रोगाणामनुत्पदनममति रोगानुत्पादनम् ।रोगानुत्पादनाय हििममति रोगानुत्पादनयय ( अरुणदत्त )
• रोगों का जो अनुत्पादक ( रोग जजसमें उत्पत्ति ना िो ) िै , उसका हिि जजसमें वर्णिि िै , उसे
रोगानुत्पादनयय किा गया िै ।
मित्त्व :
• रोगााः सवेऽत्तप जायन्िे वेगोदीरणधारणैाः । ( अ . ि . सू . 4/22 )
• वेगों क
े उदीरण ( बलात्रेरण ) िथा धारण ( बलाि ् अवरोध ) से सभय रकार क
े रोग उत्पन्न िोिा िै ।
रवृत्ति को बनाये रखना िी स्वस्थवृि िै ।
पररभाषा
• वेग –
1. रवृिेरामभमुख्येनोपजस्थित्वं वेगाः ( पदाथि चहिकहिक )
2. रवृिेरन्मुखत्वं वेगाः ( िेमाहि )
3. जाितन जाि मात्रान वेगाः रवृत्युन्मुखत्वं मूत्रपुरीषादीनाम् ।। ( च . सू . 7/3 चक्रपार्ण )
• मूत्र – मूत्र - पुरीष कीरवृत्ति का उन्मुख िोना वेग िै ।
• रकृ ति से िी अपने स्थान से च्युि िोना वेग िै ।
• वेग दो रकार क
े िोिे िैं- 1. शारीररक ( अधारणयय ) और 2. मानमसक ( धारणयय ) ।
2.
अधारणयय वेग
• स्वभावसे रवृि िुए मूत्राहद ( अधोभाव ) , उद्गाराहद ( ऊर्धवािभाव ) एवं रवृि िुए वािाहद वेगों को स्वास््य
चािने आले व्यजति को धारण निीं करना चाहिये ।
• अधारणयय वेगों को धारण से िातनयााँ :
यिााँ ' धारण ' शब्द का िात्पयि ग्रिण करने या रोकने से मलया गया िै ।
1. एिान ् धारयिो जािान ् वेगान ् रोगा भवजन्ि ये ।। ( च . सू . 7/5 )
2. रोगााः सवेऽत्तप जायन्िे वेगोदीरण धारणैाः ।। ( अ . स . सू . 5/26)
सवि रकार क
े रोग , वेगोदीरण ( वेगों में बलाि ् रवििन ) एवं वेग त्तवधारण से िोिे िैं
अधारणयय वेगों की संख्या :
• चरक क
े अनुसार- 13 ( चरक ने 6 उदाविि माने िैं , शेष 7 का वािजोदविि में अन्िभािव िै )
• सुश्रुि -13 ( िेरि रकार क
े वेगों से 13 उदाविि का वणिन ककया िै । )
• अ . स . - 13
• अ . हृ . 14
• भेल संहििा -12
3.
• वेगान्न धारयेद्वाित्तवण्मूत्रक्षविृक्षुधाम्। तनिाकासश्रमश्वासजृम्भभाऽ श्रुच्छरहदिरेिसाम्
• िेरि अधारणयय वेग- बुद्धधमान् व्यजति को उपजस्थि िुये-
( १ ) वाि
( २ ) त्तवणू ( मल )
( ३ ) मूत्र
( ४ ) क्षव ( छर ंक Sneezing )
( ५ ) िृट् ( प्यास- Thirst)
( ६ ) क्षुधा ( भूख )
( ७ ) तनिा
( ८ ) कास ( खांसय- Cough )
( ९ ) श्रम ( थकान Fatigue ) से उत्पन्न श्वास ( Dyspnoea ) ,
( १०) जृम्भभा ( जंभाई- Yawning )
( ११ ) अश्रु ( Tear ) ,
( १२ ) छरहदि ( वमन Vomiting ) और
( १३ ) रेिस् ( शुक- Semen ) इन ( िेरि रकार क
े ) वेगों को जो बािर तनकलने वाले िैं , निीं रोकना चाहिये
4.
1. अघोवाि वेगावरोधसे उत्पन्न रोग-
• अधोवाि ( अपान वायु ) का वेग रोकने से गुल्म , उदाविि , रुक् ( कोष्ठेशूल ) ,
तलम , वाि ( अपान वायु ) , मूत्र और शकृ ि् सङ्ग , दृजष्ि और अजनन बध
और हृदय क
े रोग िोिे िैं ।
• आचायि चरक ने वाि ( अपान वायु ) और उद्गार ( उर्धविवाि- Belching ) का अलग -
अलग उल्लेख ककया िै , इन्िोंने कास ( Cough ) का वणिन निीं ककया
• वािवेगावरोध से उत्पन्न रोगों की धचककत्सा-
• वाि क
े वेग को रोकने से िोने वाले रोग में स्नेिन ( Oleation ) और स्वेदन (
Fomentation ) धचककत्सा त्तवधध करना चाहिये , फलवतिियां ( Suppositories ) , वाि नाशक
भोजन , उष्ण जल का पान , वजस्ि कमि ( Enema ) और वाि का अनुलोमन ( उधचि
मागि से तनकालना- Descending series ) करने वाले कायि करना
5.
2. मल वेगावरोध( Defecation ) से उत्पन्न रोग-
मल क
े वेग को रोकने से त्तपजण्िकोद्वेष्िन ( त्तपण्िमलयों में ऐंठन क
े समान पयडा- Cramps in the calf muscles )
, पररकतििका ( गुदा में कैं चय से कािने जैसय पयडा ) , हृदय का उपरोध ( हृदय गति में अवरोध ) , मुख से
मूल का आना और पूवि में वर्णिि वाि वेगावरोध से उत्पन्न व्याधध गुल्म , उदाविि आहद राग िोिे िैं ।
• अपान वायु क
े द्वारा पुरीष का रवििन ( तनाःसरण ) िोिा िै । इसका वेग बलाि् धारण करने से अपान वायु
और मल आश्रय स्थान ( मलाशय- Rectum ) त्तवकृ ि िो जािा िै , पररणामस्वरूप अपान वायु की गति
रतिलोम ( त्तवपरीि हदशा में ) िो जािय िै जजससे मल पुनाः बृिदान्त्र ( Large intestine ) में चला जािा िै
और विााँ क
े श्लेष्मल कला ( Mucous membrane ) द्वारा मल क
े जलीयांश का शोषण िो जािा िै , जजससे
मल शुष्क िो जािा िै और आसानय से उसका त्याग निीं िोिा िै
मलावरोध ( Defecation ) से उत्पन्न रोग की धचककत्सा-
• मलावरोध से उत्पन्न रोगों में धचककत्सा क
े मलये त्तवशेष रूप से त्तवड्मेदों ( मल का भेदन Stool breaking
करने वाले ) अन्न - पान देना चाहिये ।
• आचायि चरक ने सू.स्थान ७ / ९ में पुरीषावरोध से उत्पन्न रोगों में धचककत्सा क
े मलये स्वेदन , अभ्यंग ,
अवगािन , गुदवतिि , बजस्िकमि और रमाथय अन्नपान का सेवन करने को किा िै ।
• रमाथय अन्रपान वि िै जो स्रोिों से मल को अलग करे । " ( शा.पू. ४ ) "
6.
3.मूत्रवेगावरोघ ( Micturition) से उत्पन्न रोग-
• मूत्र क
े उपजस्थि वेग को रोकने से अङ्गों का िूिना , अश्मरी , वजस्ि , मेढ्र और वंक्षण में वेदना
िोिय िै ।
मूत्रवेग को बलाि ् रोकने से वाि क
ु त्तपि िोकर मूत्राशय और मशश्न में वेदना िोिा िै । इस समय
मूत्राशय त्तवस्फाररि िो जािा िै , जजससे उसका िनाव समाप्ि िो जािा िै , पररणामस्वरूप मूत्र
कहठनिा से बूंद - बूंद करक
े बार - बार तनकलिा िै ।
• मूत्रवेगावरोध से उत्पन्न रोगों की धचककत्सा-
इनकी ( वाि , मल और मूत्र क
े वेगावरोध से उत्पन्न रोगों की ) धचककत्सा फलवतिि ( वतिि ) ,
अभ्यंग , अवगािन , स्वेदन ( Fomentation) और बजस्ि ( Enema ) कमि से करािे िैं । अभ्यंग क
े
मलये वाि नाशक िैल ।
• अवपयडक
इसमें भोजन से पूवि ( राम्भभतिं ) घृि का पान कराना चाहिये और रात्रत्र का भोजन जयणि (
जयणािजन्िक ) िो जाने अथािि् पच जाने पर उिम मात्रा में घृिपान कराना चाहिये , इन दोनों
योजनाओं की अवपयिक संज्ञा िै , अथािि् इन्िें अवपयिक कििे िैं । भोजन क
े पूवि अल्प
मात्रा में घृि का देना एक योजना िै और भोजन क
े जयणि िोने पर स्नेि को उिम मात्रा में
देना यि दूसरी योजना िैं , इन दोनों योजनाओं को अवपयिन कििे िैं ।
7.
4. उद्गार (Belching ) अवरोध से रोगोत्पत्ति-
उद्गार ( उर्धविवाि ) को रोकने से अरुधच ( भोजन में रुधच का न िोना Anorexia ) ,
कम्भप ( शरीर का कांपना Tremor ) , हृदय और उर: रदेश में अवरोध , आर्धमान ( पेि
में िनाव Tympanitis ) , कास ( खांसय- Cough ) , और हिर्धमा ( हिचकी- Hiccough ) की
उत्पत्ति िोिय िै ।
• धचककत्सा
1. इसमें हितका रोग क
े समान औषध देना ( चिकित्सा िरना िाहिये )
2. उद्गार का आना - उदान वायु का कायि िै । इसकी स्वाभात्तवक रवृति को रोकने से
उदान वायु क
ु त्तपि िोकर श्वास िथा अन्य वािज व्याधधयों को उत्पन्न करिा िै ।
3. हितका की धचककत्सा क
े मलये आचायि चरक ने धचककत्सा स्थान १७/१४७ में किा कक
“ यजत्कजचचि् कफवािघ्नमुष्णं वािानुलोमनम् । भेषजं पानमन्नं वा िद्धधिं
श्वासहिजतकने ।। " ( च.धच. १७/१४७ )
अथािि् श्वास और हितका में कफ - वाि नाशक , उष्ण और वाि का अनुलोमन करने
वाला पदाथि िी हििकर िोिा िै ।
8.
5. छर ंक( Sneezing ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग-
छर ंक का वेग रोकने से मशरोऽतिि दुबिलिा , मन्यास्िम्भभ और अहदिि रोग की उत्पत्ति िोिय िै ।
धचककत्सा
• इसकी धचककत्सा क
े मलये ियक्ष्ण धूमपान ( Smoking ) , ियक्ष्ण अचजन , ियक्ष्ण घ्राण, नावन और सूयि की ओर
देख कर ये सब करें स्वेदनऔर अभ्यंग क
े साथ वािनाशक भोजन और उसक
े बाद घृि देना चाइए
• नामसका द्वारा अचानक ियव्र गति से ियव्र शब्दयुति वायु का तनकलना िी छर ंक ( Sneezing ) िै । आचायि
चरक क
े मिानुसार रक
ु त्तपि वायु मसर क
े चारों ओर व्याप्ि िोकर नासागि ममिस्थानों को स्पशि कर क्षवथु (
छर ंक ) रोग को उत्पन्न करिय िै ियक्ष्ण या असात्म्भय िव्यों को सूंघने से उसक
े परमाणु नासाकलागि (
Nasal mucous membrane ) नाड्याग्रो को क्षुमभि कर छर ंक को उत्पन्न करिे िैं ।
• नासागुिा ( Nasal cavity ) क
े त्तववरों में जस्थि कफ भय स्थातनक कला ( Membrane ) को उिेजजि कर छर ंक
उत्पन्न करिा िै । इससे ( छर ंक से ) नासा या नासागुिा में जस्थि असात्म्भय या बाह्य पदाथि आ जािे िैं ,
जजससे कक दोष क
े बािर तनकल जाने क
े कारण ककसय भय रोग क
े िोने की संभावना निीं रि जािय िै ।
रयत्नपूविक छर ंक को रोकने से जब ये असात्म्भय या बाह्य पदाथि बािर निीं तनकल पािे िै िब ये स्रोिों में
अवरोध ( Obstruction ) उत्पन्न कर अनेक रकार क
े रोगों को उत्पन्न करिे िैं , जजनमें मशराःशूल (
Headache ) मुख्य लक्षण िैं । इससे सम्भपूणि शरीर में गुरुिा क
े लक्षण भय उत्पन्न िोिे िैं ।
9.
6.प्यास ( Thirst) वेगावरोध से उत्पन्न रोग-
प्यास का वेग रोकने से मुख का सूखना , अङ्गों में मशधथलिा , बाधधयि ( Deafness ) , सम्भमोि ( ज्ञान का
अभाव- Fainting ) , भ्रम ( चतकर आना Giddiness ) और हृदय क
े रोग िोिे िैं ।
धचककत्सा
• “ िृष्णाघािे त्तपबेन्मन्थं यवागूं वात्तप शयिलाम् ।। "
• शयिल धचककत्सा
7. भूख ( Hunger ) क
े वेग को रोकने से उत्पन्न रोग और धचककत्सा-
इससे अंगों का िूिना ( Bodyache ) , अरुधच ( Distaste ) , नलातन ( Depression) , कृ शिा ( Emaciation)
, वेदना और भ्रम ( चतकर आना Giddiness ) क
े लक्षण िोिे िैं ।
• धचककत्सा
इसमें लघु ( Light ) , जस्ननध ( Unctous ) , उष्ण और अल्प ( कम ) मात्रा में भोजन करना चाहिये ।
• अन्न को रार्णयों का राण किा गया िै- “ अन्नं वै रार्णनां राणााः ” । अत्र क
े निीं ममलने पर
जठराजनन द्वारा शरीर क
े धािुओं ( रस - रतिाहद ) और उसक
े बाद विााँ की श्लेष्मल कला (
Mucous membrane ) का भय पाचन िोने लगिा िै , जजससे उपरोति लक्षण उत्पन्न िोिे िैं , अिाः
अत्र की समुधचि व्यवस्था रखनय चाहिये ।
10.
8. तनिा (Sleep ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग और धचककत्सा-
इसक
े वेग को रोकने से मोि ( मूच्छराि- Fainting ) , मूधाि ( मशर ) और अक्षक्ष ( चक्षु ) में गुरुिा , आलस्य ,
जृजम्भभका ( जम्भभाई का आना- Yawning ) और अङ्गमदि ( Bodyache ) क
े लक्षण िोिे िैं ।
• धचककत्सा
• इसमें ठ क से सोना और संवािन ( मदिन- Massage ) करना चाहिये ।
• थक
े िुये नाडय िन्िुओं ( Nerve - fibres ) को त्तवश्राम देने क
े मलये िी तनिा की उत्पत्ति िोिय िै ।
• आचायि सुश्रुि क
े मिानुसार- " तनिाघािे त्तपबेत्क्षयरं सुप्याच्चेष्िकथारिाः । " ( सु.उ. ५५ )
अथािि ् तनिा का अवरोध ( घाि ) िोने पर दुनध पान कराकर सुन्दर - सुन्दर किातनयों को सुनाकर शयन
कराना चाहिये ।
9.कास ( Cough ) क
े वेग क
े अवरोध से उत्पन्न रोग-
इससे कास ( खांसय Cough ) की वृद्धध , श्वास ( Dyspnoea ), अरुधच ( Distaste ) और हृदय क
े रोग ( आमय
) िोिे िैं । शोष ( Emaciation ) और हिर्धमा ( हितका Hiccough ) की उत्पत्ति िोिय िै ,
धचककत्सा
इसमें कास नाशक त्तवधध को पूणि रूप से करना चाहिये ।
• चरक और सुश्रुि ने कास क
े वेगावरोध का वणिन निीं ककया िै । उद्गार का वणिन चरक , सुश्रुि ने
ककया ने िै ककन्िु यिााँ इसका वणिन निीं ककया गया िै । यिााँ कास का वणिन ककया गया िै ।
11.
10. श्रमश्वास (Dyspnoea ) क
े वेगावरोध से उत्पन्न रोग-
• श्रम से उत्पन्न श्वास को रोकने से गुल्म ( Tumour ) , हृदय रोग और सम्भमोि ( मूच्छराि- Fainting ) की
उत्पत्ति िोिय िै । इस में त्तवश्राम ( Rest ) और वािनाशक कायि ( आिार - त्तविार ) करना चाहिये ।
• दौडने या अधधक पररश्रम करने से शरीर को अधधक रति और राण वायु ( Oxygen ) की आवश्यकिा पडिय
िै , जजससे हृदय ( Heart ) और फ
ु फ्फ
ु स ( Lungs ) की गति ियव्र िो जािय िै , इस अवस्था में मनुष्य
िााँफने ( Gasping ) लगिा िै , इसे िी श्वास कििे िैं । इस श्वास को बलाि ् ( Forcely ) रोकने से राण और
उदान वायु क
ु त्तपि िोकर हृदय क
े कपािों ( Valves ) और फ
ु फ्फ
ु स क
े रोगों को उत्पन्न करिा िै ।
11.जृम्भभा ( Yawning ) क
े वेगावरोध से उत्पन्न रोग और धचककत्सा-
• इससे क्षव ( छर ंक Sneezing ) को रोकने क
े समान रोग िोिे िैं , अि : इसकी धचककत्सा क
े मलये
पूणिरूप से वािनाशक त्तवधध को अपनाना चाहिये ।
• आक्षेप, त्तवनाम ( शरीर का झुकना- Flexion of body ) , sions ) , संकोच ( अंगों में मसकु डन- Spasm ) , सुजप्ि (
Drowsiness) और शरीर में कम्भपन ( Tremor) िथा रवेपन ( िाथ - पैर में क
ं पकपािि Shivering ) क
े लक्षण िोिे िैं
। इसमें त्तवशेष रूप से ऊर्धविजत्रुगि अंगों क
े रभात्तवि िोने क
े कारण उर्धविजत्रुगि ( Clavicle ) रोगों की संभावना
िोिय िै ।
12.
12. अश्रु (Tear ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग और धचककत्सा-
वाष्प ( अश्रु ) क
े वेग को रोकने से पयनस ( रतिश्याय- Catarrh ) , अक्षक्ष ( नेत्र ) -मशरो - हृदयरोग ,
मन्यास्िम्भभ ( Torticolis) , अरुधच ( Distaste ) , भ्रम ( चतकर- Giddiness ) और गुल्म ( Tumor ) रोग की उत्पत्ति
िोिय िै । इसमें तनिा लेना , मद्य ( Alcohal ) और अच्छर कथायें सुनना चाहिये ।
13. वमन ( Vomiting ) क
े वेगावरोध से उत्पन्न रोग-
इससे त्तवसपि ( Erysipelas ) , कोठ ( त्वचा पर रति वणिन का कहठन मण्िल- Urticaria) , क
ु ष्ठ ( Skin diseases )
, नेत्र रोग , कण्िु ( Itching ) , पाण्िु ( Anaemia ) रोग ( आमय ) , ज्वर ( Fever ) , कास ( खांसय- Cough ) ,
श्वास ( Dyspnoea) , िल्लास ( ममचली- Nausea ) , व्यङ्ग और श्वयथु ( शोथ - Oedema ) क
े लक्षण उत्पन्न
िोिे िैं ।
वमन वेगावरोध से उत्पन्न रोग की धचककत्सा-
इसमें गण्िूष ' ( मुख में तवाथ या िव का इिनय मात्रा में भरना जजससे मुख में इसे घुमाया न जा सक
े ) ,
धूमपान ( Smoking ) , अनािार ( उपवास- Fasting ) , रूक्ष अन्न सेवन कर उसय का वमन करना , व्यायाम (
Exercise ) , रतिमोक्षण ( Bloodletting ) और त्तवरेचन कराना चाहिये । अभ्यंग ( Massage ) क
े मलये यवक्षार
और लवणयुति िैल उिम िै ।
13.
14. शुक्र (Semen ) क
े वेगावरोध से उत्पन्न रोग-
शुक्र का स्त्राव ( Seminal discharge ) , गुह्य वेदना ( मलङ्ग- Penis और वृषण- Testies में वेदना ) , श्वयथु (
शोथ- Oedema ) , ज्वर ( Fever ) , हृदय में पयडा , मूत्रसंग ( मूत्र का अवरोध ) , अंगभङ्ग ( Bodyache ) , वृद्धध (
अण्िवृद्धध ) , अश्मरी ( Stones ) और नपुंसकिा ( Impotency ) क
े लक्षण िोिे िैं ।
• शुक्र एक गाढा , त्तपजच्छरल , दूधधया और िरल पदाथि िै । इसका मुख्य अवयव शुक्राणु िै । यहद ककन्िीं
कारणों से क
े वेग को रोक हदया जाये िो अवरोध क
े कारण उपरोति लक्षण उत्पन्न िो जािे िैं ।
शुक्र वेगावरोध से उत्पन्न रोगों की धचककत्सा-
• इसमें िाम्रचूि ( मुगाि ) का मांर , सुरा ( Alcohal ) , शामल चावल , बजस्ि ( Enema ) , अभ्यङ्ग ( Massage )
और अवगािन ( Tub - bath ) का सेवन करना चाहिये । बजस्ि को शुद्ध करने वाले िव्यों ( क
ू ष्मांि , यवक्षार
आहद ) से मसद्ध दुनध का पान करे और त्तरय जस्त्रयों क
े साथ रिना चाहिये ।