उ र वैिदक य
डॉ. िवराग सोनट े
सहायक ा ापक
ाचीन भारतीय इितहास, सं ृ ित और पुरात िवभाग
बनारस िहंदू िव ापीठ, वाराणसी
B.A. Semester III
Paper:301, UNIT: III
Vaidik Religion
उ र वैिदक य
Dr. Virag Sontakke
ावना
• वैिदक युग म य करना मुख काय था।
• धम, देश, समाज क मयादा क र ा के िन म महापु षोंको एक करना
य कहलाता है।
• देवताओं के उ ेश से अि म हिव का जो ाग िकया जाता है, उसे य
कहते है
• देवता अि के ारा मानव ारा द भोजन करते है।
• ार क काल म स , सुर ा, िवजय, दीघायु, संतित, आिद के लए
य िकए जाते थे।
• य लोक क ाणकारी काय माना गया
• ऐसा िव ास था क संसार क कोई स दा नही जो य ारा ा न हो
सके ।
• ऋ ेद: य से लौिकक तथा पारलौिकक सुख क ा होती है।
• श॰ ा॰: सम कम म े कम य को कहा है।
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य क मह ा
• ऋ ेद: य से वेद, छं द , जौ, चतु द क उ ।
• ौत सू और गृ सू म सू और िव ृत वणन।
• ऋ ेद (पु षसू ): िव क उ य कम से।
• अथववेद: संसार क ना भ य है।
• यजुवद: य सृि च का क है।
• शतपथ ा ण: य े कम।
• ऋ ेद: जो य नही मानता वो सुख वं चत होते ए , काक, िग ,
कु कर योनी ा
• एतरेय ा ण: ऐसी कोई स दा नही जो य से ा नही होती।
• य : वैिदक धम का मे दंड। (बलदेव उपा ाय)
Dr. Virag Sontakke
य का अथ
• ाहा: : ाथ बु + आ: पूणतः + हा: ाग।
• आ ा क: मानव दय म आ ोित (सु ) जागृत करना।
• धािमक: देवताओं को स करने का साधन, ा कट करने का
ोत,
• वै ािनक: ाकृ ितक संतुलन क िव ध , कृ ित च : ऋतुचक,
सौरच , चलायमान
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ऋगवैिदक य
1. प सरल और साधारण
2. कमकांड क सरलता
3. घर म गृहपित ारा स
4. पुरोिहतों क आव कता कम
5. राजा ारा िकए य ों का वणन ा नही।
कालांतर म य ों का िव ध-िवधान जिटल आ।
ऋ ेद के पु ष सू म “िव को य कम से उ ” कहा गया।
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य ों का वग करण
• गृ और ौत इन दो वग म िवभा जत
• यह अि से ही स होते थे।
• अि के दो कार ात है ।
• इनक सं ा २१ बतायी गयी है।
१) ारताि (smatargni):
गृह कम से स ं धत सामा य (ज , िववाह, ा )
२) ोताि :
ौत य ( ुित (वेद) अनुसार िव ृत य )
वैिदक य के कार
१) हवीय
1. अि हो
2. दशपूणमास
3. चातुमा
4. आ यण
5. िन ढ –पशुबं ध
6. सौ ामणी
7. िप -िप ु य
२) सोमय
1. अि ोम
2. अ ि ोम
3. उ
4. षोडशी
5. वाजपेय
6. अितरा
7. आ ीयाम
३) “पाक य ”
1. ओपासन होम
2. वै देव
3. पाणव
4. अ का
5. मा सक
6. ा
7. शुलगव
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अि हो
• अि हो हवीय म थम है।
• अि हो : वह य जो यजमान और उसक प ी ारा चार
पुरोिहतों क सहायता से स ािदत हो।
• ितिदन: ातः तथा सायंकाल म अि क उपासना
• अि क उपासना
• िकथ : ातः काल और सायंकाल म अि िक उपासना जसम
दूध, तंडुल,द ध,घृत क आ ित दी जाए।
• ा : पापों से मु , ग ले जाने क नाव सÚश
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दश और पूणमास
• ऐसे य जसम पशुबली दी जाय
• दश : वह िदन जब चं को के वल सूय ही देख सकता है।
• पूणमास: जब चं पूण रहता है।
• या य दश और पूणमास को स ािदत होते थे।
• आप ंभ: इस य का स ादन जीवनभर, स ास होने पूव तथा तीस
वष तक या जब तक शरीर जीण ना हो जाए करते रहना चािहए।
• अ ाधेय य करनेवाला आनेवाली पूणमासी को यह य कर सकता
है।
• कालाव ध: १ या २ िदन
• ४ पुरोिहत
• दश: अि , इं मुख देवता
• पूणमास: अि , सोम मुख देवता
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चातुमा
• ऋतु स ी य
• हर चार महीने म होने से इसे चातुमा नाम पड़ा।
• इसम चार पव होते है।
i. वै देव: फा ुनी पू णमा
ii. व ण - घास: आषाढ़ पू णमा
iii. साकमेध : काितक पू णमा
iv. शुनासीरीय : फा ुन शु ितपदा
• वसंत, हेमंत और वषा का आगमन
• शुनासीरीय: कृ िष कम से संबं धत
• साकमेध: ब ल चढ़ाने क था का उ ेख, यह ब ल चिटयों के झंड पे
फक के “ यह तु ारा भाग है”
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आ यण
• आ यण: अ ( थम फल)+अयन ( हण)
• ोत: शतपथ ा ण, आप ंब धमसू , आ लायन गृहसू ,
बौधायन गृहसू
• नवीन उ धा के समय
• यह य स ािदत िकए िबना नए अ का योग नही कर सकते।
• पू णमा या अमाव ा के िदन
• देव: इं , अि तथा आ ितयाँ
• जै मिन के अनुसार यह ोत य का एक प है।
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पशुबं ध या िन ढ –पशुबं ध
• पशुबं ध मह पूण य है।
• तं पशुबं ध को िन ढ –पशुबं ध कहा जाता है।
• यह य जीवनभर करते थे: ६ मास उपरांत या साल म एक बार तं प से
• िकसी भी िदन स होता था, वषाऋतु
• कालाव ध: २ िदन
• य (यूप) का िनमाण: पलाश, खिदर, िब या रौिहतक नामक वृ के का से
होता था।
• वेदी का िनमाण:
1. वेदी पर एक उ रवेदी (ऊँ चवेदी) का िनमाण
2. वेदी क पूव िदशा के उ रीकोण से लेकर ३२ अंगुल प रणाम का ग ा खोदा जाता
था, जसे चा ाल कहते थे।
3. यह ग ा ३६ अंगुल गहरा होता था।
• देवता: जापित, सूय, इं
• सं पन: श घात के िबना पशु को ास रोक के मारना
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सोमय
• िव ृत, दीघकालीन तथा ब साधन ािप
• सोमरस क आ ित देने से “सोमय ” कहलाता है।
• कालगणना क Úि से
1. एकाह : १ िदन चलनेवाला
2. अहीन: २ िदनो से लेके १२ िदन तक
3. स : १३ िदनो से पूण वष तथा १००० वष तक चलनेवाला
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अि ोम
• ोत: तैत रय संिहता, तैत रय ा ण, शथपथ ा ण एवं एतरेय ा ण।
• अि ोम सोमय ों के सात कारों म सव े (आदश) माना जाता है।
• अि क ुित क जाने से इसका नाम अि ोम पड़ा।
• ितवष बसंत म अमाव ा या पू णमा को िकया जाता है।
• इस य का िवभाजन तीन भागो म िकया जाता है,
1. यथा (Úि )
2. पशु
3. सोम
• कालाव ध: ५ िदन
• कृ ित य होने से इसका िवशेष मह है।
• िहले ांड: इसका स वसंतो व से है।
• इस य म १२ श ों का योग िकया जाता था।
सोमय
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अ मेध य
• ाचीन य : ऋ ेद म, तैत रय ा ण, शथपथ ा ण म िव ृत वणन
• ब च लत य
• अ क ब ल दी जाती थी।
• अ का मास “उखा” नामक पा म पका के आ ित दी जाती।
• तैत रय ा ण: अ मेध को रा या रा कहा है।
• पा ता: सावभौम या अ भिष राजा, जतने क इ ा रखने वाले, अतुल
समृ पाने क कामना करनेवाले
• यिद श ु अ को पकड़ ले तो य न हो जाता है।
• फा ुन शु प के ८ वे या ९ वे िदन, आषाढ़ मास के िदनो म िकया
जाता था।
• रामायण म उ ेख
• समु गु के स े
• सातवाहन, गु , वाकाटक
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पु षमेध य
• सोमय ों म सवा धक जिटल य
• ोत: शु यजुवद, कृ यजुवद, वाजनसेयी संिहता, एवं सू
• पु षमेध : पु ष क ब ल
• चेित –िनमाण: म ५ पशु क ब ल
• िव ानो म पु ष ब ल पर मतभेद ( तीका क और वा िवक)
• म : तैत रय शाखा के अनुसार पु षमेध वा िवक था।
• शु यजुवद: ाथ मक अनु ान के बाद सभी मे मनु ों को मु कर
िदया जाता था।
• कालाव ध: ५ िदन, श॰ ा॰: ४० िदन
• ा : इसके स ादन से पु ष क ित सव े हो जाती है।
• यजमान सव ा णयों म े और सब कु छ ा करने म समथ
• पुराता क माण: कौशा ी (उ र देश), मनसर (नागपुर, महारा )
उ
• उ का प अि ोम
जैसा है।
• श ों एवं ोतों क सं ा
१५ है।
• यह तं ऋत नही है
इस लए अि ोम जैसे
पृथक नही होता
अितरा
• इसम २९ ोत और
श होते है।
• इसका स ादन रा
म होता है।
• पशुओं क सं ा ४
होती है।
अ ि ोम
• १३ ोत और श
होते है।
• अ ि ोम और
अि ोम म कोई
िवशेष अंतर नही
होता।
सौ ामयी
• पशुय है।
• पशु: अज, मेष तथा
ऋषभ।
• देवता: अ न,
सर ती और इं
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समा

Later vedik sacrifices

  • 1.
    उ र वैिदकय डॉ. िवराग सोनट े सहायक ा ापक ाचीन भारतीय इितहास, सं ृ ित और पुरात िवभाग बनारस िहंदू िव ापीठ, वाराणसी B.A. Semester III Paper:301, UNIT: III Vaidik Religion
  • 2.
  • 3.
    Dr. Virag Sontakke ावना •वैिदक युग म य करना मुख काय था। • धम, देश, समाज क मयादा क र ा के िन म महापु षोंको एक करना य कहलाता है। • देवताओं के उ ेश से अि म हिव का जो ाग िकया जाता है, उसे य कहते है • देवता अि के ारा मानव ारा द भोजन करते है। • ार क काल म स , सुर ा, िवजय, दीघायु, संतित, आिद के लए य िकए जाते थे। • य लोक क ाणकारी काय माना गया • ऐसा िव ास था क संसार क कोई स दा नही जो य ारा ा न हो सके । • ऋ ेद: य से लौिकक तथा पारलौिकक सुख क ा होती है। • श॰ ा॰: सम कम म े कम य को कहा है।
  • 4.
    Dr. Virag Sontakke यक मह ा • ऋ ेद: य से वेद, छं द , जौ, चतु द क उ । • ौत सू और गृ सू म सू और िव ृत वणन। • ऋ ेद (पु षसू ): िव क उ य कम से। • अथववेद: संसार क ना भ य है। • यजुवद: य सृि च का क है। • शतपथ ा ण: य े कम। • ऋ ेद: जो य नही मानता वो सुख वं चत होते ए , काक, िग , कु कर योनी ा • एतरेय ा ण: ऐसी कोई स दा नही जो य से ा नही होती। • य : वैिदक धम का मे दंड। (बलदेव उपा ाय)
  • 5.
    Dr. Virag Sontakke यका अथ • ाहा: : ाथ बु + आ: पूणतः + हा: ाग। • आ ा क: मानव दय म आ ोित (सु ) जागृत करना। • धािमक: देवताओं को स करने का साधन, ा कट करने का ोत, • वै ािनक: ाकृ ितक संतुलन क िव ध , कृ ित च : ऋतुचक, सौरच , चलायमान
  • 6.
    Dr. Virag Sontakke ऋगवैिदकय 1. प सरल और साधारण 2. कमकांड क सरलता 3. घर म गृहपित ारा स 4. पुरोिहतों क आव कता कम 5. राजा ारा िकए य ों का वणन ा नही। कालांतर म य ों का िव ध-िवधान जिटल आ। ऋ ेद के पु ष सू म “िव को य कम से उ ” कहा गया।
  • 7.
    Dr. Virag Sontakke यों का वग करण • गृ और ौत इन दो वग म िवभा जत • यह अि से ही स होते थे। • अि के दो कार ात है । • इनक सं ा २१ बतायी गयी है। १) ारताि (smatargni): गृह कम से स ं धत सामा य (ज , िववाह, ा ) २) ोताि : ौत य ( ुित (वेद) अनुसार िव ृत य )
  • 8.
    वैिदक य केकार १) हवीय 1. अि हो 2. दशपूणमास 3. चातुमा 4. आ यण 5. िन ढ –पशुबं ध 6. सौ ामणी 7. िप -िप ु य २) सोमय 1. अि ोम 2. अ ि ोम 3. उ 4. षोडशी 5. वाजपेय 6. अितरा 7. आ ीयाम ३) “पाक य ” 1. ओपासन होम 2. वै देव 3. पाणव 4. अ का 5. मा सक 6. ा 7. शुलगव
  • 9.
    Dr. Virag Sontakke अिहो • अि हो हवीय म थम है। • अि हो : वह य जो यजमान और उसक प ी ारा चार पुरोिहतों क सहायता से स ािदत हो। • ितिदन: ातः तथा सायंकाल म अि क उपासना • अि क उपासना • िकथ : ातः काल और सायंकाल म अि िक उपासना जसम दूध, तंडुल,द ध,घृत क आ ित दी जाए। • ा : पापों से मु , ग ले जाने क नाव सÚश
  • 10.
    Dr. Virag Sontakke दशऔर पूणमास • ऐसे य जसम पशुबली दी जाय • दश : वह िदन जब चं को के वल सूय ही देख सकता है। • पूणमास: जब चं पूण रहता है। • या य दश और पूणमास को स ािदत होते थे। • आप ंभ: इस य का स ादन जीवनभर, स ास होने पूव तथा तीस वष तक या जब तक शरीर जीण ना हो जाए करते रहना चािहए। • अ ाधेय य करनेवाला आनेवाली पूणमासी को यह य कर सकता है। • कालाव ध: १ या २ िदन • ४ पुरोिहत • दश: अि , इं मुख देवता • पूणमास: अि , सोम मुख देवता
  • 11.
    Dr. Virag Sontakke चातुमा •ऋतु स ी य • हर चार महीने म होने से इसे चातुमा नाम पड़ा। • इसम चार पव होते है। i. वै देव: फा ुनी पू णमा ii. व ण - घास: आषाढ़ पू णमा iii. साकमेध : काितक पू णमा iv. शुनासीरीय : फा ुन शु ितपदा • वसंत, हेमंत और वषा का आगमन • शुनासीरीय: कृ िष कम से संबं धत • साकमेध: ब ल चढ़ाने क था का उ ेख, यह ब ल चिटयों के झंड पे फक के “ यह तु ारा भाग है”
  • 12.
    Dr. Virag Sontakke आयण • आ यण: अ ( थम फल)+अयन ( हण) • ोत: शतपथ ा ण, आप ंब धमसू , आ लायन गृहसू , बौधायन गृहसू • नवीन उ धा के समय • यह य स ािदत िकए िबना नए अ का योग नही कर सकते। • पू णमा या अमाव ा के िदन • देव: इं , अि तथा आ ितयाँ • जै मिन के अनुसार यह ोत य का एक प है।
  • 13.
    Dr. Virag Sontakke पशुबंध या िन ढ –पशुबं ध • पशुबं ध मह पूण य है। • तं पशुबं ध को िन ढ –पशुबं ध कहा जाता है। • यह य जीवनभर करते थे: ६ मास उपरांत या साल म एक बार तं प से • िकसी भी िदन स होता था, वषाऋतु • कालाव ध: २ िदन • य (यूप) का िनमाण: पलाश, खिदर, िब या रौिहतक नामक वृ के का से होता था। • वेदी का िनमाण: 1. वेदी पर एक उ रवेदी (ऊँ चवेदी) का िनमाण 2. वेदी क पूव िदशा के उ रीकोण से लेकर ३२ अंगुल प रणाम का ग ा खोदा जाता था, जसे चा ाल कहते थे। 3. यह ग ा ३६ अंगुल गहरा होता था। • देवता: जापित, सूय, इं • सं पन: श घात के िबना पशु को ास रोक के मारना
  • 14.
    Dr. Virag Sontakke सोमय •िव ृत, दीघकालीन तथा ब साधन ािप • सोमरस क आ ित देने से “सोमय ” कहलाता है। • कालगणना क Úि से 1. एकाह : १ िदन चलनेवाला 2. अहीन: २ िदनो से लेके १२ िदन तक 3. स : १३ िदनो से पूण वष तथा १००० वष तक चलनेवाला
  • 15.
    Dr. Virag Sontakke अिोम • ोत: तैत रय संिहता, तैत रय ा ण, शथपथ ा ण एवं एतरेय ा ण। • अि ोम सोमय ों के सात कारों म सव े (आदश) माना जाता है। • अि क ुित क जाने से इसका नाम अि ोम पड़ा। • ितवष बसंत म अमाव ा या पू णमा को िकया जाता है। • इस य का िवभाजन तीन भागो म िकया जाता है, 1. यथा (Úि ) 2. पशु 3. सोम • कालाव ध: ५ िदन • कृ ित य होने से इसका िवशेष मह है। • िहले ांड: इसका स वसंतो व से है। • इस य म १२ श ों का योग िकया जाता था। सोमय
  • 16.
    Dr. Virag Sontakke अमेध य • ाचीन य : ऋ ेद म, तैत रय ा ण, शथपथ ा ण म िव ृत वणन • ब च लत य • अ क ब ल दी जाती थी। • अ का मास “उखा” नामक पा म पका के आ ित दी जाती। • तैत रय ा ण: अ मेध को रा या रा कहा है। • पा ता: सावभौम या अ भिष राजा, जतने क इ ा रखने वाले, अतुल समृ पाने क कामना करनेवाले • यिद श ु अ को पकड़ ले तो य न हो जाता है। • फा ुन शु प के ८ वे या ९ वे िदन, आषाढ़ मास के िदनो म िकया जाता था। • रामायण म उ ेख • समु गु के स े • सातवाहन, गु , वाकाटक
  • 17.
    Dr. Virag Sontakke पुषमेध य • सोमय ों म सवा धक जिटल य • ोत: शु यजुवद, कृ यजुवद, वाजनसेयी संिहता, एवं सू • पु षमेध : पु ष क ब ल • चेित –िनमाण: म ५ पशु क ब ल • िव ानो म पु ष ब ल पर मतभेद ( तीका क और वा िवक) • म : तैत रय शाखा के अनुसार पु षमेध वा िवक था। • शु यजुवद: ाथ मक अनु ान के बाद सभी मे मनु ों को मु कर िदया जाता था। • कालाव ध: ५ िदन, श॰ ा॰: ४० िदन • ा : इसके स ादन से पु ष क ित सव े हो जाती है। • यजमान सव ा णयों म े और सब कु छ ा करने म समथ • पुराता क माण: कौशा ी (उ र देश), मनसर (नागपुर, महारा )
  • 18.
    उ • उ काप अि ोम जैसा है। • श ों एवं ोतों क सं ा १५ है। • यह तं ऋत नही है इस लए अि ोम जैसे पृथक नही होता अितरा • इसम २९ ोत और श होते है। • इसका स ादन रा म होता है। • पशुओं क सं ा ४ होती है। अ ि ोम • १३ ोत और श होते है। • अ ि ोम और अि ोम म कोई िवशेष अंतर नही होता। सौ ामयी • पशुय है। • पशु: अज, मेष तथा ऋषभ। • देवता: अ न, सर ती और इं
  • 19.