पशुपालन कैलेंडर
 क मीर व िहमाचल प्रदेश म बफर् बारी का सीधा असर, सदर् हवाओं व पाला पड़ने के
प म, पड़ता है, अतः पशुओं को शीत-लहर से बचाने के आव यक उपाय कर ल।
 पाला पड़ने की संभावना हो, तो कृ ित्रम प्रकाश या गमीर् का प्रब ध अव य कर।
 कमज़ोर व रोगी पशुओं को बोरी की झूल बनाकर ओढ़ाय। सदीर् से बचने के िलए
रात के समय पशुओं को छत के नीचे या घास-फू स के छ पर म बांध कर रख।
 पशुओं को संकड़े/नम थान म ब द करने से, एवं धुआं आिद से गमीर् पहुँचाने की
कोिशश, उनके यूमोिनया से पीिड़त होने की संभावना को अिधक बढ़ाती ह।
 पशुओं को बांटा और पानी गुनगुना कर के द।
 दुधा पशुओं को तेल व गुड़ देने से भी शरीर का तापक्रम सामा य बनाये रखने म
सहायता िमलती है।
 अभी से चारे का संग्रहण अथवा उसको सही समय पर खरीद कर रख, साथ ही
पशुओं म लवण की कमी नहीं होने पाये, इस हेतु लवण िम ण िनधार्िरत मात्रा म
दाने या बांटे म िमला कर द।
 अ तः परजीवीनाशक घोल या दवा देने का सही समय भी यही है।
 पशुओं को बा य परजीिवय से बचाने के िलये पशु-शाला म फशर्, दीवार आिद साफ
रख। अतः िनगुर् डी, तुलसी, या नींबू घास का गुलद ता पशु-शाला म लटका िदया
जाए, क्य िक इसकी गंध बा य परजीिवय को दूर रखती है। पशु-शाला को
कीटाणुरिहत करने के िलए नीम तेल आधािरत कीटनाशक का प्रयोग कर।
 पशु-पालक को चािहए िक अगर मुँहपका-खुरपका रोग (Foot and Mouth Disease),
पी.पी.आर., गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), फड़िकया (Enterotoxemia), लंगड़ा
बुखार (Black Quarter) आिद रोग से बचाव के टीके नहीं लगवाएं ह , तो अभी
लगवा ल। िवशेष प से मेमन को फड़िकया का टीका लगवाएं।
 िरजका व बरसीम म 20-30 िदन, एवं जई म 20-22 िदन के अ तराल पर
आव यकता अनुसार िसंचाई करते रह।
 मौसम वैज्ञािनक के अनुसार फरवरी माह म अनेक थान पर वषार् होने की
संभावना रहती है, अतः पशुओं को भीगने से बचाएं एवं बादल हटने पर सदीर् के
बढ़ने के आसार को देखते हुए पयार् त बचाव के उपाय कर।
 िपछले माह िदये गए सदीर् से बचाव के उपाय इस माह भी जारी रख।
 जो पशु जनवरी माह म िनयि त्रत प्रजनन कायर्क्रम के तहत उपचार म थे, उनका
अनुसरण फरवरी माह म भी रखा जाए तािक सभी पशु इस महीने तक गिभर्त हो
जाएं।
 नवजात बछड़े-बछिड़य को अ तः परजीवी नाशक िनयिमत प से द।
 मेमन को पी.पी.आर. का टीका लगवाएं।
 दुधा पशुओं को थनैला रोग (Mastitis) से बचाने के िलए, उनका दूध पूरा व मु ठी
बांध कर िनकाल।
 िरजका व बरसीम एवं जई की िसंचाई क्रमशः 12-14 एवं 18-20 िदन के अंतराल
पर कर।
 बरसीम, िरजका एवं जई को सूखा चारा या अचार (साईलेज) के प म एकित्रत कर
भिव य म संभािवत चारे की कमी के समय के िलए सुरिक्षत रख।
 इस माह से गमीर् म होने वाले रोग के प्रित सावधानी रखनी होगी।
 यिद म छर, मक्खी, चींचड़, आिद, जीव की संख्या म वृ िध हो रही हो, तो इनसे
फै लने वाले रोग से बचाव करना आव यक है।
 आने वाले समय म पशुओं म बाँझपन एवं फु राव (Johne’s disease), आिद रोग भी
होते ह, अतः ऐसे म पशुओं की तुर त िचिक सा करवाएं।
 यिद दूध उ पादन म कमी हो रही हो, तो पशु िचिक सक वारा दूध और पेशाब,
दोन की जाँच करवाएं।
 बरसीम-िरजका एवं जई की िसंचाइ 10 िदन एवं 12-14 िदन क्रमशः के अ तराल
पर कर।
 ग्री मकाल म हरे चारे हेतु मक्का, बाजरा एवं वार की बोवाई कर।
 बहुऋतुजीवी चारा घास जैसे हाईिब्रड नेिपयर, िगनी घास, इ यािद की रोपाई पहले से
तैयार खेत म कर।
 हरे चारे से साईलेज तैयार कर।
 याँने वाले पशुओं को प्रसूित बुखार (Puerperal Fever) से बचाने के िलए खिनज
िम ण 50-60 ग्राम प्रितिदन द।
 इस माह म अिधक तापक्रम होने की संभावना रहती है।
 पशुओं म जल व लवण की कमी, भूख कम होना, एवं कम उ पादन, अिधक
तापक्रम के प्रमुख प्रभाव होते ह, अतः पशुओं को अ यिधक तापक्रम से बचाने के
उपाय कर।
 भार ढोने वाले पशुओं को दोपहर से शाम चार बजे तक छाया वाले एवं हवादार
थान म आराम करने द।
 पीने के पानी के इंतज़ाम पर भी यान द। पानी की कु डी साफ रख। पशुओं को
िदन म कम से कम चार बार पानी िपलाने का प्रयास कर।
 कु छ मादा पशुओं म गमीर् (ताव म आना) के लक्षण िदन म कम तथा राित्र म
अिधक प्रदिशर्त होते ह, अतः पशुपालक इसका यान रख।
 थनैला रोग (Mastitis) की पहचान और िनदान के उपाय कर।
 मेमन को फड़िकया (Enterotoxemia) व भेड़ चेचक रोग (Sheep Pox) का टीका
लगवाएं।
 गािभन (छः माह से अिधक) पशुओं को अितिरक्त आहार द।
 चारागाह म घास यूनतम तर पर होती है, तथा पशुपोषण भी वषार् न होने तक
अपेक्षाकृ त कमज़ोर रहता है। ऐसे म लवण, िवशेषकर फॉसफोरस की कमी के कारण
पशुओं म ‘पाइका’ (Pica – depraved appetite) नामक रोग के लक्षण नज़र आने लगते
ह, अतः बाँटा-चाट (Mineral block) म लवण िम ण अव य िमलाय।
 सामुदाियक प्रयास से सुिनि चत कर िक मृत पशु, ह डी, चमड़ा, कं काल आिद
चारागाह के रा त एवं उन थान पर इक् ठा नहीं होने पाए जहाँ से पशुओं का
रोज़ाना आना जाना रहता है।
 ऐसे थान की तारबंदी/बाड़बंदी कर पशुओं को रोक, क्य िक मृत पशु के अवशेष को
खाने व चबाने से प्राण-घातक रोग ‘बोचुिल म’ (Botulism) हो सकता है, िजसका
कोई उपचार नहीं है।
 चारे के िलए बोई गई मक्का, बाजरा एवं वार की कटाई 45-50 िदन की अव था
म कर।
 मई माह म अिधक तापक्रम होने की संभावना रहती है, साथ ही कु छ थान पर
आँधी-तूफान के साथ वषार् भी प्रायः होती है।
 गमीर्-जिनत रोग के फै लने से पशुओं म तापघात, जल व लवण की कमी, भूख
कम होना, एवं कम उ पादन जैसे लक्षण देखने को िमलते ह।
 पशुओं को धूप व लू से बचाने के उपाय कर।
 चारे का संग्रहण, व उसकी समय पर खरीद कर सक, ऐसे उपाय के बारे म सोच।
 पशुओं म लवण की कमी नहीं होने पाए, इस हेतु लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म
दाने या बाँटे म िमलाकर द।
 पशुओं के आहार म मौसम के अनुसार आव यक बदलाव कर। गेहूँ का चोकर और
जौ की मात्रा बढ़ाएं।
 पशुओं को संतुिलत आहार द, िजससे उनकी दुग्ध उ पादन क्षमता बनी रहे।
 िचंचड़ व पेट के कीड़ से पशुओं के बचाव का उिचत प्रब ध कर।
 चारे के िलये बोई गई चरी, मक्का एवं बहुऋतुजीवी चारा घास की कटाई कर।
 इस माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् कर।
 जून माह म अिधकतम तापक्रम बढ़ने से पशुओं म तापघात, जल व लवण की
कमी, भूख कम होना, एवं कम उ पादन जैसे लक्षण देखने को िमलते ह ।
 िपछले माह के अनुसार पशुओं को अ यिधक तापक्रम, धूप व लू से बचाने के उपाय
कर।
 गमीर् से बचाव हेतु पशुओं को वृक्ष की छाया म रख।
 िपछले माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् न िकया हो तो इस माह म कर ल।
 गलघ टु (Haemorrhagic Septicaemia), एवं लंगड़ा बुखार (Black Quarter) बीमारी से
बचाव के टीके अव य लगवाएं।
 चारागाह म चरने वाले पशुओं की सुबह, शाम या रात्री म चराई कर, तथा भरपूर
पानी भी िपलाएं।
 ‘पाइका’ (Pica – depraved appetite) ग्र त पशुओं को पेट के कीड़े मारने की दवा
देकर लवण-िमि त आहार प्रदान कर, तािक ‘पाइका’ रोग के लक्षण से छु टकारा
प्रा त हो।
 पशुओं को हरा चारा नहीं िमल रहा हो तो ‘िवटािमन ए’ के इंजेक्शन लगवाएं।
 पशुओं को िवटािमन एवं लवण-िमि त आहार द।
 गिमर् के मौसम म पैदा की गई वार म जहरीले पदाथर् हो सकते ह, जो पशुओं के
िलए हािनकारक ह। अप्रैल म बीजाई की गई वार िखलाने से पहले 2-3 बार पानी
अव य िपलाएं।
 घास की रोपाई हेतु खेत की तैयारी कर।
 मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू, ठ पा रोग, फड़िकया
(Enterotoxemia), आिद के टीके लगवा ल।
 भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये,
िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
 जुलाई म अिधकांश िह स म वषार् ऋतु आने की स भावना रहती है, तथा कु छ थान पर
आँधी-तूफान के साथ वषार् होती है। ऐसे म गमीर् व नमी जिनत रोग से पशुओं को बचाएं।
ृ िम-नाषक घोल या दवा
देने का समय भी यही है।
 अगर मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic
Septicaemia), ठ पा (Black Quarter) रोग, फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके
नहीं लगवाए ह , तो कृ पया अभी लगवा ल। िवशेष प से य क भेड़ और बकिरय को
फड़िकया रोग का टीका लगवाएं।
 पशु याँने के दो घ टे के अ दर नवजात बछड़े व बछिड़य को खीस (प्रथम– त य) अव य
िपलाएं।
 िसंिचत हरे चारे के खेत म पशुओं को नहीं जाने द, क्य िक ल बी गमीर् के बाद अचानक
वषार् से जो हरे चारे की बढ़वार होती है उसम साइनाइड जहर पैदा होने से चारा जहरीला हो
जाता है। यह वार की फसल म िवशेष तौर पर होता है। ऐसी फसल को समय पूवर् क ची
अव था म ना काट, और न ही पशुओं को िखलाएं।
 बहुऋतुजीवी चारा घास की रोपाई कर, और बढ़ रही घास की कटाई 40 से 50 िदन के
अंतर पर करते रह। संतुिलत पशु-आहार के िलए मक्का, वार, बाजरे की, लोिबया व ग्वार
के साथ िमला कर िबजाई कर।
 भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये,
िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
 कीचड़, बाढ़, आिद का प्रभाव पशओु ं पर यनतमू हो, ऐसे उपाय अभी से कर।
 वषार्जिनत रोग से बचाव के उपाय नहीं भलू ; अतःं परजीवी व क
 यादा दधू देने वाले पशओु ं के याँने के 7-8 िदन तक दग्धु वर (Milk Fever) होने की
संभावना अिधक होती है। इस रोग से पशु को बचाने के िलए उसे गािभन अव था म
उिचत मात्रा म सयू र् की रोशनी िमलनी चािहए। साथ ही गभार्व था के अंितम माह म पशु
िचिक सक वारा लगाया जाने वाला िवटािमन ई व िसलेिनयम का िटका प्रसव उपरांत
होने वाली किठनाईयाँ, जसै े की जेर का न िगरना, इ यािद म लाभदायक होता है, अतः
पानी के साथ 5 से 10 ग्राम चनाू िमलाकर, या कै ि शयम, फा फोरस का घोल 70 से 100
िम.ली. प्रितिदन भी िदया जा सकता है।
 पशुओं को अ यिधक तापक्रम एवं धूप से बचाने के उपाय कर।
 मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), 
ठ पा (Black Quarter) रोग, फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके नहीं लगवाएं
हो, तो कृ पया अभी लगवा ल।
 मुँहपका-खुरपका रोग से ग्र त पशुओं को अलग थान अथवा बाड़े म बांध, तािक
संक्रमण व थ पशुओं म नहीं हो। यिद आस-पास के पशुओं म यह रोग फै ल रहा है,
तो अपने पशुओं का सीधा संपकर् रोगी पशुओं से नहीं होने द।
 मुँहपका-खुरपका रोग से ग्र त गाय का दूध बछड़ को नहीं पीन द, क्य िक उनम इस
रोग के कारण दयघात से मृ यु हो सकती ह।
 रोगग्र त पशुओं के मुंह, खुर व थन के छाल को लाल दवा (Potassium permanganate)
का 1 प्रितशत घोल बना कर धोय। गलघ टू व ठ पा रोग के लक्षण िदखते ही तुरंत पशु
िचिक सक से संपकर् कर।
 बोचूिल म (Botulism) की रोकथाम के िलए मृत पशुओं के अवशेष को चारागाह से
अव य हटाएं।
 भेड़ बकिरय म पी.पी.आर., भेड़ चेचक (Sheep Pox) व फड़िकया रोग होने की संभावना
रहती है, अतः इन रोग से बचाव के टीके लगवा ल।
 पशुओं को अ तः परजीवी तथा कृ िम-नाशक दवाई पशु िचिक सक से परामशर् करके सही
मात्रा म अव य द।
 पशुओं को बा य परजीवी से बचाने के िलए उपयुक्त दवाई, पशु िचिक सक से परामशर्
करके अव य िदलवाएं। पशुशाला म फशर्, दीवार आिद साफ रख, अतः िनगुर् डी, तुलसी,
या नींबू घास का गुलद ता पशु-शाला म लटका िदया जाए, क्य िक इसकी गंध बा य
परजीिवय को दूर रखती है। पशु-शाला को कीटाणुरिहत करने के िलए नीम तेल
आधािरत कीटनाशक का प्रयोग कर।
 बरसात के मौसम म पशु घर को सूखा रख, एवं मक्खी रिहत करने के िलए नीलिगिर
या िन बू घास के तेल का िछड़काव करते रह।
 पशुओं को खिनज िम ण 30-50 ग्राम प्रितिदन द, िजससे पशु की दूध उ पादन और
शारीिरक क्षमता बनी रह।
 अ छा मानसून होने पर पशु-शाला म जल भराव सम या व आद्रता जिनत रोग के
संक्रमण की प्रबल स भावना रहती है, अतः वषार् जल िनकासी का समुिचत प्रबंधन कर।
 पशुओं को यथासंभव सूखे व ऊँ चे थान पर रख।
 चारे का पयार् त और उपयुक्त भ डारण सूखे व ऊँ चे थान पर कर।
 चारागाह/बाड़े की साफ-सफाई का िवशेष यान रख। समय-समय पर फशर् व दीवार पर
चूने के घोल का िछड़काव कर।
 वातावरणीय तापमान म उतार-चढ़ाव से पशुओं को बचाने के उपाय पर यान द।
 दुग्ध वर (Milk Fever) से दुधा पशुओं को बचाने के िलए जुलाई माह म दीये गए
उपचार का पालन कर।
 पशुओं का परजीिवय से बचाव कर। िवशेष प से मेमन को फड़िकया (Enterotoxemia)
रोग का टीका लगवाएं।
 गाय के मद (हीट) म आने के 12 से 18 घ टे के अ दर गािभन करवाने का उिचत
समय है।
 हरे चारे की बहु-उपल धता के कारण पशुओं म हरे चारे के अिधक सेवन से स बंिधत
सम याओं से बचने के िलए, पशुओं को बाहर खुले म चरने के िलए नहीं भेजे, इससे
संक्रमण होने की संभावना बढती है। लवण-िम ण को चारे/दाने के साथ द।
 हरे चारे से साईलेज बनाएं, अतः हरे चारे के साथ सूखे चारे को िमलाकर िखलाएं।
 बहुऋतुजीवी घास की कटाई करते रह; यथा आव यक उवर्रक, गोबर की खाद अथवा
क पो ट डालते रह।
 बरसीम व िरजका की िबजाई इस माह के अि तम स ताह म शु कर सकते है।
 इस माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् कर।
 इस माह से सदीर् का मौसम शु हो जाता है, अतः पशुओं का सदीर् से बचाव का
उिचत प्रब ध कर।
 िपछले माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् न िकया हो तो इस माह म कर ल।
 मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग होने पर पशु के प्रभािवत भाग को
लाल दवा (Potassium permanganate) 1 प्रितशत घोल से उपचािरत कर।
 मुँहपका-खुरपका रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), ठ पा (Black Quarter)
रोग, फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके यिद अभी भी नहीं लगवाएं ह ,
तो कृ पया समय रहते लगवा ल।
 परजीवी तथा कृ िम नाशक दवा/घोल देने का समय भी उपयुक्त है। परजीवीनाशक
दवा को बारी बारी से बदल कर उपयोग म ल।
 चारे की सही समय पर खरीद-फरोख्त व संग्रहण पर पूरा यान द।
 पशुओं को लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँट म िमलाकर द।
 हरी घास व चारे की उपल धता बढ़ने पर भी पशु आहार म चारे की मात्रा िनयंित्रत
ही रख, व सूखे चारे की मात्रा बढ़ा कर द, क्य िक हरे चारे को अिधक मात्रा म
खाने से पशुओं म हरे रंग की द त अथवा एिसडोिसस (रक्त म अ लता की वृ िध)
की सम या हो सकती है।
 अिधक चारा लेने के िलए बरसीम फसल की उ नत िक म बी.एल.10, बी.एल.22,
वरदान, जे.एच.बी. 146 व बी.एल.42 की िबजाई इस माह अव य कर ल।
 भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये,
िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
 इस माह म तापक्रम अचानक कम होने की ि थित म पशुओं को सदीर् से बचाने के
उपाय करने ह ग, इसके िलए रात म पशुओं को खुले म ना बांधे।
 पशुओं का िबछावन सूखा होना चािहए तथा प्रितिदन बदल द।
 मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia),
भेड़/बकरी चेचक (Sheep/Goat Pox), ठ पा (Black Quarter), फड़िकया (Enterotoxemia) रोग
आिद के टीके यिद अभी भी नहीं लगवाएं ह , तो कृ या समय रहते लगवा ल।
 थनैला (Mastitis) रोग से बचाव के उपाय कर।
 परजीवीनाशक दवा या घोल देने से पशुओं को परजीवी प्रकोप से बचाया जा सकता
है, िजससे ना के वल पशुओं के वा य म सुधार होगा, अिपतु जो भोजन पशु खाता
है उसका शरीर म सदुपयोग होगा तथा उ पादन बढ़ेगा।
 पशुओं को लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँट म िमलाकर द।
 चारे की सही समय पर खरीद-फरोख्त व संग्रहण पर पूरा यान द।
 बहुऋतुजीवी घास की कटाई कर ल। इसके बाद ये सु ताव था म चली जाती है,
िजससे अगली कटाई तापमान बढ़ने पर फरवरी-माचर् म ही प्रा त होती है।
 जई फसल से अिधक चारा लेने के िलए उ नत िक म, जैसे िक िसरसा जई 6,
िसरसा जई 9, जे.एच.ओ. 822, जे.एच.ओ. 851 की िबजाई माह के म य से शु
कर।
 बरसीम व िरजका की िबजाई माह के म य तक अव य पूरी कर ल।
 तीन वषर् म एक बार पी.पी.आर. का टीका भेड़ और बकिरय को अव य लगवाएं।
 भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये,
िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
 पशुओं का सदीर् से बचाव का उिचत प्रब ध कर। रात म पशुओं को अंदर गमीर् वाले
थान, जैसे िक छत के नीचे या घास-फू स की छ पर तले बांध।
 मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic
Septicaemia), भेड़ चेचक (Sheep Pox), फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके
यिद अभी भी नहीं लगवाएं ह , तो कृ पया समय रहते लगवा ल।
 पशुओं को खिनज लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँट म िमलाकर द।
 दुधा पशुओं को थनैला (Mastitis) रोग से बचाने के िलए पूरा दूध िनकाल, और दुध
दोहने के बाद थन को कीटाणु नाशक घोल म धो ल।
 पशु आहार म हरे चारे की मात्रा िनयंित्रत ही रख, व सूखे चारे की मात्रा बढ़ा कर द,
क्य िक हरे चारे को अिधक मात्रा म खाने से पशुओं म द त इ यादी की सम या हो
सकती है।
 यिद इस समय वातावरण म बादल नहीं है, और पशुओं को िखलाने के प चात
अितिरक्त हरा चारा बचा हुआ हो, तो उसे छाया म सुखाकर ‘हे’(सूखी घास) के प
म संरिक्षत कर।
 िबजाई के 50-55 िदन के बाद बरसीम, एवं 55-60 िदन बाद जई की चारे के िलए
कटाई कर। इसके प चात बरसीम की कटाई 25-30 िदन के अ तराल पर करते रह।
 िदस बर की चटकीली धुप म चारा प्रदान करने वाले वृक्ष की छंटाई के बाद पि य
आिद को छाया म सुखाकर गमीर् के मौसम म जब कम चारा उपल ध रहता है, उस
समय पशुओं को िखलाने के िलए संग्रहण कर।
पशुपालन कैलेंडर

पशुपालन कैलेंडर

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     क मीरव िहमाचल प्रदेश म बफर् बारी का सीधा असर, सदर् हवाओं व पाला पड़ने के प म, पड़ता है, अतः पशुओं को शीत-लहर से बचाने के आव यक उपाय कर ल।  पाला पड़ने की संभावना हो, तो कृ ित्रम प्रकाश या गमीर् का प्रब ध अव य कर।  कमज़ोर व रोगी पशुओं को बोरी की झूल बनाकर ओढ़ाय। सदीर् से बचने के िलए रात के समय पशुओं को छत के नीचे या घास-फू स के छ पर म बांध कर रख।  पशुओं को संकड़े/नम थान म ब द करने से, एवं धुआं आिद से गमीर् पहुँचाने की कोिशश, उनके यूमोिनया से पीिड़त होने की संभावना को अिधक बढ़ाती ह।  पशुओं को बांटा और पानी गुनगुना कर के द।  दुधा पशुओं को तेल व गुड़ देने से भी शरीर का तापक्रम सामा य बनाये रखने म सहायता िमलती है।  अभी से चारे का संग्रहण अथवा उसको सही समय पर खरीद कर रख, साथ ही पशुओं म लवण की कमी नहीं होने पाये, इस हेतु लवण िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बांटे म िमला कर द।  अ तः परजीवीनाशक घोल या दवा देने का सही समय भी यही है।  पशुओं को बा य परजीिवय से बचाने के िलये पशु-शाला म फशर्, दीवार आिद साफ रख। अतः िनगुर् डी, तुलसी, या नींबू घास का गुलद ता पशु-शाला म लटका िदया जाए, क्य िक इसकी गंध बा य परजीिवय को दूर रखती है। पशु-शाला को कीटाणुरिहत करने के िलए नीम तेल आधािरत कीटनाशक का प्रयोग कर।  पशु-पालक को चािहए िक अगर मुँहपका-खुरपका रोग (Foot and Mouth Disease), पी.पी.आर., गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), फड़िकया (Enterotoxemia), लंगड़ा बुखार (Black Quarter) आिद रोग से बचाव के टीके नहीं लगवाएं ह , तो अभी लगवा ल। िवशेष प से मेमन को फड़िकया का टीका लगवाएं।  िरजका व बरसीम म 20-30 िदन, एवं जई म 20-22 िदन के अ तराल पर आव यकता अनुसार िसंचाई करते रह।
  • 3.
     मौसम वैज्ञािनकके अनुसार फरवरी माह म अनेक थान पर वषार् होने की संभावना रहती है, अतः पशुओं को भीगने से बचाएं एवं बादल हटने पर सदीर् के बढ़ने के आसार को देखते हुए पयार् त बचाव के उपाय कर।  िपछले माह िदये गए सदीर् से बचाव के उपाय इस माह भी जारी रख।  जो पशु जनवरी माह म िनयि त्रत प्रजनन कायर्क्रम के तहत उपचार म थे, उनका अनुसरण फरवरी माह म भी रखा जाए तािक सभी पशु इस महीने तक गिभर्त हो जाएं।  नवजात बछड़े-बछिड़य को अ तः परजीवी नाशक िनयिमत प से द।  मेमन को पी.पी.आर. का टीका लगवाएं।  दुधा पशुओं को थनैला रोग (Mastitis) से बचाने के िलए, उनका दूध पूरा व मु ठी बांध कर िनकाल।  िरजका व बरसीम एवं जई की िसंचाई क्रमशः 12-14 एवं 18-20 िदन के अंतराल पर कर।  बरसीम, िरजका एवं जई को सूखा चारा या अचार (साईलेज) के प म एकित्रत कर भिव य म संभािवत चारे की कमी के समय के िलए सुरिक्षत रख।
  • 4.
     इस माहसे गमीर् म होने वाले रोग के प्रित सावधानी रखनी होगी।  यिद म छर, मक्खी, चींचड़, आिद, जीव की संख्या म वृ िध हो रही हो, तो इनसे फै लने वाले रोग से बचाव करना आव यक है।  आने वाले समय म पशुओं म बाँझपन एवं फु राव (Johne’s disease), आिद रोग भी होते ह, अतः ऐसे म पशुओं की तुर त िचिक सा करवाएं।  यिद दूध उ पादन म कमी हो रही हो, तो पशु िचिक सक वारा दूध और पेशाब, दोन की जाँच करवाएं।  बरसीम-िरजका एवं जई की िसंचाइ 10 िदन एवं 12-14 िदन क्रमशः के अ तराल पर कर।  ग्री मकाल म हरे चारे हेतु मक्का, बाजरा एवं वार की बोवाई कर।  बहुऋतुजीवी चारा घास जैसे हाईिब्रड नेिपयर, िगनी घास, इ यािद की रोपाई पहले से तैयार खेत म कर।  हरे चारे से साईलेज तैयार कर।  याँने वाले पशुओं को प्रसूित बुखार (Puerperal Fever) से बचाने के िलए खिनज िम ण 50-60 ग्राम प्रितिदन द।
  • 5.
     इस माहम अिधक तापक्रम होने की संभावना रहती है।  पशुओं म जल व लवण की कमी, भूख कम होना, एवं कम उ पादन, अिधक तापक्रम के प्रमुख प्रभाव होते ह, अतः पशुओं को अ यिधक तापक्रम से बचाने के उपाय कर।  भार ढोने वाले पशुओं को दोपहर से शाम चार बजे तक छाया वाले एवं हवादार थान म आराम करने द।  पीने के पानी के इंतज़ाम पर भी यान द। पानी की कु डी साफ रख। पशुओं को िदन म कम से कम चार बार पानी िपलाने का प्रयास कर।  कु छ मादा पशुओं म गमीर् (ताव म आना) के लक्षण िदन म कम तथा राित्र म अिधक प्रदिशर्त होते ह, अतः पशुपालक इसका यान रख।  थनैला रोग (Mastitis) की पहचान और िनदान के उपाय कर।  मेमन को फड़िकया (Enterotoxemia) व भेड़ चेचक रोग (Sheep Pox) का टीका लगवाएं।  गािभन (छः माह से अिधक) पशुओं को अितिरक्त आहार द।  चारागाह म घास यूनतम तर पर होती है, तथा पशुपोषण भी वषार् न होने तक अपेक्षाकृ त कमज़ोर रहता है। ऐसे म लवण, िवशेषकर फॉसफोरस की कमी के कारण पशुओं म ‘पाइका’ (Pica – depraved appetite) नामक रोग के लक्षण नज़र आने लगते ह, अतः बाँटा-चाट (Mineral block) म लवण िम ण अव य िमलाय।  सामुदाियक प्रयास से सुिनि चत कर िक मृत पशु, ह डी, चमड़ा, कं काल आिद चारागाह के रा त एवं उन थान पर इक् ठा नहीं होने पाए जहाँ से पशुओं का रोज़ाना आना जाना रहता है।  ऐसे थान की तारबंदी/बाड़बंदी कर पशुओं को रोक, क्य िक मृत पशु के अवशेष को खाने व चबाने से प्राण-घातक रोग ‘बोचुिल म’ (Botulism) हो सकता है, िजसका कोई उपचार नहीं है।  चारे के िलए बोई गई मक्का, बाजरा एवं वार की कटाई 45-50 िदन की अव था म कर।
  • 6.
     मई माहम अिधक तापक्रम होने की संभावना रहती है, साथ ही कु छ थान पर आँधी-तूफान के साथ वषार् भी प्रायः होती है।  गमीर्-जिनत रोग के फै लने से पशुओं म तापघात, जल व लवण की कमी, भूख कम होना, एवं कम उ पादन जैसे लक्षण देखने को िमलते ह।  पशुओं को धूप व लू से बचाने के उपाय कर।  चारे का संग्रहण, व उसकी समय पर खरीद कर सक, ऐसे उपाय के बारे म सोच।  पशुओं म लवण की कमी नहीं होने पाए, इस हेतु लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँटे म िमलाकर द।  पशुओं के आहार म मौसम के अनुसार आव यक बदलाव कर। गेहूँ का चोकर और जौ की मात्रा बढ़ाएं।  पशुओं को संतुिलत आहार द, िजससे उनकी दुग्ध उ पादन क्षमता बनी रहे।  िचंचड़ व पेट के कीड़ से पशुओं के बचाव का उिचत प्रब ध कर।  चारे के िलये बोई गई चरी, मक्का एवं बहुऋतुजीवी चारा घास की कटाई कर।  इस माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् कर।
  • 7.
     जून माहम अिधकतम तापक्रम बढ़ने से पशुओं म तापघात, जल व लवण की कमी, भूख कम होना, एवं कम उ पादन जैसे लक्षण देखने को िमलते ह ।  िपछले माह के अनुसार पशुओं को अ यिधक तापक्रम, धूप व लू से बचाने के उपाय कर।  गमीर् से बचाव हेतु पशुओं को वृक्ष की छाया म रख।  िपछले माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् न िकया हो तो इस माह म कर ल।  गलघ टु (Haemorrhagic Septicaemia), एवं लंगड़ा बुखार (Black Quarter) बीमारी से बचाव के टीके अव य लगवाएं।  चारागाह म चरने वाले पशुओं की सुबह, शाम या रात्री म चराई कर, तथा भरपूर पानी भी िपलाएं।  ‘पाइका’ (Pica – depraved appetite) ग्र त पशुओं को पेट के कीड़े मारने की दवा देकर लवण-िमि त आहार प्रदान कर, तािक ‘पाइका’ रोग के लक्षण से छु टकारा प्रा त हो।  पशुओं को हरा चारा नहीं िमल रहा हो तो ‘िवटािमन ए’ के इंजेक्शन लगवाएं।  पशुओं को िवटािमन एवं लवण-िमि त आहार द।  गिमर् के मौसम म पैदा की गई वार म जहरीले पदाथर् हो सकते ह, जो पशुओं के िलए हािनकारक ह। अप्रैल म बीजाई की गई वार िखलाने से पहले 2-3 बार पानी अव य िपलाएं।  घास की रोपाई हेतु खेत की तैयारी कर।  मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू, ठ पा रोग, फड़िकया (Enterotoxemia), आिद के टीके लगवा ल।  भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये, िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
  • 8.
     जुलाई मअिधकांश िह स म वषार् ऋतु आने की स भावना रहती है, तथा कु छ थान पर आँधी-तूफान के साथ वषार् होती है। ऐसे म गमीर् व नमी जिनत रोग से पशुओं को बचाएं। ृ िम-नाषक घोल या दवा देने का समय भी यही है।  अगर मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), ठ पा (Black Quarter) रोग, फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके नहीं लगवाए ह , तो कृ पया अभी लगवा ल। िवशेष प से य क भेड़ और बकिरय को फड़िकया रोग का टीका लगवाएं।  पशु याँने के दो घ टे के अ दर नवजात बछड़े व बछिड़य को खीस (प्रथम– त य) अव य िपलाएं।  िसंिचत हरे चारे के खेत म पशुओं को नहीं जाने द, क्य िक ल बी गमीर् के बाद अचानक वषार् से जो हरे चारे की बढ़वार होती है उसम साइनाइड जहर पैदा होने से चारा जहरीला हो जाता है। यह वार की फसल म िवशेष तौर पर होता है। ऐसी फसल को समय पूवर् क ची अव था म ना काट, और न ही पशुओं को िखलाएं।  बहुऋतुजीवी चारा घास की रोपाई कर, और बढ़ रही घास की कटाई 40 से 50 िदन के अंतर पर करते रह। संतुिलत पशु-आहार के िलए मक्का, वार, बाजरे की, लोिबया व ग्वार के साथ िमला कर िबजाई कर।  भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये, िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।  कीचड़, बाढ़, आिद का प्रभाव पशओु ं पर यनतमू हो, ऐसे उपाय अभी से कर।  वषार्जिनत रोग से बचाव के उपाय नहीं भलू ; अतःं परजीवी व क  यादा दधू देने वाले पशओु ं के याँने के 7-8 िदन तक दग्धु वर (Milk Fever) होने की संभावना अिधक होती है। इस रोग से पशु को बचाने के िलए उसे गािभन अव था म उिचत मात्रा म सयू र् की रोशनी िमलनी चािहए। साथ ही गभार्व था के अंितम माह म पशु िचिक सक वारा लगाया जाने वाला िवटािमन ई व िसलेिनयम का िटका प्रसव उपरांत होने वाली किठनाईयाँ, जसै े की जेर का न िगरना, इ यािद म लाभदायक होता है, अतः पानी के साथ 5 से 10 ग्राम चनाू िमलाकर, या कै ि शयम, फा फोरस का घोल 70 से 100 िम.ली. प्रितिदन भी िदया जा सकता है।
  • 9.
     पशुओं कोअ यिधक तापक्रम एवं धूप से बचाने के उपाय कर।  मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia),  ठ पा (Black Quarter) रोग, फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके नहीं लगवाएं हो, तो कृ पया अभी लगवा ल।  मुँहपका-खुरपका रोग से ग्र त पशुओं को अलग थान अथवा बाड़े म बांध, तािक संक्रमण व थ पशुओं म नहीं हो। यिद आस-पास के पशुओं म यह रोग फै ल रहा है, तो अपने पशुओं का सीधा संपकर् रोगी पशुओं से नहीं होने द।  मुँहपका-खुरपका रोग से ग्र त गाय का दूध बछड़ को नहीं पीन द, क्य िक उनम इस रोग के कारण दयघात से मृ यु हो सकती ह।  रोगग्र त पशुओं के मुंह, खुर व थन के छाल को लाल दवा (Potassium permanganate) का 1 प्रितशत घोल बना कर धोय। गलघ टू व ठ पा रोग के लक्षण िदखते ही तुरंत पशु िचिक सक से संपकर् कर।  बोचूिल म (Botulism) की रोकथाम के िलए मृत पशुओं के अवशेष को चारागाह से अव य हटाएं।  भेड़ बकिरय म पी.पी.आर., भेड़ चेचक (Sheep Pox) व फड़िकया रोग होने की संभावना रहती है, अतः इन रोग से बचाव के टीके लगवा ल।  पशुओं को अ तः परजीवी तथा कृ िम-नाशक दवाई पशु िचिक सक से परामशर् करके सही मात्रा म अव य द।  पशुओं को बा य परजीवी से बचाने के िलए उपयुक्त दवाई, पशु िचिक सक से परामशर् करके अव य िदलवाएं। पशुशाला म फशर्, दीवार आिद साफ रख, अतः िनगुर् डी, तुलसी, या नींबू घास का गुलद ता पशु-शाला म लटका िदया जाए, क्य िक इसकी गंध बा य परजीिवय को दूर रखती है। पशु-शाला को कीटाणुरिहत करने के िलए नीम तेल आधािरत कीटनाशक का प्रयोग कर।  बरसात के मौसम म पशु घर को सूखा रख, एवं मक्खी रिहत करने के िलए नीलिगिर या िन बू घास के तेल का िछड़काव करते रह।  पशुओं को खिनज िम ण 30-50 ग्राम प्रितिदन द, िजससे पशु की दूध उ पादन और शारीिरक क्षमता बनी रह।
  • 10.
     अ छामानसून होने पर पशु-शाला म जल भराव सम या व आद्रता जिनत रोग के संक्रमण की प्रबल स भावना रहती है, अतः वषार् जल िनकासी का समुिचत प्रबंधन कर।  पशुओं को यथासंभव सूखे व ऊँ चे थान पर रख।  चारे का पयार् त और उपयुक्त भ डारण सूखे व ऊँ चे थान पर कर।  चारागाह/बाड़े की साफ-सफाई का िवशेष यान रख। समय-समय पर फशर् व दीवार पर चूने के घोल का िछड़काव कर।  वातावरणीय तापमान म उतार-चढ़ाव से पशुओं को बचाने के उपाय पर यान द।  दुग्ध वर (Milk Fever) से दुधा पशुओं को बचाने के िलए जुलाई माह म दीये गए उपचार का पालन कर।  पशुओं का परजीिवय से बचाव कर। िवशेष प से मेमन को फड़िकया (Enterotoxemia) रोग का टीका लगवाएं।  गाय के मद (हीट) म आने के 12 से 18 घ टे के अ दर गािभन करवाने का उिचत समय है।  हरे चारे की बहु-उपल धता के कारण पशुओं म हरे चारे के अिधक सेवन से स बंिधत सम याओं से बचने के िलए, पशुओं को बाहर खुले म चरने के िलए नहीं भेजे, इससे संक्रमण होने की संभावना बढती है। लवण-िम ण को चारे/दाने के साथ द।  हरे चारे से साईलेज बनाएं, अतः हरे चारे के साथ सूखे चारे को िमलाकर िखलाएं।  बहुऋतुजीवी घास की कटाई करते रह; यथा आव यक उवर्रक, गोबर की खाद अथवा क पो ट डालते रह।  बरसीम व िरजका की िबजाई इस माह के अि तम स ताह म शु कर सकते है।  इस माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् कर।
  • 11.
     इस माहसे सदीर् का मौसम शु हो जाता है, अतः पशुओं का सदीर् से बचाव का उिचत प्रब ध कर।  िपछले माह म भेड़ के ऊन कतरने का कायर् न िकया हो तो इस माह म कर ल।  मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग होने पर पशु के प्रभािवत भाग को लाल दवा (Potassium permanganate) 1 प्रितशत घोल से उपचािरत कर।  मुँहपका-खुरपका रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), ठ पा (Black Quarter) रोग, फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके यिद अभी भी नहीं लगवाएं ह , तो कृ पया समय रहते लगवा ल।  परजीवी तथा कृ िम नाशक दवा/घोल देने का समय भी उपयुक्त है। परजीवीनाशक दवा को बारी बारी से बदल कर उपयोग म ल।  चारे की सही समय पर खरीद-फरोख्त व संग्रहण पर पूरा यान द।  पशुओं को लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँट म िमलाकर द।  हरी घास व चारे की उपल धता बढ़ने पर भी पशु आहार म चारे की मात्रा िनयंित्रत ही रख, व सूखे चारे की मात्रा बढ़ा कर द, क्य िक हरे चारे को अिधक मात्रा म खाने से पशुओं म हरे रंग की द त अथवा एिसडोिसस (रक्त म अ लता की वृ िध) की सम या हो सकती है।  अिधक चारा लेने के िलए बरसीम फसल की उ नत िक म बी.एल.10, बी.एल.22, वरदान, जे.एच.बी. 146 व बी.एल.42 की िबजाई इस माह अव य कर ल।  भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये, िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
  • 12.
     इस माहम तापक्रम अचानक कम होने की ि थित म पशुओं को सदीर् से बचाने के उपाय करने ह ग, इसके िलए रात म पशुओं को खुले म ना बांधे।  पशुओं का िबछावन सूखा होना चािहए तथा प्रितिदन बदल द।  मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), भेड़/बकरी चेचक (Sheep/Goat Pox), ठ पा (Black Quarter), फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके यिद अभी भी नहीं लगवाएं ह , तो कृ या समय रहते लगवा ल।  थनैला (Mastitis) रोग से बचाव के उपाय कर।  परजीवीनाशक दवा या घोल देने से पशुओं को परजीवी प्रकोप से बचाया जा सकता है, िजससे ना के वल पशुओं के वा य म सुधार होगा, अिपतु जो भोजन पशु खाता है उसका शरीर म सदुपयोग होगा तथा उ पादन बढ़ेगा।  पशुओं को लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँट म िमलाकर द।  चारे की सही समय पर खरीद-फरोख्त व संग्रहण पर पूरा यान द।  बहुऋतुजीवी घास की कटाई कर ल। इसके बाद ये सु ताव था म चली जाती है, िजससे अगली कटाई तापमान बढ़ने पर फरवरी-माचर् म ही प्रा त होती है।  जई फसल से अिधक चारा लेने के िलए उ नत िक म, जैसे िक िसरसा जई 6, िसरसा जई 9, जे.एच.ओ. 822, जे.एच.ओ. 851 की िबजाई माह के म य से शु कर।  बरसीम व िरजका की िबजाई माह के म य तक अव य पूरी कर ल।  तीन वषर् म एक बार पी.पी.आर. का टीका भेड़ और बकिरय को अव य लगवाएं।  भेड़ के शरीर को ऊन कतरने के 21 िदन बाद, बा य परजीिवय से बचाने के िलये, िकटाणु-नाषक घोल से िभगोएं।
  • 13.
     पशुओं कासदीर् से बचाव का उिचत प्रब ध कर। रात म पशुओं को अंदर गमीर् वाले थान, जैसे िक छत के नीचे या घास-फू स की छ पर तले बांध।  मुँहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग, गलघ टू (Haemorrhagic Septicaemia), भेड़ चेचक (Sheep Pox), फड़िकया (Enterotoxemia) रोग आिद के टीके यिद अभी भी नहीं लगवाएं ह , तो कृ पया समय रहते लगवा ल।  पशुओं को खिनज लवण-िम ण िनधार्िरत मात्रा म दाने या बाँट म िमलाकर द।  दुधा पशुओं को थनैला (Mastitis) रोग से बचाने के िलए पूरा दूध िनकाल, और दुध दोहने के बाद थन को कीटाणु नाशक घोल म धो ल।  पशु आहार म हरे चारे की मात्रा िनयंित्रत ही रख, व सूखे चारे की मात्रा बढ़ा कर द, क्य िक हरे चारे को अिधक मात्रा म खाने से पशुओं म द त इ यादी की सम या हो सकती है।  यिद इस समय वातावरण म बादल नहीं है, और पशुओं को िखलाने के प चात अितिरक्त हरा चारा बचा हुआ हो, तो उसे छाया म सुखाकर ‘हे’(सूखी घास) के प म संरिक्षत कर।  िबजाई के 50-55 िदन के बाद बरसीम, एवं 55-60 िदन बाद जई की चारे के िलए कटाई कर। इसके प चात बरसीम की कटाई 25-30 िदन के अ तराल पर करते रह।  िदस बर की चटकीली धुप म चारा प्रदान करने वाले वृक्ष की छंटाई के बाद पि य आिद को छाया म सुखाकर गमीर् के मौसम म जब कम चारा उपल ध रहता है, उस समय पशुओं को िखलाने के िलए संग्रहण कर।