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गुरुत्व कार्ाालर् द्वारा प्रस्तुत मासिक ई-पत्रिका                        मई- 2012




                            NON PROFIT PUBLICATION .
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                          गुरुत्व ज्र्ोसतष पत्रिका मई 2012
िंपादक                सिंतन जोशी
                      गुरुत्व ज्र्ोसतष त्रवभाग

िंपका                 गुरुत्व कार्ाालर्
                      92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA,
                      BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA
फोन                   91+9338213418, 91+9238328785,
                      gurutva.karyalay@gmail.com,
ईमेल                  gurutva_karyalay@yahoo.in,

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वेब                   http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/

पत्रिका प्रस्तुसत     सिंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
फोटो ग्राफफक्ि        सिंतन जोशी, स्वस्स्तक आटा
हमारे मुख्र् िहर्ोगी स्वस्स्तक.ऎन.जोशी (स्वस्स्तक िोफ्टे क इस्डिर्ा सल)




            ई- जडम पत्रिका                       E HOROSCOPE
      अत्र्ाधुसनक ज्र्ोसतष पद्धसत द्वारा            Create By Advanced
         उत्कृ ष्ट भत्रवष्र्वाणी क िाथ
                                  े                      Astrology
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              १००+ पेज मं प्रस्तुत                      100+ Pages
                          फहं दी/ English मं मूल्र् माि 750/-

                               GURUTVA KARYALAY
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अनुक्रम
                                                    गार्िी उपािना त्रवशेष
गार्िी िमस्त त्रवद्याओं की जननी हं                     6           नवग्रह की शांसत क सलर्े गार्िी मंि
                                                                                    े                                18

गार्िी मंि का पररिर्                                   7           दे वी गार्िी का िरल पूजन                          21

गार्िी मंि क िंदभा मं महापुरुषं क विन
            े                    े                     8           गार्िी स्तोि व माहात््र्                          25

गार्िी मडि क त्रवलक्षण प्रर्ोग
            े                                          12          रोग सनवारण क सलर्े पत्रवि जल
                                                                               े                                     34

त्रवसभडन गार्िी मडि                                    15          त्रवश्वासमि िंफहतोक्त गार्िी कवि                  37

                                                    मंि एवं स्तोि त्रवशेष
अघनाशकगार्िीस्तोि                                          29      श्री गार्िी कवि                                       33

गार्िी स्तोि                                               30      गार्िी कविम ्                                         39

गार्िीस्तोिम ्                                             30      गार्िी िुप्रभातम ्                                    40

गार्िी िालीिा                                              31      गार्िीरहस्र्ोपसनषत ्                                  41

श्री गार्िी शाप त्रवमोिनम ्                                32      गार्िी मडिाथाः िाथा                                   43

श्री गार्िी जी की आरती                                     32      श्री गार्िी फदव्र् िहस्रनाम स्तोिम ्                  44


                                                           हमारे उत्पाद
दस्क्षणावसता शंख            7 श्री हनुमान र्ंि              49 नवरत्न जफित श्री र्ंि          53 पढा़ई िंबंसधत िमस्र्ा    67

भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी      20 मंि सिद्ध दै वी र्ंि िूसि     50 जैन धमाक त्रवसशष्ट र्ंि
                                                                       े                      54 िवा रोगनाशक र्ंि/        72

िवाकार्ा सित्रद्ध कवि      28 मंिसिद्ध लक्ष्मी र्ंििूसि     50 अमोद्य महामृत्र्ुजर् कवि
                                                                                ं             56 मंि सिद्ध कवि            74

मंिसिद्ध स्फफटक श्रीर्ंि   36 रासश रत्न                     51 मंगल र्ंि िे ऋणमुत्रि          65 YANTRA                   75

द्वादश महा र्ंि            38 मंि सिद्ध रूद्राक्ष           52 कबेर र्ंि
                                                                ु                             65 GEMS STONE               77

मंि सिद्ध मारुसत र्ंि      49 मंि सिद्ध दलभ िामग्री
                                         ु ा                52 शादी िंबंसधत िमस्र्ा           67 Book Consultation        78

घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि                         55 मंि सिद्ध िामग्री-         65, 66, 67
                                                    स्थार्ी और अडर् लेख
िंपादकीर्                                                       4 दै सनक शुभ एवं अशुभ िमर् ज्ञान तासलका                   68

मई मासिक रासश फल                                            57 फदन-रात क िौघफिर्े
                                                                        े                                                 69

मई 2012 मासिक पंिांग                                        61 फदन-रात फक होरा - िूर्ोदर् िे िूर्ाास्त तक                 70

मई 2012 मासिक व्रत-पवा-त्र्ौहार                             63 ग्रह िलन मई-2012                                           71

मई 2012 -त्रवशेष र्ोग                                       68 हमारा उद्दे श्र्                                           81
GURUTVA KARYALAY



                                                    िंपादकीर्
त्रप्रर् आस्त्मर्

           बंध/ बफहन
              ु

                       जर् गुरुदे व
                                          ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं
                                              ा ु                 ा
                                  भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ्॥
भावाथा: उि प्राणस्वरूप, दःखनाशक, िुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, दे वस्वरूप परमात्मा को हम अडतःकरण मं
                         ु
धारण करं । वह परमात्मा हमारी बुत्रद्ध को िडमागा मं प्रेररत करे ।

        फहडद ू धमाग्रंथं मं उल्लेख हं की दे वी गार्िी िभी प्रकार क ज्ञान और त्रवज्ञान की जननी है । इिसलए तो स्जन
                                                                  े
वेदं को िमस्त त्रवद्याओं का खजाना माना जाता हं ,      िारं वेदं को दे वी गार्िी क पुि माने जाते हं । र्फह कारण हं ,
                                                                                 े
क दे वी गार्िी को वेदं की माता अथाात "वेदमाता" कहा गर्ा हं ।
 े
दे वी गार्िी क मडि क िार पद िे क्रमशः
              े     े
ॐ भूभवः स्वः िे ऋग्वेद की रिना हुई। तत्ित्रवतुवरेण्र्ं िे र्जुवेद की रिना हुई। भगोदे वस्र् धीमफह िे िामवेद की
     ा                                         ा              ा
रिना हुई। और सधर्ो र्ोनः प्रिोदर्ात ् िे अथवावेद की रिना हुई हं ऐिा धमाग्रंथं मं उल्लेस्खत हं ।
        पौरास्णक काल मं ही हमारे ज्ञानी ऋषी मुसनर्ं को ज्ञात हो गर्ा था की गार्िी दे वी िमस्त त्रवद्याओं की
जननी हं । ऐिा माना जाता हं की िार वेदं िे ही िमस्त शास्त्र, दशान, ब्राह्मण ग्रडथ, आरण्र्क, िूि, उपसनषद्, पुराण,
स्मृसत आफद का सनमााण हुआ हं ।
        पौरास्णक माडर्ता हं की कालांतर मं इडहीं ग्रडथं मं वस्णात ज्ञान िे िमस्त सशल्प, वास्णज्र्, सशक्षा, रिार्न,
वास्तु, िंगीत आफद ८४ कलाओं का आत्रवष्कार हुआ हं । र्फह कारण हं की दे वी गार्िी को िंिार क िमस्त ज्ञान-
                                                                                         े
त्रवज्ञान की जननी कहाँ जाता हं । स्जि प्रकार फकिी बीज क भीतर िंपूणा वृक्ष िस्डनफहत होता है , उिी प्रकार गार्िी
                                                       े
क 24 अक्षरं मं िंिार क िमस्त ज्ञान और त्रवज्ञान िस्डनफहत हं । र्ह िब गार्िी का ही अथा त्रवस्तार हं ।
 े                    े


वेदमाता गार्िी क जडम िे िंबंसधत त्रवसभडन माडर्ताएं प्रिसलत हं ।
                े
        कछ जानकारो का मानना हं की वेदमाता गार्िी का जडम श्रावणी पूस्णामा को हुवा था इि सलर्े इि फदन को
         ु
गार्िी जर्ंसत क रुप मं भी मनार्ा जाता हं ।
               े
        कछ अडर् पोराणीक माडर्ताओं एवं धमा ग्रंथो मं उल्लेख हं की फहडदी पंिांग क ज्र्ैष्ठ महीने क शुक्ल पक्ष की
         ु                                                                     े                े
एकादशी को मां गार्िी का प्राकटर् हुवा हं । कछ िमर् क पश्चर्ात इिी फदन ऋत्रष त्रवश्रासमि ने गार्िी मंि की रिना
                                            ु       े
की थी। ऐिी माडर्ता है फक इिी फदन वेदमाता गार्िी िाक्षात मं धरती पर अपने रूप मं प्रकट हुईं थीं। ज्ञान तथा
वेदं का ज्ञान दे वी गार्िी िे ही प्रकट हुआ है ।
        अडर् पौरास्णक माडर्ता क अनुिार कासताक शुक्ल पक्ष क षष्ठी क िूर्ाास्त और िप्तमी क िूर्ोदर् क मध्र्
                               े                          े       े                     े          े
वेदमाता गार्िी का जडम हुआ था। भले ही मां गार्िी क जडम फदन को लेकर त्रवसभडन लोक माडर्ता एवं शास्त्रं की
                                                 े
सभडनता िे अलग-अलग मत हो। लेफकन िभी ऋत्रषर्ं ने एक मत िे गार्िी मंि की मफहमा को स्वीकार फकर्ा हं ।
अथवावेद मं उल्लेख हं की गार्िी मंि क जप िे मनुष्र् की आर्ु, प्राण, शत्रि, कीसता, धन और ब्रह्मतेज मं वृत्रद्ध होती हं ।
                                    े


       गार्िी मंि क िंदभा मं त्रवसभडन महापुरुषो क कथन िे समलते-जुलते असभमत हं महापुरुषो क कथन िे
                   े                             े                                       े
आपको पररसित कराने हे तु इि अंक मं उिक अंश को त्रवसभडन स्रोत क माध्र्म िे िंलग्न करने का प्रर्ाि फकर्ा
                                     े                       े
गर्ा हं स्जििे र्ह स्पष्ट है फक कोई ऋत्रष र्ा त्रवद्वान अडर् त्रवषर्ं मं िाहे अपना मतभेद रखते हं, पर गार्िी क बारे
                                                                                                             े
मं उन िब मं िमान श्रद्धा थी और वे िभी अपनी उपािना मं उिका प्रथम स्थान रखते थे ! कछ त्रवद्वानो का कथन
                                                                                 ु
हं की शास्त्रं मं, ग्रंथं मं, स्मृसतर्ं मं, पुराणं मं गार्िी की मफहमा तथा िाधना पर प्रकाश िालने वाले िहस्रं श्लोक
भरे पिे हं । इन िबका िंग्रह फकर्ा जाए, तो एक बिा भारी गार्िी पुराण बन िकता हं ।
       िामाडर्तः गार्िी मडि की मफहमा एवं प्रभाव िे प्रार्ः हर फहडद ु धमा को मानने वाले लोग पररसित हं । गार्िी
मंि को "गुरु मंि" क रुप मे जाना जाता है । क्र्ोफक फहडद ु धमा मं गार्िी मडि िभी मंिं मं िवोच्ि है और िबिे
                   े
प्रबल शत्रिशाली मंि हं ।

       इि अंक मं अत्र्ंत िरल और असधक प्रभावी दै सनक गार्िी उपािना जो हर िाधारण िे िाधारण व्र्त्रि जो
अथाात जो व्र्त्रि फकिी भी प्रकार क कमा-कांि र्ा पूजा पाठ को नहीं जानता हं र्ा जानते हो ओर उिे करने मं
                                  े
अिमथा हो, ऐिे व्र्त्रि भी िरल गार्िी उपािना आिानी िे कर िक इि उद्दे श्र् िे इि अंक मं िलग्न करने का
                                                          े
प्रर्ाि फकर्ा गर्ा हं । क्र्ोफक गार्िी उपािना जीवन क हर स्स्थसत मं भि क सलए सनस्श्चत रूप िे फार्दे मंद होती हं ।
                                                    े                  े
वैिे तो मां गार्िी की पूजा हे तु अनेको त्रवसध-त्रवधान प्रिलन मं हं लेफकन िाधारण व्र्त्रि जो िंपूणा त्रवसध-त्रवधान िे
गार्िी का पूजन नहीं कर िकते वह व्र्त्रि र्फद गार्िी जी क पूजन का िरल त्रवसध-त्रवधान ज्ञात करले तो वहँ
                                                        े
सनस्श्चत रुप िे पूणा फल प्राप्त कर िकते हं । इिी उद्दे श्र् िे इि अंक मं पाठको क ज्ञान वृत्रद्ध क उद्दे श्र् िे मां गार्िी
                                                                                े                े
क पूजन की असत िरल शीघ्र फलप्रद त्रवसध, मंि, स्तोि इत्र्ाफद िे आपको पररसित कराने का प्रर्ाि फकर्ा हं । जो लोग
 े
िरल त्रवसध िे मंि जप पूजन इत्र्ाफद करने मं भी अिमथा हं वहँ लोग श्री गार्िी जी क मंि-स्तोि इत्र्ाफद का श्रवण
                                                                               े
कर क भी पूणा श्रद्धा एवं त्रवश्वाि रख कर सनस्श्चत ही लाभ प्राप्त कर िकते हं , र्हँ अनुभूत उपार् हं जो सनस्श्चत फल
    े
प्रदान करने मं िमथा हं इि मं जरा भी िंिर् नहीं हं । इि अंक मं आप अपने कार्ा उद्दे श्र् की पूसता हे तु िरल िे
िरल उपार्ं को कर पूणा िफलता प्राप्त कर िक इि उद्दे श्र् िे गार्िी मडि क त्रवलक्षण प्रर्ोग को इि अंक मं
                                         े                             े
िलग्न करने का प्रर्ाि फकर्ा गर्ा हं । स्जिे िंपडन करक आप वेदमाता गार्िी की कृ पा प्राप्त कर अपने मनोरथं को
                                                     े
सनस्श्चत रुप िे पूणा कर िकते हं ।
   आप िभी क मागादशान र्ा ज्ञानवधान क सलए गार्िी उपािना िे िंबंसधत उपर्ोगी जानकारी भी इि अंक मं
           े                        े
िंकसलत की गई हं । िाधक एवं त्रवद्वान पाठको िे अनुरोध हं , र्फद दशाार्े गए मंि, स्तोि इत्र्ादी क िंकलन, प्रमाण
                                                                                               े
पढ़ने, िंपादन मं, फिजाईन मं, टाईपींग मं, त्रप्रंफटं ग मं, प्रकाशन मं कोई िुफट रह गई हो, तो उिे स्वर्ं िुधार लं र्ा फकिी
र्ोग्र् गुरु र्ा त्रवद्वान िे िलाह त्रवमशा कर ले । क्र्ोफक त्रवद्वान गुरुजनो एवं िाधको क सनजी अनुभव त्रवसभडन अनुष्ठा
                                                                                        े
मं भेद होने पर पूजन त्रवसध एवं जप त्रवसध मं सभडनता िंभव हं ।




                                                                                                      सिंतन जोशी
6                                         मई 2012




                                गार्िी िमस्त त्रवद्याओं की जननी हं
                                                                                                        सिंतन जोशी
           ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं
               ा ु                 ा                           उिी प्रकार गार्िी क 24 अक्षरं मं िंिार क िमस्त
                                                                                  े                    े

  भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ्॥                ज्ञान और त्रवज्ञान िस्डनफहत हं । र्ह िब गार्िी का ही
                                                               अथा त्रवस्तार हं ।
       फहडद ू धमाग्रंथं मं उल्लेख हं की दे वी गार्िी िभी       मंि की परीभाषा:
प्रकार क ज्ञान और त्रवज्ञान की जननी है । इिसलए तो
        े                                                      मंि उि ध्वसन को कहते है जो अक्षर(शब्द) एवं अक्षरं
स्जन वेदं को िमस्त त्रवद्याओं का खजाना माना जाता हं ,          (शब्दं) क िमूह िे बनता है । िंपूणा ब्रह्माण्ि मं दो प्रकार
                                                                        े
       त्रवद्वानो क मतानुशार िभी वेद दे वी गार्िी की
                   े                                           फक ऊजाा िे व्र्ाप्त है , स्जिका हम अनुभव कर िकते है ,
व्र्ाख्र्ा हं । र्फह कारण हं , क दे वी गार्िी को वेदं की
                                े                              वह ध्वसन उजाा एवं प्रकाश उजाा है । इि क अलावा
                                                                                                      े
माता अथाात "वेदमाता" कहा गर्ा हं । िारं वेदं को दे वी          ब्रह्माण्ि मं कछ एिी ऊजाा भी व्र्ाप्त होती है स्जिे ना
                                                                              ु
गार्िी क पुि माने जाते हं ।
        े                                                      हम दे ख िकते है नाही िुन िकते है नाहीं अनुभव कर

       शास्त्रोि मत िे जब ब्रह्माजी ने एक-एक करके              िकते है । आध्र्ास्त्मक शत्रि इनमं िे कोई भी एक प्रकार
                                                               की ऊजाा दिरी उजाा क िहर्ोग क त्रबना िफक्रर् नहीं
                                                                        ू         े        े
अपने िारं मुख िे गार्िी क िार अलग-अलग िरण की
                         े
                                                               होती। मंि सिर् ध्वसनर्ाँ नहीं हं स्जडहं हम कानं िे
                                                                            ा
व्र्ाख्र्ा की थी उि वि िारं वेदं का उद्गम माना जाता
                                                               िुनते िकते हं , ध्वसनर्ाँ तो माि मंिं का लौफकक स्वरुप
हं र्ा िार वेद प्रकट हुए हं ।
                                                               भर हं स्जिे हम िुन िकते हं । ध्र्ान की उच्ितम
दे वी गार्िी क मडि क िार पद िे क्रमशः
              े     े
                                                               अवस्था मं व्र्त्रि का आध्र्ास्त्मक व्र्त्रित्व पूरी तरह िे
ॐ भूभवः स्वः िे ऋग्वेद की रिना हुई। तत्ित्रवतुवरेण्र्ं
     ा                                         ा               ब्रह्माण्ि की अलौफकक शत्रिओ क िाथ मे एकाकार हो
                                                                                            े
िे र्जुवेद की रिना हुई। भगोदे वस्र् धीमफह िे िामवेद
       ा                                                       जाता है और त्रवसभडन प्रकारी की शत्रिर्ां प्राप्त होने
की रिना हुई।      और सधर्ो र्ोनः प्रिोदर्ात ् िे अथवावेद       लगती हं । प्रािीन ऋत्रषर्ं ने इिे शब्द-ब्रह्म की िंज्ञा दी
की रिना हुई हं ऐिा धमाग्रंथं मं उल्लेस्खत हं ।                 वह शब्द जो िाक्षात ् ईश्वर हं ! उिी िवाज्ञानी शब्द-ब्रह्म िे
       पौरास्णक काल मं ही हमारे ज्ञानी ऋषी मुसनर्ं             एकाकार होकर व्र्त्रि को मनिाहा ज्ञान प्राप्त कर ने मे
को ज्ञात हो गर्ा था की गार्िी दे वी िमस्त त्रवद्याओं की        िमथा हो िकता हं ।
जननी हं । ऐिा माना जाता हं की िार वेदं िे ही िमस्त                     हर मंिं मं कई त्रवशेष प्रकार की शत्रि सनफहत
शास्त्र, दशान, ब्राह्मण ग्रडथ, आरण्र्क, िूि, उपसनषद्,          होती हं । मंिं क अक्षर शत्रि बीज माने जाते हं । जैिे
                                                                               े
पुराण, स्मृसत आफद का सनमााण हुआ हं ।                           िभी त्रवसशष्ट मंिं मं उनक शब्दं मं त्रवशेष प्रकार की
                                                                                        े
       पौरास्णक माडर्ता हं की कालांतर मं इडहीं ग्रडथं          शत्रि तो होती है , पर फकिी-फकिी मडि मं उन शब्दं का
मं वस्णात ज्ञान िे िमस्त सशल्प, वास्णज्र्, सशक्षा,             कोई त्रवशेष महत्वपूणा अथा नहीं होता। लेफकन गार्िी

रिार्न, वास्तु, िंगीत आफद ८४ कलाओं का आत्रवष्कार               मंि मं ऐिा नहीं हं । गार्िी मंि क हर एक-एक अक्षर मं
                                                                                                े
                                                               अनेक प्रकार क गूढ़ रहस्र्मर् तत्त्व सछपे हुए हं । ऐिा
                                                                            े
हुआ हं । र्फह कारण हं की दे वी गार्िी को िंिार के
                                                               माना जाता हं की िमस्त लोक मं प्रिसलत ६४ कलाओं,
िमस्त ज्ञान-त्रवज्ञान की जननी कहाँ जाता हं । स्जि
                                                               ६ शास्त्रं, ६ दशानं एवं ८४ त्रवद्याओं क रहस्र् प्रकासशत
                                                                                                      े
प्रकार फकिी बीज क भीतर िंपूणा वृक्ष िस्डनफहत होता है ,
                 े
                                                               करने वाले िभी अथा गार्िी क हं ।
                                                                                         े
7                                         मई 2012




                                            गार्िी मंि का पररिर्
                                                                                                         सिंतन जोशी
       िामाडर्तः गार्िी मडि की मफहमा एवं प्रभाव िे               गार्िी मंि का अथा त्रवस्तृत शब्दो मं
प्रार्ः हर फहडद ु धमा को मानने वाले लोग पररसित हं ।              ओम            -    है िवाशत्रिमान परमेश्वर
                                                                 भूर                आध्र्ास्त्मक ऊजाा का अवतार
गार्िी मंि को "गुरु मंि" क रुप मे जाना जाता है ।
                          े
                                                                               -
                                                                 भव            -    दख की त्रवनाशक
                                                                                     ु
क्र्ोफक फहडद ु धमा मं गार्िी मडि िभी मंिं मं िवोच्ि
                                                                 स्वह          -    खुशी क अवतार
                                                                                          े
है और िबिे प्रबल शत्रिशाली मंि हं ।
                                                                 तत ्          -    जो (भगवान का िंकत)
                                                                                                    े
                                                                 ित्रवतुर      -    उज्ज्वल, िमकीले, िूर्ा की तरह
           ॐ भूभवः स्वः तत्ि त्रवतुवरेण्र्ं।
                ा                   ा                            वारेण्र्ं     -    उत्तम
  भगोदे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ोनः प्रिोदर्ात॥                      भगो           -    पापं का नाशक
                                                                 दे वस्र्      -    परमात्मा

भावाथा: उि     प्राणस्वरूप, दःखनाशक, िुखस्वरूप, श्रेष्ठ,
                             ु                                   धीमफह         -    मुजे प्रासप्त हो
                                                                 सधर्ो         -    एसि बुत्रद्ध
तेजस्वी,     पापनाशक,     दे वस्वरूप   परमात्मा   को    हम
                                                                 र्ो           -    जो
अडतःकरण मं धारण करं । वह परमात्मा हमारी बुत्रद्ध को
                                                                 नह            -    हमे
िडमागा मं प्रेररत करे ।
                                                                 प्रिोदर्ात    -    प्रेरणा दे


                                                  दस्क्षणावसता शंख
  आकार लंबाई मं      फाईन        िुपर फाईन स्पेशल    आकार लंबाई मं              फाईन          िुपर फाईन स्पेशल
  0.5" ईंि                   180       230       280 4" to 4.5" ईंि                       730       910       1050
  1" to 1.5" ईंि             280       370       460 5" to 5.5" ईंि                    1050            1250      1450
  2" to 2.5" ईंि             370          460          640 6" to 6.5" ईंि              1250            1450      1900
  3" to 3.5" ईंि             460          550          820 7" to 7.5" ईंि              1550            1850      2100
  हमारे र्हां बिे आकार क फकमती व महं गे शंख जो आधा लीटर पानी और 1 लीटर पानी िमाने की क्षमता वाले
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  होते हं । आपक अनुरुध पर उपलब्ध कराएं जा िकते हं ।
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     स्पेशल गुणवत्ता वाला दस्क्षणावसता शंख पूरी तरह िे िफद रं ग का होता हं ।
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     िुपर फाईन गुणवत्ता वाला दस्क्षणावसता शंख फीक िफद रं ग का होता हं ।
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     फाईन गुणवत्ता वाला दस्क्षणावसता शंख दं रं ग का होता हं ।

                                          GURUTVA KARYALAY
                                      Call us: 91 + 9338213418, 91+ 923832878
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8                                                       मई 2012




                           गार्िी मंि क िंदभा मं महापुरुषं क विन
                                       े                    े
                                                                                                                       स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
          िभी ऋत्रषर्ं ने एक मत िे गार्िी मंि की                     वाला        अडर्          कोई       मडि
मफहमा को स्वीकार फकर्ा हं ।                                          स्वगा और पृथ्वी पर नहीं
          अथवावेद मं उल्लेख हं की गार्िी मंि क जप िे
                                              े                      हं । जैिे गंगा क िमान
                                                                                     े
मनुष्र् की आर्ु, प्राण, शत्रि, कीसता, धन और ब्रह्मतेज मं             कोई तीथा नहीं, कशव िे
                                                                                     े
वृत्रद्ध होती हं ।                                                   श्रेष्ठ    कोई         दे व      नहीं।
                                                                     गार्िी िे श्रेष्ठ मंि न
त्रवश्वासमि जी का कथन हं :                                           हुआ हं , न आगे होगा।

                                     गार्िी मंि िे बढ़कर             गार्िी          मंि       जप       लेने

                             पत्रवि करने वाला और कोई                 वाला        िमस्त           त्रवद्याओं      का

                               मंि    नहीं    हं ।   उडहं   नी       वेत्ता, श्रेष्ठ हो जाता हं । जो फद्वज

                                गार्िी मंि की मफहमा मं               अथाात ब्राह्मण गार्िी परार्ण नहीं, वह वेदं का पारं गत

                                कहां हं      की जो मनुष्र्           होते हुए भी शूद्र क िमान है , अडर्ि फकर्ा हुआ उिका
                                                                                        े

                                सनर्समत रूप िे तीन वषा               श्रम व्र्था हं । जो मनुष्र् गार्िी को नहीं जानता, ऐिा

                                तक गार्िी जाप करता हं ,              व्र्त्रि ब्राह्मणत्व िे च्र्ुत अथाात बरख़ास्त और पापर्ुि

                                वह सनस्श्चत रुप िे ईश्वर             हो जाता हं ।

                              को प्राप्त करता हं ।
                                  जो फद्वज अथाात ब्राह्मण            पाराशर जी का कथन हं
दोनं                 िंध्र्ाओं मं गार्िी मंि जपता हं , वह            िमस्त जप, िूिं तथा वेद मंिं मं गार्िी मंि परम श्रेष्ठ
िमस्त वेद को पढ़ने क िमान फल को प्राप्त करता हं ।
                    े                                                हं ।      वेद        और       गार्िी        की
मनुष्र् अडर् कोई अनुष्ठान र्ा िाधना करे र्ा न करे ,                  तुलना           मं     गार्िी          का
कवल गार्िी मंि क जप िे वहँ िभी सित्रद्ध प्राप्त कर
 े              े                                                    पलिा                 भारी          हं ।
िकता हं । प्रसतफदन एक हजार जप करने वाला मनुष्र्                      भत्रिपूवक
                                                                             ा             गार्िी       का
               ू
िमस्त पापं िे छट जाता हं । त्रवश्वासमि जी का र्हाँ तक                जप करने वाला मनुष्र्
कहना हं की जो फद्वज अथाात ब्राह्मण गार्िी की उपािना                  मुि होकर पत्रवि बन
नहीं करता, वह सनडदा का पाि हं ।                                      जाता        हं ।      वेद, शास्त्र,
                                                                     पुराण, इसतहाि पढ़ लेने
र्ोसगराज र्ाज्ञवल्क्र् जी का कथन हं                                  पर भी जो गार्िी िे

          वेदं का िार उपसनषद हं , उपसनषद का िार                      हीन        है , उिे         ब्राह्मण      नहीं

व्र्ाहृसतर्ं िफहत गार्िी हं । गार्िी वेदं की जननी है ,               िमझना िाफहर्े।

पापं का नाश करने वाली है , इििे असधक पत्रवि करने
9                                              मई 2012



शंख ऋत्रष का कथन हं                                              सनमाल         करती      है ,

नरक क िमान िमुद्र मं सगरते हुए को हाथ पकि कर
     े                                                           गार्िी रूपी ब्रह्म गंगा

बिाने वाली गार्िी ही हं । उििे उत्तम तत्व स्वगा और               िे आत्मा पत्रवि होती

पृथ्वी पर कोई नहीं हं । गार्िी का ज्ञाता सनस्िंदेह स्वगा         हं । जो गार्िी छोिकर

को प्राप्त करता हं ।                                             अडर्           उपािनार्ं
                                                                 करता है , वह पकवान
                                                                 छोिकर सभक्षा माँगने
शौनक ऋत्रष का कथन हं
                                                                 वाले क िमान मूखा
                                                                       े
        अडर् उपािनार्ं करं िाहे न करं , कवल गार्िी
                                         े
                                                                 हं ।   का्र्    िफलता
जप िे ही फद्वज (ब्राह्मण) जीवन मुि हो जाता हं । व्र्त्रि
                                                                 तथा तप की वृत्रद्ध के
िमस्त िांिाररक और पारलौफकक िुखं को प्राप्त करता
                                                                 सलर्े गार्िी िे श्रेष्ठ और कछ नहीं हं ।
                                                                                             ु
हं । िंकट क िमर् दि हजार जप करने िे त्रवपत्रत्त का
           े
सनवारण होता हं ।                                                 भारद्वाज ऋत्रष का कथन हं
                                                                 ब्रह्मा आफद दे वता भी गार्िी का
अत्रि मुसन का कथन हं                                             जप      करते     हं ,   वह      ब्रह्म
        दे वी गार्िी आत्मा का                                    िाक्षात्कार    कराने    वाली     हं ।
परम शोधन करने वाली हं ।                                          अनुसित काम करने वालं के
उिक प्रताप िे कफठन दोष
   े                                                                                   ू
                                                                 दा गुण गार्िी क कारण छट
                                                                    ु           े
और दा गुणं का पररमाजान
      ु                                                          जाते हं । गार्िी िे रफहत
अथाात िर्ाई हो जाती हं ।                                         व्र्त्रि शुद्र िे भी अपत्रवि हं ।
जो मनुष्र् गार्िी तत्त्व
को भली प्रकार िे िमझ                                             िरक ऋत्रष का कथन हं
लेता है , उिक सलए इि
             े                                                           जो       मनुष्र्       ब्रह्मिर्ापूवक
                                                                                                             ा
िंिार मं कोई िुख शेष
                                                                 गार्िी की उपािना करता है और
नहीं रह जाता हं ।
                                                                 आँवले क ताजे फलं का िेवन
                                                                        े

नारदजी का कथन हं                                                 करता है , वह मनुष्र् दीघाजीवी होता

गार्िी भत्रि का ही स्वरूप हं । जहाँ भत्रि रूपी गार्िी है ,       हं ।
वहाँ श्रीनारार्ण का सनवाि होने मं कोई िंदेह नहीं करना
िाफहर्े ।                                                        वसशष्ठ जी का कथन हं

                                                                 मडदमसत, कमागागामी और अस्स्थरमसत भी गार्िी क
                                                                          ु                                 े
महत्रषा व्र्ाि जी का कथन हं
        स्जि प्रकार पुष्प का िार शहद, दध का िार घृत              प्रभाव िे उच्ि पद को प्राप्त करते हं , फफर िद् गसत होना
                                       ू
है , उिी प्रकार िमस्त वेदं का िार गार्िी हं । सिद्ध की           सनस्श्चत हं । जो पत्रविता और स्स्थरतापूवक गार्िी की
                                                                                                         ा
हुई गार्िी कामधेनु क िमान हं । गंगा शरीर क पापं को
                    े                     े                      उपािना करते है , वे आत्म-लाभ प्राप्त करते हं ।
10                                                मई 2012



जगद्गरु शंकरािार्ा जी का कथन हं
     ु                                                        महामना मदनमोहन मालवीर् जी का कथन हं
गार्िी की मफहमा का वणान                                       ऋत्रषर्ं ने जो अमूल्र् रत्न हमं
करना मनुष्र् की िामाथ्र्                                      फदर्े    हं , उनमं              िे   एक
क बाहर हं । बुत्रद्ध का
 े                                                            अनुपम रत्न गार्िी हं ।
होना इतना बिा कार्ा है ,                                      गार्िी     िे        बुत्रद्ध    पत्रवि
स्जिकी िमता िंिार के                                          होती हं । ईश्वर का प्रकाश
और फकिी काम िे नहीं                                           आत्मा मं आता हं । इि
हो िकती । आत्म-प्रासप्त                                       प्रकाश          मं              अिंख्र्
करने       की     फदव्र्     दृत्रष्ट                         आत्माओं         को भव-बंधन
स्जि बुत्रद्ध िे प्राप्त होती                                 िे िाण समला हं । गार्िी
है , उिकी प्रेरणा गार्िी द्वारा                               मं      ईश्वर परार्णता क भाव
                                                                                      े
होती हं । गार्िी आफद मंि हं । उिका                   अवतार    उत्पडन करने की शत्रि हं । िाथ ही                              वह
दररतं को नष्ट करने और ऋत क असभवधान क सलर्े
 ु                        े         े                         भौसतक अभावं को दर करती हं । गार्िी की उपािना
                                                                              ू
हुआ हं ।                                                      ब्राह्मणं क सलर्े तो अत्र्डत आवश्र्क हं । जो ब्राह्मण
                                                                         े
                                                              गार्िी जप नहीं करता, वह अपने कताव्र् धमा को छोिने
महात्मा गाँधी जी का कथन हं
                                                              का अपराधी होता हं ।
गार्िी मंि सनरं तर जप रोसगर्ं
को अच्छा करने और आत्मा
                                                              रवीडद्र टै गोर जी का कथन हं
की उडनसत क सलर्े उपर्ोगी
          े
                                                              भारतवषा को जगाने वाला जो मंि
हं । गार्िी का स्स्थर सित्त
                                                              है , वह इतना िरल है फक एक
और शाडत हृदर् िे फकर्ा
                                                              ही श्वाि मं उिका उच्िारण
हुआ      जप       आपात्तकाल              मं
                                                              फकर्ा जा िकता हं । वह है -
िंकटं      को     दर
                   ू       करने         का
                                                              गार्िी मंि । इि पुनीत मंि
प्रभाव रखता हं ।
                                                              का अभ्र्ाि करने मं फकिी
लोकमाडर् सतलक जी का कथन हं                                    प्रकार    के         ताफकक
                                                                                       ा           ऊहापोह,
स्जि बहुमुखी दािता क बंधनं मं
                    े                                         फकिी      प्रकार        के       मतभेद    अथवा
भारतीर्      प्रजा     जकिी             हुई   है ,            फकिी प्रकार क बखेिे की गुंजाइश नहीं हं ।
                                                                           े
उिक सलर्े आत्मा क अडदर
   े             े
प्रकाश     उत्पडन          होना         िाफहर्े,              र्ोगी अरत्रवडदजी
स्जििे      ित ् और           अित ् का                        र्ोगी अरत्रवडदजी                 ने त्रवसभडन स्थानो पर जगह गार्िी
त्रववेक हो, कमागा को छोिकर
             ु                                                जप करने का सनादेश फकर्ा हं । उडहंने बतार्ा फक गार्िी
श्रेष्ठ मागा पर िलने की प्रेरणा                               मं ऐिी शत्रि िस्डनफहत है , जो महत्त्वपूणा कार्ा कर
समले, गार्िी मंि मं र्ही भावना                                िकती हं । उडहंने कईर्ं को िाधना क तौर पर गार्िी
                                                                                               े
त्रवद्यमान हं ।                                               का जप बतार्ा हं ।
11                                                  मई 2012



स्वामी रामकृ ष्ण परमहं ि जी का कथन हं                       हं । स्जि पर परमात्मा प्रिडन होते हं , उिे िद् बुत्रद्ध प्रदान

मं लोगं िे कहता हूँ फक ल्बी                                 करते हं । िद् बुत्रद्ध िे ित ् मागा

िाधना      करने         की       उतनी                       पर प्रगसत होती है और ित ्

आवश्र्कता        नहीं    हं ।     इि                        कमा िे िब प्रकार क िुख
                                                                              े

छोटी-िी गार्िी की िाधना                                     समलते हं । जो ित ् की ओर

करक दे खं । गार्िी का
   े                                                        बढ़ रहा है , उिे फकिी प्रकार

जप      करने      िे     बिी-बिी                            क िुख की कमी नहीं रहती
                                                             े

सित्रद्धर्ाँ समल जाती हं । र्ह                              । गार्िी िद् बुत्रद्ध का मंि हं ।

मंि छोटा है , पर इिकी शत्रि                                 इिसलर्े उिे मंिं का मुकटमस्ण
                                                                                   ु

बिी भारी हं ।                                               कहा हं ।


स्वामी रामतीथा जी का कथन हं                                 स्वामी सशवानंदजी जी का कथन हं
राम को प्राप्त करना िबिे बिा                                ब्राह्ममुहूता मं गार्िी का जप

काम हं । गार्िी का असभप्रार्                                करने िे सित्त शुद्ध होता है

बुत्रद्ध को काम-रुसि िे हटाकर                               और हृदर् मं सनमालता आती

राम-रुसि    मं     लगा          दे ना   हं ।                हं । शरीर नीरोग रहता है ,

स्जिकी बुत्रद्ध पत्रवि होगी, वही                            स्वभाव मं नम्रता आती है ,

राम को प्राप्त कर िकगा ।
                    े                                       बुत्रद्ध िूक्ष्म होने िे दरदसशाता
                                                                                      ू

गार्िी पुकारती है फक बुत्रद्ध मं                            बढ़ती है और स्मरण शत्रि

इतनी पत्रविता होनी िाफहर्े फक वह                            का त्रवकाि होता हं । कफठन

राम को काम िे बढ़कर िमझे ।                                  प्रिंगं    मं    गार्िी     द्वारा   दै वी
                                                            िहार्ता         समलती     हं ।   उिक द्वारा
                                                                                                े
महत्रषा रमण जी का कथन हं                                    आत्म-दशान हो
र्ोग त्रवद्या क अडतगात मंि त्रवद्या
               े                                            िकता हं ।
बिी प्रबलत हं । मंिं की शत्रि                                         उपरोि      महापुरुषो       के      कथन    िे   समलते-जुलते

िे अद्भत िफलतार्ं समलती हं
       ू                                                    असभमत प्रार्ः िभी त्रवद्वानो क हं । इििे स्पष्ट है फक
                                                                                          े
                                                            कोई ऋत्रष र्ा त्रवद्वान अडर् त्रवषर्ं मं िाहे अपना मतभेद
। गार्िी ऐिा मंि है , स्जििे
                                                            रखते हं, पर गार्िी क बारे मं उन िब मं िमान श्रद्धा
                                                                                े
आध्र्ास्त्मक और भौसतक दोनं
                                                            थी और वे िभी अपनी उपािना मं उिका प्रथम स्थान
प्रकार क लाभ समलते हं ।
        े
                                                            रखते थे ! कछ त्रवद्वानो का कथन हं की शास्त्रं मं, ग्रंथं
                                                                       ु
                                                            मं, स्मृसतर्ं मं, पुराणं मं गार्िी की मफहमा तथा िाधना
स्वामी त्रववेकानंद जी का कथन हं                             पर प्रकाश िालने वाले िहस्रं श्लोक भरे पिे हं । इन
राजा िे वही वस्तु माँगी जानी िाफहर्े, जो उिक गौरव क
                                            े      े        िबका िंग्रह फकर्ा जाए, तो एक बिा भारी गार्िी पुराण
अनुकल हो । परमात्मा िे माँगने र्ोग्र् वस्तु िद् बुत्रद्ध
    ू                                                       बन िकता हं ।
12                                       मई 2012




                                        गार्िी मडि क त्रवलक्षण प्रर्ोग
                                                    े
                                                                                    सिंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
मूल मंि:                                                        िंतान की प्रासप्त हे तु
ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं ।
     ुा                 ा                                       गार्िी मंि क आगे ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं बीज मंि लगाकर
                                                                            े

भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥                  जप करने िे िंतान की प्रासप्त होती हं ।

त्रवसध :                                                        मंि:
          प्रसतफदन प्रातः काल स्नानाफद िे सनवृत्त होकर              ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं ।
                                                                                             ुा                 ा
                                                                     भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥
स्वच्छ वस्त्र धारण कर उि मडि की एक माला जप
करं । त्रवद्वानो क मतानुशार गार्िी मडि को 108 बार
                  े
                                                                भूत-प्रेत इत्र्ाफद उपद्रवं क नाश हे तु
                                                                                            े
पढ़कर स्वच्छ जल को असभमंत्रित कर क पीने िे िाधक
                                  े
                                                                गार्िी मंि क आगे ॐ ह्रीं क्लीं बीज मंि लगाकर जप
                                                                            े
क िमस्त रोग-शोक-भर् दर होते हं ।
 े                   ू
                                                                करने िे भूत-प्रेत, तंि बाधा, िोट, मारण, मोहन,
          गार्िी मडि िे भात (पक हुए िावल) मं घी
                               े
                                                                उच्िाटन, वशीकरण, स्तंभन, कामण-टू मण, इत्र्ाफद
समलाकर 108 बार त्रवसधवत होम करने िे िाधक को
                                                                उपद्रवं का नाश होता हं ।
धमा, अथा, काम और मोक्ष की प्रासप्त होती हं ।
                                                                मंि:
                                                                       ॐ ह्रीं क्लीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं ।
                                                                                          ुा                 ा
लक्ष्मी प्रासप्त हे तु
                                                                     भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥
गार्िी मंि क आगे ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं बीज मंि लगाकर जप
            े
करने िे माँ लक्ष्मी प्रिडन होती हं ।
                                                                अिाध्र् रोगं क सनवारण हे तु
                                                                              े
मंि:
                                                                गार्िी मंि क आगे ॐ ह्रीं बीज मंि लगाकर जप करने
                                                                            े
       ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं ।
                                ुा                 ा
                                                                िे अिाध्र् रोग एवं परे शानीर्ं िे मुत्रि समलती हं ।
       भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥
                                                                मंि:
                                                                         ॐ ह्रीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं ।
                                                                                      ुा                 ा
ज्ञान प्रासप्त हे तु
                                                                     भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥
गार्िी मंि क पीछे ॐ ऐं क्लीं औ ं बीज मंि लगाकर
            े
जप करने िे मूख-जि िे जि व्र्त्रि भी त्रवद्वान हो जाता
              ा
                                                                धन-िंपत्रत्त की वृत्रद्ध हे तु
हं ।
                                                                गार्िी मंि क आगे ॐ आं ह्रीं क्लीं बीज मंि लगाकर
                                                                            े
मंि:
                                                                जप करने िे धन-िंपत्रत्त की वृत्रद्ध एवं रक्षा होती हं ।
ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । भगो दे वस्र् धीमफह ।
     ुा                 ा
                                                                मंि:
         सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ ॐ ऐं क्लीं औ ं ॥
                                                                    ॐ आं ह्रीं क्लीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं ।
                                                                                          ुा                 ा
                                                                     भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥
13                                    मई 2012




गार्िी मडि क अडर् अनुभूत प्रर्ोग:
            े                                             ज्वर सनवारण हे तु
                                                          र्फद ज्वर िे पीफित व्र्त्रि को उसित इलाज़ एवं दवाईर्ं
प्राण भर् सनवारण हे तु                                    िे राहत नहीं समल रही हो, तो आम क पत्तं को गार् क
                                                                                          े               े
र्फद व्र्त्रि क प्राण को फकिी भी कारण वश महान
               े                                          दध मं दबाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने
                                                           ू     ु
िंकट हो, ऐिी अवस्था मं शरीर का कण्ठ तक र्ा जाँघ           िे िभी प्रकार क ज्वर शीघ्र दर होने लगते हं और रोगी
                                                                         े            ू
तक का फहस्िा पानी (पत्रवि नदी, जलाशर् र्ा तालाब)          जल्दी स्वस्थ हो जाता हं ।
मं िू बा रहे इि प्रकार खिे होकर सनत्र् 108 बार गार्िी
मडि जपने िे प्राण की रक्षा होती हं , ऐिा त्रवद्वानो का    राज रोग सनवारण हे तु
कथन हं ।                                                  र्फद कोई व्र्त्रि राज रोग (अथाात: ऐिा रोग स्जििे
                                                                ू
                                                          पीछे छटना अिंभव हो, अिाध्र् रोग)िे पीफित हो, तो
ग्रह-बाधा सनवारण हे तु
                                                          मीठा वि को गार् क दध मं दबाकर गार्िी मडि पढ़कर
                                                                           े ू     ु
र्फद व्र्त्रि को ग्रह जसनत पीिाओं िे कष्ट हो, तो
                                                          108 बार हवन करने िे राज रोग मं राहत होने लगती हं
शसनवार क फदन पीपल क वृक्ष क नीिे बैठ कर गार्िी
        े          े       े
                                                          और रोगी जल्दी स्वस्थ हो ने लगता हं ।
मडि का जप करने िे ग्रहं क बुरे प्रभाव िे रक्षा होती
                         े
हं । र्ह पूणतः अनुभत प्रर्ोग हं ।
            ा      ू
                                                          कष्ठ रोग सनवारण हे तु
                                                           ु
मृत्र्ु भर् सनवारण हे तु                                  र्फद कोई व्र्त्रि कष्ठ रोग िे पीफित हो, तो शंख पुष्पी क
                                                                             ु                                   े
 र्फद व्र्त्रि की कुंिली मं अल्प मृत्र्ु र्ोग का         पुष्पं िे गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने िे
   सनमााण हो रहा हो, तो गुरुसि क छोटे टु किे करक
                                े               े         कष्ठ रोग दर होता हं ।
                                                           ु        ू
   गार् क दध मं दबाकर गार्िी मडि पढ़कर प्रसतफदन
         े ू     ु
   108 बार हवन करने िे अकाल मृत्र्ु र्ोग का               उडमाद रोग सनवारण हे तु
   सनवारण होता है । इिे मृत्र्ुंजर् हवन भी कहते हं ।
                                                          र्फद घर का कोई िदस्र् उडमाद रोग िे पीफित हो, तो
   (गुरुसि को अडर् भाषाओं मं गुलवेल, मधुपणी,
                                                          गूलर की लकिी और फल िे गार्िी मडि पढ़कर 108
   नीमसगलो, अमृतवेल, अमृतवस्ल्ल आफद नाम िे भी
                                                          बार हवन करने िे उडमाद रोग का सनवारण होता हं ।
   जाना जाता हं ) को शमी वृक्ष की लकिी मं गार् का
   शुद्ध घी, जौ, गार् दध समलाकर 7 फदन तक सनर्समत
                       ू
                                                          मधुमेह (िार्त्रबटीज) रोग सनवारण हे तु
   गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन करने िे
                                                          र्फद व्र्त्रि मधुमेह रोग िे पीफित हो, तो ईख क रि मं
                                                                                                       े
   अकाल मृत्र्ु र्ोग दर होता है ।
                      ू
                                                          मधु समलाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने
 मधु, गार् का शुद्ध घी, गार् दध समलाकर 7 फदन
                               ू
                                                          िे मधुमेह रोग मं लाभ होता हं ।
   तक सनर्समत गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन
   करने िे अकाल मृत्र्ु र्ोग दर होता है ।
                              ू
 बरगद की िसमधा मं बरगद की हरी टहनी पर गार्               बवािीर रोग सनवारण हे तु
   का शुद्ध घी और गार् क दध िब का समश्रण कर 7
                        े ू                               र्फद व्र्त्रि बवािीर रोग िे पीफित हो, तो गार् क दही,
                                                                                                         े
   फदन तक सनर्समत गार्िी मडि जपते हुए 108 बार             दध व घी तीनो को समलाकर गार्िी मडि पढ़कर 108
                                                           ू
   हवन करने िे अकाल मृत्र्ु र्ोग दर होता है ।
                                  ू                       बार हवन करने िे बवािीर रोग मं लाभ होता हं ।
14                                           मई 2012



दमा रोग सनवारण हे तु                                      पीलाने िे अथवा िंबंसधत स्थान पर असभमंत्रित जल का

र्फद व्र्त्रि दमा रोग िे पीफित हो, तो अपामागा, गार्       सछटकाव करने िे भूताफद दोष दर होता है ।
                                                                                     ू

का शुद्ध घी समलाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन
करने िे दमा रोग मं लाभ होता हं ।                          िवा िुख प्रासप्त हे तु
                                                          िभी प्रकार िे िुखं की प्रासप्त क सलए, गार्िी मडि
                                                                                          े
राष्ट्र भर् सनवारण हे तु                                  जपते हुए 108 बार ताजे़ फलं िे हवन करने िे िवा
                                                                                  ू

र्फद फकिी राजा, नेता प्रजा र्ा दे श पर फकिी प्रकार िे     िुखं की प्रासप्त होती हं ।

शिु पक्ष िे आक्रमण का अंदेशा हो र्ा फकिी प्रकार िे
कदरती िंकट (त्रवद्युत्पात, अस्ग्न आफद) का भर् हो, तो
 ु                                                        लक्ष्मी की प्रासप्त हे तु
बंत की लकिी क छोटे -छोटे टू किे ़ कर गार्िी मडि
             े                                             लाल कमल पुष्प अथवा िमेली क पुष्प और शासल
                                                                                      े
पढ़कर108 बार हवन करने िे राष्ट्र भर् का सनवारण होता           िावल (िुगंसधत िावल र्ा मीठे िावल र्ा लाल
हं ।                                                          अक्षत) िे गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन
                                                              करने िे लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं ।
असनष्टकारी दोष सनवारण हे तु                                बेल क छोटे -छोटे टु किे करक त्रबल्व, पुष्प, फल, घी,
                                                                 े                     े

र्फद फकिी फदशा, शिु त्रवशेष र्ा पंि तत्व िे िंबंसधत           खीर को समलाकर हवन िामग्री बनाकर, त्रबल्व की

दोष की आशंका हो, तो 21 फदन तक सनत्र् गार्िी मडि               लकिी िे गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन

का करं , जप की िमासप्त वाले फदन स्जि फदशा मं दोष              करने िे लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं ।

र्ा शिु हो उि फदशा मं समट्टी का ढे ला असभमंत्रित
करक फक ने िे दोष दर होता हं ।
   े ं            ू                                       त्रवजर् प्रासप्त हे तु
                                                          र्फद फकिी िे त्रबना फकिी कारण िे िरकारी लोगं र्ा
शारीररक व्र्ासध सनवारण हे तु                              प्रिािनीर् िे अनावश्र्क वाद-त्रववाद िल रहा हो, तो

र्फद शरीर क फकिी अंग मं व्र्ासध र्ा पीिा हो, तो
           े                                              मदार की लकिी मं मदार क ताजे पि गार् का शुद्ध घी
                                                                                े

आत्म भाव एवं पूणा श्रद्धा िे गार्िी मडि का जप करते        समलाकर गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन करने िे

हुऐ कशा पर फक मार कर शरीर क उि अंग र्ा फहस्िी
     ु      ूँ             े                              त्रवजर् की प्रासप्त होती हं ।

का स्पशा करने िे िभी प्रकार क रोग, त्रवकार, त्रवष,
                             े
आफद नष्ट हो जाते हं ।                                     .नोटः- त्रवशेष लाभ की प्रासप्त हे तु फकिी भी
                                                          प्रर्ोग क करने िे पूवा कछ फदन सनस्श्चत िंख्र्ा
                                                                   े              ु
भूत-प्रत व्र्ासध सनवारण हे तु                             मं 1, 3, 5, 7, 11, 21 र्था िंभव जप करने िे
र्फद व्र्त्रि को भूत-प्रेत आफद बाधा िे पीिा हो र्ा कोई    प्रर्ोग मं शीध्र लाभ की प्रासप्त होती हं । जप के
स्थान त्रवशेष पर भूत-प्रेत आफद क्षूद्र जीवं का जमाविा
                                                          िाथ प्रसतफदन दशांश हवन करे अथवा दशांश की
हो, तो ताँबं क कलश मं जल भरकर गार्िी मडि का
              े
                                                          िंख्र्ा क असधक जप करं ।
                                                                   े
जप करते हुऐ उिमं फक मार कर जल को असभमंत्रित
                  ूँ
करले फफर उि व्र्त्रि पर जल सछटकने िे र्ा उिे                                           ***
15                                          मई 2012




                            त्रवसभडन गार्िी मडि
                                                                             सिंतन जोशी,  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
                         ॐ भूभवस्वः । तत ् ित्रवतुवरेण्र्ं ।
                              ुा                   ा                            Om bhur bhuvah svah
गार्िी दे वी मडि
                                                                                Tat savitur vareniyam
                         भगो दे वस्र् धीमफह ।
                                                                                Bhargo devasya dheemahee
                         सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् ॥                            Dhiyo yo nah prachodayat.
                         ॐ सगररजार्ै त्रवद्महे ,
                                                                                Om Girijayai Vidhmahe
दगाा गार्िी मडि
 ु                       सशव त्रप्रर्ार्ै धीमफह,                                Shiv Priyayai Dheemahee
                         तडनो दगाा प्रिोदर्ात ्।।
                                                                                Tanno Durgaya Prachodayat.
                               ु
                         ॐ कात्र्ार्डर्ै त्रवद्महे ,
                                                                                Om Katyayanayai Vidhmahe
कात्र्ार्नी गार्िी मडि   कडर्ा कमारर ि धीमफह,
                                ु                                               Kanya Kumari cha Dheemahee
                         तडनो दगाा प्रिोदर्ात ्।।
                                                                                Tanno Durgaya Prachodayat.
                               ु
                         ॐ महालाक्ष्मर्े त्रवद्महे ,
                                                                                Om Mahalakshmaye Vidhmahe
लक्ष्मी गार्िी मडि       त्रवष्णु पत्नी ि धीमफह                                 Vishnu Pathniyai cha Dheemahee
                         तडनो लक्ष्मी:प्रिोदर्ात।
                                                                                Tanno Lakshmi Prachodayat.

                         ॐ महालाक्ष्मर्े त्रवद्महे ,
                                                                                Om Mahalakshmaye Vidhmahe
लक्ष्मी गार्िी मडि       त्रवष्णु त्रप्रर्ार् धीमफह                             Vishnu Priyay Dheemahee
                         तडनो लक्ष्मी:प्रिोदर्ात।
                                                                                Tanno Lakshmi Prachodayat.

                         ॐ वाग दे व्र्ै त्रवद्महे ,
                                                                                Om Vag devyai Vidhmahe
िरस्वती गार्िी मडि       काम राज्र्ा धीमफह तडनो िरस्वती                         Kam Rajya Dheemahee
                         :प्रिोदर्ात।
                                                                                Tanno Saraswati Prachodayat.

                         ॐ जनक नंफदडर्े त्रवद्महे ,
                                                                                Om Janaka Nandinye Vidhmahe
िीता गार्िी मडि          भुसमजार् धीमफह                                         Bhumijaya Dheemahee
                         तडनो िीता :प्रिोदर्ात।
                                                                                Tanno Sita Prachodayat .
                                                                                Om Vrishabhanu jayai Vidhmahe
                         ॐ वृष भानु: जार्ै त्रवद्महे , फक्रस्रप्रर्ार्
राधा गार्िी मडि
                                                                                Krishna priyaya Dheemahee
                         धीमफह तडनो राधा :प्रिोदर्ात।                           Tanno Radha Prachodayat.

                         ॐ श्री तुल्स्र्े त्रवद्महे , त्रवश्नुत्रप्रर्ार्       Om Tulasyai Vidhmahe
तुलिी गार्िी मडि                                                                Vishnu priyayay Dheemahee
                         धीमफह तडनो वृंदा: प्रिोदर्ात।                          Tanno Brindah Prachodayat.
                         ॐ पृथ्वी दे व्र्ै त्रवद्महे , िहस्र मूरतर्ै            Om Prithivi devyai Vidhmahe
पृथ्वी गार्िी मडि                                                               Sahasra murthaye Dheemahee
                         धीमफह तडनो पृथ्वी :प्रिोदर्ात।                         Tanno Prithvi Prachodayat.
                         ॐ पर्नडिार् त्रवद्महे , महा हं िार्                    Om Param Hansay Vidmahe
हं ि गार्िी मडि                                                                 maha hanasay dheemahee tanno
                         धीमफह तडनो हं ि: प्रिोदर्ात।                           hansh prachodyat.
16                                 मई 2012



                        ॐ भगवत्तै त्रवद्महे , महे श्वरर्ै धीमफह   Om bhagvattay vidmahe
अडनपूणाा गार्िी मडि                                               Maheshwariya dheemahee tanno
                        तडनो अडनपूणाा: प्रिोदर्ात।                annapurna prachodyat.
                        ॐ कासलकर्ै त्रवद्महे ,
                                                                  Om kalikaye vidmahe smashan
महालाकी गार्िी मडि      स्मशान वसशनर्ै धीमफह                      vashiney dheemahee tanno A
                        तडनो अघोर: प्रिोदर्ात।
                                                                  ghora prachodyat.

                        ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे ,
                                                                  Om Tat Purushaya Vidhmahe
सशव गार्िी मडि          महादे वार् धीमफह                          Mahadevaya Dheemahee
                        तडनो रुद्र प्रिोदर्ात।
                                                                  Tanno Rudra Prachodayat.

                        ॐ नारार्णार् त्रवद्महे ,
                                                                  Om Narayanaya Vidhmahe
नारार्ण गार्िी मडि      वािुदेवार् धीमफह                          Vasudevaya Dheemahee
                        तडनो त्रवष्णु: प्रिोदर्ात।
                                                                  Tanno Vishnu Prachodayat.

                        ॐ ितुर मुखार् त्रवद्महे , हं िारुढार्     Om Chathur mukhaya Vidmahe,
ब्रह्मा गार्िी मडि                                                Hanasaroodaya Dheemahee
                        धीमफह॥ तडनो ब्रह्मा प्रिोदर्ात ्॥         Tanno Brahma Prachodayat.
                        ॐ वेदात्मनार् त्रवद्महे , फहरण्र्गभाार्   Om Vedathmanaya vidmahe,
ब्रह्मा गार्िी मडि                                                Hiranya Garbhaya Dheemahi,
                        धीमफह॥ तडनो ब्रह्मा प्रिोदर्ात ्॥         Tanno Brahma Prachodayat
                        ॐ दाशरथर् त्रवद्महे ,
                                                                  Om Dasarathaya Vidhmahe
राम गार्िी मडि          िीता वल्लभार् धी मफह॥                     Sita Vallabhaya Dheemahee
                        तडनो रामः प्रिोदर्ात ्॥
                                                                  Tanno Rama Prachodayat.

                        ॐ दामोदरार् त्रवद्महे ,
                                                                  Om Damodaraya Vidhmahe
कृ ष्णा गार्िी मडि      रुकमणी वल्लभार् धी मफह॥                   Rukmani Vallabhay Dheemahee,
                        तडनो कृ ष्ण प्रिोदर्ात ्॥
                                                                  Tanno Krishna Prachodayat.

                        ॐ गोत्रवंदार् त्रवद्महे ,                 Om Govindaya Vidhmahe
कृ ष्णा गार्िी मडि      गोपी वल्लभार् धी मफह॥                     Gopi Vallabhaya Dheemahee
                        तडनो कृ ष्ण प्रिोदर्ात ्॥                 Tanno Krishna Prachodayat

                        ॐ सनरं जनार् त्रवद्महे ,                  OM Nirnajanaya Vidmahe
वंकटे श्वर गार्िी मडि   सनरापस्र्ा धीमफह॥                         Nirapasaya Dheemahee
                        तडनो श्रीसनवाि प्रिोदर्ात ्॥              Tanno Srinivasa Prachodayat.

                        ॐ नरसिंहार् त्रवद्महे ,                   Om Narasimhaya Vidmahe
नरसिंह गार्िी मडि       वज्रनक्षार् धीमफह॥                        Vajra Nakhaya Dheemahee
                        तडनो नरसिंह प्रिोदर्ात ्॥                 Tanno Narasimha Prachodayat.

                        ॐ वनैस्वरार् त्रवद्महे ,                  Om Vanaisvaraya Vidhmahe
हर्ग्रीव गार्िी मडि     हर्सग्रवार् धीमफह॥                        Hayagrivaya Dheemahee
                        तडनो हर्सग्रव प्रिोदर्ात ्॥               Tanno Hayagriva Pracodayat.

िुदशान गार्िी मडि       ॐ िुदशानार् त्रवद्महे ,                   Om Sudharshanaya Vidmahe
17                                 मई 2012



                        महाज्वलार् धीमफह॥                        Maha Jwalaya Dheemahee
                                                                 Tanno Chakra Prachodayat.
                        तडनो िक्र प्रिोदर्ात ्॥
                        ॐ ल्बोदरार् त्रवद्महे , महोदरार्         Om Lambodaraya vidmahe
गणेश गार्िी मडि                                                  Mahodaraya deemahee
                        धीमफह॥ तडनो दं ती प्रिोदर्ात ्॥          Tanno danti Prachodayat.
                                                                 Om Ekadanthaya vidmahe
                        ॐ एकदं तार् त्रवद्महे , वक्रतुंिार्
गणेश गार्िी मडि
                                                                 Vakrathundaya dheemahee
                        धीमफह॥ तडनो दं ती प्रिोदर्ात ्॥          Tanno danthi Prachodayat.

                        ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे , वक्रतुण्िार्     Om Thatpurashaya vidhmahe
गणेश गार्िी मडि                                                    Vakrathundaya dheemahee
                        धीमफह, तडनो दस्डत प्रिोदर्ात ्॥            Tanno danti Prachodayat.
                        ॐ िहस्त्र नेिार्ै त्रवद्महे , वज्र हस्तार् Om Sahasra nethraye Vidhmahe,
इडद्र गार्िी मडि                                                   Vajra hasthaya Dheemahee
                        धीमफह, तडनो इडद्र प्रिोदर्ात ्॥            Tanno Indra Prachodayat.
                        ॐ अंजनी जार् त्रवद्महे , महाबलार्          Om Aanjanee jaya Vidhmahe
हनुमान गार्िी मडि                                                  Maha balaya Dheemahee
                        धीमफह, तडनो हनुमान प्रिोदर्ात ्॥           Tanno Hanuman Prachodayat.
                        ॐ अंजनी जार् त्रवद्महे , वार्ुपुिार्       Om Aanjanee jaya Vidhmahe
हनुमान गार्िी मडि                                                  Vayu putraya Dheemahee
                        धीमफह, तडनो हनुमान प्रिोदर्ात ्॥           Tanno Hanuman Prachodayat .
                        ॐ िूर्ा पुिार् त्रवद्महे , महा कालार्      Om Surya puthraya Vidhmahe
र्म गार्िी मडि                                                     Maha Kalaya Dheemahee
                        धीमफह, तडनो र्म प्रिोदर्ात ्॥              Tanno Yama Prachodayat.
                        ॐ जलत्रब्बार् त्रवद्महे नीलपुरुषार्        Om Jala bimbaya Vidhmahe
वरुण गार्िी मडि                                                    Nila Purushaya Dheemahee
                        धीमफह । तडनो वरुण: प्रिोदर्ात ् ।।         Tanno Varuna Prachodayat.
                        ॐ महाज्वलार् त्रवद्महे अस्ग्नदे वार्       Om Maha jwalaya Vidhmahe
अस्ग्न गार्िी मडि                                                  Agni devaya Dheemahee
                        धीमफह । तडनो अस्ग्न: प्रिोदर्ात ् ।।       Tanno Agni Prachodayat.
                        ॐ पावकार् त्रवद्महे िप्तस्जह्वार् धीमफह Om Pavakay Vidhmahe
वैश्वानर गार्िी मडि                                                Sapta Jihvay Dheemahee
                        । तडनो वैश्वानरः प्रिोदर्ात ् ॥            TannoVaiswanar Prachodayat .
                        ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे िुवणापक्षार्       Om Thathpurushaya Vidhmahe,
गरुि गार्िी मडि                                                    Suvarna Pakshaya Dheemahee
                        धीमफह । तडनो गरुिः प्रिोदर्ात ् ॥          Tanno Garuda Prachodayat
                        ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे िक्रतुण्िार्       Om Thathpurushaya Vidhmahe,
नंदी गार्िी मडि                                                    Chakratundaya Dheemahee
                        धीमफह । तडनो नस्डदः प्रिोदर्ात ् ॥         Tanno Nandi Prachodayat .
                        ॐ सशरिी वािार् त्रवद्महे िस्च्िदानंदार् Om Shirdi vasaya Vidhmahe
सशरिी़ िाई गार्िी मडि                                              Sachithanandaya Dheemahee
                        धीमफह, तडनो िाईं प्रिोदर्ात ्।।            Tanno Sai Prachodayat .
                        ॐ कामदे वार् त्रवद्महे पुष्पवनार्          Om Kama devaya Vidhmahe
मडमथ गार्िी मडि                                                    Pushpa vanaya Dheemahee
                        धीमफह । तडनः कामः प्रिोदर्ात ् ॥           Tanno Kama Prachodayat.
18                               मई 2012




                                  नवग्रह की शांसत क सलर्े गार्िी मंि
                                                   े
                                                                                                सिंतन जोशी
त्रवसध : प्रसतफदन प्रातः काल स्नानाफद िे सनवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर उि मडि की एक माला जप करं ।
त्रवद्वानो क मतानुशार नवग्रह गार्िी मडि को 108 बार पढ़ने िे िाधक क िमस्त रोग-शोक-भर् दर होते हं ।
            े                                                     े                   ू
                                 िूर्ा गार्िी मडि
                                 ॐ भास्करार् त्रवद्महे फदवाकरार् धीमफह ।
                                 तडनोः िूर्ः प्रिोदर्ात ् ॥
                                           ा
                                 Om Bhaskaraya Vidhmahe
                                 Diva karaya Dheemahee
                                 Tanno Surya Prachodayat.

                                 ॐ अश्वध्वजार् त्रवद्महे पाशस्तार् धीमफह ।
                                 तडनोः िूर्ः प्रिोदर्ात ् ॥
                                           ा
                                 Om Aswadwajaya Vidhmahe
                                 Pasa Hasthaya Dheemahee
                                 Tanno Surya Prachodayat .
िडद्र गार्िी मडि
ॐ क्षीरपुिार् त्रवद्महे अमृतत्वार् धीमफह ।
तडनोः िडद्रः प्रिोदर्ात ् ॥
Om Kshira putraya Vidhmahe
Amritathvaya Dheemahee
Tanno Chandra Prachodayat.

ॐ पद्मध्वजार् त्रवद्महे हे म रूपार् धीमफह ।
तडनोः िोम प्रिोदर्ात ् ॥
Om Padmadwajaya Vidhmahe
Hema roopaya Dheemahee
Tanno Chandra Prachodayat .
                             .


                            मंगल गार्िी मडि
                            ॐ वीरध्वजार् त्रवद्महे त्रवघ्नहस्तार् धीमफह ।
                            तडनो भौमः प्रिोदर्ात ् ॥
                            Om veeradhwajaaya vidmahae
                            vighna hastaaya dheemahi
                            tanno bhouma prachodayaat

                            ॐ अंगारकार् त्रवद्महे भूसमपालार् धीमफह । तडनः कजः प्रिोदर्ात ् ॥
                                                                           ु
                            Om Angaarakaay vidmahae bhoomipaalaay dheemahi
                            tanno kuja prachodayaat
19                                मई 2012



                                    बुध गार्िी मडि
                                    ॐ गजध्वजार् त्रवद्महे िुखहस्तार् धीमफह ।
                                    तडनो बुधः प्रिोदर्ात ् ॥
                                    Om gajadhwajaaya vidmahae
                                    sukha hastaaya dheemahi
                                    tanno budha: prachodayaat

                                    ॐ िडद्रपुिार् त्रवद्महे रोफहणी त्रप्रर्ार् धीमफह ।
                                    तडनो बुधः प्रिोदर्ात ् ॥
                                    Om Chandraputraaya vidmahae
                                    rohini priyaay dheemahi
                                    tanno budha: prachodayaat

गुरु (बृहस्पसत) गार्िी मडि
ॐ वृषभध्वजार् त्रवद्महे क्रसनहस्तार् धीमफह ।
                          ु
तडनो गुरुः प्रिोदर्ात ् ॥
Om vrishabadhwajaaya vidmahae
kruni hastaaya dheemahi
tanno guru: prachodayaat

ॐ िुरािार्ाार् त्रवद्महे िुरश्रेष्ठार् धीमफह ।
तडनो गुरुः प्रिोदर्ात ् ॥
Om Suraachaaryaay vidmahae
shurashresthaay dheemahi
tanno guru: prachodayaat

                                    शुक्र गार्िी मडि
                                    ॐ अश्वध्वजार् त्रवद्महे धनुहास्तार् धीमफह ।
                                    तडनोः शुक्रः प्रिोदर्ात ् ॥
                                    Om aswadhwajaaya vidmahae
                                    dhanur hastaaya dheemahi
                                    tanno shukra prachodayaat

                                    ॐ रजदाभार् त्रवद्महे भृगुिुतार् धीमफह ।
                                    तडनः शुक्रः प्रिोदर्ात ् ॥
                                    Om Rajadaabhaay vidmahae
                                    Bhrugusutaay dheemahi
                                    tanno shukra prachodayaat

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20                                             मई 2012



शसन गार्िी मडि
ॐ काकध्वजार् त्रवद्महे खड्गहस्तार् धीमफह ।
तडनो मडदः प्रिोदर्ात ् ॥
Om kaakadhwajaaya vidmahae
khadga hastaaya dheemahi
tanno mandah: prachodayaat

ॐ शनैश्चरार् त्रवद्महे िूर्पुिार् धीमफह ।
                           ा
तडनो मडदः प्रिोदर्ात ् ॥
Om shanaishcharay vidmahae
suryaputraay dheemahi
tanno mandah: prachodayaat
                    राहु गार्िी मडि
                    ॐ नाकध्वजार् त्रवद्महे पद्महस्तार् धीमफह ।
                    तडनो राहुः प्रिोदर्ात ् ॥

                    Om naakadhwajaaya vidmahae
                    padma hastaaya dheemahi
                    tanno raahu: prachodayaat

कतु गार्िी मडि
 े
ॐ अश्वध्वजार् त्रवद्महे शूलहस्तार् धीमफह ।
तडनः कतुः प्रिोदर्ात ् ॥
       े
Om aswadhwajaaya vidmahae
soola hastaaya dheemahi
tanno ketu: prachodayaat

उपरोि मंिो का ग्रहो क अनुशार जाप करने िे ग्रहो की प्रसतकलता दर होकर अनुकलता प्राप्त होती हं ।
                     े                                  ू    ू          ू



                                                भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी
                            िुख-शास्डत-िमृत्रद्ध की प्रासप्त क सलर्े भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी :- स्जस्िे धन प्रसप्त, त्रववाह र्ोग,
                                                              े
                            व्र्ापार वृत्रद्ध, वशीकरण, कोटा किेरी क कार्ा, भूतप्रेत बाधा, मारण, ि्मोहन, तास्डिक
                                                                   े
                            बाधा, शिु भर्, िोर भर् जेिी अनेक परे शासनर्ो िे रक्षा होसत है और घर मे िुख िमृत्रद्ध
                            फक प्रासप्त होसत है , भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी मे लघु श्री र्ल, हस्तजोिी (हाथा जोिी), सिर्ार
                            सिडगी, त्रबस्ल्ल नाल, शंख, काली-िर्द-लाल गुंजा, इडद्र जाल, मार् जाल, पाताल तुमिी
                                                              े
                            जेिी अनेक दलभ िामग्री होती है ।
                                       ु ा
                                                                              मूल्र्:- Rs. 910 िे Rs. 8200 तक उप्लब्द्ध .
                                    गुरुत्व कार्ाालर् िंपक : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785
                                                          ा
                                                                  c
21                                     मई 2012




                                             दे वी गार्िी का िरल पूजन
                                                                                     स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, त्रवजर् ठाकुर
         अत्र्ंत िरल और असधक प्रभावी दै सनक गार्िी                       िाधक को अपने अनुष्ठा को िंपडन करने हे तु एक
उपािना भि क सलए आिानी की जा िकती हं ।
           े                                                      उपर्ुि जगह का िर्न करना िाफहए, जहाँ वहँ              फकिी
मानसिक रूप िे माँ गार्िी क भि फकिी भी पररस्स्थसत
                          े                                       त्रवघ्न-बाधा र्ा त्रवलंब क एक सनधााररत िमर् पर
                                                                                            े
मं फकिी भी िमर् पर आराधना कर िकते हं ।                            उपािना कर िकता हं। आम तौर पर एक अलग कमरे
         गार्िी उपािना जीवन क हर स्स्थसत मं भि क
                             े                  े                 र्ा घर मं एक कमरे क एक शांत कोने मं इि प्रर्ोजन
                                                                                     े
सलए सनस्श्चत रूप िे फार्दे मंद होती हं । लेफकन र्हाँ िबिे         क सलए उपर्ुि है . र्ा, भि दै सनक िाधना हे तु ऐिे
                                                                   े
महत्वपूणा हं , पूणा श्रद्धा एवं भत्रि भाव िे, आध्र्ास्त्मकता      स्थान का िर्न कर िकते हं , स्जि स्थान पर असधक
िे सनर्समत रूप िे दे वी आराधना करने िे असधक                       शांसत, एकांत और पत्रविता हो, जैिे फकिी मंफदर, नदी के
लाभप्रद होती हं ।                                                            फकनारे , खुले मैदान का िर्न भी िंभवत कर
         भि फकिी भी आध्र्ास्त्मक                                                  िकते हं . भिको अपने पूजा क स्थान
                                                                                                            े
िाधना र्ा कार्ा करते हं , र्फद वहँ                                                   को अवश्र् िाफ रखा जाना िाफहए।
पूणा    एकाग्रता      और        सनर्समत                                                         िाकार उपािना को करने
िमर् िे िंपाफदत फकर्ा जार्े                                                               हे तु भि को गार्िी माता की
तो वहँ असधक प्रभावशाली होता                                                                तस्वीर र्ा मूसता को एक छोटी
हं ।                                                                                       िी    लकिी     की    िौकी    पर
         दे वी गार्िी की दै सनक                                                             स्थात्रपत करना िाफहए और
पूजा क िाथ जुिे अनुष्ठान को
      े                                                                                     सनर्समत रुप िे प्रसतफदन धूप,
करने क सलए वांसछत भि की
      े                                                                                     दीप (शुद्ध घी का), फल आफद
                                                                                                                ू
आध्र्ास्त्मक,       मानसिक       और                                                       िे पूजन करना िाफहए। सनराकार
भावनात्मक             स्स्थती         मं                                                उपािना क फकिी भी तस्वीर र्ा
                                                                                                े
आश्चर्ाजनक रुप िे त्रवशेष बदलाव                                                       मूसता नहीं की आवश्र्कता हं , र्हाँ
दे खने को समलते हं । र्हँ अत्र्ंत िरल                                            मूसता क रुप मं, उगते िूरज र्ा कछ
                                                                                        े                       ु
त्रवसध हं जो हर एक क सलऐ उपर्ोगी हो िकती
                    े                                                   िूक्ष्म अवधारणा पर ध्र्ान कस्डद्रत कर िाधना
                                                                                                   े
हं । इि पूजा त्रवधान र्ा अनुष्ठान को मानव स्वर्ं की               की जाती हं ।
िच्िी आध्र्ास्त्मकता की गहराई को िमझ िक इि
                                       े                                 प्रातःकाल सनर्समत उपािना सलए िबिे अच्छा
उद्दे श्र् िे फदगई हं ।                                           िमर् हं । दै सनक अनुष्ठान को प्रसतफदन स्नानादी िे सनवृत्त
दै सनक अनुष्ठान िे जुिे महत्वपूणा और लाभप्रद पद्धसत               र्ा स्वच्छ हो ही शुरु करनी िाफहए। बीमारी र्ा मौिम
दशाार्ी गर्ी हं ।                                                 की खराबी जैिे मामलं मं शरीर की िफाई क सलए हाथ
                                                                                                       े
िाधक      अपनी      आवश्र्कता       के     अनुिार   िाकार   और    पैर धोकर र्ा सगले कपिे ़ िे शरीर की पौछाई कर िाधना
सनराकर दोनो रुप मं गार्िी की पूजा पत्रद्धती का िर्न               िंपडन फक जा िकती हं ।
अपनी इच्छा पूसता क सलर्े कर िकते हं ।
                  े
22                                              मई 2012



       पंिकमा क रूप मं नीिे वस्णात िंध्र्ा जप और
               े                                          मंि:
ध्र्ान त्रवसध िे पहले अंतरमन िे दै सनक उपािना करनी                 ॐ अपत्रविः पत्रविो वा, िवाावस्थांगतोऽत्रप वा।
िाफहए। र्ािा और इिी तरह अपररहार्ा पररस्स्थसतर्ं मं                  र्ः स्मरे त्पुण्िरीकाक्षं ि बाह्याभ्र्डतरः शुसिः॥
त्रवशेष अविर आफद पर अनुष्ठान को रोका जा िकता हं                   ॐ पुनातु पुण्िरीकाक्षः पुनातु पुण्िरीकाक्षः पुनातु।
एिी स्स्थती मं दै सनक उपािना जप और ध्र्ान क द्वारा
                                           े
भी िंपडन फकर्ा जा िकता हं ।                                          मंि उच्िारण क िमर् ऐिा भाव रखं की इि
                                                                                  े
दै सनक उपािना क िाथ पंि कमा िंध्र्ा:
               े                                          मंि क उच्िारण िे असभमस्डित जल आपक शरीर की
                                                               े                           े
       एक श्वेत ऊनी आिन र्ा कश क आिन पर
                             ु  े                         बाह्य और आंतररक शुत्रद्ध कर रहा हं ।
आरामदार्क मुद्रा मं बैठ कर। (अथाात आरामदार्क              आिमन:
स्स्थसत मं बैठ, अपने पाि ताँबं का कलश र्ा सगलाि मं                   वाणी, मन व अंतःकरण की शुत्रद्ध क सलए ि्मि
                                                                                                     े
पानी भरकर रखलं। दे वी क दाफहनी और एक शुद्ध घी का
                       े                                  िे तीन बार जल का आिमन करं । हर मंि क उच्िारण
                                                                                              े
दीपक और अगरबत्ती जलाऐ। मंि जप क सलए तुलिी की
                               े                          की िमासप्त क िाथ एक आिमन फकर्ा जाना िाफहए।
                                                                      े
माला, फक्रस्टल र्ा िंदन, मोती की माला का प्रर्ोग करं ।    मंि:
उपािना प्रफक्रर्ा क िार भाग
                   े                                                       ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
                                                                            ॐ अमृतात्रपधानमसि स्वाहा ।
(1) पंि कमा की शुत्रद्ध;
                                                                     ॐ ित्र्ं र्शः श्रीमासर् श्रीः श्रर्तां स्वाहा ।
(2) दे व आह्वान
(3) जप और ध्र्ान                                          सशखा स्पशा एवं वंदन:
                                                                     सशखा क स्थान को स्पशा करते हुए ऐिी भावना
                                                                           े
(4) िूर्ााघ्र्ादान
                                                          रखं फक गार्िी क इि प्रतीक क माध्र्म िे िदा िद्
                                                                         े           े
     जप और ध्र्ान को छोिकर प्रत्र्ेक पूजा त्रवसध को       त्रविार ही र्हाँ स्थात्रपत रहं गे। सन्न मंि का उच्िारण
2 िे 5 समनट मं िंपडन फकर्ा जा िकता हं । जप और             करं ।
ध्र्ान को कम िे कम 15 समनट क सलए फकर्ा जाना
                            े
िाफहए, िाधक अपनी िुत्रवधा क अनुिार मंि जप और
                           े                              मंि:
ध्र्ान की लंबी अवसध भी िुन िकते हं ।                               ॐ सिद्रत्रपस्ण महामार्े, फदव्र्तेजः िमस्डवते ।
                                                                          ू
                                                                     सतष्ठ दे त्रव सशखामध्र्े, तेजोवृत्रद्धं करुष्व मे॥
                                                                                                              ु
पंिकमा िंध्र्ा:
       सन्नसलस्खत पांि पूजा पद्धसत शरीर और मन को          प्राणार्ाम:
पत्रवि बनाने क सलए और प्राण क प्रवाह क िामंजस्र्
              े              े        े                              श्वाि को धीमी गसत िे सभतर खींिकर रोकना व

िफक्रर्ण क सलए होती हं ।
          े                                               बाहर सनकालना र्हँ प्राणार्ाम का एक फहस्िा हं । श्वाि
                                                          सभतर खींिने क िाथ भावना करं फक प्राण शत्रि, श्रेष्ठता
                                                                       े
पत्रविीकरण:                                               श्वाि क द्वारा अंदर खींिी आ रही है , छोिते िमर् र्ह
                                                                 े
       बाएँ हाथ मं जल लेकर उिे दाफहने हाथ िे ढँ क         भावना करं फक आपक िभी दगुण, दष्प्रवृत्रत्तर्ाँ, बुरे
                                                                          े     ु ा   ु
लं और पत्रविीकरण मंिोच्िारण क बाद जल को सिर
                             े                            त्रविार प्रश्वाि क माध्र्म िे उिक िाथ ही बाहर सनकल
                                                                            े              े
तथा शरीर पर सछिक लं।                                      रहे हं । प्राणार्ाम इि मंि क उच्िारण क िाथ करं ।
                                                                                      े         े
23                                             मई 2012



मंि:                                                        बढे ़ हं । हमारे जीवन का उनकी िहार्ता र्ा आश्रर् के
             ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः,                     त्रबना कोई अस्स्तत्व हं । र्ह हमारी मातृभूसम हमारे सलर्े
               ॐ जनः ॐ तपः ॐ ित्र्म ् ।                     दे वता की तरह हं ।
           ॐ तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह
                        ा                                             इि सलए पृथ्वी, मातृभूसम की उपािना इष्ट र्ा दे व
                 सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् ।                उपािना िे पहले की जाती हं । पृथ्वी का आभार प्रकट
        ॐ आपोज्र्ोतीरिोऽमृत, ब्रह्म भूभवः स्वः ॐ ।
                           ं           ुा                   करने क रूप मं की जाती हं ।
                                                                  े
                                                            सन्नसलस्खत मंि का जप करक एक ि्मि पानी को
                                                                                    े

डर्ाि:                                                      पृथ्वी को अपाण करं और फल आफद िे त्रवसध-वत पूजन
                                                                                   ू
                                                            करं ।
         डर्ाि का मुख्र् प्रर्ोजन हं , की वहँ शरीर के
                                                                      पूजन हमं िहनशीलता, उदारता, और पृथ्वी की
िभी महत्त्वपूणा अंगं मं पत्रविता का िमावेश हो तथा
                                                            तरह धैर्ा क िाथ िंपडन करना िाफहए। अपने दोनं हाथ
                                                                       े
अंतःकरण की िेतना जाग्रत हो जार्े ताफक दे व-पूजन
                                                            को नमस्कार मुद्रा मं करक सन्नसलस्खत मंि जपे
                                                                                    े
जैिा श्रेष्ठ कृ त्र् फकर्ा जा िक। बाएँ हाथ की हथेली मं
                                े
जल लेकर दाफहने हाथ की पाँिं उँ गसलर्ं को उनमं
सभगोकर बताए गए स्थान को मंिोच्िार क िाथ स्पशा
                                   े                        मंि:
करं ।                                                             ॐ पृथ्वी त्वर्ा धृता लोका दे वी त्वं त्रवष्णुना धृता।
                                                                      त्वं ि धारर् मां दे त्रव पत्रविं करु िािनम ्॥
                                                                                                        ु
मंि:
ॐ वाङ् मे आस्र्ेऽस्तु । (मुख को स्पशा करं )
                                                            गार्िी का आह्वान:
ॐ निोमे प्राणोऽस्तु। (नासिकाक दोनं सछद्रं को स्पशा करं )
                             े
                                                                      आफद शत्रि गार्िी खाआ आह्वान तो आंतररक
ॐ अक्ष्णोमे िक्षुरस्तु । (दोनं नेिं को स्पशा करं )
                                                            (अंतरमन की गहराई िे) िे फकर्ा जाता हं । गार्िी की
ॐ कणार्ोमे श्रोिमस्तु । (दोनं कानं को स्पशा करं )
                                                            फदव्र् शत्रि हमारे भीतर हमारी अंतरिेतना मं जाग्रत हो
ॐ बाह्वोमे बलमस्तु । (दोनं भुजाओं को स्पशा करं )
                                                            िक इि सलए सन्न मंि क माध्र्म िे प्राथाना हं ।
                                                              े                 े
ॐ ऊवोमे ओजोऽस्तु । (दोनं जंघाओं को स्पशा करं )
ॐ अररष्टासन मेऽङ्गासन, तनूस्तडवा मे िह िडतु ।
                                                                       ॐ आर्ातु वरदे दे त्रव त्र्र्क्षरे ब्रह्मवाफदसन।
(िमस्त शरीर का स्पशा करं )
                                                                     गार्त्रिच्छडदिां मातः। ब्रह्मर्ोने नमोऽस्तु ते॥
         आत्मशोधन की ब्रह्म िंध्र्ा क उपरोि पाँिं
                                     े                              ॐ श्री गार्त्र्र्ै नमः। आवाहर्ासम, स्थापर्ासम,
फक्रर्ाओं का भाव र्ह है फक िाधक मं पत्रविता एवं                            ध्र्ार्ासम, ततो नमस्कारं करोसम।
प्रखरता की वृत्रद्ध हो तथा मसलनता-अवांछनीर् गुणो की
सनवृत्रत्त हो । पत्रवि-प्रखर व्र्त्रि ही भगवान की कृ पा     गुरु पूजन:
प्रासप्त क असधकारी होते हं ।
          े                                                           गुरु परमात्मा की फदव्र् िेतना का अंश होते है ,
                                                            जो िाधक को जीवन क त्रवसभडन क्षेि मं मागादशान करते
                                                                             े
दे वपूजन:                                                   हं । िद् गुरु क रूप मं अपने गुरुदे व का असभवंदन करते
                                                                           े
         दे व पूजन का पहला कदम पृथ्वी पूजन हं । हम          हुए     उपािना     की    िफलता        हे तु   गुरु   आवाहन    इि
पृथ्वी माता की गोद मं पैदा हुए और उिी क ऊपर पलं-
                                       े                    मंिोच्िारण क िाथ करं ।
                                                                        े
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          ॐ गुरुब्राह्मा गुरुत्रवाष्णुः, गुरुरे व महे श्वरः।               इि प्रकार मंि का उच्िारण करते हुए माला की
               गुरुरे व परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥          जार् एवं भावना की जार् फक मंि जप िे हम सनरडतर
              अखण्िमंिलाकारं , व्र्ाप्तं र्ेन िरािरम ्।         पत्रवि हो रहे हं । दबुत्रद्ध की जगह िद्बत्रद्ध का िंिार हो
                                                                                    ु ा                 ु
          तत्पदं दसशातं र्ेन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥              रहा हं ।
  ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहर्ासम, स्थापर्ासम, ध्र्ार्ासम।                      मन को ध्र्ान मं कस्डद्रत करना होता हं । िाकार
                                                                                            े
                                                                ध्र्ान मं गार्िी माता क फदव्र् रुप की कल्पना कर क
                                                                                       े                         े
जप और ध्र्ान:                                                   उनकी छार्ा मं बैठ कर उनका स्नेह भरा प्र्ार अनवरत
         जप का िामाडर् अथा हं फकिी मडि र्ा शब्दं को             रूप िे प्राप्त होने की भावना करनी िाफहए। सनराकार
िक्रीर् गसत िे ितत मनन करना र्ा सिंतन करना होता                 ध्र्ान मं गार्िी की ित्रवता की प्रभातकालीन स्वस्णाम
हं । सनस्श्चत मडिं का लर् बद्ध रुप िे उच्िारण करना              फकरणं को शरीर पर बरिने व शरीर मं श्रद्धा-प्रज्ञा-सनष्ठा
जप कहा जाता हं । जप क कई प्रकार प्रािीन शास्त्रं मं
                     े                                          रूपी अनुदान उतरने की भावना करनी िाफहए। जप और
वस्णात हं ।                                                     ध्र्ान क िमडवर् िे ही सित्त एकाग्र होता है और
                                                                        े
         लेफकन दै सनक उपािना पद्धसत मं उपांशु जप                आत्मित्ता पर उि फक्रर्ा का महत्त्वपूणा प्रभाव भी पिता
असधक उपर्ुि हं । क्र्ोफक उपांशु जप मं जप करते िमर्              है ।
मडि को स्वर्ं िाधक क असतररि अडर् फकिी क कानं
                    े                  े
तक िुनाई नहीं दे ते इि सलए जप उपांशु दै सनक उपािना              िूर्ााघ्र्ादान:
सलए िबिे उपर्ुि हं ।                                            त्रविजान जप िमासप्त क पश्चात पूजा वेदी पर रखे ताँबं क
                                                                                     े                               े
         उपांशु जप दिरं को परे शान करने िे बिाता है
                    ू                                           कलश का जल िूर्ा की फदशा मं अध्र्ा क रूप मं सन्न
                                                                                                   े
और र्ह िाधक की मानसिक एकाग्रताको बढा़ता हं ।                    मंि क उच्िारण क िाथ िढ़ाना िाफहए।
                                                                     े         े
दै सनक उपािना दौरान कम िे कम तीन माला (324
बार) गार्िी मंि क जप करना िाफहए।
                 े                                                         ॐ िूर्देव! िहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते ।
                                                                                 ा
         र्फद िंभव हो तो जप की िंख्र्ा को बढ़ा िकते                        अनुक्पर् मां भक्त्र्ा गृहाणाघ्र्ं फदवाकर॥
है , आमतौर पर अनुभवी िाधक ग्र्ारह माला तक जप                           ॐ िूर्ाार् नमः। आफदत्र्ार् नमः। भास्करार् नमः॥
करते हं । जप की िंख्र्ा और िमर् मं सनर्समतता
(सनस्श्चत िंख्र्ा और गसत) हर फदन िमान रखना                                 जल िढा़ते िमर् र्हँ भावना करं फक जल आत्म
िाफहए।                                                          ित्ता का प्रतीक है एवं िूर्ा त्रवराट् ब्रह्म का तथा हमारी
         जप एक प्रकार िे िफाई और तेज़ करने की एक                 ित्ता ि्पदा िमत्रष्ट क सलए िमत्रपात र्ा त्रविस्जात हो
                                                                                      े
प्रफक्रर्ा हं । मंि क जप क द्वारा िक्रीर् दबाव और
                     े    े                                     रही हं ।
िंघषाण िे प्रेररत हो कर मन की िफाई और आंतररक                               उि त्रवसध-त्रवधान िंपडन होने क पश्चर्ात पूजा
                                                                                                         े
प्ररणा तेज हो जाती हं ।                                         स्थल पर दे वताओं को करबद्ध नतमस्तक होकर नमस्कार
                                                                करक िभी वस्तुओं को एकि करक र्थास्थान रख दे नी
                                                                   े                      े
    ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह
         ुा                 ा
                                                                िाफहए। िाधक िूर्ोदर् िे दो घण्टे पूवा िे िूर्ाास्त के
                     सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् ।
                                                                एक घंटे बाद तक कभी भी गार्िी उपािना कर िकते
                                                                हं ।
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                                          गार्िी स्तोि व माहात््र्
                                                                                                       स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
ॐ भूभुवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् ।
      ा                  ा

भावाथा: प्राणस्वरूप, दःखनाशक, िुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, दे वस्वरूप अशा परमात््र्ाला आ्ही अंतःकरणात
                      ु
धारण करतो. त्र्ा परमात््र्ा किू न आमिी बुद्धी िडमागी लागो

ॐ गार्िीदे व्र्ै नमः॥ ॐ नमो श्रीगजवदना॥           गणरार्ा गौरीनंदना । त्रवडघेशा भवभर्हरणा । नमन माझे िाष्टांगीं ॥१॥
नंतर नसमली श्रीिरस्वती । जगडमाता भगवती । ब्रह्माकमारी वीणावती । त्रवद्यादािी त्रवश्र्वािी ॥२॥
                                                 ु
नमन तैिं गुरुवर्ाा । िुखसनधान िद्गुरुरार्ा । स्मरुनी त्र्ा पत्रवि पार्ां । सित्तशुत्रद्ध जाहली ॥३॥
थोर ऋत्रषमुनी िंतजन । बुधगण आस्ण िज्जन । करुनी तर्ांिी नमन । ग्रंथरिना आरं सभली ॥४॥
एकदां घिली ऐिी घटना । नारद भेटले िनकमुनींना । वंदन भावं करुसन तर्ांना । ्हणाले त्रवनंती माझी ऎकावी ॥५॥
जपािाठीं अिती मंि हजार । त्र्ांत अत्र्ंत प्रभावी थोर । ज्र्ािं िामथ्र्ा अपरं पार । ऐिा मंि कोणता ॥६॥
तेव्हा ्हणाले िनकमुनी । नारदा तुझा प्रश्र्न ऎकोनी। िमाधान झालं माझ्र्ा मनीं । लोकोपर्ोगी प्रश्र्न हा ॥७॥
आतां ऎक लक्ष दे ऊन । त्वररत फलदार्ी मंिज्ञान । िफल होतील हे तु पूणा । ऐिा एकि मंि गार्िी ॥८॥
गार्िी ही मंिदे वता । िवाश्रष्ठा सतिी र्ोग्र्ता । सतंिे एकक अक्षर जपतां । आत्मतेज प्रगटतं ॥९॥
                            े                             े
गार्िीमंिािं प्रत्र्ेक अक्षर । प्रभाव पािी िवा गािांवार । दे हाच्र्ा एकका अवर्वावर । प्रत्र्क्ष पररणाम घितिे ॥१०॥
                                                                       े
गार्िीिी नांवं अनेक अिती । त्र्ांत अिते फदव्र् शत्रि । एकका नामोच्िारानं ती । शरररीं प्रगट होतिे ॥११॥
                                                         े
करीत अितां नामोच्िार । मनीं आणावा सतिा आकार । भत्रिपुवक करुनी नमस्कार । नामजप करावा तो ॥१२॥
                                                      ा
ॐ काररुपा ब्रह्मात्रवद्या ब्रह्मादे वता । ित्रविी िरस्वती वेदमाता । अमृतेश्र्वरी रुद्राणी त्रवक्रमदे वता । ॐ गार्िीं नमो नमः
॥१३॥
वैष्णवी वेदगभाा त्रवद्यादासर्का । शारदा त्रवश्र्वभोक्िी िंध्र्ास्त्मका । िुर्ाा , िंद्रा, ब्रह्माशीषाका । ॐ गार्िीं नमो नमः
॥१४॥

नारसिंही अघनासशनी इं द्राणी । अंत्रबका पद्माक्षी रुद्ररुत्रपणी । िांख्र्ार्नी िुरत्रप्रर्ा ब्रह्माणी । ॐ गार्िीं नमो नमः
॥१५॥
गार्िी तूं ब्रह्मांिघाररणी । गार्िी तूं ब्रह्मावाफदनी । गार्िी तूं त्रवश्र्वव्र्ात्रपनी । ॐ गार्िीं नमो नमः ॥१६॥
ॐ भू: ऋग्वेदपुरुषं । ॐ भुव: र्जुवदपुरुषं । ॐ स्व: िामवेदपुरुषं । ॐ मह: अथवाणवेदपुरुषं तपर्ाासम ॥१७॥
                                 े
ॐ जन: इसतहािपुराणपुरुषं । ॐ तप: िवांगपुरुषं । ॐ ित्र्ं ित्र्लोकपुरुषं । त्वं ब्रह्माशापाफद्वमुिा भव ॥१८॥
ॐ भू: भुलोकपुरुषं । ॐ भुव: भुवलोकपुरुषं । ॐ स्व: स्वलोकपुरुषं । त्वं वसिष्ठशापाफद्वमुिा भव ॥१९॥
ॐ भू एकपदा गार्िीं । ॐ भुव: फद्वपदां गार्िीं । ॐ स्व: त्रिपदां गासर्िीं । ॐ भूभुवा स्व: ितुष्पदां गासर्िीं ॥२०॥
ॐ उषिीं तपार्ासम । ॐ गार्िीं तपार्ासम । ॐ िात्रविीं तपार्ासम । तपार्ासम ॐ िरस्वतीं ॥२१॥
ॐ वेदमातरं तपार्ासम । ॐ पृथ्वीं तपार्ासम । ॐ अजां तपार्ासमअ । तपार्ासम ॐ कौसशकीं ॥२२॥
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ॐ िांकृसतं तपार्ासम । ॐ िवास्जनां तपार्ासम । ॐ गार्िीिर् तपार्ासम । त्व त्रवश्र्वासमिशापाफद्वमुिा भव ॥२३॥
गार्िीदे वी प्रात:काळीं । ऋग्वेदरुपा बासलका झाली ब्रह्मादे वािी शत्रि एकवटली । अपूवा तेजं प्रकाशे ॥२४॥
हातीं कलश अक्षमाला । स्त्रकस्त्रुवा धारण कला । मुखतेज लाजवी रत्रवंिद्राला । हं िारुढ अिते ती ॥२५॥
                           ू              े
कठी रडतालंकार झगमगती । मास्णत्रबंबांिी शोभा अपूवा ती । जी दे तिे धनिंपत्ती । ध्र्ान सतिं करावं ॥२६॥
 ं
िात्रविी नांव मध्र्ाडहकाळीं । तीि रुद्राणी शत्रि बनली । त्रिनेिा नवर्ौवना फदिली । व्र्ाघ्रांबर धाररणी ॥२७॥
हातीं खट्वांग, त्रिशुळ,रुद्राक्षमाला । अभर् मुद्रा मुगुटी िंद्रा शोभला । वृषभवाहन गौरवणा भला । र्जुवदस्वरुपा जी
                                                                                                    े
॥२८॥
आर्ुष्र् आस्ण ऎश्र्वर्ावद्धी । दे तिे िकल महासिद्धी । वाढवी िद्भावना िद्बुद्धी । िाह्य करी ती िवांिी ॥२९॥
                        ृ
िार्ंकाळी तीि त्रवष्णुशत्रि । पीतांबरधारी भगवती िरस्वती । श्र्ामलवणं गरुिारुढ ती । रत्नहार कठीं शोभती ॥३०॥
                                                                                            ं
बाजुबंद, रत्नखसित नुपुर । िुवणाककणं िौभाग्र्लंकार । शंख , िक्र, गदा पद्ममर् कर । श्रीवृद्धीकारक ती िवादा ॥३१॥
                                ं
ब्राह्मामुहूतं उठावं । बाह्माभ्र्ंतर शुसिभुत व्हावं । श्रीगार्िीिं ध्र्ान करावं । स्वस्थ एकाग्र सिंत्तानं ॥३२॥
                                           ा
प्रथम करावा करडर्ाि । नंतर करावा अंगडर्ाि । मग पुणा प्राणार्ामाि । प्रारं भ नीट करावा ॥३३॥
पूरकीं करणं त्रवष्णुस्मरण । कभकीं करावं ब्रह्मास्मरण । रे िकीं करावं सशवध्र्ान । प्राणार्न र्ा नांव अिे ॥३४॥
                             ुं
गार्िी जप करावा हजारदां । फकवा करावा शंभरदां । कमीतकमी तरी दहादां । महामंिजप करावा ॥३५॥
                            ं
गार्िीमंिािा जे जप कररती । तर्ा िारी पुरुषाथा िाध्र् होती । िवंश्र्वर्ा कीती िंपत्ती । आस्ण सित्रद्ध लाभती ॥३६॥
ज्र्ोसतमार् फदव्र् रूत्रपणी । मंदमतीिी कररते महाज्ञानी । बल,र्श,आर्ुरारोग्र् दे ऊनी । पराक्रम जगीं गाजवी ॥३७॥
गार्िी मंिातील महाशिी । व्र्ि होते अव्र्िीं । अपूवा लाभते मन:शांसत । पुणा िमाधानी होतेिे ॥३८॥
्हणुन हं दे वषं नारदा । गार्िी उपािना करावी िदा । समळे ल आत्मज्ञानिंपदा । ित्र् ित्र् वािा ही ॥३९॥
गार्िीहृदर् गार्िीतपाण । गार्िीकवि गार्िीध्र्ान । िवा पूजात्रवधी त्रविजान । नारदािी उपदे सशलं ॥४०॥
मग नारद िंतुष्ट होऊन । िनकमुनींना करुनी वंदन । आपुल्र्ा कार्ाािी गेले सनघून । जर्जर्कार करीत गार्िीिा
॥४१॥
राजकारणी, िमाजकारणी । िाफहस्त्र्कांनी त्रवद्याथ्र्ांनी । िवा स्थरातील गृहस्थानीं । गार्िीमंि जपावा ॥४२॥
स्तोि-माहात््र् गार्िीिं । रुप पालटील आर्ुष्र्ािं । महत्व पटे ल माझ्र्ा शब्दांिे । अनुभवानंि िवांना ॥४३॥
गार्िीिी र्थाथा स्तुसत । तशीि सतिी अपूवा महती । ऎका आतां र्ापुढतीं । त्रवनती समसलंदमाधव ॥४४॥
गार्िी अिे परम पुसनता । तींता वितीए शास्त्रं , श्रुसत, गीता । ित्वगुणी, सितरुपा,शाश्र्वता । िनातन, सनत्र्, ित्िुधा
॥४५॥
मंगलकरक जगज्जननी । िुखघाम, स्वघा, गार्िीभवानी । िात्रविी,स्वाहा,अपूवकरणी । मंि िौवीि अक्षरी ॥४६॥
                                                                    ा
ह्रीं , श्रीं, क्लीं, मेघा उदं ि । जीवनज्र्ोती महाप्रिंि । शांसत, क्रांसत , जागृसत, अखंि । प्रगसत, कल्पनाशत्रि ती ॥४७॥
हं िारुढ फदव्र् वस्त्रघारी । िूवणाकांती गगनात्रवहारी । कमल,कमंिलु,माला करीं । गौर तनु शोभते ॥४८॥
स्मरणं मन प्रिडन होतं । द:ख िरतं िुख उपजतं । कल्पतरुिम इस्च्छत दे ते । सनराकार सनगुणा ॥४९॥
                         ु                                                         ा
गार्िी तुझी अद्भुत मार्ा । िुरतरुिम शीतल छार्ा । भिांिे िंकट हरार्ा । िदा सिद्ध अििी तूं ॥५०॥
तूं काली लक्ष्मी िरस्वती । वेदमाता ब्रह्माणी पावाती । तुजिम अडर् निे त्रिजगतीं । कल्र्ाणकारी दे वता ॥५१॥
जर्जर् त्रिपदा भवभर्हारी । ब्रह्मा त्रवष्णु सशव तुझे पुजारी । अपार शत्रििी तुं त्रिरुपधारी । तेजोमर् माता तूं ॥५२॥
ब्रह्मांिा , िंद्रिुर्ांना । नक्षिािीं , िकल ग्रहांना । तुि दे िी गसत प्रेरणा । उप्तादक ,पालक , नाशक तूं ॥५३॥
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होते तव कृ पा जर्ांवरी । तो जरी अिला पापी भारी । तर्ाच्र्ा पापाराशी दरी । कररिी तूं क्षणांत ॥५४॥
                                                                     ु
सनबुद्ध होई बुत्रद्धवंत । शत्रिहीन होई बलवंत । रोगी होतो व्र्ाधीमुि । दररद्र द:ख न राही ॥५५॥
    ा                                                                         ु
जप कररतां गार्िीिा । लेश न राही गृहक्लेशािा । सित्तातील सिंताग्नीिा । र्हाि होई झिकरी ॥५६॥
                                    ु
अपत्र्हीनािी अपत्र्प्रात्पी । िुखच्छिी त्रवपुल िंपत्ती । िघवा अखंि िौभाग्र्वती । होती गार्िीकृ पेनं ॥५७॥
ित्र् व्रतस्थ पसतरफहता । सतजला लाभे त्रवरिता । जडमािी होते िाथाकता । मोक्षलाभ होतिे ॥५८॥
            ू ु
त्रववाहे च्छ कमाररकानीं । त्रपठाच्र्ा पांि पणत्र्ा पेटवुनी । बिावं पूवकिे पुढा करुनी । िौवीि फदवि प्रभातीं ॥५९॥
                                                                      े
मनकामना पूणा होऊनी । मना. िारखं र्ेईल घिु नी । गार्िीवरी श्रद्धा ठे वुनी । रोज ही पोथी वािावी ॥६०॥
गार्िीस्तोि हं गोि । माहात््र्ही अतीव गाढ । वाितां ऎकतां प्रिंि । प्रभाव फदिुनी र्ेतिे ॥६१॥
िौवीि वेळीं करावं वािन श्रवण । िौवीि वेळां करावं मंिपठण । िौवीि जडमींिं होतं पापक्षालन । महत्व ऐ र्ा
पोथीिं ॥६२॥
िौवीि वेळां कररतां पारार्ण । गार्िीदे वी होईल िुप्रिडन । बोलवुनी िुवासिनी तीन । एक एक पोथी द्यावी ही ॥६३॥
प्रत्र्ेक िौवीि फदविांनी । अशाि पुजाव्र्ा तीन िुवासिनी । प्रत्र्ेकीि एक एक पोथी दे ऊनी । नमस्कार करावा ॥६४॥
दे व आहे तिं दै वही अितं । पूवजडमींिं त्र्ांत रहस्र् अितं । हं न जाणतां मोठे जाणते । सनरा शेनं दे वभिी िोफिती
                              ा
॥६५॥
काळ तेर्ां थोिा कठीण । दे व न र्ेई लगेि घावून । ्हणुनी दे वािी दोष दे ऊन । श्रद्धा िोिू ं नर्े कधीं ॥६६॥
गार्िीिी अट्टश्र् शिी । प्रारब्धािी असनष्ट गती । फफरवी तिाळ ित्र् ती । त्रवश्र्वाि ऎिा धरावा ॥६७॥
र्ोग्र् काळ आल्र्ावीण । कोणतंि कार्ा न घिे जाण । ्हणुनी हातपार् गाळु न । स्वस्थ कधीम न बैिावं ॥६८॥
स्तोि-माहात््र् हं वािावं । िाधुिंतांिं विन ध्र्ानीं घ्र्ावं । स्वत:ि स्वत:ला पारखावं । शुद्ध ज्ञानप्रकाशीं ॥६९॥
आत्माज्ञान नव्हे पोरखेळ । स्वत:ला पारखावं । र्ावी लागते र्ोग्र् वेळ । उगीि होऊनी उतावीळ । दे वािी नि सनंदावं
॥७०॥
मी तर एक मानव िामाडर् । गुरुकृ पेनं झालं धडर् धडर् । त्र्ाच्र्ाि प्रेरणेनं िुिलं ज्ञान । पोथीरूपं प्रगटलं तं ॥७१॥
कांहीं दोष गेला अिेल राहून । तरी िज्जनांनी करावं थोर मन । क्षमा करावी कृ पा करुनी । ्हणे समसलंदमाधव ॥७२॥
शक अठराशे अठ्र्ाण्णव वषं पौष कृ ष्णप्रसतपदा फदवशीं । गुरुपुष्र्ामृत र्ोगािी । पोथी पूणा झाली ही ॥७३॥
  े

॥ ॐ तत ् ित ् ब्रह्मापाणमस्तु ॥शुभं भवतु ॥ ॐ शांसत: शांसत: शांसतः॥
॥ ॐ भूभूव: स्व: तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भंगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो न: प्रिोदर्ात ् ॥
        ा                  ा
॥ समसलंद माधवकृ त 'गार्िी स्तोि-महात््र् िंपूणा ॥



                                                     मंि सिद्ध मूंगा गणेश
                 मूंगा गणेश को त्रवध्नेश्वर और सित्रद्ध त्रवनार्क क रूप मं जाना जाता हं । इि क पूजन िे जीवन मं िुख
                                                                   े                          े
                 िौभाग्र् मं वृत्रद्ध होती हं ।रि िंिार को िंतुसलत करता हं । मस्स्तष्क को तीव्रता प्रदान कर व्र्त्रि को ितुर
                 बनाता हं । बार-बार होने वाले गभापात िे बिाव होता हं । मूंगा गणेश िे बुखार, नपुंिकता , िस्डनपात और िेिक
                 जेिे रोग मं लाभ प्राप्त होता हं ।                               मूल्र् Rs: 550 िे Rs: 10900 तक
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                                       िवा कार्ा सित्रद्ध कवि
स्जि व्र्त्रि को लाख प्रर्त्न और पररश्रम करने क बादभी उिे मनोवांसछत िफलतार्े एवं फकर्े गर्े कार्ा
                                               े
मं सित्रद्ध (लाभ) प्राप्त नहीं होती, उि व्र्त्रि को िवा कार्ा सित्रद्ध कवि अवश्र् धारण करना िाफहर्े।

कवि क प्रमुख लाभ: िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क द्वारा िुख िमृत्रद्ध और नव ग्रहं क नकारात्मक प्रभाव को
     े                                    े                                  े
शांत कर धारण करता व्र्त्रि क जीवन िे िवा प्रकार क द:ख-दाररद्र का नाश हो कर िुख-िौभाग्र् एवं
                            े                    े ु
उडनसत प्रासप्त होकर जीवन मे िसभ प्रकार क शुभ कार्ा सिद्ध होते हं । स्जिे धारण करने िे व्र्त्रि र्फद
                                        े
व्र्विार् करता होतो कारोबार मे वृत्रद्ध होसत हं और र्फद नौकरी करता होतो उिमे उडनसत होती हं ।


    िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं िवाजन वशीकरण कवि क समले होने की वजह िे धारण करता
                             े                         े
      की बात का दिरे व्र्त्रिओ पर प्रभाव बना रहता हं ।
                 ू
    िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं अष्ट लक्ष्मी कवि क समले होने की वजह िे व्र्त्रि पर मां महा
                             े                         े
      िदा लक्ष्मी की कृ पा एवं आशीवााद बना रहता हं । स्जस्िे मां लक्ष्मी क अष्ट रुप (१)-आफद
                                                                          े
      लक्ष्मी, (२)-धाडर् लक्ष्मी, (३)-धैरीर् लक्ष्मी, (४)-गज लक्ष्मी, (५)-िंतान लक्ष्मी, (६)-त्रवजर्
      लक्ष्मी, (७)-त्रवद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन िभी रुपो का अशीवााद प्राप्त होता हं ।

    िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं तंि रक्षा कवि क समले होने की वजह िे तांत्रिक बाधाए दर
                             े                      े                                    ू
      होती हं , िाथ ही नकारत्मन शत्रिर्ो का कोइ कप्रभाव धारण कताा व्र्त्रि पर नहीं होता। इि
                                                 ु
      कवि क प्रभाव िे इषाा-द्वे ष रखने वाले व्र्त्रिओ द्वारा होने वाले दष्ट प्रभावो िे रक्षाहोती हं ।
           े                                                            ु
    िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं शिु त्रवजर् कवि क समले होने की वजह िे शिु िे िंबंसधत
                             े                        े
      िमस्त परे शासनओ िे स्वतः ही छटकारा समल जाता हं । कवि क प्रभाव िे शिु धारण कताा
                                   ु                        े
      व्र्त्रि का िाहकर कछ नही त्रबगि िकते।
                         ु

अडर् कवि क बारे मे असधक जानकारी क सलर्े कार्ाालर् मं िंपक करे :
          े                      े                       ा

फकिी व्र्त्रि त्रवशेष को िवा कार्ा सित्रद्ध कवि दे ने नही दे ना का अंसतम सनणार् हमारे पाि िुरस्क्षत हं ।

                                  GURUTVA KARYALAY
          92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
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                    (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
29                                        मई 2012




                                             अघनाशकगार्िीस्तोि
आफदशि जगडमातभािानुग्रहकाररस्ण । िवाि व्र्ात्रपकऽनडते श्रीिंध्र्े ते नमोऽस्तु ते ॥
     े                                         े
त्वमेव िंध्र्ा गार्िी िात्रवत्रि ि िरस्वती । ब्राह्मी ि वैष्णवी रौद्री रिा श्वेता सितेतरा ॥
प्रातबााला ि मध्र्ाह्ने र्ौवनस्था भवेत्पुनः । वृद्धा िार्ं भगवती सिडत्र्ते मुसनसभः िदा ॥
हं िस्था गरुिारूढा तथा वृषभवाफहनी । ऋग्वेदाध्र्ासर्नी भूमौ दृश्र्ते र्ा तपस्स्वसभः ॥
र्जुवदं पठडती ि अडतररक्षे त्रवराजते । िा िामगात्रप िवेषु भ्रा्र्माणा तथा भुत्रव ॥
     े
रुद्रलोक गता त्वं फह त्रवष्णुलोकसनवासिनी । त्वमेव ब्रह्मणो लोकऽमत्र्ाानुग्रहकाररणी ॥
        ं                                                     े
िप्तत्रषाप्रीसतजननी मार्ा बहुवरप्रदा । सशवर्ोः करनेिोत्था ह्यश्रुस्वेदिमुद्भवा ॥
आनडदजननी दगाा दशधा पररपठ्र्ते । वरे ण्र्ा वरदा िैव वररष्ठा वरस्व्णानी ॥
          ु
गररष्ठा ि वराही ि वरारोहा ि िप्तमी । नीलगंगा तथा िंध्र्ा िवादा भोगमोक्षदा ॥
भागीरथी मत्र्ालोक पाताले भोगवत्र्त्रप ॥ त्रिलोकवाफहनी दे वी स्थानिर्सनवासिनी ॥
                 े
भूलोकस्था त्वमेवासि धररिी शोकधाररणी । भुवो लोक वार्ुशत्रिः स्वलोक तेजिां सनसधः ॥
                                              े                  े
महलोक महासित्रद्धजानलोक जनेत्र्त्रप । तपस्स्वनी तपोलोक ित्र्लोक तु ित्र्वाक् ॥
     े                 े                              े        े
कमला त्रवष्णुलोक ि गार्िी ब्रह्मलोकगा । रुद्रलोक स्स्थता गौरी हराधांगीसनवासिनी ॥
                े                               े
अहमो महतश्चैव प्रकृ सतस्त्वं फह गीर्िे । िा्र्ावस्थास्त्मका त्वं फह शबलब्रह्मरूत्रपणी ॥
ततः परापरा शत्रिः परमा त्वं फह गीर्िे । इच्छाशत्रिः फक्रर्ाशत्रिज्ञाानशत्रिस्स्त्रशत्रिदा ॥
गंगा ि र्मुना िैव त्रवपाशा ि िरस्वती । िरर्ूदेत्रवका सिडधुनमदेरावती तथा ॥
                                                           ा ा
गोदावरी शतद्रश्च कावेरी दे वलोकगा । कौसशकी िडद्रभागा ि त्रवतस्ता ि िरस्वती ॥
             ु
गण्िकी तात्रपनी तोर्ा गोमती वेिवत्र्त्रप । इिा ि त्रपंगला िैव िुषु्णा ि तृतीर्का ॥
गांधारी हस्स्तस्जह्वा ि पूषापूषा तथैव ि । अल्बुषा कहूश्चैव शंस्खनी प्राणवाफहनी ॥
                                                   ु
नािी ि त्वं शरीरस्था गीर्िे प्रािनैबधैः । हृतपद्मस्था प्राणशत्रिः कण्ठस्था स्वप्ननासर्का ॥
                                    ुा
तालुस्था त्वं िदाधारा त्रबडदस्था त्रबडदमासलनी । मूले तु कण्िली शत्रिव्र्ाात्रपनी कशमूलगा ॥
                            ु          ु                 ु                        े
सशखामध्र्ािना त्वं फह सशखाग्रे तु मनोडमनी । फकमडर्द् बहुनोिन र्स्त्कसिज्जगतीिर्े ॥
                                                           े        ं
तत्िवं त्वं महादे त्रव सश्रर्े िंध्र्े नमोऽस्तु ते । इतीदं कीसतातं स्तोिं िंध्र्ार्ां बहुपुण्र्दम ् ॥
महापापप्रशमनं महासित्रद्धत्रवधार्कम ् । र् इदं कीतार्ेत ् स्तोिं िंध्र्ाकाले िमाफहतः ॥
अपुिः प्राप्नुर्ात ् पुिं धनाथी धनमाप्नुर्ात ् । िवातीथातपोदानर्ज्ञर्ोगफलं लभेत ् ॥
भोगान ् भुक्त्वा सिरं कालमडते मोक्षमवाप्नुर्ात ् । तपस्स्वसभः कृ तं स्तोिं स्नानकाले तु र्ः पठे त ् ॥
र्ि कि जले मग्नः िंध्र्ामज्जनजं फलम ् । लभते नाि िंदेहः ित्र्ं ि नारद ॥
     ु
श्रृणुर्ाद्योऽत्रप तद्भक्त्र्ा ि तु पापात ् प्रमुच्र्ते । पीर्ूषिदृशं वाक्र्ं िंध्र्ोि नारदे ररतम ् ॥
                                                                                      ं

॥ इसत श्रीअघनाशक गार्िी स्तोिं ि्पूणम ् ॥
                                    ा
30                                              मई 2012



                           ॥गार्िी स्तोि॥                                         गार्िीस्तोिम ्
िुकल्र्ाणीं वाणीं िुरमुसनवरै ः पूस्जतपदाम
                                                            नमस्ते दे त्रव गार्िी िात्रविी त्रिपदे ऽक्षरी ।
सशवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मर्ीं वेदजननीं
परां शत्रि स्रष्टु ं त्रवत्रवध त्रवध रूपां गुण मर्ीं
          ं
                                                            अजरे अमरे माता िाफह मां भविागरात ् ॥१॥

भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम                        नमस्ते िूर्िंकाशे िूर्वात्रवत्रिकऽमले ।
                                                                       ा          ा          े

त्रवशुद्धां ित्त्वस्थाम अस्खल दरवस्थाफदहरणीम ्
                               ु                            ब्रह्मत्रवद्ये महात्रवद्ये वेदमातनामोऽस्तु ते ॥२॥
सनराकारां िारां िुत्रवमल तपो मुसतं अतुलां
जगत ् ज्र्ेष्ठां श्रेष्ठां िुर अिुर पूज्र्ां श्रुसतनुतां    अनडतकोफटब्रह्माण्िव्र्ात्रपनी ब्रह्मिाररणी ।
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम                        सनत्र्ानडदे महामर्े परे शानी नमोऽस्तु ते ॥३॥
तपो सनष्ठां असभष्टां स्वजनमन िंताप शमनीम                    त्वम ् ब्रह्मा त्वम ् हररः िाक्षाद् रुद्रस्त्वसमडद्रदे वता ।
दर्ामूसतं स्फसतं र्सततसत प्रिादै क िुलभां
             ू
                                                            समिस्त्वम ् वरुणस्त्वम ् ि त्वमस्ग्नरस्श्वनौ भगः ॥४॥
वरे ण्र्ां पुण्र्ां तां सनस्खल भवबडधाप हरणीं
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम
                                                            पूषाऽर्ामा मरुत्वांश्च ऋषर्ोऽत्रप मुनीश्वराः ।
िदा आराध्र्ां िाध्र्ां िुमसत मसत त्रवस्तारकरणीं
                                                            त्रपतरो नागर्क्षांश्च गडधवााऽप्िरिां गणाः ॥५॥
त्रवशोकां आलोकां ह्रदर्गत मोहाडधहरणीं
परां फदव्र्ां भव्र्ां अगम भव सिडध्वेक तरणीं                 रक्षोभूतत्रपशािाच्ि त्वमेव परमेश्वरी ।
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम                        ऋग्र्जुस्िामत्रवद्याश्च अथवाास्ङ्गरिासन ि ॥६॥

अजां द्वै तां िेतां त्रवत्रवध गुणरूपां िुत्रवमलां
तमो हडिीं तडिीं श्रुसत मधुरनादां रिमर्ीं                    त्वमेव िवाशास्त्रास्ण त्वमेव िवािंफहताः ।
महामाडर्ां धडर्ां िततकरूणाशील त्रवभवां                      पुराणासन ि तडिास्ण महागममतासन ि ॥७॥
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम                        त्वमेव पञ्िभूतासन तत्त्वासन जगदीश्वरी ।
जगत ् धािीं पािीं िकल भव िंहारकरणीं                         ब्राह्मी िरस्वती िडध्र्ा तुरीर्ा त्वं महे श्वरी ॥८॥
िुवीरां धीरां तां िुत्रवमलतपो रासश िरणीं
अनैकां ऐकां वै िर्जगत ् असधष्ठान ् पदवीं
                                                            तत्िद्ब्रह्मस्वरूपा त्वं फकस्ञ्ित ् िदिदास्त्मका ।
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम
                                                            परात्परे शी गार्िी नमस्ते मातरस््बक ॥९॥
                                                                                               े
प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनर्सत जाड्र्ापहरणीं
                                                            िडद्रकलास्त्मक सनत्र्े कालरात्रि स्वधे स्वरे ।
                                                                          े
फहरण्र्ां गुण्र्ां तां िुकत्रवजन गीतां िुसनपुणीं
िुत्रवद्यां सनरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं                     स्वाहाकारे ऽस्ग्नवक्िे त्वां नमासम जगदीश्वरी ॥१०॥
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम
                                                            नमो नमस्ते गार्िी िात्रविी त्वं नमा्र्हम ् ।
अनडतां शाडतां र्ां भजसत वुध वृडदः श्रुसतमर्ीम
िुगेर्ां ध्र्ेर्ां र्ां स्मरसत ह्रफद सनत्र्ं िुरपसतः        िरस्वती नमस्तुभ्र्ं तुरीर्े ब्रह्मरूत्रपणी ॥११॥
िदा भक्त्र्ा शक्त्र्ा प्रणतमसतसभः त्रप्रसतवशगां             अपराध िहस्रास्ण त्वित्कमाशतासन ि ।
भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम
                                                            मत्तो जातासन दे वेशी त्वं क्षमस्व फदने फदने ॥१२॥
शुद्ध सितः पठे द्यस्तु गार्त्र्र्ा अष्टक शुभम ्
                                        ं
                                                            ॥ इसत शीवसिष्ठिंफहतोि गार्िीस्तोिं िंपूणम ् ॥
                                                                                 ं                  ा
अहो भाग्र्ो भवेल्लोक तस्स्मन ् माता प्रिीदसत
                    े
31                                  मई 2012




                                               ॥गार्िी िालीिा॥
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्र्ोसत     िुसमरत फहर् मं ज्ञान प्रकािै।          गृह क्लेश सित सिडता भारी।
    प्रिण्ि॥ शास्डत कास्डत जागृत              आलि पाप अत्रवद्या नािै॥१३॥              नािै गार्िी भर् हारी॥२८॥
    प्रगसत रिना शत्रि अखण्ि॥                  िृत्रष्ट बीज जग जनसन भवानी।            िडतसत हीन िुिडतसत पावं।
जगत जननी मङ्गल करसन गार्िी                    कालरात्रि वरदा कल्र्ाणी॥१४॥          िुख िंपसत र्ुत मोद मनावं॥२९॥
   िुखधाम। प्रणवं िात्रविी स्वधा                ब्रह्मा त्रवष्णु रुद्र िुर जेते।      भूत त्रपशाि िबै भर् खावं।
          स्वाहा पूरन काम॥                    तुम िं पावं िुरता तेते॥१५॥           र्म क दत सनकट नफहं आवं॥३०॥
                                                                                        े ू

     भूभवः स्वः ॐ र्ुत जननी।
        ुा                                     तुम भिन की भि तु्हारे ।               जो िधवा िुसमरं सित लाई।
  गार्िी सनत कसलमल दहनी॥१॥                   जनसनफहं पुि प्राण ते प्र्ारे ॥१६॥      अछत िुहाग िदा िुखदाई॥३१॥
     अक्षर िौत्रवि परम पुनीता।                 मफहमा अपर्पार तु्हारी।                घर वर िुख प्रद लहं कमारी।
                                                                                                         ु
  इनमं बिं शास्त्र श्रुसत गीता॥२॥           जर् जर् जर् त्रिपदा भर्हारी॥१७॥         त्रवधवा रहं ित्र् व्रत धारी॥३२॥
     शाश्वत ितोगुणी ित रूपा।                   पूररत िकल ज्ञान त्रवज्ञाना।          जर्सत जर्सत जगदं ब भवानी।
   ित्र् िनातन िुधा अनूपा॥३॥                तुम िम असधक न जगमे आना॥१८॥             तुम िम और दर्ालु न दानी॥३३॥
       हं िारूढ श्वेता्बर धारी।                             ु
                                              तुमफहं जासन कछ रहै न शेषा।              जो ितगुरु िो दीक्षा पावे।
स्वणा कास्डत शुसि गगन-त्रबहारी॥४॥                         ु
                                            तुमफहं पार् कछ रहै न क्लेिा॥१९॥        िो िाधन को िफल बनावे॥३४॥
    पुस्तक पुष्प कमण्िलु माला।                जानत तुमफहं तुमफहं ह्वै जाई।           िुसमरन करे िुरूसि बिभागी।
  शुभ्र वणा तनु नर्न त्रवशाला॥५॥              पारि परसि कधातु िुहाई॥२०॥
                                                         ु                          लहै मनोरथ गृही त्रवरागी॥३५॥

   ध्र्ान धरत पुलफकत फहत होई।                  तु्हरी शत्रि फदपै िब ठाई।            अष्ट सित्रद्ध नवसनसध की दाता।
 िुख उपजत दःख दमसत खोई॥६॥
           ु   ु ा                            माता तुम िब ठौर िमाई॥२१॥               िब िमथा गार्िी माता॥३६॥
    कामधेनु तुम िुर तरु छार्ा।                   ग्रह नक्षि ब्रह्माण्ि घनेरे।       ऋत्रष मुसन र्ती तपस्वी र्ोगी।
   सनराकार की अद्भत मार्ा॥७॥
                  ु                           िब गसतवान तु्हारे प्रेरे॥२२॥         आरत अथी सिस्डतत भोगी॥३७॥
     तु्हरी शरण गहै जो कोई।                   िकल िृत्रष्ट की प्राण त्रवधाता।         जो जो शरण तु्हारी आवं।
   तरै िकल िंकट िं िोई॥८॥                    पालक पोषक नाशक िाता॥२३॥               िो िो मन वांसछत फल पावं॥३८॥
     िरस्वती लक्ष्मी तुम काली।                   मातेश्वरी दर्ा व्रत धारी।           बल बुसध त्रवद्या शील स्वभाउ।
  फदपै तु्हारी ज्र्ोसत सनराली॥९॥             तुम िन तरे पातकी भारी॥२४॥              धन वैभव र्श तेज उछाउ॥३९॥
     तु्हरी मफहमा पार न पावं।                   जापर कृ पा तु्हारी होई।              िकल बढं उपजं िुख नाना।
 जो शारद शत मुख गुन गावं॥१०॥                  तापर कृ पा करं िब कोई॥२५॥            जे र्ह पाठ करै धरर ध्र्ाना॥४०॥
                                                                                               ॥दोहा॥
      िार वेद की मात पुनीता।                   मंद बुत्रद्ध ते बुसध बल पावं।
                                                                                         र्ह िालीिा भत्रिर्ुत
    तुम ब्रह्माणी गौरी िीता॥११॥               रोगी रोग रफहत हो जावं॥२६॥
                                                                                          पाठ करै जो कोई।
     महामडि स्जतने जग माहीं।                    दररद्र समटै कटै िब पीरा।
                                                                                         तापर कृ पा प्रिडनता
     कोउ गार्िी िम नाहीं॥१२॥                  नाशै दःख हरै भव भीरा॥२७॥
                                                    ु
                                                                                           गार्िी की होर्॥
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                                           ॥श्री गार्िी शाप त्रवमोिनम ्॥
शाप मुिा फह गार्िी ितुवगा फल प्रदा । अशाप मुिा गार्िी ितुवगा फलाडतका ॥
                       ा                                  ा
ॐ अस्र् श्री गार्िी । ब्रह्मशाप त्रवमोिन मडिस्र् । ब्रह्मा ऋत्रषः । गार्िी छडदः ।
भुत्रि मुत्रिप्रदा ब्रह्मशाप त्रवमोिनी गार्िी शत्रिः दे वता । ब्रह्म शाप त्रवमोिनाथे जपे त्रवसनर्ोगः ॥
ॐ गार्िी ब्रह्मेत्र्ुपािीत र्द्रपं ब्रह्मत्रवदो त्रवदः । तां पश्र्स्डत धीराः िुमनिां वािग्रतः ।
                                ू                    ु
ॐ वेदाडत नाथार् त्रवद्महे फहरण्र्गभाार् धीमही । तडनो ब्रह्म प्रिोदर्ात ् ।
ॐ गार्िी त्वं ब्रह्म शापत ् त्रवमुिा भव ॥
ॐ अस्र् श्री वसिष्ट शाप त्रवमोिन मडिस्र् सनग्रह अनुग्रह कताा वसिष्ट ऋत्रष । त्रवश्वोद्भव गार्िी छडदः ।
वसिष्ट अनुग्रफहता गार्िी शत्रिः दे वता । वसिष्ट शाप त्रवमोिनाथे जपे त्रवसनर्ोगः ॥
ॐ िोहं अकमर्ं ज्र्ोसतरहं सशव आत्म ज्र्ोसतरहं शुक्रः िवा ज्र्ोसतरिः अस््र्हं ।(इसत र्ुक्त्व र्ोसन मुद्रां प्रदश्र्ा गार्िी
         ा
िर्ं पफदत्व)
ॐ दे वी गार्िी त्वं वसिष्ट शापत ् त्रवमुिो भव ॥
ॐ अस्र् श्री त्रवश्वासमि शाप त्रवमोिन मडिस्र् नूतन िृत्रष्ट कताा त्रवश्वासमि ऋत्रष । वाग्दे हा गार्िी छडदः ।
त्रवश्वासमि अनुग्रफहता गार्िी शत्रिः दे वता । त्रवश्वासमि शाप त्रवमोिनाथे जपे त्रवसनर्ोगः ॥
ॐ गार्िी भजांर्स्ग्न मुखीं त्रवश्वगभां र्दद्भवाः दे वाश्चफक्ररे त्रवश्विृत्रष्टं तां कल्र्ाणीं इष्टकरीं प्रपद्ये ।
                                          ु
र्डमुखास्डनिृतो अस्खलवेद गभाः । शाप र्ुिा तु गार्िी िफला न कदािन ।
शापत ् उत्तरीत िा तु मुत्रि भुत्रि फल प्रदा ॥ प्राथाना ॥ ब्रह्मरूत्रपणी गार्िी फदव्र्े िडध्र्े िरस्वती ।
अजरे अमरे िैव ब्रह्मर्ोने नमोऽस्तुते। ब्रह्म शापत ् त्रवमुिा भव। वसिष्ट शापत ् त्रवमुिा भव। त्रवश्वासमि शापत ् त्रवमुिा भव॥

                                                श्री गार्िी जी की आरती
जर्सत जर् गार्िी माता, जर्सत जर् गार्िी माता।                             स्वाहा, स्वधा, शिी ब्रह्माणी राधा रुद्राणी।

आफद शत्रि तुम अलख सनरं जन जगपालक किी।                                     जर् ितरूपा, वाणी, त्रवद्या, कमला कल्र्ाणी॥ जर्सत ..

द:ख शोक, भर्, क्लेश कलश दाररद्र दै डर् हिी॥ जर्सत ..
 ु                                                                        जननी हम हं दीन-हीन, द:ख-दररद्र क घेरे।
                                                                                               ु          े

ब्रह्म रूत्रपणी, प्रणात पासलन जगत धातृ अ्बे।                              र्दत्रप कफटल, कपटी कपूत तउ बालक हं तेरे॥ जर्सत ..
                                                                                   ु

भव भर्हारी, जन-फहतकारी, िुखदा जगद्बे॥ जर्सत ..                            स्नेहिनी करुणामर् माता िरण शरण दीजै।

भर् हाररणी, भवताररणी, अनघेअज आनडद रासश।                                   त्रवलख रहे हम सशशु िुत तेरे दर्ा दृत्रष्ट कीजै॥ जर्सत ..

अत्रवकारी, अखहरी, अत्रविसलत, अमले, अत्रवनाशी॥ जर्सत ..                    काम, क्रोध, मद, लोभ, द्भ, दभााव द्वे ष हररर्े।
                                                                                                     ु

कामधेनु ितसित आनडद जर् गंगा गीता।                                         शुद्ध बुत्रद्ध सनष्पाप हृदर् मन को पत्रवि कररर्े॥ जर्सत ..

ित्रवता की शाश्वती, शत्रि तुम िात्रविी िीता॥ जर्सत ..                     तुम िमथा िब भांसत ताररणी तुत्रष्ट-पुत्रष्ट द्दाता।

ऋग, र्जु िाम, अथवा प्रणर्नी, प्रणव महामफहमे।                              ित मागा पर हमं िलाओ, जो है िुखदाता॥

कण्िसलनी िहस्त्र िुषुमन शोभा गुण गररमे॥ जर्सत ..
 ु                                                                        जर्सत जर् गार्िी माता, जर्सत जर् गार्िी माता॥
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                                                           श्री गार्िी कवि
                                                                                                                   त्रवजर् ठाकुर
त्रवसनर्ोग:-                                                           ॐ ‘रे ’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् िदा तत्त्व शरीरकम ्।
ॐ अस्र् श्रीगार्िी कविस्र् ब्रह्मा-त्रवष्णु-रुद्राः ऋषर्ः।             ॐ ‘ण्र्ं’ ॐ पातु मे अक्षम ् िवा तत्त्वैक कारणम ्।
ऋग ् र्जुः िामाथवाास्ण छडदांसि। परब्रह्म स्वरुत्रपणी गार्िी            ॐ ‘भ’ ॐ पातु मे श्रोिम ् शब्द श्रवणैक कारणम ्।
दे वता।    भूः   बीजं।     भुवः    शत्रिः।     स्वाहा      कीलकम ्।    ॐ ‘गो’ ॐ पातु मे घ्राणम ् गडधोत्पादान कारणम ्।
ितुत्रवंशत्र्क्षरा श्रीगार्ि प्रीत्र्थे जपे त्रवसनर्ोगः।               ॐ ‘दे ’ ॐ पातु मे िास्र्म ् िभार्ाम ् शब्द रुत्रपणीम ्।
ध्र्ानः-                                                               ॐ ‘व’ ॐ पातु मे बाहु र्ुगलम ् ि कमा कारणम ्।
वस्त्राभाम ् कस्ण्िकां हस्तां, शुद्ध सनमाल ज्र्ोसतषीम ्।
              ु                                                        ॐ ‘स्र्’ पातु मे सलडगम ् षट् दल र्ुतम ्।
िवा तत्त्व मर्ीं वडदे , गार्िीं वेद मातरम ्॥                           ॐ ‘धी’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् प्रकृ सत शब्द कारणम ्।
मुिा त्रवद्रम हे म नील धवलैश्छार्ैः मुखेस्त्रीक्षणैः।
            ु                                                          ॐ ‘म’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् नमो ब्रह्म स्वरुत्रपणीम ्।
र्ुिासमडद ु सनबद्ध रत्न मुकटां तत्त्वाथा वणाास्त्मकाम ्॥
                           ु                                           ॐ ‘फह’ ॐ पातु मे बुत्रद्धम ् पर-ब्रह्म-मर्म ् िदा।
गार्िीं वरदाभर्ांकश कशां शूलं कपालं गुणैः।
                  ु                                                    ॐ ‘सध’ ॐ पातु मे सनत्र्महडकारम ् र्था तथा।
शंखं िक्रमथारत्रवडद र्ुगलं हस्तैवहडतीं भजे॥
                                 ा                                     ॐ ‘र्ो’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् जलम ् िवाि िवादा।
कवि पाठ:-                                                              ॐ ‘नः’ ॐ पातु मे सनत्र्ं तेज पुञ्जो र्था तथा।
“ॐ ॐ ॐ ॐ ‘भूः’ ॐ ॐ ‘भुवः’ ॐ ॐ ‘स्वः’ ॐ ॐ                               ॐ ‘प्र’ ॐ पातु मे सनत्र्मसनलम ् कार् कारणम ्।
‘त’ ॐ ॐ ‘त्ि’ ॐ ॐ ‘त्रव’ ॐ ॐ ‘तु’ ॐ ॐ ‘वा’ ॐ ॐ                         ॐ ‘िो’ ॐ पातु मे सनत्र्माकाशम ् सशव िस्डनभम ्।
‘रे ’ ॐ ॐ ‘ण्र्ं’ ॐ ॐ ‘भ’ ॐ ॐ ‘गो’ ॐ ॐ ‘दे ’ ॐ ॐ                       ॐ ‘द’ ॐ पातु मे स्जह्वां जप र्ज्ञस्र् कारणम ्।
‘व’ ॐ ॐ ‘ स्र्’ ॐ ॐ ‘धी’ ॐ ॐ ‘म’ ॐ ॐ ‘फह’ ॐ                            ॐ ‘र्ात ्’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् सशवम ् ज्ञान मर्म ् िदा।
ॐ ‘सध’ ॐ ॐ ‘र्ो’ ॐ ॐ ‘नः’ ॐ ॐ ‘प्र’ ॐ ॐ ‘िो’                           ॐ तत्त्वासन पातु मे सनत्र्म ्, गार्िी पर दै वतम ्।
ॐ ॐ ‘द’ ॐ ॐ ‘र्ा’ ॐ ॐ ‘त ्’ ॐ ॐ।                                       कृ ष्णं मे िततम ् पातु, ब्रह्मास्ण भूभवः स्वरोम ्॥
                                                                                                             ुा
ॐ ॐ ॐ ॐ ‘भूः’ ॐ पातु मे मूलम ् ितुदाल िमस्डवतम ्।                      ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो
                                                                            ुा                 ा
ॐ ‘भुवः’ ॐ पातु मे सलडगम ् िज्जलम ् षट् दलात्मकम ्।                    र्ो नः प्रिोदर्ात ्।
ॐ ‘स्व’ ॐ पातु मे कण्ठम ् िाकाशम ् दल षोिशम ्।                         ॐ जात-वेदिे िुनवाम िोममाराती र्तो सनदहासत वेदाः।
ॐ ‘त’ ॐ पातु मे रुपम ् ब्राह्मणम ् कारणम ् परम ्।                      षनः पषादसत दगाास्ण त्रवश्वानावेवम ् सिडधुं दररतात्र्स्ग्नः।
                                                                                   ु                               ु
ॐ ‘त्ि’ ॐ ब्रह्म रिम ् पातु मे िदा मम।                                 ॐ त्र्र््बकम ् र्जामहे िुगस्डधं पुत्रष्ट-वधानम ्।
ॐ ‘त्रव’ ॐ पातु मे गडधम ् िदा सशसशर िंर्ुतम ्।                         ऊवााररकसमव बडधनात ् मृत्र्ोमुक्षीर् मामृतात ्॥
                                                                                                    ा
ॐ ‘तु’ ॐ पातु मे स्पशं शरीरस्र् कारणम ् परम ्।                         ॐ नमस्ते तुरीर्ार् िसशातार् पदार् परो रजिेिावदोम ् मा
ॐ ‘वा’ ॐ पातु मे शब्दम ् शब्द त्रवग्रह कारणम ्।                        प्रापत॥ कवि िफहता ितुष्पाद गार्िी ि्पूणाा॥
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                                        रोग सनवारण क पत्रवि जल
                                                    े
                                                                                                           सिंतन जोशी
        गंगा नफद को फहं द ू धमा मं पत्रवि नदी माना जाता           अपने पूजन स्थान पर एक ताँबं का कलश र्ा ग्लाि
हं , इिसलए फहं द ू धमा क बहुत िे लोगो का त्रवश्वाि हं की
                        े                                            आधा पानी िे भर क रखले। (उपर्ोग फकर्ा जाने
                                                                                     े
वहँ गंगा नदी मं स्नान करक एक तीथा स्नान करने का
                         े                                           वाला जल पूणतः शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला हुआ हो)
                                                                                ा
आमतौर पर महिूि करते हं । एिी माडर्ता हं की जीवन                   अपने दाफहने हाथं की ऊगलीर्ा कलश र्ा ग्लाि क
                                                                                        ँ                     े
मं कम िे कम एक बार गंगा स्नान फकए त्रबना जीवन                        पानी मं िू बां दे और गार्िी मंि का कम िे कम
पूणा नहीं हं ।                                                       108 बार जप करं ।
        कछ जानकारो का मत हं की र्हँ कवल फहं द ू धमा
         ु                           े                            जप पूणा होने क पश्चर्ात पत्रवि जप उपर्ोग हे तु
                                                                                 े
क लोगं का त्रवश्वाि नहीं हं । गंगा नफद क जल को एक
 े                                      े                            तैर्ार हो जार्ेगा।
पत्रवि प्रतीक क रूप मं कद्रीर् महत्वता प्राप्त हं ।
               े        ं
        पौरास्णक काल िे ही दसनर्ा क कई धमा जैिे
                            ु      े                             प्रर्ोग 2
फहं द ू धमा, बौद्ध धमा र्हूदी धमा, ईिाई धमा, इस्लाम, और           िुबह स्नानाफद िे सनवृत्त होकर, अपने पूजन स्थान
उन िभी धमा मं पत्रवि जल की एक महत्वपूणा भूसमका                       पर एक ताँबं का कलश र्ा ग्लाि आधा पानी िे भर
रही हं । हालांफक त्रवसभडन धमं पत्रवि जल िे इलाज और                   क रखले। (उपर्ोग फकर्ा जाने वाला जल पूणतः
                                                                      े                                    ा
त्रवसभडन उपोग की त्रवशेष भूसमका प्रिलन मं रही हं ।                   शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला हुआ हो)
        पत्रवि   जल    का   प्रर्ोग   िाधारणतः        दो   आम     जल भरे पाि पर एकटक आपकी दृत्रष्ट रखते हुए
आध्र्ास्त्मक कार्ा मं फकर्ा जाता हं , आध्र्ास्त्मक िफाई              गार्िी मंि का कम िे कम          108 बार जप करं ।
अथाात धासमाक त्रवसध र्ा िंस्कार मं प्रर्ोग फकर्ा जाता हं          जप पूणा होने क पश्चर्ात पत्रवि जप उपर्ोग हे तु
                                                                                 े
और जीवन क मूल स्रोत दशााता हं ।
         े                                                           तैर्ार हो जार्ेगा।
        पत्रवि जल का मुख्र् उपर्ोग धासमाक पूजा-त्रवसध
और रोगं क इलाज मं फकर्ा जाता हं । पाठको क
         े                               े
                                                                 प्रर्ोग 3
मागादशान हे तु र्हाँ हम स्वर्ं क रोग-त्रबमारी को दर
                                े                 ू
                                                                  र्फद आप उपरोि त्रवसध िे पत्रवि जल बनाने मं
करने क सलए पत्रवि जल बनाने क कछ िरल त्रवसध
      े                     े ु
                                                                     िमथा नहीं हं , तो इि प्रर्ोग को कर िकते हं ।
प्रस्तुत कर रहे हं ।
                                                                  गार्ती र्ंि प्राप्त करं । जो शुद्ध ताम्र पि पर बना हो।
प्रर्ोग 1                                                         इि क पश्चर्ात फकिी र्ोग्र् त्रवद्वान ब्राह्मण िे गार्ती
                                                                        े
 पत्रवि जल बनाने हे तु प्रातः काल ब्रह्म मुहूता िबिे                र्ंि को शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे पूणा असभमंत्रित
    उत्तम िमर् हं ।                                                  करवाले र्ा प्राण-प्रसतत्रष्ठत करवा ले।
 िुबह स्नानाफद िे सनवृत्त होकर, पूजन िे पूवा अपने                र्फद आपक सलए फकिी र्ोग्र् ब्राह्मण िे र्ंि प्राण-
                                                                           े
    हाथ को अच्छी तरह िाफ पानी िे धो ले और                            प्रसतत्रष्ठत करवाना िंभव न हो तो आप हमारी िंस्था
    स्वच्छ कपिे िे पौछ कर िुखा ले।                                   गुरुत्व कार्ाालर् िे मंि सिद्ध गार्ती र्ंि प्राप्त कर
                                                                     िकते हं ।
35                                          मई 2012



 अपने पूजन स्थान मं दे वी गार्िी क सिि र्ा मूसता
                                   े                          कम िे कम 12 घंटं र्ा 24 घंटं तक र्ंि को जल मं
   क पाि मं गार्िी र्ंि को रखं।
    े                                                               िू बा कर रखं।
 अपने पूजन स्थान मं ताँबं का कलश र्ा ग्लाि को                कलश र्ा ग्लाि को धूल, समट्टी, फकटानु आफद िे
   पूरा जल भर कर रख दे । (उपर्ोग फकर्ा जाने वाला                    िुरस्क्षत रखने हे तु उिेक मुख को ढं क कर रखं।
                                                                                             े
   जल पूणतः शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला हुआ हो)
         ा                                                    इि क पश्चर्ात आपको कुछ और करने की
                                                                   े
 गार्िी र्ंि को ताँबं की थाली र्ा प्लेट अथवा अडर्                  आवश्र्िा नहीं हं ।
   फकिी भी पाि मं रखं।                                        आका पत्रवि जल 12 घंटं र्ा 24 घंटं क बाद मं
                                                                                                  े
 अब एक ताँबं की ि्मि र्ा फकिी अडर् ि्मि मं                         उपर्ोग हे तु तैर्ार हं ।
   जल भरकर गार्िी मंि का जप करते हुवे उि
                                                             नोट:
   ि्मि का जल गार्ती र्ंि पर िढा़र्े र्ा सगराते
   रहं ।                                                     हाथ व पाि को शुद्ध पानी िे अस्च्छ तरह िाफ करलं व पाि मं
 इि प्रकार कम िे कम 108 बार गार्त्रि मंि का जप              शुद्ध जल ही भरे । अडर्था हाथ मं लगी धूल-समट्टी व फकटाणु
   करं ।                                                     पानी क िाथ समलकर आपक सभतर जार्ंगे जो स्वास्थ्र् क
                                                                   े             े                            े
 जप की िमासप्त पर थाल र्ा प्लेट मं जमा हुए जल               सलर्े हासनकारक हो िकता हं ।
   को फकिी स्वच्छ ग्लाि र्ा बोटल मं भर लं।                   मंि का जप जब पानी मं हाथ िू बा हो तब 5-10 समनट िे
 पत्रवि जप उपर्ोग हे तु तैर्ार हं ।                         असधक न करं अडर्था हाथ मं पिीना होने लगेगा और पाि के
                                                             जल मं उिका समश्रण असधक मािा मं होने पर स्वास्थ्र् के

प्रर्ोग 4                                                    सलर्े नुक्शानदे ह हो िकता हं ।
                                                             उि िभी प्रर्ोग हमारे वषो क अनुभव व शोध क आधार पर
                                                                                       े             े
 र्फद आप उपरोि त्रवसध िे पत्रवि जल बनाने मं
                                                             हमने पार्ा हं फक र्ह प्रर्ोग तत्काल प्रभात्रव हं । आप भी अपने
   िमथा नहीं हं , तो इि प्रर्ोग को कर िकते हं ।
                                                             जीवन मं इि प्रर्ोग को अपनाकर दे खलं। स्जििे इि प्रर्ोग
 गार्ती र्ंि प्राप्त करं । जो शुद्ध ताम्र पि पर बना हो।
                                                             का शुभ पररणाम/लाभ पूणा पादा शीता िे आपक िामने होगा
                                                                                                    े
 इि क पश्चर्ात फकिी र्ोग्र् त्रवद्वान ब्राह्मण िे गार्ती
       े
                                                             इि मं जरा भी िंदेह नहीं हं ।
   र्ंि को शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे पूणा असभमंत्रित
                                                             र्हं प्रर्ोग हमने स्वर्ं व हमारे िाथ ल्बे िमर् िे जुिे हजारो
   करवाले र्ा प्राण-प्रसतत्रष्ठत करवा ले।
                                                             बंध/बहन प्रसतफदन करते आरहे हं । र्हं प्रर्ोग व्र्त्रि को िभी
                                                                ु
 र्फद आपक सलए फकिी र्ोग्र् ब्राह्मण िे र्ंि प्राण-
          े
                                                             प्रकार क रोगो िे मुत्रि व उत्तम स्वास्थ्र् की प्रासप्त हे तु पूणतः
                                                                     े                                                       ा
   प्रसतत्रष्ठत करवाना िंभव न हो तो आप हमारी िंस्था
                                                             िक्षम हं । क्र्ोफक इि प्रर्ोग िे िाधक अपनी स्वर्ं की शत्रि
   गुरुत्व कार्ाालर् िे मंि सिद्ध गार्ती र्ंि प्राप्त कर
                                                             को कद्रीत करता हं ।
                                                                 ं
   िकते हं ।
 अपने पूजन स्थान मं दे वी गार्िी क सिि र्ा मूसता
                                   े                         र्फद कोई व्र्त्रि उि प्रर्ोग को स्वर्ं करने मं िक्षन
   क पाि मं गार्िी र्ंि ताँबं का कलश र्ा ग्लाि को
    े                                                        नहीं हो तो उिक पररवार का कोई भी िदस्र् इि प्रर्ोग
                                                                           े
   पूरा जल भर कर उि मं िू बा कर रख दे । (उपर्ोग              को कर क उि जल को रोगी को पीला िकते हं ।
                                                                    े
   फकर्ा जाने वाला जल पूणतः शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला
                         ा                                   मंिजप पूणा सनष्ठा व श्रद्धा िे करं ।
   हुआ हो)
                                                             मफहलाओं क सलर्े अशुत्रद्ध क दौरान प्रर्ोग करना सनत्रषध
                                                                      े                 े
                                                             हं ।
36                                             मई 2012



पत्रवि जल क लाभ
           े                                                             कोई दष्ट आत्मा, भूत-प्रेत को दर करने क सलए, उि
                                                                              ु                        ू       े

 पत्रवि जल शरीर और आत्मा दोनं को अनुग्रह प्रदान                         त्रवत्रि को भोजन मं िे थोिा पत्रवि जल समलाकर

   करने क सलए दोहरा लाभ दे ते हं ।
         े                                                               परोशने की र्ा स्खलाने की कोसशश करं , वह दष्ट
                                                                                                                  ु

 पत्रवि जल िे कई लाभ प्राप्त फकर्ा जा िकता है ,                         आत्मा बहुत जल्द आपक त्रप्रर् जन र्ा िंबंसधत
                                                                                            े

   असधक िे असधक त्रवश्वाि और श्रद्धा क िाथ पत्रवि
                                      े                                  व्र्त्रि िे शरीर िे बाहर सनकल जार्ेगी।

   जल का प्रर्ोग असधक बार कर िकते हं ।                                त्रवद्वानो का कथन हं की पत्रवि जल फकिी घातक रोग
 पत्रवि जल, त्रवश्वाि और धासमाकता क िाथ सछिक ने
                                    े                                    और लाइलाज बीमारी मं उपर्ोगी।

   िे, बुरी आत्माओं और क्षुद्र जीवं िे आस्त्मर् एवं                   पत्रवि जल आपक शरीर की ऊजाा को जागने क सलए
                                                                                    े                       े

   त्रप्रर्जनो की रक्षा होती हं ।                                        अत्र्ंत उपर्ोगी हं ।

 जब आप फकिी परे शानी मं हो र्ा िर हो र्ा सिंता                       पत्रवि जल की शत्रि नकारात्मक ऊजाा को हटाने और
   हो रही हो तो आपने शरीर पर पत्रवि जल का                                िकारात्मक ऊजाा बढ़ाने मं िक्षम हं ।

   सछिकाव करं और इि जल इि जल का िेवन भी                               पत्रवि जल क िेवन िे अथाात जल को पीने िे शरीर
                                                                                  े

   कर िकते हं ।                                                          की िकारात्मक ऊजाा मं वृत्रद्ध होती है , इि जल िे

 कृ पर्ा पत्रवि जल िे प्राप्त लाभ क अवैध लाभ प्रासप्त
                                    े                                    िभी रोगं को दर फकर्ा जा िकता हं ।
                                                                                      ू

   का प्रर्ाि नहीं करं ।                                              र्फद व्र्त्रि स्वर्ं पत्रवि जल बनाने मं िमथा नहीं हो,
 कुछ लोगं का मानना है , फक र्फद फकिी क शरीर मं
                                       े                                 तो उिक पररवार क िदस्र् उिे सलए पत्रवि जल
                                                                               े        े
                                                                         तैर्ार कर िकते हं ।



                                             मंि सिद्ध स्फफटक श्री र्ंि
  "श्री र्ंि" िबिे महत्वपूणा एवं शत्रिशाली र्ंि है । "श्री र्ंि" को र्ंि राज कहा जाता है क्र्ोफक र्ह अत्र्डत शुभ र्लदर्ी र्ंि
  है । जो न कवल दिरे र्डिो िे असधक िे असधक लाभ दे ने मे िमथा है एवं िंिार क हर व्र्त्रि क सलए फार्दे मंद िात्रबत होता
             े   ू                                                         े             े
  है । पूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा िैतडर् र्ुि "श्री र्ंि" स्जि व्र्त्रि क घर मे होता है उिक सलर्े "श्री र्ंि" अत्र्डत र्लदार्ी
                                                                               े                 े
  सिद्ध होता है उिक दशान माि िे अन-सगनत लाभ एवं िुख की प्रासप्त होसत है । "श्री र्ंि" मे िमाई अफद्रसतर् एवं अद्रश्र् शत्रि
                   े
  मनुष्र् की िमस्त शुभ इच्छाओं को पूरा करने मे िमथा होसत है । स्जस्िे उिका जीवन िे हताशा और सनराशा दर होकर वह
                                                                                                    ू
  मनुष्र् अिर्लता िे िर्लता फक और सनरडतर गसत करने लगता है एवं उिे जीवन मे िमस्त भौसतक िुखो फक प्रासप्त होसत
  है । "श्री र्ंि" मनुष्र् जीवन मं उत्पडन होने वाली िमस्र्ा-बाधा एवं नकारात्मक उजाा को दर कर िकारत्मक उजाा का
                                                                                        ू
  सनमााण करने मे िमथा है । "श्री र्ंि" की स्थापन िे घर र्ा व्र्ापार क स्थान पर स्थात्रपत करने िे वास्तु दोष र् वास्तु िे
                                                                     े
  ि्बस्डधत परे शासन मे डर्ुनता आसत है व िुख-िमृत्रद्ध, शांसत एवं ऐश्वर्ा फक प्रसप्त होती है ।
   गुरुत्व कार्ाालर् मे "श्री र्ंि" 12 ग्राम िे 2250 Gram (2.25Kg) तक फक िाइज मे उप्लब्ध है
                                                                                     मूल्र्:- प्रसत ग्राम Rs. 9.10 िे Rs.28.00

                                           GURUTVA KARYALAY
                                      Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
                       Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
                     Visit Us: http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
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                                       त्रवश्वासमि िंफहतोक्त गार्िी कवि
                                                                                 पं.श्री भगवानदाि त्रिवेदी जी, िंदीप शमाा
ब्रह्मोवाि:-                                                          करं । िडद्रहासिनी मेरे कपोलं की रक्षा करं । वेदगभाा मेरी
           त्रवश्वासमि महाप्राज्ञ गार्िी कविं श्रृणु।                 ठोढ़ी की रक्षा करं । अघनासशनी मेरे कण्ठ की रक्षा करं ।
       र्स्र् त्रवज्ञान मािेण िैलोक्र्ं वश्र्ेत ् क्षणात ्॥           इडद्राणी मेरे स्तनं की रक्षा करं तथा ब्रह्मावाफदनी मेरे
                                                                      हृदर् की रक्षा करं । त्रवश्वभोक्िी मेरे पेट की रक्षा करं ।
अथाात:     ब्रह्मा   जी   बोले-   हे   महाप्राज्ञ   अथाात     महान    िुरत्रप्रर्ा मेरी नासभ की रक्षा करं । नारसिंही मेरी जांघं की
त्रबत्रद्धमान, बुत्रद्ध िागर त्रवश्वासमि !, तुम श्री गार्िी कवि       रक्षा करं तथा ब्रह्माण्िधाररणी मेरी पीठ की रक्षा करं ।
को श्रवण करो! स्जिक जानने माि िे मनुष्र् तीनं
                   े                                                  पद्माक्षी मेरे दोनं पाश्वं एवं मेरे गुह्यांगं की रक्षा करं । ॐ
लोकं को अपने वश मं कर लेता हं ।                                       कार रुपा मेरे दोनं ऊरु की रक्षा करं । िडध्र्ास्त्मका मेरे
           िात्रविी मे सशरः पातु सशखार्ाममृतेश्वरी                    जानु अथाात घुटनं की रक्षा करं ।
          ललाटं ब्रह्म दै वत्र्ां भ्रुवौ मे पातु वैष्णवी॥                     जंघर्ो: पातु िाक्षोभ्र्ां गुल्फर्ोब्राह्मशीषाका।
        कणं मं पातु रुद्राणी िूर्ाा िात्रवत्रिकाऽस््बक।
                                                      े                      िूर्ाा पदद्वर्ं   पातु    िडद्रा   पादं गुलीषु    ि॥
               गार्िी वदनं पातु शारदा दशनच्छदौ॥                               िवांड़्ग वेद माता ि पातु मं िवादाऽनघा।
                                                                            इत्र्ेतत ् कविं ब्रह्मन ् गार्त्र्र्ा: िवा पावनम ् |
अथाात: िात्रविी मेरे सिर की रक्षा करं । अमृतेश्वरी मेरी
सशखा की रक्षा करं । ब्रह्म दे वता मेरे भाल अथाात मस्तक                अथाात: आंखं िे जंघाओं तक, सिर िे एिी तक िूर्ा मेरी
की रक्षा करं । वैष्णवी मेरी भौहं की रक्षा करं । रुद्राणी मेरे         रक्षा करं । िडद्र मेरे पैरं की अंगुसलर्ं की रक्षा करं ।
दोनं कानं की रक्षा करं । िमस्त प्रास्णर्ं की िृजन हार                 ि्पूणा पापं का नाश करने वाली वेद माता िवादा हमारे
मां भगवती मेरे दोनं नेिं की रक्षा करं तथा गार्िी मेरे                 ि्पूणा अंगं की रक्षा करं । इि तरह र्ह गार्िी कवि
मुख की रक्षा करं तथा शारदा मेरे मिूढ़ं की रक्षा करं ।                 िदै व िब प्रकार िे पत्रवि करने वाला हं ।

          फद्वजान र्ज्ञत्रप्रर्ा पातु रिनार्ां िरस्वती।                         पुण्र्ं पत्रविं पापघ्नं िवारोग सनवारणम ्।
         िांख्र्ार्नी नासिका मं कपोलौ िंद्रहासिनी॥                        त्रििडध्र्ं र्ः पठे द् त्रवद्वान ् िवाान ् कामानाप्नुर्ात ्॥
         सिबुक वेदगभाा ि कण्ठं
              ं                          पात्वघनासशनी।                          िवाशास्त्राथातत्त्वज्ञ: ि भवेद् वेदत्रवत्तमः।
       स्तनौ मं पातु इडद्राणी हृदर्           ब्रहमवाफदनी॥                    िवा र्ज्ञ फलं पुण्र्ं ब्रह्माडते िमवाप्नुर्ात॥
          उदरं त्रवश्व भोक्िी ि नाभौ पातु िुरत्रप्रर्ा।
          जघनं नारसिंही ि पृष्ठं ब्रहमाण्िधाररणी॥                     अथाात: र्ह गार्िी कवि पुण्र्, पत्रवि, पापनाशक तथा
         पाश्वो मं पातु पद्माक्षी गुह्यगो पोस्प्िकाऽवतु।
                                       ं                              रोगं का सनवारण करने वाला हं । जो त्रवद्वान तीनं
        ऊवोड़् काररूपा ि जाडवो: िंध्र्ास्त्मकाऽवतु॥                    (त्रििंध्र्ा) िमर् अथाात प्रातः, दोपहर एवं िंध्र्ा काल मं
                                                                      इि का पाठ करता हं , उिक िब मनोरथ सिद्ध हो जाते
                                                                                             े
अथाात: पज्ञत्रप्रर्ा मेरे दांतं की रक्षा करं । िरस्वती मेरी           हं । वह िब शास्त्रं का तत्त्वज्ञ, जानकार, ज्ञाता तथा
स्जह्वा की रक्षा करं । िांख्र्ार्नी मेरी नासिका की रक्षा
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वेदवेत्ता हो जाता हं तथा िमस्त र्ज्ञं का फल प्राप्त                        त्रिनेिां सितवक्िां ि मुिाहार त्रवरास्जताम ्।
करक अडत मं ब्रह्मपद को प्राप्त हो जाता हं ।
   े                                                                        वराऽभर्ांकशकशां हे म पािाक्षमासलकाम ्॥
                                                                                      ु
                                                                           शंख-िक्राऽब्ज-र्ुगलं कराभ्र्ां दधतीं पराम ्।
जानकारो का कथन हं की गार्िी कवि का पाठ करने िे                           सित पंकज िंस्था ि हं िारुढां िुखास्स्मताम ् ||
पहले त्रवसनर्ोग तथा ध्र्ान करना असत आवश्र्क हं ।                   अथाात: जो गार्िी दे वी पंिमुख वाली एवं दश भुजा र्ुि
त्रवसनर्ोग क सलए दाफहने हाथ मं जल, रोली(कमकम), इि,
            े                            ु ु                       हं , स्जनकी कांसत करोिं िूर्ा क िमान हं तथा जो
                                                                                                  े
अक्षत, सिक्का, पुष्प लेकर पढे ़ फफर जल को भूसम पर                  िात्रविी व ब्रह्मा को भी दे ने मं िमथा हं । जो करोिो
छोि दं ।                                                           िडद्रमाओं क िमान शीतल हं । स्जनक तीन नेि हं तथा
                                                                              े                    े
                                                                   मुख-मण्िल स्वच्छ हं । जो मुिाहार िे त्रवभूत्रषत हं ।
त्रवसनर्ोग:                                                        स्जनक दोनं हाथं मं वर, अभर्, अंकश, कशा, िवणा पाि,
                                                                        े                          ु
ॐ अस्र् श्री गार्िी कविस्र् ब्रह्मा ऋत्रष गाार्िी छडदौ             अक्षमाला, शंख, िक्र, ध्वज शोभार्मान हं , जो परब्रह्म
गार्िी दे वता ॐ भू: बीजम ् भुव: शत्रि: स्व: कीलकम ्                स्वरुत्रपणी हं जो श्वेत कमल क आिन पर त्रवराजमान हं ।
                                                                                                े
गार्िी प्रीत्र्थे जपे त्रवसनर्ोग:।                                 शुभ्रवणा हं ि स्जिका वाहन हं और स्जिक मुख-मण्िल
                                                                                                        े
                                                                   पर िदै व प्रिडनता र्ुि मुस्कान रहती हं ।
अब इि श्लोक िे गार्िी माताका ध्र्ान करे ।
ध्र्ान:                                                                   ध्र्ात्वैवं मनिा्भोजे गार्िी कविम ् जपेत ्॥
           पञ्िवक्िां दशभुजां िूर्ा कोफट िमप्रभम ्।                अथाात: मस्स्तष्क-पटल पर माता गार्िी क स्वरुप का
                                                                                                        े
           िात्रविी ब्रह्मवरदां िडद्र कोफट-िुशीतलाम ्॥             ध्र्ान धारण कर कवि का पाठ करं ।



                                                         द्वादश महा र्ंि
  र्ंि को असत प्रासिन एवं दलभ र्ंिो क िंकलन िे हमारे वषो क अनुिंधान द्वारा बनार्ा गर्ा हं ।
                           ु ा       े                    े
       परम दलभ वशीकरण र्ंि,
             ु ा                                                     िहस्त्राक्षी लक्ष्मी आबद्ध र्ंि
       भाग्र्ोदर् र्ंि                                              आकस्स्मक धन प्रासप्त र्ंि
       मनोवांसछत कार्ा सित्रद्ध र्ंि                                पूणा पौरुष प्रासप्त कामदे व र्ंि
       राज्र् बाधा सनवृत्रत्त र्ंि                                  रोग सनवृत्रत्त र्ंि
       गृहस्थ िुख र्ंि                                              िाधना सित्रद्ध र्ंि
       शीघ्र त्रववाह िंपडन गौरी अनंग र्ंि                           शिु दमन र्ंि
  उपरोि िभी र्ंिो को द्वादश महा र्ंि क रुप मं शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे मंि सिद्ध पूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत एवं िैतडर् र्ुि फकर्े
                                      े
  जाते हं । स्जिे स्थापीत कर त्रबना फकिी पूजा अिाना-त्रवसध त्रवधान त्रवशेष लाभ प्राप्त कर िकते हं ।

                                                 GURUTVA KARYALAY
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39                                                मई 2012




                                                     गार्िी कविम ्
श्रीगणेशार् नमः।                                            फदशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूत्रपणी ॥३॥
र्ाज्ञवल्क्र् उवाि!                                         ऊध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वै ष्णवी तथा।
स्वासमन ् िवाजगडनाथ िंशर्ोऽस्स्त महाडमम।
                                                            एवं दश फदशो रक्षेत्िवातो भुवनेश्वरी ॥४॥
ितुःषत्रष्ठकलानां ि पातकानां ि तद्वद॥
                                                            तत्पदम ् पातु मे पादौ जंघे मे ित्रवतुः पदम ्।
मुच्र्ते कन पुण्र्ेन ब्रह्मरूपं कथं भवेत ्।
          े
                                                            वरे ण्र्म ् कफटदे शं तु नासभं भगास्तथैव ि ॥५॥
दे हश्च दे वतारूपो मडिरूपो त्रवशेषतः॥
ब्रह्मोवाि!                                                 दे वस्र् मे तु हृदर्ं धीमहीसत गलं तथा।

क्रमतः श्रोतुसमच्छासम कविं त्रवसधपूवकम ्।
                                    ा                       सधर्ो मे पातु स्जह्वार्ां र्ः पदं पातु लोिने ॥६॥

ॐ अस्र् श्रीगार्िीकविस्र् ब्रह्मत्रवष्णुरुद्रा ऋषर्ः।       ललाटे नः पदं पातु मूद्धाानं मे प्रिोदर्ात ्।

ऋग्र्जुःिामाऽथवाास्ण छडदांसि।                               तद्वणाः पातु मूद्धाानं िकारः पातु भालकम ् ॥७॥

परब्रह्मस्वरूत्रपणी गार्िी दे वता।                          िक्षुषी मे त्रवकारस्तु श्रोिं रक्षेत्तु कारकः।

भूः बीजम ्। भुवः शत्रिः। स्वः कीलकम ्।                      नािापुटे वकारो मे रे कारस्तु कपोलर्ोः ॥८॥

श्रीगार्िीप्रीत्र्थे जपे त्रवसनर्ोगः।                       स्णकारस्त्वधरोष्ठे ि र्ंकारस्त्वधरोष्ठक।
                                                                                                   े

ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुररसत हृदर्ार् नमः।
     ुा                                                     आस्र्मध्र्े भकारस्तु गोकारस्श्चबुक तथा ॥९॥
                                                                                              े

ॐ भूभवः स्वः वरे ण्र्समसत सशरिे स्वाहा।
     ुा                                                     दे कारः कण्ठदे शे ि वकारः स्कडधदे शर्ोः।

ॐ भूभवः स्वः भगो दे वस्र्ेसत सशखार्ै वषट्।
     ुा                                                     स्र्कारो दस्क्षणं हस्तं धीकारो वामहस्तक ॥१०॥
                                                                                                   े

ॐ भूभुवः स्वः धीमहीसत कविार् हुम ्।
      ा                                                     मकारो हृदर्ं रक्षेत्रद्धकारो जठरं तथा।

ॐ भूभवः स्वः सधर्ो र्ो नः इसत नेििर्ार् वौषट्।
     ुा                                                     सधकारो नासभदे शं तु र्ोकारस्तु कफटद्वर्म ् ॥११॥

ॐ भूभवः स्वः प्रिोदर्ाफदसत अस्त्रार् फट्।
     ुा                                                     गुह्यम ् रक्षतु र्ोकार ऊरु मे नः पदाक्षरम ् ।

अथ ध्र्ानम ्।                                               प्रकारो जानुनी रक्षेच्िोकारो जंघदे शर्ोः ॥१२॥

मुिात्रवद्रमहे मनील धवलच्छार्ैमुखस्त्रीक्षणै
           ु                    ा ै                         दकारो गुल्फदे शं तु र्ात्कारः पादर्ुग्मकम ्।

र्ुिासमडदसनबद्धरत्नमुकटां तत्त्वाथावणाास्त्मकाम ्।
   ा     ु            ु                                     जातवेदेसत गार्िी त्र्र््बकसत दशाक्षरा ॥१३॥
                                                                                      े

गार्िीं वरदाभर्ाङ्कशकशां शुभ्रं कपालं गुणं
                   ु                                        िवातः िवादा पातु आपोज्र्ोतीसत षोिशी।

शंख, िक्रमथारत्रवडदर्ुगलं हस्तैवहडतीं भजे॥
                   ु            ा                           इदम ् तु कविं फदव्र्ं बाधाशतत्रवनाशकम ् ॥१४॥

ॐ गार्िी पूवतः पातु िात्रविी पातु दस्क्षणे।
            ा                                               ितुःषत्रष्ठकलात्रवद्यािकलैश्वर्ासित्रद्धदम ्।

ब्रह्मत्रवद्या तु मे पश्चादत्तरे मां िरस्वती ॥१॥
                           ु                                जपार्भे ि हृदर्ं जपाडते कविं पठे त ् ॥१५॥

पावकीं ि फदशं रक्षेत्पावकोज्ज्वलशासलनी।                     स्त्रीगोब्राह्मणसमिाफदद्रोहाद्यस्खलपातकः।
                                                                                                   ै

र्ातुधानीं फदशं रक्षेद्यातुधानगणाफदा नी ॥२॥                 मुच्र्ते िवापापेभ्र्ः परं ब्रह्मासधगच्छसत ॥१६॥

पावमानीं फदशं रक्षेत्पवमानत्रवलासिनी।                       ॥ इसत श्रीमद्वसिष्ठिंफहतार्ां गार्िीकविं ि्पूणम ् ॥
                                                                                                          ा
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                                                           गार्िी िुप्रभातम ्
श्री पातूरर िीतारामांजनेर्ुलु कृ त                  मडद्रस्वरे ण मधुरेण ि मध्र्मेन।                  सनत्र्ाऽसि दे त्रव भवती सनस्खले प्रपञ्िे
॥श्रीरस्तु ॥                                        गानास्त्मक सनस्खललोक मनोज्ञ भावे
                                                              े                                      वडद्याऽसि िवा भुवनैः िततोद्यतासि।
श्री जासनरफद्रतनर्ापसतरब्जगभाः                      गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुपभातम ् ॥१०॥           धी प्रेररकाऽसि भुवनस्र् िरािरस्र्
िवे ि दै वतगणाः िमहषार्ोऽमी।                        पापाटवी दहन जागृत मानिा त्वम ्                   गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२०॥
ऐते भूतसनिर्ाः िमुदीरर्स्डत                         भिौघ पालन सनरं तर दीस्क्षताऽसि।                  वडदामहे भगवतीम ् भवतीम ् भवास्ब्ध
गार्त्रि   लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१॥           त्वय्र्ेव त्रवश्वमस्खलम ् स्स्थरतामुपैसत         िडताररणीम ् त्रिकरणैः करुणामृताब्दे ।
पुष्पोच्िर् प्रत्रवलित्कर कजर्ुग्माम ्
                           ं                        गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥११॥         ि्पश्र् सिडमर्तनो करुणाद्रा दृष्ट्र्ा
गंगाफदफदव्र् तफटनीवरतीरदे शे।                       र्ा वैफदकी सनस्खल पावन पावनी वाक्                गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२१॥
ष्वघ्र्ाम ् िमपासर्तुमिजनास्तवैते                   र्ा लौफककी व्र्वहृसत प्रवणा जनानाम ्।            त्वम ् मातृकामर्तनुः परम प्रभावा
गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२॥             र्ा काव्र्रूप कसलता तव रूप मेताः                 त्वय्र्ेव दे त्रव परमः पुरुषः पुराणः।
कणेमतम ् त्रवफकरता स्वरिंिर्ेन
    ृ                                               गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१२॥         त्वत्तः िमस्त भुवनासन िमुल्लिस्डत
िवे फद्वजाः श्रुसतगणम ् िमुदीरर्स्डत।               फदव्र्म ् त्रवमानमसधरुह्य नभोङ्गणेऽि             गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२२॥
पश्र्ाश्रमािथ वृक्षतलेषु दे त्रव                    गार्स्डत फदव्र् मफहमानसममे भवत्र्ाः।             त्वम ् वै प्रिूसनास्खलदे वगणस्र् दे त्रव
गार्सत लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥४॥               पश्र् प्रिीद सनिर्ा फदत्रवजाङ्गनानाम ्           त्वम ् स्तूर्िे त्रिषवणम ् सनस्खलैश्च लोकः।
                                                                                                                                              ै
गावो महत्रषासनिर्ाश्रम भूसमभागात ्                  गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१३॥         त्वम ् दे श काल परमाथा पररस्फटासि
                                                                                                                                  ु
गडतुम ् वनार् शनकः शनकः प्रर्ास्डत।
                 ै    ै                             है मीम ् रुिम ् िकल भूसमरुहाग्रदे शे             गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२३॥
वत्िान ् पर्ोऽमृतरिम ् ननु पार्सर्त्र्ा             ष्वाधार् तत्कृ त परोपकृ तौ प्रिडनः।              त्वम ् गासधिूनु परमत्रषा वरे ण दृष्टा
गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥४॥             भानुः करोत्र्विरे कनकासभषेकम ्                   तेजोमर्ी ित्रवतुरात्ममर्ास्खलाथाा।
सशष्र् प्रबोधनपरा वर मौसन मुख्र्ाः                  गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१४॥         िवााथदा प्रणत भि जनस्र् शश्वत ्
                                                                                                          ा
व्र्ाख्र्ास्डत   वेदगफदतम ्          स्फट
                                        ु     धमा   फदव्र्ापगािु िरिीषु वनी सनकङ्जे
                                                                               ु                     गार्त्रि लोकत्रवनुतो तव िुप्रभातम ् ॥२४॥
ततत्त्वम ्। स्वीर्ाश्रमाङ्गणतलेषु मनोहरे षु         षूच्िाविासन किुमासन मनोहरास्ण।
                                                                 ु                                   िंकल्प्र् लोकमस्खलम ् मनिैव िूषे
गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥५॥             पुल्लासन िस्डत पररतस्तव पूजनार्                  कारुण्र्भाव कसलताऽवसि लोकमाता।
श्रोिामृतम ् श्रुसतरवम ् कलर्डत एते                 गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१५॥         कोपास्डवता तमस्खलम ् करुषे प्रलीनम ्
                                                                                                                           ु
त्रवस्मृत्र् गडतुमटवीम ् फललाभलोभात ्।              कवास्डत पस्क्षसनिर्ाः कलगानमेते
                                                     ु                                               गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२५॥
वृक्षाग्र भूसमषु वनेषु लिस्डत कीराः                 वृक्षाग्रमुडनत ् तरािनमाश्रर्डतः।                मुिाभ त्रवद्रम िुवणा महे डद्र नील
                                                                                                                  ु
गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥६॥             दे त्रव त्वदीर् मफहमानमुदीरर्डतो                 श्वेतप्रभैर ् भुवन रक्षण बुत्रद्ध दीक्षैः।
मूसता िर्ात्मकसलते सनगम िर्ेण                       गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१६॥         वक्िैर्ते सनगम मातरुदारित्त्वे
                                                                                                            ुा
वेद्ये स्वरिर् पररस्फट मडतरूपे।
                     ु                              त्रवश्वेसश त्रवष्णुभसगसन श्रुसतवाक्स्वरूपे       गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२६॥
तत्त्वप्रबोधनपरोपसनषत्प्रपञ्िे                      तडमात्रिक सनस्खलमडतमर्स्वरूपे।
                                                             े                                       कारुण्र् वीसि सनिर्ामल कास्डत काडताम ्
गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥७॥             गानास्त्मक सनस्खलतत्त्वसनजस्वरूपे
                                                              े                                      ब्रह्माफद िवा फदत्रवजेड्र् महाप्रभावाम ्।
त्रवश्वास्त्मक सनगमशीषावतंिरूपे
              े                                     गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१७॥         प्रीत्र्ा प्रिारर् दृशम ् मसर् लोकमातः
िवाागमाडतरुफदते वरतैजिात्मन ्।                      तेजोमसर् त्रिभुवनावनििसित्ते                     गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२७॥
प्राज्ञास्त्मक िृजनपोषणिंहृसतस्थे
              े                                     िडधास्त्मक िकल काल कला स्वरूपे।
                                                              े                                      श्री लक्ष्मणाफद गुरु ित्करुणैकलब्ध
गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥८॥             मृत्र्ुंजर्े जसर्सन सनत्र्सनरं तरात्मन ्         त्रवद्या त्रवनीत मसतर्ानर् माङनेर्ः।
तुर्ाास्त्मक िकलतत्त्वगणानतीते
            े                                       गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१८॥         िंिेवतेऽिभवतीम ् भुवतीम ् विोसभः
आनंदभोगकसलते परमाधादत्रि                            त्वामेव दे त्रव पररतो सनस्खलासन तडिा             गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२८॥
ब्रह्मानुभूसतवरदे िततम ् जनानाम ्।                  ण्र्ाभासत तत्त्वमस्खलम ् भवतीम ् त्रववृण्वत ्।   ॥ इसत िीतारामाङ्जनेर् कत्रव कृ त गार्िी
गार्त्रि लोकत्रवनुते िुप्रभातम ् ॥९॥                त्वम ् िवादाऽसि तरुणारुणफदव्र्दे हे              िुप्रभातम ् ॥
तारस्वरे ण मधुरम ् पररगीर्माने                      गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१९॥
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                                                          गार्िीरहस्र्ोपसनषत ्
॥ गार्िीरहस्र्ोपसनषत ् ॥                                             धीमहीत्र्डतरात्मा । सधर् इत्र्डतरात्मा परः ।
ॐ स्वस्स्त सिद्धम ् । ॐ नमो ब्रह्मणे ।                               र् इसत िदासशवपुरुषः । नो इत्र्स्माक स्वधमे ।
                                                                                                        ं
ॐ नमस्कृ त्र् र्ाज्ञवल्क्र् ऋत्रषः स्वर्ंभुवं पररपृच्च्हसत ।         प्रिोदर्ाफदसत प्रिोफदत काम इमान ् लोकान ्
हे ब्रह्मन ् गार्त्र्र्ा उत्पत्रत्तः श्रोतुसमच्च्हासम ।              प्रत्र्ाश्रर्ते र्ः परो धमा इत्र्ेषा गार्िी ।
अथातो वसिष्ठः स्वर्ंभुवं पररपृच्च्हसत ।                              िा ि फक गोिा कत्र्क्षरा कसतपादा । कसत कक्षर्ः ।
                                                                            ं                               ु
र्ो ब्रह्मा ि ब्रह्मोवाि ।                                           कासन शीषाास्ण । िांख्र्ार्नगोिा ि ितुत्रवंशत्र्क्षरा
ब्रह्मज्ञानोत्पत्तेः प्रकृ सतं व्र्ाख्र्ास्र्ामः ।                   गार्िी त्रिपादा ितुष्पादा । पुनस्तस्र्ाश्चत्वारः पादाः
को नाम स्वर्ंभू पुरुष इसत ।                                          षट् कस्क्षकाः पञ्ि शीषाास्ण भवस्डत ।
                                                                          ु
तेनाङ्गुलीमथ्र्मानात ् िसललमभवत ् ।                                  क ि पादाः काश्च कक्षर्ः कासन शीषाास्ण ।
                                                                      े               ु
िसललात ् फनमभवत ् । फनाद्बद्बदमभवत ् ।
          े          े    ु ु                                        ऋग्वेदोऽस्र्ाः प्रथमः पादो भवसत। र्जुवदो फद्वतीर्ः पादः।
                                                                                                           े
बुद्बदादण्िमभवत ् । अण्िाद्ब्रह्माभवत ् ।
     ु                                                               िामवेदस्तृतीर्ः पादः । अथवावेदश्चतुथः पादः ।
                                                                                                         ा
ब्रह्मणो वार्ुरभवत ् । वार्ोरस्ग्नरभवत ् ।                           पूवाा फदक् प्रथमा कस्क्षभावसत। दस्क्षणा फद्वतीर्ा कस्क्षभावसत।
                                                                                        ु                               ु
अग्नेरोङ्कारोऽभवत ् । ओङ्काराद्व्र्ानऱृसतरभवत ् ।                    पस्श्चमा तृतीर्ा कस्क्षभावसत । उत्तरा ितुथी कस्क्षभावसत ।
                                                                                       ु                          ु
व्र्ानऱृत्र्ा गार्त्र्र्भवत ् ।गार्त्र्र्ा िात्रवत्र्र्भवत ् ।       ऊध्वं पञ्िमी कस्क्षभावसत । अधः षष्ठी कस्क्षभावसत ।
                                                                                   ु                       ु
िात्रवत्र्र्ा िरस्वत्र्भवत ् । िरस्वत्र्ा िवे वेदा अभवन ् ।          व्र्ाकरणोऽस्र्ाः प्रथमः शीषो भवसत । सशक्षा फद्वतीर्ः।
िवेभ्र्ो वेदेभ्र्ः िवे लोका अभवन ् ।                                 कल्पस्तृतीर्ः। सनरुिश्चतुथः। ज्र्ोसतषामर्नसमसत पञ्िमः।
                                                                                               ा
िवेभ्र्ो लोकभ्र्ः िवे प्रास्णनोऽभवन ् ।
            े                                                        का फदक् को वणाः फकमार्तनं कः स्वरः फक लक्षणम ्।
                                                                                                          ं
                                                                     कासन अक्षरदै वतासन क ऋषर्ः कासन च्हडदांसि का शिर्ः
अथातो गार्िी व्र्ाहृतर्श्च प्रवताडते ।
                                                                     कासन तत्त्वासन क िावर्वाः ।
                                                                                     े
का ि गार्िी काश्च व्र्ाहृतर्ः ।
                                                                     पूवाार्ां भवतु गार्िी । मध्र्मार्ां भवतु िात्रविी ।
फक भूः फक भुवः फक िुवः फक महः फक जनः फक तपः
  ं      ं       ं       ं      ं      ं
                                                                     पस्श्चमार्ां भवतु िरस्वती ।
फक ित्र्ं फक तत ् फक ित्रवतुः फक वरे ण्र्ं फक भगाः
  ं         ं       ं           ं            ं
                                                                     रिा गार्िी । श्वेता िात्रविी । कृ ष्णा िरस्वती ।
फक दे वस्र् फक धीमफह फक सधर्ः फक र्ः फक नः फक
  ं           ं        ं        ं      ं     ं
                                                                     पृसथव्र्डतररक्षं द्यौरार्तनासन ।
प्रिोदर्ात ् ।
                                                                     अकारोकारमकाररूपोदात्ताफदस्वरास्त्मका ।
ॐ भूररसत भुवो लोकः । भुव इत्र्डतररक्षलोकः । स्वररसत
                                                                     पूवाा िडध्र्ा हं िवाफहनी ब्राह्मी ।
स्वगालोकः ।
                                                                     मध्र्मा वृषभवाफहनी माहे श्वरी ।
मह इसत महलोकः । जन इसत जनोलोकः । तप इसत
                                                                     पस्श्चमा गरुिवाफहनी वैष्णवी ।
तपोलोकः । ित्र्समसत ित्र्लोकः ।
                                                                     पूवााह्णकासलका िडध्र्ा गार्िी कमारी
                                                                                                    ु
तफदसत तदिौ तेजोमर् तेजोऽस्ग्नदे वता ।
                                                                     रिा रिाङ्गी रिवासिनी रिगडधमाल्र्ानुलेपनी
ित्रवतुररसत ित्रवता िात्रविमाफदत्र्ो वै । वरे ण्र्समत्र्ि
                                                                     पाशाकशाङ्क्षमालाकमण्िलुवरहस्ता हं िारूढा ब्रह्मदै वत्र्ा
                                                                          ु
प्रजापसतः ।
                                                                     ऋग्वेदिफहता आफदत्र्पथगासमनी भूमण्िलवासिनी ।
भगा इत्र्ापो वै भगाः । दे वस्र् इतीडद्रो दे वो द्योतत इसत
                                                                     मध्र्ाह्नकासलका िडध्र्ा िात्रविी र्ुवती श्वेताङ्गी
ि इडद्रस्तस्मात ् िवापुरुषो नाम रुद्रः ।
                                                                     श्वेतवासिनीश्वेतगडधमाल्र्ानुलेपनी त्रिशूलिमरुहस्ता
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वृषभारूढा रुद्रदै वत्र्ार्जुवेदिफहता आफदत्र्पथगासमनी                             सित्तज्ञानानीसत प्रत्र्क्षराणां तत्त्वासन प्रतीर्डते ।
भुवोलोक व्र्वस्स्थता ।
       े                                                                         ि्पकातिीकङ्कमत्रपङ्गलेडद्रनीलास्ग्नप्रभोद्यत्िूर्ा
                                                                                          ु ु
िार्ं िडध्र्ा िरस्वती वृद्धा कृ ष्णाङ्गी कृ ष्णवासिनी                            त्रवद्युत्तारकिरोजगौरमरतकशुक्लकडदे डदशङ्खपाण्िु
                                                                                                                ु     ु
कृ ष्णगडधमाल्र्ानुलेपना शङ्खिक्रगदाभर्हस्ता                                      नेिनीलोत्पलिडदनागुरुकस्तूरीगोरोिनघनिारिस्डनभं
गरुिारूढा त्रवष्णुदैवत्र्ा िामवेदिफहता आफदत्र्पथगासमनी                           प्रत्र्क्षरमनुस््ऱृत्र् िमस्तपातकोपपातकमहापातका
स्वगालोकव्र्वस्स्थता ।                                                           ग्र्ागमनगोहत्र्ाब्रह्महत्र्ाभ्रूणहत्र्ावीरहत्र्ा
अस्ग्नवार्ुिूर्रूपावहनीर्गाहा पत्र्दस्क्षणास्ग्नरूपा
               ा                                                 ऋग्र्जु         पुरुषहत्र्ाऽजडमकृ तहत्र्ास्त्रीहत्र्ागुरुहत्र्ात्रपतृहत्र्ा
िामरूपा भूभवःस्वररसत व्र्ाहृसतरूपा प्रातमाध्र्ाह्न तृतीर्
           ुा                                                                    प्राणहत्र्ािरािरहत्र्ाऽभक्ष्र्भक्षणप्रसतग्रह
िवनास्त्मका ित्त्वरजस्तमोगुणास्त्मका जाग्रत्स्वप्न िुषुप्त                       स्वकमा त्रवच्च्हे दनस्वा्र्ासताहीनकमाकरणपरधनापहरण
रूपा विुरुद्राफदत्र्रूपा गार्िीत्रिष्टु ब्जगतीरूपा ब्रह्मशङ्करत्रवष्णु           शूद्राडन भोजनशिुमारणिण्िालीगमनाफदिमस्त
रूपेच्च्हाज्ञानफक्रर्ाशत्रिरूपा स्वरास्ड्वराड्वषड्ब्रह्मरूपेसत |                 पापहरणाथं िंस्मरे त ् ।
प्रथममाग्नेर्ं फद्वतीर्ं प्राजापत्र्ं तृतीर्ं िौ्र्ं ितुथमीशानं
                                                         ा                       मूधाा ब्रह्मा सशखाडतो त्रवष्णुललाटं रुद्रिक्षुषी िडद्राफदत्र्ौ
                                                                                                                ा
पञ्िममाफदत्र्ं षष्ठं गाहा पत्र्ं िप्तमं मैिमष्टमं भगदै वतं                       कणौ शुक्रबृहस्पती नािापुटे अस्श्वनौ दडतोष्ठावुभे िडध्र्े
नवममार्ामणं दशमं िात्रविमेकादशं त्वाष्ट्रं द्वादशं पौष्णं                        मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादर्ो हृदर्ं पजाडर् उदरमाकाशो
िर्ोदशमैद्राग्नं ितुदाशं वार्व्र्ं पञ्िदशं वामदे वं षोिषं                        नासभरस्ग्नः
मैिावरुणं िप्तदशं भ्रातृव्र्मष्टादशं वैष्णवमेकोनत्रवंशं वामनं                    कफटररडद्राग्नी    जघनं      प्राजापत्र्मूरू   कलािमूलं
                                                                                                                                ै              जानुनी
त्रवंशं वैश्वदे वमेकत्रवंशं रौद्रं द्वात्रवंशं कौबेरं िर्ोत्रवंशमास्श्वनं        त्रवश्वेदेवौ जङ्घे सशसशरः गुल्फासन पृसथवीवनस्पत्र्ादीसन
ितुत्रवंशं ब्राह्मसमसत प्रत्र्क्षरदै वतासन ।                                     नखासन महती अस्थीसन नवग्रहा अिृक्कतुमांिमृतिडधर्ः
                                                                                                                  े        ु
प्रथमं वासिष्ठं फद्वतीर्ं भारद्वाजं तृतीर्ं गाग्र्ं ितुथमुप-
                                                        ा                        कालद्वर्ास्फालनं      िंवत्िरो     सनमेषोऽहोरािसमसत           वाग्दे वीं
मडर्वं पञ्िमं भागावं षष्ठं शास्ण्िल्र्ं िप्तमं लोफहतमाष्टमं                      गार्िीं शरणमहं प्रपद्ये ।
वैष्णवं नवमं शातातपं दशमं िनतकमारमेकादशं वेदव्र्ािं
                              ु                                                  र् इदं गार्िीरहस्र्मधीते तेन क्रतुिहस्रसमष्टं भवसत ।
द्वादशं शुक िर्ोदशं पाराशर्ं ितुदाशं पौण्रक पञ्िदशं क्रतुं
           ं                               ं                                     र् इदं गार्िीरहस्र्मधीते फदविकृ तं पापं नाशर्सत ।
षोिशं      दाक्षं     िप्तदशं        काश्र्पमष्टादशमािेर्म ्      एकोन           प्रातरमध्र्ाह्नर्ोः षण्मािकृ तासन पापासन नाशर्सत ।
त्रवंशमगस्त्र्ं     त्रवंशमौद्दालकमेकत्रवंशमास्ङ्गरिं             द्वात्रवंशं    िार्ं प्रातरधीर्ानो जडमकृ तं पापं नाशर्सत ।
नासमकतुं िर्ोत्रवंशं मौद्गल्र्ं ितुत्रवंशमास्ङ्गरि वैश्वासमि
     े                                                                           र् इदं गार्िीरहस्र्ं ब्राह्मणः पठे त ् तेन गार्त्र्र्ाः
समसत प्रत्र्क्षराणामृषर्ो भवस्डत ।                                               षत्रष्टिहस्रलक्षास्ण जप्तासन भवस्डत । िवाान ् वेदानधीतो
गार्िी     त्रिष्टु ब्जगत्र्नुष्टुप्क्षद्वपस्ङ्ि   बृहत्र्ुस्ष्णगफदसतररसत        भवसत ।
त्रिरावृत्तेन च्हडदांसि प्रसतपाद्यडते । प्रह्लाफदनी प्रज्ञात्रवश्वभद्रा          िवेषु तीथेषु स्नातो भवसत । अपेर्पानात ् पूतो भवसत ।
त्रवलासिनी प्रभा शाडता मा कास्डत स्पशाा दगाा िरस्वती
                                         ु                                       अभक्ष्र्भक्षणात ् पूतो भवसत। वृषलीगमनात ् पूतो भवसत ।
त्रवरूपा     त्रवशालाक्षी          शासलनी          व्र्ात्रपनी   त्रवमला         अब्रह्मिारी ब्रह्मिारी भवसत ।
तमोऽपहाररणीिूक्ष्मावर्वा पद्मालर्ा त्रवरजा त्रवश्वरूपा भद्रा                     पस्ङ्िषु िहस्रपानात ् पूतो भवसत ।
कृ पािवातोमुखीसत ितुत्रवंशसतशिर्ो सनगद्यडते ।                                    अष्टौ ब्राह्मणान ् ग्राहसर्त्वा ब्रह्मलोक ि गच्च्हसत ।
                                                                                                                          ं
पृसथव्र्प्तेजो वाय्वाकाशगडधरिरूपस्पशाशब्दवाक्र्ासन                               इत्र्ाह भगवान ् ब्रह्मा ॥
पादपार्ूपस्थत्वक्क्षद्विक्षुश्रोिस्जह्वाघ्राणमनोबुद्ध्र्हङ्कार                   इसत गार्िीरहस्र्ोपसनषत ् िमाप्ता ॥
43                                                मई 2012




                                                     गार्िी मडिाथाः िाथा
अथ         िवादेवात्मनः     िवाशिः
                                 े       िवाावभािकतेजोमर्स्र्             परमात्मनः           िवाात्मकत्वद्योतनाथं    िवाात्मकत्वप्रसतपादक
गार्िीमहामडिस्र्ोपािनप्रकारः प्रकाश्र्ते । ति गार्िीं प्रणवाफदिप्तव्र्ाहृत्र्ुपेतां सशरःिमेतां िवावेदिारसमसत वदस्डत।,
एवंत्रवसशष्टा गार्िी प्राणार्ामैरुपास्र्ा । िप्रणव व्र्ाहृसतिर्ोपेता प्रणवाडता गार्िी जपाफदसभरुपास्र्ा ।


ति शुद्धगार्िी प्रत्र्ग्ब्रह्मैक्र्बोसधका । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ाफदसत नः अस्माक सधर्ः बुत्रद्धः र्ः प्रिोदर्ात ् प्रेरर्ेत ् इसत
                                                                                ं
िवाबुत्रद्ध िंज्ञाडतःकरणप्रकाशकः िवािाक्षी प्रत्र्गात्मा उच्र्ते । तस्र् प्रिोदर्ाच्छब्दसनफदा ष्टस्र्ात्मनः स्वरूपभूतं परं ब्रह्म
तत्ित्रवतुररत्र्ाफदपदै सनाफदा श्र्ते ।


ति        "ॐ तत्िफदसत सनदे शो ब्रह्मणस्स्त्रत्रवधःस्मृतः " इसत तच्छब्दे न प्रत्र्ग्भूतं स्वतःसिद्धं परं ब्रह्मोच्र्ते । ित्रवतुररसत
िृत्रष्टस्स्थसतलर्     लक्षणकस्र्        िवाप्रपञ्िस्र्    िमस्तद्वै तत्रवभ्रमस्र्ासधष्ठानं      लक्ष्र्ते    ।   वरे ण्र्समसत   िवावरणीर्ं
सनरसतशर्ानडदरूपम ् । भगा इत्र्त्रवद्याफद दोषभजानात्मकज्ञानैकत्रवषर्म ् । दे वस्र्ेसत िवाद्योतनात्मकाखण्ि सिदे करिम ् ।
ित्रवतुदेवस्र्ेत्र्ि षष्ठ्र्थो राहोः सशर इसतवदौपिाररकः बुद्ध्र्ाफदिवादृश्र्िास्क्षलक्षणं र्डमे स्वरूपं तत्िवाासधष्ठानभूतं
परमानडदं सनरस्तिमस्तानथारूपं स्वप्रकाशसिदात्मक ब्रह्मेत्र्ेवं धीमफह ध्र्ार्ेम ।
                                              ं


एवं िसत िह ब्रह्मणा स्वत्रववताजिप्रपञ्िस्र् रज्जुिपाडर्ार्ेन अपवाद िामानासधकरण्र्रूपमेकत्वं।, िोऽर्समसत डर्ार्ेन
िवािास्क्षप्रत्र्गात्मनो     ब्रह्मणा िह तादात््र्रूपमेकत्वं भवतीसत िवाात्मकब्रह्मबोधकोऽर्ं                  गार्िीमडिः िंपद्यते ।


िप्तव्र्ाहृसतनामर्मथाःभूररसत िडमािमुच्र्ते भुव इसत िवं भावर्सत प्रकाशर्तीसत व्र्ुत्पत्त्र्ा सिद्रपमुच्र्ते । िुत्रव्रर्त इसत
                                                                                                 ू
व्र्ुत्पत्त्र्ा   िुष्ठु िवैत्रव्रार्माणिुखस्वरूपमुच्र्ते । मह इसत महीर्ते पूज्र्त इसत व्र्ुत्पत्त्र्ा िवाासतशर्त्वमुच्र्ते । जन
इसतजनर्तीसत जनः। िकल कारणत्वमुच्र्ते । तप इसत िवातेजोरूपत्वम ् । ित्र्समसत िवाबाधरफहतम ् ।                                           एतदि
                                                                                                                                        ु ं
भवसतर्ल्लोक िद्रपं तदंकारवाच्र्ं ब्रह्मैव। आत्मनोऽस्र् िस्च्िद्रपस्वभावाफदसत । अथ भूरादर्ः िवालोका ओंकारावाच्र्
           े    ू                                               ू
ब्रह्मात्मकाः। न तद्व्र्सतररि फकसिदस्तीसत व्र्ाहृतर्ोऽत्रप िवाात्मक ब्रह्मबोसधकाः।
                             ं  ं


गार्िीसशरिोऽप्र्र्मेवाथाः आप इत्र्ाप्नोतीसत व्र्ुत्पत्त्र्ा             व्र्ात्रपत्वमुच्र्ते ज्र्ोसतररसत प्रकाशरूपत्वम ् । रि इसत
िवाासतशर्त्वम ्        ।    अमृतसमसत         मरणाफद       िंिारसनमुित्वम ्
                                                                   ा              ।    िवाव्र्ात्रपिवाप्रकाशकिवोत्कृ ष्टसनत्र्मुिमात्मरूपं
िस्च्िदात्मक र्दंकारवाच्ग्र्ं ब्रह्म तदहमस्स्म ।
            ं
                                                                                                    स्फफटक गणेश

इसत गार्िीमडिस्र्ाथाः ।                                                     स्फफटक ऊजाा को कफद्रत करने मं िहार्ता मानागर्ा
                                                                                            ं

गुहाशर्ब्रह्महुताशनोऽहं किेदमंशाख्र् हत्रवहुातं ित।                         हं । इि क प्रभाव िे र्ह व्र्त्रि को नकारात्मक उजाा
                                                                                     े
                                                                            िे बिाता हं एवं एक उत्तम गुणवत्ता वाले स्फफटक िे
त्रवलीर्ते नेदमहं भवानी त्र्ेष प्रकारस्तु त्रवसभद्यतेऽि ॥
                                                                            बनी गणेश प्रसतमा को और असधक प्रभावी और पत्रवि
र्दस्स्त र्द्भासत तदात्मरूपं नाडर्त्ततो भासत न िाडर्दस्स्त ।
                                                                            माना जाता हं ।                    RS-550 िे RS-8200 तक
स्वभाविंत्रवत्प्रत्रवभासत कवला ग्राह्यं ग्रहीतेसत मृषैव कल्पना ॥
                           े
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                                   श्री गार्िी फदव्र् िहस्रनाम स्तोिम ्
श्रीगणेशार् नमः ।                                          ित्कीसतास्िास्त्वका िाध्वी िस्च्िदानडदरूत्रपणी ।
                                                           िङ्कल्परूत्रपणी िडध्र्ा िालग्रामसनवासिनी ॥१४॥
ध्र्ानम ्
                                                           िवोपासधत्रवसनमुिा ित्र्ज्ञानप्रबोसधनी ।
                                                                          ा
रिश्वेतफहरण्र्नीलधवलैर्िां त्रिनेिोज्ज्वलां
                       ुा
                                                           त्रवकाररूपा त्रवप्रश्रीत्रवाप्राराधनतत्परा ॥१५॥
रिारिनवस्रजं मस्णगणैर्ुिां कमारीसममाम ्।
                       ा    ु
                                                           त्रवप्रप्रीत्रवाप्रकल्र्ाणी त्रवप्रवाक्र्स्वरूत्रपणी ।
गार्िी कमलािनां करतलव्र्ानद्धकण्िा्बुजां
                              ु
                                                           त्रवप्रमस्डदरमध्र्स्था त्रवप्रवादत्रवनोफदनी ॥१६॥
पद्माक्षीं ि वरस्रजञ्ि दधतीं हं िासधरूढां भजे॥
                                                           त्रवप्रोपासधत्रवसनभेिी त्रवप्रहत्र्ात्रवमोिनी ।
ॐ तत्काररूपा तत्वज्ञा तत्पदाथास्वरूत्रपस्ण ।
                                                           त्रवप्रिाता त्रवप्रगोिा त्रवप्रगोित्रववसधानी ॥१७॥
तपस्स्व्र्ाध्र्ार्सनरता तपस्स्वजननडनुता ॥१॥
                                                           त्रवप्रभोजनिडतुष्टा त्रवष्णुरूपा त्रवनोफदनी ।
तत्कीसतागुणि्पडना तथ्र्वाक्ि तपोसनसधः।
                                                           त्रवष्णुमार्ा त्रवष्णुवडद्या त्रवष्णुगभाा त्रवसित्रिणी ॥१८॥
तत्वोपदे शि्बडधा तपोलोकसनवासिनी ॥२॥
                                                           वैष्णवी त्रवष्णुभसगनी त्रवष्णुमार्ात्रवलासिनी ।
तरुणाफदत्र्िङ्काशा तप्तकाञ्िनभूषणा ।
                                                           त्रवकाररफहता त्रवश्वत्रवज्ञानघनरूत्रपणी ॥१९॥
तमोपहाररस्ण तडिी ताररस्ण ताररूत्रपस्ण ॥३॥
                                                           त्रवबुधा त्रवष्णुिङ्कल्पा त्रवश्वासमिप्रिाफदनी ।
तलाफदभुवनाडतस्था तकशास्त्रत्रवधासर्नी ।
                   ा
                                                           त्रवष्णुितडर्सनलर्ा त्रवष्णुस्वा त्रवश्विास्क्षणी ॥२०॥
                                                                    ै
तडििारा तडिमाता तडिमागाप्रदसशानी ॥४॥
                                                           त्रववेफकनी त्रवर्द्रपा त्रवजर्ा त्रवश्वमोफहनी ।
                                                                               ू
तत्वा तडित्रवधानज्ञा तडिस्था तडििास्क्षस्ण ।
                                                           त्रवद्याधरी त्रवधानज्ञा वेदतत्वाथारूत्रपणी ॥२१॥
तदे कध्र्ानसनरता तत्वज्ञानप्रबोसधनी ॥५॥
                                                           त्रवरूपाक्षी त्रवराड्रूपा त्रवक्रमा त्रवश्वमङ्गला ।
तडनाममडििुप्रीता तपस्स्वजनिेत्रवता ।
                                                           त्रवश्व्भरािमाराध्र्ा त्रवश्वभ्रमणकाररणी ॥२२॥
िाकाररूपा िात्रविी िवारूपा िनातनी ॥६॥
                                                           त्रवनार्की त्रवनोदस्था वीरगोष्ठीत्रववसधानी ।
िंिारदःखशमनी िवार्ागफलप्रदा ।
      ु                                                    त्रववाहरफहता त्रवडध्र्ा त्रवडध्र्ािलसनवासिनी ॥२३॥
िकला ित्र्िङ्कल्पा ित्र्ा ित्र्प्रदासर्नी ॥७॥
                                                           त्रवद्यात्रवद्याकरी त्रवद्या त्रवद्यात्रवद्याप्रबोसधनी ।
िडतोषजननी िारा ित्र्लोकसनवासिनी ।
                                                           त्रवमला त्रवभवा वेद्या त्रवश्वस्था त्रवत्रवधोज्ज्वला ॥२४॥
िमुद्रतनर्ाराध्र्ा िामगानत्रप्रर्ा िती ॥८॥
                                                           वीरमध्र्ा वरारोहा त्रवतडिा त्रवश्वनासर्का ।
िमानी िामदे वी ि िमस्तिुरिेत्रवता ।
                                                           वीरहत्र्ाप्रशमनी त्रवनम्रजनपासलनी ॥२५॥
िवाि्पत्रत्तजननी िद्गणा िकलेष्टदा ॥९॥
                     ु                                     वीरधीत्रवात्रवधाकारा त्रवरोसधजननासशनी ।
िनकाफदमुसनध्र्ेर्ा िमानासधकवस्जाता ।
                                                           तुकाररूपा तुर्श्रीस्तुलिीवनवासिनी ॥२६॥
                                                                         ा
िाध्र्ा सिद्धा िुधावािा सित्रद्धस्िाध्र्प्रदासर्नी ॥१०॥
                                                           तुरङ्गी तुरगारूढा तुलादानफलप्रदा ।
िद्युगाराध्र्सनलर्ा िमुत्तीणाा िदासशवा ।
                                                           तुलामाघस्नानतुष्टा तुत्रष्टपुत्रष्टप्रदासर्नी ॥२७॥
िवावेदाडतसनलर्ा िवाशास्त्राथागोिरा ॥११॥
                                                           तुरङ्गमप्रिडतुष्टा तुसलता तुल्र्मध्र्गा ।
िहस्रदलपद्मस्था िवाज्ञा िवातोमुखी ।
                                                           तुङ्गोत्तुङ्गा तुङ्गकिा तुफहनािलिंस्स्थता ॥२८॥
                                                                                ु
िमर्ा िमर्ािारा िदिद्ग्रस्डथभेफदनी ॥१२॥
                                                           तु्बुराफदस्तुसतप्रीता तुषारसशखरीश्वरी ।
िप्तकोफटमहामडिमाता िवाप्रदासर्नी ।
                                                           तुष्टा ि तुत्रष्टजननी तुष्टलोकसनवासिनी ॥२९॥
िगुणा ि्भ्रमा िाक्षी िवाितडर्रूत्रपणी ॥१३॥
                         ै
                                                           तुलाधारा तुलामध्र्ा तुलस्था तुर्रूत्रपणी ।
                                                                                           ा
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तुरीर्गुणग्भीरा तुर्नादस्वरूत्रपणी ॥३०॥
                    ा                              रस्ञ्जता राजजननी र्र्ा राकडदमध्र्गा ॥४७॥
                                                                             े ु
तुर्त्रवद्यालास्र्तुष्टा तूर्शास्त्राथावाफदनी ।
    ा                        ा                     रात्रवणी रासगणी रञ्ज्र्ा राजराजेश्वरासिाता ।
तुरीर्शास्त्रतत्वज्ञा तूर्नादत्रवनोफदनी ॥३१॥
                          ा                        राजडवती राजनीती रजतािलवासिनी ॥४८॥
तूर्नादाडतसनलर्ा तूर्ाानडदस्वरूत्रपणी ।
    ा                                              राघवासिातपादश्री राघवा राघवत्रप्रर्ा ।
तुरीर्भत्रिजननी तुर्मागाप्रदसशानी ॥३२॥
                    ा                              रत्ननूपुरमध्र्ाढ्र्ा रत्नद्वीपसनवासिनी ॥४९॥
वकाररूपा वागीशी वरे ण्र्ा वरिंत्रवधा ।             रत्नप्राकारमध्र्स्था रत्नमण्िपमध्र्गा ।
वरा वररष्ठा वैदेही वेदशास्त्रप्रदसशानी ॥३३॥        रत्नासभषेकिडतुष्टा रत्नाङ्गी रत्नदासर्नी ॥५०॥
त्रवकल्पशमनी वाणी वास्ञ्छताथाफलप्रदा ।             स्णकाररूत्रपणी सनत्र्ा सनत्र्तृप्ता सनरञ्जना ।
वर्स्था ि वर्ोमध्र्ा वर्ोवस्थात्रववस्जाता ॥३४॥     सनद्रात्र्र्त्रवशेषज्ञा नीलजीमूतिस्डनभा ॥५१॥
वस्डदनी वाफदनी वर्ाा वाङ्मर्ी वीरवस्डदता ।         नीवारशूकवत्तडवी सनत्र्कल्र्ाणरूत्रपणी ।
वानप्रस्थाश्रमस्था ि वनदगाा वनालर्ा ॥३५॥
                        ु                          सनत्र्ोत्िवा सनत्र्पूज्र्ा सनत्र्ानडदस्वरूत्रपणी ॥५२॥
वनजाक्षी वनिरी वसनता त्रवश्वमोफहनी ।               सनत्रवाकल्पा सनगुणस्था सनस्श्चडता सनरुपद्रवा ।
                                                                    ा
वसिष्ठावामदे वाफदवडद्या वडद्यस्वरूत्रपणी ॥३६॥      सनस्िंशर्ा सनरीहा ि सनलोभा नीलमूधजा ॥५३॥
                                                                                    ा
वैद्या वैद्यसिफकत्िा ि वषट्कारी विुडधरा ।          सनस्खलागममध्र्स्था सनस्खलागमिंस्स्थता ।
विुमाता विुिाता विुजडमत्रवमोिनी ॥३७॥               सनत्र्ोपासधत्रवसनमुिा सनत्र्कमाफलप्रदा ॥५४॥
                                                                      ा
विुप्रदा वािुदेवी वािुदेव मनोहरी ।                 नीलग्रीवा सनराहारा सनरञ्जनवरप्रदा ।
वािवासिातपादश्रीवाािवाररत्रवनासशनी ॥३८॥            नवनीतत्रप्रर्ा नारी नरकाणावताररणी ॥५५॥
वागीशी वाङ्मनस्थार्ी वसशनी वनवािभूः ।              नारार्णी सनरीहा ि सनमाला सनगुणत्रप्रर्ा ।
                                                                                ा
वामदे वी वरारोहा वाद्यघोषणतत्परा ॥३९॥              सनस्श्चडता सनगमािारसनस्खलागम ि वेफदनी ॥५६॥
वािस्पसतिमाराध्र्ा वेदमाता त्रवनोफदनी ।            सनमेषासनसमषोत्पडना सनमेषाण्ित्रवधासर्नी ।
रे काररूपा रे वा ि रे वातीरसनवासिनी ॥४०॥           सनवातदीपमध्र्स्था सनत्रवाघ्ना नीिनासशनी ॥५७॥
राजीवलोिना रामा रासगस्णरसतवस्डदता ।                नीलवेणी नीलखण्िा सनत्रवाषा सनष्कशोसभता ।
रमणीरामजप्ता ि राज्र्पा राजताफद्रगा ॥४१॥           नीलांशुकपरीधाना सनडदघ्नी ि सनरीश्वरी ॥५८॥
राफकणी रे वती रक्षा रुद्रजडमा रजस्वला ।            सनश्वािोच््वािमध्र्स्था सनत्र्र्ानत्रवलासिनी ।
रे णुकारमणी र्र्ा रसतवृद्धा रता रसतः ॥४२॥          र्ङ्काररूपा र्डिेशी र्डिी र्डिर्शस्स्वनी ॥५९॥
रावणानडदिडधार्ी राजश्री राजशेखरी ।                 र्डिाराधनिडतुष्टा र्जमानस्वरूत्रपणी ।
रणमद्या रथारूढा रत्रवकोफटिमप्रभा ॥४३॥              र्ोसगपूज्र्ा र्कारस्था र्ूपस्त्भसनवासिनी ॥६०॥
रत्रवमण्िलमध्र्स्था रजनी रत्रवलोिना ।              र्मघ्नी र्मकल्पा ि र्शःकामा र्तीश्वरी ।
रथाङ्गपास्ण रक्षोघ्नी रासगणी रावणासिाता ॥४४॥       र्मादीर्ोगसनरता र्सतदःखापहाररणी ॥६१॥
                                                                        ु
र्भाफदकडर्काराध्र्ा राज्र्दा राज्र्वसधानी ।        र्ज्ञा र्ज्वा र्जुगर्ा र्ज्ञेश्वरपसतव्रता ।
                                                                      े
रजताद्रीशिस्क्थस्था र्र्ा राजीवलोिना ॥४५॥          र्ज्ञिूिप्रदा र्ष्ट्री र्ज्ञकमाफलप्रदा ॥६२॥
र्र्वाणी रमाराध्र्ा राज्र्धािी रतोत्िवा ।          र्वाङ्करत्रप्रर्ा र्डिी र्वदघ्नी र्वासिाता ।
                                                          ु
रे वती ि रतोत्िाहा राजहृद्रोगहाररणी ॥४६॥           र्ज्ञकती र्ज्ञभोक्िी र्ज्ञाङ्गी र्ज्ञवाफहनी ॥६३॥
रङ्गप्रवृद्धमधुरा रङ्गमण्िपमध्र्गा ।               र्ज्ञिाक्षी र्ज्ञमुखी र्जुषी र्ज्ञरस्क्षणी ।
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भकाररूपा भद्रे शी भद्रकल्र्ाणदासर्नी ॥६४॥          दे वर्ाना दे वता ि दे विैडर्प्रपासलनी ॥८१॥
भित्रप्रर्ा भििखा भिाभीष्टस्वरूत्रपणी ।            वकाररूपा वाग्दे वी वेदमानिगोिरा ।
भसगनी भििुलभा भत्रिदा भिवत्िला ॥६५॥                वैकण्ठदे सशका वेद्या वार्ुरूपा वरप्रदा ॥८२॥
                                                      ु
भििैतडर्सनलर्ा भिबडधत्रवमोिनी ।                    वक्रतुण्िासिातपदा वक्रतुण्िप्रिाफदनी ।
भिस्वरूत्रपणी भाग्र्ा भिारोग्र्प्रदासर्नी ॥६६॥     वैसित्र्र्रूपा विुधा विुस्थाना विुत्रप्रर्ा ॥८३॥
भिमाता भिग्र्ा भिाभीष्टप्रदासर्नी ।                वषट्कारस्वरूपा ि वरारोहा वरािना ।
भास्करी भैरवी भोग्र्ा भवानी भर्नासशनी ॥६७॥         वैदेही जननी वेद्या वैदेहीशोकनासशनी ॥८४॥
भद्रास्त्मका भद्रदार्ी भद्रकाली भर्ङ्करी ।         वेदमाता वेदकडर्ा वेदरूपा त्रवनोफदनी ।
भगसनष्र्स्डदनी भू्नी भवबडधत्रवमोिनी ॥६८॥           वेदाडतवाफदनी िैव वेदाडतसनलर्त्रप्रर्ा ॥८५॥
भीमा भविखा भङ्गीभङ्गुरा भीमदसशानी ।                वेदश्रवा वेदघोषा वेदगीता त्रवनोफदनी ।
भल्ली भल्लीधरा भीरुभेरुण्िा भीमपापहा ॥६९॥          वेदशास्त्राथातत्वज्ञा वेदमागा प्रदसशानी ॥८६॥
भावज्ञा भोगदािी ि भवघ्नी भूसतभूषणा ।               वैफदकीकमाफलदा वेदिागरवािवा ।
भूसतदा भूसमदािी ि भूपसतत्वप्रदासर्नी ॥७०॥          वेदवडद्या वेदगुह्या वेदाश्वरथवाफहनी ॥८७॥
भ्रामरी भ्रमरी भारी भविागरताररणी ।                 वेदिक्रा वेदवडद्या वेदाङ्गी वेदत्रवत्कत्रवः ।
भण्िािुरवधोत्िाहा भाग्र्दा भावमोफदनी ॥७१॥          िकाररूपा िामडता िामगान त्रविक्षणा ॥८८॥
गोकाररूपा गोमाता गुरुपत्नी गुरुत्रप्रर्ा ।         िाम्राज्ञी नामरूपा ि िदानडदप्रदासर्नी ।
गोरोिनत्रप्रर्ा गौरी गोत्रवडदगुणवसधानी ॥७२॥        िवादृक्िस्डनत्रवष्टा ि िवाि्प्रेत्रषणीिहा ॥८९॥
गोपालिेष्टािडतुष्टा गोवधानत्रववसधानी ।             िव्र्ापिव्र्दा िव्र्िध्रीिी ि िहासर्नी ।
गोत्रवडदरूत्रपणी गोप्िी गोकलानांत्रववसधानी ॥७३॥
                           ु                       िकला िागरा िारा िावाभौमस्वरूत्रपणी ॥९०॥
गीता गीतत्रप्रर्ा गेर्ा गोदा गोरूपधाररणी ।         िडतोषजननी िेव्र्ा िवेशी िवारञ्जनी ।
गोपी गोहत्र्शमनी गुस्णनी गुस्णत्रवग्रहा ॥७४॥       िरस्वती िमाराद्या िामदा सिडधुिेत्रवता ॥९१॥
गोत्रवडदजननी गोष्ठा गोप्रदा गोकलोत्िवा ।
                               ु                   ि्मोफहनी िदामोहा िवामाङ्गल्र्दासर्नी ।
गोिरी गौतमी गङ्गा गोमुखी गुणवासिनी ॥७५॥            िमस्तभुवनेशानी िवाकामफलप्रदा ॥९२॥
गोपाली गोमर्ा गु्भा गोष्ठी गोपुरवासिनी ।           िवासित्रद्धप्रदा िाध्वी िवाज्ञानप्रदासर्नी ।
गरुिा गमनश्रेष्ठा गारुिा गरुिध्वजा ॥७६॥            िवादाररद्र्र्शमनी िवादःखत्रवमोिनी ॥९३॥
                                                                         ु
ग्भीरा गण्िकी गुण्िा गरुिध्वजवल्लभा ।              िवारोगप्रशमनी िवापापत्रवमोिनी ।
गगनस्था गर्ावािा गुणवृत्रत्तगुणोद्भवा ॥७७॥
                              ा                    िमदृत्रष्टस्िमगुणा िवागोप्िी िहासर्नी ॥९४॥
दे काररूपा दे वेशी दृग्रूपा दे वतासिाता ।          िामथ्र्ावाफहसन िाङ्ख्र्ा िाडद्रानडदपर्ोधरा ।
दे वराजेश्वराधााङ्गी दीनदै डर्त्रवमोिनी ॥७८॥       िङ्कीणामस्डदरस्थाना िाकतकलपासलनी ॥९५॥
                                                                          े ु
दे कालपररज्ञाना दे शोपद्रवनासशनी ।                 िंहाररणी िुधारूपा िाकतपुरवासिनी ।
                                                                        े
दे वमाता दे वमोहा दे वदानवमोफहनी ॥७९॥              ि्बोसधनी िमस्तेशी ित्र्ज्ञानस्वरूत्रपणी ॥९६॥
दे वेडद्रासिातपादश्री दे वदे वप्रिाफदनी ।          ि्पत्करी िमानाङ्गी िवाभाविुिंस्स्थता ।
दे शाडतरी दे शरूपा दे वालर्सनवासिनी ॥८०॥           िडध्र्ावडदनिुप्रीता िडमागाकलपासलनी ॥९७॥
                                                                              ु
दे शभ्रमणिडतुष्टा दे शस्वास्थ्र्प्रदासर्नी ।       िञ्जीत्रवनी िवामेधा िभ्र्ा िाधुिुपूस्जता ।
47                                          मई 2012



िसमद्धा िासमघेनी ि िामाडर्ा िामवेफदनी ॥९८॥                  ह्रीं मस्डदरा फहतकरा हृष्टा ि ह्रीं कलोद्भवा ॥११५॥
                                                                                                 ु
िमुत्तीणाा िदािारा िंहारा िवापावनी ।                        फहतप्रज्ञा फहतप्रीता फहतकारुण्र्वसधानी ।
ित्रपाणी िपामाता ि िमादानिुखप्रदा ॥९९॥                      फहतासिनी फहतक्रोधा फहतकमाफलप्रदा ॥११६॥
िवारोगप्रशमनी िवाज्ञत्वफलप्रदा ।                            फहमा है मवती है ्नी हे मािलसनवासिनी ।
िङ्क्रमा िमदा सिडधुः िगााफदकरणक्षमा ॥१००॥                   फहमागजा फहतकरी फहतकमास्वभात्रवनी ॥११७॥
िङ्कटा िङ्कटहरा िकङ्कमत्रवलेपना ।
                  ु ु                                       धीकाररूपा सधषणा धमारूपा धनेश्वरी ।
िुमुखा िुमुखप्रीता िमानासधकवस्जाता ॥१०१॥                    धनुधरा धराधारा धमाकमाफलप्रदा ॥११८॥
                                                                ा
िंस्तुता स्तुसतिुप्रीता ित्र्वादी िदास्पदा ।                धमाािारा धमािारा धमामध्र्सनवासिनी ।
धीकाररूपा धीमाता धीरा धीरप्रिाफदनी ॥१०२॥                    धनुत्रवाद्या धनुवदा धडर्ा धूतत्रवनासशनी ॥११९॥
                                                                             े           ा
धीरोत्तमा धीरधीरा धीरस्था धीरशेखरा ।                        धनधाडर्ाधेनुरूपा धनाढ्र्ा धनदासर्नी ।
धृसतरूपा धनाढ्र्ा ि धनपा धनदासर्नी ॥१०३॥                    धनेशी धमासनरता धमाराजप्रिाफदनी ॥१२०॥
धीरूपा धीरवडद्या ि धीप्रभा धीरमानिा ।                       धमास्वरूपा धमेशी धमााधमात्रविाररणी ।
धीगेर्ा धीपदस्था ि धीशाना धीप्रिाफदनी ॥१०४॥                 धमािूक्ष्मा धमागेहा धसमाष्ठा धमागोिरा ॥१२१॥
मकाररूपा मैिेर्ा महामङ्गलदे वता ।                           र्ोकाररूपा र्ोगेशी र्ोगस्था र्ोगरूत्रपणी ।
मनोवैकल्र्शमनी मलर्ािलवासिनी ॥१०५॥                          र्ोग्र्ा र्ोगीशवरदा र्ोगमागासनवासिनी ॥१२२॥
मलर्ध्वजराजश्रीमाार्ामोहत्रवभेफदनी ।                        र्ोगािनस्था र्ोगेशी र्ोगमार्ात्रवलासिनी ।
महादे वी महारूपा महाभैरवपूस्जता ॥१०६॥                       र्ोसगनी र्ोगरिा ि र्ोगाङ्गी र्ोगत्रवग्रहा ॥१२३॥
मनुप्रीता मडिमूसतामडिवश्र्ा महे श्वरी ।
                   ा                                        र्ोगवािा र्ोगभाग्र्ा र्ोगमागाप्रदसशानी ।
मत्तमातङ्गगमना मधुरा मेरुमण्टपा ॥१०७॥                       र्ोकाररूपा र्ोधाढ्र्ार्ोध्री र्ोधिुतत्परा ॥१२४॥
महागुप्ता महाभूता महाभर्त्रवनासशनी ।                        र्ोसगनी र्ोसगनीिेव्र्ा र्ोगज्ञानप्रबोसधनी ।
महाशौर्ाा मस्डिणी ि महावैररत्रवनासशनी ॥१०८॥                 र्ोगेश्वरप्राणानाथा र्ोगीश्वरहृफदस्स्थता ॥१२५॥
महालक्ष्मीमाहागौरी मफहषािुरमफदा नी ।                        र्ोगा र्ोगक्षेमकिी र्ोगक्षेमत्रवधासर्नी ।
मही ि मण्िलस्था ि मधुरागमपूस्जता ॥१०९॥                      र्ोगराजेश्वराराध्र्ा र्ोगानडदस्वरूत्रपणी ॥१२६॥
मेधा मेधाकरी मेध्र्ा माधवी मधुमसधानी ।                      नकाररूपा नादे शी नामपारार्णत्रप्रर्ा ।
मडिा मडिमर्ी माडर्ा मार्ा माधवमस्डिणी ॥११०॥                 नवसित्रद्धिमाराध्र्ा नारार्णमनोहरी ॥१२७॥
मार्ादरा ि मार्ावी मार्ाज्ञा मानदासर्नी ।
      ू                                                     नारार्णी नवाधारा नवब्रह्मासिातांसघ्रका ।
मार्ािङ्कल्पजननी मार्ामार्त्रवनोफदनी ॥१११॥                  नगेडद्रतनर्ाराध्र्ा नामरूपत्रववस्जाता ॥१२८॥
मार्ा प्रपञ्िशमनी मार्ािंहाररूत्रपणी ।                      नरसिंहासिातपदा नवबडधत्रवमोिनी ।
मार्ामडिप्रिादा ि मार्ाजनत्रवमोफहनी ॥११२॥                   नवग्रहासिातपदा नवमीपूजनत्रप्रर्ा ॥१२९॥
महापथा महाभोगा महत्रवघ्नत्रवनासशनी ।                        नैसमत्रत्तकाथाफलदा नस्डदताररत्रवनासशनी ।
महानुभावा मडिाढ्र्ा महमङ्गलदे वता ॥११३॥                     नवपीठस्स्थता नादा नवत्रषागणिेत्रवता ॥१३०॥
फहकाररूपा हृद्या ि फहतकार्ाप्रवसधानी ।                      नविूिात्रवधानज्ञा नैसमशारण्र्वासिनी ।
हे र्ोपासधत्रवसनमुिा हीनलोकत्रवनासशनी ॥११४॥
                  ा                                         नविडदनफदग्धाङ्गी नवकङ्कमधाररणी ॥१३१॥
                                                                                ु ु
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या ह्रीं दे वी ह्रीं स्वभात्रवनी ।    नववस्त्रपरीधाना नवरत्नत्रवभूषणा ।
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नव्र्भस्मत्रवदग्धाङ्गी नविडद्रकलाधरा ॥१३२॥                   दस्क्षणा दस्क्षणाराध्र्ा दस्क्षणामूसतारूत्रपणी ॥१४७॥
प्रकाररूपा प्राणेशी प्राणिंरक्षणीपरा ।                       दर्ावती दमस्वाडता दनुजाररदा र्ासनसधः ।
प्राणिञ्जीत्रवनी प्राच्र्ा प्रास्णप्राणप्रबोसधनी ॥१३३॥       दडतशोभसनभा दे वी दमना दाफिमस्तना ॥१४८॥
प्रज्ञा प्राज्ञा प्रभापुष्पा प्रतीिी प्रभुदा त्रप्रर्ा ।     दण्िा ि दमर्िी ि दस्ण्िनी दमनत्रप्रर्ा ।
प्रािीना प्रास्णसित्तस्था प्रभा प्रज्ञानरूत्रपणी ॥१३४॥       दण्िकारण्र्सनलर्ा दण्िकाररत्रवनासशनी ॥१४९॥
प्रभातकमािडतुष्टा प्राणार्ामपरार्णा ।                        दं ष्ट्राकरालवदना दण्िशोभा दरोदरी ।
प्रार्ज्ञा प्रणवा प्राणा प्रवृत्रत्तः प्रकृ सतः परा ॥१३५॥    दररद्राररष्टशमनी द्र्ा दमनपूस्जता ॥१५०॥
प्रबडधा प्रथमा िैव प्रगा प्रारब्धनासशनी ।                    दानवासिात पादश्रीद्रा त्रवणा द्रात्रवणी दर्ा ।
प्रबोधसनरता प्रेक्ष्र्ा प्रबडधा प्राणिास्क्षणी ॥१३६॥         दामोदरी दानवाररदाामोदरिहोदरी ॥१५१॥
प्रर्ागतीथासनलर्ा प्रत्र्क्षपरमेश्वरी ।                      दािी दानत्रप्रर्ा दा्नी दानश्रीफद्वा जवस्डदता ।
प्रणवाद्यडतसनलर्ा प्रणवाफदः प्रजेश्वरी ॥१३७॥                 दस्डतगा दस्ण्िनी दवाा दसधदग्धस्वरूत्रपणी ॥१५२॥
                                                                               ू       ु
िोकाररूपा िोरघ्नी िोरबाधात्रवनासशनी ।                        दाफिमीबीजिडदोहा दडतपस्ङ्ित्रवरास्जता ।
िैतडर्िेतनस्था ि ितुरा ि िमत्कृ सतः ॥१३८॥                    दपाणा दपाणस्वच्छा द्रममण्िलवासिनी ॥१५३॥
                                                                                  ु
िक्रवसताकलाधारा िफक्रणी िक्रधाररणी ।
         ु                                                   दशावतारजननी दशफदग्दै वपूस्जता ।
सित्तिेर्ा सिदानडदा सिद्रपा सिफद्वलासिनी ॥१३९॥
                         ू                                   दमा दशफदशा दृश्र्ा दशदािी दर्ासनसधः ॥१५४॥
सिडतासित्तप्रशमनी सिस्डतताथाफलप्रदा ।                        दे शकालपररज्ञाना दे शकालत्रवशोसधनी ।
िा्पेर्ी ि्पकप्रीता िण्िी िण्िाट्टहासिनी ॥१४०॥               दश्र्ाफदकलाराध्र्ा दशकालत्रवरोसधनी ।
िण्िे श्वरी िण्िमाता िण्िमुण्ित्रवनासशनी ।                   दश्र्ाफदकलाराध्र् दशग्रीवत्रवरोसधनी ॥१५५॥
िकोराक्षी सिरप्रीता सिकरा सिकरालका ॥१४१॥
                       ु     ु                               दशापराधशमनी दशवृत्रत्तफलप्रदा ।
िैतडर्रूत्रपणी िैिी िेतना सित्तिास्क्षणी ।                   र्ात्काररूत्रपणी र्ाज्ञी र्ादवी र्ादवासिाता ॥१५६॥
सििा सिित्रवसििाङ्गी सििगुप्तप्रिाफदनी ॥१४२॥                 र्र्ासतपूजनप्रीता र्ास्ज्ञकी र्ाजकत्रप्रर्ा ।
िलना िक्रिंस्था ि िा्पेर्ी िलसित्रिणी ।                      र्जमाना र्दप्रीता र्ामपूजाफलप्रदा ॥१५७॥
                                                                        ु
िडद्रमण्िलमध्र्स्था िडद्रकोफटिुशीतला ॥१४३॥                   र्शस्स्वनी र्माराध्र्ा र्मकडर्ा र्तीश्वरी ।
िडद्रानुजिमाराध्र्ा िडद्रा िण्िमहोदरी ।                      र्माफदर्ोगिडतुष्टा र्ोगीडद्रहृदर्ा र्मा ॥१५८॥
िसिाताररश्चडद्रमाता िडद्रकाडता िलेश्वरी ॥१४४॥                र्मोपासधत्रवसनमुिा र्शस्र्त्रवसधिडनुता ।
                                                                             ा
िरािरसनवािी ि िक्रपास्णिहोदरी ।                              र्वीर्िी र्ुवप्रीता र्ािानडदा र्तीश्वरी ॥१५९॥
दकाररूपा दत्तश्रीदाररद्र्र्च्छे दकाररणी ॥१४५॥                र्ोगत्रप्रर्ा र्ोगग्र्ा र्ोगध्र्ेर्ा र्थेच्छगा ।
दत्तािेर्स्र् वरदा दर्ाा ि दीनवत्िला ।                       र्ोगत्रप्रर्ा र्ज्ञिेनी र्ोगरूपा र्थेष्टदा ॥१६०॥
दक्षाराध्र्ा दक्षकडर्ा दक्षर्ज्ञत्रवनासशनी ॥१४६॥             ॥श्रीगार्िी फदव्र्िहस्रनामस्तोिं िंपणम ् ॥
                                                                                                 ू ा
दक्षा दाक्षार्णी दीक्षा दृष्टा दक्षवरप्रदा ।

 मंगल र्ंि:             (त्रिकोण) मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं ,
                                                             े                     े
इि क असतररि व्र्त्रि को ऋण मुत्रि हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं
    े
मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए मंगल र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् माि Rs-730
             े         े
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                           मंि सिद्ध वाहन दघटना नाशक मारुसत र्ंि
                                           ु ा
         पौरास्णक ग्रंथो मं उल्लेख हं की महाभारत क र्ुद्ध क िमर् अजुन क रथ क अग्रभाग पर मारुसत ध्वज एवं
                                                  े        े        ा  े    े
मारुसत र्डि लगा हुआ था। इिी र्ंि क प्रभाव क कारण िंपूणा र्ुद्ध क दौरान हज़ारं-लाखं प्रकार क आग्नेर् अस्त्र-
                                  े        े                    े                         े
शस्त्रं का प्रहार होने क बाद भी अजुन का रथ जरा भी क्षसतग्रस्त नहीं हुआ। भगवान श्री कृ ष्ण मारुसत र्ंि क इि
                        े          ा                                                                   े
अद्भत रहस्र् को जानते थे फक स्जि रथ र्ा वाहन की रक्षा स्वर्ं श्री मारुसत नंदन करते हं, वह दघटनाग्रस्त किे हो
    ु                                                                                      ु ा         ै
िकता हं । वह रथ र्ा वाहन तो वार्ुवेग िे, सनबाासधत रुप िे अपने लक्ष्र् पर त्रवजर् पतका लहराता हुआ पहुंिेगा।
इिी सलर्े श्री कृ ष्ण नं अजुन क रथ पर श्री मारुसत र्ंि को अंफकत करवार्ा था।
                            ा  े
       स्जन लोगं क स्कटर, कार, बि, ट्रक इत्र्ाफद वाहन बार-बार दघटना ग्रस्त हो रहे हो!, अनावश्र्क वाहन को
                  े   ू                                        ु ा
नुक्षान हो रहा हं! उडहं हानी एवं दघटना िे रक्षा क उद्दे श्र् िे अपने वाहन पर मंि सिद्ध श्री मारुसत र्ंि अवश्र्
                                  ु ा            े
लगाना िाफहए। जो लोग ट्राडस्पोफटं ग (पररवहन) क व्र्विार् िे जुिे हं उनको श्रीमारुसत र्ंि को अपने वाहन मं अवश्र्
                                             े
स्थात्रपत करना िाफहए, क्र्ोफक, इिी व्र्विार् िे जुिे िैकिं लोगं का अनुभव रहा हं की श्री मारुसत र्ंि को स्थात्रपत
करने िे उनक वाहन असधक फदन तक अनावश्र्क खिो िे एवं दघटनाओं िे िुरस्क्षत रहे हं । हमारा स्वर्ंका एवं अडर्
           े                                       ु ा
त्रवद्वानो का अनुभव रहा हं , की स्जन लोगं ने श्री मारुसत र्ंि अपने वाहन पर लगार्ा हं , उन लोगं क वाहन बिी िे
                                                                                                े
बिी दघटनाओं िे िुरस्क्षत रहते हं । उनक वाहनो को कोई त्रवशेष नुक्शान इत्र्ाफद नहीं होता हं और नाहीं अनावश्र्क
     ु ा                              े
रुप िे उिमं खराबी आसत हं ।
वास्तु प्रर्ोग मं मारुसत र्ंि: र्ह मारुसत नंदन श्री हनुमान जी का र्ंि है । र्फद कोई जमीन त्रबक नहीं रही हो, र्ा उि
पर कोई वाद-त्रववाद हो, तो इच्छा क अनुरूप वहँ जमीन उसित मूल्र् पर त्रबक जार्े इि सलर्े इि मारुसत र्ंि का
                                 े
प्रर्ोग फकर्ा जा िकता हं । इि मारुसत र्ंि क प्रर्ोग िे जमीन शीघ्र त्रबक जाएगी र्ा त्रववादमुि हो जाएगी। इि सलर्े
                                           े
र्ह र्ंि दोहरी शत्रि िे र्ुि है ।
मारुसत र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी क सलर्े गुरुत्व कार्ाालर् मं िंपक करं । मूल्र् Rs- 255 िे 10900 तक
             े                         े                               ा

श्री हनुमान र्ंि          शास्त्रं मं उल्लेख हं की श्री हनुमान जी को भगवान िूर्देव ने ब्रह्मा जी क आदे श पर हनुमान
                                                                               ा                  े
जी को अपने तेज का िौवाँ भाग प्रदान करते हुए आशीवााद प्रदान फकर्ा था, फक मं हनुमान को िभी शास्त्र का पूणा
ज्ञान दँ गा। स्जििे र्ह तीनोलोक मं िवा श्रेष्ठ विा हंगे तथा शास्त्र त्रवद्या मं इडहं महारत हासिल होगी और इनक
         ू                                                                                                  े
िमन बलशाली और कोई नहीं होगा। जानकारो ने मतानुशार हनुमान र्ंि की आराधना िे पुरुषं की त्रवसभडन बीमाररर्ं
दर होती हं , इि र्ंि मं अद्भत शत्रि िमाफहत होने क कारण व्र्त्रि की स्वप्न दोष, धातु रोग, रि दोष, वीर्ा दोष, मूछाा,
 ू                          ु                    े
नपुंिकता इत्र्ाफद अनेक प्रकार क दोषो को दर करने मं अत्र्डत लाभकारी हं । अथाात र्ह र्ंि पौरुष को पुष्ट करता
                               े         ू
हं । श्री हनुमान र्ंि व्र्त्रि को िंकट, वाद-त्रववाद, भूत-प्रेत, द्यूत फक्रर्ा, त्रवषभर्, िोर भर्, राज्र् भर्, मारण, ि्मोहन
स्तंभन इत्र्ाफद िे िंकटो िे रक्षा करता हं और सित्रद्ध प्रदान करने मं िक्षम हं ।
श्री हनुमान र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी क सलर्े गुरुत्व कार्ाालर् मं िंपक करं । मूल्र् Rs- 730 िे 10900 तक
                  े                         े                               ा

                                       GURUTVA KARYALAY
                             92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA,
               BHUBNESWAR-751018, (ORISSA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
                    Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
50                                           मई 2012




                                                 मंि सिद्ध त्रवशेष दै वी र्ंि िूसि
आद्य शत्रि दगाा बीिा र्ंि (अंबाजी बीिा र्ंि)
            ु                                                                        िरस्वती र्ंि
महान शत्रि दगाा र्ंि (अंबाजी र्ंि)
            ु                                                                        िप्तिती महार्ंि(िंपूणा बीज मंि िफहत)
नव दगाा र्ंि
    ु                                                                                काली र्ंि
नवाणा र्ंि (िामुंिा र्ंि)                                                            श्मशान काली पूजन र्ंि
नवाणा बीिा र्ंि                                                                      दस्क्षण काली पूजन र्ंि
िामुंिा बीिा र्ंि ( नवग्रह र्ुि)                                                     िंकट मोसिनी कासलका सित्रद्ध र्ंि
त्रिशूल बीिा र्ंि                                                                    खोफिर्ार र्ंि
बगला मुखी र्ंि                                                                       खोफिर्ार बीिा र्ंि
बगला मुखी पूजन र्ंि                                                                  अडनपूणाा पूजा र्ंि
राज राजेश्वरी वांछा कल्पलता र्ंि                                                     एकांक्षी श्रीफल र्ंि

                                                मंि सिद्ध त्रवशेष लक्ष्मी र्ंि िूसि
श्री र्ंि (लक्ष्मी र्ंि)                                                             महालक्ष्मर्ै बीज र्ंि
श्री र्ंि (मंि रफहत)                                                                 महालक्ष्मी बीिा र्ंि
श्री र्ंि (िंपूणा मंि िफहत)                                                          लक्ष्मी दार्क सिद्ध बीिा र्ंि
श्री र्ंि (बीिा र्ंि)                                                                लक्ष्मी दाता बीिा र्ंि
श्री र्ंि श्री िूि र्ंि                                                              लक्ष्मी गणेश र्ंि
श्री र्ंि (कमा पृष्ठीर्)
            ु                                                                        ज्र्ेष्ठा लक्ष्मी मंि पूजन र्ंि
लक्ष्मी बीिा र्ंि                                                                    कनक धारा र्ंि
श्री श्री र्ंि (श्रीश्री लसलता महात्रिपुर िुडदर्ै श्री महालक्ष्मर्ं श्री महार्ंि)    वैभव लक्ष्मी र्ंि (महान सित्रद्ध दार्क श्री महालक्ष्मी र्ंि)
अंकात्मक बीिा र्ंि
          ताम्र पि पर िुवणा पोलीि                                 ताम्र पि पर रजत पोलीि                                    ताम्र पि पर
                (Gold Plated)                                           (Silver Plated)                                    (Copper)
         िाईज                          मूल्र्                    िाईज                       मूल्र्                िाईज                   मूल्र्
        1” X 1”                       460                       1” X 1”                      370                 1” X 1”                  255
        2” X 2”                      820                        2” X 2”                      640                 2” X 2”                  460
        3” X 3”                      1650                       3” X 3”                     1090                 3” X 3”                  730
        4” X 4”                      2350                       4” X 4”                     1650                 4” X 4”                 1090
        6” X 6”                      3600                       6” X 6”                     2800                 6” X 6”                 1900
        9” X 9”                      6400                       9” X 9”                     5100                 9” X 9”                 3250
       12” X12”                      10800                     12” X12”                     8200                12” X12”                 6400
र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं ।
      े                                  ा
                                                             GURUTVA KARYALAY
                                            Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
                                Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
                  Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
51                                                मई 2012




                                                                 रासश रत्न
      मूंगा                     हीरा                   पडना                     मोती                   माणेक                      पडना




   Red Coral                 Diamond            Green Emerald             Naturel Pearl                Ruby                Green Emerald
                             (Special)                                     (Special)                (Old Berma)
    (Special)                                        (Special)                                       (Special)                  (Special)
5.25" Rs. 1050          10 cent    Rs. 4100     5.25" Rs. 9100           5.25"      Rs. 910       2.25"    Rs.   12500     5.25" Rs. 9100
6.25" Rs. 1250          20 cent    Rs. 8200     6.25" Rs. 12500          6.25"      Rs. 1250      3.25"    Rs.   15500     6.25" Rs. 12500
7.25" Rs. 1450          30 cent    Rs. 12500    7.25" Rs. 14500          7.25"      Rs. 1450      4.25"    Rs.   28000     7.25" Rs. 14500
8.25" Rs. 1800          40 cent    Rs. 18500    8.25" Rs. 19000          8.25"      Rs. 1900      5.25"    Rs.   46000     8.25" Rs. 19000
9.25" Rs. 2100          50 cent    Rs. 23500    9.25" Rs. 23000          9.25"      Rs. 2300      6.25"    Rs.   82000     9.25" Rs. 23000
10.25" Rs. 2800                                 10.25" Rs. 28000         10.25"     Rs. 2800                               10.25" Rs. 28000
                        All Diamond are Full
** All Weight In Rati                            ** All Weight In Rati    ** All Weight In Rati    ** All Weight In Rati    ** All Weight In Rati
                            White Colour.

  तुला रासश:             वृस्श्चक रासश:            धनु रासश:               मकर रासश:                 कभ रासश:
                                                                                                      ुं                      मीन रासश:

      हीरा                      मूंगा               पुखराज                     नीलम                     नीलम                   पुखराज




    Diamond                 Red Coral              Y.Sapphire                 B.Sapphire               B.Sapphire             Y.Sapphire
    (Special)
                             (Special)               (Special)                 (Special)                (Special)               (Special)
10 cent   Rs. 4100      5.25" Rs. 1050          5.25" Rs. 30000          5.25" Rs. 30000          5.25" Rs. 30000          5.25" Rs. 30000
20 cent   Rs. 8200      6.25" Rs. 1250          6.25" Rs. 37000          6.25" Rs. 37000          6.25" Rs. 37000          6.25" Rs. 37000
30 cent   Rs. 12500     7.25" Rs. 1450          7.25" Rs. 55000          7.25" Rs. 55000          7.25" Rs. 55000          7.25" Rs. 55000
40 cent   Rs. 18500     8.25" Rs. 1800          8.25" Rs. 73000          8.25" Rs. 73000          8.25" Rs. 73000          8.25" Rs. 73000
50 cent   Rs. 23500     9.25" Rs. 2100          9.25" Rs. 91000          9.25" Rs. 91000          9.25" Rs. 91000          9.25" Rs. 91000
                        10.25" Rs. 2800         10.25" Rs.108000         10.25" Rs.108000         10.25" Rs.108000         10.25" Rs.108000
All Diamond are Full
                        ** All Weight In Rati   ** All Weight In Rati    ** All Weight In Rati    ** All Weight In Rati    ** All Weight In Rati
    White Colour.

* उपर्ोि वजन और मूल्र् िे असधक और कम वजन और मूल्र् क रत्न एवं उपरत्न भी हमारे र्हा व्र्ापारी मूल्र् पर
                                                    े
उप्लब्ध हं ।
                                                GURUTVA KARYALAY
               92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                  Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
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52                                            मई 2012




                                                   मंि सिद्ध रूद्राक्ष
                                              Rate In                                                   Rate In
           Rudraksh List                                             Rudraksh List
                                           Indian Rupee                                              Indian Rupee
एकमुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)            2800, 5500        आठ मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)              820,1250
एकमुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                  750,1050, 1250, आठ मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)          1900
दो मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर)    30,50,75          नौ मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)              910,1250
दो मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                 50,100,           नौ मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)        2050
दो मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)           450,1250          दि मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)              1050,1250
तीन मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर)   30,50,75,         दि मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)        2100
तीन मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                50,100,           ग्र्ारह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)         1250,
तीन मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)          450,1250,         ग्र्ारह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)   2750,
िार मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर)   25,55,75,         बारह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)            1900,
िार मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                50,100,           बारह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)      2750,
पंि मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                25,55,            तेरह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)            3500, 4500,
पंि मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)          225, 550,         तेरह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)      6400,
छह मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर)    25,55,75,         िौदह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)            10500
छह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                 50,100,           िौदह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)      14500
िात मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर)   75, 155,          गौरीशंकर रूद्राक्ष                     1450
िात मुखी रूद्राक्ष (नेपाल)                225, 450,         गणेश रुद्राक्ष (नेपाल)                 550
िात मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)          1250              गणेश रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा)           750
 रुद्राक्ष क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं ।
            े                                  ा
                                             GURUTVA KARYALAY,
            92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA),
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                                           मंि सिद्ध दलभ िामग्री
                                                      ु ा
  हत्था जोिी- Rs- 370                       घोिे की नाल- Rs.351                      मार्ा जाल- Rs- 251
  सिर्ार सिंगी- Rs- 370                     दस्क्षणावती शंख- Rs- 550                 इडद्र जाल- Rs- 251
  त्रबल्ली नाल- Rs- 370                     मोसत शंख- Rs- 550                        धन वृत्रद्ध हकीक िेट Rs-251
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53                                  मई 2012




         नवरत्न जफित श्री र्ंि
                                                  शास्त्र विन क अनुिार शुद्ध िुवणा र्ा रजत
                                                               े
                                                  मं सनसमात श्री र्ंि क िारं और र्फद नवरत्न
                                                                       े
                                                  जिवा ने पर र्ह नवरत्न जफित श्री र्ंि
                                                  कहलाता हं । िभी रत्नो को उिक सनस्श्चत
                                                                              े
                                                  स्थान पर जि कर लॉकट क रूप मं धारण
                                                                    े  े
                                                  करने िे व्र्त्रि को अनंत एश्वर्ा एवं लक्ष्मी
                                                  की प्रासप्त होती हं । व्र्त्रि को एिा आभाि
                                                  होता हं जैिे मां लक्ष्मी उिक िाथ हं ।
                                                                              े
                                                  नवग्रह को श्री र्ंि क िाथ लगाने िे ग्रहं
                                                                       े
                                                  की अशुभ दशा का धारणकरने वाले व्र्त्रि
                                                  पर प्रभाव नहीं होता हं ।

गले मं होने क कारण र्ंि पत्रवि रहता हं एवं स्नान करते िमर् इि र्ंि पर स्पशा कर जो
             े
जल त्रबंद ु शरीर को लगते हं , वह गंगा जल क िमान पत्रवि होता हं । इि सलर्े इिे िबिे
                                          े
तेजस्वी एवं फलदासर् कहजाता हं । जैिे अमृत िे उत्तम कोई औषसध नहीं, उिी प्रकार लक्ष्मी
प्रासप्त क सलर्े श्री र्ंि िे उत्तम कोई र्ंि िंिार मं नहीं हं एिा शास्त्रोि विन हं । इि प्रकार क
          े                                                                                     े
नवरत्न जफित श्री र्ंि गुरूत्व कार्ाालर् द्वारा शुभ मुहूता मं प्राण प्रसतत्रष्ठत करक बनावाए जाते
                                                                                   े
हं ।
असधक जानकारी हे तु िंपक करं ।
                       ा

                                GURUTVA KARYALAY
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54                                                  मई 2012




                                         जैन धमाक त्रवसशष्ट र्ंिो की िूिी
                                                 े
श्री िौबीि तीथंकरका महान प्रभात्रवत िमत्कारी र्ंि          श्री एकाक्षी नाररर्ेर र्ंि
श्री िोबीि तीथंकर र्ंि                                     िवातो भद्र र्ंि
कल्पवृक्ष र्ंि                                             िवा िंपत्रत्तकर र्ंि
सिंतामणी पाश्वानाथ र्ंि                                    िवाकार्ा-िवा मनोकामना सित्रद्धअ र्ंि (१३० िवातोभद्र र्ंि)
सिंतामणी र्ंि (पंिफठर्ा र्ंि)                              ऋत्रष मंिल र्ंि
सिंतामणी िक्र र्ंि                                         जगदवल्लभ कर र्ंि
श्री िक्रश्वरी र्ंि
        े                                                  ऋत्रद्ध सित्रद्ध मनोकामना मान ि्मान प्रासप्त र्ंि
श्री घंटाकणा महावीर र्ंि                                   ऋत्रद्ध सित्रद्ध िमृत्रद्ध दार्क श्री महालक्ष्मी र्ंि
श्री घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि                   त्रवषम त्रवष सनग्रह कर र्ंि
(अनुभव सिद्ध िंपणा श्री घंटाकणा महावीर पतका र्ंि)
                ू
श्री पद्मावती र्ंि                                         क्षुद्रो पद्रव सननााशन र्ंि
श्री पद्मावती बीिा र्ंि                                    बृहच्िक्र र्ंि
श्री पाश्वापद्मावती ह्रंकार र्ंि                           वंध्र्ा शब्दापह र्ंि
पद्मावती व्र्ापार वृत्रद्ध र्ंि                            मृतवत्िा दोष सनवारण र्ंि
श्री धरणेडद्र पद्मावती र्ंि                                कांक वंध्र्ादोष सनवारण र्ंि
श्री पाश्वानाथ ध्र्ान र्ंि                                 बालग्रह पीिा सनवारण र्ंि
श्री पाश्वानाथ प्रभुका र्ंि                                लधुदेव कल र्ंि
                                                                   ु
भिामर र्ंि (गाथा नंबर १ िे ४४ तक)                          नवगाथात्मक उविग्गहरं स्तोिका त्रवसशष्ट र्ंि
मस्णभद्र र्ंि                                              उविग्गहरं र्ंि
श्री र्ंि                                                  श्री पंि मंगल महाश्रृत स्कध र्ंि
                                                                                     ं
श्री लक्ष्मी प्रासप्त और व्र्ापार वधाक र्ंि                ह्रींकार मर् बीज मंि
श्री लक्ष्मीकर र्ंि                                        वधामान त्रवद्या पट्ट र्ंि
लक्ष्मी प्रासप्त र्ंि                                      त्रवद्या र्ंि
महात्रवजर् र्ंि                                            िौभाग्र्कर र्ंि
त्रवजर्राज र्ंि                                            िाफकनी, शाफकनी, भर् सनवारक र्ंि
त्रवजर् पतका र्ंि                                          भूताफद सनग्रह कर र्ंि
त्रवजर् र्ंि                                               ज्वर सनग्रह कर र्ंि
सिद्धिक्र महार्ंि                                          शाफकनी सनग्रह कर र्ंि
दस्क्षण मुखार् शंख र्ंि                                    आपत्रत्त सनवारण र्ंि
दस्क्षण मुखार् र्ंि                                        शिुमख स्तंभन र्ंि
                                                               ु
र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं ।
      े                                  ा
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55                                     मई 2012




                                                     घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि को स्थापीत
                                             करने िे िाधक की िवा मनोकामनाएं पूणा होती हं । िवा
                                             प्रकार क रोग भूत-प्रेत आफद उपद्रव िे रक्षण होता हं ।
                                                     े
                                             जहरीले और फहं िक प्राणीं िे िंबसधत भर् दर होते हं ।
                                                                            ं        ू
                                             अस्ग्न भर्, िोरभर् आफद दर होते हं ।
                                                                     ू
                                                     दष्ट व अिुरी शत्रिर्ं िे उत्पडन होने वाले भर्
                                                      ु
                                             िे र्ंि क प्रभाव िे दर हो जाते हं ।
                                                      े           ू
                                                     र्ंि क पूजन िे िाधक को धन, िुख, िमृत्रद्ध,
                                                           े
                                             ऎश्वर्ा, िंतत्रत्त-िंपत्रत्त आफद की प्रासप्त होती हं । िाधक की
                                             िभी प्रकार की िास्त्वक इच्छाओं की पूसता होती हं ।
                                                     र्फद फकिी पररवार र्ा पररवार क िदस्र्ो पर
                                                                                  े
                                             वशीकरण, मारण,         उच्िाटन इत्र्ाफद जाद-टोने वाले
                                                                                       ू
                                             प्रर्ोग फकर्े गर्ं होतो इि र्ंि क प्रभाव िे स्वतः नष्ट
                                                                              े
                                             हो जाते हं और भत्रवष्र् मं र्फद कोई प्रर्ोग करता हं तो
                                             रक्षण होता हं ।
                                                     कछ जानकारो क श्री घंटाकणा महावीर पतका
                                                      ु          े
                                             र्ंि िे जुिे अद्द्भत अनुभव रहे हं । र्फद घर मं श्री
                                                                ु
                                             घंटाकणा महावीर पतका र्ंि स्थात्रपत फकर्ा हं और र्फद
                                             कोई इषाा, लोभ, मोह र्ा शिुतावश र्फद अनुसित कमा
करक फकिी भी उद्दे श्र् िे िाधक को परे शान करने का प्रर्ाि करता हं तो र्ंि क प्रभाव िे िंपणा
   े                                                                       े             ू
पररवार का रक्षण तो होता ही हं , कभी-कभी शिु क द्वारा फकर्ा गर्ा अनुसित कमा शिु पर ही उपर
                                             े
उलट वार होते दे खा हं ।                                   मूल्र्:- Rs. 1650 िे Rs. 10900 तक उप्लब्द्ध
                    िंपक करं । GURUTVA KARYALAY
                         ा
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56                                 मई 2012




                         अमोद्य महामृत्र्ुंजर् कवि
अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवि व    उल्लेस्खत अडर् िामग्रीर्ं को शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवद्वान
ब्राह्मणो द्वारा िवा लाख महामृत्र्ुजर् मंि जप एवं दशांश हवन द्वारा सनसमात कवि अत्र्ंत
                                  ं
प्रभावशाली होता हं ।


      अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवि
                                                          अमोद्य् महामृत्र्ुंजर्
            कवि बनवाने हे तु:
 अपना नाम, त्रपता-माता का नाम,                                      कवि
       गोि, एक नर्ा फोटो भेजे                            दस्क्षणा माि: 10900


                               राशी रत्न एवं उपरत्न

                                                               त्रवशेष र्ंि

                                                हमारं र्हां िभी प्रकार क र्ंि िोने-िांफद-
                                                                        े
                                                ता्बे मं आपकी आवश्र्िा क अनुशार
                                                                        े
                                                फकिी भी भाषा/धमा क र्ंिो को आपकी
                                                                  े
                                                आवश्र्क फिजाईन क अनुशार २२ गेज
                                                                े
                                                शुद्ध ता्बे मं अखंफित बनाने की त्रवशेष
       िभी िाईज एवं मूल्र् व क्वासलफट के
                                                िुत्रवधाएं उपलब्ध हं ।
     अिली नवरत्न एवं उपरत्न भी उपलब्ध हं ।
हमारे र्हां िभी प्रकार क रत्न एवं उपरत्न व्र्ापारी मूल्र् पर उपलब्ध हं । ज्र्ोसतष कार्ा िे जुिे़
                        े
बधु/बहन व रत्न व्र्विार् िे जुिे लोगो क सलर्े त्रवशेष मूल्र् पर रत्न व अडर् िामग्रीर्ा व अडर्
                                       े
िुत्रवधाएं उपलब्ध हं ।
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                                           मासिक रासश फल

                                                                                               सिंतन जोशी
मेष: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं बदलाव का त्रविार कर िकते है । फकर्े गर्े पूंस्ज सनवेश र्ा भूसम-भवन िे
                              िंबंसधअ मामलो मं ितक रहे िोरी, धोखो, मतभेदं इत्र्ादी िे िमस्र्ा हो िकती हं ।
                                                  ा
                              वाहन िावधानी िे िलार्े र्ा वाहन िे िावधान रहे आकस्स्मक दघटना हो िकती हं ।
                                                                                      ु ा
                              िल-अिल िंपत्रत्त र्ा फकिी घरे लू मामलं मं बदलाव हो िकता है ।

                              16 िे 31 मई 2012 : पूवा काल मं फकर्े गर्े कार्ा एवं रुक हुवे कार्ा िे आकस्स्मक
                                                                                     े
                              धन लाभ प्राप्त होगा। कोटा -किहरी क कार्ो मं त्रवलंब हो िकता हं । असधक वाद –त्रववाद
                                                                े
                              करने िे बिे। तनाव और सिंता क कारण स्वास्थ्र् िंबंधी िस्र्ाओं का िामना करना
                                                          े
                              पि िकता हं अतः िावधान रहे । आपको पेट क रोग क कारण पीिा हो िकती हं ।
                                                                    े     े
त्रवपरीत सलंग क प्रसत आपका असधक आकषाण रहे गा।
               े


वृषभ: 1 िे 15 मई 2012 : िामास्जक मान-ि्मान और पद-प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी।
प्रसतकलता क कारण आसथाक पक्ष कमजोर हो िकता हं । कोटा -किहरी क कार्ो मं
      ू    े                                                े
िफलता प्राप्त होने क र्ोग हं । अपने व्र्र्ं पर सनर्डिण रखने का प्रर्ाि करं और ऋण
                    े
लेने िे बिे। पाररवाररक जीवन मं छोटी-छोटी िमस्र्ाए असधक परे शान कर िकती हं ।
पररवार क फकिी िदस्र्ा का स्वास्थ्र् आपको सिंसतत कर िकता हं ।
        े

16 िे 31 मई 2012 : एकासधक स्त्रोत िे धन प्रासप्त क र्ोग बन रहे हं । इि अवसध मं
                                                  े
िल-अिल िंपत्रत्त मं पूंस्ज सनवेश करना आपक सलए त्रवशेष रुप िे फार्दे मंद हो िकता
                                         े
हं । समि एवं पररवार क लोगो का िहर्ोग प्राप्त होगा। जीवन िाथी का पूणा िहर्ोग प्राप्त
                     े
होगा। अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है ।


समथुन: 1 िे 15 मई 2012 : कार्ा फक असधकता और व्र्स्तता िे मानसिक शांसत मं कमी रहे गी। इि सलए मन को
                              सनर्ंिण मं रखने का प्रर्ाि करं । अडर्था आपका पाररवाररक जीवन भी तनावपूणा हो
                              िकता हं । आपको महत्व पूणा कार्ा एवं सनणार्ं को थोिे िमर् क सलए स्थसगत करना
                                                                                        े
                              पि िकता हं । दांपत्र् जीवन िुखमर् रहे गा।

                              16 िे 31 मई 2012 : र्फद आप नौकरी मं हं तो अपने कार्ा का अच्छा प्रदशान करने
                              मं िमथा हंगे। आपक रुक हुए कार्ं क पूणा होने िे त्रवशेष धनलाभ हो िकता हं ।
                                               े   े           े
                              मानसिक प्रडनता बढे गी। त्रवपरीत सलंग क प्रसत आपका आकषाण परे शानीर्ा खिी कर
                                                                    े
                              िकता हं अतः िावधान रहे । पररवार मं माता-त्रपता क स्वास्थ्र् क प्रसत त्रवशेष ध्र्ान
                                                                              े            े
                              रखना पि िकता हं ।
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कक: 1 िे 15 मई 2012 : आसथाक िमस्र्ाएं परे शान कर िकती हं लेफकन िमर् क िाथ िमस्र्ाएं िलझने लगेगी।
  ा                                                                  े

कोटा -किहरी क कार्ो मं त्रवजर् प्रासप्त क िंकत हं । िंतान पक्ष िे िंबंसधत सिंताएं दर
             े                           े   े                                     ू
होगी। जीवन िाथी क िाथ वैिाररक मतभेद िंभव हं । अपने खाने-पीने का त्रवशेष
                 े
ध्र्ान रखे। अपनी आंखं का त्रवशेष खर्ाल रखं। पररवार मं अशांसत का माहोल हो
िकता हं ।

16 िे 31 मई 2012 : आपक महत्वपूणा प्रर्ाि िफल हंगे। नौकरी िे जुिे लोगो को
                      े
कोई महत्व पूणा पद प्राप्त हो िकता हं । भूसम-भवन िे िंबंसधत कार्ो मं धनलाभ प्राप्त
हो िकता हं । व्र्ाविार्ीक िाझेदारी क सलए िमर् उपर्ुि हं । आसथाक स्स्थती मं
                                    े
उतार-िाढाव रहं गे। पररवार मं आपिी तालमेल बनाए रखने का प्रर्ाि करं ।


सिंह: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी- व्र्विार् मं धन प्रासप्त होने क र्ोग हं । आपक िामजीक मान-ि्मान एवं पद-
                                                              े             े

                                                                                       ु
                               प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी। व्र्विार्ीक परे शानीर्ं िे छटकारा समलेगा। महत्वपूणा कार्ो के
                               सलए आपको कजा लेना पि िकता हं । अत्रववाफहत हं तो त्रववाह क र्ोग बन िकते हं ।
                                                                                        े
                               व्र्वहार कशल रहं अडर्था पररवार मं कलह का वातावरण हो िकता हं । स्वास्थ्र् क
                                         ू                                                               े
                               प्रसत ििेतनता बरते।

                               16 िे 31 मई 2012 : नौकरी मं उच्ि असधकाररर्ं का िहर्ोग प्राप्त होगा। व्र्विार् मं
                               हं तो िरकार िे लाभ प्रासप्त िंभव हं । कोटा -किहरी क कार्ा मं त्रवलंब िंभव हं । जीवन
                                                                                  े
                               िाथी िे पूणा िहर्ोग प्राप्त होगा। घर पररवार मं मांगसलक कार्ा िंपडन होने क अच्छे
                                                                                                        े
र्ोग हं । खान-पान का त्रवशेष ध्र्ान रखं अडर्था पूराने रोगो क कारण लंबे िमर् क सलए कष्ट िंभव हं ।
                                                            े                े


कडर्ा: 1 िे 15 मई 2012 : इि माह आपक अंदर रिनात्मक कार्ा करने फक
                                   े

क्षमता का त्रवकाि होगा। आसथाक स्स्थती मं पूवा की अपक्षा मं िुधार होगा। अपने
उच्िासधकारी एव्म िहकमािारी क बीि आप अपने कार्ा का अच्छा प्रदशान करने मं
                            े
पूणरुप िे िमथा हंगे। जीवनिाथी िे पूणा िहर्ोग की प्रासप्त होगी। पररवार मं खुसशर्ो
   ा
का माहोल रहे गा और पररवार मं फकिी नर्े िदस्र् फक वृत्रद्ध होने क र्ोग बन रहे है ।
                                                                े

16 िे 31 मई 2012 : कार्ाक्षेि मं आपक जोश एवं उत्िाह मं सनरं तर वृत्रद्ध होगी।
                                    े
आर् िे व्र्र् बढ िकता हं । गुप्त त्रवरोधी-शिुओं क कारण धन हासन हो िकती है । प्रेम िंबंसधत मामलं मं िफलता प्राप्त
                                                 े
होने क अच्छे िंकत हं । आपकी वाणी पर सनर्ंिण रखं अडर्था ररश्तं मं खटाि आिकती हं । अपने खाने- पीने का
      े         े
ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है ।
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तुला: 1 िे 15 मई 2012 : अपने महत्वपूणा कार्ो को कुशलता िे पूरा करने का प्रर्ाि करं । अपने इष्ट समिं र्ा
पररवार क फकिी िदस्र्क िाथ मं मतभेद िंभव हं । अपने खाने-पीने का त्रवशेष ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र्
        े            े
                              नरम हो िकता है । आपक उच्िासधकारी एवं िहकमीर्ं िे िंबंध प्रसतकल होने क िंकत
                                                  े                                        ू       े   े
                              हं । अतः व्र्वहर कशल रहे ।
                                                ू

                              16 िे 31 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् क महत्वपूणा जोस्खम भरे कार्ा करने िे बिे।
                                                                  े
                              भूसम-भवन िे िंबंसधअ मामलो मं सिंता रह िकती हं ।            अपने त्रवरोधी एवं शिु पक्ष िे
                              िावधान रहं आप पर झूठे आरोप लग िकते है । जीवन िाथी क िाथ वैिाररक मतभेद
                                                                                 े
                              िंभव हं । धासमाक र्ािा र्ा दरस्थ स्थानो की र्ािा होने क र्ोग हं । पररवार क फकिी
                                                          ू                          े                  े
                              िदस्र् का स्वास्थ्र् कमजोर हो िकता हं ।

वृस्श्चक: 1 िे 15 मई 2012 : आपको कमाक्षेि मं त्रवशेष पद प्रासप्त क र्ोग व धन
                                                                  े

वृत्रद्ध क र्ोग बन रहे हं । भूसम-भवन इत्र्ाफद िल-अिल िंपत्रत्त मं पूंस्ज सनवेश करने क
          े                                                                          े
र्ोग बन िकते हं । घरमं मांगसलक कार्ा िंपडन होने क र्ोग हं । खाने-पीने का त्रवशेष
                                                 े
ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है । प्रेम िंबंसधत मामलो मं भी
िफलता प्राप्त कर िकते है ।

16 िे 31 मई 2012 : आपक िामास्जक मान-ि्मान और पद-प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी।
                      े
ऋण क लेन-दे ने िे बिने का प्रर्ाि करं अडर्था धन की पुनः प्रासप्त-भुगतान मं त्रवलंब
    े
हो िकता हं । महत्वपूणा कार्ो क सलए आवश्र्कता िे असधक खिा करना पि िकता है । पररवार मं खुसशर्ं भरा माहोल
                              े
आपकी प्रिडनता मं वृत्रद्ध करे गा। जीवन िाथी िे िहर्ोग प्राप्त होगा। शुभ िमािार फक प्रासप्त हो िकती हं ।

                               धनु: 1 िे 15 मई 2012 : आपकी महत्वपूणा र्ोजनाए पूणा हो िकती हं । कार्ाक्षेि मं
                               आपक जोश एवं उत्िाह मं वृत्रद्ध होने िे आपको मनोनुकल लाभ प्राप्त होगा। अपनी
                                  े                                              ू
                               असधक खिा करने फक प्रवृत्रत्त पर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं । आपक त्रवरोधी एवं शिु
                                                                                                े
                               पक्ष परास्त हंगे। अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे। पररवार क फकिी िदस्र् का स्वास्थ्र्
                                                                                        े
                               कमजोर हो िकता हं ।

                               16 िे 31 मई 2012 : इि दौरान पूंस्ज सनवेश र्ा भूसम-भवन िे िंबंसधअ मामलो मं
                               ितक रहे अडर्था भारी नुक्शान हो िकता हं । महत्व क कार्ो क सलर्े अत्र्ासधक
                                  ा                                            े       े
                               खिा क र्ोग बन रहे हं । आपक भौसतक िुख-िाधनो मं वृत्रद्ध होगी। पररवार मं
                                    े                    े
मांगसलक कार्ा हो िकते हं एवं शुभ िमािार फक प्रासप्त हो िकती हं । धासमाक र्ािा र्ा दरस्थ स्थानो की र्ािा होने क
                                                                                   ू                          े
र्ोग हं ।
60                                    मई 2012



मकर: 1 िे 15 मई 2012 : र्फद आप नौकरी मं हं तो पदौडनसत हो िकती हं र्ा नई नौकरी प्राप्त हो िकती हं ,
                                 व्र्विार् मं हं तो उडनती फक मागा प्रिस्त हंगे। इि अवसध मं िल-अिल िंपत्रत्त मं
                                 पूंस्ज सनवेश करना आपक सलए त्रवशेष रुप िे फार्दे मंद हो िकता हं । पररवार मं माता-
                                                      े
                                 त्रपता क स्वास्थ्र् क प्रसत त्रवशेष ध्र्ान रखना पि िकता हं । जीवन िाथी का पूणा
                                         े            े
                                 िहर्ोग प्राप्त होगा।

                                 16 िे 31 मई 2012 : र्फद आप नौकरी मं हं तो अपने कार्ा का अच्छा प्रदशान करने
                                 मं िमथा हंगे। एकासधक स्त्रोत िे धन प्रासप्त क र्ोग बन रहे हं । भूसम-भवन-वाहन िे
                                                                              े
                                 िंबंसध कार्ो मं त्रवशेष लाभ प्रासप्त क र्ोग उत्तम रहं गे। समि एवं पररवार क लोगो का
                                                                       े                                   े
िहर्ोग प्राप्त होगा। अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है ।


कभ: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं उडनसत व आर्क नए स्त्रोत समलने क
 ंु                                                  े                  े

र्ोग हं । आपकी आसथाक मं िुधार होगा। भूसम-भवन-वाहन की प्राप्ती हो िकती हं ।
स्वास्थ्र् िुख मं वृत्रद्ध होगी फफर भी खाने- पीने का त्रवशेष ध्र्ान रखना फहतकारी रहे गा।
दरस्थानो की व्र्वास्र्ीक र्ािाएं लाभप्रद रहे गी। हं । प्रेम िंबंधो मं िफलता प्राप्त होगी।
 ू

16 िे 31 मई 2012 : आकस्स्मक धन प्रासप्त क र्ोग बनेगं स्जस्िे आसथाक स्स्थती मं
                                         े
िुधार होगा। अपनी असधक खिा करने फक प्रवृत्रत्त पर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं ।
कोटा -किहरी क कार्ो मं िफलता प्राप्त हो िकती हं । पररवार क लोग एवं समि वगा का
             े                                            े
पूणा िहर्ोग प्राप्त होगा। पररवार क फकिी िदस्र् का स्वस्थ्र् कमजोर हो िकता हं । जीवन िाथी िे आस्त्मर्ता की
                                  े
कमी महिूि कर िकते हं ।


मीन: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं आसथाक लेन-दे न िे िंबंसधत कार्ो मं त्रवशेष िावधानी बरते। शिुओं
                               पर आपका प्रभाव रहे गा। आपक त्रवरोधी एवं शिु पक्ष परास्त हंगे। पररवार मं मांगसलक
                                                         े
                               कार्ा िंपडन होने क अच्छे र्ोग हं । अपने पररजनो का पूणा प्रेम व िहर्ोग आपको प्राप्त
                                                 े
                               होगा। प्रेम िंबंसधत मामलो मं भी िफलता प्राप्त कर िकते है । दांपत्र् जीवन िुखमर्
                               रहे गा।

                               16 िे 31 मई 2012 : आपको कार्ा क्षेि मं नर्े अविर प्राप्त अहो िकते हं । आकस्स्मक
                               धन प्रासप्त क र्ोग बन रहे हं ।
                                            े                    भूसम-भवन-वाहन िे िंबंसधअ कार्ो िे लाभ प्रासप्त िंभव
                               हं । आपकी िामस्जक प्रसतष्ठाभी इि अवसध मं बढे गी। व्र्विासर्क र्ािा मं िफलता प्राप्त
हो िकती है । खान-पान का त्रवशेष ध्र्ान रखं। अत्रववाफहत हं तो त्रववाह क र्ोग बन रहे हं ।
                                                                      े
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                                                 मई 2012 मासिक पंिांग
                                                                                                                                िंद्र
फद   वार     माह        पक्ष     सतसथ        िमासप्त नक्षि             िमासप्त र्ोग          िमासप्त    करण          िमासप्त               िमासप्त
                                                                                                                                रासश

1
     मंगल वैशाख         शुक्ल    दशमी        25:04:38   मघा            17:24:19   वृत्रद्ध   10:40:15   तैसतल        13:57:08   सिंह       -


2
     बुध     वैशाख      शुक्ल    एकादशी 22:47:51 पूवााफाल्गुनी 16:06:36 ध्रुव                08:07:32   वस्णज        12:00:59   सिंह       21:41:00


3
     गुरु    वैशाख      शुक्ल    द्वादशी     19:55:28   उत्तराफाल्गुनी 14:11:25 हषाण         25:26:25   बव           09:25:28   कडर्ा      -


4
     शुक्र   वैशाख      शुक्ल    िर्ोदशी     16:33:07   हस्त           11:44:22   वज्र       21:30:18   कौलव         06:17:10   कडर्ा      22:22:00


5
     शसन     वैशाख      शुक्ल    ितुदाशी     12:53:53   सििा           08:56:42   सित्रद्ध   17:20:08   वस्णज        12:53:53   तुला       -


6
     रत्रव   वैशाख      शुक्ल    पूस्णामा    09:05:19   स्वाती         05:57:49   व्र्सतपात 13:04:22    बव           09:05:19   तुला       21:43:00


7                                प्रसतपदा/
     िोम     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण               25:43:00   अनुराधा        24:11:08   वररर्ान    08:53:19   तैसतल        15:28:56   वृस्श्चक   -
                                 फद्वतीर्ा

8
     मंगल ज्र्ेष्ठ      कृ ष्ण   तृतीर्ा     22:28:13   जेष्ठा         21:43:13   सशव        25:09:28   वस्णज        12:01:58   वृस्श्चक   21:43:00


9
     बुध     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   ितुथी       19:42:30   मूल            19:44:22   सित्रद्ध   21:51:52   बव           09:01:15   धनु        -


10
     गुरु    ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   पंिमी       17:32:26   पूवााषाढ़      18:22:07   िाध्र्     19:05:15   कौलव         06:32:26   धनु        24:07:00


11
     शुक्र   ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   षष्ठी       16:05:31   उत्तराषाढ़     17:41:08   शुभ        16:51:27   वस्णज        16:05:31   मकर        -


12
     शसन     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   िप्तमी      15:21:44   श्रवण          17:44:14   शुक्ल      15:14:14   बव           15:21:44   मकर        -


13
     रत्रव   ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   अष्टमी      15:23:55   धसनष्ठा        18:30:29   ब्रह्म     14:12:40   कौलव         15:23:55   मकर        06:02:00


14
     िोम     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   नवमी        16:08:18   शतसभषा         19:58:56   इडद्र      13:44:52   गर           16:08:18   कभ
                                                                                                                                 ुं        -


15
     मंगल ज्र्ेष्ठ      कृ ष्ण   दशमी        17:29:17   पूवााभाद्रपद   22:03:58   वैधसत
                                                                                     ृ       13:48:02   त्रवत्रष्ट   17:29:17   कभ
                                                                                                                                 ुं        15:29:00


16
     बुध     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   एकादशी 19:22:09 उत्तराभाद्रपद 24:36:13 त्रवषकभ
                                                                              ुं             14:13:43   बव           06:22:09   मीन        -


17
     गुरु    ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   द्वादशी     21:37:32   रे वसत         27:27:13   प्रीसत     14:58:10   कौलव         08:27:13   मीन        27:28:00
62                                                मई 2012



18
     शुक्र   ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   िर्ोदशी     24:07:01   अस्श्वनी       30:32:19   आर्ुष्मान 15:56:42    गर           10:51:04   मेष     -


19
     शसन     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण   ितुदाशी     26:42:08   अस्श्वनी       06:32:45   िौभाग्र्   17:00:53   त्रवत्रष्ट   13:24:19   मेष     -


20                               अमाव
     रत्रव   ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण               29:17:16   भरणी           09:40:43   शोभन       18:06:58   ितुष्पाद     16:01:20   मेष     16:28:00
                                 स्र्ा

21
     िोम     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    प्रसतपदा    31:44:56   कृ सतका        12:46:49   असतगंि     19:08:22   फकस्तुघ्न 18:32:45 वृष          -


22
     मंगल ज्र्ेष्ठ      शुक्ल    प्रसतपदा    07:44:30   रोफहस्ण        15:44:30   िुकमाा     20:02:19   बव           07:44:30   वृष     29:07:00


23
     बुध     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    फद्वतीर्ा   09:56:16   मृगसशरा        18:25:20   धृसत       20:43:09   कौलव         09:56:16   समथुन   -


24
     गुरु    ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    तृतीर्ा     11:49:19   आद्रा          20:45:34   शूल        21:06:11   गर           11:49:19   समथुन   -


25
     शुक्र   ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    ितुथी       13:16:08   पुनवािु        22:38:38   गंि        21:07:41   त्रवत्रष्ट   13:16:08   समथुन   16:13:00


26
     शसन     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    पंिमी       14:12:02   पुष्र्         23:59:50   वृत्रद्ध   20:44:50   बालव         14:12:02   कका     -


27
     रत्रव   ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    षष्ठी       14:30:27   अश्लेषा        24:44:31   ध्रुव      19:51:05   तैसतल        14:30:27   कका     24:45:00


28
     िोम     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल    िप्तमी      14:11:24   मघा            24:50:46   व्र्ाघात   18:28:16   वस्णज        14:11:24   सिंह    -


29
     मंगल ज्र्ेष्ठ      शुक्ल    अष्टमी      13:12:03   पूवााफाल्गुनी 24:17:41 हषाण          16:32:41   बव           13:12:03   सिंह    -


30                               नवमी-
     बुध     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल                11:33:21   उत्तराफाल्गुनी 23:06:10 वज्र         14:06:10   कौलव         11:33:21   सिंह    06:03:00
                                 दशमी

31                               दशमी-
     गुरु    ज्र्ेष्ठ   शुक्ल                09:19:03   हस्त           21:21:52   सित्रद्ध   11:10:37   गर           09:19:03   कडर्ा   -
                                 एकादशी


क्र्ा आप फकिी िमस्र्ा िे ग्रस्त हं ? आपक पाि अपनी िमस्र्ाओं िे छटकारा पाने हे तु पूजा-अिाना, िाधना,
                                        े                       ु
मंि जाप इत्र्ाफद करने का िमर् नहीं हं ? अब आप अपनी िमस्र्ाओं िे बीना फकिी त्रवशेष पूजा-अिाना, त्रवसध-त्रवधान
क आपको अपने कार्ा मं िफलता प्राप्त कर िक एवं आपको अपने जीवन क िमस्त िुखो को प्राप्त करने का मागा
 े                                      े                    े
प्राप्त हो िक इि सलर्े गुरुत्व कार्ाालत द्वारा हमारा उद्दे श्र् शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण-
             े
प्रसतत्रष्ठत पूणा िैतडर् र्ुि त्रवसभडन प्रकार क र्डि- कवि एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोिाने का हं ।
                                               े                                                  े

                                             GURUTVA KARYALAY:
               BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) , Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785,
                    Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
63                                       मई 2012




                                         मई -2012 मासिक व्रत-पवा-त्र्ौहार
फद    वार    माह        पक्ष     सतसथ        िमासप्त    प्रमुख व्रत-त्र्ोहार

1    मंगल वैशाख शुक्ल दशमी                   25:04:38 श्रसमक फदवि, श्रीमहावीर स्वामी कवल्र्-ज्ञान कल्र्ाणक,
                                                                                      ै

                                                        मोफहनी एकादशी व्रत, लक्ष्मीनारार्ण एकादशी, त्रवजर्ा एकादशी व्रत,
2    बुध     वैशाख शुक्ल एकादशी              22:47:51
                                                        श्रीफहत (फहताब्द) िंवत ् 539 प्रारं भ, नारद एकादशी, िु मटबल र्ािा(कश्मी)

                                                        एकादशी व्रत (सन्बाक), प्रदोष व्रत, रुस्क्मणी द्वादशी, परशुराम द्वादशी,
                                                                           ा
3    गुरु    वैशाख शुक्ल द्वादशी             19:55:28
                                                        मधुिूदन द्वादशी, श्र्ामबाबा द्वादशी,

                                                        नृसिंह ितुदाशी व्रत, नृसिंहावतार जर्ंती महोत्िव, सछडनमस्ता महात्रवद्या
4    शुक्र   वैशाख शुक्ल िर्ोदशी             16:33:07
                                                        जर्ंती,

                                                        श्रीआद्यशंकरािार्ा     कलाि गमन, श्रीगणेश
                                                                                ै                      ितुदाशी, पूस्णामा    व्रत,
5    शसन     वैशाख शुक्ल ितुदाशी             12:53:53
                                                        श्रीित्र्नारार्ण व्रत कथा, कमाावतार जर्ंती,
                                                                                    ू

                                                        स्नान दान हे तु उत्तम वैशाखी पूस्णामा, बुद्ध पूस्णामा, बुद्ध पररसनवााण
                                                        ि्वत ् 2556 प्रारं भ, पीपल पूनम, वृडदावन त्रवहार, सशप्रा स्नान
6    रत्रव   वैशाख शुक्ल पूस्णामा            09:05:19
                                                        (उज्जसर्नी), र्मराज क सनसमत्त जलकभ दान, वैशाख स्नान पूण,
                                                                             े           ुं                    ा
                                                        पुष्करादे वी जर्ंती, मोतीलाल नेहरू जर्ंती,

                                 प्रसतपदा-
7    िोम     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण               25:43:00 दे वत्रषा नारद जर्ंती, रवीडद्रनाथ टै गोर जर्ंती (तारीख िे)
                                 फद्वतीर्ा

8    मंगल ज्र्ेष्ठ      कृ ष्ण तृतीर्ा       22:28:13 रे िक्राि फदवि.

                                                        िंकष्टी श्रीगणेश ितुथी व्रत (िं.उ.रा.10.2), मां आनडदमर्ी जर्ंती,
9    बुध     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण ितुथी         19:42:30
                                                        गोपालकृ ष्ण गोखले जर्ंती,

10 गुरु      ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण पंिमी         17:32:26 वैधसत महापात िार्ं 4.32 िे रात्रि 12.15 बजे तक,
                                                         ृ

11 शुक्र     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण षष्ठी         16:05:31 िंत तारण तरण गुरुपवी,

12 शसन       ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण िप्तमी        15:21:44 कालाष्टमी व्रत,

13 रत्रव     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण अष्टमी        15:23:55 शीतलाष्टमी बिौिा, त्रिलोकीनाथाष्टमी (प.बंगाल), मातृ फदवि, मदिा िे ,

                                                        वृषभ-िंक्रास्डत िार्ं 4.11 बजे, िंक्रास्डत क स्नान-दान का पुण्र्काल
                                                                                                    े
14 िोम       ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण नवमी          16:08:18 प्रात: 9.47 िे िंध्र्ा 4.11 बजे तक, पूजा-िंकल्प हे तु उत्तम ग्रीष्मऋतु
                                                        प्रारं भ, कल्पवाि पूण,
                                                                             ा
64                                             मई 2012



15 मंगल ज्र्ेष्ठ      कृ ष्ण दशमी       17:29:17 त्रवश्व पररवार फदवि, िौर ज्र्ेष्ठ माि प्रा

                                                   अपरा (अिला) एकादशी व्रत, जलक्रीिा एकादशी, पंजाब मं भद्रकाली
16 बुध     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण एकादशी     19:22:09
                                                   ग्र्ारि,

17 गुरु    ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण द्वादशी    21:37:32 -

18 शुक्र   ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण िर्ोदशी    24:07:01 प्रदोष व्रत, त्रिफदविीर् वटिात्रविी व्रत प्रारं भ (उ.भारत)

19 शसन     ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण ितुदाशी    26:42:08 मासिक सशवरात्रि व्रत, िात्रविी ितुदाशी (प.बंगाल)

                                                   स्नान-दान हे तु उत्तम श्राद्ध की ज्र्ेष्ठी अमावस्र्ा, वटिात्रविी अमावस्र्ा
                                                   (बरगदाही अमावि), भावुका अमावि, कररफदन, शसन जर्ंती, फलहाररणी
20 रत्रव   ज्र्ेष्ठ   कृ ष्ण अमावस्र्ा 29:17:16
                                                   कासलका पूजा (प.बंगाल), खण्िग्राि िूर्ग्रहण, िूर्ा िार्न समथुन रासश
                                                                                        ा
                                                   मं रात्रि 8.47 बजे,

                                                   गंगा दशहरा स्नान प्रारं भ, करवीर व्रत, राजीव गांधी स्मृसत फदवि,
21 िोम     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल प्रसतपदा    31:44:56
                                                   आतंकवाद-त्रवरोध फदवि

22 मंगल ज्र्ेष्ठ      शुक्ल प्रसतपदा    07:44:30 नवीन िंद्र-दशान, राजा राममोहन रार् जर्ंती,

23 बुध     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल फद्वतीर्ा   09:56:16 र्भातृतीर्ा व्रत, व्र्सतपात महापात फदन 3.42 बजे िे,

                                                   वरदत्रवनार्क        ितुथी     व्रत(िं.उ.रा.9.37),    महाराणा      प्रताप      जर्ंती,
24 गुरु    ज्र्ेष्ठ   शुक्ल तृतीर्ा     11:49:19
                                                   व्र्सतपात महापात प्रात: 8.19 बजे तक 25 मई- उमा ितुथी,

25 शुक्र   ज्र्ेष्ठ   शुक्ल ितुथी       13:16:08 पुष्र् नक्षि (रात्रि 7.39 िे)

26 शसन     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल पंिमी       14:12:02 महादे व त्रववाह (उिीिा), स्कडद कमार षष्ठी व्रत
                                                                                 ु

                                                   अरण्र्षष्ठी, त्रवंध्र्वासिनी महापूजा, जमाई षष्ठी, शीतला षष्ठी, पं. नेहरू
27 रत्रव   ज्र्ेष्ठ   शुक्ल षष्ठी       14:30:27
                                                   स्मृसत फदवि,

28 िोम     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल िप्तमी      14:11:24 बटु कभैरव जर्ंती (काशी), वीर िावरकर जर्ंती.

                                                   श्रीदगााष्टमी
                                                        ु            व्रत, श्रीअडनपूणााष्टमी    व्रत, धूमावती     महात्रवद्या    जर्ंती,
29 मंगल ज्र्ेष्ठ      शुक्ल अष्टमी      13:12:03
                                                   ज्र्ेष्ठाष्टमी,

                              नवमी-
30 बुध     ज्र्ेष्ठ   शुक्ल             11:33:21 श्रीमहे श नवमी, प्रािीन गणनानुिार गंगा-दशहरा,
                              दशमी

                              दशमी-                दृश्र्गस्णतानुिार        गंगा-दशहरा,        सनजाला   एकादशी       व्रत       (स्माता),
31 गुरु    ज्र्ेष्ठ   शुक्ल             09:19:03
                              एकादशी               श्रीकाशीत्रवश्वनाथ कलशर्ािा फदवि, त्बाक-धूम्रपान सनषेध फदवि
                                                                                          ू
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                                              गणेश लक्ष्मी र्ंि
प्राण-प्रसतत्रष्ठत गणेश लक्ष्मी र्ंि को अपने घर-दकान-ओफफि-फक्टरी मं पूजन स्थान, गल्ला र्ा अलमारी मं स्थात्रपत
                                                 ु         ै
करने व्र्ापार मं त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । र्ंि क प्रभाव िे भाग्र् मं उडनसत, मान-प्रसतष्ठा एवं
                                                     े                                               व्र्ापर मं वृत्रद्ध होती
हं एवं आसथाक स्स्थमं िुधार होता हं । गणेश लक्ष्मी र्ंि को स्थात्रपत करने िे भगवान गणेश और दे वी लक्ष्मी का
िंर्ुि आशीवााद प्राप्त होता हं ।                                                       Rs.730 िे Rs.10900 तक

                                         मंगल र्ंि िे ऋण मुत्रि
मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररि व्र्त्रि को ऋण
                           े                     े                          े
मुत्रि हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं ।    त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए मंगल
                                                                                          े         े
र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । प्राण प्रसतत्रष्ठत मंगल र्ंि क पूजन िे भाग्र्ोदर्, शरीर मं खून की
                                                                                 े
कमी, गभापात िे बिाव, बुखार, िेिक, पागलपन, िूजन और घाव, र्ौन शत्रि मं वृत्रद्ध, शिु त्रवजर्, तंि मंि क दष्ट प्रभा,
                                                                                                     े ु
भूत-प्रेत भर्, वाहन दघटनाओं, हमला, िोरी इत्र्ादी िे बिाव होता हं ।
                     ु ा                                                                        मूल्र् माि Rs- 730

                                                      कबेर र्ंि
                                                       ु
कबेर र्ंि क पूजन िे स्वणा लाभ, रत्न लाभ, पैतक ि्पत्ती एवं गिे हुए धन िे लाभ प्रासप्त फक कामना करने वाले
 ु         े                                ृ
व्र्त्रि क सलर्े कबेर र्ंि अत्र्डत िफलता दार्क होता हं । एिा शास्त्रोि विन हं । कबेर र्ंि क पूजन िे एकासधक
          े       ु                                                              ु         े
स्त्रोि िे धन का प्राप्त होकर धन िंिर् होता हं ।




    ताम्र पि पर िुवणा पोलीि                 ताम्र पि पर रजत पोलीि                               ताम्र पि पर
            (Gold Plated)                          (Silver Plated)                                (Copper)
     िाईज                    मूल्र्         िाईज                     मूल्र्           िाईज                    मूल्र्
     1” X 1”                 460            1” X 1”                   370             1” X 1”                  255
     2” X 2”                 820            2” X 2”                   640             2” X 2”                  460
     3” X 3”                1650            3” X 3”                  1090             3” X 3”                  730
     4” X 4”                2350            4” X 4”                  1650             4” X 4”                 1090
     6” X 6”                3600            6” X 6”                  2800             6” X 6”                 1900
     9” X 9”                6400            9” X 9”                  5100             9” X 9”                 3250
    12” X12”                10800          12” X12”                  8200            12” X12”                 6400

                                      GURUTVA KARYALAY
               92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                  Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785
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66                                         मई 2012




                                            नवरत्न जफित श्री र्ंि
शास्त्र विन क अनुिार शुद्ध िुवणा र्ा रजत मं सनसमात श्री र्ंि क िारं और र्फद नवरत्न जिवा ने पर र्ह नवरत्न
             े                                                े
जफित श्री र्ंि कहलाता हं । िभी रत्नो को उिक सनस्श्चत स्थान पर जि कर लॉकट क रूप मं धारण करने िे व्र्त्रि को
                                           े                           े  े
अनंत एश्वर्ा एवं लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । व्र्त्रि को एिा आभाि होता हं जैिे मां लक्ष्मी उिक िाथ हं । नवग्रह को
                                                                                                े
श्री र्ंि क िाथ लगाने िे ग्रहं की अशुभ दशा का धारण करने वाले व्र्त्रि पर प्रभाव नहीं होता हं । गले मं होने क
           े                                                                                                े
कारण र्ंि पत्रवि रहता हं एवं स्नान करते िमर् इि र्ंि पर स्पशा कर जो जल त्रबंद ु शरीर को लगते हं , वह गंगा
जल क िमान पत्रवि होता हं । इि सलर्े इिे िबिे तेजस्वी एवं फलदासर् कहजाता हं । जैिे अमृत िे उत्तम कोई
    े
औषसध नहीं, उिी प्रकार लक्ष्मी प्रासप्त क सलर्े श्री र्ंि िे उत्तम कोई र्ंि िंिार मं नहीं हं एिा शास्त्रोि विन हं । इि
                                        े
प्रकार क नवरत्न जफित श्री र्ंि गुरूत्व कार्ाालर् द्वारा शुभ मुहूता मं प्राण प्रसतत्रष्ठत करक बनावाए जाते हं ।
        े                                                                                   े


                                                 अष्ट लक्ष्मी कवि
अष्ट लक्ष्मी कवि को धारण करने िे व्र्त्रि पर िदा मां महा लक्ष्मी की कृ पा एवं आशीवााद बना
रहता हं । स्जस्िे मां लक्ष्मी क अष्ट रुप (१)-आफद लक्ष्मी, (२)-धाडर् लक्ष्मी, (३)-धैरीर् लक्ष्मी, (४)-
                               े
गज लक्ष्मी, (५)-िंतान लक्ष्मी, (६)-त्रवजर् लक्ष्मी, (७)-त्रवद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन िभी
रुपो का स्वतः अशीवााद प्राप्त होता हं ।                                                         मूल्र् माि: Rs-1250

                                      मंि सिद्ध व्र्ापार वृत्रद्ध कवि
व्र्ापार वृत्रद्ध कवि व्र्ापार क शीघ्र उडनसत क सलए उत्तम हं । िाहं कोई भी व्र्ापार हो अगर उिमं लाभ क स्थान पर
                                े             े                                                     े
बार-बार हासन हो रही हं । फकिी प्रकार िे व्र्ापार मं बार-बार बांधा उत्पडन हो रही हो! तो िंपूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत मंि
सिद्ध पूणा िैतडर् र्ुि व्र्ापात वृत्रद्ध र्ंि को व्र्पार स्थान र्ा घर मं स्थात्रपत करने िे शीघ्र ही व्र्ापार वृत्रद्ध एवं
सनतडतर लाभ प्राप्त होता हं ।                                                           मूल्र् माि: Rs.730 & 1050

                                                      मंगल र्ंि
(त्रिकोण) मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररि व्र्त्रि को
                                     े                     े                          े
ऋण मुत्रि हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए
                                                                                          े         े
मंगल र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं ।                                        मूल्र् माि Rs- 730


                                        GURUTVA KARYALAY
            92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
                    Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
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67                                                मई 2012




                                                  त्रववाह िंबंसधत िमस्र्ा
क्र्ा आपक लिक-लिकी फक आपकी शादी मं अनावश्र्क रूप िे त्रवल्ब हो रहा हं र्ा उनक वैवाफहक जीवन मं खुसशर्ां कम
         े   े                                                               े
होती जारही हं और िमस्र्ा असधक बढती जारही हं । एिी स्स्थती होने पर अपने लिक-लिकी फक किली का अध्र्र्न
                                                                          े         ुं
अवश्र् करवाले और उनक वैवाफहक िुख को कम करने वाले दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे जनकारी प्राप्त
                    े                                  े        े        े
करं ।


                                               सशक्षा िे िंबंसधत िमस्र्ा
क्र्ा आपक लिक-लिकी की पढाई मं अनावश्र्क रूप िे बाधा-त्रवघ्न र्ा रुकावटे हो रही हं ? बच्िो को अपने पूणा पररश्रम
         े   े
एवं मेहनत का उसित फल नहीं समल रहा? अपने लिक-लिकी की किली का त्रवस्तृत अध्र्र्न अवश्र् करवाले और
                                           े         ुं
उनक त्रवद्या अध्र्र्न मं आनेवाली रुकावट एवं दोषो क कारण एवं उन दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे
   े                                              े                  े        े        े
जनकारी प्राप्त करं ।

                                   क्र्ा आप फकिी िमस्र्ा िे ग्रस्त हं ?
                           ु
आपक पाि अपनी िमस्र्ाओं िे छटकारा पाने हे तु पूजा-अिाना, िाधना, मंि जाप इत्र्ाफद करने का िमर् नहीं हं ?
   े
अब आप अपनी िमस्र्ाओं िे बीना फकिी त्रवशेष पूजा-अिाना, त्रवसध-त्रवधान क आपको अपने कार्ा मं िफलता प्राप्त
                                                                      े
कर िक एवं आपको अपने जीवन क िमस्त िुखो को प्राप्त करने का मागा प्राप्त हो िक इि सलर्े गुरुत्व कार्ाालत
     े                    े                                                े
द्वारा हमारा उद्दे श्र् शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत पूणा िैतडर् र्ुि त्रवसभडन प्रकार के
र्डि- कवि एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोिाने का हं ।
                                                  े

                                         ज्र्ोसतष िंबंसधत त्रवशेष परामशा
ज्र्ोसत त्रवज्ञान, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु एवं आध्र्ास्त्मक ज्ञान िं िंबंसधत त्रवषर्ं मं हमारे 30 वषो िे असधक वषा के
अनुभवं क िाथ ज्र्ोसति िे जुिे नर्े-नर्े िंशोधन क आधार पर आप अपनी हर िमस्र्ा क िरल िमाधान प्राप्त कर
        े                                       े                            े
िकते हं ।
                                                    GURUTVA KARYALAY
              92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                       Call Us - 9338213418, 9238328785
                      Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com



                                                               ओनेक्ि
   जो व्र्त्रि पडना धारण करने मे अिमथा हो उडहं बुध ग्रह क उपरत्न ओनेक्ि को धारण करना िाफहए।
                                                         े
   उच्ि सशक्षा प्रासप्त हे तु और स्मरण शत्रि क त्रवकाि हे तु ओनेक्ि रत्न की अंगूठी को दार्ं हाथ की िबिे छोटी
                                              े
   उं गली र्ा लॉकट बनवा कर गले मं धारण करं । ओनेक्ि रत्न धारण करने िे त्रवद्या-बुत्रद्ध की प्रासप्त हो होकर स्मरण
                 े
   शत्रि का त्रवकाि होता हं ।
68                                    मई 2012




                                        मई 2012 -त्रवशेष र्ोग
                                               कार्ा सित्रद्ध र्ोग
    5       प्रात: 8:55 िे फदन-रात                 18           ि्पूणा फदन-रात

    7       िूर्ोदर् िे रात्रि 12:11 तक            21           फदन 12:46 िे रातभर

            िंध्र्ा 5:40 िे 12 मई को िार्ं
    11                                             23           िूर्ोदर् िे िंध्र्ा 6:25 तक
            5:43 तक

                                                                रात्रि 8:44 िे 25 मई को रात्रि 10:38
    15      रात्रि 10:02 िे रातभर                  24
                                                                तक

    17      ि्पूणा फदन-रात                         30           रात्रि 11:05 िे िूर्ोदर् तक

                                          फद्वपुष्कर (दोगुना फल) र्ोग
    22      फदन 3:43 िे रात्रिपर्ाडत


र्ोग फल :
   कार्ा सित्रद्ध र्ोग मे फकर्े गर्े शुभ कार्ा मे सनस्श्चत िफलता प्राप्त होती हं , एिा शास्त्रोि विन हं ।
   फद्वपुष्कर र्ोग मं फकर्े गर्े शुभ कार्ो का लाभ दोगुना होता हं । एिा शास्त्रोि विन हं ।


                    दै सनक शुभ एवं अशुभ िमर् ज्ञान तासलका
                                  गुसलक काल               र्म काल             राहु काल
                                       (शुभ)                 (अशुभ)           (अशुभ)
                    वार           िमर् अवसध             िमर् अवसध           िमर् अवसध
                    रत्रववार    03:00 िे 04:30        12:00 िे 01:30      04:30 िे 06:00
                    िोमवार      01:30 िे 03:00        10:30 िे 12:00      07:30 िे 09:00
                    मंगलवार     12:00 िे 01:30        09:00 िे 10:30      03:00 िे 04:30
                    बुधवार      10:30 िे 12:00        07:30 िे 09:00      12:00 िे 01:30
                    गुरुवार     09:00 िे 10:30        06:00 िे 07:30      01:30 िे 03:00
                    शुक्रवार    07:30 िे 09:00       03:00 िे 04:30       10:30 िे 12:00
                    शसनवार      06:00 िे 07:30       01:30 िे 03:00       09:00 िे 10:30
69                                                मई 2012



                                                                 फदन क िौघफिर्े
                                                                      े
                  िमर्                      रत्रववार   िोमवार        मंगलवार बुधवार गुरुवार              शुक्रवार    शसनवार

                  06:00 िे 07:30            उद्वे ग    अमृत          रोग           लाभ        शुभ        िल          काल
                  07:30 िे 09:00            िल         काल           उद्वे ग       अमृत       रोग        लाभ         शुभ
                  09:00 िे 10:30            लाभ        शुभ           िल            काल        उद्वे ग    अमृत        रोग
                  10:30 िे 12:00            अमृत       रोग           लाभ           शुभ        िल         काल         उद्वे ग
                  12:00 िे 01:30            काल        उद्वे ग       अमृत          रोग        लाभ        शुभ         िल
                  01:30 िे 03:00            शुभ        िल            काल           उद्वे ग    अमृत       रोग         लाभ
                  03:00 िे 04:30            रोग        लाभ           शुभ           िल         काल        उद्वे ग     अमृत
                  04:30 िे 06:00            उद्वे ग    अमृत          रोग           लाभ        शुभ        िल          काल


                                                                 रात क िौघफिर्े
                                                                      े
                  िमर्                      रत्रववार    िोमवार       मंगलवार        बुधवार गुरुवार        शुक्रवार    शसनवार

                  06:00 िे 07:30            शुभ         िल           काल            उद्वे ग    अमृत       रोग         लाभ
                  07:30 िे 09:00            अमृत        रोग          लाभ            शुभ        िल         काल         उद्वे ग
                  09:00 िे 10:30            िल          काल          उद्वे ग        अमृत       रोग        लाभ         शुभ
                  10:30 िे 12:00            रोग         लाभ          शुभ            िल         काल        उद्वे ग     अमृत
                  12:00 िे 01:30            काल         उद्वे ग      अमृत           रोग        लाभ        शुभ         िल
                  01:30 िे 03:00            लाभ         शुभ          िल             काल        उद्वे ग    अमृत        रोग
                  03:00 िे 04:30            उद्वे ग     अमृत         रोग            लाभ        शुभ        िल          काल
                  04:30 िे 06:00            शुभ         िल           काल            उद्वे ग    अमृत       रोग         लाभ
       शास्त्रोि मत क अनुशार र्फद फकिी भी कार्ा का प्रारं भ शुभ मुहूता र्ा शुभ िमर् पर फकर्ा जार्े तो कार्ा मं िफलता
                     े
प्राप्त होने फक िंभावना ज्र्ादा प्रबल हो जाती हं । इि सलर्े दै सनक शुभ िमर् िौघफिर्ा दे खकर प्राप्त फकर्ा जा िकता हं ।
नोट: प्रार्ः फदन और रात्रि क िौघफिर्े फक सगनती क्रमशः िूर्ोदर् और िूर्ाास्त िे फक जाती हं । प्रत्र्ेक िौघफिर्े फक अवसध 1
                            े
घंटा 30 समसनट अथाात िे ढ़ घंटा होती हं । िमर् क अनुिार िौघफिर्े को शुभाशुभ तीन भागं मं बांटा जाता हं , जो क्रमशः शुभ,
                                               े
मध्र्म और अशुभ हं ।

                     िौघफिर्े क स्वामी ग्रह
                               े                                                    * हर कार्ा क सलर्े शुभ/अमृत/लाभ का
                                                                                                े
शुभ िौघफिर्ा             मध्र्म िौघफिर्ा               अशुभ िौघफिर्ा                िौघफिर्ा उत्तम माना जाता हं ।
िौघफिर्ा स्वामी ग्रह     िौघफिर्ा स्वामी ग्रह          िौघफिर्ा      स्वामी ग्रह
शुभ        गुरु          िर         शुक्र              उद्बे ग       िूर्ा          * हर कार्ा क सलर्े िल/काल/रोग/उद्वे ग
                                                                                                े
अमृत       िंद्रमा                                     काल           शसन            का िौघफिर्ा उसित नहीं माना जाता।
लाभ        बुध                                         रोग           मंगल
70                                        मई 2012




                              फदन फक होरा - िूर्ोदर् िे िूर्ाास्त तक
    वार              1.घं     2.घं    3.घं     4.घं    5.घं     6.घं     7.घं    8.घं    9.घं    10.घं 11.घं 12.घं

    रत्रववार          िूर्ा   शुक्र   बुध      िंद्र   शसन      गुरु     मंगल    िूर्ा   शुक्र   बुध       िंद्र   शसन
    िोमवार            िंद्र   शसन      गुरु    मंगल िूर्ा       शुक्र    बुध     िंद्र   शसन     गुरु     मंगल     िूर्ा
    मंगलवार         मंगल      िूर्ा   शुक्र    बुध     िंद्र    शसन      गुरु    मंगल    िूर्ा   शुक्र     बुध     िंद्र
    बुधवार            बुध     िंद्र   शसन      गुरु मंगल िूर्ा           शुक्र   बुध     िंद्र   शसन       गुरु    मंगल
    गुरुवार           गुरु    मंगल    िूर्ा    शुक्र   बुध      िंद्र    शसन     गुरु    मंगल    िूर्ा    शुक्र    बुध
    शुक्रवार         शुक्र    बुध      िंद्र   शसन     गुरु मंगल         िूर्ा   शुक्र   बुध     िंद्र    शसन      गुरु
    शसनवार           शसन      गुरु    मंगल     िूर्ा   शुक्र    बुध      िंद्र   शसन     गुरु    मंगल      िूर्ा   शुक्र

                               रात फक होरा – िूर्ाास्त िे िूर्ोदर् तक
    रत्रववार          गुरु    मंगल    िूर्ा    शुक्र   बुध      िंद्र    शसन     गुरु    मंगल    िूर्ा    शुक्र    बुध
    िोमवार           शुक्र    बुध      िंद्र   शसन     गुरु मंगल         िूर्ा   शुक्र   बुध     िंद्र    शसन      गुरु
    मंगलवार          शसन      गुरु    मंगल     िूर्ा   शुक्र    बुध      िंद्र   शसन     गुरु    मंगल      िूर्ा   शुक्र
    बुधवार            िूर्ा   शुक्र   बुध      िंद्र   शसन      गुरु     मंगल    िूर्ा   शुक्र   बुध       िंद्र   शसन
    गुरुवार           िंद्र   शसन      गुरु    मंगल िूर्ा       शुक्र    बुध     िंद्र   शसन     गुरु     मंगल     िूर्ा
    शुक्रवार        मंगल      िूर्ा   शुक्र    बुध     िंद्र    शसन      गुरु    मंगल    िूर्ा   शुक्र     बुध     िंद्र
    शसनवार            बुध     िंद्र   शसन      गुरु मंगल िूर्ा           शुक्र   बुध     िंद्र   शसन       गुरु    मंगल
होरा मुहूता को कार्ा सित्रद्ध क सलए पूणा फलदार्क एवं अिूक माना जाता हं , फदन-रात क २४ घंटं मं शुभ-अशुभ िमर्
                               े                                                  े
को िमर् िे पूवा ज्ञात कर अपने कार्ा सित्रद्ध क सलए प्रर्ोग करना िाफहर्े।
                                              े

त्रवद्वानो क मत िे इस्च्छत कार्ा सित्रद्ध क सलए ग्रह िे िंबंसधत होरा का िुनाव करने िे त्रवशेष लाभ
            े                              े
प्राप्त होता हं ।
     िूर्ा फक होरा िरकारी कार्ो क सलर्े उत्तम होती हं ।
                                  े
     िंद्रमा फक होरा िभी कार्ं क सलर्े उत्तम होती हं ।
                                 े
     मंगल फक होरा कोटा -किेरी क कार्ं क सलर्े उत्तम होती हं ।
                                े       े
     बुध फक होरा त्रवद्या-बुत्रद्ध अथाात पढाई क सलर्े उत्तम होती हं ।
                                                े
     गुरु फक होरा धासमाक कार्ा एवं त्रववाह क सलर्े उत्तम होती हं ।
                                             े
     शुक्र फक होरा र्ािा क सलर्े उत्तम होती हं ।
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     शसन फक होरा धन-द्रव्र् िंबंसधत कार्ा क सलर्े उत्तम होती हं ।
                                            े
71                                                  मई 2012




                                             ग्रह िलन मई -2012
Day   Sun        Mon        Ma         Me         Jup        Ven        Sat        ah         Ket        Ua          Nep        Plu
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                                       िवा रोगनाशक र्ंि/कवि
       मनुष्र् अपने जीवन क त्रवसभडन िमर् पर फकिी ना फकिी िाध्र् र्ा अिाध्र् रोग िे ग्रस्त होता हं ।
                          े

उसित उपिार िे ज्र्ादातर िाध्र् रोगो िे तो मुत्रि समल जाती हं , लेफकन कभी-कभी िाध्र् रोग होकर भी अिाध्र्ा
होजाते हं , र्ा कोइ अिाध्र् रोग िे ग्रसित होजाते हं । हजारो लाखो रुपर्े खिा करने पर भी असधक लाभ प्राप्त नहीं हो
पाता। िॉक्टर द्वारा फदजाने वाली दवाईर्ा अल्प िमर् क सलर्े कारगर िात्रबत होती हं , एसि स्स्थती मं लाभा प्रासप्त क
                                                   े                                                            े
सलर्े व्र्त्रि एक िॉक्टर िे दिरे िॉक्टर क िक्कर लगाने को बाध्र् हो जाता हं ।
                             ू           े

       भारतीर् ऋषीर्ोने अपने र्ोग िाधना क प्रताप िे रोग शांसत हे तु त्रवसभडन आर्ुवर औषधो क असतररि र्ंि,
                                         े                                        े       े
मंि एवं तंि उल्लेख अपने ग्रंथो मं कर मानव जीवन को लाभ प्रदान करने का िाथाक प्रर्ाि हजारो वषा पूवा फकर्ा था।
बुत्रद्धजीवो क मत िे जो व्र्त्रि जीवनभर अपनी फदनिर्ाा पर सनर्म, िंर्म रख कर आहार ग्रहण करता हं , एिे व्र्त्रि
              े
को त्रवसभडन रोग िे ग्रसित होने की िंभावना कम होती हं । लेफकन आज क बदलते र्ुग मं एिे व्र्त्रि भी भर्ंकर रोग
                                                                 े
िे ग्रस्त होते फदख जाते हं । क्र्ोफक िमग्र िंिार काल क अधीन हं । एवं मृत्र्ु सनस्श्चत हं स्जिे त्रवधाता क अलावा
                                                      े                                                  े
और कोई टाल नहीं िकता, लेफकन रोग होने फक स्स्थती मं व्र्त्रि रोग दर करने का प्रर्ाि तो अवश्र् कर िकता हं ।
                                                                 ू
इि सलर्े र्ंि मंि एवं तंि क कशल जानकार िे र्ोग्र् मागादशान लेकर व्र्त्रि रोगो िे मुत्रि पाने का र्ा उिक प्रभावो
                           े ु                                                                         े
को कम करने का प्रर्ाि भी अवश्र् कर िकता हं ।

       ज्र्ोसतष त्रवद्या क कशल जानकर भी काल पुरुषकी गणना कर अनेक रोगो क अनेको रहस्र् को उजागर कर
                          े ु                                          े
िकते हं । ज्र्ोसतष शास्त्र क माध्र्म िे रोग क मूलको पकिने मे िहर्ोग समलता हं , जहा आधुसनक सिफकत्िा शास्त्र
                            े                े
अक्षम होजाता हं वहा ज्र्ोसतष शास्त्र द्वारा रोग क मूल(जि) को पकि कर उिका सनदान करना लाभदार्क एवं
                                                 े
उपार्ोगी सिद्ध होता हं ।
       हर व्र्त्रि मं लाल रं गकी कोसशकाए पाइ जाती हं , स्जिका सनर्मीत त्रवकाि क्रम बद्ध तरीक िे होता रहता हं ।
                                                                                            े
जब इन कोसशकाओ क क्रम मं पररवतान होता हं र्ा त्रवखंफिन होता हं तब व्र्त्रि क शरीर मं स्वास्थ्र् िंबंधी त्रवकारो
               े                                                           े
उत्पडन होते हं । एवं इन कोसशकाओ का िंबंध नव ग्रहो क िाथ होता हं । स्जस्िे रोगो क होने क कारणा व्र्त्रिक
                                                   े                            े      े               े
जडमांग िे दशा-महादशा एवं ग्रहो फक गोिर मं स्स्थती िे प्राप्त होता हं ।
       िवा रोग सनवारण कवि एवं महामृत्र्ुंजर् र्ंि क माध्र्म िे व्र्त्रि क जडमांग मं स्स्थत कमजोर एवं पीफित
                                                   े                     े
ग्रहो क अशुभ प्रभाव को कम करने का कार्ा िरलता पूवक फकर्ा जािकता हं । जेिे हर व्र्त्रि को ब्रह्मांि फक उजाा एवं
       े                                         ा
पृथ्वी का गुरुत्वाकषाण बल प्रभावीत कताा हं फठक उिी प्रकार कवि एवं र्ंि क माध्र्म िे ब्रह्मांि फक उजाा क
                                                                        े                              े
िकारात्मक प्रभाव िे व्र्त्रि को िकारात्मक उजाा प्राप्त होती हं स्जस्िे रोग क प्रभाव को कम कर रोग मुि करने हे तु
                                                                            े
िहार्ता समलती हं ।
       रोग सनवारण हे तु महामृत्र्ुंजर् मंि एवं र्ंि का बिा महत्व हं । स्जस्िे फहडद ू िंस्कृ सत का प्रार्ः हर व्र्त्रि
महामृत्र्ुंजर् मंि िे पररसित हं ।
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कवि क लाभ :
     े
      एिा शास्त्रोि विन हं स्जि घर मं महामृत्र्ुंजर् र्ंि स्थात्रपत होता हं वहा सनवाि कताा हो नाना प्रकार फक
       आसध-व्र्ासध-उपासध िे रक्षा होती हं ।
      पूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा िैतडर् र्ुि िवा रोग सनवारण कवि फकिी भी उम्र एवं जासत धमा क लोग िाहे
                                                                                                  े
       स्त्री हो र्ा पुरुष धारण कर िकते हं ।
      जडमांगमं अनेक प्रकारक खराब र्ोगो और खराब ग्रहो फक प्रसतकलता िे रोग उतपडन होते हं ।
                            े                                  ू
      कछ रोग िंक्रमण िे होते हं एवं कछ रोग खान-पान फक असनर्समतता और अशुद्धतािे उत्पडन होते हं । कवि
        ु                             ु
       एवं र्ंि द्वारा एिे अनेक प्रकार क खराब र्ोगो को नष्ट कर, स्वास्थ्र् लाभ और शारीररक रक्षण प्राप्त करने हे तु
                                        े
       िवा रोगनाशक कवि एवं र्ंि िवा उपर्ोगी होता हं ।
      आज क भौसतकता वादी आधुसनक र्ुगमे अनेक एिे रोग होते हं , स्जिका उपिार ओपरे शन और दवािे भी
           े
       कफठन हो जाता हं । कछ रोग एिे होते हं स्जिे बताने मं लोग फहिफकिाते हं शरम अनुभव करते हं एिे रोगो
                          ु
       को रोकने हे तु एवं उिक उपिार हे तु िवा रोगनाशक कवि एवं र्ंि लाभादासर् सिद्ध होता हं ।
                             े
      प्रत्र्ेक व्र्त्रि फक जेिे-जेिे आर्ु बढती हं वैिे-विै उिक शरीर फक ऊजाा होती जाती हं । स्जिक िाथ अनेक
                                                                े                                 े
       प्रकार क त्रवकार पैदा होने लगते हं एिी स्स्थती मं उपिार हे तु िवारोगनाशक कवि एवं र्ंि फलप्रद होता हं ।
               े
      स्जि घर मं त्रपता-पुि, माता-पुि, माता-पुिी, र्ा दो भाई एक फह नक्षिमे जडम लेते हं , तब उिकी माता क सलर्े
                                                                                                        े
       असधक कष्टदार्क स्स्थती होती हं । उपिार हे तु महामृत्र्ुंजर् र्ंि फलप्रद होता हं ।
      स्जि व्र्त्रि का जडम पररसध र्ोगमे होता हं उडहे होने वाले मृत्र्ु तुल्र् कष्ट एवं होने वाले रोग, सिंता मं
       उपिार हे तु िवा रोगनाशक कवि एवं र्ंि शुभ फलप्रद होता हं ।

नोट:- पूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा िैतडर् र्ुि िवा रोग सनवारण कवि एवं र्ंि क बारे मं असधक जानकारी हे तु हम
                                                                                े
िे िंपक करं ।
       ा


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    Here Our goal has The classical Method-Legislation with Proved by specific with fiery chants
     prestigious full consciousness (Puarn Praan Pratisthit) Give miraculous powers & Good effect All
     types of Yantra, Kavach, Rudraksh, preciouse and semi preciouse Gems stone deliver on your
     door step.
74                                  मई 2012




                                                   मंि सिद्ध कवि
मंि सिद्ध कवि को त्रवशेष प्रर्ोजन मं उपर्ोग क सलए और शीघ्र प्रभाव शाली बनाने क सलए तेजस्वी मंिो द्वारा
                                             े                                े
शुभ महूता मं शुभ फदन को तैर्ार फकर्े जाते हं . अलग-अलग कवि तैर्ार करने कसलए अलग-अलग तरह क
                                                                        े                े
मंिो का प्रर्ोग फकर्ा जाता हं .

    क्र्ं िुने मंि सिद्ध कवि?
    उपर्ोग मं आिान कोई प्रसतबडध नहीं
    कोई त्रवशेष सनसत-सनर्म नहीं
    कोई बुरा प्रभाव नहीं
    कवि क बारे मं असधक जानकारी हे तु
          े

                                               मंि सिद्ध कवि िूसि
िवा कार्ा सित्रद्ध          4600/-   ऋण मुत्रि                      910/-    त्रवघ्न बाधा सनवारण              550/-
िवा जन वशीकरण               1450/-   धन प्रासप्त                    820/-    नज़र रक्षा                        550/-
अष्ट लक्ष्मी                1250/-   तंि रक्षा                      730/-    दभााग्र् नाशक
                                                                              ु                               460/-
िंतान प्रासप्त              1250/-   शिु त्रवजर्                    730/-    * वशीकरण (२-३ व्र्त्रिक सलए)
                                                                                                    े        1050/-
स्पे- व्र्ापर वृत्रद्ध      1050/-   त्रववाह बाधा सनवारण            730/-    * पत्नी वशीकरण                   640/-
कार्ा सित्रद्ध              1050/-   व्र्ापर वृत्रद्ध               730/--   * पसत वशीकरण                     640/-
आकस्स्मक धन प्रासप्त        1050/-   िवा रोग सनवारण                 730/-    िरस्वती (कक्षा +10 क सलए)
                                                                                                 े            550/-
नवग्रह शांसत                 910/-   मस्स्तष्क पृत्रष्ट वधाक        640/-    िरस्वती (कक्षा 10 तकक सलए)
                                                                                                  े           460/-
भूसम लाभ                     910/-   कामना पूसता                    640/-    * वशीकरण ( 1 व्र्त्रि क सलए)
                                                                                                    े         640/-
काम दे व                     910/-   त्रवरोध नाशक                   640/-    रोजगार प्रासप्त                  370/-
पदं उडनसत                    910/-   रोजगार वृत्रद्ध                550/-
*कवि माि शुभ कार्ा र्ा उद्दे श्र् क सलर्े
                                   े

                                        GURUTVA KARYALAY
                 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                           Call Us - 9338213418, 9238328785
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                          (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)

                               (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
75                                   मई 2012




                       YANTRA LIST                                     EFFECTS
                    Our Splecial Yantra
 1   12 – YANTRA SET                                 For all Family Troubles
 2   VYAPAR VRUDDHI YANTRA                           For Business Development
 3   BHOOMI LABHA YANTRA                             For Farming Benefits
 4   TANTRA RAKSHA YANTRA                            For Protection Evil Sprite
 5   AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA                     For Unexpected Wealth Benefits
 6   PADOUNNATI YANTRA                               For Getting Promotion
 7   RATNE SHWARI YANTRA                             For Benefits of Gems & Jewellery
 8   BHUMI PRAPTI YANTRA                             For Land Obtained
 9   GRUH PRAPTI YANTRA                              For Ready Made House
10   KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA                                                -

                     Shastrokt Yantra

11   AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA             Blessing of Durga
12   BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL)                    Win over Enemies
13   BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL)             Blessing of Bagala Mukhi
14   BHAGYA VARDHAK YANTRA                           For Good Luck
15   BHAY NASHAK YANTRA                              For Fear Ending
16   CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta)          Blessing of Chamunda & Navgraha
17   CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA                      Blessing of Chhinnamasta
18   DARIDRA VINASHAK YANTRA                         For Poverty Ending
19   DHANDA POOJAN YANTRA                            For Good Wealth
20   DHANDA YAKSHANI YANTRA                          For Good Wealth
21   GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra)            Blessing of Lord Ganesh
22   GARBHA STAMBHAN YANTRA                          For Pregnancy Protection
23   GAYATRI BISHA YANTRA                            Blessing of Gayatri
24   HANUMAN YANTRA                                  Blessing of Lord Hanuman
25   JWAR NIVARAN YANTRA                             For Fewer Ending
     JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA
26   YANTRA
                                                     For Astrology & Spritual Knowlage
27   KALI YANTRA                                     Blessing of Kali
28   KALPVRUKSHA YANTRA                              For Fullfill your all Ambition
29   KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA)                 Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga
30   KANAK DHARA YANTRA                              Blessing of Maha Lakshami
31   KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA                                                  -
32   KARYA SHIDDHI YANTRA                            For Successes in work
33       SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA                 For Successes in all work
34   KRISHNA BISHA YANTRA                            Blessing of Lord Krishna
35   KUBER YANTRA                                    Blessing of Kuber (Good wealth)
36   LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA                      For Obstaele Of marriage
37   LAKSHAMI GANESH YANTRA                          Blessing of Lakshami & Ganesh
38   MAHA MRUTYUNJAY YANTRA                          For Good Health
39   MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA                   Blessing of Shiva
40   MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA)          For Fullfill your all Ambition
41   MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA               For Marriage with choice able Girl
42   NAVDURGA YANTRA                                 Blessing of Durga
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                               YANTRA LIST                                                     EFFECTS


43    NAVGRAHA SHANTI YANTRA                                         For good effect of 9 Planets
44    NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA                                    For good effect of 9 Planets
45        SURYA YANTRA                                              Good effect of Sun
46        CHANDRA YANTRA                                            Good effect of Moon
47        MANGAL YANTRA                                             Good effect of Mars
48        BUDHA YANTRA                                              Good effect of Mercury
49        GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA)                           Good effect of Jyupiter
50        SUKRA YANTRA                                              Good effect of Venus
51        SHANI YANTRA (COPER & STEEL)                              Good effect of Saturn
52        RAHU YANTRA                                               Good effect of Rahu
53        KETU YANTRA                                               Good effect of Ketu
54    PITRU DOSH NIVARAN YANTRA                                      For Ancestor Fault Ending
55    PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA                                    For Pregnancy Pain Ending
56    RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA                          For Benefits of State & Central Gov
57    RAM YANTRA                                                     Blessing of Ram
58    RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA                                     Blessing of Riddhi-Siddhi
59    ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA                              For Disease- Pain- Poverty Ending
60    SANKAT MOCHAN YANTRA                                           For Trouble Ending
61    SANTAN GOPAL YANTRA                                            Blessing Lorg Krishana For child acquisition
62    SANTAN PRAPTI YANTRA                                           For child acquisition
63    SARASWATI YANTRA                                               Blessing of Sawaswati (For Study & Education)
64    SHIV YANTRA                                                    Blessing of Shiv
                                                                     Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth &
 65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA)                              Peace
 66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA                                  Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth
 67 SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA                                       For Bad Dreams Ending
 68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA                                    For Vehicle Accident Ending
     VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE                Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All
 69 MAHALAKSHAMI YANTRA)                                             Successes
 70 VASTU YANTRA                                                     For Bulding Defect Ending
 71  VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA                For Education- Fame- state Award Winning
 72 VISHNU BISHA YANTRA                                              Blessing of Lord Vishnu (Narayan)
 73 VASI KARAN YANTRA                                                Attraction For office Purpose
 74      MOHINI VASI KARAN YANTRA                                   Attraction For Female
 75      PATI VASI KARAN YANTRA                                     Attraction For Husband
 76      PATNI VASI KARAN YANTRA                                    Attraction For Wife
 77      VIVAH VASHI KARAN YANTRA                                   Attraction For Marriage Purpose
Yantra Available @:- Rs- 255, 370, 460, 550, 640, 730, 820, 910, 1250, 1850, 2300, 2800 and Above…..


                                               GURUTVA KARYALAY
                    92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                            Call Us - 09338213418, 09238328785
                             Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
                  Email Us:- chintan_n_joshi@yahoo.co.in, gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
                                    (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
77                                              मई 2012



                                                  GURUTVA KARYALAY
  NAME OF GEM STONE                               GENERAL        MEDIUM FINE        FINE        SUPER FINE             SPECIAL
  Emerald                               (पडना)       200.00         500.00         1200.00 1900.00                 2800.00 & above
  Yellow Sapphire                   (पुखराज)         550.00        1200.00         1900.00 2800.00                 4600.00 & above
  Blue Sapphire                         (नीलम)       550.00        1200.00         1900.00 2800.00                 4600.00 & above
  White Sapphire       (िर्द पुखराज)
                              े                      550.00        1200.00         1900.00 2800.00                 4600.00 & above
  Bangkok Black Blue(बंकोक नीलम)                     100.00         150.00          200.00   500.00                1000.00 & above
  Ruby                               (मास्णक)        100.00         190.00          370.00   730.00                1900.00 & above
  Ruby Berma             (बमाा मास्णक)              5500.00        6400.00         8200.00 10000.00               21000.00 & above
  Speenal        (नरम मास्णक/लालिी)                  300.00         600.00         1200.00 2100.00                 3200.00 & above
  Pearl                                  (मोसत)       30.00          60.00           90.00   120.00                 280.00 & above
  Red Coral (4 jrh rd)          (लाल मूंगा)           75.00          90.00           12.00   180.00                 280.00 & above
  Red Coral (4 jrh ls mij) (लाल मूंगा)               120.00         150.00          190.00   280.00                 550.00 & above
  White Coral                (िर्द मूंगा)
                                      े               20.00          28.00           42.00    51.00                   90.00 & above
  Cat’s Eye                   (लहिुसनर्ा)             25.00          45.00           90.00   120.00                 190.00 & above
  Cat’s Eye Orissa (उफििा लहिुसनर्ा)                 460.00         640.00         1050.00 2800.00                 5500.00 & above
  Gomed                                 (गोमेद)       15.00          27.00           60.00    90.00                 120.00 & above
  Gomed CLN            (सिलोनी गोमेद)                300.00         410.00          640.00 1800.00                 2800.00 & above
  Zarakan                            (जरकन)          350.00         450.00          550.00   640.00                 910.00 & above
  Aquamarine                            (बेरुज)      210.00         320.00          410.00   550.00                 730.00 & above
  Lolite                                 (नीली)       50.00         120.00          230.00   390.00                 500.00 & above
  Turquoise                         (फर्रोजा)         15.00          30.00           45.00    60.00                   90.00 & above
  Golden Topaz                      (िुनहला)          15.00          30.00           45.00    60.00                   90.00 & above
  Real Topaz (उफििा पुखराज/टोपज)                      60.00         120.00          280.00   460.00                 640.00 & above
  Blue Topaz             (नीला टोपज)                  60.00          90.00          120.00   280.00                 460.00 & above
  White Topaz           (िर्द टोपज)
                                 े                    60.00          90.00          120.00   240.00                  410.00& above
  Amethyst                            (कटे ला)        20.00          30.00           45.00    60.00                 120.00 & above
  Opal                                   (उपल)        30.00          45.00           90.00   120.00                 190.00 & above
  Garnet                             (गारनेट)         30.00          45.00           90.00   120.00                 190.00 & above
  Tourmaline                       (तुमलीन)
                                          ा          120.00         140.00          190.00   300.00                 730.00 & above
  Star Ruby           (िुर्काडत मस्ण)
                           ा                          45.00          75.00           90.00   120.00                 190.00 & above
  Black Star               (काला स्टार)               15.00          30.00           45.00    60.00                 100.00 & above
  Green Onyx                        (ओनेक्ि)          09.00          12.00           15.00    19.00                   25.00 & above
  Real Onyx                         (ओनेक्ि)          60.00          90.00          120.00   190.00                 280.00 & above
  Lapis                             (लाजवात)          15.00          25.00           30.00    45.00                   55.00 & above
  Moon Stone          (िडद्रकाडत मस्ण)                12.00          21.00           30.00    45.00                 100.00 & above
  Rock Crystal                      (स्र्फटक)         09.00          12.00           15.00    30.00                   45.00 & above
  Kidney Stone            (दाना फर्रं गी)             09.00          11.00           15.00    19.00                   21.00 & above
  Tiger Eye             (टाइगर स्टोन)                 03.00          05.00           10.00    15.00                   21.00 & above
  Jade                                (मरगि)          12.00          19.00           23.00    27.00                   45.00 & above
  Sun Stone               (िन सितारा)                 12.00          19.00           23.00    27.00                   45.00 & above
                                                      50.00         100.00           200.00   370.00                460.00 & above
  Diamond                              (हीरा)      (Per Cent )    (Per Cent )      (PerCent )     (Per Cent)                  (Per Cent )
  (.05 to .20 Cent )
Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus
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                      BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION
      We are mostly engaged in spreading the ancient knowledge of Astrology, Numerology, Vastu and Spiritual
Science in the modern context, across the world.
      Our research and experiments on the basic principals of various ancient sciences for the use of common man.
exhaustive guide lines exhibited in the original Sanskrit texts

BOOK APPOINTMENT PHONE/ CHAT CONSULTATION
        Please book an appointment with Our expert Astrologers for an internet chart . We would require your birth
details and basic area of questions so that our expert can be ready and give you rapid replied. You can indicate the
area of question in the special comments box. In case you want more than one person reading, then please mention
in the special comment box . We shall confirm before we set the appointment. Please choose from :

                                    PHONE/ CHAT CONSULTATION
                       Consultation 30 Min.:               RS. 1250/-*
                       Consultation 45 Min.:               RS. 1900/-*
                       Consultation 60 Min.:               RS. 2500/-*
*While booking the appointment in Addvance

How Does it work Phone/Chat Consultation
This is a unique service of GURUATVA KARYALAY where we offer you the option of having a personalized
discussion with our expert astrologers. There is no limit on the number of question although time is of
consideration.
Once you request for the consultation, with a suggestion as to your convenient time we get back with a
confirmation whether the time is available for consultation or not.
    We send you a Phone Number at the designated time of the appointment
    We send you a Chat URL / ID to visit at the designated time of the appointment
    You would need to refer your Booking number before the chat is initiated
    Please remember it takes about 1-2 minutes before the chat process is initiated.
    Once the chat is initiated you can commence asking your questions and clarifications
    We recommend 25 minutes when you need to consult for one persona Only and usually the time is
       sufficient for 3-5 questions depending on the timing questions that are put.
    For more than these questions or one birth charts we would recommend 60/45 minutes Phone/chat
       is recommended
    Our expert is assisted by our technician and so chatting & typing is not a bottle neck

In special cases we don't have the time available about your Specific Questions We will taken some time for
properly Analysis your birth chart and we get back with an alternate or ask you for an alternate.
All the time mentioned is Indian Standard Time which is + 5.30 hr ahead of G.M.T.
Many clients prefer the chat so that many questions that come up during a personal discussion can be
answered right away.
BOOKING FOR PHONE/ CHAT CONSULTATION PLEASE CONTECT

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                              Call Us:- 91+9338213418, 91+9238328785.
   Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com, chintan_n_joshi@yahoo.co.in,
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                                                            िूिना
 पत्रिका मं प्रकासशत िभी लेख पत्रिका क असधकारं क िाथ ही आरस्क्षत हं ।
                                       े         े

 लेख प्रकासशत होना का मतलब र्ह कतई नहीं फक कार्ाालर् र्ा िंपादक भी इन त्रविारो िे िहमत हं।

 नास्स्तक/ अत्रवश्वािु व्र्त्रि माि पठन िामग्री िमझ िकते हं ।

 पत्रिका मं प्रकासशत फकिी भी नाम, स्थान र्ा घटना का उल्लेख र्हां फकिी भी व्र्त्रि त्रवशेष र्ा फकिी भी स्थान र्ा
   घटना िे कोई िंबंध नहीं हं ।

 प्रकासशत लेख ज्र्ोसतष, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु, मंि, र्ंि, तंि, आध्र्ास्त्मक ज्ञान पर आधाररत होने क कारण
                                                                                                  े
   र्फद फकिी क लेख, फकिी भी नाम, स्थान र्ा घटना का फकिी क वास्तत्रवक जीवन िे मेल होता हं तो र्ह माि
              े                                          े
   एक िंर्ोग हं ।

 प्रकासशत िभी लेख भारसतर् आध्र्ास्त्मक शास्त्रं िे प्रेररत होकर सलर्े जाते हं । इि कारण इन त्रवषर्ो फक
   ित्र्ता अथवा प्रामास्णकता पर फकिी भी प्रकार फक स्जडमेदारी कार्ाालर् र्ा िंपादक फक नहीं हं ।

 अडर् लेखको द्वारा प्रदान फकर्े गर्े लेख/प्रर्ोग फक प्रामास्णकता एवं प्रभाव फक स्जडमेदारी कार्ाालर् र्ा िंपादक
   फक नहीं हं । और नाहीं लेखक क पते फठकाने क बारे मं जानकारी दे ने हे तु कार्ाालर् र्ा िंपादक फकिी भी
                               े            े
   प्रकार िे बाध्र् हं ।

 ज्र्ोसतष, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु, मंि, र्ंि, तंि, आध्र्ास्त्मक ज्ञान पर आधाररत लेखो मं पाठक का अपना
   त्रवश्वाि होना आवश्र्क हं । फकिी भी व्र्त्रि त्रवशेष को फकिी भी प्रकार िे इन त्रवषर्ो मं त्रवश्वाि करने ना करने
   का अंसतम सनणार् स्वर्ं का होगा।

 पाठक द्वारा फकिी भी प्रकार फक आपत्ती स्वीकार्ा नहीं होगी।

 हमारे द्वारा पोस्ट फकर्े गर्े िभी लेख हमारे वषो क अनुभव एवं अनुशंधान क आधार पर सलखे होते हं । हम फकिी भी व्र्त्रि
                                                   े                    े
   त्रवशेष द्वारा प्रर्ोग फकर्े जाने वाले मंि- र्ंि र्ा अडर् प्रर्ोग र्ा उपार्ोकी स्जडमेदारी नफहं लेते हं ।

 र्ह स्जडमेदारी मंि-र्ंि र्ा अडर् प्रर्ोग र्ा उपार्ोको करने वाले व्र्त्रि फक स्वर्ं फक होगी। क्र्ोफक इन त्रवषर्ो मं नैसतक
   मानदं िं , िामास्जक , कानूनी सनर्मं क स्खलाफ कोई व्र्त्रि र्फद नीजी स्वाथा पूसता हे तु प्रर्ोग कताा हं अथवा
                                        े
   प्रर्ोग क करने मे िुफट होने पर प्रसतकल पररणाम िंभव हं ।
            े                           ू

 हमारे द्वारा पोस्ट फकर्े गर्े िभी मंि-र्ंि र्ा उपार् हमने िैकिोबार स्वर्ं पर एवं अडर् हमारे बंधगण पर प्रर्ोग फकर्े हं
                                                                                                 ु
   स्जस्िे हमे हर प्रर्ोग र्ा मंि-र्ंि र्ा उपार्ो द्वारा सनस्श्चत िफलता प्राप्त हुई हं ।

 पाठकं फक मांग पर एक फह लेखका पूनः प्रकाशन करने का असधकार रखता हं । पाठकं को एक लेख क पूनः
                                                                                      े
   प्रकाशन िे लाभ प्राप्त हो िकता हं ।

 असधक जानकारी हे तु आप कार्ाालर् मं िंपक कर िकते हं ।
                                         ा

                              (िभी त्रववादो कसलर्े कवल भुवनेश्वर डर्ार्ालर् ही माडर् होगा।)
                                             े      े
80               मई 2012



                                              FREE
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                            गुरुत्व ज्र्ोसतष पत्रिका मई -2012
िंपादक

सिंतन जोशी
िंपका
गुरुत्व ज्र्ोसतष त्रवभाग

गुरुत्व कार्ाालर्
92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
INDIA

फोन


91+9338213418, 91+9238328785
ईमेल
gurutva.karyalay@gmail.com,
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वेब
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81                                            मई 2012




                                                        हमारा उद्दे श्र्
त्रप्रर् आस्त्मर्

              बंध/ बफहन
                 ु

                          जर् गुरुदे व

         जहाँ आधुसनक त्रवज्ञान िमाप्त हो जाता हं । वहां आध्र्ास्त्मक ज्ञान प्रारं भ हो जाता हं , भौसतकता का आवरण ओढे व्र्त्रि
जीवन मं हताशा और सनराशा मं बंध जाता हं , और उिे अपने जीवन मं गसतशील होने क सलए मागा प्राप्त नहीं हो पाता क्र्ोफक
                                                                          े
भावनाए फह भविागर हं , स्जिमे मनुष्र् की िफलता और अिफलता सनफहत हं । उिे पाने और िमजने का िाथाक प्रर्ाि ही श्रेष्ठकर
िफलता हं । िफलता को प्राप्त करना आप का भाग्र् ही नहीं असधकार हं । ईिी सलर्े हमारी शुभ कामना िदै व आप क िाथ हं । आप
                                                                                                      े
अपने कार्ा-उद्दे श्र् एवं अनुकलता हे तु र्ंि, ग्रह रत्न एवं उपरत्न और दलभ मंि शत्रि िे पूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत सिज वस्तु का हमंशा
                              ू                                        ु ा
प्रर्ोग करे जो १००% फलदार्क हो। ईिी सलर्े हमारा उद्दे श्र् र्हीं हे की शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध
प्राण-प्रसतत्रष्ठत पूणा िैतडर् र्ुि िभी प्रकार क र्डि- कवि एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोिाने का हं ।
                                                े                                                  े


                                         िूर्ा की फकरणे उि घर मं प्रवेश करापाती हं ।
                                            जीि घर क स्खिकी दरवाजे खुले हं।
                                                    े




                                           GURUTVA KARYALAY
                92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                          Call Us - 9338213418, 9238328785
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                                   (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
82    मई 2012




MAY
2012

Gurutva jyotish may 2012

  • 1.
    Font Help >>http://gurutvajyotish.blogspot.com गुरुत्व कार्ाालर् द्वारा प्रस्तुत मासिक ई-पत्रिका मई- 2012 NON PROFIT PUBLICATION .
  • 2.
    FREE E CIRCULAR गुरुत्व ज्र्ोसतष पत्रिका मई 2012 िंपादक सिंतन जोशी गुरुत्व ज्र्ोसतष त्रवभाग िंपका गुरुत्व कार्ाालर् 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA फोन 91+9338213418, 91+9238328785, gurutva.karyalay@gmail.com, ईमेल gurutva_karyalay@yahoo.in, http://gk.yolasite.com/ वेब http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/ पत्रिका प्रस्तुसत सिंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी फोटो ग्राफफक्ि सिंतन जोशी, स्वस्स्तक आटा हमारे मुख्र् िहर्ोगी स्वस्स्तक.ऎन.जोशी (स्वस्स्तक िोफ्टे क इस्डिर्ा सल) ई- जडम पत्रिका E HOROSCOPE अत्र्ाधुसनक ज्र्ोसतष पद्धसत द्वारा Create By Advanced उत्कृ ष्ट भत्रवष्र्वाणी क िाथ े Astrology Excellent Prediction १००+ पेज मं प्रस्तुत 100+ Pages फहं दी/ English मं मूल्र् माि 750/- GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  • 3.
    अनुक्रम गार्िी उपािना त्रवशेष गार्िी िमस्त त्रवद्याओं की जननी हं 6 नवग्रह की शांसत क सलर्े गार्िी मंि े 18 गार्िी मंि का पररिर् 7 दे वी गार्िी का िरल पूजन 21 गार्िी मंि क िंदभा मं महापुरुषं क विन े े 8 गार्िी स्तोि व माहात््र् 25 गार्िी मडि क त्रवलक्षण प्रर्ोग े 12 रोग सनवारण क सलर्े पत्रवि जल े 34 त्रवसभडन गार्िी मडि 15 त्रवश्वासमि िंफहतोक्त गार्िी कवि 37 मंि एवं स्तोि त्रवशेष अघनाशकगार्िीस्तोि 29 श्री गार्िी कवि 33 गार्िी स्तोि 30 गार्िी कविम ् 39 गार्िीस्तोिम ् 30 गार्िी िुप्रभातम ् 40 गार्िी िालीिा 31 गार्िीरहस्र्ोपसनषत ् 41 श्री गार्िी शाप त्रवमोिनम ् 32 गार्िी मडिाथाः िाथा 43 श्री गार्िी जी की आरती 32 श्री गार्िी फदव्र् िहस्रनाम स्तोिम ् 44 हमारे उत्पाद दस्क्षणावसता शंख 7 श्री हनुमान र्ंि 49 नवरत्न जफित श्री र्ंि 53 पढा़ई िंबंसधत िमस्र्ा 67 भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी 20 मंि सिद्ध दै वी र्ंि िूसि 50 जैन धमाक त्रवसशष्ट र्ंि े 54 िवा रोगनाशक र्ंि/ 72 िवाकार्ा सित्रद्ध कवि 28 मंिसिद्ध लक्ष्मी र्ंििूसि 50 अमोद्य महामृत्र्ुजर् कवि ं 56 मंि सिद्ध कवि 74 मंिसिद्ध स्फफटक श्रीर्ंि 36 रासश रत्न 51 मंगल र्ंि िे ऋणमुत्रि 65 YANTRA 75 द्वादश महा र्ंि 38 मंि सिद्ध रूद्राक्ष 52 कबेर र्ंि ु 65 GEMS STONE 77 मंि सिद्ध मारुसत र्ंि 49 मंि सिद्ध दलभ िामग्री ु ा 52 शादी िंबंसधत िमस्र्ा 67 Book Consultation 78 घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि 55 मंि सिद्ध िामग्री- 65, 66, 67 स्थार्ी और अडर् लेख िंपादकीर् 4 दै सनक शुभ एवं अशुभ िमर् ज्ञान तासलका 68 मई मासिक रासश फल 57 फदन-रात क िौघफिर्े े 69 मई 2012 मासिक पंिांग 61 फदन-रात फक होरा - िूर्ोदर् िे िूर्ाास्त तक 70 मई 2012 मासिक व्रत-पवा-त्र्ौहार 63 ग्रह िलन मई-2012 71 मई 2012 -त्रवशेष र्ोग 68 हमारा उद्दे श्र् 81
  • 4.
    GURUTVA KARYALAY िंपादकीर् त्रप्रर् आस्त्मर् बंध/ बफहन ु जर् गुरुदे व ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं ा ु ा भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ्॥ भावाथा: उि प्राणस्वरूप, दःखनाशक, िुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, दे वस्वरूप परमात्मा को हम अडतःकरण मं ु धारण करं । वह परमात्मा हमारी बुत्रद्ध को िडमागा मं प्रेररत करे । फहडद ू धमाग्रंथं मं उल्लेख हं की दे वी गार्िी िभी प्रकार क ज्ञान और त्रवज्ञान की जननी है । इिसलए तो स्जन े वेदं को िमस्त त्रवद्याओं का खजाना माना जाता हं , िारं वेदं को दे वी गार्िी क पुि माने जाते हं । र्फह कारण हं , े क दे वी गार्िी को वेदं की माता अथाात "वेदमाता" कहा गर्ा हं । े दे वी गार्िी क मडि क िार पद िे क्रमशः े े ॐ भूभवः स्वः िे ऋग्वेद की रिना हुई। तत्ित्रवतुवरेण्र्ं िे र्जुवेद की रिना हुई। भगोदे वस्र् धीमफह िे िामवेद की ा ा ा रिना हुई। और सधर्ो र्ोनः प्रिोदर्ात ् िे अथवावेद की रिना हुई हं ऐिा धमाग्रंथं मं उल्लेस्खत हं । पौरास्णक काल मं ही हमारे ज्ञानी ऋषी मुसनर्ं को ज्ञात हो गर्ा था की गार्िी दे वी िमस्त त्रवद्याओं की जननी हं । ऐिा माना जाता हं की िार वेदं िे ही िमस्त शास्त्र, दशान, ब्राह्मण ग्रडथ, आरण्र्क, िूि, उपसनषद्, पुराण, स्मृसत आफद का सनमााण हुआ हं । पौरास्णक माडर्ता हं की कालांतर मं इडहीं ग्रडथं मं वस्णात ज्ञान िे िमस्त सशल्प, वास्णज्र्, सशक्षा, रिार्न, वास्तु, िंगीत आफद ८४ कलाओं का आत्रवष्कार हुआ हं । र्फह कारण हं की दे वी गार्िी को िंिार क िमस्त ज्ञान- े त्रवज्ञान की जननी कहाँ जाता हं । स्जि प्रकार फकिी बीज क भीतर िंपूणा वृक्ष िस्डनफहत होता है , उिी प्रकार गार्िी े क 24 अक्षरं मं िंिार क िमस्त ज्ञान और त्रवज्ञान िस्डनफहत हं । र्ह िब गार्िी का ही अथा त्रवस्तार हं । े े वेदमाता गार्िी क जडम िे िंबंसधत त्रवसभडन माडर्ताएं प्रिसलत हं । े कछ जानकारो का मानना हं की वेदमाता गार्िी का जडम श्रावणी पूस्णामा को हुवा था इि सलर्े इि फदन को ु गार्िी जर्ंसत क रुप मं भी मनार्ा जाता हं । े कछ अडर् पोराणीक माडर्ताओं एवं धमा ग्रंथो मं उल्लेख हं की फहडदी पंिांग क ज्र्ैष्ठ महीने क शुक्ल पक्ष की ु े े एकादशी को मां गार्िी का प्राकटर् हुवा हं । कछ िमर् क पश्चर्ात इिी फदन ऋत्रष त्रवश्रासमि ने गार्िी मंि की रिना ु े की थी। ऐिी माडर्ता है फक इिी फदन वेदमाता गार्िी िाक्षात मं धरती पर अपने रूप मं प्रकट हुईं थीं। ज्ञान तथा वेदं का ज्ञान दे वी गार्िी िे ही प्रकट हुआ है । अडर् पौरास्णक माडर्ता क अनुिार कासताक शुक्ल पक्ष क षष्ठी क िूर्ाास्त और िप्तमी क िूर्ोदर् क मध्र् े े े े े वेदमाता गार्िी का जडम हुआ था। भले ही मां गार्िी क जडम फदन को लेकर त्रवसभडन लोक माडर्ता एवं शास्त्रं की े
  • 5.
    सभडनता िे अलग-अलगमत हो। लेफकन िभी ऋत्रषर्ं ने एक मत िे गार्िी मंि की मफहमा को स्वीकार फकर्ा हं । अथवावेद मं उल्लेख हं की गार्िी मंि क जप िे मनुष्र् की आर्ु, प्राण, शत्रि, कीसता, धन और ब्रह्मतेज मं वृत्रद्ध होती हं । े गार्िी मंि क िंदभा मं त्रवसभडन महापुरुषो क कथन िे समलते-जुलते असभमत हं महापुरुषो क कथन िे े े े आपको पररसित कराने हे तु इि अंक मं उिक अंश को त्रवसभडन स्रोत क माध्र्म िे िंलग्न करने का प्रर्ाि फकर्ा े े गर्ा हं स्जििे र्ह स्पष्ट है फक कोई ऋत्रष र्ा त्रवद्वान अडर् त्रवषर्ं मं िाहे अपना मतभेद रखते हं, पर गार्िी क बारे े मं उन िब मं िमान श्रद्धा थी और वे िभी अपनी उपािना मं उिका प्रथम स्थान रखते थे ! कछ त्रवद्वानो का कथन ु हं की शास्त्रं मं, ग्रंथं मं, स्मृसतर्ं मं, पुराणं मं गार्िी की मफहमा तथा िाधना पर प्रकाश िालने वाले िहस्रं श्लोक भरे पिे हं । इन िबका िंग्रह फकर्ा जाए, तो एक बिा भारी गार्िी पुराण बन िकता हं । िामाडर्तः गार्िी मडि की मफहमा एवं प्रभाव िे प्रार्ः हर फहडद ु धमा को मानने वाले लोग पररसित हं । गार्िी मंि को "गुरु मंि" क रुप मे जाना जाता है । क्र्ोफक फहडद ु धमा मं गार्िी मडि िभी मंिं मं िवोच्ि है और िबिे े प्रबल शत्रिशाली मंि हं । इि अंक मं अत्र्ंत िरल और असधक प्रभावी दै सनक गार्िी उपािना जो हर िाधारण िे िाधारण व्र्त्रि जो अथाात जो व्र्त्रि फकिी भी प्रकार क कमा-कांि र्ा पूजा पाठ को नहीं जानता हं र्ा जानते हो ओर उिे करने मं े अिमथा हो, ऐिे व्र्त्रि भी िरल गार्िी उपािना आिानी िे कर िक इि उद्दे श्र् िे इि अंक मं िलग्न करने का े प्रर्ाि फकर्ा गर्ा हं । क्र्ोफक गार्िी उपािना जीवन क हर स्स्थसत मं भि क सलए सनस्श्चत रूप िे फार्दे मंद होती हं । े े वैिे तो मां गार्िी की पूजा हे तु अनेको त्रवसध-त्रवधान प्रिलन मं हं लेफकन िाधारण व्र्त्रि जो िंपूणा त्रवसध-त्रवधान िे गार्िी का पूजन नहीं कर िकते वह व्र्त्रि र्फद गार्िी जी क पूजन का िरल त्रवसध-त्रवधान ज्ञात करले तो वहँ े सनस्श्चत रुप िे पूणा फल प्राप्त कर िकते हं । इिी उद्दे श्र् िे इि अंक मं पाठको क ज्ञान वृत्रद्ध क उद्दे श्र् िे मां गार्िी े े क पूजन की असत िरल शीघ्र फलप्रद त्रवसध, मंि, स्तोि इत्र्ाफद िे आपको पररसित कराने का प्रर्ाि फकर्ा हं । जो लोग े िरल त्रवसध िे मंि जप पूजन इत्र्ाफद करने मं भी अिमथा हं वहँ लोग श्री गार्िी जी क मंि-स्तोि इत्र्ाफद का श्रवण े कर क भी पूणा श्रद्धा एवं त्रवश्वाि रख कर सनस्श्चत ही लाभ प्राप्त कर िकते हं , र्हँ अनुभूत उपार् हं जो सनस्श्चत फल े प्रदान करने मं िमथा हं इि मं जरा भी िंिर् नहीं हं । इि अंक मं आप अपने कार्ा उद्दे श्र् की पूसता हे तु िरल िे िरल उपार्ं को कर पूणा िफलता प्राप्त कर िक इि उद्दे श्र् िे गार्िी मडि क त्रवलक्षण प्रर्ोग को इि अंक मं े े िलग्न करने का प्रर्ाि फकर्ा गर्ा हं । स्जिे िंपडन करक आप वेदमाता गार्िी की कृ पा प्राप्त कर अपने मनोरथं को े सनस्श्चत रुप िे पूणा कर िकते हं । आप िभी क मागादशान र्ा ज्ञानवधान क सलए गार्िी उपािना िे िंबंसधत उपर्ोगी जानकारी भी इि अंक मं े े िंकसलत की गई हं । िाधक एवं त्रवद्वान पाठको िे अनुरोध हं , र्फद दशाार्े गए मंि, स्तोि इत्र्ादी क िंकलन, प्रमाण े पढ़ने, िंपादन मं, फिजाईन मं, टाईपींग मं, त्रप्रंफटं ग मं, प्रकाशन मं कोई िुफट रह गई हो, तो उिे स्वर्ं िुधार लं र्ा फकिी र्ोग्र् गुरु र्ा त्रवद्वान िे िलाह त्रवमशा कर ले । क्र्ोफक त्रवद्वान गुरुजनो एवं िाधको क सनजी अनुभव त्रवसभडन अनुष्ठा े मं भेद होने पर पूजन त्रवसध एवं जप त्रवसध मं सभडनता िंभव हं । सिंतन जोशी
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    6 मई 2012 गार्िी िमस्त त्रवद्याओं की जननी हं  सिंतन जोशी ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं ा ु ा उिी प्रकार गार्िी क 24 अक्षरं मं िंिार क िमस्त े े भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ्॥ ज्ञान और त्रवज्ञान िस्डनफहत हं । र्ह िब गार्िी का ही अथा त्रवस्तार हं । फहडद ू धमाग्रंथं मं उल्लेख हं की दे वी गार्िी िभी मंि की परीभाषा: प्रकार क ज्ञान और त्रवज्ञान की जननी है । इिसलए तो े मंि उि ध्वसन को कहते है जो अक्षर(शब्द) एवं अक्षरं स्जन वेदं को िमस्त त्रवद्याओं का खजाना माना जाता हं , (शब्दं) क िमूह िे बनता है । िंपूणा ब्रह्माण्ि मं दो प्रकार े त्रवद्वानो क मतानुशार िभी वेद दे वी गार्िी की े फक ऊजाा िे व्र्ाप्त है , स्जिका हम अनुभव कर िकते है , व्र्ाख्र्ा हं । र्फह कारण हं , क दे वी गार्िी को वेदं की े वह ध्वसन उजाा एवं प्रकाश उजाा है । इि क अलावा े माता अथाात "वेदमाता" कहा गर्ा हं । िारं वेदं को दे वी ब्रह्माण्ि मं कछ एिी ऊजाा भी व्र्ाप्त होती है स्जिे ना ु गार्िी क पुि माने जाते हं । े हम दे ख िकते है नाही िुन िकते है नाहीं अनुभव कर शास्त्रोि मत िे जब ब्रह्माजी ने एक-एक करके िकते है । आध्र्ास्त्मक शत्रि इनमं िे कोई भी एक प्रकार की ऊजाा दिरी उजाा क िहर्ोग क त्रबना िफक्रर् नहीं ू े े अपने िारं मुख िे गार्िी क िार अलग-अलग िरण की े होती। मंि सिर् ध्वसनर्ाँ नहीं हं स्जडहं हम कानं िे ा व्र्ाख्र्ा की थी उि वि िारं वेदं का उद्गम माना जाता िुनते िकते हं , ध्वसनर्ाँ तो माि मंिं का लौफकक स्वरुप हं र्ा िार वेद प्रकट हुए हं । भर हं स्जिे हम िुन िकते हं । ध्र्ान की उच्ितम दे वी गार्िी क मडि क िार पद िे क्रमशः े े अवस्था मं व्र्त्रि का आध्र्ास्त्मक व्र्त्रित्व पूरी तरह िे ॐ भूभवः स्वः िे ऋग्वेद की रिना हुई। तत्ित्रवतुवरेण्र्ं ा ा ब्रह्माण्ि की अलौफकक शत्रिओ क िाथ मे एकाकार हो े िे र्जुवेद की रिना हुई। भगोदे वस्र् धीमफह िे िामवेद ा जाता है और त्रवसभडन प्रकारी की शत्रिर्ां प्राप्त होने की रिना हुई। और सधर्ो र्ोनः प्रिोदर्ात ् िे अथवावेद लगती हं । प्रािीन ऋत्रषर्ं ने इिे शब्द-ब्रह्म की िंज्ञा दी की रिना हुई हं ऐिा धमाग्रंथं मं उल्लेस्खत हं । वह शब्द जो िाक्षात ् ईश्वर हं ! उिी िवाज्ञानी शब्द-ब्रह्म िे पौरास्णक काल मं ही हमारे ज्ञानी ऋषी मुसनर्ं एकाकार होकर व्र्त्रि को मनिाहा ज्ञान प्राप्त कर ने मे को ज्ञात हो गर्ा था की गार्िी दे वी िमस्त त्रवद्याओं की िमथा हो िकता हं । जननी हं । ऐिा माना जाता हं की िार वेदं िे ही िमस्त हर मंिं मं कई त्रवशेष प्रकार की शत्रि सनफहत शास्त्र, दशान, ब्राह्मण ग्रडथ, आरण्र्क, िूि, उपसनषद्, होती हं । मंिं क अक्षर शत्रि बीज माने जाते हं । जैिे े पुराण, स्मृसत आफद का सनमााण हुआ हं । िभी त्रवसशष्ट मंिं मं उनक शब्दं मं त्रवशेष प्रकार की े पौरास्णक माडर्ता हं की कालांतर मं इडहीं ग्रडथं शत्रि तो होती है , पर फकिी-फकिी मडि मं उन शब्दं का मं वस्णात ज्ञान िे िमस्त सशल्प, वास्णज्र्, सशक्षा, कोई त्रवशेष महत्वपूणा अथा नहीं होता। लेफकन गार्िी रिार्न, वास्तु, िंगीत आफद ८४ कलाओं का आत्रवष्कार मंि मं ऐिा नहीं हं । गार्िी मंि क हर एक-एक अक्षर मं े अनेक प्रकार क गूढ़ रहस्र्मर् तत्त्व सछपे हुए हं । ऐिा े हुआ हं । र्फह कारण हं की दे वी गार्िी को िंिार के माना जाता हं की िमस्त लोक मं प्रिसलत ६४ कलाओं, िमस्त ज्ञान-त्रवज्ञान की जननी कहाँ जाता हं । स्जि ६ शास्त्रं, ६ दशानं एवं ८४ त्रवद्याओं क रहस्र् प्रकासशत े प्रकार फकिी बीज क भीतर िंपूणा वृक्ष िस्डनफहत होता है , े करने वाले िभी अथा गार्िी क हं । े
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    7 मई 2012 गार्िी मंि का पररिर्  सिंतन जोशी िामाडर्तः गार्िी मडि की मफहमा एवं प्रभाव िे गार्िी मंि का अथा त्रवस्तृत शब्दो मं प्रार्ः हर फहडद ु धमा को मानने वाले लोग पररसित हं । ओम - है िवाशत्रिमान परमेश्वर भूर आध्र्ास्त्मक ऊजाा का अवतार गार्िी मंि को "गुरु मंि" क रुप मे जाना जाता है । े - भव - दख की त्रवनाशक ु क्र्ोफक फहडद ु धमा मं गार्िी मडि िभी मंिं मं िवोच्ि स्वह - खुशी क अवतार े है और िबिे प्रबल शत्रिशाली मंि हं । तत ् - जो (भगवान का िंकत) े ित्रवतुर - उज्ज्वल, िमकीले, िूर्ा की तरह ॐ भूभवः स्वः तत्ि त्रवतुवरेण्र्ं। ा ा वारेण्र्ं - उत्तम भगोदे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ोनः प्रिोदर्ात॥ भगो - पापं का नाशक दे वस्र् - परमात्मा भावाथा: उि प्राणस्वरूप, दःखनाशक, िुखस्वरूप, श्रेष्ठ, ु धीमफह - मुजे प्रासप्त हो सधर्ो - एसि बुत्रद्ध तेजस्वी, पापनाशक, दे वस्वरूप परमात्मा को हम र्ो - जो अडतःकरण मं धारण करं । वह परमात्मा हमारी बुत्रद्ध को नह - हमे िडमागा मं प्रेररत करे । प्रिोदर्ात - प्रेरणा दे दस्क्षणावसता शंख आकार लंबाई मं फाईन िुपर फाईन स्पेशल आकार लंबाई मं फाईन िुपर फाईन स्पेशल 0.5" ईंि 180 230 280 4" to 4.5" ईंि 730 910 1050 1" to 1.5" ईंि 280 370 460 5" to 5.5" ईंि 1050 1250 1450 2" to 2.5" ईंि 370 460 640 6" to 6.5" ईंि 1250 1450 1900 3" to 3.5" ईंि 460 550 820 7" to 7.5" ईंि 1550 1850 2100 हमारे र्हां बिे आकार क फकमती व महं गे शंख जो आधा लीटर पानी और 1 लीटर पानी िमाने की क्षमता वाले े होते हं । आपक अनुरुध पर उपलब्ध कराएं जा िकते हं । े  स्पेशल गुणवत्ता वाला दस्क्षणावसता शंख पूरी तरह िे िफद रं ग का होता हं । े  िुपर फाईन गुणवत्ता वाला दस्क्षणावसता शंख फीक िफद रं ग का होता हं । े े  फाईन गुणवत्ता वाला दस्क्षणावसता शंख दं रं ग का होता हं । GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 923832878 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
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    8 मई 2012 गार्िी मंि क िंदभा मं महापुरुषं क विन े े  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी िभी ऋत्रषर्ं ने एक मत िे गार्िी मंि की वाला अडर् कोई मडि मफहमा को स्वीकार फकर्ा हं । स्वगा और पृथ्वी पर नहीं अथवावेद मं उल्लेख हं की गार्िी मंि क जप िे े हं । जैिे गंगा क िमान े मनुष्र् की आर्ु, प्राण, शत्रि, कीसता, धन और ब्रह्मतेज मं कोई तीथा नहीं, कशव िे े वृत्रद्ध होती हं । श्रेष्ठ कोई दे व नहीं। गार्िी िे श्रेष्ठ मंि न त्रवश्वासमि जी का कथन हं : हुआ हं , न आगे होगा। गार्िी मंि िे बढ़कर गार्िी मंि जप लेने पत्रवि करने वाला और कोई वाला िमस्त त्रवद्याओं का मंि नहीं हं । उडहं नी वेत्ता, श्रेष्ठ हो जाता हं । जो फद्वज गार्िी मंि की मफहमा मं अथाात ब्राह्मण गार्िी परार्ण नहीं, वह वेदं का पारं गत कहां हं की जो मनुष्र् होते हुए भी शूद्र क िमान है , अडर्ि फकर्ा हुआ उिका े सनर्समत रूप िे तीन वषा श्रम व्र्था हं । जो मनुष्र् गार्िी को नहीं जानता, ऐिा तक गार्िी जाप करता हं , व्र्त्रि ब्राह्मणत्व िे च्र्ुत अथाात बरख़ास्त और पापर्ुि वह सनस्श्चत रुप िे ईश्वर हो जाता हं । को प्राप्त करता हं । जो फद्वज अथाात ब्राह्मण पाराशर जी का कथन हं दोनं िंध्र्ाओं मं गार्िी मंि जपता हं , वह िमस्त जप, िूिं तथा वेद मंिं मं गार्िी मंि परम श्रेष्ठ िमस्त वेद को पढ़ने क िमान फल को प्राप्त करता हं । े हं । वेद और गार्िी की मनुष्र् अडर् कोई अनुष्ठान र्ा िाधना करे र्ा न करे , तुलना मं गार्िी का कवल गार्िी मंि क जप िे वहँ िभी सित्रद्ध प्राप्त कर े े पलिा भारी हं । िकता हं । प्रसतफदन एक हजार जप करने वाला मनुष्र् भत्रिपूवक ा गार्िी का ू िमस्त पापं िे छट जाता हं । त्रवश्वासमि जी का र्हाँ तक जप करने वाला मनुष्र् कहना हं की जो फद्वज अथाात ब्राह्मण गार्िी की उपािना मुि होकर पत्रवि बन नहीं करता, वह सनडदा का पाि हं । जाता हं । वेद, शास्त्र, पुराण, इसतहाि पढ़ लेने र्ोसगराज र्ाज्ञवल्क्र् जी का कथन हं पर भी जो गार्िी िे वेदं का िार उपसनषद हं , उपसनषद का िार हीन है , उिे ब्राह्मण नहीं व्र्ाहृसतर्ं िफहत गार्िी हं । गार्िी वेदं की जननी है , िमझना िाफहर्े। पापं का नाश करने वाली है , इििे असधक पत्रवि करने
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    9 मई 2012 शंख ऋत्रष का कथन हं सनमाल करती है , नरक क िमान िमुद्र मं सगरते हुए को हाथ पकि कर े गार्िी रूपी ब्रह्म गंगा बिाने वाली गार्िी ही हं । उििे उत्तम तत्व स्वगा और िे आत्मा पत्रवि होती पृथ्वी पर कोई नहीं हं । गार्िी का ज्ञाता सनस्िंदेह स्वगा हं । जो गार्िी छोिकर को प्राप्त करता हं । अडर् उपािनार्ं करता है , वह पकवान छोिकर सभक्षा माँगने शौनक ऋत्रष का कथन हं वाले क िमान मूखा े अडर् उपािनार्ं करं िाहे न करं , कवल गार्िी े हं । का्र् िफलता जप िे ही फद्वज (ब्राह्मण) जीवन मुि हो जाता हं । व्र्त्रि तथा तप की वृत्रद्ध के िमस्त िांिाररक और पारलौफकक िुखं को प्राप्त करता सलर्े गार्िी िे श्रेष्ठ और कछ नहीं हं । ु हं । िंकट क िमर् दि हजार जप करने िे त्रवपत्रत्त का े सनवारण होता हं । भारद्वाज ऋत्रष का कथन हं ब्रह्मा आफद दे वता भी गार्िी का अत्रि मुसन का कथन हं जप करते हं , वह ब्रह्म दे वी गार्िी आत्मा का िाक्षात्कार कराने वाली हं । परम शोधन करने वाली हं । अनुसित काम करने वालं के उिक प्रताप िे कफठन दोष े ू दा गुण गार्िी क कारण छट ु े और दा गुणं का पररमाजान ु जाते हं । गार्िी िे रफहत अथाात िर्ाई हो जाती हं । व्र्त्रि शुद्र िे भी अपत्रवि हं । जो मनुष्र् गार्िी तत्त्व को भली प्रकार िे िमझ िरक ऋत्रष का कथन हं लेता है , उिक सलए इि े जो मनुष्र् ब्रह्मिर्ापूवक ा िंिार मं कोई िुख शेष गार्िी की उपािना करता है और नहीं रह जाता हं । आँवले क ताजे फलं का िेवन े नारदजी का कथन हं करता है , वह मनुष्र् दीघाजीवी होता गार्िी भत्रि का ही स्वरूप हं । जहाँ भत्रि रूपी गार्िी है , हं । वहाँ श्रीनारार्ण का सनवाि होने मं कोई िंदेह नहीं करना िाफहर्े । वसशष्ठ जी का कथन हं मडदमसत, कमागागामी और अस्स्थरमसत भी गार्िी क ु े महत्रषा व्र्ाि जी का कथन हं स्जि प्रकार पुष्प का िार शहद, दध का िार घृत प्रभाव िे उच्ि पद को प्राप्त करते हं , फफर िद् गसत होना ू है , उिी प्रकार िमस्त वेदं का िार गार्िी हं । सिद्ध की सनस्श्चत हं । जो पत्रविता और स्स्थरतापूवक गार्िी की ा हुई गार्िी कामधेनु क िमान हं । गंगा शरीर क पापं को े े उपािना करते है , वे आत्म-लाभ प्राप्त करते हं ।
  • 10.
    10 मई 2012 जगद्गरु शंकरािार्ा जी का कथन हं ु महामना मदनमोहन मालवीर् जी का कथन हं गार्िी की मफहमा का वणान ऋत्रषर्ं ने जो अमूल्र् रत्न हमं करना मनुष्र् की िामाथ्र् फदर्े हं , उनमं िे एक क बाहर हं । बुत्रद्ध का े अनुपम रत्न गार्िी हं । होना इतना बिा कार्ा है , गार्िी िे बुत्रद्ध पत्रवि स्जिकी िमता िंिार के होती हं । ईश्वर का प्रकाश और फकिी काम िे नहीं आत्मा मं आता हं । इि हो िकती । आत्म-प्रासप्त प्रकाश मं अिंख्र् करने की फदव्र् दृत्रष्ट आत्माओं को भव-बंधन स्जि बुत्रद्ध िे प्राप्त होती िे िाण समला हं । गार्िी है , उिकी प्रेरणा गार्िी द्वारा मं ईश्वर परार्णता क भाव े होती हं । गार्िी आफद मंि हं । उिका अवतार उत्पडन करने की शत्रि हं । िाथ ही वह दररतं को नष्ट करने और ऋत क असभवधान क सलर्े ु े े भौसतक अभावं को दर करती हं । गार्िी की उपािना ू हुआ हं । ब्राह्मणं क सलर्े तो अत्र्डत आवश्र्क हं । जो ब्राह्मण े गार्िी जप नहीं करता, वह अपने कताव्र् धमा को छोिने महात्मा गाँधी जी का कथन हं का अपराधी होता हं । गार्िी मंि सनरं तर जप रोसगर्ं को अच्छा करने और आत्मा रवीडद्र टै गोर जी का कथन हं की उडनसत क सलर्े उपर्ोगी े भारतवषा को जगाने वाला जो मंि हं । गार्िी का स्स्थर सित्त है , वह इतना िरल है फक एक और शाडत हृदर् िे फकर्ा ही श्वाि मं उिका उच्िारण हुआ जप आपात्तकाल मं फकर्ा जा िकता हं । वह है - िंकटं को दर ू करने का गार्िी मंि । इि पुनीत मंि प्रभाव रखता हं । का अभ्र्ाि करने मं फकिी लोकमाडर् सतलक जी का कथन हं प्रकार के ताफकक ा ऊहापोह, स्जि बहुमुखी दािता क बंधनं मं े फकिी प्रकार के मतभेद अथवा भारतीर् प्रजा जकिी हुई है , फकिी प्रकार क बखेिे की गुंजाइश नहीं हं । े उिक सलर्े आत्मा क अडदर े े प्रकाश उत्पडन होना िाफहर्े, र्ोगी अरत्रवडदजी स्जििे ित ् और अित ् का र्ोगी अरत्रवडदजी ने त्रवसभडन स्थानो पर जगह गार्िी त्रववेक हो, कमागा को छोिकर ु जप करने का सनादेश फकर्ा हं । उडहंने बतार्ा फक गार्िी श्रेष्ठ मागा पर िलने की प्रेरणा मं ऐिी शत्रि िस्डनफहत है , जो महत्त्वपूणा कार्ा कर समले, गार्िी मंि मं र्ही भावना िकती हं । उडहंने कईर्ं को िाधना क तौर पर गार्िी े त्रवद्यमान हं । का जप बतार्ा हं ।
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    11 मई 2012 स्वामी रामकृ ष्ण परमहं ि जी का कथन हं हं । स्जि पर परमात्मा प्रिडन होते हं , उिे िद् बुत्रद्ध प्रदान मं लोगं िे कहता हूँ फक ल्बी करते हं । िद् बुत्रद्ध िे ित ् मागा िाधना करने की उतनी पर प्रगसत होती है और ित ् आवश्र्कता नहीं हं । इि कमा िे िब प्रकार क िुख े छोटी-िी गार्िी की िाधना समलते हं । जो ित ् की ओर करक दे खं । गार्िी का े बढ़ रहा है , उिे फकिी प्रकार जप करने िे बिी-बिी क िुख की कमी नहीं रहती े सित्रद्धर्ाँ समल जाती हं । र्ह । गार्िी िद् बुत्रद्ध का मंि हं । मंि छोटा है , पर इिकी शत्रि इिसलर्े उिे मंिं का मुकटमस्ण ु बिी भारी हं । कहा हं । स्वामी रामतीथा जी का कथन हं स्वामी सशवानंदजी जी का कथन हं राम को प्राप्त करना िबिे बिा ब्राह्ममुहूता मं गार्िी का जप काम हं । गार्िी का असभप्रार् करने िे सित्त शुद्ध होता है बुत्रद्ध को काम-रुसि िे हटाकर और हृदर् मं सनमालता आती राम-रुसि मं लगा दे ना हं । हं । शरीर नीरोग रहता है , स्जिकी बुत्रद्ध पत्रवि होगी, वही स्वभाव मं नम्रता आती है , राम को प्राप्त कर िकगा । े बुत्रद्ध िूक्ष्म होने िे दरदसशाता ू गार्िी पुकारती है फक बुत्रद्ध मं बढ़ती है और स्मरण शत्रि इतनी पत्रविता होनी िाफहर्े फक वह का त्रवकाि होता हं । कफठन राम को काम िे बढ़कर िमझे । प्रिंगं मं गार्िी द्वारा दै वी िहार्ता समलती हं । उिक द्वारा े महत्रषा रमण जी का कथन हं आत्म-दशान हो र्ोग त्रवद्या क अडतगात मंि त्रवद्या े िकता हं । बिी प्रबलत हं । मंिं की शत्रि उपरोि महापुरुषो के कथन िे समलते-जुलते िे अद्भत िफलतार्ं समलती हं ू असभमत प्रार्ः िभी त्रवद्वानो क हं । इििे स्पष्ट है फक े कोई ऋत्रष र्ा त्रवद्वान अडर् त्रवषर्ं मं िाहे अपना मतभेद । गार्िी ऐिा मंि है , स्जििे रखते हं, पर गार्िी क बारे मं उन िब मं िमान श्रद्धा े आध्र्ास्त्मक और भौसतक दोनं थी और वे िभी अपनी उपािना मं उिका प्रथम स्थान प्रकार क लाभ समलते हं । े रखते थे ! कछ त्रवद्वानो का कथन हं की शास्त्रं मं, ग्रंथं ु मं, स्मृसतर्ं मं, पुराणं मं गार्िी की मफहमा तथा िाधना स्वामी त्रववेकानंद जी का कथन हं पर प्रकाश िालने वाले िहस्रं श्लोक भरे पिे हं । इन राजा िे वही वस्तु माँगी जानी िाफहर्े, जो उिक गौरव क े े िबका िंग्रह फकर्ा जाए, तो एक बिा भारी गार्िी पुराण अनुकल हो । परमात्मा िे माँगने र्ोग्र् वस्तु िद् बुत्रद्ध ू बन िकता हं ।
  • 12.
    12 मई 2012 गार्िी मडि क त्रवलक्षण प्रर्ोग े  सिंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी मूल मंि: िंतान की प्रासप्त हे तु ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा गार्िी मंि क आगे ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं बीज मंि लगाकर े भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ जप करने िे िंतान की प्रासप्त होती हं । त्रवसध : मंि: प्रसतफदन प्रातः काल स्नानाफद िे सनवृत्त होकर ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ स्वच्छ वस्त्र धारण कर उि मडि की एक माला जप करं । त्रवद्वानो क मतानुशार गार्िी मडि को 108 बार े भूत-प्रेत इत्र्ाफद उपद्रवं क नाश हे तु े पढ़कर स्वच्छ जल को असभमंत्रित कर क पीने िे िाधक े गार्िी मंि क आगे ॐ ह्रीं क्लीं बीज मंि लगाकर जप े क िमस्त रोग-शोक-भर् दर होते हं । े ू करने िे भूत-प्रेत, तंि बाधा, िोट, मारण, मोहन, गार्िी मडि िे भात (पक हुए िावल) मं घी े उच्िाटन, वशीकरण, स्तंभन, कामण-टू मण, इत्र्ाफद समलाकर 108 बार त्रवसधवत होम करने िे िाधक को उपद्रवं का नाश होता हं । धमा, अथा, काम और मोक्ष की प्रासप्त होती हं । मंि: ॐ ह्रीं क्लीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा लक्ष्मी प्रासप्त हे तु भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ गार्िी मंि क आगे ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं बीज मंि लगाकर जप े करने िे माँ लक्ष्मी प्रिडन होती हं । अिाध्र् रोगं क सनवारण हे तु े मंि: गार्िी मंि क आगे ॐ ह्रीं बीज मंि लगाकर जप करने े ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा िे अिाध्र् रोग एवं परे शानीर्ं िे मुत्रि समलती हं । भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ मंि: ॐ ह्रीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा ज्ञान प्रासप्त हे तु भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ गार्िी मंि क पीछे ॐ ऐं क्लीं औ ं बीज मंि लगाकर े जप करने िे मूख-जि िे जि व्र्त्रि भी त्रवद्वान हो जाता ा धन-िंपत्रत्त की वृत्रद्ध हे तु हं । गार्िी मंि क आगे ॐ आं ह्रीं क्लीं बीज मंि लगाकर े मंि: जप करने िे धन-िंपत्रत्त की वृत्रद्ध एवं रक्षा होती हं । ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । भगो दे वस्र् धीमफह । ुा ा मंि: सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥ ॐ ऐं क्लीं औ ं ॥ ॐ आं ह्रीं क्लीं ॐ भूभवस्वः । तत ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा भगो दे वस्र् धीमफह । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ॥
  • 13.
    13 मई 2012 गार्िी मडि क अडर् अनुभूत प्रर्ोग: े ज्वर सनवारण हे तु र्फद ज्वर िे पीफित व्र्त्रि को उसित इलाज़ एवं दवाईर्ं प्राण भर् सनवारण हे तु िे राहत नहीं समल रही हो, तो आम क पत्तं को गार् क े े र्फद व्र्त्रि क प्राण को फकिी भी कारण वश महान े दध मं दबाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने ू ु िंकट हो, ऐिी अवस्था मं शरीर का कण्ठ तक र्ा जाँघ िे िभी प्रकार क ज्वर शीघ्र दर होने लगते हं और रोगी े ू तक का फहस्िा पानी (पत्रवि नदी, जलाशर् र्ा तालाब) जल्दी स्वस्थ हो जाता हं । मं िू बा रहे इि प्रकार खिे होकर सनत्र् 108 बार गार्िी मडि जपने िे प्राण की रक्षा होती हं , ऐिा त्रवद्वानो का राज रोग सनवारण हे तु कथन हं । र्फद कोई व्र्त्रि राज रोग (अथाात: ऐिा रोग स्जििे ू पीछे छटना अिंभव हो, अिाध्र् रोग)िे पीफित हो, तो ग्रह-बाधा सनवारण हे तु मीठा वि को गार् क दध मं दबाकर गार्िी मडि पढ़कर े ू ु र्फद व्र्त्रि को ग्रह जसनत पीिाओं िे कष्ट हो, तो 108 बार हवन करने िे राज रोग मं राहत होने लगती हं शसनवार क फदन पीपल क वृक्ष क नीिे बैठ कर गार्िी े े े और रोगी जल्दी स्वस्थ हो ने लगता हं । मडि का जप करने िे ग्रहं क बुरे प्रभाव िे रक्षा होती े हं । र्ह पूणतः अनुभत प्रर्ोग हं । ा ू कष्ठ रोग सनवारण हे तु ु मृत्र्ु भर् सनवारण हे तु र्फद कोई व्र्त्रि कष्ठ रोग िे पीफित हो, तो शंख पुष्पी क ु े  र्फद व्र्त्रि की कुंिली मं अल्प मृत्र्ु र्ोग का पुष्पं िे गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने िे सनमााण हो रहा हो, तो गुरुसि क छोटे टु किे करक े े कष्ठ रोग दर होता हं । ु ू गार् क दध मं दबाकर गार्िी मडि पढ़कर प्रसतफदन े ू ु 108 बार हवन करने िे अकाल मृत्र्ु र्ोग का उडमाद रोग सनवारण हे तु सनवारण होता है । इिे मृत्र्ुंजर् हवन भी कहते हं । र्फद घर का कोई िदस्र् उडमाद रोग िे पीफित हो, तो (गुरुसि को अडर् भाषाओं मं गुलवेल, मधुपणी, गूलर की लकिी और फल िे गार्िी मडि पढ़कर 108 नीमसगलो, अमृतवेल, अमृतवस्ल्ल आफद नाम िे भी बार हवन करने िे उडमाद रोग का सनवारण होता हं । जाना जाता हं ) को शमी वृक्ष की लकिी मं गार् का शुद्ध घी, जौ, गार् दध समलाकर 7 फदन तक सनर्समत ू मधुमेह (िार्त्रबटीज) रोग सनवारण हे तु गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन करने िे र्फद व्र्त्रि मधुमेह रोग िे पीफित हो, तो ईख क रि मं े अकाल मृत्र्ु र्ोग दर होता है । ू मधु समलाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने  मधु, गार् का शुद्ध घी, गार् दध समलाकर 7 फदन ू िे मधुमेह रोग मं लाभ होता हं । तक सनर्समत गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन करने िे अकाल मृत्र्ु र्ोग दर होता है । ू  बरगद की िसमधा मं बरगद की हरी टहनी पर गार् बवािीर रोग सनवारण हे तु का शुद्ध घी और गार् क दध िब का समश्रण कर 7 े ू र्फद व्र्त्रि बवािीर रोग िे पीफित हो, तो गार् क दही, े फदन तक सनर्समत गार्िी मडि जपते हुए 108 बार दध व घी तीनो को समलाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 ू हवन करने िे अकाल मृत्र्ु र्ोग दर होता है । ू बार हवन करने िे बवािीर रोग मं लाभ होता हं ।
  • 14.
    14 मई 2012 दमा रोग सनवारण हे तु पीलाने िे अथवा िंबंसधत स्थान पर असभमंत्रित जल का र्फद व्र्त्रि दमा रोग िे पीफित हो, तो अपामागा, गार् सछटकाव करने िे भूताफद दोष दर होता है । ू का शुद्ध घी समलाकर गार्िी मडि पढ़कर 108 बार हवन करने िे दमा रोग मं लाभ होता हं । िवा िुख प्रासप्त हे तु िभी प्रकार िे िुखं की प्रासप्त क सलए, गार्िी मडि े राष्ट्र भर् सनवारण हे तु जपते हुए 108 बार ताजे़ फलं िे हवन करने िे िवा ू र्फद फकिी राजा, नेता प्रजा र्ा दे श पर फकिी प्रकार िे िुखं की प्रासप्त होती हं । शिु पक्ष िे आक्रमण का अंदेशा हो र्ा फकिी प्रकार िे कदरती िंकट (त्रवद्युत्पात, अस्ग्न आफद) का भर् हो, तो ु लक्ष्मी की प्रासप्त हे तु बंत की लकिी क छोटे -छोटे टू किे ़ कर गार्िी मडि े  लाल कमल पुष्प अथवा िमेली क पुष्प और शासल े पढ़कर108 बार हवन करने िे राष्ट्र भर् का सनवारण होता िावल (िुगंसधत िावल र्ा मीठे िावल र्ा लाल हं । अक्षत) िे गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन करने िे लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । असनष्टकारी दोष सनवारण हे तु  बेल क छोटे -छोटे टु किे करक त्रबल्व, पुष्प, फल, घी, े े र्फद फकिी फदशा, शिु त्रवशेष र्ा पंि तत्व िे िंबंसधत खीर को समलाकर हवन िामग्री बनाकर, त्रबल्व की दोष की आशंका हो, तो 21 फदन तक सनत्र् गार्िी मडि लकिी िे गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन का करं , जप की िमासप्त वाले फदन स्जि फदशा मं दोष करने िे लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । र्ा शिु हो उि फदशा मं समट्टी का ढे ला असभमंत्रित करक फक ने िे दोष दर होता हं । े ं ू त्रवजर् प्रासप्त हे तु र्फद फकिी िे त्रबना फकिी कारण िे िरकारी लोगं र्ा शारीररक व्र्ासध सनवारण हे तु प्रिािनीर् िे अनावश्र्क वाद-त्रववाद िल रहा हो, तो र्फद शरीर क फकिी अंग मं व्र्ासध र्ा पीिा हो, तो े मदार की लकिी मं मदार क ताजे पि गार् का शुद्ध घी े आत्म भाव एवं पूणा श्रद्धा िे गार्िी मडि का जप करते समलाकर गार्िी मडि जपते हुए 108 बार हवन करने िे हुऐ कशा पर फक मार कर शरीर क उि अंग र्ा फहस्िी ु ूँ े त्रवजर् की प्रासप्त होती हं । का स्पशा करने िे िभी प्रकार क रोग, त्रवकार, त्रवष, े आफद नष्ट हो जाते हं । .नोटः- त्रवशेष लाभ की प्रासप्त हे तु फकिी भी प्रर्ोग क करने िे पूवा कछ फदन सनस्श्चत िंख्र्ा े ु भूत-प्रत व्र्ासध सनवारण हे तु मं 1, 3, 5, 7, 11, 21 र्था िंभव जप करने िे र्फद व्र्त्रि को भूत-प्रेत आफद बाधा िे पीिा हो र्ा कोई प्रर्ोग मं शीध्र लाभ की प्रासप्त होती हं । जप के स्थान त्रवशेष पर भूत-प्रेत आफद क्षूद्र जीवं का जमाविा िाथ प्रसतफदन दशांश हवन करे अथवा दशांश की हो, तो ताँबं क कलश मं जल भरकर गार्िी मडि का े िंख्र्ा क असधक जप करं । े जप करते हुऐ उिमं फक मार कर जल को असभमंत्रित ूँ करले फफर उि व्र्त्रि पर जल सछटकने िे र्ा उिे ***
  • 15.
    15 मई 2012 त्रवसभडन गार्िी मडि  सिंतन जोशी,  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी ॐ भूभवस्वः । तत ् ित्रवतुवरेण्र्ं । ुा ा Om bhur bhuvah svah गार्िी दे वी मडि Tat savitur vareniyam भगो दे वस्र् धीमफह । Bhargo devasya dheemahee सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् ॥ Dhiyo yo nah prachodayat. ॐ सगररजार्ै त्रवद्महे , Om Girijayai Vidhmahe दगाा गार्िी मडि ु सशव त्रप्रर्ार्ै धीमफह, Shiv Priyayai Dheemahee तडनो दगाा प्रिोदर्ात ्।। Tanno Durgaya Prachodayat. ु ॐ कात्र्ार्डर्ै त्रवद्महे , Om Katyayanayai Vidhmahe कात्र्ार्नी गार्िी मडि कडर्ा कमारर ि धीमफह, ु Kanya Kumari cha Dheemahee तडनो दगाा प्रिोदर्ात ्।। Tanno Durgaya Prachodayat. ु ॐ महालाक्ष्मर्े त्रवद्महे , Om Mahalakshmaye Vidhmahe लक्ष्मी गार्िी मडि त्रवष्णु पत्नी ि धीमफह Vishnu Pathniyai cha Dheemahee तडनो लक्ष्मी:प्रिोदर्ात। Tanno Lakshmi Prachodayat. ॐ महालाक्ष्मर्े त्रवद्महे , Om Mahalakshmaye Vidhmahe लक्ष्मी गार्िी मडि त्रवष्णु त्रप्रर्ार् धीमफह Vishnu Priyay Dheemahee तडनो लक्ष्मी:प्रिोदर्ात। Tanno Lakshmi Prachodayat. ॐ वाग दे व्र्ै त्रवद्महे , Om Vag devyai Vidhmahe िरस्वती गार्िी मडि काम राज्र्ा धीमफह तडनो िरस्वती Kam Rajya Dheemahee :प्रिोदर्ात। Tanno Saraswati Prachodayat. ॐ जनक नंफदडर्े त्रवद्महे , Om Janaka Nandinye Vidhmahe िीता गार्िी मडि भुसमजार् धीमफह Bhumijaya Dheemahee तडनो िीता :प्रिोदर्ात। Tanno Sita Prachodayat . Om Vrishabhanu jayai Vidhmahe ॐ वृष भानु: जार्ै त्रवद्महे , फक्रस्रप्रर्ार् राधा गार्िी मडि Krishna priyaya Dheemahee धीमफह तडनो राधा :प्रिोदर्ात। Tanno Radha Prachodayat. ॐ श्री तुल्स्र्े त्रवद्महे , त्रवश्नुत्रप्रर्ार् Om Tulasyai Vidhmahe तुलिी गार्िी मडि Vishnu priyayay Dheemahee धीमफह तडनो वृंदा: प्रिोदर्ात। Tanno Brindah Prachodayat. ॐ पृथ्वी दे व्र्ै त्रवद्महे , िहस्र मूरतर्ै Om Prithivi devyai Vidhmahe पृथ्वी गार्िी मडि Sahasra murthaye Dheemahee धीमफह तडनो पृथ्वी :प्रिोदर्ात। Tanno Prithvi Prachodayat. ॐ पर्नडिार् त्रवद्महे , महा हं िार् Om Param Hansay Vidmahe हं ि गार्िी मडि maha hanasay dheemahee tanno धीमफह तडनो हं ि: प्रिोदर्ात। hansh prachodyat.
  • 16.
    16 मई 2012 ॐ भगवत्तै त्रवद्महे , महे श्वरर्ै धीमफह Om bhagvattay vidmahe अडनपूणाा गार्िी मडि Maheshwariya dheemahee tanno तडनो अडनपूणाा: प्रिोदर्ात। annapurna prachodyat. ॐ कासलकर्ै त्रवद्महे , Om kalikaye vidmahe smashan महालाकी गार्िी मडि स्मशान वसशनर्ै धीमफह vashiney dheemahee tanno A तडनो अघोर: प्रिोदर्ात। ghora prachodyat. ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे , Om Tat Purushaya Vidhmahe सशव गार्िी मडि महादे वार् धीमफह Mahadevaya Dheemahee तडनो रुद्र प्रिोदर्ात। Tanno Rudra Prachodayat. ॐ नारार्णार् त्रवद्महे , Om Narayanaya Vidhmahe नारार्ण गार्िी मडि वािुदेवार् धीमफह Vasudevaya Dheemahee तडनो त्रवष्णु: प्रिोदर्ात। Tanno Vishnu Prachodayat. ॐ ितुर मुखार् त्रवद्महे , हं िारुढार् Om Chathur mukhaya Vidmahe, ब्रह्मा गार्िी मडि Hanasaroodaya Dheemahee धीमफह॥ तडनो ब्रह्मा प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Brahma Prachodayat. ॐ वेदात्मनार् त्रवद्महे , फहरण्र्गभाार् Om Vedathmanaya vidmahe, ब्रह्मा गार्िी मडि Hiranya Garbhaya Dheemahi, धीमफह॥ तडनो ब्रह्मा प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Brahma Prachodayat ॐ दाशरथर् त्रवद्महे , Om Dasarathaya Vidhmahe राम गार्िी मडि िीता वल्लभार् धी मफह॥ Sita Vallabhaya Dheemahee तडनो रामः प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Rama Prachodayat. ॐ दामोदरार् त्रवद्महे , Om Damodaraya Vidhmahe कृ ष्णा गार्िी मडि रुकमणी वल्लभार् धी मफह॥ Rukmani Vallabhay Dheemahee, तडनो कृ ष्ण प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Krishna Prachodayat. ॐ गोत्रवंदार् त्रवद्महे , Om Govindaya Vidhmahe कृ ष्णा गार्िी मडि गोपी वल्लभार् धी मफह॥ Gopi Vallabhaya Dheemahee तडनो कृ ष्ण प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Krishna Prachodayat ॐ सनरं जनार् त्रवद्महे , OM Nirnajanaya Vidmahe वंकटे श्वर गार्िी मडि सनरापस्र्ा धीमफह॥ Nirapasaya Dheemahee तडनो श्रीसनवाि प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Srinivasa Prachodayat. ॐ नरसिंहार् त्रवद्महे , Om Narasimhaya Vidmahe नरसिंह गार्िी मडि वज्रनक्षार् धीमफह॥ Vajra Nakhaya Dheemahee तडनो नरसिंह प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Narasimha Prachodayat. ॐ वनैस्वरार् त्रवद्महे , Om Vanaisvaraya Vidhmahe हर्ग्रीव गार्िी मडि हर्सग्रवार् धीमफह॥ Hayagrivaya Dheemahee तडनो हर्सग्रव प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Hayagriva Pracodayat. िुदशान गार्िी मडि ॐ िुदशानार् त्रवद्महे , Om Sudharshanaya Vidmahe
  • 17.
    17 मई 2012 महाज्वलार् धीमफह॥ Maha Jwalaya Dheemahee Tanno Chakra Prachodayat. तडनो िक्र प्रिोदर्ात ्॥ ॐ ल्बोदरार् त्रवद्महे , महोदरार् Om Lambodaraya vidmahe गणेश गार्िी मडि Mahodaraya deemahee धीमफह॥ तडनो दं ती प्रिोदर्ात ्॥ Tanno danti Prachodayat. Om Ekadanthaya vidmahe ॐ एकदं तार् त्रवद्महे , वक्रतुंिार् गणेश गार्िी मडि Vakrathundaya dheemahee धीमफह॥ तडनो दं ती प्रिोदर्ात ्॥ Tanno danthi Prachodayat. ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे , वक्रतुण्िार् Om Thatpurashaya vidhmahe गणेश गार्िी मडि Vakrathundaya dheemahee धीमफह, तडनो दस्डत प्रिोदर्ात ्॥ Tanno danti Prachodayat. ॐ िहस्त्र नेिार्ै त्रवद्महे , वज्र हस्तार् Om Sahasra nethraye Vidhmahe, इडद्र गार्िी मडि Vajra hasthaya Dheemahee धीमफह, तडनो इडद्र प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Indra Prachodayat. ॐ अंजनी जार् त्रवद्महे , महाबलार् Om Aanjanee jaya Vidhmahe हनुमान गार्िी मडि Maha balaya Dheemahee धीमफह, तडनो हनुमान प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Hanuman Prachodayat. ॐ अंजनी जार् त्रवद्महे , वार्ुपुिार् Om Aanjanee jaya Vidhmahe हनुमान गार्िी मडि Vayu putraya Dheemahee धीमफह, तडनो हनुमान प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Hanuman Prachodayat . ॐ िूर्ा पुिार् त्रवद्महे , महा कालार् Om Surya puthraya Vidhmahe र्म गार्िी मडि Maha Kalaya Dheemahee धीमफह, तडनो र्म प्रिोदर्ात ्॥ Tanno Yama Prachodayat. ॐ जलत्रब्बार् त्रवद्महे नीलपुरुषार् Om Jala bimbaya Vidhmahe वरुण गार्िी मडि Nila Purushaya Dheemahee धीमफह । तडनो वरुण: प्रिोदर्ात ् ।। Tanno Varuna Prachodayat. ॐ महाज्वलार् त्रवद्महे अस्ग्नदे वार् Om Maha jwalaya Vidhmahe अस्ग्न गार्िी मडि Agni devaya Dheemahee धीमफह । तडनो अस्ग्न: प्रिोदर्ात ् ।। Tanno Agni Prachodayat. ॐ पावकार् त्रवद्महे िप्तस्जह्वार् धीमफह Om Pavakay Vidhmahe वैश्वानर गार्िी मडि Sapta Jihvay Dheemahee । तडनो वैश्वानरः प्रिोदर्ात ् ॥ TannoVaiswanar Prachodayat . ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे िुवणापक्षार् Om Thathpurushaya Vidhmahe, गरुि गार्िी मडि Suvarna Pakshaya Dheemahee धीमफह । तडनो गरुिः प्रिोदर्ात ् ॥ Tanno Garuda Prachodayat ॐ तत्पुरुषार् त्रवद्महे िक्रतुण्िार् Om Thathpurushaya Vidhmahe, नंदी गार्िी मडि Chakratundaya Dheemahee धीमफह । तडनो नस्डदः प्रिोदर्ात ् ॥ Tanno Nandi Prachodayat . ॐ सशरिी वािार् त्रवद्महे िस्च्िदानंदार् Om Shirdi vasaya Vidhmahe सशरिी़ िाई गार्िी मडि Sachithanandaya Dheemahee धीमफह, तडनो िाईं प्रिोदर्ात ्।। Tanno Sai Prachodayat . ॐ कामदे वार् त्रवद्महे पुष्पवनार् Om Kama devaya Vidhmahe मडमथ गार्िी मडि Pushpa vanaya Dheemahee धीमफह । तडनः कामः प्रिोदर्ात ् ॥ Tanno Kama Prachodayat.
  • 18.
    18 मई 2012 नवग्रह की शांसत क सलर्े गार्िी मंि े  सिंतन जोशी त्रवसध : प्रसतफदन प्रातः काल स्नानाफद िे सनवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर उि मडि की एक माला जप करं । त्रवद्वानो क मतानुशार नवग्रह गार्िी मडि को 108 बार पढ़ने िे िाधक क िमस्त रोग-शोक-भर् दर होते हं । े े ू िूर्ा गार्िी मडि ॐ भास्करार् त्रवद्महे फदवाकरार् धीमफह । तडनोः िूर्ः प्रिोदर्ात ् ॥ ा Om Bhaskaraya Vidhmahe Diva karaya Dheemahee Tanno Surya Prachodayat. ॐ अश्वध्वजार् त्रवद्महे पाशस्तार् धीमफह । तडनोः िूर्ः प्रिोदर्ात ् ॥ ा Om Aswadwajaya Vidhmahe Pasa Hasthaya Dheemahee Tanno Surya Prachodayat . िडद्र गार्िी मडि ॐ क्षीरपुिार् त्रवद्महे अमृतत्वार् धीमफह । तडनोः िडद्रः प्रिोदर्ात ् ॥ Om Kshira putraya Vidhmahe Amritathvaya Dheemahee Tanno Chandra Prachodayat. ॐ पद्मध्वजार् त्रवद्महे हे म रूपार् धीमफह । तडनोः िोम प्रिोदर्ात ् ॥ Om Padmadwajaya Vidhmahe Hema roopaya Dheemahee Tanno Chandra Prachodayat . . मंगल गार्िी मडि ॐ वीरध्वजार् त्रवद्महे त्रवघ्नहस्तार् धीमफह । तडनो भौमः प्रिोदर्ात ् ॥ Om veeradhwajaaya vidmahae vighna hastaaya dheemahi tanno bhouma prachodayaat ॐ अंगारकार् त्रवद्महे भूसमपालार् धीमफह । तडनः कजः प्रिोदर्ात ् ॥ ु Om Angaarakaay vidmahae bhoomipaalaay dheemahi tanno kuja prachodayaat
  • 19.
    19 मई 2012 बुध गार्िी मडि ॐ गजध्वजार् त्रवद्महे िुखहस्तार् धीमफह । तडनो बुधः प्रिोदर्ात ् ॥ Om gajadhwajaaya vidmahae sukha hastaaya dheemahi tanno budha: prachodayaat ॐ िडद्रपुिार् त्रवद्महे रोफहणी त्रप्रर्ार् धीमफह । तडनो बुधः प्रिोदर्ात ् ॥ Om Chandraputraaya vidmahae rohini priyaay dheemahi tanno budha: prachodayaat गुरु (बृहस्पसत) गार्िी मडि ॐ वृषभध्वजार् त्रवद्महे क्रसनहस्तार् धीमफह । ु तडनो गुरुः प्रिोदर्ात ् ॥ Om vrishabadhwajaaya vidmahae kruni hastaaya dheemahi tanno guru: prachodayaat ॐ िुरािार्ाार् त्रवद्महे िुरश्रेष्ठार् धीमफह । तडनो गुरुः प्रिोदर्ात ् ॥ Om Suraachaaryaay vidmahae shurashresthaay dheemahi tanno guru: prachodayaat शुक्र गार्िी मडि ॐ अश्वध्वजार् त्रवद्महे धनुहास्तार् धीमफह । तडनोः शुक्रः प्रिोदर्ात ् ॥ Om aswadhwajaaya vidmahae dhanur hastaaya dheemahi tanno shukra prachodayaat ॐ रजदाभार् त्रवद्महे भृगुिुतार् धीमफह । तडनः शुक्रः प्रिोदर्ात ् ॥ Om Rajadaabhaay vidmahae Bhrugusutaay dheemahi tanno shukra prachodayaat You Can Gift GURUTVA JYOTISH E-Magazines Subscription Free to Your Dear or Near Friends >> Clik Here to Free Gift
  • 20.
    20 मई 2012 शसन गार्िी मडि ॐ काकध्वजार् त्रवद्महे खड्गहस्तार् धीमफह । तडनो मडदः प्रिोदर्ात ् ॥ Om kaakadhwajaaya vidmahae khadga hastaaya dheemahi tanno mandah: prachodayaat ॐ शनैश्चरार् त्रवद्महे िूर्पुिार् धीमफह । ा तडनो मडदः प्रिोदर्ात ् ॥ Om shanaishcharay vidmahae suryaputraay dheemahi tanno mandah: prachodayaat राहु गार्िी मडि ॐ नाकध्वजार् त्रवद्महे पद्महस्तार् धीमफह । तडनो राहुः प्रिोदर्ात ् ॥ Om naakadhwajaaya vidmahae padma hastaaya dheemahi tanno raahu: prachodayaat कतु गार्िी मडि े ॐ अश्वध्वजार् त्रवद्महे शूलहस्तार् धीमफह । तडनः कतुः प्रिोदर्ात ् ॥ े Om aswadhwajaaya vidmahae soola hastaaya dheemahi tanno ketu: prachodayaat उपरोि मंिो का ग्रहो क अनुशार जाप करने िे ग्रहो की प्रसतकलता दर होकर अनुकलता प्राप्त होती हं । े ू ू ू भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी िुख-शास्डत-िमृत्रद्ध की प्रासप्त क सलर्े भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी :- स्जस्िे धन प्रसप्त, त्रववाह र्ोग, े व्र्ापार वृत्रद्ध, वशीकरण, कोटा किेरी क कार्ा, भूतप्रेत बाधा, मारण, ि्मोहन, तास्डिक े बाधा, शिु भर्, िोर भर् जेिी अनेक परे शासनर्ो िे रक्षा होसत है और घर मे िुख िमृत्रद्ध फक प्रासप्त होसत है , भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी मे लघु श्री र्ल, हस्तजोिी (हाथा जोिी), सिर्ार सिडगी, त्रबस्ल्ल नाल, शंख, काली-िर्द-लाल गुंजा, इडद्र जाल, मार् जाल, पाताल तुमिी े जेिी अनेक दलभ िामग्री होती है । ु ा मूल्र्:- Rs. 910 िे Rs. 8200 तक उप्लब्द्ध . गुरुत्व कार्ाालर् िंपक : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785 ा c
  • 21.
    21 मई 2012 दे वी गार्िी का िरल पूजन  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, त्रवजर् ठाकुर अत्र्ंत िरल और असधक प्रभावी दै सनक गार्िी िाधक को अपने अनुष्ठा को िंपडन करने हे तु एक उपािना भि क सलए आिानी की जा िकती हं । े उपर्ुि जगह का िर्न करना िाफहए, जहाँ वहँ फकिी मानसिक रूप िे माँ गार्िी क भि फकिी भी पररस्स्थसत े त्रवघ्न-बाधा र्ा त्रवलंब क एक सनधााररत िमर् पर े मं फकिी भी िमर् पर आराधना कर िकते हं । उपािना कर िकता हं। आम तौर पर एक अलग कमरे गार्िी उपािना जीवन क हर स्स्थसत मं भि क े े र्ा घर मं एक कमरे क एक शांत कोने मं इि प्रर्ोजन े सलए सनस्श्चत रूप िे फार्दे मंद होती हं । लेफकन र्हाँ िबिे क सलए उपर्ुि है . र्ा, भि दै सनक िाधना हे तु ऐिे े महत्वपूणा हं , पूणा श्रद्धा एवं भत्रि भाव िे, आध्र्ास्त्मकता स्थान का िर्न कर िकते हं , स्जि स्थान पर असधक िे सनर्समत रूप िे दे वी आराधना करने िे असधक शांसत, एकांत और पत्रविता हो, जैिे फकिी मंफदर, नदी के लाभप्रद होती हं । फकनारे , खुले मैदान का िर्न भी िंभवत कर भि फकिी भी आध्र्ास्त्मक िकते हं . भिको अपने पूजा क स्थान े िाधना र्ा कार्ा करते हं , र्फद वहँ को अवश्र् िाफ रखा जाना िाफहए। पूणा एकाग्रता और सनर्समत िाकार उपािना को करने िमर् िे िंपाफदत फकर्ा जार्े हे तु भि को गार्िी माता की तो वहँ असधक प्रभावशाली होता तस्वीर र्ा मूसता को एक छोटी हं । िी लकिी की िौकी पर दे वी गार्िी की दै सनक स्थात्रपत करना िाफहए और पूजा क िाथ जुिे अनुष्ठान को े सनर्समत रुप िे प्रसतफदन धूप, करने क सलए वांसछत भि की े दीप (शुद्ध घी का), फल आफद ू आध्र्ास्त्मक, मानसिक और िे पूजन करना िाफहए। सनराकार भावनात्मक स्स्थती मं उपािना क फकिी भी तस्वीर र्ा े आश्चर्ाजनक रुप िे त्रवशेष बदलाव मूसता नहीं की आवश्र्कता हं , र्हाँ दे खने को समलते हं । र्हँ अत्र्ंत िरल मूसता क रुप मं, उगते िूरज र्ा कछ े ु त्रवसध हं जो हर एक क सलऐ उपर्ोगी हो िकती े िूक्ष्म अवधारणा पर ध्र्ान कस्डद्रत कर िाधना े हं । इि पूजा त्रवधान र्ा अनुष्ठान को मानव स्वर्ं की की जाती हं । िच्िी आध्र्ास्त्मकता की गहराई को िमझ िक इि े प्रातःकाल सनर्समत उपािना सलए िबिे अच्छा उद्दे श्र् िे फदगई हं । िमर् हं । दै सनक अनुष्ठान को प्रसतफदन स्नानादी िे सनवृत्त दै सनक अनुष्ठान िे जुिे महत्वपूणा और लाभप्रद पद्धसत र्ा स्वच्छ हो ही शुरु करनी िाफहए। बीमारी र्ा मौिम दशाार्ी गर्ी हं । की खराबी जैिे मामलं मं शरीर की िफाई क सलए हाथ े िाधक अपनी आवश्र्कता के अनुिार िाकार और पैर धोकर र्ा सगले कपिे ़ िे शरीर की पौछाई कर िाधना सनराकर दोनो रुप मं गार्िी की पूजा पत्रद्धती का िर्न िंपडन फक जा िकती हं । अपनी इच्छा पूसता क सलर्े कर िकते हं । े
  • 22.
    22 मई 2012 पंिकमा क रूप मं नीिे वस्णात िंध्र्ा जप और े मंि: ध्र्ान त्रवसध िे पहले अंतरमन िे दै सनक उपािना करनी ॐ अपत्रविः पत्रविो वा, िवाावस्थांगतोऽत्रप वा। िाफहए। र्ािा और इिी तरह अपररहार्ा पररस्स्थसतर्ं मं र्ः स्मरे त्पुण्िरीकाक्षं ि बाह्याभ्र्डतरः शुसिः॥ त्रवशेष अविर आफद पर अनुष्ठान को रोका जा िकता हं ॐ पुनातु पुण्िरीकाक्षः पुनातु पुण्िरीकाक्षः पुनातु। एिी स्स्थती मं दै सनक उपािना जप और ध्र्ान क द्वारा े भी िंपडन फकर्ा जा िकता हं । मंि उच्िारण क िमर् ऐिा भाव रखं की इि े दै सनक उपािना क िाथ पंि कमा िंध्र्ा: े मंि क उच्िारण िे असभमस्डित जल आपक शरीर की े े एक श्वेत ऊनी आिन र्ा कश क आिन पर ु े बाह्य और आंतररक शुत्रद्ध कर रहा हं । आरामदार्क मुद्रा मं बैठ कर। (अथाात आरामदार्क आिमन: स्स्थसत मं बैठ, अपने पाि ताँबं का कलश र्ा सगलाि मं वाणी, मन व अंतःकरण की शुत्रद्ध क सलए ि्मि े पानी भरकर रखलं। दे वी क दाफहनी और एक शुद्ध घी का े िे तीन बार जल का आिमन करं । हर मंि क उच्िारण े दीपक और अगरबत्ती जलाऐ। मंि जप क सलए तुलिी की े की िमासप्त क िाथ एक आिमन फकर्ा जाना िाफहए। े माला, फक्रस्टल र्ा िंदन, मोती की माला का प्रर्ोग करं । मंि: उपािना प्रफक्रर्ा क िार भाग े ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा । ॐ अमृतात्रपधानमसि स्वाहा । (1) पंि कमा की शुत्रद्ध; ॐ ित्र्ं र्शः श्रीमासर् श्रीः श्रर्तां स्वाहा । (2) दे व आह्वान (3) जप और ध्र्ान सशखा स्पशा एवं वंदन: सशखा क स्थान को स्पशा करते हुए ऐिी भावना े (4) िूर्ााघ्र्ादान रखं फक गार्िी क इि प्रतीक क माध्र्म िे िदा िद् े े जप और ध्र्ान को छोिकर प्रत्र्ेक पूजा त्रवसध को त्रविार ही र्हाँ स्थात्रपत रहं गे। सन्न मंि का उच्िारण 2 िे 5 समनट मं िंपडन फकर्ा जा िकता हं । जप और करं । ध्र्ान को कम िे कम 15 समनट क सलए फकर्ा जाना े िाफहए, िाधक अपनी िुत्रवधा क अनुिार मंि जप और े मंि: ध्र्ान की लंबी अवसध भी िुन िकते हं । ॐ सिद्रत्रपस्ण महामार्े, फदव्र्तेजः िमस्डवते । ू सतष्ठ दे त्रव सशखामध्र्े, तेजोवृत्रद्धं करुष्व मे॥ ु पंिकमा िंध्र्ा: सन्नसलस्खत पांि पूजा पद्धसत शरीर और मन को प्राणार्ाम: पत्रवि बनाने क सलए और प्राण क प्रवाह क िामंजस्र् े े े श्वाि को धीमी गसत िे सभतर खींिकर रोकना व िफक्रर्ण क सलए होती हं । े बाहर सनकालना र्हँ प्राणार्ाम का एक फहस्िा हं । श्वाि सभतर खींिने क िाथ भावना करं फक प्राण शत्रि, श्रेष्ठता े पत्रविीकरण: श्वाि क द्वारा अंदर खींिी आ रही है , छोिते िमर् र्ह े बाएँ हाथ मं जल लेकर उिे दाफहने हाथ िे ढँ क भावना करं फक आपक िभी दगुण, दष्प्रवृत्रत्तर्ाँ, बुरे े ु ा ु लं और पत्रविीकरण मंिोच्िारण क बाद जल को सिर े त्रविार प्रश्वाि क माध्र्म िे उिक िाथ ही बाहर सनकल े े तथा शरीर पर सछिक लं। रहे हं । प्राणार्ाम इि मंि क उच्िारण क िाथ करं । े े
  • 23.
    23 मई 2012 मंि: बढे ़ हं । हमारे जीवन का उनकी िहार्ता र्ा आश्रर् के ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, त्रबना कोई अस्स्तत्व हं । र्ह हमारी मातृभूसम हमारे सलर्े ॐ जनः ॐ तपः ॐ ित्र्म ् । दे वता की तरह हं । ॐ तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह ा इि सलए पृथ्वी, मातृभूसम की उपािना इष्ट र्ा दे व सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् । उपािना िे पहले की जाती हं । पृथ्वी का आभार प्रकट ॐ आपोज्र्ोतीरिोऽमृत, ब्रह्म भूभवः स्वः ॐ । ं ुा करने क रूप मं की जाती हं । े सन्नसलस्खत मंि का जप करक एक ि्मि पानी को े डर्ाि: पृथ्वी को अपाण करं और फल आफद िे त्रवसध-वत पूजन ू करं । डर्ाि का मुख्र् प्रर्ोजन हं , की वहँ शरीर के पूजन हमं िहनशीलता, उदारता, और पृथ्वी की िभी महत्त्वपूणा अंगं मं पत्रविता का िमावेश हो तथा तरह धैर्ा क िाथ िंपडन करना िाफहए। अपने दोनं हाथ े अंतःकरण की िेतना जाग्रत हो जार्े ताफक दे व-पूजन को नमस्कार मुद्रा मं करक सन्नसलस्खत मंि जपे े जैिा श्रेष्ठ कृ त्र् फकर्ा जा िक। बाएँ हाथ की हथेली मं े जल लेकर दाफहने हाथ की पाँिं उँ गसलर्ं को उनमं सभगोकर बताए गए स्थान को मंिोच्िार क िाथ स्पशा े मंि: करं । ॐ पृथ्वी त्वर्ा धृता लोका दे वी त्वं त्रवष्णुना धृता। त्वं ि धारर् मां दे त्रव पत्रविं करु िािनम ्॥ ु मंि: ॐ वाङ् मे आस्र्ेऽस्तु । (मुख को स्पशा करं ) गार्िी का आह्वान: ॐ निोमे प्राणोऽस्तु। (नासिकाक दोनं सछद्रं को स्पशा करं ) े आफद शत्रि गार्िी खाआ आह्वान तो आंतररक ॐ अक्ष्णोमे िक्षुरस्तु । (दोनं नेिं को स्पशा करं ) (अंतरमन की गहराई िे) िे फकर्ा जाता हं । गार्िी की ॐ कणार्ोमे श्रोिमस्तु । (दोनं कानं को स्पशा करं ) फदव्र् शत्रि हमारे भीतर हमारी अंतरिेतना मं जाग्रत हो ॐ बाह्वोमे बलमस्तु । (दोनं भुजाओं को स्पशा करं ) िक इि सलए सन्न मंि क माध्र्म िे प्राथाना हं । े े ॐ ऊवोमे ओजोऽस्तु । (दोनं जंघाओं को स्पशा करं ) ॐ अररष्टासन मेऽङ्गासन, तनूस्तडवा मे िह िडतु । ॐ आर्ातु वरदे दे त्रव त्र्र्क्षरे ब्रह्मवाफदसन। (िमस्त शरीर का स्पशा करं ) गार्त्रिच्छडदिां मातः। ब्रह्मर्ोने नमोऽस्तु ते॥ आत्मशोधन की ब्रह्म िंध्र्ा क उपरोि पाँिं े ॐ श्री गार्त्र्र्ै नमः। आवाहर्ासम, स्थापर्ासम, फक्रर्ाओं का भाव र्ह है फक िाधक मं पत्रविता एवं ध्र्ार्ासम, ततो नमस्कारं करोसम। प्रखरता की वृत्रद्ध हो तथा मसलनता-अवांछनीर् गुणो की सनवृत्रत्त हो । पत्रवि-प्रखर व्र्त्रि ही भगवान की कृ पा गुरु पूजन: प्रासप्त क असधकारी होते हं । े गुरु परमात्मा की फदव्र् िेतना का अंश होते है , जो िाधक को जीवन क त्रवसभडन क्षेि मं मागादशान करते े दे वपूजन: हं । िद् गुरु क रूप मं अपने गुरुदे व का असभवंदन करते े दे व पूजन का पहला कदम पृथ्वी पूजन हं । हम हुए उपािना की िफलता हे तु गुरु आवाहन इि पृथ्वी माता की गोद मं पैदा हुए और उिी क ऊपर पलं- े मंिोच्िारण क िाथ करं । े
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    24 मई 2012 ॐ गुरुब्राह्मा गुरुत्रवाष्णुः, गुरुरे व महे श्वरः। इि प्रकार मंि का उच्िारण करते हुए माला की गुरुरे व परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ जार् एवं भावना की जार् फक मंि जप िे हम सनरडतर अखण्िमंिलाकारं , व्र्ाप्तं र्ेन िरािरम ्। पत्रवि हो रहे हं । दबुत्रद्ध की जगह िद्बत्रद्ध का िंिार हो ु ा ु तत्पदं दसशातं र्ेन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ रहा हं । ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहर्ासम, स्थापर्ासम, ध्र्ार्ासम। मन को ध्र्ान मं कस्डद्रत करना होता हं । िाकार े ध्र्ान मं गार्िी माता क फदव्र् रुप की कल्पना कर क े े जप और ध्र्ान: उनकी छार्ा मं बैठ कर उनका स्नेह भरा प्र्ार अनवरत जप का िामाडर् अथा हं फकिी मडि र्ा शब्दं को रूप िे प्राप्त होने की भावना करनी िाफहए। सनराकार िक्रीर् गसत िे ितत मनन करना र्ा सिंतन करना होता ध्र्ान मं गार्िी की ित्रवता की प्रभातकालीन स्वस्णाम हं । सनस्श्चत मडिं का लर् बद्ध रुप िे उच्िारण करना फकरणं को शरीर पर बरिने व शरीर मं श्रद्धा-प्रज्ञा-सनष्ठा जप कहा जाता हं । जप क कई प्रकार प्रािीन शास्त्रं मं े रूपी अनुदान उतरने की भावना करनी िाफहए। जप और वस्णात हं । ध्र्ान क िमडवर् िे ही सित्त एकाग्र होता है और े लेफकन दै सनक उपािना पद्धसत मं उपांशु जप आत्मित्ता पर उि फक्रर्ा का महत्त्वपूणा प्रभाव भी पिता असधक उपर्ुि हं । क्र्ोफक उपांशु जप मं जप करते िमर् है । मडि को स्वर्ं िाधक क असतररि अडर् फकिी क कानं े े तक िुनाई नहीं दे ते इि सलए जप उपांशु दै सनक उपािना िूर्ााघ्र्ादान: सलए िबिे उपर्ुि हं । त्रविजान जप िमासप्त क पश्चात पूजा वेदी पर रखे ताँबं क े े उपांशु जप दिरं को परे शान करने िे बिाता है ू कलश का जल िूर्ा की फदशा मं अध्र्ा क रूप मं सन्न े और र्ह िाधक की मानसिक एकाग्रताको बढा़ता हं । मंि क उच्िारण क िाथ िढ़ाना िाफहए। े े दै सनक उपािना दौरान कम िे कम तीन माला (324 बार) गार्िी मंि क जप करना िाफहए। े ॐ िूर्देव! िहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते । ा र्फद िंभव हो तो जप की िंख्र्ा को बढ़ा िकते अनुक्पर् मां भक्त्र्ा गृहाणाघ्र्ं फदवाकर॥ है , आमतौर पर अनुभवी िाधक ग्र्ारह माला तक जप ॐ िूर्ाार् नमः। आफदत्र्ार् नमः। भास्करार् नमः॥ करते हं । जप की िंख्र्ा और िमर् मं सनर्समतता (सनस्श्चत िंख्र्ा और गसत) हर फदन िमान रखना जल िढा़ते िमर् र्हँ भावना करं फक जल आत्म िाफहए। ित्ता का प्रतीक है एवं िूर्ा त्रवराट् ब्रह्म का तथा हमारी जप एक प्रकार िे िफाई और तेज़ करने की एक ित्ता ि्पदा िमत्रष्ट क सलए िमत्रपात र्ा त्रविस्जात हो े प्रफक्रर्ा हं । मंि क जप क द्वारा िक्रीर् दबाव और े े रही हं । िंघषाण िे प्रेररत हो कर मन की िफाई और आंतररक उि त्रवसध-त्रवधान िंपडन होने क पश्चर्ात पूजा े प्ररणा तेज हो जाती हं । स्थल पर दे वताओं को करबद्ध नतमस्तक होकर नमस्कार करक िभी वस्तुओं को एकि करक र्थास्थान रख दे नी े े ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह ुा ा िाफहए। िाधक िूर्ोदर् िे दो घण्टे पूवा िे िूर्ाास्त के सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् । एक घंटे बाद तक कभी भी गार्िी उपािना कर िकते हं ।
  • 25.
    25 मई 2012 गार्िी स्तोि व माहात््र्  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी ॐ भूभुवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ात ् । ा ा भावाथा: प्राणस्वरूप, दःखनाशक, िुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, दे वस्वरूप अशा परमात््र्ाला आ्ही अंतःकरणात ु धारण करतो. त्र्ा परमात््र्ा किू न आमिी बुद्धी िडमागी लागो ॐ गार्िीदे व्र्ै नमः॥ ॐ नमो श्रीगजवदना॥ गणरार्ा गौरीनंदना । त्रवडघेशा भवभर्हरणा । नमन माझे िाष्टांगीं ॥१॥ नंतर नसमली श्रीिरस्वती । जगडमाता भगवती । ब्रह्माकमारी वीणावती । त्रवद्यादािी त्रवश्र्वािी ॥२॥ ु नमन तैिं गुरुवर्ाा । िुखसनधान िद्गुरुरार्ा । स्मरुनी त्र्ा पत्रवि पार्ां । सित्तशुत्रद्ध जाहली ॥३॥ थोर ऋत्रषमुनी िंतजन । बुधगण आस्ण िज्जन । करुनी तर्ांिी नमन । ग्रंथरिना आरं सभली ॥४॥ एकदां घिली ऐिी घटना । नारद भेटले िनकमुनींना । वंदन भावं करुसन तर्ांना । ्हणाले त्रवनंती माझी ऎकावी ॥५॥ जपािाठीं अिती मंि हजार । त्र्ांत अत्र्ंत प्रभावी थोर । ज्र्ािं िामथ्र्ा अपरं पार । ऐिा मंि कोणता ॥६॥ तेव्हा ्हणाले िनकमुनी । नारदा तुझा प्रश्र्न ऎकोनी। िमाधान झालं माझ्र्ा मनीं । लोकोपर्ोगी प्रश्र्न हा ॥७॥ आतां ऎक लक्ष दे ऊन । त्वररत फलदार्ी मंिज्ञान । िफल होतील हे तु पूणा । ऐिा एकि मंि गार्िी ॥८॥ गार्िी ही मंिदे वता । िवाश्रष्ठा सतिी र्ोग्र्ता । सतंिे एकक अक्षर जपतां । आत्मतेज प्रगटतं ॥९॥ े े गार्िीमंिािं प्रत्र्ेक अक्षर । प्रभाव पािी िवा गािांवार । दे हाच्र्ा एकका अवर्वावर । प्रत्र्क्ष पररणाम घितिे ॥१०॥ े गार्िीिी नांवं अनेक अिती । त्र्ांत अिते फदव्र् शत्रि । एकका नामोच्िारानं ती । शरररीं प्रगट होतिे ॥११॥ े करीत अितां नामोच्िार । मनीं आणावा सतिा आकार । भत्रिपुवक करुनी नमस्कार । नामजप करावा तो ॥१२॥ ा ॐ काररुपा ब्रह्मात्रवद्या ब्रह्मादे वता । ित्रविी िरस्वती वेदमाता । अमृतेश्र्वरी रुद्राणी त्रवक्रमदे वता । ॐ गार्िीं नमो नमः ॥१३॥ वैष्णवी वेदगभाा त्रवद्यादासर्का । शारदा त्रवश्र्वभोक्िी िंध्र्ास्त्मका । िुर्ाा , िंद्रा, ब्रह्माशीषाका । ॐ गार्िीं नमो नमः ॥१४॥ नारसिंही अघनासशनी इं द्राणी । अंत्रबका पद्माक्षी रुद्ररुत्रपणी । िांख्र्ार्नी िुरत्रप्रर्ा ब्रह्माणी । ॐ गार्िीं नमो नमः ॥१५॥ गार्िी तूं ब्रह्मांिघाररणी । गार्िी तूं ब्रह्मावाफदनी । गार्िी तूं त्रवश्र्वव्र्ात्रपनी । ॐ गार्िीं नमो नमः ॥१६॥ ॐ भू: ऋग्वेदपुरुषं । ॐ भुव: र्जुवदपुरुषं । ॐ स्व: िामवेदपुरुषं । ॐ मह: अथवाणवेदपुरुषं तपर्ाासम ॥१७॥ े ॐ जन: इसतहािपुराणपुरुषं । ॐ तप: िवांगपुरुषं । ॐ ित्र्ं ित्र्लोकपुरुषं । त्वं ब्रह्माशापाफद्वमुिा भव ॥१८॥ ॐ भू: भुलोकपुरुषं । ॐ भुव: भुवलोकपुरुषं । ॐ स्व: स्वलोकपुरुषं । त्वं वसिष्ठशापाफद्वमुिा भव ॥१९॥ ॐ भू एकपदा गार्िीं । ॐ भुव: फद्वपदां गार्िीं । ॐ स्व: त्रिपदां गासर्िीं । ॐ भूभुवा स्व: ितुष्पदां गासर्िीं ॥२०॥ ॐ उषिीं तपार्ासम । ॐ गार्िीं तपार्ासम । ॐ िात्रविीं तपार्ासम । तपार्ासम ॐ िरस्वतीं ॥२१॥ ॐ वेदमातरं तपार्ासम । ॐ पृथ्वीं तपार्ासम । ॐ अजां तपार्ासमअ । तपार्ासम ॐ कौसशकीं ॥२२॥
  • 26.
    26 मई 2012 ॐ िांकृसतं तपार्ासम । ॐ िवास्जनां तपार्ासम । ॐ गार्िीिर् तपार्ासम । त्व त्रवश्र्वासमिशापाफद्वमुिा भव ॥२३॥ गार्िीदे वी प्रात:काळीं । ऋग्वेदरुपा बासलका झाली ब्रह्मादे वािी शत्रि एकवटली । अपूवा तेजं प्रकाशे ॥२४॥ हातीं कलश अक्षमाला । स्त्रकस्त्रुवा धारण कला । मुखतेज लाजवी रत्रवंिद्राला । हं िारुढ अिते ती ॥२५॥ ू े कठी रडतालंकार झगमगती । मास्णत्रबंबांिी शोभा अपूवा ती । जी दे तिे धनिंपत्ती । ध्र्ान सतिं करावं ॥२६॥ ं िात्रविी नांव मध्र्ाडहकाळीं । तीि रुद्राणी शत्रि बनली । त्रिनेिा नवर्ौवना फदिली । व्र्ाघ्रांबर धाररणी ॥२७॥ हातीं खट्वांग, त्रिशुळ,रुद्राक्षमाला । अभर् मुद्रा मुगुटी िंद्रा शोभला । वृषभवाहन गौरवणा भला । र्जुवदस्वरुपा जी े ॥२८॥ आर्ुष्र् आस्ण ऎश्र्वर्ावद्धी । दे तिे िकल महासिद्धी । वाढवी िद्भावना िद्बुद्धी । िाह्य करी ती िवांिी ॥२९॥ ृ िार्ंकाळी तीि त्रवष्णुशत्रि । पीतांबरधारी भगवती िरस्वती । श्र्ामलवणं गरुिारुढ ती । रत्नहार कठीं शोभती ॥३०॥ ं बाजुबंद, रत्नखसित नुपुर । िुवणाककणं िौभाग्र्लंकार । शंख , िक्र, गदा पद्ममर् कर । श्रीवृद्धीकारक ती िवादा ॥३१॥ ं ब्राह्मामुहूतं उठावं । बाह्माभ्र्ंतर शुसिभुत व्हावं । श्रीगार्िीिं ध्र्ान करावं । स्वस्थ एकाग्र सिंत्तानं ॥३२॥ ा प्रथम करावा करडर्ाि । नंतर करावा अंगडर्ाि । मग पुणा प्राणार्ामाि । प्रारं भ नीट करावा ॥३३॥ पूरकीं करणं त्रवष्णुस्मरण । कभकीं करावं ब्रह्मास्मरण । रे िकीं करावं सशवध्र्ान । प्राणार्न र्ा नांव अिे ॥३४॥ ुं गार्िी जप करावा हजारदां । फकवा करावा शंभरदां । कमीतकमी तरी दहादां । महामंिजप करावा ॥३५॥ ं गार्िीमंिािा जे जप कररती । तर्ा िारी पुरुषाथा िाध्र् होती । िवंश्र्वर्ा कीती िंपत्ती । आस्ण सित्रद्ध लाभती ॥३६॥ ज्र्ोसतमार् फदव्र् रूत्रपणी । मंदमतीिी कररते महाज्ञानी । बल,र्श,आर्ुरारोग्र् दे ऊनी । पराक्रम जगीं गाजवी ॥३७॥ गार्िी मंिातील महाशिी । व्र्ि होते अव्र्िीं । अपूवा लाभते मन:शांसत । पुणा िमाधानी होतेिे ॥३८॥ ्हणुन हं दे वषं नारदा । गार्िी उपािना करावी िदा । समळे ल आत्मज्ञानिंपदा । ित्र् ित्र् वािा ही ॥३९॥ गार्िीहृदर् गार्िीतपाण । गार्िीकवि गार्िीध्र्ान । िवा पूजात्रवधी त्रविजान । नारदािी उपदे सशलं ॥४०॥ मग नारद िंतुष्ट होऊन । िनकमुनींना करुनी वंदन । आपुल्र्ा कार्ाािी गेले सनघून । जर्जर्कार करीत गार्िीिा ॥४१॥ राजकारणी, िमाजकारणी । िाफहस्त्र्कांनी त्रवद्याथ्र्ांनी । िवा स्थरातील गृहस्थानीं । गार्िीमंि जपावा ॥४२॥ स्तोि-माहात््र् गार्िीिं । रुप पालटील आर्ुष्र्ािं । महत्व पटे ल माझ्र्ा शब्दांिे । अनुभवानंि िवांना ॥४३॥ गार्िीिी र्थाथा स्तुसत । तशीि सतिी अपूवा महती । ऎका आतां र्ापुढतीं । त्रवनती समसलंदमाधव ॥४४॥ गार्िी अिे परम पुसनता । तींता वितीए शास्त्रं , श्रुसत, गीता । ित्वगुणी, सितरुपा,शाश्र्वता । िनातन, सनत्र्, ित्िुधा ॥४५॥ मंगलकरक जगज्जननी । िुखघाम, स्वघा, गार्िीभवानी । िात्रविी,स्वाहा,अपूवकरणी । मंि िौवीि अक्षरी ॥४६॥ ा ह्रीं , श्रीं, क्लीं, मेघा उदं ि । जीवनज्र्ोती महाप्रिंि । शांसत, क्रांसत , जागृसत, अखंि । प्रगसत, कल्पनाशत्रि ती ॥४७॥ हं िारुढ फदव्र् वस्त्रघारी । िूवणाकांती गगनात्रवहारी । कमल,कमंिलु,माला करीं । गौर तनु शोभते ॥४८॥ स्मरणं मन प्रिडन होतं । द:ख िरतं िुख उपजतं । कल्पतरुिम इस्च्छत दे ते । सनराकार सनगुणा ॥४९॥ ु ा गार्िी तुझी अद्भुत मार्ा । िुरतरुिम शीतल छार्ा । भिांिे िंकट हरार्ा । िदा सिद्ध अििी तूं ॥५०॥ तूं काली लक्ष्मी िरस्वती । वेदमाता ब्रह्माणी पावाती । तुजिम अडर् निे त्रिजगतीं । कल्र्ाणकारी दे वता ॥५१॥ जर्जर् त्रिपदा भवभर्हारी । ब्रह्मा त्रवष्णु सशव तुझे पुजारी । अपार शत्रििी तुं त्रिरुपधारी । तेजोमर् माता तूं ॥५२॥ ब्रह्मांिा , िंद्रिुर्ांना । नक्षिािीं , िकल ग्रहांना । तुि दे िी गसत प्रेरणा । उप्तादक ,पालक , नाशक तूं ॥५३॥
  • 27.
    27 मई 2012 होते तव कृ पा जर्ांवरी । तो जरी अिला पापी भारी । तर्ाच्र्ा पापाराशी दरी । कररिी तूं क्षणांत ॥५४॥ ु सनबुद्ध होई बुत्रद्धवंत । शत्रिहीन होई बलवंत । रोगी होतो व्र्ाधीमुि । दररद्र द:ख न राही ॥५५॥ ा ु जप कररतां गार्िीिा । लेश न राही गृहक्लेशािा । सित्तातील सिंताग्नीिा । र्हाि होई झिकरी ॥५६॥ ु अपत्र्हीनािी अपत्र्प्रात्पी । िुखच्छिी त्रवपुल िंपत्ती । िघवा अखंि िौभाग्र्वती । होती गार्िीकृ पेनं ॥५७॥ ित्र् व्रतस्थ पसतरफहता । सतजला लाभे त्रवरिता । जडमािी होते िाथाकता । मोक्षलाभ होतिे ॥५८॥ ू ु त्रववाहे च्छ कमाररकानीं । त्रपठाच्र्ा पांि पणत्र्ा पेटवुनी । बिावं पूवकिे पुढा करुनी । िौवीि फदवि प्रभातीं ॥५९॥ े मनकामना पूणा होऊनी । मना. िारखं र्ेईल घिु नी । गार्िीवरी श्रद्धा ठे वुनी । रोज ही पोथी वािावी ॥६०॥ गार्िीस्तोि हं गोि । माहात््र्ही अतीव गाढ । वाितां ऎकतां प्रिंि । प्रभाव फदिुनी र्ेतिे ॥६१॥ िौवीि वेळीं करावं वािन श्रवण । िौवीि वेळां करावं मंिपठण । िौवीि जडमींिं होतं पापक्षालन । महत्व ऐ र्ा पोथीिं ॥६२॥ िौवीि वेळां कररतां पारार्ण । गार्िीदे वी होईल िुप्रिडन । बोलवुनी िुवासिनी तीन । एक एक पोथी द्यावी ही ॥६३॥ प्रत्र्ेक िौवीि फदविांनी । अशाि पुजाव्र्ा तीन िुवासिनी । प्रत्र्ेकीि एक एक पोथी दे ऊनी । नमस्कार करावा ॥६४॥ दे व आहे तिं दै वही अितं । पूवजडमींिं त्र्ांत रहस्र् अितं । हं न जाणतां मोठे जाणते । सनरा शेनं दे वभिी िोफिती ा ॥६५॥ काळ तेर्ां थोिा कठीण । दे व न र्ेई लगेि घावून । ्हणुनी दे वािी दोष दे ऊन । श्रद्धा िोिू ं नर्े कधीं ॥६६॥ गार्िीिी अट्टश्र् शिी । प्रारब्धािी असनष्ट गती । फफरवी तिाळ ित्र् ती । त्रवश्र्वाि ऎिा धरावा ॥६७॥ र्ोग्र् काळ आल्र्ावीण । कोणतंि कार्ा न घिे जाण । ्हणुनी हातपार् गाळु न । स्वस्थ कधीम न बैिावं ॥६८॥ स्तोि-माहात््र् हं वािावं । िाधुिंतांिं विन ध्र्ानीं घ्र्ावं । स्वत:ि स्वत:ला पारखावं । शुद्ध ज्ञानप्रकाशीं ॥६९॥ आत्माज्ञान नव्हे पोरखेळ । स्वत:ला पारखावं । र्ावी लागते र्ोग्र् वेळ । उगीि होऊनी उतावीळ । दे वािी नि सनंदावं ॥७०॥ मी तर एक मानव िामाडर् । गुरुकृ पेनं झालं धडर् धडर् । त्र्ाच्र्ाि प्रेरणेनं िुिलं ज्ञान । पोथीरूपं प्रगटलं तं ॥७१॥ कांहीं दोष गेला अिेल राहून । तरी िज्जनांनी करावं थोर मन । क्षमा करावी कृ पा करुनी । ्हणे समसलंदमाधव ॥७२॥ शक अठराशे अठ्र्ाण्णव वषं पौष कृ ष्णप्रसतपदा फदवशीं । गुरुपुष्र्ामृत र्ोगािी । पोथी पूणा झाली ही ॥७३॥ े ॥ ॐ तत ् ित ् ब्रह्मापाणमस्तु ॥शुभं भवतु ॥ ॐ शांसत: शांसत: शांसतः॥ ॥ ॐ भूभूव: स्व: तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भंगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो र्ो न: प्रिोदर्ात ् ॥ ा ा ॥ समसलंद माधवकृ त 'गार्िी स्तोि-महात््र् िंपूणा ॥ मंि सिद्ध मूंगा गणेश मूंगा गणेश को त्रवध्नेश्वर और सित्रद्ध त्रवनार्क क रूप मं जाना जाता हं । इि क पूजन िे जीवन मं िुख े े िौभाग्र् मं वृत्रद्ध होती हं ।रि िंिार को िंतुसलत करता हं । मस्स्तष्क को तीव्रता प्रदान कर व्र्त्रि को ितुर बनाता हं । बार-बार होने वाले गभापात िे बिाव होता हं । मूंगा गणेश िे बुखार, नपुंिकता , िस्डनपात और िेिक जेिे रोग मं लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् Rs: 550 िे Rs: 10900 तक
  • 28.
    28 मई 2012 िवा कार्ा सित्रद्ध कवि स्जि व्र्त्रि को लाख प्रर्त्न और पररश्रम करने क बादभी उिे मनोवांसछत िफलतार्े एवं फकर्े गर्े कार्ा े मं सित्रद्ध (लाभ) प्राप्त नहीं होती, उि व्र्त्रि को िवा कार्ा सित्रद्ध कवि अवश्र् धारण करना िाफहर्े। कवि क प्रमुख लाभ: िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क द्वारा िुख िमृत्रद्ध और नव ग्रहं क नकारात्मक प्रभाव को े े े शांत कर धारण करता व्र्त्रि क जीवन िे िवा प्रकार क द:ख-दाररद्र का नाश हो कर िुख-िौभाग्र् एवं े े ु उडनसत प्रासप्त होकर जीवन मे िसभ प्रकार क शुभ कार्ा सिद्ध होते हं । स्जिे धारण करने िे व्र्त्रि र्फद े व्र्विार् करता होतो कारोबार मे वृत्रद्ध होसत हं और र्फद नौकरी करता होतो उिमे उडनसत होती हं ।  िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं िवाजन वशीकरण कवि क समले होने की वजह िे धारण करता े े की बात का दिरे व्र्त्रिओ पर प्रभाव बना रहता हं । ू  िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं अष्ट लक्ष्मी कवि क समले होने की वजह िे व्र्त्रि पर मां महा े े िदा लक्ष्मी की कृ पा एवं आशीवााद बना रहता हं । स्जस्िे मां लक्ष्मी क अष्ट रुप (१)-आफद े लक्ष्मी, (२)-धाडर् लक्ष्मी, (३)-धैरीर् लक्ष्मी, (४)-गज लक्ष्मी, (५)-िंतान लक्ष्मी, (६)-त्रवजर् लक्ष्मी, (७)-त्रवद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन िभी रुपो का अशीवााद प्राप्त होता हं ।  िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं तंि रक्षा कवि क समले होने की वजह िे तांत्रिक बाधाए दर े े ू होती हं , िाथ ही नकारत्मन शत्रिर्ो का कोइ कप्रभाव धारण कताा व्र्त्रि पर नहीं होता। इि ु कवि क प्रभाव िे इषाा-द्वे ष रखने वाले व्र्त्रिओ द्वारा होने वाले दष्ट प्रभावो िे रक्षाहोती हं । े ु  िवा कार्ा सित्रद्ध कवि क िाथ मं शिु त्रवजर् कवि क समले होने की वजह िे शिु िे िंबंसधत े े िमस्त परे शासनओ िे स्वतः ही छटकारा समल जाता हं । कवि क प्रभाव िे शिु धारण कताा ु े व्र्त्रि का िाहकर कछ नही त्रबगि िकते। ु अडर् कवि क बारे मे असधक जानकारी क सलर्े कार्ाालर् मं िंपक करे : े े ा फकिी व्र्त्रि त्रवशेष को िवा कार्ा सित्रद्ध कवि दे ने नही दे ना का अंसतम सनणार् हमारे पाि िुरस्क्षत हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    29 मई 2012 अघनाशकगार्िीस्तोि आफदशि जगडमातभािानुग्रहकाररस्ण । िवाि व्र्ात्रपकऽनडते श्रीिंध्र्े ते नमोऽस्तु ते ॥ े े त्वमेव िंध्र्ा गार्िी िात्रवत्रि ि िरस्वती । ब्राह्मी ि वैष्णवी रौद्री रिा श्वेता सितेतरा ॥ प्रातबााला ि मध्र्ाह्ने र्ौवनस्था भवेत्पुनः । वृद्धा िार्ं भगवती सिडत्र्ते मुसनसभः िदा ॥ हं िस्था गरुिारूढा तथा वृषभवाफहनी । ऋग्वेदाध्र्ासर्नी भूमौ दृश्र्ते र्ा तपस्स्वसभः ॥ र्जुवदं पठडती ि अडतररक्षे त्रवराजते । िा िामगात्रप िवेषु भ्रा्र्माणा तथा भुत्रव ॥ े रुद्रलोक गता त्वं फह त्रवष्णुलोकसनवासिनी । त्वमेव ब्रह्मणो लोकऽमत्र्ाानुग्रहकाररणी ॥ ं े िप्तत्रषाप्रीसतजननी मार्ा बहुवरप्रदा । सशवर्ोः करनेिोत्था ह्यश्रुस्वेदिमुद्भवा ॥ आनडदजननी दगाा दशधा पररपठ्र्ते । वरे ण्र्ा वरदा िैव वररष्ठा वरस्व्णानी ॥ ु गररष्ठा ि वराही ि वरारोहा ि िप्तमी । नीलगंगा तथा िंध्र्ा िवादा भोगमोक्षदा ॥ भागीरथी मत्र्ालोक पाताले भोगवत्र्त्रप ॥ त्रिलोकवाफहनी दे वी स्थानिर्सनवासिनी ॥ े भूलोकस्था त्वमेवासि धररिी शोकधाररणी । भुवो लोक वार्ुशत्रिः स्वलोक तेजिां सनसधः ॥ े े महलोक महासित्रद्धजानलोक जनेत्र्त्रप । तपस्स्वनी तपोलोक ित्र्लोक तु ित्र्वाक् ॥ े े े े कमला त्रवष्णुलोक ि गार्िी ब्रह्मलोकगा । रुद्रलोक स्स्थता गौरी हराधांगीसनवासिनी ॥ े े अहमो महतश्चैव प्रकृ सतस्त्वं फह गीर्िे । िा्र्ावस्थास्त्मका त्वं फह शबलब्रह्मरूत्रपणी ॥ ततः परापरा शत्रिः परमा त्वं फह गीर्िे । इच्छाशत्रिः फक्रर्ाशत्रिज्ञाानशत्रिस्स्त्रशत्रिदा ॥ गंगा ि र्मुना िैव त्रवपाशा ि िरस्वती । िरर्ूदेत्रवका सिडधुनमदेरावती तथा ॥ ा ा गोदावरी शतद्रश्च कावेरी दे वलोकगा । कौसशकी िडद्रभागा ि त्रवतस्ता ि िरस्वती ॥ ु गण्िकी तात्रपनी तोर्ा गोमती वेिवत्र्त्रप । इिा ि त्रपंगला िैव िुषु्णा ि तृतीर्का ॥ गांधारी हस्स्तस्जह्वा ि पूषापूषा तथैव ि । अल्बुषा कहूश्चैव शंस्खनी प्राणवाफहनी ॥ ु नािी ि त्वं शरीरस्था गीर्िे प्रािनैबधैः । हृतपद्मस्था प्राणशत्रिः कण्ठस्था स्वप्ननासर्का ॥ ुा तालुस्था त्वं िदाधारा त्रबडदस्था त्रबडदमासलनी । मूले तु कण्िली शत्रिव्र्ाात्रपनी कशमूलगा ॥ ु ु ु े सशखामध्र्ािना त्वं फह सशखाग्रे तु मनोडमनी । फकमडर्द् बहुनोिन र्स्त्कसिज्जगतीिर्े ॥ े ं तत्िवं त्वं महादे त्रव सश्रर्े िंध्र्े नमोऽस्तु ते । इतीदं कीसतातं स्तोिं िंध्र्ार्ां बहुपुण्र्दम ् ॥ महापापप्रशमनं महासित्रद्धत्रवधार्कम ् । र् इदं कीतार्ेत ् स्तोिं िंध्र्ाकाले िमाफहतः ॥ अपुिः प्राप्नुर्ात ् पुिं धनाथी धनमाप्नुर्ात ् । िवातीथातपोदानर्ज्ञर्ोगफलं लभेत ् ॥ भोगान ् भुक्त्वा सिरं कालमडते मोक्षमवाप्नुर्ात ् । तपस्स्वसभः कृ तं स्तोिं स्नानकाले तु र्ः पठे त ् ॥ र्ि कि जले मग्नः िंध्र्ामज्जनजं फलम ् । लभते नाि िंदेहः ित्र्ं ि नारद ॥ ु श्रृणुर्ाद्योऽत्रप तद्भक्त्र्ा ि तु पापात ् प्रमुच्र्ते । पीर्ूषिदृशं वाक्र्ं िंध्र्ोि नारदे ररतम ् ॥ ं ॥ इसत श्रीअघनाशक गार्िी स्तोिं ि्पूणम ् ॥ ा
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    30 मई 2012 ॥गार्िी स्तोि॥ गार्िीस्तोिम ् िुकल्र्ाणीं वाणीं िुरमुसनवरै ः पूस्जतपदाम नमस्ते दे त्रव गार्िी िात्रविी त्रिपदे ऽक्षरी । सशवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मर्ीं वेदजननीं परां शत्रि स्रष्टु ं त्रवत्रवध त्रवध रूपां गुण मर्ीं ं अजरे अमरे माता िाफह मां भविागरात ् ॥१॥ भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम नमस्ते िूर्िंकाशे िूर्वात्रवत्रिकऽमले । ा ा े त्रवशुद्धां ित्त्वस्थाम अस्खल दरवस्थाफदहरणीम ् ु ब्रह्मत्रवद्ये महात्रवद्ये वेदमातनामोऽस्तु ते ॥२॥ सनराकारां िारां िुत्रवमल तपो मुसतं अतुलां जगत ् ज्र्ेष्ठां श्रेष्ठां िुर अिुर पूज्र्ां श्रुसतनुतां अनडतकोफटब्रह्माण्िव्र्ात्रपनी ब्रह्मिाररणी । भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम सनत्र्ानडदे महामर्े परे शानी नमोऽस्तु ते ॥३॥ तपो सनष्ठां असभष्टां स्वजनमन िंताप शमनीम त्वम ् ब्रह्मा त्वम ् हररः िाक्षाद् रुद्रस्त्वसमडद्रदे वता । दर्ामूसतं स्फसतं र्सततसत प्रिादै क िुलभां ू समिस्त्वम ् वरुणस्त्वम ् ि त्वमस्ग्नरस्श्वनौ भगः ॥४॥ वरे ण्र्ां पुण्र्ां तां सनस्खल भवबडधाप हरणीं भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम पूषाऽर्ामा मरुत्वांश्च ऋषर्ोऽत्रप मुनीश्वराः । िदा आराध्र्ां िाध्र्ां िुमसत मसत त्रवस्तारकरणीं त्रपतरो नागर्क्षांश्च गडधवााऽप्िरिां गणाः ॥५॥ त्रवशोकां आलोकां ह्रदर्गत मोहाडधहरणीं परां फदव्र्ां भव्र्ां अगम भव सिडध्वेक तरणीं रक्षोभूतत्रपशािाच्ि त्वमेव परमेश्वरी । भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम ऋग्र्जुस्िामत्रवद्याश्च अथवाास्ङ्गरिासन ि ॥६॥ अजां द्वै तां िेतां त्रवत्रवध गुणरूपां िुत्रवमलां तमो हडिीं तडिीं श्रुसत मधुरनादां रिमर्ीं त्वमेव िवाशास्त्रास्ण त्वमेव िवािंफहताः । महामाडर्ां धडर्ां िततकरूणाशील त्रवभवां पुराणासन ि तडिास्ण महागममतासन ि ॥७॥ भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम त्वमेव पञ्िभूतासन तत्त्वासन जगदीश्वरी । जगत ् धािीं पािीं िकल भव िंहारकरणीं ब्राह्मी िरस्वती िडध्र्ा तुरीर्ा त्वं महे श्वरी ॥८॥ िुवीरां धीरां तां िुत्रवमलतपो रासश िरणीं अनैकां ऐकां वै िर्जगत ् असधष्ठान ् पदवीं तत्िद्ब्रह्मस्वरूपा त्वं फकस्ञ्ित ् िदिदास्त्मका । भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम परात्परे शी गार्िी नमस्ते मातरस््बक ॥९॥ े प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनर्सत जाड्र्ापहरणीं िडद्रकलास्त्मक सनत्र्े कालरात्रि स्वधे स्वरे । े फहरण्र्ां गुण्र्ां तां िुकत्रवजन गीतां िुसनपुणीं िुत्रवद्यां सनरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं स्वाहाकारे ऽस्ग्नवक्िे त्वां नमासम जगदीश्वरी ॥१०॥ भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम नमो नमस्ते गार्िी िात्रविी त्वं नमा्र्हम ् । अनडतां शाडतां र्ां भजसत वुध वृडदः श्रुसतमर्ीम िुगेर्ां ध्र्ेर्ां र्ां स्मरसत ह्रफद सनत्र्ं िुरपसतः िरस्वती नमस्तुभ्र्ं तुरीर्े ब्रह्मरूत्रपणी ॥११॥ िदा भक्त्र्ा शक्त्र्ा प्रणतमसतसभः त्रप्रसतवशगां अपराध िहस्रास्ण त्वित्कमाशतासन ि । भजे अ्बां गार्िीं परम िुभगा नंदजननीम मत्तो जातासन दे वेशी त्वं क्षमस्व फदने फदने ॥१२॥ शुद्ध सितः पठे द्यस्तु गार्त्र्र्ा अष्टक शुभम ् ं ॥ इसत शीवसिष्ठिंफहतोि गार्िीस्तोिं िंपूणम ् ॥ ं ा अहो भाग्र्ो भवेल्लोक तस्स्मन ् माता प्रिीदसत े
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    31 मई 2012 ॥गार्िी िालीिा॥ ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्र्ोसत िुसमरत फहर् मं ज्ञान प्रकािै। गृह क्लेश सित सिडता भारी। प्रिण्ि॥ शास्डत कास्डत जागृत आलि पाप अत्रवद्या नािै॥१३॥ नािै गार्िी भर् हारी॥२८॥ प्रगसत रिना शत्रि अखण्ि॥ िृत्रष्ट बीज जग जनसन भवानी। िडतसत हीन िुिडतसत पावं। जगत जननी मङ्गल करसन गार्िी कालरात्रि वरदा कल्र्ाणी॥१४॥ िुख िंपसत र्ुत मोद मनावं॥२९॥ िुखधाम। प्रणवं िात्रविी स्वधा ब्रह्मा त्रवष्णु रुद्र िुर जेते। भूत त्रपशाि िबै भर् खावं। स्वाहा पूरन काम॥ तुम िं पावं िुरता तेते॥१५॥ र्म क दत सनकट नफहं आवं॥३०॥ े ू भूभवः स्वः ॐ र्ुत जननी। ुा तुम भिन की भि तु्हारे । जो िधवा िुसमरं सित लाई। गार्िी सनत कसलमल दहनी॥१॥ जनसनफहं पुि प्राण ते प्र्ारे ॥१६॥ अछत िुहाग िदा िुखदाई॥३१॥ अक्षर िौत्रवि परम पुनीता। मफहमा अपर्पार तु्हारी। घर वर िुख प्रद लहं कमारी। ु इनमं बिं शास्त्र श्रुसत गीता॥२॥ जर् जर् जर् त्रिपदा भर्हारी॥१७॥ त्रवधवा रहं ित्र् व्रत धारी॥३२॥ शाश्वत ितोगुणी ित रूपा। पूररत िकल ज्ञान त्रवज्ञाना। जर्सत जर्सत जगदं ब भवानी। ित्र् िनातन िुधा अनूपा॥३॥ तुम िम असधक न जगमे आना॥१८॥ तुम िम और दर्ालु न दानी॥३३॥ हं िारूढ श्वेता्बर धारी। ु तुमफहं जासन कछ रहै न शेषा। जो ितगुरु िो दीक्षा पावे। स्वणा कास्डत शुसि गगन-त्रबहारी॥४॥ ु तुमफहं पार् कछ रहै न क्लेिा॥१९॥ िो िाधन को िफल बनावे॥३४॥ पुस्तक पुष्प कमण्िलु माला। जानत तुमफहं तुमफहं ह्वै जाई। िुसमरन करे िुरूसि बिभागी। शुभ्र वणा तनु नर्न त्रवशाला॥५॥ पारि परसि कधातु िुहाई॥२०॥ ु लहै मनोरथ गृही त्रवरागी॥३५॥ ध्र्ान धरत पुलफकत फहत होई। तु्हरी शत्रि फदपै िब ठाई। अष्ट सित्रद्ध नवसनसध की दाता। िुख उपजत दःख दमसत खोई॥६॥ ु ु ा माता तुम िब ठौर िमाई॥२१॥ िब िमथा गार्िी माता॥३६॥ कामधेनु तुम िुर तरु छार्ा। ग्रह नक्षि ब्रह्माण्ि घनेरे। ऋत्रष मुसन र्ती तपस्वी र्ोगी। सनराकार की अद्भत मार्ा॥७॥ ु िब गसतवान तु्हारे प्रेरे॥२२॥ आरत अथी सिस्डतत भोगी॥३७॥ तु्हरी शरण गहै जो कोई। िकल िृत्रष्ट की प्राण त्रवधाता। जो जो शरण तु्हारी आवं। तरै िकल िंकट िं िोई॥८॥ पालक पोषक नाशक िाता॥२३॥ िो िो मन वांसछत फल पावं॥३८॥ िरस्वती लक्ष्मी तुम काली। मातेश्वरी दर्ा व्रत धारी। बल बुसध त्रवद्या शील स्वभाउ। फदपै तु्हारी ज्र्ोसत सनराली॥९॥ तुम िन तरे पातकी भारी॥२४॥ धन वैभव र्श तेज उछाउ॥३९॥ तु्हरी मफहमा पार न पावं। जापर कृ पा तु्हारी होई। िकल बढं उपजं िुख नाना। जो शारद शत मुख गुन गावं॥१०॥ तापर कृ पा करं िब कोई॥२५॥ जे र्ह पाठ करै धरर ध्र्ाना॥४०॥ ॥दोहा॥ िार वेद की मात पुनीता। मंद बुत्रद्ध ते बुसध बल पावं। र्ह िालीिा भत्रिर्ुत तुम ब्रह्माणी गौरी िीता॥११॥ रोगी रोग रफहत हो जावं॥२६॥ पाठ करै जो कोई। महामडि स्जतने जग माहीं। दररद्र समटै कटै िब पीरा। तापर कृ पा प्रिडनता कोउ गार्िी िम नाहीं॥१२॥ नाशै दःख हरै भव भीरा॥२७॥ ु गार्िी की होर्॥
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    32 मई 2012 ॥श्री गार्िी शाप त्रवमोिनम ्॥ शाप मुिा फह गार्िी ितुवगा फल प्रदा । अशाप मुिा गार्िी ितुवगा फलाडतका ॥ ा ा ॐ अस्र् श्री गार्िी । ब्रह्मशाप त्रवमोिन मडिस्र् । ब्रह्मा ऋत्रषः । गार्िी छडदः । भुत्रि मुत्रिप्रदा ब्रह्मशाप त्रवमोिनी गार्िी शत्रिः दे वता । ब्रह्म शाप त्रवमोिनाथे जपे त्रवसनर्ोगः ॥ ॐ गार्िी ब्रह्मेत्र्ुपािीत र्द्रपं ब्रह्मत्रवदो त्रवदः । तां पश्र्स्डत धीराः िुमनिां वािग्रतः । ू ु ॐ वेदाडत नाथार् त्रवद्महे फहरण्र्गभाार् धीमही । तडनो ब्रह्म प्रिोदर्ात ् । ॐ गार्िी त्वं ब्रह्म शापत ् त्रवमुिा भव ॥ ॐ अस्र् श्री वसिष्ट शाप त्रवमोिन मडिस्र् सनग्रह अनुग्रह कताा वसिष्ट ऋत्रष । त्रवश्वोद्भव गार्िी छडदः । वसिष्ट अनुग्रफहता गार्िी शत्रिः दे वता । वसिष्ट शाप त्रवमोिनाथे जपे त्रवसनर्ोगः ॥ ॐ िोहं अकमर्ं ज्र्ोसतरहं सशव आत्म ज्र्ोसतरहं शुक्रः िवा ज्र्ोसतरिः अस््र्हं ।(इसत र्ुक्त्व र्ोसन मुद्रां प्रदश्र्ा गार्िी ा िर्ं पफदत्व) ॐ दे वी गार्िी त्वं वसिष्ट शापत ् त्रवमुिो भव ॥ ॐ अस्र् श्री त्रवश्वासमि शाप त्रवमोिन मडिस्र् नूतन िृत्रष्ट कताा त्रवश्वासमि ऋत्रष । वाग्दे हा गार्िी छडदः । त्रवश्वासमि अनुग्रफहता गार्िी शत्रिः दे वता । त्रवश्वासमि शाप त्रवमोिनाथे जपे त्रवसनर्ोगः ॥ ॐ गार्िी भजांर्स्ग्न मुखीं त्रवश्वगभां र्दद्भवाः दे वाश्चफक्ररे त्रवश्विृत्रष्टं तां कल्र्ाणीं इष्टकरीं प्रपद्ये । ु र्डमुखास्डनिृतो अस्खलवेद गभाः । शाप र्ुिा तु गार्िी िफला न कदािन । शापत ् उत्तरीत िा तु मुत्रि भुत्रि फल प्रदा ॥ प्राथाना ॥ ब्रह्मरूत्रपणी गार्िी फदव्र्े िडध्र्े िरस्वती । अजरे अमरे िैव ब्रह्मर्ोने नमोऽस्तुते। ब्रह्म शापत ् त्रवमुिा भव। वसिष्ट शापत ् त्रवमुिा भव। त्रवश्वासमि शापत ् त्रवमुिा भव॥ श्री गार्िी जी की आरती जर्सत जर् गार्िी माता, जर्सत जर् गार्िी माता। स्वाहा, स्वधा, शिी ब्रह्माणी राधा रुद्राणी। आफद शत्रि तुम अलख सनरं जन जगपालक किी। जर् ितरूपा, वाणी, त्रवद्या, कमला कल्र्ाणी॥ जर्सत .. द:ख शोक, भर्, क्लेश कलश दाररद्र दै डर् हिी॥ जर्सत .. ु जननी हम हं दीन-हीन, द:ख-दररद्र क घेरे। ु े ब्रह्म रूत्रपणी, प्रणात पासलन जगत धातृ अ्बे। र्दत्रप कफटल, कपटी कपूत तउ बालक हं तेरे॥ जर्सत .. ु भव भर्हारी, जन-फहतकारी, िुखदा जगद्बे॥ जर्सत .. स्नेहिनी करुणामर् माता िरण शरण दीजै। भर् हाररणी, भवताररणी, अनघेअज आनडद रासश। त्रवलख रहे हम सशशु िुत तेरे दर्ा दृत्रष्ट कीजै॥ जर्सत .. अत्रवकारी, अखहरी, अत्रविसलत, अमले, अत्रवनाशी॥ जर्सत .. काम, क्रोध, मद, लोभ, द्भ, दभााव द्वे ष हररर्े। ु कामधेनु ितसित आनडद जर् गंगा गीता। शुद्ध बुत्रद्ध सनष्पाप हृदर् मन को पत्रवि कररर्े॥ जर्सत .. ित्रवता की शाश्वती, शत्रि तुम िात्रविी िीता॥ जर्सत .. तुम िमथा िब भांसत ताररणी तुत्रष्ट-पुत्रष्ट द्दाता। ऋग, र्जु िाम, अथवा प्रणर्नी, प्रणव महामफहमे। ित मागा पर हमं िलाओ, जो है िुखदाता॥ कण्िसलनी िहस्त्र िुषुमन शोभा गुण गररमे॥ जर्सत .. ु जर्सत जर् गार्िी माता, जर्सत जर् गार्िी माता॥
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    33 मई 2012 श्री गार्िी कवि  त्रवजर् ठाकुर त्रवसनर्ोग:- ॐ ‘रे ’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् िदा तत्त्व शरीरकम ्। ॐ अस्र् श्रीगार्िी कविस्र् ब्रह्मा-त्रवष्णु-रुद्राः ऋषर्ः। ॐ ‘ण्र्ं’ ॐ पातु मे अक्षम ् िवा तत्त्वैक कारणम ्। ऋग ् र्जुः िामाथवाास्ण छडदांसि। परब्रह्म स्वरुत्रपणी गार्िी ॐ ‘भ’ ॐ पातु मे श्रोिम ् शब्द श्रवणैक कारणम ्। दे वता। भूः बीजं। भुवः शत्रिः। स्वाहा कीलकम ्। ॐ ‘गो’ ॐ पातु मे घ्राणम ् गडधोत्पादान कारणम ्। ितुत्रवंशत्र्क्षरा श्रीगार्ि प्रीत्र्थे जपे त्रवसनर्ोगः। ॐ ‘दे ’ ॐ पातु मे िास्र्म ् िभार्ाम ् शब्द रुत्रपणीम ्। ध्र्ानः- ॐ ‘व’ ॐ पातु मे बाहु र्ुगलम ् ि कमा कारणम ्। वस्त्राभाम ् कस्ण्िकां हस्तां, शुद्ध सनमाल ज्र्ोसतषीम ्। ु ॐ ‘स्र्’ पातु मे सलडगम ् षट् दल र्ुतम ्। िवा तत्त्व मर्ीं वडदे , गार्िीं वेद मातरम ्॥ ॐ ‘धी’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् प्रकृ सत शब्द कारणम ्। मुिा त्रवद्रम हे म नील धवलैश्छार्ैः मुखेस्त्रीक्षणैः। ु ॐ ‘म’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् नमो ब्रह्म स्वरुत्रपणीम ्। र्ुिासमडद ु सनबद्ध रत्न मुकटां तत्त्वाथा वणाास्त्मकाम ्॥ ु ॐ ‘फह’ ॐ पातु मे बुत्रद्धम ् पर-ब्रह्म-मर्म ् िदा। गार्िीं वरदाभर्ांकश कशां शूलं कपालं गुणैः। ु ॐ ‘सध’ ॐ पातु मे सनत्र्महडकारम ् र्था तथा। शंखं िक्रमथारत्रवडद र्ुगलं हस्तैवहडतीं भजे॥ ा ॐ ‘र्ो’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् जलम ् िवाि िवादा। कवि पाठ:- ॐ ‘नः’ ॐ पातु मे सनत्र्ं तेज पुञ्जो र्था तथा। “ॐ ॐ ॐ ॐ ‘भूः’ ॐ ॐ ‘भुवः’ ॐ ॐ ‘स्वः’ ॐ ॐ ॐ ‘प्र’ ॐ पातु मे सनत्र्मसनलम ् कार् कारणम ्। ‘त’ ॐ ॐ ‘त्ि’ ॐ ॐ ‘त्रव’ ॐ ॐ ‘तु’ ॐ ॐ ‘वा’ ॐ ॐ ॐ ‘िो’ ॐ पातु मे सनत्र्माकाशम ् सशव िस्डनभम ्। ‘रे ’ ॐ ॐ ‘ण्र्ं’ ॐ ॐ ‘भ’ ॐ ॐ ‘गो’ ॐ ॐ ‘दे ’ ॐ ॐ ॐ ‘द’ ॐ पातु मे स्जह्वां जप र्ज्ञस्र् कारणम ्। ‘व’ ॐ ॐ ‘ स्र्’ ॐ ॐ ‘धी’ ॐ ॐ ‘म’ ॐ ॐ ‘फह’ ॐ ॐ ‘र्ात ्’ ॐ पातु मे सनत्र्म ् सशवम ् ज्ञान मर्म ् िदा। ॐ ‘सध’ ॐ ॐ ‘र्ो’ ॐ ॐ ‘नः’ ॐ ॐ ‘प्र’ ॐ ॐ ‘िो’ ॐ तत्त्वासन पातु मे सनत्र्म ्, गार्िी पर दै वतम ्। ॐ ॐ ‘द’ ॐ ॐ ‘र्ा’ ॐ ॐ ‘त ्’ ॐ ॐ। कृ ष्णं मे िततम ् पातु, ब्रह्मास्ण भूभवः स्वरोम ्॥ ुा ॐ ॐ ॐ ॐ ‘भूः’ ॐ पातु मे मूलम ् ितुदाल िमस्डवतम ्। ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुवरेण्र्ं भगो दे वस्र् धीमफह सधर्ो ुा ा ॐ ‘भुवः’ ॐ पातु मे सलडगम ् िज्जलम ् षट् दलात्मकम ्। र्ो नः प्रिोदर्ात ्। ॐ ‘स्व’ ॐ पातु मे कण्ठम ् िाकाशम ् दल षोिशम ्। ॐ जात-वेदिे िुनवाम िोममाराती र्तो सनदहासत वेदाः। ॐ ‘त’ ॐ पातु मे रुपम ् ब्राह्मणम ् कारणम ् परम ्। षनः पषादसत दगाास्ण त्रवश्वानावेवम ् सिडधुं दररतात्र्स्ग्नः। ु ु ॐ ‘त्ि’ ॐ ब्रह्म रिम ् पातु मे िदा मम। ॐ त्र्र््बकम ् र्जामहे िुगस्डधं पुत्रष्ट-वधानम ्। ॐ ‘त्रव’ ॐ पातु मे गडधम ् िदा सशसशर िंर्ुतम ्। ऊवााररकसमव बडधनात ् मृत्र्ोमुक्षीर् मामृतात ्॥ ा ॐ ‘तु’ ॐ पातु मे स्पशं शरीरस्र् कारणम ् परम ्। ॐ नमस्ते तुरीर्ार् िसशातार् पदार् परो रजिेिावदोम ् मा ॐ ‘वा’ ॐ पातु मे शब्दम ् शब्द त्रवग्रह कारणम ्। प्रापत॥ कवि िफहता ितुष्पाद गार्िी ि्पूणाा॥
  • 34.
    34 मई 2012 रोग सनवारण क पत्रवि जल े  सिंतन जोशी गंगा नफद को फहं द ू धमा मं पत्रवि नदी माना जाता  अपने पूजन स्थान पर एक ताँबं का कलश र्ा ग्लाि हं , इिसलए फहं द ू धमा क बहुत िे लोगो का त्रवश्वाि हं की े आधा पानी िे भर क रखले। (उपर्ोग फकर्ा जाने े वहँ गंगा नदी मं स्नान करक एक तीथा स्नान करने का े वाला जल पूणतः शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला हुआ हो) ा आमतौर पर महिूि करते हं । एिी माडर्ता हं की जीवन  अपने दाफहने हाथं की ऊगलीर्ा कलश र्ा ग्लाि क ँ े मं कम िे कम एक बार गंगा स्नान फकए त्रबना जीवन पानी मं िू बां दे और गार्िी मंि का कम िे कम पूणा नहीं हं । 108 बार जप करं । कछ जानकारो का मत हं की र्हँ कवल फहं द ू धमा ु े  जप पूणा होने क पश्चर्ात पत्रवि जप उपर्ोग हे तु े क लोगं का त्रवश्वाि नहीं हं । गंगा नफद क जल को एक े े तैर्ार हो जार्ेगा। पत्रवि प्रतीक क रूप मं कद्रीर् महत्वता प्राप्त हं । े ं पौरास्णक काल िे ही दसनर्ा क कई धमा जैिे ु े प्रर्ोग 2 फहं द ू धमा, बौद्ध धमा र्हूदी धमा, ईिाई धमा, इस्लाम, और  िुबह स्नानाफद िे सनवृत्त होकर, अपने पूजन स्थान उन िभी धमा मं पत्रवि जल की एक महत्वपूणा भूसमका पर एक ताँबं का कलश र्ा ग्लाि आधा पानी िे भर रही हं । हालांफक त्रवसभडन धमं पत्रवि जल िे इलाज और क रखले। (उपर्ोग फकर्ा जाने वाला जल पूणतः े ा त्रवसभडन उपोग की त्रवशेष भूसमका प्रिलन मं रही हं । शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला हुआ हो) पत्रवि जल का प्रर्ोग िाधारणतः दो आम  जल भरे पाि पर एकटक आपकी दृत्रष्ट रखते हुए आध्र्ास्त्मक कार्ा मं फकर्ा जाता हं , आध्र्ास्त्मक िफाई गार्िी मंि का कम िे कम 108 बार जप करं । अथाात धासमाक त्रवसध र्ा िंस्कार मं प्रर्ोग फकर्ा जाता हं  जप पूणा होने क पश्चर्ात पत्रवि जप उपर्ोग हे तु े और जीवन क मूल स्रोत दशााता हं । े तैर्ार हो जार्ेगा। पत्रवि जल का मुख्र् उपर्ोग धासमाक पूजा-त्रवसध और रोगं क इलाज मं फकर्ा जाता हं । पाठको क े े प्रर्ोग 3 मागादशान हे तु र्हाँ हम स्वर्ं क रोग-त्रबमारी को दर े ू  र्फद आप उपरोि त्रवसध िे पत्रवि जल बनाने मं करने क सलए पत्रवि जल बनाने क कछ िरल त्रवसध े े ु िमथा नहीं हं , तो इि प्रर्ोग को कर िकते हं । प्रस्तुत कर रहे हं ।  गार्ती र्ंि प्राप्त करं । जो शुद्ध ताम्र पि पर बना हो। प्रर्ोग 1  इि क पश्चर्ात फकिी र्ोग्र् त्रवद्वान ब्राह्मण िे गार्ती े  पत्रवि जल बनाने हे तु प्रातः काल ब्रह्म मुहूता िबिे र्ंि को शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे पूणा असभमंत्रित उत्तम िमर् हं । करवाले र्ा प्राण-प्रसतत्रष्ठत करवा ले।  िुबह स्नानाफद िे सनवृत्त होकर, पूजन िे पूवा अपने  र्फद आपक सलए फकिी र्ोग्र् ब्राह्मण िे र्ंि प्राण- े हाथ को अच्छी तरह िाफ पानी िे धो ले और प्रसतत्रष्ठत करवाना िंभव न हो तो आप हमारी िंस्था स्वच्छ कपिे िे पौछ कर िुखा ले। गुरुत्व कार्ाालर् िे मंि सिद्ध गार्ती र्ंि प्राप्त कर िकते हं ।
  • 35.
    35 मई 2012  अपने पूजन स्थान मं दे वी गार्िी क सिि र्ा मूसता े  कम िे कम 12 घंटं र्ा 24 घंटं तक र्ंि को जल मं क पाि मं गार्िी र्ंि को रखं। े िू बा कर रखं।  अपने पूजन स्थान मं ताँबं का कलश र्ा ग्लाि को  कलश र्ा ग्लाि को धूल, समट्टी, फकटानु आफद िे पूरा जल भर कर रख दे । (उपर्ोग फकर्ा जाने वाला िुरस्क्षत रखने हे तु उिेक मुख को ढं क कर रखं। े जल पूणतः शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला हुआ हो) ा  इि क पश्चर्ात आपको कुछ और करने की े  गार्िी र्ंि को ताँबं की थाली र्ा प्लेट अथवा अडर् आवश्र्िा नहीं हं । फकिी भी पाि मं रखं।  आका पत्रवि जल 12 घंटं र्ा 24 घंटं क बाद मं े  अब एक ताँबं की ि्मि र्ा फकिी अडर् ि्मि मं उपर्ोग हे तु तैर्ार हं । जल भरकर गार्िी मंि का जप करते हुवे उि नोट: ि्मि का जल गार्ती र्ंि पर िढा़र्े र्ा सगराते रहं । हाथ व पाि को शुद्ध पानी िे अस्च्छ तरह िाफ करलं व पाि मं  इि प्रकार कम िे कम 108 बार गार्त्रि मंि का जप शुद्ध जल ही भरे । अडर्था हाथ मं लगी धूल-समट्टी व फकटाणु करं । पानी क िाथ समलकर आपक सभतर जार्ंगे जो स्वास्थ्र् क े े े  जप की िमासप्त पर थाल र्ा प्लेट मं जमा हुए जल सलर्े हासनकारक हो िकता हं । को फकिी स्वच्छ ग्लाि र्ा बोटल मं भर लं। मंि का जप जब पानी मं हाथ िू बा हो तब 5-10 समनट िे  पत्रवि जप उपर्ोग हे तु तैर्ार हं । असधक न करं अडर्था हाथ मं पिीना होने लगेगा और पाि के जल मं उिका समश्रण असधक मािा मं होने पर स्वास्थ्र् के प्रर्ोग 4 सलर्े नुक्शानदे ह हो िकता हं । उि िभी प्रर्ोग हमारे वषो क अनुभव व शोध क आधार पर े े  र्फद आप उपरोि त्रवसध िे पत्रवि जल बनाने मं हमने पार्ा हं फक र्ह प्रर्ोग तत्काल प्रभात्रव हं । आप भी अपने िमथा नहीं हं , तो इि प्रर्ोग को कर िकते हं । जीवन मं इि प्रर्ोग को अपनाकर दे खलं। स्जििे इि प्रर्ोग  गार्ती र्ंि प्राप्त करं । जो शुद्ध ताम्र पि पर बना हो। का शुभ पररणाम/लाभ पूणा पादा शीता िे आपक िामने होगा े  इि क पश्चर्ात फकिी र्ोग्र् त्रवद्वान ब्राह्मण िे गार्ती े इि मं जरा भी िंदेह नहीं हं । र्ंि को शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे पूणा असभमंत्रित र्हं प्रर्ोग हमने स्वर्ं व हमारे िाथ ल्बे िमर् िे जुिे हजारो करवाले र्ा प्राण-प्रसतत्रष्ठत करवा ले। बंध/बहन प्रसतफदन करते आरहे हं । र्हं प्रर्ोग व्र्त्रि को िभी ु  र्फद आपक सलए फकिी र्ोग्र् ब्राह्मण िे र्ंि प्राण- े प्रकार क रोगो िे मुत्रि व उत्तम स्वास्थ्र् की प्रासप्त हे तु पूणतः े ा प्रसतत्रष्ठत करवाना िंभव न हो तो आप हमारी िंस्था िक्षम हं । क्र्ोफक इि प्रर्ोग िे िाधक अपनी स्वर्ं की शत्रि गुरुत्व कार्ाालर् िे मंि सिद्ध गार्ती र्ंि प्राप्त कर को कद्रीत करता हं । ं िकते हं ।  अपने पूजन स्थान मं दे वी गार्िी क सिि र्ा मूसता े र्फद कोई व्र्त्रि उि प्रर्ोग को स्वर्ं करने मं िक्षन क पाि मं गार्िी र्ंि ताँबं का कलश र्ा ग्लाि को े नहीं हो तो उिक पररवार का कोई भी िदस्र् इि प्रर्ोग े पूरा जल भर कर उि मं िू बा कर रख दे । (उपर्ोग को कर क उि जल को रोगी को पीला िकते हं । े फकर्ा जाने वाला जल पूणतः शुद्ध, स्वच्छ र्ा उबला ा मंिजप पूणा सनष्ठा व श्रद्धा िे करं । हुआ हो) मफहलाओं क सलर्े अशुत्रद्ध क दौरान प्रर्ोग करना सनत्रषध े े हं ।
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    36 मई 2012 पत्रवि जल क लाभ े कोई दष्ट आत्मा, भूत-प्रेत को दर करने क सलए, उि ु ू े  पत्रवि जल शरीर और आत्मा दोनं को अनुग्रह प्रदान त्रवत्रि को भोजन मं िे थोिा पत्रवि जल समलाकर करने क सलए दोहरा लाभ दे ते हं । े परोशने की र्ा स्खलाने की कोसशश करं , वह दष्ट ु  पत्रवि जल िे कई लाभ प्राप्त फकर्ा जा िकता है , आत्मा बहुत जल्द आपक त्रप्रर् जन र्ा िंबंसधत े असधक िे असधक त्रवश्वाि और श्रद्धा क िाथ पत्रवि े व्र्त्रि िे शरीर िे बाहर सनकल जार्ेगी। जल का प्रर्ोग असधक बार कर िकते हं ।  त्रवद्वानो का कथन हं की पत्रवि जल फकिी घातक रोग  पत्रवि जल, त्रवश्वाि और धासमाकता क िाथ सछिक ने े और लाइलाज बीमारी मं उपर्ोगी। िे, बुरी आत्माओं और क्षुद्र जीवं िे आस्त्मर् एवं  पत्रवि जल आपक शरीर की ऊजाा को जागने क सलए े े त्रप्रर्जनो की रक्षा होती हं । अत्र्ंत उपर्ोगी हं ।  जब आप फकिी परे शानी मं हो र्ा िर हो र्ा सिंता  पत्रवि जल की शत्रि नकारात्मक ऊजाा को हटाने और हो रही हो तो आपने शरीर पर पत्रवि जल का िकारात्मक ऊजाा बढ़ाने मं िक्षम हं । सछिकाव करं और इि जल इि जल का िेवन भी  पत्रवि जल क िेवन िे अथाात जल को पीने िे शरीर े कर िकते हं । की िकारात्मक ऊजाा मं वृत्रद्ध होती है , इि जल िे  कृ पर्ा पत्रवि जल िे प्राप्त लाभ क अवैध लाभ प्रासप्त े िभी रोगं को दर फकर्ा जा िकता हं । ू का प्रर्ाि नहीं करं ।  र्फद व्र्त्रि स्वर्ं पत्रवि जल बनाने मं िमथा नहीं हो,  कुछ लोगं का मानना है , फक र्फद फकिी क शरीर मं े तो उिक पररवार क िदस्र् उिे सलए पत्रवि जल े े तैर्ार कर िकते हं । मंि सिद्ध स्फफटक श्री र्ंि "श्री र्ंि" िबिे महत्वपूणा एवं शत्रिशाली र्ंि है । "श्री र्ंि" को र्ंि राज कहा जाता है क्र्ोफक र्ह अत्र्डत शुभ र्लदर्ी र्ंि है । जो न कवल दिरे र्डिो िे असधक िे असधक लाभ दे ने मे िमथा है एवं िंिार क हर व्र्त्रि क सलए फार्दे मंद िात्रबत होता े ू े े है । पूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा िैतडर् र्ुि "श्री र्ंि" स्जि व्र्त्रि क घर मे होता है उिक सलर्े "श्री र्ंि" अत्र्डत र्लदार्ी े े सिद्ध होता है उिक दशान माि िे अन-सगनत लाभ एवं िुख की प्रासप्त होसत है । "श्री र्ंि" मे िमाई अफद्रसतर् एवं अद्रश्र् शत्रि े मनुष्र् की िमस्त शुभ इच्छाओं को पूरा करने मे िमथा होसत है । स्जस्िे उिका जीवन िे हताशा और सनराशा दर होकर वह ू मनुष्र् अिर्लता िे िर्लता फक और सनरडतर गसत करने लगता है एवं उिे जीवन मे िमस्त भौसतक िुखो फक प्रासप्त होसत है । "श्री र्ंि" मनुष्र् जीवन मं उत्पडन होने वाली िमस्र्ा-बाधा एवं नकारात्मक उजाा को दर कर िकारत्मक उजाा का ू सनमााण करने मे िमथा है । "श्री र्ंि" की स्थापन िे घर र्ा व्र्ापार क स्थान पर स्थात्रपत करने िे वास्तु दोष र् वास्तु िे े ि्बस्डधत परे शासन मे डर्ुनता आसत है व िुख-िमृत्रद्ध, शांसत एवं ऐश्वर्ा फक प्रसप्त होती है । गुरुत्व कार्ाालर् मे "श्री र्ंि" 12 ग्राम िे 2250 Gram (2.25Kg) तक फक िाइज मे उप्लब्ध है मूल्र्:- प्रसत ग्राम Rs. 9.10 िे Rs.28.00 GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
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    37 मई 2012 त्रवश्वासमि िंफहतोक्त गार्िी कवि  पं.श्री भगवानदाि त्रिवेदी जी, िंदीप शमाा ब्रह्मोवाि:- करं । िडद्रहासिनी मेरे कपोलं की रक्षा करं । वेदगभाा मेरी त्रवश्वासमि महाप्राज्ञ गार्िी कविं श्रृणु। ठोढ़ी की रक्षा करं । अघनासशनी मेरे कण्ठ की रक्षा करं । र्स्र् त्रवज्ञान मािेण िैलोक्र्ं वश्र्ेत ् क्षणात ्॥ इडद्राणी मेरे स्तनं की रक्षा करं तथा ब्रह्मावाफदनी मेरे हृदर् की रक्षा करं । त्रवश्वभोक्िी मेरे पेट की रक्षा करं । अथाात: ब्रह्मा जी बोले- हे महाप्राज्ञ अथाात महान िुरत्रप्रर्ा मेरी नासभ की रक्षा करं । नारसिंही मेरी जांघं की त्रबत्रद्धमान, बुत्रद्ध िागर त्रवश्वासमि !, तुम श्री गार्िी कवि रक्षा करं तथा ब्रह्माण्िधाररणी मेरी पीठ की रक्षा करं । को श्रवण करो! स्जिक जानने माि िे मनुष्र् तीनं े पद्माक्षी मेरे दोनं पाश्वं एवं मेरे गुह्यांगं की रक्षा करं । ॐ लोकं को अपने वश मं कर लेता हं । कार रुपा मेरे दोनं ऊरु की रक्षा करं । िडध्र्ास्त्मका मेरे िात्रविी मे सशरः पातु सशखार्ाममृतेश्वरी जानु अथाात घुटनं की रक्षा करं । ललाटं ब्रह्म दै वत्र्ां भ्रुवौ मे पातु वैष्णवी॥ जंघर्ो: पातु िाक्षोभ्र्ां गुल्फर्ोब्राह्मशीषाका। कणं मं पातु रुद्राणी िूर्ाा िात्रवत्रिकाऽस््बक। े िूर्ाा पदद्वर्ं पातु िडद्रा पादं गुलीषु ि॥ गार्िी वदनं पातु शारदा दशनच्छदौ॥ िवांड़्ग वेद माता ि पातु मं िवादाऽनघा। इत्र्ेतत ् कविं ब्रह्मन ् गार्त्र्र्ा: िवा पावनम ् | अथाात: िात्रविी मेरे सिर की रक्षा करं । अमृतेश्वरी मेरी सशखा की रक्षा करं । ब्रह्म दे वता मेरे भाल अथाात मस्तक अथाात: आंखं िे जंघाओं तक, सिर िे एिी तक िूर्ा मेरी की रक्षा करं । वैष्णवी मेरी भौहं की रक्षा करं । रुद्राणी मेरे रक्षा करं । िडद्र मेरे पैरं की अंगुसलर्ं की रक्षा करं । दोनं कानं की रक्षा करं । िमस्त प्रास्णर्ं की िृजन हार ि्पूणा पापं का नाश करने वाली वेद माता िवादा हमारे मां भगवती मेरे दोनं नेिं की रक्षा करं तथा गार्िी मेरे ि्पूणा अंगं की रक्षा करं । इि तरह र्ह गार्िी कवि मुख की रक्षा करं तथा शारदा मेरे मिूढ़ं की रक्षा करं । िदै व िब प्रकार िे पत्रवि करने वाला हं । फद्वजान र्ज्ञत्रप्रर्ा पातु रिनार्ां िरस्वती। पुण्र्ं पत्रविं पापघ्नं िवारोग सनवारणम ्। िांख्र्ार्नी नासिका मं कपोलौ िंद्रहासिनी॥ त्रििडध्र्ं र्ः पठे द् त्रवद्वान ् िवाान ् कामानाप्नुर्ात ्॥ सिबुक वेदगभाा ि कण्ठं ं पात्वघनासशनी। िवाशास्त्राथातत्त्वज्ञ: ि भवेद् वेदत्रवत्तमः। स्तनौ मं पातु इडद्राणी हृदर् ब्रहमवाफदनी॥ िवा र्ज्ञ फलं पुण्र्ं ब्रह्माडते िमवाप्नुर्ात॥ उदरं त्रवश्व भोक्िी ि नाभौ पातु िुरत्रप्रर्ा। जघनं नारसिंही ि पृष्ठं ब्रहमाण्िधाररणी॥ अथाात: र्ह गार्िी कवि पुण्र्, पत्रवि, पापनाशक तथा पाश्वो मं पातु पद्माक्षी गुह्यगो पोस्प्िकाऽवतु। ं रोगं का सनवारण करने वाला हं । जो त्रवद्वान तीनं ऊवोड़् काररूपा ि जाडवो: िंध्र्ास्त्मकाऽवतु॥ (त्रििंध्र्ा) िमर् अथाात प्रातः, दोपहर एवं िंध्र्ा काल मं इि का पाठ करता हं , उिक िब मनोरथ सिद्ध हो जाते े अथाात: पज्ञत्रप्रर्ा मेरे दांतं की रक्षा करं । िरस्वती मेरी हं । वह िब शास्त्रं का तत्त्वज्ञ, जानकार, ज्ञाता तथा स्जह्वा की रक्षा करं । िांख्र्ार्नी मेरी नासिका की रक्षा
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    38 मई 2012 वेदवेत्ता हो जाता हं तथा िमस्त र्ज्ञं का फल प्राप्त त्रिनेिां सितवक्िां ि मुिाहार त्रवरास्जताम ्। करक अडत मं ब्रह्मपद को प्राप्त हो जाता हं । े वराऽभर्ांकशकशां हे म पािाक्षमासलकाम ्॥ ु शंख-िक्राऽब्ज-र्ुगलं कराभ्र्ां दधतीं पराम ्। जानकारो का कथन हं की गार्िी कवि का पाठ करने िे सित पंकज िंस्था ि हं िारुढां िुखास्स्मताम ् || पहले त्रवसनर्ोग तथा ध्र्ान करना असत आवश्र्क हं । अथाात: जो गार्िी दे वी पंिमुख वाली एवं दश भुजा र्ुि त्रवसनर्ोग क सलए दाफहने हाथ मं जल, रोली(कमकम), इि, े ु ु हं , स्जनकी कांसत करोिं िूर्ा क िमान हं तथा जो े अक्षत, सिक्का, पुष्प लेकर पढे ़ फफर जल को भूसम पर िात्रविी व ब्रह्मा को भी दे ने मं िमथा हं । जो करोिो छोि दं । िडद्रमाओं क िमान शीतल हं । स्जनक तीन नेि हं तथा े े मुख-मण्िल स्वच्छ हं । जो मुिाहार िे त्रवभूत्रषत हं । त्रवसनर्ोग: स्जनक दोनं हाथं मं वर, अभर्, अंकश, कशा, िवणा पाि, े ु ॐ अस्र् श्री गार्िी कविस्र् ब्रह्मा ऋत्रष गाार्िी छडदौ अक्षमाला, शंख, िक्र, ध्वज शोभार्मान हं , जो परब्रह्म गार्िी दे वता ॐ भू: बीजम ् भुव: शत्रि: स्व: कीलकम ् स्वरुत्रपणी हं जो श्वेत कमल क आिन पर त्रवराजमान हं । े गार्िी प्रीत्र्थे जपे त्रवसनर्ोग:। शुभ्रवणा हं ि स्जिका वाहन हं और स्जिक मुख-मण्िल े पर िदै व प्रिडनता र्ुि मुस्कान रहती हं । अब इि श्लोक िे गार्िी माताका ध्र्ान करे । ध्र्ान: ध्र्ात्वैवं मनिा्भोजे गार्िी कविम ् जपेत ्॥ पञ्िवक्िां दशभुजां िूर्ा कोफट िमप्रभम ्। अथाात: मस्स्तष्क-पटल पर माता गार्िी क स्वरुप का े िात्रविी ब्रह्मवरदां िडद्र कोफट-िुशीतलाम ्॥ ध्र्ान धारण कर कवि का पाठ करं । द्वादश महा र्ंि र्ंि को असत प्रासिन एवं दलभ र्ंिो क िंकलन िे हमारे वषो क अनुिंधान द्वारा बनार्ा गर्ा हं । ु ा े े  परम दलभ वशीकरण र्ंि, ु ा  िहस्त्राक्षी लक्ष्मी आबद्ध र्ंि  भाग्र्ोदर् र्ंि  आकस्स्मक धन प्रासप्त र्ंि  मनोवांसछत कार्ा सित्रद्ध र्ंि  पूणा पौरुष प्रासप्त कामदे व र्ंि  राज्र् बाधा सनवृत्रत्त र्ंि  रोग सनवृत्रत्त र्ंि  गृहस्थ िुख र्ंि  िाधना सित्रद्ध र्ंि  शीघ्र त्रववाह िंपडन गौरी अनंग र्ंि  शिु दमन र्ंि उपरोि िभी र्ंिो को द्वादश महा र्ंि क रुप मं शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे मंि सिद्ध पूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत एवं िैतडर् र्ुि फकर्े े जाते हं । स्जिे स्थापीत कर त्रबना फकिी पूजा अिाना-त्रवसध त्रवधान त्रवशेष लाभ प्राप्त कर िकते हं । GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
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    39 मई 2012 गार्िी कविम ् श्रीगणेशार् नमः। फदशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूत्रपणी ॥३॥ र्ाज्ञवल्क्र् उवाि! ऊध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वै ष्णवी तथा। स्वासमन ् िवाजगडनाथ िंशर्ोऽस्स्त महाडमम। एवं दश फदशो रक्षेत्िवातो भुवनेश्वरी ॥४॥ ितुःषत्रष्ठकलानां ि पातकानां ि तद्वद॥ तत्पदम ् पातु मे पादौ जंघे मे ित्रवतुः पदम ्। मुच्र्ते कन पुण्र्ेन ब्रह्मरूपं कथं भवेत ्। े वरे ण्र्म ् कफटदे शं तु नासभं भगास्तथैव ि ॥५॥ दे हश्च दे वतारूपो मडिरूपो त्रवशेषतः॥ ब्रह्मोवाि! दे वस्र् मे तु हृदर्ं धीमहीसत गलं तथा। क्रमतः श्रोतुसमच्छासम कविं त्रवसधपूवकम ्। ा सधर्ो मे पातु स्जह्वार्ां र्ः पदं पातु लोिने ॥६॥ ॐ अस्र् श्रीगार्िीकविस्र् ब्रह्मत्रवष्णुरुद्रा ऋषर्ः। ललाटे नः पदं पातु मूद्धाानं मे प्रिोदर्ात ्। ऋग्र्जुःिामाऽथवाास्ण छडदांसि। तद्वणाः पातु मूद्धाानं िकारः पातु भालकम ् ॥७॥ परब्रह्मस्वरूत्रपणी गार्िी दे वता। िक्षुषी मे त्रवकारस्तु श्रोिं रक्षेत्तु कारकः। भूः बीजम ्। भुवः शत्रिः। स्वः कीलकम ्। नािापुटे वकारो मे रे कारस्तु कपोलर्ोः ॥८॥ श्रीगार्िीप्रीत्र्थे जपे त्रवसनर्ोगः। स्णकारस्त्वधरोष्ठे ि र्ंकारस्त्वधरोष्ठक। े ॐ भूभवः स्वः तत्ित्रवतुररसत हृदर्ार् नमः। ुा आस्र्मध्र्े भकारस्तु गोकारस्श्चबुक तथा ॥९॥ े ॐ भूभवः स्वः वरे ण्र्समसत सशरिे स्वाहा। ुा दे कारः कण्ठदे शे ि वकारः स्कडधदे शर्ोः। ॐ भूभवः स्वः भगो दे वस्र्ेसत सशखार्ै वषट्। ुा स्र्कारो दस्क्षणं हस्तं धीकारो वामहस्तक ॥१०॥ े ॐ भूभुवः स्वः धीमहीसत कविार् हुम ्। ा मकारो हृदर्ं रक्षेत्रद्धकारो जठरं तथा। ॐ भूभवः स्वः सधर्ो र्ो नः इसत नेििर्ार् वौषट्। ुा सधकारो नासभदे शं तु र्ोकारस्तु कफटद्वर्म ् ॥११॥ ॐ भूभवः स्वः प्रिोदर्ाफदसत अस्त्रार् फट्। ुा गुह्यम ् रक्षतु र्ोकार ऊरु मे नः पदाक्षरम ् । अथ ध्र्ानम ्। प्रकारो जानुनी रक्षेच्िोकारो जंघदे शर्ोः ॥१२॥ मुिात्रवद्रमहे मनील धवलच्छार्ैमुखस्त्रीक्षणै ु ा ै दकारो गुल्फदे शं तु र्ात्कारः पादर्ुग्मकम ्। र्ुिासमडदसनबद्धरत्नमुकटां तत्त्वाथावणाास्त्मकाम ्। ा ु ु जातवेदेसत गार्िी त्र्र््बकसत दशाक्षरा ॥१३॥ े गार्िीं वरदाभर्ाङ्कशकशां शुभ्रं कपालं गुणं ु िवातः िवादा पातु आपोज्र्ोतीसत षोिशी। शंख, िक्रमथारत्रवडदर्ुगलं हस्तैवहडतीं भजे॥ ु ा इदम ् तु कविं फदव्र्ं बाधाशतत्रवनाशकम ् ॥१४॥ ॐ गार्िी पूवतः पातु िात्रविी पातु दस्क्षणे। ा ितुःषत्रष्ठकलात्रवद्यािकलैश्वर्ासित्रद्धदम ्। ब्रह्मत्रवद्या तु मे पश्चादत्तरे मां िरस्वती ॥१॥ ु जपार्भे ि हृदर्ं जपाडते कविं पठे त ् ॥१५॥ पावकीं ि फदशं रक्षेत्पावकोज्ज्वलशासलनी। स्त्रीगोब्राह्मणसमिाफदद्रोहाद्यस्खलपातकः। ै र्ातुधानीं फदशं रक्षेद्यातुधानगणाफदा नी ॥२॥ मुच्र्ते िवापापेभ्र्ः परं ब्रह्मासधगच्छसत ॥१६॥ पावमानीं फदशं रक्षेत्पवमानत्रवलासिनी। ॥ इसत श्रीमद्वसिष्ठिंफहतार्ां गार्िीकविं ि्पूणम ् ॥ ा
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    40 मई 2012 गार्िी िुप्रभातम ् श्री पातूरर िीतारामांजनेर्ुलु कृ त मडद्रस्वरे ण मधुरेण ि मध्र्मेन। सनत्र्ाऽसि दे त्रव भवती सनस्खले प्रपञ्िे ॥श्रीरस्तु ॥ गानास्त्मक सनस्खललोक मनोज्ञ भावे े वडद्याऽसि िवा भुवनैः िततोद्यतासि। श्री जासनरफद्रतनर्ापसतरब्जगभाः गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुपभातम ् ॥१०॥ धी प्रेररकाऽसि भुवनस्र् िरािरस्र् िवे ि दै वतगणाः िमहषार्ोऽमी। पापाटवी दहन जागृत मानिा त्वम ् गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२०॥ ऐते भूतसनिर्ाः िमुदीरर्स्डत भिौघ पालन सनरं तर दीस्क्षताऽसि। वडदामहे भगवतीम ् भवतीम ् भवास्ब्ध गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१॥ त्वय्र्ेव त्रवश्वमस्खलम ् स्स्थरतामुपैसत िडताररणीम ् त्रिकरणैः करुणामृताब्दे । पुष्पोच्िर् प्रत्रवलित्कर कजर्ुग्माम ् ं गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥११॥ ि्पश्र् सिडमर्तनो करुणाद्रा दृष्ट्र्ा गंगाफदफदव्र् तफटनीवरतीरदे शे। र्ा वैफदकी सनस्खल पावन पावनी वाक् गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२१॥ ष्वघ्र्ाम ् िमपासर्तुमिजनास्तवैते र्ा लौफककी व्र्वहृसत प्रवणा जनानाम ्। त्वम ् मातृकामर्तनुः परम प्रभावा गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२॥ र्ा काव्र्रूप कसलता तव रूप मेताः त्वय्र्ेव दे त्रव परमः पुरुषः पुराणः। कणेमतम ् त्रवफकरता स्वरिंिर्ेन ृ गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१२॥ त्वत्तः िमस्त भुवनासन िमुल्लिस्डत िवे फद्वजाः श्रुसतगणम ् िमुदीरर्स्डत। फदव्र्म ् त्रवमानमसधरुह्य नभोङ्गणेऽि गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२२॥ पश्र्ाश्रमािथ वृक्षतलेषु दे त्रव गार्स्डत फदव्र् मफहमानसममे भवत्र्ाः। त्वम ् वै प्रिूसनास्खलदे वगणस्र् दे त्रव गार्सत लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥४॥ पश्र् प्रिीद सनिर्ा फदत्रवजाङ्गनानाम ् त्वम ् स्तूर्िे त्रिषवणम ् सनस्खलैश्च लोकः। ै गावो महत्रषासनिर्ाश्रम भूसमभागात ् गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१३॥ त्वम ् दे श काल परमाथा पररस्फटासि ु गडतुम ् वनार् शनकः शनकः प्रर्ास्डत। ै ै है मीम ् रुिम ् िकल भूसमरुहाग्रदे शे गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२३॥ वत्िान ् पर्ोऽमृतरिम ् ननु पार्सर्त्र्ा ष्वाधार् तत्कृ त परोपकृ तौ प्रिडनः। त्वम ् गासधिूनु परमत्रषा वरे ण दृष्टा गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥४॥ भानुः करोत्र्विरे कनकासभषेकम ् तेजोमर्ी ित्रवतुरात्ममर्ास्खलाथाा। सशष्र् प्रबोधनपरा वर मौसन मुख्र्ाः गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१४॥ िवााथदा प्रणत भि जनस्र् शश्वत ् ा व्र्ाख्र्ास्डत वेदगफदतम ् स्फट ु धमा फदव्र्ापगािु िरिीषु वनी सनकङ्जे ु गार्त्रि लोकत्रवनुतो तव िुप्रभातम ् ॥२४॥ ततत्त्वम ्। स्वीर्ाश्रमाङ्गणतलेषु मनोहरे षु षूच्िाविासन किुमासन मनोहरास्ण। ु िंकल्प्र् लोकमस्खलम ् मनिैव िूषे गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥५॥ पुल्लासन िस्डत पररतस्तव पूजनार् कारुण्र्भाव कसलताऽवसि लोकमाता। श्रोिामृतम ् श्रुसतरवम ् कलर्डत एते गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१५॥ कोपास्डवता तमस्खलम ् करुषे प्रलीनम ् ु त्रवस्मृत्र् गडतुमटवीम ् फललाभलोभात ्। कवास्डत पस्क्षसनिर्ाः कलगानमेते ु गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२५॥ वृक्षाग्र भूसमषु वनेषु लिस्डत कीराः वृक्षाग्रमुडनत ् तरािनमाश्रर्डतः। मुिाभ त्रवद्रम िुवणा महे डद्र नील ु गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥६॥ दे त्रव त्वदीर् मफहमानमुदीरर्डतो श्वेतप्रभैर ् भुवन रक्षण बुत्रद्ध दीक्षैः। मूसता िर्ात्मकसलते सनगम िर्ेण गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१६॥ वक्िैर्ते सनगम मातरुदारित्त्वे ुा वेद्ये स्वरिर् पररस्फट मडतरूपे। ु त्रवश्वेसश त्रवष्णुभसगसन श्रुसतवाक्स्वरूपे गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२६॥ तत्त्वप्रबोधनपरोपसनषत्प्रपञ्िे तडमात्रिक सनस्खलमडतमर्स्वरूपे। े कारुण्र् वीसि सनिर्ामल कास्डत काडताम ् गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥७॥ गानास्त्मक सनस्खलतत्त्वसनजस्वरूपे े ब्रह्माफद िवा फदत्रवजेड्र् महाप्रभावाम ्। त्रवश्वास्त्मक सनगमशीषावतंिरूपे े गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१७॥ प्रीत्र्ा प्रिारर् दृशम ् मसर् लोकमातः िवाागमाडतरुफदते वरतैजिात्मन ्। तेजोमसर् त्रिभुवनावनििसित्ते गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२७॥ प्राज्ञास्त्मक िृजनपोषणिंहृसतस्थे े िडधास्त्मक िकल काल कला स्वरूपे। े श्री लक्ष्मणाफद गुरु ित्करुणैकलब्ध गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥८॥ मृत्र्ुंजर्े जसर्सन सनत्र्सनरं तरात्मन ् त्रवद्या त्रवनीत मसतर्ानर् माङनेर्ः। तुर्ाास्त्मक िकलतत्त्वगणानतीते े गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१८॥ िंिेवतेऽिभवतीम ् भुवतीम ् विोसभः आनंदभोगकसलते परमाधादत्रि त्वामेव दे त्रव पररतो सनस्खलासन तडिा गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥२८॥ ब्रह्मानुभूसतवरदे िततम ् जनानाम ्। ण्र्ाभासत तत्त्वमस्खलम ् भवतीम ् त्रववृण्वत ्। ॥ इसत िीतारामाङ्जनेर् कत्रव कृ त गार्िी गार्त्रि लोकत्रवनुते िुप्रभातम ् ॥९॥ त्वम ् िवादाऽसि तरुणारुणफदव्र्दे हे िुप्रभातम ् ॥ तारस्वरे ण मधुरम ् पररगीर्माने गार्त्रि लोकत्रवनुते तव िुप्रभातम ् ॥१९॥
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    41 मई 2012 गार्िीरहस्र्ोपसनषत ् ॥ गार्िीरहस्र्ोपसनषत ् ॥ धीमहीत्र्डतरात्मा । सधर् इत्र्डतरात्मा परः । ॐ स्वस्स्त सिद्धम ् । ॐ नमो ब्रह्मणे । र् इसत िदासशवपुरुषः । नो इत्र्स्माक स्वधमे । ं ॐ नमस्कृ त्र् र्ाज्ञवल्क्र् ऋत्रषः स्वर्ंभुवं पररपृच्च्हसत । प्रिोदर्ाफदसत प्रिोफदत काम इमान ् लोकान ् हे ब्रह्मन ् गार्त्र्र्ा उत्पत्रत्तः श्रोतुसमच्च्हासम । प्रत्र्ाश्रर्ते र्ः परो धमा इत्र्ेषा गार्िी । अथातो वसिष्ठः स्वर्ंभुवं पररपृच्च्हसत । िा ि फक गोिा कत्र्क्षरा कसतपादा । कसत कक्षर्ः । ं ु र्ो ब्रह्मा ि ब्रह्मोवाि । कासन शीषाास्ण । िांख्र्ार्नगोिा ि ितुत्रवंशत्र्क्षरा ब्रह्मज्ञानोत्पत्तेः प्रकृ सतं व्र्ाख्र्ास्र्ामः । गार्िी त्रिपादा ितुष्पादा । पुनस्तस्र्ाश्चत्वारः पादाः को नाम स्वर्ंभू पुरुष इसत । षट् कस्क्षकाः पञ्ि शीषाास्ण भवस्डत । ु तेनाङ्गुलीमथ्र्मानात ् िसललमभवत ् । क ि पादाः काश्च कक्षर्ः कासन शीषाास्ण । े ु िसललात ् फनमभवत ् । फनाद्बद्बदमभवत ् । े े ु ु ऋग्वेदोऽस्र्ाः प्रथमः पादो भवसत। र्जुवदो फद्वतीर्ः पादः। े बुद्बदादण्िमभवत ् । अण्िाद्ब्रह्माभवत ् । ु िामवेदस्तृतीर्ः पादः । अथवावेदश्चतुथः पादः । ा ब्रह्मणो वार्ुरभवत ् । वार्ोरस्ग्नरभवत ् । पूवाा फदक् प्रथमा कस्क्षभावसत। दस्क्षणा फद्वतीर्ा कस्क्षभावसत। ु ु अग्नेरोङ्कारोऽभवत ् । ओङ्काराद्व्र्ानऱृसतरभवत ् । पस्श्चमा तृतीर्ा कस्क्षभावसत । उत्तरा ितुथी कस्क्षभावसत । ु ु व्र्ानऱृत्र्ा गार्त्र्र्भवत ् ।गार्त्र्र्ा िात्रवत्र्र्भवत ् । ऊध्वं पञ्िमी कस्क्षभावसत । अधः षष्ठी कस्क्षभावसत । ु ु िात्रवत्र्र्ा िरस्वत्र्भवत ् । िरस्वत्र्ा िवे वेदा अभवन ् । व्र्ाकरणोऽस्र्ाः प्रथमः शीषो भवसत । सशक्षा फद्वतीर्ः। िवेभ्र्ो वेदेभ्र्ः िवे लोका अभवन ् । कल्पस्तृतीर्ः। सनरुिश्चतुथः। ज्र्ोसतषामर्नसमसत पञ्िमः। ा िवेभ्र्ो लोकभ्र्ः िवे प्रास्णनोऽभवन ् । े का फदक् को वणाः फकमार्तनं कः स्वरः फक लक्षणम ्। ं कासन अक्षरदै वतासन क ऋषर्ः कासन च्हडदांसि का शिर्ः अथातो गार्िी व्र्ाहृतर्श्च प्रवताडते । कासन तत्त्वासन क िावर्वाः । े का ि गार्िी काश्च व्र्ाहृतर्ः । पूवाार्ां भवतु गार्िी । मध्र्मार्ां भवतु िात्रविी । फक भूः फक भुवः फक िुवः फक महः फक जनः फक तपः ं ं ं ं ं ं पस्श्चमार्ां भवतु िरस्वती । फक ित्र्ं फक तत ् फक ित्रवतुः फक वरे ण्र्ं फक भगाः ं ं ं ं ं रिा गार्िी । श्वेता िात्रविी । कृ ष्णा िरस्वती । फक दे वस्र् फक धीमफह फक सधर्ः फक र्ः फक नः फक ं ं ं ं ं ं पृसथव्र्डतररक्षं द्यौरार्तनासन । प्रिोदर्ात ् । अकारोकारमकाररूपोदात्ताफदस्वरास्त्मका । ॐ भूररसत भुवो लोकः । भुव इत्र्डतररक्षलोकः । स्वररसत पूवाा िडध्र्ा हं िवाफहनी ब्राह्मी । स्वगालोकः । मध्र्मा वृषभवाफहनी माहे श्वरी । मह इसत महलोकः । जन इसत जनोलोकः । तप इसत पस्श्चमा गरुिवाफहनी वैष्णवी । तपोलोकः । ित्र्समसत ित्र्लोकः । पूवााह्णकासलका िडध्र्ा गार्िी कमारी ु तफदसत तदिौ तेजोमर् तेजोऽस्ग्नदे वता । रिा रिाङ्गी रिवासिनी रिगडधमाल्र्ानुलेपनी ित्रवतुररसत ित्रवता िात्रविमाफदत्र्ो वै । वरे ण्र्समत्र्ि पाशाकशाङ्क्षमालाकमण्िलुवरहस्ता हं िारूढा ब्रह्मदै वत्र्ा ु प्रजापसतः । ऋग्वेदिफहता आफदत्र्पथगासमनी भूमण्िलवासिनी । भगा इत्र्ापो वै भगाः । दे वस्र् इतीडद्रो दे वो द्योतत इसत मध्र्ाह्नकासलका िडध्र्ा िात्रविी र्ुवती श्वेताङ्गी ि इडद्रस्तस्मात ् िवापुरुषो नाम रुद्रः । श्वेतवासिनीश्वेतगडधमाल्र्ानुलेपनी त्रिशूलिमरुहस्ता
  • 42.
    42 मई 2012 वृषभारूढा रुद्रदै वत्र्ार्जुवेदिफहता आफदत्र्पथगासमनी सित्तज्ञानानीसत प्रत्र्क्षराणां तत्त्वासन प्रतीर्डते । भुवोलोक व्र्वस्स्थता । े ि्पकातिीकङ्कमत्रपङ्गलेडद्रनीलास्ग्नप्रभोद्यत्िूर्ा ु ु िार्ं िडध्र्ा िरस्वती वृद्धा कृ ष्णाङ्गी कृ ष्णवासिनी त्रवद्युत्तारकिरोजगौरमरतकशुक्लकडदे डदशङ्खपाण्िु ु ु कृ ष्णगडधमाल्र्ानुलेपना शङ्खिक्रगदाभर्हस्ता नेिनीलोत्पलिडदनागुरुकस्तूरीगोरोिनघनिारिस्डनभं गरुिारूढा त्रवष्णुदैवत्र्ा िामवेदिफहता आफदत्र्पथगासमनी प्रत्र्क्षरमनुस््ऱृत्र् िमस्तपातकोपपातकमहापातका स्वगालोकव्र्वस्स्थता । ग्र्ागमनगोहत्र्ाब्रह्महत्र्ाभ्रूणहत्र्ावीरहत्र्ा अस्ग्नवार्ुिूर्रूपावहनीर्गाहा पत्र्दस्क्षणास्ग्नरूपा ा ऋग्र्जु पुरुषहत्र्ाऽजडमकृ तहत्र्ास्त्रीहत्र्ागुरुहत्र्ात्रपतृहत्र्ा िामरूपा भूभवःस्वररसत व्र्ाहृसतरूपा प्रातमाध्र्ाह्न तृतीर् ुा प्राणहत्र्ािरािरहत्र्ाऽभक्ष्र्भक्षणप्रसतग्रह िवनास्त्मका ित्त्वरजस्तमोगुणास्त्मका जाग्रत्स्वप्न िुषुप्त स्वकमा त्रवच्च्हे दनस्वा्र्ासताहीनकमाकरणपरधनापहरण रूपा विुरुद्राफदत्र्रूपा गार्िीत्रिष्टु ब्जगतीरूपा ब्रह्मशङ्करत्रवष्णु शूद्राडन भोजनशिुमारणिण्िालीगमनाफदिमस्त रूपेच्च्हाज्ञानफक्रर्ाशत्रिरूपा स्वरास्ड्वराड्वषड्ब्रह्मरूपेसत | पापहरणाथं िंस्मरे त ् । प्रथममाग्नेर्ं फद्वतीर्ं प्राजापत्र्ं तृतीर्ं िौ्र्ं ितुथमीशानं ा मूधाा ब्रह्मा सशखाडतो त्रवष्णुललाटं रुद्रिक्षुषी िडद्राफदत्र्ौ ा पञ्िममाफदत्र्ं षष्ठं गाहा पत्र्ं िप्तमं मैिमष्टमं भगदै वतं कणौ शुक्रबृहस्पती नािापुटे अस्श्वनौ दडतोष्ठावुभे िडध्र्े नवममार्ामणं दशमं िात्रविमेकादशं त्वाष्ट्रं द्वादशं पौष्णं मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादर्ो हृदर्ं पजाडर् उदरमाकाशो िर्ोदशमैद्राग्नं ितुदाशं वार्व्र्ं पञ्िदशं वामदे वं षोिषं नासभरस्ग्नः मैिावरुणं िप्तदशं भ्रातृव्र्मष्टादशं वैष्णवमेकोनत्रवंशं वामनं कफटररडद्राग्नी जघनं प्राजापत्र्मूरू कलािमूलं ै जानुनी त्रवंशं वैश्वदे वमेकत्रवंशं रौद्रं द्वात्रवंशं कौबेरं िर्ोत्रवंशमास्श्वनं त्रवश्वेदेवौ जङ्घे सशसशरः गुल्फासन पृसथवीवनस्पत्र्ादीसन ितुत्रवंशं ब्राह्मसमसत प्रत्र्क्षरदै वतासन । नखासन महती अस्थीसन नवग्रहा अिृक्कतुमांिमृतिडधर्ः े ु प्रथमं वासिष्ठं फद्वतीर्ं भारद्वाजं तृतीर्ं गाग्र्ं ितुथमुप- ा कालद्वर्ास्फालनं िंवत्िरो सनमेषोऽहोरािसमसत वाग्दे वीं मडर्वं पञ्िमं भागावं षष्ठं शास्ण्िल्र्ं िप्तमं लोफहतमाष्टमं गार्िीं शरणमहं प्रपद्ये । वैष्णवं नवमं शातातपं दशमं िनतकमारमेकादशं वेदव्र्ािं ु र् इदं गार्िीरहस्र्मधीते तेन क्रतुिहस्रसमष्टं भवसत । द्वादशं शुक िर्ोदशं पाराशर्ं ितुदाशं पौण्रक पञ्िदशं क्रतुं ं ं र् इदं गार्िीरहस्र्मधीते फदविकृ तं पापं नाशर्सत । षोिशं दाक्षं िप्तदशं काश्र्पमष्टादशमािेर्म ् एकोन प्रातरमध्र्ाह्नर्ोः षण्मािकृ तासन पापासन नाशर्सत । त्रवंशमगस्त्र्ं त्रवंशमौद्दालकमेकत्रवंशमास्ङ्गरिं द्वात्रवंशं िार्ं प्रातरधीर्ानो जडमकृ तं पापं नाशर्सत । नासमकतुं िर्ोत्रवंशं मौद्गल्र्ं ितुत्रवंशमास्ङ्गरि वैश्वासमि े र् इदं गार्िीरहस्र्ं ब्राह्मणः पठे त ् तेन गार्त्र्र्ाः समसत प्रत्र्क्षराणामृषर्ो भवस्डत । षत्रष्टिहस्रलक्षास्ण जप्तासन भवस्डत । िवाान ् वेदानधीतो गार्िी त्रिष्टु ब्जगत्र्नुष्टुप्क्षद्वपस्ङ्ि बृहत्र्ुस्ष्णगफदसतररसत भवसत । त्रिरावृत्तेन च्हडदांसि प्रसतपाद्यडते । प्रह्लाफदनी प्रज्ञात्रवश्वभद्रा िवेषु तीथेषु स्नातो भवसत । अपेर्पानात ् पूतो भवसत । त्रवलासिनी प्रभा शाडता मा कास्डत स्पशाा दगाा िरस्वती ु अभक्ष्र्भक्षणात ् पूतो भवसत। वृषलीगमनात ् पूतो भवसत । त्रवरूपा त्रवशालाक्षी शासलनी व्र्ात्रपनी त्रवमला अब्रह्मिारी ब्रह्मिारी भवसत । तमोऽपहाररणीिूक्ष्मावर्वा पद्मालर्ा त्रवरजा त्रवश्वरूपा भद्रा पस्ङ्िषु िहस्रपानात ् पूतो भवसत । कृ पािवातोमुखीसत ितुत्रवंशसतशिर्ो सनगद्यडते । अष्टौ ब्राह्मणान ् ग्राहसर्त्वा ब्रह्मलोक ि गच्च्हसत । ं पृसथव्र्प्तेजो वाय्वाकाशगडधरिरूपस्पशाशब्दवाक्र्ासन इत्र्ाह भगवान ् ब्रह्मा ॥ पादपार्ूपस्थत्वक्क्षद्विक्षुश्रोिस्जह्वाघ्राणमनोबुद्ध्र्हङ्कार इसत गार्िीरहस्र्ोपसनषत ् िमाप्ता ॥
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    43 मई 2012 गार्िी मडिाथाः िाथा अथ िवादेवात्मनः िवाशिः े िवाावभािकतेजोमर्स्र् परमात्मनः िवाात्मकत्वद्योतनाथं िवाात्मकत्वप्रसतपादक गार्िीमहामडिस्र्ोपािनप्रकारः प्रकाश्र्ते । ति गार्िीं प्रणवाफदिप्तव्र्ाहृत्र्ुपेतां सशरःिमेतां िवावेदिारसमसत वदस्डत।, एवंत्रवसशष्टा गार्िी प्राणार्ामैरुपास्र्ा । िप्रणव व्र्ाहृसतिर्ोपेता प्रणवाडता गार्िी जपाफदसभरुपास्र्ा । ति शुद्धगार्िी प्रत्र्ग्ब्रह्मैक्र्बोसधका । सधर्ो र्ो नः प्रिोदर्ाफदसत नः अस्माक सधर्ः बुत्रद्धः र्ः प्रिोदर्ात ् प्रेरर्ेत ् इसत ं िवाबुत्रद्ध िंज्ञाडतःकरणप्रकाशकः िवािाक्षी प्रत्र्गात्मा उच्र्ते । तस्र् प्रिोदर्ाच्छब्दसनफदा ष्टस्र्ात्मनः स्वरूपभूतं परं ब्रह्म तत्ित्रवतुररत्र्ाफदपदै सनाफदा श्र्ते । ति "ॐ तत्िफदसत सनदे शो ब्रह्मणस्स्त्रत्रवधःस्मृतः " इसत तच्छब्दे न प्रत्र्ग्भूतं स्वतःसिद्धं परं ब्रह्मोच्र्ते । ित्रवतुररसत िृत्रष्टस्स्थसतलर् लक्षणकस्र् िवाप्रपञ्िस्र् िमस्तद्वै तत्रवभ्रमस्र्ासधष्ठानं लक्ष्र्ते । वरे ण्र्समसत िवावरणीर्ं सनरसतशर्ानडदरूपम ् । भगा इत्र्त्रवद्याफद दोषभजानात्मकज्ञानैकत्रवषर्म ् । दे वस्र्ेसत िवाद्योतनात्मकाखण्ि सिदे करिम ् । ित्रवतुदेवस्र्ेत्र्ि षष्ठ्र्थो राहोः सशर इसतवदौपिाररकः बुद्ध्र्ाफदिवादृश्र्िास्क्षलक्षणं र्डमे स्वरूपं तत्िवाासधष्ठानभूतं परमानडदं सनरस्तिमस्तानथारूपं स्वप्रकाशसिदात्मक ब्रह्मेत्र्ेवं धीमफह ध्र्ार्ेम । ं एवं िसत िह ब्रह्मणा स्वत्रववताजिप्रपञ्िस्र् रज्जुिपाडर्ार्ेन अपवाद िामानासधकरण्र्रूपमेकत्वं।, िोऽर्समसत डर्ार्ेन िवािास्क्षप्रत्र्गात्मनो ब्रह्मणा िह तादात््र्रूपमेकत्वं भवतीसत िवाात्मकब्रह्मबोधकोऽर्ं गार्िीमडिः िंपद्यते । िप्तव्र्ाहृसतनामर्मथाःभूररसत िडमािमुच्र्ते भुव इसत िवं भावर्सत प्रकाशर्तीसत व्र्ुत्पत्त्र्ा सिद्रपमुच्र्ते । िुत्रव्रर्त इसत ू व्र्ुत्पत्त्र्ा िुष्ठु िवैत्रव्रार्माणिुखस्वरूपमुच्र्ते । मह इसत महीर्ते पूज्र्त इसत व्र्ुत्पत्त्र्ा िवाासतशर्त्वमुच्र्ते । जन इसतजनर्तीसत जनः। िकल कारणत्वमुच्र्ते । तप इसत िवातेजोरूपत्वम ् । ित्र्समसत िवाबाधरफहतम ् । एतदि ु ं भवसतर्ल्लोक िद्रपं तदंकारवाच्र्ं ब्रह्मैव। आत्मनोऽस्र् िस्च्िद्रपस्वभावाफदसत । अथ भूरादर्ः िवालोका ओंकारावाच्र् े ू ू ब्रह्मात्मकाः। न तद्व्र्सतररि फकसिदस्तीसत व्र्ाहृतर्ोऽत्रप िवाात्मक ब्रह्मबोसधकाः। ं ं गार्िीसशरिोऽप्र्र्मेवाथाः आप इत्र्ाप्नोतीसत व्र्ुत्पत्त्र्ा व्र्ात्रपत्वमुच्र्ते ज्र्ोसतररसत प्रकाशरूपत्वम ् । रि इसत िवाासतशर्त्वम ् । अमृतसमसत मरणाफद िंिारसनमुित्वम ् ा । िवाव्र्ात्रपिवाप्रकाशकिवोत्कृ ष्टसनत्र्मुिमात्मरूपं िस्च्िदात्मक र्दंकारवाच्ग्र्ं ब्रह्म तदहमस्स्म । ं स्फफटक गणेश इसत गार्िीमडिस्र्ाथाः । स्फफटक ऊजाा को कफद्रत करने मं िहार्ता मानागर्ा ं गुहाशर्ब्रह्महुताशनोऽहं किेदमंशाख्र् हत्रवहुातं ित। हं । इि क प्रभाव िे र्ह व्र्त्रि को नकारात्मक उजाा े िे बिाता हं एवं एक उत्तम गुणवत्ता वाले स्फफटक िे त्रवलीर्ते नेदमहं भवानी त्र्ेष प्रकारस्तु त्रवसभद्यतेऽि ॥ बनी गणेश प्रसतमा को और असधक प्रभावी और पत्रवि र्दस्स्त र्द्भासत तदात्मरूपं नाडर्त्ततो भासत न िाडर्दस्स्त । माना जाता हं । RS-550 िे RS-8200 तक स्वभाविंत्रवत्प्रत्रवभासत कवला ग्राह्यं ग्रहीतेसत मृषैव कल्पना ॥ े
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    44 मई 2012 श्री गार्िी फदव्र् िहस्रनाम स्तोिम ् श्रीगणेशार् नमः । ित्कीसतास्िास्त्वका िाध्वी िस्च्िदानडदरूत्रपणी । िङ्कल्परूत्रपणी िडध्र्ा िालग्रामसनवासिनी ॥१४॥ ध्र्ानम ् िवोपासधत्रवसनमुिा ित्र्ज्ञानप्रबोसधनी । ा रिश्वेतफहरण्र्नीलधवलैर्िां त्रिनेिोज्ज्वलां ुा त्रवकाररूपा त्रवप्रश्रीत्रवाप्राराधनतत्परा ॥१५॥ रिारिनवस्रजं मस्णगणैर्ुिां कमारीसममाम ्। ा ु त्रवप्रप्रीत्रवाप्रकल्र्ाणी त्रवप्रवाक्र्स्वरूत्रपणी । गार्िी कमलािनां करतलव्र्ानद्धकण्िा्बुजां ु त्रवप्रमस्डदरमध्र्स्था त्रवप्रवादत्रवनोफदनी ॥१६॥ पद्माक्षीं ि वरस्रजञ्ि दधतीं हं िासधरूढां भजे॥ त्रवप्रोपासधत्रवसनभेिी त्रवप्रहत्र्ात्रवमोिनी । ॐ तत्काररूपा तत्वज्ञा तत्पदाथास्वरूत्रपस्ण । त्रवप्रिाता त्रवप्रगोिा त्रवप्रगोित्रववसधानी ॥१७॥ तपस्स्व्र्ाध्र्ार्सनरता तपस्स्वजननडनुता ॥१॥ त्रवप्रभोजनिडतुष्टा त्रवष्णुरूपा त्रवनोफदनी । तत्कीसतागुणि्पडना तथ्र्वाक्ि तपोसनसधः। त्रवष्णुमार्ा त्रवष्णुवडद्या त्रवष्णुगभाा त्रवसित्रिणी ॥१८॥ तत्वोपदे शि्बडधा तपोलोकसनवासिनी ॥२॥ वैष्णवी त्रवष्णुभसगनी त्रवष्णुमार्ात्रवलासिनी । तरुणाफदत्र्िङ्काशा तप्तकाञ्िनभूषणा । त्रवकाररफहता त्रवश्वत्रवज्ञानघनरूत्रपणी ॥१९॥ तमोपहाररस्ण तडिी ताररस्ण ताररूत्रपस्ण ॥३॥ त्रवबुधा त्रवष्णुिङ्कल्पा त्रवश्वासमिप्रिाफदनी । तलाफदभुवनाडतस्था तकशास्त्रत्रवधासर्नी । ा त्रवष्णुितडर्सनलर्ा त्रवष्णुस्वा त्रवश्विास्क्षणी ॥२०॥ ै तडििारा तडिमाता तडिमागाप्रदसशानी ॥४॥ त्रववेफकनी त्रवर्द्रपा त्रवजर्ा त्रवश्वमोफहनी । ू तत्वा तडित्रवधानज्ञा तडिस्था तडििास्क्षस्ण । त्रवद्याधरी त्रवधानज्ञा वेदतत्वाथारूत्रपणी ॥२१॥ तदे कध्र्ानसनरता तत्वज्ञानप्रबोसधनी ॥५॥ त्रवरूपाक्षी त्रवराड्रूपा त्रवक्रमा त्रवश्वमङ्गला । तडनाममडििुप्रीता तपस्स्वजनिेत्रवता । त्रवश्व्भरािमाराध्र्ा त्रवश्वभ्रमणकाररणी ॥२२॥ िाकाररूपा िात्रविी िवारूपा िनातनी ॥६॥ त्रवनार्की त्रवनोदस्था वीरगोष्ठीत्रववसधानी । िंिारदःखशमनी िवार्ागफलप्रदा । ु त्रववाहरफहता त्रवडध्र्ा त्रवडध्र्ािलसनवासिनी ॥२३॥ िकला ित्र्िङ्कल्पा ित्र्ा ित्र्प्रदासर्नी ॥७॥ त्रवद्यात्रवद्याकरी त्रवद्या त्रवद्यात्रवद्याप्रबोसधनी । िडतोषजननी िारा ित्र्लोकसनवासिनी । त्रवमला त्रवभवा वेद्या त्रवश्वस्था त्रवत्रवधोज्ज्वला ॥२४॥ िमुद्रतनर्ाराध्र्ा िामगानत्रप्रर्ा िती ॥८॥ वीरमध्र्ा वरारोहा त्रवतडिा त्रवश्वनासर्का । िमानी िामदे वी ि िमस्तिुरिेत्रवता । वीरहत्र्ाप्रशमनी त्रवनम्रजनपासलनी ॥२५॥ िवाि्पत्रत्तजननी िद्गणा िकलेष्टदा ॥९॥ ु वीरधीत्रवात्रवधाकारा त्रवरोसधजननासशनी । िनकाफदमुसनध्र्ेर्ा िमानासधकवस्जाता । तुकाररूपा तुर्श्रीस्तुलिीवनवासिनी ॥२६॥ ा िाध्र्ा सिद्धा िुधावािा सित्रद्धस्िाध्र्प्रदासर्नी ॥१०॥ तुरङ्गी तुरगारूढा तुलादानफलप्रदा । िद्युगाराध्र्सनलर्ा िमुत्तीणाा िदासशवा । तुलामाघस्नानतुष्टा तुत्रष्टपुत्रष्टप्रदासर्नी ॥२७॥ िवावेदाडतसनलर्ा िवाशास्त्राथागोिरा ॥११॥ तुरङ्गमप्रिडतुष्टा तुसलता तुल्र्मध्र्गा । िहस्रदलपद्मस्था िवाज्ञा िवातोमुखी । तुङ्गोत्तुङ्गा तुङ्गकिा तुफहनािलिंस्स्थता ॥२८॥ ु िमर्ा िमर्ािारा िदिद्ग्रस्डथभेफदनी ॥१२॥ तु्बुराफदस्तुसतप्रीता तुषारसशखरीश्वरी । िप्तकोफटमहामडिमाता िवाप्रदासर्नी । तुष्टा ि तुत्रष्टजननी तुष्टलोकसनवासिनी ॥२९॥ िगुणा ि्भ्रमा िाक्षी िवाितडर्रूत्रपणी ॥१३॥ ै तुलाधारा तुलामध्र्ा तुलस्था तुर्रूत्रपणी । ा
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    45 मई 2012 तुरीर्गुणग्भीरा तुर्नादस्वरूत्रपणी ॥३०॥ ा रस्ञ्जता राजजननी र्र्ा राकडदमध्र्गा ॥४७॥ े ु तुर्त्रवद्यालास्र्तुष्टा तूर्शास्त्राथावाफदनी । ा ा रात्रवणी रासगणी रञ्ज्र्ा राजराजेश्वरासिाता । तुरीर्शास्त्रतत्वज्ञा तूर्नादत्रवनोफदनी ॥३१॥ ा राजडवती राजनीती रजतािलवासिनी ॥४८॥ तूर्नादाडतसनलर्ा तूर्ाानडदस्वरूत्रपणी । ा राघवासिातपादश्री राघवा राघवत्रप्रर्ा । तुरीर्भत्रिजननी तुर्मागाप्रदसशानी ॥३२॥ ा रत्ननूपुरमध्र्ाढ्र्ा रत्नद्वीपसनवासिनी ॥४९॥ वकाररूपा वागीशी वरे ण्र्ा वरिंत्रवधा । रत्नप्राकारमध्र्स्था रत्नमण्िपमध्र्गा । वरा वररष्ठा वैदेही वेदशास्त्रप्रदसशानी ॥३३॥ रत्नासभषेकिडतुष्टा रत्नाङ्गी रत्नदासर्नी ॥५०॥ त्रवकल्पशमनी वाणी वास्ञ्छताथाफलप्रदा । स्णकाररूत्रपणी सनत्र्ा सनत्र्तृप्ता सनरञ्जना । वर्स्था ि वर्ोमध्र्ा वर्ोवस्थात्रववस्जाता ॥३४॥ सनद्रात्र्र्त्रवशेषज्ञा नीलजीमूतिस्डनभा ॥५१॥ वस्डदनी वाफदनी वर्ाा वाङ्मर्ी वीरवस्डदता । नीवारशूकवत्तडवी सनत्र्कल्र्ाणरूत्रपणी । वानप्रस्थाश्रमस्था ि वनदगाा वनालर्ा ॥३५॥ ु सनत्र्ोत्िवा सनत्र्पूज्र्ा सनत्र्ानडदस्वरूत्रपणी ॥५२॥ वनजाक्षी वनिरी वसनता त्रवश्वमोफहनी । सनत्रवाकल्पा सनगुणस्था सनस्श्चडता सनरुपद्रवा । ा वसिष्ठावामदे वाफदवडद्या वडद्यस्वरूत्रपणी ॥३६॥ सनस्िंशर्ा सनरीहा ि सनलोभा नीलमूधजा ॥५३॥ ा वैद्या वैद्यसिफकत्िा ि वषट्कारी विुडधरा । सनस्खलागममध्र्स्था सनस्खलागमिंस्स्थता । विुमाता विुिाता विुजडमत्रवमोिनी ॥३७॥ सनत्र्ोपासधत्रवसनमुिा सनत्र्कमाफलप्रदा ॥५४॥ ा विुप्रदा वािुदेवी वािुदेव मनोहरी । नीलग्रीवा सनराहारा सनरञ्जनवरप्रदा । वािवासिातपादश्रीवाािवाररत्रवनासशनी ॥३८॥ नवनीतत्रप्रर्ा नारी नरकाणावताररणी ॥५५॥ वागीशी वाङ्मनस्थार्ी वसशनी वनवािभूः । नारार्णी सनरीहा ि सनमाला सनगुणत्रप्रर्ा । ा वामदे वी वरारोहा वाद्यघोषणतत्परा ॥३९॥ सनस्श्चडता सनगमािारसनस्खलागम ि वेफदनी ॥५६॥ वािस्पसतिमाराध्र्ा वेदमाता त्रवनोफदनी । सनमेषासनसमषोत्पडना सनमेषाण्ित्रवधासर्नी । रे काररूपा रे वा ि रे वातीरसनवासिनी ॥४०॥ सनवातदीपमध्र्स्था सनत्रवाघ्ना नीिनासशनी ॥५७॥ राजीवलोिना रामा रासगस्णरसतवस्डदता । नीलवेणी नीलखण्िा सनत्रवाषा सनष्कशोसभता । रमणीरामजप्ता ि राज्र्पा राजताफद्रगा ॥४१॥ नीलांशुकपरीधाना सनडदघ्नी ि सनरीश्वरी ॥५८॥ राफकणी रे वती रक्षा रुद्रजडमा रजस्वला । सनश्वािोच््वािमध्र्स्था सनत्र्र्ानत्रवलासिनी । रे णुकारमणी र्र्ा रसतवृद्धा रता रसतः ॥४२॥ र्ङ्काररूपा र्डिेशी र्डिी र्डिर्शस्स्वनी ॥५९॥ रावणानडदिडधार्ी राजश्री राजशेखरी । र्डिाराधनिडतुष्टा र्जमानस्वरूत्रपणी । रणमद्या रथारूढा रत्रवकोफटिमप्रभा ॥४३॥ र्ोसगपूज्र्ा र्कारस्था र्ूपस्त्भसनवासिनी ॥६०॥ रत्रवमण्िलमध्र्स्था रजनी रत्रवलोिना । र्मघ्नी र्मकल्पा ि र्शःकामा र्तीश्वरी । रथाङ्गपास्ण रक्षोघ्नी रासगणी रावणासिाता ॥४४॥ र्मादीर्ोगसनरता र्सतदःखापहाररणी ॥६१॥ ु र्भाफदकडर्काराध्र्ा राज्र्दा राज्र्वसधानी । र्ज्ञा र्ज्वा र्जुगर्ा र्ज्ञेश्वरपसतव्रता । े रजताद्रीशिस्क्थस्था र्र्ा राजीवलोिना ॥४५॥ र्ज्ञिूिप्रदा र्ष्ट्री र्ज्ञकमाफलप्रदा ॥६२॥ र्र्वाणी रमाराध्र्ा राज्र्धािी रतोत्िवा । र्वाङ्करत्रप्रर्ा र्डिी र्वदघ्नी र्वासिाता । ु रे वती ि रतोत्िाहा राजहृद्रोगहाररणी ॥४६॥ र्ज्ञकती र्ज्ञभोक्िी र्ज्ञाङ्गी र्ज्ञवाफहनी ॥६३॥ रङ्गप्रवृद्धमधुरा रङ्गमण्िपमध्र्गा । र्ज्ञिाक्षी र्ज्ञमुखी र्जुषी र्ज्ञरस्क्षणी ।
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    46 मई 2012 भकाररूपा भद्रे शी भद्रकल्र्ाणदासर्नी ॥६४॥ दे वर्ाना दे वता ि दे विैडर्प्रपासलनी ॥८१॥ भित्रप्रर्ा भििखा भिाभीष्टस्वरूत्रपणी । वकाररूपा वाग्दे वी वेदमानिगोिरा । भसगनी भििुलभा भत्रिदा भिवत्िला ॥६५॥ वैकण्ठदे सशका वेद्या वार्ुरूपा वरप्रदा ॥८२॥ ु भििैतडर्सनलर्ा भिबडधत्रवमोिनी । वक्रतुण्िासिातपदा वक्रतुण्िप्रिाफदनी । भिस्वरूत्रपणी भाग्र्ा भिारोग्र्प्रदासर्नी ॥६६॥ वैसित्र्र्रूपा विुधा विुस्थाना विुत्रप्रर्ा ॥८३॥ भिमाता भिग्र्ा भिाभीष्टप्रदासर्नी । वषट्कारस्वरूपा ि वरारोहा वरािना । भास्करी भैरवी भोग्र्ा भवानी भर्नासशनी ॥६७॥ वैदेही जननी वेद्या वैदेहीशोकनासशनी ॥८४॥ भद्रास्त्मका भद्रदार्ी भद्रकाली भर्ङ्करी । वेदमाता वेदकडर्ा वेदरूपा त्रवनोफदनी । भगसनष्र्स्डदनी भू्नी भवबडधत्रवमोिनी ॥६८॥ वेदाडतवाफदनी िैव वेदाडतसनलर्त्रप्रर्ा ॥८५॥ भीमा भविखा भङ्गीभङ्गुरा भीमदसशानी । वेदश्रवा वेदघोषा वेदगीता त्रवनोफदनी । भल्ली भल्लीधरा भीरुभेरुण्िा भीमपापहा ॥६९॥ वेदशास्त्राथातत्वज्ञा वेदमागा प्रदसशानी ॥८६॥ भावज्ञा भोगदािी ि भवघ्नी भूसतभूषणा । वैफदकीकमाफलदा वेदिागरवािवा । भूसतदा भूसमदािी ि भूपसतत्वप्रदासर्नी ॥७०॥ वेदवडद्या वेदगुह्या वेदाश्वरथवाफहनी ॥८७॥ भ्रामरी भ्रमरी भारी भविागरताररणी । वेदिक्रा वेदवडद्या वेदाङ्गी वेदत्रवत्कत्रवः । भण्िािुरवधोत्िाहा भाग्र्दा भावमोफदनी ॥७१॥ िकाररूपा िामडता िामगान त्रविक्षणा ॥८८॥ गोकाररूपा गोमाता गुरुपत्नी गुरुत्रप्रर्ा । िाम्राज्ञी नामरूपा ि िदानडदप्रदासर्नी । गोरोिनत्रप्रर्ा गौरी गोत्रवडदगुणवसधानी ॥७२॥ िवादृक्िस्डनत्रवष्टा ि िवाि्प्रेत्रषणीिहा ॥८९॥ गोपालिेष्टािडतुष्टा गोवधानत्रववसधानी । िव्र्ापिव्र्दा िव्र्िध्रीिी ि िहासर्नी । गोत्रवडदरूत्रपणी गोप्िी गोकलानांत्रववसधानी ॥७३॥ ु िकला िागरा िारा िावाभौमस्वरूत्रपणी ॥९०॥ गीता गीतत्रप्रर्ा गेर्ा गोदा गोरूपधाररणी । िडतोषजननी िेव्र्ा िवेशी िवारञ्जनी । गोपी गोहत्र्शमनी गुस्णनी गुस्णत्रवग्रहा ॥७४॥ िरस्वती िमाराद्या िामदा सिडधुिेत्रवता ॥९१॥ गोत्रवडदजननी गोष्ठा गोप्रदा गोकलोत्िवा । ु ि्मोफहनी िदामोहा िवामाङ्गल्र्दासर्नी । गोिरी गौतमी गङ्गा गोमुखी गुणवासिनी ॥७५॥ िमस्तभुवनेशानी िवाकामफलप्रदा ॥९२॥ गोपाली गोमर्ा गु्भा गोष्ठी गोपुरवासिनी । िवासित्रद्धप्रदा िाध्वी िवाज्ञानप्रदासर्नी । गरुिा गमनश्रेष्ठा गारुिा गरुिध्वजा ॥७६॥ िवादाररद्र्र्शमनी िवादःखत्रवमोिनी ॥९३॥ ु ग्भीरा गण्िकी गुण्िा गरुिध्वजवल्लभा । िवारोगप्रशमनी िवापापत्रवमोिनी । गगनस्था गर्ावािा गुणवृत्रत्तगुणोद्भवा ॥७७॥ ा िमदृत्रष्टस्िमगुणा िवागोप्िी िहासर्नी ॥९४॥ दे काररूपा दे वेशी दृग्रूपा दे वतासिाता । िामथ्र्ावाफहसन िाङ्ख्र्ा िाडद्रानडदपर्ोधरा । दे वराजेश्वराधााङ्गी दीनदै डर्त्रवमोिनी ॥७८॥ िङ्कीणामस्डदरस्थाना िाकतकलपासलनी ॥९५॥ े ु दे कालपररज्ञाना दे शोपद्रवनासशनी । िंहाररणी िुधारूपा िाकतपुरवासिनी । े दे वमाता दे वमोहा दे वदानवमोफहनी ॥७९॥ ि्बोसधनी िमस्तेशी ित्र्ज्ञानस्वरूत्रपणी ॥९६॥ दे वेडद्रासिातपादश्री दे वदे वप्रिाफदनी । ि्पत्करी िमानाङ्गी िवाभाविुिंस्स्थता । दे शाडतरी दे शरूपा दे वालर्सनवासिनी ॥८०॥ िडध्र्ावडदनिुप्रीता िडमागाकलपासलनी ॥९७॥ ु दे शभ्रमणिडतुष्टा दे शस्वास्थ्र्प्रदासर्नी । िञ्जीत्रवनी िवामेधा िभ्र्ा िाधुिुपूस्जता ।
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    47 मई 2012 िसमद्धा िासमघेनी ि िामाडर्ा िामवेफदनी ॥९८॥ ह्रीं मस्डदरा फहतकरा हृष्टा ि ह्रीं कलोद्भवा ॥११५॥ ु िमुत्तीणाा िदािारा िंहारा िवापावनी । फहतप्रज्ञा फहतप्रीता फहतकारुण्र्वसधानी । ित्रपाणी िपामाता ि िमादानिुखप्रदा ॥९९॥ फहतासिनी फहतक्रोधा फहतकमाफलप्रदा ॥११६॥ िवारोगप्रशमनी िवाज्ञत्वफलप्रदा । फहमा है मवती है ्नी हे मािलसनवासिनी । िङ्क्रमा िमदा सिडधुः िगााफदकरणक्षमा ॥१००॥ फहमागजा फहतकरी फहतकमास्वभात्रवनी ॥११७॥ िङ्कटा िङ्कटहरा िकङ्कमत्रवलेपना । ु ु धीकाररूपा सधषणा धमारूपा धनेश्वरी । िुमुखा िुमुखप्रीता िमानासधकवस्जाता ॥१०१॥ धनुधरा धराधारा धमाकमाफलप्रदा ॥११८॥ ा िंस्तुता स्तुसतिुप्रीता ित्र्वादी िदास्पदा । धमाािारा धमािारा धमामध्र्सनवासिनी । धीकाररूपा धीमाता धीरा धीरप्रिाफदनी ॥१०२॥ धनुत्रवाद्या धनुवदा धडर्ा धूतत्रवनासशनी ॥११९॥ े ा धीरोत्तमा धीरधीरा धीरस्था धीरशेखरा । धनधाडर्ाधेनुरूपा धनाढ्र्ा धनदासर्नी । धृसतरूपा धनाढ्र्ा ि धनपा धनदासर्नी ॥१०३॥ धनेशी धमासनरता धमाराजप्रिाफदनी ॥१२०॥ धीरूपा धीरवडद्या ि धीप्रभा धीरमानिा । धमास्वरूपा धमेशी धमााधमात्रविाररणी । धीगेर्ा धीपदस्था ि धीशाना धीप्रिाफदनी ॥१०४॥ धमािूक्ष्मा धमागेहा धसमाष्ठा धमागोिरा ॥१२१॥ मकाररूपा मैिेर्ा महामङ्गलदे वता । र्ोकाररूपा र्ोगेशी र्ोगस्था र्ोगरूत्रपणी । मनोवैकल्र्शमनी मलर्ािलवासिनी ॥१०५॥ र्ोग्र्ा र्ोगीशवरदा र्ोगमागासनवासिनी ॥१२२॥ मलर्ध्वजराजश्रीमाार्ामोहत्रवभेफदनी । र्ोगािनस्था र्ोगेशी र्ोगमार्ात्रवलासिनी । महादे वी महारूपा महाभैरवपूस्जता ॥१०६॥ र्ोसगनी र्ोगरिा ि र्ोगाङ्गी र्ोगत्रवग्रहा ॥१२३॥ मनुप्रीता मडिमूसतामडिवश्र्ा महे श्वरी । ा र्ोगवािा र्ोगभाग्र्ा र्ोगमागाप्रदसशानी । मत्तमातङ्गगमना मधुरा मेरुमण्टपा ॥१०७॥ र्ोकाररूपा र्ोधाढ्र्ार्ोध्री र्ोधिुतत्परा ॥१२४॥ महागुप्ता महाभूता महाभर्त्रवनासशनी । र्ोसगनी र्ोसगनीिेव्र्ा र्ोगज्ञानप्रबोसधनी । महाशौर्ाा मस्डिणी ि महावैररत्रवनासशनी ॥१०८॥ र्ोगेश्वरप्राणानाथा र्ोगीश्वरहृफदस्स्थता ॥१२५॥ महालक्ष्मीमाहागौरी मफहषािुरमफदा नी । र्ोगा र्ोगक्षेमकिी र्ोगक्षेमत्रवधासर्नी । मही ि मण्िलस्था ि मधुरागमपूस्जता ॥१०९॥ र्ोगराजेश्वराराध्र्ा र्ोगानडदस्वरूत्रपणी ॥१२६॥ मेधा मेधाकरी मेध्र्ा माधवी मधुमसधानी । नकाररूपा नादे शी नामपारार्णत्रप्रर्ा । मडिा मडिमर्ी माडर्ा मार्ा माधवमस्डिणी ॥११०॥ नवसित्रद्धिमाराध्र्ा नारार्णमनोहरी ॥१२७॥ मार्ादरा ि मार्ावी मार्ाज्ञा मानदासर्नी । ू नारार्णी नवाधारा नवब्रह्मासिातांसघ्रका । मार्ािङ्कल्पजननी मार्ामार्त्रवनोफदनी ॥१११॥ नगेडद्रतनर्ाराध्र्ा नामरूपत्रववस्जाता ॥१२८॥ मार्ा प्रपञ्िशमनी मार्ािंहाररूत्रपणी । नरसिंहासिातपदा नवबडधत्रवमोिनी । मार्ामडिप्रिादा ि मार्ाजनत्रवमोफहनी ॥११२॥ नवग्रहासिातपदा नवमीपूजनत्रप्रर्ा ॥१२९॥ महापथा महाभोगा महत्रवघ्नत्रवनासशनी । नैसमत्रत्तकाथाफलदा नस्डदताररत्रवनासशनी । महानुभावा मडिाढ्र्ा महमङ्गलदे वता ॥११३॥ नवपीठस्स्थता नादा नवत्रषागणिेत्रवता ॥१३०॥ फहकाररूपा हृद्या ि फहतकार्ाप्रवसधानी । नविूिात्रवधानज्ञा नैसमशारण्र्वासिनी । हे र्ोपासधत्रवसनमुिा हीनलोकत्रवनासशनी ॥११४॥ ा नविडदनफदग्धाङ्गी नवकङ्कमधाररणी ॥१३१॥ ु ु ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या ह्रीं दे वी ह्रीं स्वभात्रवनी । नववस्त्रपरीधाना नवरत्नत्रवभूषणा ।
  • 48.
    48 मई 2012 नव्र्भस्मत्रवदग्धाङ्गी नविडद्रकलाधरा ॥१३२॥ दस्क्षणा दस्क्षणाराध्र्ा दस्क्षणामूसतारूत्रपणी ॥१४७॥ प्रकाररूपा प्राणेशी प्राणिंरक्षणीपरा । दर्ावती दमस्वाडता दनुजाररदा र्ासनसधः । प्राणिञ्जीत्रवनी प्राच्र्ा प्रास्णप्राणप्रबोसधनी ॥१३३॥ दडतशोभसनभा दे वी दमना दाफिमस्तना ॥१४८॥ प्रज्ञा प्राज्ञा प्रभापुष्पा प्रतीिी प्रभुदा त्रप्रर्ा । दण्िा ि दमर्िी ि दस्ण्िनी दमनत्रप्रर्ा । प्रािीना प्रास्णसित्तस्था प्रभा प्रज्ञानरूत्रपणी ॥१३४॥ दण्िकारण्र्सनलर्ा दण्िकाररत्रवनासशनी ॥१४९॥ प्रभातकमािडतुष्टा प्राणार्ामपरार्णा । दं ष्ट्राकरालवदना दण्िशोभा दरोदरी । प्रार्ज्ञा प्रणवा प्राणा प्रवृत्रत्तः प्रकृ सतः परा ॥१३५॥ दररद्राररष्टशमनी द्र्ा दमनपूस्जता ॥१५०॥ प्रबडधा प्रथमा िैव प्रगा प्रारब्धनासशनी । दानवासिात पादश्रीद्रा त्रवणा द्रात्रवणी दर्ा । प्रबोधसनरता प्रेक्ष्र्ा प्रबडधा प्राणिास्क्षणी ॥१३६॥ दामोदरी दानवाररदाामोदरिहोदरी ॥१५१॥ प्रर्ागतीथासनलर्ा प्रत्र्क्षपरमेश्वरी । दािी दानत्रप्रर्ा दा्नी दानश्रीफद्वा जवस्डदता । प्रणवाद्यडतसनलर्ा प्रणवाफदः प्रजेश्वरी ॥१३७॥ दस्डतगा दस्ण्िनी दवाा दसधदग्धस्वरूत्रपणी ॥१५२॥ ू ु िोकाररूपा िोरघ्नी िोरबाधात्रवनासशनी । दाफिमीबीजिडदोहा दडतपस्ङ्ित्रवरास्जता । िैतडर्िेतनस्था ि ितुरा ि िमत्कृ सतः ॥१३८॥ दपाणा दपाणस्वच्छा द्रममण्िलवासिनी ॥१५३॥ ु िक्रवसताकलाधारा िफक्रणी िक्रधाररणी । ु दशावतारजननी दशफदग्दै वपूस्जता । सित्तिेर्ा सिदानडदा सिद्रपा सिफद्वलासिनी ॥१३९॥ ू दमा दशफदशा दृश्र्ा दशदािी दर्ासनसधः ॥१५४॥ सिडतासित्तप्रशमनी सिस्डतताथाफलप्रदा । दे शकालपररज्ञाना दे शकालत्रवशोसधनी । िा्पेर्ी ि्पकप्रीता िण्िी िण्िाट्टहासिनी ॥१४०॥ दश्र्ाफदकलाराध्र्ा दशकालत्रवरोसधनी । िण्िे श्वरी िण्िमाता िण्िमुण्ित्रवनासशनी । दश्र्ाफदकलाराध्र् दशग्रीवत्रवरोसधनी ॥१५५॥ िकोराक्षी सिरप्रीता सिकरा सिकरालका ॥१४१॥ ु ु दशापराधशमनी दशवृत्रत्तफलप्रदा । िैतडर्रूत्रपणी िैिी िेतना सित्तिास्क्षणी । र्ात्काररूत्रपणी र्ाज्ञी र्ादवी र्ादवासिाता ॥१५६॥ सििा सिित्रवसििाङ्गी सििगुप्तप्रिाफदनी ॥१४२॥ र्र्ासतपूजनप्रीता र्ास्ज्ञकी र्ाजकत्रप्रर्ा । िलना िक्रिंस्था ि िा्पेर्ी िलसित्रिणी । र्जमाना र्दप्रीता र्ामपूजाफलप्रदा ॥१५७॥ ु िडद्रमण्िलमध्र्स्था िडद्रकोफटिुशीतला ॥१४३॥ र्शस्स्वनी र्माराध्र्ा र्मकडर्ा र्तीश्वरी । िडद्रानुजिमाराध्र्ा िडद्रा िण्िमहोदरी । र्माफदर्ोगिडतुष्टा र्ोगीडद्रहृदर्ा र्मा ॥१५८॥ िसिाताररश्चडद्रमाता िडद्रकाडता िलेश्वरी ॥१४४॥ र्मोपासधत्रवसनमुिा र्शस्र्त्रवसधिडनुता । ा िरािरसनवािी ि िक्रपास्णिहोदरी । र्वीर्िी र्ुवप्रीता र्ािानडदा र्तीश्वरी ॥१५९॥ दकाररूपा दत्तश्रीदाररद्र्र्च्छे दकाररणी ॥१४५॥ र्ोगत्रप्रर्ा र्ोगग्र्ा र्ोगध्र्ेर्ा र्थेच्छगा । दत्तािेर्स्र् वरदा दर्ाा ि दीनवत्िला । र्ोगत्रप्रर्ा र्ज्ञिेनी र्ोगरूपा र्थेष्टदा ॥१६०॥ दक्षाराध्र्ा दक्षकडर्ा दक्षर्ज्ञत्रवनासशनी ॥१४६॥ ॥श्रीगार्िी फदव्र्िहस्रनामस्तोिं िंपणम ् ॥ ू ा दक्षा दाक्षार्णी दीक्षा दृष्टा दक्षवरप्रदा । मंगल र्ंि: (त्रिकोण) मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , े े इि क असतररि व्र्त्रि को ऋण मुत्रि हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं े मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए मंगल र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् माि Rs-730 े े
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    49 मई 2012 मंि सिद्ध वाहन दघटना नाशक मारुसत र्ंि ु ा पौरास्णक ग्रंथो मं उल्लेख हं की महाभारत क र्ुद्ध क िमर् अजुन क रथ क अग्रभाग पर मारुसत ध्वज एवं े े ा े े मारुसत र्डि लगा हुआ था। इिी र्ंि क प्रभाव क कारण िंपूणा र्ुद्ध क दौरान हज़ारं-लाखं प्रकार क आग्नेर् अस्त्र- े े े े शस्त्रं का प्रहार होने क बाद भी अजुन का रथ जरा भी क्षसतग्रस्त नहीं हुआ। भगवान श्री कृ ष्ण मारुसत र्ंि क इि े ा े अद्भत रहस्र् को जानते थे फक स्जि रथ र्ा वाहन की रक्षा स्वर्ं श्री मारुसत नंदन करते हं, वह दघटनाग्रस्त किे हो ु ु ा ै िकता हं । वह रथ र्ा वाहन तो वार्ुवेग िे, सनबाासधत रुप िे अपने लक्ष्र् पर त्रवजर् पतका लहराता हुआ पहुंिेगा। इिी सलर्े श्री कृ ष्ण नं अजुन क रथ पर श्री मारुसत र्ंि को अंफकत करवार्ा था। ा े स्जन लोगं क स्कटर, कार, बि, ट्रक इत्र्ाफद वाहन बार-बार दघटना ग्रस्त हो रहे हो!, अनावश्र्क वाहन को े ू ु ा नुक्षान हो रहा हं! उडहं हानी एवं दघटना िे रक्षा क उद्दे श्र् िे अपने वाहन पर मंि सिद्ध श्री मारुसत र्ंि अवश्र् ु ा े लगाना िाफहए। जो लोग ट्राडस्पोफटं ग (पररवहन) क व्र्विार् िे जुिे हं उनको श्रीमारुसत र्ंि को अपने वाहन मं अवश्र् े स्थात्रपत करना िाफहए, क्र्ोफक, इिी व्र्विार् िे जुिे िैकिं लोगं का अनुभव रहा हं की श्री मारुसत र्ंि को स्थात्रपत करने िे उनक वाहन असधक फदन तक अनावश्र्क खिो िे एवं दघटनाओं िे िुरस्क्षत रहे हं । हमारा स्वर्ंका एवं अडर् े ु ा त्रवद्वानो का अनुभव रहा हं , की स्जन लोगं ने श्री मारुसत र्ंि अपने वाहन पर लगार्ा हं , उन लोगं क वाहन बिी िे े बिी दघटनाओं िे िुरस्क्षत रहते हं । उनक वाहनो को कोई त्रवशेष नुक्शान इत्र्ाफद नहीं होता हं और नाहीं अनावश्र्क ु ा े रुप िे उिमं खराबी आसत हं । वास्तु प्रर्ोग मं मारुसत र्ंि: र्ह मारुसत नंदन श्री हनुमान जी का र्ंि है । र्फद कोई जमीन त्रबक नहीं रही हो, र्ा उि पर कोई वाद-त्रववाद हो, तो इच्छा क अनुरूप वहँ जमीन उसित मूल्र् पर त्रबक जार्े इि सलर्े इि मारुसत र्ंि का े प्रर्ोग फकर्ा जा िकता हं । इि मारुसत र्ंि क प्रर्ोग िे जमीन शीघ्र त्रबक जाएगी र्ा त्रववादमुि हो जाएगी। इि सलर्े े र्ह र्ंि दोहरी शत्रि िे र्ुि है । मारुसत र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी क सलर्े गुरुत्व कार्ाालर् मं िंपक करं । मूल्र् Rs- 255 िे 10900 तक े े ा श्री हनुमान र्ंि शास्त्रं मं उल्लेख हं की श्री हनुमान जी को भगवान िूर्देव ने ब्रह्मा जी क आदे श पर हनुमान ा े जी को अपने तेज का िौवाँ भाग प्रदान करते हुए आशीवााद प्रदान फकर्ा था, फक मं हनुमान को िभी शास्त्र का पूणा ज्ञान दँ गा। स्जििे र्ह तीनोलोक मं िवा श्रेष्ठ विा हंगे तथा शास्त्र त्रवद्या मं इडहं महारत हासिल होगी और इनक ू े िमन बलशाली और कोई नहीं होगा। जानकारो ने मतानुशार हनुमान र्ंि की आराधना िे पुरुषं की त्रवसभडन बीमाररर्ं दर होती हं , इि र्ंि मं अद्भत शत्रि िमाफहत होने क कारण व्र्त्रि की स्वप्न दोष, धातु रोग, रि दोष, वीर्ा दोष, मूछाा, ू ु े नपुंिकता इत्र्ाफद अनेक प्रकार क दोषो को दर करने मं अत्र्डत लाभकारी हं । अथाात र्ह र्ंि पौरुष को पुष्ट करता े ू हं । श्री हनुमान र्ंि व्र्त्रि को िंकट, वाद-त्रववाद, भूत-प्रेत, द्यूत फक्रर्ा, त्रवषभर्, िोर भर्, राज्र् भर्, मारण, ि्मोहन स्तंभन इत्र्ाफद िे िंकटो िे रक्षा करता हं और सित्रद्ध प्रदान करने मं िक्षम हं । श्री हनुमान र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी क सलर्े गुरुत्व कार्ाालर् मं िंपक करं । मूल्र् Rs- 730 िे 10900 तक े े ा GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
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    50 मई 2012 मंि सिद्ध त्रवशेष दै वी र्ंि िूसि आद्य शत्रि दगाा बीिा र्ंि (अंबाजी बीिा र्ंि) ु िरस्वती र्ंि महान शत्रि दगाा र्ंि (अंबाजी र्ंि) ु िप्तिती महार्ंि(िंपूणा बीज मंि िफहत) नव दगाा र्ंि ु काली र्ंि नवाणा र्ंि (िामुंिा र्ंि) श्मशान काली पूजन र्ंि नवाणा बीिा र्ंि दस्क्षण काली पूजन र्ंि िामुंिा बीिा र्ंि ( नवग्रह र्ुि) िंकट मोसिनी कासलका सित्रद्ध र्ंि त्रिशूल बीिा र्ंि खोफिर्ार र्ंि बगला मुखी र्ंि खोफिर्ार बीिा र्ंि बगला मुखी पूजन र्ंि अडनपूणाा पूजा र्ंि राज राजेश्वरी वांछा कल्पलता र्ंि एकांक्षी श्रीफल र्ंि मंि सिद्ध त्रवशेष लक्ष्मी र्ंि िूसि श्री र्ंि (लक्ष्मी र्ंि) महालक्ष्मर्ै बीज र्ंि श्री र्ंि (मंि रफहत) महालक्ष्मी बीिा र्ंि श्री र्ंि (िंपूणा मंि िफहत) लक्ष्मी दार्क सिद्ध बीिा र्ंि श्री र्ंि (बीिा र्ंि) लक्ष्मी दाता बीिा र्ंि श्री र्ंि श्री िूि र्ंि लक्ष्मी गणेश र्ंि श्री र्ंि (कमा पृष्ठीर्) ु ज्र्ेष्ठा लक्ष्मी मंि पूजन र्ंि लक्ष्मी बीिा र्ंि कनक धारा र्ंि श्री श्री र्ंि (श्रीश्री लसलता महात्रिपुर िुडदर्ै श्री महालक्ष्मर्ं श्री महार्ंि) वैभव लक्ष्मी र्ंि (महान सित्रद्ध दार्क श्री महालक्ष्मी र्ंि) अंकात्मक बीिा र्ंि ताम्र पि पर िुवणा पोलीि ताम्र पि पर रजत पोलीि ताम्र पि पर (Gold Plated) (Silver Plated) (Copper) िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् 1” X 1” 460 1” X 1” 370 1” X 1” 255 2” X 2” 820 2” X 2” 640 2” X 2” 460 3” X 3” 1650 3” X 3” 1090 3” X 3” 730 4” X 4” 2350 4” X 4” 1650 4” X 4” 1090 6” X 6” 3600 6” X 6” 2800 6” X 6” 1900 9” X 9” 6400 9” X 9” 5100 9” X 9” 3250 12” X12” 10800 12” X12” 8200 12” X12” 6400 र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
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    51 मई 2012 रासश रत्न मूंगा हीरा पडना मोती माणेक पडना Red Coral Diamond Green Emerald Naturel Pearl Ruby Green Emerald (Special) (Special) (Old Berma) (Special) (Special) (Special) (Special) 5.25" Rs. 1050 10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 9100 5.25" Rs. 910 2.25" Rs. 12500 5.25" Rs. 9100 6.25" Rs. 1250 20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 12500 6.25" Rs. 1250 3.25" Rs. 15500 6.25" Rs. 12500 7.25" Rs. 1450 30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 14500 7.25" Rs. 1450 4.25" Rs. 28000 7.25" Rs. 14500 8.25" Rs. 1800 40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 19000 8.25" Rs. 1900 5.25" Rs. 46000 8.25" Rs. 19000 9.25" Rs. 2100 50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 23000 9.25" Rs. 2300 6.25" Rs. 82000 9.25" Rs. 23000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 All Diamond are Full ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati White Colour. तुला रासश: वृस्श्चक रासश: धनु रासश: मकर रासश: कभ रासश: ुं मीन रासश: हीरा मूंगा पुखराज नीलम नीलम पुखराज Diamond Red Coral Y.Sapphire B.Sapphire B.Sapphire Y.Sapphire (Special) (Special) (Special) (Special) (Special) (Special) 10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 1050 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 1250 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 1450 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 1800 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 2100 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 All Diamond are Full ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati White Colour. * उपर्ोि वजन और मूल्र् िे असधक और कम वजन और मूल्र् क रत्न एवं उपरत्न भी हमारे र्हा व्र्ापारी मूल्र् पर े उप्लब्ध हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 52.
    52 मई 2012 मंि सिद्ध रूद्राक्ष Rate In Rate In Rudraksh List Rudraksh List Indian Rupee Indian Rupee एकमुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2800, 5500 आठ मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 820,1250 एकमुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 750,1050, 1250, आठ मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 1900 दो मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 30,50,75 नौ मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 910,1250 दो मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, नौ मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2050 दो मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 450,1250 दि मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 1050,1250 तीन मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 30,50,75, दि मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2100 तीन मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, ग्र्ारह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 1250, तीन मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 450,1250, ग्र्ारह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2750, िार मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 25,55,75, बारह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 1900, िार मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, बारह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2750, पंि मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 25,55, तेरह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 3500, 4500, पंि मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 225, 550, तेरह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 6400, छह मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 25,55,75, िौदह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 10500 छह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, िौदह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 14500 िात मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 75, 155, गौरीशंकर रूद्राक्ष 1450 िात मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 225, 450, गणेश रुद्राक्ष (नेपाल) 550 िात मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 1250 गणेश रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 750 रुद्राक्ष क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY, 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, मंि सिद्ध दलभ िामग्री ु ा हत्था जोिी- Rs- 370 घोिे की नाल- Rs.351 मार्ा जाल- Rs- 251 सिर्ार सिंगी- Rs- 370 दस्क्षणावती शंख- Rs- 550 इडद्र जाल- Rs- 251 त्रबल्ली नाल- Rs- 370 मोसत शंख- Rs- 550 धन वृत्रद्ध हकीक िेट Rs-251 GURUTVA KARYALAY Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785, Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
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    53 मई 2012 नवरत्न जफित श्री र्ंि शास्त्र विन क अनुिार शुद्ध िुवणा र्ा रजत े मं सनसमात श्री र्ंि क िारं और र्फद नवरत्न े जिवा ने पर र्ह नवरत्न जफित श्री र्ंि कहलाता हं । िभी रत्नो को उिक सनस्श्चत े स्थान पर जि कर लॉकट क रूप मं धारण े े करने िे व्र्त्रि को अनंत एश्वर्ा एवं लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । व्र्त्रि को एिा आभाि होता हं जैिे मां लक्ष्मी उिक िाथ हं । े नवग्रह को श्री र्ंि क िाथ लगाने िे ग्रहं े की अशुभ दशा का धारणकरने वाले व्र्त्रि पर प्रभाव नहीं होता हं । गले मं होने क कारण र्ंि पत्रवि रहता हं एवं स्नान करते िमर् इि र्ंि पर स्पशा कर जो े जल त्रबंद ु शरीर को लगते हं , वह गंगा जल क िमान पत्रवि होता हं । इि सलर्े इिे िबिे े तेजस्वी एवं फलदासर् कहजाता हं । जैिे अमृत िे उत्तम कोई औषसध नहीं, उिी प्रकार लक्ष्मी प्रासप्त क सलर्े श्री र्ंि िे उत्तम कोई र्ंि िंिार मं नहीं हं एिा शास्त्रोि विन हं । इि प्रकार क े े नवरत्न जफित श्री र्ंि गुरूत्व कार्ाालर् द्वारा शुभ मुहूता मं प्राण प्रसतत्रष्ठत करक बनावाए जाते े हं । असधक जानकारी हे तु िंपक करं । ा GURUTVA KARYALAY 92/3BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 54.
    54 मई 2012 जैन धमाक त्रवसशष्ट र्ंिो की िूिी े श्री िौबीि तीथंकरका महान प्रभात्रवत िमत्कारी र्ंि श्री एकाक्षी नाररर्ेर र्ंि श्री िोबीि तीथंकर र्ंि िवातो भद्र र्ंि कल्पवृक्ष र्ंि िवा िंपत्रत्तकर र्ंि सिंतामणी पाश्वानाथ र्ंि िवाकार्ा-िवा मनोकामना सित्रद्धअ र्ंि (१३० िवातोभद्र र्ंि) सिंतामणी र्ंि (पंिफठर्ा र्ंि) ऋत्रष मंिल र्ंि सिंतामणी िक्र र्ंि जगदवल्लभ कर र्ंि श्री िक्रश्वरी र्ंि े ऋत्रद्ध सित्रद्ध मनोकामना मान ि्मान प्रासप्त र्ंि श्री घंटाकणा महावीर र्ंि ऋत्रद्ध सित्रद्ध िमृत्रद्ध दार्क श्री महालक्ष्मी र्ंि श्री घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि त्रवषम त्रवष सनग्रह कर र्ंि (अनुभव सिद्ध िंपणा श्री घंटाकणा महावीर पतका र्ंि) ू श्री पद्मावती र्ंि क्षुद्रो पद्रव सननााशन र्ंि श्री पद्मावती बीिा र्ंि बृहच्िक्र र्ंि श्री पाश्वापद्मावती ह्रंकार र्ंि वंध्र्ा शब्दापह र्ंि पद्मावती व्र्ापार वृत्रद्ध र्ंि मृतवत्िा दोष सनवारण र्ंि श्री धरणेडद्र पद्मावती र्ंि कांक वंध्र्ादोष सनवारण र्ंि श्री पाश्वानाथ ध्र्ान र्ंि बालग्रह पीिा सनवारण र्ंि श्री पाश्वानाथ प्रभुका र्ंि लधुदेव कल र्ंि ु भिामर र्ंि (गाथा नंबर १ िे ४४ तक) नवगाथात्मक उविग्गहरं स्तोिका त्रवसशष्ट र्ंि मस्णभद्र र्ंि उविग्गहरं र्ंि श्री र्ंि श्री पंि मंगल महाश्रृत स्कध र्ंि ं श्री लक्ष्मी प्रासप्त और व्र्ापार वधाक र्ंि ह्रींकार मर् बीज मंि श्री लक्ष्मीकर र्ंि वधामान त्रवद्या पट्ट र्ंि लक्ष्मी प्रासप्त र्ंि त्रवद्या र्ंि महात्रवजर् र्ंि िौभाग्र्कर र्ंि त्रवजर्राज र्ंि िाफकनी, शाफकनी, भर् सनवारक र्ंि त्रवजर् पतका र्ंि भूताफद सनग्रह कर र्ंि त्रवजर् र्ंि ज्वर सनग्रह कर र्ंि सिद्धिक्र महार्ंि शाफकनी सनग्रह कर र्ंि दस्क्षण मुखार् शंख र्ंि आपत्रत्त सनवारण र्ंि दस्क्षण मुखार् र्ंि शिुमख स्तंभन र्ंि ु र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 55.
    55 मई 2012 घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि को स्थापीत करने िे िाधक की िवा मनोकामनाएं पूणा होती हं । िवा प्रकार क रोग भूत-प्रेत आफद उपद्रव िे रक्षण होता हं । े जहरीले और फहं िक प्राणीं िे िंबसधत भर् दर होते हं । ं ू अस्ग्न भर्, िोरभर् आफद दर होते हं । ू दष्ट व अिुरी शत्रिर्ं िे उत्पडन होने वाले भर् ु िे र्ंि क प्रभाव िे दर हो जाते हं । े ू र्ंि क पूजन िे िाधक को धन, िुख, िमृत्रद्ध, े ऎश्वर्ा, िंतत्रत्त-िंपत्रत्त आफद की प्रासप्त होती हं । िाधक की िभी प्रकार की िास्त्वक इच्छाओं की पूसता होती हं । र्फद फकिी पररवार र्ा पररवार क िदस्र्ो पर े वशीकरण, मारण, उच्िाटन इत्र्ाफद जाद-टोने वाले ू प्रर्ोग फकर्े गर्ं होतो इि र्ंि क प्रभाव िे स्वतः नष्ट े हो जाते हं और भत्रवष्र् मं र्फद कोई प्रर्ोग करता हं तो रक्षण होता हं । कछ जानकारो क श्री घंटाकणा महावीर पतका ु े र्ंि िे जुिे अद्द्भत अनुभव रहे हं । र्फद घर मं श्री ु घंटाकणा महावीर पतका र्ंि स्थात्रपत फकर्ा हं और र्फद कोई इषाा, लोभ, मोह र्ा शिुतावश र्फद अनुसित कमा करक फकिी भी उद्दे श्र् िे िाधक को परे शान करने का प्रर्ाि करता हं तो र्ंि क प्रभाव िे िंपणा े े ू पररवार का रक्षण तो होता ही हं , कभी-कभी शिु क द्वारा फकर्ा गर्ा अनुसित कमा शिु पर ही उपर े उलट वार होते दे खा हं । मूल्र्:- Rs. 1650 िे Rs. 10900 तक उप्लब्द्ध िंपक करं । GURUTVA KARYALAY ा Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
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    56 मई 2012 अमोद्य महामृत्र्ुंजर् कवि अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवि व उल्लेस्खत अडर् िामग्रीर्ं को शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवद्वान ब्राह्मणो द्वारा िवा लाख महामृत्र्ुजर् मंि जप एवं दशांश हवन द्वारा सनसमात कवि अत्र्ंत ं प्रभावशाली होता हं । अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवि अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवि बनवाने हे तु: अपना नाम, त्रपता-माता का नाम, कवि गोि, एक नर्ा फोटो भेजे दस्क्षणा माि: 10900 राशी रत्न एवं उपरत्न त्रवशेष र्ंि हमारं र्हां िभी प्रकार क र्ंि िोने-िांफद- े ता्बे मं आपकी आवश्र्िा क अनुशार े फकिी भी भाषा/धमा क र्ंिो को आपकी े आवश्र्क फिजाईन क अनुशार २२ गेज े शुद्ध ता्बे मं अखंफित बनाने की त्रवशेष िभी िाईज एवं मूल्र् व क्वासलफट के िुत्रवधाएं उपलब्ध हं । अिली नवरत्न एवं उपरत्न भी उपलब्ध हं । हमारे र्हां िभी प्रकार क रत्न एवं उपरत्न व्र्ापारी मूल्र् पर उपलब्ध हं । ज्र्ोसतष कार्ा िे जुिे़ े बधु/बहन व रत्न व्र्विार् िे जुिे लोगो क सलर्े त्रवशेष मूल्र् पर रत्न व अडर् िामग्रीर्ा व अडर् े िुत्रवधाएं उपलब्ध हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
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    57 मई 2012 मासिक रासश फल  सिंतन जोशी मेष: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं बदलाव का त्रविार कर िकते है । फकर्े गर्े पूंस्ज सनवेश र्ा भूसम-भवन िे िंबंसधअ मामलो मं ितक रहे िोरी, धोखो, मतभेदं इत्र्ादी िे िमस्र्ा हो िकती हं । ा वाहन िावधानी िे िलार्े र्ा वाहन िे िावधान रहे आकस्स्मक दघटना हो िकती हं । ु ा िल-अिल िंपत्रत्त र्ा फकिी घरे लू मामलं मं बदलाव हो िकता है । 16 िे 31 मई 2012 : पूवा काल मं फकर्े गर्े कार्ा एवं रुक हुवे कार्ा िे आकस्स्मक े धन लाभ प्राप्त होगा। कोटा -किहरी क कार्ो मं त्रवलंब हो िकता हं । असधक वाद –त्रववाद े करने िे बिे। तनाव और सिंता क कारण स्वास्थ्र् िंबंधी िस्र्ाओं का िामना करना े पि िकता हं अतः िावधान रहे । आपको पेट क रोग क कारण पीिा हो िकती हं । े े त्रवपरीत सलंग क प्रसत आपका असधक आकषाण रहे गा। े वृषभ: 1 िे 15 मई 2012 : िामास्जक मान-ि्मान और पद-प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी। प्रसतकलता क कारण आसथाक पक्ष कमजोर हो िकता हं । कोटा -किहरी क कार्ो मं ू े े िफलता प्राप्त होने क र्ोग हं । अपने व्र्र्ं पर सनर्डिण रखने का प्रर्ाि करं और ऋण े लेने िे बिे। पाररवाररक जीवन मं छोटी-छोटी िमस्र्ाए असधक परे शान कर िकती हं । पररवार क फकिी िदस्र्ा का स्वास्थ्र् आपको सिंसतत कर िकता हं । े 16 िे 31 मई 2012 : एकासधक स्त्रोत िे धन प्रासप्त क र्ोग बन रहे हं । इि अवसध मं े िल-अिल िंपत्रत्त मं पूंस्ज सनवेश करना आपक सलए त्रवशेष रुप िे फार्दे मंद हो िकता े हं । समि एवं पररवार क लोगो का िहर्ोग प्राप्त होगा। जीवन िाथी का पूणा िहर्ोग प्राप्त े होगा। अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है । समथुन: 1 िे 15 मई 2012 : कार्ा फक असधकता और व्र्स्तता िे मानसिक शांसत मं कमी रहे गी। इि सलए मन को सनर्ंिण मं रखने का प्रर्ाि करं । अडर्था आपका पाररवाररक जीवन भी तनावपूणा हो िकता हं । आपको महत्व पूणा कार्ा एवं सनणार्ं को थोिे िमर् क सलए स्थसगत करना े पि िकता हं । दांपत्र् जीवन िुखमर् रहे गा। 16 िे 31 मई 2012 : र्फद आप नौकरी मं हं तो अपने कार्ा का अच्छा प्रदशान करने मं िमथा हंगे। आपक रुक हुए कार्ं क पूणा होने िे त्रवशेष धनलाभ हो िकता हं । े े े मानसिक प्रडनता बढे गी। त्रवपरीत सलंग क प्रसत आपका आकषाण परे शानीर्ा खिी कर े िकता हं अतः िावधान रहे । पररवार मं माता-त्रपता क स्वास्थ्र् क प्रसत त्रवशेष ध्र्ान े े रखना पि िकता हं ।
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    58 मई 2012 कक: 1 िे 15 मई 2012 : आसथाक िमस्र्ाएं परे शान कर िकती हं लेफकन िमर् क िाथ िमस्र्ाएं िलझने लगेगी। ा े कोटा -किहरी क कार्ो मं त्रवजर् प्रासप्त क िंकत हं । िंतान पक्ष िे िंबंसधत सिंताएं दर े े े ू होगी। जीवन िाथी क िाथ वैिाररक मतभेद िंभव हं । अपने खाने-पीने का त्रवशेष े ध्र्ान रखे। अपनी आंखं का त्रवशेष खर्ाल रखं। पररवार मं अशांसत का माहोल हो िकता हं । 16 िे 31 मई 2012 : आपक महत्वपूणा प्रर्ाि िफल हंगे। नौकरी िे जुिे लोगो को े कोई महत्व पूणा पद प्राप्त हो िकता हं । भूसम-भवन िे िंबंसधत कार्ो मं धनलाभ प्राप्त हो िकता हं । व्र्ाविार्ीक िाझेदारी क सलए िमर् उपर्ुि हं । आसथाक स्स्थती मं े उतार-िाढाव रहं गे। पररवार मं आपिी तालमेल बनाए रखने का प्रर्ाि करं । सिंह: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी- व्र्विार् मं धन प्रासप्त होने क र्ोग हं । आपक िामजीक मान-ि्मान एवं पद- े े ु प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी। व्र्विार्ीक परे शानीर्ं िे छटकारा समलेगा। महत्वपूणा कार्ो के सलए आपको कजा लेना पि िकता हं । अत्रववाफहत हं तो त्रववाह क र्ोग बन िकते हं । े व्र्वहार कशल रहं अडर्था पररवार मं कलह का वातावरण हो िकता हं । स्वास्थ्र् क ू े प्रसत ििेतनता बरते। 16 िे 31 मई 2012 : नौकरी मं उच्ि असधकाररर्ं का िहर्ोग प्राप्त होगा। व्र्विार् मं हं तो िरकार िे लाभ प्रासप्त िंभव हं । कोटा -किहरी क कार्ा मं त्रवलंब िंभव हं । जीवन े िाथी िे पूणा िहर्ोग प्राप्त होगा। घर पररवार मं मांगसलक कार्ा िंपडन होने क अच्छे े र्ोग हं । खान-पान का त्रवशेष ध्र्ान रखं अडर्था पूराने रोगो क कारण लंबे िमर् क सलए कष्ट िंभव हं । े े कडर्ा: 1 िे 15 मई 2012 : इि माह आपक अंदर रिनात्मक कार्ा करने फक े क्षमता का त्रवकाि होगा। आसथाक स्स्थती मं पूवा की अपक्षा मं िुधार होगा। अपने उच्िासधकारी एव्म िहकमािारी क बीि आप अपने कार्ा का अच्छा प्रदशान करने मं े पूणरुप िे िमथा हंगे। जीवनिाथी िे पूणा िहर्ोग की प्रासप्त होगी। पररवार मं खुसशर्ो ा का माहोल रहे गा और पररवार मं फकिी नर्े िदस्र् फक वृत्रद्ध होने क र्ोग बन रहे है । े 16 िे 31 मई 2012 : कार्ाक्षेि मं आपक जोश एवं उत्िाह मं सनरं तर वृत्रद्ध होगी। े आर् िे व्र्र् बढ िकता हं । गुप्त त्रवरोधी-शिुओं क कारण धन हासन हो िकती है । प्रेम िंबंसधत मामलं मं िफलता प्राप्त े होने क अच्छे िंकत हं । आपकी वाणी पर सनर्ंिण रखं अडर्था ररश्तं मं खटाि आिकती हं । अपने खाने- पीने का े े ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है ।
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    59 मई 2012 तुला: 1 िे 15 मई 2012 : अपने महत्वपूणा कार्ो को कुशलता िे पूरा करने का प्रर्ाि करं । अपने इष्ट समिं र्ा पररवार क फकिी िदस्र्क िाथ मं मतभेद िंभव हं । अपने खाने-पीने का त्रवशेष ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् े े नरम हो िकता है । आपक उच्िासधकारी एवं िहकमीर्ं िे िंबंध प्रसतकल होने क िंकत े ू े े हं । अतः व्र्वहर कशल रहे । ू 16 िे 31 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् क महत्वपूणा जोस्खम भरे कार्ा करने िे बिे। े भूसम-भवन िे िंबंसधअ मामलो मं सिंता रह िकती हं । अपने त्रवरोधी एवं शिु पक्ष िे िावधान रहं आप पर झूठे आरोप लग िकते है । जीवन िाथी क िाथ वैिाररक मतभेद े िंभव हं । धासमाक र्ािा र्ा दरस्थ स्थानो की र्ािा होने क र्ोग हं । पररवार क फकिी ू े े िदस्र् का स्वास्थ्र् कमजोर हो िकता हं । वृस्श्चक: 1 िे 15 मई 2012 : आपको कमाक्षेि मं त्रवशेष पद प्रासप्त क र्ोग व धन े वृत्रद्ध क र्ोग बन रहे हं । भूसम-भवन इत्र्ाफद िल-अिल िंपत्रत्त मं पूंस्ज सनवेश करने क े े र्ोग बन िकते हं । घरमं मांगसलक कार्ा िंपडन होने क र्ोग हं । खाने-पीने का त्रवशेष े ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है । प्रेम िंबंसधत मामलो मं भी िफलता प्राप्त कर िकते है । 16 िे 31 मई 2012 : आपक िामास्जक मान-ि्मान और पद-प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी। े ऋण क लेन-दे ने िे बिने का प्रर्ाि करं अडर्था धन की पुनः प्रासप्त-भुगतान मं त्रवलंब े हो िकता हं । महत्वपूणा कार्ो क सलए आवश्र्कता िे असधक खिा करना पि िकता है । पररवार मं खुसशर्ं भरा माहोल े आपकी प्रिडनता मं वृत्रद्ध करे गा। जीवन िाथी िे िहर्ोग प्राप्त होगा। शुभ िमािार फक प्रासप्त हो िकती हं । धनु: 1 िे 15 मई 2012 : आपकी महत्वपूणा र्ोजनाए पूणा हो िकती हं । कार्ाक्षेि मं आपक जोश एवं उत्िाह मं वृत्रद्ध होने िे आपको मनोनुकल लाभ प्राप्त होगा। अपनी े ू असधक खिा करने फक प्रवृत्रत्त पर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं । आपक त्रवरोधी एवं शिु े पक्ष परास्त हंगे। अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे। पररवार क फकिी िदस्र् का स्वास्थ्र् े कमजोर हो िकता हं । 16 िे 31 मई 2012 : इि दौरान पूंस्ज सनवेश र्ा भूसम-भवन िे िंबंसधअ मामलो मं ितक रहे अडर्था भारी नुक्शान हो िकता हं । महत्व क कार्ो क सलर्े अत्र्ासधक ा े े खिा क र्ोग बन रहे हं । आपक भौसतक िुख-िाधनो मं वृत्रद्ध होगी। पररवार मं े े मांगसलक कार्ा हो िकते हं एवं शुभ िमािार फक प्रासप्त हो िकती हं । धासमाक र्ािा र्ा दरस्थ स्थानो की र्ािा होने क ू े र्ोग हं ।
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    60 मई 2012 मकर: 1 िे 15 मई 2012 : र्फद आप नौकरी मं हं तो पदौडनसत हो िकती हं र्ा नई नौकरी प्राप्त हो िकती हं , व्र्विार् मं हं तो उडनती फक मागा प्रिस्त हंगे। इि अवसध मं िल-अिल िंपत्रत्त मं पूंस्ज सनवेश करना आपक सलए त्रवशेष रुप िे फार्दे मंद हो िकता हं । पररवार मं माता- े त्रपता क स्वास्थ्र् क प्रसत त्रवशेष ध्र्ान रखना पि िकता हं । जीवन िाथी का पूणा े े िहर्ोग प्राप्त होगा। 16 िे 31 मई 2012 : र्फद आप नौकरी मं हं तो अपने कार्ा का अच्छा प्रदशान करने मं िमथा हंगे। एकासधक स्त्रोत िे धन प्रासप्त क र्ोग बन रहे हं । भूसम-भवन-वाहन िे े िंबंसध कार्ो मं त्रवशेष लाभ प्रासप्त क र्ोग उत्तम रहं गे। समि एवं पररवार क लोगो का े े िहर्ोग प्राप्त होगा। अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे अडर्था आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है । कभ: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं उडनसत व आर्क नए स्त्रोत समलने क ंु े े र्ोग हं । आपकी आसथाक मं िुधार होगा। भूसम-भवन-वाहन की प्राप्ती हो िकती हं । स्वास्थ्र् िुख मं वृत्रद्ध होगी फफर भी खाने- पीने का त्रवशेष ध्र्ान रखना फहतकारी रहे गा। दरस्थानो की व्र्वास्र्ीक र्ािाएं लाभप्रद रहे गी। हं । प्रेम िंबंधो मं िफलता प्राप्त होगी। ू 16 िे 31 मई 2012 : आकस्स्मक धन प्रासप्त क र्ोग बनेगं स्जस्िे आसथाक स्स्थती मं े िुधार होगा। अपनी असधक खिा करने फक प्रवृत्रत्त पर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं । कोटा -किहरी क कार्ो मं िफलता प्राप्त हो िकती हं । पररवार क लोग एवं समि वगा का े े पूणा िहर्ोग प्राप्त होगा। पररवार क फकिी िदस्र् का स्वस्थ्र् कमजोर हो िकता हं । जीवन िाथी िे आस्त्मर्ता की े कमी महिूि कर िकते हं । मीन: 1 िे 15 मई 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं आसथाक लेन-दे न िे िंबंसधत कार्ो मं त्रवशेष िावधानी बरते। शिुओं पर आपका प्रभाव रहे गा। आपक त्रवरोधी एवं शिु पक्ष परास्त हंगे। पररवार मं मांगसलक े कार्ा िंपडन होने क अच्छे र्ोग हं । अपने पररजनो का पूणा प्रेम व िहर्ोग आपको प्राप्त े होगा। प्रेम िंबंसधत मामलो मं भी िफलता प्राप्त कर िकते है । दांपत्र् जीवन िुखमर् रहे गा। 16 िे 31 मई 2012 : आपको कार्ा क्षेि मं नर्े अविर प्राप्त अहो िकते हं । आकस्स्मक धन प्रासप्त क र्ोग बन रहे हं । े भूसम-भवन-वाहन िे िंबंसधअ कार्ो िे लाभ प्रासप्त िंभव हं । आपकी िामस्जक प्रसतष्ठाभी इि अवसध मं बढे गी। व्र्विासर्क र्ािा मं िफलता प्राप्त हो िकती है । खान-पान का त्रवशेष ध्र्ान रखं। अत्रववाफहत हं तो त्रववाह क र्ोग बन रहे हं । े
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    61 मई 2012 मई 2012 मासिक पंिांग िंद्र फद वार माह पक्ष सतसथ िमासप्त नक्षि िमासप्त र्ोग िमासप्त करण िमासप्त िमासप्त रासश 1 मंगल वैशाख शुक्ल दशमी 25:04:38 मघा 17:24:19 वृत्रद्ध 10:40:15 तैसतल 13:57:08 सिंह - 2 बुध वैशाख शुक्ल एकादशी 22:47:51 पूवााफाल्गुनी 16:06:36 ध्रुव 08:07:32 वस्णज 12:00:59 सिंह 21:41:00 3 गुरु वैशाख शुक्ल द्वादशी 19:55:28 उत्तराफाल्गुनी 14:11:25 हषाण 25:26:25 बव 09:25:28 कडर्ा - 4 शुक्र वैशाख शुक्ल िर्ोदशी 16:33:07 हस्त 11:44:22 वज्र 21:30:18 कौलव 06:17:10 कडर्ा 22:22:00 5 शसन वैशाख शुक्ल ितुदाशी 12:53:53 सििा 08:56:42 सित्रद्ध 17:20:08 वस्णज 12:53:53 तुला - 6 रत्रव वैशाख शुक्ल पूस्णामा 09:05:19 स्वाती 05:57:49 व्र्सतपात 13:04:22 बव 09:05:19 तुला 21:43:00 7 प्रसतपदा/ िोम ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण 25:43:00 अनुराधा 24:11:08 वररर्ान 08:53:19 तैसतल 15:28:56 वृस्श्चक - फद्वतीर्ा 8 मंगल ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण तृतीर्ा 22:28:13 जेष्ठा 21:43:13 सशव 25:09:28 वस्णज 12:01:58 वृस्श्चक 21:43:00 9 बुध ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण ितुथी 19:42:30 मूल 19:44:22 सित्रद्ध 21:51:52 बव 09:01:15 धनु - 10 गुरु ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण पंिमी 17:32:26 पूवााषाढ़ 18:22:07 िाध्र् 19:05:15 कौलव 06:32:26 धनु 24:07:00 11 शुक्र ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण षष्ठी 16:05:31 उत्तराषाढ़ 17:41:08 शुभ 16:51:27 वस्णज 16:05:31 मकर - 12 शसन ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण िप्तमी 15:21:44 श्रवण 17:44:14 शुक्ल 15:14:14 बव 15:21:44 मकर - 13 रत्रव ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण अष्टमी 15:23:55 धसनष्ठा 18:30:29 ब्रह्म 14:12:40 कौलव 15:23:55 मकर 06:02:00 14 िोम ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण नवमी 16:08:18 शतसभषा 19:58:56 इडद्र 13:44:52 गर 16:08:18 कभ ुं - 15 मंगल ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण दशमी 17:29:17 पूवााभाद्रपद 22:03:58 वैधसत ृ 13:48:02 त्रवत्रष्ट 17:29:17 कभ ुं 15:29:00 16 बुध ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण एकादशी 19:22:09 उत्तराभाद्रपद 24:36:13 त्रवषकभ ुं 14:13:43 बव 06:22:09 मीन - 17 गुरु ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण द्वादशी 21:37:32 रे वसत 27:27:13 प्रीसत 14:58:10 कौलव 08:27:13 मीन 27:28:00
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    62 मई 2012 18 शुक्र ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण िर्ोदशी 24:07:01 अस्श्वनी 30:32:19 आर्ुष्मान 15:56:42 गर 10:51:04 मेष - 19 शसन ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण ितुदाशी 26:42:08 अस्श्वनी 06:32:45 िौभाग्र् 17:00:53 त्रवत्रष्ट 13:24:19 मेष - 20 अमाव रत्रव ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण 29:17:16 भरणी 09:40:43 शोभन 18:06:58 ितुष्पाद 16:01:20 मेष 16:28:00 स्र्ा 21 िोम ज्र्ेष्ठ शुक्ल प्रसतपदा 31:44:56 कृ सतका 12:46:49 असतगंि 19:08:22 फकस्तुघ्न 18:32:45 वृष - 22 मंगल ज्र्ेष्ठ शुक्ल प्रसतपदा 07:44:30 रोफहस्ण 15:44:30 िुकमाा 20:02:19 बव 07:44:30 वृष 29:07:00 23 बुध ज्र्ेष्ठ शुक्ल फद्वतीर्ा 09:56:16 मृगसशरा 18:25:20 धृसत 20:43:09 कौलव 09:56:16 समथुन - 24 गुरु ज्र्ेष्ठ शुक्ल तृतीर्ा 11:49:19 आद्रा 20:45:34 शूल 21:06:11 गर 11:49:19 समथुन - 25 शुक्र ज्र्ेष्ठ शुक्ल ितुथी 13:16:08 पुनवािु 22:38:38 गंि 21:07:41 त्रवत्रष्ट 13:16:08 समथुन 16:13:00 26 शसन ज्र्ेष्ठ शुक्ल पंिमी 14:12:02 पुष्र् 23:59:50 वृत्रद्ध 20:44:50 बालव 14:12:02 कका - 27 रत्रव ज्र्ेष्ठ शुक्ल षष्ठी 14:30:27 अश्लेषा 24:44:31 ध्रुव 19:51:05 तैसतल 14:30:27 कका 24:45:00 28 िोम ज्र्ेष्ठ शुक्ल िप्तमी 14:11:24 मघा 24:50:46 व्र्ाघात 18:28:16 वस्णज 14:11:24 सिंह - 29 मंगल ज्र्ेष्ठ शुक्ल अष्टमी 13:12:03 पूवााफाल्गुनी 24:17:41 हषाण 16:32:41 बव 13:12:03 सिंह - 30 नवमी- बुध ज्र्ेष्ठ शुक्ल 11:33:21 उत्तराफाल्गुनी 23:06:10 वज्र 14:06:10 कौलव 11:33:21 सिंह 06:03:00 दशमी 31 दशमी- गुरु ज्र्ेष्ठ शुक्ल 09:19:03 हस्त 21:21:52 सित्रद्ध 11:10:37 गर 09:19:03 कडर्ा - एकादशी क्र्ा आप फकिी िमस्र्ा िे ग्रस्त हं ? आपक पाि अपनी िमस्र्ाओं िे छटकारा पाने हे तु पूजा-अिाना, िाधना, े ु मंि जाप इत्र्ाफद करने का िमर् नहीं हं ? अब आप अपनी िमस्र्ाओं िे बीना फकिी त्रवशेष पूजा-अिाना, त्रवसध-त्रवधान क आपको अपने कार्ा मं िफलता प्राप्त कर िक एवं आपको अपने जीवन क िमस्त िुखो को प्राप्त करने का मागा े े े प्राप्त हो िक इि सलर्े गुरुत्व कार्ाालत द्वारा हमारा उद्दे श्र् शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण- े प्रसतत्रष्ठत पूणा िैतडर् र्ुि त्रवसभडन प्रकार क र्डि- कवि एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोिाने का हं । े े GURUTVA KARYALAY: BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) , Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785, Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
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    63 मई 2012 मई -2012 मासिक व्रत-पवा-त्र्ौहार फद वार माह पक्ष सतसथ िमासप्त प्रमुख व्रत-त्र्ोहार 1 मंगल वैशाख शुक्ल दशमी 25:04:38 श्रसमक फदवि, श्रीमहावीर स्वामी कवल्र्-ज्ञान कल्र्ाणक, ै मोफहनी एकादशी व्रत, लक्ष्मीनारार्ण एकादशी, त्रवजर्ा एकादशी व्रत, 2 बुध वैशाख शुक्ल एकादशी 22:47:51 श्रीफहत (फहताब्द) िंवत ् 539 प्रारं भ, नारद एकादशी, िु मटबल र्ािा(कश्मी) एकादशी व्रत (सन्बाक), प्रदोष व्रत, रुस्क्मणी द्वादशी, परशुराम द्वादशी, ा 3 गुरु वैशाख शुक्ल द्वादशी 19:55:28 मधुिूदन द्वादशी, श्र्ामबाबा द्वादशी, नृसिंह ितुदाशी व्रत, नृसिंहावतार जर्ंती महोत्िव, सछडनमस्ता महात्रवद्या 4 शुक्र वैशाख शुक्ल िर्ोदशी 16:33:07 जर्ंती, श्रीआद्यशंकरािार्ा कलाि गमन, श्रीगणेश ै ितुदाशी, पूस्णामा व्रत, 5 शसन वैशाख शुक्ल ितुदाशी 12:53:53 श्रीित्र्नारार्ण व्रत कथा, कमाावतार जर्ंती, ू स्नान दान हे तु उत्तम वैशाखी पूस्णामा, बुद्ध पूस्णामा, बुद्ध पररसनवााण ि्वत ् 2556 प्रारं भ, पीपल पूनम, वृडदावन त्रवहार, सशप्रा स्नान 6 रत्रव वैशाख शुक्ल पूस्णामा 09:05:19 (उज्जसर्नी), र्मराज क सनसमत्त जलकभ दान, वैशाख स्नान पूण, े ुं ा पुष्करादे वी जर्ंती, मोतीलाल नेहरू जर्ंती, प्रसतपदा- 7 िोम ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण 25:43:00 दे वत्रषा नारद जर्ंती, रवीडद्रनाथ टै गोर जर्ंती (तारीख िे) फद्वतीर्ा 8 मंगल ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण तृतीर्ा 22:28:13 रे िक्राि फदवि. िंकष्टी श्रीगणेश ितुथी व्रत (िं.उ.रा.10.2), मां आनडदमर्ी जर्ंती, 9 बुध ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण ितुथी 19:42:30 गोपालकृ ष्ण गोखले जर्ंती, 10 गुरु ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण पंिमी 17:32:26 वैधसत महापात िार्ं 4.32 िे रात्रि 12.15 बजे तक, ृ 11 शुक्र ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण षष्ठी 16:05:31 िंत तारण तरण गुरुपवी, 12 शसन ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण िप्तमी 15:21:44 कालाष्टमी व्रत, 13 रत्रव ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण अष्टमी 15:23:55 शीतलाष्टमी बिौिा, त्रिलोकीनाथाष्टमी (प.बंगाल), मातृ फदवि, मदिा िे , वृषभ-िंक्रास्डत िार्ं 4.11 बजे, िंक्रास्डत क स्नान-दान का पुण्र्काल े 14 िोम ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण नवमी 16:08:18 प्रात: 9.47 िे िंध्र्ा 4.11 बजे तक, पूजा-िंकल्प हे तु उत्तम ग्रीष्मऋतु प्रारं भ, कल्पवाि पूण, ा
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    64 मई 2012 15 मंगल ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण दशमी 17:29:17 त्रवश्व पररवार फदवि, िौर ज्र्ेष्ठ माि प्रा अपरा (अिला) एकादशी व्रत, जलक्रीिा एकादशी, पंजाब मं भद्रकाली 16 बुध ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण एकादशी 19:22:09 ग्र्ारि, 17 गुरु ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण द्वादशी 21:37:32 - 18 शुक्र ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण िर्ोदशी 24:07:01 प्रदोष व्रत, त्रिफदविीर् वटिात्रविी व्रत प्रारं भ (उ.भारत) 19 शसन ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण ितुदाशी 26:42:08 मासिक सशवरात्रि व्रत, िात्रविी ितुदाशी (प.बंगाल) स्नान-दान हे तु उत्तम श्राद्ध की ज्र्ेष्ठी अमावस्र्ा, वटिात्रविी अमावस्र्ा (बरगदाही अमावि), भावुका अमावि, कररफदन, शसन जर्ंती, फलहाररणी 20 रत्रव ज्र्ेष्ठ कृ ष्ण अमावस्र्ा 29:17:16 कासलका पूजा (प.बंगाल), खण्िग्राि िूर्ग्रहण, िूर्ा िार्न समथुन रासश ा मं रात्रि 8.47 बजे, गंगा दशहरा स्नान प्रारं भ, करवीर व्रत, राजीव गांधी स्मृसत फदवि, 21 िोम ज्र्ेष्ठ शुक्ल प्रसतपदा 31:44:56 आतंकवाद-त्रवरोध फदवि 22 मंगल ज्र्ेष्ठ शुक्ल प्रसतपदा 07:44:30 नवीन िंद्र-दशान, राजा राममोहन रार् जर्ंती, 23 बुध ज्र्ेष्ठ शुक्ल फद्वतीर्ा 09:56:16 र्भातृतीर्ा व्रत, व्र्सतपात महापात फदन 3.42 बजे िे, वरदत्रवनार्क ितुथी व्रत(िं.उ.रा.9.37), महाराणा प्रताप जर्ंती, 24 गुरु ज्र्ेष्ठ शुक्ल तृतीर्ा 11:49:19 व्र्सतपात महापात प्रात: 8.19 बजे तक 25 मई- उमा ितुथी, 25 शुक्र ज्र्ेष्ठ शुक्ल ितुथी 13:16:08 पुष्र् नक्षि (रात्रि 7.39 िे) 26 शसन ज्र्ेष्ठ शुक्ल पंिमी 14:12:02 महादे व त्रववाह (उिीिा), स्कडद कमार षष्ठी व्रत ु अरण्र्षष्ठी, त्रवंध्र्वासिनी महापूजा, जमाई षष्ठी, शीतला षष्ठी, पं. नेहरू 27 रत्रव ज्र्ेष्ठ शुक्ल षष्ठी 14:30:27 स्मृसत फदवि, 28 िोम ज्र्ेष्ठ शुक्ल िप्तमी 14:11:24 बटु कभैरव जर्ंती (काशी), वीर िावरकर जर्ंती. श्रीदगााष्टमी ु व्रत, श्रीअडनपूणााष्टमी व्रत, धूमावती महात्रवद्या जर्ंती, 29 मंगल ज्र्ेष्ठ शुक्ल अष्टमी 13:12:03 ज्र्ेष्ठाष्टमी, नवमी- 30 बुध ज्र्ेष्ठ शुक्ल 11:33:21 श्रीमहे श नवमी, प्रािीन गणनानुिार गंगा-दशहरा, दशमी दशमी- दृश्र्गस्णतानुिार गंगा-दशहरा, सनजाला एकादशी व्रत (स्माता), 31 गुरु ज्र्ेष्ठ शुक्ल 09:19:03 एकादशी श्रीकाशीत्रवश्वनाथ कलशर्ािा फदवि, त्बाक-धूम्रपान सनषेध फदवि ू
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    65 मई 2012 गणेश लक्ष्मी र्ंि प्राण-प्रसतत्रष्ठत गणेश लक्ष्मी र्ंि को अपने घर-दकान-ओफफि-फक्टरी मं पूजन स्थान, गल्ला र्ा अलमारी मं स्थात्रपत ु ै करने व्र्ापार मं त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । र्ंि क प्रभाव िे भाग्र् मं उडनसत, मान-प्रसतष्ठा एवं े व्र्ापर मं वृत्रद्ध होती हं एवं आसथाक स्स्थमं िुधार होता हं । गणेश लक्ष्मी र्ंि को स्थात्रपत करने िे भगवान गणेश और दे वी लक्ष्मी का िंर्ुि आशीवााद प्राप्त होता हं । Rs.730 िे Rs.10900 तक मंगल र्ंि िे ऋण मुत्रि मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररि व्र्त्रि को ऋण े े े मुत्रि हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए मंगल े े र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । प्राण प्रसतत्रष्ठत मंगल र्ंि क पूजन िे भाग्र्ोदर्, शरीर मं खून की े कमी, गभापात िे बिाव, बुखार, िेिक, पागलपन, िूजन और घाव, र्ौन शत्रि मं वृत्रद्ध, शिु त्रवजर्, तंि मंि क दष्ट प्रभा, े ु भूत-प्रेत भर्, वाहन दघटनाओं, हमला, िोरी इत्र्ादी िे बिाव होता हं । ु ा मूल्र् माि Rs- 730 कबेर र्ंि ु कबेर र्ंि क पूजन िे स्वणा लाभ, रत्न लाभ, पैतक ि्पत्ती एवं गिे हुए धन िे लाभ प्रासप्त फक कामना करने वाले ु े ृ व्र्त्रि क सलर्े कबेर र्ंि अत्र्डत िफलता दार्क होता हं । एिा शास्त्रोि विन हं । कबेर र्ंि क पूजन िे एकासधक े ु ु े स्त्रोि िे धन का प्राप्त होकर धन िंिर् होता हं । ताम्र पि पर िुवणा पोलीि ताम्र पि पर रजत पोलीि ताम्र पि पर (Gold Plated) (Silver Plated) (Copper) िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् 1” X 1” 460 1” X 1” 370 1” X 1” 255 2” X 2” 820 2” X 2” 640 2” X 2” 460 3” X 3” 1650 3” X 3” 1090 3” X 3” 730 4” X 4” 2350 4” X 4” 1650 4” X 4” 1090 6” X 6” 3600 6” X 6” 2800 6” X 6” 1900 9” X 9” 6400 9” X 9” 5100 9” X 9” 3250 12” X12” 10800 12” X12” 8200 12” X12” 6400 GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
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    66 मई 2012 नवरत्न जफित श्री र्ंि शास्त्र विन क अनुिार शुद्ध िुवणा र्ा रजत मं सनसमात श्री र्ंि क िारं और र्फद नवरत्न जिवा ने पर र्ह नवरत्न े े जफित श्री र्ंि कहलाता हं । िभी रत्नो को उिक सनस्श्चत स्थान पर जि कर लॉकट क रूप मं धारण करने िे व्र्त्रि को े े े अनंत एश्वर्ा एवं लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । व्र्त्रि को एिा आभाि होता हं जैिे मां लक्ष्मी उिक िाथ हं । नवग्रह को े श्री र्ंि क िाथ लगाने िे ग्रहं की अशुभ दशा का धारण करने वाले व्र्त्रि पर प्रभाव नहीं होता हं । गले मं होने क े े कारण र्ंि पत्रवि रहता हं एवं स्नान करते िमर् इि र्ंि पर स्पशा कर जो जल त्रबंद ु शरीर को लगते हं , वह गंगा जल क िमान पत्रवि होता हं । इि सलर्े इिे िबिे तेजस्वी एवं फलदासर् कहजाता हं । जैिे अमृत िे उत्तम कोई े औषसध नहीं, उिी प्रकार लक्ष्मी प्रासप्त क सलर्े श्री र्ंि िे उत्तम कोई र्ंि िंिार मं नहीं हं एिा शास्त्रोि विन हं । इि े प्रकार क नवरत्न जफित श्री र्ंि गुरूत्व कार्ाालर् द्वारा शुभ मुहूता मं प्राण प्रसतत्रष्ठत करक बनावाए जाते हं । े े अष्ट लक्ष्मी कवि अष्ट लक्ष्मी कवि को धारण करने िे व्र्त्रि पर िदा मां महा लक्ष्मी की कृ पा एवं आशीवााद बना रहता हं । स्जस्िे मां लक्ष्मी क अष्ट रुप (१)-आफद लक्ष्मी, (२)-धाडर् लक्ष्मी, (३)-धैरीर् लक्ष्मी, (४)- े गज लक्ष्मी, (५)-िंतान लक्ष्मी, (६)-त्रवजर् लक्ष्मी, (७)-त्रवद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन िभी रुपो का स्वतः अशीवााद प्राप्त होता हं । मूल्र् माि: Rs-1250 मंि सिद्ध व्र्ापार वृत्रद्ध कवि व्र्ापार वृत्रद्ध कवि व्र्ापार क शीघ्र उडनसत क सलए उत्तम हं । िाहं कोई भी व्र्ापार हो अगर उिमं लाभ क स्थान पर े े े बार-बार हासन हो रही हं । फकिी प्रकार िे व्र्ापार मं बार-बार बांधा उत्पडन हो रही हो! तो िंपूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत मंि सिद्ध पूणा िैतडर् र्ुि व्र्ापात वृत्रद्ध र्ंि को व्र्पार स्थान र्ा घर मं स्थात्रपत करने िे शीघ्र ही व्र्ापार वृत्रद्ध एवं सनतडतर लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् माि: Rs.730 & 1050 मंगल र्ंि (त्रिकोण) मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररि व्र्त्रि को े े े ऋण मुत्रि हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए े े मंगल र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् माि Rs- 730 GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
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    67 मई 2012 त्रववाह िंबंसधत िमस्र्ा क्र्ा आपक लिक-लिकी फक आपकी शादी मं अनावश्र्क रूप िे त्रवल्ब हो रहा हं र्ा उनक वैवाफहक जीवन मं खुसशर्ां कम े े े होती जारही हं और िमस्र्ा असधक बढती जारही हं । एिी स्स्थती होने पर अपने लिक-लिकी फक किली का अध्र्र्न े ुं अवश्र् करवाले और उनक वैवाफहक िुख को कम करने वाले दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे जनकारी प्राप्त े े े े करं । सशक्षा िे िंबंसधत िमस्र्ा क्र्ा आपक लिक-लिकी की पढाई मं अनावश्र्क रूप िे बाधा-त्रवघ्न र्ा रुकावटे हो रही हं ? बच्िो को अपने पूणा पररश्रम े े एवं मेहनत का उसित फल नहीं समल रहा? अपने लिक-लिकी की किली का त्रवस्तृत अध्र्र्न अवश्र् करवाले और े ुं उनक त्रवद्या अध्र्र्न मं आनेवाली रुकावट एवं दोषो क कारण एवं उन दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे े े े े े जनकारी प्राप्त करं । क्र्ा आप फकिी िमस्र्ा िे ग्रस्त हं ? ु आपक पाि अपनी िमस्र्ाओं िे छटकारा पाने हे तु पूजा-अिाना, िाधना, मंि जाप इत्र्ाफद करने का िमर् नहीं हं ? े अब आप अपनी िमस्र्ाओं िे बीना फकिी त्रवशेष पूजा-अिाना, त्रवसध-त्रवधान क आपको अपने कार्ा मं िफलता प्राप्त े कर िक एवं आपको अपने जीवन क िमस्त िुखो को प्राप्त करने का मागा प्राप्त हो िक इि सलर्े गुरुत्व कार्ाालत े े े द्वारा हमारा उद्दे श्र् शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत पूणा िैतडर् र्ुि त्रवसभडन प्रकार के र्डि- कवि एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोिाने का हं । े ज्र्ोसतष िंबंसधत त्रवशेष परामशा ज्र्ोसत त्रवज्ञान, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु एवं आध्र्ास्त्मक ज्ञान िं िंबंसधत त्रवषर्ं मं हमारे 30 वषो िे असधक वषा के अनुभवं क िाथ ज्र्ोसति िे जुिे नर्े-नर्े िंशोधन क आधार पर आप अपनी हर िमस्र्ा क िरल िमाधान प्राप्त कर े े े िकते हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com ओनेक्ि जो व्र्त्रि पडना धारण करने मे अिमथा हो उडहं बुध ग्रह क उपरत्न ओनेक्ि को धारण करना िाफहए। े उच्ि सशक्षा प्रासप्त हे तु और स्मरण शत्रि क त्रवकाि हे तु ओनेक्ि रत्न की अंगूठी को दार्ं हाथ की िबिे छोटी े उं गली र्ा लॉकट बनवा कर गले मं धारण करं । ओनेक्ि रत्न धारण करने िे त्रवद्या-बुत्रद्ध की प्रासप्त हो होकर स्मरण े शत्रि का त्रवकाि होता हं ।
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    68 मई 2012 मई 2012 -त्रवशेष र्ोग कार्ा सित्रद्ध र्ोग 5 प्रात: 8:55 िे फदन-रात 18 ि्पूणा फदन-रात 7 िूर्ोदर् िे रात्रि 12:11 तक 21 फदन 12:46 िे रातभर िंध्र्ा 5:40 िे 12 मई को िार्ं 11 23 िूर्ोदर् िे िंध्र्ा 6:25 तक 5:43 तक रात्रि 8:44 िे 25 मई को रात्रि 10:38 15 रात्रि 10:02 िे रातभर 24 तक 17 ि्पूणा फदन-रात 30 रात्रि 11:05 िे िूर्ोदर् तक फद्वपुष्कर (दोगुना फल) र्ोग 22 फदन 3:43 िे रात्रिपर्ाडत र्ोग फल :  कार्ा सित्रद्ध र्ोग मे फकर्े गर्े शुभ कार्ा मे सनस्श्चत िफलता प्राप्त होती हं , एिा शास्त्रोि विन हं ।  फद्वपुष्कर र्ोग मं फकर्े गर्े शुभ कार्ो का लाभ दोगुना होता हं । एिा शास्त्रोि विन हं । दै सनक शुभ एवं अशुभ िमर् ज्ञान तासलका गुसलक काल र्म काल राहु काल (शुभ) (अशुभ) (अशुभ) वार िमर् अवसध िमर् अवसध िमर् अवसध रत्रववार 03:00 िे 04:30 12:00 िे 01:30 04:30 िे 06:00 िोमवार 01:30 िे 03:00 10:30 िे 12:00 07:30 िे 09:00 मंगलवार 12:00 िे 01:30 09:00 िे 10:30 03:00 िे 04:30 बुधवार 10:30 िे 12:00 07:30 िे 09:00 12:00 िे 01:30 गुरुवार 09:00 िे 10:30 06:00 िे 07:30 01:30 िे 03:00 शुक्रवार 07:30 िे 09:00 03:00 िे 04:30 10:30 िे 12:00 शसनवार 06:00 िे 07:30 01:30 िे 03:00 09:00 िे 10:30
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    69 मई 2012 फदन क िौघफिर्े े िमर् रत्रववार िोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शसनवार 06:00 िे 07:30 उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ िल काल 07:30 िे 09:00 िल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ 09:00 िे 10:30 लाभ शुभ िल काल उद्वे ग अमृत रोग 10:30 िे 12:00 अमृत रोग लाभ शुभ िल काल उद्वे ग 12:00 िे 01:30 काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ िल 01:30 िे 03:00 शुभ िल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ 03:00 िे 04:30 रोग लाभ शुभ िल काल उद्वे ग अमृत 04:30 िे 06:00 उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ िल काल रात क िौघफिर्े े िमर् रत्रववार िोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शसनवार 06:00 िे 07:30 शुभ िल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ 07:30 िे 09:00 अमृत रोग लाभ शुभ िल काल उद्वे ग 09:00 िे 10:30 िल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ 10:30 िे 12:00 रोग लाभ शुभ िल काल उद्वे ग अमृत 12:00 िे 01:30 काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ िल 01:30 िे 03:00 लाभ शुभ िल काल उद्वे ग अमृत रोग 03:00 िे 04:30 उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ िल काल 04:30 िे 06:00 शुभ िल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शास्त्रोि मत क अनुशार र्फद फकिी भी कार्ा का प्रारं भ शुभ मुहूता र्ा शुभ िमर् पर फकर्ा जार्े तो कार्ा मं िफलता े प्राप्त होने फक िंभावना ज्र्ादा प्रबल हो जाती हं । इि सलर्े दै सनक शुभ िमर् िौघफिर्ा दे खकर प्राप्त फकर्ा जा िकता हं । नोट: प्रार्ः फदन और रात्रि क िौघफिर्े फक सगनती क्रमशः िूर्ोदर् और िूर्ाास्त िे फक जाती हं । प्रत्र्ेक िौघफिर्े फक अवसध 1 े घंटा 30 समसनट अथाात िे ढ़ घंटा होती हं । िमर् क अनुिार िौघफिर्े को शुभाशुभ तीन भागं मं बांटा जाता हं , जो क्रमशः शुभ, े मध्र्म और अशुभ हं । िौघफिर्े क स्वामी ग्रह े * हर कार्ा क सलर्े शुभ/अमृत/लाभ का े शुभ िौघफिर्ा मध्र्म िौघफिर्ा अशुभ िौघफिर्ा िौघफिर्ा उत्तम माना जाता हं । िौघफिर्ा स्वामी ग्रह िौघफिर्ा स्वामी ग्रह िौघफिर्ा स्वामी ग्रह शुभ गुरु िर शुक्र उद्बे ग िूर्ा * हर कार्ा क सलर्े िल/काल/रोग/उद्वे ग े अमृत िंद्रमा काल शसन का िौघफिर्ा उसित नहीं माना जाता। लाभ बुध रोग मंगल
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    70 मई 2012 फदन फक होरा - िूर्ोदर् िे िूर्ाास्त तक वार 1.घं 2.घं 3.घं 4.घं 5.घं 6.घं 7.घं 8.घं 9.घं 10.घं 11.घं 12.घं रत्रववार िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन िोमवार िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा मंगलवार मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र बुधवार बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल गुरुवार गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध शुक्रवार शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु शसनवार शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र रात फक होरा – िूर्ाास्त िे िूर्ोदर् तक रत्रववार गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िोमवार शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगलवार शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुधवार िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरुवार िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्रवार मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसनवार बुध िंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िंद्र शसन गुरु मंगल होरा मुहूता को कार्ा सित्रद्ध क सलए पूणा फलदार्क एवं अिूक माना जाता हं , फदन-रात क २४ घंटं मं शुभ-अशुभ िमर् े े को िमर् िे पूवा ज्ञात कर अपने कार्ा सित्रद्ध क सलए प्रर्ोग करना िाफहर्े। े त्रवद्वानो क मत िे इस्च्छत कार्ा सित्रद्ध क सलए ग्रह िे िंबंसधत होरा का िुनाव करने िे त्रवशेष लाभ े े प्राप्त होता हं ।  िूर्ा फक होरा िरकारी कार्ो क सलर्े उत्तम होती हं । े  िंद्रमा फक होरा िभी कार्ं क सलर्े उत्तम होती हं । े  मंगल फक होरा कोटा -किेरी क कार्ं क सलर्े उत्तम होती हं । े े  बुध फक होरा त्रवद्या-बुत्रद्ध अथाात पढाई क सलर्े उत्तम होती हं । े  गुरु फक होरा धासमाक कार्ा एवं त्रववाह क सलर्े उत्तम होती हं । े  शुक्र फक होरा र्ािा क सलर्े उत्तम होती हं । े  शसन फक होरा धन-द्रव्र् िंबंसधत कार्ा क सलर्े उत्तम होती हं । े
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    71 मई 2012 ग्रह िलन मई -2012 Day Sun Mon Ma Me Jup Ven Sat ah Ket Ua Nep Plu 1 00:16:59 04:06:30 04:11:16 11:22:50 00:26:10 01:26:12 06:00:59 07:11:16 01:11:16 11:12:30 10:08:47 08:15:25 2 00:17:57 04:20:23 04:11:27 11:24:19 00:26:24 01:26:40 06:00:55 07:11:14 01:11:14 11:12:33 10:08:48 08:15:24 3 00:18:56 05:04:42 04:11:39 11:25:50 00:26:38 01:27:06 06:00:51 07:11:11 01:11:11 11:12:36 10:08:49 08:15:24 4 00:19:54 05:19:27 04:11:52 11:27:22 00:26:52 01:27:31 06:00:47 07:11:08 01:11:08 11:12:39 10:08:50 08:15:23 5 00:20:52 06:04:29 04:12:05 11:28:57 00:27:06 01:27:54 06:00:42 07:11:05 01:11:05 11:12:42 10:08:51 08:15:22 6 00:21:50 06:19:42 04:12:18 00:00:34 00:27:21 01:28:15 06:00:38 07:11:04 01:11:04 11:12:45 10:08:52 08:15:22 7 00:22:48 07:04:55 04:12:32 00:02:12 00:27:35 01:28:35 06:00:34 07:11:03 01:11:03 11:12:47 10:08:53 08:15:21 8 00:23:46 07:19:59 04:12:47 00:03:52 00:27:49 01:28:52 06:00:30 07:11:03 01:11:03 11:12:50 10:08:54 08:15:20 9 00:24:44 08:04:45 04:13:02 00:05:35 00:28:03 01:29:08 06:00:26 07:11:04 01:11:04 11:12:53 10:08:55 08:15:19 10 00:25:42 08:19:08 04:13:17 00:07:19 00:28:18 01:29:21 06:00:22 07:11:05 01:11:05 11:12:56 10:08:56 08:15:18 11 00:26:40 09:03:05 04:13:33 00:09:05 00:28:32 01:29:33 06:00:18 07:11:06 01:11:06 11:12:58 10:08:57 08:15:18 12 00:27:38 09:16:36 04:13:50 00:10:54 00:28:46 01:29:42 06:00:14 07:11:07 01:11:07 11:13:01 10:08:57 08:15:17 13 00:28:36 09:29:42 04:14:06 00:12:44 00:29:00 01:29:49 06:00:11 07:11:07 01:11:07 11:13:04 10:08:58 08:15:16 14 00:29:34 10:12:27 04:14:24 00:14:36 00:29:14 01:29:54 06:00:07 07:11:06 01:11:06 11:13:06 10:08:59 08:15:15 15 01:00:32 10:24:53 04:14:41 00:16:30 00:29:29 01:29:57 06:00:03 07:11:06 01:11:06 11:13:09 10:08:59 08:15:14 16 01:01:30 11:07:05 04:15:00 00:18:26 00:29:43 01:29:57 06:00:00 07:11:04 01:11:04 11:13:11 10:09:00 08:15:13 17 01:02:27 11:19:06 04:15:18 00:20:24 00:29:57 01:29:55 05:29:56 07:11:03 01:11:03 11:13:14 10:09:01 08:15:12 18 01:03:25 00:01:00 04:15:37 00:22:24 01:00:11 01:29:50 05:29:53 07:11:02 01:11:02 11:13:16 10:09:01 08:15:11 19 01:04:23 00:12:49 04:15:57 00:24:25 01:00:25 01:29:43 05:29:49 07:11:01 01:11:01 11:13:19 10:09:02 08:15:10 20 01:05:21 00:24:36 04:16:16 00:26:29 01:00:40 01:29:34 05:29:46 07:11:01 01:11:01 11:13:21 10:09:02 08:15:09 21 01:06:18 01:06:24 04:16:36 00:28:33 01:00:54 01:29:22 05:29:43 07:11:00 01:11:00 11:13:24 10:09:03 08:15:08 22 01:07:16 01:18:15 04:16:57 01:00:40 01:01:08 01:29:08 05:29:39 07:11:00 01:11:00 11:13:26 10:09:03 08:15:07 23 01:08:14 02:00:11 04:17:18 01:02:48 01:01:22 01:28:52 05:29:36 07:11:01 01:11:01 11:13:28 10:09:04 08:15:05 24 01:09:12 02:12:15 04:17:39 01:04:57 01:01:36 01:28:33 05:29:33 07:11:01 01:11:01 11:13:31 10:09:04 08:15:04 25 01:10:09 02:24:28 04:18:01 01:07:07 01:01:51 01:28:12 05:29:30 07:11:01 01:11:01 11:13:33 10:09:05 08:15:03 26 01:11:07 03:06:54 04:18:23 01:09:18 01:02:05 01:27:48 05:29:28 07:11:01 01:11:01 11:13:35 10:09:05 08:15:02 27 01:12:05 03:19:36 04:18:45 01:11:30 01:02:19 01:27:23 05:29:25 07:11:01 01:11:01 11:13:37 10:09:05 08:15:01 28 01:13:02 04:02:36 04:19:08 01:13:41 01:02:33 01:26:55 05:29:22 07:11:01 01:11:01 11:13:39 10:09:06 08:15:00 29 01:14:00 04:15:57 04:19:31 01:15:53 01:02:47 01:26:26 05:29:19 07:11:01 01:11:01 11:13:41 10:09:06 08:14:58 30 01:14:57 04:29:40 04:19:54 01:18:05 01:03:01 01:25:55 05:29:17 07:11:01 01:11:01 11:13:43 10:09:06 08:14:57 31 01:15:55 05:13:47 04:20:18 01:20:16 01:03:15 01:25:22 05:29:14 07:11:01 01:11:01 11:13:45 10:09:06 08:14:56
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    72 मई 2012 िवा रोगनाशक र्ंि/कवि मनुष्र् अपने जीवन क त्रवसभडन िमर् पर फकिी ना फकिी िाध्र् र्ा अिाध्र् रोग िे ग्रस्त होता हं । े उसित उपिार िे ज्र्ादातर िाध्र् रोगो िे तो मुत्रि समल जाती हं , लेफकन कभी-कभी िाध्र् रोग होकर भी अिाध्र्ा होजाते हं , र्ा कोइ अिाध्र् रोग िे ग्रसित होजाते हं । हजारो लाखो रुपर्े खिा करने पर भी असधक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। िॉक्टर द्वारा फदजाने वाली दवाईर्ा अल्प िमर् क सलर्े कारगर िात्रबत होती हं , एसि स्स्थती मं लाभा प्रासप्त क े े सलर्े व्र्त्रि एक िॉक्टर िे दिरे िॉक्टर क िक्कर लगाने को बाध्र् हो जाता हं । ू े भारतीर् ऋषीर्ोने अपने र्ोग िाधना क प्रताप िे रोग शांसत हे तु त्रवसभडन आर्ुवर औषधो क असतररि र्ंि, े े े मंि एवं तंि उल्लेख अपने ग्रंथो मं कर मानव जीवन को लाभ प्रदान करने का िाथाक प्रर्ाि हजारो वषा पूवा फकर्ा था। बुत्रद्धजीवो क मत िे जो व्र्त्रि जीवनभर अपनी फदनिर्ाा पर सनर्म, िंर्म रख कर आहार ग्रहण करता हं , एिे व्र्त्रि े को त्रवसभडन रोग िे ग्रसित होने की िंभावना कम होती हं । लेफकन आज क बदलते र्ुग मं एिे व्र्त्रि भी भर्ंकर रोग े िे ग्रस्त होते फदख जाते हं । क्र्ोफक िमग्र िंिार काल क अधीन हं । एवं मृत्र्ु सनस्श्चत हं स्जिे त्रवधाता क अलावा े े और कोई टाल नहीं िकता, लेफकन रोग होने फक स्स्थती मं व्र्त्रि रोग दर करने का प्रर्ाि तो अवश्र् कर िकता हं । ू इि सलर्े र्ंि मंि एवं तंि क कशल जानकार िे र्ोग्र् मागादशान लेकर व्र्त्रि रोगो िे मुत्रि पाने का र्ा उिक प्रभावो े ु े को कम करने का प्रर्ाि भी अवश्र् कर िकता हं । ज्र्ोसतष त्रवद्या क कशल जानकर भी काल पुरुषकी गणना कर अनेक रोगो क अनेको रहस्र् को उजागर कर े ु े िकते हं । ज्र्ोसतष शास्त्र क माध्र्म िे रोग क मूलको पकिने मे िहर्ोग समलता हं , जहा आधुसनक सिफकत्िा शास्त्र े े अक्षम होजाता हं वहा ज्र्ोसतष शास्त्र द्वारा रोग क मूल(जि) को पकि कर उिका सनदान करना लाभदार्क एवं े उपार्ोगी सिद्ध होता हं । हर व्र्त्रि मं लाल रं गकी कोसशकाए पाइ जाती हं , स्जिका सनर्मीत त्रवकाि क्रम बद्ध तरीक िे होता रहता हं । े जब इन कोसशकाओ क क्रम मं पररवतान होता हं र्ा त्रवखंफिन होता हं तब व्र्त्रि क शरीर मं स्वास्थ्र् िंबंधी त्रवकारो े े उत्पडन होते हं । एवं इन कोसशकाओ का िंबंध नव ग्रहो क िाथ होता हं । स्जस्िे रोगो क होने क कारणा व्र्त्रिक े े े े जडमांग िे दशा-महादशा एवं ग्रहो फक गोिर मं स्स्थती िे प्राप्त होता हं । िवा रोग सनवारण कवि एवं महामृत्र्ुंजर् र्ंि क माध्र्म िे व्र्त्रि क जडमांग मं स्स्थत कमजोर एवं पीफित े े ग्रहो क अशुभ प्रभाव को कम करने का कार्ा िरलता पूवक फकर्ा जािकता हं । जेिे हर व्र्त्रि को ब्रह्मांि फक उजाा एवं े ा पृथ्वी का गुरुत्वाकषाण बल प्रभावीत कताा हं फठक उिी प्रकार कवि एवं र्ंि क माध्र्म िे ब्रह्मांि फक उजाा क े े िकारात्मक प्रभाव िे व्र्त्रि को िकारात्मक उजाा प्राप्त होती हं स्जस्िे रोग क प्रभाव को कम कर रोग मुि करने हे तु े िहार्ता समलती हं । रोग सनवारण हे तु महामृत्र्ुंजर् मंि एवं र्ंि का बिा महत्व हं । स्जस्िे फहडद ू िंस्कृ सत का प्रार्ः हर व्र्त्रि महामृत्र्ुंजर् मंि िे पररसित हं ।
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    73 मई 2012 कवि क लाभ : े  एिा शास्त्रोि विन हं स्जि घर मं महामृत्र्ुंजर् र्ंि स्थात्रपत होता हं वहा सनवाि कताा हो नाना प्रकार फक आसध-व्र्ासध-उपासध िे रक्षा होती हं ।  पूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा िैतडर् र्ुि िवा रोग सनवारण कवि फकिी भी उम्र एवं जासत धमा क लोग िाहे े स्त्री हो र्ा पुरुष धारण कर िकते हं ।  जडमांगमं अनेक प्रकारक खराब र्ोगो और खराब ग्रहो फक प्रसतकलता िे रोग उतपडन होते हं । े ू  कछ रोग िंक्रमण िे होते हं एवं कछ रोग खान-पान फक असनर्समतता और अशुद्धतािे उत्पडन होते हं । कवि ु ु एवं र्ंि द्वारा एिे अनेक प्रकार क खराब र्ोगो को नष्ट कर, स्वास्थ्र् लाभ और शारीररक रक्षण प्राप्त करने हे तु े िवा रोगनाशक कवि एवं र्ंि िवा उपर्ोगी होता हं ।  आज क भौसतकता वादी आधुसनक र्ुगमे अनेक एिे रोग होते हं , स्जिका उपिार ओपरे शन और दवािे भी े कफठन हो जाता हं । कछ रोग एिे होते हं स्जिे बताने मं लोग फहिफकिाते हं शरम अनुभव करते हं एिे रोगो ु को रोकने हे तु एवं उिक उपिार हे तु िवा रोगनाशक कवि एवं र्ंि लाभादासर् सिद्ध होता हं । े  प्रत्र्ेक व्र्त्रि फक जेिे-जेिे आर्ु बढती हं वैिे-विै उिक शरीर फक ऊजाा होती जाती हं । स्जिक िाथ अनेक े े प्रकार क त्रवकार पैदा होने लगते हं एिी स्स्थती मं उपिार हे तु िवारोगनाशक कवि एवं र्ंि फलप्रद होता हं । े  स्जि घर मं त्रपता-पुि, माता-पुि, माता-पुिी, र्ा दो भाई एक फह नक्षिमे जडम लेते हं , तब उिकी माता क सलर्े े असधक कष्टदार्क स्स्थती होती हं । उपिार हे तु महामृत्र्ुंजर् र्ंि फलप्रद होता हं ।  स्जि व्र्त्रि का जडम पररसध र्ोगमे होता हं उडहे होने वाले मृत्र्ु तुल्र् कष्ट एवं होने वाले रोग, सिंता मं उपिार हे तु िवा रोगनाशक कवि एवं र्ंि शुभ फलप्रद होता हं । नोट:- पूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा िैतडर् र्ुि िवा रोग सनवारण कवि एवं र्ंि क बारे मं असधक जानकारी हे तु हम े िे िंपक करं । ा Declaration Notice  We do not accept liability for any out of date or incorrect information.  We will not be liable for your any indirect consequential loss, loss of profit,  If you will cancel your order for any article we can not any amount will be refunded or Exchange.  We are keepers of secrets. We honour our clients' rights to privacy and will release no information about our any other clients' transactions with us.  Our ability lies in having learned to read the subtle spiritual energy, Yantra, mantra and promptings of the natural and spiritual world.  Our skill lies in communicating clearly and honestly with each client.  Our all kawach, yantra and any other article are prepared on the Principle of Positiv energy, our Article dose not produce any bad energy. Our Goal  Here Our goal has The classical Method-Legislation with Proved by specific with fiery chants prestigious full consciousness (Puarn Praan Pratisthit) Give miraculous powers & Good effect All types of Yantra, Kavach, Rudraksh, preciouse and semi preciouse Gems stone deliver on your door step.
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    74 मई 2012 मंि सिद्ध कवि मंि सिद्ध कवि को त्रवशेष प्रर्ोजन मं उपर्ोग क सलए और शीघ्र प्रभाव शाली बनाने क सलए तेजस्वी मंिो द्वारा े े शुभ महूता मं शुभ फदन को तैर्ार फकर्े जाते हं . अलग-अलग कवि तैर्ार करने कसलए अलग-अलग तरह क े े मंिो का प्रर्ोग फकर्ा जाता हं .  क्र्ं िुने मंि सिद्ध कवि?  उपर्ोग मं आिान कोई प्रसतबडध नहीं  कोई त्रवशेष सनसत-सनर्म नहीं  कोई बुरा प्रभाव नहीं  कवि क बारे मं असधक जानकारी हे तु े मंि सिद्ध कवि िूसि िवा कार्ा सित्रद्ध 4600/- ऋण मुत्रि 910/- त्रवघ्न बाधा सनवारण 550/- िवा जन वशीकरण 1450/- धन प्रासप्त 820/- नज़र रक्षा 550/- अष्ट लक्ष्मी 1250/- तंि रक्षा 730/- दभााग्र् नाशक ु 460/- िंतान प्रासप्त 1250/- शिु त्रवजर् 730/- * वशीकरण (२-३ व्र्त्रिक सलए) े 1050/- स्पे- व्र्ापर वृत्रद्ध 1050/- त्रववाह बाधा सनवारण 730/- * पत्नी वशीकरण 640/- कार्ा सित्रद्ध 1050/- व्र्ापर वृत्रद्ध 730/-- * पसत वशीकरण 640/- आकस्स्मक धन प्रासप्त 1050/- िवा रोग सनवारण 730/- िरस्वती (कक्षा +10 क सलए) े 550/- नवग्रह शांसत 910/- मस्स्तष्क पृत्रष्ट वधाक 640/- िरस्वती (कक्षा 10 तकक सलए) े 460/- भूसम लाभ 910/- कामना पूसता 640/- * वशीकरण ( 1 व्र्त्रि क सलए) े 640/- काम दे व 910/- त्रवरोध नाशक 640/- रोजगार प्रासप्त 370/- पदं उडनसत 910/- रोजगार वृत्रद्ध 550/- *कवि माि शुभ कार्ा र्ा उद्दे श्र् क सलर्े े GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION) (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    75 मई 2012 YANTRA LIST EFFECTS Our Splecial Yantra 1 12 – YANTRA SET For all Family Troubles 2 VYAPAR VRUDDHI YANTRA For Business Development 3 BHOOMI LABHA YANTRA For Farming Benefits 4 TANTRA RAKSHA YANTRA For Protection Evil Sprite 5 AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA For Unexpected Wealth Benefits 6 PADOUNNATI YANTRA For Getting Promotion 7 RATNE SHWARI YANTRA For Benefits of Gems & Jewellery 8 BHUMI PRAPTI YANTRA For Land Obtained 9 GRUH PRAPTI YANTRA For Ready Made House 10 KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA - Shastrokt Yantra 11 AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA Blessing of Durga 12 BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL) Win over Enemies 13 BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL) Blessing of Bagala Mukhi 14 BHAGYA VARDHAK YANTRA For Good Luck 15 BHAY NASHAK YANTRA For Fear Ending 16 CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta) Blessing of Chamunda & Navgraha 17 CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA Blessing of Chhinnamasta 18 DARIDRA VINASHAK YANTRA For Poverty Ending 19 DHANDA POOJAN YANTRA For Good Wealth 20 DHANDA YAKSHANI YANTRA For Good Wealth 21 GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra) Blessing of Lord Ganesh 22 GARBHA STAMBHAN YANTRA For Pregnancy Protection 23 GAYATRI BISHA YANTRA Blessing of Gayatri 24 HANUMAN YANTRA Blessing of Lord Hanuman 25 JWAR NIVARAN YANTRA For Fewer Ending JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA 26 YANTRA For Astrology & Spritual Knowlage 27 KALI YANTRA Blessing of Kali 28 KALPVRUKSHA YANTRA For Fullfill your all Ambition 29 KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA) Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga 30 KANAK DHARA YANTRA Blessing of Maha Lakshami 31 KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA - 32 KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in work 33  SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in all work 34 KRISHNA BISHA YANTRA Blessing of Lord Krishna 35 KUBER YANTRA Blessing of Kuber (Good wealth) 36 LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA For Obstaele Of marriage 37 LAKSHAMI GANESH YANTRA Blessing of Lakshami & Ganesh 38 MAHA MRUTYUNJAY YANTRA For Good Health 39 MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA Blessing of Shiva 40 MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA) For Fullfill your all Ambition 41 MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA For Marriage with choice able Girl 42 NAVDURGA YANTRA Blessing of Durga
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    76 मई 2012 YANTRA LIST EFFECTS 43 NAVGRAHA SHANTI YANTRA For good effect of 9 Planets 44 NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA For good effect of 9 Planets 45  SURYA YANTRA Good effect of Sun 46  CHANDRA YANTRA Good effect of Moon 47  MANGAL YANTRA Good effect of Mars 48  BUDHA YANTRA Good effect of Mercury 49  GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA) Good effect of Jyupiter 50  SUKRA YANTRA Good effect of Venus 51  SHANI YANTRA (COPER & STEEL) Good effect of Saturn 52  RAHU YANTRA Good effect of Rahu 53  KETU YANTRA Good effect of Ketu 54 PITRU DOSH NIVARAN YANTRA For Ancestor Fault Ending 55 PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA For Pregnancy Pain Ending 56 RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA For Benefits of State & Central Gov 57 RAM YANTRA Blessing of Ram 58 RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA Blessing of Riddhi-Siddhi 59 ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA For Disease- Pain- Poverty Ending 60 SANKAT MOCHAN YANTRA For Trouble Ending 61 SANTAN GOPAL YANTRA Blessing Lorg Krishana For child acquisition 62 SANTAN PRAPTI YANTRA For child acquisition 63 SARASWATI YANTRA Blessing of Sawaswati (For Study & Education) 64 SHIV YANTRA Blessing of Shiv Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & 65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA) Peace 66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth 67 SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA For Bad Dreams Ending 68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA For Vehicle Accident Ending VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All 69 MAHALAKSHAMI YANTRA) Successes 70 VASTU YANTRA For Bulding Defect Ending 71 VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA For Education- Fame- state Award Winning 72 VISHNU BISHA YANTRA Blessing of Lord Vishnu (Narayan) 73 VASI KARAN YANTRA Attraction For office Purpose 74  MOHINI VASI KARAN YANTRA Attraction For Female 75  PATI VASI KARAN YANTRA Attraction For Husband 76  PATNI VASI KARAN YANTRA Attraction For Wife 77  VIVAH VASHI KARAN YANTRA Attraction For Marriage Purpose Yantra Available @:- Rs- 255, 370, 460, 550, 640, 730, 820, 910, 1250, 1850, 2300, 2800 and Above….. GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 09338213418, 09238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- chintan_n_joshi@yahoo.co.in, gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    77 मई 2012 GURUTVA KARYALAY NAME OF GEM STONE GENERAL MEDIUM FINE FINE SUPER FINE SPECIAL Emerald (पडना) 200.00 500.00 1200.00 1900.00 2800.00 & above Yellow Sapphire (पुखराज) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Blue Sapphire (नीलम) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above White Sapphire (िर्द पुखराज) े 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Bangkok Black Blue(बंकोक नीलम) 100.00 150.00 200.00 500.00 1000.00 & above Ruby (मास्णक) 100.00 190.00 370.00 730.00 1900.00 & above Ruby Berma (बमाा मास्णक) 5500.00 6400.00 8200.00 10000.00 21000.00 & above Speenal (नरम मास्णक/लालिी) 300.00 600.00 1200.00 2100.00 3200.00 & above Pearl (मोसत) 30.00 60.00 90.00 120.00 280.00 & above Red Coral (4 jrh rd) (लाल मूंगा) 75.00 90.00 12.00 180.00 280.00 & above Red Coral (4 jrh ls mij) (लाल मूंगा) 120.00 150.00 190.00 280.00 550.00 & above White Coral (िर्द मूंगा) े 20.00 28.00 42.00 51.00 90.00 & above Cat’s Eye (लहिुसनर्ा) 25.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Cat’s Eye Orissa (उफििा लहिुसनर्ा) 460.00 640.00 1050.00 2800.00 5500.00 & above Gomed (गोमेद) 15.00 27.00 60.00 90.00 120.00 & above Gomed CLN (सिलोनी गोमेद) 300.00 410.00 640.00 1800.00 2800.00 & above Zarakan (जरकन) 350.00 450.00 550.00 640.00 910.00 & above Aquamarine (बेरुज) 210.00 320.00 410.00 550.00 730.00 & above Lolite (नीली) 50.00 120.00 230.00 390.00 500.00 & above Turquoise (फर्रोजा) 15.00 30.00 45.00 60.00 90.00 & above Golden Topaz (िुनहला) 15.00 30.00 45.00 60.00 90.00 & above Real Topaz (उफििा पुखराज/टोपज) 60.00 120.00 280.00 460.00 640.00 & above Blue Topaz (नीला टोपज) 60.00 90.00 120.00 280.00 460.00 & above White Topaz (िर्द टोपज) े 60.00 90.00 120.00 240.00 410.00& above Amethyst (कटे ला) 20.00 30.00 45.00 60.00 120.00 & above Opal (उपल) 30.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Garnet (गारनेट) 30.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Tourmaline (तुमलीन) ा 120.00 140.00 190.00 300.00 730.00 & above Star Ruby (िुर्काडत मस्ण) ा 45.00 75.00 90.00 120.00 190.00 & above Black Star (काला स्टार) 15.00 30.00 45.00 60.00 100.00 & above Green Onyx (ओनेक्ि) 09.00 12.00 15.00 19.00 25.00 & above Real Onyx (ओनेक्ि) 60.00 90.00 120.00 190.00 280.00 & above Lapis (लाजवात) 15.00 25.00 30.00 45.00 55.00 & above Moon Stone (िडद्रकाडत मस्ण) 12.00 21.00 30.00 45.00 100.00 & above Rock Crystal (स्र्फटक) 09.00 12.00 15.00 30.00 45.00 & above Kidney Stone (दाना फर्रं गी) 09.00 11.00 15.00 19.00 21.00 & above Tiger Eye (टाइगर स्टोन) 03.00 05.00 10.00 15.00 21.00 & above Jade (मरगि) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above Sun Stone (िन सितारा) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above 50.00 100.00 200.00 370.00 460.00 & above Diamond (हीरा) (Per Cent ) (Per Cent ) (PerCent ) (Per Cent) (Per Cent ) (.05 to .20 Cent ) Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus
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    78 मई 2012 BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION We are mostly engaged in spreading the ancient knowledge of Astrology, Numerology, Vastu and Spiritual Science in the modern context, across the world. Our research and experiments on the basic principals of various ancient sciences for the use of common man. exhaustive guide lines exhibited in the original Sanskrit texts BOOK APPOINTMENT PHONE/ CHAT CONSULTATION Please book an appointment with Our expert Astrologers for an internet chart . We would require your birth details and basic area of questions so that our expert can be ready and give you rapid replied. You can indicate the area of question in the special comments box. In case you want more than one person reading, then please mention in the special comment box . We shall confirm before we set the appointment. Please choose from : PHONE/ CHAT CONSULTATION Consultation 30 Min.: RS. 1250/-* Consultation 45 Min.: RS. 1900/-* Consultation 60 Min.: RS. 2500/-* *While booking the appointment in Addvance How Does it work Phone/Chat Consultation This is a unique service of GURUATVA KARYALAY where we offer you the option of having a personalized discussion with our expert astrologers. There is no limit on the number of question although time is of consideration. Once you request for the consultation, with a suggestion as to your convenient time we get back with a confirmation whether the time is available for consultation or not.  We send you a Phone Number at the designated time of the appointment  We send you a Chat URL / ID to visit at the designated time of the appointment  You would need to refer your Booking number before the chat is initiated  Please remember it takes about 1-2 minutes before the chat process is initiated.  Once the chat is initiated you can commence asking your questions and clarifications  We recommend 25 minutes when you need to consult for one persona Only and usually the time is sufficient for 3-5 questions depending on the timing questions that are put.  For more than these questions or one birth charts we would recommend 60/45 minutes Phone/chat is recommended  Our expert is assisted by our technician and so chatting & typing is not a bottle neck In special cases we don't have the time available about your Specific Questions We will taken some time for properly Analysis your birth chart and we get back with an alternate or ask you for an alternate. All the time mentioned is Indian Standard Time which is + 5.30 hr ahead of G.M.T. Many clients prefer the chat so that many questions that come up during a personal discussion can be answered right away. BOOKING FOR PHONE/ CHAT CONSULTATION PLEASE CONTECT GURUTVA KARYALAY Call Us:- 91+9338213418, 91+9238328785. Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com, chintan_n_joshi@yahoo.co.in,
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    79 मई 2012 िूिना  पत्रिका मं प्रकासशत िभी लेख पत्रिका क असधकारं क िाथ ही आरस्क्षत हं । े े  लेख प्रकासशत होना का मतलब र्ह कतई नहीं फक कार्ाालर् र्ा िंपादक भी इन त्रविारो िे िहमत हं।  नास्स्तक/ अत्रवश्वािु व्र्त्रि माि पठन िामग्री िमझ िकते हं ।  पत्रिका मं प्रकासशत फकिी भी नाम, स्थान र्ा घटना का उल्लेख र्हां फकिी भी व्र्त्रि त्रवशेष र्ा फकिी भी स्थान र्ा घटना िे कोई िंबंध नहीं हं ।  प्रकासशत लेख ज्र्ोसतष, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु, मंि, र्ंि, तंि, आध्र्ास्त्मक ज्ञान पर आधाररत होने क कारण े र्फद फकिी क लेख, फकिी भी नाम, स्थान र्ा घटना का फकिी क वास्तत्रवक जीवन िे मेल होता हं तो र्ह माि े े एक िंर्ोग हं ।  प्रकासशत िभी लेख भारसतर् आध्र्ास्त्मक शास्त्रं िे प्रेररत होकर सलर्े जाते हं । इि कारण इन त्रवषर्ो फक ित्र्ता अथवा प्रामास्णकता पर फकिी भी प्रकार फक स्जडमेदारी कार्ाालर् र्ा िंपादक फक नहीं हं ।  अडर् लेखको द्वारा प्रदान फकर्े गर्े लेख/प्रर्ोग फक प्रामास्णकता एवं प्रभाव फक स्जडमेदारी कार्ाालर् र्ा िंपादक फक नहीं हं । और नाहीं लेखक क पते फठकाने क बारे मं जानकारी दे ने हे तु कार्ाालर् र्ा िंपादक फकिी भी े े प्रकार िे बाध्र् हं ।  ज्र्ोसतष, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु, मंि, र्ंि, तंि, आध्र्ास्त्मक ज्ञान पर आधाररत लेखो मं पाठक का अपना त्रवश्वाि होना आवश्र्क हं । फकिी भी व्र्त्रि त्रवशेष को फकिी भी प्रकार िे इन त्रवषर्ो मं त्रवश्वाि करने ना करने का अंसतम सनणार् स्वर्ं का होगा।  पाठक द्वारा फकिी भी प्रकार फक आपत्ती स्वीकार्ा नहीं होगी।  हमारे द्वारा पोस्ट फकर्े गर्े िभी लेख हमारे वषो क अनुभव एवं अनुशंधान क आधार पर सलखे होते हं । हम फकिी भी व्र्त्रि े े त्रवशेष द्वारा प्रर्ोग फकर्े जाने वाले मंि- र्ंि र्ा अडर् प्रर्ोग र्ा उपार्ोकी स्जडमेदारी नफहं लेते हं ।  र्ह स्जडमेदारी मंि-र्ंि र्ा अडर् प्रर्ोग र्ा उपार्ोको करने वाले व्र्त्रि फक स्वर्ं फक होगी। क्र्ोफक इन त्रवषर्ो मं नैसतक मानदं िं , िामास्जक , कानूनी सनर्मं क स्खलाफ कोई व्र्त्रि र्फद नीजी स्वाथा पूसता हे तु प्रर्ोग कताा हं अथवा े प्रर्ोग क करने मे िुफट होने पर प्रसतकल पररणाम िंभव हं । े ू  हमारे द्वारा पोस्ट फकर्े गर्े िभी मंि-र्ंि र्ा उपार् हमने िैकिोबार स्वर्ं पर एवं अडर् हमारे बंधगण पर प्रर्ोग फकर्े हं ु स्जस्िे हमे हर प्रर्ोग र्ा मंि-र्ंि र्ा उपार्ो द्वारा सनस्श्चत िफलता प्राप्त हुई हं ।  पाठकं फक मांग पर एक फह लेखका पूनः प्रकाशन करने का असधकार रखता हं । पाठकं को एक लेख क पूनः े प्रकाशन िे लाभ प्राप्त हो िकता हं ।  असधक जानकारी हे तु आप कार्ाालर् मं िंपक कर िकते हं । ा (िभी त्रववादो कसलर्े कवल भुवनेश्वर डर्ार्ालर् ही माडर् होगा।) े े
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    80 मई 2012 FREE E CIRCULAR गुरुत्व ज्र्ोसतष पत्रिका मई -2012 िंपादक सिंतन जोशी िंपका गुरुत्व ज्र्ोसतष त्रवभाग गुरुत्व कार्ाालर् 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA फोन 91+9338213418, 91+9238328785 ईमेल gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, वेब http://gk.yolasite.com/ http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/
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    81 मई 2012 हमारा उद्दे श्र् त्रप्रर् आस्त्मर् बंध/ बफहन ु जर् गुरुदे व जहाँ आधुसनक त्रवज्ञान िमाप्त हो जाता हं । वहां आध्र्ास्त्मक ज्ञान प्रारं भ हो जाता हं , भौसतकता का आवरण ओढे व्र्त्रि जीवन मं हताशा और सनराशा मं बंध जाता हं , और उिे अपने जीवन मं गसतशील होने क सलए मागा प्राप्त नहीं हो पाता क्र्ोफक े भावनाए फह भविागर हं , स्जिमे मनुष्र् की िफलता और अिफलता सनफहत हं । उिे पाने और िमजने का िाथाक प्रर्ाि ही श्रेष्ठकर िफलता हं । िफलता को प्राप्त करना आप का भाग्र् ही नहीं असधकार हं । ईिी सलर्े हमारी शुभ कामना िदै व आप क िाथ हं । आप े अपने कार्ा-उद्दे श्र् एवं अनुकलता हे तु र्ंि, ग्रह रत्न एवं उपरत्न और दलभ मंि शत्रि िे पूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत सिज वस्तु का हमंशा ू ु ा प्रर्ोग करे जो १००% फलदार्क हो। ईिी सलर्े हमारा उद्दे श्र् र्हीं हे की शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत पूणा िैतडर् र्ुि िभी प्रकार क र्डि- कवि एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोिाने का हं । े े िूर्ा की फकरणे उि घर मं प्रवेश करापाती हं । जीि घर क स्खिकी दरवाजे खुले हं। े GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION) (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
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    82 मई 2012 MAY 2012