पा ा यराजनीितक चंतन
एम ए सेमे टर-3
ारा - डा . ममता उपा याय
एसो. ो. राजनीित िव ान ,
कु मायावती राजक य
ातको र महािव ालय ,
बादलपुर , गौ. बु. नगर , उ र देश
मे कयावेली के राजनीितक िवचार
[1469- 1527]
उ े य -अ ययन क इस ई – साम ी से िन ां कत उ े य क ाि संभािवत है ।
1. मे कयावेली के राजनीितक िवचार क जानकारी
2. राजनीित के ावहा रक प क समझ का िवकास
3. म ययुगीन व आधुिनकयुगीन राजनीितक वृि य का ान
4. तुलना मक वैचा रक िव ेषण क मता का िवकास
5. वैचा रक मू यांकन क मता का िवकास
6. राजनीितक व था के िवषय मे वैचा रक अंतदृि का िवकास
2.
राजनी त वान
मे कयावेली 15 वी -16 वी शता दी का इटली का राजनीितक िवचारक है िजसे आधुिनक राजनीितक चंतन
का जनक माना जाता है । य िप वह लेटो एवं अर तू जैसे िवचारक के समान शा ीय राजनीितक दाशिनक
नह है और न ही रा य संबंधी िवषय का कोई वि थत िववेचन उसके ारा कया गया,बि क उसके िवचार
तो त कालीन इटली एवं यूरोप के अ य देश क प रि थितय के य अवलोकन पर आधा रत है। इस दृि
से म य युग क धा मकता के िव थम बार यथाथवादी िवचारधारा और अ ययन प ित मे कयावेली के
राजनीितक चंतन मे प रलि त होती है। ेन टन ि कनर ने अर तू के मू य आधा रत राजनीित िव ान के
थान पर राजनीितक जीवन के त य को सामने रख कर आधुिनक राजनीितक चंतन को ज म देने के कारण
उसे ‘’राजनीित का गैिलिलओ ‘’ कहा है। व तुतः एक उ को ट कादेशभ होने के कारण मे कयावेली ने
अपने देश इटली को एक सश एवं समृ रा बनाने का ल य िनि त कया और उसी के िनिम अपने
मह वपूण ंथ ‘’द ंस’’ क रचना क िजसमे प प मे घोषणा क शासक को रा य क सुर ा और उसके
िलए शि क चंता करनी चािहए न क नैितकता क ।सा य क पिव ता साधन को यायसंगत बना देती
है। इस कार मे कयावेली एक राजनीितक िस ांतकार के थान पर एक वहारवादी राजनीित के प
मे कट होता है िजसने राजनीितक जीवन मे शि के मह व को समझा और शासक के िलए उसे अप रहाय
बताया । आधुिनक राजनीित िव ान मे शि को के ीय अवधारणा का थान ा है। मे कयावेली को पि म
का चाण य कहा जाता है य क दोन ने ही रा के एक करण का ल य अपने स मुख रखकर राजनीितक
चंतन तुत कया था । चाण य ने च गु मौय के नेतृ व मे मौय सा ा य के िनमाण क कामना क थी ,
जब क मे कयावेली ने मेडची राजवंश के गुई िलयान से इटली के एक करण का अनुरोध कया था। हाँला क
उसक यह इ छा उसक मृ यु के 350 वष बाद कैबूर और गरीबा डी जैसे राजनेता ारा पूण क गई
।वतमान मे साधन क पिव ता मे िव ास रखने वाली गाँधीवादी िवचारधारा के समथक ारा सावजिनक
जीवन मे अनैितक साधन के योग को मे कयावेलीवाद कहकर ितर कृत कया जाता है । क तु
मे कयावेली को उसके समय क प रि थितय को यान मे रखते ए समझना यायसंगत होगा ।
जीवन व ि व –
पुनजागरण आंदोलन का क रहे इटली के लोरस नगर मे एक सामा य प रवार मे 1469 मे ज मा
मे कयावेली एक असाधारण ितभा से यु ि था । उ िश ा ा न कर स े के कारण आजीिवका
अजन हेतु इटली गणरा य मे उसने एक छोटे से पद से अपनी जीवन वृि क शु आत क , क तु अपनी सूझ
–बूझ व राजनीितक िवषय क समझ के कारण वह शी ही उ पद पर प च गया । इटली मे िनवास व
राजदूत के प मे यूरोप के िविभ देश मे वास के दौरान उसे राजनीितक जीवन का य अनुभव ा
आ जो उसक रचना का आधार बना । 1512 मे इटली पर पेन के आ मण के प रणाम व प ांस का
समथक होने के कारण मेडीचे शासक ने उसे पद युत कर
िनवािसत जीवन जीने को िववश कया । िनवािसत जीवन मे ही उसने अपने मह वपूण ंथ क रचना क ।
एक असफल राजनीित , क तु सफल लेखक के प मे 1527 मे उसका िनधन हो गया ।
िवचारधारा एवं अ ययन प ित –
मे कयावेली यथाथवादी िवचारधारा का ितिनिध िवचारक है य क उसने राजनीितक जीवन क
वा तिवकता के अवलोकन व िव ेषण को अपने िस ांत का आधार बनाया । इसके साथ – साथ उसने
3.
राजनी त वान
ऐितहािसक प ित का भी योग कया । उसक मा यता थी क वतमान सम या को समझने के िलए
अतीत का आ य लेना आव यक होता है । ाचीन यूनानी व रोमन इितहास से ेरणा लेते ए उसने अपनी
रचना मे संिवधान व रा य के अमूत िस ांत क अपे ा शासन कला के िस ांत का ितपादन कया ।
सेबाइन ने मे कयावेली के िवषय मे उिचत ही िलखा है क ‘’उसके अंदर राजनीितक ि थित के सश और
कमजोर पहलु को समझने क बल अंतदृि थी , अपने िवरोधी के संसाधन और वभाव के बारे मे प
और धैयपूवक िनणय करने का साम य था , कसी नीित क सीमा के सवािधक व तुिन आकलन क समझ
थी और कसी िवषय पर क जाने वाली कारवाई के प रणाम और घटना के पीछे िनिहत तक के पूवानुमान
लगाने क िववेकपूण सामा य बुि थी ।‘’
रचनाएं –
मे कयावेली क मुख रचनाएं ह –
1. द ंस
2. द आट ऑफ वार
3. िह ी ऑफ लोरस
4. िडसकोसस ऑन द फ ट टेन बु स ऑफ िलवी
मानव वभाव संबंधी धारणा –
मे कयावेली के राजनीितक िवचार का ारंभ िब दु मानव वभाव के िवषय मे क गई उसक िववेचना है।
यह उसके सम त राजनीितक चंतन का आधार है य क उसक यह मा यता है क राजनीितक सं था का
संचालन करने वाले शासक या उनके िनणय से भािवत होने वाले आम जन के वहार का मुख ेरक
वयं उनका वभाव है ।मानव वभाव के िवषय मे उसके िवचार नकारा मक अिधक ह और इन पर त कालीन
प रि थितय का भाव दखाई देता है । वयं अपने ित इटली के शासक के वहार एवं आम जनता तथा
धमािधका रय के वाथपूण बताव ने उसके स मुख मानवीय कृित का बुरा िच तुत कया , िजसे उसने
अपनी रचना मे सावभौिमक िस ांत का प दे दया । उसने मानव वभाव क िन ां कत बुराइय को
रेखां कत कया –
वाथपरता एवं कृत ता – मे कयावेली के अनुसार मनु य क वा तिवक कृित वाथपूण है और वह दूसर
ारा कए गए उपकार को शी ही भूल जाता है । मनु य के आपसी संबंध वाथ के आधार पर ही संचािलत
होते ह । ंस के 17 वे अ याय मे उसने िलखा है क ‘’’सामा य प से मनु य के बारे मे यह कहा जा सकता
है क वे कृत , चंचल, झूठे,कायर और लोभी होते ह। जबतक आपसे उनका वाथ पूरा होता है , वे तबतक
आपके िलए अपना जीवन , र , संपि और ब का बिलदान करने के िलए त पर रहते ह, क तु जैसे ही
उनका वाथ पूण होता है , वे आपके िव िव ोह कर देते ह। ……..मनु य कसी से तभी तक ेम करते
ह , जबतक उनका वाथ िस होता है । ‘’
4.
राजनी त वान
दुराचरण व ढ ग – मनु य ऊपर से सदाचारी होने का दखावा करते ह , क तु वा तव मे वे अपनी वासना के दास
होते ह ।
शि िपपासा एवं मह वाकां ा – मनु य का एक अ य दुगुण जैसा क मे कयावेली ने बताया, यह है क वह शि के
योग क चाह रखता है और दूसर के आचरण को अपनी इ छानुसार प रव तत करना चाहता है । सांसा रक व तु
क ाि क आकां ा उसे असीिमत शि के अजन क ेरणा देती है । आधुिनक िवचारक मे शुमार मरगेनथो ने भी
शि को मनु य के वभाव का अंग बताया है और संिवदावादी हॉ स ने भी मनु य के िवषय मे ऐसे ही िवचार
कए ह ।
अहंकार – अहंकार भ मानवीय वभाव का एक दुगुण है ,िजसके ारा मनु य वयं के सामने दूसर के वजूद को तु छ
समझता है तथा अपने िवचार व काय को दूसर पर थोपने क कोिशश करता है ।
संपि क लालसा – य िप संपि मनु य क आजीिवका क पू त के िलए आव यक है और अर तू जैसे िवचारक ने
इसे मानवीय गुण – उदारता व दानशीलता के िवकास का साधन माना है , क तु मे कयावेली ि मे असीम संपि
के अजन क लालसा देखता है , िजसके िलए वह हर कार के छल -कपट अपनाता है । संपि क इस लालसा को
दशाते ए उसने िलखा है क’’ मनु य अपने िपता के ह यारे को तो आसानी से माफ कर देता है , क तु पैतृक संपि
छीनने वाले को कभी माफ नह करता ।‘’
भय – मानवीय वभाव क एक िवशेषता यह भी है क वह भयातुर ाणी है । उसे अपने जीवन और संपि क सुर ा
का भय सताता रहता है और इसी भय आतुर होकर वह सामािजक संबंध क थापना भी करता है ।
इस कार मे कयावेली ने यादातर मनु य वभाव के नकारा मक प को सामने रखा है । य िप वह उसमे कुछ अंश
मे परोपकार व िनः वाथता के सामािजक गुण भी देखता है , ले कन ऐसा संगवश ही होता है । मनु य वभाव का यह
थाई गुण नह है ।
मानव वभाव के अनु प शासन व था के व प व शासक के आचरण का िनधारण –
मे कयावेली ने मानव वभाव के आधार पर ही शासन व था का व प िनि त करने का सुझाव दया है । शि
ेमी और वाथ मनु य को िनयंि त करने हेतु शासक को भी िनरंकुश होना चािहए । भय से शािसत होने वाले ि
के िलए शासक का ेम का तरीका कारगर नह होगा ,अतः भय से आतं कत रखने पर जनता कभी शासक के िव
िव ोह का साहस नह करेगी । उसने शासक को सुझाव दया क उसे शेर क तरह शि शाली और लोमड़ी क तरह
चालक होना चािहए । मनु य मे संपि के ित मोह को देखते ए शासक को कभी जा क संपि का हरण नह करना
चािहए ,अ यथा जनता के मन मे ज मी घृणा क भावना अंततः िव ोह का प ले लेगी । अतः बुि मान शासक ि
क ह या भले ही कर ले , क तु उसक संपि का हरण कभी न करे ।
सरकार के कार का िनधारण भी जा के वभाव को यान मे रखकर करने
का सुझाव मे कयावेली देता है । सामािजक व चा रि क दृि से िन ावान जा के िलए वह गणतं ीय शासन को
उपउ मानता है जब क िजनदेश के नाग रक मे सामािजक िन ा का अभाव है , वहाँ के िलए िनरंकुश शासन ही
उपयु होगा ।
5.
राजनी त वान
धम और नैितकता संबंधी िवचार
मे कयावेली क राजनीितक चंतन को सवािधक मह वपूण देन धमिनरपे राजनीित के िवषय मे दए गए िवचार ह ।
उसने राजनीित का धम से प प मे संबंध िव छेद कया । ाचीन यूनानी चंतन मे राजनीित नैितकता आधा रत
थी । लेटो के आदश रा य क धारणा स गुणयु दाशिनक शासक के शासन क धारणा थी । अर तू ने राजनीित को
नीितशा से मु कर एक वतं िवषय का प दया , क तु उसके चंतन मे भी रा य का सव उ े य नाग रक
को नैितक जीवन उपल ध करना है । म य युग मे राजनीित पूरी तरह धम आ छा दत थी । दो तलवार के िस ांत के
आधार पर यह मानते ए क लौ कक जीवन क तुलना मे पारलौ कक जीवन े है ,रा य पर चच क े ता
थािपत करने का यास कया गया था । इसी िवचार क अिभ ि म ययुगीन राजनीितक चंतन मे टॉमस ए नस
एवं संत अग टाइन जैसे िवचारक के िवचार मे दखाई देती है । मे कया वेली ने चच और रा य के म य सव ता के
िववाद को दर कनार करते ए लौ कक जीवन मे सु व था हेतु रा य क सुर ा और शि को मह वपूण माना और
प श द मे घोिषत कया क धम और नैितकता ि गत जोवन के िवषय ह ,राजनीित जैसे सावजिनक जीवन मे
उनका कोई मह व नह है । शासक को रा य क सुर ा और शि के िलए नैितकता क परवाह न कर सभी तरह के
अनैितक साधन को अपनाना चािहए । य द सा य पिव ह तो साधन वयं ही उिचत हो जाते ह । शासक को धम –
अधम , पाप -पु य , लोक – परलोक ,अ छा- बुरा य द दृि कोण का दास नह होना चािहए । स ा शासक वही है
जो शेर क तरह शि शाली और लोमड़ी क तरह चालाक हो । उसके श द मे , ‘’य िप राजा के िलए अपने वचन
का पालन करना और नैितक आचरण करना शंसनीय है तथािप हमारा अनुभव हमे यह बताता है क केवल उ ही
राजा ने महान काय कए ह , िज ह ने चालाक मे दूसर को पीछे छोड़ दया है और अंत मे सफल ए ह । इसिलए
बुि मान शासक के िलए न वचन पालन आव यक है और न उसे ऐसा करना चािहए , य द ऐसा करना उसके िहत मे
न हो ‘’।
मे कयावेली ने आव यकता होने पर शासक को धम िव आचरण
क छूट भी दी है , क तु इसके बावजूद भी वह धम के अनुशासना मक मह व को रा य के िलए वीकार करता है
य क धम के भय से लोग राजा ा का पालन करते ह । ‘’ िडसकोसस ‘’ मे उसने िलखा है क ‘’धा मक सं था का
पालन , गणतं क मह ा का कारण है और इन सं था क अवहेलना उनके िवनाश को ज म देती है । ‘’’इस कार
धम के िवषय मे वह उपयोिगतवादी दृि कोण रखता है । सं ेप मे मे कयावेली के धम एवं नैितकता संबंधी िवचार को
िन ां कत बंदु मे कया जा सकता है –
1. धम और नैितकता िनजी जीवन के िवषय है जब क राजनीित सावजिनक जीवन से संबंिधत है,अतः दोन को
पृथक रखना उिचत होगा ।
2. ि गत जीवन और सावजिनक जीवन के उ े य िभ है , इसिलए दोन के िलए नैितकता का मापदंड भी
िभ है ।
3. रा य क सुर ा और शि शासक का सव उ े य है िजसक ाि हेतु वह अनैितक साधन के योग के
िलए वतं है ।
4. अनुभव से िस होता है क ांस व पेन जैसे यूरोपीय रा य के शासक अनैितक साधन को अपनाकर ही
शि शाली बने ह ।
5. रा य के जीवन मे धम का उपयोिगत। वादी मह व है । । धम से डरकर लोग रा य के आदेश का पालन
करते ह।
उ लेखनीय है क मे कयावेली के ये िवचार ाचीन भारतीय िवचारक कौ ट य से सा यता रखते है , य क वह भी
यह मानता है क शासक को ‘’साम [समझाना ],दाम ,[ लोभन],द ड और भेद [कपटता पूवक दो या अिधक के म य
6.
राजनी त वान
फू ट डालकर काम िनकालना ]क नीित का अनुसरण करना चािहए । क तु आधुिनक भारतीय िवचारक गांधी के
िवचार से ये िवचार पूणतः िभ ह। गांधी के अनुसार’’ धम और नैितकता िवहीन राजनीित मृ यु जाल है ‘’।
शासक के काय एवं वहार संबंधी िवचार -
जैसा क पूव मे प कया जा चुका है , मे कयावेली के चंतन का उ े य एक शि शाली रा य क थापना करना था।
इसी के िनिम उसने अपनी पु तक ‘ ंस ‘ मे शासक के आचरण हेतु सुझाव दए है ,िज हे शासन कला के िस ांत
कहा जा सकता है । अ य िवचार के समान मे कयावेली का यह िवचार भी त कालीन प रि थितय के अवलोकन पर
आधा रत है । वह शासक के िलए िन ां कत सुझाव देता है –
1. शासक को अिधकािधक शि शाली बनने का यास करना चािहए य क तभी वह अपने रा य क बा
आ मण से र ा व आंत रक शांित क थापना कर सकता है ।
2. उ े य िसि के िलए उसे छल – कपट का सहारा लेने मे संकोच नह करना चािहए ।
3. उसे सदाचारी होने व वचन पालक होने का दखावा करना चािहए , क तु काय िसि के िलए अंदर ही अंदर
दुराचरण एवं वचन भंग से गुरेज नह करना चािहए ।
4. कानून का कठोरता पूवक पालन करवाना चािहए व जनता मे द ड का भय उ प करना चािहए , क तु
कभी-कभी उसे अपनी दयालुता का प रचय भी देना चािहए ता क लोग उसे अ छा यायाधीश समझकर
उसके कायल बने रहे ।
5. मनु य मे संपि के ित मोह को यान मे रखते ए शासक को जा क संपि का हरण नह करना चािहए
। उसे दूसरे रा य से लूट मे ा संपि को जा के म य बाँट देना चािहए ।
6. शासक को जनता के म य अपनी उदार छिव को बनाए रखने के िलए द ड आ द देने का काय अपने
अिधका रय से करवाना चािहए और जनि य काय वयं करने चािहए।
7. शासक को रा य मे कला , सािह य आ द का संर ण करना चािहए और समय – समय पर सािह यकार व
कलाकार को स मािनत कर उ ह ो सािहत करना चािहए । इससे उसक लोकि यता मे वृि होगी ।
8. शासक को चापलूस से दूर रहना चािहए य क वे उसक झूठी शंसा कर वा तिवक ि थित से अनजान
रखकर उसके िवनाश का कारण बनते ह ।
9. शासक क लोकि यता उसक स ा के थािय व के कए आव यक होती है और उसक लोकि यता का आधार
सुशासन है । सुशासन तब संभव है जब शासक उ रदाई पद पर यो य व िन ावान ि य क िनयुि करे
।
10.रा य क शि का एक बडा आधार संग ठत सै य बल होता है ,अतः शासक को सु िशि त व अ नुशािसत
सैिनक को सेना मे िनयु करना चािहए । उसे कराये के सैिनक पर िनभर नह होना चािहए य क वे
िव ासपा नह होते ह ।
11.राजकोष को ारंभ से ही रा य क समृि एवं शि का आधार माना जाता रहा है, अतः मे कयावेली भी
शासक को सुझाव देता है क उसे राजकोष मे िनरंतर वृि करने का यास करना चािहए और इसके िलए
िविजत देश क लूट से ा धन को राजकोष मे जमा करना चािहए तथा उ ोग धंधे व वािण य को
ो साहन और संर ण देना चािहए ता क आ थक समृि राजनीितक सुदृढ़ता मे सहायक हो सके ।हालां क
वतमान मे िव बंधु व और शांित क दृि से दूसरे रा य क लूट का िवचार उिचत तीत नह होता है ।
12.मे कयावेली यह भी सुझाव देता है क शासक को िविजत देश क जनता के रीित रवाज व परंपरा मे
ह त ेप नह करना चािहए बि क हर संभव सीमा तक उ ह बनाए रखते ए िवदेशी जनता का सहयोग व
7.
राजनी त वान
ा ा करने का य करना चािहए । समसामियक युग मे कमिलक एवं भी खू पारेख जैसे
ब सं कृितवादी िवचारक भी शासन से यही अपे ा करते ह क वे अ पसं यक व िवदेशी त व को सां कृितक
वाय ता दान कर रा िनमाण मे उनका सहयोग ा कर ।
13.सफल िवदेश नीित रा य क सीमा क सुर ा क गारंटी है , अतः कौ ट य के समान ही मे कयावेली क
भी मा यता है क शासक को िम रा य क सं या बढ़नी चािहए और कू टनीित का सहारा लेकर शि
संतुलन को अपने प मे करने का य करना चािहए । साथ ही अपनी शि के बल पर श ु देश के आंत रक
मामल मे य या परो प से ह त ेप करते रहना चािहए ।
प है क मे कयावेली का राजनीितक चंतन सै ांितक कम , ावहा रक यादा है । उसका चंतन रा य का दशन न
होकर रा य के िलए है। रा य क सुर ा और थािय व के ीय धुरी के प मे उसके सम चंतन को आ छा दत कए
ए ह ।
रा य एवं शासन णाली –
मे कयावेली ने लेटो और अर तू क भांित रा य को वाभािवक संगठन न मानकर कृि म संगठन माना है िजसका
िनमाण शि शाली ि ारा शि ा क आकां ा एवं कमजोर लोग क सुर ा तथा वाथ भावना के कारण
ए पर पर समझौते से आ ,अतः रा य को अपने अि त व को बनाए रखने के िलए मनु य क वाथ और आकां ा
को पूण करते रहना चािहए । अथात रा य क शि मे िनरंतर िव तार होते रहना चािहए , अ यथा उसका िवनाश
अिनवाय है। इसे राजनीितक वृि [aggrandisement] का िस ांत कहा जाता है । मे कयावेली रोमन सा ा य के
पतन का एक मुख कारण उसके िव तार का क जाना मानता है ।
रा य को मे कयावेली अ य सामािजक संगठन से उ मानता है । अ य सभी संगठन अपने काय के िलए उसपर िनभर
व उसके ित उ रदाई ह , क तु रा य कसी के ित उ रदाई नह है । उसके अनुसार रा य के उ थान -पतन का
म चलता रहता है। । िनरंतर िव तार को ा करने वाला रा य उ त व व थ रा य है , जब क िजस रा य का
िव तार क जाता है वह एक अ व थ एवं पतनशील रा य बन जाता है ।
मे कयावेली के ारा कया गया सरकार का वग करण अ वि थत व
िवरोधाभासी है ।‘ ंस ‘मे उसने िनरंकुश राजत क िववेचना क है जब क ‘’िड कोरसेज’’मे रोमन गणतं के ित
अपने लगाव को कया है । क तु दोन ही कार क सरकार के थािय व के िलए वह उनका अ छे कानून से
िविनयिमत होना आव यक मानता है । साथ ही वह यह भी िवचार करता है क शासन व था क उपयु ता
प रि थितय पर िनभर करती है । िवभािजत इटली के िलए जहां उसने शि शाली राजत को उपयु बताया , वह
िड कोरसेज मे वह गणतं क शंसा करता दखाई देता है । इस संबंध मे ड नंग का कथन उिचत तीत होता है क
‘’य िप इटली क दुदशा से भािवत होकर उसने उसके उपचार हेतु राजत का समथन कया है ,ले कन उसका
झुकाव गणतं क ओर है और इस िवषय मे उसके िवचार यूनािनय से िमलते ह। ‘’उसका प िव ास था क सरकार
क ि थरता के िलए शासन मे अिधकािधक लोग क भागीदारी आव यक है । वह शासक के चुनाव के तरीके को
आनुवंिशक तरीके से अ छा मानता है । जनक याण हेतु लोग को उिचत उपाय सुझाने क वतं ता क बात भी वह
करता है । िड कोरसेज मे उसने यह मत कया है क लोग वतं व ताकतवर होने चािहए और उनसे िवचार –
िवमश करके कसी िनणय तक प चना चािहए । अतः सेबाईन के श द मे कहा जा सकता है क ‘ सरकार के िवषय
मे ’उसका िनणय दो बात से भािवत था – एक ओर साधन स प तानाशाह तथा दूसरी ओर वतं वशासी जनता
। ये बात सुसंगत नह थी । उसने दोन को साथ- साथ अिनि त ढंग से जोड़ दया । ‘’
8.
राजनी त वान
मे कयावेली युग िशशु के प मे
ो. ड नंग एवं ो .ज स ने मे कयावेली को अपने युग का िशशु एवं युग का े िनचोड़ कहा है । य तो येक
िवचारक के िवचार पर उसके समय क प रि थितय का भाव पड़ता है , क तु मे कयावेली ने तो युगीन प रि थितय
से परे जाकर िवचार ही नह कया । दूसरे श द मे कहा जा सकता है क 15 व - 16 व सदी मे यूरोप व इटली
का जो सामािजक – राजनीितक वातावरण था और जो अव यकताएं थ , मे कयावेली ने उ ह को अपनी रचना मे
िस ांत का प दया है । मे कयावेली के चंतन को भािवत करने वाली त कालीन प रि थितयाँ िन वत थ –
पुनजागरण -15 व शता दी मे यूरोप मे पुनजागरण आंदोलन ारंभ आ िजसका क इटली का लोरस नगर था ।
लोरस का िनवासी होने के कारण इस आंदोलन क वृि य का सवािधक भाव मे कयावेली के चंतन पर पड़ा। इस
आंदोलन के दौरान राजनीित, सािह य , कला , दशन के े मे म ययुगीन आदश का अंत हो रहा था और ाचीन
यूनान के िववेकवाद क पुन थापना हो रही थी । इसी िववेकवाद से भािवत होकर मे कयावेली ने पारलौ ककता व
ई रीय स ा पर बल देने वाले धम को नकारकर लौ कक जीवन के मह व का ितपादन कया एवं लौ कक जीवन को
वि थत बनाने हेतु शि शाली रा य क आव यकता को सामने रखा । पुनजागरण काल क नई चेतना और नए
दृि कोण क अिभ ि मे कयावेली क रचना मे आ ोपांत दखाई देती है ।
यूरोप मे शि शाली राजतं क थापना –16 व सदी के अंत तक चच और रा य के म य स ा के िलए चलने वाला
संघष समा हो गया था और दोन ही े मे शि य का के ीकरण ारंभ हो गया था । इं लंड मे हेनरी स म, ांस
मे लुई एकादश , चा स अ म व लुई ादश ने सामंत क शि का अंत कर िनरंकुश राजतं क थापना कर ली थी
और इनके नेतृ व मे ये रा दन दन समृ हो रहे थे । मे कयावेली के िलए ये रा आदश बने और उसने अपनी
ररचना मे शि शाली राजत का समथन कया ।
कमजोर व िवभािजत इटली - यूरोप के शि शाली रा य क तुलना मे उसका अपना देश इटली पाँच भाग मे
िवभािजत था तथा ये सभी आपस मे लड़ते रहते थे िजसका लाभ उठाकर पड़ोसी देश उस पर अ सर आ मण कया
करते थे । समूचा इटली फूट , गृहयु एवं िवदेशी शासन से पीिड़त था । इटली क इस ि थित से मे कयावेली ममाहत
था और उसने उसे भी अ य यूरोपीय रा के समान शि शाली बनाने के िलए शि शाली राजत क कामना क ।
इटली का सावजिनक जीवन – मे कयावेली के समय मे इटली का सावजिनक जीवन आकंठ ाचार मे डूबा आ
था । उसने शासक , धमािधका रय ,शासक य अिधका रय व आम नाग रक सभी को आचरण मे िल देखा
था शासक और पोप के म य संघष , शासक का यूरोपीय रा य को स ा के वाथवश इटली पर आ मण के िलए
आमंि त करना ,तथा पोप ारा ष रचा जाना एवं साधारण नाग रक के नैितकता िवहीन आचरण ने उस पर
बुरी छाप छोड़ी । इसी अनुभव के आधार पर उसने मानव वभाव के बुरे प को सामने रखा एवं मौषय के अनैितक व
पाशिवक व प क ा या क ।
इस कार ो . ड नंग का यह कथन िनतांत उपयु तीत होता है क मे कयावेली पूरी तरह अपने युग का िशशु था।
मे कयावेली आधुिनक राजनीितक चंतन के जनक के प मे
राजनीितक दशन के इितहास मे यह अ यंत िववादा पद है क आधुिनक वृि याँ मे कयावेली के चंतन मे
पहली बार दखाई दी या ब दा के । ड नंग , सेबाईन , मुरे और ज स जैसे िवचारक क मा यता है क मे कयावेली
ने कुछ आधुिनक वृि य क शु आत अव य क , क तु उ हे िवकिसत करने का ेय बोदा को ही है । व तुतः
राजनीितक दृि से म ययुग क तीन िवशेषताएं थ – सामंतवाद , पोपतं और पिव रोमन सा ा य । मे कयावेली
ने इन तीन से राजनीितक चंतन को मु कर उसे आधुिनक युग मे वेश कराया । आधुिनक युग क सभी वृि याँ
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राजनी त वान
– रा वाद , धम िनरपे तावाद, ि वाद , उपयोिगतावाद ,िव ानवाद , शि वादी राजनीित ,संघवाद और
सं भुतावाद उसके चंता मे देखी जा सकती ह िजनक िववेचना िन ां कत प मे क जा सकती है –
1. रा वाद क धारणा का पोषण -रा वाद अधिनक युग क धरण है िजसमे एक भूभाग मे रहने वाली जनता
के म य सां कृितक या ऐितहािसक आधार पर एकता क भावना पाई जाती है । 16 व सदी तक यूरोप मे
धा मक रा य व रोमन सा ा य का भाव समा होकर शि शाली रा ीय रा य क थापना होने लगी
थी । मे कयावेली ने इन रा ीय रा य क शंसा क और रा भि के भाव से भरकर अपने देश इटली के
एक रा के प मे एक करण क कामना क ।
2. रा य क सं भुता के िवचार को मा यता – य िप मे कयावेली ने हॉ स , ब दा या आि टन क तरह सं भुता
श द का योग कर उसक वि थत िववेचना नह क , क तु रा य क सव ता का ितपादन म य युग
के बाद पहली बार उसीके ारा कया गया । सेबाईन के अनुसार , ‘’सव राजनीितक सं था के प मे रा य
श द का योग आधुिनक भाषा मे उसी क रचना से ारंभ आ । मे कयावेली के समय से ही रा य सं भु
कहा जाने लगा और बाद मे सं भुता का िस ांत ितपा दत कर दया गया । ‘’
3. धम िनरपे राजनीित क धारणा का ितपादन – मे कयावेली को आधुिनक राजनीितक चंतक का दरजा
देने वाला सबसे मुख त व उसके ारा राजनीित से धम का पृथ रण कया जाना था । म य युग मे राजनीित
पर धम हावी रहा और नैितक िनयम क दुहाई देते ए राजनीितक सं था का िवकास रोके रखा गया ।
थम बार मे कयावेली ने ही प एवं सहसपूण ढंग से घोषणा क क राजनीित का धम से कोई संबंध नह
होना चािहए और राजनीितक उ े य क ाि हेतु आव यकता नुसार नैितक – अनैितक सभी कार के
साधन अपनाए जा सकते ह । सा य क पिव ता साधन को वयं ही पिव बना देती है। धम िनजी िवषय
है , उसे सावजिनक जीवन का मापदंड नह बनाया जाना चािहए । इस संबंध मे एलेन ने उिचत ही िलखा है
क ‘’मे कयावेली क रा य क अवधारणा पूरी तरह से धमिनरपे रा य क थी । ‘’
4. ि वाद का समथन – ि वाद आधुिनक युग क मुख िवचारधारा है , िजसके अनुसार सांसा रक जीवन
मे ि , उसका िववेक , उसके िहत , उसके अिधकार ही सा य ह ,रा य व अ य सं था को इनके िनिम
ही काय करना चािहए । मे कयावेली के चंतन मे ई रीय स ा के थान पर ि के िववेक को मह व दया
गया है । रा य क उ पि सामािजक समझौते के प रणाम व प ि क सुर ा और शि क आकां ा
को पूरा करने के िलए ही ई , ऐसी उसक मा यता है । यही नह , ि वाद के अनु प ही उसने शासक को
सलाह दी क उसे ि क संपि का हरण नह करना चािहये तथा वयं ापार – वािण य के च र मे
नह पड़ना चािहए ।
5. उपयोिगतावाद का वतन - उपयोिगतावाद आधुिनक युग का दशन है ,िजसमे लौ कक जीवन को मह व देते
ए भौितक सुख को सा य माना जाता है । मे कयावेली ने म य युग के बाद थम बार पारलौ कक जीवन
से यादा मह व लौ कक जीवन को दया । साथ ही रा य ारा धम के उपयोिगता वादी प को वीकार
करने पर बल दया । धम का उपयोगी व प यह है क उसके डर से लोग राजा ा का पालन करते ह और
समाज मे शांित व सु व था बनी रहती है ।
6. शि वादी राजनीित का ितपादन - शि राजनीित िव ान का के ीय त व है िजस पर आधुिनक युग मे
केटल व लासवेल जैसे िवचारक ने बल देते ए उसके मह व का ितपादन कया है । मे कयावेली ने शासन
के िलए शि को अप रहाय बताया है और शासक को शेर जैसा शि शाली बनने का सुझाव दया है ।डोना ड
इटबाइलजोल ने इस िवषय मे िलखा है क ,’’य द एक श द मे मे कयावेली के चंतन के के ीय त व को
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राजनी त वान
संि करना हो तो वह त व है शि । उसका कैसे िनमाण कया जाय , उसे कैसे बनाए रखा जाय और उसका
िव तार कैसे कया जाय ‘’।
7. संघवाद के िवचार का बीजारोपण - आधुिनक संघवादी व था िजसका ारंभ अमरीका मे 13 औपिनवेिशक
रा य को िमलाकर आ , का बीज रोपण मे कयावेली के चंतन मे आ माना जा सकता है । उसके समय मे
इटली 5 रा य - नेप स , िमलान क डची, रोमन चच देश, वेिनस व लोरस के गणरा य मे बटा था ।
मे कयावेली ने इन सबको िमलाकर एक रा के प मे इटली के एक करण का िवचार रखा । यह िवचार ही
आगे चलकर संघवादी शासन का आधार बना ।
8. आधुिनक वै ािनक अ ययन प ित का योग – अ ययन णाली क दृि से भी मे कयावेली आधुिनक है ।
अर तू के बाद पहली बार उसने ही अवलोकन , यथाथवाद एवं ऐितहािसक िव ेषण पर आधा रत प ित को
अपनी रचना का आधार बनाया । य िप उसक अ ययन प ित मे कुछ ु टयाँ ह क तु उसके आधुिनक
होने से कोई इनकार नह कर सकता ।
इस कार यह कहा जा सकता है क मे कयावेली के चंतन मे आधुिनक युग क वृि याँ िनिहत ह जो
बाद मे प प से िवकिसत ।
िन कष -मे कयावेली के राजनीितक िवचार के उपरो िव ेषण से प होता है क मे कयावेली एक िस ांत शा ी
कम, वहारवादी राजनीित यादा है। उसने रा य के िलए शि और सुर ा को आव यक मानते ए शासक के
आचरण के संबंध मे मह वपूण ावहा रक सुझाव दए । धमिनरपे राजनीित का ितपादन करते ए उसने शासक
को नैितकता के बंधन से मु कया और सा य को साधन क तुलना मे तरजीह दी । मानव वभाव के िवषय मे उसके
िवचार यथाथ अवलोकन पर आधा रत ह ।हाँला क वह मानवीय वभाव मे नकारा मक वृि य को ही देखता है ।
युगीन प रि थितय के अ यिधक भाव के कारण उसे अपने युग का िशशु भी कहा जाता है । आधुिनक राजनीितक
चंतन का ारंभकता मे कयावेली को माना जाता है य क आधुिनकता क वृितयाँ उसके ही चंतन मे पुनजागरण
काल के बाद पहली बार कट ई ह।
मू यांकन - आलोचक ने मे कयावेली के चंतन मे अनेक किमय को उजागर कया है िजनमे से कुछ मुख इस कार
ह -
1. मानव वभाव के िवषय मे उसके िवचार एकांगी ह । उसने मनु य क कृित के बुरे प को ही देखा , जब क
मनु य अ छाइय व बुराइय दोन का िम ण है । मे कयावेली ने इटली और यूरोप के लोग के वभाव का
सवभौिमक करण करने क ु ट क है।
2. उसने रा य और ि के िलए दोहरी नैितकता क बात क ही है जो उिचत नह है रा य का िनमाण ि य
से िमलकर ही होता है ,अतः रा य के िलए नैितकता के मापदंड िभ नह हो सकते । फॉ स के श द मे ,
‘’जो नैितक प से गलत है , राजनीितक प से कभी सही नह हो सकता । ‘’
3. आलोचक क दृि मे रा य को नैितकता के बंधन से मु कर मे कयावेली ने राजनीित मे ाचार के माग
को श त कया है । वहारतः सावजिनक जीवन कतना ही दूिषत य ना हो, उस दूषण को आदश का
प नह दया जा सकता । डा .मुरे के श द मे , ‘’ मे कयावेली क दृि प है , ले कन उसमे दूर द शता
का अभाव है । उसने व तु को िसफ यथाथ प मे देखा है ,उनके आदश प क क पना नह क । ‘’
4. राजनीित के सै ांितक क मे कयावेली ने उपे ा क है और रा य के व प व उ े य के िवषय मे कोई
वि थत चंतन नह दया । गएटेल ने िलखा है ,’’मे कयावेली का रा य संबंधी िस ांत रा य का िस ांत
होने क अपे ा रा य क सुर ा और संर ण का िस ांत है । ‘’
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राजनी त वान
5. आलोचक ने मे कयावेली क अ ययन प ित को भी दोषपूण माना है । उसने पयवे ण पर आधा रत वै ािनक
प ित का व तुिन ढंग से योग न कर पहले इटली के एक करण का ल य िनि त कर िलया , त प ात
त य व ऐितहािसक उदाहरण ारा उ हे पु कया है।
उपयु आलोचना व मे कयावेली को राजनीितक धूतता का पयाय माने जाने के बावजूद उसके योगदान से इनकार
नह कया जा सकता । मै सी ने उसका मू यांकन करते ए िलखा है क ‘’’मे कयावेली ने राजनीित को नैितकता क
दृि से नह कया , बि क वह तो स दय पहले हो चुक थी । उसने तो ब त ही शंसनीय और िनमम प
वा दता के साथ उन पिव ष ं का पदाफाश कया जो उ पद पर आसीन लोग ारा रचे जाते थे । इस दृि से
उसक शंसा क जानी चािहए क उसने राजनीितक दशन को म ययुगीन धा मक नैितकता आधा रत आडंबरवाद से
मु कर उसके आधुिनक वै ािनक व प का माग श त कया । वह सही अथ मे आधुिनक राजनीितक चंतन का
अ दूत था…..। ‘’ सो ने भी िलखा है क ‘’मे कयावेली का उ े य शासक के वहार का खुलासा करना था , न क
अनैितक शासन के मह व को काश मे लाते ए उस पर ज मनाना । ‘’ नव रोमन िवचारक क नई पीढ़ी िजनमे
फिलप पे टट ,[1997] ेन टन ि कनर [1998],मरीिजओ िवरोली [1999-2000],आ द ने मे कयावेली ारा िनदिशत
गणरा य से ेरणा ली है । उसके ारा लौ कक जीवन को दए गए मह व से ारंभ मे हीगल और बाद मे मा स ने
ेरणा ली और रा य क भौितक उ पि के िस ांत को ज म दया । हॉ स ने सामािजक संिवदा के िस ांत को
यायोिचत ठहराते ए मानव वभाव के संबंध मे उसके िवचार से ेरणा ली और िनरंकुश सं भु स ा के िस ांत का
ितपादन कया । धमिनरपे ता का िवचार राजनीितक चंतन को उसक बड़ी देन है ।
मु य श द –
पुनजागरण –15 वी शता दी मे यूरोप मे ारंभ ए इस आंदोलन मे म य युग क धा मक मा यता का िवरोध करते
ए ाचीन यूनान क मा यता को पुनज िवत कया गया िजसके अनुसार लौ कक जीवन मह वपूण है िजसे
सु वि थत बनने मे मानवीय िववेक क मुख भूिमका है न क कसी ई रीय स ा क । पुनजागरण आंदोलन ने
वै ािनक व तकनीक िवकास को ो सािहत कया ।
गेलीिलओ – गॅिलिलओ 1564 मे इटली मे ज मा एक वै ािनक था िजसे आधुिनक िव ान का जनक माना जाता है।
सं भुता – एक राजनीितक धारणा है िजसका िविधक प मे ितपादन िविधशा ी जॉन आि टन के ारा कया गया।
यह रा य क सव स ा है िजसका योग करते ए रा य नाग रक से अपने आदेश का पालन करवाता है ।
धमिनरपे ता – वह धारणा जो धम को िनजी आ था का िवषय मानती है और रा य ारा धा मक मामल मे ह त ेप
का िवरोध करती है । धम िनरपे रा य धा मक मामल मे तट थ होते ए सभी धम के िवकास का समान अवसर
दान करता है ।
गणतं - यह एक आधुिनक शासन व था है िजसमे सावजिनक जीवन के पड़ और िवशेष प से सव पद आम
नाग रक के िलए खुले होते है और उ हे ा करने हेतु कसी पारंप रक यो यता [वंशानुगत ] क आव यकता नह
होती । अ सर लोकतं व गण तं साथ – साथ चलते है और दोन मे आम जन को मह व दया जाता है , क तु
लोकतं का जनक माने जाने वाले देश ि टेन मे
लोकतं के साथ तीका मक प मे राजत भी चलते रहने से गणतं का िवशेष अथ हो गया है । अब रा या य के
पद हण का आधार िनवाचन होना गणतं का तीक बन गया है ।
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राजनी त वान
References ;-
1.G.H. Sebine, A History of Political Thought,Dryden press, revised 4th edition in 1973
2. Dr.. Prabhudatt Sharma ,Rajnitik Vicharon Ka Itihas .
3. Machiyavelli, The Prince
4. W.T. Jones,A History Of Plitical Thought
5. Garrett Brown ,Concise Oxford Dictionary of Politics, Kindle E-text books
6. Stanford Encyclopaedia Of Social Sciences
-दीघ उ रीय
1. मे कयावेली को युग िशशु य कहा जाता है ।
2. मानव वभाव तथा शासक के आचरण के िवषय मे मे कयावेली के िवचार का मू यांकन क िजए ।
3. धम और नैितकता के िवषय मे मे कयावेली के िवचार क िववेचना क िजए ।
4. मे कयावेली को आधुिनक राजनीितक चंतन का जनक य कहते ह।
व तुिन –
1. मे कयावेली को युग िशशु कस िवचारक ने कहा है –
[अ] सेबाईन [ ब ] फॉ टर [ स ] ड नंग[ द ]दांते
2. कौन सी रचना मे कयावेली क नह है –
[अ ]द ंस [ब]िडसकोसस ऑन िलवी[ स ]द आट ऑफ वार[ द ]िह ी ऑफ यूरोप
3. मे कयावेली ने अपनी रचना मे कौन सी प ित अपनाई –
[आ ]ऐितहािसक [ ब ] अवलोकना मक[ स ] यथाथवादी[ द] उ सभी
4. मे कयावेली कस काल का िवचारक था –
[अ ]पुनजागरण काल[ ब ]म य काल [स] ाचीन काल[ द] उ र आधुिनक काल
5. िडसकोसस मे मे कयावेली ने कस शासन व था का समथन कया है –
[ अ ] राजत [ब] कुलीनतं [ स ] गणतं [द ] िनरंकुशतं
6. मे कयावेली को राजनीित का गॅिलिलओ य कहा जाता है-
[अ ] आधुिनक राज नीितिव ान क नीव रखने के कारण [ ब ] मानव वभाव क ा या के कारण
[स ] मनु य के िलए वै ािनक आिव कार करने के कारण [ द ] राजनीित मे वै ािनक योग करने के कारण
उ र -1. स 2. द 3. द 4. अ 5. स 6. अ