हिन्दी
परियोजना
कायय
फसल-नागार्जुन
लेखक परिर्य
नागार्जुन (३० र्ून १९११-५ नवंबर १९९८) हिन्दी और मैथिली के
अप्रतिम लेखक और कवव िे। उनका असली नाम वैद्यनाि
ममश्र िा परंिज हिन्दी साहित्य में उन्िोंने नागार्जुन ििा मैथिली में
यात्री उपनाम से रचनाएँ क ं। इनके वपिा श्री गोकज ल ममश्र िरउनी
गांव के एक ककसान िे और खेिी के अलावा पजरोहििी आहद के
मसलमसले में आस-पास के इलाकों में आया-र्ाया करिे िे। उनके
साि-साि नागार्जुन भी बचपन से िी “यात्री” िो गए। आरंमभक
मिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृ ि में िजई ककन्िज आगे स्वाध्याय
पद्धति से िी मिक्षा बढी। रािजल सांकृ त्यायन “संयजक्ि तनकाय”
का अनजवाद पढकर वैद्यनाि क इच्छा िजई कक यि ग्रंि मूल
पामल में पढा र्ाए। इसके मलए वे लंका चले गए र्िाँ वे स्वयं
पामल पढिे िे और मठ के “मभक्खजओं” को संस्कृ ि पढािे िे। यिाँ
उन्िोंने बौद्ध धमु क दीक्षा ले ली।
साहित्य में स्िान
फसल
-नागार्जुन
फसल द्वारा नागार्जुन
फसल द्वारा नागार्जुन
फसल द्वारा नागार्जुन
फसल द्वारा नागार्जुन
फसल द्वारा नागार्जुन
फसल द्वारा नागार्जुन

फसल द्वारा नागार्जुन

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    नागार्जुन (३० र्ून१९११-५ नवंबर १९९८) हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवव िे। उनका असली नाम वैद्यनाि ममश्र िा परंिज हिन्दी साहित्य में उन्िोंने नागार्जुन ििा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ क ं। इनके वपिा श्री गोकज ल ममश्र िरउनी गांव के एक ककसान िे और खेिी के अलावा पजरोहििी आहद के मसलमसले में आस-पास के इलाकों में आया-र्ाया करिे िे। उनके साि-साि नागार्जुन भी बचपन से िी “यात्री” िो गए। आरंमभक मिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृ ि में िजई ककन्िज आगे स्वाध्याय पद्धति से िी मिक्षा बढी। रािजल सांकृ त्यायन “संयजक्ि तनकाय” का अनजवाद पढकर वैद्यनाि क इच्छा िजई कक यि ग्रंि मूल पामल में पढा र्ाए। इसके मलए वे लंका चले गए र्िाँ वे स्वयं पामल पढिे िे और मठ के “मभक्खजओं” को संस्कृ ि पढािे िे। यिाँ उन्िोंने बौद्ध धमु क दीक्षा ले ली।
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