स ांची मेंबौद्ध स्तूप
स ांची, जिसे क क न य , क क न व , क क न ड बोट तथ बोट श्री पववत के न म से ् चीन समय
में ि न ि त थ और अब यह मध्य ्देश र ज्य में जस्थत है। यह ऐततह ससक तथ पुर त जववक
महवव व ल एक ध समवक स्थ न है। स ांची अपने स्तूपों, एक चट्ट न से बने अशोक स्तांभ, मांददरों,
मठों तथ तीसरी शत ब्दी बी. सी. से 12वीां शत ब्दी ए. बी. के बीच सलखे गए सशल लेखों की
सांपद के सलए ववश्व भर में ्ससद्ध है।
स ांची के स्तूप अपने ्वेश द्व र के सलए उल्लेखनीय है, इनमें बुद्ध के िीवन से ली ग घटन ओां
और उनके वपछले िन्म की ब तों क सि वटी चचत्रण है। ि तक कथ ओां में इन्हें बोचध सवव के
न म से वर्णवत ककय गय है। यह ां गौतम बुद्ध को सांके तों द्व र तनरुवपत ककय गय है िैसे कक
पदहय , िो उनकी सशक्ष ओां को दश वत है।
स ांची को 13वीां शत ब्दी के ब द 1818 तक लगभग भुल ही ददय गय थ , िब िनरल टेलर,
एक ब्रिदटश अचधक री ने इन्हें दोब र खोि , िो आधी दबी हु और अच्छी तरह सांरक्षक्षत अवस्थ में थ ।
ब द में 1912 में सर िॉन म शवल, पुर तवव ववभ ग के मह तनदेशक में इस स्थल पर खुद के क यव
क आदेश ददय ।
शूांग के समय में स ांची में और इसकी पह डडयों के आस प स अनेक मुख द्व र तैय र ककए गए थे।
5.
यह ां अशोकस्तूप पवथरों से बड बन य गय और इसे ब लू स्रेड, सीदियों और ऊपर हसमवक से सि य
गय ।
च लीस मांददरों क पुन: तनम वण और दो स्तूपों को खड करने क क यव भी इसी अवचध में ककय गय ।
पहली शत ब्दी बी. सी. में आांध्र - 7 व हन, जिसने पूवी म लव तक अपन र ज्य ववस्त ररत ककय थ ,
ने स्तूप 1 के नक्क शी द र म गव को नुकस न पहुांच य । दूसरी से चौथी शत ब्दी ए डी तक
स ांची तथ ववददश कु ष णु और क्षत्रपों क र ज्य थ और इसके ब द यह गुप्त र िवांश के प स चल गय ।
गुप्त क ल के दौर न कु छ मांददर तनसमवत ककए गए और इसमें कु छ सशल्पक री िोडी ग ।
सबसे बड स्तूप, जिसे मह न स्तूप कहते हैं, च र नक्क शीद र ्वेश द्व रों से तघर हुआ है
जिसकी च रों ददश एां कु तुबनुमे की ददश ओां में हैं।
इसके ्वेश द्व र सांभवतय 1000 एडी के आस प स बन ए गए।
ये स्तूप ववश ल अधव गोल क र गुम्बद हैं जिनमें एक के न्रीय कक्ष है और इस कक्ष में
मह वम बुद्ध के अवशेष रखे गए थे। स ांची के स्तूप के अवशेष बौद्ध व स्तुकल के
ववक स और तीसरी शत ब्दी बी सी 12वीां शत ब्दी ए डी के बीच उसी स्थ न की सशल्पकल क दश वते हैं।
इन सभी सशल्पकल ओां की एक सबसे अचधक रोचक ववशेषत यह है कक यह ां बुद्ध की छवव
म नव रूप में कहीां नहीां है। इन सशल्पक ररयों में आश्चयविनक िीवांतत है और ये एक ऐसी
दुतनय ददख ती हैं िह ां म नव और िांतु एक स थ समलकर ्सन्नत , सौह दव और बहुलत के स थ रहते हैं।
्कृ तत क सुांदर चचत्रण अद्भुत है। मह वम बुद्ध को यह ां म नव से परे आकृ ततयों में स ांके ततक रूप से
दश वय
गय है।
वतवम न में यूनेस्को की एक पररयोिन के तहत स ांची तथ एक अन्य बौद्ध स्थल सतध र की आगे
खुद , सांरक्षण तथ पय ववरण क ववक स ककय ि रह है।
6.
स ांची स्तूपक इततह स
1. स ाँची स्तूप को ककसी पररचय की िरूरत नहीां है क्योंकक स ाँची स्तूप को पहले से ही
भ रत में सबसे महववपूणव स्थ नों में से एक के रूप में चचजननत ककय ि चुक है. स ाँची
स्तूप िगह एक छोटे से ग ांव में है िो कक भोप ल, मध्य ्देश से लगभग ब वन ककलोमीटर
की दूरी पर जस्थत है I
2. स ाँची स्तूप बौद्ध धमव के ब रे में है और स ांची में असांख्य बौद्ध सांरचन ए, खांभे और मठ एक
्ससद्ध पयवटन स्थल है. इन स्म रकों की सांरचन 3 और 12 वीां सदी के बीच के युग की
त रीख में हु और स ांची स्तूप यूनेस्को द्व र ववश्व धरोहर स्थलों के अांतगवत सूचीबद्ध हैI
3. मौयव सम्र ट अशोक स ांची में 'स्तूप' क सिवक थ . ये स्तूप भगव न बुद्ध के सलए एक
श्रद्ध ांिसल के रूप में अवपवत है. सभी स्तूपों में स ांची स्तूप एक अद्वध पररपत्र चट्ट न से बन
हुआ सबसे महववपूणव और ्भ वश ली स्तूप है I
4. इस मह न स्म रक को भगव न बुद्ध के अवशेषो को ्ततष्ठ वपत करने के सलए बन य गय
थ I स ांची ्ससद्ध को न के वल भ रत में बजल्क दुतनय भर में म न्यत ् प्त है. आि ये िगह
बौद्ध धमव क एक मह न और ्तीक कें र बन गयी हैI
5. सबसे उल्लेखनीयसांरचन ओां में मह न स्तूप क पत 1818 में चल थ . मध्य शत ब्दी
३ स पूवव और ब द में मौयव सम्र ट अशोक द्व र स्तूप क चलन शुरू ककय गय थ I
स ाँची स्तूप बडे पैम ने पर एक बडे पवथर द्व र बन होत है जिसमे च र रेसलांग द्व र होते है।
6. ये रेसलांग ववस्तृत नक्क सशयों के स थ सिे होते हैं और उनमें बुद्ध के िीवन, अपने वपछले
िन्म और अन्य बौद्ध धमव के महववपूणव मह पुरूषों के िीवन से िुडे हुए तथ्य ददख ए ि ते है
I ये स्तूप अपने आप में एक आध र होते है जिसमें एक अधवगोल गुांबद (अांड क र आक र में)
होत है और ये पृथ्वी पर स्वगव के गुांबद क ्तीक होते हैI
व स्तु दृजष्टकोण
7. स ांची स्तूप एक ववश ल अद्वध पररपत्र गुांबद के आक र क कक्ष है जिसमें भगव न बुद्ध के
अवशेषो को श ांततपूणव व त वरण में रख गय है. यह एक ईंट से तनसमवत है. ये कक्ष 16.5
मीटर लांब और व्य स में 36 मीटर है I
8. मध्ययुगीन क ल से स ांची स्तूप सबसे अच्छ व स्तु डडि इन है जिसमें सभी स्तुपों को
सबसे सांगदठत सांरचन ओां में से एक कह गय है. स्तूप के ववक स के दौर न ि ांच और
डडि इन ऐततह ससक क ल की ्कृ तत और प्य र को दश वत है
9.
9. ्वेश द्वर आाँखों को चौंक देने व ली व स्तुकल क एक नमून है जिसमें नर और म द
पेड पर खुदी हु सभवि चचत्र अपने आप में एक अनोख अिूब है I यह म न ि त है कक ये
दो आवम एां म नव की भ वन ओां और म नससक जस्थतत को चचब्रत्रत करती हैI बौद्धों क म नन है
कक ये मूततवय ां गेट पर लगे होने से एक "अच्छ शगुन 'क ्तीक हैI
10. स ांची स्तूप व स्तु गररम की एक समृद्ध ववर सत क ्तीक है I ये सबसे आश्चयविनक है
कक सददयों से ये स्तूप एक ददव्य आकषवण के रूप में म ने ि ते रहे है I ये एक पववत्र स्थ न
होने के स थ-स थ सद्भ व और श ांतत से भी समृद्ध है I
10.
यज्ञ और वववद
यज्ञ, योग की ववचध है िो परम वम द्व र ही हृदय में सम्पन्न होती है। िीव के अपने सवय
पररचय िो परम वम क असभन्न ज्ञ न और अनुभव है, यज्ञ की पूणवत है। यह शुद्ध होने की
किय है। इसक सांबांध अजनन से ्तीक रूप में ककय ि त है। यज्ञ क अथव िबकक योग है
ककन्तु इसकी सशक्ष व्यवस्थ में अजनन और घी के ्तीक वमक ्योग में प रांपररक रूचच क
क रण अजनन के भोिन बन ने में, य आयुवेद और औषधीय ववज्ञ न द्व र व यु शोधन इस
अजनन से होने व ले धुओां के गुण को यज्ञ समझ इस 'यज्ञ' शब्द के ्च र ्स र में बहुत
सह यक रहे। अचधयज्ञोअहमेव त्र देहे देहभृत म वर ॥
शरीर य देह के द सवव को छोड देने क वरण य तनश्चय करने व लों में, यज्ञ अथ वत िीव और
आवम के योग की किय य िीव क आवम में ववलय, मुझ परम वम क क यव है।
अन चश्रत: कमव फलम क यवम कमव करोतत य: स सांन्य सी च योगी च न तनरजनननव च किय: ॥
अथव
यज्ञ शब्द के र्तीन अर्थ हैं- १- देवपूि , २-द न, ३-सांगततकरण। सांगततकरण क अथव है-सांगठन।
यज्ञ क एक ्मुख उद्देश्य ध समवक ्वृवि के लोगों को सव्योिन के सलए सांगदठत करन भी है।
इस युग में सांघ शजक्त ही सबसे ्मुख है।
11.
पर स्त देवतओां को पुनः ववियी बन ने के सलए ्ि पतत ने उसकी पृथक्-पृथक् शजक्तयों क
एकीकरण करके सांघ-शजक्त के रूप में दुग व शजक्त क ् दुभ वव ककय थ । उस म ध्यम से उसके
ददन कफरे और सांकट दूर हुए। म नवि तत की समस्य क हल स मूदहक शजक्त एवां सांघबद्धत पर
तनभवर है, एक की-व्यजक्तव दी-असांगदठत लोग दुबवल और स्व थी म ने ि ते हैं।ग यत्री यज्ञों क
व स्तववक ल भ स ववितनक रूप से, िन सहयोग से सम्पन्न कर ने पर ही उपलब्ध होत है।
यज्ञ का र्तात्पयथ है- वय ग, बसलद न, शुभ कमव। अपने व्य ख द्य पद थों एवां मूल्यव न् सुगांचधत
पौजष्टक रव्यों को अजनन एवां व यु के म ध्यम से समस्त सांस र के कल्य ण के सलए यज्ञ द्व र
ववतररत ककय ि त है। व यु शोधन से सबको आरोनयवधवक स ाँस लेने क अवसर समलत है।
हवन हुए पद थ्व व युभूत होकर ् र्णम त्र को ् प्त होते हैं और उनके स्व स्थ्यवधवन, रोग तनव रण
में सह यक होते हैं। यज्ञ क ल में उच्चररत वेद मांत्रों की पुनीत शब्द ध्वतन आक श में व्य प्त
होकर लोगों के अांतःकरण को स जववक एवां शुद्ध बन ती है। इस ्क र थोडे ही खचव एवां ्यतन स
यज्ञकत वओां द्व र सांस र की बडी सेव बन पडती है। वैयजक्तक उन्नतत और स म जिक ्गतत क
स र आध र सहक ररत , वय ग, परोपक र आदद ्वृवियों पर तनभवर है। यदद म त अपने
रक्त-म ांस में से एक भ ग नये सशशु क तनम वण करने के सलए न वय गे, ्सव की वेदन न सहे,
अपन शरीर तनचोडकर उसे दूध न वपल ए, प लन-पोषण में कष्ट न उठ ए और यह सब कु छ
तनत न्त तनःस्व थव भ व से न करे, तो कफर मनुष्य क िीवन-ध रण कर सकन भी सांभव न हो।
इससलए कह ि त है कक मनुष्य क िन्म यज्ञ भ वन के द्व र य उसके क रण ही सांभव होत
है। गीत क र ने इसी तथ्य को इस ्क र कह है कक ्ि पतत ने यज्ञ को मनुष्य के स थ िुडव
भ की तरह पैद ककय और यह व्यवस्थ की, कक एक दूसरे क असभवधवन करते हुए
दोनों फलें-फू लें।
12.
यज्ञ की ववचध
अजननको प वक कहते हैं क्योंकक यह अशुद्चध को दूर करती है। लोहे के अयस्क को उच्च त प
देने पर लोह वपघल कर तनकलत है। यह किय भी लोहे क यज्ञ है। प रांपररक ववचध में यज्ञ की
इस ववचध को ्तीकों से समझ य ि त रह है। कु छ लोग उस अजनन किय को गलती से यज्ञ
म न लेते हैं।
अजनन में दूध के छीांटे पडने से अजनन बुझने लगती है। अजनन और दूध के िल क यह
्तीक वमक ्योग ससफव यह ज्ञ न देत है कक मनुष्य के अतनयांब्रत्रत ववच र य अनुभव, सांस र में
अथवहीन हैं और वह ् कृ ततक ससद्ध ांतों द्व र नहीां फै ल सकत । को भी अनुभव सवव व्य पी नहीां
होत । को व्यजक्त िो दुखी है वह अपने दुख के अनुभव को कै से व्यक्त कर सकत है? और
यदद वह अपनी ब त कहत भी है य रोत ब्रबलखत है, तो भी को दूसर व्यजक्त उस दुख को
नहीां समझ सकत ।
दूध को मथने से उसक िल और घी अलग अलग हो ि ते हैं। अब उसी अजनन में घी ड ल
ि त है, जिस से अजनन उसे ्क श में पररवततवत कर देती है।। अजनन और घी क यह
्तीक वमक ्योग ससफव यह ज्ञ न देत है कक िब ज्ञ न को उसी अजनन रूपी सवय में ड ल ददय
ि त है तब इस कमव क ्भ व अलग हो ि त है और अजनन उस ज्ञ न को सांस र में ्क सशत
हो अांधक र को दूर करती है। ्सन्नत के स थ, स ांसररक ववच रों को मथ कर उसे शुद्ध करने
की किय , इांदरयों के सांयम को खांबे की तरह खड कर, सवय और व णी के रस्सी द्व र की
ि ती है। दूध अथ वत सांस र के ववच र के इसी तरह मथने से घी तनक ल ि त है, जिसमें मल
अथ वत अशुद्चध नहीां होती और उसमें उवसगव य वैर नय होत है और वह सुांदर और पववत्र है। िो
भी उस तनमवल य मल रदहत, ज्ञ न से स्न न करत है, उसके हृदय में श्री र म की भजक्त, अपने
आप पररछ यी की तरह आ ि ती है।
दूध, घी और अजनन और ्क श, िमशः अनुभव और ज्ञ न और वववेक और सवय हैं और यज्ञ
उनक एक स मांिस्य है।
13.
स्तूप कै सेबनव ए गए, स्तूप की सांरचन और स्तुपो की खोि
श ांतत के ्तीक स ांची के स्तूपों की खोि को 200 वषव पूरे हो गए हैं। सम्र ट अशोक ने
पवनी देवी के कहने पर स पूवव तीसरी शत ब्दी में इन्हें बनव ए थे। क ल ांतर में खांडहर
हो ि ने के ब द ये मलबे में दब गए। वषव 1818 में इनकी कफर खोि हु ।
पुर तवववेि डॉ. न र यण व्य स के मुत ब्रबक आि भले ही स ांची र यसेन क दहस्स हो,
लेककन सम्र ट अशोक के समय यह ववददश क एक भ ग थ । अशोक की पवनी देवी ने
बौद्ध धमव स्वीक र ककय थ । उन्होंने पतत से कहकर यह ां स्तूप बनव ए थे। उस समय
स्तूपों की इस पह डी क न म वैददसचगरर थ , जिसक अथव है ववददश की पह डी। यह ां बने
बौद्ध ववह रों में ही देवी और अशोक की सांत नें महेंर और सांघसमत्र रहे। ब द में इस
पह डी क न म क कन य और श्रीपववत भी रह । 11-12 वीां शत ब्दी में यह स्थ न खांडहर
में तब्दील हो गय । 1989 में स ांची के स्तूपों को ववश्व धरोहर में श समल ककय गय ।
14.
टेलर ने देखा,कननिंघम ने सिंवारा
डॉ. व्य स के मुत ब्रबक सददयों तक मलबे में दबे इन स्तूपों को 1818 में भोप ल ररय सत के
ब्रिदटश पॉलीदटकल एिेंट िनरल टेलर ने सबसे पहले देख । इसके ब द सवेयर िनरल
कतनांघम ने 1853 में स्तूपों और आसप स के अवशेषों क सवे ककय । उन्होंने अपनी पुस्तक
भेलस टोप्स को स ांची के स्तूपों पर कें दरत कर उसमें मुरेल खुदव, सुन री, सतध र और अांधेर
के स्तूपों क भी सवे कर उसक वववरण ददय । कतनांघम ने मलबे क उवखनन कर कर स्तूपों
को सांव र । उन्हें यह ां भगव न बुद्ध के सशष्य स ररपुत्र और मह मोनदल यन व बौद्ध सशक्षकों
की अजस्थय ां समलीां।
नवाबी काल में बना सिंग्रहालय
कतनांघम के ब द भ रतीय पुर तवव सवेक्षण के पहले तनदेशक सर िॉन म शवल ने 1912-
1919 तक स्तूपों क रखरख व कर य । म शवल के ब द 1942 में भोप ल ररय सत के
पुर तवववेि अब्दुल हमीद ने स्तूपों क उवखनन कर कर ्म र्णत ककय कक अशोक की
पवनी देवी यहीां रहती थीां। नव बी क ल में स्तूप की पह डी पर ही वह ां से तनकले अवशेषों क
सांग्रह लय बन य गय । स ांची के स्तूपों की खोि को 200 वषव पूरे होने पर सरक र ने 200
के नोट पर इनके चचत्र ्क सशत ककए हैं।
15.
पवथर में गढ़ी कथ एां
मूततव कल
शशल्पकला कल क वह रूप है िो ब्रत्रववमीय होती है। यह कठोर पद थव (िैसे पवथर),
मृदु पद थव एवां ्क श आदद से बन ये ि सकते हैं। मूततवकल एक अतत् चीन कल है।
भ रत की मूततवकल
भ रत के व स्तुसशल्प, मूततवकल , कल और सशल्प की िडे भ रतीय सभ्यत के इततह स
में बहुत दूर गहरी ्तीत होती हैं। भ रतीय मूततवकल आरम्भ से ही यथ थव रूप सलए हुए
है जिसमें म नव आकृ ततयों में ् य: पतली कमर, लचीले अांगों और एक तरूण और
सांवेदन पूणव रूप को चचब्रत्रत ककय ि त है। भ रतीय मूततवयों में पेड-पौधों और िीव
िन्तुओां से लेकर असांख्य देवी देवत ओां को चचब्रत्रत ककय गय है।
भ रत की ससांधु घ टी सभ्यत के मोहनिोदडों के बडे-बडे िल कु ण्ड ् चीन मूततवकल क
एक श्रेष्ठ उद हरण हैं। दक्षक्षण के मांददरों िैसे कक क ांचीपुरम, मदुरै, श्रीरांगम और
र मेश्वरम तथ उिर में व र णसी के मांददरों की नक्क शी की उस उवकृ ष्ट कल के चचर-
्चसलत उद हरण है िो भ रत में समृद्ध हु ।
16.
के वल यहीनहीां, मध्य ्देश के खिुर हो मांददर और उडीस के सूयव मांददर में इस उवकृ ष्ट
कल क िीत ि गत रूप है। स ांची स्तूप की मूततवकल भी बहुत भव्य है िो तीसरी सदी
.पू. से ही इसके आस-प स बन ए गए िांगलों (ब लुस्रेड्स) और तोरण द्व रों को अलांकृ त
कर रही हैं। म मल्ल पुरम क मांददर; स रन थ सांग्रह लय के ल यन के पीटल (िह ां से भ रत
की सरक री मुहर क नमन तैय र ककय गय थ ) में मोयव की पवथर की मूततव, मह वम
बुद्ध के िीवन की घटन ओां को चचब्रत्रत करने व ली अमर वती और न गिुवनघोंड की
व स्तुसशल्पीय मूततवय ां इसके अन्य उद हरण हैं।
दहन्दु गुफ व स्तुसशल्प की पर क ष्ठ मुम्ब के तनकट एलीफें ट गुफ ओां मे देखी ि सकती
है और इसी ्क र एलोर के दहन्दु और िैन शैल मांददर ववशेष रूप से आठवीां शत ब्दी
क कै ल श मांददर व स्तुसशल्प क यह रूप देख ि सकत है।
इततह स के कल खांडों के समृद्ध स क्ष्य सांके त करते हैं कक भ रतीय सशल्प कल को एक
समय पूरे ववश्व में उच्चतम स्थ न ् प्त थ ।
17.
मूततवकल क इततहस
अन्य कल ओां के सम न ही भ रतीय मूततवकल भी अवयन्त ् चीन है। यद्यवप प ष ण
क ल में भी म नव अपने प ष ण उपकरणों को कु शलत पूववक क ट-छ ाँटकर ववशेष आक र
देत थ और पवथर के टुकडे से फलक तनक लते हेतु 'दब व' तकनीक य पटककर तोडने की
तकनीक क इस्तेम ल करने लग थ , परन्तु भ रत में मूततवकल अपने व स्तववक रूप
में हडप्प सभ्यत के दौर न ही अजस्तवव में आ । इस सभ्यत की खुद में अनेक मूततवय ाँ
् प्त हु हैं िो लगभग 4000 वषव पूवव ही भ रत में मूततव तनम वण तकनीक के ववक स क
द्योतक हैं।
भ रतीय मुततवकल की परांप ससांधु घ टी सभ्यत से फै ली। उस क ल में समट्टी की छोटी
मूततवय ाँ बन ग । मौयव क ल (तीसरी शत ब्दी .पू.) के मह न् गोल क र प ष ण स्तांभों और
उवकीर्णवत ससांहों ने दूसरी और पहली शत ब्दी .पू. में स्थ वपत दहांदू और बौद्ध ्सांगों व ली
पररपक्व भ रतीय आकृ ततमूलक मूततवकल क म गव ्शस्त ककय ।
शैसलयों और परांपर ओां की व्य पक श्रेणी भ रत के ववसभन्न भ गों में शत जब्दयों तक फली-
फू ली, लेककन नौवीां-दसवीां शत ब्दी तक आते-आते भ रतीय मूततवकल एक ऐसे रूप में पहुाँच
ग , िो अब तक म मूली पररवतवनों के स थ बनी हु है। 10वीां शत ब्दी से यह मूततवकल
मुख्यतः स्थ पवयीय अलांकरण के एक भ ग के रूप में तुलन वमक रूप से छोटी व औसत
श्रेणी की असांख्य आकृ ततयों को इस ्योिन के सलए बन कर ्योग की ि ने लगी थी।
18.
मूततवकल क उपयोग
भरतीय मूततवकल की ववषय-वस्तु हमेश लगभग क ल्पतनक म नव रूप होते थे, िो लोगों
को दहांदू, बौद्ध य िैन धमव के सवयों की सशक्ष देने के क म आते थे। अन वृि मूततव क
्योग शरीर को आवम के ्तीक और देवत ओां के कजल्पत स्वरूपों को दश वने के सलए ककय
ि त थ । मूततवयों में दहांदू देवत ओां के बहुत से ससर व भुि एाँ इन देवत ओां के ववववध रूपों
और शजक्तयों को दश वने के सलए आवश्यक म ने ि ते थे।
19.
मौयवक लीन कल
हडप्पयुग और मौयव क ल के बीच के अनेक पुर त जववक अवशेष हम रे प स नहीां हैं। ऐस
सांभवत: इस विय से हुआ, क्योंकक उस क ल में भवन पवथर के नहीां बनते थे। मौयव श सन
क ल हम रे स ांस्कृ ततक इततह स क एक महत्त्वपूणव युग है।
यद्यवप मौयों द्व र तनसमवत भवनों के अवशेष हम रे बीच नहीां हैं पर मौयव श सन क ल की क
ब तों क ज़िि ग्रीक इततह सक र मेग स्थनीि ने अपनी पुस्तक 'इजण्डक ' में ककय है।
इसमें मौयो की र िध नी प टसलपुत्रशहर के वैभव एवां उसकी सि के ब रे में भी उल्लेख ककय
गय है। प टसलपुत्र शहर दस मील लांब और दो मील चौड थ , िो म़िबूत लकडी की दीव रों से
तघर हुआ थ । उसमें 500 टॉवर और 64 दरव ़िे थे। उसके भीतर श ही महल थ िो अपने
आक र में र न के श ही महल की नकल पर बन थ । चांरगुप्त के पौत्र अशोक ने बौद्ध
धमव अपन य और कल तथ ् चीन सभ्यत सांस्कृ तत के ववक स के सलए बौद्ध समशनररयों की
गततववचधयों क ववस्त र ककय । 1400 सवी के आस-प स िब चीनी बौद्ध
य त्री फ नय न भ रत आय , तब उसने श ही महल को खडे हुए देख थ । श ही महल के स थ-
स थ दीव रों दरव िों तथ अन्य कल कृ ततयों को देखकर वह इतन ्भ ववत हुआ कक उसे
ववश्व स ही नहीां हुआ कक उनक तनम वण म नव कल क रों-चचत्रक रों के ह थों हुआ होग ।
20.
बौद्ध स्तूप
अशोक केश सन क ल के पहले भी भ रत में स्तूप िैसी ची़िें ज्ञ त थीां। मूलरूप से वैददक आयों
ने इांटों और स ध रण समट्टी से उनक तनम वण ककय थ । मौयवक ल के पहले इस तरह के स्तूपों
के उद हरण नहीां समलते हैं। अशोक के श सनक ल में बुद्ध के शरीर को ध्य न में रखकर स्मृतत
चचन्हों क तनम वण ककय गय और यही स्तूप पूि के स धन बने। बौद्ध कल और धमव में स्तूप
को भगव न बुद्ध के स्मृतत चचन्ह के रूप में स्वीक र ककय गय । स्तूप अांदर से कच्ची टों से
तथ ब हरी खोल पक्की टों से बन ये गये और कफर उनमें हल्क प्ल स्टर चढ़ य गय । स्तूप
को ऊपर से लकडी अथव पवथर की छतरी से सुसजज्ित ककय गय और ्दक्षक्षण के सलए च रों
ओर लकडी क म गव भी बन य गय ।