार (Treatment)
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    163 प य काउपचार संभव नह ं है । रोकथाम का मा उपाय यह है क अव करगुहा म अंगु लयाँ डालकर नुक ले य से अ ड को तोड़ कर बाहर नकाल देना चा हए । (iii) वटा मन A क कमी (अथवा A vitaminosis A) वटा मन A के काय - प य म बढ़ोतर म सहायक, अ छ ि ट नजर (Eye sight) हेतु आव यक एवं अ द नी वचा का र क । कमी के ल ण - वटा मन A क कमी से कम अ डा उ पादन, अंधापन, कमजोर आना एवं कम वृ या वकास जैसे ल ण दखलाई देते है । (iv) ेस अथवा तनाव का रोग प य म ेस अथवा तनाव एक कार का कई कारण का मला-जुला दशन है । इनम से कु छ तनाव के कारण बताये जा सकते है । जैसे अ धक आवाज, अ धक प ी घन व, हलचल अथवा परेशान होना, अ धक गम अथवा सद आ द । इसके अ त र त ट काकरण, क लंग, ए ट बायो टक का द घकाल न भाव आ द अ य कारण भी हो सकते है । अ धकांश कु कु टपालक ेस, जो गंभीर सम या है, उसे नग य मानकर हा न उठाते ह, इसके लए जाग कता होना आव यक है । दो दन पूव अथवा 3-5 दन प चात् वटा म स का जल म योग कया जाये तो तनाव का भाव मालूम कया जा सकता है । ेस का भाव शी ह कम उ पादन या वृ म अवरोध के प म देखा जा सकता है । ेस फे टर - असंतु लत आहार, च च काटना, लंग मालूम करना, इनकु वेटर म खराबी, औष धयाँ या ए ट बायो टक का द घ उपयोग, दोषपूण वातावरण, अ धक नमी, डहाई ेशन या पानी क कमी, अ धक गम / सद / वषा, थान प रवतन, ट काकरण, ब धन म बदलाव, अ धक काश, सद हवाऐं,अ या धक शोर, उ तेजना, पेट क क ड़े, बा य परजीवी सं मण, आग तुक या मुग शाला म वेश आ द । अत: कु कु टपालक को चा हए क इन बात का यान रख तथा असामा य याओं का योग नह ं कर, सामा य कु कु ट ब धन को ाथ मकता देव । समय-समय पर वटा म स एवं ओरल रहाइ ेशन घोल पानी म मलाकर पीने का द । 13.3.3 वषाज नत रोग (i) फाउल काँलेरा यह रोग पा चुरेला म टो सडा के तीन सीरोटाइप (1,3 और 4) के वारा होता है । इन सीरोटाइप क रोग पैदा करने क मता भ न है । फाउल कॉलरा हमारे देश के व भ न थान म पाया गया है । इस रोग के जीवाणु कु त और चूह के मुँह म कई वष तक जी वत रहते ह तथा मुग म रोग का कारण बनते ह । ये जीवाणु म ी और मुग के खा य म भी कई माह तक जी वत रहते ह । यह रोग 8 स ताह से ऊपर क मु गय म होता है । अत: ायलर म यह रोग नह ं मलता है ।
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    164 यह रोग पर-ऐयूट, सब-ऐ यूट एवम ् ो नक कार म पाया जाता है । इस रोग म 80-90 तशत तक मृ यु हो सकती है । पर-ऐ यूट कार के रोग म रोग का कोई भी ल ण दखाई नह ं देता है तथा अचानक मृ यु आर भ हो जाती है । सब-ऐ यूट एवं ौ नक रोग काफ समय तक चलते ह, िजससे सर, कलंगी एवम ् वैटल म सूजन हो जाती है तथा वे नीले पड़ जाते ह । (ii) कोराइजा प य म होने वाला ए यूट सं ामक रोग है, जो जीवाणु से होता है तथा इसके मुख ल ण छ ंक आना, नाक से बदबूदार तरल चप चपा पदाथ (चीजी) नकलना मुख है । छोटे उ के प य (चूज ) म यह रोग अ धक होता है । यह रोग ह मो फलस.गे लनेरम जीवाणु से होता है । इस रोग के न न ल ण है:- * नाक से बदबूदार चीजी पदाथ नकलना तथा यह साइनस व आँख पर इक ठा हो जाता है । * चेहरा व सर सूजा हु आ तीत होता है । * ेस क अव था म यह रोग ती ता से फै लता है । (iii) कृ म रोग अथवा अ त: परजीवी सं मण अ त: परजीवी सं मण कई कार का हो सकता है । यह वशेष प से वातावरण म नमी, ल टर के गीला होने, गंदगी एवं अ य अनहाइज नक कारण से हो सकता है । इसे कृ म का रोग भी कहते है । यह नमेटोड, राउ ड वम, ससटोड, लूक वम एवं मेटोड या फ ता कृ म के प म प य म कम वृ दर एवं कम उ पादन जैसे ल ण द शत करता है । कृ म नाशक औष ध वारा जाँच करने के उपरा त इस रोग से मु त हु आ जा सकता है। (iv) कॉ सी डयो सस यह रोग एक ोटोजोआ वारा मुग क आँत म होता है, िजसे माइ ो कोप वारा शीशे क लाइड पर देखा जा सकता है । का सी (का सी डयो सस) दो कार क होती है:- 1. सीकल का सी:- यह आइमे रया टनेला नामक ोटोजोआ वारा मुग के सीका म खून के प म होती है तथा अ धक नुकसान करती 2. इ टैसटाइनल का सी - यह आइमे रया क व भ न पे सज वारा होती है तथा आंत के अलग-अलग ह स म जमा खून के प म होती है । का सी ाय: 10 स ताह से कम उ क मु गय म होती है और 4 से 8 स ताह म अ धक होती है । का सी 3 स ताह से कम उ क मु गय म तभी होती है, जब पूर तरह दू षत का सी के वातावरण म चूज क ू डंग क गई है । का सी म मुग म खून क कमी हो जाती है । मुग पील पड़ जाती है । मु गयाँ इक ी होकर बैठती है तथा दाना-पानी कम खाती ह और उनम खूनी द त लग जाते ह । (v) ए परिजलो सस यह बीमार आम तौर से चौथे-पाँचवे दन कट होती है । वशेष प से वहाँ, जहाँ बुरादे पर अखबार बछाकर चूज को छोड़ा जाता है । जहाँ बना अखबार के ह छोड़ा जाता है
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    165 और बुरादा खराबया गीला हो तो 24 घ टे म ह मृ यु शु हो जाती है । य द सब कु छ ठ क है और चूजे पहले ह दन से मरने लगते है । तो यह बीमार हैचर से भी आ सकती है । य द ड बे म डाला हु आ बछावन खराब हो तो पहले दन से ह इस रोग के ल ण मल सकते है । दाने म य द फफूं द या (Fungus) तो के वल फे फड पर ह इसके ल ण नह ं मलगे, बि क दाने क थैल पथर और आँत म भी इसके ल ण मलगे । कलेजी से भी अ दाजा लगाया जा सकता है । ायलर म अ धकतर यह सम या बुरादे से आती है और इसमे फे फड पर सफे द पीले या गुलाबी गोल दाने से दखते ह । चूजे मुंह खोल कर ल बी साँस लेते ह । सीट से आवाज भी हो सकती है । समय पर यान न दया गया तो मृ यु दर (Mortality) बहु त अ धक हो सकती है । इस बीमार को ूडर नमो नया के नाम से भी जाना जाता है । इसका इलाज तुर त होना चा हए अ यथा सी.आर.डी. या पेट म पानी क बीमार बाद म हो सकती है । 1. दाने म बार क पसा कापर स फे ट (नीला थोथा) 500 ाम / टन 5-7 दन द । 2. पानी म यूमाईसीन + डा सीसाईकल न द । 3. एक पानी म (B-Complex) द I 4. बुरादे म तुर त बार क चुना 5 ाम त वग फु ट 2 ाम ल चंग पाऊडर के साथ ठ क से मला द । 5. 10 ाम / ल टर के हसाब से कापर स फे ट का े बुरादे पर कर । य द सम या बहु त अ धक हो तो पूरा बुरादा बदलकर अ छा बुरादा या धान क भूसी डाल द । 13.4 चूज पर मौसम का असर एवं अ य कारक कु छ कारण का यहाँ व तार से ववेचन कया गया है । यह वह कारण है, िजसक वजह से चूज म शु के 5- 10 दन के बीच काफ मृ यु हो सकती है । कभी-कभी यादा समय तक भी हो सकती है । (i) ठ डक (Chilling)  *कम से कम मृ युदर के लये यह आव यक है क सह तापमान रखा जाये । चूज क मृ यु ठ ड लगने से तो सीधे हो ह सकती है, पर तु य द यह सल सला चलता रहा तो कसी बीमार का भी वेश हो सकता है, जो बहु त अ धक हा नकारक होगा ।  ठ ड लगने पर चूजे एक दूसरे से सटते जाते ह और एक त होकर काफ चूजे वशेषकर जो समूह म छोटे ह, दबकर मर जाते ह, िजसे हड लंग (Huddling) कहते हैI  कोने म भी चूके एक त होकर दबने से मर सकते ह ।  इसम चूजे मुि कल से सांस ले पाते ह । आगे चलकर पर को गरा लेते ह और इनक मृ यु हो जाती है ।
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    166  फ डक खपत (Consumption) घट जाती है और ऐसी अव था म तापमान य द 600 से नीचे हो तो बहु त अ धक मृ यु हो सकती है । (ii) बहु त अ धक गम कभी-कभी तापमान पर सह नय ण न रख पाने के कारण इतनी अ धक हो जाती है क चूज मुंह खोलकर सांस लेने (Panting) लग जाते ह । य द इस कार गम लगातार बनी रहे तो मृ यु हो सकती है । इस कार य द तापमान अ धक हो और साथ मे वातावरण क नमी (Humidity) भी बढ़ जाये तो हा न अ धक हो सकती है, य क ऐसी अव था म चूजे अ धक गम को सहन कर पाने म असमथ हो जाते ह । िजन चूज म गम का असर हो जाता है, वह दाना कम खाने के साथ-साथ सु त हो जाते ह और पानी के बतन पर भीड़ होने के कारण यासे ह मर सकते ह । वैसे तो यह अव था उ प न होनी नह ं चा हए, पर तु य द हो भी जाये तो इसका तुर त नवारण करना चा हए। जहाँ के वल बुखार के सहारे पूरे कमरे का गम करके ू डंग क जाती ह, वहां इसक संभावना अ धक है । साथ म इले ोलाइट के साथ बी का पले स पानी म मलाकर पीने को देना चा हए। (iii) चूज का नजल करण (Dehyderation): जहाँ संतु लत आहार और साफ सुथरे संतु लत रख रखाव (Management) क इस उ योग म सफलता के लए अ य त आव यक है, वह ं हर समय व छ सामा य जल क हर समय आव यकता है । पानी क कमी से चूजे सूखने लगते है और फर मृ यु होने लगती है । य द चूज को लगातार 4-5 दन पानी कम मले तो 75-100 तशत तक मृ यु 6-7 दन म हो सकती है । िजन चूज म डहाई ेशन होता है, वह कमजोर होकर सूखने लगते ह । ब कु ल सूखी बीट क ज (Constipation) के कारण होने लगी है और बाद म होती भी नह ं । चूज को ट ी के लए जोर लगाना पड़ता है । आँखे ब द करते ह और आँखे अ दर ह सकु ड़ने लगती है । पो टमाटम करने पर जब चमड़ा हटाते ह तो वह सूखी होने के कारण आसानी से नह ं हटती । मांस से चपक रहती है । मांस गहरा लाल हो जाता है । ल वर सकु ड़ने लगता है और प ताशय (Gall Bladder) बढ़ जाता है । गुद (Kidney) के बीच नल (Tubules) म सफे द गाढ़ा तरल पदाथ (Urates) मलता है । दाने क थैल (Crop)म दाना नह ं मलता । य द मलता भी है तो सूखा । चूजे का सूखना (Dehydration) न न कारण म से कसी एक से हो सकता है । * य द कोई बीमार चूज म हो । * य द पानी कसी कारणवश आव यकता से कम हो । * य द पानी के बतन ग दे ह और उसे त दन ठ क से साफ न कया जाता हो, िजसके कारण उसम बदबू आ रह हो । * य द पानी का टोर ग दा हो, िजसम से बदबू आ रह हो । * य द पानी म कोई दवा आव यकता से कह ं अ धक मला द गई हो ।
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    167 * य दपानी के बतन ऐसी जगह पर ह , जहाँ बहु त अ धक गम हो; जैसे ूडर के बहु त समीप और ूडर का तापमान आव यकता से काफ अ धक हो । * य द पानी के बतन क बनावट ऐसी हो क चूज को पानी तक अपनी च च ले जाना क ठन हो, जैसे बहु त ऊँ चे या इतने संक ण क उनका सर झुकने पर इतना नीचे न जा सके क च च पानी तक पहु ंचे । * य द पानी का तापमान कमरे के तापमान से अ धक हो । * य द ूडर हाउस म काश कम हो, वशेषकर जाड़ म, जब क चार ओर पदा लगा हो और अ दर रोशनी न हो । इन सभी उपरो त कारण से हम भल भाँ त प र चत ह फर भी कु छ प रि थ तयाँ ऐसी उ प न हो जाती है क हम छोट -छोट बु नयाद मु क ओर यान देने से वं चत रह जाते ह । इन कारण क ओर यान देकर उ ह तुर त दूर कर देना चा हए । पानी चुर मा ा म हर समय उपल ध होना चा हये । साथ म इले ोलाई स के साथ बी-कॉ पले स पानी म 5-6 दन देना चा हए । (iv)भूख (Starvation): न चय ह कोई भी फामर अपने चूज को भूखा नह ं रखना चाहता, पर तु कभी-कभी ऐसा हो भी जाता है । इसम चूजे कमजोर हो जाते ह और उनका लगातार वजन घटता जाता है । इसम पहले ह स ताह म काफ मृ यु हो सकती है । चूजे सूखने लगते ह और िजन चूज पर असर होता है, वह दूसरे चूज से अलग एक त (Huddling) होते जाते ह । पर का म बगड़ कर चूजे बदश ल लगने लगते ह । जैसे अपना ब चा भूखा होने पर रोकर माँ को बुलाता है, वैसे ह चूजे भी अपनी भाषा म “चींथीं” करके शोर करते ह, जो उनके भूखे होने का अनूठा संके त ह । भूखा रहने का (Starvation) जो सबसे भयानक य है, वह उनका आपस म नोचना है । पहले वह पैर नाखून के पास (Toe) से शु होता है, फर दुम के पास नोचना शु करते ह । य द यान न दया गया तो फर आंत नकाल कर खाने लगते ह । बुरादा ( बछावन) खाने लगते ह । यह सभी मृ यु का कारण है । पो टमाटम करने पर दाने क थैल खाल मलेगी या उसम बुरादा मलेगा । आंते खाल मलेगी । ल वर छोटा हो जाता है और प ताशय बढ़ जाता है । गुद म सफे द तरल पदाथ (Urates) मलता है, साथ ह गुद का रंग पीला पड़ने लगता है । चमड़ी के नीचे जेल के समान तरल पदाथ मलता है । भूख के कारण (Starvation Death) हमार बहु त बड़ी भूल-चूक के कारण होती है । वे कारण न न ल खत कार से हो सकते ह । * य द ी डंग टॉक िजनसे चूजे लये गये ह, उसके राशन म आव यक त व क कमी हो (Nutritional Deficiency) और चूजे कमजोर ह । * दाने का कण बहु त मोटे हो और दाना पुराना हो ।
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    168 * फ डरक बनावट गलत हो । * दाना पुराना हो या उसम बदबू हो । इन सब कारण क सह जाँच करके उनका तुर त नवारण करना चा हए तथा चूज को ी डंग करके अलग-अलग रखना चा हए । वटा मन बी का पले स (B- Complex) या वटा मन यु त कोई भी ए ट बाय टक पानी म 5-7 दन पीने को द िजए । (v) दवाय देने म गलती (Wrong Medication) कभी-कभी दवाय गलत ढंग से देने से भी मृ युदर बढ़ जाती है । कभी भी स फा दवाय अ धक मा ा म या अ धक दन तक न द । सदैव यान रखना चा हए क कोई भी दवा योग करने से पहले उसके लेबल या (Literature) को यानपूवक पढ़ लया जाए । कु छ दवाय दूसर दवाओं के साथ मलाकर नह ं द जा सकती । मसाल के तौर पर कापर स फे ट के साथ कोई भी ए ट बाय टक । कोबान (Elancoban) के साथ टाईमयु टन (Timutin) यूराजाल डान के साथ जुआल न या डाट इसी कार और बहु त सी दवाओं क सामनज यता (Compatability) देख लेनी चा हए । सदैव फ ड म जो दवाय मल ह, उनका पूरा ववरण र खये ता क य द कोई दवा देनी हो तो उसी हसाब से यह देख कर द क अमुक दवा फ ड म मल दवा के साथ द जा सकती है या नह ं । (vi)नोचना (Picking or Cannibalism) अ सर देखा गया है क चूजे एक दूसरे को नोचने लगते ह, िजसम नोचे हु ए ब चे को समय पर अलग नह ं कया गया तो उसक मृ यु हो जाती है । शर र के कसी भाग, नाखून (Toe) या दुम (Tail) को न च (Pick) लेते ह, जहाँ से र त बहने लगता है । दूसरे सारे चूजे उसके पीछे पड़ जाते ह, य क वहाँ से खून नकलने लगता है, उसको उस समय तक नोचते रहते ह, जब तक उ ह लाल खून नकलता हु आ दखता है । अ त म उसक मृ यु हो जाती है । न न कारण से यह बात हो सकती है । * य द चूज को बहु त तेज काश दया जा रहा हो । इससे दूसरे चूजे के शर र के लाल दख जाती है और उस जगह पर हमला हो जाता है । * य द चूज म भीड़ (Overcrowding) हो । * ूडर या कमरे का तापमान अ धक हो । * य द कमरे म नमी (Humidity) कम हो । * य द फ ड संतु लत न होकर नमक और ोट न वशेषकर अमीनो ए सड म कमी (Deficient)हो । * य द फ ड चूज क आव यकता से कम मल रहा हो । * य द चूजे फ ड खा लेने के बाद बेकार (Ideal) ह तो भी प कं ग क सम या शु हो सकती है ।
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    169 इन उपरो तकारण का नवारण ह इसका सह इलाज है । डी ब कं ग (Debeaking) से पूण राहत मलती है। (vii) हा नकारक गैस (Harmful Gases) कभी-कभी अमो नया और काबन मोनो साईड या डाइ साईड गैस के कारण भी मृ यु हो सकती है । अमो नया गैस हर उस शेड म कु छ न कु छ रहती है, जहाँ पो हो । पर जब यह बहु त अ धक हो जाती है तो हा नकारक स होती है । जब भी कसी ऐसे शेड म चूजे पाले जाते ह, जहाँ साथ ह बड़ी मु गयाँ भी हो (जो गलत काम है) या पुराने ल टर पर चूज को पाला जा रहा हो तो अमो नया क सम या हो सकती है । यह एक तीखी कड़वी गैस होती है, जो आँख और नाक म बुर तरह से महसूस होती है । इस हालत म चूज के आँख से पानी नकलता है और अपने शर र से चूजे आँख को रगड़ते ह । इससे आँख म अ सर भी हो सकता है । कु छ चूज म अ धापन भी आ सकता है और बाद म मृ यु । काबन मोनो साईड गैस काफ जानलेवा गैस है । जहाँ बुरादा, कोयले और लकड़ी क अगेती जलाकर गम पैदा क जाती है, वहाँ इसक काफ संभावना है । य द ऐसे शेड को चार ओर से लाि टक या बोर से ब कु ल ब द रखा गया हो और बुखार का धुंआ सीधे बाहर नकलने के लए पाईप न लगा हो तो यह सम या अव य आएगी । सदैव यान रख, धुंआ हर हाल म बाहर नकले अ यथा बहु त अ धक सं या म मृ यु हो सकती है । ऐसी हालत म चूके सु त पड़ जाते ह, लड़खड़ाते ह और अ त म मर जाते ह । पो टमाटम करने पर फे फड़े गहरे लाल रंग के मलते है । 13.5 ायलर पर का मौसम का असर मौसम का ायलर पर काफ असर पड़ता है । मु यत: अपने यहाँ गम -बरसात-जाड़ा तीन मौसम है, पर तु सच तो यह है क 365 दन म 365 मौसम है और यह नह ं, सुबह, दोपहर, शाम और रात सब अलग-अलग ह । हम अपने रखरखाव म इसके अनु प प रवतन करना आव यक है । (i) गम य द कमरे का तापमान ( ू डंग के बाद) 650 से 800 F के बीच हो तो यह सबसे अ छा समय है । ायलर ज द तैयार होगा । 800 F से 900 F पर कोई सम या नह ं । 950 F से 1000 F पर सचेत हो जाना चा हए । 1000 F से ऊपर घर को ठ डा रखने का जतन कर । F.C.R. खराब होगा । 1050 F से ऊपर मृ युदर बढ़ जायेगी ।
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    170 F.C.R. खराब होगा। तैयार होने म समय लगेगा तथा अवरोधक मता बीमा रय से लड़ने क वशेष प से वायलर क कमजोर पड़ जायेगी । अत: हम शेड को और चकन को ठ डा रखने क हर को शश को लागू करना चा हए । फ ड क खपत म काफ कमी तापमान के बढ़ने के साथ-साथ आती जायेगी । अत: फ ड म 1 -2 तशत ोट न तेलयु त या वसायु त इनेज बढ़ा देनी चा हये । साथ ह वटा म स एवं मनरल 25-30 तशत बढ़ा द । वटा म स एवं मनरल 150-175 ाम त टन फ ड म देना बहु त लाभ द होगा । बुरादे क गहराई कम रख । छोटे कसान तीन ह ते के बाद बुरादे क जगह बालू का योग कर सकते ह और दन म गम के समय उस पर पानी छड़क कर ठ डा बनाये रख सकते ह । शेड क छत पर ि कलर लगाकर पानी छड़के । छत पर फू स अलग से लगा हो तो बेहतर होगा । िजस ओर से गम हवा अ दर आ रह हो, उधर प ल का पतला पदा लगा द और छत से गरता हु आ पानी उसी पर गरे तो शेड म ठ डी हवा अ दर जायेगी और साथ ह अ दर क गम हवा को लेकर दूसर खुले रा ते से बाहर नकल जायेगी । इस कार शेड को आप आसानी से ठ डा रख सकते है । अगर गम हवा न चल रह हो तो पदा न लगाकर के वल छत को ठ डा कर । ठ डा पानी ह पीने को द । साथ ह पानी के बतन बढ़ाकर कम से कम दुगना कर द इले ोलाईट अगर पानी म दया जाये तो काफ कारगर होगा । यान रहे, आजकल काफ पानी क टंक शेड म ऊपर लगी होती है और यह वह भाग है, जो गम म सबसे अ धक गम होता है । यह नह ं, पी.वी.सी. पाईप भी छत के समीप ह लगी होती है । न चय इससे पानी का तापमान बढ़ता है । लाि टक ऑटोमे टक कर म आकर यह ठ डा नह ं हो सकता है । अत: वा तव म पूण गम भर या बरसात म जो पानी हम पलाते ह, वह अव य ठ डे पानी से अ धक तापमान का होता है । हम इसम सुधार लाना होगा । जहाँ ायलर 1200-1300 ाम वजन से अ धक करने हो, उ ह दन म9- 10 बजे के बाद फ ड न द । शाम 4-5 बजे से फ ड देना शु कर द । तैयार होने म कु छ समय बढ़ सकता है, पर तु मृ यु कम होगी। वैसे अब क ोल शेड भारत म भी बनने लगे ह, िजसम तापमान 800 – 850 F के बीच बना रहता है । (ii) बरसात यह मौसम देखने म सुहावना हो सकता है, पर तु ायलर या लेयस के लए काफ घातक स हो सकता है । गम म आप थोड़ी सतकता से शेड को ठ डा रख सकते ह । सूखे गम म जब हवा चल रह हो, नमी बढ़ाकर अथात् छत गील रखकर या पद को नम करके । पर तु बरसात म जब क तापमान मई-जून के मुकाबले काफ कम होता है । पर तु हवा म नमी (आ ता) अ धक होने के कारण ायलर पर बहु त
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    171 बुरा असर पड़ताहै । जब तक हवा चल रह हो, तो ठ क रहता है, पर शाम को जब 3 बजे के बाद हवा क जाती है, िजसे आम भाषा म ‘गुम’ कहते ह, ायलर के लये असहनीय हो जाता है, वशेष प से 1200- 1300 ाम से बड़े ायलर म । य द तापमान 950 F (350 C) हो और नमी 70 तशत तो ायलर पर तनाव या ेस 1240 F(510 C) का पड़ेगा । अब आप खुद ह फै सला कर क ऐसी हालत म ायलर को कै से जी वत रखा जाये । ऐसी अव था म हवा का आदान- दान िजतना अ धक होगा, उतना ह लाभ द होगा । ऐसे पेड़-पौधे, िजनसे हवा शेड के आस-पास कती हो, काट द । हवा के लए पंखे होने चा हए । दाने और पानी का वैसा ह ब दोब त कर जैसा गम म कया गया था । रखने क जगह बढ़ा द अथात् जाड़े के मुकाबले 15-20 तशत चूजे कम डाले । दोपहर बाद वशेष यान रख । (iii) जाड़ा उ के हसाब से तापमान बनाये रखना अ य त आव यक है, ले कन इसके लए शेड को पद से इतना ब द कर देना क चूज क ऑ सीजन क पू त न हो, जो बाहर से आती हवा से मलती है, काफ हा नकारक है । साथ ह शेड के अ दर उ प न काबन-डाईआ साईड मोनो-डाईआ साईड और अमो नया, जो एक हा नकारक जहर ल गैस है, बाहर नकलती रहनी चा हए । यह तभी होगा, जब व छ वायु का आवागमन होता रहे । इसके लए उ के हसाब से पद के ऊपर से हवा आने-जाने का रा ता अव य छोड़ा जाय । यह उस के हसाब से तापमान को बनाये रखते हु ये वयं नणय लेना है । आमतौर से देखा गया है क जाड़े म 3-4 ह ते पर बुखार या ूडर नकाल दया जाता है । इसका नणय उ के हसाब से तापमान क आव यकता को देखकर करना चा हए । 4 ह ते के चूज को 750 F ूडर के नीचे तापमान चा हये और कमरे का तापमान 650 F होना चा हये । य द इससे कम ताप होता है तो आप ूडर या बुखार नह ं नकाल सकते ह । ऐसा करने पर मृ यु दर बढ़ेगी । कसी बीमार का कोप भी हो सकता है । फ ड क फालतू खपत तय बात है । 13.6 ग मय के मौसम म मु गय क देखभाल: (i) ग मय म 30 से 42 ड ी से ट ेड या उससे अ धक तापमान होने पर प य म न के वल मृ यु दर अ धक होती है, वरन ् 5 से 20 तशत तक अ डा उ पादन भी कम हो जाता है । इससे बचाव हेतु - (a) 2.3 क ा. सो डयम बाई काब नेट या मीठा सोडा त टन आहार म मलाया जा सकता है ।
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    172 (b) ह टोक से बचाव हेतु 454 ाम / त टन आहार क दर से वटा मन सी अथवा अ धक गम म उ त दर से ह ए ीन आहार म मलाई जा सकती है । (c) अ या धक गम म जब मु गयाँ ताप नय ण के लए प टंग करना शु कर देती ह तो पतले छलके के अ डे ा त होने लगते ह । इससे बचाव हेतु प य को काब नेट पानी म दया जा सकता है । (ii) ये ायलर समूह जो ब यो य उस के हो, उ ह दोपहर म आहार नह ं दया जाना चा हये, क तु यह सु नि चत करल क इस आहार यव था से शार रक भार कम न हो (iii) गम के मौसम मे आहार का उपयोग कम हो जाता है, िजससे उ पादन मता भा वत होती है । अत: ग मय म लेयर आहार म लगभग 25 तशत तक ोट न का समावेश करद अथवा आहार उपयोग बढ़ाने हेतु ऐनज या काब हाइ ेड क मा ा कम कर द । (iv) साथ ह दाना गीला करके दया जाना चा हए । (v) मुग गह म अ धक गम और नम हवा नह ं रहनी चा हए । उसके नकालने हेतु सभी वट लेटस खुले रह एवं उन पर टाट आ द के पद लगाये जाने चा हए, िजन पर दोपहर के समय छड़काव कया जा सकता है । इसके अलावा पंख एवं कू लर का उपयोग भी कया जा सकता है । (vi) गम के मौसम म 9- 10.8 प ी / वगमीटर से अ धक प ी घन व नह ं रखे । (vii) मु गय के पीने का पानी 10-13 ड ी से0 तापमान का इले ालाइट यु त पानी दया जाना उपयु त रहता है । (viii) गम म 108 ड ी फॉरेनाइट से अ धक तापमान होने पर वयं मुग अथवा ल टर पर भी छड़काव कया जा सकता है, ले कन यह उ पादन क ओर न सोच कर मुग को जी वत रखने हेतु कया जाने वाला यास है । 13.7 स दय एवं बरसात म मु गय क देखभाल : माह जून-जुलाई एवं स दय के दौरान अ य मौसमी बीमा रय के साथ ह इ फे ि शयस ो काइ टस व इ फे ि शयस बरसल डसीज (ग बोरो) के मले हु ए सं मण क संभावना अ धक है । वशेषत: िजन प य म पहले सी.आर.डी कोराइजा या वसन तं क कोई अ य बीमार ल नकल या सब ल नकल प म हो, उ ह अ धक सावधानी क आव यकता है । उ त दोन ह बीमा रयाँ वषाणु ज नत है । ल ण : मु गयाँ -पतल बीट करना, वृ क एवं बरसा म सूजन, पैर क माँसपे शय म हेमोरेज तथा साथ ह एअर सेक, े कया म ला लया सूजन आ द ल ण द शत करती है । बचाव : पूव म ह उ त से वे सीनेशन सु नि चत कर ल । प ी गृह म वे ट लेशन का वशेष यान रखरोग होने पर ए ट बायो टक थेरेपी द व प य पर कसी कार का ेस न आने दे ।
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    173 (ii) कोराइजा: यहरोग छोटे चूज म अ धक होता है । नाक, आँख से पानी आना, चेहरे पर सूजन होना, फे फड़े व े कया म ला लमा तथा सूजन मलती है । उपचार हेतु पाँच दवस तक उ चत ए ट बायो टक वटा मन क खुराक देनी चा हए। (iii) कॉ सी डओ सस : यह रोग आइमे रया नामक परजीवी से फै लता है, जो आँत और सीका को अपना नशाना बनाते है । इसके मु य ल ण है - दाना कम खाना, वजन कम होना, बीट म खून आना, पंख फै लाकर बैठना, लंगड़े होना आ द । उपचार एवं बचाव हेतु ए ो लयम सा स दये जा सकते है । (iv) कृ म रोग : कृ म रोग ज नत सम या इस मौसम म अ धक होती है । गोल व चपटे कृ म आंत म पड़ जाते है । िजनसे मु गयाँ सु त, कलंगी काल पड़ना, उ पादन कम हो जाना आ द ल ण द शत होते है । इसे रोग से बचाव हेतु समयब कृ मनाशक क खुराक द जानी चा हए । (v) फफूं द ज नत रोग : यह रोग आहार व लटर म अ धक नमी के कारण उगी फफूं द एवं उनके टॉि सन वारा होता है । बचाव हेतु उ चत ए ट फं गल औष धयाँ बचाव के तर तक अथवा लहसुन या इसका तर आहार म 3 तशत के तर तक उपयोग कया जा सकता है । साथ ह 0.5% नीले थोथे के घोल से फाम को धोया जा सकता है । (वषा ऋतु म फै लने वाले व भ न रोग, ए परिजलो सस कोराइजा कॉ सी डओ सस कृ म रोग व अ य फफूं द ज नत रोग से बचाव हेतु बछावन सदैव शु क रहना चा हए । इस हेतु आव यकतानुसार लकड़ी के बुरादे आ द का योग कया जा सकता है । प ी गृह म वायु का उ चत आवागमन सु नि चत कया जाना आव यक है । 13.8 सारांश: प य म मौसमी रोग क समु चत देखभाल, समय रहते उनका उ तम ब धन ह इन रोग वारा कु कु ट पालन से बारहमास होने वाल आ थक त क भरपाई हो सकती है I अ या धक गम के मौसम म प य म ेस (तनाव) एवं अ य ह ट ोक जैसे रोग से उ पादन म ती गरावट के साथ-साथ शर र का तापमान अ नयि त प से बढ़ता जाता है, िजससे प य म तापघात एवं लू लगने जैसे ल ण द शत होते है । शर र म पानी क कमी होने से उ पादन म भार गरावट एवं प य म अ या धक मृ यु दर पाई जाती है । िजसका कारण नजल करण एवं ख नज लवण क कमी होना है । अत: गरमी के मौसम म प य को ठंडक क यव था एवं पीने का पानी ख नज लवण के साथ बार-बार देना चा हए । सद के मौसम म ठ ड से बचाव हेतु परदे लगाए जाने चा हए तथा बफ ल हवाओं से कु कु ट शाला के प य को दूर रखने का उ चत ब धन करना चा हए । वषा ऋतु म वशेष सावधानी बरतते हु ए ल टर गीला ना होने दे । आव यकतानुसार बछावन बदल द । कु कु टशला के अ दर एवं बाहर क टानुरोधी औष ध का छड़काव कर ।
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    174 इस कार उे यपूण एवं लापरवाह र हत यव था को अपनाकर कु कु टपालक अपने प य को अ या धक तापमान से बचा सकते ह तथा उनसे अ धक उ पादन (अंडा या मांस) लेकर अपनी आ थक ि थ त सु ढ़ कर सकते ह ।
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    175 इकाई : वभ न रोग से जुड़ी जै वक सुर ा एवं नरोगी प ीपालन इकाई – 14 14.0 उ े य 14.1 तावना 14.2 जै वक सुर ा एवं संल न कारक 14.3 जै वक सुर ा के लए मुग फाम पर कये जाने वाले पूव ब धन 14.4 कु कु ट रोग एवं व भ न रोग सार मा यम 14.5 ग नरोधक स ा त 14.6 नसं मण काय म 14.7 दाना एवं पानी का शु करण 14.8 अ ड क जै वक सुर ा 14.9 सारांश 14.0 उ े य जै वक सुर ा से अ भ ाय मुग पालन का सं मण र हत (जीवाणु/ वषाणु /परजीवी/फं फू द ) स पूण वकास एवं लाक के समु चत ब धन से है । जै वक सुर ा कु कु ट वकास को ऐसा आधार दान करता है, िजसम वा य से जुड़ी सम याओं के नराकरण के साथ-साथ मुग शाला क साफ-सफाई, उपकरण एवं अ य यु त साम ी को जीवाणु र हत बनाना (Sanitation) व कु कु टशाला को Hygienic प रि थ तयाँ दान करने क याओं को लागू करना है । इकाई म व णत अ ययन साम ी के समावेश का उ े य भी जै वक सुर ा को आधार बनाकर नरोगी कु कु ट पालन करना ह है । 14.1 तावना भारत वतमान म कु कु ट पालन वकास क ग त म नर तर अ सर हो रहा है, िजसका एकमा कारण आधु नक टे नोलॉजी के उपयोग के साथ-साथ रोग उ प न करने वाले व भ न सं मण पर नय ण ह है । इसके साथ-साथ एक मह वपूण पहलू यह भी है क तवष कु कु टपालन म होने वाल आ थक हा न का अ धकांश ेय कु कु टशाला के समु चत ब धन के अभाव म आने वाले रोग जैसे, रानीखेत, ग बारो को लवेसीलो सस सालमे नलो सस
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    176 माइको लाजमो ससव अ य, योग म लये जाने वाले बचाव एवं रोकथाम के उपाय म बरती जाने वाल श थलता एवं ु टय के कारण प य को रोगी बनाते है । अ धकाँश जीवाणु एवं वषाणु सं मण व भ न मा यम से जस वायु, पानी, दाना, मुग शाला म काम करने वाले कायकता एवं आसपास साफ-सफाई के अभाव म एक कु कु टशाला से दूसर कु कु टशाला एवं एक थान से दूसरे थान पर फै लते है । अत: आव यकता इस बात क है क फै लने वाले इन सं मण को रोका जाये, साथ ह कटाणुओं का मुग शाला म वेश नषे कया जावे । जै वक सुर ा ह वह या है, िजसम हम व भ न मा यम के वारा यह काय पूण कर सकते ह । इकाई म इ ह ं व भ न याओं का वणन कया गया है । व भ न रोग, उ पादकता कम करते है । अत: यास यह हो क प ी नरोगी रह, रोग सं मण नह ं हो तथा रोग का नवारण कया जावे । नरोगी प ी समूह ह आ थक संतुलन का आधार है । 14.2 जै वक सुर ा एवं संल न कारक जै वक सुर ा को रोग मुि त के प रपे म देखना होगा, इसे आ थक प से ा त करने के लए कु कु ट गृह नमाण यव थाओं एवं सु वधाओं के उपयु त उपभोग तथा कायकताओं क यो यता व काय मता पर यान देना होगा । पूव न मत कु कु टशालाओं पर हो सकता है, सभी जै वक सुर ा उपाय पूण प से लागू न कए जा सके , क तु नये नमाण तथा नये ोजे ट म इनका स पूण उपयोग अव य ह कया जा सकता है । नमाण के दौरान हवा (Wind) का वाह एवं दशा इस तरह रखी जाव क जीवाणुओं का वेश यूनतम लेवल पर कया जा सक, य क हवा के मा यम से ह सं मत त व जैसे - धूल, पंख, सं मत ाव आ द आसानी से कु कु टशाला म वेश कर जाते है । इसी कार उ चत थान का चयन एवं आसपास गंदगी र हत वातावरण रखना आ द ऐसे ब धन है, िजससे जै वक सुर ा के उपाय को आसानी से लागू कया जा सकता है । इसके लए नमाण के दौरान न न ब धन आव यक है । (i) मुग शाला के चार ओर कट लेतार क फे ि संग (Fencing) होनी चा हए ता क कु त , जानवर , सूअर , चूह का वेश रोका जा सके । पशु अपने साथ कई कार के सं मण के वाहक होते है । (ii) अ य प य जैसे जंगल च ड़या, कबूतर, कौआ (Stray Birds) मुग य म व भ न रोग सं मण ला सकते है । अत: इनके वेश को नषेध करने के लए ह क जा लयाँ (Wires) लगाना उ चत रहेगा । इसी कार बरगद, आम, नल गर जैसे बड़े पेड भी कु कु टशाला के आसपास नह ं होने चा हए अ यथा यह जंगल प य को जो रोग के वाहक होते ह, आमं त करगे । (iii) दाना पूण प से सुर त थान पर ह सं हत (Store) कर । यह सूखे, हवादार पानी र हत थान पर सं हत कये जावे, चूह का वेश नह ं हो, दाना पूण प से नमी मु ता थान पर ह रखा जावे अ यथा फफूं द ज नत रोग क संभावना बनी रहती है ।
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    177 (iv) अ धकतरसं मण एक कु कु टशाला से दूसरे म आने वाले यि तय के मा यम से वेश करते ह । अत: बाहर से आने वाले आग तुक का वेश पूण नषेध रहे, वाहन का आवागमन ना हो तथा मुग शाला के कायकता ह साफ-सफाई का यान रखते हु ए Foot Bath ( वेश के थान पर जीवाणुरोधी घोल) का योग कर मुग शाला म वेश कर । (v) मृत प य का न तारण, शी उ चत व ध जैसे जलाना, गाड़ना अथवा इन सनेरेटर का योग कर ह करना चा हये । गाड़ने वाले ग ढे क गहराई 2-3 फ ट से कम ना हो अ यथा कु ते व अ य पशु उसे नकाल कर पुन: सं मण का कारण बन सकते ह । ग ढे म नमक का योग भी कर । आसपास के थान पर चूना डाले । (vi) वा य कायकता अथवा मुग शाला के कायकता भी वंय कसी सं मण से सत नह ं होने चा हए । उ ह ट .बी., टायफाइड (Typhoid), Enteritis जैसे रोग नह ं होने चा हए । साथ ह कायकता काय करते समय गमबूट व द ताने का योग कर । 14.3 जै वक सुर ा के लए मुग फाम पर कये जाने वाले पूव ब ध 14.3.1 क ट पतंग (Insect & Pest) का नयं ण:- मुग फाम पर क ट-पतंग क उपि थ त, रोग होने क गारंट होती है । इनके वेश से र त परजीवी रोग जैसे पाईरोक टो सस कॉ सी डयो सस व अ य रोग तेजी से पनपते है । उपयु त क टनाशक औष ध का चयन एवं उनक नधा रत मा ा का योग कर इन वे टर परजी वय से नजात पाई जा सकती है । उदाहरणाथ Cythion – 8-16ml/ Lit. 9 Water- े के प म List of Disinfectants न न सभी जीवाणुरोधी औष धयाँ Bird Flu के रोकथाम एवं बचाव के लए भी कारगर एवं उपयोगी स होती है । (a) रे ट फाइड ि ट या सेवलोन या डटोल (1%) का योग हाथ एवं पैर क सफाई के योग म लाया जाता है । यह घोल फाम वकर के साथ - साथ आग तुक के योग के लए भी उपयोगी रहेगा । (b) 2% सो डयम हाइ ो साइड का घोल मुग फाम के वेश वार पर जूत क सफाई के योग म लाया जा सकता है । (c) सो डयम हाइपो लोराइट 2% घोल के योग से नकलने वाल लोर न (Active) वारा मुग शाला के औजार को जीवाणुर हत कया जा सकता है । (d) वाटरनर अमो नया क पाउ ड 4% घोल मुग शाला क द वार , छत , फश एवं औजार का सं मण र हत करने के लए पया त है । (e) कै ि शयम हाइ ो साइड 3% घोल द वार और फश के लये (f) 2.2% घोल सो लक ए सड (Cresolic Acid 2.2% sol) फश क सफाई के लए (g) फ नोल 2% घोल फश के लए
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    178 (h) वरकोन -एस(Vircon-S)एवं Trilocid Concentrate (i) यु मगेशन के लए फाम लन (Farmalin) एवं पोटे शयम परमेगनेट (Pot. Permaguate) योग म लया जावे। 14.3.2 ALL IN ALL OUT: कु कु ट उ योग म यह आव यक है क बना कसी बीमार के पूरा लोक तैयार होकर बाहर नकल जाये, क तु आम तौर पर ऐसा होता नह ं है । कोई न कोई बीमार कसी भी उ पर आ जाती है । ोयलर उ योग म तो यह आम बात है । और बीमा रयाँ 5 से 6 स ताह क उस म आ जाती है एवं इलाज कराना पड़ जाता है । इससे खच तो बढ़ता ह है, साथ ह वजन कम समय यादा और फ ड क खपत बढ़ कर फ ड पा तरण (F.C.R.) खराब होता है । इससे उ पादन क क मत इतनी बढ़ जाती है क ाय: नुकसान हो जाता है । यह सम या हर जगह है और कोई भी फाम इससे बचा नह ं है । जो ऑल इन ऑल आऊट का स ा त नह ं अपनाते, उ ह नुकसान उठाना पड़ सकता है । इस स ा त को अपनाने से भले ह एक लौट साल म कम नकले, क तु त लाट उ पादन खच बहु त कम आयेगा । बस यान रहे, वह पहला लाट जो आपने नकाला था । पूरा लाट तैयार होने के बाद जब नकल जाये तो पूरे शेड (Shed) को भल भाँ त साफ करके 7-10 दन का व ाम द । उसका पूरा अनुसरण कर बि क उससे भी बेहतर करने क को शश कर । आने वाले दन म जब व व यापार खुल जायेगा, तो हम हर हाल म उ पादन क मत म कमी लानी होगी, तभी हम वदेशी माल का मुकाबला कर सकगे । यह कमी आयेगी, के वल एक समय म पूरे फाम पर एक ह उ के चूज से ALL IN ALL OUT. 14.3.3 Cleaning & Disinfection Programme: OBJECTIVES- 1. To avoid various bacterial, viral, fungal & protozooal diseases. 2. To enhance the performance of birds. STEPS TO BE FOLLOWED:- 1. Remove all portable equipment’s clean & wash them with jet of wash, Afterwards dip them in any suitable disinfectant as per manufactures instructions & then sun dry for a day. 2. Remove all organic material preferably after spraying 5 to 10% formalin & disposed it off away from farm premises. 3. Control of Rodents & Wild birds entry.
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    179 4. Cleaning ofoverhead tank with pipeline -5 to 10% sodium hypochloride keep it over night & then flush the system with plain water. 5. Heat treatment- Burning of floor, cages, side wiremesh with flame fun to reduce coccidiosis, wing etc. 6. Chemical Treatment- Soak floor with strong solution caustic soda flakes for 12 to 24 Hrs. with pH above 12 in order to kill IBD virus. Dose of NaOH-11 to 12gms / lit of water, or 1.4kgs/1000sq.ft. 7. Control of Ticks, Mite and Lice infestation by spraying any insecticide e.g. - Cythion – 8 to 16 ml/ lit of water. 8. White wash –Lime stone +2 to 5% formalin +1% Copper Sulphate. 9. Fumigation- 20gms of KMNO4+40 ml formalin for 100cu.ft. 10. Spray viricidal disinfectants. 11. Keep the house vacant for 7to15 days. 14.4 कु कु ट रोग एवं व भ न सार मा यम मु गय म होने वाले कु छ रोग वशेष सार मा यम के वारा न न प से फै ल सकते है । अत: रोग कारक वारा रोग के सार तथा रोग नषेध क व धय के व लेषण से ह रोग होने क संभावनाओं को सी मत कया जा सकता है । . रोग सार का मा यम 1. कोराइजा य / अ य - यि त या उपकरण 2. फाउल –टायफाइड य / अ य - यि त या उपकरण, व टकल, अंस-ओवे रयनआहार व बछावन वारा, चूहे आ द ज तुओं वारा । 3. इ फे ि शयस- ांकाय ट सवायु सारण, य / अ य स पक 4. मायको ला मो सस य / य सं मण, व टकल, ाँस-ओवे रयन, आहार व बछावन वारा, चूहे, जंगल प य व अ य कारक वारा 5. पैराटायफाइ ड य /अ य , व टकल, एग-क टे मनेशन, आहार व बछावनसे स पक, चूहे, जंगल प य व अ य कारक से 6. पा चुरेलो सस य / अ य स पक -आहार व बछावन वारा चूहे, जंगल प य व अ य कारक से 7. पुलोरम (वी.ड लू.डी.) य / अ य स पक- यि त व उपकरण वारा, व टकल, ांस-ओवे रयन, आहार व
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    180 बछावन वारा तथाचूहे आ द वारा 8. यू कै सल (आर.डी.) रोग वायु य / अ य , स पक 9. मेरे स- डजीज य / अ य - यि त या उपकरण वारा 10. ल फायड- यूको ससव टकल, ाँस-ओवे रयन 11. ले र जो- ेकाय टस वायु सारण, य अ य स पक 12. इ फे ि शयस बसल य स पक, अ य स पक 13. डजीज (ग बोरो) 14. रयो-वायरल आथराइ टस व टकल, ांस-ओवे रयन य स पक 15. रयो-वायरल-मालए ज वशन व टकल, ांस-ओवे रयन, य स पक आहार व बछावन से स पक 16. ए डनोवायरस य (डायरे स) स पक 17. व टकल (अनुल ब) स पक एग-क टे मनेशन (अ ड-सं मण) अ य (इन-डायरे ट) सं मण- यि त या उपकरण वारा 18. 19. 20. 21. ए पिजलो सस व टकल, एग क टे मनेशन 22. ए वयन ए सेफलोमाइलाइ टस व टकल, ांस ओवे रयन ( ड ब वारा), य / अ य 23. ए वयन इ लुए जा य / अ य -जंगल प य व अ य कारक वारा 24. ए वयन पॉ स वायु सारण, य स पक 25. लोि यल-ए ाय टस आहार व बछावन वारा 26. कॉल बे सलो सस य स पक, आहार, जल तथा य 27. कॉ सी डयो सस य - आहार / बछावन वारा जै वक सुर ा, कु कु ट ब ध यव था के अ तगत आने वाले व भ न ब ध काय क वृहत ृंखला है, िजसम रोग के वेश पर रोक तथा रोग के अ य ईकाइय मे वतीयक या पा व सार के खतरे को कम करना भी है । रोग के सार क आवृ त का मापद ड प ी घन व, ोत व सारक प य तथा प ी समूह के व तारण के अलावा मानव सार वारा भी होता है । यावसा यक कु कु ट पालन म होने वाले रोग कु कु ट यवसाय को लाभ क संभावनाओं से वं चत कर सकते ह, य क रोग से उ पादन मता व उ पाद के गुण म हास, मृ युदर म वृ . आहार उपभोग म कमी तथा लागत-मू य का अवमू यन होता है ।
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    181 पार प रकप से रोग का उपचार यावसा यक लाभ क तुलना म अ या धक महंगा होता है । अत: रोग क ती ता तथा उससे होने वाल हा न को कम करने म ‘इ यूनाइजेशन ( तका रता) का अ य त मह व एवं तथा यावहा रकता होती है । तथा प 'इ यूनाइजेशन' - 'इ यून डे फ शएट' ( तका रता रोधी) सं ामक रोग जैसे वसल डजीज, आई.वी आ द म प य को पूण प से व थ रखने म व वसनीय नह ं है । 15.5 रोग नरोधक स ा त 1. सघन कु कु ट पालन अ भयान म पैतृक समूह से कम से कम 5 कमी. पैतृक समूह तथा लेयर (अ डो पादक प ी) समूह को कम से कम 3 कमी. तथा लेयर व ायलर समूह को कम से कम 1 क.मी. दूर कु कु ट गृह म पालन करके तथा कु कु ट पालन फाम से यि तय व उपकरण के अनाव यक आवागमन को रोक कर रोग फै लने के खतरे को कम कया जा सकता है । 2. यावसा यक कु कु ट ईकाइयाँ 'ऑल इन- ऑल आउट' स ा त पर रखनी चा हए । ' र लेसमे ट टॉक' व श ट रोग से पूणत: मु त तथा उ पादक प य म फै ले रोग के त पूणत: ‘इ यूनाइज' होनी चा हए । 3. ायलर, लेयर तथा पेरे ट कु कु ट के फाम उन थान पर था पत होने चा हए, जहाँ यावसा यक कु कु ट-पालन का घन व कम हो तथा जहाँ अ यावसा यक व थानीय कु कु ट न रखे जा रहे हो । 4. कु कु ट पालन फाम मु य प रवहन माग के नकट होने चा हए ता क वहाँ सुगमता से पहु ँचा जा सके । 5. चोर अथवा रोग के वेश क संभावनाओं को रोकने क ि ट से येक कु कु ट पालन फाम तथा क पृथक प से घेराब द कए हु ए ह । वेश के सभी माग विजत े ’ क चेतावनी से यु त व काय करने वाले कमचा रय क अनुपि थ त म पूण प से तालाब द कए हु ए ह । 6. कु कु ट पालन े म वेश के पूव सभी यि तय का ‘रोग-असं मण’ क ि ट से नाना द करके व कु कु ट पालन ईकाइय के लए नधा रत व ा द धारण करने चा हए। 7. दू षत आहार से पैराटायफाइड, सालमोनेलो सस आ द रोग हो सकते ह । ‘ताप-दाब या’ से आहार के हा नकारक सू म जी वय को ख म कर, इसे 'पैलेट आहार’ (गो लयाँ) म बदला जा सकता है । 8. सामा यत: ायलर, पेरे ट व लेयर कु कु ट समूह के आहार लाने-ले जाने के लए पृथक-पृथक वाहन का उपयोग उ चत रहता है । इन वाहन को वा पस आहार-संयं म ले जाने के पूव धोकर जीवाणु मु त कर लेना चा हए। 9. येक कु कु ट पालन फाम व इकाई के उपयोग हेतु पृथक-पृथक उपकरण होने चा हए । अ य उपयोग म आने वाले उपकरण को फाम म लाने से पूव पूण प से जीवाणु
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    182 र हत करनेके लए जीवाणुनाशक घोल से अ छ तरह धो लेना अथवा ' यू मगेट' कर लेना चा हए । 10. अ ड को रखने हेतु लाि टक क े उपयोग म लेनी चा हए तथा उ ह योग करने के पूव जीवाणुनाशक घोल से धो लेना चा हए । 11. साफ, शु क व यावसा यक कु कु ट से स पक- वह न बछावन ( लटर) काम म लेना चा हए । अ धक बछावन काम म लेना व यं ीकरण रोग सं मण क संभावनाओं को कम करता है । 12. ण व घायल कु कु ट, श त यि तय वारा व थ प य से पृथक कर न ट करने हेतु कु कु ट आवास दूर एक के य वनाश थल पर ले जाने चा हए तथा समु चत प से न ट कर देने चा हए ता क रोक फै लने क अ म संभावनाओं को रोका जा सके । इस हेतु आव यक वाहन व साधन सावधानीपूवक काम म लाने चा हए । 13. कसी भी ि थ त म कु कु ट- य म प ी घन व अ या धक नह ं होना चा हए । 14. कु कु ट आवास का नमाण, रखरखाव व पूण प से तकनीक सलाह पर आधा रत होना चा हए । दोषयु त आवास कु कु ट पालन यव था म यवधान उ प न करते ह । 14.6 नसं मण काय म (i) येक कु कु ट आवास गृह व फाम से व उसके चार ओर से सम त म ी व लटर पूण प से हटा द । (ii) काम म आने वाले सम त उपकरण को एक मु य थान पर एक करके व उसके मु य भाग को पृथक करके आव यक व उपयु त व ध से जीवाणु मु त कर द । (iii) पुराने व बचे आहार को पूण प से हटा द । (iv) व युत आपू त यव था का अ छ तरह से नर ण कर ले । (v) कु कु ट गृह के बा य भाग को जीवाणु र हत व रोगमु त करने हेतु आय नक जीवाणुरोधक डटज ट के घोल से 10 क ा. / सेमी. के दाब पर मश: छत, बाहर द वार , नकास ना लय व काय थल को धोय । (vi) कु कु ट गृह के आ त रक भाग को साफ करने के लए छत, द वार , परद , वे ट लेटस (संवातक), जमीन व आहार पा को साफ करना व उन पर पड़ी म ी को हटा देना आव यक है । इस हेतु अनाय नक जीवाणुरोधी डटज ट घोल अथवा जल क बौछार उ च दाब पर धोना चा हए । इस काय हेतु - वाटरनर -अमो नयम यौ गक' अथवा फ नो लक जीवाणुरोधी घोल भी उपयोगी है । कु कु ट क को अ छ तरह जीवाणु र हत करने हेतु फामि डहाइड- यौ गक से ा त 'फाम लन वा प’ से ‘ यू मगेट' (धू ीकृ त) करना अ य त ह उपयोगी है । (vii) रोग मुि त व जीवाणु रोधन क तकनीक क मानक णाल अपानाने से जै वक सुर ा काय म को उ च मता दान करते हु ए वां छत आ थक लाभ ा त कये जा सकते है ।
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    183 14.7 दाना एवंपानी का शु करण अ छे उ पादन के लए य द चूज को तीन तरह का अलग-अलग राशन दया जाये तो बेहतर होगा । 0- 10 दन तक ी टाटर - ायलर फ ड 11-24 दन तक टाटर - ायलर फ ड 25 दन से बाजार करने तक फनीशर - ायलर फ ड (i) इन तीन राशन म ोट न और एनज क मा ा म - भ न होगी- ोट न एनज ी टाटर 23-24% 2900 K.Cal. टाटर 21-22% 2950 K.Cal. फनीशर 19-20% 3000 K.Cal. (ii) एक फ ड से जब दूसरे फ ड म बदलना है तो धीरे-धीरे बदल । ी- टाटर म जाने के लए पहले दन 3 भाग ी- टाटर और 1 भाग टाटर मलाकर खलाय और इसके बाद दोन आधा-आधा आपस म मलाकर दो दन खलाव । अ त म 1 भाग ी टाटर और तीन भाग टाटर मलाकर दो दन खलाये । इसके बाद के वल टाटर । इसी कार जब टाटर से फ नसर म बदले तो धीरे-धीरे बदले, ऐसा नह ं करने पर वजन म कमी आ सकती है और आँत म सूजन (Enteritis) (iii) ोयलर उ योग म सफलता के लए कम समय, कम फ ड पर अ धक से अ धक वजन ा त करना आव यक है । 4 स ताह म 1700 ाम फ ड पर 1 kg. वजन से अ धक ा त करना सफलता होगी । (iv) ॉयलर उ पादन म फ ड अके ले खच का लगभग 50% भाग है । अत: हर हाल म इसका संतु लत होना आव यक है । साथ ह फ ड को बरबाद होने से बचाना भी आव यक है। (iv) ार भ के तीन-चार दन फ डर पूरे भरे होने चा हए । जो फ ड गरेगी, वह अखबार पर गरेगी । (vii)इसके बाद दो स ताह तक आधा भाग ह फ ड भरे । तीसरे स ताह से अ त तक व 1/3 से यादा फ ड फ डर म न भर । इस तरह काफ फ ड को बेकार होने से बचाया जा सकता है । पानी :- कु कु ट के शर र म पानी का बड़ा मह व है तथा यह एक आव यक पोषक त व क तरह काय करता है । आयु के हसाब से च कन म 55 से 75% पानी, नवो दत चूजे म 80 से 82% पानी पाया जाता है । शर र म 10% पानी क त शार रक वकार पैदा करती है, जब क शर र से 20% पानी का नकलना मृ यु का कारण बन सकता हे । पानी शर र क सभी उपापचयी याओं के लए आव यक है । अत: इसक हमेशा उपल धता बनी रहना व व छ ताजा, ठ डा पया त मा ा म हमेशा उपल ध रहना चा हए । एक औसत के हसाब से मु गय को दो एम.एल. (2ml) पानी क आव यकता त एक ाम दाने क
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    184 मा ा परहोती है, जो क बढ़कर ग मय म तीन से चार गुना हो सकती है । चूजे वय क मु गय क अपे ा अ धक पानी पीते है । चूज को पानी क कमी डीहाइ ेशन, शर र के भार म कमी, कम वृ एवं मृ यु का कारण हो सकती है । समय -समय पर पानी के बतन, फ टर, टक, वाल, स लाई लाइन आ द को देखते रहना आव यक है । शर र म पानी के न न काय होते ह । (i) पाचन या म सहायक (ii) छोट आत म भोजन के अवशोषण के लए आव यक (iii) शर र के व भ न भाग म पोषक त व को पहु ँचाना (iv) शर र म अप श ट पदाथ को बाहर नकालना (v) थम रेगुलेशन (vi) जै वक अंग को होने वाल त को रोकना (vii) व भ न जोड़ को कायशील बनाये रखना (viii) पानी क PH 5.5 (औसत 6.8 से 7.2) जल क वशेषताऐं :- जल म ख नज त व का म ण (i)Hard Water – Very Soft (15PPM) से Very Hard (2000+PPM), प ी -1000 PPM तक के पानी को नह ं पीती है । अ धक कम होने पर पापी का के ि शयम पदाथ वा व व नपल पर जम जाता है, िजससे वह अव हो जाते है एवं पानी उपल ध नह ं हो पाता। (ii)खारा पानी (Saline Water) - ऐसा जल को टल े म जहाँ पर लोराईड और काब नेट के सो डयम और पोटे शयम त व अ धक पाये जाते है, पाया जाता है । (iii) पानी म नाई ाइट और नाई ेट क उपि थ त वषा तता उ प न करती है । (iv)पानी म लोह त व (Iron Salt) क उपि थ त 0.3 PPM तक ह वीकाय होती है । पानी म स फर त व अ ड को लड़ाने का काय करते ह, जो पानी म Sulphides क उपि थ त के कारण होता है । पानी का शु करण – (i) अ ावायलेट रेडीयशन वारा (Ultra Violet Radiation,) -यह जीवाणुओं क सं या को कम करता है, क तु अ धक खच ला है । (ii) गम करना एवं छानना (Boiling and Filtration) -यह व ध अ धक पानी के शु करण के लए पया त नह ं है । (iii) रसाय नक व ध वारा (Chemical Purification) -यह व ध जीवाणुरोधी उ तम व ध है । वशेषकर पानी के लोर नेशन से (Chlorination) सभी जीवाणुओं का खा मा हो सकता है एवं यह एक स ती व ध भी है I List of Chemical Water Purifier जो माकट म उपल ध है तथा काय म लए जा रहे है I
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    186 14.8 अ डक जै वक सुर ा अ ड का उ पादन उ चतम ेणी का होना आव यक है । इसके लए Candle व ध अपनायी जानी चा हए । (a) अ ड क साफ सफाई एवं जीवाणुमु त बनाना - ग दे अ ड को अ छ तरह से प छ ल । इसके लए अ ड को गम पानी (100० ) िजसम 4.5% डटोल अथवा 0.5% फोरमल डहाइड मला हो, से धोकर साफ कर ल । (b) अ ड को Sanitize करने के लए न न योग म लेव । -Formaldehyde Gas- Fumigation 100 Cubicft Area के लए 20gm P.P+40ml formation (Ratio 1:2) योग म लेव Area= L x B x H=.......................Cubic ft. Area. (c) Quaternary Ammonia –Spray -200 PPM (d) Ozone (O3) effective at 100 PPM for hatching eggs. वतमान म बड लू रोग संसार के व भ न भाग म इमिजग (Emerging) प म कट होकर कु कु ट पालन को आ थक त पहु ँचा रहा है । वष 2006 म देश के महारा एवं गुजरात रा य म इसक पुि ट हु यी है । अत: इस रोग के फै लाव को रोकने, प य को नरोगी रखने एवं मनु य म इस रोग के फै लने क आशंका को म ेनजर इस रोग के वषय म पूण तैयार , बचाव एवं रोकथाम के समु चत उपाय का ब धन एवं कु कु ट पालक को वषय आधा रत जै वक सुर ा के वषय म जानकार होना अ य त आव यक है । कु कु ट पालक को जै वक सुर ा के फाम पर न न उपाय आव यक प से करने चा हए (i) प य को अ य पशु एवं जंगल प य से दूर पाले तथा फाम पर अ य प य व पशुओं को सि म लत न होने देव । (ii) फाम पर साफ-सफाई का वशेष यान रख । जीवाणुओं को कु कु टशाला म वेश न करने देव एवं इनक वृ रोकने के लए फाम पर डसइ फे टड का योग कर खाने एवं पीने के बतन, के स, फश, द वार इ या द अ छ तरह से साफ कर ल ।
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    187 (iii) वयं भीव छ रहे तथा नये प य को सि म लत करने से पूव अलग रख । वयं के कपड़े,. जूते, हाथ को अ छ तरह से जीवाणु र हत करने के प चात् ह कु कु टशाला म वेश कर अथवा पश कर । (iv) बाहर से लायी हु ई उपकरण औजार अथवा कसी भी चीज के मा यम से रोग के क टाणु कु कु टशाला म नह ं लाये । (v) प य पर लगातार नजर रख, देख - अ या धक मृ युदर अथवा बड पड़ रोग के कोई भी ल ण जैसे- आँख के पास गदन एवं सर पर सूजन आना, कलंगी एवं वेटल का सूजना आ द । (vi) सभी तरह के रोगी प ी क अचानक अ या धक मृ युदर क सूचना नकट थ पशु च क सालय को देव एवं रपोट कर । (vii) एक बार म एक ह उ के प य को कु कु टशाला म पाले । इस तरह से ALL IN ALL OUT स ा त क पालना करI (viii) कसी भी अनाव यक आग तुक वेश को प ी शाला म रोके एवं आने एवं जाने के पूव एवं प चात प ी शाला को, वयं को जीवाणु र हत करना सु नि चत कर 14.9 सारांश ईकाई के अ ययन से यह प ट प रल त हो रहा है क बीमा रय के रोकथाम, उपयोग कये जाने वाले दाना एवं पानी के जीवाणु र हत याओं एवं कु कु टशाला म साफ सफाई के रखरखाव के बगैर व थ कु कु टपालन एवं उससे ा त होने वाले आ थक लाभ क क पना नह क जा सकती है । जै वक सुर ा म अपनाये जाने वाल टे नोलॉजी एवं उसके या वयन के लए जानकार का होना अ य त आव यक है । कु कु ट पालक को यह भी सु नि चत करना ह होगा क चाहे कसी भी मा यम से हो, सं मण को कु कु टशाला तक नह ं पहु ँचने देना है । साथ कु छ वशेष Zoonotic रोग के वषय म जैसे Bird Flu या Avian Influenza जो मानव वा य क ि ट से भी मह वपूण है और वतमान म Emerging रोग के प म उभर रहे है; व तृत वै ा नक जानकार हो तथा उसके रोकथाम एवं बचाव के समु चत ब ध पूव म ह जै वक सुर ा के मापद ड को अपनाकर समय रहते कर लये जावे तो होने वाल बड़ी आ थक हा न से बचा भी जा सके गा, साथ ह यह यवसाय एवं समाज दोन के लए अ तमह वपूण होगा । इस तरह से यह न कष नकाला जा सकता है क जै वक सुर ा ह नरोगी कु कु टपालन का आधार त भ है ।
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    189 इकाई - वभ न पोषक त व क कमी से होने वाले रोग एवं अ य मेटाबो लक डसआडर इकाई - 15 15.0 उ े य 15.1 तावना 15.2 कु कु ट पोषण के मुख कारक व उनक कमी से होने वाले रोग 152.1 ोट न व अमीनो अ ल 15.2.2 काब हाई ेट 15.2.3 वसा 15.2.4 वटा मन 15.2.5 मनरल (आव यक अकाब नक पदाथ) 15.2.6 जल 15.3 व भ न ता लकाऐं 15.3.1 वटा मन के काय/कमी के ल ण व ाि त का साधन 15.3.2 BSI वारा नधा रत मापद ड 15.3.3 मनरल के काय / कमी के ल ण 15.4 वटा मन एवं अ य आहार त व क कमी से होने वाले व श ट रोग एवं उपचार 15.4.1 राउप रोग 15.4.2 सूखा रोग 15.4.3 े जी चक अथवा इनसेफे लो मले सया 15.4.4 पादागुं लय क ऐंठन और लकवा 15.4.5 पैरो सस अथवा टांग क ह डी का अपने थान से हट जाना 15.4.6 वजा तभ ण 15.5 सारांश
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    190 15.0 उ ेय इकाई का उ े य व भ न आहारांश त व क कमी से होने वाले रोग क जानकार देना तथा कु कु ट आहार म उनके ोत को बताना है, ता क कु कु ट पालक प य को संतु लत आहार उपल ध करा सक । 15.1 तावना शर र क सामा य याय, कु कु ट वा य, वृ दर, उ पादन, अ ड क गुणव ता व अ धक उ पादन अव ध (आयु) आ द कारक का सुचा प से ा त करने के लए आव यक होता है क पया त पोषण, उ चत रखरखाव तथा रोग मु त वातावरण क आव यकता होती है । ु टपूण पोषण से प य को कई रोग उ प न हो जाते है । य द दये जाने वाले आहार म कसी वशेष पोषक त व क पूण अनुपि थ त होती है, तो उससे संबं धत व श ट ल ण द शत होते ह, क तु य द आहार म पोषक त व क मा ा कम होती है, तो सामा य कमजोर के ल ण जैसे क सु त रहना, प ी का उ पादन कम देना । अ ड वा लट खराब होना आ द ल ण दखाई देते ह, िजनके वारा कारक का पहचाना जाना काफ मुि कल होता है । 15.2 कु कु ट पोषण के मुख कारक व उनक कमी सी होने से होने वाले रोग कु कु ट पोषण के मुख कारक न न है :- (i) ोट न व अमीनो अ ल (ii) काब हाइ ेट (iii) फै ट (iv) वटा मन (a) चब म घुलनशील वटा मन (b) पानी म घुलनशील वटा मन (v) आव यक अकाब नक पदाथ (vi) जल उ त म से कसी भी एक अथवा अ धक कारक क नि चत से कम मा ा रोग जैसी ि थ त उ प न कर देती ह । 15.2.1 ोट न व अमीनो अ ल आव यक ोट न एवं अ मनो अ ल क मा ा से अ भ ाय अ त आव यक अ मनो अ ल क उपल धता एवं अ य अ मनो अ ल के स थे सस हेतु नाइ ोजन क उपल धता से है । देश के कु छ थान म जहाँ सोयाबीन मील के थान पर बनौले क खल, सूयमुखी खल आ द इ तेमाल कये जाते है, म थओ नन क कमी देखने को मल सकती है ।
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    191 म थओ ननएवं लाई सन क कमी से कम वृ दर, उ पादन म कमी एवं छोटे आकार के अ डे का आना जैसे ल ण प रल त होते ह । फनाइलेलानीन टाईरो सन; म थयोनीन से स ट न (Cystine) और लाइसीन से हाइ ो सीलाइसीन का सं लेषण होता है । य य प लाइसीन एवं सर न को अनाव यक वग म रखा गया है पर तु कु छ प रि थ तय म इन दोन क मा ा वृ के लए अपया त हो सकती है और आहार म इनका सि म लत करना आव यक हो जाता है । आव यक अमीनो अ ल म से लाइसीन, म थयोनीन आरजीनीन लाइसीन एवं टोफे न को नाजुक अमीनो अ ल (Critical amino acids) कहते ह, य क आम तौर पर दये जाने वाले कु कु ट आहार म इनक ह नता पाई जाती है। अत: कु कु ट आहार म पशु- ोट न पूरक अथवा अ य ोट न ोत सि म लत करना चा हए िजससे इन नाजुक अमीनो अ ल क पू त क जा सक। नम चन (Moulting) के समय प य म स फर वाल अमीनो अ ल क अ धक आव यकता होती है, य क पर क रचना म स ट न (Cystine) क अ धक मा ा होती है, य य प स फर वाल अमीनो अ ल क आहार म अ धक मा ा देने से नम चन के समय क अव ध को कम नह ं कया जा सकता है, पर तु इस समय होने वाल इन अमीनो अ ल क ह नता को बचाया अव य जा सकता है । ोट न क कमी से पंख आना क जाता है तथा के नबा ल म ( वजा त भ ण) पंख नोचना, पूँछ नोचना जैसे प रणाम कट होते ह । 15.2.2 काब हाई ेट काब हाइ ेट काब नक यौ गक है । इनम हाइ ोजन और ऑ सीजन का वह ं अनुपात है जो क पानी म होता है । काब हाइ ेट का मु य काय ऊजा दान करना है और आव यकता से अ धक मा ा शर र म वसा के प म सं चत हो जाती है । अ न तथा उसके उपजात िजनक आहार म लगभग 70 तशत मा ा होती है, काब हाइ ेट के मु य ोत है । काब हाई ेट र हत आहार कु कु ट को दया जाना के वल ायो गक मह व का है । इससे इनम लकवा जैसे ल ण उपि थत होते है । यवहा रक तौर पर ऐसा आहार दया जाना संभव नह ं है । 15.2.3 वसा वसा एक काब नक यौ गक है जो क ईथर लोरोफाम और वै जीन म वलयशील है तथा ि लसरोल एवं वसीय अ ल से मलकर बना है । काब हाई ेट क भाँ त इसम भी तीन त व अथात काबन, हाई ोजन एवं ऑ सीजन होते ह, पर तु इनम काब हाइ ेट क अपे ा काबन अ धक एवं ऑ सीजन कम होती है । इस लए जब इनका आ सीडेशन होता है तो काब हाइ ेट क अपे ा 2.25 गुनी अ धक ऊजा उ प न होती है । शर र म लगभग 17.0 तशत वसा तथा अ ड म लगभग 16.8 तशत वसा होती है । कु कु ट आहार म अ धक मा ा म वसा मलाने से उसम वकृ तगंध वक सत होने क संभावना रहती है, जो ी म ऋतु म हा नकारक होते ह । वसा म घुलनशील वटा मन होती है जो प य को ा त हो जाती है । कु कु ट आहार म योग कये जाने वाले खा य पदाथ म अनेक म अ धक वसा नह ं होती है और
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    192 बनौले, सोयाबीन आद बीज म ह थोड़ी अ धक मा ा म वसा होती है । आहार क वसा कु कु ट क ऊजा को दान करने के अ त र त आव यक वसीय अ ल क पू त भी करती है । चूज क उ चत वृ एवं मु गय क अ डे देने क मता बनाये रखने के लए लनोल क अ ल आहार म होना आव यक होता है । आहार म यह लनोल क अ ल 1.5 % के तर तक होना अ नवाय है । 15.2.4 वटा मन वटा मन का ता पय वाइटल एमी स से होता है । ये वे काब नक पदाथ है, जो वृ , वकास एवं उ पादन के लये अ त आव यक है । य य प ये बहु त ह कम मा ा म वां छत होते ह, फर भी इनक कमी से प ी म संबं धत व श ट ल ण दखाई पड़ते है । इनक घुलनशीलता के आधार पर ये दो कार के होते ह । (i) चब म घुलशील, जैसे वटा.A, वटा.B, वटा.K, वटा.E (ii) पानी म घुलनशील जैसे वटा C, (एसका बक अ ल), वटा B कॉ पले स (i) चब म घुलनशील वटा म स :- (1) वटा मन – A:- वटा मन A क कमी ाय: काफ पुराने वटा मन ी- म स का योग करने से होती है । काय:- 1. यह व भ न तं जैसे क पाचनतं , जननतं , उ सजन तं एवं ने आ द क एपीथी लयल को शकाओं के सुचा प से बनने तथा काय करने के लए आव यक होता है । 2. यह सामा य वृ एवं ने यो त के लए आव यक होता है । 3. यह यूकस मे ेन ( ले मा झ ल ) क ग त व ध म उपयोगी होता है I 4. यह सं मण वरोधी वटा मन है । कमी के ल ण:- 1. कम वृ दर 2. रोग तरोधकता का कम होना 3. आँख व नासा छ से ड चाज आना 4. अंधापन, जीरो थैि मया, आँख से गीड आना 5. प ी के पंख उखड़े रहना व कमजोर आना 6. अ डा उ पादन कम होना एवं अ ड से चूजे नकलने क दर भी कम हो जाती है। 7. जनन मता (सीमन म पम क सं या) कम हो जाना । 8. अ ड म ूण क मृ युदर बढ़ जाना (इ यूबेशन के शु आती 48 घ ट म मृ यु) 9. गाऊट हो जाना, इसोफे गस व फै रं स म सफे द दाने व छाले हो जाना । प य म आव यक मा ा :- (1) लेयर प य म 12000 IU / त कलो आहार
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    193 (2) ीडस टॉक20000 IU / त कलो आहार ाकृ तक उपल धता - (ii) यह लवर ऑयल, फश ऑयल, हर घास, म का, रचका प त का आहार, मेज लू टन मील आ द म पाया जाता है । (2) वटा मन D (Vita. D3 कॉल के सीफे रॉल) :- इस वटा मन क कमी उन प य म होती है, िज ह ाय: संसीमन म रखा जाता है । काय:- (1) यह शर र म ह डय क सामा य वृ के लए आव यक होता है । (2) यह आँत म कै ि शयम व फॉ फोरस के अवशोषण म सहायक होता है । कमी के ल ण (1) चूज म इसक कमी से रके स (सूखा रोग) हो जाता है तथा पंख कम वक सत होते है। (2) वय क ाइलर / लेयर प य म ह डय क कमजोर तथा आि टओपोरो सस नामक रोग हो जाता है । (3) लेयर म मुलायमा / पतले छलके के अ डे आना । (4) उ पादन व हेचे ब लट दोन पर वपर त भाव पड़ना । (5) पाँव म कमजोर आना व कु कु ट का पगुईन क तरह पैर रखना जैसे ल ण दखाई देते है । (6) च च का अ दर क तरफ मुड़ना । वटा मन D2 क तुलना म D3 अ धक भावी होता है । ाकृ तक उपल धता :- यह मछल के तेल, कॉड लवर ऑयल, ए ट वेटेड टेरॉल तथा सूय क पराबगनी करण से शर र म बनाया जाता है । (3) वटा मन E:- यह वटा मन के ऑ सीकरण पर ा त होता है । काय - 1. ूण वकास के अलावा यह माँसपे शय के वकास के लए ज र होता है । 2. यह रोग के त तरोधकता बढ़ाता है । यह ए ट ऑ सीडे ट क तरह काय करता है । कमी के ल ण 1. जनन मता तथा अ ड को हेचे ब लट कम हो जाती है । 2. इसक कमी से बढ़े हु ए टखने एवं े जी चक रोग या एनसेफे लोमले सया होना देखा गया है । 3. ए सूडे डव डाइथे सस अथात के पलर पारग यता को बढ़ा देता है । िजससे वचा के नीचे सूजन व सेर बेलम म हेमोरेज दखाई देते है । आव यकता :- ीडर – 120mg./kg. आहार लेयर – 40mg/kg आहार
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    194 ाकृ तक उपलधता :- यह हरा चारा, रचका, वन पती तेल, साबुत व अंकु रत दाना आ द म मलता है । (4) वटा मन K :- वटा मन K क कमी ाय: कॉ सी डओ सस के साथ देखने को मलती है, य क ए ट कॉ सी डयल एवं स फा औष धय का शर र म इसक उपल धता पर वपर त भाव पड़ता है । काय :- 1. र त के जमने के लए आव यक ो ोि बन बनाने के लए आव यक होता है । 2. वसन णाल म सहायक कमी के ल ण :- 1. खून का थ का जमने म अ धक समय लगना । 2. सब यूटे नयस हेमे रज (खून का वचा के नीचे, पर व छाती के नीचे एक त होना) 3. एनी मयाँ (र त अ पता) होना 4. इन यूबेशन के दौरान ूण मृ यु आव यक मा ा :- ीडर - 4mg./kg. आहार यावसा यक ाइलर एवं लेयर - 2mg./kg. आहार ाकृ तक उपल धता :- रचका के ला, हरा चारा, मीट, फश मील आ द म पाया जाता है । (ii) पानी म घुलनशील वटा मन (1) वटा मन - C सामा यत: यह कडनी (वृ क ) म बनता है, पर तु कसी बीमार या अ य ेस क ि थ त म इसक कमी हो सकती है । काय:- 1. यह रोग तरोधकता को बढ़ाता है । 2. यह ेस क ि थ त से बचाव करता है । 3. कोलेिजनस उ तक के नमाण तथा अ डा बनाने म सहायक होता है । कमी के ल ण :- 1. वृ दर कम हो जाना । 2. अ डा उ पादन कम, अ डा रॉल ( छलके ) क वा लट कमजोर होना । 3. जनन मता तथा हे च ब लट कम हो जाना 4. सं मण से होने वाले ेस के व तरोधकता कम हो जाना आ द ल ण देखे जा सकते ह । आव यक मा ा :- सामा यत: - 50mg./ टन आहार अ धक गम म - 100 – 150gm./ टन आहार अथवा
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    195 10gm./1000 प ीपीने के पानी म । वतमान म उ नत कु कु ट पालन तकनीक म वटा मन-सी क संथे टक ेशन को आहार म मलाना उ चत रहता है। उपल धता :- यह नींबू के रस व अ य जूसी फल म मलता है । (2) बी-कॉ पले स - यह कई कार के वटा मन का समूह ह, िजसम B1 -थायमीन, B2,-राइबोफले वन, B6-पाइर डॉ सीन,, नको ट नक ए सड, पे टोथे नक ए सड तथा बाओ टन आ द सि म लत ह । इनम से येक क कमी से अलग-अलग ल ण द शत होते है ।  वटा मन B1 थायमीन – कमी के ल ण - (1) वजन म कमी, उखड़े-उखड़े पँख तथा आहार उपभोग कम होना (2) गदन क माँसपे शय का लकवा होने के कारण पीछे क ओर खंचा हु आ सर रहना अथवा व श ट कार क टार ेिजंग पोजीशन (आसमान क तरफ देखते हु ए) म आना । (3) पाँव क माँसपे शय म लकवा हो जाने के कारण लंगड़ापन अथवा लड़खडाना, इसके अ त र त पंख क माँसपे शय म भी लकवा पाया जाना । (4) वय क प य म कमी आ द ल ण प रल त होते है । आव यक मा ा :- ीडर - 4mg/kg. आहार यवसा यक प ी - 2-3mg./kg. आहार  वटा मन B6 - पाइर डॉि सन यह लाल र त क णकाओं के बनने के लए आव यक है । कमी के ल ण - इनक कमी से वृ दर, उ पादन, हेचे ब लट पर वपर त भाव पड़ता है। आव यकता – ीडर म - 6mg./kg. आहार यावसा यक लॉक - 3mg/kg. आहार  पे टोथे नक अ ल कमी के ल ण - 1. वृ दर कम होना । 2. च च, आँख व वे ट के आसपास क वचा मृत होना 3. लवर खराब होना 4. मुँह व ोवे कू लस म पस जैसे पदाथ आना । आव यकता मा ा - यवसा यक प ी - 0-15mg./kg. आहार ीडर - 30mg./kg. आहार  नको ट नक अ ल -
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    196 कमी के लण - 1. हॉक जाँईट का सूजना एवं लकवा हो जाना । 2. जीभ काल पड़ना तथा मुँह म सूजन होना । 3. पँख कम आना आव यकता - यावसा यक पालन - 40mg./kg. आहार ीडर म टॉक - 60mg./kg. आहार  वटा मन H- बाइओ टन कमी के ल ण - 1. पाँव तथा च च के आसपास क वचा मृत होना 2. आँख पर छोटे-छोटे ध बे पड़ना । 3. फै ट लवर - कडनी, सं ोम होना 4. है च ब लट कम होना आव यकता - यावसा यक पालन - 0.1mg./kg. आहार ीडर म - 0.2mg./kg. आहार  फो लक अ ल - यह कोल न व मीथीओ नल बनाने म काम आता है । कमी के ल ण - 1. लकवा, वृ दर कम, पँख आना, कम हो जाना । 2. एनीमीया र त अ पता 3. उ पादन व हेची ब लट कम हो जाना आव यकता – यावसा यक पालन – 3.4mg./kg. आहार ीडर म - 4.5mg./kg. आहार  वटा मन B12 - सायनोकोबालामीन कमी के ल ण - 1. वृ दर कम होना, लकवा हो जाना 2. शर र म सूजन आना 3. फै ट ल वर व फै ट कडनी सं ोम होना आव यक मा ा - यावसा यक पालन - 0.012 to0.015 mg./kg. आहार ीडर म - 0.3mg/kg. आहार
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    197  वटा मनB4- कोल न :- यह मी थओ नन के बनाने म सहायक होता है । इसके अ त र त यह नव म संदेश प रवहन के लये आव यक एसीटाईल कोल न (COA) बनाता है । यह लवर म फे ट मेटाबो लजम म सहायक है तथा अ डे नमाण म सहायता करता है । कमी के ल ण - 1. प ी मोटे हो जाते है एवं वृ दर कम हो जाती है । 2. आहार उपभोग व फ ड कनवसन मता कम हो जाती है । 3. प य म फै ट लवर सं ोम हो जाता है तथा कभी-कभी पेरो सम देखा जा सकता है । आव यक मा ा - च स हेतु - 800mg./kg. आहार ोवर प ी - 500mg./kg. आहार लेयर / ाइलर - 800-1000mg./kg. आहार यावसा यक प ी ीडर - 1800mg./kg. आहार ाकृ तक उपल धता – वटा मन बी-कॉ पले स साबुत दान , गेहू ँ के बाई ोड स, यी ट, लवर मील, सोयाबीन क खल, घास रचका चावल क बाई ोड स, लवर मील, मीट बाई ोड ट चापड़, दूध आ द म मलता है । 15.2.5 मनरल (आव यक अकाब नक पदाथ) कु कु ट से उ पादन ा त करने हेतु मनरल भी वटा मन, ोट न क तरह ह आव यक है । यह ह डय क आंत रक संरचना म मह वपूण योगदान देने के साथ ह अि थ तं को मजबूती दान करते है । अि थय के अ त र त नरम शार रक उ तक क संरचना तथा ऑ मो टक दबाव बनाने म भी ये मनरल मुख भू मका नभाते ह । मनरल कई ए जाईम को याशील बनाने म माँसपे शय को कायरत रखने म भी उपयोगी होते है । ख नज पदाथ पशु शर र एवं पौध के आव यक अवयव होते ह । इ ह भ म (Ash तथा अकाब नक पदाथ (inorganic matter) भी कहते ह । मु गय के शर र म लगभग 4.0 तशत ख नज पदाथ होते ह और कवच को छोड़कर शेष अ डे म लगभग 1.0 तशत ख नज होते है । उ चत अनुपात म ख नज शर र क रचना, नवाह (Maintenance) एवं उ पादन म सहायक होत है । मुख आव यक अकाब नक पदाथ मै नी शयम, कै ि सयम, फॉ फोरस, पोटे शयम, सो डयम, लोर न आ द, जब क ेसेस (कम मा ा) म आव यक त व मै नीज आयोडीन, मॉल बडनम एवं सले नयम आ द है । (A) कै ि सयम व फॉ फोरस - 1. इन त व का मेटाबो ल म म योगदान होता है । वशेषतया फॉ फोरस का काब हाइ ेट व वसा के मेटाबो ल म म मह वपूण योगदान देता है । 2. ह डय के नमाण म सहायक
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    198 3. अ डके छलके बनाने हेतु आव यक होते है । 4. र त का थ का जमने के लए आव यक होता है । 5. सो डयम व पोटे शयम के साथ कै ि सयम भी दयग त को सामा य प से चलाने म मह वपूण भू मका नभाता है । 6. फॉ फोरस का कै ि सयम के प रवहन म भी योगदान होता है, ता क अ डे के छलके बनने के लए कै ि सयम उपल ध हो सक । वटा मन-D का कै ि सयम व फॉ फोरस के अवशोषण म वशेष योगदान होता है । अत: इन त व के अलावा वटा मन -D क कमी से भी रके स या सूखा रोग हो जाता है । लेयर प य म इनक कमी से अ डा उ पादन कम, पतले छलके के अ डे आना । अ य धक कमी से पस लय व अ य ह डय के टूटने क ि थ त पैदा हो जाती है । (B) मै नी शयम काय – 1. यह काब हाइ ेट व ोट न मेटाबो ल म म सहायक है । 2. काब नेट के प म यह ह डय को मजबूती दान करता है । इसक कमी से प ी म अचानक च कर खाकर मृ यु हो जाती है । चूज म वृ दर कम, सु ती रहना आ द ल ण दखाई पड़ते है । चूज म इसक मा ा 0.04 तशत एवं लेयर प य म इसक आव यकता 0.18 तशत होती है । य द अ धक मा ा म मै नी शयम यु त आहार दया जाए तो प य म द त लगना, उ पादन कम तथा पतले छलके यु त अ डे आने के अ त र त प ी डरे हु ए तीत होते ह । इससे मु त होने के लए मनरल म सचर म चूना प थर मला दया जाता है । (C) सो डयम एवं लोर न (नमक) - सो डयम आयन लोराईड, काब नेट व फॉ फे ट के प म र त म मौजूद होता है । इसके अ त र त सो डयम सामा य दयग त बनाये रखने के लए आव यक त व है । काय -शार रक वृ , फ ड कनवजन मता, उ चत उ पादन के लए आव यक है । कमी के ल ण – 1. शार रक भार म कमी, उ पादन म कमी, अ ड के आकार म कमी आ जाना । 2. प य म के नीबा ल म होना । 3. ह डय कोमल हो जाना । 4. जनन मता कम हो जाना । 5. प ी का शॉक म आना । 6. इसी कार लोराईड आयन क कमी से चूज म वृ दर कम, मृ यु दर अ धक हो जाना । 7. ाय: जल क कमी या डहाइ ेशन होना । 8. नवस ल ण द शत करना तथा चूज का चल न पाना (चलने क को शश से चूज का आगे क ओर सर तथा पीछे क तरफ पैर करते हु ए ओंधे मूँह गरना)
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    199 प ी कोय द 4mg/kg. शार रक भार से अ धक नमक दया जाता है तो इसक वषा तता उ प न हो जाती है, िजसम प ी को यास अ धक लगना, माँसपे शय क कमजोर और प ी का च कर खाकर गरना जैसे ल ण देखे जा सकते है । (D) मै नीज - ाय: इसक कमी कम थान म अ धक प ी पालने आ वा ओवर कराऊ डंग क ि थ त म उ प न होती है । काय - यह सामा य वृ , अ छे उ पादन, माँसपे शय क मजबूती तथा अि थ तं क संरचना एवं व भ न एंजाईम को याशील करने के लए आव यक होता है । कमी के ल ण - इसक कमी से ि लप टडन अथवा पेरो सस नामक रोग उ प न हो जाता है, िजसम प ी के पैर के ट बीओ मेटाटारसस जोड़ क वकृ त होना तथा मेटाटारसल ह डय क वि टंग व ब डग (मुड़ना) होने क ि थ त बन जाती है, िजससे गे ो नीमस टडन अपनी सह ि थ त (काडाई स) से फसल जाता है व प ी म लंगड़ापन आ जाता है । इसक कमी से उ पादन कम, तथा है चंग दर अ या धक कम हो जाती है तथा ूण मृ यु बढ़ जाती है । (E) आयो डन- एक ेस मनरल है, िजसक उपयो गता थाईरॉि सन नामक हॉरमोन को बनाने म होती है । कमी के ल ण - इसक कमी से थाईरॉयड ंथी बढ़ने लगती ह, िजसे गॉयटर कहते ह । यह फशमील आय टर शैल आ द के योग से दूर क जा सकती है । (F) लौह व तांबा - लौह त व शर र म वसन या म सहायक होता है तथा तांबा लौह त व के शर र मे उपयोग तथा एंजाईम काय म सहायक होता है । इनक कमी से एनी मयाँ (र त अ पता) हो जाती है । (G)कोबा ट - यह वटा मन B12 के प म उपयोगी होता है तथा इसक कमी से कम बढ़ाव, कम आहार उपयोग, मृ यु दर अ धक व कम है चंग प रणाम ा त होते है । उ त ख नज त व क कमी आहार म उ चत मा ा म मनरल म सचर, ट आ द देकर पूर क जा सकती है । बाजार म ये बने-बनाये उपल ध है अथवा इ ह न नानुसार घर पर भी बनाया जा सकता है । . खा य पदाथ भाग (भार के आधार पर) 1. वाि पत ह डी का चूरा1 100.0000 2. फे रक काब नेट 0.2100 3. मै नीज ऑ साईड 0.0194 4. कॉपर हाइ ो साईड 0.0194 5. पोटे शयम आयोडाईड 0.0088 6. कोबा ड काब नेट 0.0022 7. योग 00.4494 इस ख नज म ण को बने हु ए आहार म 2% दर से मलाने पर आहार म 0.6 कै ि सयम, 0.25% फॉ फोरस,32PPM लौहा,20PPM ताँबा, 2.5 PPM आयोडीन, 0.2 PPM कोबा ट होगा ।
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    200 ख नज कास ता, साधारण व संतोषजनक म ण न न व ध से भी तैयार कया जा सकता है । . खा य पदाथ भाग (भार के आधार पर) 1. ह डी का चूरा 27.99 क ा. 2. सीप खोला/चूना प थर 50.00 क ा. 3. साधारण नमक (आयोडाई ड) 20.00 क ा. 4. लोहा यु त स फे ट 2.00 क ा. 5. ताँबा स फे ट 0.01 क ा. 6. योग 100.00 क ा. 7. ह डी का चूरा 27.99 क ा. उ त म ण आहार म 5% तक मलाया जा सकता है । 15.2.6 जल जल क कमी ाय: भीषण ग मय म हो जाती है । यह शर र म कई पदाथ के वलायक का काय करता है । जल व भ न त व के लये वाहक का काय भी करता है । काब हाइ ेट, फै ट व ोट न के मेटाबो ल म म मह वपूण थान रखता है । शर र से नकलने वाला जल उ सजन तथा गम को बाहर नकालने का काय भी करता है । डहाइ ेशन या जल क कमी से मृ यु हो जाती है । 15.3 व भ न ता लकाऐं 15.3.1 वटा मन के काय/कमी के ल ण व ाि त का साधन नाम वटा मन / काय कमी के ल ण कृ त उपल ध साधन वटा मन ए (Vitamin A) बढ़ोतर म सहायकअ छ ि ट हेतु आव यक अंद नी वचा का र क एसामा य कमजोर , शार रक वकास म ( कावट, लड़खड़ाती चाल, अ यवि थत पंख, मृ यु, आँख म पानी या गीढ़ जैरो थल मया, मुँह के अ दर ऊपर तलुवे रचका, पर सफ़े द छाले, आहार नल (इसोफे गस) म भी इस कार के छाले, छोटे एवंका मील, आ द जवान प ी म आँख से चपकवां लेस तथा नोि ल से भी इस कार का पदाथअंडा उ पादन कम तथा अंडो से चूजे नकलने के तशत म भी कमी कॉड लवर ऑयलहर अ य मछल तेल, हर घास, म का, आहार,मेज लू टन का मील आ द वटा मन डी रकै ट, पेर क कमजोर , स त पांव एवं चाल, कॉड ल वर आयल तथा
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    201 (Vitamin D) कै िसयम व फॉ फोरस के पाचन तथा ह डी क बनावट म सहायक पस लय म गाँठे, टखने सूजे हु ए, कमजोर हा ड़याँ, सु त मुग, पंख का रंग उड़ा हु आ, मृ यु, पतले छलके के अंडे, कम उ पादन एवं कम चूजा है चंग अ य मछल तेल | डए ट वेटेड ए टेरोल, सूय करण, अ ावायलट करण आ द वटा मन ई (Vitamin E) ए ट आ सीडट व जनन णाल मसहायक े िज चक रोग, असंतु लत चाल, खड़े रहने mei क ठनाई, च कर आना, वचा के नीचे सूजन, सेर बेलम म हैमरेज हारा चारा, वन प त तेल, दाना, साबूत अथवा अंकु रत, रचका वटा मन के (Vitamin K) र त के जमने व वास णाल म सहायक | र त जमने म अ धक समय लगना, तथा वचा के नीचे र त ाव वशेषतया पेर म, छाती पर, पेट पर, गदन म, पंख के नीचे तथा आंत म | रचका, के ला, हरा चारा, मीट, फ़श मील | वटा मन बी-1 (Vitamin B1) पील यूराइल टस, पीछे क ओर खींचा हु आ सर, बुखार म कमी, वकास म कमी, कमजोर , सूखापन, पचनशि त म श थलता, दौरे पड़ना तथा मृ यु | साबुत ेन, गेहू ं के बाई ॉड ट, ई ट, ल वर मील, मूँगफल क खाल, सोयाबीन क खाल, मोलासेज, घास, रचका, चावल बाई ॉड ट वटा मन बी2 (Vitamin B2) (राइबो ले वन) एनज मेटाबो ल म कालटो पेरे ल सस, पेर से लकु वा, वकास म अवरोध, द त, टखन के बल चलना, े कयल तथा या ट नस का मोटा होना, सुखी वचा, मुंह, वे ट, आँख तथा पेर म वचा रोग (डरमेटाइ टस), अंडा उ पादन म कमी, 11 दन क अव ध म इं यूवेटर म एम य क मृ यु लवर मील, ई ट, दु ध पदाथ, रचका, घास, कु छ म ल चूण आ द | वटा मन बी6 (Vitamin B6) (पाइर डोि सन) नायू मेटाबो ल म म सहायक कमजोर प ी, बहु त चौकने क आदत, दौरा पड़ना, कम-चूजा उतप त कम उ पादन, मृ यु, वजन कम होना तथा मृ यु| लवर मील, ई ट, राइस ौन मीट, मोलासेज, म ल , गेहू ँ तथा चावल के बाई ॉड ट रचका
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    202 नाम वटा मन/ काय कमी के ल ण कृ त उपल ध साधन पे टोथे नक अ ल (Panthotheएसएसnic Acid) ोट न/ फै ट/काब हाइ ेट म सहायक वकास म कमी, अ यवि थत पंख, आँख लवरमील,ई ट मुंह तथा गेट पर खुजल के ल ण, लवरमोलासेज, दु ध वकास, अंड के उ पादन एवं हैचे ब लट म कमी लवर मील, ई ट, मेलासेज, दु धपदाथ, गेहू ँ चावलका मेटाबो ल म म चापड़, सोयाबीन मल, रचका, गोभी ककड़ी,म का घास आ द वटा मन बी 12 (Vitamin B12) अनी मया, कमजोर प ी, अंडे म ह जीव क मृ यु नको ट नक ए सड (Nicotinic Acid) ोट न/फै ट/काब हाइ ेट मेटाबो ल म म सहायक कमजोर प ी, पंख का असाधारण वकास, मुंह तथा जीभ का सूजना, लड़खडाना, कम आहार उपयोग ई ट, लवर मील चावल चापड़, गेहू ँ दाथ, मूँगफल ,हरा चारा, मीट, म का आ द फो लक ए सड (Folic acid) र त को बनावट व ोट न मेटाबो ल म म सहायक शर र के वकास म कावट, पंख अ यवि थत, अ धक मृ यु, लंगड़ापन, खून क कमी, वजन कम, बड़ी मु गय म कम उ पादन एवं हैचे ब लट हरे प ते के पेड़ घास पालक। रचका, ई ट, लवर, कडनी बायो टन (Biotin) ए ट डमटाई टस के प म कमजोर प ी, लंगड़ापन, खुजल -पैर तथा मुंह पर, कम हैचे ब ल ट कम उ पादन लवर,ई ट,आलू गुद,दु ध,मोलसेज, रचका,घास,साबुत अनाज आ द कोल न (Choline) नायू णाल म सहाय कमजोर प ी, लंगड़ापन, आहार उपयोगकम, आँख को अ य लगने वाले प ी लवर,मील,मीट, फश, पूरा अनाज कदु ध पदाथ, मूँगफल खल, सोयाबीन आइल 15.3.2 BSI वारा नधा रत मापद ड न न ल खत मापद ड भारत म B.I.S. (भारतीय माणक सं थान-1964) वारा मुग आहार के लए नधा रत कया गया है । नाम वटा मन यू नट चूजा ोवर लेयस वटा मन ए I.U 40,00,000 4,00,000 8,00,000 वटा मन डी 3 I.U 6,00,000 6,00,000 1,20,000
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    203 थाय मन gm.2 2 2 राइबो ले वन gm 5 5 5 पै टोथे नक ए सड gm. 10 10 15 नको ट नक ए सड gm. 20 20 20 बायो टन gm. 0.1 0.10 0.15 वटा मन बी 12 gm. 15 15 15 15.3.3 मनरल के काय / कमी के ल ण . सं. नाम ख नज त व काय कमी के ल ण / रोग 1. कै ि सयम र त ाव रोकना,ह डी क बनावट व अ डे का छलका मजबूत करना I रके स,कमजोर ह डी व कमजोर अ डा छलका 2. फॉ फोरस शार रक याओं म सहायक, ह डी क बनावट म आव यक रके स, कमजोर ह डी व कमजोर अ डा छलका एवं है चंग दर कम 3. मै नी शयम काब हाइ ेट व ोट न मेटाबो ल म म सहायक अचानक च कर खाकर मृ यु 4. मैगनीज पाचन या म एनजाइम का काय सुचा प से होना कम है चंग प रणाम 5. आयरन वास या म योगदान एनी मया 6. कॉपर आयरन के शर र म उपयोग म सहायक, एनजाइ मक काय एनी मया 7. आयोडीन थाइरॉइड हारमोन के प म गोयटर 8. िज क एनजाइ मक काय असामा य पंख क बनावट छोट ह डयाँ कोबा ट वटा मन बी 12 के प म कम बढ़ाव, कम आहार उपयोग, मृ यु, कम है चंग प रणाम 15.4 वटा मन एवं अ य आहार त व क कमी से होने वाले व श ट रोग एवं उपचार इसम न न ल खत रोग सि म लत ह :- 15.4.1 राउप रोग :- यह रोग वटा मन ए क कमी के कारण उ प न होता है । सभी आयु के कु कु ट इससे भा वत होते ह । ाय: ी म ऋतु म यह रोग फै ल जाता है ।
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    204 रोग के लण (Symptoms of Disease):- वय क कु कु ट के नथून तथा आँख म पानी तथा पस नकलता है और आँख के नीचे सूजन आ जाती है । चूज म वृ दर कम होती है । पँख अ यवि थत हो जाते ह, प य म लंगड़ापन हो जाता है, पूँछ टेड़ी हो हाती है और उ च मृ यु दर पाई जाती है । अ धक उ प धारण कर लेने (Advance)क अव था म, पाचन णाल तथा वसन णाल क लेि मका ( यूकोसा) म उ तक य (necrosis) एवं करे टनीकरण (Keratinization) देखा गया है । इसके अ त र त यह रोग र नलगूट (renal gout) के प म भी कट हो सकती है और इस दशा म वृ क (Kidneys)और गवीनी (ureters) म यूरेटस एक त हो जाता है । रनडाल (Randall,1964) के अनुसार इस रोग से सत प ी शी ह कॉ सी डयो सस एवं कृ म रोग से भा वत हो जाते ह । अ डे देने वाले प य म उ पादन कम हो जाता है । अ ड म र त के ध बे अ धक दखाई देते ह । कं लगी एवं शैक पर उपि थत पीला वणक अ य हो जाता है । वटा मन क ह नता से ऐि टबाँडी उ प न करने क मता म यवधान उ प न हो जाता रोग क रोकथाम (Prevention of Disease) :- हरे चारे, पि तयाँ एवं पील म का इ या द वटा मन के पूवगामी (Precursor) होते ह । अत: इ ह आहार म मलाकर देना चा हए । मछल के तेल को आहार म सि म लत करना लाभकार स होता है । 15.4.2 सूखा रोग (Rickets): - यह रोग वसा म वलेय (Water Soluble) वटा मन 'डी' क ह नता के कारण उ प न होता है । चूज तथा अ डे देने वाल मु गय पर इसका भाव पड़ता है । ल ण (Symptoms) - अपया त वृ दर, लंगड़ापन तथा पैर घसीट कर चलना, पैर क ह डी तथा जोड़ का मोटा हो जाना, र ढ़ तथा छाती क ह डी का चटक जाना आ द चूज के रोग के ल ण है । अ डे देने वाल मु गय म अ डा उ पादन कम हो जाता है । अ धक सं या म पतल कवच वाले अथवा कवच र हत अ डे उ प न होते ह । भा वत मु गय क च च सामा य दशा अपे ा अ धक कोमल होती है । रोग क रोकथाम :- मछल के तेल म वटा मन डी क चूर मा ा होती है और इसे आहार म सि म लत करने से चूज को इस वटा मन क ाि त हो जाती है । अ डे देने वाल मु गय के आहार म ह डी का चूरा तथा पसी हु ई सपी (शंख) अथवा चूना प थर मलाकर देने से प य को कै ि शयम क ाि त हो जाती है । प य के आहार म वटा मन D स ल मट देने से के वारा भी भी वटा मन डी क पू त क जा सकती है I 15.4.3 े जी चक अथवा इनसेफे लो मले सया यह रोग कु कु ट म वटा मन 'ई' क ह नता के कारण ाय: 8 स ताह तक क आयु वाले चूज को हो जाता ह । भा वत चूजे या तो सोये से (Sleepy) अथवा उ तेिजत दखाई देते
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    205 ह । ीवाएवं सर म ऐंठन होती ह और कु छ चूजे गर जाते ह तथा साइ कल चलाई जाने क तरह ग त व ध करते ह । रोग का उपचार :- गेहू ं के जम आइल म सवा धक वटा मन “ई'' पायी जाती है । हरे चार , अंकु रत दाल एवं मछल चुरा म भी इस वटा मन क पया त मा ा होती है । अत: इसक कु कु ट आहार म सि म लत करना चा हए । 15.4.4 पादांगु लय क ऐंठन और लकवा पादांगु लय म ऐंठन हो जाना और लकवा मार जाना वटा मन बी-2 क ह नता के कारण उ प न होता है । रोग के ल ण :- आहार म वटा मन बी-2 (Riboflavin) क ह नता के कारण द त आने लगते ह, वृ क जाती है और पैर का लकवा िजसे क “क डट पैरा ल सस कहते है, हो जाता है । इससे टाँगे और पैर भा वत होते ह । ारि भक अव था म उपचार कए जाने पर यह अ छा हो सकता है, पर तु ती प धारण कर लेने पर इसका ठ क होना क ठन हो जाता है । इस रोग के कारण अंगु लयाँ अ दर क ओर हो जाती है और हाँक के सहारे प ी चलता है । ति काऐं (Nerves) अपने सामा य, यास से 4-5 गुना अ धक बड़ी हो जाती है । उपचार (Treatment) :- इस रोग का उपचार करना लाभ द नह ं है, पर तु आहार म ऐसे खा य पदाथ सि म लत करना िजनम बी-2 वटा मन क चूर मा ा हो, रोकथाम क ि ट से अ धक सफल स हु ई है । 15.4.5 पैरो सस अथवा टांग क ह डी का अपने थान से हट जाना यह रोग आहार म कोल न (Choline) बायोट न (Biotin) नयासीन (Niasin) वटा मन तथा मगनीज (Manganese) और िजंक (ज ता) लवण क ह नता के कारण उ प न होता ह । रोग के ल ण (Symptoms of Disease) :- इस रोग के कारण ट बयोमेटाटासल जोड (Tibiomatatarsal) बड़ा हो जाता है, िजसके प रणाम व प ट बया का दूर वाला सरा तथा मेटाटारसीस (Matatarsus) का नकट का सरा टेड़ा-मेढ़ा हो जाता है । पंडल क ह डी अपने थान पर न रहकर एक और खसक जाती है तथा टाँग पर नयं ण नह ं रह पाता है । एक अथवा दोन पैर इस रोग से भा वत हो सकते ह । पँख तथा पैर क ल बी ह डय का छोटा हो जाना भी देखा गया है । मगनीज क ह नता रो उ प न होने वाला रोग आहार म कै ि शयम एवं फा फो रस क अ धकता से अ धक उ हो जाता है । रोग का उपचार एवं रोकथाम :- रोग से छु टकारा पाने के लए, उपचार क अपे ा रोकथाम करना अ धक आव यक है । ह डय के टेढ़ हो जाने के प चात् उपचार करना संभव नह ं होता है । रोकथाम के लए यथे ट मा ा म मगनीज प य के आहार म मला कर खलाना चा हए । आहार म पया त मा ा म राइस पॉ लश सि म लत करने से अलग से मगनीज देने
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    206 क आव यकतानह ं पड़ती है । इसी कार कोल न, नयासीन एवं बायोट न वटा मन को आहार म उ चत मा ा म मलाकर खलाने से रोग से मुि त मल सकती ह । 15.4.6 वजा तभ ण (Cannibalism):- मनर स क कमी से ाय: यह रोग उभर जाता है । कु कु ट समूह के कु छ कु कु ट को अ य प य क कलगी पँख पर अंगूठे उँगु लय तथा शर र के अ य अंग के न चने क वृि त हो जाती है । उपचार(Treatment) उपयु त कारण को दूर कर देने से कु कु ट क पँख नोचने क वृ त को रोका जा सकता है । कु कु ट के आहार म 2-3 दन तक नमक क मा ा अ धक देने से वजा त भ ण क वृि त को कम कया जा सकता है । कु कु ट आहार म य द मा द लया हो तो उसम 2 तशत नमक मला देना चा हए । अ न और द लया मले हु ए आहार म 4 तशत नमक मला देना लाभ द होता है । नमक का भाव ात: तीन म कट हो जाता है । य द नमक के उपचार से वजा त भ ण क वृि त म सुधार न आव तो कु कु ट क ऊपर च च के लगभग 2/3 भाग को तेज चाकू से अथवा च च काटने वाल मशीन (Debeaker) से काट देना चा हए, कु कु ट का आहार ऐसा हो, िजससे क वे उसे पया त मा ा म ा त कर । बंध यव था इस कार कु शलतापूवक करनी चा हए क प ी कु छ समय तक इधर-उधर मण कर सक और भीड़ से बचे रह । 15.5 सारांश य द प य को संतु लत आहार सदैव दया जाए तो उनम आहार त व क कमी के कारण पाये जाने वाले रोग नह ं होते है । ये असं ामक रोग होते ह, जो कारक को हटा दये जाने पर ाय: वत: ह ठ क हो जाते है । अत: जब भी कसी वटा मन अथवा मनरल क कमी पायी जाय, तुर त उस वां छत त व क समावेश आव यक है । कसी भी आहारांश क कमी के ल ण ार भ म प ट नह ं दखाई पड़ते, क तु जब अ धक कमी हो जाती है । तो वकास क जाता है व ल ण य दखाई देने लगते है । कसी भी अ य रोग क तरह आहारांश त व क कमी से भी मुग आहार उपयोग कम कर देती हे और उस त व वशेष क शर र म उपल धता और भी कम हो जाती है । इस ि थ त म वां छत वटा मन व मनरल का आहार के साथ-साथ पानी म भी समावेश करना उपयोगी रहता है । अत: प ी समूह के सफल पालन एवं उ पादन के लए आव यक है क उ ह संतु लत आहार नधा रत मापद ड के अनुसार दया
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