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गुरुत्व कामाारम द्वाया प्रस्तुत भाससक ई-ऩत्रिका ससतम्फय-2019
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गुरुत्व ज्मोततष भाससक
ई-ऩत्रिका भें रेखन हेतु
फ्रीराॊस (स्वतॊि) रेखकों का
स्वागत हैं...
गुरुत्व ज्मोततष भाससक ई-
ऩत्रिका भें आऩके द्वारा सरखे गमे
भॊि, मॊि, तॊि, ज्मोततष, अॊक
ज्मोततष, वास्तु, पें गशुई, टैयों, येकी
एवॊ अन्म आध्मात्त्भक ऻान वधाक
रेख को प्रकासशत कयने हेतु बेज
सकते हैं।
अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें।
GURUTVA KARYALAY
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गुरुत्व ज्मोततष
भाससक ई-ऩत्रिका
ससतम्फय 2019
सॊऩादक
ध ॊतन जोशी
सॊऩका
गुरुत्व ज्मोततष ववबाग
गुरुत्व कामाारम
92/3. BANK COLONY,
BRAHMESHWAR PATNA,
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ऩत्रिका प्रस्तुतत
ध ॊतन जोशी,
गुरुत्व कामाारम
पोटो ग्राफपक्स
ध ॊतन जोशी,
गुरुत्व कामाारम
अनुक्रभ
(9 2013) 7 45
श्री सन्तान सप्तभी व्रत 5-ससतम्फय-2019 (फुधवाय) 8 गणऩतत अथवाशीषा 46
ऩद्मा (ऩरयवततानी) एकादशी व्रत 09-ससतम्फय-2019
( वाय)
13
गणेश स्तवन
47
इॊददया एकादशी व्रत 25-ससतम्फय-2019 ( वाय) 15 ववष्णुकृ तॊ गणेशस्तोिभ् 47
17 गणऩततस्तोिभ् 48
21 श्री ववघ्नेश्वयाष्टोत्तय शतनाभस्तोिभ् 48
ल 22 49
ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण की भदहभा 26 ? 49
27 ल ल ? 50
ल 28 गणेश कव भ् 52
सॊकटनाशन गणेशस्तोिभ् 28 गणेशद्वादशनाभस्तोिभ् 54
ल ? 29 ऋ 55
30 ऋण भो न भहा गणऩतत स्तोि 56
30 57
? 32 58
33 60
गणेशबुजॊगभ् 35 ववनामकस्तोि 61
36 श्री ससविववनामक स्तोिभ् 62
सॊकष्टहयणॊ गणेशाष्टकभ्‌ 40 63
गणेश ऩॊच् यत्नभ् 40 64
एकदन्त शयणागतत स्तोिभ् 41 ल 68
ल 42 ल 71
- ल 43 , औ 71
ल 44
72
स्थामी औय अन्म रेख
सॊऩादकीम 4 दैतनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका 102
ससतम्फय 2019 भाससक ऩॊ ाॊग 92 ददन के ौघडडमे 103
ससतम्फय 2019 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय 94 ददन फक होया - सूमोदम से सूमाास्त तक 104
ससतम्फय 2019 -ववशेष मोग 102
वप्रम आत्त्भम,
फॊधु/ फदहन
जम गुरुदेव
वक्रतुॊड भहाकाम सूमाकोदट सभप्रब:
तनववाघ्नॊ कु रु भे देव: सवाकामेषु सवादा
हे रॊफे शयीय औय हाथी सभान भुॊख वारे गणेशजी, आऩ कयोडों सूमा के सभान भकीरे हैं। कृ ऩा कय भेये
साये काभों भें आने वारी फाधाओॊ ववघ्नो को आऩ सदा दूय कयते यहें।
गणऩतत शब्द का अथथ हैं।
गण(सभूह)+ऩतत (स्वाभी) = सभूह के स्वाभी को सेनाऩतत अथाात गणऩतत कहते हैं। भानव शयीय भें
ऩाॉ ऻानेत्न्िमाॉ, ऩाॉ कभेत्न्िमाॉ औय ाय अन्त्कयण होते हैं। एवॊ इस शत्क्तओॊ को जो शत्क्तमाॊ
सॊ ासरत कयती हैं उन्हीॊ को ौदह देवता कहते हैं। इन सबी देवताओॊ के भूर प्रेयक बगवान श्रीगणेश हैं।
बायतीम सॊस्कृ तत भें प्रत्मेक शुबकामा शुबायॊब से ऩूवा बगवान श्री गणेश जी की ऩूजा-अ ाना की
जाती हैं । इस सरमे मे फकसी बी कामा का शुबायॊब कयने से ऩूवा उस कामा का "श्री गणेश कयना" कहाॊ
जाता हैं। प्रत्मक शुब कामा मा अनुष्ठान कयने के ऩूवा ‘‘श्री गणेशाम नभ्” भॊि का उच् ायण फकमा जाता
हैं। बगवान गणेश को सभस्त ससविमों के दाता भाना गमा है। क्मोफक सायी ससविमाॉ बगवान श्री गणेश भें
वास कयती हैं।
बगवान श्री गणेश सभस्त ववघ्नों को टारने वारे हैं, दमा एवॊ कृ ऩा के अतत सुॊदय भहासागय हैं, तीनो
रोक के कल्माण हेतु बगवान गणऩतत सफ प्रकाय से मोग्म हैं।
धासभाक भान्मता के अनुशाय बगवान श्री गणेशजी के ऩूजन-अ ान से व्मत्क्त को फुवि, ववद्या, वववेक योग,
व्माधध एवॊ सभस्त ववध्न-फाधाओॊ का स्वत् नाश होता है, बगवान श्री गणेशजी की कृ ऩा प्राप्त होने से व्मत्क्त के
भुत्श्कर से भुत्श्कर कामा बी सयरता से ऩूणा हो जाते हैं।
शास्िोक्त व न से इस कल्मुग भें तीव्र पर प्रदान कयने वारे बगवान गणेश औय भाता कारी हैं। इस सरमे कहाॊ
गमा हैं।
करा ण्डीववनामकौ
अथाात्: करमुग भें ण्डी औय ववनामक की आयाधना ससविदामक औय परदामी होता है।
धभा शास्िोभें ऩॊ देवों की उऩासना कयने का ववधान हैं।
आददत्मॊ गणनाथॊ देवीॊ रूिॊ के शवभ्।
ऩॊ दैवतसभत्मुक्तॊ सवाकभासु ऩूजमेत्।। (शब्दकल्ऩिुभ)
बावाथथ: - ऩॊ देवों फक उऩासना का ब्रहभाॊड के ऩॊ बूतों के साथ सॊफॊध है। ऩॊ बूत ऩृथ्वी, जर, तेज, वामु
औय आकाश से फनते हैं। औय ऩॊ बूत के आधधऩत्म के कायण से आददत्म, गणनाथ(गणेश), देवी, रूि औय
के शव मे ऩॊ देव बी ऩूजनीम हैं। हय एक तत्त्व का हय एक देवता स्वाभी हैं।
जो भनुष्म अऩने जीवन भें सबी प्रकाय की रयवि-ससवि, सुख, सभृवि औय ऐश्वमा को प्राप्त कयने की
काभना कयता हैं, अऩने जीवन भें सबी प्रकाय की सबी आध्मात्त्भक-बौततक इच्छाओॊ को ऩूणा कयने की
इच्छा यखता हैं, ववद्वानों के भतानुशाय उसे गणेश जी फक ऩूजा-अ ाना एवॊ आयाधना अवश्म कयनी
ादहमे...
दहन्दू ऩयॊऩया भें गणेशजी का ऩूजन अनाददकार से रा आ यहा हैं,
इसके अततरयक्त ज्मोततष शास्िों के अनुशाय बी अशुब ग्रह ऩीडा को दूय कयने हेतु बगवान गणेश फक
ऩूजा-अ ाना कयने से सभस्त ग्रहो के अशुब प्रबावों को दूय होकय, शुब परों फक प्रात्प्त होती हैं। इस सरमे
दहन्दू सॊस्कृ तत भें बगवान श्री गणेशजी की ऩूजा का अत्माधधक भहत्व फतामा गमा हैं।
दहन्दू ऩॊ ाॊग के अनुशाय वैसे तो प्रत्मेक भास की तुथॉ को बगवान गणेशजी का व्रत फकमा जात है।
रेफकन बािऩद की तुधथा व्रत का ववशेष भहत्व दहन्दू धभा शास्िों भें फतामा गमा है।
ऎसी भान्मता हैं की बािऩद की तुधथा के ददन जो श्रधारु व्रत, उऩवास औय दान आदद शुब कामा कताा है,
बगवान श्रीगणेश की कृ ऩा से उसे सौ गुना पर प्राप्त हो जाता हैं। व्मत्क्त को श्री ववनामक तुथॉ कयने
से भनोवाॊतछत पर प्राप्त होता है।
शास्िोक्त ववधध-ववधान से श्री गणेशजी का ऩूजन व व्रत कयना अत्मॊत राबप्रद होता हैं।
गणेश तुथॉ ऩय ॊि दशान तनषेध होने फक ऩौयाणणक भान्मता हैं। शास्िोंक्त व न के अनुशाय जो व्मत्क्त
इस ददन ॊिभा को जाने-अन्जाने देख रेता हैं उसे सभथ्मा करॊक रगता हैं। उस ऩय झूठा आयोऩ रगता
हैं। ववद्वानों के भतानुशाय मदद जाने-अॊजाने ॊि दशान कयरेता हैं तो उसे, करॊक से फ ने के सरए साधक
को बगवान श्री गणेश से अऩनी गरती के ऩरयहाय के सरए बगवान श्री गणेश का ऩूजन वॊदन कयके ऺभा
मा ना कयनी ादहए।
इस भाससक ई-ऩत्रिका भें सॊफॊधधत जानकायीमों के ववषम भें साधक एवॊ ववद्वान ऩाठको से अनुयोध
हैं, मदद दशाामे गए भॊि, श्रोक, मॊि, साधना एवॊ उऩामों मा अन्म जानकायी के राब, प्रबाव इत्मादी के
सॊकरन, प्रभाण ऩढ़ने, सॊऩादन भें, डडजाईन भें, टाईऩीॊग भें, वप्रॊदटॊग भें, प्रकाशन भें कोई िुदट यह गई हो,
तो उसे स्वमॊ सुधाय रें मा फकसी मोग्म ज्मोततषी, गुरु मा ववद्वान से सराह ववभशा कय रे । क्मोफक
ववद्वान ज्मोततषी, गुरुजनो एवॊ साधको के तनजी अनुबव ववसबन्न भॊि, श्रोक, मॊि, साधना, उऩाम के
प्रबावों का वणान कयने भें बेद होने ऩय काभना ससवि हेतु फक जाने वारी वारी ऩूजन ववधध एवॊ उसके
प्रबावों भें सबन्नता सॊबव हैं।
गणेश तुथॉ के शुब अवसय ऩय आऩ अऩने जीवन भें ददन प्रततददन
अऩने उद्देश्म फक ऩूतता हेतु अग्रणणम होते यहे आऩकी सकर भनोकाभनाएॊ
ऩूणा हो एवॊ आऩके सबी शुब कामा बगवान श्री गणेश के आसशवााद से
त्रफना फकसी सॊकट के ऩूणा होते यहे हभायी मदह भॊगर काभना हैं......
ध ॊतन जोशी
6 ससतम्फय - 2019
***** भाससक ई-ऩत्रिका से सॊफॊधधत सू ना *****
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत सबी रेख गुरुत्व कामाारम के अधधकायों के साथ ही आयक्षऺत हैं।
 ई-ऩत्रिका भें वणणात रेखों को नात्स्तक/अववश्वासु व्मत्क्त भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हैं।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख आध्मात्भ से सॊफॊधधत होने के कायण बायततम धभा शास्िों से प्रेरयत
होकय प्रस्तुत फकमा गमा हैं।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत फकसी बी ववषमो फक सत्मता अथवा प्राभाणणकता ऩय फकसी
बी प्रकाय की त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हैं।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत जानकायीकी प्राभाणणकता एवॊ प्रबाव की त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की
नहीॊ हैं औय ना हीॊ प्राभाणणकता एवॊ प्रबाव की त्जन्भेदायी के फाये भें जानकायी देने हेतु कामाारम
मा सॊऩादक फकसी बी प्रकाय से फाध्म हैं।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत रेखो भें ऩाठक का अऩना ववश्वास होना आवश्मक हैं। फकसी
बी व्मत्क्त ववशेष को फकसी बी प्रकाय से इन ववषमो भें ववश्वास कयने ना कयने का अॊततभ तनणाम
स्वमॊ का होगा।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत फकसी बी प्रकाय की आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ के आधाय ऩय ददए गमे हैं। हभ
फकसी बी व्मत्क्त ववशेष द्वाया प्रमोग फकमे जाने वारे धासभाक, एवॊ भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा
उऩामोकी त्जन्भेदायी नदहॊ रेते हैं। मह त्जन्भेदायी भॊि- मॊि मा अन्म उऩामोको कयने वारे व्मत्क्त
फक स्वमॊ फक होगी।
 क्मोफक इन ववषमो भें नैततक भानदॊडों, साभात्जक, कानूनी तनमभों के णखराप कोई व्मत्क्त मदद
नीजी स्वाथा ऩूतता हेतु प्रमोग कताा हैं अथवा प्रमोग के कयने भे िुदट होने ऩय प्रततकू र ऩरयणाभ
सॊबव हैं।
 ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत जानकायी को भाननने से प्राप्त होने वारे राब, राब की
हानी मा हानी की त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की नहीॊ हैं।
 हभाये द्वाया प्रकासशत फकमे गमे सबी रेख, जानकायी एवॊ भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय स्वमॊ
ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधुगण ऩय प्रमोग फकमे हैं त्जस्से हभे हय प्रमोग मा कव , भॊि-मॊि मा उऩामो
द्वाया तनत्श् त सपरता प्राप्त हुई हैं।
 ई-ऩत्रिका भें गुरुत्व कामाारम द्वाया प्रकासशत सबी उत्ऩादों को के वर ऩाठको की जानकायी हेतु ददमा
गमा हैं, कामाारम फकसी बी ऩाठक को इन उत्ऩादों का क्रम कयने हेतु फकसी बी प्रकाय से फाध्म
नहीॊ कयता हैं। ऩाठक इन उत्ऩादों को कहीॊ से बी क्रम कयने हेतु ऩूणात् स्वतॊि हैं।
अधधक जानकायी हेतु आऩ कामाारम भें सॊऩका कय सकते हैं।
(सबी वववादो के सरमे के वर बुवनेश्वय न्मामारम ही भान्म होगा।)
7 ससतम्फय - 2019
गणेश ऩूजन हेतु शुब भुहूता 02-ससतम्फय-2019 ( वाय)
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
वैऻातनक ऩितत के अनुसाय ब्रहभाॊड भें सभम व अनॊत आकाश के अततरयक्त सभस्त वस्तुएॊ भमाादा मुक्त हैं।
त्जस प्रकाय सभम का न ही कोई प्रायॊब है न ही कोई अॊत है। अनॊत आकाश की बी सभम की तयह कोई भमाादा
नहीॊ है। इसका कहीॊ बी प्रायॊब मा अॊत नहीॊहोता। आधुतनक भानव ने इन दोनों तत्वों को हभेशा सभझने का व अऩने
अनुसाय इनभें भ्रभण कयने का प्रमास फकमा हैं ऩयन्तु उसे सपरता प्राप्त नहीॊ हुई है।
साभान्मत् भुहूता का अथा है फकसी बी कामा को कयने के सरए सफसे शुब सभम व ततधथ मन कयना। कामा
ऩूणात् परदामक हो इसके सर, सभस्त ग्रहों व अन्म ज्मोततष तत्वों का तेज इस प्रकाय के त्न्ित फकमा जाता है फक
वे दुष्प्रबावों को ववपर कय देते हैं। वे भनुष्म की जन्भ कु ण्डरी की सभस्त फाधाओॊ को हटाने भें व दुमोगो को
दफाने मा घटाने भें सहामक होते हैं।
शुब भुहूता ग्रहो का ऎसा अनूठा सॊगभ है फक वह कामा कयने वारे व्मत्क्त को ऩूणात् सपरता की ओय
अग्रस्त कय देता है।
दहन्दू धभा भें शुब कामा के वर शुब भुहूता देखकय फकए जाने का ववधान हैं। इसी ववधान के अनुसाय श्रीगणेश
तुथॉ के ददन बगवान श्रीगणेश की स्थाऩना के श्रेष्ठ भुहूता आऩकी अनुकू रता हेतु दशााने का प्रमास फकमा जा यहा
हैं। दहन्दू धभा ग्रॊथों के अनुसाय शुब भुहूता देखकय फकए गए कामा तनत्श् त शुब व सपरता देने वारे होते हैं।
*** 2 31 ***
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त्स्थय रग्न इष्ट ऩूजन हेतु सवाश्रेष्ठ भाना जाता हैं 2 को त्स्थय रग्न
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अत् गणेश जी का ऩूजन कयते सभम मदद शुब ततधथ एवॊ रग्न का सॊमोग फकमा जाते तो मह अत्मॊत शुब
परप्रदामक होता हैं।
ववशेष: ववद्वानों के भतानुशाय त्स्थय रग्न वृत्श् क भें कयना शुब होता हैं। त्जस भें बगवान श्रीगणेश प्रततभा की
स्थाऩना की जा सकती हैं। जानकायों का भानना हैं की गणेश तुथॉ दोऩहय भें होने के कायण इसे भहागणऩतत
तुथॉ बी कहाॊ जामेगा। क्मोंफक ज्मोततष के अनुशाय वृत्श् क त्स्थय रग्न हैं। त्स्थय रग्न भें फकमा गमा कोई
बी शुब कामा स्थाई होता हैं।
ववद्वानो के भतानुशाय शुब प्रायॊब मातन आधा कामा स्वत् ऩूणा।
8 ससतम्फय - 2019
श्री सन्तान सप्तभी व्रत 5-ससतम्फय-2019 (फुधवाय)
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
श्री सन्तान सप्तभी व्रत कथा
एक फाय मुधधत्ष्ठय ने बगवान श्रीकृ ष्ण से कहा- हे
प्रबो! कोई ऐसा उत्तभ व्रत फतराइमे त्जसके प्रबाव से
भनुष्मों के अनेकों साॊसारयक दु्ख औय क्रेश दूय हो जामे वे
ऩुि एवॊ ऩौिवान हो जाएॊ।
मुधधत्ष्ठय की फात सुनकय बगवान श्रीकृ ष्ण फोरे -
हे याजन ्! तुभने भनुष्मों के कल्माण हेतु फडा ही उत्तभ प्रश्न
फकमा है। भैं तुम्हें एक ऩौयाणणक कथा सुनाता हूॊ तुभ उसे
ध्मानऩूवाक सुनो। एक सभम रोभष ऋवष ब्रजयाज की भथुया
भें भेये भाता-वऩता देवकी तथा वसुदेव के घय आए।
ऋवषयाज को आमा हुआ देख कयके दोनों अत्मन्त
प्रसन्न हुए तथा उनको उत्तभ आसन ऩय फैठा कय उनका
अनेक प्रकाय से वन्दन औय सत्काय फकमा। देवकी तथा
वसुदेव की बत्क्तऩूवाक ऋवष से प्रशन्न होकय रोभष
ऋवष उनको कथा सुनाने रगे।
रोभष ने कहा फक - हे देवकी! दुष्ट दुया ायी ऩाऩी कॊ स
ने तुम्हाये कई ऩुिों को ऩैदा होते ही भायकय तुम्हें ऩुिशोक ददमा
है।
इस दु्ख से भुक्त होने के सरए तुभ "सॊतान सप्तभी"
का व्रत कयो। इसी प्रकाय याजा नहुष की ऩत्नी ॊिभुखी
बी दु्खी यहा कयती थी। फकन्त्म ॊिभुखी ने "सॊतान
सप्तभी" व्रत ऩूणा व्रत ववधध ववधान के साथ फकमा था।
त्जसके प्रताऩ से ॊिभुखी के उसके बी ऩुि नहीॊ भये औय
उसको उत्तभ सन्तान का सुख प्राप्त हुआ। मह व्रत तुम्हें
बी ऩुिशोक से भुक्त कयेगा।
मह सुनकय देवकी ने हाथ जोडकय भुतन से प्राथना
की- हे ऋवषयाज! कृ ऩा भुझे व्रत का ऩूया ववधध-ववधान
फताने की कृ ऩा कयें ताफक भैं ववधधऩूवाक व्रत सम्ऩन्न
करूॊ औय इस दु्ख से छु टकाया ऩाउॊ।
रोभष ऋवष ने कहा फक - हे देवकी! अमोध्माऩुयी का प्रताऩी
याजा नहुष थे। उनकी ऩत्नी न्िभुखी अत्मन्त सुन्दय थीॊ।
उनके नगय भें ववष्णुदत्त नाभ का एक ब्राहभण यहता था।
उसकी स्िी का नाभ रूऩवती था। वह बी अत्मन्त रूऩवती
सुन्दयी थी।
यानी ॊिभुखी तथा रूऩवती भें ऩयस्ऩय घतनष्ठ
प्रेभ था। एक ददन वे दोनों सयमू नदी भें स्नान कयने के सरए
गई। वहाॊ उन्होंने देखा फक अन्म फहुत सी त्स्िमाॊ सयमू नदी भें
स्नान कयके तनभार वस्ि ऩहन कय एक भण्डऩ भें ऩावाती-सशव
की प्रततभा का ववधधऩूवाक ऩूजन फकमा। यानी औय ब्राह्
भणी ने मह देख कय उन त्स्िमों से ऩूछा फक - फहनों! तुभ मह
फकस देवता का औय फकस कायण से ऩूजन व्रत आदद कय यही
हो। मह सुन कय त्स्िमों ने कहा फक हभ "सन्तान सप्तभी" का
व्रत कय यही हैं औय हभने बगवान सशव-ऩावाती का ऩूजन
न्दन अऺत आदद से षोडषोऩ ाय ववधध से घागा फाॊधकय
हभने सॊकल्ऩ फकमा है फक जफ तक जीववत यहेंगी, तफ तक मह
व्रत कयती यहेंगी। मह ऩुण्म व्रत 'भुक्ताबयण व्रत' सुख तथा
सॊतान देने वारा है।
त्स्िमों से "सन्तान सप्तभी" व्रत की कथा सुनकय
यानी औय ब्राहभणी ने बी इस व्रत के कयने का भन ही भन
सॊकल्ऩ फकमा औय सशवजी के नाभ का घागा फाॉध सरमा।
ब्राहभणी इस व्रत को तनमभ ऩूवाक कयती यही फकन्तु घय
ऩहुॉ ने ऩय यानी न्िभुखी कबी व्रत का सॊकल्ऩ को बूर
जाती थी। परत् भृत्मु के ऩश् ात यानी वानयी तथा
ब्राहभणी भुगॉ की मोतन भें ऩैदा हुईं।
काराॊतय भें दोनों ऩशु मोतन छोडकय ऩुन् भनुष्म
मोतन भें आईं। रूऩवती ने एक ब्राहभण के महाॊ कन्मा के रूऩ
भें जन्भ सरमा। इस जन्भ भें यानी का नाभ ईश्वयी तथा
ब्राहभणी का नाभ बूषणा था। बूषणा का वववाह याजऩुयोदहत
अत्ग्नभुखी के साथ हुआ। इस जन्भ भें बी उन दोनों भें फडा
प्रेभ हो गमा।
व्रत के प्रबाव से बूषण देवी अत्मॊत सुन्दय थी उसे
अत्मन्त सुन्दय सवागुण सम्ऩन्न धभावीय, कभातनष्ठ, सुशीर
स्वबाव वारे आठ ऩुि उत्ऩन्न हुए। व्रत बूरने के कायण
यानी इस जन्भ भें बी सॊतान सुख से वॊध त यही।
प्रौढ़ावस्था भें उसने एक गूॊगा फहया फुविहीन अल्ऩ आमु
9 ससतम्फय - 2019
वारा एक ऩुि हुआ, त्जस कायण वह बी नौ वषा का होकय
भय गमा।
यानी के ऩुिशोक की सॊवेदना के सरए एक ददन
बूषणा उससे सभरने गई। ब्राहभणी ने यानी का सॊताऩ दूय
कयने के तनसभत्त अऩने आठों ऩुि यानी के ऩास छोड ददए।
उसे देखते ही यानी के भन भें ईष्माा ऩैदा हुई तथा उसके
भन भें ऩाऩ उत्ऩन्न हुआ। उसने बूषणा को ववदा कयके
उसके ऩुिों को बोजन के सरए फुरामा औय बोजन भें
ववष सभरा ददमा। ऩयन्तु बूषणा के व्रत के प्रबाव से
तथा बगवान शॊकय की कृ ऩा से ऩुिों को कोई हानी नहीॊ
हुई।
इससे यानी को औय बी अधधक क्रोध आमा।
उसने अऩने सेवकों को आऻा दी फक बूषणा के ऩुिों को
ऩूजा के फहाने मभुना के फकनाये रे जाकय गहये जर भें
धके र ददमा जाए। फकन्तु ऩुन् बगवान सशव औय भाता
ऩावाती की कृ ऩा से इस फाय बी बूषणा के फारक व्रत के
प्रबाव से फ गए। फपय यानी ने जल्रादों को फुराकय
आऻा दी फक ब्राहभण फारकों को वध-स्थर ऩय रे
जाकय भाय डारो फकन्तु जल्रादों द्वाया फेहद प्रमास
कयने ऩय बी फारक न भय सके । मह सभा ाय सुनकय
यानी आश् मा फकत हो गई औय इस यहस्म का ऩता रगाने
उसने बूषणा को फुराकय सायी फात फताई औय फपय
ऺभामा ना कयके उससे ऩूछा- फकस कायण तुम्हाये फच् े
नहीॊ भय ऩाए?
बूषणा फोरी- क्मा आऩको ऩूवाजन्भ की फात
स्भयण नहीॊ है? यानी ने आश् मा से कहा- नहीॊ, भुझे तो
कु छ माद नहीॊ है?
तफ उसने कहा- सुनो, ऩूवाजन्भ भें तुभ याजा
नहुष की यानी थी औय भैं तुम्हायी सखी। हभ दोनों ने
एक फाय बगवान सशव का घागा फाॊधकय सॊकल्ऩ फकमा
था फक जीवन-ऩमान्त सॊतान सप्तभी का व्रत कयेंगी।
फकन्तु दुबााग्मवश तुभ सफ बूर गईं औय व्रत की
अवहेरना होने झूठ फोरने का दोष ववसबन्न मोतनमों भें
जन्भ रेती हुई तू आज बी बोग यही है।
भैंने इस व्रत को ऩूणा ववधध-ववधान सदहत तनमभ
ऩूवाक सदैव फकमा औय आज बी कयती हूॊ।
रोभष ऋवष ने कहा- हे देवकी! बूषणा ब्राहभणी के
भुख से अऩने ऩूवा जन्भ की कथा तथा व्रत सॊकल्ऩ इत्मादद
सुनकय यानी को ऩुयानी फातें माद आ गई औय ऩश् ाताऩ कयने
रगी तथा बूषणा ब्राहभणी के यणों भें ऩडकय ऺभा मा ना
कयने रगी औय बगवान शॊकय ऩावाती जी की अऩाय भदहभा के
गीत गाने रगी। मह सफ सुनकय यानी ने बी ववधधऩूवाक
सॊतान सुख देने वारा मह भुक्ताबयण व्रत यखा। तफ
व्रत के प्रबाव से यानी ऩुन् गबावती हुई औय एक सुॊदय
फारक को जन्भ ददमा। उसी सभम से ऩुि-प्रात्प्त औय
सॊतान की यऺा के सरए मह व्रत प्र सरत है।
बगवान शॊकय के व्रत का ऐसा प्रबाव है फक ऩथ भ्रष्ट
भनुष्म बी अऩने ऩथ ऩय अग्रसय हो जाता है औय अनन्त
ऐश्वमा बोगकय भोऺ को प्राप्त कयता है। रोभष ऋवष ने फपय
कहा फक - देवकी! इससरए भैं तुभसे बी कहता हूॊ फक तुभ बी
इस व्रत को कयने का सॊकल्ऩ अऩने भन भें कयो तो तुभको बी
सन्तान सुख सभरेगा। इतनी कथा सुनकय देवकी हाथ जोड
कय रोभष ऋवष से ऩूछने रगी- हे ऋवषयाज! भैं इस ऩुनीत व्रत
को अवश्म करूॊ गी, फकन्तु आऩ इस कल्माणकायी एवॊ सन्तान
सुख देने वारे व्रत का ववधध-ववधान, तनमभ आदद ववस्ताय से
सभझाएॊ।
मह सुनकय ऋवष फोरे- हे देवकी! मह ऩुनीत व्रत बादों
बािऩद के भहीने भें शुक्रऩऺ की सप्तभी के ददन फकमा जाता
है। उस ददन ब्रहभभुहूता भें उठकय फकसी नदी अथवा कु एॊ के
ऩववि जर भें स्नान कयके तनभार वस्ि धायण कयने ादहए।
श्री शॊकय बगवान तथा भाता ऩावाती जी की भूतता की स्थाऩना
कयें। इन प्रततभाओॊ के सम्भुख सोने, ाॊदी के तायों का अथवा
येशभ का एक गॊडा फनावें उस गॊडे भें सात गाॊठें रगानी ादहए।
इस गॊडे को धूऩ, दीऩ, अष्ट गॊध से ऩूजा कयके अऩने हाथ भें
फाॊधे औय बगवान शॊकय से अऩनी काभना सपर होने की
प्राथाना कयें।
तदन्तय सात ऩुआ फनाकय बगवान को बोग रगावें
औय सात ही ऩुवे एवॊ मथाशत्क्त सोने अथवा ाॊदी की अॊगूठी
फनवाकय इन सफको एक ताॊफे के ऩाि भें यखकय औय उनका
शोडषोऩ ाय ववधध से ऩूजन कयके फकसी सदा ायी, धभातनष्ठ,
सुऩाि ब्राहभण को दान देवें। उसके ऩश् ात सात ऩुआ स्वमॊ
प्रसाद के रूऩ भें ग्रहण कयें।
10 ससतम्फय -
2019
इस प्रकाय इस व्रत का ऩायामण कयना ादहए।
प्रततसार बािऩद की शुक्रऩऺ की सप्तभी के ददन, हे देवकी!
इस व्रत को इस प्रकाय तनमभ ऩूवा कयने से सभस्त ऩाऩ नष्ट
होते हैं औय बाग्मशारी सॊतान उत्ऩन्न होती है तथा अन्त भें
सशवरोक की प्रात्प्त होती है।
हे देवकी! भैंने तुभको सन्तान सप्तभी का व्रत सम्ऩूणा
ववधान ववस्ताय सदहत वणान फकमा है। उसको अफ तुभ तनमभ
ऩूवाक कयो, त्जससे तुभको उत्तभ सन्तान उत्ऩन्न होगी।
इतनी कथा कहकय बगवान श्रीकृ ष्ण ने धभाावताय मुधधत्ष्ठय
से कहा फक - रोभष ऋवष इस प्रकाय हभायी भाता देवकी को
सशऺा देकय रे गए। ऋवष के कथनानुसाय हभायी भाता
देवकी ने इस व्रत को तनमभानुसाय फकमा त्जसके प्रबाव से हभ
उत्ऩन्न हुए।
मह व्रत ववशेष रूऩ से त्स्िमों के सरए कल्माणकायी है
ही ऩयन्तु ऩुरुषों को बी सभान रूऩ से कल्माण दामक है।
सन्तान सुख देने वारा तहा ऩाऩों का नाश कयने वारा मह
उत्तभ व्रत है त्जसे स्वमॊ बी कयें तथा दूसयों से बी कयावें। इस
व्रत को तनमभ ऩूवाक कयने से बगवान सशव-ऩावाती कृ ऩा
से तनश् म ही अभयऩद ऩद प्राप्त कयके अन्त भें सशवरोक को
प्राप्त कयता है।
संतान सप्तभी का व्रत ऩूजन:
सॊतान सप्तभी व्रत ऩुि प्रात्प्त, ऩुि यऺा तथा
ऩुि अभ्मुदम के सरए बािऩद के शुक्र ऩऺ की सप्तभी
को फकमा जाता है। इस व्रत का ववधान दोऩहय तक
यहता है। स्िीमाॊ देवी ऩावाती का ऩूजन कयके ऩुि प्रात्प्त
तथा उसके अभ्मुदम का वयदान भाॉगती हैं।
व्रत ववधान:
 प्रात्कार स्नानादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि
धायण कयें। दोऩहय को ौक ऩूय कय ॊदन, अऺत,
धूऩ, दीऩ, नैवेद्य, सुऩायी तथा नारयमर आदद से
सशव-ऩावाती का ऩूजन कयें।
 इस ददन नैवेद्य बोग के सरए खीय-ऩूयी तथा गुड के
ऩुए यखें।
 यऺा के सरए सशवजी को धागा बी अवऩात कयें।
 इस धागे को सशवजी के वयदान के रूऩ भें रेकय
उसे धायण कयके व्रतकथा का श्रवण कयें।
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11 ससतम्फय - 2019
भॊि ससि दुराब साभग्री
कारी हल्दी:- 370, 550, 730, 1450, 1900 कभर गट्टे की भारा - Rs- 370
भामा जार- Rs- 251, 551, 751 हल्दी भारा - Rs- 280
धन वृवि हकीक सेट Rs-280 (कारी हल्दी के साथ Rs-550) तुरसी भारा - Rs- 190, 280, 370, 460
घोडे की नार- Rs.351, 551, 751 नवयत्न भारा- Rs- 1050, 1900, 2800, 3700 & Above
हकीक: 11 नॊग-Rs-190, 21 नॊग Rs-370 नवयॊगी हकीक भारा Rs- 280, 460, 730
रघु श्रीपर: 1 नॊग-Rs-21, 11 नॊग-Rs-190 हकीक भारा (सात यॊग) Rs- 280, 460, 730, 910
नाग के शय: 11 ग्राभ, Rs-145 भूॊगे की भारा Rs- 190, 280, Real -1050, 1900 & Above
स्पदटक भारा- Rs- 235, 280, 460, 730, DC 1050, 1250 ऩायद भारा Rs- 1450, 1900, 2800 & Above
सपे द ॊदन भारा - Rs- 460, 640, 910 वैजमॊती भारा Rs- 190, 280, 460
यक्त (रार) ॊदन - Rs- 370, 550, रुिाऺ भारा: 190, 280, 460, 730, 1050, 1450
भोती भारा- Rs- 460, 730, 1250, 1450 & Above ववधुत भारा - Rs- 190, 280
कासभमा ससॊदूय- Rs- 460, 730, 1050, 1450, & Above भूल्म भें अॊतय छोटे से फडे आकाय के कायण हैं।
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भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि
"श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त
शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय
व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त
के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके दशान भाि से अन-धगनत राब
एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अदिततम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ
को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता
से सफ़रता फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत
है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक
उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से
वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त
होती है। >> Shop Online | Order Now
गुरुत्व कामाथरम भे ववसबन्न आकाय के "श्री मॊि" उप्रब्ध है
भूल्म:- प्रतत ग्राभ Rs. 28.00 से Rs.100.00
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12 ससतम्फय - 2019
सवा कामा ससवि कव
त्जस व्मत्क्त को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के
फादबी उसे भनोवाॊतछत सपरतामे एवॊ फकमे गमे कामा भें
ससवि (राब) प्राप्त नहीॊ होती, उस व्मत्क्त को सवा कामा
ससवि कव अवश्म धायण कयना ादहमे।
कवच के प्रभुख राब: सवा कामा ससवि कव के द्वारा
सुख सभृवि औय नव ग्रहों के नकायात्भक प्रबाव को शाॊत कय
धायण कयता व्मत्क्त के जीवन से सवा प्रकाय के दु:ख-दारयि
का नाश हो कय सुख-सौबाग्म एवॊ उन्नतत प्रात्प्त होकय
जीवन भे ससब प्रकाय के शुब कामा ससि होते हैं। त्जसे धायण
कयने से व्मत्क्त मदद व्मवसाम कयता होतो कायोफाय भे वृवि
होतत हैं औय मदद नौकयी कयता होतो उसभे उन्नतत होती हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें सवथजन वशीकयण कव
के सभरे होने की वजह से धायण कताा की फात का दूसये
व्मत्क्तओ ऩय प्रबाव फना यहता हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें अष्ट रक्ष्भी कव के
सभरे होने की वजह से व्मत्क्त ऩय सदा भाॊ भहा रक्ष्भी
की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना यहता हैं। त्जस्से भाॊ रक्ष्भी
के अष्ट रुऩ (१)-आदद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)- धैमा रक्ष्भी, (४)-गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)-
ववजम रक्ष्भी, (७)-ववद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी रुऩो का अशीवााद प्राप्त होता हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें तंत्र यऺा कव के सभरे होने की वजह से ताॊत्रिक फाधाए दूय होती हैं,
साथ ही नकायात्भक शत्क्तमो का कोइ कु प्रबाव धायण कताा व्मत्क्त ऩय नहीॊ होता। इस कव के प्रबाव
से इषाा-द्वेष यखने वारे व्मत्क्तओ द्वारा होने वारे दुष्ट प्रबावो से यऺा होती हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें शत्रु ववजम कव के सभरे होने की वजह से शिु से सॊफॊधधत सभस्त
ऩयेशातनओ से स्वत् ही छु टकाया सभर जाता हैं। कव के प्रबाव से शिु धायण कताा व्मत्क्त का ाहकय
कु छ नही त्रफगाड सकते।
अन्म कव के फाये भे अधधक जानकायी के सरमे कामाारम भें सॊऩका कये:
फकसी व्मत्क्त ववशेष को सवा कामा ससवि कव देने नही देना का अॊततभ तनणाम हभाये ऩास सुयक्षऺत हैं।
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13 ससतम्फय - 2019
भोऺप्रदा
ऩद्मा
एकादशी
ऩद्मा (ऩरयवततानी) एकादशी व्रत 09-ससतम्फय-2019 ( वाय)
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
ऩद्मा (ऩरयवतानी) एकादशी व्रत कथा
बाद्रऩद : शुक्र एकादशी
एक फाय मुधधत्ष्ठय बगवान श्रीकृ ष्ण से ऩूछते हैं,
हे बगवान! बािऩद शुक्र एकादशी का क्मा नाभ है?
इसभें फकस देवता की ऩूजा की जाती है औय इसका व्रत
कयने से क्मा पर सभरता है ?" व्रत कयने की ववधध
तथा इसका भाहात्म्म कृ ऩा कयके कदहए। बगवान
श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक इस एकादशी का नाभ ऩद्मा
(ऩरयवततथनी) एकादशी तथा इसे वाभन एकादशी से बी
जाना जाता है। अफ आऩ शाॊततऩूवाक इस व्रतकी कथा
सुतनए। इसका मऻ कयने से ही वाजऩेमी
मऻ / अनन्त मऻ का पर सभरता है।
इस ऩुण्म, स्वगा औय भोऺ को देने
वारी तथा सफ ऩाऩों का नाश कयने
वारी, उत्तभ एकादशी का
भाहात्म्म भैं तुभसे कहता हूॉ तुभ
ध्मानऩूवाक सुनो। जो भनुष्म
ऩाऩनाशक इस कथा को ऩढ़ते मा
सुनते हैं, उनको हजाय अश्वभेध मऻ
के सभान पर प्राप्त होता है।
ऩावऩमों के ऩाऩ नाश कयने के सरए इससे फढ़कय
औय कोई सयर उऩाम नहीॊ। जो भनुष्म इस एकादशी के
ददन भेये वाभन रूऩ की ऩूजा कयता है, उससे तीनों
रोक ऩूज्म होते हैं। अत: भोऺ की इच्छा कयने वारे
भनुष्म को इस व्रत को अवश्म कयना ादहए।
जो वाभन बगवान का कभर से ऩूजन कयते हैं, वे
अवश्म उनके के सभीऩ जाते हैं। त्जस भनुष्म ने
बािऩद शुक्र एकादशी को व्रत औय ऩूजन फकमा, उसने
ब्रहभा, ववष्णु सदहत तीनों रोकों के ऩूजन के सभान
पर की प्रात्प्त होती हैं। अत: एकादशी का व्रत अवश्म
कयना ादहए। इस ददन बगवान एक ओय से दूसयी ओय
कयवट रेते हैं, इससरए इसको ऩरयवततानी एकादशी कहते
हैं।
बगवान के व न सुनकय मुधधत्ष्ठय फोरे फक
बगवान! भुझे अततउत्सुकता हो यही है फक आऩ फकस
प्रकाय सोते औय कयवट रेते हैं तथा फकस तयह याजा
फसर को फाॉधा औय वाभन रूऩ यखकय क्मा-क्मा रीराएॉ
कीॊ? ातुभाास के व्रत की क्मा ववधध है तथा आऩके
शमन कयने ऩय भनुष्म का क्मा कताव्म है। वह सफ
आऩ भुझसे ववस्ताय से फताइए।
श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक हे याजन! अफ आऩ सफ
ऩाऩों को नष्ट कयने वारी कथा का श्रवण कयें।
िेतामुग भें "फसर" नाभक एक दैत्म था। वह भेया ऩयभ
बक्त था। ववववध प्रकाय के वेद सूक्तों से
भेया ऩूजन फकमा कयता था औय तनत्म
ही ब्राहभणों का ऩूजन तथा मऻ का
आमोजन कयता था, रेफकन इॊि से
द्वेष के कायण उसने इॊिरोक तथा
सबी देवताओॊ को जीत सरमा।
इस कायण सबी देवता एकि
होकय सो -वव ायकय भेये ऩास आए।
फृहस्ऩतत सदहत इॊिाददक देवता भेये के
तनकट आकय औय नतभस्तक होकय वेद
भॊिों द्वाया भेया ऩूजन औय स्तुतत कयने रगे। अत:
देवताओॊ के आग्रह ऩय भैंने वाभन रूऩ धायण कयके
ऩाॉ वाॉ अवताय सरमा औय फपय अत्मॊत तेजस्वी रूऩ से
याजा फसर को जीत सरमा।
इतनी वाताा सुनकय याजा मुधधत्ष्ठय फोरे फक हे
बगवान! आऩने वाभन रूऩ धायण कयके उस भहाफरी
दैत्म को फकस प्रकाय जीता? श्रीकृ ष्ण कहने रगे- भैंने
वाभन रूऩधायण कय फसर से तीन ऩग बूसभ की मा ना
कयते हुए कहा "मे भुझको तीन रोक के सभान है" औय
हे याजन मह तुभको अवश्म ही देनी होगी। इससे तुम्हें
तीन रोक दान का पर प्राप्त होगा"।
याजा फसर ने इसे तुच्छ मा ना सभझकय तीन
ऩग बूसभ का सॊकल्ऩ भुझको दे ददमा औय भैंने अऩने
14 ससतम्फय - 2019
त्रिववक्रभ रूऩ को फढ़ाकय महाॉ तक फक बूरोक भें ऩद,
बुवरोक भें जॊघा, स्वगारोक भें कभय, भह:रोक भें ऩेट,
जनरोक भें रृदम, मभरोक भें कॊ ठ की स्थाऩना कय
सत्मरोक भें भुख, उसके ऊऩय भस्तक स्थावऩत फकमा।
सूमा, ॊिभा आदद सफ ग्रह गण, मोग, नऺि,
इॊिाददक देवता औय शेष आदद सफ नागगणों ने ववववध
प्रकाय से वेद सूक्तों से प्राथाना की। तफ भैंने याजा फसर
का हाथ ऩकडकय कहा फक हे याजन! एक ऩद से ऩृथ्वी,
दूसये से स्वगारोक ऩूणा हो गए। अफ तीसया ऩग कहाॉ
यखूॉ?
तफ फसर ने अऩना ससय झुका कय अनुयोध फकमा
प्रबु आऩ के ऩद भेये ससय ऩय यख दीत्जए औय भैंने
अऩना ऩैय उसके भस्तक ऩय यख ददमा त्जससे भेया वह
बक्त ऩातार को रा गमा।
ऩातार रोक भें याजा फसर ने ववनीत की तो
बगवान ववष्णु ने कहा की- भैं तुम्हाये ऩास सदैव यहूॉगा।
बादो भास के शुक्र ऩऺ की 'ऩरयवतानी' नाभ की
एकादशी के ददन भैं एक रूऩ से याजा फसर के ऩास
यहूॉगा औय एक रूऩ से ऺीयसागय भें शेषनाग ऩय शमन
कयता यहूॉगा।" इस एकादशी के ददन बगवान ववष्णु सोते
हुए कयवट फदरते हैं। इस ददन त्रिरोक के नाथ ववष्णु
बगवान की ऩूजा की जाती है। वाभन एकादशी के ददन
चावर औय दही सदहत चांदी का दान कयने का ववशेष
ववधध-ववधान है। यात्रि को जागयण अवश्म कयना ादहए।
ऩौयाणणक भान्मता के अनुशाय जो भनुष्म
ववधधऩूवाक इस एकादशी का व्रत को कयते हैं, वे सफ
ऩाऩों से भुक्त होकय स्वगा भें जाकय ॊिभा के सभान
प्रकासशत होते हैं औय मश को प्राप्त कयते हैं।
***
कनकधाया मॊि
आज के बौततक मुग भें हय व्मत्क्त अततशीघ्र सभृि फनना ाहता हैं। कनकधाया
मॊि फक ऩूजा अ ाना कयने से व्मत्क्त के जन्भों जन्भ के ऋण औय दरयिता से शीघ्र
भुत्क्त सभरती हैं। मॊि के प्रबाव से व्माऩाय भें उन्नतत होती हैं, फेयोजगाय को
योजगाय प्रात्प्त होती हैं। कनकधाया मॊि अत्मॊत दुराब मॊिो भें से एक मॊि हैं त्जसे
भाॊ रक्ष्भी फक प्रात्प्त हेतु अ ूक प्रबावा शारी भाना गमा हैं। कनकधाया मॊि को
ववद्वानो ने स्वमॊससि तथा सबी प्रकाय के ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा भाना हैं।
आज के मुग भें हय व्मत्क्त अततशीघ्र सभृि फनना ाहता हैं। धन प्रात्प्त हेतु प्राण-प्रततत्ष्ठत कनकधाया मॊि के
साभने फैठकय कनकधाया स्तोि का ऩाठ कयने से ववशेष राब प्राप्त होता हैं। इस कनकधाया मॊि फक ऩूजा अ ाना
कयने से ऋण औय दरयिता से शीघ्र भुत्क्त सभरती हैं। व्माऩाय भें उन्नतत होती हैं, फेयोजगाय को योजगाय प्रात्प्त
होती हैं। जैसे श्री आदद शॊकया ामा द्वारा कनकधाया स्तोि फक य ना कु छ इस प्रकाय की गई हैं, फक त्जसके श्रवण
एवॊ ऩठन कयने से आस-ऩास के वामुभॊडर भें ववशेष अरौफकक ददव्म उजाा उत्ऩन्न होती हैं। दठक उसी प्रकाय से
कनकधाया मॊि अत्मॊत दुराब मॊिो भें से एक मॊि हैं त्जसे भाॊ रक्ष्भी फक प्रात्प्त हेतु अ ूक प्रबावा शारी भाना गमा
हैं। कनकधाया मॊि को ववद्वानो ने स्वमॊससि तथा सबी प्रकाय के ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा भाना हैं। जगद्गुरु
शॊकया ामा ने दरयि ब्राहभण के घय कनकधाया स्तोि के ऩाठ से स्वणा वषाा कयाने का उल्रेख ग्रॊथ शॊकय ददत्ग्वजम
भें सभरता हैं। कनकधाया भॊि:- ॐ वॊ श्रीॊ वॊ ऐॊ ह्ीॊ-श्रीॊ क्रीॊ कनक धायमै स्वाहा'
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15 ससतम्फय - 2019
इॊददया
एकादशी
इॊददया एकादशी व्रत 25-ससतम्फय-2019 ( वाय)
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
इॊददया एकादशी व्रत कथा
आश्ववन : कृ ष्ण एकादशी
एक फाय मुधधत्ष्ठय बगवान श्रीकृ ष्ण से ऩूछते हैं,
हे बगवान! आत्श्वन कृ ष्ण एकादशी का क्मा नाभ है?
इसभें फकस देवता की ऩूजा की जाती है औय इसका व्रत
कयने से क्मा पर सभरता है ?" व्रत कयने की ववधध
तथा इसका भाहात्म्म कृ ऩा कयके कदहए। बगवान
श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक इस एकादशी का नाभ इंददया
एकादशी है। मह एकादशी ऩाऩों को नष्ट कयने वारी
तथा वऩतयों को अधोगतत से भुत्क्त देने वारी होती है।
हे याजन! ध्मानऩूवाक इसकी कथा सुनो। इसके
सुनने भाि से ही वामऩेम मऻ का पर
सभरता है।
प्रा ीनकार भें सतमुग के
सभम भें भदहष्भतत नाभ की एक
नगयी भें इॊिसेन नाभ का एक
प्रताऩी याजा धभाऩूवाक अऩनी प्रजा
का ऩारन कयते हुए शासन कयता
था। वह याजा ऩुि, ऩौि औय धन
आदद से सॊऩन्न औय ववष्णु का ऩयभ
बक्त था। एक ददन जफ याजा सुखऩूवाक
अऩनी सबा भें फैठा था तो आकाश भागा से भहवषा नायद
उतयकय उसकी सबा भें ऩधाये। याजा उन्हें देखते ही हाथ
जोडकय खडा हो गमा औय ववधधऩूवाक आसन व अघ्मा
ददमा।
आनॊद ऩूवाक फैठकय नायदजी ने याजा से ऩूछा
फक हे याजन! आऩके सातों अॊग कु शरऩूवाक तो हैं?
तुम्हायी फुवि धभा भें औय तुम्हाया भन ववष्णु बत्क्त भें
तो यहता है? देववषा नायद की ऐसी फातें सुनकय याजा ने
कहा- हे भहवषा! आऩकी कृ ऩा से भेये याज्म भें सफ
कु शर-भॊगर है तथा भेये महाॉ मऻ कभाादद सुकृ त हो यहे
हैं। आऩ कृ ऩा कयके अऩने आगभन का कायण फताए।
तफ ऋवष कहने रगे फक हे याजन! आऩ आश् मा
देने वारे भेये व नों को सुनो।
भैं एक सभम ब्रहभरोक से
मभरोक को गमा, वहाॉ श्रिाऩूवाक
मभयाज से ऩूत्जत होकय भैंने
धभाशीर औय सत्मवान धभायाज की
प्रशॊसा की। उसी मभयाज की सबा
भें भहान ऻानी औय धभाात्भा
तुम्हाये वऩता को एकादशी का व्रत
बॊग होने के कायण देखा। उन्होंने सॊदेशा
बेजा हैं, जो भैं तुम्हें कहता हूॉ। उन्होंने कहा
फक ऩूवा जन्भ भें कोई ववघ्न हो जाने के कायण भैं
श्री भहारक्ष्भी मंत्र
धन फक देवी रक्ष्भी हैं जो भनुष्म को धन, सभृवि एवॊ ऐश्वमा प्रदान कयती हैं। अथा(धन) के त्रफना भनुष्म जीवन
दु्ख, दरयिता, योग, अबावों से ऩीडडत होता हैं, औय अथा(धन) से मुक्त भनुष्म जीवन भें सभस्त सुख-सुववधाएॊ
बोगता हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के ऩूजन से भनुष्म की जन्भों जन्भ की दरयिता का नाश होकय, धन प्रात्प्त के प्रफर
मोग फनने रगते हैं, उसे धन-धान्म औय रक्ष्भी की वृवि होती हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के तनमसभत ऩूजन एवॊ दशान
से धन की प्रात्प्त होती है औय मॊि जी तनमसभत उऩासना से देवी रक्ष्भी का स्थाई तनवास होता है। श्री भहारक्ष्भी
मॊि भनुष्म फक सबी बौततक काभनाओॊ को ऩूणा कय धन ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा हैं। अऺम तृतीमा, धनतेयस,
दीवावरी, गुरु ऩुष्माभृत मोग यववऩुष्म इत्मादद शुब भुहूता भें मॊि की स्थाऩना एवॊ ऩूजन का ववशेष भहत्व हैं।
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16 ससतम्फय - 2019
मभयाज के तनकट यह यहा हूॉ, सो हे ऩुि मदद तुभ
आत्श्वन कृ ष्णा इॊददया एकादशी का व्रत भेये तनसभत्त
कयो तो भुझे स्वगा की प्रात्प्त हो सकती है।
इतना सुनकय याजा कहने रगा फक हे भहवषा
आऩ इस व्रत की ववधध भुझसे कदहए। नायदजी कहने
रगे- आत्श्वन भाह की कृ ष्ण ऩऺ की दशभी के ददन
प्रात:कार स्नानादद से तनवृत्त होकय ऩुन: दोऩहय को
नदी आदद भें जाकय स्नान कयें।
फपय श्रिाऩूवा वऩतयों का श्राि कयें औय एक फाय
बोजन ग्रहण कयें। प्रात:कार होने ऩय एकादशी के ददन
दातून आदद कयके स्नान कयें, फपय व्रत के तनमभों को
बत्क्तऩूवाक ग्रहण कयता हुआ प्रततऻा कयें फक ‘भैं आज
सॊऩूणा बोगों को त्माग कय तनयाहाय एकादशी का व्रत
करूॉ गा।
हे प्रबु! हे ऩुॊडयीकाऺ! भैं आऩकी शयण हूॉ, आऩ
भेयी यऺा कीत्जए, इस प्रकाय तनमभऩूवाक शासरग्राभ की
भूतता के आगे ववधधऩूवाक श्राि कयके मोग्म ब्राहभणों को
पराहाय का बोजन कयाएॉ औय दक्षऺणा दें। वऩतयों के
श्राि से जो फ जाए उसको सूॉघकय गौ को दें तथा
धूऩ, दीऩ, गॊध, ऩुष्ऩ, नैवेद्य आदद सफ साभग्री से
ऋवषके श बगवान का ऩूजन कयें।
यात भें बगवान के तनकट जागयण कयें। इसके
ऩश् ात द्वादशी के ददन प्रात:कार होने ऩय बगवान का
ऩूजन कयके ब्राहभणों को बोजन कयाएॉ। बाई-फॊधुओॊ,
स्िी औय ऩुि सदहत आऩ बी भौन होकय बोजन कयें।
नायदजी कहने रगे फक हे याजन! इस ववधध से मदद तुभ
आरस्म यदहत होकय इस एकादशी का व्रत कयोगे तो
तुम्हाये वऩता अवश्म ही स्वगारोक को जाएॉगे। इतना
कहकय नायदजी अॊतध्माान हो गए।
नायदजी के कथनानुसाय याजा द्वाया अऩने फाॉधवों
तथा दासों सदहत व्रत कयने से आकाश से ऩुष्ऩवषाा हुई
औय उस याजा का वऩता गरुड ऩय ढ़कय ववष्णुरोक को
गमा। याजा इॊिसेन बी एकादशी के व्रत के प्रबाव से
तनष्कॊ टक याज्म कयके अॊत भें अऩने ऩुि को ससॊहासन
ऩय फैठाकय स्वगारोक को गमा।
हे मुधधत्ष्ठय! मह इॊददया एकादशी के व्रत का
भाहात्म्म भैंने तुभसे कहा। इसके ऩढ़ने औय सुनने से
भनुष्म सफ ऩाऩों से छू ट जाते हैं औय सफ प्रकाय के
बोगों को बोगकय फैकुॊ ठ को प्राप्त होते हैं।
***
भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि
"श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो
न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-
प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके
दशान भाि से अन-धगनत राब एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अद्ववतीम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब
इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता
फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न
होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से
घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत
एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त होती है।
गुरुत्व कामाथरम भे "श्री मॊि" 12 ग्राभ से 2250 Gram (2.25Kg) तक फक साइज भे उप्रब्ध है
.
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17 ससतम्फय - 2019
दहन्दू देवताओॊ भें सवाप्रथभ ऩूजनीम श्री गणेशजी
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
बायतीम सॊस्कृ तत भें प्रत्मेक शुबकामा कयने के
ऩूवा बगवान श्री गणेश जी की ऩूजा की जाती हैं इसी
सरमे मे फकसी बी कामा का शुबायॊब कयने से ऩूवा कामा
का "श्री गणेश कयना" कहा जाता हैं। एवॊ प्रत्मक शुब
कामा मा अनुष्ठान कयने के ऩूवा
‘‘श्री गणेशाम नभ्” का
उच् ायण फकमा जाता हैं।
गणेश को सभस्त
ससविमों को देने वारा
भाना गमा है। सायी
ससविमाॉ गणेश भें
वास कयती हैं।
इसके ऩीछे
भुख्म कायण हैं की
बगवान श्री गणेश सभस्त
ववघ्नों को टारने वारे हैं, दमा एवॊ कृ ऩा के
अतत सुॊदय भहासागय हैं, एवॊ तीनो रोक के कल्माण हेतु
बगवान गणऩतत सफ प्रकाय से मोग्म हैं। सभस्त ववघ्न
फाधाओॊ को दूय कयने वारे गणेश ववनामक हैं। गणेशजी
ववद्या-फुवि के अथाह सागय एवॊ ववधाता हैं।
बगवान गणेश को सवथ प्रथभ ऩूजे जाने के
ववषम भें कु छ ववशेष रोक कथा प्रचसरत हैं। इन ववशेष
एवं रोकवप्रम कथाओं का वणथन महा कय यहें हैं।
इस के सॊदबा भें एक कथा है फक भहवषा वेद व्मास ने
भहाबायत को से फोरकय सरखवामा था, त्जसे स्वमॊ
गणेशजी ने सरखा था। अन्म कोई बी इस ग्रॊथ को तीव्रता से
सरखने भें सभथा नहीॊ था।
सवथप्रथभ कौन ऩूजनीम हो?
कथा इस प्रकाय हैं : तीनो रोक भें सवाप्रथभ कौन ऩूजनीम
हो?, इस फात को रेकय सभस्त देवताओॊ भें वववाद खडा हो
गमा। जफ इस वववादने फडा रुऩ धायण कय सरमे तफ
सबी देवता अऩने-अऩने फर फुविअ के फर ऩय दावे
प्रस्तुत कयने रगे। कोई ऩयीणाभ
नहीॊ आता देख सफ देवताओॊ ने
तनणाम सरमा फक रकय
बगवान श्री ववष्णु को
तनणाामक फना कय
उनसे पै सरा कयवामा
जाम।
सबी देव गण
ववष्णु रोक भे
उऩत्स्थत हो गमे, बगवान
ववष्णु ने इस भुद्दे को गॊबीय होते
देख श्री ववष्णु ने सबी देवताओॊ को अऩने
साथ रेकय सशवरोक भें ऩहु गमे। सशवजी ने कहा
इसका सही तनदान सृत्ष्टकताा ब्रहभाजी दह फताएॊगे।
सशवजी श्री ववष्णु एवॊ अन्म देवताओॊ के साथ सभरकय
ब्रहभरोक ऩहु ें औय ब्रहभाजी को सायी फाते ववस्ताय से
फताकय उनसे पै सरा कयने का अनुयोध फकमा। ब्रहभाजी
ने कहा प्रथभ ऩूजनीम वहीॊ होगा जो जो ऩूये ब्रहभाण्ड के
तीन क्कय रगाकय सवाप्रथभ रौटेगा।
सभस्त देवता ब्रहभाण्ड का क्कय रगाने के सरए
अऩने अऩने वाहनों ऩय सवाय होकय तनकर ऩडे। रेफकन,
गणेशजी का वाहन भूषक था। बरा भूषक ऩय सवाय हो गणेश
कै से ब्रहभाण्ड के तीन क्कय रगाकय सवाप्रथभ रौटकय
सपर होते। रेफकन गणऩतत ऩयभ ववद्या-फुविभान एवॊ तुय
थे।
18 ससतम्फय - 2019
गणऩतत ने अऩने वाहन भूषक ऩय सवाय हो कय
अऩने भाता-वऩत फक तीन प्रदक्षऺणा ऩूयी की औय जा ऩहुॉ े
तनणाामक ब्रहभाजी के ऩास। ब्रहभाजी ने जफ ऩूछा फक वे क्मों
नहीॊ गए ब्रहभाण्ड के क्कय ऩूये कयने, तो गजाननजी ने
जवाफ ददमा फक भाता-वऩत भें तीनों रोक, सभस्त ब्रहभाण्ड,
सभस्त तीथा, सभस्त देव औय सभस्त ऩुण्म ववद्यभान होते
हैं।
अत् जफ भैंने अऩने भाता-वऩत
की ऩरयक्रभा ऩूयी कय री, तो इसका
तात्ऩमा है फक भैंने ऩूये ब्रहभाण्ड की
प्रदक्षऺणा ऩूयी कय री। उनकी मह
तका सॊगत मुत्क्त स्वीकाय कय री गई औय
इस तयह वे सबी रोक भें सवाभान्म
'सवाप्रथभ ऩूज्म' भाने गए।
सरंगऩुयाण के अनुसाय (105।
15-27) – एक फाय असुयों से िस्त
देवतागणों द्वाया की गई प्राथाना से
बगवान सशव ने सुय-सभुदाम को
असबष्ट वय देकय आश्वस्त फकमा।
कु छ ही सभम के ऩश् ात तीनो रोक
के देवाधधदेव भहादेव बगवान सशव का
भाता ऩावाती के सम्भुख ऩयब्रहभ
स्वरूऩ
गणेश जी का प्राकट्म हुआ।
सवाववघ्नेश भोदक वप्रम गणऩततजी का
जातकभाादद सॊस्काय के ऩश् ात ्
बगवान सशव ने अऩने ऩुि को उसका
कताव्म सभझाते हुए आशीवााद ददमा
फक जो तुम्हायी ऩूजा फकमे त्रफना ऩूजा
ऩाठ, अनुष्ठान इत्मादद शुब कभों का
अनुष्ठान कयेगा, उसका भॊगर बी
अभॊगर भें ऩरयणत हो जामेगा। जो
रोग पर की काभना से ब्रहभा, ववष्णु,
इन्ि अथवा अन्म देवताओॊ की बी
ऩूजा कयेंगे, फकन्तु तुम्हायी ऩूजा नहीॊ
कयेंगे, उन्हें तुभ ववघ्नों द्वाया फाधा ऩहुॉ ाओगे।
जन्भ की कथा बी फड़ी योचक है।
गणेशजी की ऩौयाणणक कथा
बगवान सशव फक अन उऩत्स्थतत भें भाता ऩावाती
ने वव ाय फकमा फक उनका स्वमॊ का एक सेवक होना
ादहमे, जो ऩयभ शुब, कामाकु शर तथा उनकी आऻा का
सतत ऩारन कयने भें कबी वव सरत न हो। इस प्रकाय
सो कय भाता ऩावाती नें अऩने
भॊगरभम ऩावनतभ शयीय के भैर से
अऩनी भामा शत्क्त से फार गणेश
को उत्ऩन्न फकमा।
एक सभम जफ भाता ऩावाती
भानसयोवय भें स्नान कय यही थी
तफ उन्होंने स्नान स्थर ऩय कोई आ
न सके इस हेतु अऩनी भामा से
गणेश को जन्भ देकय 'फार गणेश'
को ऩहया देने के सरए तनमुक्त कय
ददमा।
इसी दौयान बगवान सशव
उधय आ जाते हैं। गणेशजी सशवजी
को योक कय कहते हैं फक आऩ उधय
नहीॊ जा सकते हैं। मह सुनकय
बगवान सशव क्रोधधत हो जाते हैं औय
गणेश जी को यास्ते से हटने का
कहते हैं फकॊ तु गणेश जी अडे यहते हैं
तफ दोनों भें मुि हो जाता है। मुि
के दौयान क्रोधधत होकय सशवजी फार
गणेश का ससय धड से अरग कय
देते हैं। सशव के इस कृ त्म का जफ
ऩावाती को ऩता रता है तो वे
ववराऩ औय क्रोध से प्ररम का सृजन
कयते हुए कहती है फक तुभने भेये ऩुि
को भाय डारा।
ऩावातीजी के दु्ख को देखकय
सशवजी ने उऩत्स्थत गणको आदेश
देते हुवे कहा सफसे ऩहरा जीव सभरे,
उसका ससय काटकय इस फारक के धड
भॊि ससि ऩन्ना गणेश
बगवान श्री गणेश फुवि औय सशऺा के
कायक ग्रह फुध के अधधऩतत देवता
हैं। ऩन्ना गणेश फुध के सकायात्भक
प्रबाव को फठाता हैं एवॊ नकायात्भक
प्रबाव को कभ कयता हैं।. ऩन्न
गणेश के प्रबाव से व्माऩाय औय धन
भें वृवि भें वृवि होती हैं। फच् ो फक
ऩढाई हेतु बी ववशेष पर प्रद हैं
ऩन्ना गणेश इस के प्रबाव से फच् े
फक फुवि कू शाग्र होकय उसके
आत्भववश्वास भें बी ववशेष वृवि
होती हैं। भानससक अशाॊतत को कभ
कयने भें भदद कयता हैं, व्मत्क्त
द्वाया अवशोवषत हयी ववफकयण शाॊती
प्रदान कयती हैं, व्मत्क्त के शायीय के
तॊि को तनमॊत्रित कयती हैं। त्जगय,
पे पडे, जीब, भत्स्तष्क औय तॊत्रिका तॊि
इत्मादद योग भें सहामक होते हैं।
कीभती ऩत्थय भयगज के फने होते हैं।
Rs.550 से Rs.8200 तक
19 ससतम्फय - 2019
ई- जन्भ ऩत्रिका E HOROSCOPE
अत्माधुतनक ज्मोततष ऩितत द्वाया
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ऩय रगा दो, तो मह फारक जीववत हो उठेगा। सेवको को
सफसे ऩहरे हाथी का एक फच् ा सभरा। उन्होंने उसका ससय
राकय फारक के धड ऩय रगा ददमा, फारक जीववत हो उठा।
उस अवसय ऩय तीनो देवताओॊ ने उन्हें सबी
रोक भें अग्रऩूज्मता का वय प्रदान फकमा औय उन्हें सवा
अध्मऺ ऩद ऩय ववयाजभान फकमा।
स्कं द ऩुयाण ब्रह्भवैवतथऩुयाण के अनुसाय (गणऩततखण्ड)
–
सशव-ऩावाती के वववाह होने के फाद उनकी कोई
सॊतान नहीॊ हुई, तो सशवजी ने ऩावातीजी से बगवान
ववष्णु के शुबपरप्रद ‘ऩुण्मक’ व्रत कयने को कहा ऩावाती
के ‘ऩुण्मक’ व्रत से बगवान ववष्णु ने प्रसन्न हो कय
ऩावातीजी को ऩुि प्रात्प्त का वयदान ददमा। ‘ऩुण्मक’ व्रत
के प्रबाव से ऩावातीजी को एक ऩुि उत्ऩन्न हुवा।
ऩुि जन्भ फक फात सुन कय सबी देव, ऋवष,
गॊधवा आदद सफ गण फारक के दशान हेतु ऩधाये। इन
देव गणो भें शतन भहायाज बी उऩत्स्थत हुवे। फकन्तु
शतनदेव ने ऩत्नी द्वाया ददमे गमे शाऩ के कायण फारक
का दशान नहीॊ फकमा। ऩयन्तु भाता ऩावाती के फाय-फाय
कहने ऩय शतनदेव नें जेसे दह अऩनी ित्ष्ट सशशु फारके
उऩय ऩडी, उसी ऺण फारक गणेश का गदान धड से
अरग हो गमा। भाता ऩावाती के ववरऩ कयने ऩय
बगवान ् ववष्णु ऩुष्ऩबिा नदी के अयण्म से एक गजसशशु
का भस्तक काटकय रामे औय गणेशजी के भस्तक ऩय
रगा ददमा। गजभुख रगे होने के कायण कोई गणेश फक
उऩेऺा न कये इस सरमे बगवान ववष्णु अन्म देवताओॊ
के साथ भें तम फकम फक गणेश सबी भाॊगरीक कामो भें
अग्रणीम ऩूजे जामेंगे एवॊ उनके ऩूजन के त्रफना कोई बी
देवता ऩूजा ग्रहण नहीॊ कयेंगे।
इस ऩय बगवान ् ववष्णु ने श्रेष्ठतभ उऩहायों से
बगवान गजानन फक ऩूजा फक औय वयदान ददमा फक
सवााग्रे तव ऩूजा भमा दत्ता सुयोत्तभ।
सवाऩूज्मश् मोगीन्िो बव वत्सेत्मुवा तभ्।।
(गणऩततखॊ. 13। 2)
बावाथथ: ‘सुयश्रेष्ठ! भैंने सफसे ऩहरे तुम्हायी ऩूजा फक है,
अत् वत्स! तुभ सवाऩूज्म तथा मोगीन्ि हो जाओ।’
20 ससतम्फय - 2019
धन वृवि डडब्फी
धन वृवि डडब्फी को अऩनी अरभायी, कै श फोक्स, ऩूजा स्थान भें यखने से धन वृवि होती हैं त्जसभें कारी
हल्दी, रार- ऩीरा-सपे द रक्ष्भी कायक हकीक (अकीक), रक्ष्भी कायक स्पदटक यत्न, 3 ऩीरी कौडी, 3
सपे द कौडी, गोभती क्र, सपे द गुॊजा, यक्त गुॊजा, कारी गुॊजा, इॊि जार, भामा जार, इत्मादी दुराब
वस्तुओॊ को शुब भहुता भें तेजस्वी भॊि द्वाया असबभॊत्रित फकम जाता हैं।
भूल्म भाि Rs-730 >> Order Now
ब्रह्भवैवतथ ऩुयाण भें ही एक अन्म प्रसॊगान्तगात
ऩुिवत्सरा ऩावाती ने गणेश भदहभा का फखान कयते हुए
ऩयशुयाभ से कहा –
त्वद्वद्वधॊ रऺकोदटॊ हन्तुॊ शक्तो गणेश्वय्।
त्जतेत्न्िमाणाॊ प्रवयो नदह हत्न्त भक्षऺकाभ्।।
तेजसा कृ ष्णतुल्मोऽमॊ कृ ष्णाॊश् गणेश्वय्।
देवाश् ान्मे कृ ष्णकरा् ऩूजास्म ऩुयतस्तत्।।
(ब्रहभवैवताऩु., गणऩततख., 44। 26-27)
बावाथथ: त्जतेत्न्िम ऩुरूषों भें श्रेष्ठ गणेश तुभभें जैसे
राखों-कयोडों जन्तुओॊ को भाय डारने की शत्क्त है;
ऩयन्तु तुभने भक्खी ऩय बी हाथ नहीॊ उठामा। श्रीकृ ष्ण
के अॊश से उत्ऩन्न हुआ वह गणेश तेज भें श्रीकृ ष्ण के
ही सभान है। अन्म देवता श्रीकृ ष्ण की कराएॉ हैं। इसीसे
इसकी अग्रऩूजा होती है।
शास्त्रीम भतसे
शास्िोभें ऩॊ देवों की उऩासना कयने का ववधान हैं।
आददत्मॊ गणनाथॊ देवीॊ रूिॊ के शवभ्।
ऩॊ दैवतसभत्मुक्तॊ सवाकभासु ऩूजमेत्।। (शब्दकल्ऩिुभ)
बावाथथ: - ऩॊ देवों फक उऩासना का ब्रहभाॊड के ऩॊ बूतों
के साथ सॊफॊध है। ऩॊ बूत ऩृथ्वी, जर, तेज, वामु औय
आकाश से फनते हैं। औय ऩॊ बूत के आधधऩत्म के
कायण से आददत्म, गणनाथ(गणेश), देवी, रूि औय के शव
मे ऩॊ देव बी ऩूजनीम हैं। हय एक तत्त्व का हय एक
देवता स्वाभी हैं-
आकाशस्माधधऩो ववष्णुयग्नेश् ैव भहेश्वयी।
वामो् सूमा् क्षऺतेयीशो जीवनस्म गणाधधऩ्।।
बावाथथ:- क्रभ इस प्रकाय हैं भहाबूत अधधऩतत
1. क्षऺतत (ऩृथ्वी) सशव
2. अऩ् (जर) गणेश
3. तेज (अत्ग्न) शत्क्त (भहेश्वयी)
4. भरूत ् (वामु) सूमा (अत्ग्न)
5. व्मोभ (आकाश) ववष्णु
बगवान ् श्रीसशव ऩृथ्वी तत्त्व के अधधऩतत होने
के कायण उनकी सशवसरॊग के रुऩ भें ऩाधथाव-ऩूजा का
ववधान हैं। बगवान ् ववष्णु के आकाश तत्त्व के अधधऩतत
होने के कायण उनकी शब्दों द्वाया स्तुतत कयने का
ववधान हैं। बगवती देवी के अत्ग्न तत्त्व का अधधऩतत
होने के कायण उनका अत्ग्नकु ण्ड भें हवनादद के द्वाया
ऩूजा कयने का ववधान हैं। श्रीगणेश के जरतत्त्व के
अधधऩतत होने के कायण उनकी सवाप्रथभ ऩूजा कयने का
ववधान हैं, क्मोंफक ब्रहभाॊद भें सवाप्रथभ उत्ऩन्न होने वारे
जीव तत्त्व ‘जर’ का अधधऩतत होने के कायण गणेशजी
ही प्रथभ ऩूज्म के अधधकायी होते हैं।
आचामथ भनु का कथन है-
“अऩ ए ससजाादौ तासु फीजभवासृजत्।” (भनुस्भृतत 1)
बावाथथ:
इस प्रभाण से सृत्ष्ट के आदद भें एकभाि
वताभान जर का अधधऩतत गणेश हैं।
21 ससतम्फय - 2019
फकसी बी शुबकामा भें गणेशजी की ऩूजा सवाप्रथभ क्मों होती हैं?
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
गणऩतत शब्द का अथथ हैं।
गण(सभूह)+ऩतत (स्वाभी) = सभूह के स्वाभी को सेनाऩतत अथाात गणऩतत कहते हैं। भानव शयीय भें ऩाॉ
ऻानेत्न्िमाॉ, ऩाॉ कभेत्न्िमाॉ औय ाय अन्त्कयण होते हैं। एवॊ इस शत्क्तओॊ को जो शत्क्तमाॊ सॊ ासरत कयती हैं
उन्हीॊ को ौदह देवता कहते हैं। इन सबी देवताओॊ के भूर प्रेयक हैं बगवान श्रीगणेश।
बगवान गणऩतत शब्दब्रहभ अथाात ् ओॊकाय के प्रतीक हैं, इनकी भहत्व का मह हीॊ भुख्म कायण हैं।
श्रीगणऩत्मथवाशीषा भें वणणात हैं ओॊकाय का ही व्मक्त स्वरूऩ गणऩतत देवता हैं। इसी कायण सबी प्रकाय के
शुब भाॊगसरक कामों औय देवता-प्रततष्ठाऩनाओॊ भें बगवान गणऩतत फक प्रथभ ऩूजा फक जाती हैं। त्जस प्रकाय से
प्रत्मेक भॊि फक शत्क्त को फढाने के सरमे भॊि के आगें ॐ (ओभ्) आवश्मक रगा होता हैं। उसी प्रकाय प्रत्मेक शुब
भाॊगसरक कामों के सरमे ऩय बगवान ् गणऩतत की ऩूजा एवॊ स्भयण अतनवामा भानी गई हैं। इस सबी शास्ि एवॊ
वैददक धभा, सम्प्रदामों ने इस प्रा ीन ऩयम्ऩया को एक भत से स्वीकाय फकमा हैं इसका सदीमों से बगवान गणेश जी
क प्रथभ ऩूजन कयने फक ऩयॊऩया का अनुसयण कयते रे आयहे हैं।
गणेश जी की ही ऩूजा सफसे ऩहरे क्मों होती है, इसकी ऩौयाणणक कथा इस प्रकाय है -
ऩद्मऩुयाण के अनुसाय (सृश्ष्टखण्ड 61। 1 से 63। 11) –
एक ददन व्मासजी के सशष्म ने अऩने गुरूदेव को प्रणाभ
कयके प्रश्न फकमा फक गुरूदेव! आऩ भुझे देवताओॊ के ऩूजन का सुतनत्श् त क्रभ फतराइमे। प्रततददन फक ऩूजा भें सफसे
ऩहरे फकसका ऩूजन कयना ादहमे ?
तफ व्मासजी ने कहा: ववघ्नों को दूय कयने के सरमे सवाप्रथभ गणेशजी की ऩूजा कयनी ादहमे। ऩूवाकार भें
ऩावाती देवी को देवताओॊ ने अभृत से तैमाय फकमा हुआ एक ददव्म भोदक ददमा। भोदक देखकय दोनों फारक (स्कन्द
तथा गणेश) भाता से भाॉगने रगे। तफ भाता ने भोदक के प्रबावों का वणान कयते हुए कहा फक तुभ दोनो भें से जो
धभाा यण के द्वाया श्रेष्ठता प्राप्त कयके आमेगा, उसी को भैं मह भोदक दूॉगी। भाता की ऐसी फात सुनकय स्कन्द भमूय
ऩय आरूढ़ हो कय अल्ऩ भुहूताबय भें सफ तीथों की स्न्नान कय सरमा। इधय रम्फोदयधायी गणेशजी भाता-वऩता की
ऩरयक्रभा कयके वऩताजी के सम्भुख खडे हो गमे। तफ ऩावातीजी ने कहा- सभस्त तीथों भें फकमा हुआ स्न्नान, सम्ऩूणा
देवताओॊ को फकमा हुआ नभस्काय, सफ मऻों का अनुष्ठान तथा सफ प्रकाय के व्रत, भन्ि, मोग औय सॊमभ का ऩारन-
मे सबी साधन भाता-वऩता के ऩूजन के सोरहवें अॊश के फयाफय बी नहीॊ हो सकते।
इससरमे मह गणेश सैकडों ऩुिों औय सैकडों गणों से बी फढ़कय श्रेष्ठ है। अत् देवताओॊ का फनामा हुआ मह भोदक
भैं गणेश को ही अऩाण कयती हूॉ। भाता-वऩता की बत्क्त के कायण ही गणेश जी की प्रत्मेक शुब भॊगर भें सफसे
ऩहरे ऩूजा होगी। तत्ऩश् ात ् भहादेवजी फोरे- इस गणेश के ही अग्रऩूजन से सम्ऩूणा देवता प्रसन्न होंजाते हैं। इस
सरमे तुभहें सवाप्रथभ गणेशजी की ऩूजा कयनी ादहमे।
22 ससतम्फय - 2019
श्री गणेश ऩूजन की सयर ववधध
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
श्री गणेशजी की ऩूजा से व्मत्क्त को फुवि, ववद्या,
वववेक योग, व्माधध एवॊ सभस्त ववध्न-फाधाओॊ का स्वत्
नाश होता है
श्री गणेशजी की कृ ऩा प्राप्त होने से व्मत्क्त के
भुत्श्कर से भुत्श्कर कामा बी आसान हो जाते हैं।
त्जन रोगो को व्मवसाम-नौकयी भें ववऩयीत
ऩरयणाभ प्राप्त हो यहे हों, ऩारयवारयक तनाव, आधथाक
तॊगी, योगों से ऩीडा हो यही हो एवॊ व्मत्क्त को अथक
भेहनत कयने के उऩयाॊत बी नाकाभमाफी, दु:ख, तनयाशा
प्राप्त हो यही हो, तो एसे व्मत्क्तमो की सभस्मा के
तनवायण हेतु तुथॉ के ददन मा फुधवाय के ददन श्री
गणेशजी की ववशेष ऩूजा-अ ाना कयने का ववधान शास्िों
भें फतामा हैं।
त्जसके पर से व्मत्क्त की फकस्भत फदर जाती
हैं औय उसे जीवन भें सुख, सभृवि एवॊ ऎश्वमा की
प्रात्प्त होती हैं। श्री गणेश जी का ऩूजन अरग-अरग
उद्देश्म एवॊ काभनाऩूतता हेतु अरग-अरग भॊि व ववधध-
ववधान से फकमा जाता हैं, इस सरमे महाॊ दशााई गई
ऩूजन ववधध भें अॊतय होना साभान्म हैं।
सबी ऩाठको के भागादशान हेतु श्री गणेश जी का
ऩूजन ववधान ददमा जा यहा हैं।
गणेश ऩूजा:
ऩूजन साभग्री :
कुॊ कुॊ भ, के सय, ससॊदूय, अवीय-गुरार, ऩुष्ऩ औय भारा,
ारव, ऩान, सुऩायी, ऩॊ ाभृत, ऩॊ भेवा, गॊगाजर,
त्रफरऩि, धूऩ-दीऩ, नैवैद्य भें रड्डू )रड्डू3 ,5,7, 11
ववषभ सॊख्मा भें (मा गूड अथवा सभश्री का प्रसाद
रगाएॊ। रौंग, इराम ी, नायीमर, करश, 1सभटय रार
कऩडा, फयक, इि, जनेऊ, वऩरी सयसों, इत्मादद
आवश्मक साभग्रीमाॊ।
ऩववत्र कयण:
सफसे ऩहरे ऩूजन साभग्री व गणेश प्रततभा ध ि ऩववि
कयण कयें
अऩववि् ऩवविो वा सवाावस्थाॊ गतो वऩ वा।
म् स्भयेत् ऩुण्डयीकाऺॊ स फाहमाभ्मन्तय् शुध ्॥
इस भॊि से शयीय औय ऩूजन साभग्री ऩय जर छीटें इसे
अॊदय फाहय औय फहाय दोनों शुि हो जाता है
आचभन:
ॐ के शवाम नभ:
ॐ नायामण नभ:
ॐ भध्वामे नभ:
हस्तो प्रऺल्म हसशाके शम नभ :
आसान सुवि:
ॐ ऩृथ्वी त्वमा धृता रोका देवव त्व ववद्गणुनाधृता्।
त्व धायम भा देवव ऩववि कु रू आसनभ्॥
यऺा भंत्र:
'अऩक्राभन्तु बूतातन वऩशा ा् सवातो ददशा।
सवेषाभवयोधेन ब्रहभकभा सभायबे।
अऩसऩान्तु ते बूता् मे बूता् बूसभसॊत्स्थता्।
मे बूता ववनकताायस्ते नष्टन्तु सशवाऻमा।'
इस भॊि से दशों ददशाओॊ भैं वऩरा सयसों तछटके त्जसेस
सभस्त बूत प्रेत फाधाओॊ का तनवायण होता है
स्वस्ती वाचन:
स्वत्स्त न इन्िो वृिश्रवा :स्वत्स्त न :ऩूषा ववश्ववेदा:।
स्वत्स्तनस्ता यऺो अरयष्टनेसभ :स्वत्स्त नो
फृहस्ऩततादधात॥
इस के फाद श्री गणेश जी के भॊगर ऩाठ कयना ादहए
जो की इस प्रकाय है
23 ससतम्फय - 2019
गणेश जी का भंगर ऩाठ:
सुभुखश् ैकदन्तश् कवऩरो गजकणाक:।
रम्फोदयश् ववकटो ववघ्रनाशो ववनामक:॥
धूम्रके तुगाणाध्मऺो बार न्िो गजानन:।
द्वाद्वशैतातन नाभातन म :ऩठेच्छेणुमादवऩ॥
ववद्यायम्बे वववाहे प्रवेशे तनगाभे तथा।
सॊग्राभे सॊकटे ैव ववघ्रस्तस्म न जामते॥
एकाग्रध न होकय गणेश का ध्मान कयना ादहए
श्री गणेश का ध्मान कयें :
गजाननॊ बूतगणादद सेववतभ् कवऩत्थ जम्फूपर
ारुबऺणभ्। उभासुतभ् शोक ववनाश कायकभ् नभासभ
ववघ्नेश्वय ऩाद ऩॊकजभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री
गणेशाम नभ् गणेशॊ ध्मामासभ भॊि का उच् ायण कयें।
आह्वानं:
इस भॊि से श्री गणेश का आहवान कये मा भन ही भन
भें श्री गणेश जी को ऩधायने के सरमे ववनतत कयें।
हाथभें अऺत रेकय आहवान कयें।
आगच्छ बगवन्देव स्थाने ाि त्स्थयो बव
मावत्ऩूजाॊ करयष्मासभ तावत्वॊ सत्न्नधौ बव।।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ्
गणेशॊ ध्मामासभ भॊि का उच् ायण कयके अऺते
डारदें.....
इस भॊि से श्री गणेश की भूतता मा प्रततभा ऩय हल्दी मा
कु भकु भ से यॊगे ारव डारें। मदद प्रततभा के प्रहरे से
प्राण-प्रततष्ठा हो गई हैं तो आवश्मक्ता नहीॊ हैं तफ
के वर सुऩायी ऩय ही ारव डारें।
स्भयण:
हाथभें ऩुष्ऩ रेकय श्री गणेशजी का स्भयण कयें।
नभस्तस्भै गणेशाम सवा ववध्न ववनासशने॥
कामाायॊबेषु सवेषु ऩूत्जतो म् सुयैयवऩ।
सुभुखश् ैक दॊतश् कवऩरो गजकणाक्॥
रॊफोदयश् ववकटो ववघ्ननाशो ववनामक्।
धुम्रके तुय् गणाध्मऺो बार ॊिो गजानन॥
द्वादशैतातन नाभातन म् ऩठेच्छृ णु मादऽवऩ॥
ववद्यायॊबे वववाहे प्रवेशे तनगाभे तथा।
सॊग्राभे सॊकटे ैव ववघ्नस्तस्म न जामते॥
शुक्राॊफय धयॊ देवॊ शसशवणं तुबुाजभ्।
प्रसन्न वदनॊ ध्मामेत् सवा ववघ्नोऩशाॊतमे॥
जऩेद् गणऩतत स्तोिॊ षड्सबभाासे परॊ रबेत्।
सॊवॊत्सयेण ससविॊ रबते नाि सॊशम्॥
वक्रतुॊड भहाकाम सूमाकोदट सभ प्रब।
तनववाघ्नॊ कु रु भे देव सवा कामेषु सवादा॥
असबत्प्सताथा ससद्ध्मथं ऩूत्जतो म् सुयासुयै्।
सवा ववघ्न हयस्तस्भै गणाधधऩतमे नभ्॥
ववघ्नेश्वयाम वयदाम सुयवप्रमाम रॊफोदयाम सकराम
जगत्त्धताम। नागाननाम श्रुततमऻ ववबुवषताम गौयीसुताम
गणनाथ नभो नभस्ते॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् गणेशॊ स्भयासभ
भॊि का उच् ायण कयके ऩुष्ऩ अवऩात कयें
षोडशोऩचाय गणऩतीऩूजन:
अस्मै प्राण् प्रततष्ठन्तु अस्मै प्राणा् ऺयन्तु ।
अस्मै देवतभ ीमा भाभहेतत कश् न॥
आसनं:
आसन सभवऩात कयें। मदद ऩहरे से वस्ि त्रफछामा हुवा हैं
तो उस स्थान ऩय हल्दी मा कु भकु भ से यॊगे अऺत
डारकय ऩुष्ऩ अवऩात कयें।
यम्मॊ सुशोबनॊ ददव्मॊ सवा सौख्म कयॊ शुबभ्।
आसनॊ भमादत्तॊ गृहाण ऩयभेश्वय॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् आसनॊ
सभऩामासभ॥
मदद श्रोक ऩढने भें कदठनाई हो तो आसन सभऩाासभ
श्री गॊ गणेशाम नभ् का उच् ायण कयते हुवे गणेश जी
के यण धोमे।
ऩाद्मं:
उष्णोदकॊ तनभारॊ सवा सौगन्ध सॊमुतभ्।
ऩाद प्रऺारनाथााम दत्तॊ ते प्रततगृहमताभ्॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऩाद्मॊ
सभऩामासभ॥
24 ससतम्फय - 2019
अर्घ्मं:
आ भनीभें जर, पू र, पर, ॊदन, अऺत, दक्षऺणा
इत्मादद हाथ भें यख कय तनम्न भॊि का उच् ायण कयें...
अध्मा गृहाण देवेश गॊध ऩुष्ऩऺतै् सह।
करुणा कु रु भें देव गृहाणाध्मै् नभोस्तुते॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् अघ्मं सभऩामासभ
भॊि का उच् ायण कयके अध्मा की साभग्रीमा अवऩात
कयदें।
आचभन:
सवा तीथा सभामुक्तॊ सुगॊधध तनभार जरभ्।
आ म्मताॊ भमा दत्तॊ गृहीत्वा ऩयभेश्वयॊ॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् आ भनॊ
सभऩामासभ॥
स्नानं:
गॊगा मभुना येवा तुॊगबिा सयस्वतत।
कावेयी सदहता नद्म् सद्म् स्नाथाभवऩाता॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् स्नानॊ सभऩामासभ
भॊि का उच् ायण कयते हुवे स्नान कयामे।
ऩंचाभृत स्नान :
तत ऩश् मात ऩॊ ाभृत से क्रभश् दूध, दही, घी, शहद,
शक्कय से स्नान कया कय शुिजर मा गॊगाजर से उक्त
भॊि से ऩुन् स्वच्छ कयरे।
तत ऩश् मात शुि वस्ि से ऩोछ कय प्रततत्ष्ठत कयें।
दूध स्नान :
काभधेनु सभुत्ऩनॊ सवेषाॊ जीवन ऩयभ्।
ऩावनॊ मऻ हेतुश् ऩम :स्नानाथाभवऩातभ्॥
इस के स्थान ऩय ऩम् स्नानभ् सभऩामासभ गॊ गणेशाम
नभ् का उच् ायण कये तथा ऩम् के स्थान ऩय दूध कहें,
दहीॊ कहें, धृतभ् कहें, भधु कहें, शका या कहें के स्नान
कयामे।
ऩमसस्तु सभुद्भूतॊ भधुयाम्रॊ शसशप्रबभ् ।
दध्मानीतॊ भमा देव स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥
नवनीतसभुत्ऩन्नॊ सवासॊतोषकायकभ् ।
घृतॊ तुभ्मॊ प्रदास्मासभ स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥
तरु ऩुष्ऩ सभुत्ऩन्नॊ सुस्वादु भधुयॊ भधु ।
तेज् ऩुत्ष्टकयॊ ददव्मॊ स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥
इऺुसायसभुद्भूताॊ शका याॊ ऩुत्ष्टदाॊ शुबाभ् ।
भराऩहारयकाॊ ददव्मॊ स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥
ऩमो दधध धृत ैव भधु शका यामुतभ्।
ऩॊ ाभृत भमानीतॊ सनानाथा प्रततघृहमताभ॥
वस्त्रं:
ऩॊ ाभृत स्नान के फाद स्वच्छ कय के वस्ि ऩहनामे मा
सभवऩात कयें।
सवा बूषाददके सौम्मे रोकरज्जा तनवायणे ।
भमोऩऩाददते तुभ्मॊ वाससी प्रततगृहीताभ् ॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् वस्िोऩवस्िे
सभऩामासभ॥
मऻोऩवीत
ततऩश् मात तनम्न भॊि से मऻोऩवीत ऩहनामे
नवसभस्तॊतुसबमुक्त त्रिगुणॊ देवताभमॊ।
सऩफीतॊ भमा दत्तॊ गृहाण ऩयभेश्वयभ्॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् मऻोऩववतॊ
सभऩामासभ॥
चंदन:
ततऩश् मात रार ॊदन ढामे।
श्रीखण्ड न्दन ददव्मॊ के शयादद सुभनीहयभ्।
ववरेऩनॊ सुश्रष्ठ न्दनॊ प्रततगृहमतभ्॥ ॐ ससविफुवि
सदहत श्री गणेशाम नभ् कुॊ कु भॊ सभऩामासभ॥
कुं कुं भ:
ततऩश् मात कुॊ कुॊ भ अवीय-गुरार ढामे।
कुॊ कुॊ भ काभना ददव्मॊ काभना काभ सॊबवभ्।
कुॊ कुॊ भ नाध ातो देव गृहाण ऩयभेश्वयभ्॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् कुॊ कु भॊ
सभऩामासभ॥
ससंदूय :
ततऩश् मात ससॊदूय ढामे। ससॊदूयॊ शोबनॊ यक्तॊ सौबाग्मॊ
सुखवधानभ्। शुबदॊ काभदॊ ैव ससॊदूयॊ प्रततगृहमताभ।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ससॊदूयॊ
सभऩामासभ॥
25 ससतम्फय - 2019
अऺत:
ततऩश् मात हल्दी मा कुॊ कुॊ भ से यॊगे अऺत ढामे।
अऺताश् सुयश्रेष्ठ कुॊ कु भाक्ता् सुशोसबता्।
भमा तनवेददता बक्त्मा गृहाण ऩयभेश्वरय॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् अऺतान्
सभऩामासभ॥
ऩुष्ऩ :
ततऩश् मात ऩुष्ऩ भारा आदद ढामे।
भाल्मादीतन सुगन्धीतन भारत्मादीतन वै प्रबो।
भमा नीतातन ऩुष्ऩाणण गृहाण ऩयभेश्वय॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऩुष्ऩाणण
सभऩामासभ॥
दूवाथ:
ततऩश् मात दूवाा ढामे।
दुवाा कयान्सह रयतान भृतन्भॊगर प्रदान।
आनी ताॊस्तव ऩूजाथा गृहाण ऩयभेश्वय॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् दूवांकु यान
सभऩामासभ॥
आबूषण :
ततऩश् मात आबूषण ढामे।
अरॊकायान्भहाददव्मान्नानायतन ववतनसभातान।
गृहाण देव-देवेश प्रसीद ऩयभेश्वय॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् आबूषण
सभऩामासभ॥
इत्र:
ततऩश् मात इि अथाात् सुगॊधधत तेर ढामे।
म्ऩकाशो वकु रॊ भारती भोगयाददसब्।
वाससतॊ त्स्नग्ध तासेरु तैरॊ ारु प्रगृहमातभ्॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् तैरभ्
सभऩामासभ॥
धूऩ :
ततऩश् मात धूऩ आदद जरामे।
वनस्ऩतत यसोद्भूतो गॊधाढ्मो गॊध उत्तभ्।
आध्नम सवा देवानाॊ धूऩोमॊ प्रततगृहमताभ्॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् धूऩॊ सभऩामासभ॥
दीऩ:
ततऩश् मात दीऩ आदद जरामे।
आज्मेन वतताना मुक्तॊ वत्हनना प्रमोत्जतभ् भमा।
दीऩॊ गृहाण देवेश िेरोक्म ततसभयाऩह॥।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् दीऩॊ दशामासभ॥
नैवेद्य :
ततऩश् मात नैवेद्य अवऩात कयें।
शका या खॊडखाद्यातन दधधऺीय घृतातन ।
आहायॊ बक्ष्मॊ बोज्मॊ गृहाण गणनामक।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् नैवेद्मॊ
तनवेदमासभ॥
ततऩश् मात नैवेद्य ऩय जर तछडके ।
गॊ गणऩतमे नभ्
ततऩश् मात इस भॊि का उच् ायण कयते हुवे ऩाॊ फाय
बोजन कयामे.....
ॐ प्राणाम नभ्।
ॐ अऩानाम नभ्।
ॐ व्मानाम नभ्।
ॐ उदानाम नभ्।
ॐ सभानाम नभ्।
ततऩश् मात इस भॊि का उच् ायण कयते हुवे जर
अवऩात कयें।
भध्मे ऩानीमॊ सभऩामासभ।
फपय से उक्त भॊि का ऩाॊ फाय उच् ायण कयते हुवे ऩाॊ
फाय बोजन कयामे....
ततऩश् मात इस भॊि का उच् ायण कयते हुवे तीन फाय
जर अवऩात कयें....
ॐ गणेशाम नभ् उत्तय ऩोषणॊ सभऩामासभ।
ॐ गणेशाम नभ् हस्त प्रऺारनॊ सभऩामासभ।
ॐ गणेशाम नभ् भुख प्रऺारनॊ सभऩामासभ।
26 ससतम्फय - 2019
हाथ से बोजन की गॊध दूय कयने हेतु ॊदनमुक्त ऩानी
अवऩात कयें।
ॐ गणेशाम नभ् कयोद्वतानाथे गॊधॊ सभऩामासभ.
भुख शुवि हेतु ऩान-सुऩायी इराम ी औय रवॊग अवऩात
कयें।
एरारवेंग सॊमुक्तॊ ऩुगीपरॊ सभत्न्वतभ्, ताॊफुरॊ भमा
दत्तॊ गृहाण गणनामक .ॐ ससविफुवि सदहत श्री
गणेशाम नभ् भुखवासॊ सभऩामासभ।
दक्षऺणा:
ततऩश् मात दक्षऺणा अवऩात कयें। दहयण्म गबा गबास्थॊ
हेभफीजॊ ववबावसो। अनॊत ऩूण्म परदभत् शाॊततॊ प्रमच्छ
भे॥। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् दक्षऺणाॊ
सभऩामासभ।
प्रदक्षऺणा:
ततऩश् मात प्रदक्षऺणा कयें।
मातन कातन ऩाऩातन जन्भान्तय कृ तातन ।
तातन सवााणण नश्मन्तु प्रदक्षऺणा ऩदे ऩदे।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् प्रदक्षऺणाॊ कयोसभ।
आयती:
नीयाजन-आयती प्रगट कय उसभें ॊदन-ऩुष्ऩ रगामे कऩुय
प्रज्वसरत कयें।
ॊिाददत्मौ धयणण ववद्मुदत्ग्न त्वभेव ।
त्वभेव सवा ज्मोततवष आतॉक्मॊ प्रततगृहमताभ्॥
कऩुाय ऩूयेण भनोहयेण सुवणा ऩािान्तय सॊत्स्थतेन।
प्रददप्तबासा सहगतेन नीयाजनॊ ते ऩरयत कयोसभ।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् नीयाजनॊ
सभऩामासभ।
॥श्री गणेश आयतत॥
जम गणेश जम गणेश जम गणेश देवा
जम गणेश जम गणेश जम गणेश देवा.
भाता जाकी ऩायवती वऩता भहादेवा॥ जम गणेश.....
एकदन्त दमावन्त ायबुजाधायी
भाथे ऩय ततरक सोहे भूसे की सवायी॥ जम गणेश.....
ऩान ढ़े पर ढ़े औय ढ़े भेवा
रड्डुअन का बोग रगे सन्त कयें सेवा॥ जम गणेश.....
अॊधे को आॉख देत कोदढ़न को कामा
फाॉझन को ऩुि देत तनधान को भामा॥ जम गणेश.....
' सूय' श्माभ शयण आए सपर कीजे सेवा
जम गणेश जम गणेश जम गणेश देवा॥ जम गणेश.....
आयती के ायो औय जर घुभामे फपय गणेशजी को
आयती ददखामे खुद आयती रेकय हाथ धोरे।
फपय दोनो हाथकी अॊजसरभें ऩुष्ऩ रेकय ऩुष्ऩाॊजसर दें।
नाना सुगॊधी ऩुष्ऩाणण ऋतुकारोद्भवातन ।
ऩुष्ऩाॊजसर प्रदानेन प्रसीद गणनामक। ॐ ससविफुवि
सदहत श्री गणेशाम नभ् ऩुष्ऩाॊजसर सभऩामासभ।
प्राथथना:
ववघ्नेश्वयाम वयदाम सुयवप्रमाम रॊफोदयाम सकराम
जगविताम। नागाननाम श्रुततमऻ ववबुवषताम गौयीसुताम
गणनाथ नभो नभस्ते। बक्ताततानाशन ऩयाम गणेश्वयाम
सवेश्वयाम शुबदाम सुयेश्वयाम। ववद्याधयाम ववकटाम
वाभनाम बत्क्त प्रसन्न वयदाम नभो नभस्ते।
नभस्काय:
रॊफोदय नभस्तुभ्मॊ सतत भोदक वप्रम।
तनववाघ्नॊ कु रु भे देव सवा कामेषु सवादा।
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् नभस्कायान्
सभऩामासभ।
ववशेष अध्मथ:
आ भनी भें जर, ावर, पू र, पर, ॊदन दक्षऺणा
आदद अध्मा भें रे
यऺ यऺ गणाध्मऺ यऺ िेरोक्म यऺक। बक्तनाभ
बमॊकताा िाता बवबवाणावात्॥ परेन पसरतॊ तोमॊ परेन
पसरतॊ धनभ्। परास्मघ्मं प्रदानेन ऩूणाा सन्तु
भनोयथा्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ्
ववशेषाघ्मं सभऩामासभ।
ऺभाऩन:
आहवानॊ न जानासभ न जानासभ ववसजानभ्।
ऩूजाॊ ैव न जानासभ ऺभस्व गणनामक॥
ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऺभाऩनॊ
सभऩामासभ॥
अनमा ऩूज्मा ससविफुवि सदहत श्री गणेश् वप्रमताभ्॥
***
27 ससतम्फय - 2019
ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण की भदहभा
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
ऩौयाणणक भान्मता के अनुशाय प्रततददन बगवान श्रीगणेश की प्रततभा के साभने ऩूणा श्रिा-बत्क्तबाव से मदद कोई
भनुष्म इस ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण ऩठन कयता हैं तो उसे सभस्त प्रकाय के साॊसारयक सुखों की प्रात्प्त होती हैं।
इस ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण का ऩठ भनुष्म को सबी प्रकाय के बोगों औय भोऺ प्रदान कयने भें सभथा हैं।
श्रीववघ्नेशऩुयाणसायभुददतॊ व्मासाम धािा ऩुया, खण्डॊ वै प्रथभॊ भहागणऩतेश्र् ोऩासनाख्मॊ मथा।
सॊहतुं त्रिऩुयॊ सशवेन गणऩस्मादौ कृ तॊ ऩूजनॊ, कतुं सूत्ष्टसभभाॊ स्तुत: स ववधधना व्मासेन फुद्ध्माप्तमे ॥१॥
सॊकष्ट्माश् ववनामकस्म भनो: स्थानस्म तीथास्म वै, दूवााणाॊ भदहभेतत बत्क्त रयतॊ तत्ऩाधथवास्मा ानभ्।
तेभ्मो मैमादबीत्प्सतॊ गणऩततस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ, ता: सवाा न सभथा एव कधथतुॊ ब्रहभा कु तो भानव् ॥२॥
क्रीडाकाण्डभथो वदे कृ तमुगे श्र्वेतच्छवव: काश्मऩ: ससॊहाक: स ववनामको दशबुजो बूत्वाथ काशीॊ ममौ।
हत्त्वा ति नयान्तकॊ तदनुजॊ देवान्तकॊ दानवॊ, िेतामाॊ सशवनॊदनो यसबुजो जातो भमूयध्वज:॥३॥
हत्वा तॊ कभरासुयॊ सगणॊ ससन्धुॊ भहादैत्मऩॊ, ऩश् ात ससविभतीसुते कभरजस्तस्भै ऻानॊ ददौ।
द्वाऩाये तु गजाननो मुगबुजो गौयीसुत: ससन्दुयॊ, सम्भद्ाम स्वकयेण तॊ तनजभुखे ाखुध्वजो सरप्तवान ्॥४॥
गीतामा उऩदेश एव दह कृ तो याऻे वयेण्माम वै, तुष्टामाथ धुम्रके तुयसबधो ववप्र: सधभााधधक:।
अश्वाॊको द्वद्वबुजो ससतो गणऩततम्रेच्छाान्तक: स्वणाद:, क्रीडाकाण्डसभदॊ गणस्म हरयणा प्रोक्तॊ ववधािे ऩुया॥५॥
।। इतत श्रीऩॊ श्रोफकगणेशऩुयाणभ्।।
गणेश वाहन भूषक के से फना
सभेरू ऩवात ऩय सौभरय ऋवष का आश्रभ था। उनकी अत्मॊत रूऩवान तथा ऩततव्रता ऩत्नी का नाभ भनोभमी
था। एक ददन ऋवषवय रकडी रेने के सरए वन भें रे गए। उनके जाने के ऩश् मात भनोभमी गृहकामा भें व्मस्त हो
गईं। उसी सभम एक दुष्ट कौं नाभक गॊधवा वहाॊ आमा। जफ कौं ने रावव्मभमी भनोभमी को देखा, तो उसके
बीतय काभ जागृत होगमा एवॊ वह व्माकु र हो गमा। कौं ने भनोभमी का हाथ ऩकड सरमा। योती व काॊऩती हुई
भनोभमी उससे दमा की बीख भाॊगने रगी। उसी सभम वहा सौबरय ऋवष आ गए।
उन्हें गॊधवा को श्राऩ देते हुए कहा, तुभने ोय की बाॊतत भेयी सहधसभानी का हाथ ऩकडा हैं, इस कायण तुभ
अफसे भूषक होकय धयती के नी े औय ोयी कयके अऩना ऩेट बयोगे।’
ऋवष का श्राऩ सुनकय गॊधवा ने ऋवष से प्राथाना की- हे ऋवषवय, अवववेक के कायण भैंने आऩकी ऩत्नी के हाथ का
स्ऩशा फकमा। भुझे ऺभा कय दें।
ऋवष फोरे: कौं ! भेया श्राऩ व्मथा नहीॊ होगा। तथावऩ द्वाऩय भें भहवषा ऩयाशय के महाॊ गणऩतत देव गजरूऩ भें प्रकट
होंगे। तफ तुभ उनका वाहन फन जाओगे। इसके ऩश् मात तुम्हाया कल्माण होगा तथा देवगण बी तुम्हाया सम्भान
कयेंगे।
28 ससतम्फय - 2019
फकस पू र से कयें गणेश ऩूजन
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
गणेश जी को दूवाा सवााधधक वप्रम है। इस सरमे सपे द मा हयी दूवाा
ढ़ानी ादहए। दूवाा की तीन मा ऩाॉ ऩत्ती होनी ादहए।
गणेश‌जी को तुरसी छोडकय सबी ऩि औय ऩुष्ऩ वप्रम हैं।
गणेशजी ऩय तुरसी ढाना‌तनषेध‌हैं।‌
न तुरस्मा गणाधधऩभ्‌(ऩद्मऩुयाण)
बावाथा‌:तुरसी से गणेशजी की ऩूजा कबी नहीॊ‌कयनी‌
ादहमे।
'गणेश तुरसी ऩि दुगाा नैव तु दूवाामा' (कातताक भाहात्म्म)
बावाथथ :‌ गणेशजी की‌तुरसी ऩि‌से‌एवॊ‌दुगााजी की दूवाा ऩूजा
नहीॊ कयनी ादहमे।
गणेशजी की‌ऩूजा भें भन्दाय के रार पू र ढ़ाने से ववशेष राब
प्राप्त होता हैं। रार ऩुष्ऩ के अततरयक्त ऩूजा भें श्वेत,ऩीरे पू र
बी ढ़ाए जाते हैं।
सॊकटनाशन गणेशस्तोिभ ्
सॊकटनाशन गणेश स्तोिभ ् का प्रतत ददन ऩाठ कयने से सभस्त प्रकाय के सॊकटोका नाश होता है, श्री गणेशजी फक कृ ऩा एवॊ सुख
सभृवि फक प्राप्त होती है।
वक्रतुॊड भहाकाम सूमाकोदट सभप्रब । तनववाघ्नभ् कु रु भें देव सवा कामेषु सवादा ॥ ववघ्नेश्वयाम वयदाम सूयवप्रमाम रम्फोदयाम
सकराम जगद्वद्वताम । नागाननाम श्रुततमऻ ववबूवषताम गौयीसुताम गणनाथ नभोनभस्ते ॥
स्तोि:
प्रणम्म सशयसा देवॊ गौयीऩुॊि ववनामकभ्बक्तावासॊ स्भये तनत्मॊ आमुकाभाथाससिमे ॥ १ ॥
प्रथभॊ वक्रतुॊडॊ एकदॊतॊ द्वद्वततमकभ्तृतीमॊ कृ ष्णवऩॊगाऺॊ गजवकिॊ तुथाकभ ् ॥ २ ॥
रॊफोदयॊ ऩॊ भॊ षष्टभॊ ववकटभेव सप्तभॊ ववघ्नयाजॊ धूम्रवणं तथाअष्टकभ् ॥ ३ ॥
नवॊ बार ॊिॊ दशभॊ तु ववनामकभ्एकादशॊ गणऩततॊ द्वादशॊ तु गजाननभ् ॥ ४ ॥
द्वादशैतातन नाभातन त्रिसॊध्मॊ म: ऩठेन्नय: न ववघ्नबमॊ तस्म सवा ससवि कयॊ प्रबो ॥ ५ ॥
ववद्याधथा रबते ववद्माॊ धनाधथा रबते धनभ्ऩुिाधथा रबते ऩुिाॊभोऺाधथा रबते गततभ् ॥ ६ ॥
जऩेत्गणऩततस्तोिॊ षडसबभासै: परॊ रबेत सॊवतसयेणससविॊ रबते नािसॊशम् ॥ ७ ॥
अष्टभ्मोब्राहभणोभ्मस्म सरणखत्वा म: सभऩामेत ्तस्म ववद्या बवेत्सवाा गणेशस्म प्रसादत् ॥ ८ ॥
॥ इततश्री नायदऩुयाणे ‘सॊकटनाशन गणेशस्तोिभ ्’ सॊऩूणाभ्॥
29 ससतम्फय - 2019
गणेश ऩूजन भें तनवषि हैं तुरसी?
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
तुरसी सभस्त ऩौधों भें श्रेष्ठ भानी जाती हैं। दहॊदू धभा भें सभस्त ऩूजन कभो भें तुरसी
को प्रभुखता दी जाती हैं। प्राम् सबी दहॊदू भॊददयों भें यणाभृत भें बी तुरसी का प्रमोग
होता हैं। इसके ऩीछे ऎसी काभना होती है फक तुरसी ग्रहण कयने से तुरसी अकार
भृत्मु को हयने वारी तथा सवा व्माधधमों का नाश कयने वारी हैं।
ऩयन्तु मही ऩूज्म तुरसी को बगवान श्री गणेश की ऩूजा भें तनवषि भानी गई हैं।
शास्त्रों भें उल्रेख हैं:
तुरसीं वजथतमत्वा सवाथण्मवऩ ऩत्रऩुष्ऩाणण गणऩततवप्रमाणण। (आ ायबूषण)
गणेशजी को तुरसी छोडकय सबी ऩि-ऩुष्ऩ वप्रम हैं! गणऩततजी को दूवाा अधधक
वप्रम है।
इनसे सम्फि ब्रह्भकल्ऩ भें एक कथा सभरती हैं
एक सभम नवमौवन सम्ऩन्न तुरसी देवी नायामण ऩयामण होकय तऩस्मा के तनसभत्त से तीथो भें भ्रभण कयती हुई गॊगा तट ऩय
ऩहुॉ ीॊ। वहाॉ ऩय उन्होंने गणेश को देखा, जो फक तरूण मुवा रग यहे थे। गणेशजी अत्मन्त सुन्दय, शुि औय ऩीताम्फय धायण फकए
हुए आबूषणों से ववबूवषत थे, गणेश काभनायदहत, त्जतेत्न्िमों भें सवाश्रेष्ठ, मोधगमों के मोगी थे गणेशजी वहाॊ श्रीकृ ष्ण की
आयाधना भें घ्मानयत थे। गणेशजी को देखते ही तुरसी का भन उनकी ओय आकवषात हो गमा। तफ तुरसी उनका उऩहास
उडाने रगीॊ। घ्मानबॊग होने ऩय गणेश जी ने उनसे उनका ऩरय म ऩूछा औय उनके वहाॊ आगभन का कायण जानना ाहा। गणेश
जी ने कहा भाता! तऩत्स्वमों का घ्मान बॊग कयना सदा ऩाऩजनक औय अभॊगरकायी होता हैं।
शुबे! बगवान श्रीकृ ष्ण आऩका कल्माण कयें, भेये र्घ्मान बंग से उत्ऩन्न दोष आऩके सरए अभंगरकायक न हो।
इस ऩय तुरसी ने कहा—प्रबो! भैं धभाात्भज की कन्मा हूॊ औय तऩस्मा भें सॊरग्न हूॊ। भेयी मह तऩस्मा ऩतत प्रात्प्त के सरए हैं। अत:
आऩ भुझसे वववाह कय रीत्जए। तुरसी की मह फात सुनकय फुवि श्रेष्ठ गणेश जी ने उत्तय ददमा हे भाता! वववाह कयना फडा
बमॊकय होता हैं, भैं ब्रम्ह ायी हूॊ। वववाह तऩस्मा के सरए नाशक, भोऺद्वाय के यास्ता फॊद कयने वारा, बव फॊधन से फॊधे, सॊशमों का
उद्गभ स्थान हैं। अत: आऩ भेयी ओय से अऩना घ्मान हटा रें औय फकसी अन्म को ऩतत के रूऩ भें तराश कयें। तफ कु वऩत होकय
तुरसी ने बगवान गणेश को शाऩ देते हुए कहा फक आऩका वववाह अवश्म होगा। मह सुनकय सशव ऩुि गणेश ने बी तुरसी को
शाऩ ददमा देवी, तुभ बी तनत्श् त रूऩ से असुयों द्वाया ग्रस्त होकय वृऺ फन जाओगी।
इस शाऩ को सुनकय तुरसी ने व्मधथत होकय बगवान श्री गणेश की वॊदना की। तफ प्रसन्न होकय गणेश जी ने तुरसी से
कहा हे भनोयभे! तुभ ऩौधों की सायबूता फनोगी औय सभमाॊतय से बगवान नायामण फक वप्रमा फनोगी। सबी देवता आऩसे स्नेह
यखेंगे ऩयन्तु श्रीकृ ष्ण के सरए आऩ ववशेष वप्रम यहेंगी। आऩकी ऩूजा भनुष्मों के सरए भुत्क्त दातमनी होगी तथा भेये ऩूजन भें आऩ
सदैव त्माज्म यहेंगी। ऎसा कहकय गणेश जी ऩुन: तऩ कयने रे गए। इधय तुरसी देवी दु:णखत हवदम से ऩुष्कय भें जा ऩहुॊ ी औय
तनयाहाय यहकय तऩस्मा भें सॊरग्न हो गई। तत्ऩश् ात गणेश के शाऩ से वह ध यकार तक शॊख ूड की वप्रम ऩत्नी फनी यहीॊ। जफ
शॊख ूड शॊकय जी के त्रिशूर से भृत्मु को प्राप्त हुआ तो नायामण वप्रमा तुरसी का वृऺ रूऩ भें प्रादुबााव हुआ।
30 ससतम्फय - 2019
काभनाऩूतता हेतु भत्कायी गणेश भॊि
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
ॐ गॊ गणऩतमे नभ् ।
एसा शास्िोक्त व न हैं फक गणेश जी का मह भॊि भत्कारयक औय तत्कार पर देने वारा भॊि हैं। इस भॊि का ऩूणा
बत्क्तऩूवाक जाऩ कयने से सभस्त फाधाएॊ दूय होती हैं। षडाऺय का जऩ आधथाक प्रगतत व सभृत्ध्ददामक है।
ॐ वक्रतुॊडाम हुभ् ।
फकसी के द्वाया फक गई ताॊत्रिक फक्रमा को नष्ट
कयने के सरए, ववववध काभनाओॊ फक शीघ्र ऩूतता
के सरए उत्च्छष्ट गणऩतत फक साधना फकजाती
हैं। उत्च्छष्ट गणऩतत के भॊि का जाऩ अऺम
बॊडाय प्रदान कयने वारा हैं।
ॐ हत्स्त वऩशाध सरखे स्वाहा ।
आरस्म, तनयाशा, करह, ववघ्न दूय कयने के सरए
ववघ्नयाज रूऩ की आयाधना का मह भॊि जऩे।
ॐ गॊ क्षऺप्रप्रसादनाम नभ:।
भॊि जाऩ से कभा फॊधन, योगतनवायण, कु फुवि,
कु सॊगत्त्त, दूबााग्म, से भुत्क्त होती हैं। सभस्त
ववघ्न दूय होकय धन, आध्मात्त्भक ेतना के
ववकास एवॊ आत्भफर की प्रात्प्त के सरए हेयम्फॊ
गणऩतत का भॊि जऩे।
ॐ गूॊ नभ:।
योजगाय की प्रात्प्त व आधथाक सभृत्ध्द प्राप्त
होकय सुख सौबाग्म प्राप्त होता हैं।
ॐ श्रीॊ ह्ीॊ क्रीॊ ग्रौं गॊ गण्ऩत्मे वय वयदे नभ्
ॐ तत्ऩुरुषाम ववद्महे वक्रतुण्डाम धीभदह तन्नो दत्न्त् प्र ोदमात।
रक्ष्भी प्रात्प्त एवॊ व्मवसाम फाधाएॊ दूय कयने हेतु उत्तभ भानगमा हैं।
ॐ गी् गूॊ गणऩतमे नभ् स्वाहा।
इस भॊि के जाऩ से सभस्त प्रकाय के ववघ्नो एवॊ सॊकटो का का नाश होता हैं।
ॐ श्री गॊ सौबाग्म गणऩत्मे वय वयद सवाजनॊ भें वशभानम स्वाहा।
वववाह भें आने वारे दोषो को दूय कयने वारों को िैरोक्म भोहन गणेश भॊि का जऩ कयने से शीघ्र वववाह व अनुकू र
जीवनसाथी की प्रात्प्त होती है।
गणेश के कल्माणकायी भॊि
गणेश भॊि कक प्रतत ददन एक भारा भॊिजाऩ अवश्म कये।
ददमे गमे भॊिो भे से कोई बी एक भॊिका जाऩ कये।
(०१) गॊ ।
(०२) ग्रॊ ।
(०३) ग्रौं ।
(०४) श्री गणेशाम नभ् ।
(०५) ॐ वयदाम नभ् ।
(०६) ॐ सुभॊगराम नभ् ।
(०७) ॐ ध ॊताभणमे नभ् ।
(०८) ॐ वक्रतुॊडाम हुभ् ।
(०९) ॐ नभो बगवते गजाननाम ।
(१०) ॐ गॊ गणऩतमे नभ् ।
(११) ॐ ॐ श्री गणेशाम नभ् ।
मह भॊि के जऩ से व्मत्क्त को जीवन भें फकसी बी प्रकाय
का कष्ट नहीॊ येहता है।
 आधथाक त्स्थतत भे सुधाय होता है।
 एवॊ सवा प्रकायकी रयवि-ससवि प्राप्त होती है।
31 ससतम्फय - 2019
ॐ वक्रतुण्डेक िष्टाम क्रीॊहीॊ श्रीॊ गॊ गणऩतमे वय वयद
सवाजनॊ भॊ दशभानम स्वाहा ।
इस भॊिों के अततरयक्त गणऩतत अथवाशीषा, सॊकटनाशक,
गणेश स्िोत, गणेशकव , सॊतान गणऩतत स्िोत, ऋणहताा
गणऩतत स्िोत भमूयेश स्िोत, गणेश ारीसा का ऩाठ कयने
से गणेश जी की शीघ्र कृ ऩा प्राप्त होती है।
ॐ वय वयदाम ववजम गणऩतमे नभ्।
इस भॊि के जाऩ से भुकदभे भें सपरता प्राप्त होती हैं।
ॐ गॊ गणऩतमे सवाववघ्न हयाम सवााम सवागुयवे
रम्फोदयाम ह्ीॊ गॊ नभ्।
वाद-वववाद, कोटा क हयी भें ववजम प्रात्प्त, शिु बम से
छु टकाया ऩाने हेतु उत्तभ।
ॐ नभ् ससविववनामकाम सवाकामाकिे सवाववघ्न
प्रशभनाम सवा याज्म वश्म कायनाम सवाजन सवा स्िी
ऩुरुषाकषाणाम श्री ॐ स्वाहा।
इस भॊि के जाऩ को मािा भें सपरता प्रात्प्त हेतु प्रमोग
फकमा जाता हैं।
ॐ हुॊ गॊ ग्रौं हरयिा गणऩत्मे वयद वयद सवाजन रृदमे
स्तम्बम स्वाहा।
मह हरयिा गणेश साधना का भत्कायी भॊि हैं।
ॐ ग्रौं गॊ गणऩतमे नभ्।
गृह करेश तनवायण एवॊ घय भें सुखशात्न्त फक प्रात्प्त
हेतु।
ॐ गॊ रक्ष्म्मौ आगच्छ आगच्छ पट्।
इस भॊि के जाऩ से दरयिता का नाश होकय, धन प्रात्प्त
के प्रफर मोग फनने रगते हैं।
ॐ गणेश भहारक्ष्म्मै नभ्।
व्माऩाय से सम्फत्न्धत फाधाएॊ एवॊ ऩयेशातनमाॊ तनवायण
एवॊ व्माऩय भें तनयॊतय उन्नतत हेतु।
ॐ गॊ योग भुक्तमे पट्।
बमानक असाध्म योगों से ऩयेशानी होने ऩय, उध त
ईराज कयाने ऩय बी राब प्राप्त नहीॊ होयहा हो, तो ऩूणा
ववश्वास सें भॊि का जाऩ कयने से मा जानकाय व्मत्क्त
से जाऩ कयवाने से धीये-धीये योगी को योग से छु टकाया
सभरता हैं।
ॐ अन्तरयऺाम स्वाहा।
इस भॊि के जाऩ से भनोकाभना ऩूतता के अवसय प्राप्त
होने रगते हैं।
गॊ गणऩत्मे ऩुि वयदाम नभ्।
इस भॊि के जाऩ से उत्तभ सॊतान फक प्रात्प्त होती हैं।
ॐ वय वयदाम ववजम गणऩतमे नभ्।
इस भॊि के जाऩ से भुकदभे भें सपरता प्राप्त होती हैं।
ॐ श्री गणेश ऋण तछत्न्ध वयेण्म हुॊ नभ् पट ।
मह ऋण हताा भॊि हैं। इस भॊि का तनमसभत जाऩ कयना
ादहए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है औय साधक का ऋण
ुकता होता है। कहा जाता है फक त्जसके घय भें एक फाय बी
इस भॊि का उच् ायण हो जाता है है उसके घय भें कबी बी
ऋण मा दरयिता नहीॊ आ सकती।
जऩ ववधध:
प्रात: स्नानादद शुि होकय कु श मा ऊन के आसन ऩय
ऩूवा फक औय भुख होकय फैठें। साभने गणॆशजी का ध ि,
मॊि मा भूतता स्थात्प्त कयें फपय षोडशोऩ ाय मा
ऩॊ ोऩ ाय से बगवान गजानन का ऩूजन कय प्रथभ ददन
सॊकल्ऩ कयें। इसके फाद बगवान ग्णेशका एकाग्रध त्त से
ध्मान कयें। नैवेद्य भें मदद सॊबव होतो फूॊदद मा फेसन के
रड्डू का बोग रगामे नहीॊ तो गुड का बोग रगामे।
साधक को गणेशजी के ध ि मा भूतता के सम्भुख शुि
घी का दीऩक जराए। योज १०८ भारा का जाऩ कय ने
से शीघ्र पर फक प्रात्प्त होती हैं। मदद एक ददन भें १०८
भारा सॊबव न हो तो ५४, २७,१८ मा ९ भाराओॊ का बी
जाऩ फकमा जा सकता हैं।
भॊि जाऩ कयने भें मदद आऩ असभथा हो,
तो फकसी ब्राहभण को उध त दक्षऺणा देकय उनसे
जाऩ कयवामा जा सकता हैं।
***
32 ससतम्फय - 2019
गणेश ऩूजन से हो सकती हैं ग्रह ऩीडा दूय?
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
गणऩतत सभस्त रोकोंभें सवा प्रथभ ऩूजेजाने
वारे एकभाि देवाता हैं। गणेश सभस्त गण के
गणाध्मऺक होने के कायणा गणऩतत नाभ से बी जाने
जाते हैं।
भनुष्म को जीवन भें सभस्त प्रकाय फक रयवि-
ससवि एवॊ सुखो फक प्रात्प्त एवॊ अऩनी सम्स्त
आध्मात्त्भक-बौततक इच्छाओॊ फक ऩूतता हेतु गणेश जी
फक ऩूजा-अ ाना एवॊ आयाधना अवश्म कयनी ादहमे।
गणेशजी का ऩूजन अनाददकार से रा आ यहा हैं,
इसके अततरयक्त ज्मोततष शास्त्रों के अनुशाय ग्रह
ऩीडा दूय कयने हेतु बगवान गणेश कक ऩूजा-अचथना कयने
से सभस्त ग्रहो के अशुब प्रबाव दूय होते हैं एवं शुब
पर कक प्राश्प्त होती हैं। इस सरमे गणेश ऩूजाका
अत्माधधक भहत्व हैं।
वक्रतुण्ड भहाकाम सूमाकोदट सभप्रब्।
तनववाघ्नॊ कु रू भे देव सवा कामेषु सवादा।।
बगवान गणेश सूमा तेज के सभान तेजस्वी हैं।
गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से सूमा के प्रततकू र प्रबाव
का शभन होकय व्मत्क्त के तेज-भान-सम्भान भें वृवि होती
हैं, उसका मश ायों औय फढता हैं। वऩता के सुख भें वृवि
होकय व्मत्क्त का आध्मात्त्भक ऻान फढता हैं।
बगवान गणेश ॊि के सभान शाॊतत एवॊ शीतरता के
प्रततक हैं। गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से ॊि के
प्रततकू र प्रबाव का नाश होकय व्मत्क्त को भानससक शाॊतत
प्राप्त होती हैं। ॊि भाता का कायक ग्रह हैं इस सरमे
गणेशजी के ऩूजन से भातृसुख भें वृवि होती हैं।
बगवान गणेश भॊगर के सभान सशत्क्तशारी एवॊ
फरशारी हैं। गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से भॊगर के
अशुब प्रबाव दूय होते हैं औय व्मत्क्त फक फर-शत्क्त भें वृवि
होती हैं। गणेशजी के ऩूजन से ऋण भुत्क्त सभरती हैं।
व्मत्क्त के साहस, फर, ऩद औय प्रततष्ठा भें वृवि होती हैं
त्जस कायण व्मत्क्त भें नेतृत्व कयने फक ववरऺण शत्क्त का
ववकास होता हैं। बाई के सुख भें वृवि होती हैं।
गणेशजी फुवि औय वववेक के अधधऩतत स्वासभ
फुध ग्रह के अधधऩतत देव हैं। अत: ववद्या-फुवि प्रात्प्त के
सरए गणेश जी की आयाधना अत्मॊत परदामी ससिो
होती हैं। गणेशजी के ऩूजन से वाकशत्क्त औय
तका शत्क्त भें वृवि होती हैं। फहन के सुख भें वृवि होती
हैं।
बगवान गणेश फृहस्ऩतत(गुरु) के सभान उदाय,
ऻानी एवॊ फुवि कौशर भें तनऩूणा हैं। गणेशजी का
ऩूजन-अ ान कयने से फृहस्ऩतत(गुरु) से सॊफॊधधत ऩीडा दूय
होती हैं औय व्मत्क्त कें आध्मात्त्भक ऻान का ववकास
होता हैं। व्मत्क्त के धन औय सॊऩत्त्त भें वृवि होती हैं।
ऩतत के सुख भें वृवि होती हैं। बगवान गणेश धन,
ऐश्वमा एवॊ सॊतान प्रदान कयने वारे शुक्र के अधधऩतत हैं।
गणेशजी का ऩूजन कयने से शुक्र के अशुब प्रबाव का
शभन होता हैं। व्मत्क्त को सभस्त बौततक सुख साधन
भें वृवि होकय व्मत्क्त के सौन्दमा भें वृवि होती हैं। ऩतत
के सुख भें वृवि होती हैं।
बगवान गणेश सशव के ऩुि हैं। बगवान सशव
शतन के गुरु हैं। गणेशजी का ऩूजन कयने से शतन से
सॊफॊधधत ऩीडा दूय होती हैं। बगवान गणेश हाथी के भुख
एवॊ ऩुरुष शयीय मुक्त होने से याहू व के तू के बी
अधधऩतत देव हैं। गणेशजी का ऩूजन कयने से याहू व
के तू से सॊफॊधधत ऩीडा दूय होती हैं। इससरमे नवग्रह फक
शाॊतत भाि बगवान गणेश के स्भयण से ही हो जाती हैं।
इसभें कोई सॊदेह नहीॊ हैं। बगवान गणेश भें ऩूणा श्रिा
एवॊ ववश्वास फक आवश्मक्ता हैं। बगवान गणेश का
ऩूजन अ ान कयने से भनुष्म का जीवन सभस्त सुखो
से बय जाता है। जन्भ कुॊ डरी भें ाहें होई बी ग्रह
अस्त हो मा नी हो अथवा ऩीडडत हो तो बगवान
गणेश फक आयाधना से सबी ग्रहो के अशुब प्रबाव दूय
होता हैं एवॊ शुब परो फक प्रात्प्त होती हैं।
33 ससतम्फय - 2019
द्वादश महा यंत्र
मॊि को अतत प्राध न एवॊ दुराब मॊिो के सॊकरन से हभाये वषो के अनुसॊधान द्वारा फनामा गमा हैं।
 ऩयभ दुराब वशीकयण मॊि,
 बाग्मोदम मॊि
 भनोवाॊतछत कामा ससवि मॊि
 याज्म फाधा तनवृत्त्त मॊि
 गृहस्थ सुख मॊि
 शीघ्र वववाह सॊऩन्न गौयी अनॊग मॊि
 सहस्िाऺी रक्ष्भी आफि मॊि
 आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि
 ऩूणा ऩौरुष प्रात्प्त काभदेव मॊि
 योग तनवृत्त्त मॊि
 साधना ससवि मॊि
 शिु दभन मॊि
उऩयोक्त सबी मॊिो को द्वादश भहा मॊि के रुऩ भें शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि ऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत एवॊ ैतन्म मुक्त
फकमे जाते हैं। त्जसे स्थाऩीत कय त्रफना फकसी ऩूजा अ ाना-ववधध ववधान ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं।
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जफ गणेशजी फन गमे ज्मोततषी।
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
दहन्दु धभा भें सवाप्रथन ऩूजनीम बगवान गणेश
ने एक फाय ज्मोततषी का रुऩ धायण कय सरमा। हराॊफक
हभ बगवान गणेश के ववसबन्न रुऩों से ऩरयध त हैं,
रेफकन उनके ज्मोततषीम रुऩ से कभ ही रोग ऩरयध त
होंगे! ववद्वानों का कथन हैं की बगवान गणेश ज्मोततषी
रुऩ ब्रहभा जी की सृत्ष्ट सॊ ारन भें सहामता हेतु धायण
फकमा था।
ऩौयाणणक कथा के अनुशाय एकफाय एक फाय
याजा रयऩुञ्जम ने कदठन साधना से भन तथा इत्न्िमों
को अऩने वश भें कय सरमा। याजा रयऩुञ्जम की साधना
से सन्तुष्ट होकय ब्रहभा जी ने उन्हें सम्ऩूणा बूरोक ऩय
प्रजाऩारन औय नागयाज वासुफक की कन्मा के साथ
वववाह का आसशवााद ददमा।
ब्रहभा जी की आऻा को सुनकय रयऩुञ्जम ने
कहा, भैं आऩका मह आसशवााद स्वीकाय कयता हूॉ, रेफकन
भेयी एक शता है फक जफ तक ऩृथ्वी ऩय भेया शासन
यहेगा, तफ तक सबी देवता के वर स्वगा रोक भें ही
तनवास कयेंगे। वे ऩृथ्वी ऩय नहीॊ आएॉगे। ब्रहभा जी ने
तथास्तु कहा। अत्ग्न, सूमा, इन्ि इत्मादद सबी देवता
ऩृथ्वी से अॊतध्माान हो गमे तो रयऩुञ्जम ने प्रजा के
कल्माण हुते उन सफ देवताओॊ का रूऩ धायण कय
सरमा।
रयऩुञ्जम को देवताओॊ का रुऩ धायण फकमे हुवे
देखकय सबी देवता फहुत क्रोधधत हो गमे। याजा
रयऩुञ्जम के सभस्त ऩृथ्वी ऩय शासन कयने के कायण
वह ददवोदास के नाभ से प्रससि हुए। रयऩुञ्जम ने काशी
को अऩनी याजधानी फनामा। उनके शासन भें अऩयाध
का कहीॊ नाभो-तनशान नहीॊ था। असुय बी भनुष्म के वेश
भें आकय याजा की सेवा भें उऩत्स्थत हो जाते थे। सवाि
धभा की प्रधानता थी।
दुसयी तयप देवरोक भें, ऩृथ्वी ऩय अऩना आवास
छू टने के कायण सभस्त देवता औय बगवान सशव
अत्मधधक दु्खी थे। सबी इसी उरझन भे थे की फकसी
तयह याजा रयऩुञ्जम के याज भें कभी ढूॉढ़कय उन्हें
बूरोक के याज से हटामा जाम। इसी प्रमास भें देवताओॊ
ने रयऩुञ्जम के याजकाज भें कई प्रकाय के ववघ्न
उऩत्स्थत फकए, रेफकन कोई बी ववध्न-फाधा रयऩुञ्जम के
साभने दटक नहीॊ ऩामी। रयऩुञ्जम को ऩथभ्रष्ट कयने के
34 ससतम्फय - 2019
सरए बगवान सशव ने क्रभश: ६४ मोधगतनमों, सूमा,
ब्रहभा, सशव गण आदद को काशी बेजा। इस प्रकाय
क्रभश् कई देवता ऩृथ्वी ऩय आते गए औय एक-एक कय
सबी महीॊ तनवास कयने रगे।
तफ बगवान सशव ने अऩने ऩुि श्रीगणेश को
काशी जाने के सरमे आदेश ददमा। बगवान श्रीगणेश ने
काशी भें आऩना आवास एक भत्न्दय भें फनामा तथा वे
स्वमॊ एक वृि ब्राहभण का वेश धायण कय काशी भें
यहने रगे। काशी भें धीये-धीये रोग बगवान श्रीगणेश के
ऩास अऩना बववष्म जानने के सरमे आने रगे। धीये-धीये
उनकी कीतता तथा प्रससवि याजा रयऩुञ्जम तक ऩहूॉ ी तो
उन्होंने वृि ज्मोततषी को अऩने महाॉ आभॊत्रित फकमा।
वृि ज्मोततषी के आने ऩय रयऩुञ्जम ने उनका
ववशेष आदय सत्काय फकमा औय तनवेदन फकमा फक, इस
सभम भेया भन बौततक ऩदाथों एवॊ सबी कभों से दूय हो
यहा है। इससरए आऩ अच्छी तयह गणना कय भेये
बववष्म का वणान कीत्जए। तफ उन वृि ज्मोततषी ने
रयऩुञ्जम से कहा फक, “आज से १८वें ददन उत्तय ददशा
की ओय से एक तेजस्वी ब्राहभण का आगभन होगा औय
वे ही तुम्हें उऩदेश देकय तुम्हाया बववष्म तनत्श् त कयेंगे।
बगवान गणेश ने सम्ऩूणा काशी नगयी को अऩने
वश भें कय सरमा। याजा रयऩुञ्जम से दूय यहकय बी
बगवान गणेश ने उनके ध त्त को याज-काज से ववयक्त
कय ददमा। १८वें ददन बगवान ववष्णु ने ब्राहभण का वेश
धायण कयके अऩना नाभ ऩुण्मकीता, गरुड का नाभ
ववनमकीता तथा रक्ष्भी का नाभ गोभोऺ प्रससि फकमा।
वे स्वमॊ गुरु रूऩ भें तथा उन दोनों को ेरों के रूऩ भें
रेकय काशी ऩहुॊ े।
रयऩुञ्जम को सभा ाय सभरा तो गणेश जी की
फात को स्भयण कयके उसने ऩुण्मकीता का स्वागत कयके
उऩदेश सुना। ऩुण्मकीता ने दहन्दू धभा का खॊडन कयके
फौि धभा का भॊडन फकमा। प्रजा सदहत याजा रयऩुञ्जम
फौि धभा का ऩारन कयके अऩने धभा से ऩथभ्रष्ट हो
गमा। ऩुण्मकीता ने याजा रयऩुञ्जम से कहा फक सात ददन
उऩयाॊत उसे सशवरोक रे जाना ादहए। उससे ऩूवा
सशवसरॊग की स्थाऩना बी आवश्मक है। श्रिारु याजा ने
उसके कथन अनुसाय ददवोदासेश्वय सरॊग की स्थाऩना
एवॊ ववधध-ऩूवाक ऩूजा-अ ाना कयवाई। गरुड ववष्णु जी के
सॊदेशस्वरूऩ सभस्त घटना का ववस्तृत वणान कयने सशव
के सम्भुख गमे। तदुऩयाॊत रयऩुञ्जम ने सशवरोक प्राप्त
फकमा तथा देवतागण काशी भें अॊश रूऩ से यहने के ऩुन:
अधधकायी फन गमे। ववद्वानों का कथन हैं की गणेश जी
के ज्मोततषी रुऩ धायण कयने से ऩूवा सबी देवताओॊ के
प्रमास तनष्पर हुवे थे। इस सरए मह गणेशजी के
ज्मोततषी रुऩ का ही भत्काय था की याजा रयऩुञ्जम ने
गणेश जी की फात ऩय ववश्वास कय ब्राहभण रुऩ धायी
ववष्णु जी की फात ऩय ववश्वास फकमा औय उनके कहे
अनुशाय कामा सॊऩन्न फकमा।
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35 ससतम्फय - 2019
सॊतान गोऩार मॊि
उत्तभ सॊतान प्रात्प्त हेतु शास्िोक्त ववधध-ववधान से असबभॊत्रित सॊतान गोऩार मॊि का
ऩूजन एवॊ अनुष्ठान ववशेष राबप्रद भाना गमा हैं।
सॊतान प्रात्प्त मॊि एवॊ कव से सॊफॊधधत अधधक जानकायी हेतु गुरुत्व कामाथरम भें सॊऩका
कय सकते हैं। Ask Now
॥गणेशबुजॊगभ्॥
यणत्ऺुिघण्टातननादासबयाभॊ रत्ताण्डवोद्दण्डवत्ऩद्मतारभ् ।
रसत्तुत्न्दराङ्गोऩरयव्मारहायॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ १ ॥
ध्वतनध्वॊसवीणारमोल्राससवक्िॊ स्पु यच्छु ण्डदण्डोल्रसद्फीजऩूयभ् ।
गरद्दऩासौगन्ध्मरोरासरभारॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ २ ॥
प्रकाशज्जऩायक्तयन्तप्रसून- प्रवारप्रबातारुणज्मोततयेकभ् ।
प्ररम्फोदयॊ वक्रतुण्डैकदन्तॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ ३ ॥
ववध िस्पु यित्नभाराफकयीटॊ फकयीटोल्रसच् न्ियेखाववबूषभ् ।
ववबूषैकबूशॊ बवध्वॊसहेतुॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ ४ ॥
उदञ् द्भुजावल्रयीदृश्मभूरो- च् रद्भ्रूरताववभ्रभभ्राजदऺभ् ।
भरुत्सुन्दयी ाभयै् सेव्मभानॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे॥ ५ ॥
स्पु यत्न्नष्ठु यारोरवऩङ्गाक्षऺतायॊ कृ ऩाकोभरोदायरीरावतायभ् ।
करात्रफन्दुगॊ गीमते मोधगवमै- गाणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे॥ ६ ॥
मभेकाऺयॊ तनभारॊ तनववाकल्ऩॊ गुणातीतभानन्दभाकायशून्मभ् ।
ऩयॊ ऩयभोंकायभान्भामगबं । वदत्न्त प्रगल्बॊ ऩुयाणॊ तभीडे ॥ ७ ॥
ध दानन्दसान्िाम शान्ताम तुभ्मॊ नभो ववश्वकिे हिे तुभ्मभ्
।
नभोऽनन्तरीराम कै वल्मबासे नभो ववश्वफीज प्रसीदेशसूनो ॥ ८ ॥
इभॊ सुस्तवॊ प्रातरुत्थाम बक्त्मा ऩठेद्यस्तु भत्मो रबेत्सवाकाभान ् ।
गणेशप्रसादेन ससध्मत्न्त वा ो गणेशे ववबौ दुराबॊ फकॊ प्रसन्ने ॥ ९ ॥
जन्भ कुॊ डरी भें ाहें होई बी ग्रह अस्त हो मा नी हो अथवा ऩीडडत हो
तो बगवान गणेश फक आयाधना से सबी ग्रहो के अशुब प्रबाव दूय होता हैं एवॊ शुब परो फक प्रात्प्त होती हैं।
36 ससतम्फय - 2019
वषा की ववसबन्न तुथॉ व्रत का भहत्व
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
श्रावण कृ ष्ण चतुथी
संकष्टचतुथी व्रत
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय
सॊकष्ट तुथॉ व्रत प्रत्मेक भासकी कृ ष्ण तुथॉ को फकमा
जाता है। मदद तुथॉ दो ददन न्िोदमव्मावऩनी हो मा
दोनों ददन न हो तो भातृवविा प्रशस्मते के अनुसाय
ऩहरे ददन व्रत कयना ादहमे।
व्रतधायी को ादहमे फक वह प्रात्स्िानाददके
ऩश् ात ् व्रत कयनेका सॊकल्ऩ कयके ददनबय मथा सॊबव
भौन यहे औय सामॊकारभें ऩुन्स्िान कयके रार वस्ि
धायणकय ऋतुकार भें उऩरब्ध गन्ध ऩुष्ऩादद से
गणेशजीका ऩूजन कये,(शास्रोक्त भत से गणेश ऩूजन भें
तुरसी ऩि वत्जात हैं)
उसके फाद न्िोदम होने ऩय न्िभा का ऩूजन
कये औय अघ्मा से ऩूजन कय स्वमॊ बोजन कये तो
व्रतधायी को सुख, सौबाग्म औय सम्ऩत्त्तकी प्रात्प्त होती
है।
संकष्टचतुथी की व्रत कथा:
ऩौयाणणक कथा के अनुशाय सत्ममुग भें याजा
मुवनाश्व के ऩास सम्ऩूणा शास्िों के ऻाता ब्रहभशभाा
नाभक ब्राहभण थे, त्जनके सात ऩुि औय सात ऩुिवधुएॉ
थीॊ। ब्रहभशभाा जफ वृि हुए, तफ फडी छ् फहुओॊकी
अऩेऺा छोटी फहूने श्वशुयकी अधधक सेवा की। तफ
उन्होंने सॊतुष्ट होकय ऩुिवधु से सॊकष्टहय तुथॉका व्रत
कयवामा, त्जसके प्रबावसे वह भयणऩमान्त सफ प्रकायके
सुख साधनोंसे सॊमुक्त यही।
श्रावण शुक्र चतुथी
दूवाथ गणऩतत व्रत
ऩौयाणणक ग्रॊथ सौयऩुयाण के अनुशाय मह व्रत
श्रावण शुक्र तुथॉ को फकमा जाता है। गणेश जी के
ऩूजन हेतु इसभें भध्माहनव्मावऩनी तुथॉ री जाती है।
मदद तुथॉ दो ददन हो मा दोनों ददन न हो तो
भातृवविा प्रशस्मते के अनुसाय ऩूवावविा व्रत कयना
ादहमे।
तुथॉ ददन प्रात्स्िानादद कयके सुवणाके
गणेशजी फनवावे जो एकदन्त, तुबूाज, गजानन औय
स्वणा ससॊहासन ऩय ववयाजभान हों।
इसके अततरयक्त सोनेकी दूवाा बी फनवावे। फपय
सवातोबि फनाकय भण्डरऩय करश की स्थाऩन कयके
उसभें स्वणाभम दूवाा रगाकय उसऩय उक्त गणेशजीका
स्थाऩन कये।
गणेश जी को यक्तवस्िाददसे ववबूवषत कये औय
अनेक प्रकायके सुगात्न्धत ऩि, ऩुष्ऩादद अऩाण कय के
ऩूजन कये। फेरऩि, अऩाभागा, शभीऩि, दूफ आदी अऩाण
कयें। (शास्रोक्त भत से गणेश ऩूजन भें तुरसी ऩि वत्जात
हैं)।
स्तोि, आयती, स्तवन आदद का ववधधवत
उच् ायण कय के गणेश जी की ऩरयक्रभा कय अऩयाधों के
सरए गणेश्वय गणाध्मऺ गौयीऩुि गजानन। व्रतॊ
सम्ऩूणााताॊ मातु त्वत्प्रसादाददबानन ॥ का उच् ायण कयते
हुवे ऺभा-मा ना प्राथाना कयें। इस प्रकाय तीन मा ऩाॉ
वषा तक व्रत ऩारन से सभस्त भनोकाभनाएॉ ऩूयी होती
हैं।
इस व्रत को कयने वारे भनुष्म की सॊऩूणा
काभनाएॉ ऩूयी होती हैं औय अन्त भें उसे गणेशजी का
ऩद प्राप्त हो जाता है। ववद्वानो का कथ हैं की िैरोक्म
भें इसके सभान अन्म कोई व्रत नहीॊ है।
37 ससतम्फय - 2019
अधधक भास की गणेश चतुथी
व्मासजी के कथनानुशाय अधधक भास भें तुथॉ
की गणेश्वयके नाभ से ऩूजा कयनी ादहए। ऩूजन हेतु
षोडशोऩ ाय की ववधध उत्तभ होती है।
चतुथी व्रत के राब:
हय भहीने गणेश जी की प्रसन्नता के तनसभत्त
व्रत कयें। इसके प्रबाव से ववद्याथॉ को ववद्या, धनाथॉ को
धन प्रात्प्त एवॊ कु भायी कन्मा को सुशीर वय की प्रात्प्त
होती है औय वह सौबाग्मवती यहकय दीघाकार तक ऩतत
का सुखबोग कयती है। ववधवा द्वाया व्रत कयने ऩय अगरे
जन्भ भें वह सधवा होती हैं एवॊ ऐश्वमा-शासरनी फन कय
ऩुि-ऩौिादद का सुख बोगती हुई अॊत भें भोऺ ऩाती है।
ऩुिेच्छु को ऩुि राब होता एवॊ योगी का योग तनवायण
होता है। बमबीत व्मत्क्त बम यदहत होता एवॊ फॊधन भें
ऩडा हुआ फॊधन भुक्त हो जाता है।
बाद्रऩद शुक्र चतुथी
सशवाचतुथीव्रत:
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय बािऩद
शुक्र तुथॉकी 'सशवा' सॊऻा है। इसभें स्नान, दान, जऩ
औय उऩवास कयनेसे सौगुना प्राप्त पर होता है। त्स्िमाॉ
मदद इस ददन गुड, घी, रवण औय अऩूऩाददसे अऩने
सास श्वशुय मा भाॉ आददको तृप्त कये तो उनके
सौबाग्मकी वृवि होती है।
श्री गणेश की प्राकट्म ततधथ होने के कायण
बािऩद शुक्र तुथॉ बगवान गुणेश की वयदामक ततधथ
अत्माधधक प्रख्मात हुई। उस ददन भध्माहन कार भें
बगवान गणेश की प्रततभा का श्रिा-बत्क्तऩूणा ऩूजन कय
गणेश जी के स्भयण, ध ॊतन एवॊ नाभ-जऩ का अद्द्भुत
भाहात्म्म है। शास्िों भें उल्रेख हैं की गणेश तुथॉ का
ऩुण्मभम एवॊ अत्मॊत परप्रदातमनी है। स्वमॊ ब्रहभा जी ने
अऩने भुखायववन्द से इस ततधथ का भाहत्म फढाते हुवे
कहा है फक इस तुथॉ व्रत का तनरूऩण एवॊ भाहात्म्म
की सॊऩूणा भदहभा वखानना शक्म नहीॊ।
बाद्रऩद कृ ष्ण चतुथी
फहुरा चतुथी व्रत
बािऩद भास के कृ ष्णऩऺ की तुथॉ फहुरा ौथ
मा तुथॉ फहुरा के नाभ से बी प्रससि है।
दहन्दु भान्मताओॊ के अनुशाय बािऩद भास की
कृ ष्ण तुथॉ के ददन ऩुिवती त्स्िमाॊ अऩने ऩुिों की
कु शरता एवॊ भॊगरकाभना के तनसभत्त फहुरा व्रत यखती
हैं। रेफकन कु छ ववद्वानो का भत हैं की फहुरा तुथॉ
सही भामनों भें गो-भाता की ऩूजा एवॊ व न ऩारन की
प्रेयणा देने वारा ऩवा है।
त्जस प्रकाय भाॊ की तयह गो-भाता अऩना दूध
वऩराकय हभ सफको ऩारती है, इस सरए हभें अत:भन
भें उनके प्रतत कृ तऻता का बाव यखकय ही मह व्रत
कयना ादहए। मह व्रत सॊतान सुख का देनेवारा तथा
ऐश्वमा को फढाने वारा है।
ऩायॊऩरयक रूऩ से इस ददन व्रत को कयने वारी
स्िीमाॊ इस ऩवा के ददन गाम का दूध एवॊ उससे तनसभात
कोई ऩदाथा नहीॊ खाती हैं। क्मोकी, इस ततधथ भें गाम के
दूध ऩय के वर उसके फछडे का अधधकाय भाना जाता है।
ददन बय उऩवास यखने के फाद सामॊकार फछडे
सदहत गौ की ऩूजा की जाती हैं। कु ल्हड भें खाने की जो
साभग्री को यखकय गाम को बोग रगामा जाता है, फाद
भें स्िीमाॊ उसी को प्रसाद के रूऩ भें ग्रहण कयती है।
कई जगम इस ददन जौ के सत्तू तथा गुड का बोग बी
रगाकय खामा जाता है।
फहुरा तुथॉ के व्रत से मह प्रेयणा सभरती है हभें
हभेंशा सत्म के साथ-साथ अऩने कताव्म एवॊ व नों का
सदा ऩारन होना ादहए।
ववद्वानो के भतानुशाय बािऩद कृ ष्ण तुथॉ को
फहुरासदहत गणेश की गॊध, ऩुष्ऩ, भारा औय दूवाा आदद
के द्वाया ववधध-ववधान से ऩूजा कय ऩरयक्रभा कयनी
ादहए। साभथ्मा के अनुसाय दान-ऩुण्म कयें। दान कयने
की त्स्थतत न हो तो फहुरा गो भाता फक प्रततभा को
38 ससतम्फय - 2019
प्रणाभ कय उसका ववसजान कय दें। इस प्रकाय ऩाॉ , दस
मा सोरह वषों तक इस व्रत का ऩारन कयके उद्याऩन
कयें। उस सभम दूध देने वारी स्वस्थ गाम का दान
कयना ादहए।
आश्ववन कृ ष्ण चतुथी
आत्श्वन कृ ष्ण तुथॉको व्रत हो औय उसी ददन
भाता - वऩता आददका श्राि बी कयना हो तो ववद्वानो के
भतानुशाय ददनभें श्राि कयके ब्राहभणोंको बोजन कया दे
औय अऩने दहस्सेके बोजनको सूॉघकय गौ को णखरा दे।
यात्रिभें न्िोदमके फाद स्वमॊ बोजन कये।
व्रत कथा:
ऩौयाणणक कथा के अनुशाय एक फाय फाणासुयकी
ऩुिी ऊषाको स्वप्न भें कृ ष्ण ऩौि अतनरुिका दशान
हुआ। ऊषाको उनके प्रत्मऺ दशानकी असबराषा हुई औय
उसने ध िरेखाके द्वाया अतनरुिको अऩने घय फुरा
सरमा। इससे अतनरुिकी भाताको फडा कष्ट हुआ। इस
सॊकटको टारनेके सरमे भाताने व्रत फकमा, तफ इस
व्रतके प्रबावसे ऊषाके महाॉ तछऩे हुए अतनरुिका ऩता
रग गमा औय ऊषा तथा अतनरुि द्वायका आ गमे।
आश्ववन शुक्र चतुथी
आत्श्वन शुक्र तुथॉ नवयाि भें ऩडने के कायण
भाॊ बगवती के ऩूजन के साथ यािी जागयण कयने का
ववशेष भहत्व हैं एवॊ इस ददन गणेश जी का ऩुरुषसूक्त
द्वाया षोडशोऩ ाय ऩूजन कयके बत्क्तऩूवाक ऩूजा का
ववशेष भाहात्म्म है।
भागथशीषथ शुक्र चतुथी
कृ च्छ्र चतुथी व्रत:
भागाशीषा शुक्र तुथॉ की कृ च्र तुथॉ कहा जाता है।
ऩौयाणणक ग्रॊथ स्कन्दऩुयाण भें उल्रेख हैं की
कृ च्र तुथॉ व्रत भागाशीषा शुक्र तुथॉसे आयम्ब होकय
प्रत्मेक तुथॉको वषाऩमान्त कयके फपय दूसये, तीसये औय
ौथे वषा भें कयनेसे ाय वषाभें ऩूणा होता है।
कृ च्र तुथॉ व्रत की ववधध मह है फक ऩहरे वषाभें
(भागाशीषा शुक्र तुथॉ को) प्रात्स्िानके ऩश् ात ् व्रतका
तनमभ ग्रहण कयके गणेशजीका मथाववधध ऩूजन कये।
भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि
"श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो
न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-
प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके
दशान भाि से अन-धगनत राब एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अद्ववतीम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब
इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता
फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न
होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से
घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत
एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त होती है।
गुरुत्व कामाथरम भे "श्री मॊि" 12 ग्राभ से 2250 Gram (2.25Kg) तक फक साइज भे उप्रब्ध है
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39 ससतम्फय - 2019
नैवेद्यभें रड्डू ततरकु टा, जौका भॉडका औय सुहारी अऩाण
कयके इस भॊि का उच् ायण कयें..
त्वत्प्रसादेन देवेश व्रतॊ वषा तुष्टमभ्।
तनववाघ्रेन तु भे मातु प्रभाणॊ भूषकध्वज ॥
सॊसायाणावदुस्तायॊ सवाववघ्रसभाकु रभ्।
तस्भाद् दीनॊ जगन्नाथ िादह भाॊ गणनामक ॥
प्राथाना कयके एक फाय ऩरयसभत बोजन कये। इस
प्रकाय प्रत्मेक तुथॉको कयता यहकय दूसये वषा उसी
भागाशीषा शुक्र तुथॉको ऩुन् मथाऩूवा तनमभ ग्रहण,
व्रत औय ऩूजा कयके पक्त ( यात्रिभें एक फाय ) बोजन
कये। इसी प्रकाय प्रत्मेक तुथॉको वषाऩमान्त कयके तीसये
वषा फपय भागाशीषा शुक्र तुथॉको व्रत तनमभ औय ऩूजा
कयके अमाध त ( अथाात त्रफना भाॉगे जो कु छ त्जतना
सभरे उसीका एक फाय ) बोजन कये।
इस प्रकाय एक वषा तक प्रत्मेक तुथॉको व्रत
कयके ौथे वषाभें उसी भागाशीषा शुक्र तुथॉको तनमभ
ग्रहण, व्रत सॊकल्ऩ औय ऩूजनादद कयके तनयाहाय उऩवास
कये। इस प्रकाय वषाऩमान्त प्रत्मेक तुथॉको व्रत कयके
ौथा वषा सभाप्त होनेऩय सपे द कभरऩय ताॉफेका करश
स्थाऩन कयके सुवणाके गणेशजीका ऩूजन कये। सवत्सा
गौका दान कये, हवन कये औय ौफीस सऩत्नीक
ब्राहभणोंको बोजन कयवाकय वस्िाबूषणादद देकय स्वमॊ
बोजन कये तो इस व्रतके कयनेसे सफ प्रकायके ववघ्न दूय
हो जाते हैं औय व्रती को सफ प्रकायकी सम्ऩत्त्त प्राप्त
होती है।
वयचतुथी व्रत:
ऩौयाणणक ग्रॊथ स्कन्दऩुयाण भें उल्रेख हैं की मह
व्रत कृ च्र तुथोके सभान मह व्रत बी भागाशीषा शुक्र
तुथॉसे आयम्ब होकय ाय वषाभें ऩूणा होता है।
प्रथभ वषाभें प्रत्मेक तुथॉको ददनािाके सभम
एक फाय अरोन ( त्रफना नभक का ) बोजन, दूसये वषाभें
नक्त ( यात्रि ) बोजन, तीसयेभें अमाध त बोजन औय
ौथेभें उऩवास कयके मथाऩूवा सभाप्त कये। मह व्रत सफ
प्रकायकी अथाससवि देने वारा है।
ऩरयसभत बोजनके ववषमभें कहीॊ ऩय 32 ग्रास
औय फकसीने 29 ग्रास फतरामे हैं।
स्भृत्मन्तय भें उल्रेख हैं
अष्टौ ग्रासा भुनेबाक्ष्मा् षोडशायण्मवाससन्।
द्वात्रिॊशद् गृहस्थमा ऩरयसभतॊ ब्रहभ ारयण् ॥
अथाथत: भुतनको आठ, वनवाससमोंको सोरह, गृहस्थोंको
फत्तीस औय ब्रहभ ारयमोंको अऩरयसभत ( मथारुध )
ग्रास बोजन कयनेको कहा गमा है।
ग्रासका प्रभाण है एक आॉवरेके फयाफय अथवा
त्जतना सुगभतासे भुॉहभें जा सके , उतना एक ग्रास होता
है। न्मून बोजनके सरमे ( माऻवल्क्मने ) तीन ग्रास
तनमत फकमे हैं।
भागथशीषथ कृ ष्ण चतुथी
धचंताभणी चतुथी व्रत:
भागाशीषा कृ ष्ण तुथॉ को ध ॊताभणी तुथॉ के
नाभ से जाना जाता हैं। ववद्वानो के कथनानुशाय इस
ददन ऩूया ददन के वर ऩानी वऩकय उऩवास फकमा जाता
हैं। यािी के सभम न्िोदम के फाद करश ऩय
श्रीध ॊताभणी गणेश की स्थाऩना कय उसका ववधध-वत
ऩूजन कयने का ववधान हैं। नैवेद्य भें भोदक का बोग
रगामे।
ऩौष कृ ष्ण चतुथी
सॊकष्ट तुथॉ व्रत:
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय ऩौष
कृ ष्ण तुथॉ को गणऩतत स्भयणऩूवाक प्रात्स्िानादद
तनत्मकभा कयनेके ऩश् ात ् सॊकल्ऩ कयके ददनबय भौन
यहे। यात्रिभें ऩुन् स्िान कयके गणऩतत - ऩूजनके ऩश् ात ्
न्िोदमके फाद न्िभाका ऩूजन कयके अघ्मा दे, फपय
बोजन कयने का ववधान फतामा गमा हैं।
ऩौष शुक्र चतुथी
ऩौष शुक्र व्रत ववधध ऩूवाक कयने वारे भनुष्म
को धन-सॊऩत्त्त का अबाव नहीॊ यहता। उसी सबी प्रकाय
के सुख सौबाग्म की प्रात्प्त होती हैं।
40 ससतम्फय - 2019
भाघ शुक्र चतुथी
शाश्न्तचतुथी व्रत:
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय भाघ
शुक्र तुथॉको गणेशजीका ऩूजन कयके घीभें सने हुए
गुडके ऩूआ औय रवणके ऩदाथा अऩाण कये औय
गुरुदेवकी ऩूजा कयके उनको गुड, रवण औय घी दे तो
इस व्रतसे सफ प्रकायकी त्स्थय शात्न्त प्राप्त होती है।
अंगायकचतुथी व्रत:
ऩौयाणणक ग्रॊथ भत्स्मऩुयाण के अनुशाय मदद भाघ
शुक्र तुथॉको भॊगरवाय हो तो उस ददन प्रात्स्िानके
ऩहरे शयीयभें सभट्टी रगाकय शुि स्िान कये, रार धोती
ऩहने, वस्िाअबूषण आदद से सुसत्ज्जत धायण कये औय
उत्तयासबभुख फैठकय 'अत्ग्नभूिाा' भन्त्नका जऩ कये।
फपय बूसभको गोफयसे रीऩकय अङ्गयकाम बौभाम नभ्
का जऩ कये। फपय उसऩय रार न्दनका अष्टदर
फनामे तथा उसकी ऩूवाादद ायों ददशाओॊभें बक्ष्म बोजन
औय ावरोंसे बये हुए ाय कयवे यख कय गन्धाऺताददसे
ऩूजन कयके । दान भें कवऩरा गौ औय रार यॊगका
अतीव सौम्म धुयॊधय फैर देना औय साथभें शय्मा देना
सहस्िगुण पर देने वारा होता है।
सुखचतुथी व्रत:
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय
तुथॉ तु तुथॉ तु मदाङ्गायकसॊमुता।
तुथ्मां तु तुथ्मां तु ववधानॊ श्रृणु मादृशभ् ॥
भाघ शुक्र तुथॉको मदद भॊगरवाय हो तो रार वणाके
गन्ध, अऺत औय ऩुष्ऩ, नैवेद्यसे गणेशजीका ऩूजन
कयके उऩवास कये। इस प्रकाय ाय- ाय तुथॉ ( भाघ,
वैशाख, बािऩद औय ऩौष ) का एक वषा व्रत कये तो
सफ प्रकायके सुख प्राप्त होते हैं। प्रत्मेक तुथॉको
बौभवाय होना आवश्मक है।
गणेशव्रत
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय भाघ
शुक्र ऩूवावविा तुथॉको प्रात् स्िानादद कयके सॊकल्ऩ
कयके वेदीऩय रार वस्ि त्रफछामे। रार अऺतोंका
अष्टदर फनाकय उसऩय ससन्दूय ध ात गणेशजीको
स्थावऩत कये। स्वमॊ रार धोती ऩहनकय रार वणाके
पर ऩुष्ऩाददसे षोडशोऩ ाय ऩूजन कये। नैवेद्यभें
(सबगोकय छीरी हुई ) हल्दी, गुड, शक्कय औय घी
इनको सभराकय बोग रगामे औय नक्तव्रत (यात्रिभें एक
फाय बोजन कये तो सम्ऩूणा अबीष्ट ससि होते हैं।
भाघ कृ ष्ण चतुथी
वक्रतुण्ड तुथॉ
ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय भाघ
कृ ष्ण न्िोदमव्मावऩनी तुथॉको वक्रतुण्ड तुथॉ कहते
हैं। इस व्रतका आयम्ब सॊकल्ऩ कयके कये। सामॊकारभें
गणेशजीका औय न्िोदमके सभम न्िका ऩूजन कयके
अघ्मा दे। इस व्रतको भाघसे आयम्ब कयके हय भहीनेभें
कये तो सॊकटका नाश हो जाता है।
पाल्गुन शुक्र चतुथी
ढुत्ण्ढयाज व्रत:
पाल्गुन भास की तुथॉ को भॊगरदामक
ढुत्ण्ढयाज व्रत फकमा जाता है। तुथॉ के ददन व्रत-
उऩवास के साथ गणेशजी की सोने की भूतता फनवाकय
उसकी श्रिा-बत्क्तऩूवाक ऩूजा की जातत हैं। गणेशजी को
प्रसन्न कयने के सरए उस ददन ततर से ही दान, होभ,
ऩूजन आदद फकमे जाते हैं। उस ददन ततर के ऩीठे से
ब्राहभणों को बोजन कयाकय व्रती स्वमॊ बी बोजन कयते
हैं। इस व्रत के प्रबाव से सभस्त सम्ऩदाओॊ की वृवि
होती है औय भनुष्म गणेशजी की कृ ऩा से ही ससवि
प्राप्त कय रेता है।
भत्स्मऩुयाण के अनुसाय पाल्गुन शुक्र तुथॉ
को भनोयथ तुथॉ कहते हैं। ऩूजनोऩयान्त नक्तव्रत का
ववधान है। इस प्रकाय फायहों भहीने की प्रत्मेक शुक्र
तुथॉ को व्रत कयते हुए वषाबय के फाद उस स्वणाभूतता
का दान कयने से भनोयथ ससि होते हैं। अत्ग्नऩुयाण भें
इसको अववघ्ना तुथॉ कहाॊ गमा है।
पाल्गुन कृ ष्ण चतुथी
पाल्गुन भास की कृ ष्ण तुथॉ को ततर तुथॉ बी कहाॊ
जाता हैं
41 ससतम्फय - 2019
चैत्र कृ ष्ण चतुथी
ैि भास की तुथॉ को वासुदेवस्वरूऩ बगवान
श्रीगणेश का ववधधऩूवाक ऩूजन कय ब्राहभण को दक्षऺणा
के रुऩ भें सुवणा देने ऩय भनुष्म को सॊऩूणा देवताओॊ से
वॊददत हो जाता हैं औय वह श्री ववष्णु रोक को प्राप्त
कयता है।
कथा:
ऩौयाणणक कथा के अनुशाय प्रा ीन कारभें भमूयध्वज
नाभका याजा फडा प्रबावशारी औय धभाऻ था। एक फाय
उसका ऩुि कहीॊ खो गमा औय फहुत अनुसॊधान कयनेऩय बी
न सभरा। तफ भत्न्िऩुिकी धभावती स्िीके अनुयोधसे
याजाके सम्ऩूणा ऩरयवाने ैि कृ ष्ण तुथॉका फडे सभायोहसे
मथाववधध व्रत फकमा। तफ बगवान गणेशजीकी कृ ऩासे
याजऩुि आ गमा औय उसने भमूयध्वजकी आजीवन सेवा
की।
वैशाख कृ ष्ण चतुथी
वैशाख भास की तुथॉ को सॊकष्टी गणेश का
ऩूजा कय ब्राहभणों को शॊख का दान कयना ादहए।
इसके प्रबाव से भनुष्म सभस्त रोक भें कल्ऩों तक सुख
प्राप्त कयता है।
वैशाख शुक्र चतुथी
वैशाख भास की कृ ष्ण तुथॉ को श्रीकृ ष्णवऩॊगाऺ
गणऩतत का ऩूजन फकमा जाता हैं।
ज्मेष्ठ कृ ष्ण चतुथी
संकष्टचतुथीव्रत:
ऩौयाणुक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय ज्मेष्ठ
भास के कृ ष्ण ऩऺ की तुथॉको, प्रात्स्िानादद
तनत्मकभा कयके व्रतके सॊकल्ऩसे ददनबय भौन यहे।
सामॊकारभें ऩुन् स्िान कयके गणेशजीका औय न्िोदम
होने ऩय न्िभा का ऩूजन कये तथा शॊखभें दूध, दूवाा,
सुऩायी आदद से ववधधवत ऩूजन कयें। वामन दान कयके
बोजन कये।
ज्मेष्ठ शुक्र चतुथी
ज्मेष्ठ भास की शुक्र ऩऺ की तुथॉ को
प्रद्मरूऩी गणेश की ऩूजा कय ब्राहभणों को पर-भूर का
दान कयने से व्रतधायी को स्वगारोक प्राप्त होते हैं।
आषाढ़ चतुथी
आषाढ़ भास की तुथॉ को अतनरुिस्वरूऩ गणेश
का ववधधऩूवाक ऩूजन कयके सॊन्माससमों को तूॊफी का ऩाि
दान कयना ादहए। इस व्रत को कयने वारा भनुष्म को
भनोवाॊतछत पर प्राप्त होते है।
तुथॉ के ददन भनुष्म श्रिा-बत्क्तऩूवाक
भॊगरभूतता गणेश का ववधधवत ऩूजन कय एसा उराब
पर प्राप्त कय रेता है, जो देव सभुदाम के सरए बी
अप्राप्त्म है।
नोट: आऩकी अनुकू रता हेतु गणेश ऩूजन की सयर ववधध
इस अॊक भें उऩरब्ध कयवाई गई हैं। कृ प्मा उस ववधध से
ऩूजन कयने से ऩूवा फकसी जानकाय गुरु मा ववद्वान से
सराह ववभशा अवश्म कयरें। क्मोफक प्राॊततम व ऺेत्रिम
ऩूजन ऩितत भें सबन्नता होने के कायण ऩूजन ववधध भें
सबन्नता सॊबव हैं। उऩरब्ध कयवाई गई ऩूजन ऩितत को
सयर से सयर फनाकय के वर आऩके भगादशान के उद्देश्म
से प्रदान की गई हैं।
ववशेष सुझाव: जो रोग सुवणा भूतता फनवाने मा दान कयने
की ऺभता न हो तो वणाक (अथाात हल्दी ूणा) से ही
गणऩतत की प्रततभा फना कय ऩूजन कय सकते हैं मा दान
कय सकते हैं।
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42 ससतम्फय - 2019
॥ सॊकष्टहयणॊ गणेशाष्टकभ् ॥
ॐ अस्म श्री सॊकष्टहयणस्तोिभन्िस्म श्रीभहागणऩततदेवता,
सॊकष्टहयणाथा जऩे ववतनमोग्।
ॐ ॐ ॐ कायरूऩभ् त्र्महसभतत ऩयभ् मत्स्वरूऩभ् तुयीमभ्
िैगुण्मातीतनीरॊ करमतत भनसस्तेज-ससन्दूय-भूतताभ्।
मोगीन्िैब्राहभयन््ै् सकर-गुणभमॊ श्रीहयेन्िेणसॊगॊ गॊ गॊ गॊ गॊ गणेशॊ
गजभुखभसबतो व्माऩकॊ ध न्तमत्न्त ॥१॥ वॊ वॊ वॊ ववघ्नयाजॊ बजतत
तनजबुजे दक्षऺणे न्मस्तशुण्डॊ क्रॊ क्रॊ क्रॊ क्रोधभुिा-दसरत-रयऩुफरॊ
कल्ऩवृऺस्म भूरे। दॊ दॊ दॊ दन्तभेकॊ दधतत भुतनभुखॊ काभधेन्वा
तनषेव्मभ ्धॊ धॊ धॊ धायमन्तॊ धनदभतततघमॊ ससवि-फुवि-द्वद्वतीमभ् ॥२॥ तुॊ
तुॊ तुॊ तुॊगरूऩॊ गगनऩधथ गतॊ व्माप्नुवन्तॊ ददगन्तान ् क्रीॊ क्रीॊ
क्रीॊकायनाथॊ गसरतभदसभरल्रोर-भत्तासरभारभ्। ह्ीॊ ह्ीॊ ह्ीॊकायवऩॊगॊ
सकरभुतनवय-ध्मेमभुण्डॊ शुण्डॊ श्रीॊ श्रीॊ श्रीॊ श्रीॊ श्रमन्तॊ तनणखर-
तनधधकु रॊ नौसभ हेयम्फत्रफम्फभ् ॥३॥ रौं रौं रौंकायभाद्मॊ प्रणवसभव ऩदॊ
भन्िभुक्तावरीनाभ् शुिॊ ववघ्नेशफीजॊ शसशकयसदृशॊ मोधगनाॊ
ध्मानगम्मभ्। डॊ डॊ डॊ डाभरूऩॊ दसरतबवबमॊ
सूमाकोदटप्रकाशभ् मॊ मॊ मॊ मऻनाथॊ जऩतत भुतनवयो फाहमभभ्मन्तयॊ
॥४॥ हुॊ हुॊ हुॊ हेभवणं श्रुतत-गणणतगुणॊ शूऩाकणॊ कृ ऩारुॊ ध्मेमॊ सूमास्म
त्रफम्फॊ हमुयसस ववरसत ् सऩामऻोऩवीतभ्।
स्वाहाहुॊपट् नभोन्तैष्ठ-ठठठ-सदहतै् ऩल्रवै् सेव्मभानभ् भन्िाणाॊ
सप्तकोदट-प्रगुणणत-भदहभाधायभोशॊ प्रऩद्मे ॥५॥ ऩूवं ऩीठॊ त्रिकोणॊ
तदुऩरय रुध यॊ षट्कऩिॊ ऩवविभ् मस्मोध्वं शुियेखा वसुदरकभरॊ वो
स्वतेजश् तुस्रभ्। भध्मे हुॊकायफीजॊ तदनु
बगवत् स्वाॊगषट्कॊ षडस्रे अष्टौ शक्तीश्
ससिीफाहुरगणऩततववाष्टयश् ाष्टकॊ ॥६॥
धभााद्यष्टौ प्रससिा दशददसश ववददता वा ध्वजाल्म् कऩारॊ तस्म
ऺेिाददनाथॊ भुतनकु रभणखरॊ भन्िभुिाभहेशभ्। एवॊ मो बत्क्तमुक्तो
जऩतत गणऩततॊ ऩुष्ऩ-धूऩा-ऺताद्मैनैवेद्मैभोदकानाॊ स्तुततमुत-
ववरसद्-गीतवाददि-नादै् ॥७॥ याजानस्तस्म बृत्मा इव
मुवततकु रॊ दासवत ्सवादास्ते रक्ष्भी् सवांगमुक्ता श्रमतत सदनॊ
फकॊ कया् सवारोका्। ऩुिा् ऩुत्र्म् ऩवविा यणबूवव ववजमी द्मूतवादेवऩ
वीयो मस्मेशो ववघ्नयाजो तनवसतत रृदमे बत्क्तबाग्मस्म रुि् ॥८॥ ॥
इतत श्री सॊकष्टहयणॊ गणेशाष्टकॊ सम्ऩूणाभ् ॥
॥गणेश ऩॊच् यत्नभ्॥
भुदा कयात्तभोदकभ् सदा ववभुत्क्तसाधकभ्
कराधयावतम्सकभ् ववराससरोकयऺकभ्।
अनामकै क नामकभ् ववनासशतेबदैत्मकभ्
नताशुबाशुनाशकभ् नभासभ तभ् ववनामकभ ् ॥१॥
नतेतयाततबीकयभ् नवोददताका बास्वयभ्
नभत्सुयारयतनजायभ् नताधधकाऩदुद्वयभ्।
सुयेश्वयभ् तनधीश्वयभ ् गजेश्वयभ ् गणेश्वयभ्
भहेश्वयभ् तभाश्रमे ऩयात्ऩयभ् तनयन्तयभ् ॥२॥
सभस्तरोकशङ्कयभ् तनयस्तदैत्मकु ञ्जयभ्
दयेतयोदयभ् वयभ् वयेबवक्िभऺयभ्।
कृ ऩाकयभ् ऺभाकयभ् भुदाकयभ ् मशस्कयभ ्
भनस्कयभ्नभस्कृ ताॊ नभस्कयोसभ बास्वयभ ्॥३॥
अफकञ् नातताभाजानॊ ध यन्तनोत्क्त बाजनभ्
ऩुयारयऩूवानन्दनभ् सुयारयगवा वाणभ्।
प्रऩञ् नाशबीषणभ् धनञ्जमादद बूषणभ ्
कऩोरदानवायणभ् बजे ऩुयाणवायणभ ् ॥४॥
तनतान्तकान्त दन्तकात्न्त भन्तकान्तकात्भजभ्
अध न्त्मरूऩ भन्तहीन भन्तयाम कृ न्तनभ्।
रृदन्तये तनयन्तयभ् वसन्तभेव मोधगनाभ ्
तभेकदन्तभेव तभ ् ववध न्तमासभ सन्ततभ् ॥५॥
भहागणेश ऩॊच् यत्नभादयेण मोन्वहभ्
प्रजल्ऩतत प्रबातके रृददस्भयन्गणेश्वयभ्।
अयोगताभदोषताॊ सुसादहतीॊ सुऩुिताॊ
सभादहतामुयष्टबूततभभ्मुऩैतत सोध यात ् ॥६॥
॥इतत श्री गणेश ऩॊच् यत्नभ् सम्ऩुणा॥
43 ससतम्फय - 2019
एकदन्त शयणागतत स्तोिभ ्
एकदन्तभ ् शयणभ ् व्रजाभ:
देवषथम ऊचु:
सदात्भरूऩॊ सकराददबूतभभातमनॊ सोऽहभध न्त्मफोधभ ्।
अनाददभध्मान्तववहीनभेकॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
अनन्तध िूऩभमॊ गणेशभबेदबेदाददववहीनभाद्यभ ्। रृदद प्रकाशस्म
धयॊ स्वधीस्थॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ सभाधधसॊस्थॊ रृदद
मोधगनाॊ मॊ प्रकाशरूऩेण ववबातभेतभ ्। सदा
तनयारम्फसभाधधगम्मॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
स्वत्रफम्फबावेन ववरासमुक्ताॊ प्रत्मऺभामाॊ ववववधस्वरूऩाभ ्।
स्ववीमाकॊ ति ददातत मो वै तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
त्वदीमवीमेण सभथाबूतस्वभाममा सॊयध तॊ ववश्वभ ्। तुयीमकॊ
हमात्भप्रतीततसॊऻॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
त्वदीमसत्ताधयभेकदन्तॊ गुणेश्वयॊ मॊ गुणफोधधतायभ ्।
बजन्तभत्मन्तभजॊ त्रिसॊस्थॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
ततस्त्वमा प्रेरयतनादके न सुषुत्प्तसॊऻॊ यध तॊ जगद् वै।
सभानरूऩॊ हमुबमिसॊस्थॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ तदेव
ववश्वॊ कृ ऩमा प्रबूतॊ द्वद्वबावभादौ तभसा ववबान्तभ ्। अनेकरूऩॊ
तथैकबूतॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ ततस्त्वमा प्रेरयतके न
सृष्टॊ फबूव सूक्ष्भॊ जगदेकसॊस्थभ ्। सुसात्त्त ्वकॊ
स्वऩन्भनन्तभाद्मॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ तदेव स्वऩन्
तऩसा गणेश सुससिरूऩॊ ववववधॊ फबूव। सदैकरूऩॊ कृ ऩमा
तेऽद्य तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ त्वदाऻमा तेन त्वमा रृददस्थॊ
तथा सुसृष्टॊ जगदॊशरूऩभ ्। ववसबन्नजाग्रन्भमभप्रभेमॊ तभेकदन्तॊ
शयणॊ व्रजाभ:॥ तदेव जाग्रिजसा ववबातॊ ववरोफकतॊ त्वत्कृ ऩमा
स्भृतेन। फबूव सबन्न सदैकरूऩॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
सदेव सृत्ष्टप्रकृ ततस्वबावात्तदन्तये त्वॊ ववबासस तनत्मभ ्।
धधम: प्रदाता गणनाथ एकस्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
त्वदाऻमा बात्न्त ग्रहाश् सवे प्रकाशरूऩाणण ववबात्न्त खे वै।
भ्रभत्न्त तनत्मॊ स्वववहायकामाास्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥
त्वदाऻमा सृत्ष्टकयो ववधाता त्वदाऻमा ऩारक एकववष्णु:।
त्वदाऻमा सॊहयको हयोऽवऩ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा
बूसभजरेऽि सॊस्थे मदाऻमाऩ: प्रवहत्न्त नद्य:। स्वतीथासॊस्थश्
कृ त: सभुिस्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा देवगणा
ददववस्था ददत्न्त वै कभापरातन तनत्मभ ्। मदाऻमा शैरगणा:
त्स्थया वै तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:। मदाऻमा देवगणा
ददववस्था ददत्न्त वै कभापरातन तनत्मभ ्। मदाऻमा शैरगणा:
त्स्थया वै तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा शेषधयाधयो वै
मदाऻमा भोहप्रदश् काभ:। मदाऻमा कारधयोऽमाभा
तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा वातत ववबातत
वामुमादाऻमाधगन्जाठयाददसॊस्थ:। मदाऻमेदॊ स या यॊ
तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदन्तये सॊत्स्थतभेकदन्तस्तदाऻमा
सवासभदॊ ववबातत। अनन्तरूऩॊ रृदद फोधकॊ मस्तभेकदन्तॊ शयणॊ
व्रजाभ:॥ सुमोधगनो मोगफरेन साध्मॊ प्रकु वाते क: स्तवनेन
स्तौतत। अत: प्रणाभेन सुससविदोऽस्तु तभेकदन्तॊ शयणॊ
व्रजाभ:॥
गृत्सभद उवाच
एवॊ स्तुत्वा गणेशानॊ देवा: सभुनम: प्रबुभ ्। तृष्णीॊ बावॊ
प्रऩद्मैव ननृतुहाषासॊमुता:॥ स तानुवा प्रीतात्भा देवषॉणाॊ
स्तवेन वै। एकदन्तो भहाबागो देवषॉन् बक्तवत्सर:॥
एकदन्त उवाच
स्तोिेणाहॊ प्रसन्नोऽत्स्भ सुया: सवषागणा: फकर।
वयदोऽहॊ वृणुत वो दास्मासभ भनसीत्प्सतभ ्॥ बवत्कृ तॊ भदीमॊ
मत ् स्तोिॊ प्रीततप्रदॊ तत ्। बववष्मतत न सॊदेह:
सवाससविप्रदामकभ ्॥ मॊ मसभच्छतत तॊ तॊ वै दास्मासभ
स्तोिऩाठत:। ऩुिऩौिाददकॊ सवा करिॊ धनधान्मकभ ्॥
गजाश्वाददकभत्मन्तॊ याज्मबोगाददकॊ ्ुवभ ्। बुत्क्तॊ भुत्क्तॊ
मोगॊ वै रबते शात्न्तदामकभ ्॥ भायणोच् ाटनादीतन
याजफन्धाददकॊ मत ्। ऩठताॊ श्रृण्वताॊ नृणाॊ बवेच्
फन्धहीनता॥ एकववॊशततवायॊ म: श्रोकानेवैकववॊशतीन्। ऩठेच्
रृदद भाॊ स्भृत्वा ददनातन त्वेकववॊशततभ ्॥ न तस्म दुराबॊ
फकञ् त ् त्रिषु रोके षु वै बवेत ्। असाध्मॊ साध्मेन्भत्मा: सवाि
ववजमी बवेत ्॥ तनत्मॊ म: ऩठतत स्तोिॊ ब्रहभबूत: स वै नय:।
तस्म दशानत: सवे देवा: ऩूता बवत्न्त ॥
 प्रततददन इस इक्कीस श्रोकों का इक्कीस ददनों तक प्रततददन इक्कीस फाय ऩाठ कयता हैं उसे सवाि ववजम प्राप्त
होती हैं।
 इस स्तोि के ऩाठ से व्मत्क्त को सवा इच्छीत वस्तु फक प्रात्प्त होती हैं। ऩुि-ऩौि आदद, करि, धन-धान्म, उत्तभ
वाहन एवॊ सभस्त बौततक सुख साधनो एवॊ शाॊतत फक प्रात्प्त होती हैं।
अन्म द्वाया फकमे जाने वारे भायण, उच् ाटन औय भोहन आदद प्रमोग से व्मत्क्त फक यऺा होती हैं।
44 ससतम्फय - 2019
अनॊत तुदाशी व्रत ववशेष परदामी हैं।
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
अनॊत तुदाशी का व्रत बािऩद शुक्र ऩऺ की
तुदाशी को फकमा जाता हैं। इस ददन बगवान नायामण
की कथा की जाती है। इस ददन अनन्त बगवान की
ऩूजा कयके बक्तगण वेद-ग्रॊथों का ऩाठ कयके सॊकटों से
यऺा कयने वारा अनन्तसूिफाॊधा जाता हैं।
अनंत चतुदथशी का व्रत की ऩूजा दोऩहय भें की जाती हैं।
व्रत-ऩूजन ववधान:
 अनॊत तुदाशी का व्रत वारे ददन व्रती को प्रात्
स्नान कयके तनम्न भॊि से सॊकल्ऩ कयना ादहमे।
भभाणखरऩाऩऺमऩूवाक शुबपरवृिमे
श्रीभदनॊतप्रीततकाभनमा अनॊतव्रतभहॊ करयष्मे।
 शास्िों भें मद्यवऩ व्रत का सॊकल्ऩ एवॊ ऩूजन फकसी
ऩववि नदी मा सयोवय के तट ऩय कयने का ववधान
है, मदद महॊ सॊबव न हो, तो घय भें ऩूजागृह की
स्वच्छ बूसभ को सुशोसबत कयके करश स्थावऩत
कयें।
 करश ऩय अष्टदर कभर के सभान फने फतान ऩय
शेषनाग की शैय्माऩय रेटे बगवान ववष्णु की भूतता
अथवा ध ि को यखें।
 भूतता के सम्भुख कु भकु भ, के सय मा हल्दी से यॊगा
ौदह गाॉठों वारा 'अनॊत' अथाात सूि मा घागा बी
यखें।
 इसके फाद ॐ अनन्तामनभ: भॊि से बगवान ववष्णु
तथा अनॊतसूिकी षोडशोऩ ाय-ववधधसे ऩूजा कयें।
 ऩूजनोऩयाॊत अनन्तसूिको भॊि ऩढकय ऩुरुष अऩने
दादहने हाथ औय स्िी फाएॊ हाथ भें फाॊध रें:
अनॊन्तसागयभहासभुिेभग्नान्सभभ्मुियवासुदेव।
अनॊतरूऩेववतनमोत्जतात्भाहमनन्तरूऩामनभोनभस्ते॥
नवीन अनॊत को धायण कय ऩुयाने का त्माग तनम्न भॊि
से कयें-
न्मूनाततरयक्तातन ऩरयस्पु टातन मानीह कभाथणण भमा कृ तातन।
सवाथणण चैतातन भभ ऺभस्व प्रमादह तुष्ट् ऩुनयागभाम॥
 अनॊतसूिफाॊध रेने के ऩश् ात फकसी ब्राहभण को
नैवेद्य (बोग) भें तनवेददत ऩकवान देकय स्वमॊ
सऩरयवाय प्रसाद ग्रहण कयें।
 ऩूजा के फाद व्रत-कथा को ऩढें मा सुनें।
 अनॊत व्रत बगवान ववष्णु को प्रसन्न कयने वारा
तथा अनॊत परदामक भाना गमा है।
 अनॊत व्रत भें बगवान ववष्णु से धन-ऩुिादद की
काभना से फकमा जाता है।
 ववद्वानो के भत से अनॊत की ौदह गाॊठें ौदह
रोकों की प्रतीक हैं, त्जनभें अनॊत बगवान ववद्यभान
हैं।
अनंत चतुदथशी व्रतकथा
ऩोयाणणक कथाके अनुशाय एक फाय भहायाज
मुधधत्ष्ठय ने याजसूममऻ फकमा। मऻभॊडऩ का तनभााण
अतत सुॊदय था ही, अद्भुत बी था। उसभें जर भें स्थर
तथा स्थर भें जर की भ्राॊतत उत्ऩन्न होती थी। ऩूयी
सावधानी के फाद बी फहुत से अततधथ उस अद्भुत भॊडऩ
भें धोखा खा ुके थे। दुमोधन बी उस मऻभॊडऩ भें
घूभते हुए स्थर के भ्रभ भें एक ताराफ भें धगय गए।
तफ बीभसेन तथा िौऩदी ने 'अॊधों की सॊतान
अॊधी' कहकय दुमोधन का भजाक उडामा। इससे दुमोधन
ध ढ़ गमा। उसके भन भें द्वेष ऩैदा हो गमा औय भत्स्तक
भें उस अऩभान का फदरा रेने के वव ाय उऩजने रगे।
कापी ददनों तक वह इसी उल्झन भें यहा फक आणखय
ऩाॉडवों से अऩने अऩभान का फदरा फकस प्रकाय सरमा
जाए। तबी उसके भत्स्तष्क भें द्मूत क्रीडा भें ऩाॉडवों को
गुरुत्व कामाथरम द्वाया यत्न-रुिाऺ ऩयाभशा Book Now@RS:- 910 550*
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45 ससतम्फय - 2019
हयाकय उस अऩभान का फदरा रेने की मुत्क्त आई।
उसने ऩाॉडवों को जुए के सरए न के वर आभॊत्रित ही
फकमा फत्ल्क उन्हें जुए भें ऩयात्जत बी कय ददमा।
ऩयात्जत होकय ऩाॉडवों को फायह वषा के सरए
वनवास बोगना ऩडा। वन भें यहते हुए ऩाॉडव अनेक
कष्ट सहते यहे। एक ददन वन भें मुधधत्ष्ठय ने बगवान
श्रीकृ ष्ण से अऩना दु्ख कहा तथा उसको दूय कयने का
उऩाम ऩूछा। तफ श्रीकृ ष्ण ने कहा- हे मुधधत्ष्ठय! तुभ
ववधधऩूवाक अनॊत बगवान का व्रत कयो। इससे तुम्हाये
साये सॊकट दूय हो जाएगा। तुम्हें हाया हुआ याज्म बी
वाऩस सभर जाएगा।
मुधधत्ष्ठय के आग्रह ऩय इस सॊदबा भें श्रीकृ ष्ण
एक कथा सुनाते हुए फोरे- प्रा ीन कार भें सुभन्तु
ब्राहभण की ऩयभ सुॊदयी तथा धभाऩयामण सुशीरा नाभक
कन्मा थी। वववाह मोग्म होने ऩय ब्राहभण ने उसका
वववाह कौंडडन्म ऋवष से कय ददमा। कौंडडन्म ऋवष
सुशीरा को रेकय अऩने आश्रभ की ओय रे तो यास्ते
भें ही यात हो गई। वे एक नदी के तट ऩय सॊध्मा कयने
रगे।
सुशीरा ने देखा- वहाॉ ऩय फहुत-सी त्स्िमाॉ सुॊदय-
सुॊदय वस्ि धायण कयके फकसी देवता की ऩूजा कय यही
हैं। उत्सुकतावश सुशीरा ने उनसे उस ऩूजन के ववषम
भें ऩूछा तो उन्होंने ववधधऩूवाक अनॊत व्रत की भहत्ता
फता दी। सुशीरा ने वहीॊ उस व्रत का अनुष्ठान कयके
ौदह गाॊठों वारा डोया हाथ भें फाॉधा औय अऩने ऩतत के
ऩास आ गई।
कौंडडन्म ऋवष ने सुशीरा से डोये के फाये भें ऩूछा तो
उसने सायी फात स्ऩष्ट कय दी। ऩयॊतु ऐश्वमा के भद भें
अॊधे हो ुके कौंडडन्म ऋवष को इससे कोई प्रसन्नता
नहीॊ हुई, फत्ल्क क्रोध भें आकय उन्होंने उसके हाथ भें
फॊधे डोये को तोडकय आग भें जरा ददमा।
मह अनॊतजी का घोय अऩभान था। उनके इस
दुष्कभा का ऩरयणाभ बी शीघ्र ही साभने आ गमा।
कौंडडन्म भुतन दु्खी यहने रगे।
उनकी सायी सम्ऩत्त्त नष्ट हो गई। इस दरयिता
का कायण ऩूछने ऩय सुशीरा ने डोये जराने की फात
दोहयाई। तफ ऩश् ाताऩ कयते हुए ऋवष 'अनॊत' की प्रात्प्त
के सरए वन भें तनकर गए।
जफ वे बटकते-बटकते तनयाश होकय धगय ऩडे तो
बगवान अनॊत प्रकट होकय फोरे- 'हे कौंडडन्म! भेये
ततयस्काय के कायण ही तुभ दु्खी हुए हो रेफकन तुभने
ऩश् ाताऩ फकमा है, अत् भैं प्रसन्न हूॉ। ऩय घय जाकय
ववधधऩूवाक अनॊत व्रत कयो। ौदह वषा ऩमान्त व्रत कयने
से तुम्हाया साया दु्ख दूय हो जाएगा। तुम्हें अनॊत
सम्ऩत्त्त सभरेगी।
कौंडडन्म ऋवष ने वैसा ही फकमा। उन्हें साये
क्रेशों से भुत्क्त सभर गई। श्रीकृ ष्ण की आऻा से
मुधधत्ष्ठय ने बी बगवान अनॊत का व्रत फकमा त्जसके
प्रबाव से ऩाॉडव भहाबायत के मुि भें ववजमी हुए तथा
ध यकार तक तनष्कॊ टक याज्म कयते यहे।
गणेशजी को दुवाा-दर ढ़ाने का भॊि
गणेशजी को 21 दुवाादर ढ़ाई जाती है। दो
दुवाा-दर नी े सरखे नाभभॊिों के साथ ढ़ाएॊ।
ॐ गणाधधऩाम नभ:।
ॐ उभाऩुिाम नभ:।
ॐ ववघ्ननाशनाम नभ:।
ॐ ववनामकाम नभ:।
ॐ ईशऩुिाम नभ:।
ॐ सवाससिप्रदाम नभ:।
ॐ एकदन्ताम नभ:।
ॐ इबवक्िाम नभ:।
ॐ भूषकवाहनाम नभ:।
ॐ कु भायगुयवे नभ:।
46 ससतम्फय - 2019
भनोवाॊतछत परो फक प्रात्प्त हेतु ससवि प्रद गणऩतत स्तोि
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
प्रततददन इस स्तोि का ऩाठ कयने से
भनोवाॊतछत पर शीघ्र प्राप्त होते हैं।
भनोवाॊतछत पर प्राप्त कयने हेतु गणेशजी
के ध ि मा भूतता के साभने भॊि जाऩ कय सकते
हैं। ऩूणा श्रिा एवॊ ऩूणा ववश्वास के साथ भनोवाॊतछत
पर प्रदान कयने वारे इस स्तोि का प्रततददन कभ
से कभ 21 फाय ऩाठ अवश्म कयें।
अधधकस्म अधधकॊ परभ्।
जऩ त्जतना अधधक हो सके उतना अच्छा है। मदद भॊि
अधधक फाय जाऩ कय सकें तो श्रेष्ठ। प्रात् एवॊ
सामॊकार दोनों सभम कयें, पर शीघ्र प्राप्त होता है।
काभना ऩूणा होने के ऩश् मात बी तनमसभत स्िोत रा ऩाठ कयते यहना ादहए। कु छ एक ववशेष ऩरयत्स्थतत भें
ऩूवा जन्भ के सॊध त कभा स्वरूऩ प्रायब्ध की प्रफरता के कायण भनोवाॊतछत पर की प्रात्प्त मा तो देयी सॊबव हैं!
भनोवाॊतछत पर की प्रात्प्त के अबाव भें मोग्म ववद्वान की सराह रेकय भागादशान प्राप्त कयना उध त होगा।
अववश्वास व कु शॊका कयके आयाध्म के प्रतत अश्रिा व्मक्त कयने से व्मत्क्त को प्रततकू र प्ररयणाभ दह प्राप्त होते हैं।
शास्िोक्त व न हैं फक बगवान (इष्ट) फक आयाधना कबी व्मथा नहीॊ जाती।
भंत्र:- गणऩततववाघ्नयाजो रम्फतुण्डो गजानन्। द्वैभातुयश् हेयम्फ एकदन्तो गणाधधऩ्॥
ववनामकश् ारुकणा् ऩशुऩारो बवात्भज्। द्वादशैतातन नाभातन प्रातरुत्थाम म् ऩठेत्॥
ववश्वॊ तस्म बवेद्वश्मॊ न ववघ्नॊ बवेत्क्वध त्। (ऩद्म ऩु. ऩृ. 61।31-33)
बावाथथ: गणऩतत, ववघ्नयाज, रम्फतुण्ड, गजानन, द्वैभातुय, हेयम्फ, एकदन्त, गणाधधऩ, ववनामक, ारुकणा, ऩशुऩार औय
बवात्भज- गणेशजी के मह फायह नाभ हैं। जो व्मत्क्त प्रात्कार उठकय इनका तनमसभत ऩाठ कयता हैं, सॊऩूणा ववश्व
उनके वश भें हो जाता हैं, तथा उसे जीवन भें कबी ववघ्न का साभना नहीॊ कयना ऩडता।
गणेश रक्ष्भी मॊि
प्राण-प्रततत्ष्ठत गणेश रक्ष्भी मॊि को अऩने घय-दुकान-ओफपस-पै क्टयी भें ऩूजन स्थान, गल्रा मा अरभायी भें
स्थावऩत कयने व्माऩाय भें ववशेष राब प्राप्त होता हैं। मॊि के प्रबाव से बाग्म भें उन्नतत, भान-प्रततष्ठा एवॊ व्माऩाय
भें वृवि होती हैं एवॊ आधथाक त्स्थभें सुधाय होता हैं। गणेश रक्ष्भी मॊि को स्थावऩत कयने से बगवान गणेश औय देवी
रक्ष्भी का सॊमुक्त आशीवााद प्राप्त होता हैं। Rs.730 से Rs.10900 तक
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47 ससतम्फय - 2019
भॊि ससि ऩन्ना गणेश से हो सकता हैं वास्तु दोष का तनवायण
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
दहॊदू सॊस्कृ तत भें बगवान गणेश सवा ववघ्न ववनाशक
भाना हैं। इसी कायण गणऩतत जी का ऩूजन फकसी बी व्रत
अनुष्ठान भें सवा प्रथभ फकमा जाता हैं। बवन भें वास्तु
ऩूजन कयते सभम बी गणऩतत जी को प्रथभऩूजा जाता हैं।
त्जस घय भें तनमसभत गणऩतत जी का ववधध ववधान से
ऩूजन होता हैं, वहाॊ सुख-सभृवि एवॊ रयवि-ससवि का तनवास
होता हैं।
गणेश प्रततभा (भूतता) की स्थाऩना बवन के भुख्म
द्वाय के ऊऩय अॊदय-फहाय दोनो औय रगाने से अधधक राब
प्राप्त होता हैं।
गणेश प्रततभा (भूतता) की ऩूजा घयभें स्थाऩना कयने
ऩय उन्हें ससॊदूय ढाने से शुब पर फक प्रात्प्त होती हैं।
बवन भें द्वायवेध हो, अथाात बवन के भुख्म द्वाय के
साभने वृऺ, भॊददय, स्तॊब आदद द्वाय भें प्रवेश
कयने वारी उजाा हेतु फाधक होने ऩय वास्तु भें उसे द्वायवेध भाना जाता हैं। द्वायवेध होने ऩय वहाॊ यहने वारों
भें उच् ाटन होता हैं। ऐसे भें बवन के भुख्म द्वाय ऩय गणोशजी की फैठी हुई प्रततभा (भूतता) रगाने से द्वायवेध का
तनवायण होता हैं।
* भूततथ का आकाय 11 अंगुर से अधधक नहीं होना चादहए।
वास्तु दोष के तनवायण एवॊ घय की सुख शाॊतत के सरए ऩन्ना गणेश की प्रततभा ववशेष परदामी हैं।
ऩूजा स्थानभें ऩूजन के सरए गणेश जी की एक से अधधक प्रततभा (भूततथ) यखना वश्जथत हैं।
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48 ससतम्फय - 2019
।।गणऩतत अथवाशीषा।।
ॐ नभस्ते गणऩतमे। त्वभेव प्रत्मऺॊ तत्वभसस । त्वभेव के वरॊ कताा सस। त्वभेव के वरॊ धताासस। त्वभेव के वरॊ
हताासस । त्वभेव सवं खत्ल्वदॊ ब्रहभासस। त्व साऺादात्भासस तनत्मभ ्। ऋतॊ वत्च्भ। सत्मॊ वत्च्भ। अव त्व भाॊभ ्। अव
वक्तायभ ्। अव श्रोतायभ्। अव दातायभ्। अव धातायभ्। अवा नू ानभव सशष्मभ्।अव ऩश् ातात ्।अव ऩुयस्तात ्।
अवोत्तयात्तात ्। अव दक्षऺणात्तात ्।
अव ोध्वाात्तात ्। अवाधयात्तात ्। सवातो भाॉ ऩादह-ऩादह सभॊतात ्। त्वॊ वाङ्भम स्त्वॊ ध न्भम्। त्वभानॊदभसमस्त्वॊ
ब्रहभभम्। त्वॊ सत्च् दानॊदात ् द्वद्वतीमोसस। त्वॊ प्रत्मऺॊ ब्रहभासस। त्वॊ ऻानभमो ववऻानभमोसस। सवं जगदददॊ त्वत्तो
जामते। सवं जगदददॊ त्वत्त त्स्तष्ठतत। सवं जगदददॊ त्वतम वमभेष्मतत। सवं जगदददॊ त्वतम प्रत्मेतत। त्वॊ बूसभयाऩोनरो
तनरो नब्। त्वॊ त्वारय वाकू ऩदातन। त्वॊ गुणिमातीत: त्वभवस्थािमातीत्। त्वॊ देहिमातीत्। त्वॊ कारिमातीत्। त्वॊ
भूराधाय त्स्थतोसस तनत्मॊ। त्वॊ शत्क्त िमात्भक्। त्वाॊ मोधगनो ध्मामॊतत तनत्मॊ। त्वॊ ब्रहभा त्वॊ ववष्णुस्त्वॊ रूिस्त्वॊ
इॊिस्त्वॊ अत्ग्नस्त्वॊ वामुस्त्वॊ सूमास्त्वॊ ॊिभास्त्वॊ ब्रहभबूबुाव:स्वयोभ्।
गणादद ऩूवाभुच् ामा वणााददॊ तदनॊतयभ्। अनुस्वाय: ऩयतय्। अधेन्दुरससतभ्। तायेण ऋिॊ। एतत्तव भनुस्व रूऩभ्।
गकाय: ऩूवारूऩभ्। अकायो भध्मभरूऩभ्। अनुस्वायश् ान्त्मरूऩभ ्। त्रफन्दुरूत्तयरूऩभ ्। नाद: सॊधानभ्। सॉ दहतासॊधध: सैषा
गणेश ववद्या। गणकऋवष: तन ृद्गामिीच्छॊद्। गणऩततदेवता। ॐ गॊ गणऩतमे नभ्।एकदॊताम ववद्भहे। वक्रतुण्डाम
धीभदह। तन्नो दॊती प्र ोदमात ्। एकदॊतॊ तुहास्तॊ ऩाशभॊकु श धारयणभ्। यदॊ वयदॊ हस्तै ववाभ्राणॊ भूषकध्वजभ्। यक्तॊ
रॊफोदयॊ शूऩा कणाकॊ यक्तवाससभ्। यक्तगॊधानु सरप्ताॊगॊ यक्तऩुष्ऩै: सुऩुत्जतभ्। बक्तानुकॊ वऩनॊ देवॊ जगत्कायण भच्मुतभ्।
आववबूातॊ सृष्टमादौ प्रकृ ते ऩुरुषात्ऩयभ्। एवॊ ध्मामतत मो तनत्मॊ स मोगी मोधगनाॊ वय्।
नभो व्रातऩतमे। नभो गणऩतमे। नभ: प्रभथऩतमे। नभस्ते अस्तु रॊफोदयामै एकदॊताम। ववघ्ननासशने सशवसुताम।
श्रीवयदभूतामे नभो नभ्। एतदथवा शीषा मोधीते। स ब्रहभ बूमाम कल्ऩते। स सवा ववघ्नैनाफाध्मते। स सवात: सुखभेधते।
स ऩच् भहाऩाऩात्प्रभुच्मते। सामभधीमानो ददवसकृ तॊ ऩाऩॊ नाशमतत। प्रातयधीमानो यात्रिकृ तॊ ऩाऩॊ नाशमतत। सामॊ प्रात:
प्रमुॊजानो अऩाऩो बवतत। सवािाधीमानो ड ऩववघ्नो बवतत। धभााथाकाभभोऺॊ ववॊदतत। इदभथवाशीषाभसशष्माम न देमभ ्।
मो मदद भोहात ् दास्मतत स ऩाऩीमान ् बवतत। सहस्रावतानात ् मॊ मॊ काभभधीते तॊतभनेन साधमेत ्। अनेन गणऩतत
भसबवषॊ तत स वाग्भी बवतत । तुथ्मााभनश्र्नन जऩतत स ववद्यावान बवतत। इत्मथवाण वाक्मभ्। ब्रहभाद्यावयणॊ ववद्यात ्
न त्रफबेतत कदा नेतत। मो दूवांकु यैंमाजतत स वैश्रवणोऩभो बवतत। मो राजैमाजतत स मशोवान बवतत स भेधावान बवतत।
मो भोदक सहस्रेण मजतत स वाॊतछत पर भवाप्रोतत। म: साज्मससभतद्भ माजतत स सवं रबते स सवं रबते। अष्टौ
ब्राहभणान ् सम्मग्ग्राहतमत्वा सूमा व ास्वी बवतत। सूमाग्रहे भहानद्माॊ प्रततभा सॊतनधौ वा जप्त्वा ससिभॊिों बवतत।
भहाववघ्नात ् प्रभुच्मते। भहादोषात ् प्रभुच्मते। भहाऩाऩात ् प्रभुच्मते। स सवाववद् बवतत से सवाववद् बवतत । म एवॊ वेद
इत्मुऩतनषद्।
॥इतत श्री गणऩतत अथवाशीषा सम्ऩुणा ॥
49 ससतम्फय - 2019
गणेश स्तवन
श्री आदद कवव वाल्भीकक उवाच
तु:षत्ष्टकोटमाख्मववद्याप्रदॊ त्वाॊ सुया ामाववद्याप्रदानाऩदानभ ्। कठाबीष्टववद्याऩाकॊ दन्तमुग्भॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
स्वनाथॊ प्रधानॊ भहाववघन्नाथॊ तनजेच्छाववसृष्टाण्डवृन्देशनाथभ ्। प्रबुॊ दक्षऺणास्मस्म ववद्याप्रदॊ त्वाॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
ववबो व्माससशष्माददववद्याववसशष्टवप्रमानेकववद्याप्रदातायभाद्यभ ्। भहाशाक्तदीऺागुरुॊ श्रेष्ठदॊ त्वाॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
ववधािे िमीभुख्मवेदाॊश् मोगॊ भहाववष्णवे ागभाज शॊकयाम। ददशन्तॊ सूमााम ववद्मायहस्मॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
भहाफुविऩुिाम ैकॊ ऩुयाणॊ ददशन्तॊ गजास्मस्म भाहात्म्ममुक्तभ ्। तनजऻानशक्त्मा सभेतॊ ऩुयाणॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
िमीशीषासायॊ रु ानेकभायॊ यभाफुविदायॊ ऩयॊ ब्रहभऩायभ ्। सुयस्तोभकामॊ गणौघाधधनाथॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
ध दानन्दरूऩॊ भुतनध्मेमरूऩॊ गुणातीतभीशॊ सुयेशॊ गणेशभ ्। धयानन्दरोकाददवासवप्रमॊ त्वाॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
अनेकप्रतायॊ सुयक्ताब्जहायॊ ऩयॊ तनगुाणॊ ववश्वसद्ब्रहभरूऩभ ्। भहावाक्मसॊदोहतात्ऩमाभूतता कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥
इदॊ मे तु कव्मष्टकॊ बत्क्तमुक्तात्स्िसॊध्मॊ ऩठन्ते गजास्मॊ स्भयन्त:। कववत्वॊ सुवाक्माथाभत्मद्भुतॊ ते रबन्ते प्रसादाद् गणेशस्म
भुत्क्तभ ्॥
॥इतत श्री वाल्भीफक कृ त श्रीगणेश स्तोि सॊऩूणाभ्॥
पर: जो व्मत्क्त श्रिा बाव से तीनोकार सुफह सॊध्मा एवॊ यािी के सभम वाल्भीफक कृ त श्रीगणेश का स्तवन कयते
उन्हे सबी बौततक सुखो फक प्रात्प्त होकय उसे भोऺ को प्राप्त कय रेता हैं, एसा शास्रोक्त व न हैं ।
ववष्णुकृ तॊ गणेशस्तोिभ्
श्री नायामण उवाच
अथ ववष्णु: सबाभध्मे सम्ऩूज्म तॊ गणेश्वयभ्। तृष्टाव ऩयमा बक्त्मा सवाववघत्न्वनाशकभ ्॥
श्री ववष्णु उवाच
ईश त्वाॊ स्तोतुसभच्छासभ ब्रहभज्मोतत: सनातनभ्। तनरूवऩतुभशक्तोऽहभनुरूऩभनीहकभ्॥1॥ प्रवयॊ सवादेवानाॊ ससिानाॊ
मोधगनाॊ गुरुभ्। सवास्वरूऩॊ सवेशॊ ऻानयासशस्वरूवऩणभ्॥2॥ अव्मक्तभऺयॊ तनत्मॊ सत्मभात्भस्वरूवऩणभ ्।
वामुतुल्मातततनसराप्तॊ ाऺतॊ सवासाक्षऺणभ्॥3॥ सॊसायाणावऩाये भामाऩोते सुदुराबे। कणाधायस्वरूऩॊ
बक्तानुग्रहकायकभ्॥4॥ वयॊ वयेण्मॊ वयदॊ वयदानाभऩीश्वयभ्। ससिॊ ससविस्वरूऩॊ ससविदॊ ससविसाधनभ्॥5॥
ध्मानाततरयक्तॊ ध्मेमॊ ध्मानासाध्मॊ धासभाकभ्। धभास्वरूऩॊ धभाऻॊ धभााधभापरप्रदभ्॥6॥ फीजॊ सॊसायवृऺाणाभङ्कु यॊ
तदाश्रमभ ्। स्िीऩुन्नऩुॊसकानाॊ रूऩभेतदतीत्न्िमभ्॥7॥ सवााद्यभग्रऩूज्मॊ सवाऩूज्मॊ गुणाणावभ्। स्वेच्छमा सगुणॊ ब्रहभ
तनगुाणॊ ावऩ स्वेच्छमा॥8॥ स्व्मॊ प्रकृ ततरूऩॊ प्राकृ तॊ प्रकृ ते: ऩयभ्। त्वाॊ स्तोतुभऺभोऽनन्त: सहस्िवदनेन ॥9॥ न
ऺभ: ऩञ् वक्िश् न ऺभश् तुयानन्। सयस्वती न शक्ता न शक्तोऽहॊ तव स्तुतौ॥10॥ न शक्ताश् तुवेदा: के वा
ते वेदवाददन्॥11॥ इत्मेवॊ स्तवनॊ कृ त्वा सुयेशॊ सुयसॊसदद। सुयेशश् सुयै: साद्र्ध ववययाभ यभाऩतत्॥12॥ इदॊ ववष्णुकृ तॊ
स्तोिॊ गणेशस्म म: ऩठेत ्। सामॊप्रातश् भध्माहने बत्क्तमुक्त: सभादहत्॥13॥ तद्वद्वघत्न्नघन ् कु रुते ववघनेश्व्सततॊ
भुने। वधाते सवाकल्माणॊ कल्माणजनक: सदा॥14॥ मािाकारे ऩदठत्वा तु मो मातत बत्क्तऩूवाकभ ्। तस्म
सवााबीष्टससविबावत्मेव न सॊशम्॥15॥ तेन दृष्टॊ दु:स्वऩन ् सुस्वऩन्भुऩजामते। कदावऩ न बवेत्तस्म ग्रहऩीडा
दारुणा॥16॥ बवेद् ववनाश: शिूणाॊ फन्धूनाॊ वववधानभ ्। शश्वद्वद्वघत्न्वनाशश् शश्वत ् सम्ऩद्वद्ववधानभ्॥17॥ त्स्थया बवेद्
गृहे रक्ष्भी: ऩुिऩौिवववधधानी। सवैश्वमासभह प्राप्म हमन्ते ववष्णुऩदॊ रबेत ्॥18॥ परॊ ावऩ तीथाानाॊ मऻानाॊ मद् बवेद्
्ुवभ ्। भहताॊ सवादानानाॊ श्री गणेशप्रसादत्॥19॥
50 ससतम्फय - 2019
गणऩततस्तोिभ ्
सुवणावणासुन्दयॊ ससतैकदन्तफन्धुयॊ गृहीतऩाशकाङ्कु शॊ वयप्रदाबमप्रदभ्। तुबुाजॊ त्रिरो नॊ बुजङ्गभोऩवीततनॊ
प्रपु ल्रवारयजासनॊ बजासभ ससन्धुयाननभ्॥ फकयीटहायकु ण्डरॊ प्रदीप्तफाहुबूषणॊ प्र ण्डयत्नकङ्कणॊ
प्रशोसबताङ्तघमत्ष्टकभ्। प्रबातसूमासुन्दयाम्फयद्वमप्रधारयणॊ सयत्नहेभनूऩुयप्रशोसबताङ्तघ्रऩङ्कजभ्॥
सुवणादण्डभत्ण्डतप्र ण्ड ारु ाभयॊ गृहप्रदेन्दुसुन्दयॊ मुगऺणप्रभोददतभ्। कवीन्िध त्तयञ्जकॊ भहाववऩत्त्तबञ्जकॊ
षडऺयस्वरूवऩणॊ बजे गजेन्िरूवऩणभ्॥ ववरयञ् ववष्णुवत्न्दतॊ ववरूऩरो नस्तुतॊ धगयीशदशानेच्छमा सभवऩातॊ
ऩयाम्फमा। तनयन्तयॊ सुयासुयै: सऩुिवाभरो नै: भहाभखेष्टकभासु स्भृतॊ बजासभ तुत्न्दरभ्॥
भदौघरुब्ध ञ् रासरभञ्जुगुत्ञ्जतायवॊ प्रफुिध त्तयञ्जकॊ प्रभोदकणा ारकभ्। अनन्मबत्क्तभानवॊ
प्र ण्डभुत्क्तदामॊ नभासभ तनत्मभादयेण वक्रतुण्डनामकभ्॥ दारयिमवविावणभाशु काभदॊ स्तोिॊ
ऩठेदेतदजस्िभादयात्। ऩुिी करिस्वजनेषु भैिी ऩुभान् बवेदेकवयप्रसादात्॥
इस स्तोिा का प्रततददन ऩाठ कयने से गणेशजी की कृ ऩा से उसे सॊतान राब, स्िी प्रतत, सभि एवॊ
स्वजनो से एवॊ ऩरयवाय भें प्रेभ बाव फढता हैं।
॥श्री ववघ्नेश्वयाष्टोत्तय शतनाभस्तोिभ् ॥
ववनामको ववघ्नयाजो गौयीऩुिो गणेश्वय्। स्कॊ दाग्रजोव्मम् ऩूतो दऺोऽध्मऺो द्वद्वजवप्रम् ॥ १ ॥
अत्ग्नगवात्च्छद इन्िश्रीप्रद् । वाणीप्रदोअ् अव्मम् सवाससविप्रदश्शवातनो शवायीवप्रम् ॥ २ ॥
सवाात्भक् सृत्ष्टकताा देवोनेकाध ातत्श्शव् । शुिफुवि वप्रमश्शाॊतो ब्रहभ ायी गजानन् ॥ ३ ॥
द्वैभािेमो भुतनस्तुत्मो बक्तववघ्नववनाशन् । एकदन्तश्छतुफााहुश्छतुयश्शत्क्तसॊमुत् ॥ ४ ॥
रम्फोदयश्शूऩाकणो हयब्राहभ ववदुत्तभ् । कारो ग्रहऩतत् काभी सोभसूमाात्ग्नरो न् ॥ ५ ॥
ऩाशाङ्कु शधयश् ण्डो गुणातीतो तनयञ्जन् । अकल्भषस्स्वमॊससित्स्सिाध ात् ऩदाम्फुज् ॥ ६ ॥
फीजऩूयपरासक्तो वयदश्शाश्वत् कृ तत् । द्वद्वजवप्रमो वीतबमो गदी क्रीऺु ाऩधृत् ॥ ७ ॥
श्रीदोज उत्ऩरकय् श्रीऩतत् स्तुततहवषात् । कु रादिबेत्ता जदटर् कसरकल्भषनाशन् ॥ ८ ॥
न्ि ूडाभणण् कान्त् ऩाऩहायी सभादहत् । अधश्रतश्रीकयस्सौम्मो बक्तवाॊतछतदामक् ॥ ९ ॥
शान्त् कै वल्मसुखदस्सत्च् दानन्द ववग्रह् । ऻानी दमामुतो दाॊतो ब्रहभद्वेषवववत्जात् ॥ १० ॥
प्रभत्तदैत्मबमद् श्रीकॊ थो ववफुधेश्वय् । याभाध ातोववधधनाागयाजमऻोऩवीतक् ॥ ११ ॥
स्थूरकॊ ठ् स्वमॊकताा साभघोषवप्रम् ऩय् । स्थूरतुण्डोऽग्रणी धीयो वागीशत्स्सविदामक् ॥ १२ ॥
दूवाात्रफल्ववप्रमोऽव्मक्तभूततायद्भुतभूतताभान् । शैरेन्ितनुजोत्सङ्गखेरनोत्सुकभानस् ॥ १३ ॥
स्वरावण्मसुधासायो त्जतभन्भथववग्रह् । सभस्तजगदाधायो भामी भूषकवाहन् ॥ १४ ॥
रृष्टस्तुष्ट् प्रसन्नात्भा सवाससविप्रदामक् । अष्टोत्तयशतेनैवॊ नाम्नाॊ ववघ्नेश्वयॊ ववबुॊ ॥ १५ ॥
तुष्टाव शॊकय् ऩुिॊ त्रिऩुयॊ हॊतुभुत्मत् । म् ऩूजमेदनेनैव बक्त्मा ससविववनामकभ् ॥ १६ ॥
दूवाादरैत्रफाल्वऩिै् ऩुष्ऩैवाा ॊदनाऺतै् । सवाान्काभानवाप्नोतत सवाववघ्नै् प्रभुच्मते ॥
51 ससतम्फय - 2019
ससवि ववनामक व्रत ववधान
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
ससवि ववनामक व्रत बािऩद शुक्र ऩऺ की तुथॉ को ही फकमा जाता है। शास्िोक्त भान्मता के अनुशाय ददन दोऩहय
भें गणेशजी का जन्भ हुआ था। इसीसरए इस तुथॉ को ववनामक तुथॉ, ससविववनामक तुथॉ औय श्रीगणेश तुथॉ
के नाभ से जाना जाता है। इस सरमे ऩौयाणणक कार से ही इस ततधथ को गणेशोत्सव मा गणेश जन्भोत्सव के रूऩ
भें भनामा जाता हैं।
वैसे तो प्रत्मेक भास की तुथॉ को गणेशजी का व्रत होता है। रेफकन बािऩद के तुधथा व्रत का ववशेष भाहात्म्म है।
ऎसी भान्मता हैं की इस ददन जो श्रधारु व्रत, उऩवास औय दान आदद शुब कामा फकमा जाता है, श्रीगणेश की कृ ऩा
से सौ गुना पर प्राप्त हो जाता हैं। व्मत्क्त को श्री ववनामक तुथॉ कयने से भनोवाॊतछत पर प्राप्त होता है।
शास्िोक्त ववधध-ववधान से श्री गणेशजी का ऩूजन व व्रत इस प्रकाय कयना अत्मॊत राबप्रद होता हैं।
ववधध
 प्रात्कार स्नानआदद तनत्मकभा से शीघ्र तनवृत्त हो कय। अऩने साभथाम के अनुसाय ऩूणा बत्क्त बाव से
 बगवान गणेश की सोने, ाॊदी, ताॊफे, ऩीतर मा सभट्टी से फनी प्रततभा स्थावऩत कयें। भूतता को षोडशोऩ ाय ऩूजन-
आयती आदद से ववधध-वत ऩूजन कयें।
 गणेशजी की भूतता ऩय ससॊदूय ढ़ाएॊ।
 गणेशजी का भॊि फोरते हुए 21 दुवाा दर ढ़ाएॊ।
 श्री गणेशजी को रड्डुओॊ का बोग रगाएॊ।
 ब्राहभण बोजन कयाएॊ औय ब्राहभणों को दक्षऺणा प्रदान कयने के ऩश् ात ् सॊध्मा के सभम स्वमॊ बोजन ग्रहण कयें।
इस तयह ऩूजन कयने से बगवान श्रीगणेश अतत प्रसन्न होते हैं औय अऩने बक्तों की सकर इच्छाओॊ की ऩूतता कयते हैं।
सॊकष्टहय तुथॉ व्रत का प्रायॊब कै से हुवा?
संकष्टहय चतुदशी कथा्
बायद्वाज भुतन औय ऩृथ्वी के ऩुि भॊगर की कदठन तऩस्मा से प्रसन्न होकय भाघ भास के कृ ष्ण ऩऺ भें तुथॉ
ततधथ को गणऩतत ने उनको दशान ददमे थे।
गजानन के वयदान के परस्वरूऩ भॊगर कु भाय को इस ददन भॊगर ग्रह के रूऩ भें सौय भण्डर भें स्थान प्राप्त
हुवाथा। भॊगर कु भाय को गजानन से मह बी वयदान सभरा फक भाघ कृ ष्ण ऩऺ की तुदशॉ त्जसे सॊकष्टहय तुथॉ के नाभ
से जाना जाता हैं उस ददन जो बी व्मत्क्त गणऩततजी का व्रत यखेगा उसके सबी प्रकाय के कष्ट एवॊ ववघ्न सभाप्त हो
जाएॊगे।
एक अन्म कथा के अनुसाय बगवान शॊकय ने गणऩततजी से प्रसन्न होकय उन्हें वयदान ददमा था फक भाघ कृ ष्ण ऩऺ की
तुथॉ ततधथ को न्िभा भेये ससय से उतयकय गणेश के ससय ऩय शोबामभान होगा। इस ददन गणेश जी की उऩासना औय
व्रत त्रि-ताऩ (तीनो प्रकाय के ताऩ) का हयण कयने वारा होगा। इस ततधथ को जो व्मत्क्त श्रिा बत्क्त से मुक्त होकय
ववधध-ववधान से गणेश जी की ऩूजा कयेगा उसे भनोवाॊतछत पर फक प्रात्प्त होगी।
52 ससतम्फय - 2019
गणेश तुथॉ ऩय ॊि दशान से क्मों रगता हैं करॊक?
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
गणेश तुथॉ ऩय ॊि दशान तनषेध होने फक ऩौयाणणक भान्मता
हैं। शास्िोंक्त व न के अनुशाय जो व्मत्क्त इस ददन ॊिभा
को जाने-अन्जाने देख रेता हैं उसे सभथ्मा करॊक रगता हैं।
उस ऩय झूठा आयोऩ रगता हैं।
कथा
एक फाय जयासन्ध के बम से बगवान कृ ष्ण
सभुि के फी नगय फनाकय वहाॊ यहने रगे। बगवान
कृ ष्ण ने त्जस नगय भें तनवास फकमा था वह स्थान
आज द्वारयका के नाभ से जाना जाता हैं।
उस सभम द्वारयका ऩुयी के तनवासी से प्रसन्न
होकय सूमा बगवान ने सिजीत मादव नाभक व्मत्क्त
अऩनी स्मभन्तक भणण वारी भारा अऩने गरे से
उतायकय दे दी।
मह भणण प्रततददन आठ सेय सोना प्रदान कयती थी। भणण ऩातेही
सिजीत मादव सभृि हो गमा। बगवान श्री कृ ष्ण को जफ मह फात ऩता
री तो उन्होंने सिजीत
से स्मभन्तक भणण ऩाने की इच्छा व्मक्त की। रेफकन सिजीत ने भणण श्री कृ ष्ण को न देकय अऩने बाई
प्रसेनजीत को दे दी। एक ददन प्रसेनजीत सशकाय ऩय गमा जहाॊ एक शेय ने प्रसेनजीत को भायकय भणण रे री। मही
यीछों के याजा औय याभामण कार के जाभवॊत ने शेय को भायकय भणण ऩय कब्जा कय सरमा था।
कई ददनों तक प्रसेनजीत सशकाय से घय न रौटा तो सिजीत को ध ॊता हुई औय उसने सो ा फक श्रीकृ ष्ण ने
ही भणण ऩाने के सरए प्रसेनजीत की हत्मा कय दी। इस प्रकाय सिजीत ने ऩुख्ता सफूत जुटाए त्रफना ही सभथ्मा प्र ाय
कय ददमा फक श्री कृ ष्ण ने प्रसेनजीत की हत्मा कयवा दी हैं। इस रोकतनॊदा से आहत होकय औय इसके तनवायण के
सरए श्रीकृ ष्ण कई ददनों तक एक वन से दूसये वन बटक कय प्रसेनजीत को खोजते यहे औय वहाॊ उन्हें शेय द्वाया
प्रसेनजीत को भाय डारने औय यीछ द्वाया भणण रे जाने के ध हन सभर गए। इन्हीॊ ध हनों के आधाय ऩय श्री कृ ष्ण
जाभवॊत की गुपा भें जा ऩहुॊ े जहाॊ जाभवॊत की ऩुिी भणण से खेर यही थी। उधय जाभवॊत श्री कृ ष्ण से भणण नहीॊ
देने हेतु मुि के सरए तैमाय हो गमा। सात ददन तक जफ श्री कृ ष्ण गुपा से फाहय नहीॊ आए तो उनके सॊगी साथी
उन्हें भया हुआ जानकाय ववराऩ कयते हुए द्वारयका रौट गए। २१ ददनों तक गुपा भें मुि रता यहा औय कोई बी
झुकने को तैमाय नहीॊ था। तफ जाभवॊत को बान हुआ फक कहीॊ मे वह अवताय तो नहीॊ त्जनके दशान के सरए भुझे श्री
याभ ॊि जी से वयदान सभरा था। तफ जाभवॊत ने अऩनी ऩुिी का वववाह श्री कृ ष्ण के साथ कय ददमा औय भणण दहेज
भें श्री कृ ष्ण को दे दी। उधय कृ ष्ण जफ भणण रेकय रौटे तो उन्होंने सिजीत को भणण वाऩस कय दी। सिजीत अऩने
फकए ऩय रत्ज्जत हुआ औय अऩनी ऩुिी सत्मबाभा का वववाह श्री कृ ष्ण के साथ कय ददमा।
कु छ ही सभम फाद अक्रू य के कहने ऩय ऋतु वभाा ने सिजीत को भायकय भणण छीन री। श्री कृ ष्ण अऩने फडे
बाई फरयाभ के साथ उनसे मुि कयने ऩहुॊ े। मुि भें जीत हाससर होने वारी थी फक ऋतु वभाा ने भणण अक्रू य को दे
53 ससतम्फय - 2019
श्री भहारक्ष्भी मंत्र
धन फक देवी रक्ष्भी हैं जो भनुष्म को धन, सभृवि एवॊ ऐश्वमा प्रदान कयती हैं। अथा(धन) के त्रफना भनुष्म
जीवन दु्ख, दरयिता, योग, अबावों से ऩीडडत होता हैं, औय अथा(धन) से मुक्त भनुष्म जीवन भें सभस्त
सुख-सुववधाएॊ बोगता हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के ऩूजन से भनुष्म की जन्भों जन्भ की दरयिता का नाश
होकय, धन प्रात्प्त के प्रफर मोग फनने रगते हैं, उसे धन-धान्म औय रक्ष्भी की वृवि होती हैं। श्री
भहारक्ष्भी मॊि के तनमसभत ऩूजन एवॊ दशान से धन की प्रात्प्त होती है औय मॊि जी तनमसभत उऩासना से
देवी रक्ष्भी का स्थाई तनवास होता है। श्री भहारक्ष्भी मॊि भनुष्म फक सबी बौततक काभनाओॊ को ऩूणा कय
धन ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा हैं। अऺम तृतीमा, धनतेयस, दीवावरी, गुरु ऩुष्माभृत मोग यववऩुष्म
इत्मादद शुब भुहूता भें मॊि की स्थाऩना एवॊ ऩूजन का ववशेष भहत्व हैं।
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दी औय बाग तनकरा। श्री कृ ष्ण ने मुि तो जीत सरमा रेफकन भणण हाससर नहीॊ कय सके । जफ फरयाभ ने उनसे
भणण के फाये भें ऩूछा तो उन्होंने कहा फक भणण उनके ऩास नहीॊ। ऐसे भें फरयाभ णखन्न होकय द्वारयका जाने की
फजाम इॊिप्रस्थ रौट गए। उधय द्वारयका भें फपय ाा पै र गई फक श्री कृ ष्ण ने भणण के भोह भें बाई का बी
ततयस्काय कय ददमा। भणण के रते झूठे राॊछनों से दुखी होकय श्री कृ ष्ण सो ने रगे फक ऐसा क्मों हो यहा है। तफ
नायद जी आए औय उन्होंने कहा फक हे कृ ष्ण तुभने बािऩद भें शुक्र तुथॉ की यात को ॊिभा के दशान फकमेथे औय
इसी कायण आऩको सभथ्मा करॊक झेरना ऩड यहा हैं।
श्रीकृ ष्ण ॊिभा के दशान फक फात ववस्ताय ऩूछने ऩय नायदजी ने श्रीकृ ष्ण को करॊक वारी मह कथा फताई थी।
एक फाय बगवान श्रीगणेश ब्रहभरोक से होते हुए रौट यहे थे फक ॊिभा को गणेशजी का स्थूर शयीय औय गजभुख
देखकय हॊसी आ गई। गणेश जी को मह अऩभान सहन नहीॊ हुआ। उन्होंने ॊिभा को शाऩ देते हुए कहा, 'ऩाऩी तूने
भेया भजाक उडामा हैं। आज भैं तुझे शाऩ देता हूॊ फक जो बी तेया भुख देखेगा, वह करॊफकत हो जामेगा।
गणेशजी शाऩ सुनकय ॊिभा फहुत दुखी हुए।
गणेशजी शाऩ के शाऩ वारी फाज ॊिभा ने सभस्त देवताओॊ को सोनाई तो सबी देवताओॊ को ध ॊता हुई। औय
वव ाय ववभशा कयने रगे फक ॊिभा ही यािी कार भें ऩृथ्वी का आबूषण हैं औय इसे देखे त्रफना ऩृथ्वी ऩय यािी का
कोई काभ ऩूया नहीॊ हो सकता। ॊिभा को साथ रेकय सबी देवता ब्रहभाजी के ऩास ऩहु ें। देवताओॊ ने ब्रहभाजी को
सायी घटना ववस्ताय से सुनाई उनकी फातें सुनकय ब्रहभाजी फोरे, ॊिभा तुभने सबी गणों के अयाध्म देव सशव-ऩावाती
के ऩुि गणेश का अऩभान फकमा हैं। मदद तुभ गणेश के शाऩ से भुक्त होना ाहते हो तो श्रीगणेशजी का व्रत यखो।
वे दमारु हैं, तुम्हें भाप कय देंगे। ॊिभा गणेशजी को प्रशन्न कयने के सरमे कठोय व्रत-तऩस्मा कयने रगे। बगवान
गणेश ॊिभा की कठोय तऩस्मा से प्रसन्न हुए औय कहा वषाबय भें के वर एक ददन बािऩद भें शुक्र तुथॉ की यात
को जो तुम्हें देखेगा, उसे ही कोई सभथ्मा करॊक रगेगा। फाकी ददन कु छ नहीॊ होगा। ’ के वर एक ही ददन करॊक
रगने की फात सुनकय ॊिभा सभेत सबी देवताओॊ ने याहत की साॊस री। तफ से बािऩद भें शुक्र तुथॉ की यात
को ॊिभा के दशान का तनषेध हैं।
54 ससतम्फय - 2019
गणेश कव भ्
सॊसायभोहनस्मास्म कव स्म प्रजाऩतत्। ऋवषश्छन्दश् फृहती देवो रम्फोदय: स्वमभ्॥
धभााथाकाभभोऺेषु ववतनमोग: प्रकीततात्। सवेषाॊ कव ानाॊ सायबूतसभदॊ भुने॥
ॐ गॊ हुॊ श्रीगणेशाम स्वाहा भे ऩातु भस्तकभ्। द्वात्रिॊशदऺयो भन्िो रराटॊ भे सदावतु॥
ॐ ह्ीॊ क्रीॊ श्रीॊ गसभतत सॊततॊ ऩातु रो नभ्। तारुकॊ ऩातु ववघनेश: सॊततॊ धयणीतरे॥
ॐ ह्ीॊ श्रीॊ क्रीसभतत सॊततॊ ऩातु नाससकाभ्। ॐ गौं गॊ शूऩाकणााम स्वाहा ऩात्वधयॊ भभ॥
दन्तातन तारुकाॊ त्जहवाॊ ऩातु भे षोडशाऺय्॥
ॐ रॊ श्रीॊ रम्फोदयामेतत स्वाहा गण्डॊ सदावतु। ॐ क्रीॊ ह्ीॊ ववघन्नाशाम स्वाहा कणा सदावतु॥
ॐ श्रीॊ गॊ गजाननामेतत स्वाहा स्कन्धॊ सदावतु। ॐ ह्ीॊ ववनामकामेतत स्वाहा ऩृष्ठॊ सदावतु॥
ॐ क्रीॊ ह्ीसभतत कङ्कारॊ ऩातु वऺ:स्थरॊ गभ्। कयौ ऩादौ सदा ऩातु सवााङ्गॊ ववघत्न्नघन्कृ त ्॥
प्राच्माॊ रम्फोदय: ऩातु आगनेय्माॊ ववघन्नामक्। दक्षऺणे ऩातु ववघनेशो नैऋा त्माॊ तु गजानन्॥
ऩत्श् भे ऩावातीऩुिो वामव्माॊ शॊकयात्भज्॥ कृ ष्णस्माॊशश् ोत्तये ऩरयऩूणातभस्म ॥
ऐशान्माभेकदन्तश् हेयम्फ: ऩातु ोध्वात्। अधो गणाधधऩ: ऩातु सवाऩूज्मश् सवात्॥
स्वप्ने जागयणे ैव ऩातु भाॊ मोधगनाॊ गुरु्।
इतत ते कधथतॊ वत्स सवाभन्िौघववग्रहभ्। सॊसायभोहनॊ नाभ कव ॊ ऩयभाद्भुतभ्॥
श्रीकृ ष्णेन ऩुया दत्तॊ गोरोके यासभण्डरे। वृन्दावने ववनीताम भहमॊ ददनकयात्भज्॥
भमा दत्तॊ तुभ्मॊ मस्भै कस्भै न दास्मसस। ऩयॊ वयॊ सवाऩूज्मॊ सवासङ्कटतायणभ्॥
गुरुभभ्मच्मा ववधधवत ् कव ॊ धायमेत्तु म्। कण्ठे वा दक्षऺणे फाहौ सोऽवऩ ववष्णुना सॊशम्॥
अश्वभेधसहस्िाणण वाजऩेमशतातन । ग्रहेन्िकव स्मास्म कराॊ नाहात्न्त षोडशीभ्॥
इदॊ कव भऻात्वा मो बजेच्छॊकयात्भजभ्। शतरऺप्रजप्तोऽवऩ न भन्ि: ससविदामक्॥
॥ इतत श्री गणेश कव सॊऩूणाभ ्॥
॥गणेशद्वादशनाभस्तोिभ्॥
शुक्राॊम्फयधयभ् देवभ् शसशवणं तुबुाजभ् । प्रसन्नवदनभ् ध्मामेत्सवाववघ्नोऩशाॊतमे ।।१।।
अबीत्प्सताथाससद्ध्मथं ऩूजेतो म: सुयासुयै्। सवाववघ्नहयस्तस्भै गणाधधऩतमे नभ्।।२।।
गणानाभधधऩश् ण्डो गजवक्ित्स्िरो न्। प्रसन्न बव भे तनत्मभ् वयदातववानामक ।।३।।
सुभुखश् ैकदन्तश् कवऩरो गजकणाक: रम्फोदयश् ववकटो ववघ्ननाशो ववनामक्।।४।।
धूम्रके तुगाणाध्मऺो बार ॊिो गजानन्। द्वादशैतातन नाभातन गणेशस्म म: ऩठेत ् ।। ५ ।।
ववद्याथॉ रबते ववद्याभ् धनाथॉ ववऩुरभ् धनभ् । इष्टकाभभ् तु काभाथॉ धभााथॉ भोऺभऺमभ ् ।। ६ ।।
ववद्यायभ्भे वववाहे प्रवेशे तनगाभे तथा सॊग्राभे सॊकटेश् ैव ववघ्नस्तस्म न जामते ।। ७ ।।
॥इतत श्री गणेशद्वादशनाभ स्तोिभ् सम्ऩुणा॥
55 ससतम्फय - 2019
ऋण भुत्क्त हेतु श्री गणेश की भॊि साधना
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
ववतनमोग्- ॐ अस्म श्रीऋण हयण कतृा गणऩतत भन्िस्म सदा
सशव ऋवष्, अनुष्टुऩ छन्द्, श्रीऋण हताा गणऩतत देवता, ग्रौं
फीजॊ, गॊ शत्क्त्, गों कीरकॊ , भभ सकर ऋण नाशाथे जऩे
ववतनमोग्।
ऋष्मादद न्मास्- सदा सशव ऋषमे नभ् सशयसस, अनुष्टुऩ
छन्दसे नभ् भुखे, श्रीऋण हताा गणऩतत देवतामै नभ् रृदद,
ग्रौं फीजाम नभ् गुहमे, गॊ शक्तमे नभ् ऩादमो, गों कीरकाम
नभ् नाबौ, भभ सकर ऋण नाशाथे जऩे ववतनमोगाम नभ्
अच्जरौ।
कय न्मास्- ॐ गणेश अॊगुष्ठाभ्माॊ नभ्, ऋण तछत्न्ध
तजानीभ्माॊ नभ्, वयेण्मॊ भध्मभाभ्माॊ नभ्, हुॊ अनासभकाभ्माॊ
नभ्, नभ् कतनत्ष्ठकाभ्माॊ नभ्, पट् कय तर कय ऩृष्ठाभ्माॊ
नभ्।
षडंग न्मास्- ॐ गणेश रृदमाम नभ्, ऋण तछत्न्ध सशयसे
स्वाहा, वयेण्मॊ सशखामै वषट्, हुॊ कव ाम हुभ ्, नभ् नेि िमाम
वौषट्, पट् अस्िाम पट्।
ध्मान्-
ॐ ससन्दूय-वणं द्वद्व-बुजॊ गणेशॊ, रम्फोदयॊ ऩद्म-दरे तनववष्टभ ्।
ब्रहभादद-देवै् ऩरय-सेव्मभानॊ, ससिैमुातॊ तॊ प्रणभासभ देवभ ्।।
आवाहन इत्मादद कय ऩञ् ोऩ ायों मा भानससक ऩूजन कये।
॥कवच-ऩाठ॥
ॐ आभोदश् सशय् ऩातु, प्रभोदश् सशखोऩरय, सम्भोदो भ्रू-मुगे
ऩातु, भ्रू-भध्मे गणाधीऩ्।
गण-क्रीडश् ऺुमुागॊ, नासामाॊ गण-नामक्, त्जहवामाॊ सुभुख्
ऩातु, ग्रीवामाॊ दुम्भुाख्॥
ववघ्नेशो रृदमे ऩातु, फाहु-मुग्भे सदा भभ, ववघ्न-कत्ताा
उदये, ववघ्न-हत्ताा सरॊगके ।
गज-वक्िो कदट-देशे, एक-दन्तो तनतम्फके , रम्फोदय् सदा
ऩातु, गुहम-देशे भभारुण्॥
व्मार-मऻोऩवीती भाॊ, ऩातु ऩाद-मुगे सदा, जाऩक् सवादा ऩातु,
जानु-जॊघे गणाधधऩ्। हरयिा् सवादा ऩातु, सवांगे गण-नामक्॥
॥स्तोत्र-ऩाठ॥
सृष्ट्मादौ ब्रहभणा सम्मक्, ऩूत्जत् पर-ससिमे। सदैव ऩावाती-
ऩुि्, ऋण-नाशॊ कयोतु भे॥१॥
त्रिऩुयस्म वधात ् ऩूवं-शम्बुना सम्मगध ात्। दहयण्म-
कश्मप्वादीनाॊ, वधाथे ववष्णुनाध ात्॥२॥
भदहषस्म वधे देव्मा, गण-नाथ् प्रऩूत्जत्। तायकस्म वधात ्
ऩूवं, कु भायेण प्रऩुत्जत्॥३॥
बास्कयेण गणेशो दह, ऩूत्जतश्छवव-ससिमे। शसशना कात्न्त-
वृिमथं, ऩूत्जतो गण-नामक्।
ऩारनाम तऩसाॊ, ववश्वासभिेण ऩूत्जत्॥४॥
॥पर-श्रुतत॥
इदॊ त्वृण-हय-स्तोिॊ, तीव्र-दारयद्र्म-नाशनभ ्, एक-वायॊ ऩठेत्न्नत्मॊ,
वषाभेकॊ सभादहत्।
दारयद्र्मॊ दारुणॊ त्मक्त्वा, कु फेय-सभताॊ व्रजेत ्।।
उक्त ववधान सॊऩन्न होने ऩय इस भॊि का १ भार मा कभ-
से-कभ २१ फाय जऩ कये।
भन्त्र्- ॐ गणेश ऋणं तछश्न्ध वयेण्मं हुं नभ् पट्
वषा बय कव औय भॊि का ऩाठ कयने से भनुष्म के दारयद्र्म
का नाश होता है तथा रक्ष्भी प्राप्त होती है।
नोट: बगवान श्री गणेश की मह धन दामी साधना प्रमोग हैं।
साधना का प्रमोग ऩीरे यॊग के आसन ऩय ऩीरे वस्ि धायण
कय ऩीरे यॊग की भारा मा ऩीरे सूत भें फनी स्पदटक की
भारा से कयना अत्मॊत राबप्राद होता हैं। साधना कार भें
गणेशजी को ऩूजा भें दूवाा ढ़ाए।
भंत्रोच्छ्चायण भें क्रभश् ववतनमोग, न्मास, ध्मान कय आवाहन
औय ऩूजन कये। ऩूजन के ऩश् ात ्कव - ऩाठ कयने के फाद
स्तोि का ऩाठ कये। स्तोि की सभात्प्त ऩय भॊि का जऩ कयें।
56 ससतम्फय - 2019
ऋण भो न भहा गणऩतत स्तोि
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
ववतनमोग्- ॐ अस्म श्रीऋण भो न भहा गणऩतत स्तोि भन्िस्म बगवान ् शुक्रा ामा ऋवष्, ऋण-भो न-गणऩतत्
देवता, भभ-ऋण-भो नाथं जऩे ववतनमोग्।
ऋष्मादद-न्मास्- बगवान ् शुक्रा ामा ऋषमे नभ् सशयसस, ऋण-भो न-गणऩतत देवतामै नभ् रृदद, भभ-ऋण-भो नाथे
जऩे ववतनमोगाम नभ् अञ्जरौ।
॥भूर-स्तोत्र॥
ॐ स्भयासभ देव-देवेश !वक्र-तुणडॊ भहा-फरभ्। षडऺयॊ कृ ऩा-ससन्धु, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥१॥
भहा-गणऩततॊ देवॊ, भहा-सत्त्वॊ भहा-फरभ्। भहा-ववघ्न-हयॊ सौम्मॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥२॥
एकाऺयॊ एक-दन्तॊ, एक-ब्रहभ सनातनभ्। एकभेवाद्वद्वतीमॊ , नभासभ ऋण-भुक्तमे॥३॥
शुक्राम्फयॊ शुक्र-वणं, शुक्र-गन्धानुरेऩनभ ्। सवा-शुक्र-भमॊ देवॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥४॥
यक्ताम्फयॊ यक्त-वणं, यक्त-गन्धानुरेऩनभ्। यक्त-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥५॥
कृ ष्णाम्फयॊ कृ ष्ण-वणं, कृ ष्ण-गन्धानुरेऩनभ्। कृ ष्ण-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥६॥
ऩीताम्फयॊ ऩीत-वणं, ऩीत-गन्धानुरेऩनभ्। ऩीत-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥७॥
नीराम्फयॊ नीर-वणं, नीर-गन्धानुरेऩनभ्। नीर-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥८॥
धूम्राम्फयॊ धूम्र-वणं, धूम्र-गन्धानुरेऩनभ्। धूम्र-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥९॥
सवााम्फयॊ सवा-वणं, सवा-गन्धानुरेऩनभ ्। सवा-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥१०॥
बि-जातॊ रुऩॊ , ऩाशाॊकु श-धयॊ शुबभ्। सवा-ववघ्न-हयॊ देवॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥११॥
॥पर-श्रुतत॥ म् ऩठेत ् ऋण-हयॊ-स्तोिॊ, प्रात्-कारे सुधी नय्। षण्भासाभ्मन्तये ैव, ऋणच्छेदो बववष्मतत॥
बावाथथ: जो व्मत्क्त उक्त ऋण भो न स्तोि का ववधध-ववधान व ऩूणा तनष्ठा से तनमसभत प्रात् कार ऩाठ कयता हैं
उसके सभस्त प्रकाय के ऋणों से भुत्क्त सभर जाती हैं।
गणेशजी को वप्रम हैं ससॊदूय : गणेश ऩूजन भें ससॊदूय का उऩमोग अत्मॊत शुब एवॊ राबकायी होता हैं। क्मोफकॊ
बगवान गणेशजीको ससॊदूय अत्माधधक वप्रम हैं। गणेश जी को शुि घी भें ससॊदूय सभराकय रेऩ ढाने से सुख औय
सौबाग्म फक प्रात्प्त होती हैं। ससॊदूयी यॊग के उऩमोग से व्मत्क्त के फुवि, आयोग्म, त्माग भें वृवि होती हैं। इसी
सरमे प्राम् ज्मादातय साधु-सॊत के वस्ि का यॊग ससॊदूयी दह होता हैं।
गणेशजी फक सूॊड फकस ओय हो?: भॊददय औय घय भें स्थावऩत फकजाने वारी बगवान गणेश प्रततभा भें सूॊड
फकसी प्रततभा भें दाईं तो फकसी प्रततभा भें फाईं ओय देखने को सभरती हैं। घय भें फाईं ओय सूॊडवारे गणेशही
स्थावऩत कयना शुब परप्रद भानागमा हैं। क्मोफकॊ जहाॊ फाईं सूॊड वारे गणॆश सौम्म स्वरूऩ के प्रततक हैं, वहीॊ दाईं
ओय तयप सूॊड वारे गणॆशजी अत्ग्न (उग्र) स्वरुऩ के भाने जाते हैं।
57 ससतम्फय - 2019
जफ गणेशजी ने ूय फकम कु फेय का अहॊकाय
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
एक ऩौयाणणक कथा के अनुशाय हैं। कु फेय तीनों रोकों भें सफसे धनी थे। एक ददन उन्होंने सो ा फक हभाये
ऩास इतनी सॊऩत्त्त हैं, रेफकन कभ ही रोगों को इसकी जानकायी हैं। इससरए उन्होंने अऩनी सॊऩत्त्त का प्रदशान कयने
के सरए एक बव्म बोज का आमोजन कयने की फात सो ी। उस भें तीनों रोकों के सबी देवताओॊ को आभॊत्रित फकमा
गमा।
बगवान सशव कु फेयके इष्ट देवता थे, इससरए उनका आशीवााद रेने वह कै राश ऩहुॊ े औय कहा, प्रबो! आज भैं
तीनों रोकों भें सफसे धनवान हूॊ, मह सफ आऩ की कृ ऩा का पर हैं। अऩने तनवास ऩय एक बोज का आमोजन कयने
जा यहा हूॉ, कृ ऩमा आऩ ऩरयवाय सदहत बोज भें ऩधायने की कृ ऩा कये।
बगवान सशव कु फेय के भन का अहॊकाय ताड गए, फोरे, वत्स! भैं फूढ़ा हो रा हूॉ, इस सरमे कहीॊ फाहय नहीॊ
जाता। इस सरमे तुम्हायें बोज भैं नहीॊ आसकता। सशवजी फक फात ऩय कु फेय धगड-धगडाने रगे, बगवन! आऩके फगैय तो
भेया साया आमोजन फेकाय रा जाएगा। तफ सशव जी ने कहा, एक उऩाम हैं। भैं अऩने छोटे फेटे गणऩतत को तुम्हाये
बोज भें जाने को कह दूॊगा। कु फेय सॊतुष्ट होकय रौट आए। तनमत सभम ऩय कु फेय ने बव्म बोज का आमोजन फकमा।
तीनों रोकों के देवता ऩहुॊ ुके थे। अॊत भें गणऩतत आए औय आते ही कहा, भुझको फहुत तेज बूख रगी हैं।
बोजन कहाॊ है। कु फेय उन्हें रे गए बोजन से सजे कभये भें। गणऩतत को सोने की थारी भें बोजन ऩयोसा गमा। ऺण
बय भें ही ऩयोसा गमा साया बोजन खत्भ हो गमा। दोफाया खाना ऩयोसा गमा, उसे बी खा गए। फाय-फाय खाना ऩयोसा
जाता औय ऺण बय भें गणेश जी उसे ट कय जाते। थोडी ही देय भें हजायों रोगों के सरए फना बोजन खत्भ हो
गमा, रेफकन गणऩतत का ऩेट नहीॊ बया। गणऩतत यसोईघय भें ऩहुॊ े औय वहाॊ यखा साया कच् ा साभान बी खा गए,
तफ बी बूख नहीॊ सभटी। जफ सफ कु छ खत्भ हो गमा तो गणऩतत ने कु फेय से कहा, जफ तुम्हाये ऩास भुझे णखराने के
सरए कु छ था ही नहीॊ तो तुभने भुझे न्मोता क्मों ददमा था? गणऩतत जी फक मह फात सुनकय कु फेय का अहॊकाय ूय-
ूय हो गमा।
 क्मा आऩके फच् े कु सॊगती के सशकाय हैं?
 क्मा आऩके फच् े आऩका कहना नहीॊ भान यहे हैं?
 क्मा आऩके फच् े घय भें अशाॊतत ऩैदा कय यहे हैं?
घय ऩरयवाय भें शाॊतत एवॊ फच् े को कु सॊगती से छु डाने हेतु फच् े के नाभ से गुरुत्व कामाारत द्वाया
शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त वशीकयण कव एवॊ
एस.एन.डडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भें स्थावऩत कय अल्ऩ ऩूजा, ववधध-ववधान से आऩ ववशेष
राब प्राप्त कय सकते हैं। मदद आऩ तो आऩ भॊि ससि वशीकयण कव एवॊ एस.एन.डडब्फी फनवाना
ाहते हैं, तो सॊऩका इस कय सकते हैं।
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58 ससतम्फय - 2019
एकदॊत कथा गणेश
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
एकदॊत कै से कहराए गणेशजी
भहाबायत ववश्व का सफसे फडा भहाकाव्म एवॊ ग्रॊथ
हैं। त्जसकी य ना भें एक राख से ज्मादा श्रोको का प्रमोग
हुवा हैं। एसी रोकभान्मता हैं फक ब्रहभाजी ने स्वप्न भें
ऋवष ऩयाशय एवॊ सत्मवती के ऩुि भहवषा व्मास को
भहाबायत सरखने की प्रेयणा दी थी।
भहाबायत के य नाकाय अरौफकक शत्क्त से
सम्ऩन्न भहवषा व्मास त्रिकार िष्टा थे। इस सरमे भहवषा
व्मास ने भहाबायत सरखने का मह काभ स्वीकाय कय
सरमा, रेफकन भहवषा व्मास के भत्स्तष्क भें त्जस
तीव्रतासे भहाबायत के भॊि आ यहेथे इस कायण उन
भॊिो को उसी तीव्रता से को कोई सरखने वारा मोग्म
व्मत्क्त न सभरा। वे ऐसे फकसी व्मत्क्त की खोज भें रग गए
जो भहाबायत सरख सके । भहाबायत के प्रथभ अध्माम भें
उल्रेख हैं फक वेद व्मास ने गणेशजी को भहाबायत सरखने का
प्रस्ताव ददमा तो गणेशजी ने भहाबायत सरख का प्रस्ताव
स्वीकाय कय सरमा।
गणेशजी ने भहाबायत सरखने के ऩहरे शता यखी फक
भहवषा कथा सरखवाते सभम एक ऩर के सरए बी नहीॊ रुकें गे।
इस शता को भानते हुए भहवषा ने बी एक शता यख दी
फक गणेशजी बी एक-एक वाक्म को त्रफना सभझे नहीॊ सरखेंगे।
भहाबायत सरखते सभम इस शता के कायणा गणेशजी के
सभझने के दौयान भहवषा को सो ने का अवसय सभर जाता
था।
भहाबायत सरखने गणेशजी ने अऩना एक दाॉत
तोडकय उसफक रेखनी फानई। इस सरमे उन्हें एकदॊत
कहा जाता हैं। भाना जाता है फक त्रफना रुके सरखने की
शीघ्रता भें मह दाॉत टूटा था।
एक दाॊत टूट ने फक औय एक कहानी हैं
ब्रहभावैवता ऩुयाण के अनुशाय ऩयशुयाभ शीवजी को सभल्ने
कै रश गमे। कै रश के प्रवेश द्वाय ऩय ही गणेश ने ऩयशुयाभ को
योक सरमी फकन्तु ऩयशुयाभ रुके नहीॊ औय फरऩूवाक प्रवेश
कयने का प्रमास फकमा। तफ गणेशजी नें ऩयशुयाभ से मुि
कय उनको स्तत्म्बत कय अऩनी सूॉड भें रऩेटकय सभस्त
रोकों भें भ्रभण कयाते हुए गौरोक भें बगवान श्रीकृ ष्ण
का दशान कयाते हुए बूतर ऩय ऩटक ददमा। ऩयशुयाभ ने
क्रोध भें पयसे(ऩयशु)से गणेशजी के एक दाॊत को काट डारा।
तसबसे गणेश को एकदॊत कहा जाता हैं।
एकदन्त कथा
एकदन्तावतायौ वै देदहनाॊ ब्रहभधायक्।
भदासुयस्म हन्ता स आखुवाहनग् स्भृत्।।
बावाथथ: बगवान ् गणेश का ‘एक दन्तावताय’ देदह-
ब्रहभधायक है, वह भदासुयका वध कयनेवारा है; उसका
वाहन भूषक फतामा गमा है।
वह भहवषा च्मवन का ऩुि भदासुय एक फरवान ्
ऩयाक्रभी दैत्म था। एक फाय वह अऩने वऩता से आऻा
प्राप्त कय दैत्मगुरु शुक्रा ामा के ऩास गमा।
उसने शुक्रा ामा से अनुयोध फकम फक आऩ भुझे
कृ प्मा अऩना सशष्म फना रें, भैं सभग्र ब्रहभाण्ड का
स्वाभी फनना ाहता हूॉ। कृ प्मा आऩ भेयी इच्छा ऩूयी
कयने के सरमे भेया उध त भागादशान कयें। शुक्रा ामा ने
सन्तुष्ट होकय उसे अऩना सशष्म फना सरमा। सवाऻ
आ ामा ने उसे "ह्ीं" (एकाऺयी) शत्क्त भन्ि प्रदान
फकमा। भदासुय अऩने गुरुदेव शुक्रा ामा से आऻा ऩाकय
के उनके यणों भें प्रणाभ कय आशीवााद रेकय जॊगर भें
तऩ कयने के सरमे रा गमा। उसने जगदम्फा का
ध्मान कयते हुए एक हजाय वषों तक कठोय तऩ फकमा।
तऩ कयते हुवे उसका शयीय दीभकों की फाॉफी से ढॊक
गमा। उसके ायों तयप वृऺ उग गमे औय रताएॉ पै र
59 ससतम्फय - 2019
गमीॊ। उसके कठोय तऩसे प्रसन्न होकय भाॊ बगवती
प्रकट हुईं। बगवती ने उसे नीयोग यहने तथा तनष्कॊ टक
सम्ऩूणा ब्रहभाण्ड का याज्म प्राप्त होने का वयदान ददमा।
भदासुयने ऩहरे सम्ऩूणा धयती ऩय अऩना
साम्राज्म स्थावऩत फकमा। फपय स्वगा ऩय साम्राज्म
स्थावऩत कयने के सरमे ढ़ाई की। इन्ि इत्मादद देवाताओॊ
को ऩयाजीत कय उसने स्वगा का बी साम्राज्म स्थावऩत
फकमा। उसने प्रभदासुय की कन्मा सारसा से वववाह
फकमा। सारसासे उसे तीन ऩुि हुए। उसने बगवान ् सशव
को ऩयात्जत कय ददमा। सवाि असुयों का क्रू यतभ शासन
रने रगा। ऩृथ्वीऩय सभस्त धभा-कभा रुप्त होने रगा।
सवाि हाहाकाय भ गमा। देवतागण एवॊ भुतनगण दु्खीत
होने रगे।
ध त्न्तत देवता सनत्कु भाय के ऩास गमे, तथा
उनसे असुयो के ववनाश एवॊ ऩून् धभा-स्थाऩना का उऩाम
ऩूछा् सनत्कु भाय ने कहा देवगण आऩ रोग श्रिाऩूवाक
बगवान ् एकदन्त की उऩासना कयें। वे सन्तुष्ट होकय
अवश्म ही आऩरोगों का भनोयथ ऩूणा कयेंगे। भहवषा के
उऩदेश अनुसाय देवगण एकदन्त की उऩासना कयन
रगे। तऩस्मा के सौ वषा ऩूये होने ऩय बगवान ् एकदन्त
प्रकट हुए तथा वय भाॉगने के सरमे कहा। देवताओॊ ने
तनवेदन फकमा प्रबु भदासुय के शासन भें देवताओॊ का
स्थानभ्रष्ट औय भुतनगण कभाभ्रष्ट हो गमे हैं। आऩ हभें
इस कष्ट से भुत्क्त ददराकाय अऩनी बत्क्त प्रदान कयें।
उधय देववषाने भदासुय को सू ना दी फक बगवान ्
एकदन्त ने देवताओॊ को वयदान ददमा हैं। अफ वे तुम्हाया
प्राण-हयण कयने के सरमे तुभसे मुि कयना ाहते हैं।
भदासुय अत्मन्त कु वऩत होकय अऩनी ववशार सेना के
साथ एकदन्त से मुि कयने रा गमा। बगवान ् एकदन्त
यास्ते भें ही प्रकट हो गमे। याऺसों ने देखा फक बगवान ्
एकदन्त भूषक ऩय सवाय होकय साभने से रे आ यहे
हैं। उनकी आकृ तत अत्मन्त बमानक हैं। उनके हाथोंभें
ऩयशु, ऩाश आदद आमुध हैं। उन्होंने असुयों से कहा फक
तुभ अऩने स्वाभी से कह दो मदद वह जीववत यहना
ाहता हैं तो देवताओॊ से द्वेष छोड दे। उनका याज्म उन्हें
वाऩस कय दे। अगय वह ऐसा नहीॊ कयता हैं तो भैं
तनत्श् त ही उसका वध करूॉ गा। भहाक्रू य भदासुय मुि के
सरमे तैमाय हो गमा जैसे ही उसने अऩने धनुष ऩय फाण
ढ़ाना ाहा फक बगवान ् एकदन्त का तीव्र ऩयशु उसे
रगा औय वह फेहोश होकय धगय गमा।
फेहोशी टूटने ऩय भदायसुय सभझ गमा फक मह
सवा सभथा ऩयभात्भा ही हैं। उसने हाथ जोडकय स्तुतत
कयते हुए कहा फक प्रबु आऩ भुझे ऺभा कय अऩनी दृढ़
बत्क्त प्रदान कयें। एकदन्त ने प्रसन्न होकय कहा फक
जहाॉ भेयी ऩूजा आयाधना हो, वहाॉ तुभ कदावऩ भत जाना।
आजसे तुभ ऩातार भें यहोगे। देवता बी प्रसन्न होकय
एकदन्त की स्तुतत कयके स्वगा रोक रे गमे।
***
नवयत्न जडडत श्री मॊि
शास्ि व न के अनुसाय शुि सुवणा मा यजत भें तनसभात श्री मॊि के ायों औय मदद नवयत्न जडवा ने ऩय मह नवयत्न
जडडत श्री मॊि कहराता हैं। सबी यत्नो को उसके तनत्श् त स्थान ऩय जड कय रॉके ट के रूऩ भें धायण कयने से व्मत्क्त
को अनॊत एश्वमा एवॊ रक्ष्भी की प्रात्प्त होती हैं। व्मत्क्त को एसा आबास होता हैं जैसे भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हैं। नवग्रह
को श्री मॊि के साथ रगाने से ग्रहों की अशुब दशा का धायण कयने वारे व्मत्क्त ऩय प्रबाव नहीॊ होता हैं। गरे भें होने
के कायण मॊि ऩववि यहता हैं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो जर त्रफॊदु शयीय को रगते हैं, वह गॊगा
जर के सभान ऩववि होता हैं। इस सरमे इसे सफसे तेजस्वी एवॊ परदातम कहजाता हैं। जैसे अभृत से उत्तभ कोई
औषधध नहीॊ, उसी प्रकाय रक्ष्भी प्रात्प्त के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भें नहीॊ हैं एसा शास्िोक्त व न हैं।
इस प्रकाय के नवयत्न जडडत श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्वाया शुब भुहूता भें प्राण प्रततत्ष्ठत कयके फनावाए जाते हैं। Rs:
4600, 5500, 6400 से , से अधधक >> OrderNow
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60 ससतम्फय - 2019
वक्रतुण्ड कथा
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
वक्रतुण्डावतायश् देहानाॊ ब्रहभधायक्।
भत्सयासुयहन्ता स ससॊहवाहनग् स्भृत्।।
बगवान् श्रीगणेश का ‘वक्रतुण्डावताय’ ब्रहभरूऩ से
सम्ऩूणा शयीयों को धायण कयनेवारा, भत्सयासुय का वध
कयनेवारा तथा ससॊहवाहन ऩय रनेवारा हैं।
भुद्गर ऩुयाण के अनुसाय बगवान् गणेश के
अनेकों अवताय हैं, त्जनभें आठ अवताय प्रभुख हैं। ऩहरा
अवताय बगवान् वक्रतुण्ड का है। ऐसी कथा है फक देवयाज
इन्ि के प्रभाद से भत्सयासुय का जन्भ हु्आ। उसने दैत्मगुरु
शुक्रा ामा से बगवान् सशवके ॐ नभ् सशवाम (ऩञ् ाऺयी
भन्ि) की दीऺा प्राप्त कय बगवान् शॊकय की कठोय
तऩस्मा की बगवान् शॊकय ने प्रसन्न होकय उसे अबम होने
का वयदान ददमा।
वयदान प्राप्त कय जफ भत्सयासुय घय रौटा तफ
शुक्रा ामा ने उसे दैत्मों का याजा फना ददमा। दैत्मभत्न्िमों
ने शत्क्तशारी भत्सय को ववश्व ऩय ववजम प्राप्त कयने की
सराह दी। शत्क्त औय ऩद के भद से ूय भत्सयासुय ने
अऩनी ववशार सेना के साथ ऩृथ्वी के याजाओॊ ऩय
आक्रभण कय ददमा। कोई बी याजा असुय के साभने दटक
नहीॊ सका। कु छ ऩयात्जत हो गमे औय कु ठ प्राण फ ाकय
कन्दयाओॊ भें तछऩ गमे। इस प्रकाय सम्ऩूणा ऩृथ्वी ऩय
भत्सयासुय का शासन हो गमा।
ऩृथ्वी साम्राज्म प्राप्त कय उस दैत्म ने क्रभश्
ऩातार औय स्वगा ऩय बी ढ़ाई कय दी। शेष ने
ववनमऩूवाक उसके अधीन यहकय उसे कय ऩातार रोक देना
स्वीकाय कय सरमा। इन्ि इत्मादद देवता उससे ऩयात्जत
होकय बाग गमे। भत्सयासुय स्वगा का बी सम्राट हो गमा।
असुयों से दु्खी होकय देवतागण ब्रहभा औय ववष्णु
को साथ रेकय सशवजी के कै रास ऩहुॉ े। उन्होंने बगवान्
शॊकय को दैत्मों के अत्मा ाय वृताॊत सुनामा। बगवान्
शॊकयने भत्सयासुय के इस दुष्कभा की घोय तनन्दा की। मह
सभा ाय सुनकय भत्सयासुय ने कै रास ऩय बी आक्रभण कय
ददमा।
बगवान् सशव से उसका घोय मुि हुआ। ऩयन्तु,
त्रिऩुयारय बगवान् सशव बी जीत नहीॊ सके । उसने उन्हें बी
कठोय ऩाश भें फाॉध सरमा औय कै राश का स्वाभी फनकय
वहीॊ यहने रगा। ायों तयप दैत्मों का अत्मा ाय होने रगा।
दु्खी देवताओॊ के साभने भत्सयासुय के ववनाश का
कोई भागा नहीॊ फ ा। वे अत्मन्त ध त्न्तत औय दुफार हो
यहे थे। उसी सभम वहाॉ बगवान दत्तािेम आ ऩहुॉ े। उन्होंन
देवताओॊ को वक्रतुण्ड के गॊ(एकाऺयी भन्ि) का उऩदेश
फकमा। सभस्त देवता बगवान् वक्रतुण्ड के ध्मान के साथ
एकाऺयी भन्ि का जऩ कयने रगे। उनकी आयाधना से
सन्तुष्ट होकय तत्कार परदाता वक्रतुण्ड प्रकट हुए।
उन्होंने देवताओॊसे कहा आऩ रोग तनत्श् न्त हो जामॉ। भैं
भत्सयासुय के गवा को ूय- ूय कय दूॉगा।
बगवान् वक्रतुण्ड ने अऩने असॊख्म गणों के साथ
भत्सयासुय के नगयों को ायों तयप से घेय सरमा। बमॊकय
मुि तछड गमा। ऩाॉ ददनों तक रगाताय मुि रता यहा।
भत्सयासुय के सुन्दयवप्रम एवॊ ववषमवप्रम नाभक दो ऩुि थे
वक्रतुण्ड के गणों ने उन्हें भाय डारा। ऩुि वध से व्माकु र
भत्सयासुय यणबूसभ भें उऩत्स्थत हुआ। वहाॉ से उसने
बगवान् वक्रतुण्ड को अऩशब्द कहे। बगवान् वक्रतुण्ड ने
प्रबावशारी स्वय भें कहा मदद तुझे प्राणवप्रम हैं तो शस्ि
यखकय तु भेयी शयण भें आ जा नहीॊ तो तनत्श् त भाया
जामगा।
वक्रतुण्ड के बमानक रूऩ को देखकय भत्सयासुय
अत्मन्त व्माकु र हो गमा। उसकी सायी शत्क्त ऺीण हो
गमी। बमके भाये वह काॉऩने रगा तथा ववनमऩूवाक
वक्रतुण्ड की स्तुतत कयने रगा। उसकी प्राथाना से सन्तुष्ट
होकय दमाभम वक्रतुण्ड ने उसे अबम प्रदान कयते हुए
अऩनी बत्क्त का वयदान फकमा तथा सुख शाॊतत से जीवन
त्रफताने के सरमे ऩातार रोक जाने का आदेश ददमा।
भत्सयासुय से तनत्श् न्त होकय देवगण वक्रतुण्ड की स्तुतत
कयने रगे। देवताओॊ को स्वतन्ि कय प्रबु वक्रतुण्ड ने उन्हें
बी अऩनी बत्क्त प्रदान की।
61 ससतम्फय - 2019
॥ ववनामकस्तोि ॥
भूवषकवाहन भोदकहस्त ाभयकणा ववरत्म्फतसूि । वाभनरूऩ भहेश्वयऩुि ववघ्नववनामक ऩाद नभस्ते ॥
देवदेवसुतॊ देवॊ जगद्वद्वघ्नववनामकभ् । हत्स्तरूऩॊ भहाकामॊ सूमाकोदटसभप्रबभ् ॥ १ ॥
वाभनॊ जदटरॊ कान्तॊ ह्स्वग्रीवॊ भहोदयभ ् । धूम्रससन्दूयमुद्गण्डॊ ववकटॊ प्रकटोत्कटभ् ॥ २ ॥
एकदन्तॊ प्ररम्फोष्ठॊ नागमऻोऩवीततनभ् । त्र्मऺॊ गजभुखॊ कृ ष्णॊ सुकृ तॊ यक्तवाससभ् ॥ ३ ॥
दन्तऩाणणॊ वयदॊ ब्रहभण्मॊ ब्रहभ ारयणभ् । ऩुण्मॊ गणऩततॊ ददव्मॊ ववघ्नयाजॊ नभाम्महभ् ॥ ४ ॥
देवॊ गणऩततॊ नाथॊ ववश्वस्माग्रे तु गासभनभ् । देवानाभधधकॊ श्रेष्ठॊ नामकॊ सुववनामकभ ् ॥ ५ ॥
नभासभ बगवॊ देवॊ अद्भुतॊ गणनामकभ् । वक्रतुण्ड प्र ण्डाम उग्रतुण्डाम ते नभ् ॥ ६ ॥
ण्डाम गुरु ण्डाम ण्ड ण्डाम ते नभ् । भत्तोन्भत्तप्रभत्ताम तनत्मभत्ताम ते नभ् ॥ ७ ॥
उभासुतॊ नभस्मासभ गङ्गाऩुिाम ते नभ् । ओङ्कायाम वषट्काय स्वाहाकायाम ते नभ् ॥ ८ ॥
भन्िभूते भहामोधगन ् जातवेदे नभो नभ् । ऩयशुऩाशकहस्ताम गजहस्ताम ते नभ् ॥ ९ ॥
भेघाम भेघवणााम भेघेश्वय नभो नभ् । घोयाम घोयरूऩाम घोयघोयाम ते नभ् ॥ १० ॥
ऩुयाणऩूवाऩूज्माम ऩुरुषाम नभो नभ् । भदोत्कट नभस्तेऽस्तु नभस्ते ण्डववक्रभ ॥ ११ ॥
ववनामक नभस्तेऽस्तु नभस्ते बक्तवत्सर । बक्तवप्रमाम शान्ताम भहातेजत्स्वने नभ् ॥ १२ ॥
मऻाम मऻहोिे मऻेशाम नभो नभ् । नभस्ते शुक्रबस्भाङ्ग शुक्रभाराधयाम ॥ १३ ॥
भदत्क्रन्नकऩोराम गणाधधऩतमे नभ् । यक्तऩुष्ऩ वप्रमाम यक्त न्दन बूवषत ॥ १४ ॥
अत्ग्नहोिाम शान्ताम अऩयाजय्म ते नभ् । आखुवाहन देवेश एकदन्ताम ते नभ् ॥ १५ ॥
शूऩाकणााम शूयाम दीघादन्ताम ते नभ् । ववघ्नॊ हयतु देवेश सशवऩुिो ववनामक् ॥ १६ ॥
परश्रुतत
जऩादस्मैव होभाच् सन्ध्मोऩासनसस्तथा । ववप्रो बवतत वेदाढ्म् ऺत्रिमो ववजमी बवेत ् ॥
वैश्मो धनसभृि् स्मात ् शूि् ऩाऩै् प्रभुच्मते । गसबाणी जनमेत्ऩुिॊ कन्मा बताायभाप्नुमात ् ॥
प्रवासी रबते स्थानॊ फिो फन्धात ् प्रभुच्मते । इष्टससविभवाप्नोतत ऩुनात्मासत्तभॊ कु रॊ ॥
सवाभङ्गरभाङ्गल्मॊ सवाऩाऩप्रणाशनभ् । सवाकाभप्रदॊ ऩुॊसाॊ ऩठताॊ श्रुणुताभवऩ ॥
. ॥ इतत श्रीब्रहभाण्डऩुयाणे स्कन्दप्रोक्त ववनामकस्तोिॊ सम्ऩूणाभ ् ॥
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62 ससतम्फय - 2019
॥ श्री ससविववनामक स्तोिभ् ॥
जमोऽस्तु ते गणऩते देदह भे ववऩुराॊ भततभ्।
स्तवनभ् ते सदा कतुं स्पू तता मच्छभभातनशभ् ॥१॥
प्रबुॊ भॊगरभूततं त्वाॊ न्िेन्िाववऩ ध्मामत्।
मजतस्त्वाॊ ववष्णुसशवौ ध्मामतश् ाव्ममॊ सदा ॥२॥
ववनामकॊ प्राहुस्त्वाॊ गजास्मॊ शुबदामकॊ ।
त्वन्नाम्ना ववरमॊ मात्न्त दोषा् कसरभरान्तक ॥३॥
त्वत्ऩदाब्जाॊफकतश् ाहॊ नभासभ यणौ तव।
देवेशस्त्वॊ ैकदन्तो भद्वद्वऻत्प्तॊ शृणु प्रबो ॥४॥
कु रु त्वॊ भतम वात्सल्मॊ यऺ भाॊ सकरातनव।
ववघ्नेभ्मो यऺ भाॊ तनत्मॊ कु रु भे ाणखरा् फक्रमा्॥५॥
गौरयसुतस्त्वॊ गणेश् शॄणु ववऻाऩनॊ भभ।
त्वत्ऩादमोयनन्माथॉ मा े सवााथा यऺणभ् ॥६॥
त्वभेव भाता वऩता देवस्त्वॊ भभाव्मम्।
अनाथनाथस्त्वॊ देदह ववबो भे वाॊतछतॊ परभ् ॥७॥
रॊफोदयस्वभ् गजास्मो ववबु् ससविववनामक्।
हेयॊफ् सशवऩुिस्त्वॊ ववघ्नेशोऽनाथफाॊधव् ॥८॥
नागाननो बक्तऩारो वयदस्त्वॊ दमाॊ कु रु।
ससॊदूयवणा् ऩयशुहस्तस्त्वॊ ववघ्ननाशक् ॥९॥
ववश्वास्मॊ भॊगराधीशॊ ववघ्नेशॊ ऩयशूधयॊ।
दुरयतारयॊ दीनफन्धूॊ सवेशॊ त्वाॊ जना जगु् ॥१०॥
नभासभ ववघ्नहताायॊ वन्दे श्रीप्रभथाधधऩॊ।
नभासभ एकदन्तॊ दीनफन्धू नभाम्महभ् ॥ ११॥
नभनॊ शॊबुतनमॊ नभनॊ करुणारमॊ।
नभस्तेऽस्तु गणेशाम स्वासभने नभोऽस्तु ते ॥१२॥
नभोऽस्तु देवयाजाम वन्दे गौयीसुतॊ ऩुन्।
नभासभ यणौ बक्त्मा बार न्िगणेशमो् ॥१३॥
नैवास्त्माशा भत्च् त्ते त्वद्भक्तेस्तवनस्म ।
बवेत्मेव तु भत्च् त्ते हमाशा तव दशाने ॥१४॥
अऻानश् ैव भूढोऽहॊ ध्मामासभ यणौ तव।
दशानॊ देदह भे शीघ्रॊ जगदीश कृ ऩाॊ कु रु ॥१५॥
फारकश् ाहभल्ऩऻ् सवेषाभसस ेश्वय्।
ऩारक् सवाबक्तानाॊ बवसस त्वॊ गजानन ॥१६॥
दरयिोऽहॊ बाग्महीन् भत्च् त्तॊ तेऽस्तु ऩादमो्।
शयण्मॊ भाभनन्मॊ ते कृ ऩारो देदह दशानभ् ॥१७॥
इदॊ गणऩतेस्तोिॊ म् ऩठेत्सुसभादहत्।
गणेशकृ ऩमा ऻानससत्ध्धॊ स रबते धनॊ ॥१८॥
ऩठेद्म् ससविदॊ स्तोिॊ देवॊ सॊऩूज्म बत्क्तभान्।
कदावऩ फाध्मते बूतप्रेतादीनाॊ न ऩीडमा ॥१९॥
ऩदठत्वा स्तौतत म् स्तोिसभदॊ ससविववनामकॊ ।
षण्भासै् ससविभाप्नोतत न बवेदनृतॊ व ्
गणेश यणौ नत्वा ब्रूते बक्तो ददवाकय् ॥२०॥
॥ इतत श्री ससविववनामक स्तोिभ् सम्ऩूणाभ्॥
***
63 ससतम्फय - 2019
सशवशत्क्तकृ तॊ गणाधीशस्तोिभ
श्रीशश्क्तसशवावूचतु:
नभस्ते गणनाथाम गणानाॊ ऩतमे नभ:।
बत्क्तवप्रमाम देवेश बक्तेभ्म: सुखदामक॥
स्वानन्दवाससने तुभ्मॊ ससविफुविवयाम ।
नासबशेषाम देवाम ढुत्ण्ढयाजाम ते नभ:॥
वयदाबमहस्ताम नभ: ऩयशुधारयणे।
नभस्ते सृणणहस्ताम नासबशेषाम ते नभ:॥
अनाभमाम सवााम सवाऩूज्माम ते नभ:।
सगुणाम नभस्तुभ्मॊ ब्रहभणे तनगुाणाम ॥
ब्रहभभ्मो ब्रहभदािे गजानन नभोस्तु ते।
आददऩूज्माम ज्मेष्ठाम ज्मेष्ठयाजाम ते नभ:॥
भािे वऩिे सवेषाॊ हेयम्फाम नभो नभ:।
अनादमे ववघ्नेश ववघन्कि्ये नभो नभ:॥
ववघन्हि्ये स्वबक्तानाॊ रम्फोदय नभोस्तु ते।
त्वदीमबत्क्तमोगेन मोगीशा: शात्न्तभागता:॥
फकॊ स्तुवो मोगरूऩॊ तॊ प्रणभावश् ववघन्ऩभ्।
तेन तुष्टो बव स्वासभत्न्नत्मुक्त्वा तॊ प्रणेभतु:॥
तावुत्थाप्म गणाधीश उवा तौ भहेश्वयौ॥
श्रीगणेश उवाच
बवत्कृ तसभदॊ स्तोिॊ भभ बत्क्तवववधानभ्।
बववष्मतत सौख्मस्म ऩठते श्रृण्वते प्रदभ्।
बुत्क्तभुत्क्तप्रदॊ ैव ऩुिऩौिाददकॊ तथा॥
धनधान्माददकॊ सवा रबते तेन तनत्श् तभ्॥
जो व्मत्क्त इस स्तोि का तनमसभत रुऩ से
ववधधवत श्रिा बत्क्त से ऩठन औय श्रवण कयता हैं।
उसे सबी प्रकाय के सुख प्राप्त होते हैं। इसके अततरयक्त
स्तोि का ऩाठ कयने से व्मत्क्त को बोग-भोऺ तथा ऩुि औय
ऩौि आदद का राब होता हैं। स्तोि के द्वाया व्मत्क्त को धन-धान्म इत्मादद
सबी वस्तुएॉ तनत्श् तरूऩ से प्राप्त होती हैं।
64 ससतम्फय - 2019
गणेश ऩुयाण फक भदहभा
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
गणेश ऩुयाण
शौनक जी ने ऩूछा हे प्रबो! गणेश ऩुयाण का
आयम्ब फकस प्रकाय हुआ? मह आऩ भुझे फताने की कृ ऩा
कयें।
इस ऩय सूत जी फोरे हे शौनक! मद्यवऩ गणेश ऩुयाण
अतत प्रा ीन हैं, क्मोंफक बगवान गणेश तो आदद हैं, न
जाने कफ से गणेश जी अऩने उऩासकों ऩय कृ ऩा कयते
रे आ यहे हैं। गणेशजी के तो अनन्त रयि हैं,
त्जनका सॊग्रह एक भहाऩुयाण का रूऩ रे सकता हैं।
गणेश ऩुयाण को एक फाय बगवान ववष्णु ने
नायद जी को औय बगवान शॊकय ने भाता ऩावाती जी
को सुनामा था। फाद भें वही ऩुयाण सॊऺेऩ रूऩ भें
ब्रहभाजी ने ऩुि भहवषा वेदव्मास को सुनामा औय फपय
व्मास जी से भहवषा बृगु ने सुना। बृगु ने कृ ऩा कयके
सौयाष्र के याजा सोभकान्त को सुनामा था। तफ से वह
ऩुयाण अनेक कथाओॊ भें ववस्तृत होता औय अनेक
कथाओॊ से यदहत होता हुआ अनेक रूऩ भें प्र सरत हैं।
शौनक जी ने ऩूछा बगवान ्! आऩ मह फताने का कष्ट
कयें फक याजा सोभकान्त कौन था? उसने भहवषा से गणेश
ऩुयाण का श्रवण फकस जगह फकमा था? एवॊ उस ऩुयाण
के श्रवण से उसे क्मा-क्मा उऩरत्ब्धमाॉ हुई? हे नाथ! भुझे
श्री गणेश्वय की कथा के प्रतत उत्कण्ठा फढ़ती ही जा
यही हैं।
सूतजी फोरे-'हे शौनक! सौयाष्र के देवनगय नाभ
की एक प्रससि याजधानी थी। वहाॉ का याजा सोभकान्त
था। याजा अऩनी प्रजा का ऩारन ऩुि के सभान कयता
था। वह वेदऻान सम्ऩन्न, शस्ि-ववद्या भें ऩायॊगत एवॊ
प्रफर प्रताऩी याजा सभस्त याजाओॊ भें भान्म तथा
अत्मन्त वैबवशारी था। उसका ऐश्वमा कु फेय के बी
ऐश्वमा को रत्ज्जत कयता था। उसने अऩने ऩयाक्रभ से
अनेकों देश जीत सरमे थे। उसकी ऩत्नी अत्मन्त
रूऩवती, गुणवती, धभाऻा एवॊ ऩततव्रता धभा का ऩारन
कयने वारी थी। वह सदैव अऩने प्राणनाथ फक सेवा भें
रगी यहती थी। उसका नाभ सुधभाा था। जैसे वह
ऩततव्रता थी, वैसे ही याजा बी एक ऩत्नी व्रत का ऩारन
कयने वारा था। उसका हेभकान्त नाभक एक सुन्दय ऩुि
था। ऩुि बी सोभकान्त फक तयह सबी ववद्याओॊ का ऻाता
औय अस्ि-शस्िादद के अभ्मास भें तनऩुण हो गमा था।
इन सबी श्रेष्ठ सम्ऩन्न, सद्गुणी रऺणों से याजा अऩनी
प्रजाजनों के दहतों का अत्मन्त ऩोषक था।
इस प्रकाय याजा सोभकान्त स्िी, ऩुि, ऩशु, वाहन,
याज्म एवॊ प्रततष्ठा इत्मादद से सफ प्रकायसुखी था। उसे
फकसी प्रकाय का दु:ख तो था ही नहीॊ। सबी प्रजाजन
उसका सम्भान कयते थे, त्जस कायण उसकी श्रेष्ठ
कीतता बी सॊसायव्माऩी थी। ऩयन्तु मुवावस्था के अन्त भें
सोभकान्त को घृणणत कु ष्ठ योग हो गमा। उसके अनेक
उऩा ाय फकमे गमे, फकन्तु कोई राब नहीॊ हुआ। योग
शीघ्रता से फढऩे रगा औय उसके कीडे ऩड गमे। जफ
योग की अधधक वृवि होने रगी औय उसका कोई उऩाम
न हो सका तो याजा ने अभात्मों को फुराकय कहा-
सुब्रतो! जाने फकस कायण मह योग भुझे ऩीडडत कय यहा
हैं। अवश्म ही मह भेयें फकसी ऩूवा जन्भ के ऩाऩ का पर
होगा। इससरए भैं अफ अऩना सभस्त याज-ऩाट छोडकय
वन भें यहूॉगा। अत् आऩ भेये ऩुि हेभकान्त को भेये
सभान भानकय याज्म शासन का धभाऩूवाक सॊ ारन
कयाते यहें। मह कहकय याजा ने शुब ददन ददखवाकय
अऩने ऩुि हेभकान्त को याज्मऩद ऩय असबवषक्त फकमा
औय अऩनी ऩत्नी सुधभाा के साथ तनजान वन की ओय
र ददमा। प्रजाऩारक याजा के ववमोग भें सभस्त
प्रजाजन अश्रु फहाते हुए उनके साथ रे। याज्म की
सीभा ऩय ऩहुॉ कय याजा ने अऩने ऩुि, अभात्मगण औय
प्रजाजनों को सभझामा-आऩ सफ रोग धभा के जानने
वारे, श्रेष्ठ आ यण भें तत्ऩय एवॊ सरृदम हैं। मह सॊसाय
तो वैसे बी ऩरयवतानशीर है। जो आज है, वह कर नहीॊ
था औय आने वारे कर बी नहीॊ यहेगा। इससरए भेये
जाने से दु:ख का कोई कायण नहीॊ हैं। भेये स्थान ऩय
65 ससतम्फय - 2019
भेया ऩुि सबी कामों को कयेगा, इससरए आऩ सफ उसके
अनुशासन भें यहते हुए उसे सदैव सम्भतत देते यहें। फपय
ऩुि से कहा-'ऩुि! मह त्स्थतत सबी के सभऺ आती यही
हैं। हभाये ऩूवा ऩुरूष बी ऩयम्ऩयागत रूऩ से वृिावस्था
आने ऩय वन भें जाते यहे हैं। भैं कु छ सभम ऩदहरे ही
वन भें जा यहा हूॉ तो कु छ ऩदहरे मा ऩीछे जाने भें कोई
अन्तय नहीॊ ऩडता। मदद कु छ वषा फाद जाऊॉ तफ बी
भोह का त्माग कयना ही होगा। इससरए, हे वत्स! तुभ
दु:णखत भत होओ औय भेयी आऻा भानकय याज्म-शासन
को ठीक प्रकाय राओ। ध्मान यखना ऺत्रिम धभा का
कबी त्माग न कयना औय प्रजा को सदा सुखी यखना।
इस प्रकाय याजा सोभकान्त ने सबी को सभझा फुझाकय
वहाॉ से वाऩस रौटामा औय स्वमॊ अऩनी ऩततव्रता ऩत्त्न
के साथ वन भें प्रवेश फकमा। ऩुि हेभकान्त के आग्रह से
उसने सुफर औय ऻानगम्म नाभक दो अभात्मों को बी
साथ रे सरमा। उन सफने एक सभतर एवॊ सुन्दय स्थान
देखकय वहाॉ ववश्राभ फकमा। तबी उन्हें एक भुतनकु भाय
ददखाई ददमा। याजा ने उससे ऩूछा-'तुभ कौनहो? कहाॉ
यहते हो? मदद उध त सभझो तो भुझे फताओ। भुतन
फारक ने कोभर वाणी भें कहा-'भैं भहवषा बृगु का ऩुि हूॉ,
भेया नाभ च्मवन है। हभाया आश्रभ तनकट भें ही है। अफ
आऩ बी अऩना ऩरय म दीत्जए। याजा ने कहा-
'भुतनकु भाय! आऩका ऩरय म ऩाकय भुझे फडी प्रसन्नता
हुई। भैं सौयाष्र के देवनगय याज्म का अधधऩतत यहा हूॉ।
अफ अऩने ऩुि को याज्म देकय भैंने अयण्म की शयण री
हैं। भुझे कु ष्ठ योग अत्मन्त ऩीडडत फकमे हुए हैं, इसकी
तनवृत्त्त का कोई उऩाम कयने वारा हो तो कृ ऩमा कय
भुझे फताइमे। भुतनकु भाय ने कहा-'भैं अऩने वऩताजी से
आऩका वृतान्त कहता हूॉ, फपय वे जैसा कहेंगे, आऩको
फताऊॉ गा। मह कहकय भुतन फारक रा गमा औय कु छ
देय भें ही आकय फोरा-'याजन ्! भैंने आऩका वृत्तान्त
अऩने वऩताजी को फतामा। उनकी आऻा हुई हैं फक आऩ
सफ भेये साथ आश्रभ भें रकय उनसे बेंट कयें तबी
आऩके योग के ववषम भें बी वव ाय फकमा जामेगा।
ऩूवाजन्भ का वृत्तान्त जानने के सरमे याजा अऩनी ऩत्त्न
औय अभात्मों के सदहत च्मवन के साथ-साथ बृगु आश्रभ
भें जा ऩहुॉ ा औय उन्हें प्रणाभ कय फोरा हे बगवान ् हे
भहवषा! भैं आऩकी शयण हूॉ, आऩ भुझ कु ष्ठी ऩय कृ ऩा
कीत्जए। भहवषा फोरे याजन ्! मह तुम्हाये फकसी ऩूवाजन्भ
के ऩाऩ कभा का ही उदम हो गमा हैं। इसका उऩाम भैं
वव ाय कय फताऊॉ गा। आज तो आऩ सफ स्नानादद से
तनवृत्त होकय यात्रि-ववश्राभ कयो। भहवषा की आऻानुसाय
सफने स्नान, बोजन आदद उऩयान्त यात्रि व्मतीत की
औय प्रात: स्नानादद तनत्मकभों से तनवृत्त होकय भहवषा
की सेवा भें उऩत्स्थत हुए।
भहवषा ने कहा-'याजन ्! भैंने तुम्हाये ऩूवाजन्भ का
वृत्तान्त जान सरमा हैं औय मह बी ऻात कय सरमा हैं
फक फकस ऩाऩ के पर से तुम्हें इस घृणणत योग की
प्रात्प्त हुई हैं। मदद तुभ ाहो तो उसे सुना दूॉ। याजा ने
हाथ जोडकय तनवेदन फकमा फडी कृ ऩा होगी भुतननाथ! भैं
उसे सुनने के सरए उत्कत्ण्ठत हूॉ। भहवषा ने कहा तुभ ऩूवा
जन्भ भें एक धनवान वैश्म के राडरे ऩुि थे। वह वैश्म
ववॊध्मा र के तनकट कौल्हाय नाभक ग्राभ भें तनवास
कयता था। उसकी ऩत्नी का नाभ सुरो ना था। तुभ
उसी वैश्म-दम्ऩत्त्त के ऩि हुए। तुम्हाया नाभ 'काभद था।
तुम्हाया रारन-ऩारन फडे राड- ाव से हुआ। उन्होंने
तुम्हाया वववाह एक अत्मन्त सुन्दयी वैश्म कन्मा से कय
ददमा था, त्जसका नाभ कु टुत्म्फनी था। मद्यवऩ तुम्हायी
बामाा सुशीरा थी औय तुम्हें सदैव धभा भें तनयत देखना
ाहती थी, फकन्तु तुम्हाया स्वबाव वासनान्ध होने के
कायण ददन प्रततददन ववकृ त होता जा यहा था। फकन्तु
भाता-वऩता बी धासभाक थे, इससरए उनके साभने तुम्हायी
ववकृ तत दफी यही। ऩयन्तु भाता-वऩता की भृत्मु के फाद
तुभ तनयॊकु श हो गमे औय अऩनी ऩत्नी की फात बी नहीॊ
भानते थे।
तुम्हाये अना ाय भें प्रवृत्त देखकय उसे दु:ख होता
था, तो बी उसका कु छ वश न रता था। तुम्हायी
उन्भुक्ताता यभ सीभा ऩय थी। अऩनों से बी द्वेष औय
क्रू यता का व्मवहाय फकमा कयते थे। हत्मा आदद कया
देना तुम्हाये सरमे साभान्म फात हो गई। ऩीडडत
व्मत्क्तमों ने तुम्हाये ववरूि याजा से ऩुकाय की। असबमोग
रा औय तुम्हें याज्म की सीभा से बी फाहय रे जाने
का आदेश हुआ। तफ तुभ घय छोडकय फकसी तनजान वन
66 ससतम्फय - 2019
भें यहने रगे। उस सभम तुम्हाया कामा रोगों को रूटना
औय हत्मा कयना ही यह गमा।
एक ददन भध्माहन कार था। गुणवधाक नाभक
एक ववद्वान ् ब्राहभण उधय से तनकरा। फे ाया अऩनी
ऩत्नी को सरवाने के सरए ससुयार जा यहा था। तुभने
उस ब्राहभण मुवक को ऩकड कय रूट सरमा। प्रततयोध
कयने ऩय उसे भायने रगे तो वह ीत्काय कयने रगा-
भुझे भत भाय, भत भाय। देख, भेया दूसया वववाह हुआ है,
भैं ऩत्नी को रेने के सरमे जा यहा हूॉ। फकन्तु तुभ तो
क्रोधावेश भें ऐसे रीन हो यहे थे फक तुभने उसकी फात
सुनकय बी नहीॊ सुनी। जफ उसे भायने रगे तो उसने
शाऩ दे ददमा-'अये हत्माये! भेयी हत्मा के ऩाऩ से तू सहस्र
कल्ऩ तक घोय नयक बोगेगा। तुभने उसकी कोई ध न्ता
न की औय ससय काट सरमा। याजन ्! तुभने ऐसी-ऐसी एक
नहीॊ फत्ल्क अनेक तनयीह हत्माएॉ की थीॊ, त्जनकी गणना
कयना बी ऩाऩ है।
इस प्रकाय इस जन्भ भें तुभने घोय ऩाऩ कभा
फकमे थे, फकन्तु फुढ़ाऩा आने ऩय जफ अशक्त हो गमे तफ
तुम्हाये साथ क्रू यकभाा थे वे बी फकनाया कय गमे। उन्होंने
सो सरमा फक अफ तो इसे णखराना बी ऩडेगा, इससरए
भयने दो महीॊ। गणऩतत-उऩासना का अभाॊघ प्रबाव
याजन ्! अफ तुभ तनयारम्फ थे, र-फपय तो सकते ही
नहीॊ थे, बूख से ऩीडडत यहने के कायण योगों ने बी घेय
सरमा। उधय से जो कोई तनकरता, तुम्हें घृणा की दृत्ष्ट
से देखता हुआ रा जाता। तफ तुभ आहाय की खोज भें
फडी कदठनाई से रते हुए एक जीणाशीणा देवारम भें जा
ऩहुॉ े। उसभें बगवान ् गणेश्वय की प्रततभा ववद्यभान थी।
तफ न जाने फकस ऩुण्म के उदम होने से तुम्हाये भन भें
गणेशजी के प्रतत बत्क्त-बाव जाग्रत हुआ। तुभ तनयाहाय
यहकय उनकी उऩासना कयने रगे। उससे तुम्हें सफ कु छ
सभरा औय योग बी कभ हुआ।
याजन ्! तुभने अऩने साधथमों की दृत्ष्ट फ ाकय
फहुत-सा धन एक स्थान ऩय गाढ़ ददमा था। अफ तुभने
उस धन को उसे देवारम के जीणोिाय भें रगाने का
तनश् म फकमा। सशल्ऩी फुराकय उस भत्न्दय को सुन्दय
औय बव्म फनवा ददमा। इस कायण कु ख्मातत सुख्मातत भें
फदरने रगी। फपय मथा सभम तुम्हायी भृत्मु हुई।
मभदूतों ने ऩकडकय तुम्हें मभयाज के सभऺ उऩत्स्थत
फकमा। मभयाज तुभसे फोरे-'जीव! तुभने ऩाऩ औय ऩुण्म
दोनों ही फकमे हैं औय दोनों का ही बोग तुम्हें बोगना
है। फकन्तु ऩहरे ऩाऩ का पर बोगना ाहते हो मा ऩुण्म
का? इसके उत्तय भें तुभने प्रथभ ऩुण्मकभों के बोग की
इच्छा प्रकट की औय इसीसरए उन्होंने तुम्हें याजकु र भें
जन्भ रेने के सरए बेज ददमा। ऩूवा जन्भ भें तुभने
बगवान ् गणाध्मऺ का सुन्दय एवॊ बव्म भत्न्दय फनवामा
था, इससरए तुम्हें सुन्दय देह की प्रात्प्त हुई है। मह
कहकय भहवषा बृगु कु छ रूके , क्मोंफक उन्होंने देखा फक
याजा को इस वृत्तान्त ऩय शॊङ्का हो यही है। तबी भहवषा
के शयीय से असॊख्म ववकयार ऩऺी उत्ऩन्न होकय याजा
की ओय झऩटे। उनकी ों फडी तीक्ष्ण थी, त्जनसे वे
याजा के शयीय को नो -नो कय खाने रगे। उसके
कायण उत्ऩन्न असहम ऩीडा से व्माकु र हुए याजा ने
भहवषा के सभऺ हाथ जोडकय तनवेदन फकमा-'प्रबो!
आऩका आश्रभ तो सभस्त दोष, द्वेष आदद से ऩये है औय
महाॉ भैं आऩकी शयण भें फैठा हूॉ तफ मह ऩऺी भुझे
अकायण ही क्मों ऩीडडत कय यहे हैं? हे भुतननाथ! इनसे
भेयी यऺा कीत्जए।
भहवषा ने याजा के आत्र्तव न सुनकय सान्त्वना
देते हुए कहा-'याजन ्! तुभने भेये व नों भें शॊका की थी
औय जो भुझ सत्मवादी के कथन भें शॊका कयता है, उसे
खाने के सरए भेये शयीय से इसी प्रकाय ऩऺी प्रकट हो
जाते हैं, जो फक भये हुॊकाय कयने ऩय बस्भ हो जामा
कयते हैं। मह कहकय भहवषा ने हुॊङ्काय की ओय तबी वे
सभस्त ऩऺी बस्भ हो गमे। याजा श्रिावनत होकय उनके
सभऺ अश्रुऩात कयता हुआ फोरा-'प्रबो! अफ उस ऩाऩ से
भुक्त होने के उऩाम कीत्जए।
भहवषा ने कु छ वव ाय कय कहा-'याजन ्! तुभ ऩय
बगवान ् गणेश्वय की कृ ऩा सहज रूऩ से है औय वे ही
प्रबु तुम्हाये ऩाऩों को बी दूय कयने भें सभथा हैं। इससरए
तुभ उनके ऩाऩ-नाशक रयिों को श्रवण कयो। गणेश
ऩुयाण भें उनके प्रभुख रयिों का बरे प्रकाय वणान हुआ
है, अतएव तुभ श्रिा-बत्क्त ऩूवाक उसी को सुनने भें
ध त्त रगाओ। याजा ने प्राथाना की-'भहाभुने! भैंने गणेश
ऩुयाण का नाभ बी आज तक नहीॊ सुना तो उनके सुनने
67 ससतम्फय - 2019
गणेश रक्ष्भी मॊि
प्राण-प्रततत्ष्ठत गणेश रक्ष्भी मॊि को अऩने घय-
दुकान-ओफपस-पै क्टयी भें ऩूजन स्थान, गल्रा मा
अरभायी भें स्थावऩत कयने व्माऩाय भें ववशेष राब
प्राप्त होता हैं। मॊि के प्रबाव से बाग्म भें उन्नतत,
भान-प्रततष्ठा एवॊ व्माऩय भें वृवि होती हैं एवॊ आधथाक
त्स्थभें सुधाय होता हैं। गणेश रक्ष्भी मॊि को स्थावऩत
कयने से बगवान गणेश औय देवी रक्ष्भी का सॊमुक्त
आशीवााद प्राप्त होता हैं।
Rs.325 से Rs.12700 तक
का सौबाग्म कै से प्राप्त कय सकूॉ गा। हे नाथ! आऩसे
अधधक ऻानी औय प्रकाण्ड ववद्वान ् औय कौन हो सकता
है? आऩ ही भुझ ऩय कृ ऩा कीत्जए। भहवषा ने याजा की
दीनता देखकय उसके शयीय ऩय अऩने कभण्डर का
भन्िऩूत जर तछडका।
तबी याजा को एक छीॊक आई औय नाससका से
एक अत्मन्त छोटा कारे वणा का ऩुरूष फाहय तनकर
आमा। देखते-देखते वह फढ़ गमा। उसके बमॊकय रूऩ को
देखकय याजा कु छ बमबीत हुआ, फकन्तु सभस्त
आश्रभवासी वहाॉ से बाग गमे। वह ऩुरूष भहवषा के
सभऺ हाथ जोडकय खडा हो गमा। बृगु ने उसकी ओय
देखा औय कु छ उच् स्वय भें फोरे-'तू कौन है? क्मा
ाहता है? वह फोरा-'भैं साऺात ् ऩाऩ हूॉ, सभस्त ऩावऩमों
के शयीय भें भेया तनवास है। आऩके भन्िऩूत जर के
स्ऩशा से भुझे वववश होकय याजा के शयीय से फाहय
तनकरना ऩडा है। अफ भुझे फडी बूख रगी है, फताइमे
क्मा खाऊॉ औय कहाॉ यहूॉ? भहवषा फोरे-'तु उस आभ के
अवकाश स्थान भें तनवास कय औय उसी वृऺ के ऩत्ते
खाकय जीवन-तनवााह कय। मह सुनते ही वह ऩुरूष आभ
के वृऺ के ऩास ऩहुॉ ा, फकन्तु उसके स्ऩशा भाि से वह
वृऺ जरकय बस्भ हो गमा। फपय जफ ऩाऩ ऩुरूष को
यहने के सरए कोई स्थान ददखाई न ददमा तो वह बी
अन्तदहात हो गमा।
हवषा फोरे-'याजन ्? कारान्तय भें मह वृऺ ऩुन: अऩना
ऩूवारूऩ धायण कयेगा। जफ तक मह ऩुन: उत्ऩन्न न हो
तफ तक भैं तुम्हें गणेश ऩुयाण का श्रवण कयाता यहूॉगा।
तुभ ऩुयाण श्रवण के सॊकल्ऩऩूवाक आदद देव गणेशजी का
ऩूजन कयो, तफ भैं गणेश ऩुयाण की कथा का आयम्ब
करूॉ गा। भुतनयाज के आदेशानुसाय याजा ने ऩुयाण-श्रवण
का सॊकल्ऩ फकमा।
उसी सभम याजा ने अनुबव फकमा फक उसकी
सभस्त ऩीडा दूय हो गई है। दृत्ष्ट डारी तो कु ष्ठ योग
का अफ कहीॊ ध न्ह बी शेष नहीॊ यह गमा था। अऩने को
ऩूणारूऩ से योग यदहत एवॊ ऩूवावत ् सुन्दय हुआ देखकय
याजा के आश् मा की सीभा न यही औय उसने भहवषा के
यण ऩकड सरए औय तनवेदन फकमा फक प्रबो! भुझे
गणेश ऩुयाण का ववस्तायऩूवाक श्रवण कयाइमे। भहवषा ने
कहा-'याजन ्! मह गणेश ऩुयाण सभस्त ऩाऩों औय सॊकटों
को दूय कयने वारा है, तुभ इसे ध्मानऩूवाक सुनो। इसका
श्रवण के वर गणऩतत-बक्तों को ही कयना-कयाना ादहए
अन्म फकसी को नहीॊ।
कसरमुग भें ऩाऩों की अधधक वृवि होगी, औय
रागे कष्ट-सहन भें असभथा एवॊ अल्ऩामु होंगे। उनके
ऩाऩ दूय कयने का कोई साधन होना ादहए। इस वव ाय
से भहवषा वेदव्मास ने भुझे सुनामा था। उन्हीॊ की कृ ऩा से
भैं बगवान गणाध्मऺ के भहान रयिों को सुनने का
सौबाग्म प्राप्त कय सका था।
भहायाज! बगवान गजानन अऩने सयर स्वबाव
वारे बक्तों को सफ कु छ प्रदान कयने भें सभथा हैं।
तनयसबभान प्राणणमों ऩय वे सदैव अनुग्रह कयते हैं फकन्तु
सभथ्मासबभानी फकसी को बी नहीॊ यहने देते।
***
68 ससतम्फय - 2019
काभनाऩूतता हेतु तीन दुराब गणेश साधना
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
हरयिा गणऩतत मन्ि साधना
साधना हेतु साभग्री:- श्री हरयिा गणेश मन्ि (हरयिा
गणऩतत मन्ि), एवॊ श्री गणेश जी की प्रततभा(हल्दी की
सभरजामे तो अतत उत्तभ), हल्दी, घी का दीऩ, धूऩफत्ती,
अऺत
भारा: भूॊगे मा हल्दी की
सभम: प्रात्कार
ददशा: ऩूवा
आसन: रार
वस्ि: ऩीरा
ददन: कृ ष्ण ऩऺ की तुथॉ से शुक्र ऩऺ की तुथॉ तक
जऩ सॊख्मा: ाय राख
प्रदाद : गुड
भंत्र:–
ॐ हुॊ गॊ ग्रौं हरयिागणऩत्मे वयद सवाजन रृदम स्तॊबम स्तॊबम स्वाहा ||
Om Hum Gan Gloun Haridraganapatye Varad Sarvajan Hruday Stambhay Stambhay Swaha
ववधध: प्रात्कार स्नानइत्मादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि धायण कय रार आसन ऩय
फैठ जामे। श्री हरयिा गणेश मन्ि एवॊ गणेशजी के ववग्रह को एक रकडी की ौकी ऩय ऩीरा वस्ि त्रफछा कय स्थावऩत
कयदे। गणेशजी को हल्दी, रार मा ऩीरे पू र गणेशजी को अवऩात कयें। प्रसाद भें गुड ढाए। धूऩ-दीऩ इत्मादद से
ववधधवत ऩूजन कयें, साधन कार भें धूऩ-दीऩ ारु यखें। भन्ि जऩ प्रायॊब कयने से ऩूवा जऩ का ववतनमोग अवश्म
कयरें। जऩ की सभात्प्त ऩय हल्दी सभधश्रत अऺत से दशाॊश हवन कयके ब्राहभण बोजन कयामे।
भन्ि जऩ से ऩूवा गणेशजी का इस भॊि से ध्मान कयें।
ध्मान भन्त्र :
ऩाशाॊक शौभोदकभेक दन्तॊ कयैदाधानॊ कनकासनस्थभ् हारयिाखन्ड प्रततभॊ त्रिनेिॊ ऩीताॊशुकॊ यात्रि गणेश भीडे ॥
Paashank Shoumodakamek Dantam Karairdadhanam Kanakasanastham Haridrakhand Pratimam
Trinetram Peetanshukanratri Ganesha Meede.
शुक्र ऩऺ की तुथॉ को हल्दी का रेऩ शयीय ऩय रगाकय स्नान कयें। गणेशजी का ऩूजन कये औय ८०००
भन्ि से तऩाण कयके , घी से १०१ फाय हवन कये। कुॊ वायी कन्मा को बोजन कयामे औय मथाशत्क्त दक्षऺणा देकय
प्रसन्न कयें। मन्ि एवॊ प्रततभा को अऩने ऩूजा स्थान भें स्थावऩत कयदे।
प्रभुख प्रमोजन: १. शिु भुख फॊध कयने हेतु। २. जर, अत्ग्न, ोय एवॊ दहॊसक जीवों से यऺा हेतु। ३. वॊध्मा स्िी को
सॊतान प्रात्प्त हेतु।
11 Pcs x 4 Colour Only Rs.370
21 Pcs x 4 Colour Only Rs.505
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69 ससतम्फय - 2019
ववजम गणऩतत मन्ि साधना
साधना हेतु साभग्री:- श्री गणेश मन्ि (सॊऩूणा फीज भॊि सदहत), एवॊ स्पदटक की गणेश की प्रततभा, रार ॊदन,
के सय घी का दीऩ, धूऩफत्ती, अऺत, जर ऩाि, कनेय के पू र
भारा: भूॊगे मा यक्त ॊदन की
सभम: ददन भें फकसी बी सभम (प्रात्कार उत्तभ होता हैं)
ददशा: ऩूवा
आसन: रार
वस्ि: रार
ददन: ऩाॊ ददन भें (फकसी बी फुधवाय से साधना प्रायॊब कयें)
जऩ सॊख्मा: सवा राख
प्रदाद : गुड
भॊि:–
ॐ वय वयदाम ववजम गणऩतमे नभ्।
Om Var Varaday Vijay Ganapatye Namah |
ववधध:–
प्रात्कार स्नानइत्मादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि धायण कय
रार आसन ऩय फैठ जामे।
श्री गणेश मन्ि एवॊ गणेशजी के ववग्रह को एक रकडी की
ौकी ऩय रार वस्ि त्रफछा कय स्थावऩत कयदे। गणेशजी को के सय
व यक्त ॊदन का ततरक कये, प्रसाद भें गुड ढाए। धूऩ-दीऩ
इत्मादद से ववधधवत ऩूजन कयें, साधन कार भें धूऩ-दीऩ ारु यखें।
२१ कनेय के पू र(कनेय अप्राप्त हो तो रार गुराफ मा कोइ बी रार पू र) गणेशजी को अवऩात कयें। गणेश जी को
हय ऩुष्ऩ अवऩात कयते सभम त्जस कामा भें ववजम प्राप्त कयनी हो उस कामा की ऩूतता हेतु गणेश जी से श्रिा बाव से
प्राथना कयें।
फपय भन्ि जऩ प्रायॊब कयें। ऩाॊ ददन भें सवा राख जऩ ऩूणा हो जाने ऩय, छठ्ठे ददन ऩाॊ कु वारयकाओॊ को
बोजन कयामे औय मथाशत्क्त दक्षऺणा देकय प्रसन्न कयें। एसा कयने से साधक की काभनाएॊ ऩूणा होती हैं। मन्ि एवॊ
भूतता को अऩने ऩूजा स्थान भें स्थावऩत कयदें, त्जस कामा उद्देश्म के सरमे प्रमोग फकमा हो उस कामा हेतु जफ
आवश्मक हो तो मन्ि को सॊफॊधधत कामा के सभम साथ रेकय जामे। कामा उद्देश्म भें ववजमश्री की प्रात्प्त के ऩश् मात
मन्ि को फहते ऩानी भें ववसत्जात कयदे। गणेश प्रततभा का तनमसभत ऩूजन कय सकते हैं।
प्रभुख प्रमोजन:
१. कोटा-के श आदद वववादों भें सपरता हेतु।
२. शिु का प्रबाव फढ़ गमा हो तो उस ऩय ववजम प्राप्त कयने हेतु।
३. मदद फकसी कामा उद्देश्म भें सपरता प्राप्त कयने हेतु ।
70 ससतम्फय - 2019
कल्माणकायी गणऩतत मन्ि साधना
साधना हेतु साभग्री:- श्री गणेश ससि मन्ि एवॊ स्पदटक की गणेश की प्रततभा, रार ॊदन, के सय घी का दीऩ,
धूऩफत्ती, अऺत, कनेय के पू र
भारा: भूॊगे मा यक्त ॊदन की
सभम: ददन भें फकसी बी सभम (प्रात्कार उत्तभ होता हैं)
ददशा: ऩूवा
आसन: रार
वस्ि: रार
ददन: ऩाॊ ददन, ग्मायाददन मा इत्क्कस ददन भें (फकसी बी
फुधवाय से साधना प्रायॊब कयें)
जऩ सॊख्मा: सवा राख
प्रदाद : गुड
भॊि:–
गॊ गणऩतमे नभ्।
Gan Ganapatye Namah |
ववधध:–
फकसी बी फुधवाय को प्रात्कार स्नानइत्मादद से तनवृत्त
होकय स्वच्छ वस्ि धायण कय रार आसन ऩय फैठ जामे।
श्री गणेश ससि मन्ि एवॊ गणेशजी के ववग्रह को एक
रकडी की ौकी ऩय रार वस्ि त्रफछा कय स्थावऩत कयदे।
गणेशजी को के सय व यक्त ॊदन का ततरक कये, प्रसाद
भें गुड ढाए। धूऩ-दीऩ इत्मादद से ववधधवत ऩूजन कयें,
साधन कार भें धूऩ-दीऩ ारु यखें। सॊबव हो तो गणेशजी
को ऩुष्ऩ अवऩात कयें।
त्जतने ददनों भें साधना सॊऩन्न कयनी हो उसी के अनुरुऩ
सॊकल्ऩ कयके भन्ि जऩ प्रायॊब कयें। तनमसभत उसी सभम
भें भन्ि जऩ कये।
साधना सम्ऩन्न होने ऩय फकसी ब्राहभण मा कु भारयका कों बोजन कयामे औय मथाशत्क्त दक्षऺणा वस्ि आदद देकय
प्रसन्न कयें।
मन्ि औय गणेश प्रततभा को अऩने ऩूजा स्थान भें स्थावऩत कयदें, औय तनमसभत उक्त भन्ि की एक भारा जऩ कयें।
उक्त साधना से साधक का बववष्म भें ससि होने वारे कामा त्रफना फकसी ऩयेशानी से तनववाध्न सॊऩन्न हो जामे गा।
प्रभुख प्रमोजन:
१. सबी कामा तनववाघ्न सॊऩन्न कयने हेतु।
२. भहत्वऩूणा कामों भें आने वारी फाधा एवॊ ववध्नों के नाश हेतु।
३. ऩरयवाय की सुख-सभृवि हेतु।
71 ससतम्फय - 2019
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72 ससतम्फय - 2019
 सॊकरन गुरुत्व कामाारम
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73 ससतम्फय - 2019
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स्वत्स्तक को ऋग्वेद भें
सूमा भनोवाॊतछत परदाता सम्ऩूणा जगत का कल्माण
कयने वारा औय देवताओॊ को अभयत्व प्रदान कयने वारा
भाना गमा है।
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74 ससतम्फय - 2019
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अन्म सॊस्कृ तत भें स्वत्स्तक
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75 ससतम्फय - 2019
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इनके अरावा
स्वत्स्तक के ववसबन्न राब
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76 ससतम्फय - 2019
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77 ससतम्फय - 2019
नकारसऩा मोग एक कष्टदामक मोग !
कार का भतरफ है भृत्मु । ज्मोततष के जानकायों
के अनुसाय त्जस व्मत्क्त का जन्भ अशुबकायी कारसऩा
मोग भे हुवा हो वह व्मत्क्त जीवन बय भृत्मु के सभान
कष्ट बोगने वारा होता है, व्मत्क्त जीवन बय कोइ ना
कोइ सभस्मा से ग्रस्त होकय अशाॊत ध त होता है।
कारसऩा मोग अशुब एवॊ ऩीडादामक होने ऩय व्मत्क्त के
जीवन को अत्मॊत दु्खदामी फना देता है।
कारसऩथ मोग भतरफ क्मा?
जफ जन्भ कुॊ डरी भें साये ग्रह याहु औय के तु के
फी त्स्थत यहते हैं तो उससे ज्मोततष ववद्या के जानकाय
उसे कारसऩा मोग कहा जाता है।
कारसऩथ मोग ककस प्रकाय फनता है औय क्मों
फनता हैं?
जफ 7 ग्रह याहु औय के तु के भध्म भे त्स्थत हो
मह अत्च्छ त्स्थतत नदह है। याहु औय के तु के भध्म भे
फाकी सफ ग्रह आजाने से याहु के तु अन्म शुब ग्रहों के
प्रबावों को ऺीण कय देते हों!, तो अशुब कारसऩा मोग
फनता है, क्मोफक ज्मोततष भे याहु को सऩा(साऩ) का
भुह(भुख) एवॊ के तु को ऩूॊछ कहा जाता है।
कारसऩथ मोग का प्रबाव क्म होता है?
त्जस प्रकाय फकसी व्मत्क्त को साऩ काट रे तो
वह व्मत्क्त शाॊतत से नही फेठ सकता वेसे ही कारसऩा
मोग से ऩीडडत व्मत्क्त को जीवन ऩमान्त शायीरयक,
भानससक, आधथाक ऩयेशानी का साभना कयना ऩडता है।
वववाह ववरम्फ से होता है एवॊ वववाह के ऩश्च्मात सॊतान
से सॊफॊधी कष्ट जेसे उसे सॊतान होती ही नहीॊ मा होती है
तो योग ग्रस्त होती है। उसे जीवन भें फकसी न फकसी
भहत्वऩूणा वस्तु का अबाव यहता है। जातक को कारसऩा
मोग के कायण सबी कामों भें अत्माधधक सॊघषा कयना
ऩडताअ है। उसकी योजी-योटी का जुगाड बी फडी भुत्श्कर
से हो ऩाता है। अगय जुगाड होजामे तो रम्फे सभम तक
दटकती नही है। फाय-फाय व्मवसाम मा नौकयी भे फदराव
आते येहते है। धनाढम घय भें ऩैदा होने के फावजूद फकसी
न फकसी वजह से उसे अप्रत्मासशत रूऩ से आधथाक ऺतत
होती यहती है। तयह-तयह की ऩयेशानी से तघये यहते हैं।
एक सभस्मा खतभ होते ही दूसयी ऩाव ऩसाये खडी होजाती
है। कारसऩा मोग से व्मत्क्त को ैन नही सभरता उसके
कामा फनते ही नही औय फन जामे आधे भे रुक जाते है।
व्मत्क्त के 99% हो ुका कामा बी आखयी ऩरो भे
अकस्भात ही रुक जात है।
ऩयॊतु मह ध्मान यहे, कारसऩा मोग वारे सबी
जातकों ऩय इस मोग का सभान प्रबाव नही ऩडता।
क्मोफक फकस बाव भें कौन सी यासश अवत्स्थत है औय
उसभें कौन-कौन ग्रह कहाॊ त्स्थत हैं औय दृत्ष्ट कय यहे है
उस्का प्रबाव फराफर फकतना है - इन सफ फातों का बी
सॊफॊधधत जातक ऩय भहत्वऩूणा प्रबाव ऩडता है।
इससरए भािा कारसऩा मोग सुनकय बमबीत हो
जाने की जरूयत नहीॊ फत्ल्क उसका जानकाय मा कु शर
ज्मोततषी से ज्मोततषीम ववश्रेषण कयवाकय उसके प्रबावों
की ववस्तृत जानकायी हाससर कय रेना ही फुविभत्ता है।
जफ असरी कायण ज्मोततषीम ववश्रेषण से स्ऩष्ट हो जामे
तो तत्कार उसका उऩाम कयना ादहए। उऩाम से कारसऩा
मोग के कु प्रबावो को कभ फकमा जा सकता है।
मदद आऩकी जन्भ कुॊ डरी भे बी अशुब कारसऩा मोग का
फन यहा हो औय आऩ उसके अशुब प्रबावों से ऩयेशान हो,
तो कारसऩा मोग के अशुब प्राबावों को शाॊत कयने के
सरमे ववशेष अनुबूत उऩामों को अऩना कय अऩने जीवन
को सुखी एवॊ सभृि फनाए। ***
कारसऩा शाॊतत हेतु अनुबूत एवॊ सयर उऩाम
भॊि ससि
कारसऩा शाॊतत मॊि
भॊि ससि
कारसऩा शाॊतत क व
ववस्तृत जानकायी हेतु सॊऩका कयें। GURUTVA KARYALAY
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78 ससतम्फय - 2019
भॊि ससि दुराब साभग्री
कारी हल्दी:- 370, 550, 730, 1450, 1900 कभर गट्टे की भारा - Rs- 370
भामा जार- Rs- 251, 551, 751 हल्दी भारा - Rs- 280
धन वृवि हकीक सेट Rs-280 (कारी हल्दी के साथ Rs-550) तुरसी भारा - Rs- 190, 280, 370, 460
घोडे की नार- Rs.351, 551, 751 नवयत्न भारा- Rs- 1050, 1900, 2800, 3700 & Above
हकीक: 11 नॊग-Rs-190, 21 नॊग Rs-370 नवयॊगी हकीक भारा Rs- 280, 460, 730
रघु श्रीपर: 1 नॊग-Rs-21, 11 नॊग-Rs-190 हकीक भारा (सात यॊग) Rs- 280, 460, 730, 910
नाग के शय: 11 ग्राभ, Rs-145 भूॊगे की भारा Rs- 190, 280, Real -1050, 1900 & Above
स्पदटक भारा- Rs- 235, 280, 460, 730, DC 1050, 1250 ऩायद भारा Rs- 1450, 1900, 2800 & Above
सपे द ॊदन भारा - Rs- 460, 640, 910 वैजमॊती भारा Rs- 190, 280, 460
यक्त (रार) ॊदन - Rs- 370, 550, रुिाऺ भारा: 190, 280, 460, 730, 1050, 1450
भोती भारा- Rs- 460, 730, 1250, 1450 & Above ववधुत भारा - Rs- 190, 280
कासभमा ससॊदूय- Rs- 460, 730, 1050, 1450, & Above भूल्म भें अॊतय छोटे से फडे आकाय के कायण हैं।
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भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि
"श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त
शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय
व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त
के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके दशान भाि से अन-धगनत राब
एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अदिततम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ
को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता
से सफ़रता फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत
है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक
उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से
वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त
होती है। >> Shop Online | Order Now
गुरुत्व कामाथरम भे ववसबन्न आकाय के "श्री मॊि" उप्रब्ध है
भूल्म:- प्रतत ग्राभ Rs. 28.00 से Rs.100.00
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BHUBNESWAR-751018, (ODISHA), Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785,
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79 ससतम्फय - 2019
सवा कामा ससवि कव
त्जस व्मत्क्त को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के
फादबी उसे भनोवाॊतछत सपरतामे एवॊ फकमे गमे कामा भें
ससवि (राब) प्राप्त नहीॊ होती, उस व्मत्क्त को सवा कामा
ससवि कव अवश्म धायण कयना ादहमे।
कवच के प्रभुख राब: सवा कामा ससवि कव के द्वारा
सुख सभृवि औय नव ग्रहों के नकायात्भक प्रबाव को शाॊत कय
धायण कयता व्मत्क्त के जीवन से सवा प्रकाय के दु:ख-दारयि
का नाश हो कय सुख-सौबाग्म एवॊ उन्नतत प्रात्प्त होकय
जीवन भे ससब प्रकाय के शुब कामा ससि होते हैं। त्जसे धायण
कयने से व्मत्क्त मदद व्मवसाम कयता होतो कायोफाय भे वृवि
होतत हैं औय मदद नौकयी कयता होतो उसभे उन्नतत होती हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें सवथजन वशीकयण कव
के सभरे होने की वजह से धायण कताा की फात का दूसये
व्मत्क्तओ ऩय प्रबाव फना यहता हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें अष्ट रक्ष्भी कव के
सभरे होने की वजह से व्मत्क्त ऩय सदा भाॊ भहा रक्ष्भी
की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना यहता हैं। त्जस्से भाॊ रक्ष्भी
के अष्ट रुऩ (१)-आदद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)- धैमा रक्ष्भी, (४)-गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)-
ववजम रक्ष्भी, (७)-ववद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी रुऩो का अशीवााद प्राप्त होता हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें तंत्र यऺा कव के सभरे होने की वजह से ताॊत्रिक फाधाए दूय होती हैं,
साथ ही नकायात्भक शत्क्तमो का कोइ कु प्रबाव धायण कताा व्मत्क्त ऩय नहीॊ होता। इस कव के प्रबाव
से इषाा-द्वेष यखने वारे व्मत्क्तओ द्वारा होने वारे दुष्ट प्रबावो से यऺा होती हैं।
 सवा कामा ससवि कव के साथ भें शत्रु ववजम कव के सभरे होने की वजह से शिु से सॊफॊधधत सभस्त
ऩयेशातनओ से स्वत् ही छु टकाया सभर जाता हैं। कव के प्रबाव से शिु धायण कताा व्मत्क्त का ाहकय
कु छ नही त्रफगाड सकते।
अन्म कव के फाये भे अधधक जानकायी के सरमे कामाारम भें सॊऩका कये:
फकसी व्मत्क्त ववशेष को सवा कामा ससवि कव देने नही देना का अॊततभ तनणाम हभाये ऩास सुयक्षऺत हैं।
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92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA)
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(ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
80 ससतम्फय - 2019
श्री गणेश मॊि
गणेश मॊि सवा प्रकाय की ऋवि-ससवि प्रदाता एवॊ सबी प्रकाय की उऩरत्ब्धमों देने भें सभथा है, क्मोकी श्री गणेश मॊि
के ऩूजन का पर बी बगवान गणऩतत के ऩूजन के सभान भाना जाता हैं। हय भनुष्म को को जीवन भें सुख-सभृवि
की प्रात्प्त एवॊ तनमसभत जीवन भें प्राप्त होने वारे ववसबन्न कष्ट, फाधा-ववघ्नों को नास के सरए श्री गणेश मॊि को
अऩने ऩूजा स्थान भें अवश्म स्थावऩत कयना ादहए। श्रीगणऩत्मथवाशीषा भें वणणात हैं ॐकाय का ही व्मक्त स्वरूऩ
श्री गणेश हैं। इसी सरए सबी प्रकाय के शुब भाॊगसरक कामों औय देवता-प्रततष्ठाऩनाओॊ भें बगवान गणऩतत का
प्रथभ ऩूजन फकमा जाता हैं। त्जस प्रकाय से प्रत्मेक भॊि फक शत्क्त को फढाने के सरमे भॊि के आगें ॐ (ओभ्)
आवश्म रगा होता हैं। उसी प्रकाय प्रत्मेक शुब भाॊगसरक कामों के सरमे बगवान ् गणऩतत की ऩूजा एवॊ स्भयण
अतनवामा भाना गमा हैं। इस ऩौयाणणक भत को सबी शास्ि एवॊ वैददक धभा, सम्प्रदामों ने गणेश जी के ऩूजन हेतु
इस प्रा ीन ऩयम्ऩया को एक भत से स्वीकाय फकमा हैं।
श्री गणेश मॊि के ऩूजन से व्मत्क्त को फुवि, द्विद्या, वववेक का ववकास होता हैं औय योग, व्माधध एवॊ सभस्त
ववध्न-फाधाओॊ का स्वत् नाश होता है। श्री गणेशजी की कृ ऩा प्राप्त होने से व्मत्क्त के भुत्श्कर से भुत्श्कर कामा
बी आसान हो जाते हैं।
त्जन रोगो को व्मवसाम-नौकयी भें ववऩयीत ऩरयणाभ प्राप्त हो यहे हों, ऩारयवारयक तनाव, आधथाक तॊगी, योगों से
ऩीडा हो यही हो एवॊ व्मत्क्त को अथक भेहनत कयने के उऩयाॊत बी नाकाभमाफी, दु:ख, तनयाशा प्राप्त हो यही हो,
तो एसे व्मत्क्तमो की सभस्मा के तनवायण हेतु तुथॉ के ददन मा फुधवाय के ददन श्री गणेशजी की ववशेष ऩूजा-
अ ाना कयने का ववधान शास्िों भें फतामा हैं।
त्जसके पर से व्मत्क्त की फकस्भत फदर जाती हैं औय उसे जीवन भें सुख, सभृवि एवॊ ऐश्वमा की प्रात्प्त होती
हैं। त्जस प्रकाय श्री गणेश जी का ऩूजन अरग-अरग उद्देश्म एवॊ काभनाऩूतता हेतु फकमा जाता हैं, उसी प्रकाय श्री
गणेश मॊि का ऩूजन बी अरग-अरग उद्देश्म एवॊ काभनाऩूतता हेतु अरग-अरग फकमा जाता सकता हैं।
श्री गणेश मॊि के तनमसभत ऩूजन से भनुष्म को जीवन भें सबी प्रकाय की ऋवि-ससवि व धन-सम्ऩत्त्त की प्रात्प्त
हेतु श्री गणेश मॊि अत्मॊत राबदामक हैं। श्री गणेश मॊि के ऩूजन से व्मत्क्त की साभात्जक ऩद-प्रततष्ठा औय
कीतता ायों औय पै रने रगती हैं।
 द्विद्वानों का अनुबव हैं की फकसी बी शुब कामा को प्रायॊऩ कयने से ऩूवा मा शुबकामा हेतु घय से फाहय जाने से ऩूवा
गणऩतत मॊि का ऩूजन एवॊ दशान कयना शुब परदामक यहता हैं। जीवन से सभस्त ववघ्न दूय होकय धन,
आध्मात्त्भक ेतना के ववकास एवॊ आत्भफर की प्रात्प्त के सरए भनुष्म को गणेश मॊि का ऩूजन कयना ादहए।
गणऩतत मॊि को फकसी बी भाह की गणेश तुथॉ मा फुधवाय को प्रात: कार अऩने घय, ओफपस, व्मवसामीक
स्थर ऩय ऩूजा स्थर ऩय स्थावऩत कयना शुब यहता हैं।
गुरुत्व कामाथरम भें उऩरब्ध अन्म : रक्ष्भी गणेश मॊि | गणेश मॊि | गणेश मॊि (सॊऩूणा फीज भॊि सदहत) | गणेश
ससि मॊि | एकाऺय गणऩतत मॊि | हरयिा गणेश मॊि बी उऩरब्ध हैं। अधधक जानकायी आऩ हभायी वेफ साइट ऩय
प्राप्त कय सकते हैं।
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81 ससतम्फय - 2019
दस भहाववद्या ऩूजन मॊि
Das Mahavidya Poojan Yantra | Dasmahavidya Pujan Yantra
दस भहाववद्या ऩूजन मॊि को देवी दस
भहाववद्या की शत्क्तमों से मुक्त अत्मॊत
प्रबावशारी औय दुराब मॊि भाना गमा हैं।
इस मॊि के भाध्मभ से साधक के ऩरयवाय
ऩय दसो महाद्विद्याओॊ का आसशवााद प्राप्त होता
हैं। दस भहाववद्या मॊि के तनमसभत ऩूजन-दशान
से भनुष्म की सबी भनोकाभनाओॊ की ऩूतता होती
हैं। दस भहाववद्या मॊि साधक की सभस्त
इच्छाओॊ को ऩूणा कयने भें सभथा हैं। दस
भहाववद्या मॊि भनुष्म को शत्क्तसॊऩन्न एवॊ
बूसभवान फनाने भें सभथा हैं।
दस भहाववद्या मॊि के श्रिाऩूवाक ऩूजन
से शीघ्र देवी कृ ऩा प्राप्त होती हैं औय साधक को
दस भहाववद्या देवीमों की कृ ऩा से सॊसाय की
सभस्त ससविमों की प्रात्प्त सॊबव हैं। देवी दस
भहाववद्या की कृ ऩा से साधक को धभा, अथा,
काभ व् भोऺ तुववाध ऩुरुषाथों की प्रात्प्त हो
सकती हैं। दस भहाववद्या मॊि भें भाॉ दुगाा के दस
अवतायों का आशीवााद सभादहत हैं, इससरए दस
भहाववद्या मॊि को के ऩूजन एवॊ दशान भाि से व्मत्क्त अऩने जीवन को तनयॊतय अधधक से अधधक साथाक एवॊ
सपर फनाने भें सभथा हो सकता हैं।
देवी के आसशवााद से व्मत्क्त को ऻान, सुख, धन-सॊऩदा, ऐश्वमा, रूऩ-सौंदमा की प्रात्प्त सॊबव हैं। व्मत्क्त को वाद-
वववाद भें शिुओॊ ऩय ववजम की प्रात्प्त होती हैं।
दश भहाववद्या को शास्िों भें आद्या बगवती के दस बेद कहे गमे हैं, जो क्रभश् (1) कारी, (2) ताया, (3)
षोडशी, (4) बुवनेश्वयी, (5) बैयवी, (6) तछन्नभस्ता, (7) धूभावती, (8) फगरा, (9) भातॊगी एवॊ (10)
कभात्त्भका। इस सबी देवी स्वरुऩों को, सत्म्भसरत रुऩ भें दश भहाववद्या के नाभ से जाना जाता हैं।
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82 ससतम्फय - 2019
अभोद्य भहाभृत्मुॊजम कव
अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव व उल्रेणखत अन्म साभग्रीमों को शास्िोक्त ववधध-ववधान से
ववद्वान ब्राहभणो द्वारा सवा राख भहाभृत्मुंजम भंत्र जऩ एवॊ दशाॊश हवन द्वारा तनसभात कव
अत्मॊत प्रबावशारी होता हैं।
अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव
कव फनवाने हेतु:
अऩना नाभ, वऩता-भाता का नाभ,
गोि, एक नमा पोटो बेजे
कव के ववषम भें अधधक जानकायी हेतु गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें। >> Order Now
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श्री हनुभान मॊि
शास्िों भें उल्रेख हैं की श्री हनुभान जी को बगवान सूमादेव ने ब्रहभा जी के आदेश ऩय हनुभान जी को
अऩने तेज का सौवाॉ बाग प्रदान कयते हुए आशीवााद प्रदान फकमा था, फक भैं हनुभान को सबी शास्ि का
ऩूणा ऻान दूॉगा। त्जससे मह तीनोरोक भें सवा श्रेष्ठ वक्ता होंगे तथा शास्ि ववद्या भें इन्हें भहायत हाससर
होगी औय इनके सभन फरशारी औय कोई नहीॊ होगा। जानकायो ने भतानुशाय हनुभान मॊि की आयाधना से
ऩुरुषों की ववसबन्न फीभारयमों दूय होती हैं, इस मॊि भें अद्भुत शत्क्त सभादहत होने के कायण व्मत्क्त की
स्वप्न दोष, धातु योग, यक्त दोष, वीमा दोष, भूछाा, नऩुॊसकता इत्मादद अनेक प्रकाय के दोषो को दूय कयने भें
अत्मन्त राबकायी हैं। अथाात मह मॊि ऩौरुष को ऩुष्ट कयता हैं। श्री हनुभान मॊि व्मत्क्त को सॊकट, वाद-
वववाद, बूत-प्रेत, द्मूत फक्रमा, ववषबम, ोय बम, याज्म बम, भायण, सम्भोहन स्तॊबन इत्मादद से सॊकटो से
यऺा कयता हैं औय ससवि प्रदान कयने भें सऺभ हैं। श्री हनुभान मॊि के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे
गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें। भूल्म Rs- 325 से 12700 तक >> Shop Online | Order Now
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अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम
कव
दक्षऺणा भाि: 10900
83 ससतम्फय - 2019
भॊि ससि ऩायद प्रततभा
ऩायद श्री मॊि ऩायद रक्ष्भी गणेश ऩायद रक्ष्भी नायामण ऩायद रक्ष्भी नायामण
21 Gram से 5.250 Kg तक
उऩरब्ध
100 Gram 121 Gram 100 Gram
ऩायद सशवसरॊग ऩायद सशवसरॊग+नॊदद ऩायद सशवजी ऩायद कारी
21 Gram से 5.250 Kg तक
उऩरब्ध
101 Gram से 5.250 Kg
तक उऩरब्ध
75 Gram 37 Gram
ऩायद दुगाा ऩायद दुगाा ऩायद सयस्वती ऩायद सयस्वती
82 Gram 100 Gram 50 Gram 225 Gram
ऩायद हनुभान 2 ऩायद हनुभान 3 ऩायद हनुभान 1 ऩायद कु फेय
100 Gram 125 Gram 100 Gram 100 Gram
हभायें महाॊ सबी प्रकाय की भॊि ससि ऩायद प्रततभाएॊ, सशवसरॊग, वऩयासभड, भारा एवॊ गुदटका शुि ऩायद भें उऩरब्ध हैं।
त्रफना भॊि ससि की हुई ऩायद प्रततभाएॊ थोक व्माऩायी भूल्म ऩय उऩरब्ध हैं।
ज्मोततष, यत्न व्मवसाम, ऩूजा-ऩाठ इत्मादद ऺेि से जुडे फॊधु/फहन के सरमे हभायें ववशेष मॊि, कव , यत्न, रुिाऺ व अन्म दुरब
साभग्रीमों ऩय ववशेष सुत्रफधाएॊ उऩरब्ध हैं। अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें।
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84 ससतम्फय - 2019
हभाये ववशेष मॊि
व्माऩाय वृवि मंत्र: हभाये अनुबवों के अनुसाय मह मॊि व्माऩाय वृवि एवॊ ऩरयवाय भें सुख सभृवि हेतु ववशेष प्रबावशारी हैं।
बूसभराब मंत्र: बूसभ, बवन, खेती से सॊफॊधधत व्मवसाम से जुडे रोगों के सरए बूसभराब मॊि ववशेष राबकायी ससि
हुवा हैं।
तंत्र यऺा मंत्र: फकसी शिु द्वारा फकमे गमे भॊि-तॊि आदद के प्रबाव को दूय कयने एवॊ बूत, प्रेत नज़य आदद फुयी
शत्क्तमों से यऺा हेतु ववशेष प्रबावशारी हैं।
आकश्स्भक धन प्राश्प्त मंत्र: अऩने नाभ के अनुसाय ही भनुष्म को आकत्स्भक धन प्रात्प्त हेतु परप्रद हैं इस
मॊि के ऩूजन से साधक को अप्रत्मासशत धन राब प्राप्त होता हैं। ाहे वह धन राब व्मवसाम से हो, नौकयी से हो,
धन-सॊऩत्त्त इत्मादद फकसी बी भाध्मभ से मह राब प्राप्त हो सकता हैं। हभाये वषों के अनुसॊधान एवॊ अनुबवों से
हभने आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि से शेमय रेडडॊग, सोने- ाॊदी के व्माऩाय इत्मादद सॊफॊधधत ऺेि से जुडे रोगो को
ववशेष रुऩ से आकत्स्भक धन राब प्राप्त होते देखा हैं। आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि से ववसबन्न स्रोत से धनराब बी
सभर सकता हैं।
ऩदौन्नतत मंत्र: ऩदौन्नतत मॊि नौकयी ऩैसा रोगो के सरए राबप्रद हैं। त्जन रोगों को अत्माधधक ऩरयश्रभ एवॊ श्रेष्ठ
कामा कयने ऩय बी नौकयी भें उन्नतत अथाात प्रभोशन नहीॊ सभर यहा हो उनके सरए मह ववशेष राबप्रद हो सकता हैं।
यत्नेववयी मंत्र: यत्नेश्वयी मॊि हीये-जवाहयात, यत्न ऩत्थय, सोना- ाॊदी, ज्वैरयी से सॊफॊधधत व्मवसाम से जुडे रोगों के
सरए अधधक प्रबावी हैं। शेय फाजाय भें सोने- ाॊदी जैसी फहुभूल्म धातुओॊ भें तनवेश कयने वारे रोगों के सरए बी
ववशेष राबदाम हैं।
बूसभ प्राश्प्त मंत्र: जो रोग खेती, व्मवसाम मा तनवास स्थान हेतु उत्तभ बूसभ आदद प्राप्त कयना ाहते हैं, रेफकन
उस कामा भें कोई ना कोई अड न मा फाधा-ववघ्न आते यहते हो त्जस कायण कामा ऩूणा नहीॊ हो यहा हो, तो उनके
सरए बूसभ प्रात्प्त मॊि उत्तभ परप्रद हो सकता हैं।
गृह प्राश्प्त मंत्र: जो रोग स्वमॊ का घय, दुकान, ओफपस, पै क्टयी आदद के सरए बवन प्राप्त कयना ाहते हैं।
मथाथा प्रमासो के उऩयाॊत बी उनकी असबराषा ऩूणा नहीॊ हो ऩायही हो उनके सरए गृह प्रात्प्त मॊि ववशेष उऩमोगी ससि
हो सकता हैं।
कै रास धन यऺा मंत्र: कै रास धन यऺा मॊि धन वृवि एवॊ सुख सभृवि हेतु ववशेष परदाम हैं।
आधथाक राब एवॊ सुख सभृवि हेतु 19 दुराब रक्ष्भी मॊि >> Shop Online | Order Now
ववसबन्न रक्ष्भी मॊि
श्री मॊि (रक्ष्भी मॊि) भहारक्ष्भमै फीज मॊि कनक धाया मॊि
श्री मॊि (भॊि यदहत) भहारक्ष्भी फीसा मॊि वैबव रक्ष्भी मॊि (भहान ससवि दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि)
श्री मॊि (सॊऩूणा भॊि सदहत) रक्ष्भी दामक ससि फीसा मॊि श्री श्री मॊि (रसरता भहात्रिऩुय सुन्दमै श्री भहारक्ष्भमैं श्री भहामॊि)
श्री मॊि (फीसा मॊि) रक्ष्भी दाता फीसा मॊि अॊकात्भक फीसा मॊि
श्री मॊि श्री सूक्त मॊि रक्ष्भी फीसा मॊि ज्मेष्ठा रक्ष्भी भॊि ऩूजन मॊि
श्री मॊि (कु भा ऩृष्ठीम) रक्ष्भी गणेश मॊि धनदा मॊि > Shop Online | Order Now
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85 ससतम्फय - 2019
सवाससविदामक भुदिका
इस भुदिका भें भूॊगे को शुब भुहूता भें त्रिधातु (सुवणा+यजत+ताॊफें) भें जडवा कय उसे शास्िोक्त ववधध-
ववधान से ववसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्वारा सवाससविदामक फनाने हेतु प्राण-प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त
फकमा जाता हैं। इस भुदिका को फकसी बी वगा के व्मत्क्त हाथ की फकसी बी उॊगरी भें धायण कय
सकते हैं। महॊ भुदिका कबी फकसी बी त्स्थती भें अऩववि नहीॊ होती। इससरए कबी भुदिका को
उतायने की आवश्मक्ता नहीॊ हैं। इसे धायण कयने से व्मत्क्त की सभस्माओॊ का सभाधान होने
रगता हैं। धायणकताा को जीवन भें सपरता प्रात्प्त एवॊ उन्नतत के नमे भागा प्रसस्त होते यहते हैं
औय जीवन भें सबी प्रकाय की ससविमाॊ बी शी् प्राप्त होती हैं। भूल्म भात्र- 6400/-
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(नोट: इस भुदिका को धायण कयने से भॊगर ग्रह का कोई फुया प्रबाव साधक ऩय नहीॊ होता हैं।)
सवथससविदामक भुदद्रका के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे हेतु सम्ऩकथ कयें।
ऩतत-ऩत्नी भें करह तनवायण हेतु
मदद ऩरयवायों भें सुख-सुववधा के सभस्त साधान होते हुए बी छोटी-छोटी फातो भें ऩतत-ऩत्नी के त्रफ भे
करह होता यहता हैं, तो घय के त्जतने सदस्म हो उन सफके नाभ से गुरुत्व कामाारत द्वारा शास्िोक्त
ववधध-ववधान से भॊि ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त वशीकयण कव एवॊ गृह करह नाशक
डडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भें त्रफना फकसी ऩूजा, ववधध-ववधान से आऩ ववशेष राब प्राप्त कय
सकते हैं। मदद आऩ भॊि ससि ऩतत वशीकयण मा ऩत्नी वशीकयण एवॊ गृह करह नाशक डडब्फी फनवाना
ाहते हैं, तो सॊऩका आऩ कय सकते हैं।
100 से अधधक जैन मॊि
हभाये महाॊ जैन धभा के सबी प्रभुख, दुराब एवॊ शीघ्र प्रबावशारी मॊि ताम्र ऩि,
ससरवय ( ाॊदी) ओय गोल्ड (सोने) भे उऩरब्ध हैं।
हभाये महाॊ सबी प्रकाय के मॊि कोऩय ताम्र ऩि, ससरवय ( ाॊदी) ओय गोल्ड (सोने) भे फनवाए जाते है।
इसके अरावा आऩकी आवश्मकता अनुसाय आऩके द्वारा प्राप्त (ध ि, मॊि, डडज़ाईन) के अनुरुऩ मॊि
बी फनवाए जाते है. गुरुत्व कामाारम द्वारा उऩरब्ध कयामे गमे सबी मॊि अखॊडडत एवॊ 22 गेज शुि
कोऩय(ताम्र ऩि)- 99.99 ट शुि ससरवय ( ाॊदी) एवॊ 22 के येट गोल्ड (सोने) भे फनवाए जाते है। मॊि
के ववषम भे अधधक जानकायी के सरमे हेतु सम्ऩका कयें।
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86 ससतम्फय - 2019
द्वादश भहा मॊि
मॊि को अतत प्राध न एवॊ दुराब मॊिो के सॊकरन से हभाये वषो के अनुसॊधान
द्वारा फनामा गमा हैं।
 ऩयभ दुराब वशीकयण मॊि,
 बाग्मोदम मॊि
 भनोवाॊतछत कामा ससवि मॊि
 याज्म फाधा तनवृत्त्त मॊि
 गृहस्थ सुख मॊि
 शीघ्र वववाह सॊऩन्न गौयी अनॊग मॊि
 सहस्िाऺी रक्ष्भी आफि मॊि
 आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि
 ऩूणा ऩौरुष प्रात्प्त काभदेव मॊि
 योग तनवृत्त्त मॊि
 साधना ससवि मॊि
 शिु दभन मॊि
उऩयोक्त सबी मॊिो को द्वादश भहा मॊि के रुऩ भें शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि ऩूणा
प्राणप्रततत्ष्ठत एवॊ ैतन्म मुक्त फकमे जाते हैं। त्जसे स्थाऩीत कय त्रफना फकसी ऩूजा
अ ाना-ववधध ववधान ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं।
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 क्मा आऩके फच् े कु सॊगती के सशकाय हैं?
 क्मा आऩके फच् े आऩका कहना नहीॊ भान यहे हैं?
 क्मा आऩके फच् े घय भें अशाॊतत ऩैदा कय यहे हैं?
घय ऩरयवाय भें शाॊतत एवॊ फच् े को कु सॊगती से छु डाने हेतु फच् े के नाभ से गुरुत्व कामाारत
द्वारा शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त वशीकयण कव
एवॊ एस.एन.डडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भें स्थावऩत कय अल्ऩ ऩूजा, ववधध-ववधान से
आऩ ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं। मदद आऩ तो आऩ भॊि ससि वशीकयण कव एवॊ
एस.एन.डडब्फी फनवाना ाहते हैं, तो सॊऩका इस कय सकते हैं।
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87 ससतम्फय - 2019
सॊऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत 22 गेज शुि स्टीर भें तनसभात अखॊडडत
ऩुरुषाकाय शतन मंत्र
ऩुरुषाकाय शतन मॊि (स्टीर भें) को तीव्र प्रबावशारी फनाने हेतु शतन की कायक धातु शुि
स्टीर(रोहे) भें फनामा गमा हैं। त्जस के प्रबाव से साधक को तत्कार राब प्राप्त होता हैं। मदद
जन्भ कुॊ डरी भें शतन प्रततकू र होने ऩय व्मत्क्त को अनेक कामों भें असपरता प्राप्त होती है, कबी
व्मवसाम भें घटा, नौकयी भें ऩयेशानी, वाहन दुघाटना, गृह क्रेश आदद ऩयेशानीमाॊ फढ़ती जाती है
ऐसी त्स्थततमों भें प्राणप्रततत्ष्ठत ग्रह ऩीडा तनवायक शतन मॊि की अऩने को व्मऩाय स्थान मा घय भें
स्थाऩना कयने से अनेक राब सभरते हैं। मदद शतन की ढैमा मा साढ़ेसाती का सभम हो तो इसे
अवश्म ऩूजना ादहए। शतनमॊि के ऩूजन भाि से व्मत्क्त को भृत्मु, कजा, कोटाके श, जोडो का ददा,
फात योग तथा रम्फे सभम के सबी प्रकाय के योग से ऩयेशान व्मत्क्त के सरमे शतन मॊि अधधक
राबकायी होगा। नौकयी ऩेशा आदद के रोगों को ऩदौन्नतत बी शतन द्वारा ही सभरती है अत् मह
मॊि अतत उऩमोगी मॊि है त्जसके द्वारा शीघ्र ही राब ऩामा जा सकता है।
भूल्म: 1225 से 8200 >> Shop Online | Order Now
सॊऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत
22 गेज शुि स्टीर भें तनसभात अखॊडडत
शतन तैततसा मॊि
शतनग्रह से सॊफॊधधत ऩीडा के तनवायण हेतु ववशेष राबकायी मॊि।
भूल्म: 640 से 12700 >> Shop Online | Order Now
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88 ससतम्फय - 2019
नवयत्न जडडत श्री मॊि
शास्ि व न के अनुसाय शुि सुवणा मा
यजत भें तनसभात श्री मॊि के ायों औय
मदद नवयत्न जडवा ने ऩय मह नवयत्न
जडडत श्री मॊि कहराता हैं। सबी यत्नो को
उसके तनत्श् त स्थान ऩय जड कय रॉके ट
के रूऩ भें धायण कयने से व्मत्क्त को
अनॊत एश्वमा एवॊ रक्ष्भी की प्रात्प्त होती
हैं। व्मत्क्त को एसा आबास होता हैं जैसे
भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हैं। नवग्रह को श्री
मॊि के साथ रगाने से ग्रहों की अशुब
दशा का धायणकयने वारे व्मत्क्त ऩय
प्रबाव नहीॊ होता हैं।
गरे भें होने के कायण मॊि ऩववि यहता हैं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो
जर त्रफॊदु शयीय को रगते हैं, वह गॊगा जर के सभान ऩववि होता हैं। इस सरमे इसे सफसे
तेजस्वी एवॊ परदातम कहजाता हैं। जैसे अभृत से उत्तभ कोई औषधध नहीॊ, उसी प्रकाय
रक्ष्भी प्रात्प्त के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भें नहीॊ हैं एसा शास्िोक्त व न हैं।
इस प्रकाय के नवयत्न जडडत श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्वाया शुब भुहूता भें प्राण प्रततत्ष्ठत
कयके फनावाए जाते हैं। Rs: 4600, 5500, 6400 से 10,900 से अधधक
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अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें।
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89 ससतम्फय - 2019
भॊि ससि वाहन दुघाटना नाशक भारुतत मॊि
ऩौयाणणक ग्रॊथो भें उल्रेख हैं की भहाबायत के मुि के सभम अजुान के यथ के अग्रबाग ऩय भारुतत ध्वज
एवॊ भारुतत मन्ि रगा हुआ था। इसी मॊि के प्रबाव के कायण सॊऩूणा मुि के दौयान हज़ायों-राखों प्रकाय के आग्नेम
अस्ि-शस्िों का प्रहाय होने के फाद बी अजुान का यथ जया बी ऺततग्रस्त नहीॊ हुआ। बगवान श्री कृ ष्ण भारुतत मॊि
के इस अद्भुत यहस्म को जानते थे फक त्जस यथ मा वाहन की यऺा स्वमॊ श्री भारुतत नॊदन कयते हों, वह
दुघाटनाग्रस्त कै से हो सकता हैं। वह यथ मा वाहन तो वामुवेग से, तनफााधधत रुऩ से अऩने रक्ष्म ऩय ववजम ऩतका
रहयाता हुआ ऩहुॊ ेगा। इसी सरमे श्री कृ ष्ण नें अजुान के यथ ऩय श्री भारुतत मॊि को अॊफकत कयवामा था।
त्जन रोगों के स्कू टय, काय, फस, रक इत्मादद वाहन फाय-फाय दुघाटना ग्रस्त हो यहे हो!, अनावश्मक वाहन
को नुऺान हो यहा हों! उन्हें हानी एवॊ दुघाटना से यऺा के उद्देश्म से अऩने वाहन ऩय भॊि ससि श्री भारुतत मॊि अवश्म
रगाना ादहए। जो रोग रान्स्ऩोदटंग (ऩरयवहन) के व्मवसाम से जुडे हैं उनको श्रीभारुतत मॊि को अऩने वाहन भें
अवश्म स्थावऩत कयना ादहए, क्मोफक, इसी व्मवसाम से जुडे सैकडों रोगों का अनुबव यहा हैं की श्री भारुतत मॊि
को स्थावऩत कयने से उनके वाहन अधधक ददन तक अनावश्मक ख ो से एवॊ दुघाटनाओॊ से सुयक्षऺत यहे हैं। हभाया
स्वमॊका एवॊ अन्म ववद्वानो का अनुबव यहा हैं, की त्जन रोगों ने श्री भारुतत मॊि अऩने वाहन ऩय रगामा हैं, उन
रोगों के वाहन फडी से फडी दुघाटनाओॊ से सुयक्षऺत यहते हैं। उनके वाहनो को कोई ववशेष नुक्शान इत्मादद नहीॊ होता
हैं औय नाहीॊ अनावश्मक रुऩ से उसभें खयाफी आतत हैं।
वास्तु प्रमोग भें भारुतत मंत्र: मह भारुतत नॊदन श्री हनुभान जी का मॊि है। मदद कोई जभीन त्रफक नहीॊ यही हो, मा
उस ऩय कोई वाद-वववाद हो, तो इच्छा के अनुरूऩ वहॉ जभीन उध त भूल्म ऩय त्रफक जामे इस सरमे इस भारुतत मॊि
का प्रमोग फकमा जा सकता हैं। इस भारुतत मॊि के प्रमोग से जभीन शीघ्र त्रफक जाएगी मा वववादभुक्त हो जाएगी।
इस सरमे मह मॊि दोहयी शत्क्त से मुक्त है।
भारुतत मॊि के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें।
भूल्म Rs- 325 से 12700 तक
श्री हनुभान मॊि शास्िों भें उल्रेख हैं की श्री हनुभान जी को बगवान सूमादेव ने ब्रहभा जी के आदेश ऩय
हनुभान जी को अऩने तेज का सौवाॉ बाग प्रदान कयते हुए आशीवााद प्रदान फकमा था, फक भैं हनुभान को सबी शास्ि
का ऩूणा ऻान दूॉगा। त्जससे मह तीनोरोक भें सवा श्रेष्ठ वक्ता होंगे तथा शास्ि ववद्या भें इन्हें भहायत हाससर होगी
औय इनके सभन फरशारी औय कोई नहीॊ होगा। जानकायो ने भतानुसाय हनुभान मॊि की आयाधना से ऩुरुषों की
ववसबन्न फीभारयमों दूय होती हैं, इस मॊि भें अद्भुत शत्क्त सभादहत होने के कायण व्मत्क्त की स्वप्न दोष, धातु योग,
यक्त दोष, वीमा दोष, भूछाा, नऩुॊसकता इत्मादद अनेक प्रकाय के दोषो को दूय कयने भें अत्मन्त राबकायी हैं। अथाात
मह मॊि ऩौरुष को ऩुष्ट कयता हैं। श्री हनुभान मॊि व्मत्क्त को सॊकट, वाद-वववाद, बूत-प्रेत, द्मूत फक्रमा, ववषबम, ोय
बम, याज्म बम, भायण, सम्भोहन स्तॊबन इत्मादद से सॊकटो से यऺा कयता हैं औय ससवि प्रदान कयने भें सऺभ हैं।
श्री हनुभान मॊि के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें।
भूल्म Rs- 910 से 12700 तक
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ववसबन्न देवताओं के मंत्र
गणेश मंत्र भहाभृत्मुॊजम मॊि याभ यऺा मॊि याज
गणेश मंत्र (संऩूणथ फीज भंत्र सदहत) भहाभृत्मुॊजम कव मॊि याभ मॊि
गणेश ससि मंत्र भहाभृत्मुॊजम ऩूजन मॊि द्वादशाऺय ववष्णु भॊि ऩूजन मॊि
एकाऺय गणऩतत मंत्र भहाभृत्मुॊजम मुक्त सशव खप्ऩय भाहा सशव
मॊि
ववष्णु फीसा मॊि
हरयद्रा गणेश मंत्र सशव ऩॊ ाऺयी मॊि गरुड ऩूजन मॊि
कु फेय मंत्र सशव मॊि ध ॊताभणी मॊि याज
श्री द्वादशाऺयी रुद्र ऩूजन मंत्र अद्वद्वतीम सवाकाम्म ससवि सशव मॊि ध ॊताभणी मॊि
दत्तात्रम मंत्र नृससॊह ऩूजन मॊि स्वणााकषाणा बैयव मॊि
दत्त मंत्र ऩॊ देव मॊि हनुभान ऩूजन मॊि
आऩदुिायण फटुक बैयव मंत्र सॊतान गोऩार मॊि हनुभान मॊि
फटुक मंत्र श्री कृ ष्ण अष्टाऺयी भॊि ऩूजन मॊि सॊकट भो न मॊि
व्मंकटेश मंत्र कृ ष्ण फीसा मॊि वीय साधन ऩूजन मॊि
कातथवीमाथजुथन ऩूजन मंत्र सवा काभ प्रद बैयव मॊि दक्षऺणाभूतता ध्मानभ ् मॊि
भनोकाभना ऩूततथ एवं कष्ट तनवायण हेतु ववशेष मंत्र
व्माऩाय वृवि कायक मंत्र अभृत तत्व सॊजीवनी कामा कल्ऩ मॊि िम ताऩोंसे भुत्क्त दाता फीसा मॊि
व्माऩाय वृवि मंत्र ववजमयाज ऩॊ दशी मॊि भधुभेह तनवायक मॊि
व्माऩाय वधथक मंत्र ववद्यामश ववबूतत याज सम्भान प्रद ससि फीसा
मॊि
ज्वय तनवायण मॊि
व्माऩायोन्नतत कायी ससि मंत्र सम्भान दामक मॊि योग कष्ट दरयिता नाशक मॊि
बाग्म वधथक मंत्र सुख शाॊतत दामक मॊि योग तनवायक मॊि
स्वश्स्तक मंत्र फारा मॊि तनाव भुक्त फीसा मॊि
सवथ कामथ फीसा मंत्र फारा यऺा मॊि ववद्मुत भानस मॊि
कामथ ससवि मंत्र गबा स्तम्बन मॊि गृह करह नाशक मॊि
सुख सभृवि मंत्र सॊतान प्रात्प्त मॊि करेश हयण फत्त्तसा मॊि
सवथ रयवि ससवि प्रद मंत्र प्रसूता बम नाशक मॊि वशीकयण मॊि
सवथ सुख दामक ऩैंसदठमा मंत्र प्रसव-कष्टनाशक ऩॊ दशी मॊि भोदहतन वशीकयण मॊि
ऋवि ससवि दाता मंत्र शाॊतत गोऩार मॊि कणा वऩशा नी वशीकयण मॊि
सवथ ससवि मंत्र त्रिशूर फीशा मॊि वाताारी स्तम्बन मॊि
साफय ससवि मंत्र ऩॊ दशी मॊि (फीसा मॊि मुक्त ायों
प्रकायके )
वास्तु मॊि
शाफयी मंत्र फेकायी तनवायण मॊि श्री भत्स्म मॊि
ससिाश्रभ मंत्र षोडशी मॊि वाहन दुघाटना नाशक मॊि
ज्मोततष तंत्र ऻान ववऻान प्रद ससि फीसा
मंत्र
अडसदठमा मॊि प्रेत-फाधा नाशक मॊि
ब्रह्भाण्ड साफय ससवि मंत्र अस्सीमा मॊि बूतादी व्माधधहयण मॊि
कु ण्डसरनी ससवि मंत्र ऋवि कायक मॊि कष्ट तनवायक ससवि फीसा मॊि
क्राश्न्त औय श्रीवधथक चौंतीसा मंत्र भन वाॊतछत कन्मा प्रात्प्त मॊि बम नाशक मॊि
श्री ऺेभ कल्माणी ससवि भहा मंत्र वववाहकय मॊि स्वप्न बम तनवायक मॊि
91 ससतम्फय - 2019
ऻान दाता भहा मंत्र रग्न ववघ्न तनवायक मॊि कु दृत्ष्ट नाशक मॊि
कामा कल्ऩ मंत्र रग्न मोग मॊि श्री शिु ऩयाबव मॊि
दीधाथमु अभृत तत्व संजीवनी मंत्र दरयिता ववनाशक मॊि शिु दभनाणाव ऩूजन मॊि
भंत्र ससि ववशेष दैवी मंत्र सूधच
आद्य शश्क्त दुगाथ फीसा मंत्र (अंफाजी फीसा मंत्र) सयस्वती मॊि
भहान शश्क्त दुगाथ मंत्र (अंफाजी मंत्र) सप्तसती भहामॊि(सॊऩूणा फीज भॊि सदहत)
नव दुगाथ मंत्र कारी मॊि
नवाणथ मंत्र (चाभुंडा मंत्र) श्भशान कारी ऩूजन मॊि
नवाणथ फीसा मंत्र दक्षऺण कारी ऩूजन मॊि
चाभुंडा फीसा मंत्र ( नवग्रह मुक्त) सॊकट भोध नी कासरका ससवि मॊि
त्रत्रशूर फीसा मंत्र खोडडमाय मॊि
फगरा भुखी मंत्र खोडडमाय फीसा मॊि
फगरा भुखी ऩूजन मंत्र अन्नऩूणाा ऩूजा मॊि
याज याजेववयी वांछा कल्ऩरता मंत्र एकाॊऺी श्रीपर मॊि
भंत्र ससि ववशेष रक्ष्भी मंत्र सूधच
श्री मंत्र (रक्ष्भी मंत्र) भहारक्ष्भमै फीज मॊि
श्री मंत्र (भंत्र यदहत) भहारक्ष्भी फीसा मॊि
श्री मंत्र (संऩूणथ भंत्र सदहत) रक्ष्भी दामक ससि फीसा मॊि
श्री मंत्र (फीसा मंत्र) रक्ष्भी दाता फीसा मॊि
श्री मंत्र श्री सूक्त मंत्र रक्ष्भी गणेश मॊि
श्री मंत्र (कु भथ ऩृष्ठीम) ज्मेष्ठा रक्ष्भी भॊि ऩूजन मॊि
रक्ष्भी फीसा मंत्र कनक धाया मॊि
श्री श्री मंत्र (श्रीश्री रसरता भहात्रत्रऩुय सुन्दमै श्री भहारक्ष्भमैं श्री भहामंत्र) वैबव रक्ष्भी मॊि (भहान ससवि दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि)
अंकात्भक फीसा मंत्र
ताम्र ऩत्र ऩय सुवणथ ऩोरीस
(Gold Plated)
ताम्र ऩत्र ऩय यजत ऩोरीस
(Silver Plated)
ताम्र ऩत्र ऩय
(Copper)
साईज भूल्म साईज भूल्म साईज भूल्म
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”
550
910
1450
2350
3700
9100
12700
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”
370
640
1050
1450
2800
4600
9100
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”
325
550
910
1225
2350
4150
9100
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92 ससतम्फय - 2019
2019 भाससक ऩॊ ाॊग
दद िार माह पक्ष
द्विद्वि
समाद्वि नक्षत्र समाद्वि योग समाद्वि करण समाद्वि
चंद्र
राद्वश
समाद्वि
1
यवव बािऩद शुक्र
08:31-
29:40
11:10 साध्म 09:31 कौरव 08:31 -
2
सोभ बािऩद शुक्र 26:4 08:32 ल 25:53 वणणज 15:30 06:45
3
भॊगर बािऩद शुक्र 23:40
-
06:23-
28:54
ब्रहभ 22:46 फव 12:47 ल -
4
फुध बािऩद शुक्र 21:59 28:07 इन्ि 20:15 कौरव 10:44 ल 11:40
5
गुरु बािऩद शुक्र 21:06 28:08 वैधृतत 18:23 गय 09:26 -
6
शुक्र बािऩद शुक्र 21:00 28:57 ववषकुॊ ब 17:09 ववत्ष्ट 08:57 -
7
शतन बािऩद शुक्र 21:39 ल - प्रीतत 16:33 फारव 09:14 17:22
8
यवव बािऩद शुक्र 22:57 ल 06:28 आमुष्भान 16:29 तैततर 10:14 -
9
सोभ बािऩद शुक्र 24:45 08:35 सौबाग्म 16:52 वणणज 11:48 15:13
10
भॊगर बािऩद शुक्र 26:54 11:08 शोबन 17:33 फव 13:47 -
11
फुध बािऩद शुक्र 29:14 13:59 अततगॊड 18:27 कौरव 16:03 -
12
गुरु बािऩद शुक्र - 16:57 सुकभाा 19:27 गय 18:26 03:29
13
शुक्र बािऩद शुक्र 07:39 19:58 धृतत 20:27 वणणज 07:39 -
14
शतन बािऩद शुक्र 10:02 22:55 शूर 21:25 फव 10:02 16:12
93 ससतम्फय - 2019
15
यवव कृ ष्ण प्रततऩदा 12:19 25:44 गॊड 22:17 कौरव 12:19 -
16
सोभ कृ ष्ण 14:27 28:21 वृवि 23:00 गय 14:27 -
17
भॊगर कृ ष्ण 16:21 - ्ुव 23:30 ववत्ष्ट 16:21 04:22
18
फुध कृ ष्ण 17:57 06:43 व्माघात 23:45 फारव 17:57 -
19
गुरु कृ ष्ण 19:10 08:44 हषाण 23:40 कौरव 06:37 15:12
20
शुक्र कृ ष्ण 19:54 10:19 वज्र 23:09 गय 07:36 -
21
शतन कृ ष्ण 20:03 11:21 ससवि 22:10 ववत्ष्ट 08:03 22:30
22
यवव कृ ष्ण 19:33 11:45 व्मततऩात 20:39 फारव 07:53 -
23
सोभ कृ ष्ण 18:22 11:29 वरयमान 18:33 तैततर 07:03 -
24
भॊगर कृ ष्ण 16:29 10:30 ऩरयग्रह 15:52 ववत्ष्ट 16:29 04:50
25
फुध कृ ष्ण 13:58 08:52 सशव 12:40 फारव 13:58 -
26
गुरु कृ ष्ण 10:54
ल
-
06:39
-
28:01
साध्म 09:00 तैततर 10:54 06:40
27
शुक्र कृ ष्ण
- 07:26-
27:43
25:4 शुब 24:43 वणणज 07:26 -
28
शतन कृ ष्ण 23:56 22:02 ल 20:22 तुस्ऩाद 13:49 06:19
29
यवव शुक्र प्रततऩदा 20:16 19:06 ब्रहभ 16:06 फकस्तुघ्न 10:04 -
30
सोभ शुक्र 16:55 16:28 इन्ि 12:03 फारव 06:32 05:45
94 ससतम्फय - 2019
2019 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय
दद वाय भाह ऩऺ ततधथ सभाश्प्त प्रभुख व्रत-त्मोहाय
1 यवव बािऩद शुक्र
- 08:31-
29:40
ल व्रत, फडी तीज, वायाहावताय जमॊती, गौयी
तृतीमा व्रत, के वडा तीज, गौयी तीज (ओडीसा), त्रिरोक तीज
2 सोभ बािऩद शुक्र 26:4
श्रीकृ ष्ण-करॊकनी तुथॉ, शास्िोक्त
भत से आज के ददन ॊिभा का दशान सवाथा तनवषि, ऩत्थय (ढेरा)
ौथ, ौठ ॊि (सभधथ.), सौबाग्म तुथॉ (ऩ.फॊ), सशवा तुथॉ,
सयस्वती ऩूजा (ओडीसा), रक्ष्भी ऩूजा, जैन सॊवत्सयी ( तुथॉ ऩऺ)
(श्वेताॊफय जैन), भूरसूिवाॊ न (श्वेताॊफय जैन),
3 भॊगर बािऩद शुक्र 23:40
ऋवषऩॊ भी-भध्माहन भें सप्तवषा ऩूजन, गगा एवॊ अॊधगया ऋवष जमॊती,
आकाश ऩॊ भी (जैन), जैन सॊवत्सयी (ऩॊ भी ऩऺ), गुरु ऩॊ भी
(ओडीसा), यऺाऩॊ भी (ऩ.फॊ), दशरऺण व्रत 10 ददन एवॊ ऩुष्ऩाॊजसर
व्रत 5 ददन (ददगॊफय जैन), आकाश ऩॊ भी (जैन),
4 फुध बािऩद शुक्र 21:59
सूमाषष्ठी व्रत, रोराका षष्ठी (काशी), फरदेव छठ-श्रीफरयाभ जमॊती
भहोत्सव (ब्रज), रसरता षष्ठी, भॊथन षष्ठी (ऩ.फॊ), स्कन्द कु भाय
षष्ठी व्रत, सोभनाथ व्रत (ओडीसा), गौयी का आवाहन, ॊदनषष्ठी
(जैन), कारू तनवााण ददवस (जैन)
5 गुरु बािऩद शुक्र 21:06
भुक्ताबयण सप्तभी व्रत, सॊतान सप्तभी व्रत, रसरता सप्तभी (ऩ.फॊ-
ओडीसा), नवाखाई, अऩयात्जता ऩूजा, ज्मेष्ठागौयी का ऩूजन,
भहारक्ष्भी व्रत-अनुष्ठान प्रायॊब ( ॊिोदम कारीन अष्टभी भें), तनदोष-
शीरसप्तभी (ददगॊफय जैन),
6 शुक्र बािऩद शुक्र 21:00
श्रीदुगााष्टभी व्रत, श्रीअन्नऩूणााष्टभी व्रत, श्रीयाधाष्टभी व्रतोत्सव
(फयसाना-भथुया) दधीध जमॊती, ज्मेष्ठागौयी का
ववसजान, तन:शल्म अष्टभी (ददग.जैन), दुफरी आठभ (श्वेत.जैन),
7 शतन बािऩद शुक्र 21:39
श्रीभद्भागवत जमॊती-सप्ताह प्रायॊब,नन्दानवभी, अदुख नवभी, श्री ॊि
जमॊती, तर नवभी (ऩ.फॊ- ओडीसा),
8 यवव बािऩद शुक्र 22:57 तेजा दशभी, सुगन्ध दशभी (जैन), भहायवववाय व्रत
95 ससतम्फय - 2019
9 सोभ बािऩद शुक्र 24:45
ल ल ऩाश्वा ऩरयवतानी एकादशी, धभाा-
कभाा एकादशी ल ग्मायस (भ.प्रदेश),
10 भॊगर बािऩद शुक्र 26:54
श्रवण नऺिमुता द्वादशी व्रत, श्रीवाभन अवताय जमॊती, बुवनेश्वयी
भहाववद्या जमॊती, श्माभफाफा द्वादशी द्वा
द्वा इन्िऩूजा प्रायॊब
11 फुध बािऩद शुक्र 29:14
ओणभ (द.बायत), प्रदोष व्रत, गोत्रियाि व्रत प्रायॊब, यत्निम व्रत 3
ददन (ददगॊफय जैन)
12 गुरु बािऩद शुक्र -
अनन्त तुदाशी, 10 ददन का श्रीगणेशोत्सव ऩूणा, ऩाधथाव गणेश
प्रततभा ववसजान (भहायाष्र), इन्ि गोववन्द ऩूजा (ओडीसा),
13 शुक्र बािऩद शुक्र 07:39
स्नान-दान हेतु उत्तभ बािऩदी ऩूणणाभा (07:39 ),
गोत्रियाि व्रत ऩूणा, श्रीभद्भागवत सप्ताह ऩूणा, श्रीसत्मनायामण ऩूजा
कथा, रोकऩार ऩूजा ऩूणणाभा, सशव ऩरयवतानोत्सव भहारम आयॊब
ऩूणणाभा का श्राि (07:39 ), अम्फाजी का भेरा,
14 शतन बािऩद शुक्र 10:02
स्नान-दान हेतु उत्तभ बािऩदी ऩूणणाभा (10:02 ),
सॊन्माससमोंका ातुभाास ऩूणा, शास्िोक्त भत से ातुभाास के व्रतधायी
के सरए आत्श्वन भें दूध वत्जात हैं। वऩतृऩऺ का तऩाण प्रायॊब,
प्रततऩदा का 10:02
अशून्म शमन व्रत, ऺभावाणी ऩवा (ददगॊफय जैन)
15 यवव कृ ष्ण प्रततऩदा 12:19
प्रततऩदा का द्वद्वतीमा का श्राि, दूज का श्राि,
दूज का श्राि
16 सोभ कृ ष्ण 14:27
तीमा का श्राि, दूज का श्राि तृतीमा श्राि, तीज
का श्राि
17 भॊगर कृ ष्ण 16:21
सॊकष्टी श्रीगणेश तुथॉ व्रत
8 ववश्वकभाा ऩूजा, बौभ ववश्वकभाा ऩूजा, सूमा की कन्मा
सॊक्रात्न्त 13:09 तृतीमा श्राि, तीज का श्राि ( 16:21
18 फुध कृ ष्ण 17:57 तुथॉ का श्राि, ौथ का श्राि,
19 गुरु कृ ष्ण 19:10 का
96 ससतम्फय - 2019
20 शुक्र कृ ष्ण 19:54 षष्ठी का श्राि, छठ का श्राि, कवऩरा षष्ठी, ॊि षष्ठी व्रत,
21 शतन कृ ष्ण 20:03
सप्तभी का श्राि, सातभ का श्राि, बानु सप्तभी ऩवा (ववद्वानों के भत
से सूमा ग्रहण तुल्म परप्रद), सादहफ सप्तभी, जीववत्ऩुत्रिका व्रत
( ), जीउततमा व्रत,
22 यवव कृ ष्ण 19:33
अष्टभी का श्राि, आठभ का श्राि, काराष्टभी व्रत, भहारक्ष्भी
अष्टभी,भहारक्ष्भी व्रत ऩूणा, गमाभध्माष्टभी, गजगौयी अष्टभी,
जीउततमा व्रत, जीववत्ऩुत्रिका व्रत (
जीववत्ऩुत्रिका व्रत का ऩायण ( ),
23 सोभ कृ ष्ण 18:22
नवभी का श्राि, नोभ का श्राि, भातृनवभी श्राि, सौबाग्मवती त्स्िमों
(सुहाधगनों) का श्राि, जीववत्ऩुत्रिका व्रत का ऩायण
24 भॊगर कृ ष्ण 16:29 दशभी का श्राि,
25 फुध कृ ष्ण 13:58
इॊददया एकादशी व्रत, एकादशी का श्राि, ग्मायस का श्राि 8
द्वादशी का श्राि, फायस का श्राि, भघा
श्राि, सॊन्माससमों-मतत व वैष्णवों का श्राि, येंदटमा फायस,
26 गुरु कृ ष्ण द्वा 10:54
10: द्वादशी का श्राि, फायस का श्राि, भघा श्राि,
सॊन्माससमों-मतत व वैष्णवों का श्राि, येंदटमा फायस,
िमोदशी का श्राि, तेयस का श्राि
27 शुक्र कृ ष्ण
- 07:26-
27:43
भाससक सशवयात्रि व्रत, दुभायण श्राि, (आज के ददन शस्ि, ववष,
अत्ग्न, जर, दुघाटना आदद से अकार भृत्मु भें भये व्मत्क्त का श्राि),
तुदाशी का श्राि,
28 शतन कृ ष्ण 23:56
स्नान-दान-श्राि हेतु उत्तभ आत्श्वनी अभावस्मा, वऩतृववसजानी
अभावस, सवावऩतृ श्राि, आज अऻात भयण ततधथवारे ऩूवाजों का श्राि
अभावस्मा भें फकमा जाना शास्िोध त यहेगा, नाती द्वाया नाना-नानी
का श्राि, अभावस्मा, भहारमा सभाप्त
29 यवव शुक्र प्रततऩदा 20:16
शायदीम नवयाि प्रायॊब, प्रथभ नवयाि करश स्थाऩना, घट स्थाऩना
भहायाज
अग्रसेन जमॊती
30 सोभ शुक्र 16:55 तीम नवयाि, नवीन ॊि दशान, येभन्त ऩूजन,
97 ससतम्फय - 2019
यासश यत्न
भेष यासश: वृषब यासश: सभथुन यासश: कका यासश: ससॊह यासश: कन्मा यासश:
भूॊगा हीया ऩन्ना भोती भाणेक ऩन्ना
Red Coral
(Special)
Diamond
(Special)
Green Emerald
(Special)
Naturel Pearl
(Special)
Ruby
(Old Berma)
(Special)
Green
Emerald
(Special)
5.25" Rs. 1050 10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 9100 5.25" Rs. 910 2.25" Rs. 12500 5.25" Rs. 9100
6.25" Rs. 1250 20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 12500 6.25" Rs. 1250 3.25" Rs. 15500 6.25" Rs. 12500
7.25" Rs. 1450 30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 14500 7.25" Rs. 1450 4.25" Rs. 28000 7.25" Rs. 14500
8.25" Rs. 1800 40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 19000 8.25" Rs. 1900 5.25" Rs. 46000 8.25" Rs. 19000
9.25" Rs. 2100 50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 23000 9.25" Rs. 2300 6.25" Rs. 82000 9.25" Rs. 23000
10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000
** All Weight In Rati
All Diamond are Full
White Colour.
** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati
** All Weight In
Rati
तुरा यासश: वृत्श् क यासश: धनु यासश: भकय यासश: कुॊ ब यासश: भीन यासश:
हीया भूॊगा ऩुखयाज नीरभ नीरभ ऩुखयाज
Diamond
(Special)
Red Coral
(Special)
Y.Sapphire
(Special)
B.Sapphire
(Special)
B.Sapphire
(Special)
Y.Sapphire
(Special)
10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 1050 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000
20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 1250 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000
30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 1450 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000
40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 1800 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000
50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 2100 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000
10.25" Rs. 2800 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000
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* उऩमोक्त वजन औय भूल्म से अधधक औय कभ वजन औय भूल्म के यत्न एवॊ उऩयत्न बी हभाये महा व्माऩायी भूल्म ऩय
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98 ससतम्फय - 2019
श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि
फकसी बी व्मत्क्त का जीवन तफ आसान फन जाता हैं जफ उसके ायों औय का भाहोर उसके अनुरुऩ उसके वश
भें हों। जफ कोई व्मत्क्त का आकषाण दुसयो के उऩय एक ुम्फकीम प्रबाव डारता हैं, तफ रोग उसकी सहामता एवॊ
सेवा हेतु तत्ऩय होते है औय उसके प्राम् सबी कामा त्रफना अधधक कष्ट व
ऩयेशानी से सॊऩन्न हो जाते हैं। आज के बौततकता वादद मुग भें हय व्मत्क्त
के सरमे दूसयो को अऩनी औय खी ने हेतु एक प्रबावशासर ुॊफकत्व को
कामभ यखना अतत आवश्मक हो जाता हैं। आऩका आकषाण औय व्मत्क्तत्व
आऩके ायो ओय से रोगों को आकवषात कये इस सरमे सयर उऩाम हैं,
श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र। क्मोफक बगवान श्री कृ ष्ण एक अरौफकव एवॊ ददवम
ुॊफकीम व्मत्क्तत्व के धनी थे। इसी कायण से श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के ऩूजन
एवॊ दशान से आकषाक व्मत्क्तत्व प्राप्त होता हैं।
श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के साथ व्मत्क्तको दृढ़ इच्छा शत्क्त एवॊ उजाा
प्राप्त होती हैं, त्जस्से व्मत्क्त हभेशा एक बीड भें हभेशा आकषाण का कें ि
यहता हैं।
मदद फकसी व्मत्क्त को अऩनी प्रततबा व आत्भववश्वास के स्तय भें
वृवि, अऩने सभिो व ऩरयवायजनो के त्रफ भें रयश्तो भें सुधाय कयने की
ईच्छा होती हैं उनके सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र का ऩूजन एक सयर व सुरब
भाध्मभ सात्रफत हो सकता हैं।
श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र ऩय अॊफकत शत्क्तशारी ववशेष येखाएॊ, फीज भॊि एवॊ
अॊको से व्मत्क्त को अद्द्भुत आॊतरयक शत्क्तमाॊ प्राप्त होती हैं जो व्मत्क्त
को सफसे आगे एवॊ सबी ऺेिो भें अग्रणणम फनाने भें सहामक ससि होती हैं।
श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के ऩूजन व तनमसभत दशान के भाध्मभ से बगवान
श्रीकृ ष्ण का आशीवााद प्राप्त कय सभाज भें स्वमॊ का अद्वद्वतीम स्थान स्थावऩत कयें।
श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र अरौफकक ब्रहभाॊडीम उजाा का सॊ ाय कयता हैं, जो एक प्राकृ त्त्त भाध्मभ से व्मत्क्त के बीतय
सद्दबावना, सभृवि, सपरता, उत्तभ स्वास्थ्म, मोग औय ध्मान के सरमे एक शत्क्तशारी भाध्मभ हैं!
 श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के ऩूजन से व्मत्क्त के साभात्जक भान-सम्भान व ऩद-प्रततष्ठा भें वृवि होती हैं।
 ववद्वानो के भतानुसाय श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के भध्मबाग ऩय ध्मान मोग कें दित कयने से व्मत्क्त फक ेतना शत्क्त जाग्रत
होकय शीघ्र उच् स्तय को प्राप्तहोती हैं।
 जो ऩुरुषों औय भदहरा अऩने साथी ऩय अऩना प्रबाव डारना ाहते हैं औय उन्हें अऩनी औय आकवषात कयना ाहते
हैं। उनके सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र उत्तभ उऩाम ससि हो सकता हैं।
 ऩतत-ऩत्नी भें आऩसी प्रभ की वृवि औय सुखी दाम्ऩत्म जीवन के सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र राबदामी होता हैं।
भूल्म:- Rs. 910 से Rs. 12700 तक उप्रब्ि >> Shop Online
श्रीकृ ष्ण फीसा कव
श्रीकृ ष्ण फीसा कव को के वर
ववशेष शुब भुहुता भें तनभााण फकमा
जाता हैं। कव को ववद्वान
कभाकाॊडी ब्राहभणों द्वाया शुब भुहुता
भें शास्िोक्त ववधध-ववधान से ववसशष्ट
तेजस्वी भॊिो द्वाया ससि प्राण-
प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त कयके
तनभााण फकमा जाता हैं। त्जस के
पर स्वरुऩ धायण कयता व्मत्क्त
को शीघ्र ऩूणा राब प्राप्त होता हैं।
कव को गरे भें धायण कयने से
वहॊ अत्मॊत प्रबाव शारी होता हैं।
गरे भें धायण कयने से कव
हभेशा रृदम के ऩास यहता हैं त्जस्से
व्मत्क्त ऩय उसका राब अतत तीव्र
एवॊ शीघ्र ऻात होने रगता हैं।
भूरम भात्र: 2350 >>Order Now
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99 ससतम्फय - 2019
जैन धभाके ववसशष्ट मॊिो की सू ी
श्री ौफीस तीथंकयका भहान प्रबाववत भत्कायी मॊि श्री एकाऺी नारयमेय मॊि
श्री ोफीस तीथंकय मॊि सवातो बि मॊि
कल्ऩवृऺ मॊि सवा सॊऩत्त्तकय मॊि
ध ॊताभणी ऩाश्वानाथ मॊि सवाकामा-सवा भनोकाभना ससविअ मॊि (१३० सवातोबि मॊि)
ध ॊताभणी मॊि (ऩैंसदठमा मॊि) ऋवष भॊडर मॊि
ध ॊताभणी क्र मॊि जगदवल्रब कय मॊि
श्री क्रे श्वयी मॊि ऋवि ससवि भनोकाभना भान सम्भान प्रात्प्त मॊि
श्री घॊटाकणा भहावीय मॊि ऋवि ससवि सभृवि दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि
श्री घॊटाकणा भहावीय सवा ससवि भहामॊि
(अनुबव ससि सॊऩूणा श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि)
ववषभ ववष तनग्रह कय मॊि
श्री ऩद्मावती मॊि ऺुिो ऩिव तननााशन मॊि
श्री ऩद्मावती फीसा मॊि फृहच् क्र मॊि
श्री ऩाश्वाऩद्मावती ह्ींकाय मॊि वॊध्मा शब्दाऩह मॊि
ऩद्मावती व्माऩाय वृवि मॊि भृतवत्सा दोष तनवायण मॊि
श्री धयणेन्ि ऩद्मावती मॊि काॊक वॊध्मादोष तनवायण मॊि
श्री ऩाश्वानाथ ध्मान मॊि फारग्रह ऩीडा तनवायण मॊि
श्री ऩाश्वानाथ प्रबुका मॊि रधुदेव कु र मॊि
बक्ताभय मॊि (गाथा नॊफय १ से ४४ तक) नवगाथात्भक उवसग्गहयॊ स्तोिका ववसशष्ट मॊि
भणणबि मॊि उवसग्गहयॊ मॊि
श्री मॊि श्री ऩॊ भॊगर भहाश्रृत स्कॊ ध मॊि
श्री रक्ष्भी प्रात्प्त औय व्माऩाय वधाक मॊि ह्ीॊकाय भम फीज भॊि
श्री रक्ष्भीकय मॊि वधाभान ववद्या ऩट्ट मॊि
रक्ष्भी प्रात्प्त मॊि ववद्या मॊि
भहाववजम मॊि सौबाग्मकय मॊि
ववजमयाज मॊि डाफकनी, शाफकनी, बम तनवायक मॊि
ववजम ऩतका मॊि बूतादद तनग्रह कय मॊि
ववजम मॊि ज्वय तनग्रह कय मॊि
ससि क्र भहामॊि शाफकनी तनग्रह कय मॊि
दक्षऺण भुखाम शॊख मॊि आऩत्त्त तनवायण मॊि
दक्षऺण भुखाम मॊि शिुभुख स्तॊबन मॊि
मंत्र के ववषम भें अधधक जानकायी हेतु संऩकथ कयें।
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100 ससतम्फय - 2019
घॊटाकणा भहावीय सवा ससवि भहामॊि को
स्थाऩीत कयने से साधक की सवा भनोकाभनाएॊ ऩूणा
होती हैं। सवा प्रकाय के योग बूत-प्रेत आदद उऩिव से
यऺण होता हैं। जहयीरे औय दहॊसक प्राणीॊ से सॊफॊधधत
बम दूय होते हैं। अत्ग्न बम, ोयबम आदद दूय होते
हैं।
दुष्ट व असुयी शत्क्तमों से उत्ऩन्न होने वारे
बम से मॊि के प्रबाव से दूय हो जाते हैं।
मॊि के ऩूजन से साधक को धन, सुख, सभृवि,
ऎश्वमा, सॊतत्त्त-सॊऩत्त्त आदद की प्रात्प्त होती हैं।
साधक की सबी प्रकाय की सात्त्वक इच्छाओॊ की ऩूतता
होती हैं।
मदद फकसी ऩरयवाय मा ऩरयवाय के सदस्मो ऩय
वशीकयण, भायण, उच् ाटन इत्मादद जादू-टोने वारे
प्रमोग फकमे गमें होतो इस मॊि के प्रबाव से स्वत्
नष्ट हो जाते हैं औय बववष्म भें मदद कोई प्रमोग
कयता हैं तो यऺण होता हैं।
कु छ जानकायो के श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका
मॊि से जुडे अद्द्भुत अनुबव यहे हैं। मदद घय भें श्री
घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि स्थावऩत फकमा हैं औय मदद कोई इषाा, रोब, भोह मा शिुतावश मदद
अनुध त कभा कयके फकसी बी उद्देश्म से साधक को ऩयेशान कयने का प्रमास कयता हैं तो मॊि के
प्रबाव से सॊऩूणा ऩरयवाय का यऺण तो होता ही हैं, कबी-कबी शिु के द्वाया फकमा गमा अनुध त कभा
शिु ऩय ही उऩय उरट वाय होते देखा हैं। भूल्म:- Rs. 2350 से Rs. 12700 तक उप्रब्ि
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101 ससतम्फय - 2019
अभोघ भहाभृत्मुॊजम कव
अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव व उल्रेणखत अन्म साभग्रीमों को शास्िोक्त ववधध-ववधान से
ववद्वान ब्राहभणो द्वाया सवा राख भहाभृत्मुंजम भंत्र जऩ एवॊ दशाॊश हवन द्वाया तनसभात फकमा
जाता हैं इससरए कव अत्मॊत प्रबावशारी होता हैं। >> Order Now
अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव
कव फनवाने हेतु:
अऩना नाभ, वऩता-भाता का नाभ,
गोि, एक नमा पोटो बेजे
याशी यत्न एवॊ उऩयत्न
ववशेष मॊि
हभायें महाॊ सबी प्रकाय के मॊि सोने- ाॊदद-
ताम्फे भें आऩकी आवश्मक्ता के अनुसाय
फकसी बी बाषा/धभा के मॊिो को आऩकी
आवश्मक डडजाईन के अनुसाय २२ गेज
शुि ताम्फे भें अखॊडडत फनाने की ववशेष
सुववधाएॊ उऩरब्ध हैं।
सबी साईज एवॊ भूल्म व क्वासरदट के
असरी नवयत्न एवॊ उऩयत्न बी उऩरब्ध हैं।
हभाये महाॊ सबी प्रकाय के यत्न एवॊ उऩयत्न व्माऩायी भूल्म ऩय उऩरब्ध हैं। ज्मोततष कामा से जुडे
फधु/फहन व यत्न व्मवसाम से जुडे रोगो के सरमे ववशेष भूल्म ऩय यत्न व अन्म साभग्रीमा व अन्म
सुववधाएॊ उऩरब्ध हैं।
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अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम
कव
दक्षऺणा भाि: 10900
102 ससतम्फय - 2019
2019 -ववशेष मोग
कामा ससवि मोग द्वद्वऩुष्कय मोग (दोगुना पर दामक)
01 ल 21 दोऩहय 8
05 8 ल 29 8 ल
08 ववघ्नकायक बिा
15 02 दोऩहय 03:21 से यात 01:54 तक (ऩातार)
17 ल 05 यात 08:49 से अगरे ददन 08:40 तक (स्वगा)
21 8 ल 09 दोऩहय 11:41 से यात 12:31 तक (ऩातार)
29 ल यात 07:07 13 सुफह 07:35 से यात 08:49 तक (ऩृथ्वी)
त्रिऩुष्कय मोग (तीनगुना पर दामक) 17 से सॊध्मा 04:33 तक (स्वगा)
01 8 20 8 से अगरे ददन सुफह 08:21 तक (स्वगा)
10 दोऩहय 11:09 24 सुफह 05:45 से सॊध्मा 04:42 तक (ऩृथ्वी)
27 सुफह 07:32 से सॊध्मा 05:40 तक (ऩृथ्वी)
मोग पर :
 कामा ससवि मोग भे फकमे गमे शुब कामा भे तनत्श् त सपरता प्राप्त होती हैं, एसा शास्िोक्त व न हैं।
 द्वद्वऩुष्कय मोग भें फकमे गमे शुब कामो का राब दोगुना होता हैं। एसा शास्िोक्त व न हैं।
 त्रिऩुष्कय मोग भें फकमे गमे शुब कामो का राब तीन गुना होता हैं। एसा शास्िोक्त व न हैं।
 शास्िोंक्त भत से ववघ्नकायक बिा मोग भें शुब कामा कयना वत्जात हैं।
दैतनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका
गुसरक कार (शुब) मभ कार (अशुब) याहु कार (अशुब)
वाय सभम अवधध सभम अवधध सभम अवधध
यवववाय 03:00 से 04:30 12:00 से 01:30 04:30 से 06:00
सोभवाय 01:30 से 03:00 10:30 से 12:00 07:30 से 09:00
भॊगरवाय 12:00 से 01:30 09:00 से 10:30 03:00 से 04:30
फुधवाय 10:30 से 12:00 07:30 से 09:00 12:00 से 01:30
गुरुवाय 09:00 से 10:30 06:00 से 07:30 01:30 से 03:00
शुक्रवाय 07:30 से 09:00 03:00 से 04:30 10:30 से 12:00
शतनवाय 06:00 से 07:30 01:30 से 03:00 09:00 से 10:30
103 ससतम्फय - 2019
ददन के ौघडडमे
सभम यवववाय सोभवाय भॊगरवाय फुधवाय गुरुवाय शुक्रवाय शतनवाय
06:00 से 07:30 उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल काल
07:30 से 09:00 चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ
09:00 से 10:30 लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग
10:30 से 12:00 अमृि रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग
12:00 से 01:30 काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल
01:30 से 03:00 शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ
03:00 से 04:30 रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि
04:30 से 06:00 उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल काल
यात के ौघडडमे
सभम यवववाय सोभवाय भॊगरवाय फुधवाय गुरुवाय शुक्रवाय शतनवाय
06:00 से 07:30 शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ
07:30 से 09:00 अमृि रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग
09:00 से 10:30 चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ
10:30 से 12:00 रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि
12:00 से 01:30 काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल
01:30 से 03:00 लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग
03:00 से 04:30 उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल काल
04:30 से 06:00 शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ
शास्िोक्त भत के अनुसाय मदद फकसी बी कामा का प्रायॊब शुब भुहूता मा शुब सभम ऩय फकमा जामे तो कामा भें
सपरता प्राप्त होने फक सॊबावना ज्मादा प्रफर हो जाती हैं। इस सरमे दैतनक शुब सभम ौघडडमा देखकय प्राप्त फकमा जा
सकता हैं।
नोट: प्राम् ददन औय यात्रि के ौघडडमे फक धगनती क्रभश् सूमोदम औय सूमाास्त से फक जाती हैं। प्रत्मेक ौघडडमे फक अवधध
1 घॊटा 30 सभतनट अथाात डेढ़ घॊटा होती हैं। सभम के अनुसाय ौघडडमे को शुबाशुब तीन बागों भें फाॊटा जाता हैं, जो क्रभश्
शुब, भध्मभ औय अशुब हैं।
ौघडडमे के स्वाभी ग्रह * हय कामा के सरमे शुब/अभृत/राब का
ौघडडमा उत्तभ भाना जाता हैं।
* हय कामा के सरमे र/कार/योग/उद्वेग
का ौघडडमा उध त नहीॊ भाना जाता।
शुब ौघडडमा भध्मभ ौघडडमा अशुब ौघडडमा
ौघडडमा स्वाभी ग्रह ौघडडमा स्वाभी ग्रह ौघडडमा स्वाभी ग्रह
शुब गुरु य शुक्र उद्बेग सूमा
अभृत ॊिभा कार शतन
राब फुध योग भॊगर
104 ससतम्फय - 2019
ददन फक होया - सूमोदम से सूमाास्त तक
वाय 1.घॊ 2.घॊ 3.घॊ 4.घॊ 5.घॊ 6.घॊ 7.घॊ 8.घॊ 9.घॊ 10.घॊ 11.घॊ 12.घॊ
यवववाय सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन
सोभवाय ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा
भॊगरवाय भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि
फुधवाय फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर
गुरुवाय गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध
शुक्रवाय शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु
शतनवाय शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र
यात फक होया – सूमाास्त से सूमोदम तक
यवववाय गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध
सोभवाय शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु
भॊगरवाय शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र
फुधवाय सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन
गुरुवाय ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा
शुक्रवाय भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि
शतनवाय फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर
होया भुहूता को कामा ससवि के सरए ऩूणा परदामक एवॊ अ ूक भाना जाता हैं, ददन-यात के २४ घॊटों भें शुब-अशुब
सभम को सभम से ऩूवा ऻात कय अऩने कामा ससवि के सरए प्रमोग कयना ादहमे।
ववद्वानो के भत से इश्च्छ्छत कामथ ससवि के सरए ग्रह से संफंधधत होया का चुनाव कयने से ववशेष राब
प्राप्त होता हैं।
 सूमा फक होया सयकायी कामो के सरमे उत्तभ होती हैं।
 ॊिभा फक होया सबी कामों के सरमे उत्तभ होती हैं।
 भॊगर फक होया कोटा-क ेयी के कामों के सरमे उत्तभ होती हैं।
 फुध फक होया ववद्या-फुवि अथाात ऩढाई के सरमे उत्तभ होती हैं।
 गुरु फक होया धासभाक कामा एवॊ वववाह के सरमे उत्तभ होती हैं।
 शुक्र फक होया मािा के सरमे उत्तभ होती हैं।
 शतन फक होया धन-िव्म सॊफॊधधत कामा के सरमे उत्तभ होती हैं।
105 ससतम्फय - 2019
सवा योगनाशक मॊि/कव
भनुष्म अऩने जीवन के ववसबन्न सभम ऩय फकसी ना फकसी साध्म मा असाध्म योग से ग्रस्त होता
हैं। उध त उऩ ाय से ज्मादातय साध्म योगो से तो भुत्क्त सभर जाती हैं, रेफकन कबी-कबी साध्म योग
होकय बी असाध्म होजाते हैं, मा कोइ असाध्म योग से ग्रससत होजाते हैं। हजायो राखो रुऩमे ख ा कयने ऩय
बी अधधक राब प्राप्त नहीॊ हो ऩाता। डॉक्टय द्वारा ददजाने वारी दवाईमा अल्ऩ सभम के सरमे कायगय
सात्रफत होती हैं, एसी त्स्थती भें राब प्रात्प्त के सरमे व्मत्क्त एक डॉक्टय से दूसये डॉक्टय के क्कय रगाने
को फाध्म हो जाता हैं।
बायतीम ऋषीमोने अऩने मोग साधना के प्रताऩ से योग शाॊतत हेतु ववसबन्न आमुवेय औषधो के
अततरयक्त मॊि, भॊि एवॊ तॊि का उल्रेख अऩने ग्रॊथो भें कय भानव जीवन को राब प्रदान कयने का साथाक
प्रमास हजायो वषा ऩूवा फकमा था। फुविजीवो के भत से जो व्मत्क्त जीवनबय अऩनी ददन माा ऩय तनमभ,
सॊमभ यख कय आहाय ग्रहण कयता हैं, एसे व्मत्क्त को ववसबन्न योग से ग्रससत होने की सॊबावना कभ होती
हैं। रेफकन आज के फदरते मुग भें एसे व्मत्क्त बी बमॊकय योग से ग्रस्त होते ददख जाते हैं। क्मोफक सभग्र
सॊसाय कार के अधीन हैं। एवॊ भृत्मु तनत्श् त हैं त्जसे ववधाता के अरावा औय कोई टार नहीॊ सकता,
रेफकन योग होने फक त्स्थती भें व्मत्क्त योग दूय कयने का प्रमास तो अवश्म कय सकता हैं। इस सरमे मंत्र
भंत्र एवं तंत्र के कु शर जानकाय से मोग्म भागादशान रेकय व्मत्क्त योगो से भुत्क्त ऩाने का मा उसके प्रबावो
को कभ कयने का प्रमास बी अवश्म कय सकता हैं।
ज्मोततष द्विद्या के कु शर जानकय बी कार ऩुरुषकी गणना कय अनेक योगो के अनेको यहस्म को
उजागय कय सकते हैं। ज्मोततष शास्ि के भाध्मभ से योग के भूरको ऩकडने भे सहमोग सभरता हैं, जहा
आधुतनक ध फकत्सा शास्ि अऺभ होजाता हैं वहा ज्मोततष शास्ि द्वाया योग के भूर(जड) को ऩकड कय
उसका तनदान कयना राबदामक एवॊ उऩामोगी ससि होता हैं।
हय व्मत्क्त भें रार यॊगकी कोसशकाए ऩाइ जाती हैं, त्जसका तनमभीत ववकास क्रभ फि तयीके से
होता यहता हैं। जफ इन कोसशकाओ के क्रभ भें ऩरयवतान होता है मा ववखॊडडन होता हैं तफ व्मत्क्त के शयीय
भें स्वास्थ्म सॊफॊधी ववकायो उत्ऩन्न होते हैं। एवॊ इन कोसशकाओ का सॊफॊध नव ग्रहो के साथ होता हैं।
त्जस्से योगो के होने के कायण व्मत्क्त के जन्भाॊग से दशा-भहादशा एवॊ ग्रहो फक गो य त्स्थती से प्राप्त
होता हैं।
सवा योग तनवायण कव एवॊ भहाभृत्मुॊजम मॊि के भाध्मभ से व्मत्क्त के जन्भाॊग भें त्स्थत कभजोय
एवॊ ऩीडडत ग्रहो के अशुब प्रबाव को कभ कयने का कामा सयरता ऩूवाक फकमा जासकता हैं। जेसे हय
व्मत्क्त को ब्रहभाॊड फक उजाा एवॊ ऩृथ्वी का गुरुत्वाकषाण फर प्रबावीत कताा हैं दठक उसी प्रकाय कव एवॊ
मॊि के भाध्मभ से ब्रहभाॊड फक उजाा के सकायात्भक प्रबाव से व्मत्क्त को सकायात्भक उजाा प्राप्त होती हैं
त्जस्से योग के प्रबाव को कभ कय योग भुक्त कयने हेतु सहामता सभरती हैं।
योग तनवायण हेतु भहाभृत्मुॊजम भॊि एवॊ मॊि का फडा भहत्व हैं। त्जस्से दहन्दू सॊस्कृ तत का प्राम् हय
व्मत्क्त भहाभृत्मुॊजम भॊि से ऩरयध त हैं।
106 ससतम्फय - 2019
कवच के राब :
 एसा शास्िोक्त व न हैं त्जस घय भें भहाभृत्मुॊजम मॊि स्थावऩत होता हैं वहा तनवास कताा हो नाना
प्रकाय फक आधध-व्माधध-उऩाधध से यऺा होती हैं।
 ऩूणा प्राण प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त सवा योग तनवायण कव फकसी बी उम्र एवॊ जातत धभा के
रोग ाहे स्िी हो मा ऩुरुष धायण कय सकते हैं।
 जन्भाॊगभें अनेक प्रकायके खयाफ मोगो औय खयाफ ग्रहो फक प्रततकू रता से योग उतऩन्न होते हैं।
 कु छ योग सॊक्रभण से होते हैं एवॊ कु छ योग खान-ऩान फक अतनमसभतता औय अशुितासे उत्ऩन्न होते हैं।
कव एवॊ मॊि द्वाया एसे अनेक प्रकाय के खयाफ मोगो को नष्ट कय, स्वास्थ्म राब औय शायीरयक यऺण
प्राप्त कयने हेतु सवा योगनाशक कव एवॊ मॊि सवा उऩमोगी होता हैं।
 आज के बौततकता वादी आधुतनक मुगभे अनेक एसे योग होते हैं, त्जसका उऩ ाय ओऩयेशन औय दवासे
बी कदठन हो जाता हैं। कु छ योग एसे होते हैं त्जसे फताने भें रोग दह फक ाते हैं शयभ अनुबव कयते हैं
एसे योगो को योकने हेतु एवॊ उसके उऩ ाय हेतु सवा योगनाशक कव एवॊ मॊि राबादातम ससि होता हैं।
 प्रत्मेक व्मत्क्त फक जेसे-जेसे आमु फढती हैं वैसे-वसै उसके शयीय फक ऊजाा कभ होती जाती हैं। त्जसके
साथ अनेक प्रकाय के ववकाय ऩैदा होने रगते हैं एसी त्स्थती भें उऩ ाय हेतु सवायोगनाशक कव एवॊ
मॊि परप्रद होता हैं।
 त्जस घय भें वऩता-ऩुि, भाता-ऩुि, भाता-ऩुिी, मा दो बाई एक दह नऺिभे जन्भ रेते हैं, तफ उसकी
भाता के सरमे अधधक कष्टदामक त्स्थती होती हैं। उऩ ाय हेतु भहाभृत्मुॊजम मॊि परप्रद होता हैं।
 त्जस व्मत्क्त का जन्भ ऩरयधध मोगभे होता हैं उन्हे होने वारे भृत्मु तुल्म कष्ट एवॊ होने वारे योग,
ध ॊता भें उऩ ाय हेतु सवा योगनाशक कव एवॊ मॊि शुब परप्रद होता हैं।
नोट:- ऩूणा प्राण प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त सवा योग तनवायण कव एवॊ मॊि के फाये भें अधधक
जानकायी हेतु सॊऩका कयें। >> Shop Online | Order Now
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Our Goal
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107 ससतम्फय - 2019
भंत्र ससि कवच
मंत्र द्वसद्ध किच को द्विशेष प्रयोजन में उपयोग के द्वलए और शीघ्र प्रभाि शाली बनाने के द्वलए िेजस्िी मंत्रो द्वारा शुभ महूित में शुभ
ददन को िैयार दकये जािे है । अलग-अलग किच िैयार करने केद्वलए अलग-अलग िरह के मंत्रो का प्रयोग दकया जािा है ।
 क्यों चुने मंत्र द्वसद्ध किच?  उपयोग में आसान कोई प्रद्विबन्ध नहीॊ  कोई द्विशेष द्वनद्वि-द्वनयम नहीं  कोई बुरा प्रभाि नहीं
भंत्र ससि कवच सूधच
राज राजेश्वरी किच
Raj Rajeshwari Kawach ………..………………………
11000 द्विष्णु बीसा किच
Vishnu Visha Kawach ………..………………………... 2350
अमोघ महामृतयुंजय किच
Amogh Mahamrutyunjay Kawach ……………………. 10900
रामभद्र बीसा किच
Ramabhadra Visha Kawach ………..………………… 2350
दस महाद्विद्या किच
Dus Mahavidhya Kawach ………..……………………. 7300
कुबेर बीसा किच
Kuber Visha Kawach ………..…………………………. 2350
श्री घंटाकणत महािीर सित द्वसद्वद्ध प्रद किच
Shri Ghantakarn Mahavir Sarv Siddhi Prad Kawach.. 6400
गरुड बीसा किच
Garud Visha Kawach ………..………………………… 2350
सकल द्वसद्वद्ध प्रद गायत्री किच
Sakal Siddhi Prad Gayatri Kawach …………………... 6400
लक्ष्मी बीसा किच
Lakshmi Visha Kawach ……..…………………………. 2350
निदुगात शद्वि किच
Navdurga Shakiti Kawach ………..…………………… 6400
ससह बीसा किच
Sinha Visha Kawach ………..…………………………. 2350
रसायन द्वसद्वद्ध किच
Rasayan Siddhi Kawach ………..…………………….. 6400
निातण बीसा किच
Narvan Visha Kawach ………..……………………….. 2350
पंचदेि शद्वि किच
Pancha Dev Shakti Kawach ………..…………………. 6400
संकट मोद्वचनी काद्वलका द्वसद्वद्ध किच
Sankat Mochinee Kalika Siddhi Kawach ………..…… 2350
सित कायत द्वसद्वद्ध किच
Sarv Karya Siddhi Kawach ………..………………….. 5500
राम रक्षा किच
Ram Raksha Kawach ………..………………………… 2350
सुिणत लक्ष्मी किच
Suvarn Lakshmi Kawach ………..……………………. 4600
नारायण रक्षा किच
Narayan Raksha Kavach .……………………………... 2350
स्िणातकषतण भैरि किच
Swarnakarshan Bhairav Kawach ………..…………… 4600
हनुमान रक्षा किच
Hanuman Raksha Kawach ………..………………….. 2350
कालसपत शांद्वि किच
Kalsharp Shanti Kawach ………..…………………….. 3700
भैरि रक्षा किच
Bhairav Raksha Kawach ………………………………. 2350
द्विलक्षण सकल राज िशीकरण किच
Vilakshan Sakal Raj Vasikaran Kawach ………..…… 3250
शद्वन साड़ेसािी और ढ़ैया कष्ट द्वनिारण किच
Shani Sadesatee aur Dhaiya Kasht Nivaran Kawach ….. 2350
इष्ट द्वसद्वद्ध किच
Isht Siddhi Kawach ………..…………………………… 2800
श्राद्वपि योग द्वनिारण किच
Sharapit Yog Nivaran Kawach ……..………………… 1900
परदेश गमन और लाभ प्राद्वि किच
Pardesh Gaman Aur Labh Prapti Kawach ………...... 2350
द्विष योग द्वनिारण किच
Vish Yog Nivaran Kawach ……..……………………. 1900
श्रीदुगात बीसा किच
Durga Visha Kawach ………..…………………………. 2350
सितजन िशीकरण किच
Sarvjan Vashikaran Kawach ……..…………………… 1450
कृ ष्ण बीसा किच
Krushna Bisa Kawach ………..………………………... 2350
द्वसद्वद्ध द्विनायक किच
Siddhi Vinayak Ganapati Kawach ……..…………….. 1450
अष्ट द्विनायक किच
Asht Vinayak Kawach ………..………………………... 2350
सकल सम्मान प्राद्वि किच
Sakal Samman Praapti Kawach ……..………………. 1450
आकषतण िृद्वद्ध किच
Aakarshan Vruddhi Kawach ……..…………………… 1450
स्िप्न भय द्वनिारण किच
Swapna Bhay Nivaran Kawach ……..……………….. 1050
108 ससतम्फय - 2019
िशीकरण नाशक किच
Vasikaran Nashak Kawach ……..…………………….. 1450
सरस्ििी किच (कक्षा +10 के द्वलए)
Saraswati Kawach (For Class +10) ………………….. 1050
प्रीद्वि नाशक किच
Preeti Nashak Kawach ……..…………………………. 1450
सरस्ििी किच (कक्षा 10 िकके द्वलए)
Saraswati Kawach (For up to Class 10) …………….. 910
चंडाल योग द्वनिारण किच
Chandal Yog Nivaran Kawach ……..………………… 1450
िशीकरण किच (2-3 व्यद्विके द्वलए)
Vashikaran Kawach For (For 2-3 Person) ……………. 1250
ग्रहण योग द्वनिारण किच
Grahan Yog Nivaran Kawach ……..………………….. 1450
पत्नी िशीकरण किच
Patni Vasikaran Kawach ………………………………... 820
मांगद्वलक योग द्वनिारण किच (कुजा योग )
Magalik Yog Nivaran Kawach (Kuja Yoga) …………. 1450
पद्वि िशीकरण किच
Pati Vasikaran Kawach …………………………………. 820
अष्ट लक्ष्मी किच
Asht Lakshmi Kawach ……..………………………... 1250
िशीकरण किच ( 1 व्यद्वि के द्वलए)
Vashikaran Kawach (For 1 Person) …………………… 820
आकद्वस्मक धन प्राद्वि किच
Akashmik Dhan Prapti Kawach ……..……………….. 1250
सुदशतन बीसा किच
Sudarshan Visha Kawach ……..…………………...…... 910
स्पे.व्यापार िृद्वद्ध किच
Special Vyapar Vruddhi Kawach ……..……………… 1250
महा सुदशतन किच
Mahasudarshan Kawach ……..……………...…………. 910
धन प्राद्वि किच
Dhan Prapti Kawach ……..…………………………... 1250
िंत्र रक्षा किच
Tantra Raksha Kawach …………………………………. 910
कायत द्वसद्वद्ध किच
Karya Siddhi Kawach ……..…………………………… 1250
िशीकरण किच (2-3 व्यद्विके द्वलए)
Vashikaran Kawach For (For 2-3 Person) ……………. 1250
भूद्वमलाभ किच
Bhumilabh Kawach ……..……………………………. 1250
पत्नी िशीकरण किच
Patni Vasikaran Kawach ………………………………... 820
निग्रह शांद्वि किच
Navgrah Shanti Kawach ……..……………………….. 1250
पद्वि िशीकरण किच
Pati Vasikaran Kawach …………………………………. 820
संिान प्राद्वि किच
Santan Prapti Kawach ……..………………………….. 1250
िशीकरण किच ( 1 व्यद्वि के द्वलए)
Vashikaran Kawach (For 1 Person) …………………… 820
कामदेि किच
Kamdev Kawach ……..………………………………. 1250
सुदशतन बीसा किच
Sudarshan Visha Kawach ……..…………………...…... 910
हंस बीसा किच
Hans Visha Kawach ……..…………………………….. 1250
महा सुदशतन किच
Mahasudarshan Kawach ……..……………...…………. 910
पदौन्नद्वि किच
Padounnati Kawach ……..…………………………. 1250
िंत्र रक्षा किच
Tantra Raksha Kawach …………………………………. 910
ऋण / कजत मुद्वि किच
Rin / Karaj Mukti Kawach ……..……………………… 1250
द्वत्रशूल बीसा किच
Trishool Visha Kawach ……..…………………………... 910
शत्रु द्विजय किच
Shatru Vijay Kawach ………………………………….. 1050
व्यापर िृद्वद्ध किच
Vyapar Vruddhi Kawach ………………………………... 910
द्वििाह बाधा द्वनिारण किच
Vivah Badha Nivaran Kawach ………………………... 1050
सित रोग द्वनिारण किच
Sarv Rog Nivaran Kawach ……………………………... 910
स्िद्वस्िक बीसा किच
Swastik Visha Kawach ……..…………………………. 1050
शारीररक शद्वि िधतक किच
Sharirik Shakti Vardhak Kawach ..……………………... 910
मद्वस्िष्क पृद्वष्ट िधतक किच
Mastishk Prushti Vardhak Kawach …………………… 820
द्वसद्ध शुक्र किच
Siddha Shukra Kawach …………………………………. 820
109 ससतम्फय - 2019
िाणी पृद्वष्ट िधतक किच
Vani Prushti Vardhak Kawach ………………………… 820
द्वसद्ध शद्वन किच
Siddha Shani Kawach …………………………………... 820
कामना पूर्ति किच
Kamana Poorti Kawach ………………………………. 820
द्वसद्ध राहु किच
Siddha Rahu Kawach …………………………………… 820
द्विरोध नाशक किच
Virodh Nashan Kawach ………………………………. 820
द्वसद्ध केिु किच
Siddha Ketu Kawach ……………………………………. 820
द्वसद्ध सूयत किच
Siddha Surya Kawach …………………………………. 820
रोजगार िृद्वद्ध किच
Rojgar Vruddhi Kawach ………………………………… 730
द्वसद्ध चंद्र किच
Siddha Chandra Kawach ……………………………… 820
द्विघ्न बाधा द्वनिारण किच
Vighna Badha Nivaran Kawah …………………………. 730
द्वसद्ध मंगल किच (कु जा)
Siddha Mangal Kawach (Kuja) ……………………… 820
नज़र रक्षा किच
Najar Raksha Kawah ……………………………………. 730
द्वसद्ध बुध किच
Siddha Bhudh Kawach ………………………………… 820
रोजगार प्राद्वि किच
Rojagar Prapti Kawach …………………………………. 730
द्वसद्ध गुरु किच
Siddha Guru Kawach ………………………………..… 820
दुभातग्य नाशक किच
Durbhagya Nashak ……………………………………… 640
उऩयोक्त कव के अरावा अन्म सभस्मा ववशेष के सभाधान हेतु एवॊ उद्देश्म ऩूतता हेतु कव का तनभााण फकमा जाता हैं। कव के ववषम भें
अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें। *कव भाि शुब कामा मा उद्देश्म के सरमे >> Shop Online | Order Now
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110 ससतम्फय - 2019
Gemstone Price List
NAME OF GEM STONE GENERAL MEDIUM FINE FINE SUPER FINE SPECIAL
Emerald (ऩन्ना) 200.00 500.00 1200.00 1900.00 2800.00 & above
Yellow Sapphire (ऩुखयाज) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above
Yellow Sapphire Bangkok (फैंकोक ऩुखयाज) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above
Blue Sapphire (नीरभ) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above
White Sapphire (सफ़े द ऩुखयाज) 1000.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above
Bangkok Black Blue(फैंकोक नीरभ) 100.00 150.00 190.00 550.00 1000.00 & above
Ruby (भाणणक) 100.00 190.00 370.00 730.00 1900.00 & above
Ruby Berma (फभाा भाणणक) 5500.00 6400.00 8200.00 10000.00 21000.00 & above
Speenal (नयभ भाणणक/रारडी) 300.00 600.00 1200.00 2100.00 3200.00 & above
Pearl (भोतत) 30.00 60.00 90.00 120.00 280.00 & above
Red Coral (4 यतत तक) (रार भूॊगा) 125.00 190.00 280.00 370.00 460.00 & above
Red Coral (4 यतत से उऩय)(रार भूॊगा) 190.00 280.00 370.00 460.00 550.00 & above
White Coral (सफ़े द भूॊगा) 73.00 100.00 190.00 280.00 460.00 & above
Cat’s Eye (रहसुतनमा) 25.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above
Cat’s Eye ODISHA(उडडसा रहसुतनमा) 280.00 460.00 730.00 1000.00 1900.00 & above
Gomed (गोभेद) 19.00 28.00 45.00 100.00 190.00 & above
Gomed CLN (ससरोनी गोभेद) 190.00 280.00 460.00 730.00 1000.00 & above
Zarakan (जयकन) 550.00 730.00 820.00 1050.00 1250.00 & above
Aquamarine (फेरुज) 210.00 320.00 410.00 550.00 730.00 & above
Lolite (नीरी) 50.00 120.00 230.00 390.00 500.00 & above
Turquoise (फफ़योजा) 100.00 145.00 190.00 280.00 460.00 & above
Golden Topaz (सुनहरा) 28.00 46.00 90.00 120.00 190.00 & above
Real Topaz (उडडसा ऩुखयाज/टोऩज) 100.00 190.00 280.00 460.00 640.00 & above
Blue Topaz (नीरा टोऩज) 100.00 190.00 280.00 460.00 640.00 & above
White Topaz (सफ़े द टोऩज) 60.00 90.00 120.00 240.00 410.00& above
Amethyst (कटेरा) 28.00 46.00 90.00 120.00 190.00 & above
Opal (उऩर) 28.00 46.00 90.00 190.00 460.00 & above
Garnet (गायनेट) 28.00 46.00 90.00 120.00 190.00 & above
Tourmaline (तुभारीन) 120.00 140.00 190.00 300.00 730.00 & above
Star Ruby (सुमाकान्त भणण) 45.00 75.00 90.00 120.00 190.00 & above
Black Star (कारा स्टाय) 15.00 30.00 45.00 60.00 100.00 & above
Green Onyx (ओनेक्स) 10.00 19.00 28.00 55.00 100.00 & above
Lapis (राजवात) 15.00 28.00 45.00 100.00 190.00 & above
Moon Stone ( न्िकान्त भणण) 12.00 19.00 28.00 55.00 190.00 & above
Rock Crystal (स्फ़दटक) 19.00 46.00 15.00 30.00 45.00 & above
Kidney Stone (दाना फफ़यॊगी) 09.00 11.00 15.00 19.00 21.00 & above
Tiger Eye (टाइगय स्टोन) 03.00 05.00 10.00 15.00 21.00 & above
Jade (भयग ) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above
Sun Stone (सन ससताया) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above
Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus
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111 ससतम्फय - 2019
GURUTVA KARYALAY
YANTRA LIST EFFECTS
Our Splecial Yantra
1 12 – YANTRA SET For all Family Troubles
2 VYAPAR VRUDDHI YANTRA For Business Development
3 BHOOMI LABHA YANTRA For Farming Benefits
4 TANTRA RAKSHA YANTRA For Protection Evil Sprite
5 AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA For Unexpected Wealth Benefits
6 PADOUNNATI YANTRA For Getting Promotion
7 RATNE SHWARI YANTRA For Benefits of Gems & Jewellery
8 BHUMI PRAPTI YANTRA For Land Obtained
9 GRUH PRAPTI YANTRA For Ready Made House
10 KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA -
Shastrokt Yantra
11 AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA Blessing of Durga
12 BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL) Win over Enemies
13 BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL) Blessing of Bagala Mukhi
14 BHAGYA VARDHAK YANTRA For Good Luck
15 BHAY NASHAK YANTRA For Fear Ending
16 CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta) Blessing of Chamunda & Navgraha
17 CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA Blessing of Chhinnamasta
18 DARIDRA VINASHAK YANTRA For Poverty Ending
19 DHANDA POOJAN YANTRA For Good Wealth
20 DHANDA YAKSHANI YANTRA For Good Wealth
21 GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra) Blessing of Lord Ganesh
22 GARBHA STAMBHAN YANTRA For Pregnancy Protection
23 GAYATRI BISHA YANTRA Blessing of Gayatri
24 HANUMAN YANTRA Blessing of Lord Hanuman
25 JWAR NIVARAN YANTRA For Fewer Ending
26 JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA
YANTRA
For Astrology & Spritual Knowlage
27 KALI YANTRA Blessing of Kali
28 KALPVRUKSHA YANTRA For Fullfill your all Ambition
29 KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA) Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga
30 KANAK DHARA YANTRA Blessing of Maha Lakshami
31 KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA -
32 KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in work
33  SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in all work
34 KRISHNA BISHA YANTRA Blessing of Lord Krishna
35 KUBER YANTRA Blessing of Kuber (Good wealth)
36 LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA For Obstaele Of marriage
37 LAKSHAMI GANESH YANTRA Blessing of Lakshami & Ganesh
38 MAHA MRUTYUNJAY YANTRA For Good Health
39 MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA Blessing of Shiva
40 MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA) For Fullfill your all Ambition
41 MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA For Marriage with choice able Girl
42 NAVDURGA YANTRA Blessing of Durga
112 ससतम्फय - 2019
YANTRA LIST EFFECTS
43 NAVGRAHA SHANTI YANTRA For good effect of 9 Planets
44 NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA For good effect of 9 Planets
45  SURYA YANTRA Good effect of Sun
46  CHANDRA YANTRA Good effect of Moon
47  MANGAL YANTRA Good effect of Mars
48  BUDHA YANTRA Good effect of Mercury
49  GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA) Good effect of Jyupiter
50  SUKRA YANTRA Good effect of Venus
51  SHANI YANTRA (COPER & STEEL) Good effect of Saturn
52  RAHU YANTRA Good effect of Rahu
53  KETU YANTRA Good effect of Ketu
54 PITRU DOSH NIVARAN YANTRA For Ancestor Fault Ending
55 PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA For Pregnancy Pain Ending
56 RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA For Benefits of State & Central Gov
57 RAM YANTRA Blessing of Ram
58 RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA Blessing of Riddhi-Siddhi
59 ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA For Disease- Pain- Poverty Ending
60 SANKAT MOCHAN YANTRA For Trouble Ending
61 SANTAN GOPAL YANTRA Blessing Lorg Krishana For child acquisition
62 SANTAN PRAPTI YANTRA For child acquisition
63 SARASWATI YANTRA Blessing of Sawaswati (For Study & Education)
64 SHIV YANTRA Blessing of Shiv
65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA)
Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth &
Peace
66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth
67 SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA For Bad Dreams Ending
68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA For Vehicle Accident Ending
69 VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE
MAHALAKSHAMI YANTRA)
Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All
Successes
70 VASTU YANTRA For Bulding Defect Ending
71 VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA For Education- Fame- state Award Winning
72 VISHNU BISHA YANTRA Blessing of Lord Vishnu (Narayan)
73 VASI KARAN YANTRA Attraction For office Purpose
74  MOHINI VASI KARAN YANTRA Attraction For Female
75  PATI VASI KARAN YANTRA Attraction For Husband
76  PATNI VASI KARAN YANTRA Attraction For Wife
77  VIVAH VASHI KARAN YANTRA Attraction For Marriage Purpose
Yantra Available @:- Rs- 325 to 12700 and Above…..
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113 ससतम्फय - 2019
सू ना
 ऩत्रिका भें प्रकासशत सबी रेख ऩत्रिका के अधधकायों के साथ ही आयक्षऺत हैं।
 रेख प्रकासशत होना का भतरफ मह कतई नहीॊ फक कामाारम मा सॊऩादक बी इन वव ायो से सहभत हों।
 नात्स्तक/ अववश्वासु व्मत्क्त भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हैं।
 ऩत्रिका भें प्रकासशत फकसी बी नाभ, स्थान मा घटना का उल्रेख महाॊ फकसी बी व्मत्क्त ववशेष मा फकसी बी स्थान मा
घटना से कोई सॊफॊध नहीॊ हैं।
 प्रकासशत रेख ज्मोततष, अॊक ज्मोततष, वास्तु, भॊि, मॊि, तॊि, आध्मात्त्भक ऻान ऩय आधारयत होने के कायण
मदद फकसी के रेख, फकसी बी नाभ, स्थान मा घटना का फकसी के वास्तववक जीवन से भेर होता हैं तो मह भाि
एक सॊमोग हैं।
 प्रकासशत सबी रेख बायततम आध्मात्त्भक शास्िों से प्रेरयत होकय सरमे जाते हैं। इस कायण इन ववषमो फक
सत्मता अथवा प्राभाणणकता ऩय फकसी बी प्रकाय फक त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हैं।
 अन्म रेखको द्वाया प्रदान फकमे गमे रेख/प्रमोग फक प्राभाणणकता एवॊ प्रबाव फक त्जन्भेदायी कामाारम मा
सॊऩादक फक नहीॊ हैं। औय नाहीॊ रेखक के ऩते दठकाने के फाये भें जानकायी देने हेतु कामाारम मा सॊऩादक
फकसी बी प्रकाय से फाध्म हैं।
 ज्मोततष, अॊक ज्मोततष, वास्तु, भॊि, मॊि, तॊि, आध्मात्त्भक ऻान ऩय आधारयत रेखो भें ऩाठक का अऩना
ववश्वास होना आवश्मक हैं। फकसी बी व्मत्क्त ववशेष को फकसी बी प्रकाय से इन ववषमो भें ववश्वास कयने ना
कयने का अॊततभ तनणाम स्वमॊ का होगा।
 ऩाठक द्वारा फकसी बी प्रकाय फक आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।
 हभाये द्वारा ऩोस्ट फकमे गमे सबी रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ अनुशॊधान के आधाय ऩय सरखे होते हैं। हभ फकसी बी
व्मत्क्त ववशेष द्वारा प्रमोग फकमे जाने वारे भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोकी त्जन्भेदायी नदहॊ रेते हैं।
 मह त्जन्भेदायी भॊि-मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोको कयने वारे व्मत्क्त फक स्वमॊ फक होगी। क्मोफक इन ववषमो भें
नैततक भानदॊडों, साभात्जक, कानूनी तनमभों के णखराप कोई व्मत्क्त मदद नीजी स्वाथा ऩूतता हेतु प्रमोग कताा हैं
अथवा प्रमोग के कयने भे िुदट होने ऩय प्रततकू र ऩरयणाभ सॊबव हैं।
 हभाये द्वारा ऩोस्ट फकमे गमे सबी भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय स्वमॊ ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधुगण ऩय प्रमोग फकमे
हैं त्जस्से हभे हय प्रमोग मा भॊि-मॊि मा उऩामो द्वारा तनत्श् त सपरता प्राप्त हुई हैं।
 ऩाठकों फक भाॊग ऩय एक दह रेखका ऩून् प्रकाशन कयने का अधधकाय यखता हैं। ऩाठकों को एक रेख के
ऩून् प्रकाशन से राब प्राप्त हो सकता हैं।
 अधधक जानकायी हेतु आऩ कामाारम भें सॊऩका कय सकते हैं।
(सबी वववादो के सरमे के वर बुवनेववय न्मामारम ही भान्म होगा।)
114 ससतम्फय - 2019
FREE
E CIRCULAR
गुरुत्व ज्मोततष भाससक ई-ऩत्रिका
ससतम्फय 2019
सॊऩादक
ध ॊतन जोशी
सॊऩका
गुरुत्व ज्मोततष ववबाग
गुरुत्व कामाारम
92/3. BANK COLONY,
BRAHMESHWAR PATNA,
BHUBNESWAR-751018,
(ODISHA) INDIA
पोन
91+9338213418, 91+9238328785
ईभेर
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115 ससतम्फय - 2019
हभाया उद्देश्म
वप्रम आत्त्भम
फॊधु/ फदहन
जम गुरुदेव
जहाॉ आधुतनक ववऻान सभाप्त हो जाता हैं। वहाॊ आध्मात्त्भक ऻान प्रायॊब
हो जाता हैं, बौततकता का आवयण ओढे व्मत्क्त जीवन भें हताशा औय तनयाशा भें
फॊध जाता हैं, औय उसे अऩने जीवन भें गततशीर होने के सरए भागा प्राप्त नहीॊ हो
ऩाता क्मोफक बावनाए दह बवसागय हैं, त्जसभे भनुष्म की सपरता औय
असपरता तनदहत हैं। उसे ऩाने औय सभजने का साथाक प्रमास ही श्रेष्ठकय
सपरता हैं। सपरता को प्राप्त कयना आऩ का बाग्म ही नहीॊ अधधकाय हैं। ईसी
सरमे हभायी शुब काभना सदैव आऩ के साथ हैं। आऩ अऩने कामा-उद्देश्म एवॊ
अनुकू रता हेतु मॊि, ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न औय दुराब भॊि शत्क्त से ऩूणा प्राण-
प्रततत्ष्ठत ध ज वस्तु का हभेंशा प्रमोग कये जो १००% परदामक हो। ईसी सरमे
हभाया उद्देश्म महीॊ हे की शास्िोक्त ववधध-ववधान से ववसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्वाया
ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त सबी प्रकाय के मन्ि- कव एवॊ शुब
परदामी ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न आऩके घय तक ऩहो ाने का हैं।
सूमा की फकयणे उस घय भें प्रवेश कयाऩाती हैं।
जीस घय के णखडकी दयवाजे खुरे हों।
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116 ससतम्फय - 2019
GURUTVA JYOTISH
Monthly
SEP -2019

GURUTVA JYOTISH SEPTEMBER-2019

  • 1.
    Nonprofit Publications . गुरुत्वकामाारम द्वाया प्रस्तुत भाससक ई-ऩत्रिका ससतम्फय-2019 Our Web Site: www.gurutvajyotish.com Shp Our Product Online www.gurutvakaryalay.com Join Us: fb.com/gurutva.karyalay | twitter.com/#!/GURUTVAKARYALAY | plus.google.com/u/0/+ChintanJoshi
  • 2.
    FREE E CIRCULAR गुरुत्व ज्मोततषभाससक ई-ऩत्रिका भें रेखन हेतु फ्रीराॊस (स्वतॊि) रेखकों का स्वागत हैं... गुरुत्व ज्मोततष भाससक ई- ऩत्रिका भें आऩके द्वारा सरखे गमे भॊि, मॊि, तॊि, ज्मोततष, अॊक ज्मोततष, वास्तु, पें गशुई, टैयों, येकी एवॊ अन्म आध्मात्त्भक ऻान वधाक रेख को प्रकासशत कयने हेतु बेज सकते हैं। अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें। GURUTVA KARYALAY BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) INDIA Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com गुरुत्व ज्मोततष भाससक ई-ऩत्रिका ससतम्फय 2019 सॊऩादक ध ॊतन जोशी सॊऩका गुरुत्व ज्मोततष ववबाग गुरुत्व कामाारम 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) INDIA पोन 91+9338213418, 91+9238328785, ईभेर gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, वेफ www.gurutvakaryalay.com www.gurutvakaryalay.in http://gk.yolasite.com/ www.shrigems.com www.gurutvakaryalay.blogspot.com/ ऩत्रिका प्रस्तुतत ध ॊतन जोशी, गुरुत्व कामाारम पोटो ग्राफपक्स ध ॊतन जोशी, गुरुत्व कामाारम
  • 3.
    अनुक्रभ (9 2013) 745 श्री सन्तान सप्तभी व्रत 5-ससतम्फय-2019 (फुधवाय) 8 गणऩतत अथवाशीषा 46 ऩद्मा (ऩरयवततानी) एकादशी व्रत 09-ससतम्फय-2019 ( वाय) 13 गणेश स्तवन 47 इॊददया एकादशी व्रत 25-ससतम्फय-2019 ( वाय) 15 ववष्णुकृ तॊ गणेशस्तोिभ् 47 17 गणऩततस्तोिभ् 48 21 श्री ववघ्नेश्वयाष्टोत्तय शतनाभस्तोिभ् 48 ल 22 49 ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण की भदहभा 26 ? 49 27 ल ल ? 50 ल 28 गणेश कव भ् 52 सॊकटनाशन गणेशस्तोिभ् 28 गणेशद्वादशनाभस्तोिभ् 54 ल ? 29 ऋ 55 30 ऋण भो न भहा गणऩतत स्तोि 56 30 57 ? 32 58 33 60 गणेशबुजॊगभ् 35 ववनामकस्तोि 61 36 श्री ससविववनामक स्तोिभ् 62 सॊकष्टहयणॊ गणेशाष्टकभ्‌ 40 63 गणेश ऩॊच् यत्नभ् 40 64 एकदन्त शयणागतत स्तोिभ् 41 ल 68 ल 42 ल 71 - ल 43 , औ 71 ल 44 72 स्थामी औय अन्म रेख सॊऩादकीम 4 दैतनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका 102 ससतम्फय 2019 भाससक ऩॊ ाॊग 92 ददन के ौघडडमे 103 ससतम्फय 2019 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय 94 ददन फक होया - सूमोदम से सूमाास्त तक 104 ससतम्फय 2019 -ववशेष मोग 102
  • 4.
    वप्रम आत्त्भम, फॊधु/ फदहन जमगुरुदेव वक्रतुॊड भहाकाम सूमाकोदट सभप्रब: तनववाघ्नॊ कु रु भे देव: सवाकामेषु सवादा हे रॊफे शयीय औय हाथी सभान भुॊख वारे गणेशजी, आऩ कयोडों सूमा के सभान भकीरे हैं। कृ ऩा कय भेये साये काभों भें आने वारी फाधाओॊ ववघ्नो को आऩ सदा दूय कयते यहें। गणऩतत शब्द का अथथ हैं। गण(सभूह)+ऩतत (स्वाभी) = सभूह के स्वाभी को सेनाऩतत अथाात गणऩतत कहते हैं। भानव शयीय भें ऩाॉ ऻानेत्न्िमाॉ, ऩाॉ कभेत्न्िमाॉ औय ाय अन्त्कयण होते हैं। एवॊ इस शत्क्तओॊ को जो शत्क्तमाॊ सॊ ासरत कयती हैं उन्हीॊ को ौदह देवता कहते हैं। इन सबी देवताओॊ के भूर प्रेयक बगवान श्रीगणेश हैं। बायतीम सॊस्कृ तत भें प्रत्मेक शुबकामा शुबायॊब से ऩूवा बगवान श्री गणेश जी की ऩूजा-अ ाना की जाती हैं । इस सरमे मे फकसी बी कामा का शुबायॊब कयने से ऩूवा उस कामा का "श्री गणेश कयना" कहाॊ जाता हैं। प्रत्मक शुब कामा मा अनुष्ठान कयने के ऩूवा ‘‘श्री गणेशाम नभ्” भॊि का उच् ायण फकमा जाता हैं। बगवान गणेश को सभस्त ससविमों के दाता भाना गमा है। क्मोफक सायी ससविमाॉ बगवान श्री गणेश भें वास कयती हैं। बगवान श्री गणेश सभस्त ववघ्नों को टारने वारे हैं, दमा एवॊ कृ ऩा के अतत सुॊदय भहासागय हैं, तीनो रोक के कल्माण हेतु बगवान गणऩतत सफ प्रकाय से मोग्म हैं। धासभाक भान्मता के अनुशाय बगवान श्री गणेशजी के ऩूजन-अ ान से व्मत्क्त को फुवि, ववद्या, वववेक योग, व्माधध एवॊ सभस्त ववध्न-फाधाओॊ का स्वत् नाश होता है, बगवान श्री गणेशजी की कृ ऩा प्राप्त होने से व्मत्क्त के भुत्श्कर से भुत्श्कर कामा बी सयरता से ऩूणा हो जाते हैं। शास्िोक्त व न से इस कल्मुग भें तीव्र पर प्रदान कयने वारे बगवान गणेश औय भाता कारी हैं। इस सरमे कहाॊ गमा हैं। करा ण्डीववनामकौ अथाात्: करमुग भें ण्डी औय ववनामक की आयाधना ससविदामक औय परदामी होता है। धभा शास्िोभें ऩॊ देवों की उऩासना कयने का ववधान हैं। आददत्मॊ गणनाथॊ देवीॊ रूिॊ के शवभ्। ऩॊ दैवतसभत्मुक्तॊ सवाकभासु ऩूजमेत्।। (शब्दकल्ऩिुभ) बावाथथ: - ऩॊ देवों फक उऩासना का ब्रहभाॊड के ऩॊ बूतों के साथ सॊफॊध है। ऩॊ बूत ऩृथ्वी, जर, तेज, वामु औय आकाश से फनते हैं। औय ऩॊ बूत के आधधऩत्म के कायण से आददत्म, गणनाथ(गणेश), देवी, रूि औय के शव मे ऩॊ देव बी ऩूजनीम हैं। हय एक तत्त्व का हय एक देवता स्वाभी हैं।
  • 5.
    जो भनुष्म अऩनेजीवन भें सबी प्रकाय की रयवि-ससवि, सुख, सभृवि औय ऐश्वमा को प्राप्त कयने की काभना कयता हैं, अऩने जीवन भें सबी प्रकाय की सबी आध्मात्त्भक-बौततक इच्छाओॊ को ऩूणा कयने की इच्छा यखता हैं, ववद्वानों के भतानुशाय उसे गणेश जी फक ऩूजा-अ ाना एवॊ आयाधना अवश्म कयनी ादहमे... दहन्दू ऩयॊऩया भें गणेशजी का ऩूजन अनाददकार से रा आ यहा हैं, इसके अततरयक्त ज्मोततष शास्िों के अनुशाय बी अशुब ग्रह ऩीडा को दूय कयने हेतु बगवान गणेश फक ऩूजा-अ ाना कयने से सभस्त ग्रहो के अशुब प्रबावों को दूय होकय, शुब परों फक प्रात्प्त होती हैं। इस सरमे दहन्दू सॊस्कृ तत भें बगवान श्री गणेशजी की ऩूजा का अत्माधधक भहत्व फतामा गमा हैं। दहन्दू ऩॊ ाॊग के अनुशाय वैसे तो प्रत्मेक भास की तुथॉ को बगवान गणेशजी का व्रत फकमा जात है। रेफकन बािऩद की तुधथा व्रत का ववशेष भहत्व दहन्दू धभा शास्िों भें फतामा गमा है। ऎसी भान्मता हैं की बािऩद की तुधथा के ददन जो श्रधारु व्रत, उऩवास औय दान आदद शुब कामा कताा है, बगवान श्रीगणेश की कृ ऩा से उसे सौ गुना पर प्राप्त हो जाता हैं। व्मत्क्त को श्री ववनामक तुथॉ कयने से भनोवाॊतछत पर प्राप्त होता है। शास्िोक्त ववधध-ववधान से श्री गणेशजी का ऩूजन व व्रत कयना अत्मॊत राबप्रद होता हैं। गणेश तुथॉ ऩय ॊि दशान तनषेध होने फक ऩौयाणणक भान्मता हैं। शास्िोंक्त व न के अनुशाय जो व्मत्क्त इस ददन ॊिभा को जाने-अन्जाने देख रेता हैं उसे सभथ्मा करॊक रगता हैं। उस ऩय झूठा आयोऩ रगता हैं। ववद्वानों के भतानुशाय मदद जाने-अॊजाने ॊि दशान कयरेता हैं तो उसे, करॊक से फ ने के सरए साधक को बगवान श्री गणेश से अऩनी गरती के ऩरयहाय के सरए बगवान श्री गणेश का ऩूजन वॊदन कयके ऺभा मा ना कयनी ादहए। इस भाससक ई-ऩत्रिका भें सॊफॊधधत जानकायीमों के ववषम भें साधक एवॊ ववद्वान ऩाठको से अनुयोध हैं, मदद दशाामे गए भॊि, श्रोक, मॊि, साधना एवॊ उऩामों मा अन्म जानकायी के राब, प्रबाव इत्मादी के सॊकरन, प्रभाण ऩढ़ने, सॊऩादन भें, डडजाईन भें, टाईऩीॊग भें, वप्रॊदटॊग भें, प्रकाशन भें कोई िुदट यह गई हो, तो उसे स्वमॊ सुधाय रें मा फकसी मोग्म ज्मोततषी, गुरु मा ववद्वान से सराह ववभशा कय रे । क्मोफक ववद्वान ज्मोततषी, गुरुजनो एवॊ साधको के तनजी अनुबव ववसबन्न भॊि, श्रोक, मॊि, साधना, उऩाम के प्रबावों का वणान कयने भें बेद होने ऩय काभना ससवि हेतु फक जाने वारी वारी ऩूजन ववधध एवॊ उसके प्रबावों भें सबन्नता सॊबव हैं। गणेश तुथॉ के शुब अवसय ऩय आऩ अऩने जीवन भें ददन प्रततददन अऩने उद्देश्म फक ऩूतता हेतु अग्रणणम होते यहे आऩकी सकर भनोकाभनाएॊ ऩूणा हो एवॊ आऩके सबी शुब कामा बगवान श्री गणेश के आसशवााद से त्रफना फकसी सॊकट के ऩूणा होते यहे हभायी मदह भॊगर काभना हैं...... ध ॊतन जोशी
  • 6.
    6 ससतम्फय -2019 ***** भाससक ई-ऩत्रिका से सॊफॊधधत सू ना *****  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत सबी रेख गुरुत्व कामाारम के अधधकायों के साथ ही आयक्षऺत हैं।  ई-ऩत्रिका भें वणणात रेखों को नात्स्तक/अववश्वासु व्मत्क्त भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हैं।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख आध्मात्भ से सॊफॊधधत होने के कायण बायततम धभा शास्िों से प्रेरयत होकय प्रस्तुत फकमा गमा हैं।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत फकसी बी ववषमो फक सत्मता अथवा प्राभाणणकता ऩय फकसी बी प्रकाय की त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हैं।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत जानकायीकी प्राभाणणकता एवॊ प्रबाव की त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की नहीॊ हैं औय ना हीॊ प्राभाणणकता एवॊ प्रबाव की त्जन्भेदायी के फाये भें जानकायी देने हेतु कामाारम मा सॊऩादक फकसी बी प्रकाय से फाध्म हैं।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत रेखो भें ऩाठक का अऩना ववश्वास होना आवश्मक हैं। फकसी बी व्मत्क्त ववशेष को फकसी बी प्रकाय से इन ववषमो भें ववश्वास कयने ना कयने का अॊततभ तनणाम स्वमॊ का होगा।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत फकसी बी प्रकाय की आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ के आधाय ऩय ददए गमे हैं। हभ फकसी बी व्मत्क्त ववशेष द्वाया प्रमोग फकमे जाने वारे धासभाक, एवॊ भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोकी त्जन्भेदायी नदहॊ रेते हैं। मह त्जन्भेदायी भॊि- मॊि मा अन्म उऩामोको कयने वारे व्मत्क्त फक स्वमॊ फक होगी।  क्मोफक इन ववषमो भें नैततक भानदॊडों, साभात्जक, कानूनी तनमभों के णखराप कोई व्मत्क्त मदद नीजी स्वाथा ऩूतता हेतु प्रमोग कताा हैं अथवा प्रमोग के कयने भे िुदट होने ऩय प्रततकू र ऩरयणाभ सॊबव हैं।  ई-ऩत्रिका भें प्रकासशत रेख से सॊफॊधधत जानकायी को भाननने से प्राप्त होने वारे राब, राब की हानी मा हानी की त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की नहीॊ हैं।  हभाये द्वाया प्रकासशत फकमे गमे सबी रेख, जानकायी एवॊ भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय स्वमॊ ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधुगण ऩय प्रमोग फकमे हैं त्जस्से हभे हय प्रमोग मा कव , भॊि-मॊि मा उऩामो द्वाया तनत्श् त सपरता प्राप्त हुई हैं।  ई-ऩत्रिका भें गुरुत्व कामाारम द्वाया प्रकासशत सबी उत्ऩादों को के वर ऩाठको की जानकायी हेतु ददमा गमा हैं, कामाारम फकसी बी ऩाठक को इन उत्ऩादों का क्रम कयने हेतु फकसी बी प्रकाय से फाध्म नहीॊ कयता हैं। ऩाठक इन उत्ऩादों को कहीॊ से बी क्रम कयने हेतु ऩूणात् स्वतॊि हैं। अधधक जानकायी हेतु आऩ कामाारम भें सॊऩका कय सकते हैं। (सबी वववादो के सरमे के वर बुवनेश्वय न्मामारम ही भान्म होगा।)
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    7 ससतम्फय -2019 गणेश ऩूजन हेतु शुब भुहूता 02-ससतम्फय-2019 ( वाय)  सॊकरन गुरुत्व कामाारम वैऻातनक ऩितत के अनुसाय ब्रहभाॊड भें सभम व अनॊत आकाश के अततरयक्त सभस्त वस्तुएॊ भमाादा मुक्त हैं। त्जस प्रकाय सभम का न ही कोई प्रायॊब है न ही कोई अॊत है। अनॊत आकाश की बी सभम की तयह कोई भमाादा नहीॊ है। इसका कहीॊ बी प्रायॊब मा अॊत नहीॊहोता। आधुतनक भानव ने इन दोनों तत्वों को हभेशा सभझने का व अऩने अनुसाय इनभें भ्रभण कयने का प्रमास फकमा हैं ऩयन्तु उसे सपरता प्राप्त नहीॊ हुई है। साभान्मत् भुहूता का अथा है फकसी बी कामा को कयने के सरए सफसे शुब सभम व ततधथ मन कयना। कामा ऩूणात् परदामक हो इसके सर, सभस्त ग्रहों व अन्म ज्मोततष तत्वों का तेज इस प्रकाय के त्न्ित फकमा जाता है फक वे दुष्प्रबावों को ववपर कय देते हैं। वे भनुष्म की जन्भ कु ण्डरी की सभस्त फाधाओॊ को हटाने भें व दुमोगो को दफाने मा घटाने भें सहामक होते हैं। शुब भुहूता ग्रहो का ऎसा अनूठा सॊगभ है फक वह कामा कयने वारे व्मत्क्त को ऩूणात् सपरता की ओय अग्रस्त कय देता है। दहन्दू धभा भें शुब कामा के वर शुब भुहूता देखकय फकए जाने का ववधान हैं। इसी ववधान के अनुसाय श्रीगणेश तुथॉ के ददन बगवान श्रीगणेश की स्थाऩना के श्रेष्ठ भुहूता आऩकी अनुकू रता हेतु दशााने का प्रमास फकमा जा यहा हैं। दहन्दू धभा ग्रॊथों के अनुसाय शुब भुहूता देखकय फकए गए कामा तनत्श् त शुब व सपरता देने वारे होते हैं। *** 2 31 *** ल     ल त्स्थय रग्न इष्ट ऩूजन हेतु सवाश्रेष्ठ भाना जाता हैं 2 को त्स्थय रग्न  ल  ल ल  ल अत् गणेश जी का ऩूजन कयते सभम मदद शुब ततधथ एवॊ रग्न का सॊमोग फकमा जाते तो मह अत्मॊत शुब परप्रदामक होता हैं। ववशेष: ववद्वानों के भतानुशाय त्स्थय रग्न वृत्श् क भें कयना शुब होता हैं। त्जस भें बगवान श्रीगणेश प्रततभा की स्थाऩना की जा सकती हैं। जानकायों का भानना हैं की गणेश तुथॉ दोऩहय भें होने के कायण इसे भहागणऩतत तुथॉ बी कहाॊ जामेगा। क्मोंफक ज्मोततष के अनुशाय वृत्श् क त्स्थय रग्न हैं। त्स्थय रग्न भें फकमा गमा कोई बी शुब कामा स्थाई होता हैं। ववद्वानो के भतानुशाय शुब प्रायॊब मातन आधा कामा स्वत् ऩूणा।
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    8 ससतम्फय -2019 श्री सन्तान सप्तभी व्रत 5-ससतम्फय-2019 (फुधवाय)  सॊकरन गुरुत्व कामाारम श्री सन्तान सप्तभी व्रत कथा एक फाय मुधधत्ष्ठय ने बगवान श्रीकृ ष्ण से कहा- हे प्रबो! कोई ऐसा उत्तभ व्रत फतराइमे त्जसके प्रबाव से भनुष्मों के अनेकों साॊसारयक दु्ख औय क्रेश दूय हो जामे वे ऩुि एवॊ ऩौिवान हो जाएॊ। मुधधत्ष्ठय की फात सुनकय बगवान श्रीकृ ष्ण फोरे - हे याजन ्! तुभने भनुष्मों के कल्माण हेतु फडा ही उत्तभ प्रश्न फकमा है। भैं तुम्हें एक ऩौयाणणक कथा सुनाता हूॊ तुभ उसे ध्मानऩूवाक सुनो। एक सभम रोभष ऋवष ब्रजयाज की भथुया भें भेये भाता-वऩता देवकी तथा वसुदेव के घय आए। ऋवषयाज को आमा हुआ देख कयके दोनों अत्मन्त प्रसन्न हुए तथा उनको उत्तभ आसन ऩय फैठा कय उनका अनेक प्रकाय से वन्दन औय सत्काय फकमा। देवकी तथा वसुदेव की बत्क्तऩूवाक ऋवष से प्रशन्न होकय रोभष ऋवष उनको कथा सुनाने रगे। रोभष ने कहा फक - हे देवकी! दुष्ट दुया ायी ऩाऩी कॊ स ने तुम्हाये कई ऩुिों को ऩैदा होते ही भायकय तुम्हें ऩुिशोक ददमा है। इस दु्ख से भुक्त होने के सरए तुभ "सॊतान सप्तभी" का व्रत कयो। इसी प्रकाय याजा नहुष की ऩत्नी ॊिभुखी बी दु्खी यहा कयती थी। फकन्त्म ॊिभुखी ने "सॊतान सप्तभी" व्रत ऩूणा व्रत ववधध ववधान के साथ फकमा था। त्जसके प्रताऩ से ॊिभुखी के उसके बी ऩुि नहीॊ भये औय उसको उत्तभ सन्तान का सुख प्राप्त हुआ। मह व्रत तुम्हें बी ऩुिशोक से भुक्त कयेगा। मह सुनकय देवकी ने हाथ जोडकय भुतन से प्राथना की- हे ऋवषयाज! कृ ऩा भुझे व्रत का ऩूया ववधध-ववधान फताने की कृ ऩा कयें ताफक भैं ववधधऩूवाक व्रत सम्ऩन्न करूॊ औय इस दु्ख से छु टकाया ऩाउॊ। रोभष ऋवष ने कहा फक - हे देवकी! अमोध्माऩुयी का प्रताऩी याजा नहुष थे। उनकी ऩत्नी न्िभुखी अत्मन्त सुन्दय थीॊ। उनके नगय भें ववष्णुदत्त नाभ का एक ब्राहभण यहता था। उसकी स्िी का नाभ रूऩवती था। वह बी अत्मन्त रूऩवती सुन्दयी थी। यानी ॊिभुखी तथा रूऩवती भें ऩयस्ऩय घतनष्ठ प्रेभ था। एक ददन वे दोनों सयमू नदी भें स्नान कयने के सरए गई। वहाॊ उन्होंने देखा फक अन्म फहुत सी त्स्िमाॊ सयमू नदी भें स्नान कयके तनभार वस्ि ऩहन कय एक भण्डऩ भें ऩावाती-सशव की प्रततभा का ववधधऩूवाक ऩूजन फकमा। यानी औय ब्राह् भणी ने मह देख कय उन त्स्िमों से ऩूछा फक - फहनों! तुभ मह फकस देवता का औय फकस कायण से ऩूजन व्रत आदद कय यही हो। मह सुन कय त्स्िमों ने कहा फक हभ "सन्तान सप्तभी" का व्रत कय यही हैं औय हभने बगवान सशव-ऩावाती का ऩूजन न्दन अऺत आदद से षोडषोऩ ाय ववधध से घागा फाॊधकय हभने सॊकल्ऩ फकमा है फक जफ तक जीववत यहेंगी, तफ तक मह व्रत कयती यहेंगी। मह ऩुण्म व्रत 'भुक्ताबयण व्रत' सुख तथा सॊतान देने वारा है। त्स्िमों से "सन्तान सप्तभी" व्रत की कथा सुनकय यानी औय ब्राहभणी ने बी इस व्रत के कयने का भन ही भन सॊकल्ऩ फकमा औय सशवजी के नाभ का घागा फाॉध सरमा। ब्राहभणी इस व्रत को तनमभ ऩूवाक कयती यही फकन्तु घय ऩहुॉ ने ऩय यानी न्िभुखी कबी व्रत का सॊकल्ऩ को बूर जाती थी। परत् भृत्मु के ऩश् ात यानी वानयी तथा ब्राहभणी भुगॉ की मोतन भें ऩैदा हुईं। काराॊतय भें दोनों ऩशु मोतन छोडकय ऩुन् भनुष्म मोतन भें आईं। रूऩवती ने एक ब्राहभण के महाॊ कन्मा के रूऩ भें जन्भ सरमा। इस जन्भ भें यानी का नाभ ईश्वयी तथा ब्राहभणी का नाभ बूषणा था। बूषणा का वववाह याजऩुयोदहत अत्ग्नभुखी के साथ हुआ। इस जन्भ भें बी उन दोनों भें फडा प्रेभ हो गमा। व्रत के प्रबाव से बूषण देवी अत्मॊत सुन्दय थी उसे अत्मन्त सुन्दय सवागुण सम्ऩन्न धभावीय, कभातनष्ठ, सुशीर स्वबाव वारे आठ ऩुि उत्ऩन्न हुए। व्रत बूरने के कायण यानी इस जन्भ भें बी सॊतान सुख से वॊध त यही। प्रौढ़ावस्था भें उसने एक गूॊगा फहया फुविहीन अल्ऩ आमु
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    9 ससतम्फय -2019 वारा एक ऩुि हुआ, त्जस कायण वह बी नौ वषा का होकय भय गमा। यानी के ऩुिशोक की सॊवेदना के सरए एक ददन बूषणा उससे सभरने गई। ब्राहभणी ने यानी का सॊताऩ दूय कयने के तनसभत्त अऩने आठों ऩुि यानी के ऩास छोड ददए। उसे देखते ही यानी के भन भें ईष्माा ऩैदा हुई तथा उसके भन भें ऩाऩ उत्ऩन्न हुआ। उसने बूषणा को ववदा कयके उसके ऩुिों को बोजन के सरए फुरामा औय बोजन भें ववष सभरा ददमा। ऩयन्तु बूषणा के व्रत के प्रबाव से तथा बगवान शॊकय की कृ ऩा से ऩुिों को कोई हानी नहीॊ हुई। इससे यानी को औय बी अधधक क्रोध आमा। उसने अऩने सेवकों को आऻा दी फक बूषणा के ऩुिों को ऩूजा के फहाने मभुना के फकनाये रे जाकय गहये जर भें धके र ददमा जाए। फकन्तु ऩुन् बगवान सशव औय भाता ऩावाती की कृ ऩा से इस फाय बी बूषणा के फारक व्रत के प्रबाव से फ गए। फपय यानी ने जल्रादों को फुराकय आऻा दी फक ब्राहभण फारकों को वध-स्थर ऩय रे जाकय भाय डारो फकन्तु जल्रादों द्वाया फेहद प्रमास कयने ऩय बी फारक न भय सके । मह सभा ाय सुनकय यानी आश् मा फकत हो गई औय इस यहस्म का ऩता रगाने उसने बूषणा को फुराकय सायी फात फताई औय फपय ऺभामा ना कयके उससे ऩूछा- फकस कायण तुम्हाये फच् े नहीॊ भय ऩाए? बूषणा फोरी- क्मा आऩको ऩूवाजन्भ की फात स्भयण नहीॊ है? यानी ने आश् मा से कहा- नहीॊ, भुझे तो कु छ माद नहीॊ है? तफ उसने कहा- सुनो, ऩूवाजन्भ भें तुभ याजा नहुष की यानी थी औय भैं तुम्हायी सखी। हभ दोनों ने एक फाय बगवान सशव का घागा फाॊधकय सॊकल्ऩ फकमा था फक जीवन-ऩमान्त सॊतान सप्तभी का व्रत कयेंगी। फकन्तु दुबााग्मवश तुभ सफ बूर गईं औय व्रत की अवहेरना होने झूठ फोरने का दोष ववसबन्न मोतनमों भें जन्भ रेती हुई तू आज बी बोग यही है। भैंने इस व्रत को ऩूणा ववधध-ववधान सदहत तनमभ ऩूवाक सदैव फकमा औय आज बी कयती हूॊ। रोभष ऋवष ने कहा- हे देवकी! बूषणा ब्राहभणी के भुख से अऩने ऩूवा जन्भ की कथा तथा व्रत सॊकल्ऩ इत्मादद सुनकय यानी को ऩुयानी फातें माद आ गई औय ऩश् ाताऩ कयने रगी तथा बूषणा ब्राहभणी के यणों भें ऩडकय ऺभा मा ना कयने रगी औय बगवान शॊकय ऩावाती जी की अऩाय भदहभा के गीत गाने रगी। मह सफ सुनकय यानी ने बी ववधधऩूवाक सॊतान सुख देने वारा मह भुक्ताबयण व्रत यखा। तफ व्रत के प्रबाव से यानी ऩुन् गबावती हुई औय एक सुॊदय फारक को जन्भ ददमा। उसी सभम से ऩुि-प्रात्प्त औय सॊतान की यऺा के सरए मह व्रत प्र सरत है। बगवान शॊकय के व्रत का ऐसा प्रबाव है फक ऩथ भ्रष्ट भनुष्म बी अऩने ऩथ ऩय अग्रसय हो जाता है औय अनन्त ऐश्वमा बोगकय भोऺ को प्राप्त कयता है। रोभष ऋवष ने फपय कहा फक - देवकी! इससरए भैं तुभसे बी कहता हूॊ फक तुभ बी इस व्रत को कयने का सॊकल्ऩ अऩने भन भें कयो तो तुभको बी सन्तान सुख सभरेगा। इतनी कथा सुनकय देवकी हाथ जोड कय रोभष ऋवष से ऩूछने रगी- हे ऋवषयाज! भैं इस ऩुनीत व्रत को अवश्म करूॊ गी, फकन्तु आऩ इस कल्माणकायी एवॊ सन्तान सुख देने वारे व्रत का ववधध-ववधान, तनमभ आदद ववस्ताय से सभझाएॊ। मह सुनकय ऋवष फोरे- हे देवकी! मह ऩुनीत व्रत बादों बािऩद के भहीने भें शुक्रऩऺ की सप्तभी के ददन फकमा जाता है। उस ददन ब्रहभभुहूता भें उठकय फकसी नदी अथवा कु एॊ के ऩववि जर भें स्नान कयके तनभार वस्ि धायण कयने ादहए। श्री शॊकय बगवान तथा भाता ऩावाती जी की भूतता की स्थाऩना कयें। इन प्रततभाओॊ के सम्भुख सोने, ाॊदी के तायों का अथवा येशभ का एक गॊडा फनावें उस गॊडे भें सात गाॊठें रगानी ादहए। इस गॊडे को धूऩ, दीऩ, अष्ट गॊध से ऩूजा कयके अऩने हाथ भें फाॊधे औय बगवान शॊकय से अऩनी काभना सपर होने की प्राथाना कयें। तदन्तय सात ऩुआ फनाकय बगवान को बोग रगावें औय सात ही ऩुवे एवॊ मथाशत्क्त सोने अथवा ाॊदी की अॊगूठी फनवाकय इन सफको एक ताॊफे के ऩाि भें यखकय औय उनका शोडषोऩ ाय ववधध से ऩूजन कयके फकसी सदा ायी, धभातनष्ठ, सुऩाि ब्राहभण को दान देवें। उसके ऩश् ात सात ऩुआ स्वमॊ प्रसाद के रूऩ भें ग्रहण कयें।
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    10 ससतम्फय - 2019 इसप्रकाय इस व्रत का ऩायामण कयना ादहए। प्रततसार बािऩद की शुक्रऩऺ की सप्तभी के ददन, हे देवकी! इस व्रत को इस प्रकाय तनमभ ऩूवा कयने से सभस्त ऩाऩ नष्ट होते हैं औय बाग्मशारी सॊतान उत्ऩन्न होती है तथा अन्त भें सशवरोक की प्रात्प्त होती है। हे देवकी! भैंने तुभको सन्तान सप्तभी का व्रत सम्ऩूणा ववधान ववस्ताय सदहत वणान फकमा है। उसको अफ तुभ तनमभ ऩूवाक कयो, त्जससे तुभको उत्तभ सन्तान उत्ऩन्न होगी। इतनी कथा कहकय बगवान श्रीकृ ष्ण ने धभाावताय मुधधत्ष्ठय से कहा फक - रोभष ऋवष इस प्रकाय हभायी भाता देवकी को सशऺा देकय रे गए। ऋवष के कथनानुसाय हभायी भाता देवकी ने इस व्रत को तनमभानुसाय फकमा त्जसके प्रबाव से हभ उत्ऩन्न हुए। मह व्रत ववशेष रूऩ से त्स्िमों के सरए कल्माणकायी है ही ऩयन्तु ऩुरुषों को बी सभान रूऩ से कल्माण दामक है। सन्तान सुख देने वारा तहा ऩाऩों का नाश कयने वारा मह उत्तभ व्रत है त्जसे स्वमॊ बी कयें तथा दूसयों से बी कयावें। इस व्रत को तनमभ ऩूवाक कयने से बगवान सशव-ऩावाती कृ ऩा से तनश् म ही अभयऩद ऩद प्राप्त कयके अन्त भें सशवरोक को प्राप्त कयता है। संतान सप्तभी का व्रत ऩूजन: सॊतान सप्तभी व्रत ऩुि प्रात्प्त, ऩुि यऺा तथा ऩुि अभ्मुदम के सरए बािऩद के शुक्र ऩऺ की सप्तभी को फकमा जाता है। इस व्रत का ववधान दोऩहय तक यहता है। स्िीमाॊ देवी ऩावाती का ऩूजन कयके ऩुि प्रात्प्त तथा उसके अभ्मुदम का वयदान भाॉगती हैं। व्रत ववधान:  प्रात्कार स्नानादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि धायण कयें। दोऩहय को ौक ऩूय कय ॊदन, अऺत, धूऩ, दीऩ, नैवेद्य, सुऩायी तथा नारयमर आदद से सशव-ऩावाती का ऩूजन कयें।  इस ददन नैवेद्य बोग के सरए खीय-ऩूयी तथा गुड के ऩुए यखें।  यऺा के सरए सशवजी को धागा बी अवऩात कयें।  इस धागे को सशवजी के वयदान के रूऩ भें रेकय उसे धायण कयके व्रतकथा का श्रवण कयें। Beautiful Stone Bracelets Natural Om Mani Padme Hum Bracelet 8 MM Rs. 415 Natural Citrine Golden Topaz Sunehla (सुनेहरा) Bracelet 8 MM Rs. 415  Lapis Lazuli Bracelet  Rudraksha Bracelet  Pearl Bracelet  Smoky Quartz Bracelet  Druzy Agate Beads Bracelet  Howlite Bracelet  Aquamarine Bracelet  White Agate Bracelet  Amethyst Bracelet  Black Obsidian Bracelet  Red Carnelian Bracelet  Tiger Eye Bracelet  Lava (slag) Bracelet  Blood Stone Bracelet  Green Jade Bracelet  7 Chakra Bracelet  Amanzonite Bracelet  Amethyst Jade  Sodalite Bracelet  Unakite Bracelet  Calcite Bracelet  Yellow Jade Bracelet  Rose Quartz Bracelet  Snow Flakes Bracelet
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    11 ससतम्फय -2019 भॊि ससि दुराब साभग्री कारी हल्दी:- 370, 550, 730, 1450, 1900 कभर गट्टे की भारा - Rs- 370 भामा जार- Rs- 251, 551, 751 हल्दी भारा - Rs- 280 धन वृवि हकीक सेट Rs-280 (कारी हल्दी के साथ Rs-550) तुरसी भारा - Rs- 190, 280, 370, 460 घोडे की नार- Rs.351, 551, 751 नवयत्न भारा- Rs- 1050, 1900, 2800, 3700 & Above हकीक: 11 नॊग-Rs-190, 21 नॊग Rs-370 नवयॊगी हकीक भारा Rs- 280, 460, 730 रघु श्रीपर: 1 नॊग-Rs-21, 11 नॊग-Rs-190 हकीक भारा (सात यॊग) Rs- 280, 460, 730, 910 नाग के शय: 11 ग्राभ, Rs-145 भूॊगे की भारा Rs- 190, 280, Real -1050, 1900 & Above स्पदटक भारा- Rs- 235, 280, 460, 730, DC 1050, 1250 ऩायद भारा Rs- 1450, 1900, 2800 & Above सपे द ॊदन भारा - Rs- 460, 640, 910 वैजमॊती भारा Rs- 190, 280, 460 यक्त (रार) ॊदन - Rs- 370, 550, रुिाऺ भारा: 190, 280, 460, 730, 1050, 1450 भोती भारा- Rs- 460, 730, 1250, 1450 & Above ववधुत भारा - Rs- 190, 280 कासभमा ससॊदूय- Rs- 460, 730, 1050, 1450, & Above भूल्म भें अॊतय छोटे से फडे आकाय के कायण हैं। >> Shop Online | Order Now भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि "श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके दशान भाि से अन-धगनत राब एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अदिततम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त होती है। >> Shop Online | Order Now गुरुत्व कामाथरम भे ववसबन्न आकाय के "श्री मॊि" उप्रब्ध है भूल्म:- प्रतत ग्राभ Rs. 28.00 से Rs.100.00 GURUTVA KARYALAY BHUBNESWAR-751018, (ODISHA), Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785, Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
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    12 ससतम्फय -2019 सवा कामा ससवि कव त्जस व्मत्क्त को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के फादबी उसे भनोवाॊतछत सपरतामे एवॊ फकमे गमे कामा भें ससवि (राब) प्राप्त नहीॊ होती, उस व्मत्क्त को सवा कामा ससवि कव अवश्म धायण कयना ादहमे। कवच के प्रभुख राब: सवा कामा ससवि कव के द्वारा सुख सभृवि औय नव ग्रहों के नकायात्भक प्रबाव को शाॊत कय धायण कयता व्मत्क्त के जीवन से सवा प्रकाय के दु:ख-दारयि का नाश हो कय सुख-सौबाग्म एवॊ उन्नतत प्रात्प्त होकय जीवन भे ससब प्रकाय के शुब कामा ससि होते हैं। त्जसे धायण कयने से व्मत्क्त मदद व्मवसाम कयता होतो कायोफाय भे वृवि होतत हैं औय मदद नौकयी कयता होतो उसभे उन्नतत होती हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें सवथजन वशीकयण कव के सभरे होने की वजह से धायण कताा की फात का दूसये व्मत्क्तओ ऩय प्रबाव फना यहता हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें अष्ट रक्ष्भी कव के सभरे होने की वजह से व्मत्क्त ऩय सदा भाॊ भहा रक्ष्भी की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना यहता हैं। त्जस्से भाॊ रक्ष्भी के अष्ट रुऩ (१)-आदद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)- धैमा रक्ष्भी, (४)-गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)- ववजम रक्ष्भी, (७)-ववद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी रुऩो का अशीवााद प्राप्त होता हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें तंत्र यऺा कव के सभरे होने की वजह से ताॊत्रिक फाधाए दूय होती हैं, साथ ही नकायात्भक शत्क्तमो का कोइ कु प्रबाव धायण कताा व्मत्क्त ऩय नहीॊ होता। इस कव के प्रबाव से इषाा-द्वेष यखने वारे व्मत्क्तओ द्वारा होने वारे दुष्ट प्रबावो से यऺा होती हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें शत्रु ववजम कव के सभरे होने की वजह से शिु से सॊफॊधधत सभस्त ऩयेशातनओ से स्वत् ही छु टकाया सभर जाता हैं। कव के प्रबाव से शिु धायण कताा व्मत्क्त का ाहकय कु छ नही त्रफगाड सकते। अन्म कव के फाये भे अधधक जानकायी के सरमे कामाारम भें सॊऩका कये: फकसी व्मत्क्त ववशेष को सवा कामा ससवि कव देने नही देना का अॊततभ तनणाम हभाये ऩास सुयक्षऺत हैं। >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- www.gurutvakaryalay.com and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    13 ससतम्फय -2019 भोऺप्रदा ऩद्मा एकादशी ऩद्मा (ऩरयवततानी) एकादशी व्रत 09-ससतम्फय-2019 ( वाय)  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ऩद्मा (ऩरयवतानी) एकादशी व्रत कथा बाद्रऩद : शुक्र एकादशी एक फाय मुधधत्ष्ठय बगवान श्रीकृ ष्ण से ऩूछते हैं, हे बगवान! बािऩद शुक्र एकादशी का क्मा नाभ है? इसभें फकस देवता की ऩूजा की जाती है औय इसका व्रत कयने से क्मा पर सभरता है ?" व्रत कयने की ववधध तथा इसका भाहात्म्म कृ ऩा कयके कदहए। बगवान श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक इस एकादशी का नाभ ऩद्मा (ऩरयवततथनी) एकादशी तथा इसे वाभन एकादशी से बी जाना जाता है। अफ आऩ शाॊततऩूवाक इस व्रतकी कथा सुतनए। इसका मऻ कयने से ही वाजऩेमी मऻ / अनन्त मऻ का पर सभरता है। इस ऩुण्म, स्वगा औय भोऺ को देने वारी तथा सफ ऩाऩों का नाश कयने वारी, उत्तभ एकादशी का भाहात्म्म भैं तुभसे कहता हूॉ तुभ ध्मानऩूवाक सुनो। जो भनुष्म ऩाऩनाशक इस कथा को ऩढ़ते मा सुनते हैं, उनको हजाय अश्वभेध मऻ के सभान पर प्राप्त होता है। ऩावऩमों के ऩाऩ नाश कयने के सरए इससे फढ़कय औय कोई सयर उऩाम नहीॊ। जो भनुष्म इस एकादशी के ददन भेये वाभन रूऩ की ऩूजा कयता है, उससे तीनों रोक ऩूज्म होते हैं। अत: भोऺ की इच्छा कयने वारे भनुष्म को इस व्रत को अवश्म कयना ादहए। जो वाभन बगवान का कभर से ऩूजन कयते हैं, वे अवश्म उनके के सभीऩ जाते हैं। त्जस भनुष्म ने बािऩद शुक्र एकादशी को व्रत औय ऩूजन फकमा, उसने ब्रहभा, ववष्णु सदहत तीनों रोकों के ऩूजन के सभान पर की प्रात्प्त होती हैं। अत: एकादशी का व्रत अवश्म कयना ादहए। इस ददन बगवान एक ओय से दूसयी ओय कयवट रेते हैं, इससरए इसको ऩरयवततानी एकादशी कहते हैं। बगवान के व न सुनकय मुधधत्ष्ठय फोरे फक बगवान! भुझे अततउत्सुकता हो यही है फक आऩ फकस प्रकाय सोते औय कयवट रेते हैं तथा फकस तयह याजा फसर को फाॉधा औय वाभन रूऩ यखकय क्मा-क्मा रीराएॉ कीॊ? ातुभाास के व्रत की क्मा ववधध है तथा आऩके शमन कयने ऩय भनुष्म का क्मा कताव्म है। वह सफ आऩ भुझसे ववस्ताय से फताइए। श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक हे याजन! अफ आऩ सफ ऩाऩों को नष्ट कयने वारी कथा का श्रवण कयें। िेतामुग भें "फसर" नाभक एक दैत्म था। वह भेया ऩयभ बक्त था। ववववध प्रकाय के वेद सूक्तों से भेया ऩूजन फकमा कयता था औय तनत्म ही ब्राहभणों का ऩूजन तथा मऻ का आमोजन कयता था, रेफकन इॊि से द्वेष के कायण उसने इॊिरोक तथा सबी देवताओॊ को जीत सरमा। इस कायण सबी देवता एकि होकय सो -वव ायकय भेये ऩास आए। फृहस्ऩतत सदहत इॊिाददक देवता भेये के तनकट आकय औय नतभस्तक होकय वेद भॊिों द्वाया भेया ऩूजन औय स्तुतत कयने रगे। अत: देवताओॊ के आग्रह ऩय भैंने वाभन रूऩ धायण कयके ऩाॉ वाॉ अवताय सरमा औय फपय अत्मॊत तेजस्वी रूऩ से याजा फसर को जीत सरमा। इतनी वाताा सुनकय याजा मुधधत्ष्ठय फोरे फक हे बगवान! आऩने वाभन रूऩ धायण कयके उस भहाफरी दैत्म को फकस प्रकाय जीता? श्रीकृ ष्ण कहने रगे- भैंने वाभन रूऩधायण कय फसर से तीन ऩग बूसभ की मा ना कयते हुए कहा "मे भुझको तीन रोक के सभान है" औय हे याजन मह तुभको अवश्म ही देनी होगी। इससे तुम्हें तीन रोक दान का पर प्राप्त होगा"। याजा फसर ने इसे तुच्छ मा ना सभझकय तीन ऩग बूसभ का सॊकल्ऩ भुझको दे ददमा औय भैंने अऩने
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    14 ससतम्फय -2019 त्रिववक्रभ रूऩ को फढ़ाकय महाॉ तक फक बूरोक भें ऩद, बुवरोक भें जॊघा, स्वगारोक भें कभय, भह:रोक भें ऩेट, जनरोक भें रृदम, मभरोक भें कॊ ठ की स्थाऩना कय सत्मरोक भें भुख, उसके ऊऩय भस्तक स्थावऩत फकमा। सूमा, ॊिभा आदद सफ ग्रह गण, मोग, नऺि, इॊिाददक देवता औय शेष आदद सफ नागगणों ने ववववध प्रकाय से वेद सूक्तों से प्राथाना की। तफ भैंने याजा फसर का हाथ ऩकडकय कहा फक हे याजन! एक ऩद से ऩृथ्वी, दूसये से स्वगारोक ऩूणा हो गए। अफ तीसया ऩग कहाॉ यखूॉ? तफ फसर ने अऩना ससय झुका कय अनुयोध फकमा प्रबु आऩ के ऩद भेये ससय ऩय यख दीत्जए औय भैंने अऩना ऩैय उसके भस्तक ऩय यख ददमा त्जससे भेया वह बक्त ऩातार को रा गमा। ऩातार रोक भें याजा फसर ने ववनीत की तो बगवान ववष्णु ने कहा की- भैं तुम्हाये ऩास सदैव यहूॉगा। बादो भास के शुक्र ऩऺ की 'ऩरयवतानी' नाभ की एकादशी के ददन भैं एक रूऩ से याजा फसर के ऩास यहूॉगा औय एक रूऩ से ऺीयसागय भें शेषनाग ऩय शमन कयता यहूॉगा।" इस एकादशी के ददन बगवान ववष्णु सोते हुए कयवट फदरते हैं। इस ददन त्रिरोक के नाथ ववष्णु बगवान की ऩूजा की जाती है। वाभन एकादशी के ददन चावर औय दही सदहत चांदी का दान कयने का ववशेष ववधध-ववधान है। यात्रि को जागयण अवश्म कयना ादहए। ऩौयाणणक भान्मता के अनुशाय जो भनुष्म ववधधऩूवाक इस एकादशी का व्रत को कयते हैं, वे सफ ऩाऩों से भुक्त होकय स्वगा भें जाकय ॊिभा के सभान प्रकासशत होते हैं औय मश को प्राप्त कयते हैं। *** कनकधाया मॊि आज के बौततक मुग भें हय व्मत्क्त अततशीघ्र सभृि फनना ाहता हैं। कनकधाया मॊि फक ऩूजा अ ाना कयने से व्मत्क्त के जन्भों जन्भ के ऋण औय दरयिता से शीघ्र भुत्क्त सभरती हैं। मॊि के प्रबाव से व्माऩाय भें उन्नतत होती हैं, फेयोजगाय को योजगाय प्रात्प्त होती हैं। कनकधाया मॊि अत्मॊत दुराब मॊिो भें से एक मॊि हैं त्जसे भाॊ रक्ष्भी फक प्रात्प्त हेतु अ ूक प्रबावा शारी भाना गमा हैं। कनकधाया मॊि को ववद्वानो ने स्वमॊससि तथा सबी प्रकाय के ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा भाना हैं। आज के मुग भें हय व्मत्क्त अततशीघ्र सभृि फनना ाहता हैं। धन प्रात्प्त हेतु प्राण-प्रततत्ष्ठत कनकधाया मॊि के साभने फैठकय कनकधाया स्तोि का ऩाठ कयने से ववशेष राब प्राप्त होता हैं। इस कनकधाया मॊि फक ऩूजा अ ाना कयने से ऋण औय दरयिता से शीघ्र भुत्क्त सभरती हैं। व्माऩाय भें उन्नतत होती हैं, फेयोजगाय को योजगाय प्रात्प्त होती हैं। जैसे श्री आदद शॊकया ामा द्वारा कनकधाया स्तोि फक य ना कु छ इस प्रकाय की गई हैं, फक त्जसके श्रवण एवॊ ऩठन कयने से आस-ऩास के वामुभॊडर भें ववशेष अरौफकक ददव्म उजाा उत्ऩन्न होती हैं। दठक उसी प्रकाय से कनकधाया मॊि अत्मॊत दुराब मॊिो भें से एक मॊि हैं त्जसे भाॊ रक्ष्भी फक प्रात्प्त हेतु अ ूक प्रबावा शारी भाना गमा हैं। कनकधाया मॊि को ववद्वानो ने स्वमॊससि तथा सबी प्रकाय के ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा भाना हैं। जगद्गुरु शॊकया ामा ने दरयि ब्राहभण के घय कनकधाया स्तोि के ऩाठ से स्वणा वषाा कयाने का उल्रेख ग्रॊथ शॊकय ददत्ग्वजम भें सभरता हैं। कनकधाया भॊि:- ॐ वॊ श्रीॊ वॊ ऐॊ ह्ीॊ-श्रीॊ क्रीॊ कनक धायमै स्वाहा' GURUTVA KARYALAY Call Us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 or Shop Online @ www.gurutvakaryalay.com
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    15 ससतम्फय -2019 इॊददया एकादशी इॊददया एकादशी व्रत 25-ससतम्फय-2019 ( वाय)  सॊकरन गुरुत्व कामाारम इॊददया एकादशी व्रत कथा आश्ववन : कृ ष्ण एकादशी एक फाय मुधधत्ष्ठय बगवान श्रीकृ ष्ण से ऩूछते हैं, हे बगवान! आत्श्वन कृ ष्ण एकादशी का क्मा नाभ है? इसभें फकस देवता की ऩूजा की जाती है औय इसका व्रत कयने से क्मा पर सभरता है ?" व्रत कयने की ववधध तथा इसका भाहात्म्म कृ ऩा कयके कदहए। बगवान श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक इस एकादशी का नाभ इंददया एकादशी है। मह एकादशी ऩाऩों को नष्ट कयने वारी तथा वऩतयों को अधोगतत से भुत्क्त देने वारी होती है। हे याजन! ध्मानऩूवाक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने भाि से ही वामऩेम मऻ का पर सभरता है। प्रा ीनकार भें सतमुग के सभम भें भदहष्भतत नाभ की एक नगयी भें इॊिसेन नाभ का एक प्रताऩी याजा धभाऩूवाक अऩनी प्रजा का ऩारन कयते हुए शासन कयता था। वह याजा ऩुि, ऩौि औय धन आदद से सॊऩन्न औय ववष्णु का ऩयभ बक्त था। एक ददन जफ याजा सुखऩूवाक अऩनी सबा भें फैठा था तो आकाश भागा से भहवषा नायद उतयकय उसकी सबा भें ऩधाये। याजा उन्हें देखते ही हाथ जोडकय खडा हो गमा औय ववधधऩूवाक आसन व अघ्मा ददमा। आनॊद ऩूवाक फैठकय नायदजी ने याजा से ऩूछा फक हे याजन! आऩके सातों अॊग कु शरऩूवाक तो हैं? तुम्हायी फुवि धभा भें औय तुम्हाया भन ववष्णु बत्क्त भें तो यहता है? देववषा नायद की ऐसी फातें सुनकय याजा ने कहा- हे भहवषा! आऩकी कृ ऩा से भेये याज्म भें सफ कु शर-भॊगर है तथा भेये महाॉ मऻ कभाादद सुकृ त हो यहे हैं। आऩ कृ ऩा कयके अऩने आगभन का कायण फताए। तफ ऋवष कहने रगे फक हे याजन! आऩ आश् मा देने वारे भेये व नों को सुनो। भैं एक सभम ब्रहभरोक से मभरोक को गमा, वहाॉ श्रिाऩूवाक मभयाज से ऩूत्जत होकय भैंने धभाशीर औय सत्मवान धभायाज की प्रशॊसा की। उसी मभयाज की सबा भें भहान ऻानी औय धभाात्भा तुम्हाये वऩता को एकादशी का व्रत बॊग होने के कायण देखा। उन्होंने सॊदेशा बेजा हैं, जो भैं तुम्हें कहता हूॉ। उन्होंने कहा फक ऩूवा जन्भ भें कोई ववघ्न हो जाने के कायण भैं श्री भहारक्ष्भी मंत्र धन फक देवी रक्ष्भी हैं जो भनुष्म को धन, सभृवि एवॊ ऐश्वमा प्रदान कयती हैं। अथा(धन) के त्रफना भनुष्म जीवन दु्ख, दरयिता, योग, अबावों से ऩीडडत होता हैं, औय अथा(धन) से मुक्त भनुष्म जीवन भें सभस्त सुख-सुववधाएॊ बोगता हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के ऩूजन से भनुष्म की जन्भों जन्भ की दरयिता का नाश होकय, धन प्रात्प्त के प्रफर मोग फनने रगते हैं, उसे धन-धान्म औय रक्ष्भी की वृवि होती हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के तनमसभत ऩूजन एवॊ दशान से धन की प्रात्प्त होती है औय मॊि जी तनमसभत उऩासना से देवी रक्ष्भी का स्थाई तनवास होता है। श्री भहारक्ष्भी मॊि भनुष्म फक सबी बौततक काभनाओॊ को ऩूणा कय धन ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा हैं। अऺम तृतीमा, धनतेयस, दीवावरी, गुरु ऩुष्माभृत मोग यववऩुष्म इत्मादद शुब भुहूता भें मॊि की स्थाऩना एवॊ ऩूजन का ववशेष भहत्व हैं। >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
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    16 ससतम्फय -2019 मभयाज के तनकट यह यहा हूॉ, सो हे ऩुि मदद तुभ आत्श्वन कृ ष्णा इॊददया एकादशी का व्रत भेये तनसभत्त कयो तो भुझे स्वगा की प्रात्प्त हो सकती है। इतना सुनकय याजा कहने रगा फक हे भहवषा आऩ इस व्रत की ववधध भुझसे कदहए। नायदजी कहने रगे- आत्श्वन भाह की कृ ष्ण ऩऺ की दशभी के ददन प्रात:कार स्नानादद से तनवृत्त होकय ऩुन: दोऩहय को नदी आदद भें जाकय स्नान कयें। फपय श्रिाऩूवा वऩतयों का श्राि कयें औय एक फाय बोजन ग्रहण कयें। प्रात:कार होने ऩय एकादशी के ददन दातून आदद कयके स्नान कयें, फपय व्रत के तनमभों को बत्क्तऩूवाक ग्रहण कयता हुआ प्रततऻा कयें फक ‘भैं आज सॊऩूणा बोगों को त्माग कय तनयाहाय एकादशी का व्रत करूॉ गा। हे प्रबु! हे ऩुॊडयीकाऺ! भैं आऩकी शयण हूॉ, आऩ भेयी यऺा कीत्जए, इस प्रकाय तनमभऩूवाक शासरग्राभ की भूतता के आगे ववधधऩूवाक श्राि कयके मोग्म ब्राहभणों को पराहाय का बोजन कयाएॉ औय दक्षऺणा दें। वऩतयों के श्राि से जो फ जाए उसको सूॉघकय गौ को दें तथा धूऩ, दीऩ, गॊध, ऩुष्ऩ, नैवेद्य आदद सफ साभग्री से ऋवषके श बगवान का ऩूजन कयें। यात भें बगवान के तनकट जागयण कयें। इसके ऩश् ात द्वादशी के ददन प्रात:कार होने ऩय बगवान का ऩूजन कयके ब्राहभणों को बोजन कयाएॉ। बाई-फॊधुओॊ, स्िी औय ऩुि सदहत आऩ बी भौन होकय बोजन कयें। नायदजी कहने रगे फक हे याजन! इस ववधध से मदद तुभ आरस्म यदहत होकय इस एकादशी का व्रत कयोगे तो तुम्हाये वऩता अवश्म ही स्वगारोक को जाएॉगे। इतना कहकय नायदजी अॊतध्माान हो गए। नायदजी के कथनानुसाय याजा द्वाया अऩने फाॉधवों तथा दासों सदहत व्रत कयने से आकाश से ऩुष्ऩवषाा हुई औय उस याजा का वऩता गरुड ऩय ढ़कय ववष्णुरोक को गमा। याजा इॊिसेन बी एकादशी के व्रत के प्रबाव से तनष्कॊ टक याज्म कयके अॊत भें अऩने ऩुि को ससॊहासन ऩय फैठाकय स्वगारोक को गमा। हे मुधधत्ष्ठय! मह इॊददया एकादशी के व्रत का भाहात्म्म भैंने तुभसे कहा। इसके ऩढ़ने औय सुनने से भनुष्म सफ ऩाऩों से छू ट जाते हैं औय सफ प्रकाय के बोगों को बोगकय फैकुॊ ठ को प्राप्त होते हैं। *** भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि "श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण- प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके दशान भाि से अन-धगनत राब एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अद्ववतीम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त होती है। गुरुत्व कामाथरम भे "श्री मॊि" 12 ग्राभ से 2250 Gram (2.25Kg) तक फक साइज भे उप्रब्ध है . भूल्म:- प्रतत ग्राभ Rs. 28 से Rs.100 >>Order Now GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Visit Us: www.gurutvakaryalay.com www.gurutvajyotish.com and gurutvakaryalay.blogspot.com
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    17 ससतम्फय -2019 दहन्दू देवताओॊ भें सवाप्रथभ ऩूजनीम श्री गणेशजी  सॊकरन गुरुत्व कामाारम बायतीम सॊस्कृ तत भें प्रत्मेक शुबकामा कयने के ऩूवा बगवान श्री गणेश जी की ऩूजा की जाती हैं इसी सरमे मे फकसी बी कामा का शुबायॊब कयने से ऩूवा कामा का "श्री गणेश कयना" कहा जाता हैं। एवॊ प्रत्मक शुब कामा मा अनुष्ठान कयने के ऩूवा ‘‘श्री गणेशाम नभ्” का उच् ायण फकमा जाता हैं। गणेश को सभस्त ससविमों को देने वारा भाना गमा है। सायी ससविमाॉ गणेश भें वास कयती हैं। इसके ऩीछे भुख्म कायण हैं की बगवान श्री गणेश सभस्त ववघ्नों को टारने वारे हैं, दमा एवॊ कृ ऩा के अतत सुॊदय भहासागय हैं, एवॊ तीनो रोक के कल्माण हेतु बगवान गणऩतत सफ प्रकाय से मोग्म हैं। सभस्त ववघ्न फाधाओॊ को दूय कयने वारे गणेश ववनामक हैं। गणेशजी ववद्या-फुवि के अथाह सागय एवॊ ववधाता हैं। बगवान गणेश को सवथ प्रथभ ऩूजे जाने के ववषम भें कु छ ववशेष रोक कथा प्रचसरत हैं। इन ववशेष एवं रोकवप्रम कथाओं का वणथन महा कय यहें हैं। इस के सॊदबा भें एक कथा है फक भहवषा वेद व्मास ने भहाबायत को से फोरकय सरखवामा था, त्जसे स्वमॊ गणेशजी ने सरखा था। अन्म कोई बी इस ग्रॊथ को तीव्रता से सरखने भें सभथा नहीॊ था। सवथप्रथभ कौन ऩूजनीम हो? कथा इस प्रकाय हैं : तीनो रोक भें सवाप्रथभ कौन ऩूजनीम हो?, इस फात को रेकय सभस्त देवताओॊ भें वववाद खडा हो गमा। जफ इस वववादने फडा रुऩ धायण कय सरमे तफ सबी देवता अऩने-अऩने फर फुविअ के फर ऩय दावे प्रस्तुत कयने रगे। कोई ऩयीणाभ नहीॊ आता देख सफ देवताओॊ ने तनणाम सरमा फक रकय बगवान श्री ववष्णु को तनणाामक फना कय उनसे पै सरा कयवामा जाम। सबी देव गण ववष्णु रोक भे उऩत्स्थत हो गमे, बगवान ववष्णु ने इस भुद्दे को गॊबीय होते देख श्री ववष्णु ने सबी देवताओॊ को अऩने साथ रेकय सशवरोक भें ऩहु गमे। सशवजी ने कहा इसका सही तनदान सृत्ष्टकताा ब्रहभाजी दह फताएॊगे। सशवजी श्री ववष्णु एवॊ अन्म देवताओॊ के साथ सभरकय ब्रहभरोक ऩहु ें औय ब्रहभाजी को सायी फाते ववस्ताय से फताकय उनसे पै सरा कयने का अनुयोध फकमा। ब्रहभाजी ने कहा प्रथभ ऩूजनीम वहीॊ होगा जो जो ऩूये ब्रहभाण्ड के तीन क्कय रगाकय सवाप्रथभ रौटेगा। सभस्त देवता ब्रहभाण्ड का क्कय रगाने के सरए अऩने अऩने वाहनों ऩय सवाय होकय तनकर ऩडे। रेफकन, गणेशजी का वाहन भूषक था। बरा भूषक ऩय सवाय हो गणेश कै से ब्रहभाण्ड के तीन क्कय रगाकय सवाप्रथभ रौटकय सपर होते। रेफकन गणऩतत ऩयभ ववद्या-फुविभान एवॊ तुय थे।
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    18 ससतम्फय -2019 गणऩतत ने अऩने वाहन भूषक ऩय सवाय हो कय अऩने भाता-वऩत फक तीन प्रदक्षऺणा ऩूयी की औय जा ऩहुॉ े तनणाामक ब्रहभाजी के ऩास। ब्रहभाजी ने जफ ऩूछा फक वे क्मों नहीॊ गए ब्रहभाण्ड के क्कय ऩूये कयने, तो गजाननजी ने जवाफ ददमा फक भाता-वऩत भें तीनों रोक, सभस्त ब्रहभाण्ड, सभस्त तीथा, सभस्त देव औय सभस्त ऩुण्म ववद्यभान होते हैं। अत् जफ भैंने अऩने भाता-वऩत की ऩरयक्रभा ऩूयी कय री, तो इसका तात्ऩमा है फक भैंने ऩूये ब्रहभाण्ड की प्रदक्षऺणा ऩूयी कय री। उनकी मह तका सॊगत मुत्क्त स्वीकाय कय री गई औय इस तयह वे सबी रोक भें सवाभान्म 'सवाप्रथभ ऩूज्म' भाने गए। सरंगऩुयाण के अनुसाय (105। 15-27) – एक फाय असुयों से िस्त देवतागणों द्वाया की गई प्राथाना से बगवान सशव ने सुय-सभुदाम को असबष्ट वय देकय आश्वस्त फकमा। कु छ ही सभम के ऩश् ात तीनो रोक के देवाधधदेव भहादेव बगवान सशव का भाता ऩावाती के सम्भुख ऩयब्रहभ स्वरूऩ गणेश जी का प्राकट्म हुआ। सवाववघ्नेश भोदक वप्रम गणऩततजी का जातकभाादद सॊस्काय के ऩश् ात ् बगवान सशव ने अऩने ऩुि को उसका कताव्म सभझाते हुए आशीवााद ददमा फक जो तुम्हायी ऩूजा फकमे त्रफना ऩूजा ऩाठ, अनुष्ठान इत्मादद शुब कभों का अनुष्ठान कयेगा, उसका भॊगर बी अभॊगर भें ऩरयणत हो जामेगा। जो रोग पर की काभना से ब्रहभा, ववष्णु, इन्ि अथवा अन्म देवताओॊ की बी ऩूजा कयेंगे, फकन्तु तुम्हायी ऩूजा नहीॊ कयेंगे, उन्हें तुभ ववघ्नों द्वाया फाधा ऩहुॉ ाओगे। जन्भ की कथा बी फड़ी योचक है। गणेशजी की ऩौयाणणक कथा बगवान सशव फक अन उऩत्स्थतत भें भाता ऩावाती ने वव ाय फकमा फक उनका स्वमॊ का एक सेवक होना ादहमे, जो ऩयभ शुब, कामाकु शर तथा उनकी आऻा का सतत ऩारन कयने भें कबी वव सरत न हो। इस प्रकाय सो कय भाता ऩावाती नें अऩने भॊगरभम ऩावनतभ शयीय के भैर से अऩनी भामा शत्क्त से फार गणेश को उत्ऩन्न फकमा। एक सभम जफ भाता ऩावाती भानसयोवय भें स्नान कय यही थी तफ उन्होंने स्नान स्थर ऩय कोई आ न सके इस हेतु अऩनी भामा से गणेश को जन्भ देकय 'फार गणेश' को ऩहया देने के सरए तनमुक्त कय ददमा। इसी दौयान बगवान सशव उधय आ जाते हैं। गणेशजी सशवजी को योक कय कहते हैं फक आऩ उधय नहीॊ जा सकते हैं। मह सुनकय बगवान सशव क्रोधधत हो जाते हैं औय गणेश जी को यास्ते से हटने का कहते हैं फकॊ तु गणेश जी अडे यहते हैं तफ दोनों भें मुि हो जाता है। मुि के दौयान क्रोधधत होकय सशवजी फार गणेश का ससय धड से अरग कय देते हैं। सशव के इस कृ त्म का जफ ऩावाती को ऩता रता है तो वे ववराऩ औय क्रोध से प्ररम का सृजन कयते हुए कहती है फक तुभने भेये ऩुि को भाय डारा। ऩावातीजी के दु्ख को देखकय सशवजी ने उऩत्स्थत गणको आदेश देते हुवे कहा सफसे ऩहरा जीव सभरे, उसका ससय काटकय इस फारक के धड भॊि ससि ऩन्ना गणेश बगवान श्री गणेश फुवि औय सशऺा के कायक ग्रह फुध के अधधऩतत देवता हैं। ऩन्ना गणेश फुध के सकायात्भक प्रबाव को फठाता हैं एवॊ नकायात्भक प्रबाव को कभ कयता हैं।. ऩन्न गणेश के प्रबाव से व्माऩाय औय धन भें वृवि भें वृवि होती हैं। फच् ो फक ऩढाई हेतु बी ववशेष पर प्रद हैं ऩन्ना गणेश इस के प्रबाव से फच् े फक फुवि कू शाग्र होकय उसके आत्भववश्वास भें बी ववशेष वृवि होती हैं। भानससक अशाॊतत को कभ कयने भें भदद कयता हैं, व्मत्क्त द्वाया अवशोवषत हयी ववफकयण शाॊती प्रदान कयती हैं, व्मत्क्त के शायीय के तॊि को तनमॊत्रित कयती हैं। त्जगय, पे पडे, जीब, भत्स्तष्क औय तॊत्रिका तॊि इत्मादद योग भें सहामक होते हैं। कीभती ऩत्थय भयगज के फने होते हैं। Rs.550 से Rs.8200 तक
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    19 ससतम्फय -2019 ई- जन्भ ऩत्रिका E HOROSCOPE अत्माधुतनक ज्मोततष ऩितत द्वाया उत्कृ ष्ट बववष्मवाणी के साथ १००+ ऩेज भें प्रस्तुत Create By Advanced Astrology Excellent Prediction 100+ Pages दहॊदी/ English भें भूल्म भाि 910/- GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) INDIA Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com ऩय रगा दो, तो मह फारक जीववत हो उठेगा। सेवको को सफसे ऩहरे हाथी का एक फच् ा सभरा। उन्होंने उसका ससय राकय फारक के धड ऩय रगा ददमा, फारक जीववत हो उठा। उस अवसय ऩय तीनो देवताओॊ ने उन्हें सबी रोक भें अग्रऩूज्मता का वय प्रदान फकमा औय उन्हें सवा अध्मऺ ऩद ऩय ववयाजभान फकमा। स्कं द ऩुयाण ब्रह्भवैवतथऩुयाण के अनुसाय (गणऩततखण्ड) – सशव-ऩावाती के वववाह होने के फाद उनकी कोई सॊतान नहीॊ हुई, तो सशवजी ने ऩावातीजी से बगवान ववष्णु के शुबपरप्रद ‘ऩुण्मक’ व्रत कयने को कहा ऩावाती के ‘ऩुण्मक’ व्रत से बगवान ववष्णु ने प्रसन्न हो कय ऩावातीजी को ऩुि प्रात्प्त का वयदान ददमा। ‘ऩुण्मक’ व्रत के प्रबाव से ऩावातीजी को एक ऩुि उत्ऩन्न हुवा। ऩुि जन्भ फक फात सुन कय सबी देव, ऋवष, गॊधवा आदद सफ गण फारक के दशान हेतु ऩधाये। इन देव गणो भें शतन भहायाज बी उऩत्स्थत हुवे। फकन्तु शतनदेव ने ऩत्नी द्वाया ददमे गमे शाऩ के कायण फारक का दशान नहीॊ फकमा। ऩयन्तु भाता ऩावाती के फाय-फाय कहने ऩय शतनदेव नें जेसे दह अऩनी ित्ष्ट सशशु फारके उऩय ऩडी, उसी ऺण फारक गणेश का गदान धड से अरग हो गमा। भाता ऩावाती के ववरऩ कयने ऩय बगवान ् ववष्णु ऩुष्ऩबिा नदी के अयण्म से एक गजसशशु का भस्तक काटकय रामे औय गणेशजी के भस्तक ऩय रगा ददमा। गजभुख रगे होने के कायण कोई गणेश फक उऩेऺा न कये इस सरमे बगवान ववष्णु अन्म देवताओॊ के साथ भें तम फकम फक गणेश सबी भाॊगरीक कामो भें अग्रणीम ऩूजे जामेंगे एवॊ उनके ऩूजन के त्रफना कोई बी देवता ऩूजा ग्रहण नहीॊ कयेंगे। इस ऩय बगवान ् ववष्णु ने श्रेष्ठतभ उऩहायों से बगवान गजानन फक ऩूजा फक औय वयदान ददमा फक सवााग्रे तव ऩूजा भमा दत्ता सुयोत्तभ। सवाऩूज्मश् मोगीन्िो बव वत्सेत्मुवा तभ्।। (गणऩततखॊ. 13। 2) बावाथथ: ‘सुयश्रेष्ठ! भैंने सफसे ऩहरे तुम्हायी ऩूजा फक है, अत् वत्स! तुभ सवाऩूज्म तथा मोगीन्ि हो जाओ।’
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    20 ससतम्फय -2019 धन वृवि डडब्फी धन वृवि डडब्फी को अऩनी अरभायी, कै श फोक्स, ऩूजा स्थान भें यखने से धन वृवि होती हैं त्जसभें कारी हल्दी, रार- ऩीरा-सपे द रक्ष्भी कायक हकीक (अकीक), रक्ष्भी कायक स्पदटक यत्न, 3 ऩीरी कौडी, 3 सपे द कौडी, गोभती क्र, सपे द गुॊजा, यक्त गुॊजा, कारी गुॊजा, इॊि जार, भामा जार, इत्मादी दुराब वस्तुओॊ को शुब भहुता भें तेजस्वी भॊि द्वाया असबभॊत्रित फकम जाता हैं। भूल्म भाि Rs-730 >> Order Now ब्रह्भवैवतथ ऩुयाण भें ही एक अन्म प्रसॊगान्तगात ऩुिवत्सरा ऩावाती ने गणेश भदहभा का फखान कयते हुए ऩयशुयाभ से कहा – त्वद्वद्वधॊ रऺकोदटॊ हन्तुॊ शक्तो गणेश्वय्। त्जतेत्न्िमाणाॊ प्रवयो नदह हत्न्त भक्षऺकाभ्।। तेजसा कृ ष्णतुल्मोऽमॊ कृ ष्णाॊश् गणेश्वय्। देवाश् ान्मे कृ ष्णकरा् ऩूजास्म ऩुयतस्तत्।। (ब्रहभवैवताऩु., गणऩततख., 44। 26-27) बावाथथ: त्जतेत्न्िम ऩुरूषों भें श्रेष्ठ गणेश तुभभें जैसे राखों-कयोडों जन्तुओॊ को भाय डारने की शत्क्त है; ऩयन्तु तुभने भक्खी ऩय बी हाथ नहीॊ उठामा। श्रीकृ ष्ण के अॊश से उत्ऩन्न हुआ वह गणेश तेज भें श्रीकृ ष्ण के ही सभान है। अन्म देवता श्रीकृ ष्ण की कराएॉ हैं। इसीसे इसकी अग्रऩूजा होती है। शास्त्रीम भतसे शास्िोभें ऩॊ देवों की उऩासना कयने का ववधान हैं। आददत्मॊ गणनाथॊ देवीॊ रूिॊ के शवभ्। ऩॊ दैवतसभत्मुक्तॊ सवाकभासु ऩूजमेत्।। (शब्दकल्ऩिुभ) बावाथथ: - ऩॊ देवों फक उऩासना का ब्रहभाॊड के ऩॊ बूतों के साथ सॊफॊध है। ऩॊ बूत ऩृथ्वी, जर, तेज, वामु औय आकाश से फनते हैं। औय ऩॊ बूत के आधधऩत्म के कायण से आददत्म, गणनाथ(गणेश), देवी, रूि औय के शव मे ऩॊ देव बी ऩूजनीम हैं। हय एक तत्त्व का हय एक देवता स्वाभी हैं- आकाशस्माधधऩो ववष्णुयग्नेश् ैव भहेश्वयी। वामो् सूमा् क्षऺतेयीशो जीवनस्म गणाधधऩ्।। बावाथथ:- क्रभ इस प्रकाय हैं भहाबूत अधधऩतत 1. क्षऺतत (ऩृथ्वी) सशव 2. अऩ् (जर) गणेश 3. तेज (अत्ग्न) शत्क्त (भहेश्वयी) 4. भरूत ् (वामु) सूमा (अत्ग्न) 5. व्मोभ (आकाश) ववष्णु बगवान ् श्रीसशव ऩृथ्वी तत्त्व के अधधऩतत होने के कायण उनकी सशवसरॊग के रुऩ भें ऩाधथाव-ऩूजा का ववधान हैं। बगवान ् ववष्णु के आकाश तत्त्व के अधधऩतत होने के कायण उनकी शब्दों द्वाया स्तुतत कयने का ववधान हैं। बगवती देवी के अत्ग्न तत्त्व का अधधऩतत होने के कायण उनका अत्ग्नकु ण्ड भें हवनादद के द्वाया ऩूजा कयने का ववधान हैं। श्रीगणेश के जरतत्त्व के अधधऩतत होने के कायण उनकी सवाप्रथभ ऩूजा कयने का ववधान हैं, क्मोंफक ब्रहभाॊद भें सवाप्रथभ उत्ऩन्न होने वारे जीव तत्त्व ‘जर’ का अधधऩतत होने के कायण गणेशजी ही प्रथभ ऩूज्म के अधधकायी होते हैं। आचामथ भनु का कथन है- “अऩ ए ससजाादौ तासु फीजभवासृजत्।” (भनुस्भृतत 1) बावाथथ: इस प्रभाण से सृत्ष्ट के आदद भें एकभाि वताभान जर का अधधऩतत गणेश हैं।
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    21 ससतम्फय -2019 फकसी बी शुबकामा भें गणेशजी की ऩूजा सवाप्रथभ क्मों होती हैं?  सॊकरन गुरुत्व कामाारम गणऩतत शब्द का अथथ हैं। गण(सभूह)+ऩतत (स्वाभी) = सभूह के स्वाभी को सेनाऩतत अथाात गणऩतत कहते हैं। भानव शयीय भें ऩाॉ ऻानेत्न्िमाॉ, ऩाॉ कभेत्न्िमाॉ औय ाय अन्त्कयण होते हैं। एवॊ इस शत्क्तओॊ को जो शत्क्तमाॊ सॊ ासरत कयती हैं उन्हीॊ को ौदह देवता कहते हैं। इन सबी देवताओॊ के भूर प्रेयक हैं बगवान श्रीगणेश। बगवान गणऩतत शब्दब्रहभ अथाात ् ओॊकाय के प्रतीक हैं, इनकी भहत्व का मह हीॊ भुख्म कायण हैं। श्रीगणऩत्मथवाशीषा भें वणणात हैं ओॊकाय का ही व्मक्त स्वरूऩ गणऩतत देवता हैं। इसी कायण सबी प्रकाय के शुब भाॊगसरक कामों औय देवता-प्रततष्ठाऩनाओॊ भें बगवान गणऩतत फक प्रथभ ऩूजा फक जाती हैं। त्जस प्रकाय से प्रत्मेक भॊि फक शत्क्त को फढाने के सरमे भॊि के आगें ॐ (ओभ्) आवश्मक रगा होता हैं। उसी प्रकाय प्रत्मेक शुब भाॊगसरक कामों के सरमे ऩय बगवान ् गणऩतत की ऩूजा एवॊ स्भयण अतनवामा भानी गई हैं। इस सबी शास्ि एवॊ वैददक धभा, सम्प्रदामों ने इस प्रा ीन ऩयम्ऩया को एक भत से स्वीकाय फकमा हैं इसका सदीमों से बगवान गणेश जी क प्रथभ ऩूजन कयने फक ऩयॊऩया का अनुसयण कयते रे आयहे हैं। गणेश जी की ही ऩूजा सफसे ऩहरे क्मों होती है, इसकी ऩौयाणणक कथा इस प्रकाय है - ऩद्मऩुयाण के अनुसाय (सृश्ष्टखण्ड 61। 1 से 63। 11) – एक ददन व्मासजी के सशष्म ने अऩने गुरूदेव को प्रणाभ कयके प्रश्न फकमा फक गुरूदेव! आऩ भुझे देवताओॊ के ऩूजन का सुतनत्श् त क्रभ फतराइमे। प्रततददन फक ऩूजा भें सफसे ऩहरे फकसका ऩूजन कयना ादहमे ? तफ व्मासजी ने कहा: ववघ्नों को दूय कयने के सरमे सवाप्रथभ गणेशजी की ऩूजा कयनी ादहमे। ऩूवाकार भें ऩावाती देवी को देवताओॊ ने अभृत से तैमाय फकमा हुआ एक ददव्म भोदक ददमा। भोदक देखकय दोनों फारक (स्कन्द तथा गणेश) भाता से भाॉगने रगे। तफ भाता ने भोदक के प्रबावों का वणान कयते हुए कहा फक तुभ दोनो भें से जो धभाा यण के द्वाया श्रेष्ठता प्राप्त कयके आमेगा, उसी को भैं मह भोदक दूॉगी। भाता की ऐसी फात सुनकय स्कन्द भमूय ऩय आरूढ़ हो कय अल्ऩ भुहूताबय भें सफ तीथों की स्न्नान कय सरमा। इधय रम्फोदयधायी गणेशजी भाता-वऩता की ऩरयक्रभा कयके वऩताजी के सम्भुख खडे हो गमे। तफ ऩावातीजी ने कहा- सभस्त तीथों भें फकमा हुआ स्न्नान, सम्ऩूणा देवताओॊ को फकमा हुआ नभस्काय, सफ मऻों का अनुष्ठान तथा सफ प्रकाय के व्रत, भन्ि, मोग औय सॊमभ का ऩारन- मे सबी साधन भाता-वऩता के ऩूजन के सोरहवें अॊश के फयाफय बी नहीॊ हो सकते। इससरमे मह गणेश सैकडों ऩुिों औय सैकडों गणों से बी फढ़कय श्रेष्ठ है। अत् देवताओॊ का फनामा हुआ मह भोदक भैं गणेश को ही अऩाण कयती हूॉ। भाता-वऩता की बत्क्त के कायण ही गणेश जी की प्रत्मेक शुब भॊगर भें सफसे ऩहरे ऩूजा होगी। तत्ऩश् ात ् भहादेवजी फोरे- इस गणेश के ही अग्रऩूजन से सम्ऩूणा देवता प्रसन्न होंजाते हैं। इस सरमे तुभहें सवाप्रथभ गणेशजी की ऩूजा कयनी ादहमे।
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    22 ससतम्फय -2019 श्री गणेश ऩूजन की सयर ववधध  सॊकरन गुरुत्व कामाारम श्री गणेशजी की ऩूजा से व्मत्क्त को फुवि, ववद्या, वववेक योग, व्माधध एवॊ सभस्त ववध्न-फाधाओॊ का स्वत् नाश होता है श्री गणेशजी की कृ ऩा प्राप्त होने से व्मत्क्त के भुत्श्कर से भुत्श्कर कामा बी आसान हो जाते हैं। त्जन रोगो को व्मवसाम-नौकयी भें ववऩयीत ऩरयणाभ प्राप्त हो यहे हों, ऩारयवारयक तनाव, आधथाक तॊगी, योगों से ऩीडा हो यही हो एवॊ व्मत्क्त को अथक भेहनत कयने के उऩयाॊत बी नाकाभमाफी, दु:ख, तनयाशा प्राप्त हो यही हो, तो एसे व्मत्क्तमो की सभस्मा के तनवायण हेतु तुथॉ के ददन मा फुधवाय के ददन श्री गणेशजी की ववशेष ऩूजा-अ ाना कयने का ववधान शास्िों भें फतामा हैं। त्जसके पर से व्मत्क्त की फकस्भत फदर जाती हैं औय उसे जीवन भें सुख, सभृवि एवॊ ऎश्वमा की प्रात्प्त होती हैं। श्री गणेश जी का ऩूजन अरग-अरग उद्देश्म एवॊ काभनाऩूतता हेतु अरग-अरग भॊि व ववधध- ववधान से फकमा जाता हैं, इस सरमे महाॊ दशााई गई ऩूजन ववधध भें अॊतय होना साभान्म हैं। सबी ऩाठको के भागादशान हेतु श्री गणेश जी का ऩूजन ववधान ददमा जा यहा हैं। गणेश ऩूजा: ऩूजन साभग्री : कुॊ कुॊ भ, के सय, ससॊदूय, अवीय-गुरार, ऩुष्ऩ औय भारा, ारव, ऩान, सुऩायी, ऩॊ ाभृत, ऩॊ भेवा, गॊगाजर, त्रफरऩि, धूऩ-दीऩ, नैवैद्य भें रड्डू )रड्डू3 ,5,7, 11 ववषभ सॊख्मा भें (मा गूड अथवा सभश्री का प्रसाद रगाएॊ। रौंग, इराम ी, नायीमर, करश, 1सभटय रार कऩडा, फयक, इि, जनेऊ, वऩरी सयसों, इत्मादद आवश्मक साभग्रीमाॊ। ऩववत्र कयण: सफसे ऩहरे ऩूजन साभग्री व गणेश प्रततभा ध ि ऩववि कयण कयें अऩववि् ऩवविो वा सवाावस्थाॊ गतो वऩ वा। म् स्भयेत् ऩुण्डयीकाऺॊ स फाहमाभ्मन्तय् शुध ्॥ इस भॊि से शयीय औय ऩूजन साभग्री ऩय जर छीटें इसे अॊदय फाहय औय फहाय दोनों शुि हो जाता है आचभन: ॐ के शवाम नभ: ॐ नायामण नभ: ॐ भध्वामे नभ: हस्तो प्रऺल्म हसशाके शम नभ : आसान सुवि: ॐ ऩृथ्वी त्वमा धृता रोका देवव त्व ववद्गणुनाधृता्। त्व धायम भा देवव ऩववि कु रू आसनभ्॥ यऺा भंत्र: 'अऩक्राभन्तु बूतातन वऩशा ा् सवातो ददशा। सवेषाभवयोधेन ब्रहभकभा सभायबे। अऩसऩान्तु ते बूता् मे बूता् बूसभसॊत्स्थता्। मे बूता ववनकताायस्ते नष्टन्तु सशवाऻमा।' इस भॊि से दशों ददशाओॊ भैं वऩरा सयसों तछटके त्जसेस सभस्त बूत प्रेत फाधाओॊ का तनवायण होता है स्वस्ती वाचन: स्वत्स्त न इन्िो वृिश्रवा :स्वत्स्त न :ऩूषा ववश्ववेदा:। स्वत्स्तनस्ता यऺो अरयष्टनेसभ :स्वत्स्त नो फृहस्ऩततादधात॥ इस के फाद श्री गणेश जी के भॊगर ऩाठ कयना ादहए जो की इस प्रकाय है
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    23 ससतम्फय -2019 गणेश जी का भंगर ऩाठ: सुभुखश् ैकदन्तश् कवऩरो गजकणाक:। रम्फोदयश् ववकटो ववघ्रनाशो ववनामक:॥ धूम्रके तुगाणाध्मऺो बार न्िो गजानन:। द्वाद्वशैतातन नाभातन म :ऩठेच्छेणुमादवऩ॥ ववद्यायम्बे वववाहे प्रवेशे तनगाभे तथा। सॊग्राभे सॊकटे ैव ववघ्रस्तस्म न जामते॥ एकाग्रध न होकय गणेश का ध्मान कयना ादहए श्री गणेश का ध्मान कयें : गजाननॊ बूतगणादद सेववतभ् कवऩत्थ जम्फूपर ारुबऺणभ्। उभासुतभ् शोक ववनाश कायकभ् नभासभ ववघ्नेश्वय ऩाद ऩॊकजभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् गणेशॊ ध्मामासभ भॊि का उच् ायण कयें। आह्वानं: इस भॊि से श्री गणेश का आहवान कये मा भन ही भन भें श्री गणेश जी को ऩधायने के सरमे ववनतत कयें। हाथभें अऺत रेकय आहवान कयें। आगच्छ बगवन्देव स्थाने ाि त्स्थयो बव मावत्ऩूजाॊ करयष्मासभ तावत्वॊ सत्न्नधौ बव।। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् गणेशॊ ध्मामासभ भॊि का उच् ायण कयके अऺते डारदें..... इस भॊि से श्री गणेश की भूतता मा प्रततभा ऩय हल्दी मा कु भकु भ से यॊगे ारव डारें। मदद प्रततभा के प्रहरे से प्राण-प्रततष्ठा हो गई हैं तो आवश्मक्ता नहीॊ हैं तफ के वर सुऩायी ऩय ही ारव डारें। स्भयण: हाथभें ऩुष्ऩ रेकय श्री गणेशजी का स्भयण कयें। नभस्तस्भै गणेशाम सवा ववध्न ववनासशने॥ कामाायॊबेषु सवेषु ऩूत्जतो म् सुयैयवऩ। सुभुखश् ैक दॊतश् कवऩरो गजकणाक्॥ रॊफोदयश् ववकटो ववघ्ननाशो ववनामक्। धुम्रके तुय् गणाध्मऺो बार ॊिो गजानन॥ द्वादशैतातन नाभातन म् ऩठेच्छृ णु मादऽवऩ॥ ववद्यायॊबे वववाहे प्रवेशे तनगाभे तथा। सॊग्राभे सॊकटे ैव ववघ्नस्तस्म न जामते॥ शुक्राॊफय धयॊ देवॊ शसशवणं तुबुाजभ्। प्रसन्न वदनॊ ध्मामेत् सवा ववघ्नोऩशाॊतमे॥ जऩेद् गणऩतत स्तोिॊ षड्सबभाासे परॊ रबेत्। सॊवॊत्सयेण ससविॊ रबते नाि सॊशम्॥ वक्रतुॊड भहाकाम सूमाकोदट सभ प्रब। तनववाघ्नॊ कु रु भे देव सवा कामेषु सवादा॥ असबत्प्सताथा ससद्ध्मथं ऩूत्जतो म् सुयासुयै्। सवा ववघ्न हयस्तस्भै गणाधधऩतमे नभ्॥ ववघ्नेश्वयाम वयदाम सुयवप्रमाम रॊफोदयाम सकराम जगत्त्धताम। नागाननाम श्रुततमऻ ववबुवषताम गौयीसुताम गणनाथ नभो नभस्ते॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् गणेशॊ स्भयासभ भॊि का उच् ायण कयके ऩुष्ऩ अवऩात कयें षोडशोऩचाय गणऩतीऩूजन: अस्मै प्राण् प्रततष्ठन्तु अस्मै प्राणा् ऺयन्तु । अस्मै देवतभ ीमा भाभहेतत कश् न॥ आसनं: आसन सभवऩात कयें। मदद ऩहरे से वस्ि त्रफछामा हुवा हैं तो उस स्थान ऩय हल्दी मा कु भकु भ से यॊगे अऺत डारकय ऩुष्ऩ अवऩात कयें। यम्मॊ सुशोबनॊ ददव्मॊ सवा सौख्म कयॊ शुबभ्। आसनॊ भमादत्तॊ गृहाण ऩयभेश्वय॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् आसनॊ सभऩामासभ॥ मदद श्रोक ऩढने भें कदठनाई हो तो आसन सभऩाासभ श्री गॊ गणेशाम नभ् का उच् ायण कयते हुवे गणेश जी के यण धोमे। ऩाद्मं: उष्णोदकॊ तनभारॊ सवा सौगन्ध सॊमुतभ्। ऩाद प्रऺारनाथााम दत्तॊ ते प्रततगृहमताभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऩाद्मॊ सभऩामासभ॥
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    24 ससतम्फय -2019 अर्घ्मं: आ भनीभें जर, पू र, पर, ॊदन, अऺत, दक्षऺणा इत्मादद हाथ भें यख कय तनम्न भॊि का उच् ायण कयें... अध्मा गृहाण देवेश गॊध ऩुष्ऩऺतै् सह। करुणा कु रु भें देव गृहाणाध्मै् नभोस्तुते॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् अघ्मं सभऩामासभ भॊि का उच् ायण कयके अध्मा की साभग्रीमा अवऩात कयदें। आचभन: सवा तीथा सभामुक्तॊ सुगॊधध तनभार जरभ्। आ म्मताॊ भमा दत्तॊ गृहीत्वा ऩयभेश्वयॊ॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् आ भनॊ सभऩामासभ॥ स्नानं: गॊगा मभुना येवा तुॊगबिा सयस्वतत। कावेयी सदहता नद्म् सद्म् स्नाथाभवऩाता॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् स्नानॊ सभऩामासभ भॊि का उच् ायण कयते हुवे स्नान कयामे। ऩंचाभृत स्नान : तत ऩश् मात ऩॊ ाभृत से क्रभश् दूध, दही, घी, शहद, शक्कय से स्नान कया कय शुिजर मा गॊगाजर से उक्त भॊि से ऩुन् स्वच्छ कयरे। तत ऩश् मात शुि वस्ि से ऩोछ कय प्रततत्ष्ठत कयें। दूध स्नान : काभधेनु सभुत्ऩनॊ सवेषाॊ जीवन ऩयभ्। ऩावनॊ मऻ हेतुश् ऩम :स्नानाथाभवऩातभ्॥ इस के स्थान ऩय ऩम् स्नानभ् सभऩामासभ गॊ गणेशाम नभ् का उच् ायण कये तथा ऩम् के स्थान ऩय दूध कहें, दहीॊ कहें, धृतभ् कहें, भधु कहें, शका या कहें के स्नान कयामे। ऩमसस्तु सभुद्भूतॊ भधुयाम्रॊ शसशप्रबभ् । दध्मानीतॊ भमा देव स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥ नवनीतसभुत्ऩन्नॊ सवासॊतोषकायकभ् । घृतॊ तुभ्मॊ प्रदास्मासभ स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥ तरु ऩुष्ऩ सभुत्ऩन्नॊ सुस्वादु भधुयॊ भधु । तेज् ऩुत्ष्टकयॊ ददव्मॊ स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥ इऺुसायसभुद्भूताॊ शका याॊ ऩुत्ष्टदाॊ शुबाभ् । भराऩहारयकाॊ ददव्मॊ स्नानाथं प्रततगृहमताभ् ॥ ऩमो दधध धृत ैव भधु शका यामुतभ्। ऩॊ ाभृत भमानीतॊ सनानाथा प्रततघृहमताभ॥ वस्त्रं: ऩॊ ाभृत स्नान के फाद स्वच्छ कय के वस्ि ऩहनामे मा सभवऩात कयें। सवा बूषाददके सौम्मे रोकरज्जा तनवायणे । भमोऩऩाददते तुभ्मॊ वाससी प्रततगृहीताभ् ॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् वस्िोऩवस्िे सभऩामासभ॥ मऻोऩवीत ततऩश् मात तनम्न भॊि से मऻोऩवीत ऩहनामे नवसभस्तॊतुसबमुक्त त्रिगुणॊ देवताभमॊ। सऩफीतॊ भमा दत्तॊ गृहाण ऩयभेश्वयभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् मऻोऩववतॊ सभऩामासभ॥ चंदन: ततऩश् मात रार ॊदन ढामे। श्रीखण्ड न्दन ददव्मॊ के शयादद सुभनीहयभ्। ववरेऩनॊ सुश्रष्ठ न्दनॊ प्रततगृहमतभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् कुॊ कु भॊ सभऩामासभ॥ कुं कुं भ: ततऩश् मात कुॊ कुॊ भ अवीय-गुरार ढामे। कुॊ कुॊ भ काभना ददव्मॊ काभना काभ सॊबवभ्। कुॊ कुॊ भ नाध ातो देव गृहाण ऩयभेश्वयभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् कुॊ कु भॊ सभऩामासभ॥ ससंदूय : ततऩश् मात ससॊदूय ढामे। ससॊदूयॊ शोबनॊ यक्तॊ सौबाग्मॊ सुखवधानभ्। शुबदॊ काभदॊ ैव ससॊदूयॊ प्रततगृहमताभ। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ससॊदूयॊ सभऩामासभ॥
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    25 ससतम्फय -2019 अऺत: ततऩश् मात हल्दी मा कुॊ कुॊ भ से यॊगे अऺत ढामे। अऺताश् सुयश्रेष्ठ कुॊ कु भाक्ता् सुशोसबता्। भमा तनवेददता बक्त्मा गृहाण ऩयभेश्वरय॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् अऺतान् सभऩामासभ॥ ऩुष्ऩ : ततऩश् मात ऩुष्ऩ भारा आदद ढामे। भाल्मादीतन सुगन्धीतन भारत्मादीतन वै प्रबो। भमा नीतातन ऩुष्ऩाणण गृहाण ऩयभेश्वय॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऩुष्ऩाणण सभऩामासभ॥ दूवाथ: ततऩश् मात दूवाा ढामे। दुवाा कयान्सह रयतान भृतन्भॊगर प्रदान। आनी ताॊस्तव ऩूजाथा गृहाण ऩयभेश्वय॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् दूवांकु यान सभऩामासभ॥ आबूषण : ततऩश् मात आबूषण ढामे। अरॊकायान्भहाददव्मान्नानायतन ववतनसभातान। गृहाण देव-देवेश प्रसीद ऩयभेश्वय॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् आबूषण सभऩामासभ॥ इत्र: ततऩश् मात इि अथाात् सुगॊधधत तेर ढामे। म्ऩकाशो वकु रॊ भारती भोगयाददसब्। वाससतॊ त्स्नग्ध तासेरु तैरॊ ारु प्रगृहमातभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् तैरभ् सभऩामासभ॥ धूऩ : ततऩश् मात धूऩ आदद जरामे। वनस्ऩतत यसोद्भूतो गॊधाढ्मो गॊध उत्तभ्। आध्नम सवा देवानाॊ धूऩोमॊ प्रततगृहमताभ्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् धूऩॊ सभऩामासभ॥ दीऩ: ततऩश् मात दीऩ आदद जरामे। आज्मेन वतताना मुक्तॊ वत्हनना प्रमोत्जतभ् भमा। दीऩॊ गृहाण देवेश िेरोक्म ततसभयाऩह॥। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् दीऩॊ दशामासभ॥ नैवेद्य : ततऩश् मात नैवेद्य अवऩात कयें। शका या खॊडखाद्यातन दधधऺीय घृतातन । आहायॊ बक्ष्मॊ बोज्मॊ गृहाण गणनामक। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् नैवेद्मॊ तनवेदमासभ॥ ततऩश् मात नैवेद्य ऩय जर तछडके । गॊ गणऩतमे नभ् ततऩश् मात इस भॊि का उच् ायण कयते हुवे ऩाॊ फाय बोजन कयामे..... ॐ प्राणाम नभ्। ॐ अऩानाम नभ्। ॐ व्मानाम नभ्। ॐ उदानाम नभ्। ॐ सभानाम नभ्। ततऩश् मात इस भॊि का उच् ायण कयते हुवे जर अवऩात कयें। भध्मे ऩानीमॊ सभऩामासभ। फपय से उक्त भॊि का ऩाॊ फाय उच् ायण कयते हुवे ऩाॊ फाय बोजन कयामे.... ततऩश् मात इस भॊि का उच् ायण कयते हुवे तीन फाय जर अवऩात कयें.... ॐ गणेशाम नभ् उत्तय ऩोषणॊ सभऩामासभ। ॐ गणेशाम नभ् हस्त प्रऺारनॊ सभऩामासभ। ॐ गणेशाम नभ् भुख प्रऺारनॊ सभऩामासभ।
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    26 ससतम्फय -2019 हाथ से बोजन की गॊध दूय कयने हेतु ॊदनमुक्त ऩानी अवऩात कयें। ॐ गणेशाम नभ् कयोद्वतानाथे गॊधॊ सभऩामासभ. भुख शुवि हेतु ऩान-सुऩायी इराम ी औय रवॊग अवऩात कयें। एरारवेंग सॊमुक्तॊ ऩुगीपरॊ सभत्न्वतभ्, ताॊफुरॊ भमा दत्तॊ गृहाण गणनामक .ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् भुखवासॊ सभऩामासभ। दक्षऺणा: ततऩश् मात दक्षऺणा अवऩात कयें। दहयण्म गबा गबास्थॊ हेभफीजॊ ववबावसो। अनॊत ऩूण्म परदभत् शाॊततॊ प्रमच्छ भे॥। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् दक्षऺणाॊ सभऩामासभ। प्रदक्षऺणा: ततऩश् मात प्रदक्षऺणा कयें। मातन कातन ऩाऩातन जन्भान्तय कृ तातन । तातन सवााणण नश्मन्तु प्रदक्षऺणा ऩदे ऩदे। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् प्रदक्षऺणाॊ कयोसभ। आयती: नीयाजन-आयती प्रगट कय उसभें ॊदन-ऩुष्ऩ रगामे कऩुय प्रज्वसरत कयें। ॊिाददत्मौ धयणण ववद्मुदत्ग्न त्वभेव । त्वभेव सवा ज्मोततवष आतॉक्मॊ प्रततगृहमताभ्॥ कऩुाय ऩूयेण भनोहयेण सुवणा ऩािान्तय सॊत्स्थतेन। प्रददप्तबासा सहगतेन नीयाजनॊ ते ऩरयत कयोसभ। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् नीयाजनॊ सभऩामासभ। ॥श्री गणेश आयतत॥ जम गणेश जम गणेश जम गणेश देवा जम गणेश जम गणेश जम गणेश देवा. भाता जाकी ऩायवती वऩता भहादेवा॥ जम गणेश..... एकदन्त दमावन्त ायबुजाधायी भाथे ऩय ततरक सोहे भूसे की सवायी॥ जम गणेश..... ऩान ढ़े पर ढ़े औय ढ़े भेवा रड्डुअन का बोग रगे सन्त कयें सेवा॥ जम गणेश..... अॊधे को आॉख देत कोदढ़न को कामा फाॉझन को ऩुि देत तनधान को भामा॥ जम गणेश..... ' सूय' श्माभ शयण आए सपर कीजे सेवा जम गणेश जम गणेश जम गणेश देवा॥ जम गणेश..... आयती के ायो औय जर घुभामे फपय गणेशजी को आयती ददखामे खुद आयती रेकय हाथ धोरे। फपय दोनो हाथकी अॊजसरभें ऩुष्ऩ रेकय ऩुष्ऩाॊजसर दें। नाना सुगॊधी ऩुष्ऩाणण ऋतुकारोद्भवातन । ऩुष्ऩाॊजसर प्रदानेन प्रसीद गणनामक। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऩुष्ऩाॊजसर सभऩामासभ। प्राथथना: ववघ्नेश्वयाम वयदाम सुयवप्रमाम रॊफोदयाम सकराम जगविताम। नागाननाम श्रुततमऻ ववबुवषताम गौयीसुताम गणनाथ नभो नभस्ते। बक्ताततानाशन ऩयाम गणेश्वयाम सवेश्वयाम शुबदाम सुयेश्वयाम। ववद्याधयाम ववकटाम वाभनाम बत्क्त प्रसन्न वयदाम नभो नभस्ते। नभस्काय: रॊफोदय नभस्तुभ्मॊ सतत भोदक वप्रम। तनववाघ्नॊ कु रु भे देव सवा कामेषु सवादा। ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् नभस्कायान् सभऩामासभ। ववशेष अध्मथ: आ भनी भें जर, ावर, पू र, पर, ॊदन दक्षऺणा आदद अध्मा भें रे यऺ यऺ गणाध्मऺ यऺ िेरोक्म यऺक। बक्तनाभ बमॊकताा िाता बवबवाणावात्॥ परेन पसरतॊ तोमॊ परेन पसरतॊ धनभ्। परास्मघ्मं प्रदानेन ऩूणाा सन्तु भनोयथा्॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ववशेषाघ्मं सभऩामासभ। ऺभाऩन: आहवानॊ न जानासभ न जानासभ ववसजानभ्। ऩूजाॊ ैव न जानासभ ऺभस्व गणनामक॥ ॐ ससविफुवि सदहत श्री गणेशाम नभ् ऺभाऩनॊ सभऩामासभ॥ अनमा ऩूज्मा ससविफुवि सदहत श्री गणेश् वप्रमताभ्॥ ***
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    27 ससतम्फय -2019 ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण की भदहभा  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ऩौयाणणक भान्मता के अनुशाय प्रततददन बगवान श्रीगणेश की प्रततभा के साभने ऩूणा श्रिा-बत्क्तबाव से मदद कोई भनुष्म इस ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण ऩठन कयता हैं तो उसे सभस्त प्रकाय के साॊसारयक सुखों की प्रात्प्त होती हैं। इस ऩॊ श्रोकी श्रीगणेशऩुयाण का ऩठ भनुष्म को सबी प्रकाय के बोगों औय भोऺ प्रदान कयने भें सभथा हैं। श्रीववघ्नेशऩुयाणसायभुददतॊ व्मासाम धािा ऩुया, खण्डॊ वै प्रथभॊ भहागणऩतेश्र् ोऩासनाख्मॊ मथा। सॊहतुं त्रिऩुयॊ सशवेन गणऩस्मादौ कृ तॊ ऩूजनॊ, कतुं सूत्ष्टसभभाॊ स्तुत: स ववधधना व्मासेन फुद्ध्माप्तमे ॥१॥ सॊकष्ट्माश् ववनामकस्म भनो: स्थानस्म तीथास्म वै, दूवााणाॊ भदहभेतत बत्क्त रयतॊ तत्ऩाधथवास्मा ानभ्। तेभ्मो मैमादबीत्प्सतॊ गणऩततस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ, ता: सवाा न सभथा एव कधथतुॊ ब्रहभा कु तो भानव् ॥२॥ क्रीडाकाण्डभथो वदे कृ तमुगे श्र्वेतच्छवव: काश्मऩ: ससॊहाक: स ववनामको दशबुजो बूत्वाथ काशीॊ ममौ। हत्त्वा ति नयान्तकॊ तदनुजॊ देवान्तकॊ दानवॊ, िेतामाॊ सशवनॊदनो यसबुजो जातो भमूयध्वज:॥३॥ हत्वा तॊ कभरासुयॊ सगणॊ ससन्धुॊ भहादैत्मऩॊ, ऩश् ात ससविभतीसुते कभरजस्तस्भै ऻानॊ ददौ। द्वाऩाये तु गजाननो मुगबुजो गौयीसुत: ससन्दुयॊ, सम्भद्ाम स्वकयेण तॊ तनजभुखे ाखुध्वजो सरप्तवान ्॥४॥ गीतामा उऩदेश एव दह कृ तो याऻे वयेण्माम वै, तुष्टामाथ धुम्रके तुयसबधो ववप्र: सधभााधधक:। अश्वाॊको द्वद्वबुजो ससतो गणऩततम्रेच्छाान्तक: स्वणाद:, क्रीडाकाण्डसभदॊ गणस्म हरयणा प्रोक्तॊ ववधािे ऩुया॥५॥ ।। इतत श्रीऩॊ श्रोफकगणेशऩुयाणभ्।। गणेश वाहन भूषक के से फना सभेरू ऩवात ऩय सौभरय ऋवष का आश्रभ था। उनकी अत्मॊत रूऩवान तथा ऩततव्रता ऩत्नी का नाभ भनोभमी था। एक ददन ऋवषवय रकडी रेने के सरए वन भें रे गए। उनके जाने के ऩश् मात भनोभमी गृहकामा भें व्मस्त हो गईं। उसी सभम एक दुष्ट कौं नाभक गॊधवा वहाॊ आमा। जफ कौं ने रावव्मभमी भनोभमी को देखा, तो उसके बीतय काभ जागृत होगमा एवॊ वह व्माकु र हो गमा। कौं ने भनोभमी का हाथ ऩकड सरमा। योती व काॊऩती हुई भनोभमी उससे दमा की बीख भाॊगने रगी। उसी सभम वहा सौबरय ऋवष आ गए। उन्हें गॊधवा को श्राऩ देते हुए कहा, तुभने ोय की बाॊतत भेयी सहधसभानी का हाथ ऩकडा हैं, इस कायण तुभ अफसे भूषक होकय धयती के नी े औय ोयी कयके अऩना ऩेट बयोगे।’ ऋवष का श्राऩ सुनकय गॊधवा ने ऋवष से प्राथाना की- हे ऋवषवय, अवववेक के कायण भैंने आऩकी ऩत्नी के हाथ का स्ऩशा फकमा। भुझे ऺभा कय दें। ऋवष फोरे: कौं ! भेया श्राऩ व्मथा नहीॊ होगा। तथावऩ द्वाऩय भें भहवषा ऩयाशय के महाॊ गणऩतत देव गजरूऩ भें प्रकट होंगे। तफ तुभ उनका वाहन फन जाओगे। इसके ऩश् मात तुम्हाया कल्माण होगा तथा देवगण बी तुम्हाया सम्भान कयेंगे।
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    28 ससतम्फय -2019 फकस पू र से कयें गणेश ऩूजन  सॊकरन गुरुत्व कामाारम गणेश जी को दूवाा सवााधधक वप्रम है। इस सरमे सपे द मा हयी दूवाा ढ़ानी ादहए। दूवाा की तीन मा ऩाॉ ऩत्ती होनी ादहए। गणेश‌जी को तुरसी छोडकय सबी ऩि औय ऩुष्ऩ वप्रम हैं। गणेशजी ऩय तुरसी ढाना‌तनषेध‌हैं।‌ न तुरस्मा गणाधधऩभ्‌(ऩद्मऩुयाण) बावाथा‌:तुरसी से गणेशजी की ऩूजा कबी नहीॊ‌कयनी‌ ादहमे। 'गणेश तुरसी ऩि दुगाा नैव तु दूवाामा' (कातताक भाहात्म्म) बावाथथ :‌ गणेशजी की‌तुरसी ऩि‌से‌एवॊ‌दुगााजी की दूवाा ऩूजा नहीॊ कयनी ादहमे। गणेशजी की‌ऩूजा भें भन्दाय के रार पू र ढ़ाने से ववशेष राब प्राप्त होता हैं। रार ऩुष्ऩ के अततरयक्त ऩूजा भें श्वेत,ऩीरे पू र बी ढ़ाए जाते हैं। सॊकटनाशन गणेशस्तोिभ ् सॊकटनाशन गणेश स्तोिभ ् का प्रतत ददन ऩाठ कयने से सभस्त प्रकाय के सॊकटोका नाश होता है, श्री गणेशजी फक कृ ऩा एवॊ सुख सभृवि फक प्राप्त होती है। वक्रतुॊड भहाकाम सूमाकोदट सभप्रब । तनववाघ्नभ् कु रु भें देव सवा कामेषु सवादा ॥ ववघ्नेश्वयाम वयदाम सूयवप्रमाम रम्फोदयाम सकराम जगद्वद्वताम । नागाननाम श्रुततमऻ ववबूवषताम गौयीसुताम गणनाथ नभोनभस्ते ॥ स्तोि: प्रणम्म सशयसा देवॊ गौयीऩुॊि ववनामकभ्बक्तावासॊ स्भये तनत्मॊ आमुकाभाथाससिमे ॥ १ ॥ प्रथभॊ वक्रतुॊडॊ एकदॊतॊ द्वद्वततमकभ्तृतीमॊ कृ ष्णवऩॊगाऺॊ गजवकिॊ तुथाकभ ् ॥ २ ॥ रॊफोदयॊ ऩॊ भॊ षष्टभॊ ववकटभेव सप्तभॊ ववघ्नयाजॊ धूम्रवणं तथाअष्टकभ् ॥ ३ ॥ नवॊ बार ॊिॊ दशभॊ तु ववनामकभ्एकादशॊ गणऩततॊ द्वादशॊ तु गजाननभ् ॥ ४ ॥ द्वादशैतातन नाभातन त्रिसॊध्मॊ म: ऩठेन्नय: न ववघ्नबमॊ तस्म सवा ससवि कयॊ प्रबो ॥ ५ ॥ ववद्याधथा रबते ववद्माॊ धनाधथा रबते धनभ्ऩुिाधथा रबते ऩुिाॊभोऺाधथा रबते गततभ् ॥ ६ ॥ जऩेत्गणऩततस्तोिॊ षडसबभासै: परॊ रबेत सॊवतसयेणससविॊ रबते नािसॊशम् ॥ ७ ॥ अष्टभ्मोब्राहभणोभ्मस्म सरणखत्वा म: सभऩामेत ्तस्म ववद्या बवेत्सवाा गणेशस्म प्रसादत् ॥ ८ ॥ ॥ इततश्री नायदऩुयाणे ‘सॊकटनाशन गणेशस्तोिभ ्’ सॊऩूणाभ्॥
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    29 ससतम्फय -2019 गणेश ऩूजन भें तनवषि हैं तुरसी?  सॊकरन गुरुत्व कामाारम तुरसी सभस्त ऩौधों भें श्रेष्ठ भानी जाती हैं। दहॊदू धभा भें सभस्त ऩूजन कभो भें तुरसी को प्रभुखता दी जाती हैं। प्राम् सबी दहॊदू भॊददयों भें यणाभृत भें बी तुरसी का प्रमोग होता हैं। इसके ऩीछे ऎसी काभना होती है फक तुरसी ग्रहण कयने से तुरसी अकार भृत्मु को हयने वारी तथा सवा व्माधधमों का नाश कयने वारी हैं। ऩयन्तु मही ऩूज्म तुरसी को बगवान श्री गणेश की ऩूजा भें तनवषि भानी गई हैं। शास्त्रों भें उल्रेख हैं: तुरसीं वजथतमत्वा सवाथण्मवऩ ऩत्रऩुष्ऩाणण गणऩततवप्रमाणण। (आ ायबूषण) गणेशजी को तुरसी छोडकय सबी ऩि-ऩुष्ऩ वप्रम हैं! गणऩततजी को दूवाा अधधक वप्रम है। इनसे सम्फि ब्रह्भकल्ऩ भें एक कथा सभरती हैं एक सभम नवमौवन सम्ऩन्न तुरसी देवी नायामण ऩयामण होकय तऩस्मा के तनसभत्त से तीथो भें भ्रभण कयती हुई गॊगा तट ऩय ऩहुॉ ीॊ। वहाॉ ऩय उन्होंने गणेश को देखा, जो फक तरूण मुवा रग यहे थे। गणेशजी अत्मन्त सुन्दय, शुि औय ऩीताम्फय धायण फकए हुए आबूषणों से ववबूवषत थे, गणेश काभनायदहत, त्जतेत्न्िमों भें सवाश्रेष्ठ, मोधगमों के मोगी थे गणेशजी वहाॊ श्रीकृ ष्ण की आयाधना भें घ्मानयत थे। गणेशजी को देखते ही तुरसी का भन उनकी ओय आकवषात हो गमा। तफ तुरसी उनका उऩहास उडाने रगीॊ। घ्मानबॊग होने ऩय गणेश जी ने उनसे उनका ऩरय म ऩूछा औय उनके वहाॊ आगभन का कायण जानना ाहा। गणेश जी ने कहा भाता! तऩत्स्वमों का घ्मान बॊग कयना सदा ऩाऩजनक औय अभॊगरकायी होता हैं। शुबे! बगवान श्रीकृ ष्ण आऩका कल्माण कयें, भेये र्घ्मान बंग से उत्ऩन्न दोष आऩके सरए अभंगरकायक न हो। इस ऩय तुरसी ने कहा—प्रबो! भैं धभाात्भज की कन्मा हूॊ औय तऩस्मा भें सॊरग्न हूॊ। भेयी मह तऩस्मा ऩतत प्रात्प्त के सरए हैं। अत: आऩ भुझसे वववाह कय रीत्जए। तुरसी की मह फात सुनकय फुवि श्रेष्ठ गणेश जी ने उत्तय ददमा हे भाता! वववाह कयना फडा बमॊकय होता हैं, भैं ब्रम्ह ायी हूॊ। वववाह तऩस्मा के सरए नाशक, भोऺद्वाय के यास्ता फॊद कयने वारा, बव फॊधन से फॊधे, सॊशमों का उद्गभ स्थान हैं। अत: आऩ भेयी ओय से अऩना घ्मान हटा रें औय फकसी अन्म को ऩतत के रूऩ भें तराश कयें। तफ कु वऩत होकय तुरसी ने बगवान गणेश को शाऩ देते हुए कहा फक आऩका वववाह अवश्म होगा। मह सुनकय सशव ऩुि गणेश ने बी तुरसी को शाऩ ददमा देवी, तुभ बी तनत्श् त रूऩ से असुयों द्वाया ग्रस्त होकय वृऺ फन जाओगी। इस शाऩ को सुनकय तुरसी ने व्मधथत होकय बगवान श्री गणेश की वॊदना की। तफ प्रसन्न होकय गणेश जी ने तुरसी से कहा हे भनोयभे! तुभ ऩौधों की सायबूता फनोगी औय सभमाॊतय से बगवान नायामण फक वप्रमा फनोगी। सबी देवता आऩसे स्नेह यखेंगे ऩयन्तु श्रीकृ ष्ण के सरए आऩ ववशेष वप्रम यहेंगी। आऩकी ऩूजा भनुष्मों के सरए भुत्क्त दातमनी होगी तथा भेये ऩूजन भें आऩ सदैव त्माज्म यहेंगी। ऎसा कहकय गणेश जी ऩुन: तऩ कयने रे गए। इधय तुरसी देवी दु:णखत हवदम से ऩुष्कय भें जा ऩहुॊ ी औय तनयाहाय यहकय तऩस्मा भें सॊरग्न हो गई। तत्ऩश् ात गणेश के शाऩ से वह ध यकार तक शॊख ूड की वप्रम ऩत्नी फनी यहीॊ। जफ शॊख ूड शॊकय जी के त्रिशूर से भृत्मु को प्राप्त हुआ तो नायामण वप्रमा तुरसी का वृऺ रूऩ भें प्रादुबााव हुआ।
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    30 ससतम्फय -2019 काभनाऩूतता हेतु भत्कायी गणेश भॊि  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ॐ गॊ गणऩतमे नभ् । एसा शास्िोक्त व न हैं फक गणेश जी का मह भॊि भत्कारयक औय तत्कार पर देने वारा भॊि हैं। इस भॊि का ऩूणा बत्क्तऩूवाक जाऩ कयने से सभस्त फाधाएॊ दूय होती हैं। षडाऺय का जऩ आधथाक प्रगतत व सभृत्ध्ददामक है। ॐ वक्रतुॊडाम हुभ् । फकसी के द्वाया फक गई ताॊत्रिक फक्रमा को नष्ट कयने के सरए, ववववध काभनाओॊ फक शीघ्र ऩूतता के सरए उत्च्छष्ट गणऩतत फक साधना फकजाती हैं। उत्च्छष्ट गणऩतत के भॊि का जाऩ अऺम बॊडाय प्रदान कयने वारा हैं। ॐ हत्स्त वऩशाध सरखे स्वाहा । आरस्म, तनयाशा, करह, ववघ्न दूय कयने के सरए ववघ्नयाज रूऩ की आयाधना का मह भॊि जऩे। ॐ गॊ क्षऺप्रप्रसादनाम नभ:। भॊि जाऩ से कभा फॊधन, योगतनवायण, कु फुवि, कु सॊगत्त्त, दूबााग्म, से भुत्क्त होती हैं। सभस्त ववघ्न दूय होकय धन, आध्मात्त्भक ेतना के ववकास एवॊ आत्भफर की प्रात्प्त के सरए हेयम्फॊ गणऩतत का भॊि जऩे। ॐ गूॊ नभ:। योजगाय की प्रात्प्त व आधथाक सभृत्ध्द प्राप्त होकय सुख सौबाग्म प्राप्त होता हैं। ॐ श्रीॊ ह्ीॊ क्रीॊ ग्रौं गॊ गण्ऩत्मे वय वयदे नभ् ॐ तत्ऩुरुषाम ववद्महे वक्रतुण्डाम धीभदह तन्नो दत्न्त् प्र ोदमात। रक्ष्भी प्रात्प्त एवॊ व्मवसाम फाधाएॊ दूय कयने हेतु उत्तभ भानगमा हैं। ॐ गी् गूॊ गणऩतमे नभ् स्वाहा। इस भॊि के जाऩ से सभस्त प्रकाय के ववघ्नो एवॊ सॊकटो का का नाश होता हैं। ॐ श्री गॊ सौबाग्म गणऩत्मे वय वयद सवाजनॊ भें वशभानम स्वाहा। वववाह भें आने वारे दोषो को दूय कयने वारों को िैरोक्म भोहन गणेश भॊि का जऩ कयने से शीघ्र वववाह व अनुकू र जीवनसाथी की प्रात्प्त होती है। गणेश के कल्माणकायी भॊि गणेश भॊि कक प्रतत ददन एक भारा भॊिजाऩ अवश्म कये। ददमे गमे भॊिो भे से कोई बी एक भॊिका जाऩ कये। (०१) गॊ । (०२) ग्रॊ । (०३) ग्रौं । (०४) श्री गणेशाम नभ् । (०५) ॐ वयदाम नभ् । (०६) ॐ सुभॊगराम नभ् । (०७) ॐ ध ॊताभणमे नभ् । (०८) ॐ वक्रतुॊडाम हुभ् । (०९) ॐ नभो बगवते गजाननाम । (१०) ॐ गॊ गणऩतमे नभ् । (११) ॐ ॐ श्री गणेशाम नभ् । मह भॊि के जऩ से व्मत्क्त को जीवन भें फकसी बी प्रकाय का कष्ट नहीॊ येहता है।  आधथाक त्स्थतत भे सुधाय होता है।  एवॊ सवा प्रकायकी रयवि-ससवि प्राप्त होती है।
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    31 ससतम्फय -2019 ॐ वक्रतुण्डेक िष्टाम क्रीॊहीॊ श्रीॊ गॊ गणऩतमे वय वयद सवाजनॊ भॊ दशभानम स्वाहा । इस भॊिों के अततरयक्त गणऩतत अथवाशीषा, सॊकटनाशक, गणेश स्िोत, गणेशकव , सॊतान गणऩतत स्िोत, ऋणहताा गणऩतत स्िोत भमूयेश स्िोत, गणेश ारीसा का ऩाठ कयने से गणेश जी की शीघ्र कृ ऩा प्राप्त होती है। ॐ वय वयदाम ववजम गणऩतमे नभ्। इस भॊि के जाऩ से भुकदभे भें सपरता प्राप्त होती हैं। ॐ गॊ गणऩतमे सवाववघ्न हयाम सवााम सवागुयवे रम्फोदयाम ह्ीॊ गॊ नभ्। वाद-वववाद, कोटा क हयी भें ववजम प्रात्प्त, शिु बम से छु टकाया ऩाने हेतु उत्तभ। ॐ नभ् ससविववनामकाम सवाकामाकिे सवाववघ्न प्रशभनाम सवा याज्म वश्म कायनाम सवाजन सवा स्िी ऩुरुषाकषाणाम श्री ॐ स्वाहा। इस भॊि के जाऩ को मािा भें सपरता प्रात्प्त हेतु प्रमोग फकमा जाता हैं। ॐ हुॊ गॊ ग्रौं हरयिा गणऩत्मे वयद वयद सवाजन रृदमे स्तम्बम स्वाहा। मह हरयिा गणेश साधना का भत्कायी भॊि हैं। ॐ ग्रौं गॊ गणऩतमे नभ्। गृह करेश तनवायण एवॊ घय भें सुखशात्न्त फक प्रात्प्त हेतु। ॐ गॊ रक्ष्म्मौ आगच्छ आगच्छ पट्। इस भॊि के जाऩ से दरयिता का नाश होकय, धन प्रात्प्त के प्रफर मोग फनने रगते हैं। ॐ गणेश भहारक्ष्म्मै नभ्। व्माऩाय से सम्फत्न्धत फाधाएॊ एवॊ ऩयेशातनमाॊ तनवायण एवॊ व्माऩय भें तनयॊतय उन्नतत हेतु। ॐ गॊ योग भुक्तमे पट्। बमानक असाध्म योगों से ऩयेशानी होने ऩय, उध त ईराज कयाने ऩय बी राब प्राप्त नहीॊ होयहा हो, तो ऩूणा ववश्वास सें भॊि का जाऩ कयने से मा जानकाय व्मत्क्त से जाऩ कयवाने से धीये-धीये योगी को योग से छु टकाया सभरता हैं। ॐ अन्तरयऺाम स्वाहा। इस भॊि के जाऩ से भनोकाभना ऩूतता के अवसय प्राप्त होने रगते हैं। गॊ गणऩत्मे ऩुि वयदाम नभ्। इस भॊि के जाऩ से उत्तभ सॊतान फक प्रात्प्त होती हैं। ॐ वय वयदाम ववजम गणऩतमे नभ्। इस भॊि के जाऩ से भुकदभे भें सपरता प्राप्त होती हैं। ॐ श्री गणेश ऋण तछत्न्ध वयेण्म हुॊ नभ् पट । मह ऋण हताा भॊि हैं। इस भॊि का तनमसभत जाऩ कयना ादहए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है औय साधक का ऋण ुकता होता है। कहा जाता है फक त्जसके घय भें एक फाय बी इस भॊि का उच् ायण हो जाता है है उसके घय भें कबी बी ऋण मा दरयिता नहीॊ आ सकती। जऩ ववधध: प्रात: स्नानादद शुि होकय कु श मा ऊन के आसन ऩय ऩूवा फक औय भुख होकय फैठें। साभने गणॆशजी का ध ि, मॊि मा भूतता स्थात्प्त कयें फपय षोडशोऩ ाय मा ऩॊ ोऩ ाय से बगवान गजानन का ऩूजन कय प्रथभ ददन सॊकल्ऩ कयें। इसके फाद बगवान ग्णेशका एकाग्रध त्त से ध्मान कयें। नैवेद्य भें मदद सॊबव होतो फूॊदद मा फेसन के रड्डू का बोग रगामे नहीॊ तो गुड का बोग रगामे। साधक को गणेशजी के ध ि मा भूतता के सम्भुख शुि घी का दीऩक जराए। योज १०८ भारा का जाऩ कय ने से शीघ्र पर फक प्रात्प्त होती हैं। मदद एक ददन भें १०८ भारा सॊबव न हो तो ५४, २७,१८ मा ९ भाराओॊ का बी जाऩ फकमा जा सकता हैं। भॊि जाऩ कयने भें मदद आऩ असभथा हो, तो फकसी ब्राहभण को उध त दक्षऺणा देकय उनसे जाऩ कयवामा जा सकता हैं। ***
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    32 ससतम्फय -2019 गणेश ऩूजन से हो सकती हैं ग्रह ऩीडा दूय?  सॊकरन गुरुत्व कामाारम गणऩतत सभस्त रोकोंभें सवा प्रथभ ऩूजेजाने वारे एकभाि देवाता हैं। गणेश सभस्त गण के गणाध्मऺक होने के कायणा गणऩतत नाभ से बी जाने जाते हैं। भनुष्म को जीवन भें सभस्त प्रकाय फक रयवि- ससवि एवॊ सुखो फक प्रात्प्त एवॊ अऩनी सम्स्त आध्मात्त्भक-बौततक इच्छाओॊ फक ऩूतता हेतु गणेश जी फक ऩूजा-अ ाना एवॊ आयाधना अवश्म कयनी ादहमे। गणेशजी का ऩूजन अनाददकार से रा आ यहा हैं, इसके अततरयक्त ज्मोततष शास्त्रों के अनुशाय ग्रह ऩीडा दूय कयने हेतु बगवान गणेश कक ऩूजा-अचथना कयने से सभस्त ग्रहो के अशुब प्रबाव दूय होते हैं एवं शुब पर कक प्राश्प्त होती हैं। इस सरमे गणेश ऩूजाका अत्माधधक भहत्व हैं। वक्रतुण्ड भहाकाम सूमाकोदट सभप्रब्। तनववाघ्नॊ कु रू भे देव सवा कामेषु सवादा।। बगवान गणेश सूमा तेज के सभान तेजस्वी हैं। गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से सूमा के प्रततकू र प्रबाव का शभन होकय व्मत्क्त के तेज-भान-सम्भान भें वृवि होती हैं, उसका मश ायों औय फढता हैं। वऩता के सुख भें वृवि होकय व्मत्क्त का आध्मात्त्भक ऻान फढता हैं। बगवान गणेश ॊि के सभान शाॊतत एवॊ शीतरता के प्रततक हैं। गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से ॊि के प्रततकू र प्रबाव का नाश होकय व्मत्क्त को भानससक शाॊतत प्राप्त होती हैं। ॊि भाता का कायक ग्रह हैं इस सरमे गणेशजी के ऩूजन से भातृसुख भें वृवि होती हैं। बगवान गणेश भॊगर के सभान सशत्क्तशारी एवॊ फरशारी हैं। गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से भॊगर के अशुब प्रबाव दूय होते हैं औय व्मत्क्त फक फर-शत्क्त भें वृवि होती हैं। गणेशजी के ऩूजन से ऋण भुत्क्त सभरती हैं। व्मत्क्त के साहस, फर, ऩद औय प्रततष्ठा भें वृवि होती हैं त्जस कायण व्मत्क्त भें नेतृत्व कयने फक ववरऺण शत्क्त का ववकास होता हैं। बाई के सुख भें वृवि होती हैं। गणेशजी फुवि औय वववेक के अधधऩतत स्वासभ फुध ग्रह के अधधऩतत देव हैं। अत: ववद्या-फुवि प्रात्प्त के सरए गणेश जी की आयाधना अत्मॊत परदामी ससिो होती हैं। गणेशजी के ऩूजन से वाकशत्क्त औय तका शत्क्त भें वृवि होती हैं। फहन के सुख भें वृवि होती हैं। बगवान गणेश फृहस्ऩतत(गुरु) के सभान उदाय, ऻानी एवॊ फुवि कौशर भें तनऩूणा हैं। गणेशजी का ऩूजन-अ ान कयने से फृहस्ऩतत(गुरु) से सॊफॊधधत ऩीडा दूय होती हैं औय व्मत्क्त कें आध्मात्त्भक ऻान का ववकास होता हैं। व्मत्क्त के धन औय सॊऩत्त्त भें वृवि होती हैं। ऩतत के सुख भें वृवि होती हैं। बगवान गणेश धन, ऐश्वमा एवॊ सॊतान प्रदान कयने वारे शुक्र के अधधऩतत हैं। गणेशजी का ऩूजन कयने से शुक्र के अशुब प्रबाव का शभन होता हैं। व्मत्क्त को सभस्त बौततक सुख साधन भें वृवि होकय व्मत्क्त के सौन्दमा भें वृवि होती हैं। ऩतत के सुख भें वृवि होती हैं। बगवान गणेश सशव के ऩुि हैं। बगवान सशव शतन के गुरु हैं। गणेशजी का ऩूजन कयने से शतन से सॊफॊधधत ऩीडा दूय होती हैं। बगवान गणेश हाथी के भुख एवॊ ऩुरुष शयीय मुक्त होने से याहू व के तू के बी अधधऩतत देव हैं। गणेशजी का ऩूजन कयने से याहू व के तू से सॊफॊधधत ऩीडा दूय होती हैं। इससरमे नवग्रह फक शाॊतत भाि बगवान गणेश के स्भयण से ही हो जाती हैं। इसभें कोई सॊदेह नहीॊ हैं। बगवान गणेश भें ऩूणा श्रिा एवॊ ववश्वास फक आवश्मक्ता हैं। बगवान गणेश का ऩूजन अ ान कयने से भनुष्म का जीवन सभस्त सुखो से बय जाता है। जन्भ कुॊ डरी भें ाहें होई बी ग्रह अस्त हो मा नी हो अथवा ऩीडडत हो तो बगवान गणेश फक आयाधना से सबी ग्रहो के अशुब प्रबाव दूय होता हैं एवॊ शुब परो फक प्रात्प्त होती हैं।
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    33 ससतम्फय -2019 द्वादश महा यंत्र मॊि को अतत प्राध न एवॊ दुराब मॊिो के सॊकरन से हभाये वषो के अनुसॊधान द्वारा फनामा गमा हैं।  ऩयभ दुराब वशीकयण मॊि,  बाग्मोदम मॊि  भनोवाॊतछत कामा ससवि मॊि  याज्म फाधा तनवृत्त्त मॊि  गृहस्थ सुख मॊि  शीघ्र वववाह सॊऩन्न गौयी अनॊग मॊि  सहस्िाऺी रक्ष्भी आफि मॊि  आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि  ऩूणा ऩौरुष प्रात्प्त काभदेव मॊि  योग तनवृत्त्त मॊि  साधना ससवि मॊि  शिु दभन मॊि उऩयोक्त सबी मॊिो को द्वादश भहा मॊि के रुऩ भें शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि ऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत एवॊ ैतन्म मुक्त फकमे जाते हैं। त्जसे स्थाऩीत कय त्रफना फकसी ऩूजा अ ाना-ववधध ववधान ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं। GURUTVA KARYALAY Call us: + 8 8, + 8 8 8 Shop Online : www.gurutvakaryalay.com जफ गणेशजी फन गमे ज्मोततषी।  सॊकरन गुरुत्व कामाारम दहन्दु धभा भें सवाप्रथन ऩूजनीम बगवान गणेश ने एक फाय ज्मोततषी का रुऩ धायण कय सरमा। हराॊफक हभ बगवान गणेश के ववसबन्न रुऩों से ऩरयध त हैं, रेफकन उनके ज्मोततषीम रुऩ से कभ ही रोग ऩरयध त होंगे! ववद्वानों का कथन हैं की बगवान गणेश ज्मोततषी रुऩ ब्रहभा जी की सृत्ष्ट सॊ ारन भें सहामता हेतु धायण फकमा था। ऩौयाणणक कथा के अनुशाय एकफाय एक फाय याजा रयऩुञ्जम ने कदठन साधना से भन तथा इत्न्िमों को अऩने वश भें कय सरमा। याजा रयऩुञ्जम की साधना से सन्तुष्ट होकय ब्रहभा जी ने उन्हें सम्ऩूणा बूरोक ऩय प्रजाऩारन औय नागयाज वासुफक की कन्मा के साथ वववाह का आसशवााद ददमा। ब्रहभा जी की आऻा को सुनकय रयऩुञ्जम ने कहा, भैं आऩका मह आसशवााद स्वीकाय कयता हूॉ, रेफकन भेयी एक शता है फक जफ तक ऩृथ्वी ऩय भेया शासन यहेगा, तफ तक सबी देवता के वर स्वगा रोक भें ही तनवास कयेंगे। वे ऩृथ्वी ऩय नहीॊ आएॉगे। ब्रहभा जी ने तथास्तु कहा। अत्ग्न, सूमा, इन्ि इत्मादद सबी देवता ऩृथ्वी से अॊतध्माान हो गमे तो रयऩुञ्जम ने प्रजा के कल्माण हुते उन सफ देवताओॊ का रूऩ धायण कय सरमा। रयऩुञ्जम को देवताओॊ का रुऩ धायण फकमे हुवे देखकय सबी देवता फहुत क्रोधधत हो गमे। याजा रयऩुञ्जम के सभस्त ऩृथ्वी ऩय शासन कयने के कायण वह ददवोदास के नाभ से प्रससि हुए। रयऩुञ्जम ने काशी को अऩनी याजधानी फनामा। उनके शासन भें अऩयाध का कहीॊ नाभो-तनशान नहीॊ था। असुय बी भनुष्म के वेश भें आकय याजा की सेवा भें उऩत्स्थत हो जाते थे। सवाि धभा की प्रधानता थी। दुसयी तयप देवरोक भें, ऩृथ्वी ऩय अऩना आवास छू टने के कायण सभस्त देवता औय बगवान सशव अत्मधधक दु्खी थे। सबी इसी उरझन भे थे की फकसी तयह याजा रयऩुञ्जम के याज भें कभी ढूॉढ़कय उन्हें बूरोक के याज से हटामा जाम। इसी प्रमास भें देवताओॊ ने रयऩुञ्जम के याजकाज भें कई प्रकाय के ववघ्न उऩत्स्थत फकए, रेफकन कोई बी ववध्न-फाधा रयऩुञ्जम के साभने दटक नहीॊ ऩामी। रयऩुञ्जम को ऩथभ्रष्ट कयने के
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    34 ससतम्फय -2019 सरए बगवान सशव ने क्रभश: ६४ मोधगतनमों, सूमा, ब्रहभा, सशव गण आदद को काशी बेजा। इस प्रकाय क्रभश् कई देवता ऩृथ्वी ऩय आते गए औय एक-एक कय सबी महीॊ तनवास कयने रगे। तफ बगवान सशव ने अऩने ऩुि श्रीगणेश को काशी जाने के सरमे आदेश ददमा। बगवान श्रीगणेश ने काशी भें आऩना आवास एक भत्न्दय भें फनामा तथा वे स्वमॊ एक वृि ब्राहभण का वेश धायण कय काशी भें यहने रगे। काशी भें धीये-धीये रोग बगवान श्रीगणेश के ऩास अऩना बववष्म जानने के सरमे आने रगे। धीये-धीये उनकी कीतता तथा प्रससवि याजा रयऩुञ्जम तक ऩहूॉ ी तो उन्होंने वृि ज्मोततषी को अऩने महाॉ आभॊत्रित फकमा। वृि ज्मोततषी के आने ऩय रयऩुञ्जम ने उनका ववशेष आदय सत्काय फकमा औय तनवेदन फकमा फक, इस सभम भेया भन बौततक ऩदाथों एवॊ सबी कभों से दूय हो यहा है। इससरए आऩ अच्छी तयह गणना कय भेये बववष्म का वणान कीत्जए। तफ उन वृि ज्मोततषी ने रयऩुञ्जम से कहा फक, “आज से १८वें ददन उत्तय ददशा की ओय से एक तेजस्वी ब्राहभण का आगभन होगा औय वे ही तुम्हें उऩदेश देकय तुम्हाया बववष्म तनत्श् त कयेंगे। बगवान गणेश ने सम्ऩूणा काशी नगयी को अऩने वश भें कय सरमा। याजा रयऩुञ्जम से दूय यहकय बी बगवान गणेश ने उनके ध त्त को याज-काज से ववयक्त कय ददमा। १८वें ददन बगवान ववष्णु ने ब्राहभण का वेश धायण कयके अऩना नाभ ऩुण्मकीता, गरुड का नाभ ववनमकीता तथा रक्ष्भी का नाभ गोभोऺ प्रससि फकमा। वे स्वमॊ गुरु रूऩ भें तथा उन दोनों को ेरों के रूऩ भें रेकय काशी ऩहुॊ े। रयऩुञ्जम को सभा ाय सभरा तो गणेश जी की फात को स्भयण कयके उसने ऩुण्मकीता का स्वागत कयके उऩदेश सुना। ऩुण्मकीता ने दहन्दू धभा का खॊडन कयके फौि धभा का भॊडन फकमा। प्रजा सदहत याजा रयऩुञ्जम फौि धभा का ऩारन कयके अऩने धभा से ऩथभ्रष्ट हो गमा। ऩुण्मकीता ने याजा रयऩुञ्जम से कहा फक सात ददन उऩयाॊत उसे सशवरोक रे जाना ादहए। उससे ऩूवा सशवसरॊग की स्थाऩना बी आवश्मक है। श्रिारु याजा ने उसके कथन अनुसाय ददवोदासेश्वय सरॊग की स्थाऩना एवॊ ववधध-ऩूवाक ऩूजा-अ ाना कयवाई। गरुड ववष्णु जी के सॊदेशस्वरूऩ सभस्त घटना का ववस्तृत वणान कयने सशव के सम्भुख गमे। तदुऩयाॊत रयऩुञ्जम ने सशवरोक प्राप्त फकमा तथा देवतागण काशी भें अॊश रूऩ से यहने के ऩुन: अधधकायी फन गमे। ववद्वानों का कथन हैं की गणेश जी के ज्मोततषी रुऩ धायण कयने से ऩूवा सबी देवताओॊ के प्रमास तनष्पर हुवे थे। इस सरए मह गणेशजी के ज्मोततषी रुऩ का ही भत्काय था की याजा रयऩुञ्जम ने गणेश जी की फात ऩय ववश्वास कय ब्राहभण रुऩ धायी ववष्णु जी की फात ऩय ववश्वास फकमा औय उनके कहे अनुशाय कामा सॊऩन्न फकमा। *** Natural 2 Mukhi Rudraksha 1 Kg Seller Pack or 100 Pcs Seller Pack Size : Assorted 20 mm to 35 mm and above GURUTVA KARYALAY Call Us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 or Shop Online @ www.gurutvakaryalay.com
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    35 ससतम्फय -2019 सॊतान गोऩार मॊि उत्तभ सॊतान प्रात्प्त हेतु शास्िोक्त ववधध-ववधान से असबभॊत्रित सॊतान गोऩार मॊि का ऩूजन एवॊ अनुष्ठान ववशेष राबप्रद भाना गमा हैं। सॊतान प्रात्प्त मॊि एवॊ कव से सॊफॊधधत अधधक जानकायी हेतु गुरुत्व कामाथरम भें सॊऩका कय सकते हैं। Ask Now ॥गणेशबुजॊगभ्॥ यणत्ऺुिघण्टातननादासबयाभॊ रत्ताण्डवोद्दण्डवत्ऩद्मतारभ् । रसत्तुत्न्दराङ्गोऩरयव्मारहायॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ १ ॥ ध्वतनध्वॊसवीणारमोल्राससवक्िॊ स्पु यच्छु ण्डदण्डोल्रसद्फीजऩूयभ् । गरद्दऩासौगन्ध्मरोरासरभारॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ २ ॥ प्रकाशज्जऩायक्तयन्तप्रसून- प्रवारप्रबातारुणज्मोततयेकभ् । प्ररम्फोदयॊ वक्रतुण्डैकदन्तॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ ३ ॥ ववध िस्पु यित्नभाराफकयीटॊ फकयीटोल्रसच् न्ियेखाववबूषभ् । ववबूषैकबूशॊ बवध्वॊसहेतुॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे ॥ ४ ॥ उदञ् द्भुजावल्रयीदृश्मभूरो- च् रद्भ्रूरताववभ्रभभ्राजदऺभ् । भरुत्सुन्दयी ाभयै् सेव्मभानॊ गणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे॥ ५ ॥ स्पु यत्न्नष्ठु यारोरवऩङ्गाक्षऺतायॊ कृ ऩाकोभरोदायरीरावतायभ् । करात्रफन्दुगॊ गीमते मोधगवमै- गाणाधीशभीशानसूनुॊ तभीडे॥ ६ ॥ मभेकाऺयॊ तनभारॊ तनववाकल्ऩॊ गुणातीतभानन्दभाकायशून्मभ् । ऩयॊ ऩयभोंकायभान्भामगबं । वदत्न्त प्रगल्बॊ ऩुयाणॊ तभीडे ॥ ७ ॥ ध दानन्दसान्िाम शान्ताम तुभ्मॊ नभो ववश्वकिे हिे तुभ्मभ् । नभोऽनन्तरीराम कै वल्मबासे नभो ववश्वफीज प्रसीदेशसूनो ॥ ८ ॥ इभॊ सुस्तवॊ प्रातरुत्थाम बक्त्मा ऩठेद्यस्तु भत्मो रबेत्सवाकाभान ् । गणेशप्रसादेन ससध्मत्न्त वा ो गणेशे ववबौ दुराबॊ फकॊ प्रसन्ने ॥ ९ ॥ जन्भ कुॊ डरी भें ाहें होई बी ग्रह अस्त हो मा नी हो अथवा ऩीडडत हो तो बगवान गणेश फक आयाधना से सबी ग्रहो के अशुब प्रबाव दूय होता हैं एवॊ शुब परो फक प्रात्प्त होती हैं।
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    36 ससतम्फय -2019 वषा की ववसबन्न तुथॉ व्रत का भहत्व  सॊकरन गुरुत्व कामाारम श्रावण कृ ष्ण चतुथी संकष्टचतुथी व्रत ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय सॊकष्ट तुथॉ व्रत प्रत्मेक भासकी कृ ष्ण तुथॉ को फकमा जाता है। मदद तुथॉ दो ददन न्िोदमव्मावऩनी हो मा दोनों ददन न हो तो भातृवविा प्रशस्मते के अनुसाय ऩहरे ददन व्रत कयना ादहमे। व्रतधायी को ादहमे फक वह प्रात्स्िानाददके ऩश् ात ् व्रत कयनेका सॊकल्ऩ कयके ददनबय मथा सॊबव भौन यहे औय सामॊकारभें ऩुन्स्िान कयके रार वस्ि धायणकय ऋतुकार भें उऩरब्ध गन्ध ऩुष्ऩादद से गणेशजीका ऩूजन कये,(शास्रोक्त भत से गणेश ऩूजन भें तुरसी ऩि वत्जात हैं) उसके फाद न्िोदम होने ऩय न्िभा का ऩूजन कये औय अघ्मा से ऩूजन कय स्वमॊ बोजन कये तो व्रतधायी को सुख, सौबाग्म औय सम्ऩत्त्तकी प्रात्प्त होती है। संकष्टचतुथी की व्रत कथा: ऩौयाणणक कथा के अनुशाय सत्ममुग भें याजा मुवनाश्व के ऩास सम्ऩूणा शास्िों के ऻाता ब्रहभशभाा नाभक ब्राहभण थे, त्जनके सात ऩुि औय सात ऩुिवधुएॉ थीॊ। ब्रहभशभाा जफ वृि हुए, तफ फडी छ् फहुओॊकी अऩेऺा छोटी फहूने श्वशुयकी अधधक सेवा की। तफ उन्होंने सॊतुष्ट होकय ऩुिवधु से सॊकष्टहय तुथॉका व्रत कयवामा, त्जसके प्रबावसे वह भयणऩमान्त सफ प्रकायके सुख साधनोंसे सॊमुक्त यही। श्रावण शुक्र चतुथी दूवाथ गणऩतत व्रत ऩौयाणणक ग्रॊथ सौयऩुयाण के अनुशाय मह व्रत श्रावण शुक्र तुथॉ को फकमा जाता है। गणेश जी के ऩूजन हेतु इसभें भध्माहनव्मावऩनी तुथॉ री जाती है। मदद तुथॉ दो ददन हो मा दोनों ददन न हो तो भातृवविा प्रशस्मते के अनुसाय ऩूवावविा व्रत कयना ादहमे। तुथॉ ददन प्रात्स्िानादद कयके सुवणाके गणेशजी फनवावे जो एकदन्त, तुबूाज, गजानन औय स्वणा ससॊहासन ऩय ववयाजभान हों। इसके अततरयक्त सोनेकी दूवाा बी फनवावे। फपय सवातोबि फनाकय भण्डरऩय करश की स्थाऩन कयके उसभें स्वणाभम दूवाा रगाकय उसऩय उक्त गणेशजीका स्थाऩन कये। गणेश जी को यक्तवस्िाददसे ववबूवषत कये औय अनेक प्रकायके सुगात्न्धत ऩि, ऩुष्ऩादद अऩाण कय के ऩूजन कये। फेरऩि, अऩाभागा, शभीऩि, दूफ आदी अऩाण कयें। (शास्रोक्त भत से गणेश ऩूजन भें तुरसी ऩि वत्जात हैं)। स्तोि, आयती, स्तवन आदद का ववधधवत उच् ायण कय के गणेश जी की ऩरयक्रभा कय अऩयाधों के सरए गणेश्वय गणाध्मऺ गौयीऩुि गजानन। व्रतॊ सम्ऩूणााताॊ मातु त्वत्प्रसादाददबानन ॥ का उच् ायण कयते हुवे ऺभा-मा ना प्राथाना कयें। इस प्रकाय तीन मा ऩाॉ वषा तक व्रत ऩारन से सभस्त भनोकाभनाएॉ ऩूयी होती हैं। इस व्रत को कयने वारे भनुष्म की सॊऩूणा काभनाएॉ ऩूयी होती हैं औय अन्त भें उसे गणेशजी का ऩद प्राप्त हो जाता है। ववद्वानो का कथ हैं की िैरोक्म भें इसके सभान अन्म कोई व्रत नहीॊ है।
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    37 ससतम्फय -2019 अधधक भास की गणेश चतुथी व्मासजी के कथनानुशाय अधधक भास भें तुथॉ की गणेश्वयके नाभ से ऩूजा कयनी ादहए। ऩूजन हेतु षोडशोऩ ाय की ववधध उत्तभ होती है। चतुथी व्रत के राब: हय भहीने गणेश जी की प्रसन्नता के तनसभत्त व्रत कयें। इसके प्रबाव से ववद्याथॉ को ववद्या, धनाथॉ को धन प्रात्प्त एवॊ कु भायी कन्मा को सुशीर वय की प्रात्प्त होती है औय वह सौबाग्मवती यहकय दीघाकार तक ऩतत का सुखबोग कयती है। ववधवा द्वाया व्रत कयने ऩय अगरे जन्भ भें वह सधवा होती हैं एवॊ ऐश्वमा-शासरनी फन कय ऩुि-ऩौिादद का सुख बोगती हुई अॊत भें भोऺ ऩाती है। ऩुिेच्छु को ऩुि राब होता एवॊ योगी का योग तनवायण होता है। बमबीत व्मत्क्त बम यदहत होता एवॊ फॊधन भें ऩडा हुआ फॊधन भुक्त हो जाता है। बाद्रऩद शुक्र चतुथी सशवाचतुथीव्रत: ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय बािऩद शुक्र तुथॉकी 'सशवा' सॊऻा है। इसभें स्नान, दान, जऩ औय उऩवास कयनेसे सौगुना प्राप्त पर होता है। त्स्िमाॉ मदद इस ददन गुड, घी, रवण औय अऩूऩाददसे अऩने सास श्वशुय मा भाॉ आददको तृप्त कये तो उनके सौबाग्मकी वृवि होती है। श्री गणेश की प्राकट्म ततधथ होने के कायण बािऩद शुक्र तुथॉ बगवान गुणेश की वयदामक ततधथ अत्माधधक प्रख्मात हुई। उस ददन भध्माहन कार भें बगवान गणेश की प्रततभा का श्रिा-बत्क्तऩूणा ऩूजन कय गणेश जी के स्भयण, ध ॊतन एवॊ नाभ-जऩ का अद्द्भुत भाहात्म्म है। शास्िों भें उल्रेख हैं की गणेश तुथॉ का ऩुण्मभम एवॊ अत्मॊत परप्रदातमनी है। स्वमॊ ब्रहभा जी ने अऩने भुखायववन्द से इस ततधथ का भाहत्म फढाते हुवे कहा है फक इस तुथॉ व्रत का तनरूऩण एवॊ भाहात्म्म की सॊऩूणा भदहभा वखानना शक्म नहीॊ। बाद्रऩद कृ ष्ण चतुथी फहुरा चतुथी व्रत बािऩद भास के कृ ष्णऩऺ की तुथॉ फहुरा ौथ मा तुथॉ फहुरा के नाभ से बी प्रससि है। दहन्दु भान्मताओॊ के अनुशाय बािऩद भास की कृ ष्ण तुथॉ के ददन ऩुिवती त्स्िमाॊ अऩने ऩुिों की कु शरता एवॊ भॊगरकाभना के तनसभत्त फहुरा व्रत यखती हैं। रेफकन कु छ ववद्वानो का भत हैं की फहुरा तुथॉ सही भामनों भें गो-भाता की ऩूजा एवॊ व न ऩारन की प्रेयणा देने वारा ऩवा है। त्जस प्रकाय भाॊ की तयह गो-भाता अऩना दूध वऩराकय हभ सफको ऩारती है, इस सरए हभें अत:भन भें उनके प्रतत कृ तऻता का बाव यखकय ही मह व्रत कयना ादहए। मह व्रत सॊतान सुख का देनेवारा तथा ऐश्वमा को फढाने वारा है। ऩायॊऩरयक रूऩ से इस ददन व्रत को कयने वारी स्िीमाॊ इस ऩवा के ददन गाम का दूध एवॊ उससे तनसभात कोई ऩदाथा नहीॊ खाती हैं। क्मोकी, इस ततधथ भें गाम के दूध ऩय के वर उसके फछडे का अधधकाय भाना जाता है। ददन बय उऩवास यखने के फाद सामॊकार फछडे सदहत गौ की ऩूजा की जाती हैं। कु ल्हड भें खाने की जो साभग्री को यखकय गाम को बोग रगामा जाता है, फाद भें स्िीमाॊ उसी को प्रसाद के रूऩ भें ग्रहण कयती है। कई जगम इस ददन जौ के सत्तू तथा गुड का बोग बी रगाकय खामा जाता है। फहुरा तुथॉ के व्रत से मह प्रेयणा सभरती है हभें हभेंशा सत्म के साथ-साथ अऩने कताव्म एवॊ व नों का सदा ऩारन होना ादहए। ववद्वानो के भतानुशाय बािऩद कृ ष्ण तुथॉ को फहुरासदहत गणेश की गॊध, ऩुष्ऩ, भारा औय दूवाा आदद के द्वाया ववधध-ववधान से ऩूजा कय ऩरयक्रभा कयनी ादहए। साभथ्मा के अनुसाय दान-ऩुण्म कयें। दान कयने की त्स्थतत न हो तो फहुरा गो भाता फक प्रततभा को
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    38 ससतम्फय -2019 प्रणाभ कय उसका ववसजान कय दें। इस प्रकाय ऩाॉ , दस मा सोरह वषों तक इस व्रत का ऩारन कयके उद्याऩन कयें। उस सभम दूध देने वारी स्वस्थ गाम का दान कयना ादहए। आश्ववन कृ ष्ण चतुथी आत्श्वन कृ ष्ण तुथॉको व्रत हो औय उसी ददन भाता - वऩता आददका श्राि बी कयना हो तो ववद्वानो के भतानुशाय ददनभें श्राि कयके ब्राहभणोंको बोजन कया दे औय अऩने दहस्सेके बोजनको सूॉघकय गौ को णखरा दे। यात्रिभें न्िोदमके फाद स्वमॊ बोजन कये। व्रत कथा: ऩौयाणणक कथा के अनुशाय एक फाय फाणासुयकी ऩुिी ऊषाको स्वप्न भें कृ ष्ण ऩौि अतनरुिका दशान हुआ। ऊषाको उनके प्रत्मऺ दशानकी असबराषा हुई औय उसने ध िरेखाके द्वाया अतनरुिको अऩने घय फुरा सरमा। इससे अतनरुिकी भाताको फडा कष्ट हुआ। इस सॊकटको टारनेके सरमे भाताने व्रत फकमा, तफ इस व्रतके प्रबावसे ऊषाके महाॉ तछऩे हुए अतनरुिका ऩता रग गमा औय ऊषा तथा अतनरुि द्वायका आ गमे। आश्ववन शुक्र चतुथी आत्श्वन शुक्र तुथॉ नवयाि भें ऩडने के कायण भाॊ बगवती के ऩूजन के साथ यािी जागयण कयने का ववशेष भहत्व हैं एवॊ इस ददन गणेश जी का ऩुरुषसूक्त द्वाया षोडशोऩ ाय ऩूजन कयके बत्क्तऩूवाक ऩूजा का ववशेष भाहात्म्म है। भागथशीषथ शुक्र चतुथी कृ च्छ्र चतुथी व्रत: भागाशीषा शुक्र तुथॉ की कृ च्र तुथॉ कहा जाता है। ऩौयाणणक ग्रॊथ स्कन्दऩुयाण भें उल्रेख हैं की कृ च्र तुथॉ व्रत भागाशीषा शुक्र तुथॉसे आयम्ब होकय प्रत्मेक तुथॉको वषाऩमान्त कयके फपय दूसये, तीसये औय ौथे वषा भें कयनेसे ाय वषाभें ऩूणा होता है। कृ च्र तुथॉ व्रत की ववधध मह है फक ऩहरे वषाभें (भागाशीषा शुक्र तुथॉ को) प्रात्स्िानके ऩश् ात ् व्रतका तनमभ ग्रहण कयके गणेशजीका मथाववधध ऩूजन कये। भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि "श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण- प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके दशान भाि से अन-धगनत राब एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अद्ववतीम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त होती है। गुरुत्व कामाथरम भे "श्री मॊि" 12 ग्राभ से 2250 Gram (2.25Kg) तक फक साइज भे उप्रब्ध है . भूल्म:- प्रतत ग्राभ Rs. 28 से Rs.100 >>Order Now GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Visit Us: www.gurutvakaryalay.com www.gurutvajyotish.com and gurutvakaryalay.blogspot.com
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    39 ससतम्फय -2019 नैवेद्यभें रड्डू ततरकु टा, जौका भॉडका औय सुहारी अऩाण कयके इस भॊि का उच् ायण कयें.. त्वत्प्रसादेन देवेश व्रतॊ वषा तुष्टमभ्। तनववाघ्रेन तु भे मातु प्रभाणॊ भूषकध्वज ॥ सॊसायाणावदुस्तायॊ सवाववघ्रसभाकु रभ्। तस्भाद् दीनॊ जगन्नाथ िादह भाॊ गणनामक ॥ प्राथाना कयके एक फाय ऩरयसभत बोजन कये। इस प्रकाय प्रत्मेक तुथॉको कयता यहकय दूसये वषा उसी भागाशीषा शुक्र तुथॉको ऩुन् मथाऩूवा तनमभ ग्रहण, व्रत औय ऩूजा कयके पक्त ( यात्रिभें एक फाय ) बोजन कये। इसी प्रकाय प्रत्मेक तुथॉको वषाऩमान्त कयके तीसये वषा फपय भागाशीषा शुक्र तुथॉको व्रत तनमभ औय ऩूजा कयके अमाध त ( अथाात त्रफना भाॉगे जो कु छ त्जतना सभरे उसीका एक फाय ) बोजन कये। इस प्रकाय एक वषा तक प्रत्मेक तुथॉको व्रत कयके ौथे वषाभें उसी भागाशीषा शुक्र तुथॉको तनमभ ग्रहण, व्रत सॊकल्ऩ औय ऩूजनादद कयके तनयाहाय उऩवास कये। इस प्रकाय वषाऩमान्त प्रत्मेक तुथॉको व्रत कयके ौथा वषा सभाप्त होनेऩय सपे द कभरऩय ताॉफेका करश स्थाऩन कयके सुवणाके गणेशजीका ऩूजन कये। सवत्सा गौका दान कये, हवन कये औय ौफीस सऩत्नीक ब्राहभणोंको बोजन कयवाकय वस्िाबूषणादद देकय स्वमॊ बोजन कये तो इस व्रतके कयनेसे सफ प्रकायके ववघ्न दूय हो जाते हैं औय व्रती को सफ प्रकायकी सम्ऩत्त्त प्राप्त होती है। वयचतुथी व्रत: ऩौयाणणक ग्रॊथ स्कन्दऩुयाण भें उल्रेख हैं की मह व्रत कृ च्र तुथोके सभान मह व्रत बी भागाशीषा शुक्र तुथॉसे आयम्ब होकय ाय वषाभें ऩूणा होता है। प्रथभ वषाभें प्रत्मेक तुथॉको ददनािाके सभम एक फाय अरोन ( त्रफना नभक का ) बोजन, दूसये वषाभें नक्त ( यात्रि ) बोजन, तीसयेभें अमाध त बोजन औय ौथेभें उऩवास कयके मथाऩूवा सभाप्त कये। मह व्रत सफ प्रकायकी अथाससवि देने वारा है। ऩरयसभत बोजनके ववषमभें कहीॊ ऩय 32 ग्रास औय फकसीने 29 ग्रास फतरामे हैं। स्भृत्मन्तय भें उल्रेख हैं अष्टौ ग्रासा भुनेबाक्ष्मा् षोडशायण्मवाससन्। द्वात्रिॊशद् गृहस्थमा ऩरयसभतॊ ब्रहभ ारयण् ॥ अथाथत: भुतनको आठ, वनवाससमोंको सोरह, गृहस्थोंको फत्तीस औय ब्रहभ ारयमोंको अऩरयसभत ( मथारुध ) ग्रास बोजन कयनेको कहा गमा है। ग्रासका प्रभाण है एक आॉवरेके फयाफय अथवा त्जतना सुगभतासे भुॉहभें जा सके , उतना एक ग्रास होता है। न्मून बोजनके सरमे ( माऻवल्क्मने ) तीन ग्रास तनमत फकमे हैं। भागथशीषथ कृ ष्ण चतुथी धचंताभणी चतुथी व्रत: भागाशीषा कृ ष्ण तुथॉ को ध ॊताभणी तुथॉ के नाभ से जाना जाता हैं। ववद्वानो के कथनानुशाय इस ददन ऩूया ददन के वर ऩानी वऩकय उऩवास फकमा जाता हैं। यािी के सभम न्िोदम के फाद करश ऩय श्रीध ॊताभणी गणेश की स्थाऩना कय उसका ववधध-वत ऩूजन कयने का ववधान हैं। नैवेद्य भें भोदक का बोग रगामे। ऩौष कृ ष्ण चतुथी सॊकष्ट तुथॉ व्रत: ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय ऩौष कृ ष्ण तुथॉ को गणऩतत स्भयणऩूवाक प्रात्स्िानादद तनत्मकभा कयनेके ऩश् ात ् सॊकल्ऩ कयके ददनबय भौन यहे। यात्रिभें ऩुन् स्िान कयके गणऩतत - ऩूजनके ऩश् ात ् न्िोदमके फाद न्िभाका ऩूजन कयके अघ्मा दे, फपय बोजन कयने का ववधान फतामा गमा हैं। ऩौष शुक्र चतुथी ऩौष शुक्र व्रत ववधध ऩूवाक कयने वारे भनुष्म को धन-सॊऩत्त्त का अबाव नहीॊ यहता। उसी सबी प्रकाय के सुख सौबाग्म की प्रात्प्त होती हैं।
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    40 ससतम्फय -2019 भाघ शुक्र चतुथी शाश्न्तचतुथी व्रत: ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय भाघ शुक्र तुथॉको गणेशजीका ऩूजन कयके घीभें सने हुए गुडके ऩूआ औय रवणके ऩदाथा अऩाण कये औय गुरुदेवकी ऩूजा कयके उनको गुड, रवण औय घी दे तो इस व्रतसे सफ प्रकायकी त्स्थय शात्न्त प्राप्त होती है। अंगायकचतुथी व्रत: ऩौयाणणक ग्रॊथ भत्स्मऩुयाण के अनुशाय मदद भाघ शुक्र तुथॉको भॊगरवाय हो तो उस ददन प्रात्स्िानके ऩहरे शयीयभें सभट्टी रगाकय शुि स्िान कये, रार धोती ऩहने, वस्िाअबूषण आदद से सुसत्ज्जत धायण कये औय उत्तयासबभुख फैठकय 'अत्ग्नभूिाा' भन्त्नका जऩ कये। फपय बूसभको गोफयसे रीऩकय अङ्गयकाम बौभाम नभ् का जऩ कये। फपय उसऩय रार न्दनका अष्टदर फनामे तथा उसकी ऩूवाादद ायों ददशाओॊभें बक्ष्म बोजन औय ावरोंसे बये हुए ाय कयवे यख कय गन्धाऺताददसे ऩूजन कयके । दान भें कवऩरा गौ औय रार यॊगका अतीव सौम्म धुयॊधय फैर देना औय साथभें शय्मा देना सहस्िगुण पर देने वारा होता है। सुखचतुथी व्रत: ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय तुथॉ तु तुथॉ तु मदाङ्गायकसॊमुता। तुथ्मां तु तुथ्मां तु ववधानॊ श्रृणु मादृशभ् ॥ भाघ शुक्र तुथॉको मदद भॊगरवाय हो तो रार वणाके गन्ध, अऺत औय ऩुष्ऩ, नैवेद्यसे गणेशजीका ऩूजन कयके उऩवास कये। इस प्रकाय ाय- ाय तुथॉ ( भाघ, वैशाख, बािऩद औय ऩौष ) का एक वषा व्रत कये तो सफ प्रकायके सुख प्राप्त होते हैं। प्रत्मेक तुथॉको बौभवाय होना आवश्मक है। गणेशव्रत ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मऩुयाण के अनुशाय भाघ शुक्र ऩूवावविा तुथॉको प्रात् स्िानादद कयके सॊकल्ऩ कयके वेदीऩय रार वस्ि त्रफछामे। रार अऺतोंका अष्टदर फनाकय उसऩय ससन्दूय ध ात गणेशजीको स्थावऩत कये। स्वमॊ रार धोती ऩहनकय रार वणाके पर ऩुष्ऩाददसे षोडशोऩ ाय ऩूजन कये। नैवेद्यभें (सबगोकय छीरी हुई ) हल्दी, गुड, शक्कय औय घी इनको सभराकय बोग रगामे औय नक्तव्रत (यात्रिभें एक फाय बोजन कये तो सम्ऩूणा अबीष्ट ससि होते हैं। भाघ कृ ष्ण चतुथी वक्रतुण्ड तुथॉ ऩौयाणणक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय भाघ कृ ष्ण न्िोदमव्मावऩनी तुथॉको वक्रतुण्ड तुथॉ कहते हैं। इस व्रतका आयम्ब सॊकल्ऩ कयके कये। सामॊकारभें गणेशजीका औय न्िोदमके सभम न्िका ऩूजन कयके अघ्मा दे। इस व्रतको भाघसे आयम्ब कयके हय भहीनेभें कये तो सॊकटका नाश हो जाता है। पाल्गुन शुक्र चतुथी ढुत्ण्ढयाज व्रत: पाल्गुन भास की तुथॉ को भॊगरदामक ढुत्ण्ढयाज व्रत फकमा जाता है। तुथॉ के ददन व्रत- उऩवास के साथ गणेशजी की सोने की भूतता फनवाकय उसकी श्रिा-बत्क्तऩूवाक ऩूजा की जातत हैं। गणेशजी को प्रसन्न कयने के सरए उस ददन ततर से ही दान, होभ, ऩूजन आदद फकमे जाते हैं। उस ददन ततर के ऩीठे से ब्राहभणों को बोजन कयाकय व्रती स्वमॊ बी बोजन कयते हैं। इस व्रत के प्रबाव से सभस्त सम्ऩदाओॊ की वृवि होती है औय भनुष्म गणेशजी की कृ ऩा से ही ससवि प्राप्त कय रेता है। भत्स्मऩुयाण के अनुसाय पाल्गुन शुक्र तुथॉ को भनोयथ तुथॉ कहते हैं। ऩूजनोऩयान्त नक्तव्रत का ववधान है। इस प्रकाय फायहों भहीने की प्रत्मेक शुक्र तुथॉ को व्रत कयते हुए वषाबय के फाद उस स्वणाभूतता का दान कयने से भनोयथ ससि होते हैं। अत्ग्नऩुयाण भें इसको अववघ्ना तुथॉ कहाॊ गमा है। पाल्गुन कृ ष्ण चतुथी पाल्गुन भास की कृ ष्ण तुथॉ को ततर तुथॉ बी कहाॊ जाता हैं
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    41 ससतम्फय -2019 चैत्र कृ ष्ण चतुथी ैि भास की तुथॉ को वासुदेवस्वरूऩ बगवान श्रीगणेश का ववधधऩूवाक ऩूजन कय ब्राहभण को दक्षऺणा के रुऩ भें सुवणा देने ऩय भनुष्म को सॊऩूणा देवताओॊ से वॊददत हो जाता हैं औय वह श्री ववष्णु रोक को प्राप्त कयता है। कथा: ऩौयाणणक कथा के अनुशाय प्रा ीन कारभें भमूयध्वज नाभका याजा फडा प्रबावशारी औय धभाऻ था। एक फाय उसका ऩुि कहीॊ खो गमा औय फहुत अनुसॊधान कयनेऩय बी न सभरा। तफ भत्न्िऩुिकी धभावती स्िीके अनुयोधसे याजाके सम्ऩूणा ऩरयवाने ैि कृ ष्ण तुथॉका फडे सभायोहसे मथाववधध व्रत फकमा। तफ बगवान गणेशजीकी कृ ऩासे याजऩुि आ गमा औय उसने भमूयध्वजकी आजीवन सेवा की। वैशाख कृ ष्ण चतुथी वैशाख भास की तुथॉ को सॊकष्टी गणेश का ऩूजा कय ब्राहभणों को शॊख का दान कयना ादहए। इसके प्रबाव से भनुष्म सभस्त रोक भें कल्ऩों तक सुख प्राप्त कयता है। वैशाख शुक्र चतुथी वैशाख भास की कृ ष्ण तुथॉ को श्रीकृ ष्णवऩॊगाऺ गणऩतत का ऩूजन फकमा जाता हैं। ज्मेष्ठ कृ ष्ण चतुथी संकष्टचतुथीव्रत: ऩौयाणुक ग्रॊथ बववष्मोत्तय के अनुशाय ज्मेष्ठ भास के कृ ष्ण ऩऺ की तुथॉको, प्रात्स्िानादद तनत्मकभा कयके व्रतके सॊकल्ऩसे ददनबय भौन यहे। सामॊकारभें ऩुन् स्िान कयके गणेशजीका औय न्िोदम होने ऩय न्िभा का ऩूजन कये तथा शॊखभें दूध, दूवाा, सुऩायी आदद से ववधधवत ऩूजन कयें। वामन दान कयके बोजन कये। ज्मेष्ठ शुक्र चतुथी ज्मेष्ठ भास की शुक्र ऩऺ की तुथॉ को प्रद्मरूऩी गणेश की ऩूजा कय ब्राहभणों को पर-भूर का दान कयने से व्रतधायी को स्वगारोक प्राप्त होते हैं। आषाढ़ चतुथी आषाढ़ भास की तुथॉ को अतनरुिस्वरूऩ गणेश का ववधधऩूवाक ऩूजन कयके सॊन्माससमों को तूॊफी का ऩाि दान कयना ादहए। इस व्रत को कयने वारा भनुष्म को भनोवाॊतछत पर प्राप्त होते है। तुथॉ के ददन भनुष्म श्रिा-बत्क्तऩूवाक भॊगरभूतता गणेश का ववधधवत ऩूजन कय एसा उराब पर प्राप्त कय रेता है, जो देव सभुदाम के सरए बी अप्राप्त्म है। नोट: आऩकी अनुकू रता हेतु गणेश ऩूजन की सयर ववधध इस अॊक भें उऩरब्ध कयवाई गई हैं। कृ प्मा उस ववधध से ऩूजन कयने से ऩूवा फकसी जानकाय गुरु मा ववद्वान से सराह ववभशा अवश्म कयरें। क्मोफक प्राॊततम व ऺेत्रिम ऩूजन ऩितत भें सबन्नता होने के कायण ऩूजन ववधध भें सबन्नता सॊबव हैं। उऩरब्ध कयवाई गई ऩूजन ऩितत को सयर से सयर फनाकय के वर आऩके भगादशान के उद्देश्म से प्रदान की गई हैं। ववशेष सुझाव: जो रोग सुवणा भूतता फनवाने मा दान कयने की ऺभता न हो तो वणाक (अथाात हल्दी ूणा) से ही गणऩतत की प्रततभा फना कय ऩूजन कय सकते हैं मा दान कय सकते हैं। Seven Chakra Stone Chips ORGONE PYRAMID Best For Remove Negativity & Increase Positive Energy
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    42 ससतम्फय -2019 ॥ सॊकष्टहयणॊ गणेशाष्टकभ् ॥ ॐ अस्म श्री सॊकष्टहयणस्तोिभन्िस्म श्रीभहागणऩततदेवता, सॊकष्टहयणाथा जऩे ववतनमोग्। ॐ ॐ ॐ कायरूऩभ् त्र्महसभतत ऩयभ् मत्स्वरूऩभ् तुयीमभ् िैगुण्मातीतनीरॊ करमतत भनसस्तेज-ससन्दूय-भूतताभ्। मोगीन्िैब्राहभयन््ै् सकर-गुणभमॊ श्रीहयेन्िेणसॊगॊ गॊ गॊ गॊ गॊ गणेशॊ गजभुखभसबतो व्माऩकॊ ध न्तमत्न्त ॥१॥ वॊ वॊ वॊ ववघ्नयाजॊ बजतत तनजबुजे दक्षऺणे न्मस्तशुण्डॊ क्रॊ क्रॊ क्रॊ क्रोधभुिा-दसरत-रयऩुफरॊ कल्ऩवृऺस्म भूरे। दॊ दॊ दॊ दन्तभेकॊ दधतत भुतनभुखॊ काभधेन्वा तनषेव्मभ ्धॊ धॊ धॊ धायमन्तॊ धनदभतततघमॊ ससवि-फुवि-द्वद्वतीमभ् ॥२॥ तुॊ तुॊ तुॊ तुॊगरूऩॊ गगनऩधथ गतॊ व्माप्नुवन्तॊ ददगन्तान ् क्रीॊ क्रीॊ क्रीॊकायनाथॊ गसरतभदसभरल्रोर-भत्तासरभारभ्। ह्ीॊ ह्ीॊ ह्ीॊकायवऩॊगॊ सकरभुतनवय-ध्मेमभुण्डॊ शुण्डॊ श्रीॊ श्रीॊ श्रीॊ श्रीॊ श्रमन्तॊ तनणखर- तनधधकु रॊ नौसभ हेयम्फत्रफम्फभ् ॥३॥ रौं रौं रौंकायभाद्मॊ प्रणवसभव ऩदॊ भन्िभुक्तावरीनाभ् शुिॊ ववघ्नेशफीजॊ शसशकयसदृशॊ मोधगनाॊ ध्मानगम्मभ्। डॊ डॊ डॊ डाभरूऩॊ दसरतबवबमॊ सूमाकोदटप्रकाशभ् मॊ मॊ मॊ मऻनाथॊ जऩतत भुतनवयो फाहमभभ्मन्तयॊ ॥४॥ हुॊ हुॊ हुॊ हेभवणं श्रुतत-गणणतगुणॊ शूऩाकणॊ कृ ऩारुॊ ध्मेमॊ सूमास्म त्रफम्फॊ हमुयसस ववरसत ् सऩामऻोऩवीतभ्। स्वाहाहुॊपट् नभोन्तैष्ठ-ठठठ-सदहतै् ऩल्रवै् सेव्मभानभ् भन्िाणाॊ सप्तकोदट-प्रगुणणत-भदहभाधायभोशॊ प्रऩद्मे ॥५॥ ऩूवं ऩीठॊ त्रिकोणॊ तदुऩरय रुध यॊ षट्कऩिॊ ऩवविभ् मस्मोध्वं शुियेखा वसुदरकभरॊ वो स्वतेजश् तुस्रभ्। भध्मे हुॊकायफीजॊ तदनु बगवत् स्वाॊगषट्कॊ षडस्रे अष्टौ शक्तीश् ससिीफाहुरगणऩततववाष्टयश् ाष्टकॊ ॥६॥ धभााद्यष्टौ प्रससिा दशददसश ववददता वा ध्वजाल्म् कऩारॊ तस्म ऺेिाददनाथॊ भुतनकु रभणखरॊ भन्िभुिाभहेशभ्। एवॊ मो बत्क्तमुक्तो जऩतत गणऩततॊ ऩुष्ऩ-धूऩा-ऺताद्मैनैवेद्मैभोदकानाॊ स्तुततमुत- ववरसद्-गीतवाददि-नादै् ॥७॥ याजानस्तस्म बृत्मा इव मुवततकु रॊ दासवत ्सवादास्ते रक्ष्भी् सवांगमुक्ता श्रमतत सदनॊ फकॊ कया् सवारोका्। ऩुिा् ऩुत्र्म् ऩवविा यणबूवव ववजमी द्मूतवादेवऩ वीयो मस्मेशो ववघ्नयाजो तनवसतत रृदमे बत्क्तबाग्मस्म रुि् ॥८॥ ॥ इतत श्री सॊकष्टहयणॊ गणेशाष्टकॊ सम्ऩूणाभ् ॥ ॥गणेश ऩॊच् यत्नभ्॥ भुदा कयात्तभोदकभ् सदा ववभुत्क्तसाधकभ् कराधयावतम्सकभ् ववराससरोकयऺकभ्। अनामकै क नामकभ् ववनासशतेबदैत्मकभ् नताशुबाशुनाशकभ् नभासभ तभ् ववनामकभ ् ॥१॥ नतेतयाततबीकयभ् नवोददताका बास्वयभ् नभत्सुयारयतनजायभ् नताधधकाऩदुद्वयभ्। सुयेश्वयभ् तनधीश्वयभ ् गजेश्वयभ ् गणेश्वयभ् भहेश्वयभ् तभाश्रमे ऩयात्ऩयभ् तनयन्तयभ् ॥२॥ सभस्तरोकशङ्कयभ् तनयस्तदैत्मकु ञ्जयभ् दयेतयोदयभ् वयभ् वयेबवक्िभऺयभ्। कृ ऩाकयभ् ऺभाकयभ् भुदाकयभ ् मशस्कयभ ् भनस्कयभ्नभस्कृ ताॊ नभस्कयोसभ बास्वयभ ्॥३॥ अफकञ् नातताभाजानॊ ध यन्तनोत्क्त बाजनभ् ऩुयारयऩूवानन्दनभ् सुयारयगवा वाणभ्। प्रऩञ् नाशबीषणभ् धनञ्जमादद बूषणभ ् कऩोरदानवायणभ् बजे ऩुयाणवायणभ ् ॥४॥ तनतान्तकान्त दन्तकात्न्त भन्तकान्तकात्भजभ् अध न्त्मरूऩ भन्तहीन भन्तयाम कृ न्तनभ्। रृदन्तये तनयन्तयभ् वसन्तभेव मोधगनाभ ् तभेकदन्तभेव तभ ् ववध न्तमासभ सन्ततभ् ॥५॥ भहागणेश ऩॊच् यत्नभादयेण मोन्वहभ् प्रजल्ऩतत प्रबातके रृददस्भयन्गणेश्वयभ्। अयोगताभदोषताॊ सुसादहतीॊ सुऩुिताॊ सभादहतामुयष्टबूततभभ्मुऩैतत सोध यात ् ॥६॥ ॥इतत श्री गणेश ऩॊच् यत्नभ् सम्ऩुणा॥
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    43 ससतम्फय -2019 एकदन्त शयणागतत स्तोिभ ् एकदन्तभ ् शयणभ ् व्रजाभ: देवषथम ऊचु: सदात्भरूऩॊ सकराददबूतभभातमनॊ सोऽहभध न्त्मफोधभ ्। अनाददभध्मान्तववहीनभेकॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ अनन्तध िूऩभमॊ गणेशभबेदबेदाददववहीनभाद्यभ ्। रृदद प्रकाशस्म धयॊ स्वधीस्थॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ सभाधधसॊस्थॊ रृदद मोधगनाॊ मॊ प्रकाशरूऩेण ववबातभेतभ ्। सदा तनयारम्फसभाधधगम्मॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ स्वत्रफम्फबावेन ववरासमुक्ताॊ प्रत्मऺभामाॊ ववववधस्वरूऩाभ ्। स्ववीमाकॊ ति ददातत मो वै तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ त्वदीमवीमेण सभथाबूतस्वभाममा सॊयध तॊ ववश्वभ ्। तुयीमकॊ हमात्भप्रतीततसॊऻॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ त्वदीमसत्ताधयभेकदन्तॊ गुणेश्वयॊ मॊ गुणफोधधतायभ ्। बजन्तभत्मन्तभजॊ त्रिसॊस्थॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ ततस्त्वमा प्रेरयतनादके न सुषुत्प्तसॊऻॊ यध तॊ जगद् वै। सभानरूऩॊ हमुबमिसॊस्थॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ तदेव ववश्वॊ कृ ऩमा प्रबूतॊ द्वद्वबावभादौ तभसा ववबान्तभ ्। अनेकरूऩॊ तथैकबूतॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ ततस्त्वमा प्रेरयतके न सृष्टॊ फबूव सूक्ष्भॊ जगदेकसॊस्थभ ्। सुसात्त्त ्वकॊ स्वऩन्भनन्तभाद्मॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ तदेव स्वऩन् तऩसा गणेश सुससिरूऩॊ ववववधॊ फबूव। सदैकरूऩॊ कृ ऩमा तेऽद्य तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ त्वदाऻमा तेन त्वमा रृददस्थॊ तथा सुसृष्टॊ जगदॊशरूऩभ ्। ववसबन्नजाग्रन्भमभप्रभेमॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ तदेव जाग्रिजसा ववबातॊ ववरोफकतॊ त्वत्कृ ऩमा स्भृतेन। फबूव सबन्न सदैकरूऩॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ सदेव सृत्ष्टप्रकृ ततस्वबावात्तदन्तये त्वॊ ववबासस तनत्मभ ्। धधम: प्रदाता गणनाथ एकस्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ त्वदाऻमा बात्न्त ग्रहाश् सवे प्रकाशरूऩाणण ववबात्न्त खे वै। भ्रभत्न्त तनत्मॊ स्वववहायकामाास्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ त्वदाऻमा सृत्ष्टकयो ववधाता त्वदाऻमा ऩारक एकववष्णु:। त्वदाऻमा सॊहयको हयोऽवऩ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा बूसभजरेऽि सॊस्थे मदाऻमाऩ: प्रवहत्न्त नद्य:। स्वतीथासॊस्थश् कृ त: सभुिस्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा देवगणा ददववस्था ददत्न्त वै कभापरातन तनत्मभ ्। मदाऻमा शैरगणा: त्स्थया वै तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:। मदाऻमा देवगणा ददववस्था ददत्न्त वै कभापरातन तनत्मभ ्। मदाऻमा शैरगणा: त्स्थया वै तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा शेषधयाधयो वै मदाऻमा भोहप्रदश् काभ:। मदाऻमा कारधयोऽमाभा तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदाऻमा वातत ववबातत वामुमादाऻमाधगन्जाठयाददसॊस्थ:। मदाऻमेदॊ स या यॊ तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ मदन्तये सॊत्स्थतभेकदन्तस्तदाऻमा सवासभदॊ ववबातत। अनन्तरूऩॊ रृदद फोधकॊ मस्तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ सुमोधगनो मोगफरेन साध्मॊ प्रकु वाते क: स्तवनेन स्तौतत। अत: प्रणाभेन सुससविदोऽस्तु तभेकदन्तॊ शयणॊ व्रजाभ:॥ गृत्सभद उवाच एवॊ स्तुत्वा गणेशानॊ देवा: सभुनम: प्रबुभ ्। तृष्णीॊ बावॊ प्रऩद्मैव ननृतुहाषासॊमुता:॥ स तानुवा प्रीतात्भा देवषॉणाॊ स्तवेन वै। एकदन्तो भहाबागो देवषॉन् बक्तवत्सर:॥ एकदन्त उवाच स्तोिेणाहॊ प्रसन्नोऽत्स्भ सुया: सवषागणा: फकर। वयदोऽहॊ वृणुत वो दास्मासभ भनसीत्प्सतभ ्॥ बवत्कृ तॊ भदीमॊ मत ् स्तोिॊ प्रीततप्रदॊ तत ्। बववष्मतत न सॊदेह: सवाससविप्रदामकभ ्॥ मॊ मसभच्छतत तॊ तॊ वै दास्मासभ स्तोिऩाठत:। ऩुिऩौिाददकॊ सवा करिॊ धनधान्मकभ ्॥ गजाश्वाददकभत्मन्तॊ याज्मबोगाददकॊ ्ुवभ ्। बुत्क्तॊ भुत्क्तॊ मोगॊ वै रबते शात्न्तदामकभ ्॥ भायणोच् ाटनादीतन याजफन्धाददकॊ मत ्। ऩठताॊ श्रृण्वताॊ नृणाॊ बवेच् फन्धहीनता॥ एकववॊशततवायॊ म: श्रोकानेवैकववॊशतीन्। ऩठेच् रृदद भाॊ स्भृत्वा ददनातन त्वेकववॊशततभ ्॥ न तस्म दुराबॊ फकञ् त ् त्रिषु रोके षु वै बवेत ्। असाध्मॊ साध्मेन्भत्मा: सवाि ववजमी बवेत ्॥ तनत्मॊ म: ऩठतत स्तोिॊ ब्रहभबूत: स वै नय:। तस्म दशानत: सवे देवा: ऩूता बवत्न्त ॥  प्रततददन इस इक्कीस श्रोकों का इक्कीस ददनों तक प्रततददन इक्कीस फाय ऩाठ कयता हैं उसे सवाि ववजम प्राप्त होती हैं।  इस स्तोि के ऩाठ से व्मत्क्त को सवा इच्छीत वस्तु फक प्रात्प्त होती हैं। ऩुि-ऩौि आदद, करि, धन-धान्म, उत्तभ वाहन एवॊ सभस्त बौततक सुख साधनो एवॊ शाॊतत फक प्रात्प्त होती हैं। अन्म द्वाया फकमे जाने वारे भायण, उच् ाटन औय भोहन आदद प्रमोग से व्मत्क्त फक यऺा होती हैं।
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    44 ससतम्फय -2019 अनॊत तुदाशी व्रत ववशेष परदामी हैं।  सॊकरन गुरुत्व कामाारम अनॊत तुदाशी का व्रत बािऩद शुक्र ऩऺ की तुदाशी को फकमा जाता हैं। इस ददन बगवान नायामण की कथा की जाती है। इस ददन अनन्त बगवान की ऩूजा कयके बक्तगण वेद-ग्रॊथों का ऩाठ कयके सॊकटों से यऺा कयने वारा अनन्तसूिफाॊधा जाता हैं। अनंत चतुदथशी का व्रत की ऩूजा दोऩहय भें की जाती हैं। व्रत-ऩूजन ववधान:  अनॊत तुदाशी का व्रत वारे ददन व्रती को प्रात् स्नान कयके तनम्न भॊि से सॊकल्ऩ कयना ादहमे। भभाणखरऩाऩऺमऩूवाक शुबपरवृिमे श्रीभदनॊतप्रीततकाभनमा अनॊतव्रतभहॊ करयष्मे।  शास्िों भें मद्यवऩ व्रत का सॊकल्ऩ एवॊ ऩूजन फकसी ऩववि नदी मा सयोवय के तट ऩय कयने का ववधान है, मदद महॊ सॊबव न हो, तो घय भें ऩूजागृह की स्वच्छ बूसभ को सुशोसबत कयके करश स्थावऩत कयें।  करश ऩय अष्टदर कभर के सभान फने फतान ऩय शेषनाग की शैय्माऩय रेटे बगवान ववष्णु की भूतता अथवा ध ि को यखें।  भूतता के सम्भुख कु भकु भ, के सय मा हल्दी से यॊगा ौदह गाॉठों वारा 'अनॊत' अथाात सूि मा घागा बी यखें।  इसके फाद ॐ अनन्तामनभ: भॊि से बगवान ववष्णु तथा अनॊतसूिकी षोडशोऩ ाय-ववधधसे ऩूजा कयें।  ऩूजनोऩयाॊत अनन्तसूिको भॊि ऩढकय ऩुरुष अऩने दादहने हाथ औय स्िी फाएॊ हाथ भें फाॊध रें: अनॊन्तसागयभहासभुिेभग्नान्सभभ्मुियवासुदेव। अनॊतरूऩेववतनमोत्जतात्भाहमनन्तरूऩामनभोनभस्ते॥ नवीन अनॊत को धायण कय ऩुयाने का त्माग तनम्न भॊि से कयें- न्मूनाततरयक्तातन ऩरयस्पु टातन मानीह कभाथणण भमा कृ तातन। सवाथणण चैतातन भभ ऺभस्व प्रमादह तुष्ट् ऩुनयागभाम॥  अनॊतसूिफाॊध रेने के ऩश् ात फकसी ब्राहभण को नैवेद्य (बोग) भें तनवेददत ऩकवान देकय स्वमॊ सऩरयवाय प्रसाद ग्रहण कयें।  ऩूजा के फाद व्रत-कथा को ऩढें मा सुनें।  अनॊत व्रत बगवान ववष्णु को प्रसन्न कयने वारा तथा अनॊत परदामक भाना गमा है।  अनॊत व्रत भें बगवान ववष्णु से धन-ऩुिादद की काभना से फकमा जाता है।  ववद्वानो के भत से अनॊत की ौदह गाॊठें ौदह रोकों की प्रतीक हैं, त्जनभें अनॊत बगवान ववद्यभान हैं। अनंत चतुदथशी व्रतकथा ऩोयाणणक कथाके अनुशाय एक फाय भहायाज मुधधत्ष्ठय ने याजसूममऻ फकमा। मऻभॊडऩ का तनभााण अतत सुॊदय था ही, अद्भुत बी था। उसभें जर भें स्थर तथा स्थर भें जर की भ्राॊतत उत्ऩन्न होती थी। ऩूयी सावधानी के फाद बी फहुत से अततधथ उस अद्भुत भॊडऩ भें धोखा खा ुके थे। दुमोधन बी उस मऻभॊडऩ भें घूभते हुए स्थर के भ्रभ भें एक ताराफ भें धगय गए। तफ बीभसेन तथा िौऩदी ने 'अॊधों की सॊतान अॊधी' कहकय दुमोधन का भजाक उडामा। इससे दुमोधन ध ढ़ गमा। उसके भन भें द्वेष ऩैदा हो गमा औय भत्स्तक भें उस अऩभान का फदरा रेने के वव ाय उऩजने रगे। कापी ददनों तक वह इसी उल्झन भें यहा फक आणखय ऩाॉडवों से अऩने अऩभान का फदरा फकस प्रकाय सरमा जाए। तबी उसके भत्स्तष्क भें द्मूत क्रीडा भें ऩाॉडवों को गुरुत्व कामाथरम द्वाया यत्न-रुिाऺ ऩयाभशा Book Now@RS:- 910 550* >> Order Now | Email US | Customer Care: 91+ 9338213418, 91+ 9238328785
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    45 ससतम्फय -2019 हयाकय उस अऩभान का फदरा रेने की मुत्क्त आई। उसने ऩाॉडवों को जुए के सरए न के वर आभॊत्रित ही फकमा फत्ल्क उन्हें जुए भें ऩयात्जत बी कय ददमा। ऩयात्जत होकय ऩाॉडवों को फायह वषा के सरए वनवास बोगना ऩडा। वन भें यहते हुए ऩाॉडव अनेक कष्ट सहते यहे। एक ददन वन भें मुधधत्ष्ठय ने बगवान श्रीकृ ष्ण से अऩना दु्ख कहा तथा उसको दूय कयने का उऩाम ऩूछा। तफ श्रीकृ ष्ण ने कहा- हे मुधधत्ष्ठय! तुभ ववधधऩूवाक अनॊत बगवान का व्रत कयो। इससे तुम्हाये साये सॊकट दूय हो जाएगा। तुम्हें हाया हुआ याज्म बी वाऩस सभर जाएगा। मुधधत्ष्ठय के आग्रह ऩय इस सॊदबा भें श्रीकृ ष्ण एक कथा सुनाते हुए फोरे- प्रा ीन कार भें सुभन्तु ब्राहभण की ऩयभ सुॊदयी तथा धभाऩयामण सुशीरा नाभक कन्मा थी। वववाह मोग्म होने ऩय ब्राहभण ने उसका वववाह कौंडडन्म ऋवष से कय ददमा। कौंडडन्म ऋवष सुशीरा को रेकय अऩने आश्रभ की ओय रे तो यास्ते भें ही यात हो गई। वे एक नदी के तट ऩय सॊध्मा कयने रगे। सुशीरा ने देखा- वहाॉ ऩय फहुत-सी त्स्िमाॉ सुॊदय- सुॊदय वस्ि धायण कयके फकसी देवता की ऩूजा कय यही हैं। उत्सुकतावश सुशीरा ने उनसे उस ऩूजन के ववषम भें ऩूछा तो उन्होंने ववधधऩूवाक अनॊत व्रत की भहत्ता फता दी। सुशीरा ने वहीॊ उस व्रत का अनुष्ठान कयके ौदह गाॊठों वारा डोया हाथ भें फाॉधा औय अऩने ऩतत के ऩास आ गई। कौंडडन्म ऋवष ने सुशीरा से डोये के फाये भें ऩूछा तो उसने सायी फात स्ऩष्ट कय दी। ऩयॊतु ऐश्वमा के भद भें अॊधे हो ुके कौंडडन्म ऋवष को इससे कोई प्रसन्नता नहीॊ हुई, फत्ल्क क्रोध भें आकय उन्होंने उसके हाथ भें फॊधे डोये को तोडकय आग भें जरा ददमा। मह अनॊतजी का घोय अऩभान था। उनके इस दुष्कभा का ऩरयणाभ बी शीघ्र ही साभने आ गमा। कौंडडन्म भुतन दु्खी यहने रगे। उनकी सायी सम्ऩत्त्त नष्ट हो गई। इस दरयिता का कायण ऩूछने ऩय सुशीरा ने डोये जराने की फात दोहयाई। तफ ऩश् ाताऩ कयते हुए ऋवष 'अनॊत' की प्रात्प्त के सरए वन भें तनकर गए। जफ वे बटकते-बटकते तनयाश होकय धगय ऩडे तो बगवान अनॊत प्रकट होकय फोरे- 'हे कौंडडन्म! भेये ततयस्काय के कायण ही तुभ दु्खी हुए हो रेफकन तुभने ऩश् ाताऩ फकमा है, अत् भैं प्रसन्न हूॉ। ऩय घय जाकय ववधधऩूवाक अनॊत व्रत कयो। ौदह वषा ऩमान्त व्रत कयने से तुम्हाया साया दु्ख दूय हो जाएगा। तुम्हें अनॊत सम्ऩत्त्त सभरेगी। कौंडडन्म ऋवष ने वैसा ही फकमा। उन्हें साये क्रेशों से भुत्क्त सभर गई। श्रीकृ ष्ण की आऻा से मुधधत्ष्ठय ने बी बगवान अनॊत का व्रत फकमा त्जसके प्रबाव से ऩाॉडव भहाबायत के मुि भें ववजमी हुए तथा ध यकार तक तनष्कॊ टक याज्म कयते यहे। गणेशजी को दुवाा-दर ढ़ाने का भॊि गणेशजी को 21 दुवाादर ढ़ाई जाती है। दो दुवाा-दर नी े सरखे नाभभॊिों के साथ ढ़ाएॊ। ॐ गणाधधऩाम नभ:। ॐ उभाऩुिाम नभ:। ॐ ववघ्ननाशनाम नभ:। ॐ ववनामकाम नभ:। ॐ ईशऩुिाम नभ:। ॐ सवाससिप्रदाम नभ:। ॐ एकदन्ताम नभ:। ॐ इबवक्िाम नभ:। ॐ भूषकवाहनाम नभ:। ॐ कु भायगुयवे नभ:।
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    46 ससतम्फय -2019 भनोवाॊतछत परो फक प्रात्प्त हेतु ससवि प्रद गणऩतत स्तोि  सॊकरन गुरुत्व कामाारम प्रततददन इस स्तोि का ऩाठ कयने से भनोवाॊतछत पर शीघ्र प्राप्त होते हैं। भनोवाॊतछत पर प्राप्त कयने हेतु गणेशजी के ध ि मा भूतता के साभने भॊि जाऩ कय सकते हैं। ऩूणा श्रिा एवॊ ऩूणा ववश्वास के साथ भनोवाॊतछत पर प्रदान कयने वारे इस स्तोि का प्रततददन कभ से कभ 21 फाय ऩाठ अवश्म कयें। अधधकस्म अधधकॊ परभ्। जऩ त्जतना अधधक हो सके उतना अच्छा है। मदद भॊि अधधक फाय जाऩ कय सकें तो श्रेष्ठ। प्रात् एवॊ सामॊकार दोनों सभम कयें, पर शीघ्र प्राप्त होता है। काभना ऩूणा होने के ऩश् मात बी तनमसभत स्िोत रा ऩाठ कयते यहना ादहए। कु छ एक ववशेष ऩरयत्स्थतत भें ऩूवा जन्भ के सॊध त कभा स्वरूऩ प्रायब्ध की प्रफरता के कायण भनोवाॊतछत पर की प्रात्प्त मा तो देयी सॊबव हैं! भनोवाॊतछत पर की प्रात्प्त के अबाव भें मोग्म ववद्वान की सराह रेकय भागादशान प्राप्त कयना उध त होगा। अववश्वास व कु शॊका कयके आयाध्म के प्रतत अश्रिा व्मक्त कयने से व्मत्क्त को प्रततकू र प्ररयणाभ दह प्राप्त होते हैं। शास्िोक्त व न हैं फक बगवान (इष्ट) फक आयाधना कबी व्मथा नहीॊ जाती। भंत्र:- गणऩततववाघ्नयाजो रम्फतुण्डो गजानन्। द्वैभातुयश् हेयम्फ एकदन्तो गणाधधऩ्॥ ववनामकश् ारुकणा् ऩशुऩारो बवात्भज्। द्वादशैतातन नाभातन प्रातरुत्थाम म् ऩठेत्॥ ववश्वॊ तस्म बवेद्वश्मॊ न ववघ्नॊ बवेत्क्वध त्। (ऩद्म ऩु. ऩृ. 61।31-33) बावाथथ: गणऩतत, ववघ्नयाज, रम्फतुण्ड, गजानन, द्वैभातुय, हेयम्फ, एकदन्त, गणाधधऩ, ववनामक, ारुकणा, ऩशुऩार औय बवात्भज- गणेशजी के मह फायह नाभ हैं। जो व्मत्क्त प्रात्कार उठकय इनका तनमसभत ऩाठ कयता हैं, सॊऩूणा ववश्व उनके वश भें हो जाता हैं, तथा उसे जीवन भें कबी ववघ्न का साभना नहीॊ कयना ऩडता। गणेश रक्ष्भी मॊि प्राण-प्रततत्ष्ठत गणेश रक्ष्भी मॊि को अऩने घय-दुकान-ओफपस-पै क्टयी भें ऩूजन स्थान, गल्रा मा अरभायी भें स्थावऩत कयने व्माऩाय भें ववशेष राब प्राप्त होता हैं। मॊि के प्रबाव से बाग्म भें उन्नतत, भान-प्रततष्ठा एवॊ व्माऩाय भें वृवि होती हैं एवॊ आधथाक त्स्थभें सुधाय होता हैं। गणेश रक्ष्भी मॊि को स्थावऩत कयने से बगवान गणेश औय देवी रक्ष्भी का सॊमुक्त आशीवााद प्राप्त होता हैं। Rs.730 से Rs.10900 तक >> Order Now
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    47 ससतम्फय -2019 भॊि ससि ऩन्ना गणेश से हो सकता हैं वास्तु दोष का तनवायण  सॊकरन गुरुत्व कामाारम दहॊदू सॊस्कृ तत भें बगवान गणेश सवा ववघ्न ववनाशक भाना हैं। इसी कायण गणऩतत जी का ऩूजन फकसी बी व्रत अनुष्ठान भें सवा प्रथभ फकमा जाता हैं। बवन भें वास्तु ऩूजन कयते सभम बी गणऩतत जी को प्रथभऩूजा जाता हैं। त्जस घय भें तनमसभत गणऩतत जी का ववधध ववधान से ऩूजन होता हैं, वहाॊ सुख-सभृवि एवॊ रयवि-ससवि का तनवास होता हैं। गणेश प्रततभा (भूतता) की स्थाऩना बवन के भुख्म द्वाय के ऊऩय अॊदय-फहाय दोनो औय रगाने से अधधक राब प्राप्त होता हैं। गणेश प्रततभा (भूतता) की ऩूजा घयभें स्थाऩना कयने ऩय उन्हें ससॊदूय ढाने से शुब पर फक प्रात्प्त होती हैं। बवन भें द्वायवेध हो, अथाात बवन के भुख्म द्वाय के साभने वृऺ, भॊददय, स्तॊब आदद द्वाय भें प्रवेश कयने वारी उजाा हेतु फाधक होने ऩय वास्तु भें उसे द्वायवेध भाना जाता हैं। द्वायवेध होने ऩय वहाॊ यहने वारों भें उच् ाटन होता हैं। ऐसे भें बवन के भुख्म द्वाय ऩय गणोशजी की फैठी हुई प्रततभा (भूतता) रगाने से द्वायवेध का तनवायण होता हैं। * भूततथ का आकाय 11 अंगुर से अधधक नहीं होना चादहए। वास्तु दोष के तनवायण एवॊ घय की सुख शाॊतत के सरए ऩन्ना गणेश की प्रततभा ववशेष परदामी हैं। ऩूजा स्थानभें ऩूजन के सरए गणेश जी की एक से अधधक प्रततभा (भूततथ) यखना वश्जथत हैं। Natural Nepali 5 Mukhi Rudraksha 1 Kg Seller Pack Size : Assorted 15 mm to 18 mm and above Price Starting Rs.550 to 1450 Per KG GURUTVA KARYALAY Call Us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 or Shop Online @ www.gurutvakaryalay.com
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    48 ससतम्फय -2019 ।।गणऩतत अथवाशीषा।। ॐ नभस्ते गणऩतमे। त्वभेव प्रत्मऺॊ तत्वभसस । त्वभेव के वरॊ कताा सस। त्वभेव के वरॊ धताासस। त्वभेव के वरॊ हताासस । त्वभेव सवं खत्ल्वदॊ ब्रहभासस। त्व साऺादात्भासस तनत्मभ ्। ऋतॊ वत्च्भ। सत्मॊ वत्च्भ। अव त्व भाॊभ ्। अव वक्तायभ ्। अव श्रोतायभ्। अव दातायभ्। अव धातायभ्। अवा नू ानभव सशष्मभ्।अव ऩश् ातात ्।अव ऩुयस्तात ्। अवोत्तयात्तात ्। अव दक्षऺणात्तात ्। अव ोध्वाात्तात ्। अवाधयात्तात ्। सवातो भाॉ ऩादह-ऩादह सभॊतात ्। त्वॊ वाङ्भम स्त्वॊ ध न्भम्। त्वभानॊदभसमस्त्वॊ ब्रहभभम्। त्वॊ सत्च् दानॊदात ् द्वद्वतीमोसस। त्वॊ प्रत्मऺॊ ब्रहभासस। त्वॊ ऻानभमो ववऻानभमोसस। सवं जगदददॊ त्वत्तो जामते। सवं जगदददॊ त्वत्त त्स्तष्ठतत। सवं जगदददॊ त्वतम वमभेष्मतत। सवं जगदददॊ त्वतम प्रत्मेतत। त्वॊ बूसभयाऩोनरो तनरो नब्। त्वॊ त्वारय वाकू ऩदातन। त्वॊ गुणिमातीत: त्वभवस्थािमातीत्। त्वॊ देहिमातीत्। त्वॊ कारिमातीत्। त्वॊ भूराधाय त्स्थतोसस तनत्मॊ। त्वॊ शत्क्त िमात्भक्। त्वाॊ मोधगनो ध्मामॊतत तनत्मॊ। त्वॊ ब्रहभा त्वॊ ववष्णुस्त्वॊ रूिस्त्वॊ इॊिस्त्वॊ अत्ग्नस्त्वॊ वामुस्त्वॊ सूमास्त्वॊ ॊिभास्त्वॊ ब्रहभबूबुाव:स्वयोभ्। गणादद ऩूवाभुच् ामा वणााददॊ तदनॊतयभ्। अनुस्वाय: ऩयतय्। अधेन्दुरससतभ्। तायेण ऋिॊ। एतत्तव भनुस्व रूऩभ्। गकाय: ऩूवारूऩभ्। अकायो भध्मभरूऩभ्। अनुस्वायश् ान्त्मरूऩभ ्। त्रफन्दुरूत्तयरूऩभ ्। नाद: सॊधानभ्। सॉ दहतासॊधध: सैषा गणेश ववद्या। गणकऋवष: तन ृद्गामिीच्छॊद्। गणऩततदेवता। ॐ गॊ गणऩतमे नभ्।एकदॊताम ववद्भहे। वक्रतुण्डाम धीभदह। तन्नो दॊती प्र ोदमात ्। एकदॊतॊ तुहास्तॊ ऩाशभॊकु श धारयणभ्। यदॊ वयदॊ हस्तै ववाभ्राणॊ भूषकध्वजभ्। यक्तॊ रॊफोदयॊ शूऩा कणाकॊ यक्तवाससभ्। यक्तगॊधानु सरप्ताॊगॊ यक्तऩुष्ऩै: सुऩुत्जतभ्। बक्तानुकॊ वऩनॊ देवॊ जगत्कायण भच्मुतभ्। आववबूातॊ सृष्टमादौ प्रकृ ते ऩुरुषात्ऩयभ्। एवॊ ध्मामतत मो तनत्मॊ स मोगी मोधगनाॊ वय्। नभो व्रातऩतमे। नभो गणऩतमे। नभ: प्रभथऩतमे। नभस्ते अस्तु रॊफोदयामै एकदॊताम। ववघ्ननासशने सशवसुताम। श्रीवयदभूतामे नभो नभ्। एतदथवा शीषा मोधीते। स ब्रहभ बूमाम कल्ऩते। स सवा ववघ्नैनाफाध्मते। स सवात: सुखभेधते। स ऩच् भहाऩाऩात्प्रभुच्मते। सामभधीमानो ददवसकृ तॊ ऩाऩॊ नाशमतत। प्रातयधीमानो यात्रिकृ तॊ ऩाऩॊ नाशमतत। सामॊ प्रात: प्रमुॊजानो अऩाऩो बवतत। सवािाधीमानो ड ऩववघ्नो बवतत। धभााथाकाभभोऺॊ ववॊदतत। इदभथवाशीषाभसशष्माम न देमभ ्। मो मदद भोहात ् दास्मतत स ऩाऩीमान ् बवतत। सहस्रावतानात ् मॊ मॊ काभभधीते तॊतभनेन साधमेत ्। अनेन गणऩतत भसबवषॊ तत स वाग्भी बवतत । तुथ्मााभनश्र्नन जऩतत स ववद्यावान बवतत। इत्मथवाण वाक्मभ्। ब्रहभाद्यावयणॊ ववद्यात ् न त्रफबेतत कदा नेतत। मो दूवांकु यैंमाजतत स वैश्रवणोऩभो बवतत। मो राजैमाजतत स मशोवान बवतत स भेधावान बवतत। मो भोदक सहस्रेण मजतत स वाॊतछत पर भवाप्रोतत। म: साज्मससभतद्भ माजतत स सवं रबते स सवं रबते। अष्टौ ब्राहभणान ् सम्मग्ग्राहतमत्वा सूमा व ास्वी बवतत। सूमाग्रहे भहानद्माॊ प्रततभा सॊतनधौ वा जप्त्वा ससिभॊिों बवतत। भहाववघ्नात ् प्रभुच्मते। भहादोषात ् प्रभुच्मते। भहाऩाऩात ् प्रभुच्मते। स सवाववद् बवतत से सवाववद् बवतत । म एवॊ वेद इत्मुऩतनषद्। ॥इतत श्री गणऩतत अथवाशीषा सम्ऩुणा ॥
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    49 ससतम्फय -2019 गणेश स्तवन श्री आदद कवव वाल्भीकक उवाच तु:षत्ष्टकोटमाख्मववद्याप्रदॊ त्वाॊ सुया ामाववद्याप्रदानाऩदानभ ्। कठाबीष्टववद्याऩाकॊ दन्तमुग्भॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ स्वनाथॊ प्रधानॊ भहाववघन्नाथॊ तनजेच्छाववसृष्टाण्डवृन्देशनाथभ ्। प्रबुॊ दक्षऺणास्मस्म ववद्याप्रदॊ त्वाॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ ववबो व्माससशष्माददववद्याववसशष्टवप्रमानेकववद्याप्रदातायभाद्यभ ्। भहाशाक्तदीऺागुरुॊ श्रेष्ठदॊ त्वाॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ ववधािे िमीभुख्मवेदाॊश् मोगॊ भहाववष्णवे ागभाज शॊकयाम। ददशन्तॊ सूमााम ववद्मायहस्मॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ भहाफुविऩुिाम ैकॊ ऩुयाणॊ ददशन्तॊ गजास्मस्म भाहात्म्ममुक्तभ ्। तनजऻानशक्त्मा सभेतॊ ऩुयाणॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ िमीशीषासायॊ रु ानेकभायॊ यभाफुविदायॊ ऩयॊ ब्रहभऩायभ ्। सुयस्तोभकामॊ गणौघाधधनाथॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ ध दानन्दरूऩॊ भुतनध्मेमरूऩॊ गुणातीतभीशॊ सुयेशॊ गणेशभ ्। धयानन्दरोकाददवासवप्रमॊ त्वाॊ कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ अनेकप्रतायॊ सुयक्ताब्जहायॊ ऩयॊ तनगुाणॊ ववश्वसद्ब्रहभरूऩभ ्। भहावाक्मसॊदोहतात्ऩमाभूतता कववॊ फुविनाथॊ कवीनाॊ नभासभ॥ इदॊ मे तु कव्मष्टकॊ बत्क्तमुक्तात्स्िसॊध्मॊ ऩठन्ते गजास्मॊ स्भयन्त:। कववत्वॊ सुवाक्माथाभत्मद्भुतॊ ते रबन्ते प्रसादाद् गणेशस्म भुत्क्तभ ्॥ ॥इतत श्री वाल्भीफक कृ त श्रीगणेश स्तोि सॊऩूणाभ्॥ पर: जो व्मत्क्त श्रिा बाव से तीनोकार सुफह सॊध्मा एवॊ यािी के सभम वाल्भीफक कृ त श्रीगणेश का स्तवन कयते उन्हे सबी बौततक सुखो फक प्रात्प्त होकय उसे भोऺ को प्राप्त कय रेता हैं, एसा शास्रोक्त व न हैं । ववष्णुकृ तॊ गणेशस्तोिभ् श्री नायामण उवाच अथ ववष्णु: सबाभध्मे सम्ऩूज्म तॊ गणेश्वयभ्। तृष्टाव ऩयमा बक्त्मा सवाववघत्न्वनाशकभ ्॥ श्री ववष्णु उवाच ईश त्वाॊ स्तोतुसभच्छासभ ब्रहभज्मोतत: सनातनभ्। तनरूवऩतुभशक्तोऽहभनुरूऩभनीहकभ्॥1॥ प्रवयॊ सवादेवानाॊ ससिानाॊ मोधगनाॊ गुरुभ्। सवास्वरूऩॊ सवेशॊ ऻानयासशस्वरूवऩणभ्॥2॥ अव्मक्तभऺयॊ तनत्मॊ सत्मभात्भस्वरूवऩणभ ्। वामुतुल्मातततनसराप्तॊ ाऺतॊ सवासाक्षऺणभ्॥3॥ सॊसायाणावऩाये भामाऩोते सुदुराबे। कणाधायस्वरूऩॊ बक्तानुग्रहकायकभ्॥4॥ वयॊ वयेण्मॊ वयदॊ वयदानाभऩीश्वयभ्। ससिॊ ससविस्वरूऩॊ ससविदॊ ससविसाधनभ्॥5॥ ध्मानाततरयक्तॊ ध्मेमॊ ध्मानासाध्मॊ धासभाकभ्। धभास्वरूऩॊ धभाऻॊ धभााधभापरप्रदभ्॥6॥ फीजॊ सॊसायवृऺाणाभङ्कु यॊ तदाश्रमभ ्। स्िीऩुन्नऩुॊसकानाॊ रूऩभेतदतीत्न्िमभ्॥7॥ सवााद्यभग्रऩूज्मॊ सवाऩूज्मॊ गुणाणावभ्। स्वेच्छमा सगुणॊ ब्रहभ तनगुाणॊ ावऩ स्वेच्छमा॥8॥ स्व्मॊ प्रकृ ततरूऩॊ प्राकृ तॊ प्रकृ ते: ऩयभ्। त्वाॊ स्तोतुभऺभोऽनन्त: सहस्िवदनेन ॥9॥ न ऺभ: ऩञ् वक्िश् न ऺभश् तुयानन्। सयस्वती न शक्ता न शक्तोऽहॊ तव स्तुतौ॥10॥ न शक्ताश् तुवेदा: के वा ते वेदवाददन्॥11॥ इत्मेवॊ स्तवनॊ कृ त्वा सुयेशॊ सुयसॊसदद। सुयेशश् सुयै: साद्र्ध ववययाभ यभाऩतत्॥12॥ इदॊ ववष्णुकृ तॊ स्तोिॊ गणेशस्म म: ऩठेत ्। सामॊप्रातश् भध्माहने बत्क्तमुक्त: सभादहत्॥13॥ तद्वद्वघत्न्नघन ् कु रुते ववघनेश्व्सततॊ भुने। वधाते सवाकल्माणॊ कल्माणजनक: सदा॥14॥ मािाकारे ऩदठत्वा तु मो मातत बत्क्तऩूवाकभ ्। तस्म सवााबीष्टससविबावत्मेव न सॊशम्॥15॥ तेन दृष्टॊ दु:स्वऩन ् सुस्वऩन्भुऩजामते। कदावऩ न बवेत्तस्म ग्रहऩीडा दारुणा॥16॥ बवेद् ववनाश: शिूणाॊ फन्धूनाॊ वववधानभ ्। शश्वद्वद्वघत्न्वनाशश् शश्वत ् सम्ऩद्वद्ववधानभ्॥17॥ त्स्थया बवेद् गृहे रक्ष्भी: ऩुिऩौिवववधधानी। सवैश्वमासभह प्राप्म हमन्ते ववष्णुऩदॊ रबेत ्॥18॥ परॊ ावऩ तीथाानाॊ मऻानाॊ मद् बवेद् ्ुवभ ्। भहताॊ सवादानानाॊ श्री गणेशप्रसादत्॥19॥
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    50 ससतम्फय -2019 गणऩततस्तोिभ ् सुवणावणासुन्दयॊ ससतैकदन्तफन्धुयॊ गृहीतऩाशकाङ्कु शॊ वयप्रदाबमप्रदभ्। तुबुाजॊ त्रिरो नॊ बुजङ्गभोऩवीततनॊ प्रपु ल्रवारयजासनॊ बजासभ ससन्धुयाननभ्॥ फकयीटहायकु ण्डरॊ प्रदीप्तफाहुबूषणॊ प्र ण्डयत्नकङ्कणॊ प्रशोसबताङ्तघमत्ष्टकभ्। प्रबातसूमासुन्दयाम्फयद्वमप्रधारयणॊ सयत्नहेभनूऩुयप्रशोसबताङ्तघ्रऩङ्कजभ्॥ सुवणादण्डभत्ण्डतप्र ण्ड ारु ाभयॊ गृहप्रदेन्दुसुन्दयॊ मुगऺणप्रभोददतभ्। कवीन्िध त्तयञ्जकॊ भहाववऩत्त्तबञ्जकॊ षडऺयस्वरूवऩणॊ बजे गजेन्िरूवऩणभ्॥ ववरयञ् ववष्णुवत्न्दतॊ ववरूऩरो नस्तुतॊ धगयीशदशानेच्छमा सभवऩातॊ ऩयाम्फमा। तनयन्तयॊ सुयासुयै: सऩुिवाभरो नै: भहाभखेष्टकभासु स्भृतॊ बजासभ तुत्न्दरभ्॥ भदौघरुब्ध ञ् रासरभञ्जुगुत्ञ्जतायवॊ प्रफुिध त्तयञ्जकॊ प्रभोदकणा ारकभ्। अनन्मबत्क्तभानवॊ प्र ण्डभुत्क्तदामॊ नभासभ तनत्मभादयेण वक्रतुण्डनामकभ्॥ दारयिमवविावणभाशु काभदॊ स्तोिॊ ऩठेदेतदजस्िभादयात्। ऩुिी करिस्वजनेषु भैिी ऩुभान् बवेदेकवयप्रसादात्॥ इस स्तोिा का प्रततददन ऩाठ कयने से गणेशजी की कृ ऩा से उसे सॊतान राब, स्िी प्रतत, सभि एवॊ स्वजनो से एवॊ ऩरयवाय भें प्रेभ बाव फढता हैं। ॥श्री ववघ्नेश्वयाष्टोत्तय शतनाभस्तोिभ् ॥ ववनामको ववघ्नयाजो गौयीऩुिो गणेश्वय्। स्कॊ दाग्रजोव्मम् ऩूतो दऺोऽध्मऺो द्वद्वजवप्रम् ॥ १ ॥ अत्ग्नगवात्च्छद इन्िश्रीप्रद् । वाणीप्रदोअ् अव्मम् सवाससविप्रदश्शवातनो शवायीवप्रम् ॥ २ ॥ सवाात्भक् सृत्ष्टकताा देवोनेकाध ातत्श्शव् । शुिफुवि वप्रमश्शाॊतो ब्रहभ ायी गजानन् ॥ ३ ॥ द्वैभािेमो भुतनस्तुत्मो बक्तववघ्नववनाशन् । एकदन्तश्छतुफााहुश्छतुयश्शत्क्तसॊमुत् ॥ ४ ॥ रम्फोदयश्शूऩाकणो हयब्राहभ ववदुत्तभ् । कारो ग्रहऩतत् काभी सोभसूमाात्ग्नरो न् ॥ ५ ॥ ऩाशाङ्कु शधयश् ण्डो गुणातीतो तनयञ्जन् । अकल्भषस्स्वमॊससित्स्सिाध ात् ऩदाम्फुज् ॥ ६ ॥ फीजऩूयपरासक्तो वयदश्शाश्वत् कृ तत् । द्वद्वजवप्रमो वीतबमो गदी क्रीऺु ाऩधृत् ॥ ७ ॥ श्रीदोज उत्ऩरकय् श्रीऩतत् स्तुततहवषात् । कु रादिबेत्ता जदटर् कसरकल्भषनाशन् ॥ ८ ॥ न्ि ूडाभणण् कान्त् ऩाऩहायी सभादहत् । अधश्रतश्रीकयस्सौम्मो बक्तवाॊतछतदामक् ॥ ९ ॥ शान्त् कै वल्मसुखदस्सत्च् दानन्द ववग्रह् । ऻानी दमामुतो दाॊतो ब्रहभद्वेषवववत्जात् ॥ १० ॥ प्रभत्तदैत्मबमद् श्रीकॊ थो ववफुधेश्वय् । याभाध ातोववधधनाागयाजमऻोऩवीतक् ॥ ११ ॥ स्थूरकॊ ठ् स्वमॊकताा साभघोषवप्रम् ऩय् । स्थूरतुण्डोऽग्रणी धीयो वागीशत्स्सविदामक् ॥ १२ ॥ दूवाात्रफल्ववप्रमोऽव्मक्तभूततायद्भुतभूतताभान् । शैरेन्ितनुजोत्सङ्गखेरनोत्सुकभानस् ॥ १३ ॥ स्वरावण्मसुधासायो त्जतभन्भथववग्रह् । सभस्तजगदाधायो भामी भूषकवाहन् ॥ १४ ॥ रृष्टस्तुष्ट् प्रसन्नात्भा सवाससविप्रदामक् । अष्टोत्तयशतेनैवॊ नाम्नाॊ ववघ्नेश्वयॊ ववबुॊ ॥ १५ ॥ तुष्टाव शॊकय् ऩुिॊ त्रिऩुयॊ हॊतुभुत्मत् । म् ऩूजमेदनेनैव बक्त्मा ससविववनामकभ् ॥ १६ ॥ दूवाादरैत्रफाल्वऩिै् ऩुष्ऩैवाा ॊदनाऺतै् । सवाान्काभानवाप्नोतत सवाववघ्नै् प्रभुच्मते ॥
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    51 ससतम्फय -2019 ससवि ववनामक व्रत ववधान  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ससवि ववनामक व्रत बािऩद शुक्र ऩऺ की तुथॉ को ही फकमा जाता है। शास्िोक्त भान्मता के अनुशाय ददन दोऩहय भें गणेशजी का जन्भ हुआ था। इसीसरए इस तुथॉ को ववनामक तुथॉ, ससविववनामक तुथॉ औय श्रीगणेश तुथॉ के नाभ से जाना जाता है। इस सरमे ऩौयाणणक कार से ही इस ततधथ को गणेशोत्सव मा गणेश जन्भोत्सव के रूऩ भें भनामा जाता हैं। वैसे तो प्रत्मेक भास की तुथॉ को गणेशजी का व्रत होता है। रेफकन बािऩद के तुधथा व्रत का ववशेष भाहात्म्म है। ऎसी भान्मता हैं की इस ददन जो श्रधारु व्रत, उऩवास औय दान आदद शुब कामा फकमा जाता है, श्रीगणेश की कृ ऩा से सौ गुना पर प्राप्त हो जाता हैं। व्मत्क्त को श्री ववनामक तुथॉ कयने से भनोवाॊतछत पर प्राप्त होता है। शास्िोक्त ववधध-ववधान से श्री गणेशजी का ऩूजन व व्रत इस प्रकाय कयना अत्मॊत राबप्रद होता हैं। ववधध  प्रात्कार स्नानआदद तनत्मकभा से शीघ्र तनवृत्त हो कय। अऩने साभथाम के अनुसाय ऩूणा बत्क्त बाव से  बगवान गणेश की सोने, ाॊदी, ताॊफे, ऩीतर मा सभट्टी से फनी प्रततभा स्थावऩत कयें। भूतता को षोडशोऩ ाय ऩूजन- आयती आदद से ववधध-वत ऩूजन कयें।  गणेशजी की भूतता ऩय ससॊदूय ढ़ाएॊ।  गणेशजी का भॊि फोरते हुए 21 दुवाा दर ढ़ाएॊ।  श्री गणेशजी को रड्डुओॊ का बोग रगाएॊ।  ब्राहभण बोजन कयाएॊ औय ब्राहभणों को दक्षऺणा प्रदान कयने के ऩश् ात ् सॊध्मा के सभम स्वमॊ बोजन ग्रहण कयें। इस तयह ऩूजन कयने से बगवान श्रीगणेश अतत प्रसन्न होते हैं औय अऩने बक्तों की सकर इच्छाओॊ की ऩूतता कयते हैं। सॊकष्टहय तुथॉ व्रत का प्रायॊब कै से हुवा? संकष्टहय चतुदशी कथा् बायद्वाज भुतन औय ऩृथ्वी के ऩुि भॊगर की कदठन तऩस्मा से प्रसन्न होकय भाघ भास के कृ ष्ण ऩऺ भें तुथॉ ततधथ को गणऩतत ने उनको दशान ददमे थे। गजानन के वयदान के परस्वरूऩ भॊगर कु भाय को इस ददन भॊगर ग्रह के रूऩ भें सौय भण्डर भें स्थान प्राप्त हुवाथा। भॊगर कु भाय को गजानन से मह बी वयदान सभरा फक भाघ कृ ष्ण ऩऺ की तुदशॉ त्जसे सॊकष्टहय तुथॉ के नाभ से जाना जाता हैं उस ददन जो बी व्मत्क्त गणऩततजी का व्रत यखेगा उसके सबी प्रकाय के कष्ट एवॊ ववघ्न सभाप्त हो जाएॊगे। एक अन्म कथा के अनुसाय बगवान शॊकय ने गणऩततजी से प्रसन्न होकय उन्हें वयदान ददमा था फक भाघ कृ ष्ण ऩऺ की तुथॉ ततधथ को न्िभा भेये ससय से उतयकय गणेश के ससय ऩय शोबामभान होगा। इस ददन गणेश जी की उऩासना औय व्रत त्रि-ताऩ (तीनो प्रकाय के ताऩ) का हयण कयने वारा होगा। इस ततधथ को जो व्मत्क्त श्रिा बत्क्त से मुक्त होकय ववधध-ववधान से गणेश जी की ऩूजा कयेगा उसे भनोवाॊतछत पर फक प्रात्प्त होगी।
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    52 ससतम्फय -2019 गणेश तुथॉ ऩय ॊि दशान से क्मों रगता हैं करॊक?  सॊकरन गुरुत्व कामाारम गणेश तुथॉ ऩय ॊि दशान तनषेध होने फक ऩौयाणणक भान्मता हैं। शास्िोंक्त व न के अनुशाय जो व्मत्क्त इस ददन ॊिभा को जाने-अन्जाने देख रेता हैं उसे सभथ्मा करॊक रगता हैं। उस ऩय झूठा आयोऩ रगता हैं। कथा एक फाय जयासन्ध के बम से बगवान कृ ष्ण सभुि के फी नगय फनाकय वहाॊ यहने रगे। बगवान कृ ष्ण ने त्जस नगय भें तनवास फकमा था वह स्थान आज द्वारयका के नाभ से जाना जाता हैं। उस सभम द्वारयका ऩुयी के तनवासी से प्रसन्न होकय सूमा बगवान ने सिजीत मादव नाभक व्मत्क्त अऩनी स्मभन्तक भणण वारी भारा अऩने गरे से उतायकय दे दी। मह भणण प्रततददन आठ सेय सोना प्रदान कयती थी। भणण ऩातेही सिजीत मादव सभृि हो गमा। बगवान श्री कृ ष्ण को जफ मह फात ऩता री तो उन्होंने सिजीत से स्मभन्तक भणण ऩाने की इच्छा व्मक्त की। रेफकन सिजीत ने भणण श्री कृ ष्ण को न देकय अऩने बाई प्रसेनजीत को दे दी। एक ददन प्रसेनजीत सशकाय ऩय गमा जहाॊ एक शेय ने प्रसेनजीत को भायकय भणण रे री। मही यीछों के याजा औय याभामण कार के जाभवॊत ने शेय को भायकय भणण ऩय कब्जा कय सरमा था। कई ददनों तक प्रसेनजीत सशकाय से घय न रौटा तो सिजीत को ध ॊता हुई औय उसने सो ा फक श्रीकृ ष्ण ने ही भणण ऩाने के सरए प्रसेनजीत की हत्मा कय दी। इस प्रकाय सिजीत ने ऩुख्ता सफूत जुटाए त्रफना ही सभथ्मा प्र ाय कय ददमा फक श्री कृ ष्ण ने प्रसेनजीत की हत्मा कयवा दी हैं। इस रोकतनॊदा से आहत होकय औय इसके तनवायण के सरए श्रीकृ ष्ण कई ददनों तक एक वन से दूसये वन बटक कय प्रसेनजीत को खोजते यहे औय वहाॊ उन्हें शेय द्वाया प्रसेनजीत को भाय डारने औय यीछ द्वाया भणण रे जाने के ध हन सभर गए। इन्हीॊ ध हनों के आधाय ऩय श्री कृ ष्ण जाभवॊत की गुपा भें जा ऩहुॊ े जहाॊ जाभवॊत की ऩुिी भणण से खेर यही थी। उधय जाभवॊत श्री कृ ष्ण से भणण नहीॊ देने हेतु मुि के सरए तैमाय हो गमा। सात ददन तक जफ श्री कृ ष्ण गुपा से फाहय नहीॊ आए तो उनके सॊगी साथी उन्हें भया हुआ जानकाय ववराऩ कयते हुए द्वारयका रौट गए। २१ ददनों तक गुपा भें मुि रता यहा औय कोई बी झुकने को तैमाय नहीॊ था। तफ जाभवॊत को बान हुआ फक कहीॊ मे वह अवताय तो नहीॊ त्जनके दशान के सरए भुझे श्री याभ ॊि जी से वयदान सभरा था। तफ जाभवॊत ने अऩनी ऩुिी का वववाह श्री कृ ष्ण के साथ कय ददमा औय भणण दहेज भें श्री कृ ष्ण को दे दी। उधय कृ ष्ण जफ भणण रेकय रौटे तो उन्होंने सिजीत को भणण वाऩस कय दी। सिजीत अऩने फकए ऩय रत्ज्जत हुआ औय अऩनी ऩुिी सत्मबाभा का वववाह श्री कृ ष्ण के साथ कय ददमा। कु छ ही सभम फाद अक्रू य के कहने ऩय ऋतु वभाा ने सिजीत को भायकय भणण छीन री। श्री कृ ष्ण अऩने फडे बाई फरयाभ के साथ उनसे मुि कयने ऩहुॊ े। मुि भें जीत हाससर होने वारी थी फक ऋतु वभाा ने भणण अक्रू य को दे
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    53 ससतम्फय -2019 श्री भहारक्ष्भी मंत्र धन फक देवी रक्ष्भी हैं जो भनुष्म को धन, सभृवि एवॊ ऐश्वमा प्रदान कयती हैं। अथा(धन) के त्रफना भनुष्म जीवन दु्ख, दरयिता, योग, अबावों से ऩीडडत होता हैं, औय अथा(धन) से मुक्त भनुष्म जीवन भें सभस्त सुख-सुववधाएॊ बोगता हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के ऩूजन से भनुष्म की जन्भों जन्भ की दरयिता का नाश होकय, धन प्रात्प्त के प्रफर मोग फनने रगते हैं, उसे धन-धान्म औय रक्ष्भी की वृवि होती हैं। श्री भहारक्ष्भी मॊि के तनमसभत ऩूजन एवॊ दशान से धन की प्रात्प्त होती है औय मॊि जी तनमसभत उऩासना से देवी रक्ष्भी का स्थाई तनवास होता है। श्री भहारक्ष्भी मॊि भनुष्म फक सबी बौततक काभनाओॊ को ऩूणा कय धन ऐश्वमा प्रदान कयने भें सभथा हैं। अऺम तृतीमा, धनतेयस, दीवावरी, गुरु ऩुष्माभृत मोग यववऩुष्म इत्मादद शुब भुहूता भें मॊि की स्थाऩना एवॊ ऩूजन का ववशेष भहत्व हैं। >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com दी औय बाग तनकरा। श्री कृ ष्ण ने मुि तो जीत सरमा रेफकन भणण हाससर नहीॊ कय सके । जफ फरयाभ ने उनसे भणण के फाये भें ऩूछा तो उन्होंने कहा फक भणण उनके ऩास नहीॊ। ऐसे भें फरयाभ णखन्न होकय द्वारयका जाने की फजाम इॊिप्रस्थ रौट गए। उधय द्वारयका भें फपय ाा पै र गई फक श्री कृ ष्ण ने भणण के भोह भें बाई का बी ततयस्काय कय ददमा। भणण के रते झूठे राॊछनों से दुखी होकय श्री कृ ष्ण सो ने रगे फक ऐसा क्मों हो यहा है। तफ नायद जी आए औय उन्होंने कहा फक हे कृ ष्ण तुभने बािऩद भें शुक्र तुथॉ की यात को ॊिभा के दशान फकमेथे औय इसी कायण आऩको सभथ्मा करॊक झेरना ऩड यहा हैं। श्रीकृ ष्ण ॊिभा के दशान फक फात ववस्ताय ऩूछने ऩय नायदजी ने श्रीकृ ष्ण को करॊक वारी मह कथा फताई थी। एक फाय बगवान श्रीगणेश ब्रहभरोक से होते हुए रौट यहे थे फक ॊिभा को गणेशजी का स्थूर शयीय औय गजभुख देखकय हॊसी आ गई। गणेश जी को मह अऩभान सहन नहीॊ हुआ। उन्होंने ॊिभा को शाऩ देते हुए कहा, 'ऩाऩी तूने भेया भजाक उडामा हैं। आज भैं तुझे शाऩ देता हूॊ फक जो बी तेया भुख देखेगा, वह करॊफकत हो जामेगा। गणेशजी शाऩ सुनकय ॊिभा फहुत दुखी हुए। गणेशजी शाऩ के शाऩ वारी फाज ॊिभा ने सभस्त देवताओॊ को सोनाई तो सबी देवताओॊ को ध ॊता हुई। औय वव ाय ववभशा कयने रगे फक ॊिभा ही यािी कार भें ऩृथ्वी का आबूषण हैं औय इसे देखे त्रफना ऩृथ्वी ऩय यािी का कोई काभ ऩूया नहीॊ हो सकता। ॊिभा को साथ रेकय सबी देवता ब्रहभाजी के ऩास ऩहु ें। देवताओॊ ने ब्रहभाजी को सायी घटना ववस्ताय से सुनाई उनकी फातें सुनकय ब्रहभाजी फोरे, ॊिभा तुभने सबी गणों के अयाध्म देव सशव-ऩावाती के ऩुि गणेश का अऩभान फकमा हैं। मदद तुभ गणेश के शाऩ से भुक्त होना ाहते हो तो श्रीगणेशजी का व्रत यखो। वे दमारु हैं, तुम्हें भाप कय देंगे। ॊिभा गणेशजी को प्रशन्न कयने के सरमे कठोय व्रत-तऩस्मा कयने रगे। बगवान गणेश ॊिभा की कठोय तऩस्मा से प्रसन्न हुए औय कहा वषाबय भें के वर एक ददन बािऩद भें शुक्र तुथॉ की यात को जो तुम्हें देखेगा, उसे ही कोई सभथ्मा करॊक रगेगा। फाकी ददन कु छ नहीॊ होगा। ’ के वर एक ही ददन करॊक रगने की फात सुनकय ॊिभा सभेत सबी देवताओॊ ने याहत की साॊस री। तफ से बािऩद भें शुक्र तुथॉ की यात को ॊिभा के दशान का तनषेध हैं।
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    54 ससतम्फय -2019 गणेश कव भ् सॊसायभोहनस्मास्म कव स्म प्रजाऩतत्। ऋवषश्छन्दश् फृहती देवो रम्फोदय: स्वमभ्॥ धभााथाकाभभोऺेषु ववतनमोग: प्रकीततात्। सवेषाॊ कव ानाॊ सायबूतसभदॊ भुने॥ ॐ गॊ हुॊ श्रीगणेशाम स्वाहा भे ऩातु भस्तकभ्। द्वात्रिॊशदऺयो भन्िो रराटॊ भे सदावतु॥ ॐ ह्ीॊ क्रीॊ श्रीॊ गसभतत सॊततॊ ऩातु रो नभ्। तारुकॊ ऩातु ववघनेश: सॊततॊ धयणीतरे॥ ॐ ह्ीॊ श्रीॊ क्रीसभतत सॊततॊ ऩातु नाससकाभ्। ॐ गौं गॊ शूऩाकणााम स्वाहा ऩात्वधयॊ भभ॥ दन्तातन तारुकाॊ त्जहवाॊ ऩातु भे षोडशाऺय्॥ ॐ रॊ श्रीॊ रम्फोदयामेतत स्वाहा गण्डॊ सदावतु। ॐ क्रीॊ ह्ीॊ ववघन्नाशाम स्वाहा कणा सदावतु॥ ॐ श्रीॊ गॊ गजाननामेतत स्वाहा स्कन्धॊ सदावतु। ॐ ह्ीॊ ववनामकामेतत स्वाहा ऩृष्ठॊ सदावतु॥ ॐ क्रीॊ ह्ीसभतत कङ्कारॊ ऩातु वऺ:स्थरॊ गभ्। कयौ ऩादौ सदा ऩातु सवााङ्गॊ ववघत्न्नघन्कृ त ्॥ प्राच्माॊ रम्फोदय: ऩातु आगनेय्माॊ ववघन्नामक्। दक्षऺणे ऩातु ववघनेशो नैऋा त्माॊ तु गजानन्॥ ऩत्श् भे ऩावातीऩुिो वामव्माॊ शॊकयात्भज्॥ कृ ष्णस्माॊशश् ोत्तये ऩरयऩूणातभस्म ॥ ऐशान्माभेकदन्तश् हेयम्फ: ऩातु ोध्वात्। अधो गणाधधऩ: ऩातु सवाऩूज्मश् सवात्॥ स्वप्ने जागयणे ैव ऩातु भाॊ मोधगनाॊ गुरु्। इतत ते कधथतॊ वत्स सवाभन्िौघववग्रहभ्। सॊसायभोहनॊ नाभ कव ॊ ऩयभाद्भुतभ्॥ श्रीकृ ष्णेन ऩुया दत्तॊ गोरोके यासभण्डरे। वृन्दावने ववनीताम भहमॊ ददनकयात्भज्॥ भमा दत्तॊ तुभ्मॊ मस्भै कस्भै न दास्मसस। ऩयॊ वयॊ सवाऩूज्मॊ सवासङ्कटतायणभ्॥ गुरुभभ्मच्मा ववधधवत ् कव ॊ धायमेत्तु म्। कण्ठे वा दक्षऺणे फाहौ सोऽवऩ ववष्णुना सॊशम्॥ अश्वभेधसहस्िाणण वाजऩेमशतातन । ग्रहेन्िकव स्मास्म कराॊ नाहात्न्त षोडशीभ्॥ इदॊ कव भऻात्वा मो बजेच्छॊकयात्भजभ्। शतरऺप्रजप्तोऽवऩ न भन्ि: ससविदामक्॥ ॥ इतत श्री गणेश कव सॊऩूणाभ ्॥ ॥गणेशद्वादशनाभस्तोिभ्॥ शुक्राॊम्फयधयभ् देवभ् शसशवणं तुबुाजभ् । प्रसन्नवदनभ् ध्मामेत्सवाववघ्नोऩशाॊतमे ।।१।। अबीत्प्सताथाससद्ध्मथं ऩूजेतो म: सुयासुयै्। सवाववघ्नहयस्तस्भै गणाधधऩतमे नभ्।।२।। गणानाभधधऩश् ण्डो गजवक्ित्स्िरो न्। प्रसन्न बव भे तनत्मभ् वयदातववानामक ।।३।। सुभुखश् ैकदन्तश् कवऩरो गजकणाक: रम्फोदयश् ववकटो ववघ्ननाशो ववनामक्।।४।। धूम्रके तुगाणाध्मऺो बार ॊिो गजानन्। द्वादशैतातन नाभातन गणेशस्म म: ऩठेत ् ।। ५ ।। ववद्याथॉ रबते ववद्याभ् धनाथॉ ववऩुरभ् धनभ् । इष्टकाभभ् तु काभाथॉ धभााथॉ भोऺभऺमभ ् ।। ६ ।। ववद्यायभ्भे वववाहे प्रवेशे तनगाभे तथा सॊग्राभे सॊकटेश् ैव ववघ्नस्तस्म न जामते ।। ७ ।। ॥इतत श्री गणेशद्वादशनाभ स्तोिभ् सम्ऩुणा॥
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    55 ससतम्फय -2019 ऋण भुत्क्त हेतु श्री गणेश की भॊि साधना  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ववतनमोग्- ॐ अस्म श्रीऋण हयण कतृा गणऩतत भन्िस्म सदा सशव ऋवष्, अनुष्टुऩ छन्द्, श्रीऋण हताा गणऩतत देवता, ग्रौं फीजॊ, गॊ शत्क्त्, गों कीरकॊ , भभ सकर ऋण नाशाथे जऩे ववतनमोग्। ऋष्मादद न्मास्- सदा सशव ऋषमे नभ् सशयसस, अनुष्टुऩ छन्दसे नभ् भुखे, श्रीऋण हताा गणऩतत देवतामै नभ् रृदद, ग्रौं फीजाम नभ् गुहमे, गॊ शक्तमे नभ् ऩादमो, गों कीरकाम नभ् नाबौ, भभ सकर ऋण नाशाथे जऩे ववतनमोगाम नभ् अच्जरौ। कय न्मास्- ॐ गणेश अॊगुष्ठाभ्माॊ नभ्, ऋण तछत्न्ध तजानीभ्माॊ नभ्, वयेण्मॊ भध्मभाभ्माॊ नभ्, हुॊ अनासभकाभ्माॊ नभ्, नभ् कतनत्ष्ठकाभ्माॊ नभ्, पट् कय तर कय ऩृष्ठाभ्माॊ नभ्। षडंग न्मास्- ॐ गणेश रृदमाम नभ्, ऋण तछत्न्ध सशयसे स्वाहा, वयेण्मॊ सशखामै वषट्, हुॊ कव ाम हुभ ्, नभ् नेि िमाम वौषट्, पट् अस्िाम पट्। ध्मान्- ॐ ससन्दूय-वणं द्वद्व-बुजॊ गणेशॊ, रम्फोदयॊ ऩद्म-दरे तनववष्टभ ्। ब्रहभादद-देवै् ऩरय-सेव्मभानॊ, ससिैमुातॊ तॊ प्रणभासभ देवभ ्।। आवाहन इत्मादद कय ऩञ् ोऩ ायों मा भानससक ऩूजन कये। ॥कवच-ऩाठ॥ ॐ आभोदश् सशय् ऩातु, प्रभोदश् सशखोऩरय, सम्भोदो भ्रू-मुगे ऩातु, भ्रू-भध्मे गणाधीऩ्। गण-क्रीडश् ऺुमुागॊ, नासामाॊ गण-नामक्, त्जहवामाॊ सुभुख् ऩातु, ग्रीवामाॊ दुम्भुाख्॥ ववघ्नेशो रृदमे ऩातु, फाहु-मुग्भे सदा भभ, ववघ्न-कत्ताा उदये, ववघ्न-हत्ताा सरॊगके । गज-वक्िो कदट-देशे, एक-दन्तो तनतम्फके , रम्फोदय् सदा ऩातु, गुहम-देशे भभारुण्॥ व्मार-मऻोऩवीती भाॊ, ऩातु ऩाद-मुगे सदा, जाऩक् सवादा ऩातु, जानु-जॊघे गणाधधऩ्। हरयिा् सवादा ऩातु, सवांगे गण-नामक्॥ ॥स्तोत्र-ऩाठ॥ सृष्ट्मादौ ब्रहभणा सम्मक्, ऩूत्जत् पर-ससिमे। सदैव ऩावाती- ऩुि्, ऋण-नाशॊ कयोतु भे॥१॥ त्रिऩुयस्म वधात ् ऩूवं-शम्बुना सम्मगध ात्। दहयण्म- कश्मप्वादीनाॊ, वधाथे ववष्णुनाध ात्॥२॥ भदहषस्म वधे देव्मा, गण-नाथ् प्रऩूत्जत्। तायकस्म वधात ् ऩूवं, कु भायेण प्रऩुत्जत्॥३॥ बास्कयेण गणेशो दह, ऩूत्जतश्छवव-ससिमे। शसशना कात्न्त- वृिमथं, ऩूत्जतो गण-नामक्। ऩारनाम तऩसाॊ, ववश्वासभिेण ऩूत्जत्॥४॥ ॥पर-श्रुतत॥ इदॊ त्वृण-हय-स्तोिॊ, तीव्र-दारयद्र्म-नाशनभ ्, एक-वायॊ ऩठेत्न्नत्मॊ, वषाभेकॊ सभादहत्। दारयद्र्मॊ दारुणॊ त्मक्त्वा, कु फेय-सभताॊ व्रजेत ्।। उक्त ववधान सॊऩन्न होने ऩय इस भॊि का १ भार मा कभ- से-कभ २१ फाय जऩ कये। भन्त्र्- ॐ गणेश ऋणं तछश्न्ध वयेण्मं हुं नभ् पट् वषा बय कव औय भॊि का ऩाठ कयने से भनुष्म के दारयद्र्म का नाश होता है तथा रक्ष्भी प्राप्त होती है। नोट: बगवान श्री गणेश की मह धन दामी साधना प्रमोग हैं। साधना का प्रमोग ऩीरे यॊग के आसन ऩय ऩीरे वस्ि धायण कय ऩीरे यॊग की भारा मा ऩीरे सूत भें फनी स्पदटक की भारा से कयना अत्मॊत राबप्राद होता हैं। साधना कार भें गणेशजी को ऩूजा भें दूवाा ढ़ाए। भंत्रोच्छ्चायण भें क्रभश् ववतनमोग, न्मास, ध्मान कय आवाहन औय ऩूजन कये। ऩूजन के ऩश् ात ्कव - ऩाठ कयने के फाद स्तोि का ऩाठ कये। स्तोि की सभात्प्त ऩय भॊि का जऩ कयें।
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    56 ससतम्फय -2019 ऋण भो न भहा गणऩतत स्तोि  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ववतनमोग्- ॐ अस्म श्रीऋण भो न भहा गणऩतत स्तोि भन्िस्म बगवान ् शुक्रा ामा ऋवष्, ऋण-भो न-गणऩतत् देवता, भभ-ऋण-भो नाथं जऩे ववतनमोग्। ऋष्मादद-न्मास्- बगवान ् शुक्रा ामा ऋषमे नभ् सशयसस, ऋण-भो न-गणऩतत देवतामै नभ् रृदद, भभ-ऋण-भो नाथे जऩे ववतनमोगाम नभ् अञ्जरौ। ॥भूर-स्तोत्र॥ ॐ स्भयासभ देव-देवेश !वक्र-तुणडॊ भहा-फरभ्। षडऺयॊ कृ ऩा-ससन्धु, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥१॥ भहा-गणऩततॊ देवॊ, भहा-सत्त्वॊ भहा-फरभ्। भहा-ववघ्न-हयॊ सौम्मॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥२॥ एकाऺयॊ एक-दन्तॊ, एक-ब्रहभ सनातनभ्। एकभेवाद्वद्वतीमॊ , नभासभ ऋण-भुक्तमे॥३॥ शुक्राम्फयॊ शुक्र-वणं, शुक्र-गन्धानुरेऩनभ ्। सवा-शुक्र-भमॊ देवॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥४॥ यक्ताम्फयॊ यक्त-वणं, यक्त-गन्धानुरेऩनभ्। यक्त-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥५॥ कृ ष्णाम्फयॊ कृ ष्ण-वणं, कृ ष्ण-गन्धानुरेऩनभ्। कृ ष्ण-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥६॥ ऩीताम्फयॊ ऩीत-वणं, ऩीत-गन्धानुरेऩनभ्। ऩीत-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥७॥ नीराम्फयॊ नीर-वणं, नीर-गन्धानुरेऩनभ्। नीर-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥८॥ धूम्राम्फयॊ धूम्र-वणं, धूम्र-गन्धानुरेऩनभ्। धूम्र-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥९॥ सवााम्फयॊ सवा-वणं, सवा-गन्धानुरेऩनभ ्। सवा-ऩुष्ऩै ऩूज्मभानॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥१०॥ बि-जातॊ रुऩॊ , ऩाशाॊकु श-धयॊ शुबभ्। सवा-ववघ्न-हयॊ देवॊ, नभासभ ऋण-भुक्तमे॥११॥ ॥पर-श्रुतत॥ म् ऩठेत ् ऋण-हयॊ-स्तोिॊ, प्रात्-कारे सुधी नय्। षण्भासाभ्मन्तये ैव, ऋणच्छेदो बववष्मतत॥ बावाथथ: जो व्मत्क्त उक्त ऋण भो न स्तोि का ववधध-ववधान व ऩूणा तनष्ठा से तनमसभत प्रात् कार ऩाठ कयता हैं उसके सभस्त प्रकाय के ऋणों से भुत्क्त सभर जाती हैं। गणेशजी को वप्रम हैं ससॊदूय : गणेश ऩूजन भें ससॊदूय का उऩमोग अत्मॊत शुब एवॊ राबकायी होता हैं। क्मोफकॊ बगवान गणेशजीको ससॊदूय अत्माधधक वप्रम हैं। गणेश जी को शुि घी भें ससॊदूय सभराकय रेऩ ढाने से सुख औय सौबाग्म फक प्रात्प्त होती हैं। ससॊदूयी यॊग के उऩमोग से व्मत्क्त के फुवि, आयोग्म, त्माग भें वृवि होती हैं। इसी सरमे प्राम् ज्मादातय साधु-सॊत के वस्ि का यॊग ससॊदूयी दह होता हैं। गणेशजी फक सूॊड फकस ओय हो?: भॊददय औय घय भें स्थावऩत फकजाने वारी बगवान गणेश प्रततभा भें सूॊड फकसी प्रततभा भें दाईं तो फकसी प्रततभा भें फाईं ओय देखने को सभरती हैं। घय भें फाईं ओय सूॊडवारे गणेशही स्थावऩत कयना शुब परप्रद भानागमा हैं। क्मोफकॊ जहाॊ फाईं सूॊड वारे गणॆश सौम्म स्वरूऩ के प्रततक हैं, वहीॊ दाईं ओय तयप सूॊड वारे गणॆशजी अत्ग्न (उग्र) स्वरुऩ के भाने जाते हैं।
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    57 ससतम्फय -2019 जफ गणेशजी ने ूय फकम कु फेय का अहॊकाय  सॊकरन गुरुत्व कामाारम एक ऩौयाणणक कथा के अनुशाय हैं। कु फेय तीनों रोकों भें सफसे धनी थे। एक ददन उन्होंने सो ा फक हभाये ऩास इतनी सॊऩत्त्त हैं, रेफकन कभ ही रोगों को इसकी जानकायी हैं। इससरए उन्होंने अऩनी सॊऩत्त्त का प्रदशान कयने के सरए एक बव्म बोज का आमोजन कयने की फात सो ी। उस भें तीनों रोकों के सबी देवताओॊ को आभॊत्रित फकमा गमा। बगवान सशव कु फेयके इष्ट देवता थे, इससरए उनका आशीवााद रेने वह कै राश ऩहुॊ े औय कहा, प्रबो! आज भैं तीनों रोकों भें सफसे धनवान हूॊ, मह सफ आऩ की कृ ऩा का पर हैं। अऩने तनवास ऩय एक बोज का आमोजन कयने जा यहा हूॉ, कृ ऩमा आऩ ऩरयवाय सदहत बोज भें ऩधायने की कृ ऩा कये। बगवान सशव कु फेय के भन का अहॊकाय ताड गए, फोरे, वत्स! भैं फूढ़ा हो रा हूॉ, इस सरमे कहीॊ फाहय नहीॊ जाता। इस सरमे तुम्हायें बोज भैं नहीॊ आसकता। सशवजी फक फात ऩय कु फेय धगड-धगडाने रगे, बगवन! आऩके फगैय तो भेया साया आमोजन फेकाय रा जाएगा। तफ सशव जी ने कहा, एक उऩाम हैं। भैं अऩने छोटे फेटे गणऩतत को तुम्हाये बोज भें जाने को कह दूॊगा। कु फेय सॊतुष्ट होकय रौट आए। तनमत सभम ऩय कु फेय ने बव्म बोज का आमोजन फकमा। तीनों रोकों के देवता ऩहुॊ ुके थे। अॊत भें गणऩतत आए औय आते ही कहा, भुझको फहुत तेज बूख रगी हैं। बोजन कहाॊ है। कु फेय उन्हें रे गए बोजन से सजे कभये भें। गणऩतत को सोने की थारी भें बोजन ऩयोसा गमा। ऺण बय भें ही ऩयोसा गमा साया बोजन खत्भ हो गमा। दोफाया खाना ऩयोसा गमा, उसे बी खा गए। फाय-फाय खाना ऩयोसा जाता औय ऺण बय भें गणेश जी उसे ट कय जाते। थोडी ही देय भें हजायों रोगों के सरए फना बोजन खत्भ हो गमा, रेफकन गणऩतत का ऩेट नहीॊ बया। गणऩतत यसोईघय भें ऩहुॊ े औय वहाॊ यखा साया कच् ा साभान बी खा गए, तफ बी बूख नहीॊ सभटी। जफ सफ कु छ खत्भ हो गमा तो गणऩतत ने कु फेय से कहा, जफ तुम्हाये ऩास भुझे णखराने के सरए कु छ था ही नहीॊ तो तुभने भुझे न्मोता क्मों ददमा था? गणऩतत जी फक मह फात सुनकय कु फेय का अहॊकाय ूय- ूय हो गमा।  क्मा आऩके फच् े कु सॊगती के सशकाय हैं?  क्मा आऩके फच् े आऩका कहना नहीॊ भान यहे हैं?  क्मा आऩके फच् े घय भें अशाॊतत ऩैदा कय यहे हैं? घय ऩरयवाय भें शाॊतत एवॊ फच् े को कु सॊगती से छु डाने हेतु फच् े के नाभ से गुरुत्व कामाारत द्वाया शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त वशीकयण कव एवॊ एस.एन.डडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भें स्थावऩत कय अल्ऩ ऩूजा, ववधध-ववधान से आऩ ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं। मदद आऩ तो आऩ भॊि ससि वशीकयण कव एवॊ एस.एन.डडब्फी फनवाना ाहते हैं, तो सॊऩका इस कय सकते हैं। GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com www.gurutvajyotish.com and gurutvakaryalay.blogspot.com
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    58 ससतम्फय -2019 एकदॊत कथा गणेश  सॊकरन गुरुत्व कामाारम एकदॊत कै से कहराए गणेशजी भहाबायत ववश्व का सफसे फडा भहाकाव्म एवॊ ग्रॊथ हैं। त्जसकी य ना भें एक राख से ज्मादा श्रोको का प्रमोग हुवा हैं। एसी रोकभान्मता हैं फक ब्रहभाजी ने स्वप्न भें ऋवष ऩयाशय एवॊ सत्मवती के ऩुि भहवषा व्मास को भहाबायत सरखने की प्रेयणा दी थी। भहाबायत के य नाकाय अरौफकक शत्क्त से सम्ऩन्न भहवषा व्मास त्रिकार िष्टा थे। इस सरमे भहवषा व्मास ने भहाबायत सरखने का मह काभ स्वीकाय कय सरमा, रेफकन भहवषा व्मास के भत्स्तष्क भें त्जस तीव्रतासे भहाबायत के भॊि आ यहेथे इस कायण उन भॊिो को उसी तीव्रता से को कोई सरखने वारा मोग्म व्मत्क्त न सभरा। वे ऐसे फकसी व्मत्क्त की खोज भें रग गए जो भहाबायत सरख सके । भहाबायत के प्रथभ अध्माम भें उल्रेख हैं फक वेद व्मास ने गणेशजी को भहाबायत सरखने का प्रस्ताव ददमा तो गणेशजी ने भहाबायत सरख का प्रस्ताव स्वीकाय कय सरमा। गणेशजी ने भहाबायत सरखने के ऩहरे शता यखी फक भहवषा कथा सरखवाते सभम एक ऩर के सरए बी नहीॊ रुकें गे। इस शता को भानते हुए भहवषा ने बी एक शता यख दी फक गणेशजी बी एक-एक वाक्म को त्रफना सभझे नहीॊ सरखेंगे। भहाबायत सरखते सभम इस शता के कायणा गणेशजी के सभझने के दौयान भहवषा को सो ने का अवसय सभर जाता था। भहाबायत सरखने गणेशजी ने अऩना एक दाॉत तोडकय उसफक रेखनी फानई। इस सरमे उन्हें एकदॊत कहा जाता हैं। भाना जाता है फक त्रफना रुके सरखने की शीघ्रता भें मह दाॉत टूटा था। एक दाॊत टूट ने फक औय एक कहानी हैं ब्रहभावैवता ऩुयाण के अनुशाय ऩयशुयाभ शीवजी को सभल्ने कै रश गमे। कै रश के प्रवेश द्वाय ऩय ही गणेश ने ऩयशुयाभ को योक सरमी फकन्तु ऩयशुयाभ रुके नहीॊ औय फरऩूवाक प्रवेश कयने का प्रमास फकमा। तफ गणेशजी नें ऩयशुयाभ से मुि कय उनको स्तत्म्बत कय अऩनी सूॉड भें रऩेटकय सभस्त रोकों भें भ्रभण कयाते हुए गौरोक भें बगवान श्रीकृ ष्ण का दशान कयाते हुए बूतर ऩय ऩटक ददमा। ऩयशुयाभ ने क्रोध भें पयसे(ऩयशु)से गणेशजी के एक दाॊत को काट डारा। तसबसे गणेश को एकदॊत कहा जाता हैं। एकदन्त कथा एकदन्तावतायौ वै देदहनाॊ ब्रहभधायक्। भदासुयस्म हन्ता स आखुवाहनग् स्भृत्।। बावाथथ: बगवान ् गणेश का ‘एक दन्तावताय’ देदह- ब्रहभधायक है, वह भदासुयका वध कयनेवारा है; उसका वाहन भूषक फतामा गमा है। वह भहवषा च्मवन का ऩुि भदासुय एक फरवान ् ऩयाक्रभी दैत्म था। एक फाय वह अऩने वऩता से आऻा प्राप्त कय दैत्मगुरु शुक्रा ामा के ऩास गमा। उसने शुक्रा ामा से अनुयोध फकम फक आऩ भुझे कृ प्मा अऩना सशष्म फना रें, भैं सभग्र ब्रहभाण्ड का स्वाभी फनना ाहता हूॉ। कृ प्मा आऩ भेयी इच्छा ऩूयी कयने के सरमे भेया उध त भागादशान कयें। शुक्रा ामा ने सन्तुष्ट होकय उसे अऩना सशष्म फना सरमा। सवाऻ आ ामा ने उसे "ह्ीं" (एकाऺयी) शत्क्त भन्ि प्रदान फकमा। भदासुय अऩने गुरुदेव शुक्रा ामा से आऻा ऩाकय के उनके यणों भें प्रणाभ कय आशीवााद रेकय जॊगर भें तऩ कयने के सरमे रा गमा। उसने जगदम्फा का ध्मान कयते हुए एक हजाय वषों तक कठोय तऩ फकमा। तऩ कयते हुवे उसका शयीय दीभकों की फाॉफी से ढॊक गमा। उसके ायों तयप वृऺ उग गमे औय रताएॉ पै र
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    59 ससतम्फय -2019 गमीॊ। उसके कठोय तऩसे प्रसन्न होकय भाॊ बगवती प्रकट हुईं। बगवती ने उसे नीयोग यहने तथा तनष्कॊ टक सम्ऩूणा ब्रहभाण्ड का याज्म प्राप्त होने का वयदान ददमा। भदासुयने ऩहरे सम्ऩूणा धयती ऩय अऩना साम्राज्म स्थावऩत फकमा। फपय स्वगा ऩय साम्राज्म स्थावऩत कयने के सरमे ढ़ाई की। इन्ि इत्मादद देवाताओॊ को ऩयाजीत कय उसने स्वगा का बी साम्राज्म स्थावऩत फकमा। उसने प्रभदासुय की कन्मा सारसा से वववाह फकमा। सारसासे उसे तीन ऩुि हुए। उसने बगवान ् सशव को ऩयात्जत कय ददमा। सवाि असुयों का क्रू यतभ शासन रने रगा। ऩृथ्वीऩय सभस्त धभा-कभा रुप्त होने रगा। सवाि हाहाकाय भ गमा। देवतागण एवॊ भुतनगण दु्खीत होने रगे। ध त्न्तत देवता सनत्कु भाय के ऩास गमे, तथा उनसे असुयो के ववनाश एवॊ ऩून् धभा-स्थाऩना का उऩाम ऩूछा् सनत्कु भाय ने कहा देवगण आऩ रोग श्रिाऩूवाक बगवान ् एकदन्त की उऩासना कयें। वे सन्तुष्ट होकय अवश्म ही आऩरोगों का भनोयथ ऩूणा कयेंगे। भहवषा के उऩदेश अनुसाय देवगण एकदन्त की उऩासना कयन रगे। तऩस्मा के सौ वषा ऩूये होने ऩय बगवान ् एकदन्त प्रकट हुए तथा वय भाॉगने के सरमे कहा। देवताओॊ ने तनवेदन फकमा प्रबु भदासुय के शासन भें देवताओॊ का स्थानभ्रष्ट औय भुतनगण कभाभ्रष्ट हो गमे हैं। आऩ हभें इस कष्ट से भुत्क्त ददराकाय अऩनी बत्क्त प्रदान कयें। उधय देववषाने भदासुय को सू ना दी फक बगवान ् एकदन्त ने देवताओॊ को वयदान ददमा हैं। अफ वे तुम्हाया प्राण-हयण कयने के सरमे तुभसे मुि कयना ाहते हैं। भदासुय अत्मन्त कु वऩत होकय अऩनी ववशार सेना के साथ एकदन्त से मुि कयने रा गमा। बगवान ् एकदन्त यास्ते भें ही प्रकट हो गमे। याऺसों ने देखा फक बगवान ् एकदन्त भूषक ऩय सवाय होकय साभने से रे आ यहे हैं। उनकी आकृ तत अत्मन्त बमानक हैं। उनके हाथोंभें ऩयशु, ऩाश आदद आमुध हैं। उन्होंने असुयों से कहा फक तुभ अऩने स्वाभी से कह दो मदद वह जीववत यहना ाहता हैं तो देवताओॊ से द्वेष छोड दे। उनका याज्म उन्हें वाऩस कय दे। अगय वह ऐसा नहीॊ कयता हैं तो भैं तनत्श् त ही उसका वध करूॉ गा। भहाक्रू य भदासुय मुि के सरमे तैमाय हो गमा जैसे ही उसने अऩने धनुष ऩय फाण ढ़ाना ाहा फक बगवान ् एकदन्त का तीव्र ऩयशु उसे रगा औय वह फेहोश होकय धगय गमा। फेहोशी टूटने ऩय भदायसुय सभझ गमा फक मह सवा सभथा ऩयभात्भा ही हैं। उसने हाथ जोडकय स्तुतत कयते हुए कहा फक प्रबु आऩ भुझे ऺभा कय अऩनी दृढ़ बत्क्त प्रदान कयें। एकदन्त ने प्रसन्न होकय कहा फक जहाॉ भेयी ऩूजा आयाधना हो, वहाॉ तुभ कदावऩ भत जाना। आजसे तुभ ऩातार भें यहोगे। देवता बी प्रसन्न होकय एकदन्त की स्तुतत कयके स्वगा रोक रे गमे। *** नवयत्न जडडत श्री मॊि शास्ि व न के अनुसाय शुि सुवणा मा यजत भें तनसभात श्री मॊि के ायों औय मदद नवयत्न जडवा ने ऩय मह नवयत्न जडडत श्री मॊि कहराता हैं। सबी यत्नो को उसके तनत्श् त स्थान ऩय जड कय रॉके ट के रूऩ भें धायण कयने से व्मत्क्त को अनॊत एश्वमा एवॊ रक्ष्भी की प्रात्प्त होती हैं। व्मत्क्त को एसा आबास होता हैं जैसे भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हैं। नवग्रह को श्री मॊि के साथ रगाने से ग्रहों की अशुब दशा का धायण कयने वारे व्मत्क्त ऩय प्रबाव नहीॊ होता हैं। गरे भें होने के कायण मॊि ऩववि यहता हैं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो जर त्रफॊदु शयीय को रगते हैं, वह गॊगा जर के सभान ऩववि होता हैं। इस सरमे इसे सफसे तेजस्वी एवॊ परदातम कहजाता हैं। जैसे अभृत से उत्तभ कोई औषधध नहीॊ, उसी प्रकाय रक्ष्भी प्रात्प्त के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भें नहीॊ हैं एसा शास्िोक्त व न हैं। इस प्रकाय के नवयत्न जडडत श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्वाया शुब भुहूता भें प्राण प्रततत्ष्ठत कयके फनावाए जाते हैं। Rs: 4600, 5500, 6400 से , से अधधक >> OrderNow GURUTVA KARYALAY
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    60 ससतम्फय -2019 वक्रतुण्ड कथा  सॊकरन गुरुत्व कामाारम वक्रतुण्डावतायश् देहानाॊ ब्रहभधायक्। भत्सयासुयहन्ता स ससॊहवाहनग् स्भृत्।। बगवान् श्रीगणेश का ‘वक्रतुण्डावताय’ ब्रहभरूऩ से सम्ऩूणा शयीयों को धायण कयनेवारा, भत्सयासुय का वध कयनेवारा तथा ससॊहवाहन ऩय रनेवारा हैं। भुद्गर ऩुयाण के अनुसाय बगवान् गणेश के अनेकों अवताय हैं, त्जनभें आठ अवताय प्रभुख हैं। ऩहरा अवताय बगवान् वक्रतुण्ड का है। ऐसी कथा है फक देवयाज इन्ि के प्रभाद से भत्सयासुय का जन्भ हु्आ। उसने दैत्मगुरु शुक्रा ामा से बगवान् सशवके ॐ नभ् सशवाम (ऩञ् ाऺयी भन्ि) की दीऺा प्राप्त कय बगवान् शॊकय की कठोय तऩस्मा की बगवान् शॊकय ने प्रसन्न होकय उसे अबम होने का वयदान ददमा। वयदान प्राप्त कय जफ भत्सयासुय घय रौटा तफ शुक्रा ामा ने उसे दैत्मों का याजा फना ददमा। दैत्मभत्न्िमों ने शत्क्तशारी भत्सय को ववश्व ऩय ववजम प्राप्त कयने की सराह दी। शत्क्त औय ऩद के भद से ूय भत्सयासुय ने अऩनी ववशार सेना के साथ ऩृथ्वी के याजाओॊ ऩय आक्रभण कय ददमा। कोई बी याजा असुय के साभने दटक नहीॊ सका। कु छ ऩयात्जत हो गमे औय कु ठ प्राण फ ाकय कन्दयाओॊ भें तछऩ गमे। इस प्रकाय सम्ऩूणा ऩृथ्वी ऩय भत्सयासुय का शासन हो गमा। ऩृथ्वी साम्राज्म प्राप्त कय उस दैत्म ने क्रभश् ऩातार औय स्वगा ऩय बी ढ़ाई कय दी। शेष ने ववनमऩूवाक उसके अधीन यहकय उसे कय ऩातार रोक देना स्वीकाय कय सरमा। इन्ि इत्मादद देवता उससे ऩयात्जत होकय बाग गमे। भत्सयासुय स्वगा का बी सम्राट हो गमा। असुयों से दु्खी होकय देवतागण ब्रहभा औय ववष्णु को साथ रेकय सशवजी के कै रास ऩहुॉ े। उन्होंने बगवान् शॊकय को दैत्मों के अत्मा ाय वृताॊत सुनामा। बगवान् शॊकयने भत्सयासुय के इस दुष्कभा की घोय तनन्दा की। मह सभा ाय सुनकय भत्सयासुय ने कै रास ऩय बी आक्रभण कय ददमा। बगवान् सशव से उसका घोय मुि हुआ। ऩयन्तु, त्रिऩुयारय बगवान् सशव बी जीत नहीॊ सके । उसने उन्हें बी कठोय ऩाश भें फाॉध सरमा औय कै राश का स्वाभी फनकय वहीॊ यहने रगा। ायों तयप दैत्मों का अत्मा ाय होने रगा। दु्खी देवताओॊ के साभने भत्सयासुय के ववनाश का कोई भागा नहीॊ फ ा। वे अत्मन्त ध त्न्तत औय दुफार हो यहे थे। उसी सभम वहाॉ बगवान दत्तािेम आ ऩहुॉ े। उन्होंन देवताओॊ को वक्रतुण्ड के गॊ(एकाऺयी भन्ि) का उऩदेश फकमा। सभस्त देवता बगवान् वक्रतुण्ड के ध्मान के साथ एकाऺयी भन्ि का जऩ कयने रगे। उनकी आयाधना से सन्तुष्ट होकय तत्कार परदाता वक्रतुण्ड प्रकट हुए। उन्होंने देवताओॊसे कहा आऩ रोग तनत्श् न्त हो जामॉ। भैं भत्सयासुय के गवा को ूय- ूय कय दूॉगा। बगवान् वक्रतुण्ड ने अऩने असॊख्म गणों के साथ भत्सयासुय के नगयों को ायों तयप से घेय सरमा। बमॊकय मुि तछड गमा। ऩाॉ ददनों तक रगाताय मुि रता यहा। भत्सयासुय के सुन्दयवप्रम एवॊ ववषमवप्रम नाभक दो ऩुि थे वक्रतुण्ड के गणों ने उन्हें भाय डारा। ऩुि वध से व्माकु र भत्सयासुय यणबूसभ भें उऩत्स्थत हुआ। वहाॉ से उसने बगवान् वक्रतुण्ड को अऩशब्द कहे। बगवान् वक्रतुण्ड ने प्रबावशारी स्वय भें कहा मदद तुझे प्राणवप्रम हैं तो शस्ि यखकय तु भेयी शयण भें आ जा नहीॊ तो तनत्श् त भाया जामगा। वक्रतुण्ड के बमानक रूऩ को देखकय भत्सयासुय अत्मन्त व्माकु र हो गमा। उसकी सायी शत्क्त ऺीण हो गमी। बमके भाये वह काॉऩने रगा तथा ववनमऩूवाक वक्रतुण्ड की स्तुतत कयने रगा। उसकी प्राथाना से सन्तुष्ट होकय दमाभम वक्रतुण्ड ने उसे अबम प्रदान कयते हुए अऩनी बत्क्त का वयदान फकमा तथा सुख शाॊतत से जीवन त्रफताने के सरमे ऩातार रोक जाने का आदेश ददमा। भत्सयासुय से तनत्श् न्त होकय देवगण वक्रतुण्ड की स्तुतत कयने रगे। देवताओॊ को स्वतन्ि कय प्रबु वक्रतुण्ड ने उन्हें बी अऩनी बत्क्त प्रदान की।
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    61 ससतम्फय -2019 ॥ ववनामकस्तोि ॥ भूवषकवाहन भोदकहस्त ाभयकणा ववरत्म्फतसूि । वाभनरूऩ भहेश्वयऩुि ववघ्नववनामक ऩाद नभस्ते ॥ देवदेवसुतॊ देवॊ जगद्वद्वघ्नववनामकभ् । हत्स्तरूऩॊ भहाकामॊ सूमाकोदटसभप्रबभ् ॥ १ ॥ वाभनॊ जदटरॊ कान्तॊ ह्स्वग्रीवॊ भहोदयभ ् । धूम्रससन्दूयमुद्गण्डॊ ववकटॊ प्रकटोत्कटभ् ॥ २ ॥ एकदन्तॊ प्ररम्फोष्ठॊ नागमऻोऩवीततनभ् । त्र्मऺॊ गजभुखॊ कृ ष्णॊ सुकृ तॊ यक्तवाससभ् ॥ ३ ॥ दन्तऩाणणॊ वयदॊ ब्रहभण्मॊ ब्रहभ ारयणभ् । ऩुण्मॊ गणऩततॊ ददव्मॊ ववघ्नयाजॊ नभाम्महभ् ॥ ४ ॥ देवॊ गणऩततॊ नाथॊ ववश्वस्माग्रे तु गासभनभ् । देवानाभधधकॊ श्रेष्ठॊ नामकॊ सुववनामकभ ् ॥ ५ ॥ नभासभ बगवॊ देवॊ अद्भुतॊ गणनामकभ् । वक्रतुण्ड प्र ण्डाम उग्रतुण्डाम ते नभ् ॥ ६ ॥ ण्डाम गुरु ण्डाम ण्ड ण्डाम ते नभ् । भत्तोन्भत्तप्रभत्ताम तनत्मभत्ताम ते नभ् ॥ ७ ॥ उभासुतॊ नभस्मासभ गङ्गाऩुिाम ते नभ् । ओङ्कायाम वषट्काय स्वाहाकायाम ते नभ् ॥ ८ ॥ भन्िभूते भहामोधगन ् जातवेदे नभो नभ् । ऩयशुऩाशकहस्ताम गजहस्ताम ते नभ् ॥ ९ ॥ भेघाम भेघवणााम भेघेश्वय नभो नभ् । घोयाम घोयरूऩाम घोयघोयाम ते नभ् ॥ १० ॥ ऩुयाणऩूवाऩूज्माम ऩुरुषाम नभो नभ् । भदोत्कट नभस्तेऽस्तु नभस्ते ण्डववक्रभ ॥ ११ ॥ ववनामक नभस्तेऽस्तु नभस्ते बक्तवत्सर । बक्तवप्रमाम शान्ताम भहातेजत्स्वने नभ् ॥ १२ ॥ मऻाम मऻहोिे मऻेशाम नभो नभ् । नभस्ते शुक्रबस्भाङ्ग शुक्रभाराधयाम ॥ १३ ॥ भदत्क्रन्नकऩोराम गणाधधऩतमे नभ् । यक्तऩुष्ऩ वप्रमाम यक्त न्दन बूवषत ॥ १४ ॥ अत्ग्नहोिाम शान्ताम अऩयाजय्म ते नभ् । आखुवाहन देवेश एकदन्ताम ते नभ् ॥ १५ ॥ शूऩाकणााम शूयाम दीघादन्ताम ते नभ् । ववघ्नॊ हयतु देवेश सशवऩुिो ववनामक् ॥ १६ ॥ परश्रुतत जऩादस्मैव होभाच् सन्ध्मोऩासनसस्तथा । ववप्रो बवतत वेदाढ्म् ऺत्रिमो ववजमी बवेत ् ॥ वैश्मो धनसभृि् स्मात ् शूि् ऩाऩै् प्रभुच्मते । गसबाणी जनमेत्ऩुिॊ कन्मा बताायभाप्नुमात ् ॥ प्रवासी रबते स्थानॊ फिो फन्धात ् प्रभुच्मते । इष्टससविभवाप्नोतत ऩुनात्मासत्तभॊ कु रॊ ॥ सवाभङ्गरभाङ्गल्मॊ सवाऩाऩप्रणाशनभ् । सवाकाभप्रदॊ ऩुॊसाॊ ऩठताॊ श्रुणुताभवऩ ॥ . ॥ इतत श्रीब्रहभाण्डऩुयाणे स्कन्दप्रोक्त ववनामकस्तोिॊ सम्ऩूणाभ ् ॥ Kamiya Sindoor Available in Natural Solid Rock Shape 7 Gram to 100 Gram Pack Available *Powder Also Available Kamiya Sindoor Use in Various Religious Pooja, Sadhana and Customize Wish Fulfillment GURUTVA KARYALAY Call Us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 or Shop Online @ www.gurutvakaryalay.com
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    62 ससतम्फय -2019 ॥ श्री ससविववनामक स्तोिभ् ॥ जमोऽस्तु ते गणऩते देदह भे ववऩुराॊ भततभ्। स्तवनभ् ते सदा कतुं स्पू तता मच्छभभातनशभ् ॥१॥ प्रबुॊ भॊगरभूततं त्वाॊ न्िेन्िाववऩ ध्मामत्। मजतस्त्वाॊ ववष्णुसशवौ ध्मामतश् ाव्ममॊ सदा ॥२॥ ववनामकॊ प्राहुस्त्वाॊ गजास्मॊ शुबदामकॊ । त्वन्नाम्ना ववरमॊ मात्न्त दोषा् कसरभरान्तक ॥३॥ त्वत्ऩदाब्जाॊफकतश् ाहॊ नभासभ यणौ तव। देवेशस्त्वॊ ैकदन्तो भद्वद्वऻत्प्तॊ शृणु प्रबो ॥४॥ कु रु त्वॊ भतम वात्सल्मॊ यऺ भाॊ सकरातनव। ववघ्नेभ्मो यऺ भाॊ तनत्मॊ कु रु भे ाणखरा् फक्रमा्॥५॥ गौरयसुतस्त्वॊ गणेश् शॄणु ववऻाऩनॊ भभ। त्वत्ऩादमोयनन्माथॉ मा े सवााथा यऺणभ् ॥६॥ त्वभेव भाता वऩता देवस्त्वॊ भभाव्मम्। अनाथनाथस्त्वॊ देदह ववबो भे वाॊतछतॊ परभ् ॥७॥ रॊफोदयस्वभ् गजास्मो ववबु् ससविववनामक्। हेयॊफ् सशवऩुिस्त्वॊ ववघ्नेशोऽनाथफाॊधव् ॥८॥ नागाननो बक्तऩारो वयदस्त्वॊ दमाॊ कु रु। ससॊदूयवणा् ऩयशुहस्तस्त्वॊ ववघ्ननाशक् ॥९॥ ववश्वास्मॊ भॊगराधीशॊ ववघ्नेशॊ ऩयशूधयॊ। दुरयतारयॊ दीनफन्धूॊ सवेशॊ त्वाॊ जना जगु् ॥१०॥ नभासभ ववघ्नहताायॊ वन्दे श्रीप्रभथाधधऩॊ। नभासभ एकदन्तॊ दीनफन्धू नभाम्महभ् ॥ ११॥ नभनॊ शॊबुतनमॊ नभनॊ करुणारमॊ। नभस्तेऽस्तु गणेशाम स्वासभने नभोऽस्तु ते ॥१२॥ नभोऽस्तु देवयाजाम वन्दे गौयीसुतॊ ऩुन्। नभासभ यणौ बक्त्मा बार न्िगणेशमो् ॥१३॥ नैवास्त्माशा भत्च् त्ते त्वद्भक्तेस्तवनस्म । बवेत्मेव तु भत्च् त्ते हमाशा तव दशाने ॥१४॥ अऻानश् ैव भूढोऽहॊ ध्मामासभ यणौ तव। दशानॊ देदह भे शीघ्रॊ जगदीश कृ ऩाॊ कु रु ॥१५॥ फारकश् ाहभल्ऩऻ् सवेषाभसस ेश्वय्। ऩारक् सवाबक्तानाॊ बवसस त्वॊ गजानन ॥१६॥ दरयिोऽहॊ बाग्महीन् भत्च् त्तॊ तेऽस्तु ऩादमो्। शयण्मॊ भाभनन्मॊ ते कृ ऩारो देदह दशानभ् ॥१७॥ इदॊ गणऩतेस्तोिॊ म् ऩठेत्सुसभादहत्। गणेशकृ ऩमा ऻानससत्ध्धॊ स रबते धनॊ ॥१८॥ ऩठेद्म् ससविदॊ स्तोिॊ देवॊ सॊऩूज्म बत्क्तभान्। कदावऩ फाध्मते बूतप्रेतादीनाॊ न ऩीडमा ॥१९॥ ऩदठत्वा स्तौतत म् स्तोिसभदॊ ससविववनामकॊ । षण्भासै् ससविभाप्नोतत न बवेदनृतॊ व ् गणेश यणौ नत्वा ब्रूते बक्तो ददवाकय् ॥२०॥ ॥ इतत श्री ससविववनामक स्तोिभ् सम्ऩूणाभ्॥ ***
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    63 ससतम्फय -2019 सशवशत्क्तकृ तॊ गणाधीशस्तोिभ श्रीशश्क्तसशवावूचतु: नभस्ते गणनाथाम गणानाॊ ऩतमे नभ:। बत्क्तवप्रमाम देवेश बक्तेभ्म: सुखदामक॥ स्वानन्दवाससने तुभ्मॊ ससविफुविवयाम । नासबशेषाम देवाम ढुत्ण्ढयाजाम ते नभ:॥ वयदाबमहस्ताम नभ: ऩयशुधारयणे। नभस्ते सृणणहस्ताम नासबशेषाम ते नभ:॥ अनाभमाम सवााम सवाऩूज्माम ते नभ:। सगुणाम नभस्तुभ्मॊ ब्रहभणे तनगुाणाम ॥ ब्रहभभ्मो ब्रहभदािे गजानन नभोस्तु ते। आददऩूज्माम ज्मेष्ठाम ज्मेष्ठयाजाम ते नभ:॥ भािे वऩिे सवेषाॊ हेयम्फाम नभो नभ:। अनादमे ववघ्नेश ववघन्कि्ये नभो नभ:॥ ववघन्हि्ये स्वबक्तानाॊ रम्फोदय नभोस्तु ते। त्वदीमबत्क्तमोगेन मोगीशा: शात्न्तभागता:॥ फकॊ स्तुवो मोगरूऩॊ तॊ प्रणभावश् ववघन्ऩभ्। तेन तुष्टो बव स्वासभत्न्नत्मुक्त्वा तॊ प्रणेभतु:॥ तावुत्थाप्म गणाधीश उवा तौ भहेश्वयौ॥ श्रीगणेश उवाच बवत्कृ तसभदॊ स्तोिॊ भभ बत्क्तवववधानभ्। बववष्मतत सौख्मस्म ऩठते श्रृण्वते प्रदभ्। बुत्क्तभुत्क्तप्रदॊ ैव ऩुिऩौिाददकॊ तथा॥ धनधान्माददकॊ सवा रबते तेन तनत्श् तभ्॥ जो व्मत्क्त इस स्तोि का तनमसभत रुऩ से ववधधवत श्रिा बत्क्त से ऩठन औय श्रवण कयता हैं। उसे सबी प्रकाय के सुख प्राप्त होते हैं। इसके अततरयक्त स्तोि का ऩाठ कयने से व्मत्क्त को बोग-भोऺ तथा ऩुि औय ऩौि आदद का राब होता हैं। स्तोि के द्वाया व्मत्क्त को धन-धान्म इत्मादद सबी वस्तुएॉ तनत्श् तरूऩ से प्राप्त होती हैं।
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    64 ससतम्फय -2019 गणेश ऩुयाण फक भदहभा  सॊकरन गुरुत्व कामाारम गणेश ऩुयाण शौनक जी ने ऩूछा हे प्रबो! गणेश ऩुयाण का आयम्ब फकस प्रकाय हुआ? मह आऩ भुझे फताने की कृ ऩा कयें। इस ऩय सूत जी फोरे हे शौनक! मद्यवऩ गणेश ऩुयाण अतत प्रा ीन हैं, क्मोंफक बगवान गणेश तो आदद हैं, न जाने कफ से गणेश जी अऩने उऩासकों ऩय कृ ऩा कयते रे आ यहे हैं। गणेशजी के तो अनन्त रयि हैं, त्जनका सॊग्रह एक भहाऩुयाण का रूऩ रे सकता हैं। गणेश ऩुयाण को एक फाय बगवान ववष्णु ने नायद जी को औय बगवान शॊकय ने भाता ऩावाती जी को सुनामा था। फाद भें वही ऩुयाण सॊऺेऩ रूऩ भें ब्रहभाजी ने ऩुि भहवषा वेदव्मास को सुनामा औय फपय व्मास जी से भहवषा बृगु ने सुना। बृगु ने कृ ऩा कयके सौयाष्र के याजा सोभकान्त को सुनामा था। तफ से वह ऩुयाण अनेक कथाओॊ भें ववस्तृत होता औय अनेक कथाओॊ से यदहत होता हुआ अनेक रूऩ भें प्र सरत हैं। शौनक जी ने ऩूछा बगवान ्! आऩ मह फताने का कष्ट कयें फक याजा सोभकान्त कौन था? उसने भहवषा से गणेश ऩुयाण का श्रवण फकस जगह फकमा था? एवॊ उस ऩुयाण के श्रवण से उसे क्मा-क्मा उऩरत्ब्धमाॉ हुई? हे नाथ! भुझे श्री गणेश्वय की कथा के प्रतत उत्कण्ठा फढ़ती ही जा यही हैं। सूतजी फोरे-'हे शौनक! सौयाष्र के देवनगय नाभ की एक प्रससि याजधानी थी। वहाॉ का याजा सोभकान्त था। याजा अऩनी प्रजा का ऩारन ऩुि के सभान कयता था। वह वेदऻान सम्ऩन्न, शस्ि-ववद्या भें ऩायॊगत एवॊ प्रफर प्रताऩी याजा सभस्त याजाओॊ भें भान्म तथा अत्मन्त वैबवशारी था। उसका ऐश्वमा कु फेय के बी ऐश्वमा को रत्ज्जत कयता था। उसने अऩने ऩयाक्रभ से अनेकों देश जीत सरमे थे। उसकी ऩत्नी अत्मन्त रूऩवती, गुणवती, धभाऻा एवॊ ऩततव्रता धभा का ऩारन कयने वारी थी। वह सदैव अऩने प्राणनाथ फक सेवा भें रगी यहती थी। उसका नाभ सुधभाा था। जैसे वह ऩततव्रता थी, वैसे ही याजा बी एक ऩत्नी व्रत का ऩारन कयने वारा था। उसका हेभकान्त नाभक एक सुन्दय ऩुि था। ऩुि बी सोभकान्त फक तयह सबी ववद्याओॊ का ऻाता औय अस्ि-शस्िादद के अभ्मास भें तनऩुण हो गमा था। इन सबी श्रेष्ठ सम्ऩन्न, सद्गुणी रऺणों से याजा अऩनी प्रजाजनों के दहतों का अत्मन्त ऩोषक था। इस प्रकाय याजा सोभकान्त स्िी, ऩुि, ऩशु, वाहन, याज्म एवॊ प्रततष्ठा इत्मादद से सफ प्रकायसुखी था। उसे फकसी प्रकाय का दु:ख तो था ही नहीॊ। सबी प्रजाजन उसका सम्भान कयते थे, त्जस कायण उसकी श्रेष्ठ कीतता बी सॊसायव्माऩी थी। ऩयन्तु मुवावस्था के अन्त भें सोभकान्त को घृणणत कु ष्ठ योग हो गमा। उसके अनेक उऩा ाय फकमे गमे, फकन्तु कोई राब नहीॊ हुआ। योग शीघ्रता से फढऩे रगा औय उसके कीडे ऩड गमे। जफ योग की अधधक वृवि होने रगी औय उसका कोई उऩाम न हो सका तो याजा ने अभात्मों को फुराकय कहा- सुब्रतो! जाने फकस कायण मह योग भुझे ऩीडडत कय यहा हैं। अवश्म ही मह भेयें फकसी ऩूवा जन्भ के ऩाऩ का पर होगा। इससरए भैं अफ अऩना सभस्त याज-ऩाट छोडकय वन भें यहूॉगा। अत् आऩ भेये ऩुि हेभकान्त को भेये सभान भानकय याज्म शासन का धभाऩूवाक सॊ ारन कयाते यहें। मह कहकय याजा ने शुब ददन ददखवाकय अऩने ऩुि हेभकान्त को याज्मऩद ऩय असबवषक्त फकमा औय अऩनी ऩत्नी सुधभाा के साथ तनजान वन की ओय र ददमा। प्रजाऩारक याजा के ववमोग भें सभस्त प्रजाजन अश्रु फहाते हुए उनके साथ रे। याज्म की सीभा ऩय ऩहुॉ कय याजा ने अऩने ऩुि, अभात्मगण औय प्रजाजनों को सभझामा-आऩ सफ रोग धभा के जानने वारे, श्रेष्ठ आ यण भें तत्ऩय एवॊ सरृदम हैं। मह सॊसाय तो वैसे बी ऩरयवतानशीर है। जो आज है, वह कर नहीॊ था औय आने वारे कर बी नहीॊ यहेगा। इससरए भेये जाने से दु:ख का कोई कायण नहीॊ हैं। भेये स्थान ऩय
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    65 ससतम्फय -2019 भेया ऩुि सबी कामों को कयेगा, इससरए आऩ सफ उसके अनुशासन भें यहते हुए उसे सदैव सम्भतत देते यहें। फपय ऩुि से कहा-'ऩुि! मह त्स्थतत सबी के सभऺ आती यही हैं। हभाये ऩूवा ऩुरूष बी ऩयम्ऩयागत रूऩ से वृिावस्था आने ऩय वन भें जाते यहे हैं। भैं कु छ सभम ऩदहरे ही वन भें जा यहा हूॉ तो कु छ ऩदहरे मा ऩीछे जाने भें कोई अन्तय नहीॊ ऩडता। मदद कु छ वषा फाद जाऊॉ तफ बी भोह का त्माग कयना ही होगा। इससरए, हे वत्स! तुभ दु:णखत भत होओ औय भेयी आऻा भानकय याज्म-शासन को ठीक प्रकाय राओ। ध्मान यखना ऺत्रिम धभा का कबी त्माग न कयना औय प्रजा को सदा सुखी यखना। इस प्रकाय याजा सोभकान्त ने सबी को सभझा फुझाकय वहाॉ से वाऩस रौटामा औय स्वमॊ अऩनी ऩततव्रता ऩत्त्न के साथ वन भें प्रवेश फकमा। ऩुि हेभकान्त के आग्रह से उसने सुफर औय ऻानगम्म नाभक दो अभात्मों को बी साथ रे सरमा। उन सफने एक सभतर एवॊ सुन्दय स्थान देखकय वहाॉ ववश्राभ फकमा। तबी उन्हें एक भुतनकु भाय ददखाई ददमा। याजा ने उससे ऩूछा-'तुभ कौनहो? कहाॉ यहते हो? मदद उध त सभझो तो भुझे फताओ। भुतन फारक ने कोभर वाणी भें कहा-'भैं भहवषा बृगु का ऩुि हूॉ, भेया नाभ च्मवन है। हभाया आश्रभ तनकट भें ही है। अफ आऩ बी अऩना ऩरय म दीत्जए। याजा ने कहा- 'भुतनकु भाय! आऩका ऩरय म ऩाकय भुझे फडी प्रसन्नता हुई। भैं सौयाष्र के देवनगय याज्म का अधधऩतत यहा हूॉ। अफ अऩने ऩुि को याज्म देकय भैंने अयण्म की शयण री हैं। भुझे कु ष्ठ योग अत्मन्त ऩीडडत फकमे हुए हैं, इसकी तनवृत्त्त का कोई उऩाम कयने वारा हो तो कृ ऩमा कय भुझे फताइमे। भुतनकु भाय ने कहा-'भैं अऩने वऩताजी से आऩका वृतान्त कहता हूॉ, फपय वे जैसा कहेंगे, आऩको फताऊॉ गा। मह कहकय भुतन फारक रा गमा औय कु छ देय भें ही आकय फोरा-'याजन ्! भैंने आऩका वृत्तान्त अऩने वऩताजी को फतामा। उनकी आऻा हुई हैं फक आऩ सफ भेये साथ आश्रभ भें रकय उनसे बेंट कयें तबी आऩके योग के ववषम भें बी वव ाय फकमा जामेगा। ऩूवाजन्भ का वृत्तान्त जानने के सरमे याजा अऩनी ऩत्त्न औय अभात्मों के सदहत च्मवन के साथ-साथ बृगु आश्रभ भें जा ऩहुॉ ा औय उन्हें प्रणाभ कय फोरा हे बगवान ् हे भहवषा! भैं आऩकी शयण हूॉ, आऩ भुझ कु ष्ठी ऩय कृ ऩा कीत्जए। भहवषा फोरे याजन ्! मह तुम्हाये फकसी ऩूवाजन्भ के ऩाऩ कभा का ही उदम हो गमा हैं। इसका उऩाम भैं वव ाय कय फताऊॉ गा। आज तो आऩ सफ स्नानादद से तनवृत्त होकय यात्रि-ववश्राभ कयो। भहवषा की आऻानुसाय सफने स्नान, बोजन आदद उऩयान्त यात्रि व्मतीत की औय प्रात: स्नानादद तनत्मकभों से तनवृत्त होकय भहवषा की सेवा भें उऩत्स्थत हुए। भहवषा ने कहा-'याजन ्! भैंने तुम्हाये ऩूवाजन्भ का वृत्तान्त जान सरमा हैं औय मह बी ऻात कय सरमा हैं फक फकस ऩाऩ के पर से तुम्हें इस घृणणत योग की प्रात्प्त हुई हैं। मदद तुभ ाहो तो उसे सुना दूॉ। याजा ने हाथ जोडकय तनवेदन फकमा फडी कृ ऩा होगी भुतननाथ! भैं उसे सुनने के सरए उत्कत्ण्ठत हूॉ। भहवषा ने कहा तुभ ऩूवा जन्भ भें एक धनवान वैश्म के राडरे ऩुि थे। वह वैश्म ववॊध्मा र के तनकट कौल्हाय नाभक ग्राभ भें तनवास कयता था। उसकी ऩत्नी का नाभ सुरो ना था। तुभ उसी वैश्म-दम्ऩत्त्त के ऩि हुए। तुम्हाया नाभ 'काभद था। तुम्हाया रारन-ऩारन फडे राड- ाव से हुआ। उन्होंने तुम्हाया वववाह एक अत्मन्त सुन्दयी वैश्म कन्मा से कय ददमा था, त्जसका नाभ कु टुत्म्फनी था। मद्यवऩ तुम्हायी बामाा सुशीरा थी औय तुम्हें सदैव धभा भें तनयत देखना ाहती थी, फकन्तु तुम्हाया स्वबाव वासनान्ध होने के कायण ददन प्रततददन ववकृ त होता जा यहा था। फकन्तु भाता-वऩता बी धासभाक थे, इससरए उनके साभने तुम्हायी ववकृ तत दफी यही। ऩयन्तु भाता-वऩता की भृत्मु के फाद तुभ तनयॊकु श हो गमे औय अऩनी ऩत्नी की फात बी नहीॊ भानते थे। तुम्हाये अना ाय भें प्रवृत्त देखकय उसे दु:ख होता था, तो बी उसका कु छ वश न रता था। तुम्हायी उन्भुक्ताता यभ सीभा ऩय थी। अऩनों से बी द्वेष औय क्रू यता का व्मवहाय फकमा कयते थे। हत्मा आदद कया देना तुम्हाये सरमे साभान्म फात हो गई। ऩीडडत व्मत्क्तमों ने तुम्हाये ववरूि याजा से ऩुकाय की। असबमोग रा औय तुम्हें याज्म की सीभा से बी फाहय रे जाने का आदेश हुआ। तफ तुभ घय छोडकय फकसी तनजान वन
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    66 ससतम्फय -2019 भें यहने रगे। उस सभम तुम्हाया कामा रोगों को रूटना औय हत्मा कयना ही यह गमा। एक ददन भध्माहन कार था। गुणवधाक नाभक एक ववद्वान ् ब्राहभण उधय से तनकरा। फे ाया अऩनी ऩत्नी को सरवाने के सरए ससुयार जा यहा था। तुभने उस ब्राहभण मुवक को ऩकड कय रूट सरमा। प्रततयोध कयने ऩय उसे भायने रगे तो वह ीत्काय कयने रगा- भुझे भत भाय, भत भाय। देख, भेया दूसया वववाह हुआ है, भैं ऩत्नी को रेने के सरमे जा यहा हूॉ। फकन्तु तुभ तो क्रोधावेश भें ऐसे रीन हो यहे थे फक तुभने उसकी फात सुनकय बी नहीॊ सुनी। जफ उसे भायने रगे तो उसने शाऩ दे ददमा-'अये हत्माये! भेयी हत्मा के ऩाऩ से तू सहस्र कल्ऩ तक घोय नयक बोगेगा। तुभने उसकी कोई ध न्ता न की औय ससय काट सरमा। याजन ्! तुभने ऐसी-ऐसी एक नहीॊ फत्ल्क अनेक तनयीह हत्माएॉ की थीॊ, त्जनकी गणना कयना बी ऩाऩ है। इस प्रकाय इस जन्भ भें तुभने घोय ऩाऩ कभा फकमे थे, फकन्तु फुढ़ाऩा आने ऩय जफ अशक्त हो गमे तफ तुम्हाये साथ क्रू यकभाा थे वे बी फकनाया कय गमे। उन्होंने सो सरमा फक अफ तो इसे णखराना बी ऩडेगा, इससरए भयने दो महीॊ। गणऩतत-उऩासना का अभाॊघ प्रबाव याजन ्! अफ तुभ तनयारम्फ थे, र-फपय तो सकते ही नहीॊ थे, बूख से ऩीडडत यहने के कायण योगों ने बी घेय सरमा। उधय से जो कोई तनकरता, तुम्हें घृणा की दृत्ष्ट से देखता हुआ रा जाता। तफ तुभ आहाय की खोज भें फडी कदठनाई से रते हुए एक जीणाशीणा देवारम भें जा ऩहुॉ े। उसभें बगवान ् गणेश्वय की प्रततभा ववद्यभान थी। तफ न जाने फकस ऩुण्म के उदम होने से तुम्हाये भन भें गणेशजी के प्रतत बत्क्त-बाव जाग्रत हुआ। तुभ तनयाहाय यहकय उनकी उऩासना कयने रगे। उससे तुम्हें सफ कु छ सभरा औय योग बी कभ हुआ। याजन ्! तुभने अऩने साधथमों की दृत्ष्ट फ ाकय फहुत-सा धन एक स्थान ऩय गाढ़ ददमा था। अफ तुभने उस धन को उसे देवारम के जीणोिाय भें रगाने का तनश् म फकमा। सशल्ऩी फुराकय उस भत्न्दय को सुन्दय औय बव्म फनवा ददमा। इस कायण कु ख्मातत सुख्मातत भें फदरने रगी। फपय मथा सभम तुम्हायी भृत्मु हुई। मभदूतों ने ऩकडकय तुम्हें मभयाज के सभऺ उऩत्स्थत फकमा। मभयाज तुभसे फोरे-'जीव! तुभने ऩाऩ औय ऩुण्म दोनों ही फकमे हैं औय दोनों का ही बोग तुम्हें बोगना है। फकन्तु ऩहरे ऩाऩ का पर बोगना ाहते हो मा ऩुण्म का? इसके उत्तय भें तुभने प्रथभ ऩुण्मकभों के बोग की इच्छा प्रकट की औय इसीसरए उन्होंने तुम्हें याजकु र भें जन्भ रेने के सरए बेज ददमा। ऩूवा जन्भ भें तुभने बगवान ् गणाध्मऺ का सुन्दय एवॊ बव्म भत्न्दय फनवामा था, इससरए तुम्हें सुन्दय देह की प्रात्प्त हुई है। मह कहकय भहवषा बृगु कु छ रूके , क्मोंफक उन्होंने देखा फक याजा को इस वृत्तान्त ऩय शॊङ्का हो यही है। तबी भहवषा के शयीय से असॊख्म ववकयार ऩऺी उत्ऩन्न होकय याजा की ओय झऩटे। उनकी ों फडी तीक्ष्ण थी, त्जनसे वे याजा के शयीय को नो -नो कय खाने रगे। उसके कायण उत्ऩन्न असहम ऩीडा से व्माकु र हुए याजा ने भहवषा के सभऺ हाथ जोडकय तनवेदन फकमा-'प्रबो! आऩका आश्रभ तो सभस्त दोष, द्वेष आदद से ऩये है औय महाॉ भैं आऩकी शयण भें फैठा हूॉ तफ मह ऩऺी भुझे अकायण ही क्मों ऩीडडत कय यहे हैं? हे भुतननाथ! इनसे भेयी यऺा कीत्जए। भहवषा ने याजा के आत्र्तव न सुनकय सान्त्वना देते हुए कहा-'याजन ्! तुभने भेये व नों भें शॊका की थी औय जो भुझ सत्मवादी के कथन भें शॊका कयता है, उसे खाने के सरए भेये शयीय से इसी प्रकाय ऩऺी प्रकट हो जाते हैं, जो फक भये हुॊकाय कयने ऩय बस्भ हो जामा कयते हैं। मह कहकय भहवषा ने हुॊङ्काय की ओय तबी वे सभस्त ऩऺी बस्भ हो गमे। याजा श्रिावनत होकय उनके सभऺ अश्रुऩात कयता हुआ फोरा-'प्रबो! अफ उस ऩाऩ से भुक्त होने के उऩाम कीत्जए। भहवषा ने कु छ वव ाय कय कहा-'याजन ्! तुभ ऩय बगवान ् गणेश्वय की कृ ऩा सहज रूऩ से है औय वे ही प्रबु तुम्हाये ऩाऩों को बी दूय कयने भें सभथा हैं। इससरए तुभ उनके ऩाऩ-नाशक रयिों को श्रवण कयो। गणेश ऩुयाण भें उनके प्रभुख रयिों का बरे प्रकाय वणान हुआ है, अतएव तुभ श्रिा-बत्क्त ऩूवाक उसी को सुनने भें ध त्त रगाओ। याजा ने प्राथाना की-'भहाभुने! भैंने गणेश ऩुयाण का नाभ बी आज तक नहीॊ सुना तो उनके सुनने
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    67 ससतम्फय -2019 गणेश रक्ष्भी मॊि प्राण-प्रततत्ष्ठत गणेश रक्ष्भी मॊि को अऩने घय- दुकान-ओफपस-पै क्टयी भें ऩूजन स्थान, गल्रा मा अरभायी भें स्थावऩत कयने व्माऩाय भें ववशेष राब प्राप्त होता हैं। मॊि के प्रबाव से बाग्म भें उन्नतत, भान-प्रततष्ठा एवॊ व्माऩय भें वृवि होती हैं एवॊ आधथाक त्स्थभें सुधाय होता हैं। गणेश रक्ष्भी मॊि को स्थावऩत कयने से बगवान गणेश औय देवी रक्ष्भी का सॊमुक्त आशीवााद प्राप्त होता हैं। Rs.325 से Rs.12700 तक का सौबाग्म कै से प्राप्त कय सकूॉ गा। हे नाथ! आऩसे अधधक ऻानी औय प्रकाण्ड ववद्वान ् औय कौन हो सकता है? आऩ ही भुझ ऩय कृ ऩा कीत्जए। भहवषा ने याजा की दीनता देखकय उसके शयीय ऩय अऩने कभण्डर का भन्िऩूत जर तछडका। तबी याजा को एक छीॊक आई औय नाससका से एक अत्मन्त छोटा कारे वणा का ऩुरूष फाहय तनकर आमा। देखते-देखते वह फढ़ गमा। उसके बमॊकय रूऩ को देखकय याजा कु छ बमबीत हुआ, फकन्तु सभस्त आश्रभवासी वहाॉ से बाग गमे। वह ऩुरूष भहवषा के सभऺ हाथ जोडकय खडा हो गमा। बृगु ने उसकी ओय देखा औय कु छ उच् स्वय भें फोरे-'तू कौन है? क्मा ाहता है? वह फोरा-'भैं साऺात ् ऩाऩ हूॉ, सभस्त ऩावऩमों के शयीय भें भेया तनवास है। आऩके भन्िऩूत जर के स्ऩशा से भुझे वववश होकय याजा के शयीय से फाहय तनकरना ऩडा है। अफ भुझे फडी बूख रगी है, फताइमे क्मा खाऊॉ औय कहाॉ यहूॉ? भहवषा फोरे-'तु उस आभ के अवकाश स्थान भें तनवास कय औय उसी वृऺ के ऩत्ते खाकय जीवन-तनवााह कय। मह सुनते ही वह ऩुरूष आभ के वृऺ के ऩास ऩहुॉ ा, फकन्तु उसके स्ऩशा भाि से वह वृऺ जरकय बस्भ हो गमा। फपय जफ ऩाऩ ऩुरूष को यहने के सरए कोई स्थान ददखाई न ददमा तो वह बी अन्तदहात हो गमा। हवषा फोरे-'याजन ्? कारान्तय भें मह वृऺ ऩुन: अऩना ऩूवारूऩ धायण कयेगा। जफ तक मह ऩुन: उत्ऩन्न न हो तफ तक भैं तुम्हें गणेश ऩुयाण का श्रवण कयाता यहूॉगा। तुभ ऩुयाण श्रवण के सॊकल्ऩऩूवाक आदद देव गणेशजी का ऩूजन कयो, तफ भैं गणेश ऩुयाण की कथा का आयम्ब करूॉ गा। भुतनयाज के आदेशानुसाय याजा ने ऩुयाण-श्रवण का सॊकल्ऩ फकमा। उसी सभम याजा ने अनुबव फकमा फक उसकी सभस्त ऩीडा दूय हो गई है। दृत्ष्ट डारी तो कु ष्ठ योग का अफ कहीॊ ध न्ह बी शेष नहीॊ यह गमा था। अऩने को ऩूणारूऩ से योग यदहत एवॊ ऩूवावत ् सुन्दय हुआ देखकय याजा के आश् मा की सीभा न यही औय उसने भहवषा के यण ऩकड सरए औय तनवेदन फकमा फक प्रबो! भुझे गणेश ऩुयाण का ववस्तायऩूवाक श्रवण कयाइमे। भहवषा ने कहा-'याजन ्! मह गणेश ऩुयाण सभस्त ऩाऩों औय सॊकटों को दूय कयने वारा है, तुभ इसे ध्मानऩूवाक सुनो। इसका श्रवण के वर गणऩतत-बक्तों को ही कयना-कयाना ादहए अन्म फकसी को नहीॊ। कसरमुग भें ऩाऩों की अधधक वृवि होगी, औय रागे कष्ट-सहन भें असभथा एवॊ अल्ऩामु होंगे। उनके ऩाऩ दूय कयने का कोई साधन होना ादहए। इस वव ाय से भहवषा वेदव्मास ने भुझे सुनामा था। उन्हीॊ की कृ ऩा से भैं बगवान गणाध्मऺ के भहान रयिों को सुनने का सौबाग्म प्राप्त कय सका था। भहायाज! बगवान गजानन अऩने सयर स्वबाव वारे बक्तों को सफ कु छ प्रदान कयने भें सभथा हैं। तनयसबभान प्राणणमों ऩय वे सदैव अनुग्रह कयते हैं फकन्तु सभथ्मासबभानी फकसी को बी नहीॊ यहने देते। ***
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    68 ससतम्फय -2019 काभनाऩूतता हेतु तीन दुराब गणेश साधना  सॊकरन गुरुत्व कामाारम हरयिा गणऩतत मन्ि साधना साधना हेतु साभग्री:- श्री हरयिा गणेश मन्ि (हरयिा गणऩतत मन्ि), एवॊ श्री गणेश जी की प्रततभा(हल्दी की सभरजामे तो अतत उत्तभ), हल्दी, घी का दीऩ, धूऩफत्ती, अऺत भारा: भूॊगे मा हल्दी की सभम: प्रात्कार ददशा: ऩूवा आसन: रार वस्ि: ऩीरा ददन: कृ ष्ण ऩऺ की तुथॉ से शुक्र ऩऺ की तुथॉ तक जऩ सॊख्मा: ाय राख प्रदाद : गुड भंत्र:– ॐ हुॊ गॊ ग्रौं हरयिागणऩत्मे वयद सवाजन रृदम स्तॊबम स्तॊबम स्वाहा || Om Hum Gan Gloun Haridraganapatye Varad Sarvajan Hruday Stambhay Stambhay Swaha ववधध: प्रात्कार स्नानइत्मादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि धायण कय रार आसन ऩय फैठ जामे। श्री हरयिा गणेश मन्ि एवॊ गणेशजी के ववग्रह को एक रकडी की ौकी ऩय ऩीरा वस्ि त्रफछा कय स्थावऩत कयदे। गणेशजी को हल्दी, रार मा ऩीरे पू र गणेशजी को अवऩात कयें। प्रसाद भें गुड ढाए। धूऩ-दीऩ इत्मादद से ववधधवत ऩूजन कयें, साधन कार भें धूऩ-दीऩ ारु यखें। भन्ि जऩ प्रायॊब कयने से ऩूवा जऩ का ववतनमोग अवश्म कयरें। जऩ की सभात्प्त ऩय हल्दी सभधश्रत अऺत से दशाॊश हवन कयके ब्राहभण बोजन कयामे। भन्ि जऩ से ऩूवा गणेशजी का इस भॊि से ध्मान कयें। ध्मान भन्त्र : ऩाशाॊक शौभोदकभेक दन्तॊ कयैदाधानॊ कनकासनस्थभ् हारयिाखन्ड प्रततभॊ त्रिनेिॊ ऩीताॊशुकॊ यात्रि गणेश भीडे ॥ Paashank Shoumodakamek Dantam Karairdadhanam Kanakasanastham Haridrakhand Pratimam Trinetram Peetanshukanratri Ganesha Meede. शुक्र ऩऺ की तुथॉ को हल्दी का रेऩ शयीय ऩय रगाकय स्नान कयें। गणेशजी का ऩूजन कये औय ८००० भन्ि से तऩाण कयके , घी से १०१ फाय हवन कये। कुॊ वायी कन्मा को बोजन कयामे औय मथाशत्क्त दक्षऺणा देकय प्रसन्न कयें। मन्ि एवॊ प्रततभा को अऩने ऩूजा स्थान भें स्थावऩत कयदे। प्रभुख प्रमोजन: १. शिु भुख फॊध कयने हेतु। २. जर, अत्ग्न, ोय एवॊ दहॊसक जीवों से यऺा हेतु। ३. वॊध्मा स्िी को सॊतान प्रात्प्त हेतु। 11 Pcs x 4 Colour Only Rs.370 21 Pcs x 4 Colour Only Rs.505 Visit Us: www.gurutvakaryalay.com
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    69 ससतम्फय -2019 ववजम गणऩतत मन्ि साधना साधना हेतु साभग्री:- श्री गणेश मन्ि (सॊऩूणा फीज भॊि सदहत), एवॊ स्पदटक की गणेश की प्रततभा, रार ॊदन, के सय घी का दीऩ, धूऩफत्ती, अऺत, जर ऩाि, कनेय के पू र भारा: भूॊगे मा यक्त ॊदन की सभम: ददन भें फकसी बी सभम (प्रात्कार उत्तभ होता हैं) ददशा: ऩूवा आसन: रार वस्ि: रार ददन: ऩाॊ ददन भें (फकसी बी फुधवाय से साधना प्रायॊब कयें) जऩ सॊख्मा: सवा राख प्रदाद : गुड भॊि:– ॐ वय वयदाम ववजम गणऩतमे नभ्। Om Var Varaday Vijay Ganapatye Namah | ववधध:– प्रात्कार स्नानइत्मादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि धायण कय रार आसन ऩय फैठ जामे। श्री गणेश मन्ि एवॊ गणेशजी के ववग्रह को एक रकडी की ौकी ऩय रार वस्ि त्रफछा कय स्थावऩत कयदे। गणेशजी को के सय व यक्त ॊदन का ततरक कये, प्रसाद भें गुड ढाए। धूऩ-दीऩ इत्मादद से ववधधवत ऩूजन कयें, साधन कार भें धूऩ-दीऩ ारु यखें। २१ कनेय के पू र(कनेय अप्राप्त हो तो रार गुराफ मा कोइ बी रार पू र) गणेशजी को अवऩात कयें। गणेश जी को हय ऩुष्ऩ अवऩात कयते सभम त्जस कामा भें ववजम प्राप्त कयनी हो उस कामा की ऩूतता हेतु गणेश जी से श्रिा बाव से प्राथना कयें। फपय भन्ि जऩ प्रायॊब कयें। ऩाॊ ददन भें सवा राख जऩ ऩूणा हो जाने ऩय, छठ्ठे ददन ऩाॊ कु वारयकाओॊ को बोजन कयामे औय मथाशत्क्त दक्षऺणा देकय प्रसन्न कयें। एसा कयने से साधक की काभनाएॊ ऩूणा होती हैं। मन्ि एवॊ भूतता को अऩने ऩूजा स्थान भें स्थावऩत कयदें, त्जस कामा उद्देश्म के सरमे प्रमोग फकमा हो उस कामा हेतु जफ आवश्मक हो तो मन्ि को सॊफॊधधत कामा के सभम साथ रेकय जामे। कामा उद्देश्म भें ववजमश्री की प्रात्प्त के ऩश् मात मन्ि को फहते ऩानी भें ववसत्जात कयदे। गणेश प्रततभा का तनमसभत ऩूजन कय सकते हैं। प्रभुख प्रमोजन: १. कोटा-के श आदद वववादों भें सपरता हेतु। २. शिु का प्रबाव फढ़ गमा हो तो उस ऩय ववजम प्राप्त कयने हेतु। ३. मदद फकसी कामा उद्देश्म भें सपरता प्राप्त कयने हेतु ।
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    70 ससतम्फय -2019 कल्माणकायी गणऩतत मन्ि साधना साधना हेतु साभग्री:- श्री गणेश ससि मन्ि एवॊ स्पदटक की गणेश की प्रततभा, रार ॊदन, के सय घी का दीऩ, धूऩफत्ती, अऺत, कनेय के पू र भारा: भूॊगे मा यक्त ॊदन की सभम: ददन भें फकसी बी सभम (प्रात्कार उत्तभ होता हैं) ददशा: ऩूवा आसन: रार वस्ि: रार ददन: ऩाॊ ददन, ग्मायाददन मा इत्क्कस ददन भें (फकसी बी फुधवाय से साधना प्रायॊब कयें) जऩ सॊख्मा: सवा राख प्रदाद : गुड भॊि:– गॊ गणऩतमे नभ्। Gan Ganapatye Namah | ववधध:– फकसी बी फुधवाय को प्रात्कार स्नानइत्मादद से तनवृत्त होकय स्वच्छ वस्ि धायण कय रार आसन ऩय फैठ जामे। श्री गणेश ससि मन्ि एवॊ गणेशजी के ववग्रह को एक रकडी की ौकी ऩय रार वस्ि त्रफछा कय स्थावऩत कयदे। गणेशजी को के सय व यक्त ॊदन का ततरक कये, प्रसाद भें गुड ढाए। धूऩ-दीऩ इत्मादद से ववधधवत ऩूजन कयें, साधन कार भें धूऩ-दीऩ ारु यखें। सॊबव हो तो गणेशजी को ऩुष्ऩ अवऩात कयें। त्जतने ददनों भें साधना सॊऩन्न कयनी हो उसी के अनुरुऩ सॊकल्ऩ कयके भन्ि जऩ प्रायॊब कयें। तनमसभत उसी सभम भें भन्ि जऩ कये। साधना सम्ऩन्न होने ऩय फकसी ब्राहभण मा कु भारयका कों बोजन कयामे औय मथाशत्क्त दक्षऺणा वस्ि आदद देकय प्रसन्न कयें। मन्ि औय गणेश प्रततभा को अऩने ऩूजा स्थान भें स्थावऩत कयदें, औय तनमसभत उक्त भन्ि की एक भारा जऩ कयें। उक्त साधना से साधक का बववष्म भें ससि होने वारे कामा त्रफना फकसी ऩयेशानी से तनववाध्न सॊऩन्न हो जामे गा। प्रभुख प्रमोजन: १. सबी कामा तनववाघ्न सॊऩन्न कयने हेतु। २. भहत्वऩूणा कामों भें आने वारी फाधा एवॊ ववध्नों के नाश हेतु। ३. ऩरयवाय की सुख-सभृवि हेतु।
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    71 ससतम्फय -2019 ल  ल ल ल - - - औ     ल ल ल ल ल  ल ल -ल औ औ औ  औ ल  औ  ल ल औ  ल औ ल ल
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    72 ससतम्फय -2019  सॊकरन गुरुत्व कामाारम ल ल ल ल + ल ल - ल ल ल ल ल ल ल ल द्वा ल ल ल ल ल ल ल द्वा ऋ - ल ल - ल ल - ल द्वा ऋ - ल ल + ल ल ल ल ल ल ल ल
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    73 ससतम्फय -2019 ल ल ल ^ ^( ल - ल ल ) - ल ल द्वा औ औ ल ल द्वा द्वा ल ल ल औ द्वा ऋ , औ , जो ल ल स्वत्स्तक को ऋग्वेद भें सूमा भनोवाॊतछत परदाता सम्ऩूणा जगत का कल्माण कयने वारा औय देवताओॊ को अभयत्व प्रदान कयने वारा भाना गमा है। द्वा ऋ औ द्वा ल औ औ औ ल औ ल - - - - ल - - ल ल - - द्वा औ औ
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    74 ससतम्फय -2019 औ तनयॊतय ल औ औ ल औ औ - ल ल ल ल अन्म सॊस्कृ तत भें स्वत्स्तक  ल (gammadion o  (Hakenkreuz), k  ल o करात्भक य नाएॊ ल औ औ ल  ल ल ल o औ  ल ल o ल ल ल ल 卍 औ 卐 औ ल ल औ ल   o ल ल ल ल औ  ल ल
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    75 ससतम्फय -2019 द्वा ऋ  ल ल 8 ल ल ल  -  ल ल ल ल  औ - - ल  ल ल  औ ल ल औ  ल - ल ल  औ इनके अरावा स्वत्स्तक के ववसबन्न राब - द्वा ल ल - - - ल ल ल  ल   ल द्वा ल  ल ल  ल  ल
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    76 ससतम्फय -2019   ल  द्वा ल ल -  द्वा ल  ल ल  ल ल ल ल  ल ल औ ल ल - ल ल ल *** ल - ( ) ल ल ( ) ( ) ( ) ल ल ल ( ) ( ) ल ऋ ल ल 16 ल औ ( + ) ल ( + ) ल ( ) ल ( + ) ( ४८) ( ) ( ) GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Shop @ : www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvakaryalay.in New Arrival
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    77 ससतम्फय -2019 नकारसऩा मोग एक कष्टदामक मोग ! कार का भतरफ है भृत्मु । ज्मोततष के जानकायों के अनुसाय त्जस व्मत्क्त का जन्भ अशुबकायी कारसऩा मोग भे हुवा हो वह व्मत्क्त जीवन बय भृत्मु के सभान कष्ट बोगने वारा होता है, व्मत्क्त जीवन बय कोइ ना कोइ सभस्मा से ग्रस्त होकय अशाॊत ध त होता है। कारसऩा मोग अशुब एवॊ ऩीडादामक होने ऩय व्मत्क्त के जीवन को अत्मॊत दु्खदामी फना देता है। कारसऩथ मोग भतरफ क्मा? जफ जन्भ कुॊ डरी भें साये ग्रह याहु औय के तु के फी त्स्थत यहते हैं तो उससे ज्मोततष ववद्या के जानकाय उसे कारसऩा मोग कहा जाता है। कारसऩथ मोग ककस प्रकाय फनता है औय क्मों फनता हैं? जफ 7 ग्रह याहु औय के तु के भध्म भे त्स्थत हो मह अत्च्छ त्स्थतत नदह है। याहु औय के तु के भध्म भे फाकी सफ ग्रह आजाने से याहु के तु अन्म शुब ग्रहों के प्रबावों को ऺीण कय देते हों!, तो अशुब कारसऩा मोग फनता है, क्मोफक ज्मोततष भे याहु को सऩा(साऩ) का भुह(भुख) एवॊ के तु को ऩूॊछ कहा जाता है। कारसऩथ मोग का प्रबाव क्म होता है? त्जस प्रकाय फकसी व्मत्क्त को साऩ काट रे तो वह व्मत्क्त शाॊतत से नही फेठ सकता वेसे ही कारसऩा मोग से ऩीडडत व्मत्क्त को जीवन ऩमान्त शायीरयक, भानससक, आधथाक ऩयेशानी का साभना कयना ऩडता है। वववाह ववरम्फ से होता है एवॊ वववाह के ऩश्च्मात सॊतान से सॊफॊधी कष्ट जेसे उसे सॊतान होती ही नहीॊ मा होती है तो योग ग्रस्त होती है। उसे जीवन भें फकसी न फकसी भहत्वऩूणा वस्तु का अबाव यहता है। जातक को कारसऩा मोग के कायण सबी कामों भें अत्माधधक सॊघषा कयना ऩडताअ है। उसकी योजी-योटी का जुगाड बी फडी भुत्श्कर से हो ऩाता है। अगय जुगाड होजामे तो रम्फे सभम तक दटकती नही है। फाय-फाय व्मवसाम मा नौकयी भे फदराव आते येहते है। धनाढम घय भें ऩैदा होने के फावजूद फकसी न फकसी वजह से उसे अप्रत्मासशत रूऩ से आधथाक ऺतत होती यहती है। तयह-तयह की ऩयेशानी से तघये यहते हैं। एक सभस्मा खतभ होते ही दूसयी ऩाव ऩसाये खडी होजाती है। कारसऩा मोग से व्मत्क्त को ैन नही सभरता उसके कामा फनते ही नही औय फन जामे आधे भे रुक जाते है। व्मत्क्त के 99% हो ुका कामा बी आखयी ऩरो भे अकस्भात ही रुक जात है। ऩयॊतु मह ध्मान यहे, कारसऩा मोग वारे सबी जातकों ऩय इस मोग का सभान प्रबाव नही ऩडता। क्मोफक फकस बाव भें कौन सी यासश अवत्स्थत है औय उसभें कौन-कौन ग्रह कहाॊ त्स्थत हैं औय दृत्ष्ट कय यहे है उस्का प्रबाव फराफर फकतना है - इन सफ फातों का बी सॊफॊधधत जातक ऩय भहत्वऩूणा प्रबाव ऩडता है। इससरए भािा कारसऩा मोग सुनकय बमबीत हो जाने की जरूयत नहीॊ फत्ल्क उसका जानकाय मा कु शर ज्मोततषी से ज्मोततषीम ववश्रेषण कयवाकय उसके प्रबावों की ववस्तृत जानकायी हाससर कय रेना ही फुविभत्ता है। जफ असरी कायण ज्मोततषीम ववश्रेषण से स्ऩष्ट हो जामे तो तत्कार उसका उऩाम कयना ादहए। उऩाम से कारसऩा मोग के कु प्रबावो को कभ फकमा जा सकता है। मदद आऩकी जन्भ कुॊ डरी भे बी अशुब कारसऩा मोग का फन यहा हो औय आऩ उसके अशुब प्रबावों से ऩयेशान हो, तो कारसऩा मोग के अशुब प्राबावों को शाॊत कयने के सरमे ववशेष अनुबूत उऩामों को अऩना कय अऩने जीवन को सुखी एवॊ सभृि फनाए। *** कारसऩा शाॊतत हेतु अनुबूत एवॊ सयर उऩाम भॊि ससि कारसऩा शाॊतत मॊि भॊि ससि कारसऩा शाॊतत क व ववस्तृत जानकायी हेतु सॊऩका कयें। GURUTVA KARYALAY Call Us - 9338213418, 9238328785
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    78 ससतम्फय -2019 भॊि ससि दुराब साभग्री कारी हल्दी:- 370, 550, 730, 1450, 1900 कभर गट्टे की भारा - Rs- 370 भामा जार- Rs- 251, 551, 751 हल्दी भारा - Rs- 280 धन वृवि हकीक सेट Rs-280 (कारी हल्दी के साथ Rs-550) तुरसी भारा - Rs- 190, 280, 370, 460 घोडे की नार- Rs.351, 551, 751 नवयत्न भारा- Rs- 1050, 1900, 2800, 3700 & Above हकीक: 11 नॊग-Rs-190, 21 नॊग Rs-370 नवयॊगी हकीक भारा Rs- 280, 460, 730 रघु श्रीपर: 1 नॊग-Rs-21, 11 नॊग-Rs-190 हकीक भारा (सात यॊग) Rs- 280, 460, 730, 910 नाग के शय: 11 ग्राभ, Rs-145 भूॊगे की भारा Rs- 190, 280, Real -1050, 1900 & Above स्पदटक भारा- Rs- 235, 280, 460, 730, DC 1050, 1250 ऩायद भारा Rs- 1450, 1900, 2800 & Above सपे द ॊदन भारा - Rs- 460, 640, 910 वैजमॊती भारा Rs- 190, 280, 460 यक्त (रार) ॊदन - Rs- 370, 550, रुिाऺ भारा: 190, 280, 460, 730, 1050, 1450 भोती भारा- Rs- 460, 730, 1250, 1450 & Above ववधुत भारा - Rs- 190, 280 कासभमा ससॊदूय- Rs- 460, 730, 1050, 1450, & Above भूल्म भें अॊतय छोटे से फडे आकाय के कायण हैं। >> Shop Online | Order Now भॊि ससि स्पदटक श्री मॊि "श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्क्तशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से अधधक से अधधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्क्त के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त "श्री मॊि" त्जस व्मत्क्त के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससि होता है उसके दशान भाि से अन-धगनत राब एवॊ सुख की प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भे सभाई अदिततम एवॊ अिश्म शत्क्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होतत है। त्जस्से उसका जीवन से हताशा औय तनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता फक औय तनयन्तय गतत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौततक सुखो फक प्रात्प्त होतत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भें उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का तनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थावऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फत्न्धत ऩयेशातन भे न्मुनता आतत है व सुख-सभृवि, शाॊतत एवॊ ऐश्वमा फक प्रत्प्त होती है। >> Shop Online | Order Now गुरुत्व कामाथरम भे ववसबन्न आकाय के "श्री मॊि" उप्रब्ध है भूल्म:- प्रतत ग्राभ Rs. 28.00 से Rs.100.00 GURUTVA KARYALAY BHUBNESWAR-751018, (ODISHA), Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785, Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
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    79 ससतम्फय -2019 सवा कामा ससवि कव त्जस व्मत्क्त को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के फादबी उसे भनोवाॊतछत सपरतामे एवॊ फकमे गमे कामा भें ससवि (राब) प्राप्त नहीॊ होती, उस व्मत्क्त को सवा कामा ससवि कव अवश्म धायण कयना ादहमे। कवच के प्रभुख राब: सवा कामा ससवि कव के द्वारा सुख सभृवि औय नव ग्रहों के नकायात्भक प्रबाव को शाॊत कय धायण कयता व्मत्क्त के जीवन से सवा प्रकाय के दु:ख-दारयि का नाश हो कय सुख-सौबाग्म एवॊ उन्नतत प्रात्प्त होकय जीवन भे ससब प्रकाय के शुब कामा ससि होते हैं। त्जसे धायण कयने से व्मत्क्त मदद व्मवसाम कयता होतो कायोफाय भे वृवि होतत हैं औय मदद नौकयी कयता होतो उसभे उन्नतत होती हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें सवथजन वशीकयण कव के सभरे होने की वजह से धायण कताा की फात का दूसये व्मत्क्तओ ऩय प्रबाव फना यहता हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें अष्ट रक्ष्भी कव के सभरे होने की वजह से व्मत्क्त ऩय सदा भाॊ भहा रक्ष्भी की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना यहता हैं। त्जस्से भाॊ रक्ष्भी के अष्ट रुऩ (१)-आदद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)- धैमा रक्ष्भी, (४)-गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)- ववजम रक्ष्भी, (७)-ववद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी रुऩो का अशीवााद प्राप्त होता हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें तंत्र यऺा कव के सभरे होने की वजह से ताॊत्रिक फाधाए दूय होती हैं, साथ ही नकायात्भक शत्क्तमो का कोइ कु प्रबाव धायण कताा व्मत्क्त ऩय नहीॊ होता। इस कव के प्रबाव से इषाा-द्वेष यखने वारे व्मत्क्तओ द्वारा होने वारे दुष्ट प्रबावो से यऺा होती हैं।  सवा कामा ससवि कव के साथ भें शत्रु ववजम कव के सभरे होने की वजह से शिु से सॊफॊधधत सभस्त ऩयेशातनओ से स्वत् ही छु टकाया सभर जाता हैं। कव के प्रबाव से शिु धायण कताा व्मत्क्त का ाहकय कु छ नही त्रफगाड सकते। अन्म कव के फाये भे अधधक जानकायी के सरमे कामाारम भें सॊऩका कये: फकसी व्मत्क्त ववशेष को सवा कामा ससवि कव देने नही देना का अॊततभ तनणाम हभाये ऩास सुयक्षऺत हैं। >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- www.gurutvakaryalay.com and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    80 ससतम्फय -2019 श्री गणेश मॊि गणेश मॊि सवा प्रकाय की ऋवि-ससवि प्रदाता एवॊ सबी प्रकाय की उऩरत्ब्धमों देने भें सभथा है, क्मोकी श्री गणेश मॊि के ऩूजन का पर बी बगवान गणऩतत के ऩूजन के सभान भाना जाता हैं। हय भनुष्म को को जीवन भें सुख-सभृवि की प्रात्प्त एवॊ तनमसभत जीवन भें प्राप्त होने वारे ववसबन्न कष्ट, फाधा-ववघ्नों को नास के सरए श्री गणेश मॊि को अऩने ऩूजा स्थान भें अवश्म स्थावऩत कयना ादहए। श्रीगणऩत्मथवाशीषा भें वणणात हैं ॐकाय का ही व्मक्त स्वरूऩ श्री गणेश हैं। इसी सरए सबी प्रकाय के शुब भाॊगसरक कामों औय देवता-प्रततष्ठाऩनाओॊ भें बगवान गणऩतत का प्रथभ ऩूजन फकमा जाता हैं। त्जस प्रकाय से प्रत्मेक भॊि फक शत्क्त को फढाने के सरमे भॊि के आगें ॐ (ओभ्) आवश्म रगा होता हैं। उसी प्रकाय प्रत्मेक शुब भाॊगसरक कामों के सरमे बगवान ् गणऩतत की ऩूजा एवॊ स्भयण अतनवामा भाना गमा हैं। इस ऩौयाणणक भत को सबी शास्ि एवॊ वैददक धभा, सम्प्रदामों ने गणेश जी के ऩूजन हेतु इस प्रा ीन ऩयम्ऩया को एक भत से स्वीकाय फकमा हैं। श्री गणेश मॊि के ऩूजन से व्मत्क्त को फुवि, द्विद्या, वववेक का ववकास होता हैं औय योग, व्माधध एवॊ सभस्त ववध्न-फाधाओॊ का स्वत् नाश होता है। श्री गणेशजी की कृ ऩा प्राप्त होने से व्मत्क्त के भुत्श्कर से भुत्श्कर कामा बी आसान हो जाते हैं। त्जन रोगो को व्मवसाम-नौकयी भें ववऩयीत ऩरयणाभ प्राप्त हो यहे हों, ऩारयवारयक तनाव, आधथाक तॊगी, योगों से ऩीडा हो यही हो एवॊ व्मत्क्त को अथक भेहनत कयने के उऩयाॊत बी नाकाभमाफी, दु:ख, तनयाशा प्राप्त हो यही हो, तो एसे व्मत्क्तमो की सभस्मा के तनवायण हेतु तुथॉ के ददन मा फुधवाय के ददन श्री गणेशजी की ववशेष ऩूजा- अ ाना कयने का ववधान शास्िों भें फतामा हैं। त्जसके पर से व्मत्क्त की फकस्भत फदर जाती हैं औय उसे जीवन भें सुख, सभृवि एवॊ ऐश्वमा की प्रात्प्त होती हैं। त्जस प्रकाय श्री गणेश जी का ऩूजन अरग-अरग उद्देश्म एवॊ काभनाऩूतता हेतु फकमा जाता हैं, उसी प्रकाय श्री गणेश मॊि का ऩूजन बी अरग-अरग उद्देश्म एवॊ काभनाऩूतता हेतु अरग-अरग फकमा जाता सकता हैं। श्री गणेश मॊि के तनमसभत ऩूजन से भनुष्म को जीवन भें सबी प्रकाय की ऋवि-ससवि व धन-सम्ऩत्त्त की प्रात्प्त हेतु श्री गणेश मॊि अत्मॊत राबदामक हैं। श्री गणेश मॊि के ऩूजन से व्मत्क्त की साभात्जक ऩद-प्रततष्ठा औय कीतता ायों औय पै रने रगती हैं।  द्विद्वानों का अनुबव हैं की फकसी बी शुब कामा को प्रायॊऩ कयने से ऩूवा मा शुबकामा हेतु घय से फाहय जाने से ऩूवा गणऩतत मॊि का ऩूजन एवॊ दशान कयना शुब परदामक यहता हैं। जीवन से सभस्त ववघ्न दूय होकय धन, आध्मात्त्भक ेतना के ववकास एवॊ आत्भफर की प्रात्प्त के सरए भनुष्म को गणेश मॊि का ऩूजन कयना ादहए। गणऩतत मॊि को फकसी बी भाह की गणेश तुथॉ मा फुधवाय को प्रात: कार अऩने घय, ओफपस, व्मवसामीक स्थर ऩय ऩूजा स्थर ऩय स्थावऩत कयना शुब यहता हैं। गुरुत्व कामाथरम भें उऩरब्ध अन्म : रक्ष्भी गणेश मॊि | गणेश मॊि | गणेश मॊि (सॊऩूणा फीज भॊि सदहत) | गणेश ससि मॊि | एकाऺय गणऩतत मॊि | हरयिा गणेश मॊि बी उऩरब्ध हैं। अधधक जानकायी आऩ हभायी वेफ साइट ऩय प्राप्त कय सकते हैं। GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in Shop Online: www.gurutvakaryalay.com
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    81 ससतम्फय -2019 दस भहाववद्या ऩूजन मॊि Das Mahavidya Poojan Yantra | Dasmahavidya Pujan Yantra दस भहाववद्या ऩूजन मॊि को देवी दस भहाववद्या की शत्क्तमों से मुक्त अत्मॊत प्रबावशारी औय दुराब मॊि भाना गमा हैं। इस मॊि के भाध्मभ से साधक के ऩरयवाय ऩय दसो महाद्विद्याओॊ का आसशवााद प्राप्त होता हैं। दस भहाववद्या मॊि के तनमसभत ऩूजन-दशान से भनुष्म की सबी भनोकाभनाओॊ की ऩूतता होती हैं। दस भहाववद्या मॊि साधक की सभस्त इच्छाओॊ को ऩूणा कयने भें सभथा हैं। दस भहाववद्या मॊि भनुष्म को शत्क्तसॊऩन्न एवॊ बूसभवान फनाने भें सभथा हैं। दस भहाववद्या मॊि के श्रिाऩूवाक ऩूजन से शीघ्र देवी कृ ऩा प्राप्त होती हैं औय साधक को दस भहाववद्या देवीमों की कृ ऩा से सॊसाय की सभस्त ससविमों की प्रात्प्त सॊबव हैं। देवी दस भहाववद्या की कृ ऩा से साधक को धभा, अथा, काभ व् भोऺ तुववाध ऩुरुषाथों की प्रात्प्त हो सकती हैं। दस भहाववद्या मॊि भें भाॉ दुगाा के दस अवतायों का आशीवााद सभादहत हैं, इससरए दस भहाववद्या मॊि को के ऩूजन एवॊ दशान भाि से व्मत्क्त अऩने जीवन को तनयॊतय अधधक से अधधक साथाक एवॊ सपर फनाने भें सभथा हो सकता हैं। देवी के आसशवााद से व्मत्क्त को ऻान, सुख, धन-सॊऩदा, ऐश्वमा, रूऩ-सौंदमा की प्रात्प्त सॊबव हैं। व्मत्क्त को वाद- वववाद भें शिुओॊ ऩय ववजम की प्रात्प्त होती हैं। दश भहाववद्या को शास्िों भें आद्या बगवती के दस बेद कहे गमे हैं, जो क्रभश् (1) कारी, (2) ताया, (3) षोडशी, (4) बुवनेश्वयी, (5) बैयवी, (6) तछन्नभस्ता, (7) धूभावती, (8) फगरा, (9) भातॊगी एवॊ (10) कभात्त्भका। इस सबी देवी स्वरुऩों को, सत्म्भसरत रुऩ भें दश भहाववद्या के नाभ से जाना जाता हैं। >> Shop Online GURUTVA KARYALAY Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Shop Pnlone @ : www.gurutvakaryalay.com
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    82 ससतम्फय -2019 अभोद्य भहाभृत्मुॊजम कव अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव व उल्रेणखत अन्म साभग्रीमों को शास्िोक्त ववधध-ववधान से ववद्वान ब्राहभणो द्वारा सवा राख भहाभृत्मुंजम भंत्र जऩ एवॊ दशाॊश हवन द्वारा तनसभात कव अत्मॊत प्रबावशारी होता हैं। अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव कव फनवाने हेतु: अऩना नाभ, वऩता-भाता का नाभ, गोि, एक नमा पोटो बेजे कव के ववषम भें अधधक जानकायी हेतु गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें। >> Order Now GURUTVA KARYALAY 91+ 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Website: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | श्री हनुभान मॊि शास्िों भें उल्रेख हैं की श्री हनुभान जी को बगवान सूमादेव ने ब्रहभा जी के आदेश ऩय हनुभान जी को अऩने तेज का सौवाॉ बाग प्रदान कयते हुए आशीवााद प्रदान फकमा था, फक भैं हनुभान को सबी शास्ि का ऩूणा ऻान दूॉगा। त्जससे मह तीनोरोक भें सवा श्रेष्ठ वक्ता होंगे तथा शास्ि ववद्या भें इन्हें भहायत हाससर होगी औय इनके सभन फरशारी औय कोई नहीॊ होगा। जानकायो ने भतानुशाय हनुभान मॊि की आयाधना से ऩुरुषों की ववसबन्न फीभारयमों दूय होती हैं, इस मॊि भें अद्भुत शत्क्त सभादहत होने के कायण व्मत्क्त की स्वप्न दोष, धातु योग, यक्त दोष, वीमा दोष, भूछाा, नऩुॊसकता इत्मादद अनेक प्रकाय के दोषो को दूय कयने भें अत्मन्त राबकायी हैं। अथाात मह मॊि ऩौरुष को ऩुष्ट कयता हैं। श्री हनुभान मॊि व्मत्क्त को सॊकट, वाद- वववाद, बूत-प्रेत, द्मूत फक्रमा, ववषबम, ोय बम, याज्म बम, भायण, सम्भोहन स्तॊबन इत्मादद से सॊकटो से यऺा कयता हैं औय ससवि प्रदान कयने भें सऺभ हैं। श्री हनुभान मॊि के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें। भूल्म Rs- 325 से 12700 तक >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव दक्षऺणा भाि: 10900
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    83 ससतम्फय -2019 भॊि ससि ऩायद प्रततभा ऩायद श्री मॊि ऩायद रक्ष्भी गणेश ऩायद रक्ष्भी नायामण ऩायद रक्ष्भी नायामण 21 Gram से 5.250 Kg तक उऩरब्ध 100 Gram 121 Gram 100 Gram ऩायद सशवसरॊग ऩायद सशवसरॊग+नॊदद ऩायद सशवजी ऩायद कारी 21 Gram से 5.250 Kg तक उऩरब्ध 101 Gram से 5.250 Kg तक उऩरब्ध 75 Gram 37 Gram ऩायद दुगाा ऩायद दुगाा ऩायद सयस्वती ऩायद सयस्वती 82 Gram 100 Gram 50 Gram 225 Gram ऩायद हनुभान 2 ऩायद हनुभान 3 ऩायद हनुभान 1 ऩायद कु फेय 100 Gram 125 Gram 100 Gram 100 Gram हभायें महाॊ सबी प्रकाय की भॊि ससि ऩायद प्रततभाएॊ, सशवसरॊग, वऩयासभड, भारा एवॊ गुदटका शुि ऩायद भें उऩरब्ध हैं। त्रफना भॊि ससि की हुई ऩायद प्रततभाएॊ थोक व्माऩायी भूल्म ऩय उऩरब्ध हैं। ज्मोततष, यत्न व्मवसाम, ऩूजा-ऩाठ इत्मादद ऺेि से जुडे फॊधु/फहन के सरमे हभायें ववशेष मॊि, कव , यत्न, रुिाऺ व अन्म दुरब साभग्रीमों ऩय ववशेष सुत्रफधाएॊ उऩरब्ध हैं। अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें। GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Visit Us: www.gurutvakaryalay.com
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    84 ससतम्फय -2019 हभाये ववशेष मॊि व्माऩाय वृवि मंत्र: हभाये अनुबवों के अनुसाय मह मॊि व्माऩाय वृवि एवॊ ऩरयवाय भें सुख सभृवि हेतु ववशेष प्रबावशारी हैं। बूसभराब मंत्र: बूसभ, बवन, खेती से सॊफॊधधत व्मवसाम से जुडे रोगों के सरए बूसभराब मॊि ववशेष राबकायी ससि हुवा हैं। तंत्र यऺा मंत्र: फकसी शिु द्वारा फकमे गमे भॊि-तॊि आदद के प्रबाव को दूय कयने एवॊ बूत, प्रेत नज़य आदद फुयी शत्क्तमों से यऺा हेतु ववशेष प्रबावशारी हैं। आकश्स्भक धन प्राश्प्त मंत्र: अऩने नाभ के अनुसाय ही भनुष्म को आकत्स्भक धन प्रात्प्त हेतु परप्रद हैं इस मॊि के ऩूजन से साधक को अप्रत्मासशत धन राब प्राप्त होता हैं। ाहे वह धन राब व्मवसाम से हो, नौकयी से हो, धन-सॊऩत्त्त इत्मादद फकसी बी भाध्मभ से मह राब प्राप्त हो सकता हैं। हभाये वषों के अनुसॊधान एवॊ अनुबवों से हभने आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि से शेमय रेडडॊग, सोने- ाॊदी के व्माऩाय इत्मादद सॊफॊधधत ऺेि से जुडे रोगो को ववशेष रुऩ से आकत्स्भक धन राब प्राप्त होते देखा हैं। आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि से ववसबन्न स्रोत से धनराब बी सभर सकता हैं। ऩदौन्नतत मंत्र: ऩदौन्नतत मॊि नौकयी ऩैसा रोगो के सरए राबप्रद हैं। त्जन रोगों को अत्माधधक ऩरयश्रभ एवॊ श्रेष्ठ कामा कयने ऩय बी नौकयी भें उन्नतत अथाात प्रभोशन नहीॊ सभर यहा हो उनके सरए मह ववशेष राबप्रद हो सकता हैं। यत्नेववयी मंत्र: यत्नेश्वयी मॊि हीये-जवाहयात, यत्न ऩत्थय, सोना- ाॊदी, ज्वैरयी से सॊफॊधधत व्मवसाम से जुडे रोगों के सरए अधधक प्रबावी हैं। शेय फाजाय भें सोने- ाॊदी जैसी फहुभूल्म धातुओॊ भें तनवेश कयने वारे रोगों के सरए बी ववशेष राबदाम हैं। बूसभ प्राश्प्त मंत्र: जो रोग खेती, व्मवसाम मा तनवास स्थान हेतु उत्तभ बूसभ आदद प्राप्त कयना ाहते हैं, रेफकन उस कामा भें कोई ना कोई अड न मा फाधा-ववघ्न आते यहते हो त्जस कायण कामा ऩूणा नहीॊ हो यहा हो, तो उनके सरए बूसभ प्रात्प्त मॊि उत्तभ परप्रद हो सकता हैं। गृह प्राश्प्त मंत्र: जो रोग स्वमॊ का घय, दुकान, ओफपस, पै क्टयी आदद के सरए बवन प्राप्त कयना ाहते हैं। मथाथा प्रमासो के उऩयाॊत बी उनकी असबराषा ऩूणा नहीॊ हो ऩायही हो उनके सरए गृह प्रात्प्त मॊि ववशेष उऩमोगी ससि हो सकता हैं। कै रास धन यऺा मंत्र: कै रास धन यऺा मॊि धन वृवि एवॊ सुख सभृवि हेतु ववशेष परदाम हैं। आधथाक राब एवॊ सुख सभृवि हेतु 19 दुराब रक्ष्भी मॊि >> Shop Online | Order Now ववसबन्न रक्ष्भी मॊि श्री मॊि (रक्ष्भी मॊि) भहारक्ष्भमै फीज मॊि कनक धाया मॊि श्री मॊि (भॊि यदहत) भहारक्ष्भी फीसा मॊि वैबव रक्ष्भी मॊि (भहान ससवि दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि) श्री मॊि (सॊऩूणा भॊि सदहत) रक्ष्भी दामक ससि फीसा मॊि श्री श्री मॊि (रसरता भहात्रिऩुय सुन्दमै श्री भहारक्ष्भमैं श्री भहामॊि) श्री मॊि (फीसा मॊि) रक्ष्भी दाता फीसा मॊि अॊकात्भक फीसा मॊि श्री मॊि श्री सूक्त मॊि रक्ष्भी फीसा मॊि ज्मेष्ठा रक्ष्भी भॊि ऩूजन मॊि श्री मॊि (कु भा ऩृष्ठीम) रक्ष्भी गणेश मॊि धनदा मॊि > Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY :Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
  • 85.
    85 ससतम्फय -2019 सवाससविदामक भुदिका इस भुदिका भें भूॊगे को शुब भुहूता भें त्रिधातु (सुवणा+यजत+ताॊफें) भें जडवा कय उसे शास्िोक्त ववधध- ववधान से ववसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्वारा सवाससविदामक फनाने हेतु प्राण-प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त फकमा जाता हैं। इस भुदिका को फकसी बी वगा के व्मत्क्त हाथ की फकसी बी उॊगरी भें धायण कय सकते हैं। महॊ भुदिका कबी फकसी बी त्स्थती भें अऩववि नहीॊ होती। इससरए कबी भुदिका को उतायने की आवश्मक्ता नहीॊ हैं। इसे धायण कयने से व्मत्क्त की सभस्माओॊ का सभाधान होने रगता हैं। धायणकताा को जीवन भें सपरता प्रात्प्त एवॊ उन्नतत के नमे भागा प्रसस्त होते यहते हैं औय जीवन भें सबी प्रकाय की ससविमाॊ बी शी् प्राप्त होती हैं। भूल्म भात्र- 6400/- >> Shop Online | Order Now (नोट: इस भुदिका को धायण कयने से भॊगर ग्रह का कोई फुया प्रबाव साधक ऩय नहीॊ होता हैं।) सवथससविदामक भुदद्रका के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे हेतु सम्ऩकथ कयें। ऩतत-ऩत्नी भें करह तनवायण हेतु मदद ऩरयवायों भें सुख-सुववधा के सभस्त साधान होते हुए बी छोटी-छोटी फातो भें ऩतत-ऩत्नी के त्रफ भे करह होता यहता हैं, तो घय के त्जतने सदस्म हो उन सफके नाभ से गुरुत्व कामाारत द्वारा शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त वशीकयण कव एवॊ गृह करह नाशक डडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भें त्रफना फकसी ऩूजा, ववधध-ववधान से आऩ ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं। मदद आऩ भॊि ससि ऩतत वशीकयण मा ऩत्नी वशीकयण एवॊ गृह करह नाशक डडब्फी फनवाना ाहते हैं, तो सॊऩका आऩ कय सकते हैं। 100 से अधधक जैन मॊि हभाये महाॊ जैन धभा के सबी प्रभुख, दुराब एवॊ शीघ्र प्रबावशारी मॊि ताम्र ऩि, ससरवय ( ाॊदी) ओय गोल्ड (सोने) भे उऩरब्ध हैं। हभाये महाॊ सबी प्रकाय के मॊि कोऩय ताम्र ऩि, ससरवय ( ाॊदी) ओय गोल्ड (सोने) भे फनवाए जाते है। इसके अरावा आऩकी आवश्मकता अनुसाय आऩके द्वारा प्राप्त (ध ि, मॊि, डडज़ाईन) के अनुरुऩ मॊि बी फनवाए जाते है. गुरुत्व कामाारम द्वारा उऩरब्ध कयामे गमे सबी मॊि अखॊडडत एवॊ 22 गेज शुि कोऩय(ताम्र ऩि)- 99.99 ट शुि ससरवय ( ाॊदी) एवॊ 22 के येट गोल्ड (सोने) भे फनवाए जाते है। मॊि के ववषम भे अधधक जानकायी के सरमे हेतु सम्ऩका कयें। GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
  • 86.
    86 ससतम्फय -2019 द्वादश भहा मॊि मॊि को अतत प्राध न एवॊ दुराब मॊिो के सॊकरन से हभाये वषो के अनुसॊधान द्वारा फनामा गमा हैं।  ऩयभ दुराब वशीकयण मॊि,  बाग्मोदम मॊि  भनोवाॊतछत कामा ससवि मॊि  याज्म फाधा तनवृत्त्त मॊि  गृहस्थ सुख मॊि  शीघ्र वववाह सॊऩन्न गौयी अनॊग मॊि  सहस्िाऺी रक्ष्भी आफि मॊि  आकत्स्भक धन प्रात्प्त मॊि  ऩूणा ऩौरुष प्रात्प्त काभदेव मॊि  योग तनवृत्त्त मॊि  साधना ससवि मॊि  शिु दभन मॊि उऩयोक्त सबी मॊिो को द्वादश भहा मॊि के रुऩ भें शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि ऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत एवॊ ैतन्म मुक्त फकमे जाते हैं। त्जसे स्थाऩीत कय त्रफना फकसी ऩूजा अ ाना-ववधध ववधान ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं। >> Shop Online | Order Now  क्मा आऩके फच् े कु सॊगती के सशकाय हैं?  क्मा आऩके फच् े आऩका कहना नहीॊ भान यहे हैं?  क्मा आऩके फच् े घय भें अशाॊतत ऩैदा कय यहे हैं? घय ऩरयवाय भें शाॊतत एवॊ फच् े को कु सॊगती से छु डाने हेतु फच् े के नाभ से गुरुत्व कामाारत द्वारा शास्िोक्त ववधध-ववधान से भॊि ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त वशीकयण कव एवॊ एस.एन.डडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भें स्थावऩत कय अल्ऩ ऩूजा, ववधध-ववधान से आऩ ववशेष राब प्राप्त कय सकते हैं। मदद आऩ तो आऩ भॊि ससि वशीकयण कव एवॊ एस.एन.डडब्फी फनवाना ाहते हैं, तो सॊऩका इस कय सकते हैं। GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
  • 87.
    87 ससतम्फय -2019 सॊऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत 22 गेज शुि स्टीर भें तनसभात अखॊडडत ऩुरुषाकाय शतन मंत्र ऩुरुषाकाय शतन मॊि (स्टीर भें) को तीव्र प्रबावशारी फनाने हेतु शतन की कायक धातु शुि स्टीर(रोहे) भें फनामा गमा हैं। त्जस के प्रबाव से साधक को तत्कार राब प्राप्त होता हैं। मदद जन्भ कुॊ डरी भें शतन प्रततकू र होने ऩय व्मत्क्त को अनेक कामों भें असपरता प्राप्त होती है, कबी व्मवसाम भें घटा, नौकयी भें ऩयेशानी, वाहन दुघाटना, गृह क्रेश आदद ऩयेशानीमाॊ फढ़ती जाती है ऐसी त्स्थततमों भें प्राणप्रततत्ष्ठत ग्रह ऩीडा तनवायक शतन मॊि की अऩने को व्मऩाय स्थान मा घय भें स्थाऩना कयने से अनेक राब सभरते हैं। मदद शतन की ढैमा मा साढ़ेसाती का सभम हो तो इसे अवश्म ऩूजना ादहए। शतनमॊि के ऩूजन भाि से व्मत्क्त को भृत्मु, कजा, कोटाके श, जोडो का ददा, फात योग तथा रम्फे सभम के सबी प्रकाय के योग से ऩयेशान व्मत्क्त के सरमे शतन मॊि अधधक राबकायी होगा। नौकयी ऩेशा आदद के रोगों को ऩदौन्नतत बी शतन द्वारा ही सभरती है अत् मह मॊि अतत उऩमोगी मॊि है त्जसके द्वारा शीघ्र ही राब ऩामा जा सकता है। भूल्म: 1225 से 8200 >> Shop Online | Order Now सॊऩूणा प्राणप्रततत्ष्ठत 22 गेज शुि स्टीर भें तनसभात अखॊडडत शतन तैततसा मॊि शतनग्रह से सॊफॊधधत ऩीडा के तनवायण हेतु ववशेष राबकायी मॊि। भूल्म: 640 से 12700 >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
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    88 ससतम्फय -2019 नवयत्न जडडत श्री मॊि शास्ि व न के अनुसाय शुि सुवणा मा यजत भें तनसभात श्री मॊि के ायों औय मदद नवयत्न जडवा ने ऩय मह नवयत्न जडडत श्री मॊि कहराता हैं। सबी यत्नो को उसके तनत्श् त स्थान ऩय जड कय रॉके ट के रूऩ भें धायण कयने से व्मत्क्त को अनॊत एश्वमा एवॊ रक्ष्भी की प्रात्प्त होती हैं। व्मत्क्त को एसा आबास होता हैं जैसे भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हैं। नवग्रह को श्री मॊि के साथ रगाने से ग्रहों की अशुब दशा का धायणकयने वारे व्मत्क्त ऩय प्रबाव नहीॊ होता हैं। गरे भें होने के कायण मॊि ऩववि यहता हैं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो जर त्रफॊदु शयीय को रगते हैं, वह गॊगा जर के सभान ऩववि होता हैं। इस सरमे इसे सफसे तेजस्वी एवॊ परदातम कहजाता हैं। जैसे अभृत से उत्तभ कोई औषधध नहीॊ, उसी प्रकाय रक्ष्भी प्रात्प्त के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भें नहीॊ हैं एसा शास्िोक्त व न हैं। इस प्रकाय के नवयत्न जडडत श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्वाया शुब भुहूता भें प्राण प्रततत्ष्ठत कयके फनावाए जाते हैं। Rs: 4600, 5500, 6400 से 10,900 से अधधक >> Shop Online | Order Now अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें। GURUTVA KARYALAY 92/3BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com
  • 89.
    89 ससतम्फय -2019 भॊि ससि वाहन दुघाटना नाशक भारुतत मॊि ऩौयाणणक ग्रॊथो भें उल्रेख हैं की भहाबायत के मुि के सभम अजुान के यथ के अग्रबाग ऩय भारुतत ध्वज एवॊ भारुतत मन्ि रगा हुआ था। इसी मॊि के प्रबाव के कायण सॊऩूणा मुि के दौयान हज़ायों-राखों प्रकाय के आग्नेम अस्ि-शस्िों का प्रहाय होने के फाद बी अजुान का यथ जया बी ऺततग्रस्त नहीॊ हुआ। बगवान श्री कृ ष्ण भारुतत मॊि के इस अद्भुत यहस्म को जानते थे फक त्जस यथ मा वाहन की यऺा स्वमॊ श्री भारुतत नॊदन कयते हों, वह दुघाटनाग्रस्त कै से हो सकता हैं। वह यथ मा वाहन तो वामुवेग से, तनफााधधत रुऩ से अऩने रक्ष्म ऩय ववजम ऩतका रहयाता हुआ ऩहुॊ ेगा। इसी सरमे श्री कृ ष्ण नें अजुान के यथ ऩय श्री भारुतत मॊि को अॊफकत कयवामा था। त्जन रोगों के स्कू टय, काय, फस, रक इत्मादद वाहन फाय-फाय दुघाटना ग्रस्त हो यहे हो!, अनावश्मक वाहन को नुऺान हो यहा हों! उन्हें हानी एवॊ दुघाटना से यऺा के उद्देश्म से अऩने वाहन ऩय भॊि ससि श्री भारुतत मॊि अवश्म रगाना ादहए। जो रोग रान्स्ऩोदटंग (ऩरयवहन) के व्मवसाम से जुडे हैं उनको श्रीभारुतत मॊि को अऩने वाहन भें अवश्म स्थावऩत कयना ादहए, क्मोफक, इसी व्मवसाम से जुडे सैकडों रोगों का अनुबव यहा हैं की श्री भारुतत मॊि को स्थावऩत कयने से उनके वाहन अधधक ददन तक अनावश्मक ख ो से एवॊ दुघाटनाओॊ से सुयक्षऺत यहे हैं। हभाया स्वमॊका एवॊ अन्म ववद्वानो का अनुबव यहा हैं, की त्जन रोगों ने श्री भारुतत मॊि अऩने वाहन ऩय रगामा हैं, उन रोगों के वाहन फडी से फडी दुघाटनाओॊ से सुयक्षऺत यहते हैं। उनके वाहनो को कोई ववशेष नुक्शान इत्मादद नहीॊ होता हैं औय नाहीॊ अनावश्मक रुऩ से उसभें खयाफी आतत हैं। वास्तु प्रमोग भें भारुतत मंत्र: मह भारुतत नॊदन श्री हनुभान जी का मॊि है। मदद कोई जभीन त्रफक नहीॊ यही हो, मा उस ऩय कोई वाद-वववाद हो, तो इच्छा के अनुरूऩ वहॉ जभीन उध त भूल्म ऩय त्रफक जामे इस सरमे इस भारुतत मॊि का प्रमोग फकमा जा सकता हैं। इस भारुतत मॊि के प्रमोग से जभीन शीघ्र त्रफक जाएगी मा वववादभुक्त हो जाएगी। इस सरमे मह मॊि दोहयी शत्क्त से मुक्त है। भारुतत मॊि के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें। भूल्म Rs- 325 से 12700 तक श्री हनुभान मॊि शास्िों भें उल्रेख हैं की श्री हनुभान जी को बगवान सूमादेव ने ब्रहभा जी के आदेश ऩय हनुभान जी को अऩने तेज का सौवाॉ बाग प्रदान कयते हुए आशीवााद प्रदान फकमा था, फक भैं हनुभान को सबी शास्ि का ऩूणा ऻान दूॉगा। त्जससे मह तीनोरोक भें सवा श्रेष्ठ वक्ता होंगे तथा शास्ि ववद्या भें इन्हें भहायत हाससर होगी औय इनके सभन फरशारी औय कोई नहीॊ होगा। जानकायो ने भतानुसाय हनुभान मॊि की आयाधना से ऩुरुषों की ववसबन्न फीभारयमों दूय होती हैं, इस मॊि भें अद्भुत शत्क्त सभादहत होने के कायण व्मत्क्त की स्वप्न दोष, धातु योग, यक्त दोष, वीमा दोष, भूछाा, नऩुॊसकता इत्मादद अनेक प्रकाय के दोषो को दूय कयने भें अत्मन्त राबकायी हैं। अथाात मह मॊि ऩौरुष को ऩुष्ट कयता हैं। श्री हनुभान मॊि व्मत्क्त को सॊकट, वाद-वववाद, बूत-प्रेत, द्मूत फक्रमा, ववषबम, ोय बम, याज्म बम, भायण, सम्भोहन स्तॊबन इत्मादद से सॊकटो से यऺा कयता हैं औय ससवि प्रदान कयने भें सऺभ हैं। श्री हनुभान मॊि के ववषम भें अधधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भें सॊऩका कयें। भूल्म Rs- 910 से 12700 तक GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, >> Shop Online | Order Now
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    90 ससतम्फय -2019 ववसबन्न देवताओं के मंत्र गणेश मंत्र भहाभृत्मुॊजम मॊि याभ यऺा मॊि याज गणेश मंत्र (संऩूणथ फीज भंत्र सदहत) भहाभृत्मुॊजम कव मॊि याभ मॊि गणेश ससि मंत्र भहाभृत्मुॊजम ऩूजन मॊि द्वादशाऺय ववष्णु भॊि ऩूजन मॊि एकाऺय गणऩतत मंत्र भहाभृत्मुॊजम मुक्त सशव खप्ऩय भाहा सशव मॊि ववष्णु फीसा मॊि हरयद्रा गणेश मंत्र सशव ऩॊ ाऺयी मॊि गरुड ऩूजन मॊि कु फेय मंत्र सशव मॊि ध ॊताभणी मॊि याज श्री द्वादशाऺयी रुद्र ऩूजन मंत्र अद्वद्वतीम सवाकाम्म ससवि सशव मॊि ध ॊताभणी मॊि दत्तात्रम मंत्र नृससॊह ऩूजन मॊि स्वणााकषाणा बैयव मॊि दत्त मंत्र ऩॊ देव मॊि हनुभान ऩूजन मॊि आऩदुिायण फटुक बैयव मंत्र सॊतान गोऩार मॊि हनुभान मॊि फटुक मंत्र श्री कृ ष्ण अष्टाऺयी भॊि ऩूजन मॊि सॊकट भो न मॊि व्मंकटेश मंत्र कृ ष्ण फीसा मॊि वीय साधन ऩूजन मॊि कातथवीमाथजुथन ऩूजन मंत्र सवा काभ प्रद बैयव मॊि दक्षऺणाभूतता ध्मानभ ् मॊि भनोकाभना ऩूततथ एवं कष्ट तनवायण हेतु ववशेष मंत्र व्माऩाय वृवि कायक मंत्र अभृत तत्व सॊजीवनी कामा कल्ऩ मॊि िम ताऩोंसे भुत्क्त दाता फीसा मॊि व्माऩाय वृवि मंत्र ववजमयाज ऩॊ दशी मॊि भधुभेह तनवायक मॊि व्माऩाय वधथक मंत्र ववद्यामश ववबूतत याज सम्भान प्रद ससि फीसा मॊि ज्वय तनवायण मॊि व्माऩायोन्नतत कायी ससि मंत्र सम्भान दामक मॊि योग कष्ट दरयिता नाशक मॊि बाग्म वधथक मंत्र सुख शाॊतत दामक मॊि योग तनवायक मॊि स्वश्स्तक मंत्र फारा मॊि तनाव भुक्त फीसा मॊि सवथ कामथ फीसा मंत्र फारा यऺा मॊि ववद्मुत भानस मॊि कामथ ससवि मंत्र गबा स्तम्बन मॊि गृह करह नाशक मॊि सुख सभृवि मंत्र सॊतान प्रात्प्त मॊि करेश हयण फत्त्तसा मॊि सवथ रयवि ससवि प्रद मंत्र प्रसूता बम नाशक मॊि वशीकयण मॊि सवथ सुख दामक ऩैंसदठमा मंत्र प्रसव-कष्टनाशक ऩॊ दशी मॊि भोदहतन वशीकयण मॊि ऋवि ससवि दाता मंत्र शाॊतत गोऩार मॊि कणा वऩशा नी वशीकयण मॊि सवथ ससवि मंत्र त्रिशूर फीशा मॊि वाताारी स्तम्बन मॊि साफय ससवि मंत्र ऩॊ दशी मॊि (फीसा मॊि मुक्त ायों प्रकायके ) वास्तु मॊि शाफयी मंत्र फेकायी तनवायण मॊि श्री भत्स्म मॊि ससिाश्रभ मंत्र षोडशी मॊि वाहन दुघाटना नाशक मॊि ज्मोततष तंत्र ऻान ववऻान प्रद ससि फीसा मंत्र अडसदठमा मॊि प्रेत-फाधा नाशक मॊि ब्रह्भाण्ड साफय ससवि मंत्र अस्सीमा मॊि बूतादी व्माधधहयण मॊि कु ण्डसरनी ससवि मंत्र ऋवि कायक मॊि कष्ट तनवायक ससवि फीसा मॊि क्राश्न्त औय श्रीवधथक चौंतीसा मंत्र भन वाॊतछत कन्मा प्रात्प्त मॊि बम नाशक मॊि श्री ऺेभ कल्माणी ससवि भहा मंत्र वववाहकय मॊि स्वप्न बम तनवायक मॊि
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    91 ससतम्फय -2019 ऻान दाता भहा मंत्र रग्न ववघ्न तनवायक मॊि कु दृत्ष्ट नाशक मॊि कामा कल्ऩ मंत्र रग्न मोग मॊि श्री शिु ऩयाबव मॊि दीधाथमु अभृत तत्व संजीवनी मंत्र दरयिता ववनाशक मॊि शिु दभनाणाव ऩूजन मॊि भंत्र ससि ववशेष दैवी मंत्र सूधच आद्य शश्क्त दुगाथ फीसा मंत्र (अंफाजी फीसा मंत्र) सयस्वती मॊि भहान शश्क्त दुगाथ मंत्र (अंफाजी मंत्र) सप्तसती भहामॊि(सॊऩूणा फीज भॊि सदहत) नव दुगाथ मंत्र कारी मॊि नवाणथ मंत्र (चाभुंडा मंत्र) श्भशान कारी ऩूजन मॊि नवाणथ फीसा मंत्र दक्षऺण कारी ऩूजन मॊि चाभुंडा फीसा मंत्र ( नवग्रह मुक्त) सॊकट भोध नी कासरका ससवि मॊि त्रत्रशूर फीसा मंत्र खोडडमाय मॊि फगरा भुखी मंत्र खोडडमाय फीसा मॊि फगरा भुखी ऩूजन मंत्र अन्नऩूणाा ऩूजा मॊि याज याजेववयी वांछा कल्ऩरता मंत्र एकाॊऺी श्रीपर मॊि भंत्र ससि ववशेष रक्ष्भी मंत्र सूधच श्री मंत्र (रक्ष्भी मंत्र) भहारक्ष्भमै फीज मॊि श्री मंत्र (भंत्र यदहत) भहारक्ष्भी फीसा मॊि श्री मंत्र (संऩूणथ भंत्र सदहत) रक्ष्भी दामक ससि फीसा मॊि श्री मंत्र (फीसा मंत्र) रक्ष्भी दाता फीसा मॊि श्री मंत्र श्री सूक्त मंत्र रक्ष्भी गणेश मॊि श्री मंत्र (कु भथ ऩृष्ठीम) ज्मेष्ठा रक्ष्भी भॊि ऩूजन मॊि रक्ष्भी फीसा मंत्र कनक धाया मॊि श्री श्री मंत्र (श्रीश्री रसरता भहात्रत्रऩुय सुन्दमै श्री भहारक्ष्भमैं श्री भहामंत्र) वैबव रक्ष्भी मॊि (भहान ससवि दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि) अंकात्भक फीसा मंत्र ताम्र ऩत्र ऩय सुवणथ ऩोरीस (Gold Plated) ताम्र ऩत्र ऩय यजत ऩोरीस (Silver Plated) ताम्र ऩत्र ऩय (Copper) साईज भूल्म साईज भूल्म साईज भूल्म 1” X 1” 2” X 2” 3” X 3” 4” X 4” 6” X 6” 9” X 9” 12” X12” 550 910 1450 2350 3700 9100 12700 1” X 1” 2” X 2” 3” X 3” 4” X 4” 6” X 6” 9” X 9” 12” X12” 370 640 1050 1450 2800 4600 9100 1” X 1” 2” X 2” 3” X 3” 4” X 4” 6” X 6” 9” X 9” 12” X12” 325 550 910 1225 2350 4150 9100 मंत्र के ववषम भें अधधक जानकायी हेतु संऩकथ कयें। >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
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    92 ससतम्फय -2019 2019 भाससक ऩॊ ाॊग दद िार माह पक्ष द्विद्वि समाद्वि नक्षत्र समाद्वि योग समाद्वि करण समाद्वि चंद्र राद्वश समाद्वि 1 यवव बािऩद शुक्र 08:31- 29:40 11:10 साध्म 09:31 कौरव 08:31 - 2 सोभ बािऩद शुक्र 26:4 08:32 ल 25:53 वणणज 15:30 06:45 3 भॊगर बािऩद शुक्र 23:40 - 06:23- 28:54 ब्रहभ 22:46 फव 12:47 ल - 4 फुध बािऩद शुक्र 21:59 28:07 इन्ि 20:15 कौरव 10:44 ल 11:40 5 गुरु बािऩद शुक्र 21:06 28:08 वैधृतत 18:23 गय 09:26 - 6 शुक्र बािऩद शुक्र 21:00 28:57 ववषकुॊ ब 17:09 ववत्ष्ट 08:57 - 7 शतन बािऩद शुक्र 21:39 ल - प्रीतत 16:33 फारव 09:14 17:22 8 यवव बािऩद शुक्र 22:57 ल 06:28 आमुष्भान 16:29 तैततर 10:14 - 9 सोभ बािऩद शुक्र 24:45 08:35 सौबाग्म 16:52 वणणज 11:48 15:13 10 भॊगर बािऩद शुक्र 26:54 11:08 शोबन 17:33 फव 13:47 - 11 फुध बािऩद शुक्र 29:14 13:59 अततगॊड 18:27 कौरव 16:03 - 12 गुरु बािऩद शुक्र - 16:57 सुकभाा 19:27 गय 18:26 03:29 13 शुक्र बािऩद शुक्र 07:39 19:58 धृतत 20:27 वणणज 07:39 - 14 शतन बािऩद शुक्र 10:02 22:55 शूर 21:25 फव 10:02 16:12
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    93 ससतम्फय -2019 15 यवव कृ ष्ण प्रततऩदा 12:19 25:44 गॊड 22:17 कौरव 12:19 - 16 सोभ कृ ष्ण 14:27 28:21 वृवि 23:00 गय 14:27 - 17 भॊगर कृ ष्ण 16:21 - ्ुव 23:30 ववत्ष्ट 16:21 04:22 18 फुध कृ ष्ण 17:57 06:43 व्माघात 23:45 फारव 17:57 - 19 गुरु कृ ष्ण 19:10 08:44 हषाण 23:40 कौरव 06:37 15:12 20 शुक्र कृ ष्ण 19:54 10:19 वज्र 23:09 गय 07:36 - 21 शतन कृ ष्ण 20:03 11:21 ससवि 22:10 ववत्ष्ट 08:03 22:30 22 यवव कृ ष्ण 19:33 11:45 व्मततऩात 20:39 फारव 07:53 - 23 सोभ कृ ष्ण 18:22 11:29 वरयमान 18:33 तैततर 07:03 - 24 भॊगर कृ ष्ण 16:29 10:30 ऩरयग्रह 15:52 ववत्ष्ट 16:29 04:50 25 फुध कृ ष्ण 13:58 08:52 सशव 12:40 फारव 13:58 - 26 गुरु कृ ष्ण 10:54 ल - 06:39 - 28:01 साध्म 09:00 तैततर 10:54 06:40 27 शुक्र कृ ष्ण - 07:26- 27:43 25:4 शुब 24:43 वणणज 07:26 - 28 शतन कृ ष्ण 23:56 22:02 ल 20:22 तुस्ऩाद 13:49 06:19 29 यवव शुक्र प्रततऩदा 20:16 19:06 ब्रहभ 16:06 फकस्तुघ्न 10:04 - 30 सोभ शुक्र 16:55 16:28 इन्ि 12:03 फारव 06:32 05:45
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    94 ससतम्फय -2019 2019 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय दद वाय भाह ऩऺ ततधथ सभाश्प्त प्रभुख व्रत-त्मोहाय 1 यवव बािऩद शुक्र - 08:31- 29:40 ल व्रत, फडी तीज, वायाहावताय जमॊती, गौयी तृतीमा व्रत, के वडा तीज, गौयी तीज (ओडीसा), त्रिरोक तीज 2 सोभ बािऩद शुक्र 26:4 श्रीकृ ष्ण-करॊकनी तुथॉ, शास्िोक्त भत से आज के ददन ॊिभा का दशान सवाथा तनवषि, ऩत्थय (ढेरा) ौथ, ौठ ॊि (सभधथ.), सौबाग्म तुथॉ (ऩ.फॊ), सशवा तुथॉ, सयस्वती ऩूजा (ओडीसा), रक्ष्भी ऩूजा, जैन सॊवत्सयी ( तुथॉ ऩऺ) (श्वेताॊफय जैन), भूरसूिवाॊ न (श्वेताॊफय जैन), 3 भॊगर बािऩद शुक्र 23:40 ऋवषऩॊ भी-भध्माहन भें सप्तवषा ऩूजन, गगा एवॊ अॊधगया ऋवष जमॊती, आकाश ऩॊ भी (जैन), जैन सॊवत्सयी (ऩॊ भी ऩऺ), गुरु ऩॊ भी (ओडीसा), यऺाऩॊ भी (ऩ.फॊ), दशरऺण व्रत 10 ददन एवॊ ऩुष्ऩाॊजसर व्रत 5 ददन (ददगॊफय जैन), आकाश ऩॊ भी (जैन), 4 फुध बािऩद शुक्र 21:59 सूमाषष्ठी व्रत, रोराका षष्ठी (काशी), फरदेव छठ-श्रीफरयाभ जमॊती भहोत्सव (ब्रज), रसरता षष्ठी, भॊथन षष्ठी (ऩ.फॊ), स्कन्द कु भाय षष्ठी व्रत, सोभनाथ व्रत (ओडीसा), गौयी का आवाहन, ॊदनषष्ठी (जैन), कारू तनवााण ददवस (जैन) 5 गुरु बािऩद शुक्र 21:06 भुक्ताबयण सप्तभी व्रत, सॊतान सप्तभी व्रत, रसरता सप्तभी (ऩ.फॊ- ओडीसा), नवाखाई, अऩयात्जता ऩूजा, ज्मेष्ठागौयी का ऩूजन, भहारक्ष्भी व्रत-अनुष्ठान प्रायॊब ( ॊिोदम कारीन अष्टभी भें), तनदोष- शीरसप्तभी (ददगॊफय जैन), 6 शुक्र बािऩद शुक्र 21:00 श्रीदुगााष्टभी व्रत, श्रीअन्नऩूणााष्टभी व्रत, श्रीयाधाष्टभी व्रतोत्सव (फयसाना-भथुया) दधीध जमॊती, ज्मेष्ठागौयी का ववसजान, तन:शल्म अष्टभी (ददग.जैन), दुफरी आठभ (श्वेत.जैन), 7 शतन बािऩद शुक्र 21:39 श्रीभद्भागवत जमॊती-सप्ताह प्रायॊब,नन्दानवभी, अदुख नवभी, श्री ॊि जमॊती, तर नवभी (ऩ.फॊ- ओडीसा), 8 यवव बािऩद शुक्र 22:57 तेजा दशभी, सुगन्ध दशभी (जैन), भहायवववाय व्रत
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    95 ससतम्फय -2019 9 सोभ बािऩद शुक्र 24:45 ल ल ऩाश्वा ऩरयवतानी एकादशी, धभाा- कभाा एकादशी ल ग्मायस (भ.प्रदेश), 10 भॊगर बािऩद शुक्र 26:54 श्रवण नऺिमुता द्वादशी व्रत, श्रीवाभन अवताय जमॊती, बुवनेश्वयी भहाववद्या जमॊती, श्माभफाफा द्वादशी द्वा द्वा इन्िऩूजा प्रायॊब 11 फुध बािऩद शुक्र 29:14 ओणभ (द.बायत), प्रदोष व्रत, गोत्रियाि व्रत प्रायॊब, यत्निम व्रत 3 ददन (ददगॊफय जैन) 12 गुरु बािऩद शुक्र - अनन्त तुदाशी, 10 ददन का श्रीगणेशोत्सव ऩूणा, ऩाधथाव गणेश प्रततभा ववसजान (भहायाष्र), इन्ि गोववन्द ऩूजा (ओडीसा), 13 शुक्र बािऩद शुक्र 07:39 स्नान-दान हेतु उत्तभ बािऩदी ऩूणणाभा (07:39 ), गोत्रियाि व्रत ऩूणा, श्रीभद्भागवत सप्ताह ऩूणा, श्रीसत्मनायामण ऩूजा कथा, रोकऩार ऩूजा ऩूणणाभा, सशव ऩरयवतानोत्सव भहारम आयॊब ऩूणणाभा का श्राि (07:39 ), अम्फाजी का भेरा, 14 शतन बािऩद शुक्र 10:02 स्नान-दान हेतु उत्तभ बािऩदी ऩूणणाभा (10:02 ), सॊन्माससमोंका ातुभाास ऩूणा, शास्िोक्त भत से ातुभाास के व्रतधायी के सरए आत्श्वन भें दूध वत्जात हैं। वऩतृऩऺ का तऩाण प्रायॊब, प्रततऩदा का 10:02 अशून्म शमन व्रत, ऺभावाणी ऩवा (ददगॊफय जैन) 15 यवव कृ ष्ण प्रततऩदा 12:19 प्रततऩदा का द्वद्वतीमा का श्राि, दूज का श्राि, दूज का श्राि 16 सोभ कृ ष्ण 14:27 तीमा का श्राि, दूज का श्राि तृतीमा श्राि, तीज का श्राि 17 भॊगर कृ ष्ण 16:21 सॊकष्टी श्रीगणेश तुथॉ व्रत 8 ववश्वकभाा ऩूजा, बौभ ववश्वकभाा ऩूजा, सूमा की कन्मा सॊक्रात्न्त 13:09 तृतीमा श्राि, तीज का श्राि ( 16:21 18 फुध कृ ष्ण 17:57 तुथॉ का श्राि, ौथ का श्राि, 19 गुरु कृ ष्ण 19:10 का
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    96 ससतम्फय -2019 20 शुक्र कृ ष्ण 19:54 षष्ठी का श्राि, छठ का श्राि, कवऩरा षष्ठी, ॊि षष्ठी व्रत, 21 शतन कृ ष्ण 20:03 सप्तभी का श्राि, सातभ का श्राि, बानु सप्तभी ऩवा (ववद्वानों के भत से सूमा ग्रहण तुल्म परप्रद), सादहफ सप्तभी, जीववत्ऩुत्रिका व्रत ( ), जीउततमा व्रत, 22 यवव कृ ष्ण 19:33 अष्टभी का श्राि, आठभ का श्राि, काराष्टभी व्रत, भहारक्ष्भी अष्टभी,भहारक्ष्भी व्रत ऩूणा, गमाभध्माष्टभी, गजगौयी अष्टभी, जीउततमा व्रत, जीववत्ऩुत्रिका व्रत ( जीववत्ऩुत्रिका व्रत का ऩायण ( ), 23 सोभ कृ ष्ण 18:22 नवभी का श्राि, नोभ का श्राि, भातृनवभी श्राि, सौबाग्मवती त्स्िमों (सुहाधगनों) का श्राि, जीववत्ऩुत्रिका व्रत का ऩायण 24 भॊगर कृ ष्ण 16:29 दशभी का श्राि, 25 फुध कृ ष्ण 13:58 इॊददया एकादशी व्रत, एकादशी का श्राि, ग्मायस का श्राि 8 द्वादशी का श्राि, फायस का श्राि, भघा श्राि, सॊन्माससमों-मतत व वैष्णवों का श्राि, येंदटमा फायस, 26 गुरु कृ ष्ण द्वा 10:54 10: द्वादशी का श्राि, फायस का श्राि, भघा श्राि, सॊन्माससमों-मतत व वैष्णवों का श्राि, येंदटमा फायस, िमोदशी का श्राि, तेयस का श्राि 27 शुक्र कृ ष्ण - 07:26- 27:43 भाससक सशवयात्रि व्रत, दुभायण श्राि, (आज के ददन शस्ि, ववष, अत्ग्न, जर, दुघाटना आदद से अकार भृत्मु भें भये व्मत्क्त का श्राि), तुदाशी का श्राि, 28 शतन कृ ष्ण 23:56 स्नान-दान-श्राि हेतु उत्तभ आत्श्वनी अभावस्मा, वऩतृववसजानी अभावस, सवावऩतृ श्राि, आज अऻात भयण ततधथवारे ऩूवाजों का श्राि अभावस्मा भें फकमा जाना शास्िोध त यहेगा, नाती द्वाया नाना-नानी का श्राि, अभावस्मा, भहारमा सभाप्त 29 यवव शुक्र प्रततऩदा 20:16 शायदीम नवयाि प्रायॊब, प्रथभ नवयाि करश स्थाऩना, घट स्थाऩना भहायाज अग्रसेन जमॊती 30 सोभ शुक्र 16:55 तीम नवयाि, नवीन ॊि दशान, येभन्त ऩूजन,
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    97 ससतम्फय -2019 यासश यत्न भेष यासश: वृषब यासश: सभथुन यासश: कका यासश: ससॊह यासश: कन्मा यासश: भूॊगा हीया ऩन्ना भोती भाणेक ऩन्ना Red Coral (Special) Diamond (Special) Green Emerald (Special) Naturel Pearl (Special) Ruby (Old Berma) (Special) Green Emerald (Special) 5.25" Rs. 1050 10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 9100 5.25" Rs. 910 2.25" Rs. 12500 5.25" Rs. 9100 6.25" Rs. 1250 20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 12500 6.25" Rs. 1250 3.25" Rs. 15500 6.25" Rs. 12500 7.25" Rs. 1450 30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 14500 7.25" Rs. 1450 4.25" Rs. 28000 7.25" Rs. 14500 8.25" Rs. 1800 40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 19000 8.25" Rs. 1900 5.25" Rs. 46000 8.25" Rs. 19000 9.25" Rs. 2100 50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 23000 9.25" Rs. 2300 6.25" Rs. 82000 9.25" Rs. 23000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 ** All Weight In Rati All Diamond are Full White Colour. ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati तुरा यासश: वृत्श् क यासश: धनु यासश: भकय यासश: कुॊ ब यासश: भीन यासश: हीया भूॊगा ऩुखयाज नीरभ नीरभ ऩुखयाज Diamond (Special) Red Coral (Special) Y.Sapphire (Special) B.Sapphire (Special) B.Sapphire (Special) Y.Sapphire (Special) 10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 1050 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 1250 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 1450 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 1800 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 2100 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 All Diamond are Full White Colour. ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati * उऩमोक्त वजन औय भूल्म से अधधक औय कभ वजन औय भूल्म के यत्न एवॊ उऩयत्न बी हभाये महा व्माऩायी भूल्म ऩय उप्रब्ध हैं। >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Shop Online @ : www.gurutvakaryalay.com
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    98 ससतम्फय -2019 श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि फकसी बी व्मत्क्त का जीवन तफ आसान फन जाता हैं जफ उसके ायों औय का भाहोर उसके अनुरुऩ उसके वश भें हों। जफ कोई व्मत्क्त का आकषाण दुसयो के उऩय एक ुम्फकीम प्रबाव डारता हैं, तफ रोग उसकी सहामता एवॊ सेवा हेतु तत्ऩय होते है औय उसके प्राम् सबी कामा त्रफना अधधक कष्ट व ऩयेशानी से सॊऩन्न हो जाते हैं। आज के बौततकता वादद मुग भें हय व्मत्क्त के सरमे दूसयो को अऩनी औय खी ने हेतु एक प्रबावशासर ुॊफकत्व को कामभ यखना अतत आवश्मक हो जाता हैं। आऩका आकषाण औय व्मत्क्तत्व आऩके ायो ओय से रोगों को आकवषात कये इस सरमे सयर उऩाम हैं, श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र। क्मोफक बगवान श्री कृ ष्ण एक अरौफकव एवॊ ददवम ुॊफकीम व्मत्क्तत्व के धनी थे। इसी कायण से श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के ऩूजन एवॊ दशान से आकषाक व्मत्क्तत्व प्राप्त होता हैं। श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के साथ व्मत्क्तको दृढ़ इच्छा शत्क्त एवॊ उजाा प्राप्त होती हैं, त्जस्से व्मत्क्त हभेशा एक बीड भें हभेशा आकषाण का कें ि यहता हैं। मदद फकसी व्मत्क्त को अऩनी प्रततबा व आत्भववश्वास के स्तय भें वृवि, अऩने सभिो व ऩरयवायजनो के त्रफ भें रयश्तो भें सुधाय कयने की ईच्छा होती हैं उनके सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र का ऩूजन एक सयर व सुरब भाध्मभ सात्रफत हो सकता हैं। श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र ऩय अॊफकत शत्क्तशारी ववशेष येखाएॊ, फीज भॊि एवॊ अॊको से व्मत्क्त को अद्द्भुत आॊतरयक शत्क्तमाॊ प्राप्त होती हैं जो व्मत्क्त को सफसे आगे एवॊ सबी ऺेिो भें अग्रणणम फनाने भें सहामक ससि होती हैं। श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के ऩूजन व तनमसभत दशान के भाध्मभ से बगवान श्रीकृ ष्ण का आशीवााद प्राप्त कय सभाज भें स्वमॊ का अद्वद्वतीम स्थान स्थावऩत कयें। श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र अरौफकक ब्रहभाॊडीम उजाा का सॊ ाय कयता हैं, जो एक प्राकृ त्त्त भाध्मभ से व्मत्क्त के बीतय सद्दबावना, सभृवि, सपरता, उत्तभ स्वास्थ्म, मोग औय ध्मान के सरमे एक शत्क्तशारी भाध्मभ हैं!  श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के ऩूजन से व्मत्क्त के साभात्जक भान-सम्भान व ऩद-प्रततष्ठा भें वृवि होती हैं।  ववद्वानो के भतानुसाय श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र के भध्मबाग ऩय ध्मान मोग कें दित कयने से व्मत्क्त फक ेतना शत्क्त जाग्रत होकय शीघ्र उच् स्तय को प्राप्तहोती हैं।  जो ऩुरुषों औय भदहरा अऩने साथी ऩय अऩना प्रबाव डारना ाहते हैं औय उन्हें अऩनी औय आकवषात कयना ाहते हैं। उनके सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र उत्तभ उऩाम ससि हो सकता हैं।  ऩतत-ऩत्नी भें आऩसी प्रभ की वृवि औय सुखी दाम्ऩत्म जीवन के सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मंत्र राबदामी होता हैं। भूल्म:- Rs. 910 से Rs. 12700 तक उप्रब्ि >> Shop Online श्रीकृ ष्ण फीसा कव श्रीकृ ष्ण फीसा कव को के वर ववशेष शुब भुहुता भें तनभााण फकमा जाता हैं। कव को ववद्वान कभाकाॊडी ब्राहभणों द्वाया शुब भुहुता भें शास्िोक्त ववधध-ववधान से ववसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्वाया ससि प्राण- प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त कयके तनभााण फकमा जाता हैं। त्जस के पर स्वरुऩ धायण कयता व्मत्क्त को शीघ्र ऩूणा राब प्राप्त होता हैं। कव को गरे भें धायण कयने से वहॊ अत्मॊत प्रबाव शारी होता हैं। गरे भें धायण कयने से कव हभेशा रृदम के ऩास यहता हैं त्जस्से व्मत्क्त ऩय उसका राब अतत तीव्र एवॊ शीघ्र ऻात होने रगता हैं। भूरम भात्र: 2350 >>Order Now GURUTVA KARYALAY Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Shop Online @ : www.gurutvakaryalay.com
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    99 ससतम्फय -2019 जैन धभाके ववसशष्ट मॊिो की सू ी श्री ौफीस तीथंकयका भहान प्रबाववत भत्कायी मॊि श्री एकाऺी नारयमेय मॊि श्री ोफीस तीथंकय मॊि सवातो बि मॊि कल्ऩवृऺ मॊि सवा सॊऩत्त्तकय मॊि ध ॊताभणी ऩाश्वानाथ मॊि सवाकामा-सवा भनोकाभना ससविअ मॊि (१३० सवातोबि मॊि) ध ॊताभणी मॊि (ऩैंसदठमा मॊि) ऋवष भॊडर मॊि ध ॊताभणी क्र मॊि जगदवल्रब कय मॊि श्री क्रे श्वयी मॊि ऋवि ससवि भनोकाभना भान सम्भान प्रात्प्त मॊि श्री घॊटाकणा भहावीय मॊि ऋवि ससवि सभृवि दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि श्री घॊटाकणा भहावीय सवा ससवि भहामॊि (अनुबव ससि सॊऩूणा श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि) ववषभ ववष तनग्रह कय मॊि श्री ऩद्मावती मॊि ऺुिो ऩिव तननााशन मॊि श्री ऩद्मावती फीसा मॊि फृहच् क्र मॊि श्री ऩाश्वाऩद्मावती ह्ींकाय मॊि वॊध्मा शब्दाऩह मॊि ऩद्मावती व्माऩाय वृवि मॊि भृतवत्सा दोष तनवायण मॊि श्री धयणेन्ि ऩद्मावती मॊि काॊक वॊध्मादोष तनवायण मॊि श्री ऩाश्वानाथ ध्मान मॊि फारग्रह ऩीडा तनवायण मॊि श्री ऩाश्वानाथ प्रबुका मॊि रधुदेव कु र मॊि बक्ताभय मॊि (गाथा नॊफय १ से ४४ तक) नवगाथात्भक उवसग्गहयॊ स्तोिका ववसशष्ट मॊि भणणबि मॊि उवसग्गहयॊ मॊि श्री मॊि श्री ऩॊ भॊगर भहाश्रृत स्कॊ ध मॊि श्री रक्ष्भी प्रात्प्त औय व्माऩाय वधाक मॊि ह्ीॊकाय भम फीज भॊि श्री रक्ष्भीकय मॊि वधाभान ववद्या ऩट्ट मॊि रक्ष्भी प्रात्प्त मॊि ववद्या मॊि भहाववजम मॊि सौबाग्मकय मॊि ववजमयाज मॊि डाफकनी, शाफकनी, बम तनवायक मॊि ववजम ऩतका मॊि बूतादद तनग्रह कय मॊि ववजम मॊि ज्वय तनग्रह कय मॊि ससि क्र भहामॊि शाफकनी तनग्रह कय मॊि दक्षऺण भुखाम शॊख मॊि आऩत्त्त तनवायण मॊि दक्षऺण भुखाम मॊि शिुभुख स्तॊबन मॊि मंत्र के ववषम भें अधधक जानकायी हेतु संऩकथ कयें। GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Shop Online @ : www.gurutvakaryalay.com
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    100 ससतम्फय -2019 घॊटाकणा भहावीय सवा ससवि भहामॊि को स्थाऩीत कयने से साधक की सवा भनोकाभनाएॊ ऩूणा होती हैं। सवा प्रकाय के योग बूत-प्रेत आदद उऩिव से यऺण होता हैं। जहयीरे औय दहॊसक प्राणीॊ से सॊफॊधधत बम दूय होते हैं। अत्ग्न बम, ोयबम आदद दूय होते हैं। दुष्ट व असुयी शत्क्तमों से उत्ऩन्न होने वारे बम से मॊि के प्रबाव से दूय हो जाते हैं। मॊि के ऩूजन से साधक को धन, सुख, सभृवि, ऎश्वमा, सॊतत्त्त-सॊऩत्त्त आदद की प्रात्प्त होती हैं। साधक की सबी प्रकाय की सात्त्वक इच्छाओॊ की ऩूतता होती हैं। मदद फकसी ऩरयवाय मा ऩरयवाय के सदस्मो ऩय वशीकयण, भायण, उच् ाटन इत्मादद जादू-टोने वारे प्रमोग फकमे गमें होतो इस मॊि के प्रबाव से स्वत् नष्ट हो जाते हैं औय बववष्म भें मदद कोई प्रमोग कयता हैं तो यऺण होता हैं। कु छ जानकायो के श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि से जुडे अद्द्भुत अनुबव यहे हैं। मदद घय भें श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि स्थावऩत फकमा हैं औय मदद कोई इषाा, रोब, भोह मा शिुतावश मदद अनुध त कभा कयके फकसी बी उद्देश्म से साधक को ऩयेशान कयने का प्रमास कयता हैं तो मॊि के प्रबाव से सॊऩूणा ऩरयवाय का यऺण तो होता ही हैं, कबी-कबी शिु के द्वाया फकमा गमा अनुध त कभा शिु ऩय ही उऩय उरट वाय होते देखा हैं। भूल्म:- Rs. 2350 से Rs. 12700 तक उप्रब्ि >> Shop Online | Order Now संऩकथ कयें। GURUTVA KARYALAY Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
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    101 ससतम्फय -2019 अभोघ भहाभृत्मुॊजम कव अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव व उल्रेणखत अन्म साभग्रीमों को शास्िोक्त ववधध-ववधान से ववद्वान ब्राहभणो द्वाया सवा राख भहाभृत्मुंजम भंत्र जऩ एवॊ दशाॊश हवन द्वाया तनसभात फकमा जाता हैं इससरए कव अत्मॊत प्रबावशारी होता हैं। >> Order Now अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव कव फनवाने हेतु: अऩना नाभ, वऩता-भाता का नाभ, गोि, एक नमा पोटो बेजे याशी यत्न एवॊ उऩयत्न ववशेष मॊि हभायें महाॊ सबी प्रकाय के मॊि सोने- ाॊदद- ताम्फे भें आऩकी आवश्मक्ता के अनुसाय फकसी बी बाषा/धभा के मॊिो को आऩकी आवश्मक डडजाईन के अनुसाय २२ गेज शुि ताम्फे भें अखॊडडत फनाने की ववशेष सुववधाएॊ उऩरब्ध हैं। सबी साईज एवॊ भूल्म व क्वासरदट के असरी नवयत्न एवॊ उऩयत्न बी उऩरब्ध हैं। हभाये महाॊ सबी प्रकाय के यत्न एवॊ उऩयत्न व्माऩायी भूल्म ऩय उऩरब्ध हैं। ज्मोततष कामा से जुडे फधु/फहन व यत्न व्मवसाम से जुडे रोगो के सरमे ववशेष भूल्म ऩय यत्न व अन्म साभग्रीमा व अन्म सुववधाएॊ उऩरब्ध हैं। GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Shop Online:- www.gurutvakaryalay.com अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कव दक्षऺणा भाि: 10900
  • 102.
    102 ससतम्फय -2019 2019 -ववशेष मोग कामा ससवि मोग द्वद्वऩुष्कय मोग (दोगुना पर दामक) 01 ल 21 दोऩहय 8 05 8 ल 29 8 ल 08 ववघ्नकायक बिा 15 02 दोऩहय 03:21 से यात 01:54 तक (ऩातार) 17 ल 05 यात 08:49 से अगरे ददन 08:40 तक (स्वगा) 21 8 ल 09 दोऩहय 11:41 से यात 12:31 तक (ऩातार) 29 ल यात 07:07 13 सुफह 07:35 से यात 08:49 तक (ऩृथ्वी) त्रिऩुष्कय मोग (तीनगुना पर दामक) 17 से सॊध्मा 04:33 तक (स्वगा) 01 8 20 8 से अगरे ददन सुफह 08:21 तक (स्वगा) 10 दोऩहय 11:09 24 सुफह 05:45 से सॊध्मा 04:42 तक (ऩृथ्वी) 27 सुफह 07:32 से सॊध्मा 05:40 तक (ऩृथ्वी) मोग पर :  कामा ससवि मोग भे फकमे गमे शुब कामा भे तनत्श् त सपरता प्राप्त होती हैं, एसा शास्िोक्त व न हैं।  द्वद्वऩुष्कय मोग भें फकमे गमे शुब कामो का राब दोगुना होता हैं। एसा शास्िोक्त व न हैं।  त्रिऩुष्कय मोग भें फकमे गमे शुब कामो का राब तीन गुना होता हैं। एसा शास्िोक्त व न हैं।  शास्िोंक्त भत से ववघ्नकायक बिा मोग भें शुब कामा कयना वत्जात हैं। दैतनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका गुसरक कार (शुब) मभ कार (अशुब) याहु कार (अशुब) वाय सभम अवधध सभम अवधध सभम अवधध यवववाय 03:00 से 04:30 12:00 से 01:30 04:30 से 06:00 सोभवाय 01:30 से 03:00 10:30 से 12:00 07:30 से 09:00 भॊगरवाय 12:00 से 01:30 09:00 से 10:30 03:00 से 04:30 फुधवाय 10:30 से 12:00 07:30 से 09:00 12:00 से 01:30 गुरुवाय 09:00 से 10:30 06:00 से 07:30 01:30 से 03:00 शुक्रवाय 07:30 से 09:00 03:00 से 04:30 10:30 से 12:00 शतनवाय 06:00 से 07:30 01:30 से 03:00 09:00 से 10:30
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    103 ससतम्फय -2019 ददन के ौघडडमे सभम यवववाय सोभवाय भॊगरवाय फुधवाय गुरुवाय शुक्रवाय शतनवाय 06:00 से 07:30 उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल काल 07:30 से 09:00 चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ 09:00 से 10:30 लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग 10:30 से 12:00 अमृि रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग 12:00 से 01:30 काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल 01:30 से 03:00 शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ 03:00 से 04:30 रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि 04:30 से 06:00 उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल काल यात के ौघडडमे सभम यवववाय सोभवाय भॊगरवाय फुधवाय गुरुवाय शुक्रवाय शतनवाय 06:00 से 07:30 शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ 07:30 से 09:00 अमृि रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग 09:00 से 10:30 चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ 10:30 से 12:00 रोग लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि 12:00 से 01:30 काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल 01:30 से 03:00 लाभ शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग 03:00 से 04:30 उद्वेग अमृि रोग लाभ शुभ चल काल 04:30 से 06:00 शुभ चल काल उद्वेग अमृि रोग लाभ शास्िोक्त भत के अनुसाय मदद फकसी बी कामा का प्रायॊब शुब भुहूता मा शुब सभम ऩय फकमा जामे तो कामा भें सपरता प्राप्त होने फक सॊबावना ज्मादा प्रफर हो जाती हैं। इस सरमे दैतनक शुब सभम ौघडडमा देखकय प्राप्त फकमा जा सकता हैं। नोट: प्राम् ददन औय यात्रि के ौघडडमे फक धगनती क्रभश् सूमोदम औय सूमाास्त से फक जाती हैं। प्रत्मेक ौघडडमे फक अवधध 1 घॊटा 30 सभतनट अथाात डेढ़ घॊटा होती हैं। सभम के अनुसाय ौघडडमे को शुबाशुब तीन बागों भें फाॊटा जाता हैं, जो क्रभश् शुब, भध्मभ औय अशुब हैं। ौघडडमे के स्वाभी ग्रह * हय कामा के सरमे शुब/अभृत/राब का ौघडडमा उत्तभ भाना जाता हैं। * हय कामा के सरमे र/कार/योग/उद्वेग का ौघडडमा उध त नहीॊ भाना जाता। शुब ौघडडमा भध्मभ ौघडडमा अशुब ौघडडमा ौघडडमा स्वाभी ग्रह ौघडडमा स्वाभी ग्रह ौघडडमा स्वाभी ग्रह शुब गुरु य शुक्र उद्बेग सूमा अभृत ॊिभा कार शतन राब फुध योग भॊगर
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    104 ससतम्फय -2019 ददन फक होया - सूमोदम से सूमाास्त तक वाय 1.घॊ 2.घॊ 3.घॊ 4.घॊ 5.घॊ 6.घॊ 7.घॊ 8.घॊ 9.घॊ 10.घॊ 11.घॊ 12.घॊ यवववाय सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन सोभवाय ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा भॊगरवाय भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि फुधवाय फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर गुरुवाय गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध शुक्रवाय शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु शतनवाय शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र यात फक होया – सूमाास्त से सूमोदम तक यवववाय गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध सोभवाय शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगरवाय शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुधवाय सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरुवाय ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्रवाय भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतनवाय फुध ॊि शतन गुरु भॊगर सूमा शुक्र फुध ॊि शतन गुरु भॊगर होया भुहूता को कामा ससवि के सरए ऩूणा परदामक एवॊ अ ूक भाना जाता हैं, ददन-यात के २४ घॊटों भें शुब-अशुब सभम को सभम से ऩूवा ऻात कय अऩने कामा ससवि के सरए प्रमोग कयना ादहमे। ववद्वानो के भत से इश्च्छ्छत कामथ ससवि के सरए ग्रह से संफंधधत होया का चुनाव कयने से ववशेष राब प्राप्त होता हैं।  सूमा फक होया सयकायी कामो के सरमे उत्तभ होती हैं।  ॊिभा फक होया सबी कामों के सरमे उत्तभ होती हैं।  भॊगर फक होया कोटा-क ेयी के कामों के सरमे उत्तभ होती हैं।  फुध फक होया ववद्या-फुवि अथाात ऩढाई के सरमे उत्तभ होती हैं।  गुरु फक होया धासभाक कामा एवॊ वववाह के सरमे उत्तभ होती हैं।  शुक्र फक होया मािा के सरमे उत्तभ होती हैं।  शतन फक होया धन-िव्म सॊफॊधधत कामा के सरमे उत्तभ होती हैं।
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    105 ससतम्फय -2019 सवा योगनाशक मॊि/कव भनुष्म अऩने जीवन के ववसबन्न सभम ऩय फकसी ना फकसी साध्म मा असाध्म योग से ग्रस्त होता हैं। उध त उऩ ाय से ज्मादातय साध्म योगो से तो भुत्क्त सभर जाती हैं, रेफकन कबी-कबी साध्म योग होकय बी असाध्म होजाते हैं, मा कोइ असाध्म योग से ग्रससत होजाते हैं। हजायो राखो रुऩमे ख ा कयने ऩय बी अधधक राब प्राप्त नहीॊ हो ऩाता। डॉक्टय द्वारा ददजाने वारी दवाईमा अल्ऩ सभम के सरमे कायगय सात्रफत होती हैं, एसी त्स्थती भें राब प्रात्प्त के सरमे व्मत्क्त एक डॉक्टय से दूसये डॉक्टय के क्कय रगाने को फाध्म हो जाता हैं। बायतीम ऋषीमोने अऩने मोग साधना के प्रताऩ से योग शाॊतत हेतु ववसबन्न आमुवेय औषधो के अततरयक्त मॊि, भॊि एवॊ तॊि का उल्रेख अऩने ग्रॊथो भें कय भानव जीवन को राब प्रदान कयने का साथाक प्रमास हजायो वषा ऩूवा फकमा था। फुविजीवो के भत से जो व्मत्क्त जीवनबय अऩनी ददन माा ऩय तनमभ, सॊमभ यख कय आहाय ग्रहण कयता हैं, एसे व्मत्क्त को ववसबन्न योग से ग्रससत होने की सॊबावना कभ होती हैं। रेफकन आज के फदरते मुग भें एसे व्मत्क्त बी बमॊकय योग से ग्रस्त होते ददख जाते हैं। क्मोफक सभग्र सॊसाय कार के अधीन हैं। एवॊ भृत्मु तनत्श् त हैं त्जसे ववधाता के अरावा औय कोई टार नहीॊ सकता, रेफकन योग होने फक त्स्थती भें व्मत्क्त योग दूय कयने का प्रमास तो अवश्म कय सकता हैं। इस सरमे मंत्र भंत्र एवं तंत्र के कु शर जानकाय से मोग्म भागादशान रेकय व्मत्क्त योगो से भुत्क्त ऩाने का मा उसके प्रबावो को कभ कयने का प्रमास बी अवश्म कय सकता हैं। ज्मोततष द्विद्या के कु शर जानकय बी कार ऩुरुषकी गणना कय अनेक योगो के अनेको यहस्म को उजागय कय सकते हैं। ज्मोततष शास्ि के भाध्मभ से योग के भूरको ऩकडने भे सहमोग सभरता हैं, जहा आधुतनक ध फकत्सा शास्ि अऺभ होजाता हैं वहा ज्मोततष शास्ि द्वाया योग के भूर(जड) को ऩकड कय उसका तनदान कयना राबदामक एवॊ उऩामोगी ससि होता हैं। हय व्मत्क्त भें रार यॊगकी कोसशकाए ऩाइ जाती हैं, त्जसका तनमभीत ववकास क्रभ फि तयीके से होता यहता हैं। जफ इन कोसशकाओ के क्रभ भें ऩरयवतान होता है मा ववखॊडडन होता हैं तफ व्मत्क्त के शयीय भें स्वास्थ्म सॊफॊधी ववकायो उत्ऩन्न होते हैं। एवॊ इन कोसशकाओ का सॊफॊध नव ग्रहो के साथ होता हैं। त्जस्से योगो के होने के कायण व्मत्क्त के जन्भाॊग से दशा-भहादशा एवॊ ग्रहो फक गो य त्स्थती से प्राप्त होता हैं। सवा योग तनवायण कव एवॊ भहाभृत्मुॊजम मॊि के भाध्मभ से व्मत्क्त के जन्भाॊग भें त्स्थत कभजोय एवॊ ऩीडडत ग्रहो के अशुब प्रबाव को कभ कयने का कामा सयरता ऩूवाक फकमा जासकता हैं। जेसे हय व्मत्क्त को ब्रहभाॊड फक उजाा एवॊ ऩृथ्वी का गुरुत्वाकषाण फर प्रबावीत कताा हैं दठक उसी प्रकाय कव एवॊ मॊि के भाध्मभ से ब्रहभाॊड फक उजाा के सकायात्भक प्रबाव से व्मत्क्त को सकायात्भक उजाा प्राप्त होती हैं त्जस्से योग के प्रबाव को कभ कय योग भुक्त कयने हेतु सहामता सभरती हैं। योग तनवायण हेतु भहाभृत्मुॊजम भॊि एवॊ मॊि का फडा भहत्व हैं। त्जस्से दहन्दू सॊस्कृ तत का प्राम् हय व्मत्क्त भहाभृत्मुॊजम भॊि से ऩरयध त हैं।
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    106 ससतम्फय -2019 कवच के राब :  एसा शास्िोक्त व न हैं त्जस घय भें भहाभृत्मुॊजम मॊि स्थावऩत होता हैं वहा तनवास कताा हो नाना प्रकाय फक आधध-व्माधध-उऩाधध से यऺा होती हैं।  ऩूणा प्राण प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त सवा योग तनवायण कव फकसी बी उम्र एवॊ जातत धभा के रोग ाहे स्िी हो मा ऩुरुष धायण कय सकते हैं।  जन्भाॊगभें अनेक प्रकायके खयाफ मोगो औय खयाफ ग्रहो फक प्रततकू रता से योग उतऩन्न होते हैं।  कु छ योग सॊक्रभण से होते हैं एवॊ कु छ योग खान-ऩान फक अतनमसभतता औय अशुितासे उत्ऩन्न होते हैं। कव एवॊ मॊि द्वाया एसे अनेक प्रकाय के खयाफ मोगो को नष्ट कय, स्वास्थ्म राब औय शायीरयक यऺण प्राप्त कयने हेतु सवा योगनाशक कव एवॊ मॊि सवा उऩमोगी होता हैं।  आज के बौततकता वादी आधुतनक मुगभे अनेक एसे योग होते हैं, त्जसका उऩ ाय ओऩयेशन औय दवासे बी कदठन हो जाता हैं। कु छ योग एसे होते हैं त्जसे फताने भें रोग दह फक ाते हैं शयभ अनुबव कयते हैं एसे योगो को योकने हेतु एवॊ उसके उऩ ाय हेतु सवा योगनाशक कव एवॊ मॊि राबादातम ससि होता हैं।  प्रत्मेक व्मत्क्त फक जेसे-जेसे आमु फढती हैं वैसे-वसै उसके शयीय फक ऊजाा कभ होती जाती हैं। त्जसके साथ अनेक प्रकाय के ववकाय ऩैदा होने रगते हैं एसी त्स्थती भें उऩ ाय हेतु सवायोगनाशक कव एवॊ मॊि परप्रद होता हैं।  त्जस घय भें वऩता-ऩुि, भाता-ऩुि, भाता-ऩुिी, मा दो बाई एक दह नऺिभे जन्भ रेते हैं, तफ उसकी भाता के सरमे अधधक कष्टदामक त्स्थती होती हैं। उऩ ाय हेतु भहाभृत्मुॊजम मॊि परप्रद होता हैं।  त्जस व्मत्क्त का जन्भ ऩरयधध मोगभे होता हैं उन्हे होने वारे भृत्मु तुल्म कष्ट एवॊ होने वारे योग, ध ॊता भें उऩ ाय हेतु सवा योगनाशक कव एवॊ मॊि शुब परप्रद होता हैं। नोट:- ऩूणा प्राण प्रततत्ष्ठत एवॊ ऩूणा ैतन्म मुक्त सवा योग तनवायण कव एवॊ मॊि के फाये भें अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें। >> Shop Online | Order Now Declaration Notice  We do not accept liability for any out of date or incorrect information.  We will not be liable for your any indirect consequential loss, loss of profit,  If you will cancel your order for any article we can not any amount will be refunded or Exchange.  We are keepers of secrets. We honour our clients' rights to privacy and will release no information about our any other clients' transactions with us.  Our ability lies in having learned to read the subtle spiritual energy, Yantra, mantra and promptings of the natural and spiritual world.  Our skill lies in communicating clearly and honestly with each client.  Our all kawach, yantra and any other article are prepared on the Principle of Positiv energy, our Article dose not produce any bad energy. Our Goal  Here Our goal has The classical Method-Legislation with Proved by specific with fiery chants prestigious full consciousness (Puarn Praan Pratisthit) Give miraculous powers & Good effect All types of Yantra, Kavach, Rudraksh, preciouse and semi preciouse Gems stone deliver on your door step.
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    107 ससतम्फय -2019 भंत्र ससि कवच मंत्र द्वसद्ध किच को द्विशेष प्रयोजन में उपयोग के द्वलए और शीघ्र प्रभाि शाली बनाने के द्वलए िेजस्िी मंत्रो द्वारा शुभ महूित में शुभ ददन को िैयार दकये जािे है । अलग-अलग किच िैयार करने केद्वलए अलग-अलग िरह के मंत्रो का प्रयोग दकया जािा है ।  क्यों चुने मंत्र द्वसद्ध किच?  उपयोग में आसान कोई प्रद्विबन्ध नहीॊ  कोई द्विशेष द्वनद्वि-द्वनयम नहीं  कोई बुरा प्रभाि नहीं भंत्र ससि कवच सूधच राज राजेश्वरी किच Raj Rajeshwari Kawach ………..……………………… 11000 द्विष्णु बीसा किच Vishnu Visha Kawach ………..………………………... 2350 अमोघ महामृतयुंजय किच Amogh Mahamrutyunjay Kawach ……………………. 10900 रामभद्र बीसा किच Ramabhadra Visha Kawach ………..………………… 2350 दस महाद्विद्या किच Dus Mahavidhya Kawach ………..……………………. 7300 कुबेर बीसा किच Kuber Visha Kawach ………..…………………………. 2350 श्री घंटाकणत महािीर सित द्वसद्वद्ध प्रद किच Shri Ghantakarn Mahavir Sarv Siddhi Prad Kawach.. 6400 गरुड बीसा किच Garud Visha Kawach ………..………………………… 2350 सकल द्वसद्वद्ध प्रद गायत्री किच Sakal Siddhi Prad Gayatri Kawach …………………... 6400 लक्ष्मी बीसा किच Lakshmi Visha Kawach ……..…………………………. 2350 निदुगात शद्वि किच Navdurga Shakiti Kawach ………..…………………… 6400 ससह बीसा किच Sinha Visha Kawach ………..…………………………. 2350 रसायन द्वसद्वद्ध किच Rasayan Siddhi Kawach ………..…………………….. 6400 निातण बीसा किच Narvan Visha Kawach ………..……………………….. 2350 पंचदेि शद्वि किच Pancha Dev Shakti Kawach ………..…………………. 6400 संकट मोद्वचनी काद्वलका द्वसद्वद्ध किच Sankat Mochinee Kalika Siddhi Kawach ………..…… 2350 सित कायत द्वसद्वद्ध किच Sarv Karya Siddhi Kawach ………..………………….. 5500 राम रक्षा किच Ram Raksha Kawach ………..………………………… 2350 सुिणत लक्ष्मी किच Suvarn Lakshmi Kawach ………..……………………. 4600 नारायण रक्षा किच Narayan Raksha Kavach .……………………………... 2350 स्िणातकषतण भैरि किच Swarnakarshan Bhairav Kawach ………..…………… 4600 हनुमान रक्षा किच Hanuman Raksha Kawach ………..………………….. 2350 कालसपत शांद्वि किच Kalsharp Shanti Kawach ………..…………………….. 3700 भैरि रक्षा किच Bhairav Raksha Kawach ………………………………. 2350 द्विलक्षण सकल राज िशीकरण किच Vilakshan Sakal Raj Vasikaran Kawach ………..…… 3250 शद्वन साड़ेसािी और ढ़ैया कष्ट द्वनिारण किच Shani Sadesatee aur Dhaiya Kasht Nivaran Kawach ….. 2350 इष्ट द्वसद्वद्ध किच Isht Siddhi Kawach ………..…………………………… 2800 श्राद्वपि योग द्वनिारण किच Sharapit Yog Nivaran Kawach ……..………………… 1900 परदेश गमन और लाभ प्राद्वि किच Pardesh Gaman Aur Labh Prapti Kawach ………...... 2350 द्विष योग द्वनिारण किच Vish Yog Nivaran Kawach ……..……………………. 1900 श्रीदुगात बीसा किच Durga Visha Kawach ………..…………………………. 2350 सितजन िशीकरण किच Sarvjan Vashikaran Kawach ……..…………………… 1450 कृ ष्ण बीसा किच Krushna Bisa Kawach ………..………………………... 2350 द्वसद्वद्ध द्विनायक किच Siddhi Vinayak Ganapati Kawach ……..…………….. 1450 अष्ट द्विनायक किच Asht Vinayak Kawach ………..………………………... 2350 सकल सम्मान प्राद्वि किच Sakal Samman Praapti Kawach ……..………………. 1450 आकषतण िृद्वद्ध किच Aakarshan Vruddhi Kawach ……..…………………… 1450 स्िप्न भय द्वनिारण किच Swapna Bhay Nivaran Kawach ……..……………….. 1050
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    108 ससतम्फय -2019 िशीकरण नाशक किच Vasikaran Nashak Kawach ……..…………………….. 1450 सरस्ििी किच (कक्षा +10 के द्वलए) Saraswati Kawach (For Class +10) ………………….. 1050 प्रीद्वि नाशक किच Preeti Nashak Kawach ……..…………………………. 1450 सरस्ििी किच (कक्षा 10 िकके द्वलए) Saraswati Kawach (For up to Class 10) …………….. 910 चंडाल योग द्वनिारण किच Chandal Yog Nivaran Kawach ……..………………… 1450 िशीकरण किच (2-3 व्यद्विके द्वलए) Vashikaran Kawach For (For 2-3 Person) ……………. 1250 ग्रहण योग द्वनिारण किच Grahan Yog Nivaran Kawach ……..………………….. 1450 पत्नी िशीकरण किच Patni Vasikaran Kawach ………………………………... 820 मांगद्वलक योग द्वनिारण किच (कुजा योग ) Magalik Yog Nivaran Kawach (Kuja Yoga) …………. 1450 पद्वि िशीकरण किच Pati Vasikaran Kawach …………………………………. 820 अष्ट लक्ष्मी किच Asht Lakshmi Kawach ……..………………………... 1250 िशीकरण किच ( 1 व्यद्वि के द्वलए) Vashikaran Kawach (For 1 Person) …………………… 820 आकद्वस्मक धन प्राद्वि किच Akashmik Dhan Prapti Kawach ……..……………….. 1250 सुदशतन बीसा किच Sudarshan Visha Kawach ……..…………………...…... 910 स्पे.व्यापार िृद्वद्ध किच Special Vyapar Vruddhi Kawach ……..……………… 1250 महा सुदशतन किच Mahasudarshan Kawach ……..……………...…………. 910 धन प्राद्वि किच Dhan Prapti Kawach ……..…………………………... 1250 िंत्र रक्षा किच Tantra Raksha Kawach …………………………………. 910 कायत द्वसद्वद्ध किच Karya Siddhi Kawach ……..…………………………… 1250 िशीकरण किच (2-3 व्यद्विके द्वलए) Vashikaran Kawach For (For 2-3 Person) ……………. 1250 भूद्वमलाभ किच Bhumilabh Kawach ……..……………………………. 1250 पत्नी िशीकरण किच Patni Vasikaran Kawach ………………………………... 820 निग्रह शांद्वि किच Navgrah Shanti Kawach ……..……………………….. 1250 पद्वि िशीकरण किच Pati Vasikaran Kawach …………………………………. 820 संिान प्राद्वि किच Santan Prapti Kawach ……..………………………….. 1250 िशीकरण किच ( 1 व्यद्वि के द्वलए) Vashikaran Kawach (For 1 Person) …………………… 820 कामदेि किच Kamdev Kawach ……..………………………………. 1250 सुदशतन बीसा किच Sudarshan Visha Kawach ……..…………………...…... 910 हंस बीसा किच Hans Visha Kawach ……..…………………………….. 1250 महा सुदशतन किच Mahasudarshan Kawach ……..……………...…………. 910 पदौन्नद्वि किच Padounnati Kawach ……..…………………………. 1250 िंत्र रक्षा किच Tantra Raksha Kawach …………………………………. 910 ऋण / कजत मुद्वि किच Rin / Karaj Mukti Kawach ……..……………………… 1250 द्वत्रशूल बीसा किच Trishool Visha Kawach ……..…………………………... 910 शत्रु द्विजय किच Shatru Vijay Kawach ………………………………….. 1050 व्यापर िृद्वद्ध किच Vyapar Vruddhi Kawach ………………………………... 910 द्वििाह बाधा द्वनिारण किच Vivah Badha Nivaran Kawach ………………………... 1050 सित रोग द्वनिारण किच Sarv Rog Nivaran Kawach ……………………………... 910 स्िद्वस्िक बीसा किच Swastik Visha Kawach ……..…………………………. 1050 शारीररक शद्वि िधतक किच Sharirik Shakti Vardhak Kawach ..……………………... 910 मद्वस्िष्क पृद्वष्ट िधतक किच Mastishk Prushti Vardhak Kawach …………………… 820 द्वसद्ध शुक्र किच Siddha Shukra Kawach …………………………………. 820
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    109 ससतम्फय -2019 िाणी पृद्वष्ट िधतक किच Vani Prushti Vardhak Kawach ………………………… 820 द्वसद्ध शद्वन किच Siddha Shani Kawach …………………………………... 820 कामना पूर्ति किच Kamana Poorti Kawach ………………………………. 820 द्वसद्ध राहु किच Siddha Rahu Kawach …………………………………… 820 द्विरोध नाशक किच Virodh Nashan Kawach ………………………………. 820 द्वसद्ध केिु किच Siddha Ketu Kawach ……………………………………. 820 द्वसद्ध सूयत किच Siddha Surya Kawach …………………………………. 820 रोजगार िृद्वद्ध किच Rojgar Vruddhi Kawach ………………………………… 730 द्वसद्ध चंद्र किच Siddha Chandra Kawach ……………………………… 820 द्विघ्न बाधा द्वनिारण किच Vighna Badha Nivaran Kawah …………………………. 730 द्वसद्ध मंगल किच (कु जा) Siddha Mangal Kawach (Kuja) ……………………… 820 नज़र रक्षा किच Najar Raksha Kawah ……………………………………. 730 द्वसद्ध बुध किच Siddha Bhudh Kawach ………………………………… 820 रोजगार प्राद्वि किच Rojagar Prapti Kawach …………………………………. 730 द्वसद्ध गुरु किच Siddha Guru Kawach ………………………………..… 820 दुभातग्य नाशक किच Durbhagya Nashak ……………………………………… 640 उऩयोक्त कव के अरावा अन्म सभस्मा ववशेष के सभाधान हेतु एवॊ उद्देश्म ऩूतता हेतु कव का तनभााण फकमा जाता हैं। कव के ववषम भें अधधक जानकायी हेतु सॊऩका कयें। *कव भाि शुब कामा मा उद्देश्म के सरमे >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY Call Us - 9338213418, 9238328785, Our Website:- www.gurutvakaryalay.com and www.gurutvajyotish.com Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    110 ससतम्फय -2019 Gemstone Price List NAME OF GEM STONE GENERAL MEDIUM FINE FINE SUPER FINE SPECIAL Emerald (ऩन्ना) 200.00 500.00 1200.00 1900.00 2800.00 & above Yellow Sapphire (ऩुखयाज) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Yellow Sapphire Bangkok (फैंकोक ऩुखयाज) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Blue Sapphire (नीरभ) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above White Sapphire (सफ़े द ऩुखयाज) 1000.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Bangkok Black Blue(फैंकोक नीरभ) 100.00 150.00 190.00 550.00 1000.00 & above Ruby (भाणणक) 100.00 190.00 370.00 730.00 1900.00 & above Ruby Berma (फभाा भाणणक) 5500.00 6400.00 8200.00 10000.00 21000.00 & above Speenal (नयभ भाणणक/रारडी) 300.00 600.00 1200.00 2100.00 3200.00 & above Pearl (भोतत) 30.00 60.00 90.00 120.00 280.00 & above Red Coral (4 यतत तक) (रार भूॊगा) 125.00 190.00 280.00 370.00 460.00 & above Red Coral (4 यतत से उऩय)(रार भूॊगा) 190.00 280.00 370.00 460.00 550.00 & above White Coral (सफ़े द भूॊगा) 73.00 100.00 190.00 280.00 460.00 & above Cat’s Eye (रहसुतनमा) 25.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Cat’s Eye ODISHA(उडडसा रहसुतनमा) 280.00 460.00 730.00 1000.00 1900.00 & above Gomed (गोभेद) 19.00 28.00 45.00 100.00 190.00 & above Gomed CLN (ससरोनी गोभेद) 190.00 280.00 460.00 730.00 1000.00 & above Zarakan (जयकन) 550.00 730.00 820.00 1050.00 1250.00 & above Aquamarine (फेरुज) 210.00 320.00 410.00 550.00 730.00 & above Lolite (नीरी) 50.00 120.00 230.00 390.00 500.00 & above Turquoise (फफ़योजा) 100.00 145.00 190.00 280.00 460.00 & above Golden Topaz (सुनहरा) 28.00 46.00 90.00 120.00 190.00 & above Real Topaz (उडडसा ऩुखयाज/टोऩज) 100.00 190.00 280.00 460.00 640.00 & above Blue Topaz (नीरा टोऩज) 100.00 190.00 280.00 460.00 640.00 & above White Topaz (सफ़े द टोऩज) 60.00 90.00 120.00 240.00 410.00& above Amethyst (कटेरा) 28.00 46.00 90.00 120.00 190.00 & above Opal (उऩर) 28.00 46.00 90.00 190.00 460.00 & above Garnet (गायनेट) 28.00 46.00 90.00 120.00 190.00 & above Tourmaline (तुभारीन) 120.00 140.00 190.00 300.00 730.00 & above Star Ruby (सुमाकान्त भणण) 45.00 75.00 90.00 120.00 190.00 & above Black Star (कारा स्टाय) 15.00 30.00 45.00 60.00 100.00 & above Green Onyx (ओनेक्स) 10.00 19.00 28.00 55.00 100.00 & above Lapis (राजवात) 15.00 28.00 45.00 100.00 190.00 & above Moon Stone ( न्िकान्त भणण) 12.00 19.00 28.00 55.00 190.00 & above Rock Crystal (स्फ़दटक) 19.00 46.00 15.00 30.00 45.00 & above Kidney Stone (दाना फफ़यॊगी) 09.00 11.00 15.00 19.00 21.00 & above Tiger Eye (टाइगय स्टोन) 03.00 05.00 10.00 15.00 21.00 & above Jade (भयग ) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above Sun Stone (सन ससताया) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call Us - 09338213418, 09238328785 Email Us:- chintan_n_joshi@yahoo.co.in, gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    111 ससतम्फय -2019 GURUTVA KARYALAY YANTRA LIST EFFECTS Our Splecial Yantra 1 12 – YANTRA SET For all Family Troubles 2 VYAPAR VRUDDHI YANTRA For Business Development 3 BHOOMI LABHA YANTRA For Farming Benefits 4 TANTRA RAKSHA YANTRA For Protection Evil Sprite 5 AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA For Unexpected Wealth Benefits 6 PADOUNNATI YANTRA For Getting Promotion 7 RATNE SHWARI YANTRA For Benefits of Gems & Jewellery 8 BHUMI PRAPTI YANTRA For Land Obtained 9 GRUH PRAPTI YANTRA For Ready Made House 10 KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA - Shastrokt Yantra 11 AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA Blessing of Durga 12 BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL) Win over Enemies 13 BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL) Blessing of Bagala Mukhi 14 BHAGYA VARDHAK YANTRA For Good Luck 15 BHAY NASHAK YANTRA For Fear Ending 16 CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta) Blessing of Chamunda & Navgraha 17 CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA Blessing of Chhinnamasta 18 DARIDRA VINASHAK YANTRA For Poverty Ending 19 DHANDA POOJAN YANTRA For Good Wealth 20 DHANDA YAKSHANI YANTRA For Good Wealth 21 GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra) Blessing of Lord Ganesh 22 GARBHA STAMBHAN YANTRA For Pregnancy Protection 23 GAYATRI BISHA YANTRA Blessing of Gayatri 24 HANUMAN YANTRA Blessing of Lord Hanuman 25 JWAR NIVARAN YANTRA For Fewer Ending 26 JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA YANTRA For Astrology & Spritual Knowlage 27 KALI YANTRA Blessing of Kali 28 KALPVRUKSHA YANTRA For Fullfill your all Ambition 29 KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA) Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga 30 KANAK DHARA YANTRA Blessing of Maha Lakshami 31 KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA - 32 KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in work 33  SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in all work 34 KRISHNA BISHA YANTRA Blessing of Lord Krishna 35 KUBER YANTRA Blessing of Kuber (Good wealth) 36 LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA For Obstaele Of marriage 37 LAKSHAMI GANESH YANTRA Blessing of Lakshami & Ganesh 38 MAHA MRUTYUNJAY YANTRA For Good Health 39 MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA Blessing of Shiva 40 MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA) For Fullfill your all Ambition 41 MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA For Marriage with choice able Girl 42 NAVDURGA YANTRA Blessing of Durga
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    112 ससतम्फय -2019 YANTRA LIST EFFECTS 43 NAVGRAHA SHANTI YANTRA For good effect of 9 Planets 44 NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA For good effect of 9 Planets 45  SURYA YANTRA Good effect of Sun 46  CHANDRA YANTRA Good effect of Moon 47  MANGAL YANTRA Good effect of Mars 48  BUDHA YANTRA Good effect of Mercury 49  GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA) Good effect of Jyupiter 50  SUKRA YANTRA Good effect of Venus 51  SHANI YANTRA (COPER & STEEL) Good effect of Saturn 52  RAHU YANTRA Good effect of Rahu 53  KETU YANTRA Good effect of Ketu 54 PITRU DOSH NIVARAN YANTRA For Ancestor Fault Ending 55 PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA For Pregnancy Pain Ending 56 RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA For Benefits of State & Central Gov 57 RAM YANTRA Blessing of Ram 58 RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA Blessing of Riddhi-Siddhi 59 ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA For Disease- Pain- Poverty Ending 60 SANKAT MOCHAN YANTRA For Trouble Ending 61 SANTAN GOPAL YANTRA Blessing Lorg Krishana For child acquisition 62 SANTAN PRAPTI YANTRA For child acquisition 63 SARASWATI YANTRA Blessing of Sawaswati (For Study & Education) 64 SHIV YANTRA Blessing of Shiv 65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA) Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & Peace 66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth 67 SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA For Bad Dreams Ending 68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA For Vehicle Accident Ending 69 VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE MAHALAKSHAMI YANTRA) Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All Successes 70 VASTU YANTRA For Bulding Defect Ending 71 VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA For Education- Fame- state Award Winning 72 VISHNU BISHA YANTRA Blessing of Lord Vishnu (Narayan) 73 VASI KARAN YANTRA Attraction For office Purpose 74  MOHINI VASI KARAN YANTRA Attraction For Female 75  PATI VASI KARAN YANTRA Attraction For Husband 76  PATNI VASI KARAN YANTRA Attraction For Wife 77  VIVAH VASHI KARAN YANTRA Attraction For Marriage Purpose Yantra Available @:- Rs- 325 to 12700 and Above….. >> Shop Online | Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call Us - 09338213418, 09238328785 Email Us:- chintan_n_joshi@yahoo.co.in, gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    113 ससतम्फय -2019 सू ना  ऩत्रिका भें प्रकासशत सबी रेख ऩत्रिका के अधधकायों के साथ ही आयक्षऺत हैं।  रेख प्रकासशत होना का भतरफ मह कतई नहीॊ फक कामाारम मा सॊऩादक बी इन वव ायो से सहभत हों।  नात्स्तक/ अववश्वासु व्मत्क्त भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हैं।  ऩत्रिका भें प्रकासशत फकसी बी नाभ, स्थान मा घटना का उल्रेख महाॊ फकसी बी व्मत्क्त ववशेष मा फकसी बी स्थान मा घटना से कोई सॊफॊध नहीॊ हैं।  प्रकासशत रेख ज्मोततष, अॊक ज्मोततष, वास्तु, भॊि, मॊि, तॊि, आध्मात्त्भक ऻान ऩय आधारयत होने के कायण मदद फकसी के रेख, फकसी बी नाभ, स्थान मा घटना का फकसी के वास्तववक जीवन से भेर होता हैं तो मह भाि एक सॊमोग हैं।  प्रकासशत सबी रेख बायततम आध्मात्त्भक शास्िों से प्रेरयत होकय सरमे जाते हैं। इस कायण इन ववषमो फक सत्मता अथवा प्राभाणणकता ऩय फकसी बी प्रकाय फक त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हैं।  अन्म रेखको द्वाया प्रदान फकमे गमे रेख/प्रमोग फक प्राभाणणकता एवॊ प्रबाव फक त्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हैं। औय नाहीॊ रेखक के ऩते दठकाने के फाये भें जानकायी देने हेतु कामाारम मा सॊऩादक फकसी बी प्रकाय से फाध्म हैं।  ज्मोततष, अॊक ज्मोततष, वास्तु, भॊि, मॊि, तॊि, आध्मात्त्भक ऻान ऩय आधारयत रेखो भें ऩाठक का अऩना ववश्वास होना आवश्मक हैं। फकसी बी व्मत्क्त ववशेष को फकसी बी प्रकाय से इन ववषमो भें ववश्वास कयने ना कयने का अॊततभ तनणाम स्वमॊ का होगा।  ऩाठक द्वारा फकसी बी प्रकाय फक आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।  हभाये द्वारा ऩोस्ट फकमे गमे सबी रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ अनुशॊधान के आधाय ऩय सरखे होते हैं। हभ फकसी बी व्मत्क्त ववशेष द्वारा प्रमोग फकमे जाने वारे भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोकी त्जन्भेदायी नदहॊ रेते हैं।  मह त्जन्भेदायी भॊि-मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोको कयने वारे व्मत्क्त फक स्वमॊ फक होगी। क्मोफक इन ववषमो भें नैततक भानदॊडों, साभात्जक, कानूनी तनमभों के णखराप कोई व्मत्क्त मदद नीजी स्वाथा ऩूतता हेतु प्रमोग कताा हैं अथवा प्रमोग के कयने भे िुदट होने ऩय प्रततकू र ऩरयणाभ सॊबव हैं।  हभाये द्वारा ऩोस्ट फकमे गमे सबी भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय स्वमॊ ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधुगण ऩय प्रमोग फकमे हैं त्जस्से हभे हय प्रमोग मा भॊि-मॊि मा उऩामो द्वारा तनत्श् त सपरता प्राप्त हुई हैं।  ऩाठकों फक भाॊग ऩय एक दह रेखका ऩून् प्रकाशन कयने का अधधकाय यखता हैं। ऩाठकों को एक रेख के ऩून् प्रकाशन से राब प्राप्त हो सकता हैं।  अधधक जानकायी हेतु आऩ कामाारम भें सॊऩका कय सकते हैं। (सबी वववादो के सरमे के वर बुवनेववय न्मामारम ही भान्म होगा।)
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    114 ससतम्फय -2019 FREE E CIRCULAR गुरुत्व ज्मोततष भाससक ई-ऩत्रिका ससतम्फय 2019 सॊऩादक ध ॊतन जोशी सॊऩका गुरुत्व ज्मोततष ववबाग गुरुत्व कामाारम 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) INDIA पोन 91+9338213418, 91+9238328785 ईभेर gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, वेफ www.gurutvakaryalay.com www.gurutvajyotish.com www.shrigems.com http://gk.yolasite.com/ www.gurutvakaryalay.blogspot.com
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    115 ससतम्फय -2019 हभाया उद्देश्म वप्रम आत्त्भम फॊधु/ फदहन जम गुरुदेव जहाॉ आधुतनक ववऻान सभाप्त हो जाता हैं। वहाॊ आध्मात्त्भक ऻान प्रायॊब हो जाता हैं, बौततकता का आवयण ओढे व्मत्क्त जीवन भें हताशा औय तनयाशा भें फॊध जाता हैं, औय उसे अऩने जीवन भें गततशीर होने के सरए भागा प्राप्त नहीॊ हो ऩाता क्मोफक बावनाए दह बवसागय हैं, त्जसभे भनुष्म की सपरता औय असपरता तनदहत हैं। उसे ऩाने औय सभजने का साथाक प्रमास ही श्रेष्ठकय सपरता हैं। सपरता को प्राप्त कयना आऩ का बाग्म ही नहीॊ अधधकाय हैं। ईसी सरमे हभायी शुब काभना सदैव आऩ के साथ हैं। आऩ अऩने कामा-उद्देश्म एवॊ अनुकू रता हेतु मॊि, ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न औय दुराब भॊि शत्क्त से ऩूणा प्राण- प्रततत्ष्ठत ध ज वस्तु का हभेंशा प्रमोग कये जो १००% परदामक हो। ईसी सरमे हभाया उद्देश्म महीॊ हे की शास्िोक्त ववधध-ववधान से ववसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्वाया ससि प्राण-प्रततत्ष्ठत ऩूणा ैतन्म मुक्त सबी प्रकाय के मन्ि- कव एवॊ शुब परदामी ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न आऩके घय तक ऩहो ाने का हैं। सूमा की फकयणे उस घय भें प्रवेश कयाऩाती हैं। जीस घय के णखडकी दयवाजे खुरे हों। GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ODISHA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    116 ससतम्फय -2019 GURUTVA JYOTISH Monthly SEP -2019