जीवन परिचय
जन्म -26 माचा ,1907 फर्राखाबाद ,उत्ति प्रदेश
मृत्यु - 11 सितंबि , 1987 इलाहाबाद , उत्ति प्रदेश
शिक्षा - इंदौि समशन स्कू ल िे प्रािंसिक सशक्षा प्राप्त की I
िन 1932 में इलाहाबाद ववश्वववद्यालय िे
िंस्कृ त में एम. ए. पाि ककया I
काययक्षेत्र - उपन्यािकाि , कवययत्री , लघु कथा लेखखका
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3.
महादेवी वमाा जीकी प्रमुख कृ यतयााँ व
उल्लेखनीय िम्मान
प्रचशित कविता संग्रह - नीहाि , िश्श्म , नीिजा , िांध्यिीत , दीपसशखा
िप्तपर्ाा , प्रथम आयाम , अश्नन िेखा
रेखाचचत्र - अतीत के चलगचत्र , स्मृयत की िेखाएाँ
संस्मरण - पथ के िाथी , मेिा परिवाि , िंस्मिर्
निबंध - संग्रह - श्ृंखला की कड़ियााँ , वववेचनात्मक िद्य ,िाहहत्यकाि
की आस्था तथा अन्य यनबंध
आपको िन 1956 में पद्म िूषर् , 1982 में ज्ञानपीठ पुिस्काि ,
वषा 1988 में पद्म वविूषर् िे िम्मायनत ककया िया I
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4.
िंस्मिर्
स्मृनत के आधारपर ककसी विषय पर अथिा ककसी व्यक्तत पर शिखखत
आिेख संस्मरण कहिाता है I
संस्मरण को साहहक्त्यक निबंध की एक प्रिृवि भी मािा जा सकता है
ऐसी रचिाओं को संस्मरणात्मक निबंध कहा जाता है I
संस्मरण में िेखक जो कु छ स्ियं देखता है और अिुभि करता है ,
उसी का चचत्रण करता है I
िेखक की स्ियं की अिुभूनतयााँ तथा संिेदिाएाँ संस्मरण में अंतनियहहत
रहती हैं I
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5.
प्रस्तुत िंस्मिर् केपााँच चिर्
प्रथम चरण - चिल्िू ि िेखखका की प्रथम मुिाकात
द्वितीय चरण - चिल्िू ि िेखखका के बीच संबंधों की
घनिष्ठता
तृतीय चरण - चिल्िू के जीिि में प्रथम िसंत का आिमि
चतुथय चरण - चिल्िू सभी प्राखणयों में अपिाद ूपप
पााँचिााँ चरण - संिेदििीि चिल्िू के जीिि का अंत काि
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6.
अचािक एक हदिसिेरे कमरे से बरामदे
में आकर मैंिे देखा दो कौिे एक िमिे
के चारों ओर चोंचों से छु िां - छु िौिि
जैसा खेि खेि रहे हैं I
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7.
िबने कहा कककौवे की चोंच का
घाव लिने के बाद यह बच नहीं
िकता , अतः इिे ऐिे ही िहने
हदया जाए I पिंतु मन नहीं माना
उिे हौले िे उठाकि अपने कमिे
में ले आई , कफि र्रई िे िक्त
पोंछकि घाव पि पेंसिलन का
मिहम लिाया I
रूई की पतली बत्ती दूध िे
सििोकि जैिे - तैिे उिके नन्हे
िे मुाँह में लिाई पिंतु मुाँह खुल
न िका औि दूध की बूंदे दोनों
ओि दुलक िई I
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8.
कई घंटे केउपचार के उपरांत
उसके मुाँह में एक बूाँद पािी
टपकाया जा सका।
तीििे हदन वह इतना अच्छा हो िया
कक मेिी उाँिली अपने दो नन्हें पंजों
िे पकिकि नीले कााँच की मोयतयों
जैिी आाँखों िे इधि -उधि देखने
लिा।
तीि -चार मास में उसके क्स्िग्ध रोयें
,झब्बेदार पूाँछ और चंचि चमकीिी आाँखें
सबको विक्स्मत ििीं।
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9.
जब मैं शिखिे
बैठतीतब अपिी
ओर मेरा ध्याि
आकवषयत करिे की
उसे इतिी तीव्र
इच्छा होती थी कक
उसिे एक अच्छा
उपाय खोज
निकािा।
उसके समझदारी और
काययकिाप पर सबको
आश्चयय होता था I
मैंिे फू ि रखिे की एक
हल्की डशिया में रुई
बबछाकर उसे तार से
खखड़की पर िटका हदया।
िही दो िषय चिल्िू का घर
रहा।
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10.
चिल्िू को पकड़करएक िंबे
शिफ़ाफ़े में इस प्रकार रख देती कक
अििे दो पंजो और शसर के
अनतररतत सारा िघु िात शिफ़ाफ़े
के भीतर बंद रहता।
िह मेरे पैर तक आकर सरय से परदे पर
चढ़ जाता और कफर उसी तेजी से
उतरता I उसका यह दौड़िे का क्रम तब
तक चिता जब तक मैं उसे पकड़िे के
शिए ि उठती i
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11.
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भूख िििे पर चचक् -चचक् करके मािो
िह मुझे सूचिा देता और काजू या
बबस्कु ट शमि जािे पर उसी क्स्थनत में
शिफ़ाफ़े से बाहर िािे पंजों से पकड़ कर
उसे कु तरता रहता I
12.
चिल्िू के जीििका
प्रथम िसंत आया।
िीम - चमेिी की िंध
कमरे में धीरे -धीरे आिे
ििी। बाहर की
चििहररयााँ खखड़की की
जािी के पास आकर
चचक् - चचक् करके ि
जािे तया कहिे ििीं।
चिल्िू को जािी के
पास बैठकर अपिेपि
से बाहर झााँकते
देखकर मुझे ििा कक
इसे मुतत करिा
आिश्यक है।
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13.
मैंने कीलें यनकालकिजाली
का एक कोना खोल हदया
औि इि मािा िे गिल्लू ने
बाहि जाने पि िचमुच ही
मुश्क्त की िााँि ली I
इतने छोटे जीव को घि में
पले कु त्ते - बबश्ल्लयों िे
बचाना िी एक िमस्या थी I
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14.
मेरे कमरे सेबाहर जािे पर चिल्िू भी
खखड़की की खुिी जािी की राह बाहर
चिा जाता और हदिभर चििहररयों के
झुंड का िेता बिा , हर डाि पर
उछिता - कू दता रहता और ठीक 4:00
बजे खखड़की से भीतर आकर अपिे
झूिे में झूििे ििता I
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15.
मुझे चौंकाने कीइच्छा
उिमें न जाने कब औि
कै िे उत्पन्न हो िई थी।
किी फू लदान के फू लों में
यछप जाता ,किी पिदे
की चुन्नट में औि किी
िोनजुही की पवत्तयों में।
मेरे पास बहुत से पिु -पक्षी
हैं और उिका मुझसे ििाि
भी कम िहीं है , परंतु उिमें
से ककसी को मेरे साथ मेरी
थािी में खािे की हहम्मत हुई
है , ऐसा स्मरण िहीं आता।
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16.
चिल्िू इि मेंअपिाद था I मैं
जैसे ही खािे के कमरे में
पहुाँचती िह खखड़की से निकिकर
आंिि की दीिार बरामदा पार
करके मेज पर पहुाँच जाता और
मेरी थािी में बैठ जािा चाहता I
बड़ी कहठिाई से मैंिे उसे थािी
के पास बैठिा शसखाया , जहााँ
बैठकर िह मेरी थािी में से
एक -एक चािि उठाकर बड़ी
सफ़ाई से खाता रहता।
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17.
काजू उिका वप्रय
खाद्यथा।
उसी बीच मुझे मोटर दुघयटिा में आहत होकर
कु छ हदि अस्पताि में रहिा पड़ा I उि हदिों
जब मेरे कमरे का दरिाजा खोिा जाता , चिल्िू
अपिे झूिे से उतरकर दौड़ता और कफर ककसी
दूसरे को देखकर उसी तेजी से अपिे घोंसिे में
जा बैठता I
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18.
मेरी अस्िस्थता मेंिह तककए पर
शसरहािे बैठकर अपिे िन्हें - िन्हें
पंजों से मेरे शसर और बािों को
इतिे धीरे - धीरे सहिाता रहता कक
उसका हटिा एक पररचाररका के
हटिे के समाि ििता।
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19.
िशमययों में जबमैं दोपहर में काम करती रहती तो
चिल्िू ि बाहर जाता , ि अपिे झूिे में बैठता।
उसिे मेरे निकट रहिे के साथ िरमी से बचिे का
एक िया उपाय खोज निकािा था। िह मेरे पास
रखी सुराही पर िेट जाता और इस प्रकार समीप
भी रहता और ठंडक में भी रहता।
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20.
चििहररयों के जीििकी अिचध 2 िषय से
अचधक िहीं होती , अतः चिल्िू की जीिि
यात्रा का अंत आ ही िया I उस हदि उसिे
ि कु छ खाया ि बाहर िया I रात में अंत
की यातिा में भी िह अपिे झूिे से
उतरकर मेरे बबस्तर पर आया और ठंडे पंजों
से मेरी िही उंििी पकड़ कर हाथ से
चचपक िया , क्जसे उसिे अपिे बचपि की
मरणासन्ि क्स्थनत में पकड़ा था I
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21.
पंजे इतिे ठंडेहो रहे थे कक मैंिे जािकर हीटर
जिाया और उसे उष्णता देिे का प्रयत्ि ककया I
परंतु प्रभात की प्रथम ककरण के स्पिय के साथ ही
िह ककसी और जीिि में जाििे के शिए सो िया
I
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22.
मैंिे उसका झूिाउतार कर
रख हदया है I खखड़की की
जािी बंद कर दी है , परंतु
चििहररयों की िई पीढ़ी
जािी के उस पार चचक् -
चचक् करती ही रहती है
और सोिजुही पर बसंत
आता ही रहता है I
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23.
सोिजुही की िताके िीचे चिल्िू
को समाचध दी िई है , इसशिए कक
उसे िह िता सबसे अचधक वप्रय
थी I
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