1
Valmiki
Ramayanam
Sundara Kanda
Parayanam
Day-6
(Ch-35 to Ch-42{417Slokas})
2
पञ्चत्रिंशस्सर्गः
Hanuman further narrates his story to Sita -- Gives
description of Rama and Lakshmana
2
3
त ां तु र मकथ ां श्रुत्व , वैदेही व नरर्षभ त्।
उवाच वचनां स न्तत्व-ममदां मधुरय गिर ।।5.35.1।।
क्व ते र मेण सांसिषः, कथां जानासस लक्ष्मणम्।
व नर ण ां नर ण ां च, कथमासीत्सम िमः।।5.35.2।।
य नन र मस्य मलङ्ि नन, लक्ष्मणस्य च व नर।
त नन भूयस्समाचक्ष्व, न म ां शोकस्समाववशेत ्।।5.35.3।।
कीदृशां तस्य सांस्थ नां, रूपां र मस्य कीदृशम्।
कथमूरू कथां ब हू, लक्ष्मणस्य च शिंस मे।।5.35.4।।
एवमुक्तस्तु वैदेह्य , हनुम न्तम रुत त्मजः।
ततो र मां यथ तत्त्व-म ख्य तुमुपचक्रमे।।5.35.5।।
4
ज नन्तती बत ददष्ट्य , म ां वैदेदह परिपृच्छसस।
भतुषः कमलपत्र क्षि, सांस्थ नां लक्ष्मणस्य च।।5.35.6।।
य नन र मस्य गचह्न नन, लक्ष्मणस्य च य नन वै।
लक्षित नन ववश ल क्षि, वदतश्शृणु त नन मे।।5.35.7।।
र मः कमलपत्र ि-स्सवषसत्त्वमनोहरः।
रूपद क्षिण्यसम्पन्तनः, प्रसूतो जनक त्मजे।।5.35.8।।
तेजस ऽददत्य सङ्क शः, िमय पृगथवीसमः।
बृहस्पनतसमो बुद्ध्य , यशस व सवोपमः।।5.35.9।।
रक्षित जीवलोकस्य, स्वजनस्य मभरक्षित ।
रक्षित स्वस्य वृत्तस्य, धमषस्य च परन्ततपः।।5.35.10।।
5
र मो भ ममनन लोकस्य, च तुवषण्यषस्य रक्षित ।
मय षद न ां च लोकस्य, कत ष क रनयत च सः।।5.35.11।।
अगचषष्टम नगचषतोऽत्यथं, ब्रह्मचयषव्रते स्स्थतः।
स धून मुपक रज्ञः, प्रच रज्ञश्च कमषण म्।।5.35.12।।
र जववद्धय ववनीतश्च, ब्र ह्मण न मुप मसत ।
श्रुतव न्तशीलसम्पन्तनो, ववनीतश्च परन्ततपः।।5.35.13।।
यजुवेदववनीतश्च, वेदववद्धमभस्सुपूस्जतः।
धनुवेदे च वेदेर्ु, वेद ङ्िेर्ु च ननस्ष्टितः।।5.35.14।।
ववपुल ांसो मह ब हुः, कम्बुग्रीवश्शुभ ननः।
िूढजरुस्सुत म्र िो, र मो देवव जनैश्श्रुतः*।।5.35.15।।
6
दुन्तदुमभस्वनननर्घोर्, स्स्स्नग्धवणषः प्रत पव न्।
समस्समववभक्त ङ्िो, वणं श्य मां सम गश्रतः।।5.35.16।।
त्ररस्स्थरस्स्रप्रलम्बश्च, त्ररसमस्स्रर्ु चोन्तनतः।
त्ररत म्रस्स्रर्ु च स्स्नग्धो, िम्भीरस्स्रर्ु ननत्यशः।।17।।
त्ररवलीव ांस््यवन-तश्चतुर्वयषङ्िस्स्रशीर्षव न्।
चतुष्टकलश्चतुलेख-श्चतुस्ष्टकष्टक
ु श्चतुस्समः।।5.35.18।।
चतुदषशसमद्धवन्तद्धव-श्चतुदंष्टरश्चतुिषनतः।
महोष्टिहनुन सश्च, पञ्चस्स्नग्धोऽष्टटवांशव न्।।5.35.19।।
दशपद्धमो दशबृह-स्त्रमभर्वय षप्तो द्धववशुक्लव न्।
र्डुन्तनतो नवतनु-स्स्रमभर्व्ागप्नोतत र र्घवः।।5.35.20।।
7
सत्यधमषपरश्श्रीम न्, सङ्ग्रह नुग्रहे रतः।
देशक लववभ िज्ञ-स्सवषलोकवप्रयांवदः।।5.35.21।।
भ्र त तस्य च द्धवैम र-स्सौममत्रररपर स्जतः।
अनुर िेण रूपेण, िुणैश्चैव तथ ववधः।।5.35.22।।
त वुभौ नरश दूषलौ, त्वद्धदशषनसमुत्सुकौ।
ववगचन्तवन्ततौ महीां कृ त्स्न -मस्म मभरमभसङ्ितौ।।23।।
त्व मेव म िषम णौ तौ, ववचरन्ततौ वसुन्तधर म्।
ददशगतुमृगिपनतां, पूवषजेन वरोवपतम्।।5.35.24।।
ऋश्यमूकस्य पृष्टिे तु, बहुप दपसङ्क
ु ले।
भ्र तुभषय तषम सीनां, सुग्रीवां वप्रयदशषनम्।।5.35.25।।
8
वयां तु हररर जां तां, सुग्रीवां सत्यसङ्िरम्।
पररचय षमहे र ज्य -त्पूवषजेन वरोवपतम्।।5.35.26।।
ततस्तौ चीरवसनौ, धनुः प्रवरप णणनौ।
ऋश्यमूकस्य शैलस्य, रम्यां देशमुप ितौ।।5.35.27।।
स तौ दृष्ट्व नरर्वय घ्रौ, धस्न्तवनौ व नरर्षभः।
अवप्लुतो गिरेस्तस्य, मशखरां भयमोदहतः।।5.35.28।।
ततस्स मशखरे तस्स्म-न्तव नरेन्तरो र्वयवस्स्थतः।
तयोस्समीपां म मेव, प्रेष्ामास सत्वरम्।।5.35.29।।
त वहां पुरुर्र्वय घ्रौ, सुग्रीववचन त्प्रभू।
रूपलिणसम्पन्तनौ, कृ त ञ्जमलरुपस्स्थतः।।5.35.30।।
9
तौ पररज्ञ ततत्त्व थौ, मय प्रीनतसमस्न्तवतौ।
पृष्टिम रोप्य तां देशां, प्र वपतौ पुरुर्र्षभौ।।5.35.31।।
ननवेददतौ च तत्त्वेन, सुग्रीव य मह त्मने।
तयोरन्तयोन्तयसल्ल प -द्धभृशां प्रीनतिजा्त।।5.35.32।।
ततस्तौ प्रीनतसम्पन्तनौ, हरीश्वरनरेश्वरौ।
परस्परकृ त श्व सौ, कथय पूवषवृत्तय ।।5.35.33।।
ततस्स सान्तत्व्ामास, सुग्रीवां लक्ष्मण ग्रजः।
स्रीहेतोव षमलन भ्र र , ननरस्तमुरुतेजस ।।5.35.34।।
ततस्त्वन्तन शजां शोक
ां , र मस्य स्क्लष्टटकमषणः।
लक्ष्मणो व नरेन्तर य, सुग्रीव य न्त्वेद्त्।।5.35.35।।
10
स श्रुत्व व नरेन्तरस्तु, लक्ष्मणेनेररतां वचः।
तद सीस्न्तनष्टप्रभोऽत्यथं, ग्रहग्रस्त इव ांशुम न्।।5.35.36।।
ततस्त्वद्धि रशोभीनन, रिस दियम णय ।
य न्तय भरणज ल नन, प नतत नन महीतले।।5.35.37।।
त नन सव षणण र म य, आनीय हररयूथप ः।
सांहृष्टट दशग्ामासु-र्गनतां तु न ववदुस्तव।।5.35.38।।
त नन र म य दत्त नन, मयैवोपहृत नन च।
स्वनवन्तत्यवकीण षनन, तस्स्मस्न्तवितचेतमस।।5.35.39।।
त न्तयङ्क
े दशषनीय नन, कृ त्व बहुववधां तव।
तेन देवप्रक शेन, देवेन पररदेववतम ्।।5.35.40।।
11
पश्यतस्त नन रुदत-स्त म्यतश्च पुनः पुनः।
प्र दीपयन्तद शरथे-स्त नन शोकहुत शनम्।।5.35.41।।
शनयतां च गचरां तेन, दुःख तेन मह त्मन ।
मय वप ववववधैव षक्यैः, कृ च्छ्र दुत्थ वपतः पुनः।।5.35.42।।
त नन दृष्ट्व मह ब हु-दषशषनयत्व मुहुमुषहुः।
र र्घवस्सह सौममत्रर-स्सुग्रीवे स न्त्वेद्त्।।5.35.43।।
स तव दशषन द ये, र र्घवः परितप््ते।
महत ज्वलत ननत्य-मस्ग्ननेव स्ग्नपवषतः।।5.35.44।।
त्वत्कृ ते तमननर च, शोकस्श्चन्तत च र र्घवम्।
ताप्न्न्तत मह त्म न-मग्न्तयि रममव ग्नयः।।5.35.45।।
12
तव दशषनशोक
े न, र र्घवः प्रववचाल््ते।
महत भूममकम्पेन, मह ननव मशलोच्छ्चयः।।5.35.46।।
क नन नन सुरम्य णण, नदीः प्रस्रवण नन च।
चरन्तन रनतमाप्नोतत, त्व मपश्यन्तनृप त्मजे।।5.35.47।।
स त्व ां मनुजश दूषलः, क्षिप्रां प्राप्स््तत र र्घवः।
सममरब न्तधवां हत्व , र वणां जनक त्मजे।।5.35.48।।
सदहतौ र मसुग्रीव -वुभ वक
ु रुत ां तद ।
समयां व मलनां हन्ततुां, तव च न्तवेर्णां तथ ।।5.35.49।।
ततस्त भय ां क
ु म र भय ां, वीर भय ां स हरीश्वरः।
ककस्ष्टकन्तध ां समुप िम्य, व ली युद्धधे ननप नततः।।50।।
13
ततो ननहत्य तरस , र मो व मलनम हवे।
सवषिषहररसङ्र्घ न ां, सुग्रीवमकरोत्पनतम्।।5.35.51।।
र मसुग्रीवयोरैक्यां, देर्वयेवां समजा्त।
हनुमन्ततां च म ां ववद्धगध, तयोदूषतममह ितम्।।5.35.52।।
स्वर ज्यां प्र प्य सुग्रीव-स्सम नीय हरीश्वर न्।
त्वदथं प्रेष्ामास, ददशो दश मह बल न्।।5.35.53।।
आददष्टट व नरेन्तरेण, सुग्रीवेण महौजस ।
अदरर जप्रतीक श -स्सवषतः प्रस्स्थतौ महीम्।।5.35.54।।
ततस्ते म िषम ण वै, सुग्रीववचन तुर ः।
चिन्न्तत वसुध ां कृ त्स्न ां, वयमन्तये च व नर ः।।5.35.55।।
14
अङ्िदो न म लक्ष्मीव -न्तव मलसूनुमषह बलः।
प्रस्स्थतः कवपश दूषल-स्स्रभ िबलसांवृतः।।5.35.56।।
तेर् ां नो ववप्रणष्टट न ां, ववन्त्ये पवषतसत्तमे।
भृशां शोकपरीत न -महोर रिण ित ः।।5.35.57।।
ते वयां क यषनैर श्य -त्क लस्य नतक्रमेण च।
भय च्छ्च कवपर जस्य, प्र ण ांस्त्यक्तुां र्वयवस्स्थत ः।।58।।
ववगचत्य वनदुि षणण, गिररप्रस्रवण नन च।
अन स द्धय पदां देर्वय ः, प्र ण ांस्त्यक्तुां समुद्धयत ः।।59।।
दृष्ट्व प्र योपववष्टट ांश्च, सव षन्तव नरपुङ्िव न्।
भृशां शोक णषवे मग्नः, पयषदेवयदङ्िदः।।5.35.60।।
15
तव न शां च वैदेदह, व मलनश्च वधां तथ ।
प्र योपवेशमस्म क
ां , मरणां च जट युर्ः।।5.35.61।।
तेर् ां नस्व ममसन्तदेश -स्न्तनर श न ां मुमूर्षत म्।
क यषहेतोररव य त-श्शक
ु ननवीयषव न्तमह न्।।5.35.62।।
िृध्रर जस्य सोदयषः, सम्प नतन षम िृध्रर ्।
श्रुत्व भ्र तृवधां कोप -दददां वचनमब्रवीत्।।5.35.63।।
यवीय न्तक
े न मे भ्र त , हतः क्व च ननप नततः।
एतद ख्य तुसमच्छासम, भवद्धमभव षनरोत्तम ः।।5.35.64।।
अङ्िदोऽकथयत्तस्य, जनस्थ ने महद्धवधम्।
रिस भीमरूपेण, त्व मुद्धददश्य यथ तथम्।।5.35.65।।
16
जट युर्ो वधां श्रुत्व , दुःणखतस्सोऽरुण त्मजः।
त्व ां शशिंस वर रोहे, वसन्ततीां र वण लये।।5.35.66।।
तस्य तद्धवचनां श्रुत्व , सम्प तेः प्रीनतवधषनम्।
अङ्िदप्रमुख स्तूणं, ततस्सम्प्रस्स्थत वयम्।।5.35.67।।
ववन्त्य दुत्थ य सम्प्र प्त -स्स िरस्य न्ततमुत्तरम्*।
त्वद्धधशषनकृ तोत्स ह , हृष्टट स्तुष्टट ः प्लवङ्िम ः।।68।।
अङ्िदप्रमुख स्सवे, वेलोप न्ततमुपस्स्थत ः।
गचन्तत ां जगमुः पुनभीत -स्त्वद्धदशषनसमुत्सुक ः।।5.35.69।
अथ हां हररसैन्तयस्य, स िरां प्रेक्ष्य सीदतः।
र्वयवधूय भयां तीव्रां, योजन न ां शतां प्लुतः।।5.35.70।।
17
लङ्क च वप मय र रौ, प्रववष्टट र िस क
ु ल ।
र वणश्च मय दृष्टट-स्त्वां च शोकपररप्लुत ।।5.35.71।।
एतत्ते सवषम ख्य तां, यथ वृत्तमनस्न्तदते।
असििाषस्व म ां देवव, दूतो द शरथेरहम्।।5.35.72।।
तां म ां र मकृ तोद्धयोिां, त्वस्न्तनममत्तममह ितम्।
सुग्रीवसगचवां देवव, बुद्ध्यस्व पवन त्मजम्।।5.35.73।।
क
ु शली तव क क
ु त्स्थ-स्सवषशस्रभृत ां वरः।
िुरोर र धने युक्तो, लक्ष्मणश्च सुलिणः।।5.35.74।।
तस्य वीयषवतो देवव, भतुषस्तव दहते रतः।
अहमेकस्तु सम्प्र प्त-स्सुग्रीववचन ददह*।।5.35.75।।
18
मयेयमसह येन, चरत क मरूवपण ।
दक्षिण ददिनुक्र न्तत , त्वन्तम िषववचयैवर्ण ।।5.35.76।।
ददष्ट्य हां हररसैन्तय न ां, त्वन्तन शमनुशोचत म्।
अपनेष््ासम सन्तत पां, तव मभिमशांसन त्।।5.35.77।।
ददष्ट्य दह मम न र्वयथं, देवव स िरलङ्र्घनम्।
प्राप्स््ाम््हममदां ददष्ट्य , त्वद्धदशषनकृ तां यशः।।5.35.78।।
र र्घवश्च मह वीयषः, क्षिप्रां त्व मसिपत्स््ते।
सममरब न्तधवां हत्व , र वणां र िस गधपम्।।5.35.79।।
म ल्यव न्तन म वैदेदह, गिरीण मुत्तमो गिररः।
ततो र्च्छतत िोकणं, पवषतां क
े सरी हररः।।5.35.80।।
19
स च देववर्षमभददषष्टटः, वपत मम मह कवपः।
तीथे नदीपतेः पुण्ये, शम्बस दनमुद्धधरत्।।5.35.81।।
तस्य हां हररणः िेरे, ज तो व तेन मैगथमल।
हनुम नननत ववख्य तो, लोक
े स्वेनैव कमषण ।।5.35.82।।
ववश्व स थं तु वैदेदह, भतुषरुक्त मय िुण ः।
अगचर र र्घवो देवव, त्व ममतो ननयत ऽनर्घे।।5.35.83।।
एवां ववश्व मसत सीत , हेतुमभश्शोककमशषत ।
उपपन्तनैरमभज्ञ नैदूषतां, तमवर्च्छतत।।5.35.84।।
अतुलां च ित हर्ं, प्रहर्ेण च ज नकी।
नेर भय ां वक्रपक्ष्म भय ां, मुमोचानन्तदजां जलम्।।5.35.85।।
20
च रु तद्धवदनां तस्य -स्त म्रशुक्ल यतेिणम्।
अशोित ववश ल क्ष्य , र हुमुक्त इवोडुर ्।।5.35.86।।
हनुमन्ततां कवपां र्वयक्तां, मन्तयते न न्तयथेनत स ।
अथोवाच हनूम ांस्त -मुत्तरां वप्रयदशषन म्।।5.35.87।।
एतत्ते सवषम ख्य तां, सम श्वमसदह मैगथमल।
ककां किोसम कथां व ते, िोचते प्रतत्ाम््हम्।।5.35.88।।
हतेऽसुरे सांयनत शम्बस दने, कवपप्रवीरेण महवर्षचोदन त्।
ततोऽन्स्म व युप्रभवो दह मैगथमल, प्रभ वतस्तत्प्रनतमश्च
व नरः।। 5.35.89 ।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे
पञ्चत्ररांशस्सिषः।।
21
षट्तत्रिंशस्सर्गः
Hanuman hands over the signet ring to Sita
22
भूय एव मह तेज , हनूम न्तपवन त्मजः।
अब्रवीत्प्रगश्रतां व क्यां, सीत प्रत्ययक रण त्।।5.36.1।।.
व नरोऽहां मह भ िे, दूतो र मस्य धीमतः।
र मन म ङ्ककतां चेदां, पश्् देर्वयङ्िुलीयकम्।।5.36.2।।
प्रत्यय थं तव ऽनीतां, तेन दत्तां मह त्मन ।
सम श्वमसदह भरां ते, िीणदुःखफल ह््सस।।5.36.3।।
िृहीत्व प्रेिम ण स , भतुषः करववभूर्णम्।
भत षरममव सम्प्र प्त , ज नकी मुददत ऽिवत्।।5.36.4।।
च रु तद्धवदनां तस्य -स्त म्रशुक्ल यतेिणम्।
अशोित ववश ल क्ष्य , र हुमुक्त इवोडुर ्।।5.36.5।।
23
ततस्स िीमती ब ल , भतृषसन्तदेशहवर्षत ।
पररतुष्टट वप्रयां कृ त्व , प्रशशिंस मह कवपम्।।5.36.6।।
ववक्र न्ततस्त्वां समथषस्त्वां, प्र ज्ञस्त्वां व नरोत्तम।
येनेदां र िसपदां, त्वयैक
े न प्रधवर्षतम्।।5.36.7।।
शतयोजनववस्तीणष-स्स िरो मकर लयः।
ववक्रमश्ल र्घनीयेन, क्रमत िोष्टपदीकृ तः।।5.36.8।।
न दह त्व ां प्र कृ तां मन्त्े, व नरां व नरर्षभ।
यस्य ते नान्स्त सन्तर सो, र वण न्तन वप सम्भ्रमः।।5.36.9।
अर्गसे च कवपश्रेष्टि, मय सममभभ वर्तुम्।
यद््सस प्रेवर्तस्तेन, र मेण ववददत त्मन ।।5.36.10।।
24
प्रेषत्ष््तत दुधषर्ो, र मो न ह्यपरीक्षितम्।
पर क्रममववज्ञ य, मत्सक शां ववशेर्तः।।5.36.11।।
ददष्ट्य च क
ु शली र मो, धम षत्म सत्यसङ्िरः।
लक्ष्मणश्च मह तेज -स्सुममर नन्तदवधषनः।।5.36.12।।
क
ु शली यदद क क
ु त्स्थः, ककां नु स िरमेखल म्।
महीां दर्तत कोपेन, युि न्तत स्ग्नररवोस्त्थतः।।5.36.13।।
अथव शस्क्तमन्ततौ तौ, सुर ण मवप ननग्रहे।
ममैव तु न दुःख न -मन्स्त मन्त्े ववपयषयः।।5.36.14।।
कस्च्छ्चन्तन र्वयगथतो र मः, कस्च्छ्चन्तन परितप््ते।
उत्तर णण च क य षणण, क
ु रुते पुरुर्ोत्तमः।।5.36.15।।
25
कस्च्छ्चन्तन दीनस्सम्भ्र न्ततः, क येर्ु न च मुह््तत।
कस्च्छ्चत्पुरुर्क य षणण, क
ु रुते नृपतेस्सुतः।।5.36.16।।
द्धववववधां त्ररववधोप य-मुप यमवप सेवते।
ववन्जर्ीषुस्सुहृत्कस्च्छ्च-स्न्तमरेर्ु च परन्ततपः।।5.36.17।।
कस्च्छ्चस्न्तमर णण लिते, ममरैश्च प््सिर्म््ते।
कस्च्छ्चत्कल्य णममत्रश्च, ममरत्रैश्च वप पुरस्कृ तः।।18।।
कस्च्छ्चद श स्स्त देव न ां, प्रस दां प गथषव त्मजः।
कस्च्छ्चत्पुरुर्क रां च, दैवां च प्रततपद््ते।।5.36.19।।
कस्च्छ्चन्तन ववितस्नेहः, प्रव स न्तमनय र र्घवः।
कस्च्छ्चन्तम ां र्वयसन दस्म -न्तमोक्षत्ष््तत व नर।।5.36.20।
26
सुख न मुगचतो ननत्य-मसुख न मनौगचतः।
दुःखमुत्तरम स द्धय, कस्च्छ्चर मो न सीदतत।।5.36.21।।
कौसल्य य स्तथ कस्च्छ्च-त्सुममर य स्तथैव च।
अभीक्ष्णां श्रू्ते कस्च्छ्च-त्क
ु शलां भरतस्य च।।5.36.22।।
मस्न्तनममत्तेन म न हषः, कस्च्छ्चच्छ्छोक
े न र र्घवः।
कस्च्छ्चन्तन न्तयमन र मः, कस्च्छ्चन्तम ां ताित्ष््तत।।23।।
कस्च्छ्चदिौदहणीां भीम ां, भरतो भ्र तृवत्सलः।
्वस्जनीां मस्न्तरमभिुषप्त ां, प्रेषत्ष््तत मत्कृ ते।।5.36.24।।
व नर गधपनतश्शीम -न्तसुग्रीवः कस्च्छ्चदेष््तत।
मत्कृ ते हररमभवीरैवृषतो, दन्ततनख युधैः।।5.36.25।।
27
कस्च्छ्चच्छ्छ लक्ष्मणश्शूर-स्सुममर नन्तदवधषनः।
अस्रववच्छ्छरज लेन, र िस न्न्तवधसमष््तत।।5.36.26।।
रौरेण कस्च्छ्चदस्रेण, ज्वलत ननहतां रणे।
द्रक्ष््ाम््ल्पेन क लेन, र वणां ससुहृज्जनम्।।5.36.27।।
कस्च्छ्चन्तन तद्धधेमसम नवणं, तस्य ननां पद्धमसम निस्न्तध।
मय ववन शुष््तत शोकदीनां, जलिये
पद्धमममव तपेन।।28।।
धम षपदेश त्त्यजतश्च र ज्यां म ां, च प्यरण्यां नयतः पद नतम्।
नासीद्र्व्थ यस्य न भीनष शोकः,
कस्च्छ्चत्स धैयं हृदये किोतत।29।।
28
न च स्य म त न वपत च न न्तयः,
स्नेह द्धववमशष्टटोऽन्स्त मय समो व ।
त वत्त्वहां दूत स्जजीववर्ेयां,
य वत्प्रवृवत्तां शृणुय ां वप्रयस्य।।5.36.30।।
इतीव देवी वचनां मह थं, तां व नरेन्तरां मधुर थषमुक्त्व ।
श्रोतुां पुनस्तस्य वचोऽमभर मां, र म थषयुक्तां ववरर म र म ।।
सीत य वचनां श्रुत्व , म रुनतभीमववक्रमः।
मशरस्यञ्जमलम ध य, व क्यमुत्तरमब्रवीत्।।5.36.32।।
न त्व ममहस्थ ां ज नीते, र मः कमललोचने।
तेन त्व ां नान्त््ाशु, शचीममव पुरन्तदरः।।5.36.33।।
29
श्रुत्वैव तु वचो मह्यां, क्षिप्रमेष््तत र र्घवः।
चमूां प्रकर्षन्तमहतीां, हयृषििणसङ्क
ु ल म्।।5.36.34।।
ववष्टटम्भनयत्व ब णौर्घै-रिोभयां वरुण लयम्।
करिष््तत पुरीां लङ्क ां, क क
ु त्स्थः श न्ततर िस म्।।35।।
तर यद्धयन्ततर मृत्यु-यषदद देव स्सह सुर ः।
स्थास््न्न्तत पगथ र मस्य, स त नवप वधधष््तत।।5.36.36।
तव दशषनजेन ये, शोक
े न स पररप्लुतः।
न शमष लिते र म-स्स्सांह ददषत इव द्धववपः।।5.36.37।।
मलयेन च ववन्त्येन, मेरुण मन्तदरेण च।
ददुषरेण च ते देवव, शपे मूलफलेन च।।5.36.38।।
30
यथ सुनयनां वल्िु, त्रबम्बोष्टिां च रु क
ु ण्डलम्।
मुखां द्रक्ष््सस र मस्य, पूणषचन्तरममवोददतम्।।5.36.39।।
क्षिप्रां द्रक्ष््सस वैदेदह, र मां प्रस्रवणे गिरौ।
शतक्रतुममव सीनां, न िर जस्य मूधषनन।।5.36.40।।
न म ांसां र र्घवो िुङक्ते, न च ऽवप मधु सेवते।
वन्तयां सुववदहतां ननत्यां, भक्तमश्नातत पञ्चमम्।।5.36.41।।
नैव दांश न्तन मशक न्तन, कीट न्तन सरीसृप न्।
र र्घवोऽपनयेद्धि र -त्त्वद्धितेन न्ततर त्मन ।।5.36.42।।
ननत्यां ्य नपरो र मो, ननत्यां शोकपर यणः।
न न्तयन्च्चन्तत्ते ककस्ञ्च-त्स तु क मवशां ितः।।5.36.43।।
31
अननरस्सततां र म-स्सुप्तोऽवप च नरोत्तमः।
सीतेनत मधुर ां व णीां, र्वय हरन्तप्रततबुध््ते।।5.36.44।।
दृष्ट्व फलां व पुष्टपां व , यद्धव ऽन्तयत्सुमनोहरम्।
बहुशो ह वप्रयेत्येवां, श्वसांस्त्व मसििाषते।।5.36.45।।
स देवव ननत्यां पररतप्यम न-स्त्व मेव सीतेत्यमभभ र्म णः।
धृतव्रतो र जसुतो मह त्म , तवैव ल भ य कृ तप्रयत्नः।।46।
स र मसङ्कीतषनवीतशोक , र मस्य शोक
े न सम नशोक ।
शरन्तमुखे स म्बुदशेर्चन्तर , ननशेव वैदेहसुत बिूव।।47।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे
र््त्ररांशस्सिषः।।
32
सप्तत्रिंशस्सर्गः
Hanuman offers to carry Sita back to Rama Sita
politely Sita declines -- appeals to Hanuman to get
Rama to take her
32
33
सीत तद्धवचनां श्रुत्व , पूणषचन्तरननभ नन ।
हम मन्ततमुवाचेदां, धम षथषसदहतां वचः।।5.37.1।।
अमृतां ववर्सांसृष्टटां, त्वय व नर भ वर्तम्।
यच्छ्च न न्तयमन र मो, यच्छ्च शोकपर यणः ।।5.37.2।।
ऐश्वये व सुववस्तीणे, र्वयसने व सुद रुणे।
रज्ज्वेव पुरुर्ां बद्ध्व , कृ त न्ततः पररकर्षनत।।5.37.3।।
ववगधनूषनमसांह यषः, प्र णणन ां प्लविोत्तम।
सौममत्ररां म ां च र मां च, र्वयसनै: पश्् मोदहत न्।।5.37.4।।
शोकस्य स्य कद प रां, र र्घवोऽधधर्समष््तत।
प्लवम नः पररश्र न्ततो, हतनौस्स िरे यथ ।।5.37.5।।
34
र िस न ां वधां कृ त्व , सूदनयत्व च र वणम्।
लङ्क मुन्तमूमलत ां कृ त्व , कद द्रक्ष््तत म ां पनतः।।5.37.6।।
स व च्छ्यस्सांत्वरस्वेनत, य वदेव न पू्गते।
अयां सांवत्सरः क ल-स्त वद्धगध मम जीववतम्।।5.37.7।।
वतषते दशमो म सो, द्धवौ तु शेर्ौ प्लवङ्िम।
र वणेन नृशांसेन, समयो यः कृ तो मम।।5.37.8।।
ववभीर्णेन च भ्र र , मम ननय षतनां प्रनत।
अनुनीतः प्रयत्नेन, न च तत्क
ु रुते मनतम्।।5.37.9।।
मम प्रनतप्रद नां दह, र वणस्य न िोचते।
र वणां म िषते सांख्ये, मृत्युः क लवशां ितम्।।5.37.10।।
35
ज्येष्टि कन्तय नल न म, ववभीर्णसुत कपे।
तय ममेदम ख्य तां, म र प्रदहतय स्वयम्।।5.37.11।।
असांशयां हररश्रेष्टि, क्षिप्रां म ां प्राप्स््ते पनतः।
अन्ततर त्म च मे शुद्धध-स्तस्स्मांश्च बहवो िुण ः।।12।।
उत्स हः पौरुर्ां सत्त्व-म नृशांस्यां कृ तज्ञत ।
ववक्रमश्च प्रभ वश्च, सस्न्तत व नर र र्घवे।।5.37.13।।
चतुदषशसहस्र णण, र िस न ां जघान यः।
जनस्थ ने ववन भ्र र , शरुः कस्तस्य नोद्ववजेत्।।14।।
न स शक्यस्तुलनयतुां, र्वयसनैः पुरुर्र्षभः।
अहां तस्य प्रभ वज्ञ , शक्रस्येव पुलोमज ।।5.37.15।।
36
शरज ल ांशुम न्तशूरः, कपे र मददव करः।
शरुरिोमयां तोय-मुपशोर्ां नत्ष््तत।।5.37.16।।
इनत सञ्जल्पम न ां त ां, र म थे शोककमशषत म ्।
आश्रुसम्पूणषनयन -मुवाच वचनां कवपः।।5.37.17।।
श्रुत्वैव तु वचो मह्यां, क्षिप्रमेष््तत र र्घवः।
चमूां प्रकर्षन्तमहतीां, हयृषििणसङ्क
ु ल म ्।।5.37.18।।
अथव मोचत्ष््ासम, त्व मद्धयैव वर नने।
अस्म द्धधुःख दुप रोह, मम पृष्टिमननस्न्तदते।।5.37.19।।
त्व ां दह पृष्टिित ां कृ त्व , सन्ततरिष््ासम स िरम ्।
शस्क्तिन्स्त दह मे वोढुां, लङ्क मवप सर वण म ्।।20।।
37
अहां प्रस्रवणस्थ य, र र्घव य द्धय मैगथमल।
प्रापत्ष््ासम शक्र य, हर्वयां हुतममव नलः।।5.37.21।।
रक्ष्यस्यद्धवैव वैदेदह, र र्घवां सहलक्ष्मणम्।
र्वयवस यसम युक्तां, ववष्टणुां दैत्यवधे यथ ।।5.37.22।।
त्वद्धदशषनकृ तोत्स ह-म श्रमस्थां मह बलम्।
पुरन्तदरममव सीनां, न िर जस्य मूधषनन।।5.37.23।।
पृष्टिम रोह मे देवव, म ववकाङ्क्क्षस्व शोभने।
योिमस्न्तवच्छ्छ र मेण, शश ङ्क
े नेव रोदहणी।।5.37.24।।
कथयन्ततीव चन्तरेण, सूयेण च मह गचषर् ।
मत्पृष्टिमगधरुह्य त्वां, तर क शमह णषवौ।।5.37.25।।
38
न दह मे सम्प्रय तस्य, त्व ममतो नयतोऽङ्िने।
अनुिन्ततुां िनतां शक्त -स्सवे लङ्क ननव मसनः।।5.37.26।।
यथैव हममह प्र प्त-स्तथैव हमसांशयः।
्ास््ासम पश्य वैदेदह, त्व मुद्धयम्य ववह यसम्।।5.37.27।
मैगथली तु हररश्रेष्टि -च्छ्ुत्व वचनमद्धभुतम्।
हर्षववस्स्मतसव षङ्िी, हनुमन्ततमथाब्रवीत्।।5.37.28।।
हनुमन्तदूरम्व नां, कथां म ां वोढुसमच्छसस।
तदेव खलु ते मन्तये, कवपत्वां हररयूथप।।5.37.29।।
कथां व ल्पशरीरस्त्वां, म ममतो नेतुसमच्छसस।
सक शां म नवेन्तरस्य, भतुषमे प्लविर्षभ।।5.37.30।।
39
सीत य वचनां श्रुत्व , हनुम न्तम रुत त्मजः।
धचन्तत्ामास लक्ष्मीव -न्तनवां पररभवां कृ तम्।।5.37.31।।
न मे जानातत सत्त्वां व , प्रभ वां व ऽमसतेिण ।
तस्म त्पश््तु वैदेही, यरूपां मम क मतः।।5.37.32।।
इनत सस्ञ्चन्तत्य हनुम ां-स्तद प्लविसत्तमः।
दशग्ामास वैदेह्य -स्स्वरूपमररमदषनः।।5.37.33।।
स तस्म त्प दप द्धधी-म न प्लुत्य प्लविर्षभः।
ततो वगधषतुम रेभे, सीत प्रत्ययक रण त्।।5.37.34।।
मेरुमन्तदरसङ्क शो, बिौ दीप्त नलप्रभः।
अग्रतो र्वयवतस्थे च, सीत य व नरोत्तमः।।5.37.35।।
40
हररः पवषतसङ्क श-स्त म्रवक्रो मह बलः।
वज्रदांष्टरनखो भीमो, वैदेहीममदमब्रवीत्।।5.37.36।।
सपवषतवनोद्धदेश ां, स ्टप्र क रतोरण म्।
लङ्क ममम ां सन थ ां व , ननयतुां शस्क्तिन्स्त मे।।5.37.37।।
तदवस्थ प्यत ां बुद्धगध-रलां देवव ववक ङ्िय ।
ववशोक
ां क
ु रु वैदेदह, र र्घवां सहलक्ष्मणम्।।5.37.38।।
तां दृष्ट्व भीमसङ्क श-मुवाच जनक त्मज ।
पद्धमपरववश ल िी, म रुतस्यौरसां सुतम्।।5.37.39।।
तव सत्त्वां बलां चैव, ववजानासम मह कपे।
व योररव िनतां चैव, तेजश्च ग्नेररव द्धभुतम्।।5.37.40।।
41
प्र कृ तोऽन्तयः कथां चेम ां, भूममम िन्ततुमर्गतत।
उदधेरप्रमेयस्य, प रां व नरपुङ्िव।।5.37.41।।
जानासम िमने शस्क्तां, नयने च वप ते मम।
अवश्यां सम्प्रध य षशु, क यषमसद्धगधमषह त्मनः।।5.37.42।।
अयुक्तां तु कवपश्रेष्टि, मम िन्ततुां त्वय ऽनर्घ।
व युवेिसवेिस्य, वेिो म ां मोहयेत्तव।।5.37.43।।
अहम क शम पन्तन , ह्युपयुषपरर स िरम्।
प्रपतेयां दह ते पृष्टि -द्धभय द्धवेिेव िच्छ्छतः।।5.37.44।।
पनतत स िरे च हां, नतममनक्रझर् क
ु ले।
भवेयम शु वववश , य दस मन्तनमुत्तमम्।।5.37.45।।
42
न च शक्ष््े त्वय स धं, िन्ततुां शरुववन शन।
कलरवनत सन्तदेह-स्त्वय्यवप स्य दसांशयः।।5.37.46।।
दियम ण ां तु म ां दृष्ट्व , र िस भीमववक्रम ः।
अनुिच्छ्छेयुर ददष्टट , र वणेन दुर त्मन ।।5.37.47।।
तैस्त्वां पररवृतश्शूरै-श्शूलमुद्धिरप णणमभः।
भवेस्त्वां सांशयां प्र प्तो, मय वीर कलरव न्।।5.37.48।।
स युध बहवो र्वयोस्म्न, र िस स्त्वां ननर युधः।
कथां शक्ष््सस सांय तुां, म ां चैव परररक्षितुम्।।5.37.49।।
यु्यम नस्य रिोमभ-स्तव तैः क्र
ू रकमषमभः।
प्रपतेयां दह ते पृष्टि -द्धभय त ष कवपसत्तम।।5.37.50।।
43
अथ रि ांमस भीम नन, मह स्न्तत बलवस्न्तत च।
कथस्ञ्चत्स ांपर ये त्व ां, ज्े्ुः कवपसत्तम।।5.37.51।।
अथव यु्यम नस्य, पतेयां ववमुखस्य ते।
पनतत ां च िृहीत्व म ां, न्े्ुः प पर िस ः।।5.37.52।।
म ां व र्िे्ुस्त्वद्धधस्त -द्धववशसेयुरथ वप व ।
अर्वयवस्थौ दह दृश्येते, युद्धधे जयपर जयौ।।5.37.53।।
अहां व वप ववपद्धयेयां, रिोमभरमभतस्जषत ।
त्वत्प्रयत्नो हररश्रेष्टि, भवेस्न्तनष्टफल एव तु।।5.37.54।।
क मां त्वमसस पय षप्तो, ननहन्ततुां सवषर िस न्।
र र्घवस्य यशो र्ी्े-त्त्वय शस्तैस्तु र िसैः।।5.37.55।।
44
अथव ऽद य रि ांमस, न्त्से्ुस्सम्वृते दह म म ्।
यर ते नासिजानी्ु-र्गरयो न वप र र्घवौ।।5.37.56।।
आरम्भस्तु मदथोऽयां, ततस्तव ननरथषकः।
त्वय दह सह र मस्य, मह न िमने िुणः।।5.37.57।।
मनय जीववतम यत्तां, र र्घवस्य मह त्मनः।
भ्र रूण ां च मह ब हो, तव र जक
ु लस्य च।।5.37.58।।
तौ ननर शौ मदथं तु, शोकसन्तत पकमशषतौ।
सह सवषिषहररमभ-स्त्यक्ष्यतः प्र णसङ्ग्रहम्।।5.37.59।।
भतुषभषस्क्तां पुरस्कृ त्य, र म दन्तयस्य व नर।
न स्पृशासम शरीरां तु, पुांसो व नरपुङ्िव।।5.37.60।।
45
यदहां ि रसांस्पशं, र वणस्य बल द्धित ।
अनीश ककां करिष््ासम, ववन थ वववश सती।।5.37.61।।
यदद र मो दशग्रीव-ममह हत्त्व सब न्तधवम्।
म ममतो िृह्य र्च्छेत, तत्तस्य सदृशां िवेत्।।5.37.62।।
श्रुत दह दृष्टट श्च मय पर क्रम ,
मह त्मनस्तस्य रण वमददषनः।
न देविन्तधवषभुजङ्िर िस ,
िवन्न्तत र मेण सम दह सांयुिे ।63।।
समीक्ष्य तां सांयनत गचरक मुषकम्,
मह बलां व सवतुल्यववक्रमम्।
सलक्ष्मणां को ववर्हेत र र्घवां,
46
हुत शनां दीप्तममव ननलेररतम ्।।64।।
सलक्ष्मणां र र्घवम स्जमदषनां,
ददश िजां मत्तममव र्वयवस्स्थतम्।
सर्ेत को व नरमुख्य सांयुिे,
युि न्ततसूयषप्रनतमां शर गचषर्म्।।5.37.65।।
स मे हररश्रेष्टि सलक्ष्मणां पनतां,
सयूथपां क्षिप्रममर्ोपपाद्।
गचर य र मां प्रनत शोककमशषत ां,
क
ु रुष्व म ां व नरमुख्य हवर्षत म ्।।5.37.66।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे सप्तत्ररांशस्सिषः।।
47
अष्टत्रिंशस्सर्गः
Hanuman carries the episode of Kakasura and the
Chudamani from Sita to Rama as a mark of
identification
47
48
ततस्स कवपश दूषल-स्तेन व क्येन तोवर्तः।
सीत मुवाच तच्छ्छ
ृ त्व , व क्यां व क्यववश रदः।।5.38.1।।
युक्तरूपां त्वय देवव, भ वर्तां शुभदशषने।
सदृशां स्रीस्वभ वस्य, स ्वीन ां ववनयस्य च।।5.38.2।।
स्रीत्वां न तु समथं दह, स िरां र्वयनतवनतषतुम्।
म मगधष्टि य ववस्तीणं, शतयोजनम यतम्।।5.38.3।।
द्धववतीयां क रणां यच्छ्च, ब्रवीवष ववनय स्न्तवते।
र म दन्तयस्य नार्ागसम, सांस्पशषममनत ज नकक ।।5.38.4।।
एतत्ते सदृशां देवव, पत्न्तय स्तस्य मह त्मनः।
क ह्यन्तय त्व मृते देवव, ब्रू्ाद्वचनमीदृशम्।।5.38.5।।
49
श्रोष््ते चैव क क
ु त्स्थ:, सवं ननरवशेर्तः।
चेस्ष्टटतां यत्त्वय देवव, भ वर्तां मम च ग्रतः।।5.38.6।।
क रणैबषहुमभदेवव, र मवप्रयगचकीर्षय ।
स्नेहप्रस्कन्तनमनस , मयैतत्समुदीररतम्।।5.38.7।।
लङ्क य दुष्टप्रवेशत्व -द्धदुस्तरत्व न्तमहोदधेः।
स मर्थय षद त्मनश्चैव, मयैतत्समुदीररतम ्।।5.38.8।।
इच्छासम त्व ां सम नेतु-मद्धयैव रर्घुबन्तधुन ।
िुरुस्नेहेन भक्त्य च, न न्तयथैतदुद हृतम ्।।5.38.9।।
यदद नोत्सर्से य तुां, मय स थषमननस्न्तदते।
अमभज्ञ नां प्र्च्छ त्वां, जानी्ाद्रार्घवो दह यत्।।5.38.10।।
50
एवमुक्त हनुमत , सीत सुरसुतोपम ।
उवाच वचनां मन्तदां, ब ष्टपप्रग्रगथत िरम्।।5.38.11।।
इदां श्रेष्टिममभज्ञ नां, ब्रू्ास्त्विं तु मम वप्रयम्।
शैलस्य गचरक
ू टस्य, प दे पूवोत्तरे पुर ।।5.38.12।।
त पस श्रमव मसन्तय ः, प्र ज्यमूलफलोदक
े ।
तस्स्मस्न्तसद्धध श्रमे देशे, मन्तद ककन्तय ववदूरतः।।5.38.13।।
तस्योपवनर्ण्डेर्ु, न न पुष्टपसुिस्न्तधर्ु।
ववहृत्य समलले स्क्लन्तन , मम ङ्क
े समुप ववशमः।।14।।
ततो म ांससम युक्तो, व यसः पयषतुण्डयत्।
तमहां लोष्टटमुद्धयम्य, व रय ममस्म व यसम्।।5.38.15।।
51
द रयन्तस च म ां क क-स्तत्रैव पररलीयते।
न च प्युप रमन्तम ांस -द्धभि गथष बमलभोजनः।।5.38.16।।
उत्कर्षन्तत्य ां च रशन ां, क्र
ु द्धध य ां मनय पक्षिणण।
स्रस्यम ने च वसने, ततो दृष्टट त्वय ह्यहम्।।5.38.17।।
त्वय ऽपहमसत च हां, क्र
ु द्धध सांलस्ज्जत तद ।
भििृ्नेन क क
े न, द ररत त्व मुप ित ।।5.38.18।।
आसीनस्य च ते श्र न्तत , पुनरुत्सङ्िम ववशम्।
क्र
ु ्यन्तती च प्रहृष्टटेन, त्वय ऽहां पररस स्न्तत्वत ।।5.38.19।।
ब ष्टपपूणषमुखी मन्तदां, चिुर्ी पररम जषती।
लक्षित ऽहां त्वय न थ, व यसेन प्रकोवपत ।।5.38.20।।
52
पररश्रम त्प्रसुप्त च, र र्घव ङ्क
े ऽप्यहां गचरम्।
पय षयेण प्रसुप्तश्च, मम ङ्क
े भरत ग्रजः।।5.38.21।।
स तर पुनरेव थ, व यसस्समुप िमत्।
ततस्सुप्तप्रबुद्धध ां म ां, र मस्य ङ्क त्समुस्त्थत म्।।22।।
व यसस्सहस िम्य, ववददाि स्तन न्ततरे।
पुनः पुनरथोत्पत्य, ववददाि स म ां भृशम्।।5.38.23।।
ततस्समुक्षितो र मो, मुक्तैश्शोणणतत्रबन्तदुमभः।
व यसेन ततस्तेन, बलवस्त्क्लश्यम नय ।।5.38.24।।
स मय बोगधतश्श्रीम -न्तसुखसुप्तः परन्ततपः।
स म ां दृष्ट्व मह ब हु-ववषतुन्तन ां स्तनयोस्तद ।।5.38.25।।
53
आशीववर् इव क्र
ु द्धध-श्वसन्तव क्यमभ र्त।
क
े न ते न िन सोरु, ववितां वै स्तन न्ततरम्।।5.38.26।।
कः क्रीडतत सरोर्ेण, पञ्चवक्रेण भोगिन ।
वीिम णस्ततस्तां वै, व यसां समुदैक्षत।।5.38.27।।
नखैस्सरुगधरैस्तीक्ष्णै-म षमेव मभमुखां स्स्थतम्।
पुत्रः ककल स शक्रस्य, व यसः पतत ां वरः।।5.38.28।।
धर न्ततरितश्शीघ्रां, पवनस्य ितौ समः।
ततस्तस्स्मन्तमह ब हुः, कोपसांवनतषतेिणः।।5.38.29।।
व यसे कृ तव न्तक्र
ू र ां, मनतां मनतमत ां वरः।
स दभं सांस्तर द्धिृह्य, ब्र ह्मेण स्रेण ्ोज्त्।।5.38.30।।
54
स दीप्त इव क ल स्ग्न-जषज्व ल मभमुखो द्धववजम्।
स तां प्रदीप्तां गचिेप, दभं तां व यसां प्रनत।।5.38.31।।
ततस्तां व यसां दभष-स्सोम्बरेऽनुजर्ाम ह।
अनुसृष्टटस्तद क को, जर्ाम ववववध ां िनतम्।।5.38.32।।
लोकक म इमां लोक
ां , सवं वै ववचच र ह।
स वपर च पररत्यक्त-स्सुरैश्च समहवर्षमभः।।5.38.33।।
रीन्तलोक न्तसम्पररक्रम्य, तमेव शरणां ितः।
स तां ननपनततां भूमौ, शरण्यश्शरण ितम्।।5.38.34।।
वध हषमवप क क
ु त्स्थ:, कृ पय प्गपाल्त्।
पररद्धयूनां ववर्ण्णां च, स तम य न्ततमब्रवीत्।।5.38.35।।
55
मोर्घां कतुं न शक्यां तु, ब्र ह्ममस्रां तदुच्छ्यत म्।
दहनस्तु दक्षिण क्षि त्व-च्छ्छर इत्यथ सोऽब्रवीत्।।5.38.36।।
ततस्तस्य क्षि क कस्य, दहनस्स्त स्म स दक्षिणम्।
दत्त्व स दक्षिणां नेरां, प्र णेभयः परररक्षितः।।5.38.37।।
स र म य नमस्कृ त्य, र ज्ञे दशरथ य च।
ववसृष्टटस्तेन वीरेण, प्रततपेदे स्वम लयम्।।5.38.38।।
मत्कृ ते क कम रे तु, ब्रह्म स्रां समुदीररतम्।
कस्म द्धयो म ां हरेत्त्वत्तः, क्षमसे तां महीपते।।5.38.39।।
स क
ु रुष्टव महोत्स हः, कृ प ां मनय नरर्षभ।
त्वय न थवती न थ, ह्यन थ इव दृश््ते।।5.38.40।।
56
आनृशांस्यां परो धमष-स्तवत्त्त ऐव मय श्रुतः।
जानासम त्व ां मह वीयं, महोत्स हां मह बलम्।।5.38.41।।
अप रप रमिोभयां, ि म्भीय षत्स िरोपमम्।
भत षरां ससमुर य , धरण्य व सवोपमम्।।5.38.42।।
एवमस्रववद ां श्रेष्टि-स्सत्यव न्तबलव नवप।
ककमथषमस्रां रिस्सु, न ्ोज्सस र र्घव।।5.38.43।।
न न ि न ऽवप िन्तधव ष, न सुर न मरुद्धिण ः।
र मस्य समरे वेिां, शक्त ः प्रनतसम गधतुां।।5.38.44।।
तस्य वीयषवतः कस्श्च-द्धयद्धयस्स्त मनय सम्भ्रमः।
ककमथं न शरैस्तीक्ष्णै:, ियां न्तत र िस न्।।5.38.45।।
57
भ्र तुर देशम द य, लक्ष्मणो व परन्ततपः।
कस्य हेतोनष म ां वीरः, पररर नत मह बलः।।5.38.46।।
यदद तौ पुरुर्र्वय घ्रौ, व य्वस्ग्नसमतेजसौ।
सुर ण मवप दुधषर्ौ, ककमथं म मुपेितः।।5.38.47।।
ममैव दुष्टकृ तां ककस्ञ्च-न्तमहदन्स्त न सांशयः।
समथ षववप तौ यन्तम ां, नावेक्षेते परन्ततपौ।।5.38.48।।
वैदेह्य वचनां श्रुत्व , करुणां स श्रुभ वर्तम्।
अथाब्रवीन्तमह तेज , हनुम न्तम रुत त्मजः।।5.38.49।।
त्वच्छ्छोकववमुखो र मो, देवव सत्येन ते शपे।
र मे दुःख मभपन्तने च, लक्ष्मणः परितप््ते।।5.38.50।।
58
कथस्ञ्चद्धभवती दृष्टट , न क लः पररदेववतुम्।
इमां मुहूतं दुःख न ां, द्रक्ष््स््न्ततमननस्न्तदते।।5.38.51।।
त वुभौ पुरुर्र्वय घ्रौ, र जपुरौ मह बलौ।
त्वद्धदशषनकृ तोत्स हौ, लङ्क ां भस्मीकररष्टयतः।।5.38.52।।
हत्त्व च समरे क्र
ू रां, र वणां सहब न्तधवम्।
र र्घवस्त्व ां ववश ल क्षि, नेष््तत स्व ां पुरीां प्रनत।।5.38.53।।
ब्रूहर् यर र्घवो व च्छ्यो, लक्ष्मणश्च मह बलः।
सुग्रीवो व वप तेजस्वी, हरयोऽवप सम ित ः।।5.38.54।।
इत्युक्तवनत तस्स्मांस्तु, सीत सुरसुतोपम ।
उवाच शोकसन्ततप्त , हनुमन्ततां प्लवङ्िमम्।।5.38.55।।
59
कौसल्य लोकभत षरां, सुषुवे यां मनस्स्वनी।
तां मम थे सुखां पृच्छ, मशरस चासिवाद्।।5.38.56।।
स्रजश्च सवषरत्न नन, वप्रय य श्च वर ङ्िन ः।
ऐश्वयं च ववश ल य ां, पृगथर्वय मवप दुलषभम्।।5.38.57।।
वपतरां म तरां चैव, सम्म न्त्ासिप्रसाद्् च।
अनुप्रव्रस्जतो र मां, सुममर येन सुप्रज ः।।5.38.58।।
आनुक
ू ल्येन धम षत्म , त्यक्त्व सुखमनुत्तमम्।
अनुर्च्छतत क क
ु त्स्थां, भ्र तरां प लयन्तवने।।5.38.59।।
मसांहस्कन्तधो मह ब हु-मषनस्वी वप्रयदमशषनः।
वपतृवद्वतगते र मे, म तृवन्तम ां सम चरन्।।5.38.60।।
60
दियम ण ां तद वीरो, न तु म ां वेद लक्ष्मणः।
वृद्धधोपसेवी लक्ष्मीव न्, शक्तो न बहुभ वर्त ।।5.38.61।।
र जपुरः वप्रयः श्रेष्टिः, सदृशः श्वशुरस्य मे।
ममः वप्रयतरो ननत्यां, भ्र त र मस्य लक्ष्मणः।।5.38.62।।
ननयुक्तो धुरर यस्य ां तु, त मुद्वर्तत वीयषव न्।
यां दृष्ट्व र र्घवो नैव, वृत्तम यषमनुस्मिेत्।।5.38.63।।
स मम थ षय क
ु शलां, वक्तर्वयो वचन न्तमम।
मृदुननषत्यां शुगचदषिः, वप्रयो र मस्य लक्ष्मणः।।5.38.64।।
यथ दह व नरश्रेष्टि, दुःखियकरो िवेत्।
त्वमस्स्मन्तक यषननयोिे, प्रम णां हररसत्तमः।।5.38.65।।
61
र र्घवस्त्वत्सम रम्भ -न्तमनय यत्नपरो िवेत्।
इदां ब्रू्ाश्च मे न थां, शूरां र मां पुनः पुनः।।5.38.66।।
जीववतां धाित्ष््ासम, म सां दशरथ त्मज।
ऊ्वं म स न्तन जीवेयां, सत्येन हां ब्रवीसम ते।।5.38.67।।
र वणेनोपरुद्धध ां म ां, ननकृ त्य प पकमषण ।
र तुमर्गसस वीर त्वां, प त ल ददव कौमशकीम्।।5.38.68।।
ततो वस्रितां मुक्त्व , ददर्वयां चूड मणणां शुभम्।
प्रदेयो र र्घव येनत, सीत हनुमते ददौ।।5.38.69।।
प्रनतिृह्य ततो वीरो, मणणरत्नमनुत्तमम्।
अङ्िुल्य ्ोज्ामास, न ह्यस्य प्र भवद्धभुजः।।5.38.70।
62
मणणरत्नां कवपवरः, प्रततर्ृह््ासिवाद्् च।
सीत ां प्रदक्षिणां कृ त्व , प्रणतः प र्वशषतः स्स्थतः।।5.38.71।।
हर्ेण महत युक्तः, सीत दशषनजेन सः।
हृदयेन ितो र मां, शरीरेण तु ववस्ष्टितः।।5.38.72।।
मणणवरमुपिृह्य तां मह हं,
जनकनृप त्मजय धृतां प्रभ व त्।
गिररररव पवन वधूतमुक्तः,
सुणखतमन ः प्रनतसङ्क्रमां प्रपेदे।।5.38.73।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे
अष्टटत्ररांशस्सिषः।।
63
एकोनचत्वारििंशस्सर्गः
Sita further appeals to Hanuman
63
64
मणणां दत्त्व ततः सीत , हनूमन्ततमथाब्रवीत्।
अमभज्ञ नममभज्ञ त-मेतर मस्य तत्त्वतः।।5.39.1।।
मणणां तु दृष्ट्व र मो वै, रय ण ां सिंस्मरिष््तत।
वीरो जनन्तय मम च, र ज्ञो दशरथस्य च।।5.39.2।।
स भूयस्त्वां समुत्स हे, चोददतो हररसत्तम।
अस्स्मन्तक यषसम रम्भे, प्रगचन्ततय यदुत्तरम्।।5.39.3।।
त्वमस्स्मन्तक यषननयोिे, प्रम णां हररसत्तम।
हनुमन्तयत्नम स्थ य, दुःखियकरो िव।।5.39.4।।
तस्य गचन्ततयतो यत्नो, दुःखियकरो िवेत्।
स तथेनत प्रनतज्ञ य, म रुनतभीमववक्रमः।।5.39.5।।
65
मशरस वन्त्य वैदेहीां, िमन ्ोपचक्रमे।
ज्ञ त्व सम्प्रस्स्थतां देवी, व नरां म रुत त्मजम्।।5.39.6।।
ब ष्टपिद्धिदय व च , मैगथली व क्यमब्रवीत्।
क
ु शलां हनुमन्तब्रूय ः, सदहतौ र मलक्ष्मणौ।।5.39.7।।
सुग्रीवां च सह म त्यां, वृद्धध न्सव ंश्च व नर न्।
ब्रूय स्त्वां व नरश्रेष्टि, क
ु शलां धमषसांदहतम्।।5.39.8।।
यथ स च मह ब हु-म ं ताि्तत र र्घवः।
अस्म द्धदुःख म्बुसांरोध -त्त्वां* सम ध तुमर्गसस।।5.39.9।।
जीवन्ततीां म ां यथ र मः, सम्िाव्तत कीनतषम न्।
तत्तथ हनुमन्तव च्छ्यां, व च धमषमवाप्नुहर्।।5.39.10।।
66
ननत्यमुत्स हयुक्त श्च, व चश्रुत्व त्वयेररत ः।
वधधगष््ते द शरथेः, पौरुर्ां मदव प्तये।।5.39.11।।
मत्सन्तदेशयुत व च-स्त्वत्तश्श्रुत्व च र र्घवः।
पर क्रमववगधां वीरो, ववगधवत्सिंववधास््तत।।5.39.12।।
सीत य वचनां श्रुत्व , हनुम न्तम रुत त्मजः।
मशरस्यञ्जमलम ध य, व क्यमुत्तरमब्रवीत्।।5.39.13।।
क्षिप्रमेष््तत क क
ु त्स्थो, ह यृषिप्रवरैवृषतः।
यस्ते युगध ववस्जत्य री-न्तशोक
ां र्व्पनत्ष््तत।।5.39.14।।
न दह पश््ासम मत्येर्ु, न सुरेर्ु सुरेर्ु व ।
यस्तस्य क्षिपतो ब ण -न्तस्थ तुमुत्सर्तेऽग्रतः।।5.39.15।।
67
अप्यक
ष मवप पजषन्तय-मवप वैवस्वतां यमम्।
स दह सोढुां रणे शक्त-स्तव हेतोववषशेर्तः।।5.39.16।।
स दह स िरपयषन्तत ां, महीां श मसतुमीहनत।
त्वस्न्तनममत्तो दह र मस्य, जयो जनकनस्न्तदनन।।5.39.17।।
तस्य तद्धवचनां श्रुत्व , सम्यक्सत्यां सुभ वर्तम ्।
ज नकी बहुमेनेऽथ, वचनां चेदमब्रवीत्।।5.39.18।।
ततस्तां प्रस्स्थतां सीत , वीिम ण पुनः पुनः।
भतृषस्नेह स्न्तवतां व क्यां, सौह द षदनुमान्त्।।5.39.19।।
यदद व मन्त्से वीर, वसैक हमररन्तदम।
कस्स्मांस्श्चत्सांवृते देशे, ववश्र न्ततःश्वो र्समष््सस।।20।।
68
मम चेदल्पभ ग्य य , स स्न्तन्य त्तव व नर।
अस्य शोकस्य महतो, मुहूतं मोिणां िवेत्।।5.39.21।।
िते दह हररश दूषल, पुनर िमन य तु।
प्र ण न मवप सन्तदेहो, मम स््ान्तनार सांशयः।।5.39.22।।
तव दशषनजः शोको, भूयो म ां परिताप्ेत्।
दुःख द्धदुःखपर मृष्टट ां,* दीपयस्न्तनव व नर।।5.39.23।।
अयां च वीर सन्तदेह-न्स्तष्ठतीव मम ग्रतः।
सुमह ांस्त्वत्सह येर्ु, हयृषिेर्ु हरीश्वरः।।5.39.24।।
कथां नु खलु दुष्टप रां, तरिष््न्न्तत महोदगधम्।
त नन हयृषिसैन्तय नन, तौ व नरवर त्मजौ।।5.39.25।।
69
रय ण मेव भूत न ां, स िरस्य स्य लङ्र्घने।
शस्क्तस्स्य द्धवैनतेयस्य, तव व म रुतस्य व ।।5.39.26।।
तदस्स्मन्तक यषननयोिे, वीरैवां दुरनतक्रमे।
ककां पश््सस सम ध नां, त्वां दह क यषववद ां वरः।।5.39.27।।
क ममस्य त्वमेवैकः, क यषस्य पररस धने।
पय षप्तः परवीरघ्न, यशस्यस्ते फलोदयः।।5.39.28।।
बलैस्समग्रैयषदद म ां, र वणां स्जत्य सांयुिे।
ववजयी स्वपुरां य य -त्तत्तस्य सदृशां िवेत्।।5.39.29।।
शरैस्तु सङ्क
ु ल ां कृ त्व , लङ्क ां परबल दषनः।
म ां न्ेद््दद क क
ु त्स्थः, तत्तस्य सदृशां िवेत्।।5.39.30।।
70
तद्धयथ तस्य ववक्र न्तत-मनुरूपां मह त्मनः।
िवेदाहवशूरस्य, तथ त्वमुपपाद्।।5.39.31।।
तदथोपदहतां व क्यां, प्रगश्रतां हेतुसांदहतम्।
ननशम्य हनुम न्तशेर्ां, व क्यमुत्तरमब्रवीत्।।5.39.32।।
देवव हयृषिसैन्तय न -मीश्वरः प्लवत ां वरः।
सुग्रीवस्सत्त्वसम्पन्तन-स्तव थे कृ तननश्चयः।।5.39.33।।
स व नरसहस्र ण ां, कोटीमभरमभसांवृतः।
क्षिप्रमेष््तत वैदेदह, र िस न ां ननबहषणः।।5.39.34।।
तस्य ववक्रमसम्पन्तन -स्सत्त्ववन्ततो मह बल ः।
मनस्सङ्कल्पसम्प त , ननदेशे हरयः स्स्थत ः।।5.39.35।।
71
येर् ां नोपरर न धस्त -न्तन नतयषक्सज्जते िनतः।
न च कमषसु सीदन्न्तत, महत्स्वममततेजसः।।5.39.36।।
असकृ त्तैमषहोत्स है-स्सस िरधर धर ।
प्रदक्षिणीकृ त भूमम-व षयुम ि षनुस ररमभः।।5.39.37।।
मद्धववमशष्टट श्च तुल्य श्च, सन्न्तत तर वनौकसः।
मत्तः प्रत्यवरः कस्श्च-न्तनान्स्त सुग्रीवसस्न्तनधौ।।5.39.38।।
अहां त वददह प्र प्तः, ककां पुनस्ते मह बल ः।
न दह प्रकृ ष्टट ः प्रेष््न्तते, प्रेष््न्तते हीतरे जन ः।।5.39.39।।
तदलां पररत पेन देवव, शोको र्व्पैतु ते।
एकोत्प तेन ते लङ्क -मेष््न्न्तत हररयूथप ः।।5.39.40।।
72
मम पृष्टिितौ तौ च, चन्तरसूय षवववोददतौ।
त्वत्सक शां मह सत्त्वौ, नृमसांह व िममष्टयतः।।5.39.41।।
ततो वीरौ नरवरौ, सदहतौ र मलक्ष्मणौ।
आिम्य निरीां लङ्क ां, स यक
ै ववषधममष्टयतः।।5.39.42।।
सिणां र वणां हत्त्व , र र्घवो रर्घुनन्तदनः।
त्व म द य वर रोहे, स्वपुरीां प्रतत्ास््तत।।5.39.43।।
तद श्वमसदह भरां, ते भव त्वां क लक ङ्क्षिणी।
नगचर द्द्रक्ष््से र मां, प्रज्वलन्ततममव नलम्।।5.39.44।।
ननहते र िसेन्तरेऽस्स्म-न्तसपुर म त्यब न्तधवे।
त्वां समेष्टवमस र मेण, शश ङ्क
े नेव रोदहणी।।5.39.45।।
73
क्षिप्रां त्वां देवव शोकस्य, प रां ्ास््सस मैगथमल।
र वणां चैव र मेण, ननहतां द्रक्ष््सेऽगचर त्।।5.39.46।।
एवम श्व स्य वैदेहीां, हनुम न्तम रुत त्मजः।
िमन य मनतां कृ त्व , वैदेहीां पुनिब्रवीत्।।5.39.47।।
तमररघ्नां कृ त त्म नां, क्षिप्रां द्रक्ष््सस र र्घवम्।
लक्ष्मणां च धनुष्टप णणां, लङ्क द्धव रमुप ितम्।।5.39.48।।
नखदांष्टर युध न्तवीर -स्न्तसम्हश दूषलववक्रम न्।
व नर न्तव रणेन्तर भ -स्न्तिप्रां द्रक्ष््सस सङ्ित न्।।5.39.49।।
शैल म्बुदननक श न ां, लङ्क मलयस नुर्ु।
नदषत ां कवपमुख्य न -म ये यूध न्तयनेकशः।।5.39.50।।
74
स तु ममषणण र्घोरेण, त डडतो मन्तमथेर्ुण ।
न शमष लिते र म-स्स्सांह गधषत इव द्धववपः।।5.39.51।।
म रुदो देवव शोक
े न, मािूत्ते मनसोऽवप्रयम्।
शचीव पत्य शक्र
े ण, भर ष न थवती ह्यमस।।5.39.52।।
र म द्धववमशष्टटः कोऽन्तयो-ऽन्स्त कस्श्चत्सौममत्ररण समः।
अस्ग्नम रुतकल्पौ तौ, भ्र तरौ तव सांश्रयौ।।5.39.53।।
न स्स्मांस्श्चरां वत्स््सस देवव देशे, रिोिणैर्युवर्तेऽनतरौरे।
न ते गचर द मिमनां वप्रयस्य,
क्षमस्व मत्सङ्िमक लम रम्।।54।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे एकोनचत्व ररांशस्सिषः।।
75
चत्वारििंशस्सर्गः
Sita permits Hanuman to depart
75
76
श्रुत्व तु वचनां तस्य, व युसूनोमषह त्मनः।
उवाचात्मदहतां व क्यां, सीत सुरसुतोपम ।।5.40.1।।
त्व ां दृष्ट्व वप्रयवक्त रां, सम्प्रहृष््ासम व नरः।
अधषसञ्ज तसस्येव, वृस्ष्टटां प्र प्य वसुन्तधर ।।5.40.2।।
यथ तां पुरुर्र्वय घ्रां, ि रैश्शोक मभकमशषतैः।
सांस्पृशेयां सक म हां, तथ क
ु रु दय ां मनय।।5.40.3।।
अमभज्ञ नां च र मस्य, दद्धय हररिणोत्तम।
क्षिप्त ममर्ीक ां क कस्य, कोप देक क्षिश तनीम्।।5.40.4।।
मनस्श्शल य स्स्तलको, िण्डप श्वे ननवेमशतः।
त्वय प्रणष्टटे नतलक
े तां, ककल स्मतुषमर्गसस।।5.40.5।।
77
स वीयषव न्तकथां सीत ां, हृत ां समनुमन्त्से।
वसन्ततीां रिस ां म्ये, महेन्तरवरुणोपमः।।5.40.6।।
एर् चूड मणणददषर्वयो, मय सुपरररक्षितः।
एतां दृष्ट्व प्रहृष््ासम, र्वयसने त्व ममव नर्घ।।5.40.7।।
एर् ननय षनततश्श्रीम -न्तमय ते व ररसम्भवः।
अतः परां न शक्ष््ासम, जीववतुां शोकल लस ।।5.40.8।।
असह्य नन च दुःख नन, व चश्च हृदयस्च्छ्छदः।
र िसीन ां सुर्घोर ण ां, त्वत्कृ ते मषग्ाम््हम्।।5.40.9।।
धाित्ष््ासम म सां तु, जीववतां शरुसूदन।
ऊ्वं म स न्तन जीववष््े, त्वय हीन नृप त्मज।।5.40.10।
78
र्घोरो र िसर जोऽयां, दृस्ष्टटश्च न सुख मनय।
त्व ां च श्रुत्व ववपद्धयन्ततां, न जीवेयमहां िणम्।।5.40.11।।
वैदेह्य वचनां श्रुत्व , करुणां स श्रु भ वर्तम्।
अथाब्रवीन्तमह तेज , हनुम न्तम रुत त्मजः।।5.40.12।।
त्वच्छ्छोकववमुखो र मो, देवव सत्येन ते शपे।
र मे दुःख मभभूते तु, लक्ष्मणः परितप््ते।।5.40.13।।
कथस्ञ्चद्धभवती दृष्टट , न क लः पररशोगचतुम्।
इमां मुहूतं दुःख न -मन्ततां द्रक्ष््सस भ ममनन।।5.40.14।।
त वुभौ पुरुर्र्वय घ्रौ, र जपुर वररन्तदमौ।
त्वद्धदशषनकृ तोत्स हौ, लङ्क ां भस्मीकररष्टयतः।।5.40.15।।
79
हत्त्व च समरे क्र
ू रां, र वणां सहब न्तधवम्।
र र्घवौ त्व ां ववश ल क्षि, स्व ां पुरीां प्र पनयष्टयतः।।5.40.16।।
यत्तु र मो ववज नीय -दमभज्ञ नमननस्न्तदते।
प्रीनतसञ्जननां तस्य, भूयस्त्वां द तुमर्गसस।।5.40.17।।
साब्रवीद्दत्तमेवेनत, मय मभज्ञ नमुत्तमम्।
एतदेव दह र मस्य, दृष्ट्व मत्क
े शभूर्णम्।।5.40.18।।
श्रद्धधेयां हनुमन्तव क्यां, तव वीर िववष््तत।
स तां मणणवरां िृह्य, श्रीम न्तप्लविसत्तमः।।5.40.19।।
प्रणम्य मशरस देवीां, िमन ्ोपचक्रमे।
तमुत्प तकृ तोत्स ह-मवेक्ष्य हररपुङ्िवम्।।5.40.20।।
80
वधषम नां मह वेि-मुवाच जनक त्मज ।
अश्रुपूणषमुखी दीन , ब ष्टपिद्धिदय गिर ।।5.40.21।।
हनुमस्न्तसांहसङ्क शौ, भ्र तरौ र मलक्ष्मणौ।
सुग्रीवां च सह म त्यां, सव षन्ब्रू्ा अन मयम्*।।5.40.22।।
यथ च स मह ब हु-म ं ताि्तत र र्घवः।
अस्म द्धदु:ख म्बुसम्रोध -त्त्वां सम ध तुमर्गसस।।5.40.23।।
इमां च तीव्रां मम शोकवेिां, रिोमभरेमभः पररभत्सषनां च।
ब्रू्ास्तु र मस्य ितस्समीपम्,
मशवश्च तेऽ्व ऽस्तु हररप्रवीर।24।।
81
स र जपु्र प्रनतवेददत थषः,
कवपः कृ त थषः पररहृष्टटचेत ः।
अल्प वशेर्ां प्रसमीक्ष्य क यं,
ददशां ह्युदीचीां मनस जर्ाम।।5.40.25।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे
चत्व ररांशस्सिषः।
82
एकचत्वारििंशस्सर्गः
Hanuman decides to meet Ravana and
measure his strength
83
स च व स्ग्भः प्रशस्त मभ-िषममष्टयन्तपूस्जतस्तय ।
तस्म द्धदेश दपक्रम्य, धचन्तत्ामास व नरः।।5.41.1।।
अल्पशेर्ममदां क यं, दृष्टटेयममसतेिण ।
रीनुप य ननतक्रम्य, चतुथष: इह ववद््ते।।5.41.2।।
न स म रिस्सु िुण य कल्पते,
न द नमथोपगचतेर्ु ्ुज््ते।
न भेदस ्य बलदवपषत जन ः,
पर क्रमस्त्वेव ममेह िोचते।।3।।
न च स्य क यषस्य पर क्रम दृते,
ववननश्चयः कस्श्चददर्ोपपद््ते।
हतप्रवीर दह रणे दह र िस ः,
कथस्ञ्चदीयुयषददह द्धय म दषवम्।।4।।
84
क ये कमषणण ननददषष्टटे, यो बहून्तयवप साध्ेत ्।
पूवषक य षववरोधेन, स क यं कतुषमर्गतत।।5.41.5।।
न ह्येकस्स धको हेतु-स्स्वल्पस्य पीह कमषणः।
यो ह्यथं बहुध वेद, स समथोऽथषस धने।।5.41.6।।
इहैव त वत्कृ तननश्चयो ह्यहां,
यदद व्रजेयां प्लविेश्वर लयम्।
पर त्मसम्मदषववशेर्तत्त्ववव,
त्ततः कृ तां स््ान्तमम भतृषश सनम्।।5.41.7।।
कथां नु खल्वद्धय िवेत्सुख ितां,
प्रसह्य युद्धधां मम र िसैः सह।
तथैव खल्व त्मबलां च स रव,
त्सम्म नयेन्तम ां च रणे दश ननः।।5.41.8।।
85
ततस्सम स द्धय रणे दश ननां,
समस्न्तरविं सबलप्रय नयनम्।
हृदद स्स्थतां तस्य मतां बलां च वै,
सुखेन मत्त्व ऽहममतः पुनव्रषजे।।9।।
इदमस्य नृशांसस्य, नन्तदनोपममुत्तमम्।
वनां नेरमनःक न्ततां, न न रुमलत युतम्।।5.41.10।।
इदां ववध्विंसत्ष््ासम, शुष्टक
ां वनममव नलः।
अस्स्मन्तभग्ने ततः कोपां, करिष््तत दश ननः।।5.41.11।।
ततो महत्स श्वमह रथद्धववपां,
बलां समादेक्ष््तत र िस गधपः।
त्ररशूलक ल यसप्दटस युधां,
ततो महद्धयुद्धधममदां िववष््तत।।12।।
86
अहां तु तैः सांयनत चण्डववक्रमै,
स्समेत्य रिोमभरसह्य ववक्रमः।
ननहत्य तर वणचोददतां बलां,
सुखां र्समष््ासम कपीश्वर लयम ्।।5.41.13।।
ततो म रुतवत्कृ द्धधो, म रुनतभीमववक्रमः।
ऊरुवेिेन महत , रुम न्तिेप्तुमथािित्।।5.41.14।।
ततस्तु हनुम न्तवीरो, बिञ्ज प्रमद वनम ्।
मत्तद्धववजसम र्घुष्टटां, न न रुमलत युतम ्।।5.41.15।।
तद्धवनां मगथतैवृषिै-मभषन्तनैश्च समलल शयैः।
चूणणषतैः पवषत ग्रैश्च, बिूवावप्रयदशषनम ्।।5.41.16।।
87
न न शक
ु न्ततववरुतैः, प्रमभन्तनैस्समलल शयैः।
त म्रैः ककसलयैः क्ल न्ततै:,
क्ल न्ततरुमलत युतम्।।5.41.17।।
न बिौ तद्धवनां तर, द व नलहतां यथ ।
र्वय क
ु ल वरण िेजु-ववगह्वल इव त लत ः।।5.41.18।।
लत िृहैस्श्चरिृहैश्च न मशतै,
मषहोरिैर्वय षलमृिैश्च ननधुषतैः।
मशल िृहैरुन्तमगथतैस्तथ िृहैः,
प्रणष्टटरूपां तदिून्तमहद्धवनम्।।5.41.19।।
88
स ववह्वल ऽशोकलत प्रत न ,
वनस्थली शोकलत प्रत न ।
ज त दश स्यप्रमद वनस्य,
कपेबषल द्धगध प्रमद वनस्य।।5.41.20।।
स तस्य कृ त्व थषपतेमषह कवप,
मषहद्धर्वयलीक
ां मनसो मह त्मनः।
्ु्ुत्सुिेको बहुमभमषह बलै,
स्श्शय ज्वलांस्तोरणम स्स्थतः कवपः।।5.41.21।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे
एकचत्व ररांशस्सिषः।।
89
द्ववचत्वारििंशस्सर्गः
Hanuman ruins Ashoka garden -- kills kinkaras
90
ततः पक्षिननन देन, वृिभङ्िस्वनेन च।
बिूवुस्राससम्भ्र न्तत -स्सवे लङ्क ननव मसनः।।5.42.1।।
ववरुत श्च भयरस्त , ववनेदुमृगिपक्षिणः।
रिस ां च ननममत्त नन, क्र
ू र णण प्रततपेहदिे।।5.42.2।।
ततो ित य ां ननर य ां, र िस्यो ववकृ त नन ः।
तद्धवनां ददृशुिगग्नां तां, च वीरां मह कवपम्।।5.42.3।।
स त दृष्ट्व मह ब हु-मषह सत्त्वो मह बलः।
चकाि सुमहरूपां, र िसीन ां भय वहम्।।5.42.4।।
ततस्तां गिररसङ्क श-मनतक यां मह बलम्।
र िस्यो व नरां दृष्ट्व , पप्रच्छ
ु जगनक त्मज म्।।5.42.5।।
91
कोऽयां कस्य क
ु तो व यां, ककां ननममत्तममह ितः।
कथां त्वय सह नेन, सांव दः कृ त इत्युत।।5.42.6।।
आचक्ष्व नो ववश ल क्षि, म भूत्ते सुभिे भयम ्।
सांव दममसत प ङ्िे, त्वय ककां कृ तव नयम्।।5.42.7।।
अथाब्रवीन्तमह स ्वी, सीत सव षङ्िसुन्तदरी।
रिस ां भीमरूप ण ां, ववज्ञ ने मम क िनतः।।5.42.8।।
यूयमेव मभज नीत, योऽयां यद्धव करिष््तत।
अदहरेव ह्यहेः प द -न्न्तवजानातत न सांशयः।।5.42.9।।
अहमप्यस्य भीतान्स्म, नैनां जानासम को न्तवयां।
वेद्सम र िसमेवैनां, क मरूवपणम ितम्।।5.42.10।।
92
वैदेह्य वचनां श्रुत्व , र िस्यो ववरुत ददशः।
स्स्थत ः क स्श्चद्धित ः क स्श्च-र वण य
ननवेददतुम्।।5.42.11।।
र वणस्य समीपे तु, र िस्यो ववकृ त नन ः।
ववरूपां व नरां भीम-म ख्य तुमुपचक्रमुः।।5.42.12।।
अशोकवननक म्ये, र जन्तभीमवपुः कवपः।
सीतय कृ तसांव द-न्स्तष्ठत््ममतववक्रमः।।5.42.13।।
न च तां ज नकी सीत , हररां हररणलोचन ।
अस्म मभबषहुध पृष्टट , ननवेदनयतुसमच्छतत।।5.42.14।।
व सवस्य िवेद्दूतो, दूतो वैश्रवणस्य व ।
प्रेवर्तो व वप र मेण, सीत न्तवेर्णक ङ्िय ।।5.42.15।।
93
तेन त्वद्धभुतरूपेण, यत्तत्तव मनोहरम्।
न न मृििण कीणं, प्रमृष्टटां प्रमद वनम्।।5.42.16।।
न तर कस्श्चदुद्धदेशो, यस्तेन न ववन मशतः।
यर स ज नकी सीत , स तेन न ववन मशतः।।5.42.17।।
ज नकीरिण थं व , श्रम द्धव नोपलभ््ते।
अथव कश्श्रमस्तस्य, सैव तेन मभरक्षित ।।5.42.18।।
च रुपल्लवपुष्टप ढ्यां, यां सीत स्वयम स्स्थत ।
प्रवृद्धधस्श्शांशुप वृि-स्स च तेन मभरक्षितः।।5.42.19।।
तस्योग्ररूपस्योग्र त्वां, दण्डम ज्ञ तुमर्गसस।
सीत सम्भ वर्त येन, तद्धवनां च ववन मशतम्।।5.42.20।।
94
मनः पररिृहीत ां त ां, तव रिोिणेश्वर।
कस्सीत मसििाषेत, यो न स््ात्त््क्तजीववतः।।5.42.21।।
र िसीन ां वचश्रुत्व , र वणो र िसेश्वरः।
हुत स्ग्नररव जज्वाल, कोपसांवनतषतेिणः।।5.42.22।।
तस्य क्र
ु द्धधस्य नेर भय ां, प्र पतन्तन स्रत्रबन्तदवः।
दीप्त भय ममव दीप भय ां, स गचषर्
स्स्नेहत्रबन्तदवः।।5.42.23।।
आत्मनस्सदृश न्तशूर -स्न्तकङ्कर न्तन म र िस न्।
र्व्ाहददेश मह तेज , ननग्रह थं हनूमतः।।5.42.24।।
तेर् मशीनतस हस्रां, ककङ्कर ण ां तरस्स्वन म्।
तन्ग्ुिगवन त्तस्म -त्क
ू टमुद्धिरप णयः।।5.42.25।।
95
महोदर मह दांष्टर , र्घोररूप मह बल ः।
युद्धध मभमनसस्सवे, हनुमद्धग्रहणोद्धयत ः।।5.42.26।।
ते कपीन्तरां सम स द्धय, तोरणस्थमवस्स्थतम्।
असिपेतुमगह वेि ः, पतङ्ि इव प वकम्।।5.42.27।।
ते िद मभववषगचर मभः, पररर्घैः क ञ्चन ङ्िदैः।
आजघ्नुव षनरश्रेष्टिां, शरैश्च ददत्यसस्न्तनभैः।।5.42.28।।
मुद्धिरैः प्दटशैश्शूलैः, प्र सतोमरशस्क्तमभः।
पररव यष हनूमन्ततां, सहस तस्थुिग्रतः।।5.42.29।।
हनुम नवप तेजस्वी, श्रीम न्तपवषतसस्न्तनभः।
क्षित व वव्य ल ङ्िूलां, ननाद च मह स्वनम्।।5.42.30।।
96
स भूत्व सुमह क यो, हनुम न्तम रुत त्मजः।
धृष्टटमास्फोट्ामास, लङ्क ां शब्देन पूरयन्।।5.42.31।।
तस्य स्फोदटतशब्देन, महत स नुन ददन ।
पेतुववषहङ्ि ििन -दुच्छ्चैश्चेदमघोष्त्।।5.42.32।।
ज्त््नतबलो र मो, लक्ष्मणश्च मह बलः।
र ज ज्तत सुग्रीवो, र र्घवेण मभप मलतः।।5.42.33।।
द सोऽहां कोसलेन्तरस्य, र मस्य स्क्लष्टटकमषणः।
हनुम न्तशरुसैन्तय न ां, ननहन्तत म रुत त्मजः।।5.42.34।।
न र वणसहस्रां मे, युद्धधे प्रनतबलां िवेत्।
मशल मभस्तु प्रहरतः, प दपैश्च सहस्रशः।।5.42.35।।
97
अदषनयत्व पुरीां लङ्क -ममभव द्धय च मैगथलीम्।
समृद्धध थो र्समष््ासम, ममर्त ां सवषरिस म्।।5.42.36।।
तस्य सन्तन दशब्देन, तेऽिवन्तियशङ्ककत ः।
ददृशुश्च हनूमन्ततां, सन्त्य मेर्घममवोन्तनतम्।।5.42.37।।
स्व ममसन्तदेशननश्शङ्क -स्ततस्ते र िस ः कवपम्।
गचरैः प्रहरणैभीमै-िसिपेतुस्ततस्ततः।।5.42.38।।
स तैः पररवृतश्शूरै-स्सवषतस्सुमह बलः।
आससादाऽयसां भीमां, पररर्घां तोरण गश्रतम्।।5.42.39।।
स तां पररर्घम द य, जर्घ न रजनीचर न्।
स पन्तनिममव द य, स्फ
ु रन्ततां ववनत सुतः।।5.42.40।।
98
ववचच र म्बरे वीरः, पररिृह्य च म रुनतः।
स हत्व र िस न्तवीर -स्न्तकङ्कर न्तम रुत त्मजः।।5.42.41।
युद्धध क ङ्िी पुनवीर-स्तोरणां समुप गश्रतः।
ततस्तस्म द्धभय न्तमुक्त ः, कनतगचत्तर र िस ः।।5.42.42।
ननहत स्न्तकङ्कर न्तसव ष-न्र वण य न्त्वेद्न्*।
स र िस न ां ननहतां महद्धबलां,
ननशम्य र ज पररवृत्तलोचनः।
समाहददेशाप्रनतमां पर क्रमे,
प्रहस्तपुरां समरे सुदुजषयम्।।5.42.43।।
इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे
द्धववचत्व ररांशस्सिषः।।
99
त्रचत्वारिशस्सर्गः
ततस्स ककङ्कर न्तहत्व , हनुम न्त्य नम स्स्थतः।
वनां भग्नां मय चैत्य-प्र स दो न ववन मशतः।।5.43.1।।
मङ्िल चरणम ्

06_Sundara Kandam_v3.pdf

  • 1.
  • 2.
    2 पञ्चत्रिंशस्सर्गः Hanuman further narrateshis story to Sita -- Gives description of Rama and Lakshmana 2
  • 3.
    3 त ां तुर मकथ ां श्रुत्व , वैदेही व नरर्षभ त्। उवाच वचनां स न्तत्व-ममदां मधुरय गिर ।।5.35.1।। क्व ते र मेण सांसिषः, कथां जानासस लक्ष्मणम्। व नर ण ां नर ण ां च, कथमासीत्सम िमः।।5.35.2।। य नन र मस्य मलङ्ि नन, लक्ष्मणस्य च व नर। त नन भूयस्समाचक्ष्व, न म ां शोकस्समाववशेत ्।।5.35.3।। कीदृशां तस्य सांस्थ नां, रूपां र मस्य कीदृशम्। कथमूरू कथां ब हू, लक्ष्मणस्य च शिंस मे।।5.35.4।। एवमुक्तस्तु वैदेह्य , हनुम न्तम रुत त्मजः। ततो र मां यथ तत्त्व-म ख्य तुमुपचक्रमे।।5.35.5।।
  • 4.
    4 ज नन्तती बतददष्ट्य , म ां वैदेदह परिपृच्छसस। भतुषः कमलपत्र क्षि, सांस्थ नां लक्ष्मणस्य च।।5.35.6।। य नन र मस्य गचह्न नन, लक्ष्मणस्य च य नन वै। लक्षित नन ववश ल क्षि, वदतश्शृणु त नन मे।।5.35.7।। र मः कमलपत्र ि-स्सवषसत्त्वमनोहरः। रूपद क्षिण्यसम्पन्तनः, प्रसूतो जनक त्मजे।।5.35.8।। तेजस ऽददत्य सङ्क शः, िमय पृगथवीसमः। बृहस्पनतसमो बुद्ध्य , यशस व सवोपमः।।5.35.9।। रक्षित जीवलोकस्य, स्वजनस्य मभरक्षित । रक्षित स्वस्य वृत्तस्य, धमषस्य च परन्ततपः।।5.35.10।।
  • 5.
    5 र मो भममनन लोकस्य, च तुवषण्यषस्य रक्षित । मय षद न ां च लोकस्य, कत ष क रनयत च सः।।5.35.11।। अगचषष्टम नगचषतोऽत्यथं, ब्रह्मचयषव्रते स्स्थतः। स धून मुपक रज्ञः, प्रच रज्ञश्च कमषण म्।।5.35.12।। र जववद्धय ववनीतश्च, ब्र ह्मण न मुप मसत । श्रुतव न्तशीलसम्पन्तनो, ववनीतश्च परन्ततपः।।5.35.13।। यजुवेदववनीतश्च, वेदववद्धमभस्सुपूस्जतः। धनुवेदे च वेदेर्ु, वेद ङ्िेर्ु च ननस्ष्टितः।।5.35.14।। ववपुल ांसो मह ब हुः, कम्बुग्रीवश्शुभ ननः। िूढजरुस्सुत म्र िो, र मो देवव जनैश्श्रुतः*।।5.35.15।।
  • 6.
    6 दुन्तदुमभस्वनननर्घोर्, स्स्स्नग्धवणषः प्रतपव न्। समस्समववभक्त ङ्िो, वणं श्य मां सम गश्रतः।।5.35.16।। त्ररस्स्थरस्स्रप्रलम्बश्च, त्ररसमस्स्रर्ु चोन्तनतः। त्ररत म्रस्स्रर्ु च स्स्नग्धो, िम्भीरस्स्रर्ु ननत्यशः।।17।। त्ररवलीव ांस््यवन-तश्चतुर्वयषङ्िस्स्रशीर्षव न्। चतुष्टकलश्चतुलेख-श्चतुस्ष्टकष्टक ु श्चतुस्समः।।5.35.18।। चतुदषशसमद्धवन्तद्धव-श्चतुदंष्टरश्चतुिषनतः। महोष्टिहनुन सश्च, पञ्चस्स्नग्धोऽष्टटवांशव न्।।5.35.19।। दशपद्धमो दशबृह-स्त्रमभर्वय षप्तो द्धववशुक्लव न्। र्डुन्तनतो नवतनु-स्स्रमभर्व्ागप्नोतत र र्घवः।।5.35.20।।
  • 7.
    7 सत्यधमषपरश्श्रीम न्, सङ्ग्रहनुग्रहे रतः। देशक लववभ िज्ञ-स्सवषलोकवप्रयांवदः।।5.35.21।। भ्र त तस्य च द्धवैम र-स्सौममत्रररपर स्जतः। अनुर िेण रूपेण, िुणैश्चैव तथ ववधः।।5.35.22।। त वुभौ नरश दूषलौ, त्वद्धदशषनसमुत्सुकौ। ववगचन्तवन्ततौ महीां कृ त्स्न -मस्म मभरमभसङ्ितौ।।23।। त्व मेव म िषम णौ तौ, ववचरन्ततौ वसुन्तधर म्। ददशगतुमृगिपनतां, पूवषजेन वरोवपतम्।।5.35.24।। ऋश्यमूकस्य पृष्टिे तु, बहुप दपसङ्क ु ले। भ्र तुभषय तषम सीनां, सुग्रीवां वप्रयदशषनम्।।5.35.25।।
  • 8.
    8 वयां तु हरररजां तां, सुग्रीवां सत्यसङ्िरम्। पररचय षमहे र ज्य -त्पूवषजेन वरोवपतम्।।5.35.26।। ततस्तौ चीरवसनौ, धनुः प्रवरप णणनौ। ऋश्यमूकस्य शैलस्य, रम्यां देशमुप ितौ।।5.35.27।। स तौ दृष्ट्व नरर्वय घ्रौ, धस्न्तवनौ व नरर्षभः। अवप्लुतो गिरेस्तस्य, मशखरां भयमोदहतः।।5.35.28।। ततस्स मशखरे तस्स्म-न्तव नरेन्तरो र्वयवस्स्थतः। तयोस्समीपां म मेव, प्रेष्ामास सत्वरम्।।5.35.29।। त वहां पुरुर्र्वय घ्रौ, सुग्रीववचन त्प्रभू। रूपलिणसम्पन्तनौ, कृ त ञ्जमलरुपस्स्थतः।।5.35.30।।
  • 9.
    9 तौ पररज्ञ ततत्त्वथौ, मय प्रीनतसमस्न्तवतौ। पृष्टिम रोप्य तां देशां, प्र वपतौ पुरुर्र्षभौ।।5.35.31।। ननवेददतौ च तत्त्वेन, सुग्रीव य मह त्मने। तयोरन्तयोन्तयसल्ल प -द्धभृशां प्रीनतिजा्त।।5.35.32।। ततस्तौ प्रीनतसम्पन्तनौ, हरीश्वरनरेश्वरौ। परस्परकृ त श्व सौ, कथय पूवषवृत्तय ।।5.35.33।। ततस्स सान्तत्व्ामास, सुग्रीवां लक्ष्मण ग्रजः। स्रीहेतोव षमलन भ्र र , ननरस्तमुरुतेजस ।।5.35.34।। ततस्त्वन्तन शजां शोक ां , र मस्य स्क्लष्टटकमषणः। लक्ष्मणो व नरेन्तर य, सुग्रीव य न्त्वेद्त्।।5.35.35।।
  • 10.
    10 स श्रुत्व वनरेन्तरस्तु, लक्ष्मणेनेररतां वचः। तद सीस्न्तनष्टप्रभोऽत्यथं, ग्रहग्रस्त इव ांशुम न्।।5.35.36।। ततस्त्वद्धि रशोभीनन, रिस दियम णय । य न्तय भरणज ल नन, प नतत नन महीतले।।5.35.37।। त नन सव षणण र म य, आनीय हररयूथप ः। सांहृष्टट दशग्ामासु-र्गनतां तु न ववदुस्तव।।5.35.38।। त नन र म य दत्त नन, मयैवोपहृत नन च। स्वनवन्तत्यवकीण षनन, तस्स्मस्न्तवितचेतमस।।5.35.39।। त न्तयङ्क े दशषनीय नन, कृ त्व बहुववधां तव। तेन देवप्रक शेन, देवेन पररदेववतम ्।।5.35.40।।
  • 11.
    11 पश्यतस्त नन रुदत-स्तम्यतश्च पुनः पुनः। प्र दीपयन्तद शरथे-स्त नन शोकहुत शनम्।।5.35.41।। शनयतां च गचरां तेन, दुःख तेन मह त्मन । मय वप ववववधैव षक्यैः, कृ च्छ्र दुत्थ वपतः पुनः।।5.35.42।। त नन दृष्ट्व मह ब हु-दषशषनयत्व मुहुमुषहुः। र र्घवस्सह सौममत्रर-स्सुग्रीवे स न्त्वेद्त्।।5.35.43।। स तव दशषन द ये, र र्घवः परितप््ते। महत ज्वलत ननत्य-मस्ग्ननेव स्ग्नपवषतः।।5.35.44।। त्वत्कृ ते तमननर च, शोकस्श्चन्तत च र र्घवम्। ताप्न्न्तत मह त्म न-मग्न्तयि रममव ग्नयः।।5.35.45।।
  • 12.
    12 तव दशषनशोक े न,र र्घवः प्रववचाल््ते। महत भूममकम्पेन, मह ननव मशलोच्छ्चयः।।5.35.46।। क नन नन सुरम्य णण, नदीः प्रस्रवण नन च। चरन्तन रनतमाप्नोतत, त्व मपश्यन्तनृप त्मजे।।5.35.47।। स त्व ां मनुजश दूषलः, क्षिप्रां प्राप्स््तत र र्घवः। सममरब न्तधवां हत्व , र वणां जनक त्मजे।।5.35.48।। सदहतौ र मसुग्रीव -वुभ वक ु रुत ां तद । समयां व मलनां हन्ततुां, तव च न्तवेर्णां तथ ।।5.35.49।। ततस्त भय ां क ु म र भय ां, वीर भय ां स हरीश्वरः। ककस्ष्टकन्तध ां समुप िम्य, व ली युद्धधे ननप नततः।।50।।
  • 13.
    13 ततो ननहत्य तरस, र मो व मलनम हवे। सवषिषहररसङ्र्घ न ां, सुग्रीवमकरोत्पनतम्।।5.35.51।। र मसुग्रीवयोरैक्यां, देर्वयेवां समजा्त। हनुमन्ततां च म ां ववद्धगध, तयोदूषतममह ितम्।।5.35.52।। स्वर ज्यां प्र प्य सुग्रीव-स्सम नीय हरीश्वर न्। त्वदथं प्रेष्ामास, ददशो दश मह बल न्।।5.35.53।। आददष्टट व नरेन्तरेण, सुग्रीवेण महौजस । अदरर जप्रतीक श -स्सवषतः प्रस्स्थतौ महीम्।।5.35.54।। ततस्ते म िषम ण वै, सुग्रीववचन तुर ः। चिन्न्तत वसुध ां कृ त्स्न ां, वयमन्तये च व नर ः।।5.35.55।।
  • 14.
    14 अङ्िदो न मलक्ष्मीव -न्तव मलसूनुमषह बलः। प्रस्स्थतः कवपश दूषल-स्स्रभ िबलसांवृतः।।5.35.56।। तेर् ां नो ववप्रणष्टट न ां, ववन्त्ये पवषतसत्तमे। भृशां शोकपरीत न -महोर रिण ित ः।।5.35.57।। ते वयां क यषनैर श्य -त्क लस्य नतक्रमेण च। भय च्छ्च कवपर जस्य, प्र ण ांस्त्यक्तुां र्वयवस्स्थत ः।।58।। ववगचत्य वनदुि षणण, गिररप्रस्रवण नन च। अन स द्धय पदां देर्वय ः, प्र ण ांस्त्यक्तुां समुद्धयत ः।।59।। दृष्ट्व प्र योपववष्टट ांश्च, सव षन्तव नरपुङ्िव न्। भृशां शोक णषवे मग्नः, पयषदेवयदङ्िदः।।5.35.60।।
  • 15.
    15 तव न शांच वैदेदह, व मलनश्च वधां तथ । प्र योपवेशमस्म क ां , मरणां च जट युर्ः।।5.35.61।। तेर् ां नस्व ममसन्तदेश -स्न्तनर श न ां मुमूर्षत म्। क यषहेतोररव य त-श्शक ु ननवीयषव न्तमह न्।।5.35.62।। िृध्रर जस्य सोदयषः, सम्प नतन षम िृध्रर ्। श्रुत्व भ्र तृवधां कोप -दददां वचनमब्रवीत्।।5.35.63।। यवीय न्तक े न मे भ्र त , हतः क्व च ननप नततः। एतद ख्य तुसमच्छासम, भवद्धमभव षनरोत्तम ः।।5.35.64।। अङ्िदोऽकथयत्तस्य, जनस्थ ने महद्धवधम्। रिस भीमरूपेण, त्व मुद्धददश्य यथ तथम्।।5.35.65।।
  • 16.
    16 जट युर्ो वधांश्रुत्व , दुःणखतस्सोऽरुण त्मजः। त्व ां शशिंस वर रोहे, वसन्ततीां र वण लये।।5.35.66।। तस्य तद्धवचनां श्रुत्व , सम्प तेः प्रीनतवधषनम्। अङ्िदप्रमुख स्तूणं, ततस्सम्प्रस्स्थत वयम्।।5.35.67।। ववन्त्य दुत्थ य सम्प्र प्त -स्स िरस्य न्ततमुत्तरम्*। त्वद्धधशषनकृ तोत्स ह , हृष्टट स्तुष्टट ः प्लवङ्िम ः।।68।। अङ्िदप्रमुख स्सवे, वेलोप न्ततमुपस्स्थत ः। गचन्तत ां जगमुः पुनभीत -स्त्वद्धदशषनसमुत्सुक ः।।5.35.69। अथ हां हररसैन्तयस्य, स िरां प्रेक्ष्य सीदतः। र्वयवधूय भयां तीव्रां, योजन न ां शतां प्लुतः।।5.35.70।।
  • 17.
    17 लङ्क च वपमय र रौ, प्रववष्टट र िस क ु ल । र वणश्च मय दृष्टट-स्त्वां च शोकपररप्लुत ।।5.35.71।। एतत्ते सवषम ख्य तां, यथ वृत्तमनस्न्तदते। असििाषस्व म ां देवव, दूतो द शरथेरहम्।।5.35.72।। तां म ां र मकृ तोद्धयोिां, त्वस्न्तनममत्तममह ितम्। सुग्रीवसगचवां देवव, बुद्ध्यस्व पवन त्मजम्।।5.35.73।। क ु शली तव क क ु त्स्थ-स्सवषशस्रभृत ां वरः। िुरोर र धने युक्तो, लक्ष्मणश्च सुलिणः।।5.35.74।। तस्य वीयषवतो देवव, भतुषस्तव दहते रतः। अहमेकस्तु सम्प्र प्त-स्सुग्रीववचन ददह*।।5.35.75।।
  • 18.
    18 मयेयमसह येन, चरतक मरूवपण । दक्षिण ददिनुक्र न्तत , त्वन्तम िषववचयैवर्ण ।।5.35.76।। ददष्ट्य हां हररसैन्तय न ां, त्वन्तन शमनुशोचत म्। अपनेष््ासम सन्तत पां, तव मभिमशांसन त्।।5.35.77।। ददष्ट्य दह मम न र्वयथं, देवव स िरलङ्र्घनम्। प्राप्स््ाम््हममदां ददष्ट्य , त्वद्धदशषनकृ तां यशः।।5.35.78।। र र्घवश्च मह वीयषः, क्षिप्रां त्व मसिपत्स््ते। सममरब न्तधवां हत्व , र वणां र िस गधपम्।।5.35.79।। म ल्यव न्तन म वैदेदह, गिरीण मुत्तमो गिररः। ततो र्च्छतत िोकणं, पवषतां क े सरी हररः।।5.35.80।।
  • 19.
    19 स च देववर्षमभददषष्टटः,वपत मम मह कवपः। तीथे नदीपतेः पुण्ये, शम्बस दनमुद्धधरत्।।5.35.81।। तस्य हां हररणः िेरे, ज तो व तेन मैगथमल। हनुम नननत ववख्य तो, लोक े स्वेनैव कमषण ।।5.35.82।। ववश्व स थं तु वैदेदह, भतुषरुक्त मय िुण ः। अगचर र र्घवो देवव, त्व ममतो ननयत ऽनर्घे।।5.35.83।। एवां ववश्व मसत सीत , हेतुमभश्शोककमशषत । उपपन्तनैरमभज्ञ नैदूषतां, तमवर्च्छतत।।5.35.84।। अतुलां च ित हर्ं, प्रहर्ेण च ज नकी। नेर भय ां वक्रपक्ष्म भय ां, मुमोचानन्तदजां जलम्।।5.35.85।।
  • 20.
    20 च रु तद्धवदनांतस्य -स्त म्रशुक्ल यतेिणम्। अशोित ववश ल क्ष्य , र हुमुक्त इवोडुर ्।।5.35.86।। हनुमन्ततां कवपां र्वयक्तां, मन्तयते न न्तयथेनत स । अथोवाच हनूम ांस्त -मुत्तरां वप्रयदशषन म्।।5.35.87।। एतत्ते सवषम ख्य तां, सम श्वमसदह मैगथमल। ककां किोसम कथां व ते, िोचते प्रतत्ाम््हम्।।5.35.88।। हतेऽसुरे सांयनत शम्बस दने, कवपप्रवीरेण महवर्षचोदन त्। ततोऽन्स्म व युप्रभवो दह मैगथमल, प्रभ वतस्तत्प्रनतमश्च व नरः।। 5.35.89 ।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे पञ्चत्ररांशस्सिषः।।
  • 21.
  • 22.
    22 भूय एव महतेज , हनूम न्तपवन त्मजः। अब्रवीत्प्रगश्रतां व क्यां, सीत प्रत्ययक रण त्।।5.36.1।।. व नरोऽहां मह भ िे, दूतो र मस्य धीमतः। र मन म ङ्ककतां चेदां, पश्् देर्वयङ्िुलीयकम्।।5.36.2।। प्रत्यय थं तव ऽनीतां, तेन दत्तां मह त्मन । सम श्वमसदह भरां ते, िीणदुःखफल ह््सस।।5.36.3।। िृहीत्व प्रेिम ण स , भतुषः करववभूर्णम्। भत षरममव सम्प्र प्त , ज नकी मुददत ऽिवत्।।5.36.4।। च रु तद्धवदनां तस्य -स्त म्रशुक्ल यतेिणम्। अशोित ववश ल क्ष्य , र हुमुक्त इवोडुर ्।।5.36.5।।
  • 23.
    23 ततस्स िीमती बल , भतृषसन्तदेशहवर्षत । पररतुष्टट वप्रयां कृ त्व , प्रशशिंस मह कवपम्।।5.36.6।। ववक्र न्ततस्त्वां समथषस्त्वां, प्र ज्ञस्त्वां व नरोत्तम। येनेदां र िसपदां, त्वयैक े न प्रधवर्षतम्।।5.36.7।। शतयोजनववस्तीणष-स्स िरो मकर लयः। ववक्रमश्ल र्घनीयेन, क्रमत िोष्टपदीकृ तः।।5.36.8।। न दह त्व ां प्र कृ तां मन्त्े, व नरां व नरर्षभ। यस्य ते नान्स्त सन्तर सो, र वण न्तन वप सम्भ्रमः।।5.36.9। अर्गसे च कवपश्रेष्टि, मय सममभभ वर्तुम्। यद््सस प्रेवर्तस्तेन, र मेण ववददत त्मन ।।5.36.10।।
  • 24.
    24 प्रेषत्ष््तत दुधषर्ो, रमो न ह्यपरीक्षितम्। पर क्रममववज्ञ य, मत्सक शां ववशेर्तः।।5.36.11।। ददष्ट्य च क ु शली र मो, धम षत्म सत्यसङ्िरः। लक्ष्मणश्च मह तेज -स्सुममर नन्तदवधषनः।।5.36.12।। क ु शली यदद क क ु त्स्थः, ककां नु स िरमेखल म्। महीां दर्तत कोपेन, युि न्तत स्ग्नररवोस्त्थतः।।5.36.13।। अथव शस्क्तमन्ततौ तौ, सुर ण मवप ननग्रहे। ममैव तु न दुःख न -मन्स्त मन्त्े ववपयषयः।।5.36.14।। कस्च्छ्चन्तन र्वयगथतो र मः, कस्च्छ्चन्तन परितप््ते। उत्तर णण च क य षणण, क ु रुते पुरुर्ोत्तमः।।5.36.15।।
  • 25.
    25 कस्च्छ्चन्तन दीनस्सम्भ्र न्ततः,क येर्ु न च मुह््तत। कस्च्छ्चत्पुरुर्क य षणण, क ु रुते नृपतेस्सुतः।।5.36.16।। द्धववववधां त्ररववधोप य-मुप यमवप सेवते। ववन्जर्ीषुस्सुहृत्कस्च्छ्च-स्न्तमरेर्ु च परन्ततपः।।5.36.17।। कस्च्छ्चस्न्तमर णण लिते, ममरैश्च प््सिर्म््ते। कस्च्छ्चत्कल्य णममत्रश्च, ममरत्रैश्च वप पुरस्कृ तः।।18।। कस्च्छ्चद श स्स्त देव न ां, प्रस दां प गथषव त्मजः। कस्च्छ्चत्पुरुर्क रां च, दैवां च प्रततपद््ते।।5.36.19।। कस्च्छ्चन्तन ववितस्नेहः, प्रव स न्तमनय र र्घवः। कस्च्छ्चन्तम ां र्वयसन दस्म -न्तमोक्षत्ष््तत व नर।।5.36.20।
  • 26.
    26 सुख न मुगचतोननत्य-मसुख न मनौगचतः। दुःखमुत्तरम स द्धय, कस्च्छ्चर मो न सीदतत।।5.36.21।। कौसल्य य स्तथ कस्च्छ्च-त्सुममर य स्तथैव च। अभीक्ष्णां श्रू्ते कस्च्छ्च-त्क ु शलां भरतस्य च।।5.36.22।। मस्न्तनममत्तेन म न हषः, कस्च्छ्चच्छ्छोक े न र र्घवः। कस्च्छ्चन्तन न्तयमन र मः, कस्च्छ्चन्तम ां ताित्ष््तत।।23।। कस्च्छ्चदिौदहणीां भीम ां, भरतो भ्र तृवत्सलः। ्वस्जनीां मस्न्तरमभिुषप्त ां, प्रेषत्ष््तत मत्कृ ते।।5.36.24।। व नर गधपनतश्शीम -न्तसुग्रीवः कस्च्छ्चदेष््तत। मत्कृ ते हररमभवीरैवृषतो, दन्ततनख युधैः।।5.36.25।।
  • 27.
    27 कस्च्छ्चच्छ्छ लक्ष्मणश्शूर-स्सुममर नन्तदवधषनः। अस्रववच्छ्छरजलेन, र िस न्न्तवधसमष््तत।।5.36.26।। रौरेण कस्च्छ्चदस्रेण, ज्वलत ननहतां रणे। द्रक्ष््ाम््ल्पेन क लेन, र वणां ससुहृज्जनम्।।5.36.27।। कस्च्छ्चन्तन तद्धधेमसम नवणं, तस्य ननां पद्धमसम निस्न्तध। मय ववन शुष््तत शोकदीनां, जलिये पद्धमममव तपेन।।28।। धम षपदेश त्त्यजतश्च र ज्यां म ां, च प्यरण्यां नयतः पद नतम्। नासीद्र्व्थ यस्य न भीनष शोकः, कस्च्छ्चत्स धैयं हृदये किोतत।29।।
  • 28.
    28 न च स्यम त न वपत च न न्तयः, स्नेह द्धववमशष्टटोऽन्स्त मय समो व । त वत्त्वहां दूत स्जजीववर्ेयां, य वत्प्रवृवत्तां शृणुय ां वप्रयस्य।।5.36.30।। इतीव देवी वचनां मह थं, तां व नरेन्तरां मधुर थषमुक्त्व । श्रोतुां पुनस्तस्य वचोऽमभर मां, र म थषयुक्तां ववरर म र म ।। सीत य वचनां श्रुत्व , म रुनतभीमववक्रमः। मशरस्यञ्जमलम ध य, व क्यमुत्तरमब्रवीत्।।5.36.32।। न त्व ममहस्थ ां ज नीते, र मः कमललोचने। तेन त्व ां नान्त््ाशु, शचीममव पुरन्तदरः।।5.36.33।।
  • 29.
    29 श्रुत्वैव तु वचोमह्यां, क्षिप्रमेष््तत र र्घवः। चमूां प्रकर्षन्तमहतीां, हयृषििणसङ्क ु ल म्।।5.36.34।। ववष्टटम्भनयत्व ब णौर्घै-रिोभयां वरुण लयम्। करिष््तत पुरीां लङ्क ां, क क ु त्स्थः श न्ततर िस म्।।35।। तर यद्धयन्ततर मृत्यु-यषदद देव स्सह सुर ः। स्थास््न्न्तत पगथ र मस्य, स त नवप वधधष््तत।।5.36.36। तव दशषनजेन ये, शोक े न स पररप्लुतः। न शमष लिते र म-स्स्सांह ददषत इव द्धववपः।।5.36.37।। मलयेन च ववन्त्येन, मेरुण मन्तदरेण च। ददुषरेण च ते देवव, शपे मूलफलेन च।।5.36.38।।
  • 30.
    30 यथ सुनयनां वल्िु,त्रबम्बोष्टिां च रु क ु ण्डलम्। मुखां द्रक्ष््सस र मस्य, पूणषचन्तरममवोददतम्।।5.36.39।। क्षिप्रां द्रक्ष््सस वैदेदह, र मां प्रस्रवणे गिरौ। शतक्रतुममव सीनां, न िर जस्य मूधषनन।।5.36.40।। न म ांसां र र्घवो िुङक्ते, न च ऽवप मधु सेवते। वन्तयां सुववदहतां ननत्यां, भक्तमश्नातत पञ्चमम्।।5.36.41।। नैव दांश न्तन मशक न्तन, कीट न्तन सरीसृप न्। र र्घवोऽपनयेद्धि र -त्त्वद्धितेन न्ततर त्मन ।।5.36.42।। ननत्यां ्य नपरो र मो, ननत्यां शोकपर यणः। न न्तयन्च्चन्तत्ते ककस्ञ्च-त्स तु क मवशां ितः।।5.36.43।।
  • 31.
    31 अननरस्सततां र म-स्सुप्तोऽवपच नरोत्तमः। सीतेनत मधुर ां व णीां, र्वय हरन्तप्रततबुध््ते।।5.36.44।। दृष्ट्व फलां व पुष्टपां व , यद्धव ऽन्तयत्सुमनोहरम्। बहुशो ह वप्रयेत्येवां, श्वसांस्त्व मसििाषते।।5.36.45।। स देवव ननत्यां पररतप्यम न-स्त्व मेव सीतेत्यमभभ र्म णः। धृतव्रतो र जसुतो मह त्म , तवैव ल भ य कृ तप्रयत्नः।।46। स र मसङ्कीतषनवीतशोक , र मस्य शोक े न सम नशोक । शरन्तमुखे स म्बुदशेर्चन्तर , ननशेव वैदेहसुत बिूव।।47।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे र््त्ररांशस्सिषः।।
  • 32.
    32 सप्तत्रिंशस्सर्गः Hanuman offers tocarry Sita back to Rama Sita politely Sita declines -- appeals to Hanuman to get Rama to take her 32
  • 33.
    33 सीत तद्धवचनां श्रुत्व, पूणषचन्तरननभ नन । हम मन्ततमुवाचेदां, धम षथषसदहतां वचः।।5.37.1।। अमृतां ववर्सांसृष्टटां, त्वय व नर भ वर्तम्। यच्छ्च न न्तयमन र मो, यच्छ्च शोकपर यणः ।।5.37.2।। ऐश्वये व सुववस्तीणे, र्वयसने व सुद रुणे। रज्ज्वेव पुरुर्ां बद्ध्व , कृ त न्ततः पररकर्षनत।।5.37.3।। ववगधनूषनमसांह यषः, प्र णणन ां प्लविोत्तम। सौममत्ररां म ां च र मां च, र्वयसनै: पश्् मोदहत न्।।5.37.4।। शोकस्य स्य कद प रां, र र्घवोऽधधर्समष््तत। प्लवम नः पररश्र न्ततो, हतनौस्स िरे यथ ।।5.37.5।।
  • 34.
    34 र िस नां वधां कृ त्व , सूदनयत्व च र वणम्। लङ्क मुन्तमूमलत ां कृ त्व , कद द्रक्ष््तत म ां पनतः।।5.37.6।। स व च्छ्यस्सांत्वरस्वेनत, य वदेव न पू्गते। अयां सांवत्सरः क ल-स्त वद्धगध मम जीववतम्।।5.37.7।। वतषते दशमो म सो, द्धवौ तु शेर्ौ प्लवङ्िम। र वणेन नृशांसेन, समयो यः कृ तो मम।।5.37.8।। ववभीर्णेन च भ्र र , मम ननय षतनां प्रनत। अनुनीतः प्रयत्नेन, न च तत्क ु रुते मनतम्।।5.37.9।। मम प्रनतप्रद नां दह, र वणस्य न िोचते। र वणां म िषते सांख्ये, मृत्युः क लवशां ितम्।।5.37.10।।
  • 35.
    35 ज्येष्टि कन्तय नलन म, ववभीर्णसुत कपे। तय ममेदम ख्य तां, म र प्रदहतय स्वयम्।।5.37.11।। असांशयां हररश्रेष्टि, क्षिप्रां म ां प्राप्स््ते पनतः। अन्ततर त्म च मे शुद्धध-स्तस्स्मांश्च बहवो िुण ः।।12।। उत्स हः पौरुर्ां सत्त्व-म नृशांस्यां कृ तज्ञत । ववक्रमश्च प्रभ वश्च, सस्न्तत व नर र र्घवे।।5.37.13।। चतुदषशसहस्र णण, र िस न ां जघान यः। जनस्थ ने ववन भ्र र , शरुः कस्तस्य नोद्ववजेत्।।14।। न स शक्यस्तुलनयतुां, र्वयसनैः पुरुर्र्षभः। अहां तस्य प्रभ वज्ञ , शक्रस्येव पुलोमज ।।5.37.15।।
  • 36.
    36 शरज ल ांशुमन्तशूरः, कपे र मददव करः। शरुरिोमयां तोय-मुपशोर्ां नत्ष््तत।।5.37.16।। इनत सञ्जल्पम न ां त ां, र म थे शोककमशषत म ्। आश्रुसम्पूणषनयन -मुवाच वचनां कवपः।।5.37.17।। श्रुत्वैव तु वचो मह्यां, क्षिप्रमेष््तत र र्घवः। चमूां प्रकर्षन्तमहतीां, हयृषििणसङ्क ु ल म ्।।5.37.18।। अथव मोचत्ष््ासम, त्व मद्धयैव वर नने। अस्म द्धधुःख दुप रोह, मम पृष्टिमननस्न्तदते।।5.37.19।। त्व ां दह पृष्टिित ां कृ त्व , सन्ततरिष््ासम स िरम ्। शस्क्तिन्स्त दह मे वोढुां, लङ्क मवप सर वण म ्।।20।।
  • 37.
    37 अहां प्रस्रवणस्थ य,र र्घव य द्धय मैगथमल। प्रापत्ष््ासम शक्र य, हर्वयां हुतममव नलः।।5.37.21।। रक्ष्यस्यद्धवैव वैदेदह, र र्घवां सहलक्ष्मणम्। र्वयवस यसम युक्तां, ववष्टणुां दैत्यवधे यथ ।।5.37.22।। त्वद्धदशषनकृ तोत्स ह-म श्रमस्थां मह बलम्। पुरन्तदरममव सीनां, न िर जस्य मूधषनन।।5.37.23।। पृष्टिम रोह मे देवव, म ववकाङ्क्क्षस्व शोभने। योिमस्न्तवच्छ्छ र मेण, शश ङ्क े नेव रोदहणी।।5.37.24।। कथयन्ततीव चन्तरेण, सूयेण च मह गचषर् । मत्पृष्टिमगधरुह्य त्वां, तर क शमह णषवौ।।5.37.25।।
  • 38.
    38 न दह मेसम्प्रय तस्य, त्व ममतो नयतोऽङ्िने। अनुिन्ततुां िनतां शक्त -स्सवे लङ्क ननव मसनः।।5.37.26।। यथैव हममह प्र प्त-स्तथैव हमसांशयः। ्ास््ासम पश्य वैदेदह, त्व मुद्धयम्य ववह यसम्।।5.37.27। मैगथली तु हररश्रेष्टि -च्छ्ुत्व वचनमद्धभुतम्। हर्षववस्स्मतसव षङ्िी, हनुमन्ततमथाब्रवीत्।।5.37.28।। हनुमन्तदूरम्व नां, कथां म ां वोढुसमच्छसस। तदेव खलु ते मन्तये, कवपत्वां हररयूथप।।5.37.29।। कथां व ल्पशरीरस्त्वां, म ममतो नेतुसमच्छसस। सक शां म नवेन्तरस्य, भतुषमे प्लविर्षभ।।5.37.30।।
  • 39.
    39 सीत य वचनांश्रुत्व , हनुम न्तम रुत त्मजः। धचन्तत्ामास लक्ष्मीव -न्तनवां पररभवां कृ तम्।।5.37.31।। न मे जानातत सत्त्वां व , प्रभ वां व ऽमसतेिण । तस्म त्पश््तु वैदेही, यरूपां मम क मतः।।5.37.32।। इनत सस्ञ्चन्तत्य हनुम ां-स्तद प्लविसत्तमः। दशग्ामास वैदेह्य -स्स्वरूपमररमदषनः।।5.37.33।। स तस्म त्प दप द्धधी-म न प्लुत्य प्लविर्षभः। ततो वगधषतुम रेभे, सीत प्रत्ययक रण त्।।5.37.34।। मेरुमन्तदरसङ्क शो, बिौ दीप्त नलप्रभः। अग्रतो र्वयवतस्थे च, सीत य व नरोत्तमः।।5.37.35।।
  • 40.
    40 हररः पवषतसङ्क श-स्तम्रवक्रो मह बलः। वज्रदांष्टरनखो भीमो, वैदेहीममदमब्रवीत्।।5.37.36।। सपवषतवनोद्धदेश ां, स ्टप्र क रतोरण म्। लङ्क ममम ां सन थ ां व , ननयतुां शस्क्तिन्स्त मे।।5.37.37।। तदवस्थ प्यत ां बुद्धगध-रलां देवव ववक ङ्िय । ववशोक ां क ु रु वैदेदह, र र्घवां सहलक्ष्मणम्।।5.37.38।। तां दृष्ट्व भीमसङ्क श-मुवाच जनक त्मज । पद्धमपरववश ल िी, म रुतस्यौरसां सुतम्।।5.37.39।। तव सत्त्वां बलां चैव, ववजानासम मह कपे। व योररव िनतां चैव, तेजश्च ग्नेररव द्धभुतम्।।5.37.40।।
  • 41.
    41 प्र कृ तोऽन्तयःकथां चेम ां, भूममम िन्ततुमर्गतत। उदधेरप्रमेयस्य, प रां व नरपुङ्िव।।5.37.41।। जानासम िमने शस्क्तां, नयने च वप ते मम। अवश्यां सम्प्रध य षशु, क यषमसद्धगधमषह त्मनः।।5.37.42।। अयुक्तां तु कवपश्रेष्टि, मम िन्ततुां त्वय ऽनर्घ। व युवेिसवेिस्य, वेिो म ां मोहयेत्तव।।5.37.43।। अहम क शम पन्तन , ह्युपयुषपरर स िरम्। प्रपतेयां दह ते पृष्टि -द्धभय द्धवेिेव िच्छ्छतः।।5.37.44।। पनतत स िरे च हां, नतममनक्रझर् क ु ले। भवेयम शु वववश , य दस मन्तनमुत्तमम्।।5.37.45।।
  • 42.
    42 न च शक्ष््ेत्वय स धं, िन्ततुां शरुववन शन। कलरवनत सन्तदेह-स्त्वय्यवप स्य दसांशयः।।5.37.46।। दियम ण ां तु म ां दृष्ट्व , र िस भीमववक्रम ः। अनुिच्छ्छेयुर ददष्टट , र वणेन दुर त्मन ।।5.37.47।। तैस्त्वां पररवृतश्शूरै-श्शूलमुद्धिरप णणमभः। भवेस्त्वां सांशयां प्र प्तो, मय वीर कलरव न्।।5.37.48।। स युध बहवो र्वयोस्म्न, र िस स्त्वां ननर युधः। कथां शक्ष््सस सांय तुां, म ां चैव परररक्षितुम्।।5.37.49।। यु्यम नस्य रिोमभ-स्तव तैः क्र ू रकमषमभः। प्रपतेयां दह ते पृष्टि -द्धभय त ष कवपसत्तम।।5.37.50।।
  • 43.
    43 अथ रि ांमसभीम नन, मह स्न्तत बलवस्न्तत च। कथस्ञ्चत्स ांपर ये त्व ां, ज्े्ुः कवपसत्तम।।5.37.51।। अथव यु्यम नस्य, पतेयां ववमुखस्य ते। पनतत ां च िृहीत्व म ां, न्े्ुः प पर िस ः।।5.37.52।। म ां व र्िे्ुस्त्वद्धधस्त -द्धववशसेयुरथ वप व । अर्वयवस्थौ दह दृश्येते, युद्धधे जयपर जयौ।।5.37.53।। अहां व वप ववपद्धयेयां, रिोमभरमभतस्जषत । त्वत्प्रयत्नो हररश्रेष्टि, भवेस्न्तनष्टफल एव तु।।5.37.54।। क मां त्वमसस पय षप्तो, ननहन्ततुां सवषर िस न्। र र्घवस्य यशो र्ी्े-त्त्वय शस्तैस्तु र िसैः।।5.37.55।।
  • 44.
    44 अथव ऽद यरि ांमस, न्त्से्ुस्सम्वृते दह म म ्। यर ते नासिजानी्ु-र्गरयो न वप र र्घवौ।।5.37.56।। आरम्भस्तु मदथोऽयां, ततस्तव ननरथषकः। त्वय दह सह र मस्य, मह न िमने िुणः।।5.37.57।। मनय जीववतम यत्तां, र र्घवस्य मह त्मनः। भ्र रूण ां च मह ब हो, तव र जक ु लस्य च।।5.37.58।। तौ ननर शौ मदथं तु, शोकसन्तत पकमशषतौ। सह सवषिषहररमभ-स्त्यक्ष्यतः प्र णसङ्ग्रहम्।।5.37.59।। भतुषभषस्क्तां पुरस्कृ त्य, र म दन्तयस्य व नर। न स्पृशासम शरीरां तु, पुांसो व नरपुङ्िव।।5.37.60।।
  • 45.
    45 यदहां ि रसांस्पशं,र वणस्य बल द्धित । अनीश ककां करिष््ासम, ववन थ वववश सती।।5.37.61।। यदद र मो दशग्रीव-ममह हत्त्व सब न्तधवम्। म ममतो िृह्य र्च्छेत, तत्तस्य सदृशां िवेत्।।5.37.62।। श्रुत दह दृष्टट श्च मय पर क्रम , मह त्मनस्तस्य रण वमददषनः। न देविन्तधवषभुजङ्िर िस , िवन्न्तत र मेण सम दह सांयुिे ।63।। समीक्ष्य तां सांयनत गचरक मुषकम्, मह बलां व सवतुल्यववक्रमम्। सलक्ष्मणां को ववर्हेत र र्घवां,
  • 46.
    46 हुत शनां दीप्तममवननलेररतम ्।।64।। सलक्ष्मणां र र्घवम स्जमदषनां, ददश िजां मत्तममव र्वयवस्स्थतम्। सर्ेत को व नरमुख्य सांयुिे, युि न्ततसूयषप्रनतमां शर गचषर्म्।।5.37.65।। स मे हररश्रेष्टि सलक्ष्मणां पनतां, सयूथपां क्षिप्रममर्ोपपाद्। गचर य र मां प्रनत शोककमशषत ां, क ु रुष्व म ां व नरमुख्य हवर्षत म ्।।5.37.66।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे सप्तत्ररांशस्सिषः।।
  • 47.
    47 अष्टत्रिंशस्सर्गः Hanuman carries theepisode of Kakasura and the Chudamani from Sita to Rama as a mark of identification 47
  • 48.
    48 ततस्स कवपश दूषल-स्तेनव क्येन तोवर्तः। सीत मुवाच तच्छ्छ ृ त्व , व क्यां व क्यववश रदः।।5.38.1।। युक्तरूपां त्वय देवव, भ वर्तां शुभदशषने। सदृशां स्रीस्वभ वस्य, स ्वीन ां ववनयस्य च।।5.38.2।। स्रीत्वां न तु समथं दह, स िरां र्वयनतवनतषतुम्। म मगधष्टि य ववस्तीणं, शतयोजनम यतम्।।5.38.3।। द्धववतीयां क रणां यच्छ्च, ब्रवीवष ववनय स्न्तवते। र म दन्तयस्य नार्ागसम, सांस्पशषममनत ज नकक ।।5.38.4।। एतत्ते सदृशां देवव, पत्न्तय स्तस्य मह त्मनः। क ह्यन्तय त्व मृते देवव, ब्रू्ाद्वचनमीदृशम्।।5.38.5।।
  • 49.
    49 श्रोष््ते चैव कक ु त्स्थ:, सवं ननरवशेर्तः। चेस्ष्टटतां यत्त्वय देवव, भ वर्तां मम च ग्रतः।।5.38.6।। क रणैबषहुमभदेवव, र मवप्रयगचकीर्षय । स्नेहप्रस्कन्तनमनस , मयैतत्समुदीररतम्।।5.38.7।। लङ्क य दुष्टप्रवेशत्व -द्धदुस्तरत्व न्तमहोदधेः। स मर्थय षद त्मनश्चैव, मयैतत्समुदीररतम ्।।5.38.8।। इच्छासम त्व ां सम नेतु-मद्धयैव रर्घुबन्तधुन । िुरुस्नेहेन भक्त्य च, न न्तयथैतदुद हृतम ्।।5.38.9।। यदद नोत्सर्से य तुां, मय स थषमननस्न्तदते। अमभज्ञ नां प्र्च्छ त्वां, जानी्ाद्रार्घवो दह यत्।।5.38.10।।
  • 50.
    50 एवमुक्त हनुमत ,सीत सुरसुतोपम । उवाच वचनां मन्तदां, ब ष्टपप्रग्रगथत िरम्।।5.38.11।। इदां श्रेष्टिममभज्ञ नां, ब्रू्ास्त्विं तु मम वप्रयम्। शैलस्य गचरक ू टस्य, प दे पूवोत्तरे पुर ।।5.38.12।। त पस श्रमव मसन्तय ः, प्र ज्यमूलफलोदक े । तस्स्मस्न्तसद्धध श्रमे देशे, मन्तद ककन्तय ववदूरतः।।5.38.13।। तस्योपवनर्ण्डेर्ु, न न पुष्टपसुिस्न्तधर्ु। ववहृत्य समलले स्क्लन्तन , मम ङ्क े समुप ववशमः।।14।। ततो म ांससम युक्तो, व यसः पयषतुण्डयत्। तमहां लोष्टटमुद्धयम्य, व रय ममस्म व यसम्।।5.38.15।।
  • 51.
    51 द रयन्तस चम ां क क-स्तत्रैव पररलीयते। न च प्युप रमन्तम ांस -द्धभि गथष बमलभोजनः।।5.38.16।। उत्कर्षन्तत्य ां च रशन ां, क्र ु द्धध य ां मनय पक्षिणण। स्रस्यम ने च वसने, ततो दृष्टट त्वय ह्यहम्।।5.38.17।। त्वय ऽपहमसत च हां, क्र ु द्धध सांलस्ज्जत तद । भििृ्नेन क क े न, द ररत त्व मुप ित ।।5.38.18।। आसीनस्य च ते श्र न्तत , पुनरुत्सङ्िम ववशम्। क्र ु ्यन्तती च प्रहृष्टटेन, त्वय ऽहां पररस स्न्तत्वत ।।5.38.19।। ब ष्टपपूणषमुखी मन्तदां, चिुर्ी पररम जषती। लक्षित ऽहां त्वय न थ, व यसेन प्रकोवपत ।।5.38.20।।
  • 52.
    52 पररश्रम त्प्रसुप्त च,र र्घव ङ्क े ऽप्यहां गचरम्। पय षयेण प्रसुप्तश्च, मम ङ्क े भरत ग्रजः।।5.38.21।। स तर पुनरेव थ, व यसस्समुप िमत्। ततस्सुप्तप्रबुद्धध ां म ां, र मस्य ङ्क त्समुस्त्थत म्।।22।। व यसस्सहस िम्य, ववददाि स्तन न्ततरे। पुनः पुनरथोत्पत्य, ववददाि स म ां भृशम्।।5.38.23।। ततस्समुक्षितो र मो, मुक्तैश्शोणणतत्रबन्तदुमभः। व यसेन ततस्तेन, बलवस्त्क्लश्यम नय ।।5.38.24।। स मय बोगधतश्श्रीम -न्तसुखसुप्तः परन्ततपः। स म ां दृष्ट्व मह ब हु-ववषतुन्तन ां स्तनयोस्तद ।।5.38.25।।
  • 53.
    53 आशीववर् इव क्र ुद्धध-श्वसन्तव क्यमभ र्त। क े न ते न िन सोरु, ववितां वै स्तन न्ततरम्।।5.38.26।। कः क्रीडतत सरोर्ेण, पञ्चवक्रेण भोगिन । वीिम णस्ततस्तां वै, व यसां समुदैक्षत।।5.38.27।। नखैस्सरुगधरैस्तीक्ष्णै-म षमेव मभमुखां स्स्थतम्। पुत्रः ककल स शक्रस्य, व यसः पतत ां वरः।।5.38.28।। धर न्ततरितश्शीघ्रां, पवनस्य ितौ समः। ततस्तस्स्मन्तमह ब हुः, कोपसांवनतषतेिणः।।5.38.29।। व यसे कृ तव न्तक्र ू र ां, मनतां मनतमत ां वरः। स दभं सांस्तर द्धिृह्य, ब्र ह्मेण स्रेण ्ोज्त्।।5.38.30।।
  • 54.
    54 स दीप्त इवक ल स्ग्न-जषज्व ल मभमुखो द्धववजम्। स तां प्रदीप्तां गचिेप, दभं तां व यसां प्रनत।।5.38.31।। ततस्तां व यसां दभष-स्सोम्बरेऽनुजर्ाम ह। अनुसृष्टटस्तद क को, जर्ाम ववववध ां िनतम्।।5.38.32।। लोकक म इमां लोक ां , सवं वै ववचच र ह। स वपर च पररत्यक्त-स्सुरैश्च समहवर्षमभः।।5.38.33।। रीन्तलोक न्तसम्पररक्रम्य, तमेव शरणां ितः। स तां ननपनततां भूमौ, शरण्यश्शरण ितम्।।5.38.34।। वध हषमवप क क ु त्स्थ:, कृ पय प्गपाल्त्। पररद्धयूनां ववर्ण्णां च, स तम य न्ततमब्रवीत्।।5.38.35।।
  • 55.
    55 मोर्घां कतुं नशक्यां तु, ब्र ह्ममस्रां तदुच्छ्यत म्। दहनस्तु दक्षिण क्षि त्व-च्छ्छर इत्यथ सोऽब्रवीत्।।5.38.36।। ततस्तस्य क्षि क कस्य, दहनस्स्त स्म स दक्षिणम्। दत्त्व स दक्षिणां नेरां, प्र णेभयः परररक्षितः।।5.38.37।। स र म य नमस्कृ त्य, र ज्ञे दशरथ य च। ववसृष्टटस्तेन वीरेण, प्रततपेदे स्वम लयम्।।5.38.38।। मत्कृ ते क कम रे तु, ब्रह्म स्रां समुदीररतम्। कस्म द्धयो म ां हरेत्त्वत्तः, क्षमसे तां महीपते।।5.38.39।। स क ु रुष्टव महोत्स हः, कृ प ां मनय नरर्षभ। त्वय न थवती न थ, ह्यन थ इव दृश््ते।।5.38.40।।
  • 56.
    56 आनृशांस्यां परो धमष-स्तवत्त्तऐव मय श्रुतः। जानासम त्व ां मह वीयं, महोत्स हां मह बलम्।।5.38.41।। अप रप रमिोभयां, ि म्भीय षत्स िरोपमम्। भत षरां ससमुर य , धरण्य व सवोपमम्।।5.38.42।। एवमस्रववद ां श्रेष्टि-स्सत्यव न्तबलव नवप। ककमथषमस्रां रिस्सु, न ्ोज्सस र र्घव।।5.38.43।। न न ि न ऽवप िन्तधव ष, न सुर न मरुद्धिण ः। र मस्य समरे वेिां, शक्त ः प्रनतसम गधतुां।।5.38.44।। तस्य वीयषवतः कस्श्च-द्धयद्धयस्स्त मनय सम्भ्रमः। ककमथं न शरैस्तीक्ष्णै:, ियां न्तत र िस न्।।5.38.45।।
  • 57.
    57 भ्र तुर देशमद य, लक्ष्मणो व परन्ततपः। कस्य हेतोनष म ां वीरः, पररर नत मह बलः।।5.38.46।। यदद तौ पुरुर्र्वय घ्रौ, व य्वस्ग्नसमतेजसौ। सुर ण मवप दुधषर्ौ, ककमथं म मुपेितः।।5.38.47।। ममैव दुष्टकृ तां ककस्ञ्च-न्तमहदन्स्त न सांशयः। समथ षववप तौ यन्तम ां, नावेक्षेते परन्ततपौ।।5.38.48।। वैदेह्य वचनां श्रुत्व , करुणां स श्रुभ वर्तम्। अथाब्रवीन्तमह तेज , हनुम न्तम रुत त्मजः।।5.38.49।। त्वच्छ्छोकववमुखो र मो, देवव सत्येन ते शपे। र मे दुःख मभपन्तने च, लक्ष्मणः परितप््ते।।5.38.50।।
  • 58.
    58 कथस्ञ्चद्धभवती दृष्टट ,न क लः पररदेववतुम्। इमां मुहूतं दुःख न ां, द्रक्ष््स््न्ततमननस्न्तदते।।5.38.51।। त वुभौ पुरुर्र्वय घ्रौ, र जपुरौ मह बलौ। त्वद्धदशषनकृ तोत्स हौ, लङ्क ां भस्मीकररष्टयतः।।5.38.52।। हत्त्व च समरे क्र ू रां, र वणां सहब न्तधवम्। र र्घवस्त्व ां ववश ल क्षि, नेष््तत स्व ां पुरीां प्रनत।।5.38.53।। ब्रूहर् यर र्घवो व च्छ्यो, लक्ष्मणश्च मह बलः। सुग्रीवो व वप तेजस्वी, हरयोऽवप सम ित ः।।5.38.54।। इत्युक्तवनत तस्स्मांस्तु, सीत सुरसुतोपम । उवाच शोकसन्ततप्त , हनुमन्ततां प्लवङ्िमम्।।5.38.55।।
  • 59.
    59 कौसल्य लोकभत षरां,सुषुवे यां मनस्स्वनी। तां मम थे सुखां पृच्छ, मशरस चासिवाद्।।5.38.56।। स्रजश्च सवषरत्न नन, वप्रय य श्च वर ङ्िन ः। ऐश्वयं च ववश ल य ां, पृगथर्वय मवप दुलषभम्।।5.38.57।। वपतरां म तरां चैव, सम्म न्त्ासिप्रसाद्् च। अनुप्रव्रस्जतो र मां, सुममर येन सुप्रज ः।।5.38.58।। आनुक ू ल्येन धम षत्म , त्यक्त्व सुखमनुत्तमम्। अनुर्च्छतत क क ु त्स्थां, भ्र तरां प लयन्तवने।।5.38.59।। मसांहस्कन्तधो मह ब हु-मषनस्वी वप्रयदमशषनः। वपतृवद्वतगते र मे, म तृवन्तम ां सम चरन्।।5.38.60।।
  • 60.
    60 दियम ण ांतद वीरो, न तु म ां वेद लक्ष्मणः। वृद्धधोपसेवी लक्ष्मीव न्, शक्तो न बहुभ वर्त ।।5.38.61।। र जपुरः वप्रयः श्रेष्टिः, सदृशः श्वशुरस्य मे। ममः वप्रयतरो ननत्यां, भ्र त र मस्य लक्ष्मणः।।5.38.62।। ननयुक्तो धुरर यस्य ां तु, त मुद्वर्तत वीयषव न्। यां दृष्ट्व र र्घवो नैव, वृत्तम यषमनुस्मिेत्।।5.38.63।। स मम थ षय क ु शलां, वक्तर्वयो वचन न्तमम। मृदुननषत्यां शुगचदषिः, वप्रयो र मस्य लक्ष्मणः।।5.38.64।। यथ दह व नरश्रेष्टि, दुःखियकरो िवेत्। त्वमस्स्मन्तक यषननयोिे, प्रम णां हररसत्तमः।।5.38.65।।
  • 61.
    61 र र्घवस्त्वत्सम रम्भ-न्तमनय यत्नपरो िवेत्। इदां ब्रू्ाश्च मे न थां, शूरां र मां पुनः पुनः।।5.38.66।। जीववतां धाित्ष््ासम, म सां दशरथ त्मज। ऊ्वं म स न्तन जीवेयां, सत्येन हां ब्रवीसम ते।।5.38.67।। र वणेनोपरुद्धध ां म ां, ननकृ त्य प पकमषण । र तुमर्गसस वीर त्वां, प त ल ददव कौमशकीम्।।5.38.68।। ततो वस्रितां मुक्त्व , ददर्वयां चूड मणणां शुभम्। प्रदेयो र र्घव येनत, सीत हनुमते ददौ।।5.38.69।। प्रनतिृह्य ततो वीरो, मणणरत्नमनुत्तमम्। अङ्िुल्य ्ोज्ामास, न ह्यस्य प्र भवद्धभुजः।।5.38.70।
  • 62.
    62 मणणरत्नां कवपवरः, प्रततर्ृह््ासिवाद््च। सीत ां प्रदक्षिणां कृ त्व , प्रणतः प र्वशषतः स्स्थतः।।5.38.71।। हर्ेण महत युक्तः, सीत दशषनजेन सः। हृदयेन ितो र मां, शरीरेण तु ववस्ष्टितः।।5.38.72।। मणणवरमुपिृह्य तां मह हं, जनकनृप त्मजय धृतां प्रभ व त्। गिररररव पवन वधूतमुक्तः, सुणखतमन ः प्रनतसङ्क्रमां प्रपेदे।।5.38.73।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे अष्टटत्ररांशस्सिषः।।
  • 63.
  • 64.
    64 मणणां दत्त्व ततःसीत , हनूमन्ततमथाब्रवीत्। अमभज्ञ नममभज्ञ त-मेतर मस्य तत्त्वतः।।5.39.1।। मणणां तु दृष्ट्व र मो वै, रय ण ां सिंस्मरिष््तत। वीरो जनन्तय मम च, र ज्ञो दशरथस्य च।।5.39.2।। स भूयस्त्वां समुत्स हे, चोददतो हररसत्तम। अस्स्मन्तक यषसम रम्भे, प्रगचन्ततय यदुत्तरम्।।5.39.3।। त्वमस्स्मन्तक यषननयोिे, प्रम णां हररसत्तम। हनुमन्तयत्नम स्थ य, दुःखियकरो िव।।5.39.4।। तस्य गचन्ततयतो यत्नो, दुःखियकरो िवेत्। स तथेनत प्रनतज्ञ य, म रुनतभीमववक्रमः।।5.39.5।।
  • 65.
    65 मशरस वन्त्य वैदेहीां,िमन ्ोपचक्रमे। ज्ञ त्व सम्प्रस्स्थतां देवी, व नरां म रुत त्मजम्।।5.39.6।। ब ष्टपिद्धिदय व च , मैगथली व क्यमब्रवीत्। क ु शलां हनुमन्तब्रूय ः, सदहतौ र मलक्ष्मणौ।।5.39.7।। सुग्रीवां च सह म त्यां, वृद्धध न्सव ंश्च व नर न्। ब्रूय स्त्वां व नरश्रेष्टि, क ु शलां धमषसांदहतम्।।5.39.8।। यथ स च मह ब हु-म ं ताि्तत र र्घवः। अस्म द्धदुःख म्बुसांरोध -त्त्वां* सम ध तुमर्गसस।।5.39.9।। जीवन्ततीां म ां यथ र मः, सम्िाव्तत कीनतषम न्। तत्तथ हनुमन्तव च्छ्यां, व च धमषमवाप्नुहर्।।5.39.10।।
  • 66.
    66 ननत्यमुत्स हयुक्त श्च,व चश्रुत्व त्वयेररत ः। वधधगष््ते द शरथेः, पौरुर्ां मदव प्तये।।5.39.11।। मत्सन्तदेशयुत व च-स्त्वत्तश्श्रुत्व च र र्घवः। पर क्रमववगधां वीरो, ववगधवत्सिंववधास््तत।।5.39.12।। सीत य वचनां श्रुत्व , हनुम न्तम रुत त्मजः। मशरस्यञ्जमलम ध य, व क्यमुत्तरमब्रवीत्।।5.39.13।। क्षिप्रमेष््तत क क ु त्स्थो, ह यृषिप्रवरैवृषतः। यस्ते युगध ववस्जत्य री-न्तशोक ां र्व्पनत्ष््तत।।5.39.14।। न दह पश््ासम मत्येर्ु, न सुरेर्ु सुरेर्ु व । यस्तस्य क्षिपतो ब ण -न्तस्थ तुमुत्सर्तेऽग्रतः।।5.39.15।।
  • 67.
    67 अप्यक ष मवप पजषन्तय-मवपवैवस्वतां यमम्। स दह सोढुां रणे शक्त-स्तव हेतोववषशेर्तः।।5.39.16।। स दह स िरपयषन्तत ां, महीां श मसतुमीहनत। त्वस्न्तनममत्तो दह र मस्य, जयो जनकनस्न्तदनन।।5.39.17।। तस्य तद्धवचनां श्रुत्व , सम्यक्सत्यां सुभ वर्तम ्। ज नकी बहुमेनेऽथ, वचनां चेदमब्रवीत्।।5.39.18।। ततस्तां प्रस्स्थतां सीत , वीिम ण पुनः पुनः। भतृषस्नेह स्न्तवतां व क्यां, सौह द षदनुमान्त्।।5.39.19।। यदद व मन्त्से वीर, वसैक हमररन्तदम। कस्स्मांस्श्चत्सांवृते देशे, ववश्र न्ततःश्वो र्समष््सस।।20।।
  • 68.
    68 मम चेदल्पभ ग्यय , स स्न्तन्य त्तव व नर। अस्य शोकस्य महतो, मुहूतं मोिणां िवेत्।।5.39.21।। िते दह हररश दूषल, पुनर िमन य तु। प्र ण न मवप सन्तदेहो, मम स््ान्तनार सांशयः।।5.39.22।। तव दशषनजः शोको, भूयो म ां परिताप्ेत्। दुःख द्धदुःखपर मृष्टट ां,* दीपयस्न्तनव व नर।।5.39.23।। अयां च वीर सन्तदेह-न्स्तष्ठतीव मम ग्रतः। सुमह ांस्त्वत्सह येर्ु, हयृषिेर्ु हरीश्वरः।।5.39.24।। कथां नु खलु दुष्टप रां, तरिष््न्न्तत महोदगधम्। त नन हयृषिसैन्तय नन, तौ व नरवर त्मजौ।।5.39.25।।
  • 69.
    69 रय ण मेवभूत न ां, स िरस्य स्य लङ्र्घने। शस्क्तस्स्य द्धवैनतेयस्य, तव व म रुतस्य व ।।5.39.26।। तदस्स्मन्तक यषननयोिे, वीरैवां दुरनतक्रमे। ककां पश््सस सम ध नां, त्वां दह क यषववद ां वरः।।5.39.27।। क ममस्य त्वमेवैकः, क यषस्य पररस धने। पय षप्तः परवीरघ्न, यशस्यस्ते फलोदयः।।5.39.28।। बलैस्समग्रैयषदद म ां, र वणां स्जत्य सांयुिे। ववजयी स्वपुरां य य -त्तत्तस्य सदृशां िवेत्।।5.39.29।। शरैस्तु सङ्क ु ल ां कृ त्व , लङ्क ां परबल दषनः। म ां न्ेद््दद क क ु त्स्थः, तत्तस्य सदृशां िवेत्।।5.39.30।।
  • 70.
    70 तद्धयथ तस्य ववक्रन्तत-मनुरूपां मह त्मनः। िवेदाहवशूरस्य, तथ त्वमुपपाद्।।5.39.31।। तदथोपदहतां व क्यां, प्रगश्रतां हेतुसांदहतम्। ननशम्य हनुम न्तशेर्ां, व क्यमुत्तरमब्रवीत्।।5.39.32।। देवव हयृषिसैन्तय न -मीश्वरः प्लवत ां वरः। सुग्रीवस्सत्त्वसम्पन्तन-स्तव थे कृ तननश्चयः।।5.39.33।। स व नरसहस्र ण ां, कोटीमभरमभसांवृतः। क्षिप्रमेष््तत वैदेदह, र िस न ां ननबहषणः।।5.39.34।। तस्य ववक्रमसम्पन्तन -स्सत्त्ववन्ततो मह बल ः। मनस्सङ्कल्पसम्प त , ननदेशे हरयः स्स्थत ः।।5.39.35।।
  • 71.
    71 येर् ां नोपररन धस्त -न्तन नतयषक्सज्जते िनतः। न च कमषसु सीदन्न्तत, महत्स्वममततेजसः।।5.39.36।। असकृ त्तैमषहोत्स है-स्सस िरधर धर । प्रदक्षिणीकृ त भूमम-व षयुम ि षनुस ररमभः।।5.39.37।। मद्धववमशष्टट श्च तुल्य श्च, सन्न्तत तर वनौकसः। मत्तः प्रत्यवरः कस्श्च-न्तनान्स्त सुग्रीवसस्न्तनधौ।।5.39.38।। अहां त वददह प्र प्तः, ककां पुनस्ते मह बल ः। न दह प्रकृ ष्टट ः प्रेष््न्तते, प्रेष््न्तते हीतरे जन ः।।5.39.39।। तदलां पररत पेन देवव, शोको र्व्पैतु ते। एकोत्प तेन ते लङ्क -मेष््न्न्तत हररयूथप ः।।5.39.40।।
  • 72.
    72 मम पृष्टिितौ तौच, चन्तरसूय षवववोददतौ। त्वत्सक शां मह सत्त्वौ, नृमसांह व िममष्टयतः।।5.39.41।। ततो वीरौ नरवरौ, सदहतौ र मलक्ष्मणौ। आिम्य निरीां लङ्क ां, स यक ै ववषधममष्टयतः।।5.39.42।। सिणां र वणां हत्त्व , र र्घवो रर्घुनन्तदनः। त्व म द य वर रोहे, स्वपुरीां प्रतत्ास््तत।।5.39.43।। तद श्वमसदह भरां, ते भव त्वां क लक ङ्क्षिणी। नगचर द्द्रक्ष््से र मां, प्रज्वलन्ततममव नलम्।।5.39.44।। ननहते र िसेन्तरेऽस्स्म-न्तसपुर म त्यब न्तधवे। त्वां समेष्टवमस र मेण, शश ङ्क े नेव रोदहणी।।5.39.45।।
  • 73.
    73 क्षिप्रां त्वां देववशोकस्य, प रां ्ास््सस मैगथमल। र वणां चैव र मेण, ननहतां द्रक्ष््सेऽगचर त्।।5.39.46।। एवम श्व स्य वैदेहीां, हनुम न्तम रुत त्मजः। िमन य मनतां कृ त्व , वैदेहीां पुनिब्रवीत्।।5.39.47।। तमररघ्नां कृ त त्म नां, क्षिप्रां द्रक्ष््सस र र्घवम्। लक्ष्मणां च धनुष्टप णणां, लङ्क द्धव रमुप ितम्।।5.39.48।। नखदांष्टर युध न्तवीर -स्न्तसम्हश दूषलववक्रम न्। व नर न्तव रणेन्तर भ -स्न्तिप्रां द्रक्ष््सस सङ्ित न्।।5.39.49।। शैल म्बुदननक श न ां, लङ्क मलयस नुर्ु। नदषत ां कवपमुख्य न -म ये यूध न्तयनेकशः।।5.39.50।।
  • 74.
    74 स तु ममषणणर्घोरेण, त डडतो मन्तमथेर्ुण । न शमष लिते र म-स्स्सांह गधषत इव द्धववपः।।5.39.51।। म रुदो देवव शोक े न, मािूत्ते मनसोऽवप्रयम्। शचीव पत्य शक्र े ण, भर ष न थवती ह्यमस।।5.39.52।। र म द्धववमशष्टटः कोऽन्तयो-ऽन्स्त कस्श्चत्सौममत्ररण समः। अस्ग्नम रुतकल्पौ तौ, भ्र तरौ तव सांश्रयौ।।5.39.53।। न स्स्मांस्श्चरां वत्स््सस देवव देशे, रिोिणैर्युवर्तेऽनतरौरे। न ते गचर द मिमनां वप्रयस्य, क्षमस्व मत्सङ्िमक लम रम्।।54।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे एकोनचत्व ररांशस्सिषः।।
  • 75.
  • 76.
    76 श्रुत्व तु वचनांतस्य, व युसूनोमषह त्मनः। उवाचात्मदहतां व क्यां, सीत सुरसुतोपम ।।5.40.1।। त्व ां दृष्ट्व वप्रयवक्त रां, सम्प्रहृष््ासम व नरः। अधषसञ्ज तसस्येव, वृस्ष्टटां प्र प्य वसुन्तधर ।।5.40.2।। यथ तां पुरुर्र्वय घ्रां, ि रैश्शोक मभकमशषतैः। सांस्पृशेयां सक म हां, तथ क ु रु दय ां मनय।।5.40.3।। अमभज्ञ नां च र मस्य, दद्धय हररिणोत्तम। क्षिप्त ममर्ीक ां क कस्य, कोप देक क्षिश तनीम्।।5.40.4।। मनस्श्शल य स्स्तलको, िण्डप श्वे ननवेमशतः। त्वय प्रणष्टटे नतलक े तां, ककल स्मतुषमर्गसस।।5.40.5।।
  • 77.
    77 स वीयषव न्तकथांसीत ां, हृत ां समनुमन्त्से। वसन्ततीां रिस ां म्ये, महेन्तरवरुणोपमः।।5.40.6।। एर् चूड मणणददषर्वयो, मय सुपरररक्षितः। एतां दृष्ट्व प्रहृष््ासम, र्वयसने त्व ममव नर्घ।।5.40.7।। एर् ननय षनततश्श्रीम -न्तमय ते व ररसम्भवः। अतः परां न शक्ष््ासम, जीववतुां शोकल लस ।।5.40.8।। असह्य नन च दुःख नन, व चश्च हृदयस्च्छ्छदः। र िसीन ां सुर्घोर ण ां, त्वत्कृ ते मषग्ाम््हम्।।5.40.9।। धाित्ष््ासम म सां तु, जीववतां शरुसूदन। ऊ्वं म स न्तन जीववष््े, त्वय हीन नृप त्मज।।5.40.10।
  • 78.
    78 र्घोरो र िसरजोऽयां, दृस्ष्टटश्च न सुख मनय। त्व ां च श्रुत्व ववपद्धयन्ततां, न जीवेयमहां िणम्।।5.40.11।। वैदेह्य वचनां श्रुत्व , करुणां स श्रु भ वर्तम्। अथाब्रवीन्तमह तेज , हनुम न्तम रुत त्मजः।।5.40.12।। त्वच्छ्छोकववमुखो र मो, देवव सत्येन ते शपे। र मे दुःख मभभूते तु, लक्ष्मणः परितप््ते।।5.40.13।। कथस्ञ्चद्धभवती दृष्टट , न क लः पररशोगचतुम्। इमां मुहूतं दुःख न -मन्ततां द्रक्ष््सस भ ममनन।।5.40.14।। त वुभौ पुरुर्र्वय घ्रौ, र जपुर वररन्तदमौ। त्वद्धदशषनकृ तोत्स हौ, लङ्क ां भस्मीकररष्टयतः।।5.40.15।।
  • 79.
    79 हत्त्व च समरेक्र ू रां, र वणां सहब न्तधवम्। र र्घवौ त्व ां ववश ल क्षि, स्व ां पुरीां प्र पनयष्टयतः।।5.40.16।। यत्तु र मो ववज नीय -दमभज्ञ नमननस्न्तदते। प्रीनतसञ्जननां तस्य, भूयस्त्वां द तुमर्गसस।।5.40.17।। साब्रवीद्दत्तमेवेनत, मय मभज्ञ नमुत्तमम्। एतदेव दह र मस्य, दृष्ट्व मत्क े शभूर्णम्।।5.40.18।। श्रद्धधेयां हनुमन्तव क्यां, तव वीर िववष््तत। स तां मणणवरां िृह्य, श्रीम न्तप्लविसत्तमः।।5.40.19।। प्रणम्य मशरस देवीां, िमन ्ोपचक्रमे। तमुत्प तकृ तोत्स ह-मवेक्ष्य हररपुङ्िवम्।।5.40.20।।
  • 80.
    80 वधषम नां महवेि-मुवाच जनक त्मज । अश्रुपूणषमुखी दीन , ब ष्टपिद्धिदय गिर ।।5.40.21।। हनुमस्न्तसांहसङ्क शौ, भ्र तरौ र मलक्ष्मणौ। सुग्रीवां च सह म त्यां, सव षन्ब्रू्ा अन मयम्*।।5.40.22।। यथ च स मह ब हु-म ं ताि्तत र र्घवः। अस्म द्धदु:ख म्बुसम्रोध -त्त्वां सम ध तुमर्गसस।।5.40.23।। इमां च तीव्रां मम शोकवेिां, रिोमभरेमभः पररभत्सषनां च। ब्रू्ास्तु र मस्य ितस्समीपम्, मशवश्च तेऽ्व ऽस्तु हररप्रवीर।24।।
  • 81.
    81 स र जपु्रप्रनतवेददत थषः, कवपः कृ त थषः पररहृष्टटचेत ः। अल्प वशेर्ां प्रसमीक्ष्य क यं, ददशां ह्युदीचीां मनस जर्ाम।।5.40.25।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे चत्व ररांशस्सिषः।
  • 82.
  • 83.
    83 स च वस्ग्भः प्रशस्त मभ-िषममष्टयन्तपूस्जतस्तय । तस्म द्धदेश दपक्रम्य, धचन्तत्ामास व नरः।।5.41.1।। अल्पशेर्ममदां क यं, दृष्टटेयममसतेिण । रीनुप य ननतक्रम्य, चतुथष: इह ववद््ते।।5.41.2।। न स म रिस्सु िुण य कल्पते, न द नमथोपगचतेर्ु ्ुज््ते। न भेदस ्य बलदवपषत जन ः, पर क्रमस्त्वेव ममेह िोचते।।3।। न च स्य क यषस्य पर क्रम दृते, ववननश्चयः कस्श्चददर्ोपपद््ते। हतप्रवीर दह रणे दह र िस ः, कथस्ञ्चदीयुयषददह द्धय म दषवम्।।4।।
  • 84.
    84 क ये कमषणणननददषष्टटे, यो बहून्तयवप साध्ेत ्। पूवषक य षववरोधेन, स क यं कतुषमर्गतत।।5.41.5।। न ह्येकस्स धको हेतु-स्स्वल्पस्य पीह कमषणः। यो ह्यथं बहुध वेद, स समथोऽथषस धने।।5.41.6।। इहैव त वत्कृ तननश्चयो ह्यहां, यदद व्रजेयां प्लविेश्वर लयम्। पर त्मसम्मदषववशेर्तत्त्ववव, त्ततः कृ तां स््ान्तमम भतृषश सनम्।।5.41.7।। कथां नु खल्वद्धय िवेत्सुख ितां, प्रसह्य युद्धधां मम र िसैः सह। तथैव खल्व त्मबलां च स रव, त्सम्म नयेन्तम ां च रणे दश ननः।।5.41.8।।
  • 85.
    85 ततस्सम स द्धयरणे दश ननां, समस्न्तरविं सबलप्रय नयनम्। हृदद स्स्थतां तस्य मतां बलां च वै, सुखेन मत्त्व ऽहममतः पुनव्रषजे।।9।। इदमस्य नृशांसस्य, नन्तदनोपममुत्तमम्। वनां नेरमनःक न्ततां, न न रुमलत युतम्।।5.41.10।। इदां ववध्विंसत्ष््ासम, शुष्टक ां वनममव नलः। अस्स्मन्तभग्ने ततः कोपां, करिष््तत दश ननः।।5.41.11।। ततो महत्स श्वमह रथद्धववपां, बलां समादेक्ष््तत र िस गधपः। त्ररशूलक ल यसप्दटस युधां, ततो महद्धयुद्धधममदां िववष््तत।।12।।
  • 86.
    86 अहां तु तैःसांयनत चण्डववक्रमै, स्समेत्य रिोमभरसह्य ववक्रमः। ननहत्य तर वणचोददतां बलां, सुखां र्समष््ासम कपीश्वर लयम ्।।5.41.13।। ततो म रुतवत्कृ द्धधो, म रुनतभीमववक्रमः। ऊरुवेिेन महत , रुम न्तिेप्तुमथािित्।।5.41.14।। ततस्तु हनुम न्तवीरो, बिञ्ज प्रमद वनम ्। मत्तद्धववजसम र्घुष्टटां, न न रुमलत युतम ्।।5.41.15।। तद्धवनां मगथतैवृषिै-मभषन्तनैश्च समलल शयैः। चूणणषतैः पवषत ग्रैश्च, बिूवावप्रयदशषनम ्।।5.41.16।।
  • 87.
    87 न न शक ुन्ततववरुतैः, प्रमभन्तनैस्समलल शयैः। त म्रैः ककसलयैः क्ल न्ततै:, क्ल न्ततरुमलत युतम्।।5.41.17।। न बिौ तद्धवनां तर, द व नलहतां यथ । र्वय क ु ल वरण िेजु-ववगह्वल इव त लत ः।।5.41.18।। लत िृहैस्श्चरिृहैश्च न मशतै, मषहोरिैर्वय षलमृिैश्च ननधुषतैः। मशल िृहैरुन्तमगथतैस्तथ िृहैः, प्रणष्टटरूपां तदिून्तमहद्धवनम्।।5.41.19।।
  • 88.
    88 स ववह्वल ऽशोकलतप्रत न , वनस्थली शोकलत प्रत न । ज त दश स्यप्रमद वनस्य, कपेबषल द्धगध प्रमद वनस्य।।5.41.20।। स तस्य कृ त्व थषपतेमषह कवप, मषहद्धर्वयलीक ां मनसो मह त्मनः। ्ु्ुत्सुिेको बहुमभमषह बलै, स्श्शय ज्वलांस्तोरणम स्स्थतः कवपः।।5.41.21।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे एकचत्व ररांशस्सिषः।।
  • 89.
  • 90.
    90 ततः पक्षिननन देन,वृिभङ्िस्वनेन च। बिूवुस्राससम्भ्र न्तत -स्सवे लङ्क ननव मसनः।।5.42.1।। ववरुत श्च भयरस्त , ववनेदुमृगिपक्षिणः। रिस ां च ननममत्त नन, क्र ू र णण प्रततपेहदिे।।5.42.2।। ततो ित य ां ननर य ां, र िस्यो ववकृ त नन ः। तद्धवनां ददृशुिगग्नां तां, च वीरां मह कवपम्।।5.42.3।। स त दृष्ट्व मह ब हु-मषह सत्त्वो मह बलः। चकाि सुमहरूपां, र िसीन ां भय वहम्।।5.42.4।। ततस्तां गिररसङ्क श-मनतक यां मह बलम्। र िस्यो व नरां दृष्ट्व , पप्रच्छ ु जगनक त्मज म्।।5.42.5।।
  • 91.
    91 कोऽयां कस्य क ुतो व यां, ककां ननममत्तममह ितः। कथां त्वय सह नेन, सांव दः कृ त इत्युत।।5.42.6।। आचक्ष्व नो ववश ल क्षि, म भूत्ते सुभिे भयम ्। सांव दममसत प ङ्िे, त्वय ककां कृ तव नयम्।।5.42.7।। अथाब्रवीन्तमह स ्वी, सीत सव षङ्िसुन्तदरी। रिस ां भीमरूप ण ां, ववज्ञ ने मम क िनतः।।5.42.8।। यूयमेव मभज नीत, योऽयां यद्धव करिष््तत। अदहरेव ह्यहेः प द -न्न्तवजानातत न सांशयः।।5.42.9।। अहमप्यस्य भीतान्स्म, नैनां जानासम को न्तवयां। वेद्सम र िसमेवैनां, क मरूवपणम ितम्।।5.42.10।।
  • 92.
    92 वैदेह्य वचनां श्रुत्व, र िस्यो ववरुत ददशः। स्स्थत ः क स्श्चद्धित ः क स्श्च-र वण य ननवेददतुम्।।5.42.11।। र वणस्य समीपे तु, र िस्यो ववकृ त नन ः। ववरूपां व नरां भीम-म ख्य तुमुपचक्रमुः।।5.42.12।। अशोकवननक म्ये, र जन्तभीमवपुः कवपः। सीतय कृ तसांव द-न्स्तष्ठत््ममतववक्रमः।।5.42.13।। न च तां ज नकी सीत , हररां हररणलोचन । अस्म मभबषहुध पृष्टट , ननवेदनयतुसमच्छतत।।5.42.14।। व सवस्य िवेद्दूतो, दूतो वैश्रवणस्य व । प्रेवर्तो व वप र मेण, सीत न्तवेर्णक ङ्िय ।।5.42.15।।
  • 93.
    93 तेन त्वद्धभुतरूपेण, यत्तत्तवमनोहरम्। न न मृििण कीणं, प्रमृष्टटां प्रमद वनम्।।5.42.16।। न तर कस्श्चदुद्धदेशो, यस्तेन न ववन मशतः। यर स ज नकी सीत , स तेन न ववन मशतः।।5.42.17।। ज नकीरिण थं व , श्रम द्धव नोपलभ््ते। अथव कश्श्रमस्तस्य, सैव तेन मभरक्षित ।।5.42.18।। च रुपल्लवपुष्टप ढ्यां, यां सीत स्वयम स्स्थत । प्रवृद्धधस्श्शांशुप वृि-स्स च तेन मभरक्षितः।।5.42.19।। तस्योग्ररूपस्योग्र त्वां, दण्डम ज्ञ तुमर्गसस। सीत सम्भ वर्त येन, तद्धवनां च ववन मशतम्।।5.42.20।।
  • 94.
    94 मनः पररिृहीत ांत ां, तव रिोिणेश्वर। कस्सीत मसििाषेत, यो न स््ात्त््क्तजीववतः।।5.42.21।। र िसीन ां वचश्रुत्व , र वणो र िसेश्वरः। हुत स्ग्नररव जज्वाल, कोपसांवनतषतेिणः।।5.42.22।। तस्य क्र ु द्धधस्य नेर भय ां, प्र पतन्तन स्रत्रबन्तदवः। दीप्त भय ममव दीप भय ां, स गचषर् स्स्नेहत्रबन्तदवः।।5.42.23।। आत्मनस्सदृश न्तशूर -स्न्तकङ्कर न्तन म र िस न्। र्व्ाहददेश मह तेज , ननग्रह थं हनूमतः।।5.42.24।। तेर् मशीनतस हस्रां, ककङ्कर ण ां तरस्स्वन म्। तन्ग्ुिगवन त्तस्म -त्क ू टमुद्धिरप णयः।।5.42.25।।
  • 95.
    95 महोदर मह दांष्टर, र्घोररूप मह बल ः। युद्धध मभमनसस्सवे, हनुमद्धग्रहणोद्धयत ः।।5.42.26।। ते कपीन्तरां सम स द्धय, तोरणस्थमवस्स्थतम्। असिपेतुमगह वेि ः, पतङ्ि इव प वकम्।।5.42.27।। ते िद मभववषगचर मभः, पररर्घैः क ञ्चन ङ्िदैः। आजघ्नुव षनरश्रेष्टिां, शरैश्च ददत्यसस्न्तनभैः।।5.42.28।। मुद्धिरैः प्दटशैश्शूलैः, प्र सतोमरशस्क्तमभः। पररव यष हनूमन्ततां, सहस तस्थुिग्रतः।।5.42.29।। हनुम नवप तेजस्वी, श्रीम न्तपवषतसस्न्तनभः। क्षित व वव्य ल ङ्िूलां, ननाद च मह स्वनम्।।5.42.30।।
  • 96.
    96 स भूत्व सुमहक यो, हनुम न्तम रुत त्मजः। धृष्टटमास्फोट्ामास, लङ्क ां शब्देन पूरयन्।।5.42.31।। तस्य स्फोदटतशब्देन, महत स नुन ददन । पेतुववषहङ्ि ििन -दुच्छ्चैश्चेदमघोष्त्।।5.42.32।। ज्त््नतबलो र मो, लक्ष्मणश्च मह बलः। र ज ज्तत सुग्रीवो, र र्घवेण मभप मलतः।।5.42.33।। द सोऽहां कोसलेन्तरस्य, र मस्य स्क्लष्टटकमषणः। हनुम न्तशरुसैन्तय न ां, ननहन्तत म रुत त्मजः।।5.42.34।। न र वणसहस्रां मे, युद्धधे प्रनतबलां िवेत्। मशल मभस्तु प्रहरतः, प दपैश्च सहस्रशः।।5.42.35।।
  • 97.
    97 अदषनयत्व पुरीां लङ्क-ममभव द्धय च मैगथलीम्। समृद्धध थो र्समष््ासम, ममर्त ां सवषरिस म्।।5.42.36।। तस्य सन्तन दशब्देन, तेऽिवन्तियशङ्ककत ः। ददृशुश्च हनूमन्ततां, सन्त्य मेर्घममवोन्तनतम्।।5.42.37।। स्व ममसन्तदेशननश्शङ्क -स्ततस्ते र िस ः कवपम्। गचरैः प्रहरणैभीमै-िसिपेतुस्ततस्ततः।।5.42.38।। स तैः पररवृतश्शूरै-स्सवषतस्सुमह बलः। आससादाऽयसां भीमां, पररर्घां तोरण गश्रतम्।।5.42.39।। स तां पररर्घम द य, जर्घ न रजनीचर न्। स पन्तनिममव द य, स्फ ु रन्ततां ववनत सुतः।।5.42.40।।
  • 98.
    98 ववचच र म्बरेवीरः, पररिृह्य च म रुनतः। स हत्व र िस न्तवीर -स्न्तकङ्कर न्तम रुत त्मजः।।5.42.41। युद्धध क ङ्िी पुनवीर-स्तोरणां समुप गश्रतः। ततस्तस्म द्धभय न्तमुक्त ः, कनतगचत्तर र िस ः।।5.42.42। ननहत स्न्तकङ्कर न्तसव ष-न्र वण य न्त्वेद्न्*। स र िस न ां ननहतां महद्धबलां, ननशम्य र ज पररवृत्तलोचनः। समाहददेशाप्रनतमां पर क्रमे, प्रहस्तपुरां समरे सुदुजषयम्।।5.42.43।। इत्य र्े श्रीमर म यणे व ल्मीकीये आददक र्वये सुन्तदरक ण्डे द्धववचत्व ररांशस्सिषः।।
  • 99.
    99 त्रचत्वारिशस्सर्गः ततस्स ककङ्कर न्तहत्व, हनुम न्त्य नम स्स्थतः। वनां भग्नां मय चैत्य-प्र स दो न ववन मशतः।।5.43.1।। मङ्िल चरणम ्