धन्वंतरी स्तवन
गुरुस्थान
वैद्यसूर्यवंशीसर वैद्यजमदग्नीसर
वैद्यधोपेश्वरकरसर
वैद्य पवार सर
वैद्य आव्हाड सर वैद्यकु लकर्णीसर वैद्य राजेंद्र कदम
■M.D. Ayurveda Ph.D. Scholar
■Director of Pimpri Chinchwad 1 st Cashless Nirvikar Ayurvedic
Superspeciality
■ Hospital at Jai Ganesh Samrajya Bhosari Pune
■Experience 14 yr in field of Ayurveda
■Examinations of more than 23000 patients
■Speciality in Piles ,Psoriasis and joint disorder
■Awarded by Health excellence Award by Sakal Media Group and Nirog
Street .
■Chairman Ayurved Prachar Prasar Samitti Nima Maharashtra
■Executive Member Ayurved Vyaspith Pimpri Chinhcwad
■Joint Secretary Maharashta Ayurved Samelan Pimpri Chinchwad
■Chairman Go Green Committe Nima Pimpri Chinchwad
■Founder member Avirat Shramdaan NGO
■Article publish on obesity ,cancer etc.
■Ph no : 9881572395 MailI’d.:drnileshlondhe@gmail.com
Vaidya Nilesh Navnath Londhe
Lecture 1
Introduction to
Ayurveda:
The Basic Principles
of Tridosha
and
Panchamahabhuta
इस लोक में उपलब्ध ग्रंथों में सबसे श्रेष्ठ व प्राचीन ग्रंथ 'वेद' हैं जो
संख्या में चार हैं-
वेद एवं आयुर्वेद
इह खल्वायुर्वेदं नामोपाङ्गमर्थव वेदस्य ॥(सु.सू. 1/6)
तदायुर्वेदमनीत्यायुर्वेद: ।(च.सू. 30/23)
1. ऋग्वेद
3. सामवेद
2. यजुर्वेद
4. अथर्ववेद
आयुर्वेद अनादि व शाश्वत है।
इसे अथर्ववेद का 'उपांङ्ग' या 'पंचम वेद'
भी कहा गया है' क्योंकि आयुर्वेद आयु का
विज्ञान व आयु का पुण्यतम वेद है।
आयुर्वेद परिचय
"न जन्तु कश्चिदमरः पृथिव्यामेव जायते ।
अती मृत्युरवारर्यः स्यात्किन्तु रोगो निवार्यते ॥"
(शा.स.पू.ख.5/53)
अर्थात् संसार में कोई भी जीव अमर नहीं है, एवं मृत्यु का निवारण संभव नहीं
है परंतु आयुष्मान् जीव में चिकित्सा के द्वारा रोगों का निवारण किया जा
सकता है।
आयुर्वेद एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति है जो :
• शरीर
• मन
• आत्मा
के संतुलन पर आधारित है।
"स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, अतुरस्य विकार प्रशमनं।"
आयुर्वेद का प्रयोजन
आयुर्वेद के मुख्य दो प्रयोजन हैं,
पहला - स्वस्थ लोगो के स्वास्थ्य की रक्षा करना
दूसरा - रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना ।
आयुर्वेद के मुख्य प्रयोजनों की पूर्ति के उद्देश्य से ब्रह्मा जी ने
अष्टाङ्ग आयुर्वेद का
उपदेश किया था जो निम्न प्रकार है-
अष्टाङ्ग आयुर्वेद
1. कायचिकित्सा ( General Medicine)
2. शल्य तंत्र (General Surgery)
3. शालाक्य तंत्र (E.N.T.)
4. अगद तंत्र (Toxicology & Jurisprudence)
5. भूतविद्या
6. कौमार भृत्य (Paediatrics)
7. रसायन तंत्र (Geriatrics)
8. वाजीकरण तंत्र (Aphrodisiacs)
आयु : लक्षण
शरीरेन्द्रिय सत्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्।
शरीर, इंद्रिय, मन, एवं आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं।
यहाँ इंद्रिय शब्द से बाह्येन्द्रिय व आभ्यन्तरेन्द्रिय दोनों का
ही ग्रहण किया जाता है।
(च.सू. 1/12)
त्रिदोष,
पंचमहाभूतों
महत्वपूर्ण क्यो है ?
• शरीर की संरचना समझना
• रोग उपचार
• आध्यात्मिक स्वास्थ्य
• रोगों की जड़ पहचानना
• जीवनशैली सुधारना
• त्रिदोष सिद्धांत - वात, पित्त और कफ
• पंचमहाभूत सिद्धांत - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश
• प्रकृती - विकृती
• आम
• अग्नि
• सप्तधातु -रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र
• त्रिमल - स्वेद , मूत्र, मल
• आहार और जीवनशैली
• व्याधीक्षमत्व
आयुर्वेद के मुख्य सिद्धांत :
स्वस्थयावस्था में त्रिदोष, धातु एवं मल
अपने स्वाभाविक प्राकृत कर्म
करते रहते हैं
इसलिए इनको
शरीर का मूल कारण कहा गया है।
दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् |
दोष विवेचन
निरुक्ति 'शरीरं दूषयन्तीति दोषाः'
अर्थात् जो शरीर या धातुओं को दूषित करे उसे दोष कहते हैं।
दोष
शारीरिक दोष मानसिक दोष
वात, पित्त एवं कफ रज एवं तम
दोष शामक रस प्रकोपाक रस
वात मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त कषाय
पित्त मधुर तिक्त कषाय अम्ल लवण कटु
कफ कटु तिक्त कषाय मधुर अम्ल लवण
त्रिदोष और रस
दोष संचय प्रकोप प्रसर स्थानसंश्रय व्यक्ती भेद
वात स्तब्ध कोष्ठता,
पूर्ण कोष्ठता
कोष्ठ तोद-
संचरणा
विमार्ग-गमन
आटोप
दोष अव्यव
मे आश्रित
रोग
अवस्था
उपद्रव
अस्वथा
पित्त पीतांव
भासता,
मन्द उष्मता
आम्लिका
(अम्लउद्गार)
पिपास
परिदाह
ओष
चोष
परिदाह
धूमायनानि
दोष अव्यव
मे आश्रित
रोग
अवस्था
उपद्रव
अस्वथा
कफ अंगानां
गौरवम,
आलस्यम
हृदयोत्कलेद
अन्नद्वेष
अरोचक
अविपाक
अंगसाद
छर्दि
दोष अव्यव
मे आश्रित
रोग
अवस्था
उपद्रव
अस्वथा
त्रिदोष और षट्क्रियाकाल
दोष समय
वात अपराह्न - 2 PM to 6 PM
प्रात: काल - 2 AM to 6 AM
पित्त मध्यान्ह - 10 AM to 2 PM
रात्रि - 10 PM to 2 AM
कफ प्रभात - 6 AM to 10 AM
संध्या - 6 PM to 10 PM
त्रिदोष और समय
दोष संचय प्रकोप प्रशमन
वात ग्रीष्म वर्षा शरद
पित्त वर्षा शरद हेमंत
कफ शिशिर वसंत ग्रीष्म
त्रिदोष और ऋतु
त्रिदोष और प्रकृती
संतुलित दोषों के सामान्य कार्य
• तीनों दोष शरीर के सभी अंगों में मौजूद होते हैं।
• ये दोष सामान्य संतुलित स्थिति में अच्छे स्वास्थ्य का कारण बनते हैं और
असंतुलित स्थिति में बीमारी का कारण बनते हैं।
• जब वे संतुलित होते हैं, तो वे
• उपचय - शरीर को पोषण
• बल- शक्ति और प्रतिरक्षा में सुधार,
• वर्ण प्रसाद - त्वचा के स्वास्थ्य और रंग में सुधार का कारण बनते हैं .
त्रिदोष के कार्ये
पित्तं पङ्गु कफः पङ्गु पत्ङ्गवो मलधातवः ।
वायुनः यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् ॥ (शा.स.पू.ख. 5/25)
वात दोष
पित्त एवं कफ गति रहित हैं तथा
धातु एवं मल भी गति रहित होते हैं,
इन्हें वात ही अपनी इच्छा से गति प्रदान करता है
एवं जहां ले जाना चाहता है वहां ले जाता है।
(जैसे बादल आकाश में फै लते हैं)
वात की प्रधानता का कारण
• व्यापक होने से,
• शरीर के सूक्ष्मतम स्रोतों में प्रवेश कर
शीघ्रता से रोग उत्पन्न करने से,
• कफ-पित्त की अपेक्षा बलवान होने से,
• स्वयं कुपित होकर अन्य दोषों को भी प्रकुपित
• करने से तथा
• बहुसंख्यक रोगों को उत्पन्न करने के कारण
शरीरस्थ दोषों में वात प्रधान दोष है।
वात के गुण-
वात के प्राकृतिक गुण-रजो
बहुल
• रूक्षः सूखापन - सर्दियों में अक्सर लोग सूखी त्वचा
और फटे होंठों का अनुभव करते हैं
• शीत: ठंडक - हाथ-पैर ठंडे रह सकते हैं, सर्दी का
ज्यादा अहसास होना
• लघुः हल्कापन
• सूक्ष्म : सूक्ष्म और महीन होता है
• चल: गतिशील -
शरीर में गति और सक्रियता को नियंत्रित करता है।
असंतुलीत-शरीर में अत्यधिक गति उत्पन्न ,
बेचैनी या अनियंत्रित विचारों
वात के गुण-
• विशदः स्पष्ट और साफ -
शरीर में गति और संचार ठीक तरीके से हो रहे हैं,
बिना किसी रुकावट के।
• खरः खुरदरापन- त्वचा का खुरदरा होना
• दारुण: पीड़ादायक- शरीर में दर्द और खिंचाव उत्पन्न करता है।
• अनवस्थित एवं योगवाही, ये वायु के भौतिक गुण हैं।
वात के गुण-
वायु के प्राकृत कर्म
• उत्साह : उत्साह और ऊर्जा को नियंत्रित करता
है (कार्य करने की शारीरिक व मानसिक
प्रवृत्ति)
• उच्छ्श्वास:निःश्वास : श्वसन क्रिया (सांस लेने
और छोड़ने) को नियंत्रित करता है
• चेष्टा (कायिक, वाचिक, मानसिक),धातुओं में सम्यक्ङ्गति:
शरीर के अंगों और मांसपेशियों में गति और सक्रियता लाता है
• गतिशील मलों (मूत्र, पुरीष, स्वेद) का उचित समय पर सम्यक्
निष्कासन
वायु के प्राकृत कर्म
• शरीर रूपी यंत्र को धारण करना,
• मन का नियमन,
• मन व इंद्रियों को अपने विषयों में लगाना,
• ज्ञान को आत्मा तक पहुंचाना,
• सर्व धातु व शरीर की रचना करना,
वायु के प्राकृत कर्म
• शरीर का नियंत्रण,
• अग्नि का प्रेरण,
• स्थूल व सूक्ष्म स्रोतसों का निर्माण करना,
• क्लेद का शोषण, गर्भकृति का निर्माण, गर्भ
वायु के प्राकृत कर्म
⚬ पक्वाशय, कटि, सक्थि
(पैर की अस्थियां)
⚬ वस्ति, पुरीषाधान (Large intestine)
⚬ श्रोत अस्थि व स्पर्शनेन्द्रिय
⚬ वात के स्थान हैं।
⚬ इनमें पक्वाशय वात का विशिष्ट स्थान है।
वात के विशिष्ट स्थान
वात के प्रकार
सर्व शरीर में व्याप्त 'वात' एक ही है, परंतु भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न कर्म
करने के कारण स्थान व कर्मों के आधार पर 'वात' के निम्र 5 भेद हैं"-
1. प्राण वायु
2. उदान वायु
3. समान वायु
4. व्यान वायु
5. अपान वायु
प्राण वायु के स्थान
⚬स्थान-हृदय,
⚬मुख,
⚬शिर,
⚬जिह्ना,
⚬नासिका,
⚬कर्ण या कण्ठ
⚬तथा उरस प्राण वायु के स्थान हैं।
⚬हृदय प्राण वायु का मुख्य स्थान है'
1. मन एवं बुद्धि का नियंत्रण।
2. ष्ठीवन (थूकना), क्षवधु (छींकना), उद्‌
गार आदि कर्म।
3. श्वास प्रक्रिया-उच्छवास (Expiration) एवं निःश्वास
(Inspiration) का संचालन।
फु फ्फु स (Lungs) के प्रधान कार्य प्राण वायु द्वारा सम्पादित होते हैं।
4. अन्न (आहार का निगलना)।
प्राण वायु के कर्म-
प्राण वायु के कर्म-
5. देह को धारण करना।
6. प्राण वायु सभी इंद्रियों को अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में
प्रवृत्त कराती है। यथा-
(i) गंध ज्ञान-Olfactory Nerve (1st Cranial Nerve) द्वारा ।
(ii) रुप ज्ञान-Optic Nerve & Occulomotor Nerve (2nd &
3rd Cranial Nerve) द्वारा ।
(iii) शब्द ज्ञान-Auditory Nerve (8th Cranial Nerve) द्वारा।
(iv) रस ज्ञान-Glossopharyngeal Nerve (9th Cranial nerve) द्वारा ।
(v) स्पर्श ज्ञान-त्वचा स्थित nerves द्वारा होता है।
7. तेरह प्राणों (अग्नि, सोम, वायु, सत्व, रज, तम, पंच ज्ञानेन्द्रिय,
भूतात्मा एवं मन) का अबलम्बन करना।
प्राण वायु विकृति जन्य रोग-
⚬प्राण वायु की विकृति से
⚬ श्वास,
⚬ हिक्का,
⚬हृद रोग व
⚬मानसिक रोग उत्पन्न हो
सकते हैं।
उदान वायु के स्थान
• स्थान-उर (वक्ष),
• कण्ठ तथा
• नाभि
ये उदान वायु के स्थान हैं'।
• कण्ठ उदान वायु का प्रधान स्थान है।
उदान वायु के कर्म
1. भाषण, गान आदि वाणी की प्रवृत्ति ।
2. प्रयन, चेष्टा करना, नासिका, कण्ठ आदि की चेष्टायें
उदान वायु द्वारा सम्पादित होती हैं।
3. ऊर्ध्व जत्रुगत अंगों को शक्ति प्रदान करना।
4. बल, वर्ण, स्मरणशक्ति एवं ऊर्जा का संचार करना'।
• ऊर्ध्व जत्रुगत रोग उदान वायु की विकृति से होते हैं।
• ऊर्ध्व जत्रुगत रोगों में शिरोरोग, नेत्र रोग,
कर्ण एवं नासिका रोग
• दन्तरोग एवं मुखरोग विशेषतः उदानवायु की विकृति से
होते हैं।
उदान वायु विकृति जन्य रोग
समान वायु के स्थान
• नाभि,
• आमाशय
• क्षुद्रांत्र
ये समान वायु के प्रमुख स्थान हैं।
नाभि समान वायु का विशेष स्थान है।
समान वायु के कर्म
• अन्न को ग्रहण कर पचाना।
• भोजन का सार-किट्ट भाग में विभाजन करना।
• जठराग्नि दीप्त करना।
• स्वेदवह स्रोतों के कार्य सम्पादित करना।
• अन्नवह स्रोतों के कार्य सम्गदित करना।
• उदकवह स्रोतों के कार्य सम्पादित करना।
• अग्निमांद्य,
• गुल्म,
• अतिसार,
• ग्रहणी एवं
• अजीर्ण
आदि रोग समान वायु की विकृति से उत्पन्न हो सकते हैं।
समान वायु विकृति जन्य रोग
व्यान वायु का स्थान
सम्पूर्ण शरीर व्यान वायु का स्थान है।
व्यान वायु का स्थान
1. रस धातु का समस्त शरीर में प्रवाहण करना।
2. रक्त का संवहन करना।
3. स्वेद व आंसुओं का निकलना।
4. संधियों की गति व चेष्टा का नियामन करना।
5. उत्क्षेपण (ऊपर की ओर फें कना), मांसपेशियों की प्रसरण क्रिया, तथा अवक्षेपण
(नीचे की ओर गति), मांसपेशियों की संकुचन क्रिया सम्पादित करना।
6. निमेष (पलक बंद करना)
7. उन्मेष (पलक खोलना) आदि कर्म व्यान वायु द्वारा सम्पादित होते हैं।
व्यान वायु जन्य रोग
• रोग-ज्वर,
• रक्तपित्त,
• अतिसार,
• यक्ष्मा व
• सर्वांगगत रोग
व्यान वायु की विकृति से उत्पन्न हो सकते हैं'।
अपान वायु के स्थान
• गुदा,
• वृहदांत्र,
• वृषण,
• मूत्रेन्द्रिय,
• वस्ति,
• नाभि,
• उरु एवं वंक्षण आदि अपान वायु के स्थान हैं।
अपान वायु के कर्म
1. मूत्र, पुरीष, शुक्र, आर्तव एवं गर्भ का उचित समय
पर शरीर से बाहर निकालना।
2. मल, पुरीष, शुक्र, आर्तव एवं गर्भ का वेग न होने पर
इनको धारण करना
अपान वायु के कर्म हैं।
अपान वायु विकृत होने पर
मूत्राशय एवं गुदा में होने वाले गम्भीर
रोगों को उत्पन्न कर सकती है।
अपान वायु विकृति जन्य रोग
• गर्भाशय विकार
• मूळव्याध (बवासीर)
• किडनी विकार
• मूत्र विकार
वात प्रकोपक (वृद्धि) निदान
आहारज निदान
i) कटु-तिक्त-कषाय रस प्रधान पदार्थ अति सेवन
i) रुक्ष-लघु अन्न पदार्थ सेवन
iii) शीतवीर्य द्रव्य सेवन
iv) अनशन, विषमाशन, अध्यशन एवं प्रमिताशन
v) चना, मटर, मसूर अतिसेवन
वात प्रकोपक (वृद्धि) निदान
विहारज निदान
i) अति व्यायाम व अति व्यवाय
ii) लंघन या उपवास
iii) प्लवन (Excessive swimming), प्रपतन (Falling) व
अभिघात
iv) रात्रि जागरण
v) वेग विधारण
vi) गजरथ-पदातिचर्या अर्थात् घोड़ा-हाथी आदि की सवारी करना एवं
वात प्रकोपक (वृद्धि) निदान
मानसिक निदान
अतिशोक-चिन्ता-भय-लोभ व ग्लानि
अन्य निदान
i) रक्त स्राव
ii) धातु क्षय
iii) वर्षा ऋतु
iv) वृद्धावस्था
v) सांयकाल
वात दोष वृद्धि के लक्षण
एवं वात दोष क्षय के लक्षण'
कार्ष्या काष्णर्योष्णंकामित्वं कम्पानाह शकृतगदान्।
बलनिद्रेन्द्रियभ्रंश प्रलाप भ्रम दीनताः ॥ (अ.हृ.सू. 11/5-6
लिङ्ग क्षीणेऽनिलेऽङ्गस्य सादोल्प भाषिते हितम्।
संज्ञामोहस्तथा श्लेष्मवृद्धयुक्तामयसंभवः ॥ (अ.हृसू. 11/55)
वात दोष वृद्धि के लक्षण
1.प्राण वायु की वृद्धि
(i) शक्ति की कमी (Loss of Power)
(ii) प्रलाप (Delirium)
(iii) दीनता (Inability to work)
(iv) भ्रम (Vertigo)
(v) अनिद्रा (Insomnia)
2. उदान वायु वृद्धि
(i) वाणी की कर्कशता (Hoarseness of voice)
(ii) मुख एवं नेत्र का कालापन (Dark Circles around eyes)
3. समान वायु वृद्धि
(i) उष्ण पदार्थों के सेवन की इच्छा होना (Desire to eat warm/hot substances)
4.व्यान वायु वृद्धि
(i) त्वक् रौक्ष्यता (Dry Skin)
(ii) कृशता (Decreased body weight)
(iii) अंगों का फड़कना (Throbbing sensation)
5.अपान वायु वृद्धि
(i) हाथ पैर का फटना (Cracking of soles)
(ii) मल का गाढ़ा या शुष्क होना (Hard Stool)
वात दोष वृद्धि के लक्षण
वात दोष क्षय के लक्षण'
1. प्राण वायु क्षय
(i) प्रसन्नता का अभाव (Loss of happiness)
(ii) ज्ञान की कमी (Lack of knowledge)
(iii) बुद्धि का मोह (Confusion)
2. उदान वायु क्षय
(i) अल्पभाषण (Feeble Voice)
3. समान वायु क्षय
(i) मंदाग्नि (Poor Appetite)
4. व्यान वायु क्षय
(i) समस्त कार्यों में मंदता (Inertness, diminished body
functions)
(ii) अंगों का ढीलापन (Looseness of body parts)
5.अपान वायु क्षय
(i) मलावरोध (Constipation, Oliguria, Amenorrhoea
वात दोष क्षय के लक्षण'
• नखभेद (नाखूनों का टूटना)
• विपादिका (पैरों का फटना)
• पद शूल (पैर में दर्द)
• पद सुप्तता (पैर का सुन्न होना)
• पिंडिकोद्वेष्टान (पिंडली की मांसपेशियों में ऐंठन)
• गृध्रासी (कटिस्नायुशूल)
• उरुस्तंभ (जांघ की कठोरता)
• उरुसादा (पैर में दर्द) जाँघ)
• पंगुल्या (पैराप्लेजिया)
वातज नानात्मज व्याधी -८०
वातज नानात्मज व्याधी -८०
• उदावर्त (सूजन)
• खंजत्व (लंगड़ापन)
• कुब्जत्व (लंगड़ापन)
• त्रिकग्रह (सैक्रो-इलियक जोड़ की कठोरता)
• पृष्टग्रह (पीठ की कठोरता)
• वाक संगा (रोकना)। वाणी)
• कषाय अस्यता (मुंह में कसैला स्वाद)
• मुख शोष (मुंह का सूखापन)
• कर्ण शूल (कान में दर्द)
वातज नानात्मज व्याधी -८०
• बाधिर्या (बहरापन)
• एकांग रोग (मोनोप्लेजिया)
• सर्वांग रोग (बहुप्रतिघात)
• पक्षवध (हेमिप्लेजिया)
• भ्रम (चक्कर आना)
• वेपथु (कंपकंपी)
• हिक्का (हिचकी)
• अति प्रलाप (प्रलाप) अत्यधिक अप्रासंगिक बात
• रौक्ष्य (सूखापन)
• पौरुष्य (कठोरता)
वात दोष वृद्धि में निम्न चिकित्सासूत्र अपनाने चाहियें' -
(i) स्नेहन स्वेदन के पश्चात् मृदु संशोधन
(ii) निरुह व अनुवासन बस्ति प्रयुक्त करें
(iii) नस्यकर्म, गण्डूष, धूम्रपान, शिरोवस्ति दें
(iv) अभ्यंग, मर्दन, वेष्टन करें
(v) मधुर-अम्ल-लवण रस युक्त उष्ण व स्निग्ध भोजन दें
वात दोष वृद्धि की चिकित्सा
पित्त दोष
पित्त के गुण :
• ऊष्ण, स्निग्ध, तीक्ष्ण, द्रव, कटु, सर, रूक्ष, लघु, विशद
• विस्त्र, पूति, पीत, नील तथा अम्ल (विदग्धावस्था में) पित्त के
भौतिक गुण हैं।
पित्त अग्नि महाभूत का प्रतिनिधि द्रव्य है एवं इसमें
अग्नि के गुणों की अधिकता होती है
प्राकृत पित्त के कर्म-
• दर्शन (देखना)
• पक्ति (भोजन पाक)
• क्षुत् (क्षुधा)
• तृष्णा (प्यास)
• शरीर की मृदुता
• प्रभा (कांति)
• मानसिक प्रसन्नता
• ऊष्मा (शरीर का स्वाभाविक तापमान बनाये रखना)
• धारणाशक्ति (मेधा)
• बुद्धि (धृति)
• रूचि
• शौर्य, पराक्रम
• धातु पाक
पित्त दोष के विशिष्ट स्थान
• स्वेद,
• रस,
• लसीका,
• रुधिर,
• आमाशय पित्त के प्रमुख स्थान हैं.
• इनमें भी आमाशय विशेष रुप से पित्त
का स्थान है।
• पक्वाशय एवं आमाशय के मध्य में पित्त
का स्थान अवस्थित है।
आचार्य चरक ने केवल वात दोष के पांच भेद बताये हैं, पित्त
एवं कफ के नहीं। आचार्य सुश्रुत ने पित्त के पांच भेद बताये हैं जो स्थानं कर्म की
भिन्नता से निम्न प्रकार हैं-
पित्त दोष के भेद
1.पाचक पित्त
2. रंजक पित्त
3.साधक पित्त
4.आलोचक पित्त
5.भ्राजक पित्त
पाचक पित्त के स्थान
आमाशय (अधोभाग),
पक्वाशय के मध्य स्थान ग्रहणी सहित क्षुद्रांत्र
(Small intestine including Duodenum) तथा
अग्न्याशय (Pancreas)
• चार प्रकार के अन्नपान-अशित, पीत, लीढ़ एवं खादित को पचाना|
• अन्न पाचन करके दोष, रस, मल तथा मूत्र को अलग-अलग करके अन्न
का विवेचन करना।
• सप्त धात्वाग्नियों एवं पंचभूताग्रियों को अपने स्थान पर रखता हुआ
अपनी शक्ति प्रदान कर अनुग्रह करता रहता है'।
• पक्ति, ऊष्मा, बल, वर्ण, स्वास्थ्य, उत्साह, प्रभा, ओज तथा प्राण का
कारण है एवं इनका पोषण करता है'।
• विकृत होने पर [विषम, तीक्ष्ण, मंद ] शरीर में रोग व पाचकाग्नि शांत
होने पर मृत्यु हो जाती है"।
पाचक पित्त के कर्म
पाचक पित्त विकृति जन्य रोग
• अग्निमांद्य,
• अम्लपित्त,
• ग्रहणी रोग,
• अजीर्ण
• आदि रोग पाचकाग्रि के विकृत होने पर उत्पन्न हो सकते हैं।
रंजक पित्त का स्थान
• यकृत (Liver) एवं प्लीहा (Spleen) रंजक पित्त
के स्थान हैं किंतु आचार्य वाग्भर ने आमाशय में
रंजक पित्त का स्थान बताया है।
• गर्भकाल में गर्भ में रक्त का निर्माण यकृत एवं प्लीहा
में ही होता है तथा जन्म के बाद रक्त का निर्माण
Red bone marrow में होता है।
1.अन्न रस को रंजित कर रक्त निर्माण करना।
2. रंजक पित्त आमाशय में आश्रित होकर अन्न रस को रंजित करके रक्त
निर्माण करता है।
3. शरीर के मूत्र, पुरीष, त्वक्, केश एवं नेत्रों का रंजन करना।
4. क्षुद्रांत्र (Small Intestine) में स्थित रंजक पित्त, मूत्र एवं पुरीष
का रंजन करता है। त्वक् की सबसे नीचे की 'ताम्रा' त्वचा में स्थित रंजक
पित्त (Melanin) त्वक् (त्वचा) को विशिष्ट वर्ण प्रदान करता है।
रंजक पित्त के कार्य
आलोचक पित्त का स्थान'
नेत्र आलोचक पित्त का स्थान है।
आलोचक पित्त के भेद' - आचार्य भेल ने आलोचक पित्त के
निम्न दो भेद बताए
चक्षु वैशेषिक - यह वस्तुओं की भिन्नता का ज्ञान कराता है।
2. बुद्धि वैशेषिक - यह अत्यंत सूक्ष्म विषयों को भी ग्रहण
करता है तथा धूमध्य में श्रृगांटक मर्म में रहता है।
आलोचक पित्त के कर्म
• वस्तुओं के रुप का दर्शन करना।
• वस्तुओं की भिन्नता का ज्ञान करना।
आलोचक पित्त विकृति जन्य रोग
• दृष्टि संबंधी तिमिर आदि रोग
• तथा दृष्टि पटल के रोग
आलोचक पित्त की विकृति से होते हैं।
साधक पित्त के स्थान'
हृदय साधक पित्त का स्थान है।
साधक पित्त के कर्म
1)मेधा, बुद्धि एवं अभिमान आदि मनोरथों को पूर्ण करना
(2) प्रभा बनाये रखना
(3) इन्द्रियों की निर्मलता बनाये रखना
(4) शौर्य एवं भय आदि भावों को प्रकट करांना
(5) हर्ष एवं क्रोध की अभिव्यक्ति करना
(6) प्रसन्नता एवं मोह आदि की अनुभूति कराना.
साधक पित्त विकृतिजन्य रोग'
(1) मानसिक विकृतियां -भय, क्रोध, मोह आदि।
(2) हृदय की विकृतियां - रक्तावृत्त वात (Hypertension), हृदय
रोग आदि।
(3) अन्तःस्त्रावी ग्रंथियों (Endocrinal glands) के विकार-यथा
पीयूषग्रंथि (Pituitary gland), अधिवृक्क ग्रंथि के रोग साधक पित्त
की विकृति से होते हैं।
भ्राजक पित्त का स्थान
आचार्य सुश्रुत ने त्वचा के बाह्य स्तर को "अवभासिनी" कहा है जो
सब वर्णों को प्रकट करती है तथा पांच प्रकार की छाया को प्रकाशित
करती है
त्वचा भ्राजक पित्त का स्थान है।
भ्राजक पित्त के कर्म
(1) त्वचा को वर्ण प्रदान करना
(2) शरीर के तापमान का नियमन करना
(3) छाया का प्रकाशन करना
(4) त्वचा के सम्पर्क में आने वाले परिषेक, अभ्यंग,
अवगाहन, लेप आदि का अवशोषण करना
भ्राजक पित्त विकृति जन्य रोग
⚬विभिन्न त्वक् रोग, विवर्णता,
⚬म्लानता,
⚬श्वित्र,
⚬सिध्म,
⚬कुष्ठ,
⚬पलित आदि रोग भ्राजक पित्त की विकृति से
उत्पन्न हो सकते हैं।
पित्त वृद्धि के निदान
आहारज निदान
i) कटु, अम्ल, लवण, क्षार, तीक्ष्ण, ऊष्ण, विदाही अन्न-पान का अधिक
सेवन
ii) अध्यशन
iii) तिल, अलसी, कुलथी, सर्षप, दधि, सुरा अतिसेवन
iv) हरितशाक, गोधा, मत्स्यमांस, तक्र, कांजी का अति सेवन पित्त
प्रकोपक है।
पित्त वृद्धि के निदान
विहारज निदान
i) अति आतप सेवन
ⅱ) अति स्त्री प्रसंग
iii) अति परिश्रम
पित्त वृद्धि के निदान
मानसिक निदान
i) क्रोध
ii) ईर्ष्या
iii) शोक
iv) भय
v) द्वेष
अन्य निदान
i) मध्यान्ह काल
li) मध्यावस्था
iii) शरद ऋतु
पित्त वृद्धि के लक्षण'
पित्त क्षय के लक्षण
पित्तवृद्धो पीतावभासता संतापः शीतकामित्वमल्पनिद्रता
मूच्र्छा बलहानिरिन्द्रियदौर्बल्यं पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं च ।
(सु.सू. 15/13)
1) पित्तक्षये मन्दोष्मानिता निष्प्रभता च।(सु. सू. 15/7)
2) पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः ।(अ. ह. सू. 11/16)
पित्त वृद्धि के लक्षण
1) पाचक पित्त की वृद्धि
i) तृष्णा [Thirst]
ii) शीतकामिता [Desire for cold things]
2) आलोचक पित्त वृद्धि
i) पीतनेत्रता [Yellowish eyes]
3) साधक पित्त वृद्धि
i) निद्राल्पता [Insomnia]
ii) मूर्च्छा एवं बलहानि [Syncope & loss of Vigour]
iii) इन्द्रिय दौर्बल्य [Deficient Sensory Perceptions]
iv) भ्रम [Vertigo]
पित्त वृद्धि के लक्षण
4) रंजक पित्त की वृद्धि
i) पीतावभासता [Yellowish texture of skin]
ii) पीत मल, मूत्र, नेत्र [Yellowish Stool, Urine &
eyes
5) भ्राजक पित्त की वृद्धि
i) संताप [Raised body temperature]
ii) दाह [Burning Sensation]
पित्त क्षय के लक्षण
1) पाचक पित्त क्षय
i) मंदाग्नि [Poor appetite]
2) रंजक पित्त क्षय
i) पाण्डु [Anaemia]
3) आलोचक पित्त क्षय-
i) मंददृष्टि [Diminished Vision]
ii) अदर्श । [Inabitity to see]
पित्त क्षय के लक्षण
4) साधक पित्त क्षय
i) निष्प्रभता [Loss of Lusture]
5) भ्राजक पित्त क्षय
i) मंदोष्मता [Decreased body
temperature]
• ओश
• दाह
• विदाह
• अतिस्वेद
• अम्लउद्गार
• अंस दाह
• उष्मा आधिक्य
• त्वक दाह
पित्त नानात्मज व्याधी -४०
• रक्त पित्त
• कामला
• नीलिका
• तिक्त आस्यता
• रक्त मंडल
• अतृप्ती
• गल पाक
• गुद पाक
(i) विरेचन व रक्तमोक्षण कर्म
(ii) शीत प्रदेह, परिषेक व अभ्यंग
(iii) मधुर-तिक्त, कषाय रस प्रधान एवं शीत द्रव्य सेवन
(iv) क्षीर व घृत का प्रयोग
(v) पित्तशामक द्रव्यों यथा-चन्दन, हीबेर, मुक्ता, प्रवाल आदि का
प्रयोग करें
पित्त दोष वृद्धि की चिकित्सा-सिद्धान्त
कफ दोष
जल से जिसकी उत्पत्ति हो उसे कफ कहते हैं।
जल का कार्य संयोग करना है अतः संयोग कर्ता को 'श्लेष्मा' या 'कफ'
कहा है।
प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।। स चैवोजः स्मृतः
काये स च पाप्मोपदिश्यते ॥च.सू. 17/117)
कफ प्राकृत होने पर 'बल' कहलाता है'।
इसी को शरीर में 'ओज' कहते हैं।
कफ विकृत होने पर 'मल' कहलाता है।
शरीरस्थ कफ चन्द्रमा का प्रतिरूप है।
प्राकृत कफ के गुण
• भौतिक गुण-
• स्निग्ध, शीत, गुरु, मधुर,
• स्थिर, पिच्छिल, लवण,
• श्वेत, मंद एव श्लक्ष्ण
• ये कफ के भौतिक गुण हैं।
• कफ तमो गुण प्रधान होता है।
1) स्नेहन
(2) बंधन
(3) स्थिरता (दृढ़ता)
(4) गौरवता
(5) वृषता (मैथुन शक्ति)
प्राकृत कफ के कर्म
(6) बल, क्षमा एवं धैर्य
(7) उदारता, उत्साह
(8) संधियों को चिकना करना
(9) तर्पण-पूरण-रोपण
(10) वृंहण एवं उपचय-ये कफ के प्राकृत कर्म हैं।
कफ के विशिष्ट स्थान'
• उर:प्रदेश (Chest),
• कण्ठ,
• शिर,
• क्लोम,
• पर्वसंधि,
• ग्रीवा,
• रस, मेद, एवं आमाशय
कफ के प्रमुख स्थान हैं
कफ के भेद
आचार्य वाग्भट्ट ने स्थान एवं कर्म की भिन्नता के आधार पर
कफ के पांच भेद बताये हैं जो निम्न हैं-
(1) क्लेदक कफ
(2) अवलम्बक कफ
(3) बोधक कफ
(4) तर्पक कफ
(5) श्लेषक कफ
क्लेदक कफ का स्थान
क्लेदक कफ के कर्म-
क्लेदक कफ का स्थान आमाशय है
(1) अन्न का क्लेदन करना
(2) अन्न को मृदु बनाना
(3) पिण्ड रूप आहार का संघात कर द्रव के समान महीन
एवं पतला बनाकर सुखपूर्वक पचने योग्य बना
(4) अन्य स्थान स्थित श्लेष्मा को अपने उदक कर्म से
अनुग्रहीत करनाना
क्लेदक कफ विकृति जन्य रोग
• मंदाग्नि,
• हल्लास,
• वमन,
• अजीर्ण,
• ऊर्ध्वग
• अम्लपित्त
• उदर एवं
• शरीर में भारीपन उत्पन्न होता है।
अवलम्बक कफ के स्थान'
अवलम्बक कफ के कर्म
उरस (हृदय एवं फु फ्फु स) एवं त्रिक अवलम्बक कफ के स्थान हैं।
(1) अन्न रस के वीर्य से हृदय को बल देना
(2) अपने उदक से शेष कफ के स्थानों को बल देना।
(3) उरस में स्थित कफ अपनी शक्ति से त्रिक स्थानों (मेरूदण्ड के
दोनों बाहु एवं ग्रीवा के संधि स्थल) को धारण करता है।
अवलम्बक कफ विकृतिजन्य रोग
(1) फु फ्फु स के रोग-श्वसनिक ज्वर (Pneumonia),
फु फ्फु स आवरण शोध (Pleurisy), कास (Cough) एवं
श्वास रोग (Asthma) इत्यादि।
2) हृदय के रोग-कफज एवं सात्रिपातिक हृद रोग,
परिहृदयावरण शोथ (Pericarditis), हृदमांसपेशी
शोथ (Myocarditis), हृदविस्फारण
(Dialatation of Heart) आदि रोग अवलम्बक कफ
की विकृति से उत्पन्न होते हैं।
बोधक कफ के स्थान'
बोधक कफ के कर्म
बोधक कफ का स्थान जिव्हा मूल एवं कण्ठ हैं।
(1) जिव्हा में अवस्थित होकर रस का बोध कराना। मधुर,
अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय-इन षडरसों के ज्ञान का कार्य
बोधक कफ करता है।
(2) मुख में आये अन्न का विभाजन करना, तथा अन्न को पतला
करना।
बोधक कफ विकृति जन्य रोग
(1) मुख की ग्रंथियों के शोथे।
(2) लालास्त्राव का अधिक निकलना, हल्लास,
मुखशोष, एवं मुखपाक आदि रोग बोधक कफ की
विकृति से उत्पन्न होते हैं।
तर्पक कफ के स्थान
तर्पक कफ के कर्म
तर्पक कफ का स्थान 'शिर' है।
(1) मस्तिष्क का संतर्पण एवं स्नेहन करना
(2) चक्षु एवं ऊर्ध्वजत्रुगत इन्द्रियों का पोषण करके इन्हें अपने कर्म करने में सामर्थ्य
प्रदान करना
3) ज्ञान, विवेक, क्षमा, निर्लोभता, धारणाशक्ति तथा मानसिक शांति प्रदान करना
(4) त्वक्, जिह्वा, घ्राण, नेत्र एवं श्रोत्र को अपनी शक्ति से अनुग्रहीत करना
तर्पक कफ विकृति जन्य रोग
तर्पक कफ का स्थान
'शिर' है।
(1) मानस विकृतियां - अविवेक, अशांति,
मस्तिष्क दौर्बल्य
(2) खालित्य, पालित्य आदि रोग
(3) चक्षु, नासिका, कर्णस्त्राव आदि रोग
श्लेषक कफ के स्थान'
श्लेषक कफ के कर्म
समस्त संधियां श्लेषक कफ के स्थान हैं।
(1) समस्त संधियों का स्नेहन करना
(2) संधियों का पोषण करना, उन्हें स्निग्ध रखना तथा संधियों को दृढ़ता
पूवर्क मिलाए (जोड़े) रखना
(3) संधियों को भली प्रकार कार्य करने में सहयोग देना
श्लेषक कफ विकृति जन्य रोग
समस्त संधियां श्लेषक
कफ के स्थान हैं।संधिगत रोग,
आमवात,
संधिवात,
संधिशोथ आदि रोग श्लेषक
कफ की विकृति से उत्पन्न
हो सकते हैं।
आहारज निदान
1) मधुर-अम्ल-लवण रस युक्त पदार्थों का अति सेवन
ii) शीत-स्निग्ध-गुरु-पिच्छिल-अभिष्यन्दि पदार्थ अति सेजन
iii) अध्यशन, समशन, अग्निमांद्य
iv) नवान्न सेवन, इक्षुरस व गुड़विकार सेवन
v) दधि व क्षीर विकार अति सेवन
vi) माष, राजमाष, तिलपिष्ट, सिगांड़ा, बल्लीफल आदि का अतिसेवन
कफ वृद्धि
विहारज निदान
मानसिक निदान
i) दिवास्वाप
iii) अव्यायाम
ii) अतिस्वप्न
iv) आलस्य
v) सुखशय्याति सेवन
vi) रज-धूम सेवन
कफ वृद्धि
मानसिक निदान
i) हर्ष
ii) संतोष
iii) अचिन्ता
iv) तमोगुण प्रधानता
अन्य निदान
i) बाल्यावस्था
ii) बसंत ऋतु
iii) प्रातःकाल
iv) भोजनोपरांत
मानसिक निदान
कफ वृद्धि
कफ वृद्धि - क्षय के लक्षण
श्लेष्मवृद्धौ शौक्ल्यं शैत्यं स्थैर्यं गौरवमवसादस्तन्द्रानिद्रा
सन्ध्यस्थि विश्लेषश्च ।सु.सू. 15/13)
श्लेष्मक्षये रुक्षताऽन्तर्दाह आमाशयेतरश्लेष्माशयशून्यता
संधिशैथिल्यं तृष्णा दौर्बल्यं प्रजागरणं च ।
(सु.सू. 15/7)
i) तर्पक कफ वृद्धि
1) तन्द्रा (Drowsiness)
2) निद्राधिक्य (Excessive sleep)
3) गौरव (Heaviness in body)
4) शैथिल्य एवं आलस्य (Laziness)
ii) अवलम्बक कफ वृद्धि
1) श्वास रोग (Asthma)
2) कास (Cough)
3) शीत लगना (Feeling of Cold)
कफ वृद्धि के लक्षण
III) बोधक कफ वृद्धि
1) प्रसेक (Increased Salivation)
Iv) क्लेदक कफ वृद्धि
1) मल, मूत्र, नेत्र एवं त्वचा का वर्ण श्वेत होना
(Whitish colour of skin, eyes, urine &
stool)
2) अग्निमांद्य (Poor appetite)
v) श्लेषक कफ वृद्धि
1) संधि शैथिल्य (Looseness of Joints)
2) अंग शैथिल्य (Malaise)
3) निश्चलता (Inactivity)
कफ वृद्धि के लक्षण
कफ क्षय के लक्षण'
i) तर्पक कफ क्षय
1) अनिद्रा (Insomnia)
2) रूक्षता एवं शून्यता (Dryness & numbness)
3) दुर्बलता (Weakness)
II) अवलम्बक कफ क्षय
1) अर्न्तदाह (Burning Sensation)
2) हृदद्रव (Palpitation)
कफ क्षय के लक्षण'
III) बोधक कफ क्षय
1) तृष्णा (Thirst)
iv) क्लेदक कफ क्षय
1)अन्न का क्लेदन न होना (Difficulty in digestion of
food)
2) विषमाग्नि (Irregular Appetite)
v)श्लेषक कफ क्षय
संधिशैथिल्य (Loseness of Joints)
• तृप्ती
• तंद्रा
• निद्रा आधिक्य
• आलस्य
• गुरु गात्र
• मुख स्राव
• मल आधिक्य
• अपक्ती
• हृदय उपलेप
• कंठ उपलेप
• अति स्थुलता
• मंदाग्नि
कफ नानात्मज व्याधी -२०
i) स्वेदन, वमन व शिरोविरेचन कर्म प्रयोग
ii) तीक्ष्ण विरेचन प्रयोग
iii) आकाश, वायु व अग्निमहाभूत प्रधान द्रव्यों का प्रयोग
iv) कटु-तिक्त-कषाय रस, तीक्ष्ण, ऊष्ण, रूक्ष, गुण युक्त द्रव्यों
का सेवन
v) व्यायाम, रूक्ष उद्वर्तन का प्रयोग
vi) पंचकोल, त्रिफला, वल्लीपंचमूल द्रव्यों का प्रयोग
श्लेष्मा दोष वृद्धि की अवस्था में निम्न चिकित्सा सिद्धांत अपनाने चाहिएँ'-
PANCHAMAHABHUTA
पंच महाभूतों क
े गुण और उनक
े कार्यों
महाभूत (तत्व) गुण (विशेषताएँ ) कार्य (प्रभाव)
पृथ्वी (Earth)
गुरु (भारी), खरा (खुरदरा), कठिन (कठोर), मंद (धीमा), स्थिर
(स्थायी), विशद (गैर-चिपचिपा), सान्द्र (ठोस), स्थूल (मोटा), गंध
(गंधयुक्त)
उपचय (विकास), संघात (संघटन), गौरव
(भारता), स्थैर्य (स्थिरता)
जल (Water)
द्रव (तरल), स्निग्ध (चिकना), शीत (ठं डा), मंद (धीमा), पृथु
(कोमल), पिच्छिल (चिपचिपा), रस (स्वादयुक्त)
उपक्लेदन (सिक्त करना), स्निग्धता
(चिकनाहट), बंधन (बंधन करना), विश्यान्दन
(बाहर निकलना), मृदुता (कोमलता), प्रह्लादन
(आनंद देना)
अग्नि (Fire)
उष्ण (गर्म), तीक्ष्ण (तीव्र), सूक्ष्म (अत्यंत छोटा), लघु (हल्का), रुक्ष
(रूखा), विशद, रूप (दृश्यता)
दाह (गर्मी उत्पन्न करना), पाचन (पचाने की
शक्ति), प्रभा (तेज), प्रकाश (उज्ज्वलता), वर्ण
(रंग प्रदान करना)
वायु (Air)
लघु (हल्का), शीत (ठं डा), रुक्ष (रूखा), विशद, सूक्ष्म (अत्यंत
छोटा), स्पर्श
रौक्ष्य (रूखापन), ग्लानि (निर्बलता), विशार
(गति देना), विशद, लाघव (हल्कापन)
आकाश
(Ether/Space)
मृदु (कोमल), लघु (हल्का), श्लक्ष्ण (चिकना), शब्द (ध्वनि), सूक्ष्म
(अत्यंत छोटा)
मृदुता (कोमलता), सौशिर्य (रिक्तता उत्पन्न
करना), लाघव (हल्कापन)
पंचमहाभूत तन्मात्रा इंद्रिय गुण
आकाश शब्द कर्ण अप्रतिघात
वायु स्पर्श त्वक चलत्व
अग्नि रूप चक्षु उष्णत्व
पृथ्वी गंध नासा खरत्व
जल रस जिव्हा द्रवतव
वात दोष - आकाश + वायु महाभूत
पित्त दोष - अग्नि महाभूत
कफ दोष - जल + पृथ्वी महाभूत
त्रिदोष एवं पंच महाभूत
आयुर्वेद मतानुसार समस्त द्रव्य पांच भौतिक हैं।
धातू पंचमहाभूत
रस जल
रक्त अग्नि
मांस पृथ्वी
मेद जल ,पृथ्वी
अस्थी पृथ्वी, वायु, अग्नि
मज्जा जल
शुक्र जल
पंचमहाभूत और धातू
मल पंचमहाभूत
पुरीष पृथ्वी
मूत्र अग्नि, जल
स्वेद जल
पंचमहाभूत और मल
रस पंचमहाभूत
मधुर पृथ्वी, जल
अम्ल पृथ्वी, अग्नि
लवण जल , अग्नि
कटु वायु, अग्नि
तिक्त वायु,आकाश
कषाय वायु, पृथ्वी
पंचमहाभूत और
पंचमहाभूत और रस
वर्ण पंचमहाभूत
गौर अग्नि, आकाश, जल
कृष्ण अग्नि, पृथ्वी, वायु
श्याम सम मिश्रित पंचमहाभूत
पंचमहाभूत और वर्ण
पंचमहाभूत त्रिगुण
आकाश सत्व
वायु रज
अग्नि सत्व, रज
पृथ्वी तम
जल सत्व, तम
पंचमहाभूत और त्रिगुण
कर्म त्रिगुण
वमन अग्नि, वायु
विरेचन पृथ्वी, जल
संशमन आकाश
संग्राही वायु
दीपन अग्नि
लेखन वायु, अग्नि
बृहण पृथ्वी, जल
पंचमहाभूत और कर्म
"Start your learning journey
today, as every small step today
leads to great success
tomorrow!"
THANK YOU !!!

Introduction to basic principles of Ayurveda

  • 2.
  • 3.
    गुरुस्थान वैद्यसूर्यवंशीसर वैद्यजमदग्नीसर वैद्यधोपेश्वरकरसर वैद्य पवारसर वैद्य आव्हाड सर वैद्यकु लकर्णीसर वैद्य राजेंद्र कदम
  • 8.
    ■M.D. Ayurveda Ph.D.Scholar ■Director of Pimpri Chinchwad 1 st Cashless Nirvikar Ayurvedic Superspeciality ■ Hospital at Jai Ganesh Samrajya Bhosari Pune ■Experience 14 yr in field of Ayurveda ■Examinations of more than 23000 patients ■Speciality in Piles ,Psoriasis and joint disorder ■Awarded by Health excellence Award by Sakal Media Group and Nirog Street . ■Chairman Ayurved Prachar Prasar Samitti Nima Maharashtra ■Executive Member Ayurved Vyaspith Pimpri Chinhcwad ■Joint Secretary Maharashta Ayurved Samelan Pimpri Chinchwad ■Chairman Go Green Committe Nima Pimpri Chinchwad ■Founder member Avirat Shramdaan NGO ■Article publish on obesity ,cancer etc. ■Ph no : 9881572395 MailI’d.:drnileshlondhe@gmail.com Vaidya Nilesh Navnath Londhe
  • 9.
    Lecture 1 Introduction to Ayurveda: TheBasic Principles of Tridosha and Panchamahabhuta
  • 10.
    इस लोक मेंउपलब्ध ग्रंथों में सबसे श्रेष्ठ व प्राचीन ग्रंथ 'वेद' हैं जो संख्या में चार हैं- वेद एवं आयुर्वेद इह खल्वायुर्वेदं नामोपाङ्गमर्थव वेदस्य ॥(सु.सू. 1/6) तदायुर्वेदमनीत्यायुर्वेद: ।(च.सू. 30/23) 1. ऋग्वेद 3. सामवेद 2. यजुर्वेद 4. अथर्ववेद आयुर्वेद अनादि व शाश्वत है। इसे अथर्ववेद का 'उपांङ्ग' या 'पंचम वेद' भी कहा गया है' क्योंकि आयुर्वेद आयु का विज्ञान व आयु का पुण्यतम वेद है।
  • 11.
    आयुर्वेद परिचय "न जन्तुकश्चिदमरः पृथिव्यामेव जायते । अती मृत्युरवारर्यः स्यात्किन्तु रोगो निवार्यते ॥" (शा.स.पू.ख.5/53) अर्थात् संसार में कोई भी जीव अमर नहीं है, एवं मृत्यु का निवारण संभव नहीं है परंतु आयुष्मान् जीव में चिकित्सा के द्वारा रोगों का निवारण किया जा सकता है।
  • 12.
    आयुर्वेद एक प्राचीनचिकित्सा पद्धति है जो : • शरीर • मन • आत्मा के संतुलन पर आधारित है। "स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, अतुरस्य विकार प्रशमनं।" आयुर्वेद का प्रयोजन आयुर्वेद के मुख्य दो प्रयोजन हैं, पहला - स्वस्थ लोगो के स्वास्थ्य की रक्षा करना दूसरा - रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना ।
  • 13.
    आयुर्वेद के मुख्यप्रयोजनों की पूर्ति के उद्देश्य से ब्रह्मा जी ने अष्टाङ्ग आयुर्वेद का उपदेश किया था जो निम्न प्रकार है- अष्टाङ्ग आयुर्वेद 1. कायचिकित्सा ( General Medicine) 2. शल्य तंत्र (General Surgery) 3. शालाक्य तंत्र (E.N.T.) 4. अगद तंत्र (Toxicology & Jurisprudence) 5. भूतविद्या 6. कौमार भृत्य (Paediatrics) 7. रसायन तंत्र (Geriatrics) 8. वाजीकरण तंत्र (Aphrodisiacs)
  • 14.
    आयु : लक्षण शरीरेन्द्रियसत्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्। शरीर, इंद्रिय, मन, एवं आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। यहाँ इंद्रिय शब्द से बाह्येन्द्रिय व आभ्यन्तरेन्द्रिय दोनों का ही ग्रहण किया जाता है। (च.सू. 1/12)
  • 15.
    त्रिदोष, पंचमहाभूतों महत्वपूर्ण क्यो है? • शरीर की संरचना समझना • रोग उपचार • आध्यात्मिक स्वास्थ्य • रोगों की जड़ पहचानना • जीवनशैली सुधारना
  • 16.
    • त्रिदोष सिद्धांत- वात, पित्त और कफ • पंचमहाभूत सिद्धांत - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश • प्रकृती - विकृती • आम • अग्नि • सप्तधातु -रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र • त्रिमल - स्वेद , मूत्र, मल • आहार और जीवनशैली • व्याधीक्षमत्व आयुर्वेद के मुख्य सिद्धांत :
  • 17.
    स्वस्थयावस्था में त्रिदोष,धातु एवं मल अपने स्वाभाविक प्राकृत कर्म करते रहते हैं इसलिए इनको शरीर का मूल कारण कहा गया है। दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् |
  • 18.
    दोष विवेचन निरुक्ति 'शरीरंदूषयन्तीति दोषाः' अर्थात् जो शरीर या धातुओं को दूषित करे उसे दोष कहते हैं। दोष शारीरिक दोष मानसिक दोष वात, पित्त एवं कफ रज एवं तम
  • 19.
    दोष शामक रसप्रकोपाक रस वात मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त कषाय पित्त मधुर तिक्त कषाय अम्ल लवण कटु कफ कटु तिक्त कषाय मधुर अम्ल लवण त्रिदोष और रस
  • 20.
    दोष संचय प्रकोपप्रसर स्थानसंश्रय व्यक्ती भेद वात स्तब्ध कोष्ठता, पूर्ण कोष्ठता कोष्ठ तोद- संचरणा विमार्ग-गमन आटोप दोष अव्यव मे आश्रित रोग अवस्था उपद्रव अस्वथा पित्त पीतांव भासता, मन्द उष्मता आम्लिका (अम्लउद्गार) पिपास परिदाह ओष चोष परिदाह धूमायनानि दोष अव्यव मे आश्रित रोग अवस्था उपद्रव अस्वथा कफ अंगानां गौरवम, आलस्यम हृदयोत्कलेद अन्नद्वेष अरोचक अविपाक अंगसाद छर्दि दोष अव्यव मे आश्रित रोग अवस्था उपद्रव अस्वथा त्रिदोष और षट्क्रियाकाल
  • 21.
    दोष समय वात अपराह्न- 2 PM to 6 PM प्रात: काल - 2 AM to 6 AM पित्त मध्यान्ह - 10 AM to 2 PM रात्रि - 10 PM to 2 AM कफ प्रभात - 6 AM to 10 AM संध्या - 6 PM to 10 PM त्रिदोष और समय
  • 22.
    दोष संचय प्रकोपप्रशमन वात ग्रीष्म वर्षा शरद पित्त वर्षा शरद हेमंत कफ शिशिर वसंत ग्रीष्म त्रिदोष और ऋतु
  • 23.
  • 24.
    संतुलित दोषों केसामान्य कार्य • तीनों दोष शरीर के सभी अंगों में मौजूद होते हैं। • ये दोष सामान्य संतुलित स्थिति में अच्छे स्वास्थ्य का कारण बनते हैं और असंतुलित स्थिति में बीमारी का कारण बनते हैं। • जब वे संतुलित होते हैं, तो वे • उपचय - शरीर को पोषण • बल- शक्ति और प्रतिरक्षा में सुधार, • वर्ण प्रसाद - त्वचा के स्वास्थ्य और रंग में सुधार का कारण बनते हैं . त्रिदोष के कार्ये
  • 25.
    पित्तं पङ्गु कफःपङ्गु पत्ङ्गवो मलधातवः । वायुनः यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् ॥ (शा.स.पू.ख. 5/25) वात दोष पित्त एवं कफ गति रहित हैं तथा धातु एवं मल भी गति रहित होते हैं, इन्हें वात ही अपनी इच्छा से गति प्रदान करता है एवं जहां ले जाना चाहता है वहां ले जाता है। (जैसे बादल आकाश में फै लते हैं)
  • 26.
    वात की प्रधानताका कारण • व्यापक होने से, • शरीर के सूक्ष्मतम स्रोतों में प्रवेश कर शीघ्रता से रोग उत्पन्न करने से, • कफ-पित्त की अपेक्षा बलवान होने से, • स्वयं कुपित होकर अन्य दोषों को भी प्रकुपित • करने से तथा • बहुसंख्यक रोगों को उत्पन्न करने के कारण शरीरस्थ दोषों में वात प्रधान दोष है।
  • 27.
    वात के गुण- वातके प्राकृतिक गुण-रजो बहुल • रूक्षः सूखापन - सर्दियों में अक्सर लोग सूखी त्वचा और फटे होंठों का अनुभव करते हैं • शीत: ठंडक - हाथ-पैर ठंडे रह सकते हैं, सर्दी का ज्यादा अहसास होना • लघुः हल्कापन
  • 28.
    • सूक्ष्म :सूक्ष्म और महीन होता है • चल: गतिशील - शरीर में गति और सक्रियता को नियंत्रित करता है। असंतुलीत-शरीर में अत्यधिक गति उत्पन्न , बेचैनी या अनियंत्रित विचारों वात के गुण-
  • 29.
    • विशदः स्पष्टऔर साफ - शरीर में गति और संचार ठीक तरीके से हो रहे हैं, बिना किसी रुकावट के। • खरः खुरदरापन- त्वचा का खुरदरा होना • दारुण: पीड़ादायक- शरीर में दर्द और खिंचाव उत्पन्न करता है। • अनवस्थित एवं योगवाही, ये वायु के भौतिक गुण हैं। वात के गुण-
  • 30.
    वायु के प्राकृतकर्म • उत्साह : उत्साह और ऊर्जा को नियंत्रित करता है (कार्य करने की शारीरिक व मानसिक प्रवृत्ति) • उच्छ्श्वास:निःश्वास : श्वसन क्रिया (सांस लेने और छोड़ने) को नियंत्रित करता है
  • 31.
    • चेष्टा (कायिक,वाचिक, मानसिक),धातुओं में सम्यक्ङ्गति: शरीर के अंगों और मांसपेशियों में गति और सक्रियता लाता है • गतिशील मलों (मूत्र, पुरीष, स्वेद) का उचित समय पर सम्यक् निष्कासन वायु के प्राकृत कर्म
  • 32.
    • शरीर रूपीयंत्र को धारण करना, • मन का नियमन, • मन व इंद्रियों को अपने विषयों में लगाना, • ज्ञान को आत्मा तक पहुंचाना, • सर्व धातु व शरीर की रचना करना, वायु के प्राकृत कर्म
  • 33.
    • शरीर कानियंत्रण, • अग्नि का प्रेरण, • स्थूल व सूक्ष्म स्रोतसों का निर्माण करना, • क्लेद का शोषण, गर्भकृति का निर्माण, गर्भ वायु के प्राकृत कर्म
  • 34.
    ⚬ पक्वाशय, कटि,सक्थि (पैर की अस्थियां) ⚬ वस्ति, पुरीषाधान (Large intestine) ⚬ श्रोत अस्थि व स्पर्शनेन्द्रिय ⚬ वात के स्थान हैं। ⚬ इनमें पक्वाशय वात का विशिष्ट स्थान है। वात के विशिष्ट स्थान
  • 35.
    वात के प्रकार सर्वशरीर में व्याप्त 'वात' एक ही है, परंतु भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न कर्म करने के कारण स्थान व कर्मों के आधार पर 'वात' के निम्र 5 भेद हैं"- 1. प्राण वायु 2. उदान वायु 3. समान वायु 4. व्यान वायु 5. अपान वायु
  • 36.
    प्राण वायु केस्थान ⚬स्थान-हृदय, ⚬मुख, ⚬शिर, ⚬जिह्ना, ⚬नासिका, ⚬कर्ण या कण्ठ ⚬तथा उरस प्राण वायु के स्थान हैं। ⚬हृदय प्राण वायु का मुख्य स्थान है'
  • 37.
    1. मन एवंबुद्धि का नियंत्रण। 2. ष्ठीवन (थूकना), क्षवधु (छींकना), उद्‌ गार आदि कर्म। 3. श्वास प्रक्रिया-उच्छवास (Expiration) एवं निःश्वास (Inspiration) का संचालन। फु फ्फु स (Lungs) के प्रधान कार्य प्राण वायु द्वारा सम्पादित होते हैं। 4. अन्न (आहार का निगलना)। प्राण वायु के कर्म-
  • 38.
    प्राण वायु केकर्म- 5. देह को धारण करना। 6. प्राण वायु सभी इंद्रियों को अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में प्रवृत्त कराती है। यथा- (i) गंध ज्ञान-Olfactory Nerve (1st Cranial Nerve) द्वारा । (ii) रुप ज्ञान-Optic Nerve & Occulomotor Nerve (2nd & 3rd Cranial Nerve) द्वारा । (iii) शब्द ज्ञान-Auditory Nerve (8th Cranial Nerve) द्वारा। (iv) रस ज्ञान-Glossopharyngeal Nerve (9th Cranial nerve) द्वारा । (v) स्पर्श ज्ञान-त्वचा स्थित nerves द्वारा होता है। 7. तेरह प्राणों (अग्नि, सोम, वायु, सत्व, रज, तम, पंच ज्ञानेन्द्रिय, भूतात्मा एवं मन) का अबलम्बन करना।
  • 39.
    प्राण वायु विकृतिजन्य रोग- ⚬प्राण वायु की विकृति से ⚬ श्वास, ⚬ हिक्का, ⚬हृद रोग व ⚬मानसिक रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
  • 40.
    उदान वायु केस्थान • स्थान-उर (वक्ष), • कण्ठ तथा • नाभि ये उदान वायु के स्थान हैं'। • कण्ठ उदान वायु का प्रधान स्थान है।
  • 41.
    उदान वायु केकर्म 1. भाषण, गान आदि वाणी की प्रवृत्ति । 2. प्रयन, चेष्टा करना, नासिका, कण्ठ आदि की चेष्टायें उदान वायु द्वारा सम्पादित होती हैं। 3. ऊर्ध्व जत्रुगत अंगों को शक्ति प्रदान करना। 4. बल, वर्ण, स्मरणशक्ति एवं ऊर्जा का संचार करना'।
  • 42.
    • ऊर्ध्व जत्रुगतरोग उदान वायु की विकृति से होते हैं। • ऊर्ध्व जत्रुगत रोगों में शिरोरोग, नेत्र रोग, कर्ण एवं नासिका रोग • दन्तरोग एवं मुखरोग विशेषतः उदानवायु की विकृति से होते हैं। उदान वायु विकृति जन्य रोग
  • 43.
    समान वायु केस्थान • नाभि, • आमाशय • क्षुद्रांत्र ये समान वायु के प्रमुख स्थान हैं। नाभि समान वायु का विशेष स्थान है।
  • 44.
    समान वायु केकर्म • अन्न को ग्रहण कर पचाना। • भोजन का सार-किट्ट भाग में विभाजन करना। • जठराग्नि दीप्त करना। • स्वेदवह स्रोतों के कार्य सम्पादित करना। • अन्नवह स्रोतों के कार्य सम्गदित करना। • उदकवह स्रोतों के कार्य सम्पादित करना।
  • 45.
    • अग्निमांद्य, • गुल्म, •अतिसार, • ग्रहणी एवं • अजीर्ण आदि रोग समान वायु की विकृति से उत्पन्न हो सकते हैं। समान वायु विकृति जन्य रोग
  • 46.
    व्यान वायु कास्थान सम्पूर्ण शरीर व्यान वायु का स्थान है। व्यान वायु का स्थान 1. रस धातु का समस्त शरीर में प्रवाहण करना। 2. रक्त का संवहन करना। 3. स्वेद व आंसुओं का निकलना। 4. संधियों की गति व चेष्टा का नियामन करना। 5. उत्क्षेपण (ऊपर की ओर फें कना), मांसपेशियों की प्रसरण क्रिया, तथा अवक्षेपण (नीचे की ओर गति), मांसपेशियों की संकुचन क्रिया सम्पादित करना। 6. निमेष (पलक बंद करना) 7. उन्मेष (पलक खोलना) आदि कर्म व्यान वायु द्वारा सम्पादित होते हैं।
  • 47.
    व्यान वायु जन्यरोग • रोग-ज्वर, • रक्तपित्त, • अतिसार, • यक्ष्मा व • सर्वांगगत रोग व्यान वायु की विकृति से उत्पन्न हो सकते हैं'।
  • 48.
    अपान वायु केस्थान • गुदा, • वृहदांत्र, • वृषण, • मूत्रेन्द्रिय, • वस्ति, • नाभि, • उरु एवं वंक्षण आदि अपान वायु के स्थान हैं।
  • 49.
    अपान वायु केकर्म 1. मूत्र, पुरीष, शुक्र, आर्तव एवं गर्भ का उचित समय पर शरीर से बाहर निकालना। 2. मल, पुरीष, शुक्र, आर्तव एवं गर्भ का वेग न होने पर इनको धारण करना अपान वायु के कर्म हैं।
  • 50.
    अपान वायु विकृतहोने पर मूत्राशय एवं गुदा में होने वाले गम्भीर रोगों को उत्पन्न कर सकती है। अपान वायु विकृति जन्य रोग • गर्भाशय विकार • मूळव्याध (बवासीर) • किडनी विकार • मूत्र विकार
  • 51.
    वात प्रकोपक (वृद्धि)निदान आहारज निदान i) कटु-तिक्त-कषाय रस प्रधान पदार्थ अति सेवन i) रुक्ष-लघु अन्न पदार्थ सेवन iii) शीतवीर्य द्रव्य सेवन iv) अनशन, विषमाशन, अध्यशन एवं प्रमिताशन v) चना, मटर, मसूर अतिसेवन
  • 52.
    वात प्रकोपक (वृद्धि)निदान विहारज निदान i) अति व्यायाम व अति व्यवाय ii) लंघन या उपवास iii) प्लवन (Excessive swimming), प्रपतन (Falling) व अभिघात iv) रात्रि जागरण v) वेग विधारण vi) गजरथ-पदातिचर्या अर्थात् घोड़ा-हाथी आदि की सवारी करना एवं
  • 53.
    वात प्रकोपक (वृद्धि)निदान मानसिक निदान अतिशोक-चिन्ता-भय-लोभ व ग्लानि अन्य निदान i) रक्त स्राव ii) धातु क्षय iii) वर्षा ऋतु iv) वृद्धावस्था v) सांयकाल
  • 54.
    वात दोष वृद्धिके लक्षण एवं वात दोष क्षय के लक्षण' कार्ष्या काष्णर्योष्णंकामित्वं कम्पानाह शकृतगदान्। बलनिद्रेन्द्रियभ्रंश प्रलाप भ्रम दीनताः ॥ (अ.हृ.सू. 11/5-6 लिङ्ग क्षीणेऽनिलेऽङ्गस्य सादोल्प भाषिते हितम्। संज्ञामोहस्तथा श्लेष्मवृद्धयुक्तामयसंभवः ॥ (अ.हृसू. 11/55)
  • 55.
    वात दोष वृद्धिके लक्षण 1.प्राण वायु की वृद्धि (i) शक्ति की कमी (Loss of Power) (ii) प्रलाप (Delirium) (iii) दीनता (Inability to work) (iv) भ्रम (Vertigo) (v) अनिद्रा (Insomnia) 2. उदान वायु वृद्धि (i) वाणी की कर्कशता (Hoarseness of voice) (ii) मुख एवं नेत्र का कालापन (Dark Circles around eyes)
  • 56.
    3. समान वायुवृद्धि (i) उष्ण पदार्थों के सेवन की इच्छा होना (Desire to eat warm/hot substances) 4.व्यान वायु वृद्धि (i) त्वक् रौक्ष्यता (Dry Skin) (ii) कृशता (Decreased body weight) (iii) अंगों का फड़कना (Throbbing sensation) 5.अपान वायु वृद्धि (i) हाथ पैर का फटना (Cracking of soles) (ii) मल का गाढ़ा या शुष्क होना (Hard Stool) वात दोष वृद्धि के लक्षण
  • 57.
    वात दोष क्षयके लक्षण' 1. प्राण वायु क्षय (i) प्रसन्नता का अभाव (Loss of happiness) (ii) ज्ञान की कमी (Lack of knowledge) (iii) बुद्धि का मोह (Confusion) 2. उदान वायु क्षय (i) अल्पभाषण (Feeble Voice)
  • 58.
    3. समान वायुक्षय (i) मंदाग्नि (Poor Appetite) 4. व्यान वायु क्षय (i) समस्त कार्यों में मंदता (Inertness, diminished body functions) (ii) अंगों का ढीलापन (Looseness of body parts) 5.अपान वायु क्षय (i) मलावरोध (Constipation, Oliguria, Amenorrhoea वात दोष क्षय के लक्षण'
  • 59.
    • नखभेद (नाखूनोंका टूटना) • विपादिका (पैरों का फटना) • पद शूल (पैर में दर्द) • पद सुप्तता (पैर का सुन्न होना) • पिंडिकोद्वेष्टान (पिंडली की मांसपेशियों में ऐंठन) • गृध्रासी (कटिस्नायुशूल) • उरुस्तंभ (जांघ की कठोरता) • उरुसादा (पैर में दर्द) जाँघ) • पंगुल्या (पैराप्लेजिया) वातज नानात्मज व्याधी -८०
  • 60.
    वातज नानात्मज व्याधी-८० • उदावर्त (सूजन) • खंजत्व (लंगड़ापन) • कुब्जत्व (लंगड़ापन) • त्रिकग्रह (सैक्रो-इलियक जोड़ की कठोरता) • पृष्टग्रह (पीठ की कठोरता) • वाक संगा (रोकना)। वाणी) • कषाय अस्यता (मुंह में कसैला स्वाद) • मुख शोष (मुंह का सूखापन) • कर्ण शूल (कान में दर्द)
  • 61.
    वातज नानात्मज व्याधी-८० • बाधिर्या (बहरापन) • एकांग रोग (मोनोप्लेजिया) • सर्वांग रोग (बहुप्रतिघात) • पक्षवध (हेमिप्लेजिया) • भ्रम (चक्कर आना) • वेपथु (कंपकंपी) • हिक्का (हिचकी) • अति प्रलाप (प्रलाप) अत्यधिक अप्रासंगिक बात • रौक्ष्य (सूखापन) • पौरुष्य (कठोरता)
  • 62.
    वात दोष वृद्धिमें निम्न चिकित्सासूत्र अपनाने चाहियें' - (i) स्नेहन स्वेदन के पश्चात् मृदु संशोधन (ii) निरुह व अनुवासन बस्ति प्रयुक्त करें (iii) नस्यकर्म, गण्डूष, धूम्रपान, शिरोवस्ति दें (iv) अभ्यंग, मर्दन, वेष्टन करें (v) मधुर-अम्ल-लवण रस युक्त उष्ण व स्निग्ध भोजन दें वात दोष वृद्धि की चिकित्सा
  • 64.
    पित्त दोष पित्त केगुण : • ऊष्ण, स्निग्ध, तीक्ष्ण, द्रव, कटु, सर, रूक्ष, लघु, विशद • विस्त्र, पूति, पीत, नील तथा अम्ल (विदग्धावस्था में) पित्त के भौतिक गुण हैं। पित्त अग्नि महाभूत का प्रतिनिधि द्रव्य है एवं इसमें अग्नि के गुणों की अधिकता होती है
  • 65.
    प्राकृत पित्त केकर्म- • दर्शन (देखना) • पक्ति (भोजन पाक) • क्षुत् (क्षुधा) • तृष्णा (प्यास) • शरीर की मृदुता • प्रभा (कांति) • मानसिक प्रसन्नता • ऊष्मा (शरीर का स्वाभाविक तापमान बनाये रखना) • धारणाशक्ति (मेधा) • बुद्धि (धृति) • रूचि • शौर्य, पराक्रम • धातु पाक
  • 66.
    पित्त दोष केविशिष्ट स्थान • स्वेद, • रस, • लसीका, • रुधिर, • आमाशय पित्त के प्रमुख स्थान हैं. • इनमें भी आमाशय विशेष रुप से पित्त का स्थान है। • पक्वाशय एवं आमाशय के मध्य में पित्त का स्थान अवस्थित है।
  • 67.
    आचार्य चरक नेकेवल वात दोष के पांच भेद बताये हैं, पित्त एवं कफ के नहीं। आचार्य सुश्रुत ने पित्त के पांच भेद बताये हैं जो स्थानं कर्म की भिन्नता से निम्न प्रकार हैं- पित्त दोष के भेद 1.पाचक पित्त 2. रंजक पित्त 3.साधक पित्त 4.आलोचक पित्त 5.भ्राजक पित्त
  • 68.
    पाचक पित्त केस्थान आमाशय (अधोभाग), पक्वाशय के मध्य स्थान ग्रहणी सहित क्षुद्रांत्र (Small intestine including Duodenum) तथा अग्न्याशय (Pancreas)
  • 69.
    • चार प्रकारके अन्नपान-अशित, पीत, लीढ़ एवं खादित को पचाना| • अन्न पाचन करके दोष, रस, मल तथा मूत्र को अलग-अलग करके अन्न का विवेचन करना। • सप्त धात्वाग्नियों एवं पंचभूताग्रियों को अपने स्थान पर रखता हुआ अपनी शक्ति प्रदान कर अनुग्रह करता रहता है'। • पक्ति, ऊष्मा, बल, वर्ण, स्वास्थ्य, उत्साह, प्रभा, ओज तथा प्राण का कारण है एवं इनका पोषण करता है'। • विकृत होने पर [विषम, तीक्ष्ण, मंद ] शरीर में रोग व पाचकाग्नि शांत होने पर मृत्यु हो जाती है"। पाचक पित्त के कर्म
  • 70.
    पाचक पित्त विकृतिजन्य रोग • अग्निमांद्य, • अम्लपित्त, • ग्रहणी रोग, • अजीर्ण • आदि रोग पाचकाग्रि के विकृत होने पर उत्पन्न हो सकते हैं।
  • 71.
    रंजक पित्त कास्थान • यकृत (Liver) एवं प्लीहा (Spleen) रंजक पित्त के स्थान हैं किंतु आचार्य वाग्भर ने आमाशय में रंजक पित्त का स्थान बताया है। • गर्भकाल में गर्भ में रक्त का निर्माण यकृत एवं प्लीहा में ही होता है तथा जन्म के बाद रक्त का निर्माण Red bone marrow में होता है।
  • 72.
    1.अन्न रस कोरंजित कर रक्त निर्माण करना। 2. रंजक पित्त आमाशय में आश्रित होकर अन्न रस को रंजित करके रक्त निर्माण करता है। 3. शरीर के मूत्र, पुरीष, त्वक्, केश एवं नेत्रों का रंजन करना। 4. क्षुद्रांत्र (Small Intestine) में स्थित रंजक पित्त, मूत्र एवं पुरीष का रंजन करता है। त्वक् की सबसे नीचे की 'ताम्रा' त्वचा में स्थित रंजक पित्त (Melanin) त्वक् (त्वचा) को विशिष्ट वर्ण प्रदान करता है। रंजक पित्त के कार्य
  • 73.
    आलोचक पित्त कास्थान' नेत्र आलोचक पित्त का स्थान है। आलोचक पित्त के भेद' - आचार्य भेल ने आलोचक पित्त के निम्न दो भेद बताए चक्षु वैशेषिक - यह वस्तुओं की भिन्नता का ज्ञान कराता है। 2. बुद्धि वैशेषिक - यह अत्यंत सूक्ष्म विषयों को भी ग्रहण करता है तथा धूमध्य में श्रृगांटक मर्म में रहता है।
  • 74.
    आलोचक पित्त केकर्म • वस्तुओं के रुप का दर्शन करना। • वस्तुओं की भिन्नता का ज्ञान करना।
  • 75.
    आलोचक पित्त विकृतिजन्य रोग • दृष्टि संबंधी तिमिर आदि रोग • तथा दृष्टि पटल के रोग आलोचक पित्त की विकृति से होते हैं।
  • 76.
    साधक पित्त केस्थान' हृदय साधक पित्त का स्थान है। साधक पित्त के कर्म 1)मेधा, बुद्धि एवं अभिमान आदि मनोरथों को पूर्ण करना (2) प्रभा बनाये रखना (3) इन्द्रियों की निर्मलता बनाये रखना (4) शौर्य एवं भय आदि भावों को प्रकट करांना (5) हर्ष एवं क्रोध की अभिव्यक्ति करना (6) प्रसन्नता एवं मोह आदि की अनुभूति कराना.
  • 77.
    साधक पित्त विकृतिजन्यरोग' (1) मानसिक विकृतियां -भय, क्रोध, मोह आदि। (2) हृदय की विकृतियां - रक्तावृत्त वात (Hypertension), हृदय रोग आदि। (3) अन्तःस्त्रावी ग्रंथियों (Endocrinal glands) के विकार-यथा पीयूषग्रंथि (Pituitary gland), अधिवृक्क ग्रंथि के रोग साधक पित्त की विकृति से होते हैं।
  • 78.
    भ्राजक पित्त कास्थान आचार्य सुश्रुत ने त्वचा के बाह्य स्तर को "अवभासिनी" कहा है जो सब वर्णों को प्रकट करती है तथा पांच प्रकार की छाया को प्रकाशित करती है त्वचा भ्राजक पित्त का स्थान है।
  • 79.
    भ्राजक पित्त केकर्म (1) त्वचा को वर्ण प्रदान करना (2) शरीर के तापमान का नियमन करना (3) छाया का प्रकाशन करना (4) त्वचा के सम्पर्क में आने वाले परिषेक, अभ्यंग, अवगाहन, लेप आदि का अवशोषण करना
  • 80.
    भ्राजक पित्त विकृतिजन्य रोग ⚬विभिन्न त्वक् रोग, विवर्णता, ⚬म्लानता, ⚬श्वित्र, ⚬सिध्म, ⚬कुष्ठ, ⚬पलित आदि रोग भ्राजक पित्त की विकृति से उत्पन्न हो सकते हैं।
  • 81.
    पित्त वृद्धि केनिदान आहारज निदान i) कटु, अम्ल, लवण, क्षार, तीक्ष्ण, ऊष्ण, विदाही अन्न-पान का अधिक सेवन ii) अध्यशन iii) तिल, अलसी, कुलथी, सर्षप, दधि, सुरा अतिसेवन iv) हरितशाक, गोधा, मत्स्यमांस, तक्र, कांजी का अति सेवन पित्त प्रकोपक है।
  • 82.
    पित्त वृद्धि केनिदान विहारज निदान i) अति आतप सेवन ⅱ) अति स्त्री प्रसंग iii) अति परिश्रम
  • 83.
    पित्त वृद्धि केनिदान मानसिक निदान i) क्रोध ii) ईर्ष्या iii) शोक iv) भय v) द्वेष अन्य निदान i) मध्यान्ह काल li) मध्यावस्था iii) शरद ऋतु
  • 84.
    पित्त वृद्धि केलक्षण' पित्त क्षय के लक्षण पित्तवृद्धो पीतावभासता संतापः शीतकामित्वमल्पनिद्रता मूच्र्छा बलहानिरिन्द्रियदौर्बल्यं पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं च । (सु.सू. 15/13) 1) पित्तक्षये मन्दोष्मानिता निष्प्रभता च।(सु. सू. 15/7) 2) पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः ।(अ. ह. सू. 11/16)
  • 85.
    पित्त वृद्धि केलक्षण 1) पाचक पित्त की वृद्धि i) तृष्णा [Thirst] ii) शीतकामिता [Desire for cold things] 2) आलोचक पित्त वृद्धि i) पीतनेत्रता [Yellowish eyes] 3) साधक पित्त वृद्धि i) निद्राल्पता [Insomnia] ii) मूर्च्छा एवं बलहानि [Syncope & loss of Vigour] iii) इन्द्रिय दौर्बल्य [Deficient Sensory Perceptions] iv) भ्रम [Vertigo]
  • 86.
    पित्त वृद्धि केलक्षण 4) रंजक पित्त की वृद्धि i) पीतावभासता [Yellowish texture of skin] ii) पीत मल, मूत्र, नेत्र [Yellowish Stool, Urine & eyes 5) भ्राजक पित्त की वृद्धि i) संताप [Raised body temperature] ii) दाह [Burning Sensation]
  • 87.
    पित्त क्षय केलक्षण 1) पाचक पित्त क्षय i) मंदाग्नि [Poor appetite] 2) रंजक पित्त क्षय i) पाण्डु [Anaemia] 3) आलोचक पित्त क्षय- i) मंददृष्टि [Diminished Vision] ii) अदर्श । [Inabitity to see]
  • 88.
    पित्त क्षय केलक्षण 4) साधक पित्त क्षय i) निष्प्रभता [Loss of Lusture] 5) भ्राजक पित्त क्षय i) मंदोष्मता [Decreased body temperature]
  • 89.
    • ओश • दाह •विदाह • अतिस्वेद • अम्लउद्गार • अंस दाह • उष्मा आधिक्य • त्वक दाह पित्त नानात्मज व्याधी -४० • रक्त पित्त • कामला • नीलिका • तिक्त आस्यता • रक्त मंडल • अतृप्ती • गल पाक • गुद पाक
  • 90.
    (i) विरेचन वरक्तमोक्षण कर्म (ii) शीत प्रदेह, परिषेक व अभ्यंग (iii) मधुर-तिक्त, कषाय रस प्रधान एवं शीत द्रव्य सेवन (iv) क्षीर व घृत का प्रयोग (v) पित्तशामक द्रव्यों यथा-चन्दन, हीबेर, मुक्ता, प्रवाल आदि का प्रयोग करें पित्त दोष वृद्धि की चिकित्सा-सिद्धान्त
  • 92.
    कफ दोष जल सेजिसकी उत्पत्ति हो उसे कफ कहते हैं। जल का कार्य संयोग करना है अतः संयोग कर्ता को 'श्लेष्मा' या 'कफ' कहा है। प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।। स चैवोजः स्मृतः काये स च पाप्मोपदिश्यते ॥च.सू. 17/117) कफ प्राकृत होने पर 'बल' कहलाता है'। इसी को शरीर में 'ओज' कहते हैं। कफ विकृत होने पर 'मल' कहलाता है। शरीरस्थ कफ चन्द्रमा का प्रतिरूप है।
  • 93.
    प्राकृत कफ केगुण • भौतिक गुण- • स्निग्ध, शीत, गुरु, मधुर, • स्थिर, पिच्छिल, लवण, • श्वेत, मंद एव श्लक्ष्ण • ये कफ के भौतिक गुण हैं। • कफ तमो गुण प्रधान होता है।
  • 94.
    1) स्नेहन (2) बंधन (3)स्थिरता (दृढ़ता) (4) गौरवता (5) वृषता (मैथुन शक्ति) प्राकृत कफ के कर्म (6) बल, क्षमा एवं धैर्य (7) उदारता, उत्साह (8) संधियों को चिकना करना (9) तर्पण-पूरण-रोपण (10) वृंहण एवं उपचय-ये कफ के प्राकृत कर्म हैं।
  • 95.
    कफ के विशिष्टस्थान' • उर:प्रदेश (Chest), • कण्ठ, • शिर, • क्लोम, • पर्वसंधि, • ग्रीवा, • रस, मेद, एवं आमाशय कफ के प्रमुख स्थान हैं
  • 96.
    कफ के भेद आचार्यवाग्भट्ट ने स्थान एवं कर्म की भिन्नता के आधार पर कफ के पांच भेद बताये हैं जो निम्न हैं- (1) क्लेदक कफ (2) अवलम्बक कफ (3) बोधक कफ (4) तर्पक कफ (5) श्लेषक कफ
  • 97.
    क्लेदक कफ कास्थान क्लेदक कफ के कर्म- क्लेदक कफ का स्थान आमाशय है (1) अन्न का क्लेदन करना (2) अन्न को मृदु बनाना (3) पिण्ड रूप आहार का संघात कर द्रव के समान महीन एवं पतला बनाकर सुखपूर्वक पचने योग्य बना (4) अन्य स्थान स्थित श्लेष्मा को अपने उदक कर्म से अनुग्रहीत करनाना
  • 98.
    क्लेदक कफ विकृतिजन्य रोग • मंदाग्नि, • हल्लास, • वमन, • अजीर्ण, • ऊर्ध्वग • अम्लपित्त • उदर एवं • शरीर में भारीपन उत्पन्न होता है।
  • 99.
    अवलम्बक कफ केस्थान' अवलम्बक कफ के कर्म उरस (हृदय एवं फु फ्फु स) एवं त्रिक अवलम्बक कफ के स्थान हैं। (1) अन्न रस के वीर्य से हृदय को बल देना (2) अपने उदक से शेष कफ के स्थानों को बल देना। (3) उरस में स्थित कफ अपनी शक्ति से त्रिक स्थानों (मेरूदण्ड के दोनों बाहु एवं ग्रीवा के संधि स्थल) को धारण करता है।
  • 100.
    अवलम्बक कफ विकृतिजन्यरोग (1) फु फ्फु स के रोग-श्वसनिक ज्वर (Pneumonia), फु फ्फु स आवरण शोध (Pleurisy), कास (Cough) एवं श्वास रोग (Asthma) इत्यादि। 2) हृदय के रोग-कफज एवं सात्रिपातिक हृद रोग, परिहृदयावरण शोथ (Pericarditis), हृदमांसपेशी शोथ (Myocarditis), हृदविस्फारण (Dialatation of Heart) आदि रोग अवलम्बक कफ की विकृति से उत्पन्न होते हैं।
  • 101.
    बोधक कफ केस्थान' बोधक कफ के कर्म बोधक कफ का स्थान जिव्हा मूल एवं कण्ठ हैं। (1) जिव्हा में अवस्थित होकर रस का बोध कराना। मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय-इन षडरसों के ज्ञान का कार्य बोधक कफ करता है। (2) मुख में आये अन्न का विभाजन करना, तथा अन्न को पतला करना।
  • 102.
    बोधक कफ विकृतिजन्य रोग (1) मुख की ग्रंथियों के शोथे। (2) लालास्त्राव का अधिक निकलना, हल्लास, मुखशोष, एवं मुखपाक आदि रोग बोधक कफ की विकृति से उत्पन्न होते हैं।
  • 103.
    तर्पक कफ केस्थान तर्पक कफ के कर्म तर्पक कफ का स्थान 'शिर' है। (1) मस्तिष्क का संतर्पण एवं स्नेहन करना (2) चक्षु एवं ऊर्ध्वजत्रुगत इन्द्रियों का पोषण करके इन्हें अपने कर्म करने में सामर्थ्य प्रदान करना 3) ज्ञान, विवेक, क्षमा, निर्लोभता, धारणाशक्ति तथा मानसिक शांति प्रदान करना (4) त्वक्, जिह्वा, घ्राण, नेत्र एवं श्रोत्र को अपनी शक्ति से अनुग्रहीत करना
  • 104.
    तर्पक कफ विकृतिजन्य रोग तर्पक कफ का स्थान 'शिर' है। (1) मानस विकृतियां - अविवेक, अशांति, मस्तिष्क दौर्बल्य (2) खालित्य, पालित्य आदि रोग (3) चक्षु, नासिका, कर्णस्त्राव आदि रोग
  • 105.
    श्लेषक कफ केस्थान' श्लेषक कफ के कर्म समस्त संधियां श्लेषक कफ के स्थान हैं। (1) समस्त संधियों का स्नेहन करना (2) संधियों का पोषण करना, उन्हें स्निग्ध रखना तथा संधियों को दृढ़ता पूवर्क मिलाए (जोड़े) रखना (3) संधियों को भली प्रकार कार्य करने में सहयोग देना
  • 106.
    श्लेषक कफ विकृतिजन्य रोग समस्त संधियां श्लेषक कफ के स्थान हैं।संधिगत रोग, आमवात, संधिवात, संधिशोथ आदि रोग श्लेषक कफ की विकृति से उत्पन्न हो सकते हैं।
  • 107.
    आहारज निदान 1) मधुर-अम्ल-लवणरस युक्त पदार्थों का अति सेवन ii) शीत-स्निग्ध-गुरु-पिच्छिल-अभिष्यन्दि पदार्थ अति सेजन iii) अध्यशन, समशन, अग्निमांद्य iv) नवान्न सेवन, इक्षुरस व गुड़विकार सेवन v) दधि व क्षीर विकार अति सेवन vi) माष, राजमाष, तिलपिष्ट, सिगांड़ा, बल्लीफल आदि का अतिसेवन कफ वृद्धि
  • 108.
    विहारज निदान मानसिक निदान i)दिवास्वाप iii) अव्यायाम ii) अतिस्वप्न iv) आलस्य v) सुखशय्याति सेवन vi) रज-धूम सेवन कफ वृद्धि
  • 109.
    मानसिक निदान i) हर्ष ii)संतोष iii) अचिन्ता iv) तमोगुण प्रधानता अन्य निदान i) बाल्यावस्था ii) बसंत ऋतु iii) प्रातःकाल iv) भोजनोपरांत मानसिक निदान कफ वृद्धि
  • 110.
    कफ वृद्धि -क्षय के लक्षण श्लेष्मवृद्धौ शौक्ल्यं शैत्यं स्थैर्यं गौरवमवसादस्तन्द्रानिद्रा सन्ध्यस्थि विश्लेषश्च ।सु.सू. 15/13) श्लेष्मक्षये रुक्षताऽन्तर्दाह आमाशयेतरश्लेष्माशयशून्यता संधिशैथिल्यं तृष्णा दौर्बल्यं प्रजागरणं च । (सु.सू. 15/7)
  • 111.
    i) तर्पक कफवृद्धि 1) तन्द्रा (Drowsiness) 2) निद्राधिक्य (Excessive sleep) 3) गौरव (Heaviness in body) 4) शैथिल्य एवं आलस्य (Laziness) ii) अवलम्बक कफ वृद्धि 1) श्वास रोग (Asthma) 2) कास (Cough) 3) शीत लगना (Feeling of Cold) कफ वृद्धि के लक्षण
  • 112.
    III) बोधक कफवृद्धि 1) प्रसेक (Increased Salivation) Iv) क्लेदक कफ वृद्धि 1) मल, मूत्र, नेत्र एवं त्वचा का वर्ण श्वेत होना (Whitish colour of skin, eyes, urine & stool) 2) अग्निमांद्य (Poor appetite) v) श्लेषक कफ वृद्धि 1) संधि शैथिल्य (Looseness of Joints) 2) अंग शैथिल्य (Malaise) 3) निश्चलता (Inactivity) कफ वृद्धि के लक्षण
  • 113.
    कफ क्षय केलक्षण' i) तर्पक कफ क्षय 1) अनिद्रा (Insomnia) 2) रूक्षता एवं शून्यता (Dryness & numbness) 3) दुर्बलता (Weakness) II) अवलम्बक कफ क्षय 1) अर्न्तदाह (Burning Sensation) 2) हृदद्रव (Palpitation)
  • 114.
    कफ क्षय केलक्षण' III) बोधक कफ क्षय 1) तृष्णा (Thirst) iv) क्लेदक कफ क्षय 1)अन्न का क्लेदन न होना (Difficulty in digestion of food) 2) विषमाग्नि (Irregular Appetite) v)श्लेषक कफ क्षय संधिशैथिल्य (Loseness of Joints)
  • 115.
    • तृप्ती • तंद्रा •निद्रा आधिक्य • आलस्य • गुरु गात्र • मुख स्राव • मल आधिक्य • अपक्ती • हृदय उपलेप • कंठ उपलेप • अति स्थुलता • मंदाग्नि कफ नानात्मज व्याधी -२०
  • 116.
    i) स्वेदन, वमनव शिरोविरेचन कर्म प्रयोग ii) तीक्ष्ण विरेचन प्रयोग iii) आकाश, वायु व अग्निमहाभूत प्रधान द्रव्यों का प्रयोग iv) कटु-तिक्त-कषाय रस, तीक्ष्ण, ऊष्ण, रूक्ष, गुण युक्त द्रव्यों का सेवन v) व्यायाम, रूक्ष उद्वर्तन का प्रयोग vi) पंचकोल, त्रिफला, वल्लीपंचमूल द्रव्यों का प्रयोग श्लेष्मा दोष वृद्धि की अवस्था में निम्न चिकित्सा सिद्धांत अपनाने चाहिएँ'-
  • 118.
  • 119.
    पंच महाभूतों क ेगुण और उनक े कार्यों महाभूत (तत्व) गुण (विशेषताएँ ) कार्य (प्रभाव) पृथ्वी (Earth) गुरु (भारी), खरा (खुरदरा), कठिन (कठोर), मंद (धीमा), स्थिर (स्थायी), विशद (गैर-चिपचिपा), सान्द्र (ठोस), स्थूल (मोटा), गंध (गंधयुक्त) उपचय (विकास), संघात (संघटन), गौरव (भारता), स्थैर्य (स्थिरता) जल (Water) द्रव (तरल), स्निग्ध (चिकना), शीत (ठं डा), मंद (धीमा), पृथु (कोमल), पिच्छिल (चिपचिपा), रस (स्वादयुक्त) उपक्लेदन (सिक्त करना), स्निग्धता (चिकनाहट), बंधन (बंधन करना), विश्यान्दन (बाहर निकलना), मृदुता (कोमलता), प्रह्लादन (आनंद देना) अग्नि (Fire) उष्ण (गर्म), तीक्ष्ण (तीव्र), सूक्ष्म (अत्यंत छोटा), लघु (हल्का), रुक्ष (रूखा), विशद, रूप (दृश्यता) दाह (गर्मी उत्पन्न करना), पाचन (पचाने की शक्ति), प्रभा (तेज), प्रकाश (उज्ज्वलता), वर्ण (रंग प्रदान करना) वायु (Air) लघु (हल्का), शीत (ठं डा), रुक्ष (रूखा), विशद, सूक्ष्म (अत्यंत छोटा), स्पर्श रौक्ष्य (रूखापन), ग्लानि (निर्बलता), विशार (गति देना), विशद, लाघव (हल्कापन) आकाश (Ether/Space) मृदु (कोमल), लघु (हल्का), श्लक्ष्ण (चिकना), शब्द (ध्वनि), सूक्ष्म (अत्यंत छोटा) मृदुता (कोमलता), सौशिर्य (रिक्तता उत्पन्न करना), लाघव (हल्कापन)
  • 120.
    पंचमहाभूत तन्मात्रा इंद्रियगुण आकाश शब्द कर्ण अप्रतिघात वायु स्पर्श त्वक चलत्व अग्नि रूप चक्षु उष्णत्व पृथ्वी गंध नासा खरत्व जल रस जिव्हा द्रवतव
  • 121.
    वात दोष -आकाश + वायु महाभूत पित्त दोष - अग्नि महाभूत कफ दोष - जल + पृथ्वी महाभूत त्रिदोष एवं पंच महाभूत आयुर्वेद मतानुसार समस्त द्रव्य पांच भौतिक हैं।
  • 122.
    धातू पंचमहाभूत रस जल रक्तअग्नि मांस पृथ्वी मेद जल ,पृथ्वी अस्थी पृथ्वी, वायु, अग्नि मज्जा जल शुक्र जल पंचमहाभूत और धातू
  • 123.
    मल पंचमहाभूत पुरीष पृथ्वी मूत्रअग्नि, जल स्वेद जल पंचमहाभूत और मल
  • 124.
    रस पंचमहाभूत मधुर पृथ्वी,जल अम्ल पृथ्वी, अग्नि लवण जल , अग्नि कटु वायु, अग्नि तिक्त वायु,आकाश कषाय वायु, पृथ्वी पंचमहाभूत और पंचमहाभूत और रस
  • 125.
    वर्ण पंचमहाभूत गौर अग्नि,आकाश, जल कृष्ण अग्नि, पृथ्वी, वायु श्याम सम मिश्रित पंचमहाभूत पंचमहाभूत और वर्ण
  • 126.
    पंचमहाभूत त्रिगुण आकाश सत्व वायुरज अग्नि सत्व, रज पृथ्वी तम जल सत्व, तम पंचमहाभूत और त्रिगुण
  • 127.
    कर्म त्रिगुण वमन अग्नि,वायु विरेचन पृथ्वी, जल संशमन आकाश संग्राही वायु दीपन अग्नि लेखन वायु, अग्नि बृहण पृथ्वी, जल पंचमहाभूत और कर्म
  • 128.
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