प्रात् स्भयणीम ऩयभ ऩूज्म
                                                         सॊत श्री आसायाभजी फाऩू के
                                                                  सत्सॊग-प्रवचन



                                                   दै वी सॊऩदा
                                                                   ननवेदन
           जजतने बी द्ख, ददद , ऩीडाएॉ हैं, चचत्त को ऺोब कयाने वारे.... जन्भों भें बटकानेवारे......
अशाॊनत दे ने वारे कभद हैं वे सफ सदगणों क अबाव भें ही होते हैं
                                        े
           बगवान श्रीकृष्ण ने जीवन भें कसे सदगणों की अत्मॊत आवश्मकता है मह बगवद् गीता
                                        ै
क 'दै वासयसम्ऩदाववबागमोग' नाभ क सोरहवें अध्माम क प्रथभ तीन द्ऴोंकों भें फतामा है । उन
 े                             े                े
दै वी सम्ऩदा क छब्फीस सदगणों को धायण कयने से सख, शाॊनत, आनन्दभम जीवन जीने की
              े
कजी मभर जाती है , धभद, अथद, काभ औय भोऺ, मे चायों ऩरुषाथद सहज भें ही मसद्ध हो जाते हैं ,
 ॊ
क्मोंकक दै वी सम्ऩदा आत्भदे व की है ।
           इस ग्रॊथ भें सॊतों ने सयर औय उत्साह-प्रेयक प्रवचनों क द्राया दै वी सम्ऩदा भें जस्थत बक्तों
                                                                े
क, सॊतों क जीवन-प्रसॊग ऩय प्रकाश डारते हए हभें प्रसाद फाॉटा है । आऩ इस ऻान-प्रसाद का
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ऩठन-भनन कयें गे तो अवश्म राबाजन्वत होंगे।
                                                                                                                                            ववनीत,
                                                                                                          श्री मोग वेदान्त सेवा समभनत
                                                                                                                            अभदावाद आश्रभ

                                                                  अनक्रभ
ननवेदन............................................................................................................................................... 2
दै वी सम्ऩदा – 1 ................................................................................................................................. 3
दै वी सम्ऩदा – 2 ............................................................................................................................... 17
दै वी सम्ऩदा -3 ................................................................................................................................. 34
जीवन-ववकास औय प्राणोऩासना ........................................................................................................... 47
सत्सॊग सॊचम .................................................................................................................................... 61
   ऻानमोग ....................................................................................................................................... 61
   याभ क दीवाने ............................................................................................................................... 64
        े
   मभयाज का 'डडऩाटद भेन्ट' ................................................................................................................. 65
   सदगरु-भहहभा ............................................................................................................................... 66
ढाई अऺय प्रेभ का...... ................................................................................................................... 67
   सपरता की नीॊव एकाग्रता.............................................................................................................. 68
  'गरुत्मागात ् बवेन्भत्म्.....' ............................................................................................................. 70
                       ृ
  ऩष्ऩ-चमन .................................................................................................................................... 73
बडक्तभनत यानी यत्नावती ...................................................................................................................... 74




                                                      दै वी सम्ऩदा – 1
                                         (हदनाॊक् 22-7-1990 यवववाय, अभदावाद आश्रभ)
                                                 अबमॊ सत्त्वसॊशवद्धऻादनमोगव्मवजस्थनत्।
                                              दानॊ दभद्ळ मऻद्ळ स्वाध्मामस्तऩ आजदवभ ्।।
           'बम का सवदथा अबाव, अॊत्कयण की ऩणद ननभदरता, तत्त्वऻान क मरए ध्मानमोग भें
                                          ू                      े
ननयॊ तय दृढ़ जस्थनत, साजत्त्वक दान, इजन्िमों का दभन, बगवान, दे वता औय गरुजनों की ऩजा तथा
                                                                                  ू
अजननहोत्र आहद उत्तभ कभों का आचयण एवॊ वेदशास्त्रों का ऩठन-ऩाठन तथा बगवान क नाभ औय
                                                                         े
गणों का सॊकीतदन, स्वधभदऩारन क मरए कद्शसहन औय शयीय तथा इजन्िमों क सहहत अॊत्कयण
                             े                                  े
की सयरता – मे सफ दै वी सम्ऩदा को रेकय उत्ऩन्न हए ऩरुष क रऺण हैं।'
                                                       े
                                                                                                                  (बगवद् गीता् 16.1)
           जीवन भें ननबदमता आनी चाहहए। बम ऩाऩ है , ननबदमता जीवन है । जीवन भें अगय
ननबदमता आ जाम तो द्ख, ददद , शोक, चचन्ताएॉ दय हो जाती हैं। बम अऻानभूरक है ,
                                           ू
अववद्याभूरक है औय ननबदमता ब्रह्मववद्याभूरक हैं। जो ऩाऩी होता है , अनत ऩरयग्रही होता है वह
बमबीत यहता है । जो ननष्ऩाऩ है , ऩरयग्रहयहहत है अथवा जजसक जीवन भें सत्त्वगण की प्रधानता
                                                        े
है वह ननबदम यहता है ।
           जजसक जीवन भें दै वी रऺण हैं वह महाॉ बी सखी यहता है औय ऩयरोक बी उसक मरए
               े                                                             े
सखभम हो जाता है । जजसक जीवन भें दै वी रऺण की कभी है वह महाॉ बी द्खी यहता है औय
                      े
ऩयरोक भें बी द्ख ऩाता यहता है । जीवन भें अगय सख, चैन, आयाभ, अभन-चभन चाहहए तो
'अभन होना ऩडेगा। अभन भाना भन क सॊकल्ऩ-ववकल्ऩ कभ हों। अभनी बाव को प्राद्ऱ हो तो
                              े
जीवन भें चभन फढ़ता है ।
           भनष्म की वास्तववक अॊतयात्भा इतनी भहान ् है कक जजसका वणदन कयते वेद बगवान बी
'नेनत.... नेनत.....' ऩकाय दे ते हैं। भानव का वास्तववक तत्त्व, वास्तववक स्वरूऩ ऐसा भहान ् है
रेककन बम ने, स्वाथद ने, यजो-तभोगण क प्रबाव ने उसे दीन-हीन फना हदमा है ।
                                   े
           द्ख भनष्म का स्वबाव नहीॊ है इसमरए वह द्ख नहीॊ चाहता है । सख भनष्म का
स्वबाव है इसमरए वह सख चाहता है । जैसे, भॉह भें दाॉत यहना स्वाबाववक है तो कबी ऐसा नहीॊ
होता कक दाॉत ननकारकय पक दॉ । जफ तक दाॉत तन्दरुस्त यहते हैं तफ तक उन्हें पकने की
                      ें   ू                                             ें
इच्छा नहीॊ होती। बोजन कयते वक्त कछ अन्न का कण, सब्जी का नतनका दाॉतों भें पस जाता है
                                                                          ॉ
तो रूरी (जजह्वा) फाय-फाय वहाॉ रटका कयती है । जफ तक वह कचया ननकरा नहीॊ जाता तफ तक
चैन नहीॊ रेती। क्मोंकक दाॉतों भें वह कचया यहना स्वाबाववक नहीॊ है ।
       ऐसे ही सख तम्हाये जीवन भें आता है तो कोई हजद नहीॊ है रेककन द्ख आता है तो उसे
ननकारने क मरए तभ तत्ऩय हो जाते हो। दाॉतों भें नतनका यहना अस्वाबाववक रगता है वैसे
         े
रृदम भें द्ख यहना तम्हें अस्वाबाववक रगता है । द्ख होता है यजो-तभोगण की प्रधानता से।
       बगवान कहते हैं कक बम का सवदथा अबाव कय दें । जीवन भें बम न आवे। ननबदम यहें ।
ननबदम वही हो सकता है जो दसयों को बमबीत न कयें । ननबदम वही यह सकता है जो ननष्ऩाऩ
                         ू
होने की तत्ऩय हो जाम। जो ववरासयहहत हो जामगा वह ननबदम हो जामगा।
       ननबदमता ऐसा तत्त्व है कक उससे ऩयभात्भ-तत्त्व भें ऩहॉ चने की शडक्त आती है । ककसी को
रगेगा कक 'फडे-फडे डाक रोग, गन्डा तत्त्व ननबदम होते हैं....' नहीॊ नहीॊ..... ऩाऩी कबी ननबदम नहीॊ
                     ू
हो सकता। गन्डे रोग तो कामयों क आगे योफ भायते हैं। जो रोग भचगदमाॉ खाकय भहकपर कयते
                              े
हैं, दारू ऩीकय नशे भें चय होते हैं , नशे भें आकय सीधे-सादे रोगों को डाॉटते हैं तो ऐसी डाॉट से
                        ू
रोग घफया जाते हैं। रोगों की घफयाहट का पामदा गन्डे रोग उठाते हैं। वास्तव भें चॊफर की
घाटी का हो चाहे उसक फाऩ हो रेककन जजसभें सत्त्वगण नहीॊ है अथवा जो आत्भऻानी नहीॊ है
वह ननबदम नहीॊ हो सकता। ननबदम वही आदभी होगा जो सत्त्वगणी हो। फाकी क ननबदम हदखते
                                                                  े
हए रोग डाभेच होते हैं, ऩाऩी औय ऩाभय होते हैं। बमबीत आदभी दसये को बमबीत कयता है ।
                                                          ू
डयऩोक ही दसये को डयाता है ।
          ू
       जो ऩूया ननबदम होता है वह दसयों को ननबदम नायामण तत्त्व भें रे जाता है । जो डय यहा है
                                 ू
वह डयऩोक है । डाभेच औय गॊडा स्वबाव का आदभी दसयों का शोषण कयता है । ननबीक दसयों का
                                            ू                             ू
शोषण नहीॊ कयता, ऩोषण कयता है । अत् जीवन भें ननबदमता रानी चाहहए।
       फॊगार भें हगरी जजरे क दे ये गाॉव भें खदीयाभ नाभ क व्मडक्त यहते थे। गाॉव क जल्भी
                            े                           े                       े
जभीॊदाय ने उन्हें अऩने भकद्दभें भें झठी गवाही दे ने क मरए दभ भाया। उन्हें डयाते हए वह फोरा्
                                     ू               े
       "याजा क आगे भेये ऩऺ भॊ गवाही दे दो। याजा तभ ऩय ववद्वास कयें गे औय भेया काभ फन
              े
जामेगा। अगय तभ भेये ऩऺ भें नहीॊ फोरे तो जानते हो, भैं कौन हूॉ? भैंने कइमों क घयों को
                                                                            े
फयफाद कय हदमा है । तम्हाया बी वही हार होगा। दे ये गाॉव भें यहना असॊबव हो जाएगा।"
       खदीयाभ ने ननबदमता से जवाफ दे हदमा् "गाॉव भें यहना असॊबव हो जामे तो बरे हो जाम
रेककन भैं झठी गवाही हयचगज नहीॊ दॉ गा। भैं तो जो सत्म है वही फोर दॉ गा।"
           ू                      ू                                ू
       उस दद्श ने खदीयाभ को ऩये शान कयना शरु कय हदमा। खदीयाभ फेचाये सीधे सादे
प्राभाणणक इन्सान थे। वे गाॉव छोडकय चरे गमे। कई बफघा, जभीन, गाम-बैंस, घय-फाय की हानन
हई कपय बी सत्म ऩय खदीयाभ अडडग यहे ।
रोगों की नजयों भें खदीयाभ को हानन हई होगी थोडी-फहत रेककन सत्म की गवाही दे ने भें
अडडग यहने से खदीयाभ ईद्वय को, ऩयभात्भा को स्वीकाय हो गमे। गाॉव छोडना ऩडा, जभीन
छोडनी ऩडी, ननबीक यहकय सत्म क ऩऺ भें यहे , झठी गवाही नहीॊ दी ऐसे सज्जन को दद्श ने
                            े              ू
फाह्य हानन ऩहॉ चा दी रेककन ऐसी फाह्य हानन ऩहॉ चने ऩय बी बक्त का कबी कछ नहीॊ बफगडता मह
मसद्ध कयने क मरमे बगवान ने उन्हीॊ दे हाती आदभी खदीयाभ क घय एक भहान ् आत्भा को
            े                                          े
अवतरयत ककमा। वे भहान ् आत्भा श्री याभकृष्ण ऩयभहॊ स होकय प्रमसद्ध हए। उनकी कृऩा ऩाकय
वववेकानन्द ववद्वववख्मात हए। धन्म है उस दे हाती खदीयाभ की सच्चाई औय सत्म ननद्षा।
       जीवन भें ननबदमता आनी चाहहए। ऩाऩ क साभने, अनाचाय क साभने कबी फोरना ऩडे तो
                                        े               े
फोर दे ना चाहहए। सभाज भें रोग डयऩोक होकय गण्डा तत्त्वों को ऩोसते यहते हैं औय स्वमॊ शोषे
जाते हैं। कछ अननद्श घटता हआ दे खते हैं तो उसका प्रनतकाय नहीॊ कयते। 'हभाया क्मा..... हभाया
क्मा.....? कये गा सो बये गा....।' ऐसी दफदर भनोदशा से मसकड जाते हैं। सज्जन रोग मसकड जाते
हैं, चनाव रडने वारे नेताओॊ को बी गण्डे तत्त्वों को हाथ भें यखना ऩडता है । क्मोंकक सभाज के
डयऩोक रोगों ऩय उन्हीॊ की धाकधभकी चरती है ।
       अत् अऩने जीवन भें औय साये सभाज भें अभन-चभन राना हो तो बगवान श्रीकृष्ण की
फात को आज ध्मान से सनें ।
      ननबदमता का मह भतरफ नहीॊ है कक फहू सास का अऩभान कय दे ् 'भैं ननबदम हूॉ....।'
ननबदमता का मह भतरफ नहीॊ कक छोया भाॉ-फाऩ का कहना भाने नहीॊ। ननबदमता का मह भतरफ
नहीॊ कक मशष्म गरु को कह दे कक, 'भैं ननबदम हूॉ, आऩकी फात नहीॊ भानॉूगा।' मह तो खड्डे भें
चगयने का भागद है । रोग ननबदमता का ऐसा गरत अथद रगा रेते हैं।
       हरयद्राय भें घाटवारे फाफा वेदान्ती सॊत थे। सत्सॊग भें फाय-फाय कहते कक ननबदम यहो।
उनकी एक मशष्मा ने फाफाजी की मह फात ऩकड री। वह फूढ़ी थी। हदल्री से फाफाजी क ऩास
                                                                          े
आती थी। एक हदन खट्टे आभ की ऩकौडडमाॊ फना कय फाफाजी क ऩास रे आमी। फाफाजी ने कहा्
                                                   े
"अबी भैंने दध ऩीमा है । दध क ऊऩय ऩकौडे नहीॊ खाने चाहहए।"
            ू            ू  े
       वह फोरी् फाफाजी ! "भैंने भेहनत कयक आऩक मरम फनामा है । खाओ न....।"
                                         े   े
       "भेहनत कयक फनामा है तो क्मा भैं खाकय फीभाय ऩडूॉ? नहीॊ खाना है , रे जा।"
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       फाफाजी ने डाॉटते हए कहा् "क्मा भतरफ?"
      "आऩ ही ने तो कहा है कक ननबदम यहो। भैं ननबदम यहूॉगी। आऩ बरे ककतना बी डाॉटो। भैं
तो णखराकय यहूॉगी।" वह भहहरा फोरी।
       गरु मशष्मा का वह सॊवाद भैं सन यहा था। भैंने सोचा् याभ.... याभ.... याभ....। भहाऩरुष
कसी ननबदमता फता यहे हैं औय भूढ़ रोग कसी ननबदमता ऩकड रेते हैं ! ननबदम फनने का भतरफ
 ै                                   ै
मह नहीॊ कक जो हभें ननबदम फनामें उनका ही ववयोध कयक अऩने औय उनक जीवन का ह्रास कयें ।
                                                 े           े
ननबदमता का भतरफ नकट्टा होना नहीॊ। ननबदमता का भतरफ भन का गराभ होना नहीॊ। ननबदमता
का भतरफ है जजसभें बगवद् गीता क भताबफक दै वी सम्ऩदा क छब्फीस रऺण बय जामें।
                              े                     े
                                     ननबदम जऩे सकर बव मभटे ।
                                       सॊत कृऩा ते प्राणी छटे ।।
                                                           ू
       ऐसे ननबदम नायामण तत्त्व भें जगने को ननबदमता चाहहए। इसमरमे अॊत्कयण भें बम का
सवदथा अबाव होना चाहहए।
       अॊत्कयण ननभदर होगा तो ननबदमता आमेगी। ऻानमोग भें जस्थनत होगी, आत्भाकाय ववत्त
                                                                              ृ
फनाने भें रूचच होगी वह आदभी ननबदम यहे गा। ईद्वय भें दृढ़ ववद्वास होगा तो ननबदमता आमेगी।
       जीवन भें दान-ऩण्म का बी फडा भहत्त्व है । दान बक्त बी कयता है ऻानी बी कयता है ।
बक्त का दान है रूऩमा-ऩैसा, चीज-वस्तएॉ, अन्न-वस्त्राहद। ऻानी का दान है ननबदमता का, ऻानी
का दान है आत्भा जागनत का।
                   ृ
       नद्वय चीजों को दान भें दे कय कोई दानी फन जाम वह बक्त है । अऩने आऩको, अऩने स्व-
स्वरूऩ को सभाजच भें फाॉटकय, सफको आत्भानॊद का अभत चखानेवारे ऻानी भहादानी हो जाते
                                               ृ
हैं।
       दीन-हीन, रूरे-रॉ गडे, गयीफ रोगों को सहामता कयना मह दमा है । जो रोग ववद्रान हैं,
फवद्धभान हैं, सत्त्वगण प्रधान है । जो ऻानदान कयते कयाते हैं ऐसे रोगों की सेवा भें जो चीजें
अवऩदत की जाती हैं वह दान कहा जाता है । बगवान क भागद चरने वारे रोगों का सहाम रूऩ
                                              े
होना मह दान है । इतय रोगों को सहाम रूऩ होना मह दमा है । दमा धभद का भूर है । दान
सत्त्वगण फढ़ाता है । जीवन भें ननबदमता राता है ।
       ऻानमोग भें ननयॊ तय दृढ़ जस्थनत कयने क मरए जीवन भें दान औय इजन्िम दभन होना
                                            े
चाहहए। इजन्िम दभन का भतरफ है जजतना आवश्मक हो उतना ही इजन्िमों को आहाय दे ना।
आॉख को जजतना जरूयी हो उतना ही दृश्म हदखाओ, व्मथद भें इधय-उधय न बटकाओ। कान को
जो जरूयी हो वह सनाओ। व्मथद चचाद, ककसी की ननन्दा सनाकय कान की श्रवण-शडक्त का
अऩव्मम न कयो। फोरने-चखने भें जजह्वा का उऩमोग जजतना जरूयी हो उतना कयो। व्मथद भें
इजन्िमों की शडक्त को फाहय ऺीण भत कयो। इजन्िमों की शडक्त ऺीण कयने से जीवन की सूक्ष्भ
शडक्त का ह्रास होता है । परत् आदभी फहहभख यहता है , चचत्त भें शाॊनत नहीॊ यहती औय आत्भा
                                       द
भें जस्थनत कयने का साभर्थमद ऺीण हो जाता है ।
       अगय जीवन को हदव्म फनाना है , ऩयभ तेजस्वी फनाना है , सफ द्खों से सदा क मरए दय
                                                                            े     ू
होकय ऩयभ सख-स्वरूऩ आत्भा का साऺात्काय कयना है तो सूक्ष्भ शडक्तमों की जरूयत ऩडती है ।
सूक्ष्भ शडक्तमाॉ इजन्िमों क सॊमभ से ववकमसत होती हैं , सयक्षऺत यहती हैं। इजन्िमों का असॊमभ
                           े
कयने से सूक्ष्भ शडक्तमाॉ ऺीण हो जाती हैं। योजी-योटी क मरए तडपनेवारे भजदय भें औय मोगी
                                                     े                 ू
ऩरुष भें इतना ही पक है । साभान्म आदभी ने अऩनी सूक्ष्भ शडक्तमों का जतन नहीॊ ककमा जफकक
                   द
मोगी ऩरुष शडक्तमों का सॊमभ कयक साभर्थमदवान फन जाते हैं।
                              े
       चरते-चरते फात कयते हैं तो हदभाग की शडक्त कभजोय हो जाती है । न खाने जैसा खा
रेते हैं, न बोगने जैसा बोग रेते हैं। वे न सॊसाय का सख ठीक से बोग जाते हैं न आत्भा का
सख रे ऩाते हैं। दस-फीस रूऩमे की राचायी भें हदनबय भेहनत कयते हैं। खाने-ऩीने का ढॊ ग नहीॊ
है , बोगने का ढॊ ग नहीॊ है तो फेचाये योगी यहते हैं।
       मोगीऩरुष इहरोक का ही नहीॊ, ब्रह्मरोक तक का सख बी बोगते हैं औय भडक्तराब बी
रेते हैं। वे जानते हैं कक सक्ष्भ शडक्तमों का सदऩमोग कसे ककमा जाम।
                           ू                         ै
       सक्ष्भ
        ू       शडक्तमों का सॊयऺण औय सॊवधदन कयने क मरए अऩने आहाय-ववहाय भें सजग
                                                  े
यहना जरूयी है । दोऩहय को बय ऩेट बोजन ककमा हो तो शाभ को जया उऩवास जैसा कय रेना
चाहहए। हदनबय बखे यहे तो याबत्र को सोने क दो घण्टे ऩहरे अच्छी तयह बोजन कय रेना
              ू                         े
चाहहए। बोजन क फीच भें ऩानी ऩीना ऩवद्शदामक है । अजीणद भें ऩानी औषध है । बूखे ऩेट ऩानी
             े
ऩीना ववष हो जाता है । खफ बूख रगी है औय चगरास दो चगरास ऩानी ऩी मरमा तो शयीय
                       ू
दफरा-ऩतरा औय कभजोय हो जामगा।
       क्मा खाना, कफ खाना, ककतना खाना, कसे खाना..... क्मा फोरना, कफ फोरना, ककतना
                                        ै
फोरना, कसे फोरना, ककससे फोरना.... क्मा सनना, कफ सनना, ककतना सनना, ककसका
        ै
सनना.... इस प्रकाय हभाये स्थर-सूक्ष्भ सफ आहाय भें वववेक यखना चाहहए। बोरे बारे रोग
                            ू
फेचाये जजस ककसी की जैसी तैसी फातें सन रेते हैं , ननन्दा क बोग फन जाते हैं।
                                                         े
       'भैं क्मा करू.....? वह आदभी भेये ऩास आमा....। उसने ननन्दा सनाई तो भैंने सन री।'
                   ॉ
       अये बाई ! तूने ननन्दा सन री? ननन्दकों की ऩॊडक्त भें शामभर हो गमा?
                               कफीया ननन्दक ना मभरो ऩाऩी मभरो हजाय।
                             एक ननन्दक क भाथे ऩय राख ऩाऩीन को बाय।।
                                        े
       इस जीवन भें अऩना ही कभद कट जाम तो बी कापी है । दसयों की ननन्दा सनकय क्मों
                                                       ू
दसयों क ऩाऩ अऩने मसय ऩय रेना? जजसकी ननन्दा कयते हैं , सनते हॊ वह तो आइस्क्रीभ खाता
 ू     े
होगा औय हभ उसकी ननन्दा सनकय अशाॊनत क्मों भोर रें । कफ सनना, क्मा सनना, ककसका
सनना औय उस ऩय ककतना ववद्वास यखना इसभें बी अक्र चाहहए। अक्र फढ़ाने क मरए बी
                                                                   े
अक्र चाहहए। तऩ फढ़ाने क मरए बी तऩ चाहहए। धन फढ़ाने क मरए बी धन चाहहए।
                       े                            े
जीवनदाता से मभरने क बी जीवन जीने का सच्चा ढॊ ग चाहहए। जीवन भें दै वी सॊऩदा होनी
                   े
चाहहए। दै वी सॊऩदा क कछ रऺण फताते हए बगवान श्रीकृष्ण मह द्ऴोक कह यहे हैं-
                    े
       'बम का सवदथा अबाव, अॊत्कयण की ऩूणद ननभदरता, तत्त्वऻान क मरए ध्मानमोग भें
                                                              े
ननयॊ तय दृढ़ जस्थनत औय साजत्त्वक दान, इजन्िमों का दभन, बगवान, दे वता औय गरुजनों की ऩजा
                                                                                    ू
तथा अजननहोत्राहद उत्तभ कभों का आचयण एवॊ वेदशास्त्रों का ऩठन-ऩाठन तथा बगवान क नाभ
                                                                            े
औय गणों का कीतदन, स्वधभद-ऩारन क मरए कद्शसहन औय शयीय व इजन्िमों क सहहत,
                               े                                े
अॊत्कयण की सयरता मे सफ दै वी सम्ऩदावान ऩरुष क रऺण हैं।'
                                             े
          बगवान, दे वता औय गरुजनों की ऩूजा से तऩ-तेज फढ़ता है । बगवान मा ककसी ब्रह्मवेत्ता
सदगरु क चचत्र क सभऺ जफ भौका मभरे , फैठ जाओ। शयीय को जस्थय कयक उन्हें एकटक
       े       े                                             े
ननहायते जाओ। नेत्र की जस्थयता क द्राया भन को जस्थय कयने का अभ्मास कयो। ऐसे तऩ होता
                               े
है । तऩ से तेज फढ़ता है । इजन्िम-सॊमभ फढ़ता है । जीवन की शडक्तमों भें ववद्ध होती है , फवद्ध भें
                                                                       ृ
सक्ष्भता आती है । सभस्माएॉ सरझाने की प्रेयणा मभरती है । व्मवहाय भें बी आदभी सपर होता
 ू
है , ऩयभाथद भें बी आगे फढ़ता है ।
          जीवन भें ऐसा अभ्मास है नहीॊ, इजन्िम-सॊमभ है नहीॊ औय ठाकयजी क भॊहदय भें जाता है ,
                                                                      े
घॊट फजाता है । कपय बी योता यहता है । सद ऩय रूऩमे राता है , आचथदक फोझ भें दफता चरा जाता
                                      ू
है । मशकामत कयता यहता है कक, 'मह दननमाॉ फहत खयाफ है । भैं तो आऩघात कयक भय जाऊ तो
                                                                      े      ॉ
अच्छा।'
                               अये , डफा दे जो जहाजों को उसे तूपान कहते हैं।
                               जो तूपानों से टक्कय रे उसे इन्सान कहते हैं ।।
          व्मवहाय जगत क तपान तो क्मा, भौत का तूपान आमे उससे बी टक्कय रेने का
                       े ू
साभर्थमद आ जाम इसका नाभ है साऺात्काय। इसका नाभ है भनष्म जीवन की सपरता।
          जया जया-सी फात भें डय यहे हैं? जया जया-सी फात भें मसकड यहे हैं? हो होकय क्मा होगा?
जो बी हो गमा वह दे ख मरमा। जो हो यहा है वह दे ख यहे हैं। जो होगा वह बी दे खा जामेगा।
भॉूछ ऩय ताव दे ते हए.... बगवान को प्माय कयते हए तभ आगे फढ़ते जाओ।
          ननबदम..... ननबदम.... ननबदम.... ननबदम..... ननबदम.....।
          अये , बगवान का दास होकय, गरु का सेवक होकय, भनष्म का तन ऩाकय ऩाऩी ऩाभयों से,
भचगदमाॉ खानेवारे कफाफी-शयाफी रोगों से डय यहे हो? वे अऩने आऩ अऩने ऩाऩों भें डूफ यहे हैं, भय
यहे हैं। भहाबायत भें अजन जैसा आदभी दमोधन से डय यहा है । सोच यहा है कक ऐसे-ऐसे रोग
                       द
उसक ऩऺ भें हैं।
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          श्रीकृष्ण ने अजन से कहा कक्
                         द
                                 क्रैब्मॊ भा स्भ गभ् ऩाथद नैतत्त्वय्मऩऩद्यते।
                                    ऺिॊ रृदमदौफदल्मॊ त्मक्त्वोवत्तद्ष ऩयॊ तऩ।।
          'हे अजन ! नऩॊसकता को भत प्राद्ऱ हो। तेये मरमे मह उचचत नहीॊ है । हे ऩयॊ तऩ ! रृदम
                द
की तच्छ दफदरता को त्मागकय मद्ध क मरए खडा हो जा।'
                                े
                                                                                      (गीता् 2.3)
          सभाज भें सज्जन रोगों की सॊख्मा ज्मादा है रेककन सज्जन रो सज्जनता-सज्जनता भें
मसकड जाते हैं औय दजदन रोग मसय ऩय सवाय हो जाते हैं।
तभ डयो भत। घफडाओ भत। अबमॊ सत्त्वसॊशवद्ध.... ननबदम फनो। ववकट ऩरयजस्थनतमों भें
भागद खोजो। भागद अगय नहीॊ मभरता हो तो बगवान अथवा सदगरु क चचत्र क सभऺ फैठ जाओ,
                                                       े       े
ॐकाय अथवा स्वजस्तक क चचत्र सभऺ फैठ जाओ। एकटक ननहायो.... ननहायो.... ननहायो....। सफह
                    े
भें समोदम से ऩहर उठ जाओ, स्नानाहद कयक ऩाॉच-सात प्राणामाभ कयो। शयीय की जस्थयता,
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प्राण औय भन की जस्थयता कयो। कपय 'प्रोब्रेभ का सोल्मूशन' खोजो। मूॉ चटकी फजाते मभर
जामगा।
      जजतने तभ डयते हो, जजतने जजतने तभ घफयाते हो, जजतने जजतने तभ ववनम्र होकय
मसकडते हो उतना मे गण्डा तत्त्ववारे सभझते हैं कक हभ फडे हैं औय मे हभसे छोटे हैं। तभ
जजतना बीतय से ननबीक होकय जीते हो उतना उन रोगों क आगे सपर होते हो।
                                                े
                               हभें मभटा सक मे जभाने भें दभ नहीॊ।
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                               हभसे जभाना है जभाने से हभ नहीॊ।।
      हभाया चैतन्म-स्वरूऩ ईद्वय हभाये साथ है , हभ ईभानदायी से जीते हैं, दसयों का हभ अहहत
                                                                         ू
नहीॊ कयते, अहहत नहीॊ चाहते कपय हभाया फया कसे हो सकता है? फया होता हआ हदखे तो डयो
                                          ै
भत। सायी दननमा उल्टी होकय टॉ ग जाम कपय बी तभ सच्चाई भें अडडग यहोगे तो ववजम तम्हायी
ही होगी।
      ताभसी तत्त्वों से, आसयी तत्त्वों से कबी डयना नहीॊ चाहहए। बीतय से सत्त्वगण औय
ननबदमता फढ़ाकय सभाज का अभन-चभन फढ़ाने क मरए मत्न कयना चाहहए।
                                       े
      'हभाया क्मा.....? जो कये गा सो बये गा...' ऐसी कामयता प्राम् बगतडों भें आ जाती है । ऐसे
रोग बक्त नहीॊ कहे जाते, बगतडे कहे जाते हैं। बक्त तो वह है जो सॊसाय भें यहते हए, भामा भें
यहते हए भामा से ऩाय यहे ।
                            बगत जगत को ठगत है बगत को ठगे न कोई।
                            एक फाय जो बगत ठगे अखण्ड मऻ पर होई।।
      बक्त उसका नाभ नहीॊ जो बागता यहे । बक्त उसका नाभ नहीॊ जो कामय हो जाम। बक्त
उसका नाभ नहीॊ जो भाय खाता यहे ।
      जजसस ने कहा था् 'तम्हें कोई एक थप्ऩड भाय दे तो दसया गार धय दे ना, क्मोंकक उसकी
                                                      ू
इच्छा ऩयी हो। उसभें बी बगवान है ।'
       ू
      जजसस ने मह कहा, ठीक है । इसमरए कहा था कक कोई आवेश भें आ गमा हो तो तभ
थोडी सहन शडक्त जटा रो, शामद उसका द्रे ष मभट जाम, रृदम का ऩरयवतदन हो जामे।
      जजसस का एक प्माया मशष्म था। ककसी गॊडा तत्त्व ने उसका तभाचा ठोक हदमा। कपय
ऩूछा् "दसया गार कहाॉ है ?" मशष्म ने दसया गार धय हदमा। उस दद्श ने महाॉ बी तभाचा जभा
        ू                            ू
हदमा। कपय बी उस असय को सॊतोष नहीॊ हआ। उसने कहा्
      "अफ तीसया कहाॉ यख?"
                       ॉू
जजसस क मशष्म ने उस दद्श क गार ऩय जोयदाय तभाचा जड हदमा औय फोरा् "तीसया
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गार मह है ।"
       "तम्हाये गरु ने तो भना ककमा था। उनका उऩदे श नहीॊ भानते?"
       "गरु ने इसमरए भना ककमा था कक अहहॊसा की सयऺा हो। हहॊसा न हो। रेककन तम्हें दो
फाय भौका मभरा कपय बी तम्हाया हहॊसक स्वबाव नहीॊ मभटा। तभ असय हो। सफक मसखामे बफना
सीधे नहीॊ होओगे।"
       अनशासन क बफना आसयी तत्त्व ननमॊत्रण भें नहीॊ यहते। यावण औय दमोधन को ऐसे ही
               े
छोड दे ते तो आज हभ रोगों का सभाज शामद इस अवस्था भें न जी ऩाता। नैनतक औय
साभाजजक अन्धाधधी हो जाती। जफ-जफ सभाज भें ऐसा वैसा हो जाम तफ साजत्त्वक रोगों को
              ॊू
सतक होकय, हहम्भतवान फनकय तेजस्वी जीवन बफताने का मत्न कयना चाहहए। आऩ ननबदम यहे ,
   द
दसयों को ननबदम कये । सत्त्वगण की ववद्ध कये । जीवन भें दै वी फर चाहहए, आध्माजत्भक फर
 ू                                ृ
चाहहए। कवर व्मथद ववराऩ नहीॊ कयना चाहहए कक, 'हे भेये बगवान ! हे भेये प्रब " भेयी यऺा
        े
कयो... यऺा कयो...।'
       भैंने सनी है एक कहानी।
       गराभ नफीय ने योजे यखे। थोडा फहत बगत था औय ठगतों क साथ दोस्थी बी थी।
                                                        े
उसका धन्धा चोयी कयने का था। योजे क हदनों भें उसने चोयी छोड यखी थी। मभत्रों ने सभझामा्
                                  े
"ऐसा बगतडा फनेगा तो काभ कसे चरेगा? पराने ककसान क वहाॉ फहढ़मा फैर आमे हैं। जा,
                         ै                      े
खोर क रे आ।"
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       गराभ नफीय फैर चयाने चरा गमा। नमा मसक्खड था। फैर खोरकय रे जाने रगा तो फैर
क गरे भें फॉधी हई घॊहटमाॉ फजने रगीॊ। रोग जग गमे औय चोय का ऩीछा ककमा। गराभ नफीय
 े
आगे चरा तो ऩीछे हल्रा गल्रा सनाई दे ने रगा। उसने डयक भाये खदा से प्राथदना की् "हे
                                                    े
खदातारा ! भैंने योजा यखा है , भैं कभजोय हो गमा हूॉ। तू भझे सहाम कय। भेये ऊऩय यहे भत कय।
दफाया मह धन्धा नहीॊ करूगा। इस फाय फचा रे।"
                      ॉ
       उसक रृदमाकाश भें आकाशवाणी हई, प्रेयणा मभरी कक, "फैरों को छोडकय बाग जा तो
          े
फच जामगा। दफाया चोयी भत कयना।"
     "भामरक ! भैं योजा यख यहा हूॉ। भझभें दौडने की शडक्त नहीॊ है । दमा कयक आऩ ही भझे
                                                                         े
फचाओ।"
       "अच्छा, तू दौड नहीॊ सकता है तो जल्दी से चरकय साभनेवारी झाडी भें छऩ जा। फैरों
को छोड दे ।"
       "भझभें इतनी बी शडक्त नहीॊ है । तू यहे भत कय.... तू यहे भत कय....." गराभ नफीय इस
प्रकाय चगडचगडाता यहा। इतने भें रोगों ने आकय उसे ऩकड मरमा्
"भूखद ! फोरता है 'यहे भत कय... यहे भत कय....?' भार चयाते सभम यहे भत नही की औय
अफ ऩकडा गमा तो यहे भत कय.. यहे भत कय...?" रोगों ने फयाफय भेथीऩाक चखामा, यात बय
कोठयी भें फन्द यखा, सफह भें ऩमरस को सौंऩ हदमा।
       गराभ नफीय अॊत्प्रेयणा की आवाज सनकय हहम्भत कयता तो फच जाता।
                                     हहम्भते भदाद तो भददे खदा।
                                   फेहहम्भत फन्दा तो फेजाय खदा।।
       जो नाहहम्भत हो जाता है उसको फचाने भें बगवान बी फेजाय हो जाते हैं , राचाय हो जाते
हैं। अऩना ऩरुषाथद जगाना चाहहए, हहम्भतवान फनना चाहहए।
                                मह कौन-सा उकदा जो हो नहीॊ सकता?
                                 तेया जी न चाहे तो हो नहीॊ सकता।
                                  छोटा-सा कीडा ऩत्थय भें घय कये....
                               इन्सान क्मा हदरे हदरफय भें घय न कये?
       तभभें ईद्वय की अथाह शडक्त छऩी है । ऩयभात्भा का अनऩभ फर छऩा है । तभ चाहो तो
ऐसी ऊचाई ऩय ऩहॉ च सकते हो कक तम्हाया दीदाय कयक रोग अऩना बानम फना रें । तभ ब्रह्मवेत्ता
     ॉ                                        े
फन सकते हो ऐसा तत्त्व तभभें छऩा है । रेककन अबागे ववषमों ने, तम्हाये नकायात्भक ववचायों ने,
दफदर ख्मारों ने, चगरी, ननन्दा औय मशकामत की आदतों ने, यजो औय तभोगण ने तम्हायी शडक्त
को बफखेय हदमा है । इसीमरए श्रीकृष्ण कहते हैं-
                                        अबमॊ सत्त्वसॊशवद्ध्.....।
       जीवन भें दै वी सम्ऩदा क रऺण बयो औय ननबदम फनो। जजतनी तम्हायी आध्माजत्भक
                              े
उन्ननत होगी उतनी ठीक से साभाजजक उन्ननत बी होगी। अगय आध्माजत्भक उन्ननत शून्म है तो
नैनतक उन्ननत भात्र बाषा होगी। आध्माजत्भक उन्ननत क बफना नैनतक उन्ननत नहीॊ हो सकती।
                                                 े
नैनतक उन्ननत नहीॊ होगी तो बौनतक उन्ननत हदखेगी रेककन वास्तव भें वह उन्ननत नहीॊ होगी,
जॊजीयें होगी तम्हाये मरमे। रोगों की नजयों भें फडा भकान, फडी गाडडमाॉ, फहत रूऩमे-ऩैसे हदखेंगे
रेककन तम्हाये बीतय टे न्शन ही टे न्शन होगा, भसीफतें ही भसीफतें होगी।
       आध्माजत्भक उन्ननत जजतने अनऩात भें होती है उतने अनऩात भें नैनतक फर फढ़ता है ।
जजतने अनऩात भें नैनतक फर फढ़ता है उतने अनऩात भें तभ जागनतक वस्तओॊ का ठीक
उऩमोग औय उऩबोग कय सकते हो। रोग जगत की वस्तओॊ का उऩबोग थोडे ही कयते हैं, वे तो
बोग फन जाते हैं। वस्तएॉ उन्हें बोग रेती हैं। धन की चचन्ता कयते-कयते सेठ को 'हाटद -अटै क' हो
गमा तो धन ने सेठ को बोग मरमा। क्मा खाक सेठ ने बोगा धन को? काय भें तो ड्रामवय घूभ
यहा है , सेठ तो ऩडे हैं बफस्तय भें । रड्डू तो यसोईमा उडा यहा है, सेठ तो डामबफटीज़ से ऩीडडत हैं।
बोग तो नौकय-चाकय बोग यहे हैं औय सेठ चचन्ता भें सूख यहा है ।
अऩने को सेठ, साहफ औय सखी कहरानेवारे तथा-कचथत फडे-फडे रोगों क ऩास अगय
                                                                      े
सत्त्वगण नहीॊ है तो उनकी वस्तओॊ का उऩबोग दसये रोग कयते हैं।
                                          ू
          तम्हाये जीवन भें जजतने अनऩात भें सत्त्वगण होगा उतने अनऩात भें आध्माजत्भक शडक्तमाॉ
ववकमसत होगी। जजतने अनऩात भें आध्माजत्भक शडक्तमाॉ होगी उतने अनऩात भें नैनतक फर
फढ़े गा। जजतने अनऩात भें नैनतक फर होगा उतने अनऩात भें व्मवहारयक सच्चाई होगी, चीज-
वस्तओॊ का व्मावहारयक सदऩमोग होगा। तम्हाये सॊऩक भें आनेवारों का हहत होगा। जीवन भें
                                              द
आध्माजत्भक उन्ननत नहीॊ होगी तो नैनतक फर नहीॊ आएगा। उतना ही जीवन डावाॉडोर यहे गा।
डावाॉडोर आदभी खद तो चगयता है , उसका सॊग कयने वारे बी ऩये शान होते हैं।
          इजन्िमों का दभन नहीॊ कयने से सक्ष्भ शडक्तमाॉ बफखय जाती हैं तो आध्माजत्भक उन्ननत
                                        ू
नहीॊ होती।
          वाणी का सॊमभ कयना भाने चगरी, ननन्दा नहीॊ कयना, कट बाषा न फोरना, झठ-कऩट
                                                                           ू
न कयना, मह वाणी का तऩ है । आचामद की उऩासना कयना, बगवान की उऩासना कयना, मह
भन का तऩ है । शयीय को गरत जगह ऩय न जाने दे ना, व्रत-उऩवास आहद कयना मह शायीरयक
तऩ है ।
          व्रत-उऩवास की भहहभा सनकय कछ भहहराएॉ रम्फे-रम्फे व्रत यखने रग जाती है । जो
सहाचगन जस्त्रमाॉ है , जजनका ऩनत हमात है ऐसी भहहराओॊ को अचधक भात्रा भें व्रत उऩवास नहीॊ
कयना चाहहए। सहाचगन अगय अचधक उऩवास कये गी तो ऩनत की आम ऺीण होगी। सद्ऱाह भें ,
ऩन्िह हदन भें एक उऩवास शयीय क मरए बी ठीक है औय व्रत क मरए बी ठीक है ।
                             े                       े
          कछ रोग योज-योज ऩेट भें ठूॉस-ठूॉसकय खाते हैं, अजीणद फना रेते हैं औय कछ रोग खफ
                                                                                     ू
बूखाभयी कयते हैं, सोचते हैं कक भझे जल्दी बगवान मभर जाम। नहीॊ, व्मवहाय भें थोडा दऺ
फनने की जरूयत है । कफ खाना, क्मा खाना, कसे खाना, कफ व्रत यखना, कसे यखना मह ठीक
                                        ै                       ै
से सभझकय आदभी अगय तऩस्वी जीवन बफताता है तो उसका फर, तेज फढ़ता है ।
          प्राणामाभ से भन एकाग्र होता है । प्राणामाभ से प्राण की रयधभ अगय ठीक हो जाम तो
शयीय भें वात औय कप ननमॊबत्रत हो जाते हैं। कपय फाहय की दवाइमों की ओय 'भेननेट थेयाऩी'
आहद की जरूयत नहीॊ ऩडती है । इन्जैक्शन की सइमाॉ बोंकाने की बी जरूयत नहीॊ ऩडती है ।
कवर अऩने प्राणों की गनत को ठीक से सभझ रो तो कापी झॊझटो से छट्टी हो जामगी।
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          जऩ कयने से एक प्रकाय का आबाभण्डर फनता है , सूक्ष्भ तेज फनता है । उससे शयीय भें
स्पनतद आती है , भन-फवद्ध भें फर फढ़ता है । जऩ कयते सभम अगय आसन ऩय नहीॊ फैठोगे तो
   ू
शयीय की ववद्यत ् शडक्त को अथींग मभर जामगा। आबा, तेज, ओज, फर की सयऺा नही होगी।
अत् आसन ऩय फैठकय प्राणामाभ, जऩ-तऩ, ध्मान-बजन कयना चाहहए। शयीय तन्दरुस्त यहे गा,
भन एकाग्र फनेगा, फवद्ध तेजस्वी होगी, जीवन भें सत्त्वगण की ववद्ध होगी।
                                                           ृ
                                       सत्त्वात ् सॊजामते ऻानभ ्।
सत्त्वगण की ववद्ध से ऻान उत्ऩन्न होता है ।
                    ृ
       आदभी जजतना बी ऩाभय हो, उसभें ककतने बी दोष हों, अगय थोडे ही हदन इन साधनों
का अवरॊफन रे तो उसक दोष अऩने आऩ ननकरने रगें गे।
                   े
       सूक्ष्भ शडक्तमों से स्थर शडक्तमाॉ सॊचामरत होती हैं। भोटयकाय भें ऩेट्रोर से इॊजजन क बीतय
                              ू                                                          े
थोडी-सी आग जरती है । इससे इतनी फडी गाडी बागती है । ट्रे न क फोइरय भें थोडे गेरन ऩानी
                                                           े
होता है , उफरता है , वाष्ऩ फनता है , उससे हजायों भन, राखों टन वजन को रेकय इॊजजन को
बागता है ।
       ऐसे ही भन जफ ध्मान-बजन कयक सक्ष्भ होता है तो राखों भसीफतों को काटकय अऩने
                                 े ू
बगवत्प्राद्ऱरूऩी भोऺ क द्राय ऩय ऩहॉ च जाता है । फाहय की गाडी तो वाष्ऩ क फर से तम्हें
                      े                                                े
अभदावाद से हदल्री ऩहॉ चाती है जफकक तम्हायी हदर की गाडी अगय सत्त्वगण फढ़े तो हदरफय
तक ऩयभात्भा तक, ऩहॉ चा दे ती है ।
       भनष्म को कबी बी हताश नहीॊ होना चाहहए। आध्माजत्भक याह को योशन कयने वारे
याहफय मभरे हैं, साधना का उत्तभ वातावयण मभर यहा है , इन फातों को आत्भसात ् कयने क मरए
                                                                                े
श्रद्धा-बडक्त औय फवद्ध बी है तो जजतना हो सक, अचधक से अचधक चर रेना चाहहए। ककसी बी
                                           े
द्खों से, ककसी बी ऩरयजस्थनतमों से रुकना नहीॊ चाहहए।
                           गभ की अन्धेयी यात भें हदर को न फेकयाय कय।
                             सफह जरूय आमेगी सफह का इन्तजाय कय।।
       घफयाहट से तम्हायी मोनमता ऺीण हो जाती है । जफ डय आमे तो सभझो मह ऩाऩ का
द्योतक है । ऩाऩ की उऩज डय है । अववद्या की उऩज डय है । अऻान की उऩज डय है । ननबदमता ऻान
की उऩज है । ननबदमता आती है इजन्िमों का सॊमभ कयने से, आत्भववचाय कयने से। 'भैं दे ह नहीॊ
हूॉ.... भैं अभय आत्भा हूॉ। एक फभ ही नहीॊ, ववद्वबय क सफ फभ मभरकय बी शयीय क ऊऩय चगय
                                                   े                     े
ऩडें तो बी शयीय क बीतय का जो आत्भचैतन्म है उसका फार फाॉका बी नहीॊ होता। वह चैतन्म
                   े
आत्भा भैं हूॉ। सोऽहभ ्.... इस प्रकाय आत्भा भें जागने का अभ्मास कयो। 'सोऽहभ ् का अजऩाजाऩ
कयो। अऩने सोऽहभ ् स्वबाव भें हटको।
       ववकायों से ज्मों-ज्मों फचते जाओगे त्मों-त्मों आध्माजत्भक उन्ननत होगी, नैनतक फर
फढ़े गा। तभ सॊसाय का सदऩमोग कय ऩाओगे। अबी सॊसाय का सदऩमोग नहीॊ होता। सयकनेवारी
चीजों का सदऩमोग नहीॊ होता, उनक दरुऩमोग होता है । साथ ही साथ हभाये भन-इजन्िमों का बी
दरुऩमोग हो जाता है , हभाये जीवन का बी दरुऩमोग हो जाता है । कहाॉ तो दरदब भनष्म
जन्भ..... दे वता रोग बी बायत भें भनष्म जन्भ रेने क मरए रारानमत यहते हैं... वह भनष्म
                                                  े
जन्भ ऩाकय आदभी दो योटी क मरए इधय उधय धक्का खा यहा है । दो ऩैसे क भकान क मरए
                        े                                       े      े
चगडचगडा यहा है ! चाय ऩैसे की रोन रेने क मरए राईन भें खडा है ! साहफों को औय एजेन्टों
                                       े
को सराभ कयता है , मसकडता यहता है । जजतना मसकडता है उतना ज्मादा धक्क खाता है । ज्मादा
                                                                   े
कभीशन दे ना ऩडता है । तफ कहीॊ रोन ऩास होता है । मह क्मा भनष्म का दबादनम है? भानव
जीवन जीने का ढॊ ग ही हभ रोगों ने खो हदमा है ।
       ववरामसता फढ़ गई है । ऐश-आयाभी जीवन (Luxurious Life) जीकय सखी यहना चाहते हैं
वे रोग ज्मादा द्खी हैं फेचाये । जो भ्रद्शाचाय (Corruption) कयक सखी यहना चाहते हैं उनको अऩने
                                                              े
फेटों क द्राया, फेहटमों क द्राया औय कोई प्रोब्रेभ क द्राया चचत्त भें अशाॊनत की आग जरती यहती
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है ।
                             अगय आयाभ चाहे तू दे आयाभ खरकत को।
                          सताकय गैय रोगों को मभरेगा कफ अभन तझको।।
       दसयों का फाह्य ठाठ-ठठाया दे खकय अऩने शाॊनतभम आनन्दभम, तऩस्वी औय त्मागी जीवन
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को धधरा भत कयो। सख-वैबव की वस्तएॉ ऩाकय जो अऩने को सखी सभझकय उन जैसे होने क
    ॉ                                                                     े
मरए जो रोग नीनत छोडकय दयाचाय क तयप रगते हैं उन ऩय हभें दगनी दमा आती है । मे रोग
                              े
जीवन जीने का ढॊ ग ही नहीॊ सभझते। फहढ़मा भकान हो, फहढ़मा गाडी हो, फहढ़मा मह हो, फहढ़मा
वह हो तो आदभी सखी हो जाम? अगय ऐसा होता तो यावण ऩूया सखी हो जाता। दमोधन ऩूया
सखी हो जाता। नहीॊ, नहीॊ, ऐसा नहीॊ है ।
                        शक्कय णखरा शक्कय मभरे टक्कय णखरा टक्कय मभरे।
                            नेकी का फदरा नेक है फदों को फदी दे ख रे।
                        दननमाॉ ने जान इसको मभमाॉ सागय की मह भझदाय है ।
                               औयों का फेडा ऩाय तो तेया फेडा ऩाय है ।।
                        करजग नहीॊ कयजग है मह इस हाथ दे उस हाथ रे।।
       भैंने सनी है एक सत्म घटना।
       अभदावाद, शाहीफाग भें डपनारा क ऩास हाईकोटद क एक जज सफह भें दातन कयते हए
                                    े             े
घूभने ननकरे थे। नदी क तयप दो यॊ गरूट जवान आऩस भें हॉ सी-भजाक कय यहे थे। एक ने
                     े
मसगये ट सरगाने क मरए जज से भाचचस भाॉगा। जज ने इशाये से इन्काय कय हदमा। थोडी दे य
                े
इधय-उधय टहरकय जज हवा खाने क मरए कहीॊ फैठ गमे। दे ख यहे थे उन दोनों को। इतने भें वे
                           े
यॊ गरूट हॉसी-भजाक, तू-भैं-तू-भैं कयते हए रड ऩडे। एक ने याभऩयी चक्क ननकारकय दसये को
                                                                  ू         ू
घसेड हदमा, खन कय डारा औय ऩरामन हो गमा। जज ने ऩमरस को पोन आहद सफ ककमा
            ू
होगा। खन का कस फना। सेशन कोटद से वह क घूभता घाभता कछ सभम क फाद आणखय हाई
       ू     े                       े                    े
कोटद भें उसी जज क ऩास आमा। कस जाॉचा। उन्हें ऩता चरा कक कस वही है । उस हदन वारी
                 े          े                           े
घटना का उन्हें ठीक स्भयण था। उन्होंने दे खा तो ऩामा कक मह उस हदन वारा अऩयाधी तो नहीॊ
है ।
       वे जज कभदपर क अकाट्म मसद्धान्त को भाननेवारे थे। वे सभझते थे कक राॊच-रयद्वत मा
                    े
औय कोई बी अशब कभद उस सभम तो अच्छा रगता है रेककन सभम ऩाकय उसक पर बोगने
                                                            े
ही ऩडते हैं। ऩाऩ कयते सभम अच्छा रगता है रेककन बोगना ऩडता है । कछ सभम क मरए
                                                                      े
आदभी ककन्हीॊ कायणों से चाहे छट जाम रेककन दे य सवेय कभद का पर उसे मभरता है , मभरता है
                             ू
औय मभरता ही है ।
       जज ने दे खा कक मह अऩयाधी तो फूढ़ा है जफकक खन कयने वारा यॊ गरूट तो जवान था।
                                                  ू
उन्होंने फढ़े को अऩनी चेम्फय भें फरामा। फूढ़ा योने रगा्
          ू
       "साहफ ! डपनारा क ऩास, साफयभती का ककनाया.... मह सफ घटना भैं बफल्कर जानता
                       े
ही नहीॊ हूॉ। बगवान की कसभ, भैं ननदोष भाया जा यहा हूॉ।"
       जज सत्त्वगणी थे, सज्जन थे, ननभदर ववचायों वारे, खरे भन क थे। ननबदम थे। नन्स्वाथी
                                                              े
औय साजत्वक आदभी ननबदम यहता है । उन्होंने फढ़े से कहा्
                                          ू
       "दे खो, तभ इस भाभरे भें कछ नहीॊ जानते मह ठीक है रेककन सेशन कोटद भें तभ ऩय
मह अऩयाध बफल्कर कपट हो गमा है । हभ तो कवर कानन का चकादा दे ते हैं। अफ हभ इसभें
                                       े     ू
औय कछ नहीॊ कय सकते।
       इस कस भें तभ नहीॊ थे ऐसा तो भेया भन बी कहता है कपय बी मह फात बी उतनी ही
           े
ननजद्ळत है कक अगय तभने जीवनबय कहीॊ बी ककसी इन्सान की हत्मा नहीॊ की होती तो आज
सेशन कोटद क द्राया ऐसा जडफेसराक कस तभ ऩय फैठ नहीॊ सकता था।
           े                     े
       काका ! अफ सच फताओ, तभने कहीॊ न कहीॊ, कबी न कबी, अऩनी जवानी भें ककसी
भनष्म को भाया था?"
       उस फूढ़े ने कफूर कय मरमा् "साहफ ! अफ भेये आणखयी हदन हैं। आऩ ऩछते हैं तो फता
                                                                    ू
दे ते हूॉ कक आऩकी फात सही है भैंने दो खन ककमे थे। राॊच-रयद्वत दे कय छट गमा था।"
                                       ू                             ू
       जज फोरे् "तभ तो दे कय छट गमे रेककन जजन्होंने मरमा उनसे कपय उनक फेटे रेंगे,
                              ू                                      े
उनकी फेहटमाॉ रेंगी, कदयत ककसी न ककसी हहसाफ से फदरा रेगी। तभ वहाॉ दे कय छटे तो महाॉ
                                                                        ू
कपट हो गमे। उस सभम रगता है कक छट गमे रेककन कभद का पर तो दे य-सवेय बोगना ही
                               ू
ऩडता है ।"
       कभद का पर जफ बोगना ही ऩडता है तो क्मों न फहढ़मा कभद कयें ताकक फहढ़मा पर
मभरे? फहढ़मा कभद कयक कभद बगवान को ही क्मों न दे दें ताकक बगवान ही मभर जामें?
                    े
       नायामण..... नायामण.... नायामण...... नायामण.... नायामण......
       सत्त्वसॊशवद्ध क मरए, ननबदमता क मरए बगवान का ध्मान बगवन्नाभ का जऩ, बगवान
                      े              े
क गणों का सॊकीतदन, बगवान औय गरुजनों का ऩूजन आहद साधन हैं। अजननहोत्र आहद उत्तभ
 े
कभों का आचयण कयना सत्त्वगण फढ़ाने क मरए हहतावह है । ऩहरे क जभाने भें मऻ-माग होते
                                   े                      े
थे। कपय उसका स्थान इद्श की भूनतदऩूजा ने मरमा। भूनतदऩूजा बी चचत्तशवद्ध का एक फहढ़मा साधन
है । वेदशास्त्रों का ऩठन-ऩाठन, जऩ, कीतदन आहद से सत्त्वगण फढ़ता है । सत्त्वगण फढ़ने से
भनोकाभना जल्दी से ऩणद होती है । हर की काभना कयने से तऩ खचद हो जाता है । ऊचे से ऊची
                   ू                                                     ॉ      ॉ
मह काभना कयें कक, 'हे बगवान ् ! हभायी कोई काभना न यहे । अगय कोई काभना यहे तो तझे
ऩाने की ही काभना यहे ।' ऐसी काभना से तऩ घटता नहीॊ, औय चाय गना फढ़ जाता है ।
       जऩ-तऩ कयक, बगवन्नाभ सॊकीतदन से सत्त्वगण फढ़ाओ। स्वधभदऩारन कयने भें जो कद्श
                े
सहना ऩडे वह सहो। तभ जहाॉ जो कत्तदव्म भें रगे हो, वहाॉ उसी भें फहढ़मा काभ कयो। नौकय हो
तो अऩनी नौकयी का कत्तदव्म ठीक से फजाओ। दसये रोग आरस्म भें मा गऩशऩ भें सभम फयफाद
                                        ू
कयते हों तो वे जानें रेककन तभ अऩना काभ ईभानदायी से उत्साहऩूवक कयो। स्वधभदऩारन कयो।
                                                            द
भहहरा हो तो घय को ठीक साप सथया यखो, स्वगद जैसा फनाओ। आश्रभ क मशष्म हो तो आश्रभ
                                                            े
को ऐसा सहावना फनाओ कक आने वारों का चचत्त प्रसन्न हो जाम, जल्दी से बगवान क ध्मान-
                                                                         े
बजन भें रग जाम। तम्हें ऩण्म होगा।
       अऩना स्वधभद ऩारने भें कद्श तो सहना ही ऩडेगा। सदी-गभी, बख-प्मास, भान-अऩभान
                                                              ू
सहना ऩडेगा। अये चाय ऩैसे कभाने क मरए यातऩारीवारों को सहना ऩडता है , हदनऩारीवारों को
                                े
सहना ऩडता है तो 'ईद्वयऩारी' कयने वारा थोडा सा सह रे तो क्मा घाटा है बैमा?
       .....तो स्वधभदऩारन क मरए कद्श सहें । शयीय तथा इजन्िमों क सहहत अॊत्कयण की
                           े                                   े
सयरता यखें । चचत्त भें क्रयता औय कहटरता नहीॊ यखें। जफ-जफ ध्मान-बजन भें मा ऐसे ही फैठें
                         ू
तफ सीधे, टट्टाय फैठें। झककय मा ऐसे-वैसे फैठने से जीवन-शडक्त का ह्रास होता है । जफ फैठें तफ
हाथ ऩयस्ऩय मभरे हए हों, ऩारथी फॉधी हई हो। इससे जीवन-शडक्त का अऩव्मम होना रुक
जामगा। सूक्ष्भ शडक्त की यऺा होगी। तन तन्दरुस्त यहे गा। भन प्रसन्न यहे गा। सत्त्वगण भें जस्थनत
कयने भें सहाम मभरेगी। स्वधभदऩारन भें कद्श सहने ऩडे तो हॉ सते-हॉ सते सह रो मह दै वी
सम्ऩदावान ऩरुष क रऺण हैं। ऐसे ऩरुष की फवद्ध ब्रह्मसख भें जस्थत होने रगती है । जजसकी फवद्ध
                े
ब्रह्मसख भें जस्थत होने रगती है उसक आगे सॊसाय का सख ऩारे हए कत्ते की तयह हाजजय हो
                                   े
जाता है । उसकी भौज ऩडे तो जया सा उऩमोग कय रेता है , नहीॊ तो उससे भॉह भोड रेता है ।
       जजसक जीवन भें सत्त्वगण नहीॊ हैं , दै वी सॊऩवत्त नहीॊ है वह सॊसाय क सख क ऩीछे बटक-
           े                                                             े    े
बटककय जीवन खत्भ कय दे ता है । सख तो जया-सा मभरा न मभरा रेककन द्ख औय चचन्ताएॉ
उसक बानम भें सदा फनी यहती हैं।
   े
       सफ द्खों की ननववत्त औय ऩयभ सख की प्रानद्ऱ अगय कोई कयना चाहे तो अऩने जीवन भें
                      ृ
सत्त्वगण की प्रधानता रामे। ननबदमता, दान, इजन्िमदभन, सॊमभ, सयरता आहद सदगणों को ऩद्श
कये । सदगणों भें प्रीनत होगी तो दगण अऩने आऩ ननकर जामेंगे। सदगणों भें प्रीनत नहीॊ है ,
                                  द
इसमरए दगणों को हभ ऩोसते हैं। थोडा जभा थोडा उधाय.... थोडा जभा थोडा उधाय... ऐसा हभाया
        द
खाता चरता यहता है । ऩाभयों को, कऩहटमों को दे खकय उनका अनकयण कयने क मरए उत्सक हो
                                                                  े
जाते हैं। भ्रद्शाचाय कयक बी धन इकट्ठा कयने की चाह यखते हैं। अये बैमा ! वे रोग जो कयते हैं
                        े
वे बैंसा फन कय बोगें गे, वऺ फनकय कल्हाडे क घाव सहें गे, मह तो फाद भें ऩता चरेगा। उनकी
                          ृ               े
नकर क्मों कय यहे हो?
जीवन भें कोई बी ऩरयजस्थनत आमे तो सोचो कक कफीय होते तो क्मा कयते? याभजी होते
तो क्मा कयते? रखनरारा होते तो क्मा कयते? सीताजी होती तो क्मा कयती? गागी होती तो
क्मा कयती? भदारसा होती तो क्मा कयती? शफयी बीरनी होती तो क्मा कयती? ऐसा सोचकय
अऩना जीवन हदव्म फनाना चाहहए। हदव्म जीवन फनाने क मरए दृढ़ सॊकल्ऩ कयना चाहहए। दृढ़
                                               े
सॊकल्ऩ क मरए सफह जल्दी उठो। सूमोदम से ऩहरे स्नानाहद कयक थोडे हदन ही अभ्मास कयो,
        े                                              े
तम्हाया अॊत्कयण ऩावन होगा। सत्त्वगण फढ़े गा। एक गण दसये गणों को रे आता है । एक
                                                    ू
अवगण दसये अवगणों को रे आता है । एक ऩाऩ दसये ऩाऩों को रे आता है औय एक ऩण्म दसये
      ू                                 ू                                  ू
ऩण्मों को रे आता है । तभ जजसको सहाया दोगे वह फढ़े गा। सदगण को सहाया दोगे तो ऻान
शोबा दे गा।
                                          अनक्रभ
                          ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


                                  दै वी सम्ऩदा – 2
                          (हदनाॊक् 29.7.1990 यवववाय, अभदावाद आश्रभ)
                            अहहॊसा सत्मभक्रोधस्त्माग् शाजन्तयऩैशनभ ्।
                              दमा बूतेष्वरोरद्ऱवॊ भादद वॊ ह्रीयचाऩरभ ्।।
       'भन, वाणी औय शयीय से ककसी प्रकाय बी ककसी को कद्श न दे ना, मथाथद औय वप्रम
बाषण, अऩना अऩकाय कयने वारे ऩय बी क्रोध का न होना, कभों भें कत्तादऩन क अमबभान का
                                                                     े
त्माग, अन्त्कयण की उऩयनत अथादत ् चचत्त की चॊचरता का अबाव, ककसी की बी ननन्दा आहद न
कयना, सफ बूतप्राणणमों भें हे त यहहत दमा, इजन्िमों का ववषमों क साथ सॊमोग होने ऩय बी उनभें
                                                             े
आसडक्त का न होना, कोभरता, रोक औय शास्त्र से ववरुद्ध आचयण भें रज्जा औय व्मथद चेद्शाओॊ
का अबाव (मे दै वी सम्ऩदा को रेकय उत्ऩन्न हए ऩरुष क रऺण हैं।)
                                                  े
                                                                           (बगवद् गीता् 16.2)
       साधक को कसा होना चाहहए, जीवन का सवाांगी ववकास कयने क मरए कसे गण धायण
                ै                                          े     ै
कयने चाहहए, जीवन का सवाांगी ववकास कयने क मरए कसे गण धायण कयने चाहहए इसका
                                        े     ै
वणदन बगवान श्रीकृष्ण 'दै वीसम्ऩद् ववबागमोग' भें कयते हैं। कछ ऐसे भहाऩरुष होते हैं जजनके
जीवन भें मे गण जन्भजात होते हैं। कछ ऐसे बक्त होते हैं जजनक जीवन भें बडक्त-बाव से मे
                                                          े
गण धीये -धीये आते हैं। उनको महद सत्सॊग मभर जाम, वे थोडा ऩरुषाथद कये तो गण जल्दी से
आते हैं। साधक रोग साधन-बजन कयक गण अऩने भें बय रेते हैं।
                              े
दै वी सम्ऩदा आत्भानबव की जननी है । दै वी सम्ऩदा आत्भा क ननकट है , आत्भा का
                                                               े
स्वबाव है , जजनभें दै वी सम्ऩदा होती है वे रोग फहत रोगों क प्माये होते हैं। दै वी सम्ऩदा भें
                                                          े
छब्फीस सदगण फतामे गमे हैं।
        आऩने व्मवहाय भें बी दे खा होगा कक आदभी ककतना बी फेईभान हो, फदभाश हो, रटे या
हो, डाक हो रेककन वह नहीॊ चाहता है कक भेये साथ दसया कोई फदभाशी कये । फेईभान आदभी बी
       ू                                       ू
अऩना भनीभ ईभानदाय चाहता है । फदभाश आदभी बी अऩना कोषाध्मऺ मा साथी, सॊगी
ईभानदाय चाहता है । ईभानदाय रोग तो ईभानदाय आदभी को प्माय कयते ही हैं रेककन फेईभान
रोगों को बी ईभानदाय आदभी की आवश्मकता होती है । अथादत ् दै वी गण आत्भा क ननकटवती हैं
                                                                       े
इसमरए दै वी गणवारों को प्राम् सफ रोग प्माय कयते हैं। आसयी स्वबाव क रोग बी दै वी
                                                                  े
गणवारे क प्रनत बीतय से झक हए होते हैं, कवर फाहय से पपकायते हैं। श्रीयाभजी क प्रनत
        े                े              े                                  े
यावण बीतय से झका हआ था रेककन फाहय से पपकायते पपकायते भय गमा। कस श्री कृष्ण क
                                                              ॊ             े
प्रनत बीतय से प्रबाववत था रेककन फाहय से दद्शता कयता यहा। इस प्रकाय जजसभें दै वी गण होते
हैं उसक कटम्फी, ऩडोसी आद फाहय से चाहे उसकी हदल्रगी उडामें, उऩहास कयें रेककन बीतय भें
       े
उससे प्रबाववत होते जाते हैं। अत् साधक को चाहहए कक अगय आसयी स्वबाव क दस-फीस रोग
                                                                   े
उसका भजाक उडामें, उसका ववयोध कयें , उसकी ननन्दा कयें मा कोई आयोऩ-राॊछन रगामें तो
साधक को चचॊनतत नहीॊ होना चाहहए। साधक को कबी बमबीत नहीॊ होना चाहहए। उसे सदा माद
यखना चाहहए कक्
                            इरजाभ रगाने वारों ने इरजाभ रगामे राख भगय।
                              तेयी सौगात सभझ हभ मसय ऩे उठामे जाते हैं।।
        मे सॊत-भहात्भा-सत्ऩरुष-सदगरुओॊ की भहानता है । वमशद्षजी भहायाज कहते हैं-
        "हे याभजी ! भैं फाजाय से गजयता हूॉ तफ ऩाऩी रोग भेये मरए क्मा क्मा फोरते हैं मह
सफ भैं जानता हूॉ रेककन भेया दमार स्वबाव है ।"
        साधक क जीवन भें बी बीतय दमा होनी चाहहए। दमा का भतरफ मह नहीॊ है कक सदा
              े
भूखद फना यहे । कबी दद्शजन क प्रनत पपकाय बी कय दे रेककन बीतय से अऩने चचत्त को चैतन्म
                           े       ू
क यस से सयाफोय कयता जाम।
 े
        बगवान श्रीकृष्ण साधक क जीवन भें साध्म तत्त्व का जल्दी से साऺात्काय हो जाम
                              े
इसमरए दै वी गणों का वणदन कय यहे हैं। दै वी सम्ऩदा क गण दे व की अनबूनत क कयीफ रे जाते
                                                   े                   े
हैं। दे व वह ऩयभेद्वय है जो सवदत्र है , सवदशडक्तभान है , सूक्ष्भानतसूक्ष्भ है । कहा है कक् 'भातदेवो
                                                                                               ृ
बव..... वऩतदेवो बव.... आचामददेवो बव.... अनतचथदे वो बव.....।' इन भाता, वऩता, आचामद,
           ृ
अनतचथ आहद हाथ-ऩैय, नाक-भॉहवारे दे वों भें जो वास्तववक दे व है , जो अन्तमादभी दे व है वह
ऩयभात्भा तम्हाये अन्त्कयण भें बी फैठा है । उस दे व का अनबव कयने क मरए दै वी सम्ऩदा
                                                                 े
ननतान्त आवश्मक है । दै वी सम्ऩदा आत्भा-ऩयभात्भा क साऺात्काय तक ऩहॉचा दे ती है ।
                                                 े
स्थर-शयीयधायी को सवदथा अहहॊसक होना तो सॊबव नहीॊ रेककन अऩने स्वाथद क कायण
          ू                                                               े
ककसी चचत्त को, ककसी क तन-भन को, ककसी क जीवन को कद्श न दे ना मह अहहॊसा है । डॉक्टय
                     े                े
शल्म कक्रमा कयता है , भयीज को ऩीडा ऩहॉ चाता है रेककन उसका ऩीडा ऩहॉ चाने का स्वाथद नहीॊ है ।
उसका स्वाथद है कक भयीज ननयोग हो जाम। इसमरम अॊगों की काटाकटी कयना, यक्त फहाना
डॉक्टय क मरए हहॊसा नहीॊ भानी जाती।
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       हहॊसा का जन्भ तभोगण से होता है । प्रनतहहॊसा यजोगण से ऩैदा होती है । अहहॊसा सत्त्वगण
से ऩैदा होती है । श्रीकृष्ण की अहहॊसा सत्त्व-यजो-तभोगणजन्म नहीॊ है । श्रीकृष्ण की अहहॊसा मह है
कक जजस तत्त्व की कबी भत्म नहीॊ होती उसभें हटककय व्मवहाय कयना। मह ऩयभ अहहॊसा है ,
                      ृ
अहहॊसा का सक्ष्भतभ स्वरूऩ है ।
           ू
                                           अहहॊसा ऩयभो धभद्।
       ऩयभ तत्त्व भें जो हटक गमा, अचर तत्त्व भें जो प्रनतवद्षत हो गमा वही इस ऩयभ धभद को
उऩरब्ध होता है ।
                                 प्रकृते् कक्रमभाणानन गणै् कभादणण सवदश्।
                                  अहॊ कायववभूढात्भा कतादहमभनत भन्मते।।
       'वास्तव भें सम्ऩूणद कभद सफ प्रकाय से प्रकृनत क गणों द्राया ककमे जाते हैं तो बी जजसका
                                                     े
अॊत्कयण अहॊ काय से भोहहत हो यहा है ऐसा अऻानी 'भैं कत्ताद हूॉ' ऐसा भानता है ।'
                                                                                  (गीता् 3.27)
       प्रकृनत भें होने वारे कभों को जो कत्ताद फनकय अऩने भें थोऩता है वह ककतना बी
अहहॊसक हो जाम कपय बी उसक द्राया हहॊसा हो जामगी औय अऩने स्वरूऩ भें हटककय नयो वा
                        े
कजयो वा की रीरा कयवाकय ऩाऩी तत्त्वों को जगत से हटवाते हैं तबी बी श्रीकृष्ण सदा अहहॊसक
 ॊ
हैं।
       सत्म का भतरफ है मथाथद औय वप्रम बाषण। अॊत्कयण औय इजन्िमों क द्राया जैसा
                                                                 े
ननद्ळम ककमा हो वैसा ही वप्रम शब्दों भें कहने का नाभ है सत्म बाषण। सत्म भधय औय
हहतकायी होता है । भाॉ भधय वचन फोरती है , उसभें फारक हहत है रेककन डाककनी भधय वचन
फोरती है रेककन उसका वचन आदभी क तेज-ओज-वीमद का सत्मानाश कयने वारा होता है ।
                              े
       'सेल्सभैन' भधय वचन फोरता है तो उसभें अऩना सौदा कयने का स्वाथद बया होता है । भाॉ
भधय वचन फोरती है तो उसक वचन भें अऩने सॊतान-ऩत्र-ऩत्री-कटम्फी का हहत छऩा हआ है ।
                       े
अत् भधय वचन सत्म होना चाहहए औय साथ ही साथ हहतकय होना चाहहए। अहहॊसा वह है
जजसभें भन, कभद, वचन से ककसी क तन-भन-जीवन को स्वाथद क मरए सताने का प्रमास न
                             े                      े
ककमा जाम।
       क्रोध का न होना अक्रोध है । श्रीयाभचन्िजी क चचत्त भें ऩूयी शाजन्त थी। उनक ननकटवती
                                                  े                             े
रोगों को चचन्ता हई कक याभजी इतने शान्त यहें गे तो यावण भये गा कसे? उन्होंने याभ जी से
                                                               ै
ववनती की कक् "प्रब ! आऩ क्रोध कीजजए।" कपय याभजी ने क्रोध का आवाहन ककमा् 'हे क्रोध !
अहॊ त्वॊ आवाहमामभ। भैं तम्हाया आवाहन कयता हूॉ।' श्रीयाभजी ने उऩमोग कयने क मरए क्रोध को
                                                                         े
फरामा।
       ऩरयवाय भें अनशासन कयने क मरए, व्मवहाय-जीवन भें पपकायने क मरए कबी क्रोध
                               े                               े
कयना ऩडे मह एक फात है रेककन हभ रोग प्राम् क्रोध का उऩमोग नहीॊ कयते अवऩत क्रोध से
आक्रान्त हो जाते है , क्रोध हभाये ऊऩय सवाय हो जाता है । क्रोध आग जैसा खतयनाक है । घय भें
चोयी हो जाम तो कछ न कछ साभान फचा यहता है , फाढ़ का ऩानी आ जाम कपय बी साभान
फचा यहता है , फाढ़ का ऩानी आ जाम कपय बी साभान फचा यहता है रेककन घय भें आग रग
जाम तो सफ कछ स्वाहा हो जाता है , कछ बी फचता नहीॊ। उसी प्रकाय अऩने अन्त्कयण भें महद
रोब, भोहरूऩी चोय प्रववद्श हो जाम तो कछ ऩण्म ऺीण हो जाम, कपय बी चचत्त भें शाॊनत औय
प्रसन्नता का कछ अॊश फचता है रेककन अन्त्कयण भें क्रोधरूऩी आग रग जाम तो सायी शाॊनत
बॊग हो जाती है , जऩ-तऩ-दान आहद ऩण्म-प्रबाव ऺीण होने रगता है । इसीमरए बगवान कहते हैं -
जीवन भें अक्रोध राना चाहहए। स्वबाव भें से क्रोध को ववदा कयना चाहहए।
       प्रद्ल होगा कक दवादसा आहद इतना क्रोध कयते थे कपय बी भहान ् ऋवष थे। मह कसे?
                                                                              ै
       दवादसा ऻानी थे। क्रोध कयते हए हदखते थे, श्राऩ दे ते हए हदखते थे। कपय बी वे अऩने
स्वरूऩ भें प्रनतवद्षत थे। ऻानी को सॊसायी तयाजू भें नहीॊ तोरा जाता। साभान्म आदभी क्रोध कये
तो उसका तऩ ऺीण हो जाता है । उसका वचन मसद्ध नहीॊ होता।
       दवादसा कहीॊ अऩनी भस्ती भें फैठे थे। आधा भीर दय से कोई ब्राह्मण गज़य यहा था।
                                                    ू
दवादसा ने चचल्रा कय उसे अऩने ऩास फरामा्
       "एइ.... इधय आ, ब्राह्मण क फच्चे....!"
                                े
       वह ऩास आकय हाथ जोडते हए फोरा्
       "जी भहायाज !"
       "कहाॉ गमा था तू?"
       "भैं तऩ कयने गमा था। फेटा नहीॊ हो यहा था। भाता जी की प्रसन्नता क मरए भैंने तीन
                                                                       े
सार तक तऩ ककमा। भाॉ प्रकट हई, भझे ऩत्र-प्रानद्ऱ का वयदान हदमा।"
       "हाॉ, ऩत्र-प्रानद्ऱ का वयदान हदमा....! तझे ऩता नहीॊ, दवादसा महाॉ फैठे हैं? प्रणाभ ककमे बफना
तू उधय से ही चरा जाता है ? जा, वयदान कन्सर है । तझे ऩत्र नहीॊ होगा। क्मा सभझता है ..."
                                      े
       दय से गजयते हए आदभी को इस प्रकाय श्राऩ दे दे ना...! इतना क्रोध होने ऩय बी दवादसा
        ू
का वचन पमरत होता था, क्मोंकक दवादसा ब्रह्मवेत्ता थे। दवादसा क्रोध कयते हए हदखते थे। उस
ब्राह्मण क वास्तववक कल्माण क मरए मह होना जरूयी था इसमरए दवादसा क द्राया क्रोध हो गमा।
          े                 े                                   े
       दवादसा श्रीकृष्ण क वहाॉ अनतचथ होकय यहे , चचत्र-ववचचत्र चेद्शाएॉ कयक उनको उहद्रनन कयने
                         े                                                े
का, क्रोचधत कयने का प्रमास ककमा रेककन श्रीकृष्ण अऩनी सत्तासभान भें जस्थत यहे । श्रीकृष्ण की
सभता का जगत को दशदन कयाने क मरए दवादसा ने रीरा की थी। उन्हें जजस खण्ड भें ठहयामा
                           े
गमा था उस खण्ड भें जो फहढ़मा चीज वस्तएॉ थी, सय-सभान था, सन्दय बफछौने, गद्दी-तककमे,
चन्दनकाद्ष की फनी हई चीजें आहद सफ खण्ड क फीच इकट्ठा कयक आग रगा दी। अऩने फार
                                        े              े
खोरकय वहाॉ 'होरी... होरी....' कयक नाचने रगे कपय बी श्री कृष्ण को क्रोध नहीॊ आमा।
                                 े
       दवादसा ने खाने क मरए फहत सायी खीय फनाई। कछ खीय खाई। फाकी फची हई जठी खीय
                       े                                                ू
श्रीकृष्ण को दे ते हए आऻा की् 'मह खीय अऩने शयीय ऩय चऩड दो।' श्रीकृष्ण ने गरुदे व की फची
हई खीय उठा कय अऩने भख सहहत सवद अॊगों ऩय चऩड दी। दवादसा ने दे खा कक श्रीकृष्ण क चचत्त
                                                                              े
भें कोई मशकामत नहीॊ है ।
                           भस्कयाकय गभ का जहय         जजनको ऩीना आ गमा।
                           मह हकीकत है कक जहाॉ भें उनको जीना आ गमा।।
       श्रीकृष्ण की प्रसन्नता औय भस्ती ज्मों-की-त्मों फनी यही। क्मा अदबत है सभता ! ककससे
व्मवहाय कयना, कहाॉ कयना, कफ कयना, कसा कयना, ककतना कयना मह श्रीकृष्ण जानते हैं। वे
                                   ै
ऻान की भूनतद हैं। दवादसा उनको क्रोचधत कयने क मरए, उहद्रनन कयने क मरए चेद्शा कयते हैं
                                            े                   े
रेककन श्रीकृष्ण क चचत्त भें कोई मशकामत नहीॊ है । एक फाय दवादसा ऋवष क आगे मसय झका
                 े                                                  े
हदमा, अनतचथ दे व की आवबगत कय दी कपय उनक मरए मशकामत कसी?
                                       े            ै
                            जो भॊजजर चरते हैं वे मशकवा नहीॊ ककमा कयते।
                        जो मशकवा ककमा कयते हैं वे भॊजजर नहीॊ ऩहॉ चा कयते।।
       रूजक्भणी गरु-मशष्म की रीरा दे ख यही है , भस्कया यही है कक गरु तो ऩक्क हैं रेककन
                                                                            े
चेरे बी कच्चे नहीॊ हैं, चेरे बी गरु ही हैं। उनका चचत्त प्रसन्न हो यहा है कक भेये कृष्ण का चचत्त
ककतनी सभता भें जस्थत है !
       दवादसा की नजय रुजक्भणी क हास्म ऩय गई तो गयज उठे ्
                               े
       "अये ! तू हॉ स यही है ? इधय आ।"
       रुजक्भणी जी क फार ऩकडकय उनक भख ऩय दवादसा ने अऩने हाथ से जठी खीय चऩड
                    े             े                             ू
दी। कपय नतयछी आॉख से श्रीकृष्ण की ओय ननहायते हैं। श्रीकृष्ण स्वरूऩ भें शान्त औय सभ हैं।
दवादसा ने दे खा कक मह फाण बी पर हो गमा। अफ नमा ननशाना ताका्
                              े
       "ऐ कृष्ण ! भझे यथ ऩय फैठकय नगयमात्रा कयनी है । घोडों क फदरे तभ दोनों यथ
                                                             े
खीॊचोगे।"
       "जो आऻा।"
       श्रीकृष्ण औय रुजक्भणी दोनों यथ भें जत गमे औय दवादसा यथारूढ़ हए। नगय क याजभागद
                                                                            े
से यथ गजय यहा है । दवादसा दोनों ऩय कोडे पटकायते जा यहे हैं। कोभर अॊगना रुजक्भणी जी की
क्मा हारत हई होगी ! फाजाय क रोग आद्ळमद भें डूफे जा यहे हैं कक द्रायकाधीश श्रीकृष्ण कौन से
                           े
फाफा क चक्कय भें आ गमे हैं !
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श्रीकृष्ण कहते हैं कक चौयासी क चक्कय से ननकरना हो, भन क चक्कय से ननकरना हो
                                     े                        े
तो दवादसा ऋवष क चयणों भें औय उनक चक्कयों भें जरूय आना चाहहए।
               े                े
       कोई स्त्री क चक्कय भें है , कोई फच्चों क चक्कय भें है , कोई धन क चक्कय भें है , कोई
                   े                           े                       े
सत्ता क चक्कय भें है , कोई भन क चक्कय भें है । इन साये चक्कयों से ननकरने क मरए कन्है मा
       े                       े                                          े
गरु क चक्कय भें है ।
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       बगवद् गीता का इतना भाहात्म्म क्मों है ? क्मोंकक उसभें श्रीकृष्ण जो कहते हैं वह उनके
जीवन भें है । अक्रोध भाना अक्रोध। क्रोध कहाॉ कयना चाहहए मह वे बरी प्रकाय जानते हैं। कस
                                                                                     ॊ
को आमरॊगन कयते-कयते मभसदन ऩहॉ चा हदमा। कपय उसकी उत्तयकक्रमा कयाने भें श्रीकृष्ण क चचत्त
                                                                                 े
भें द्रे ष नहीॊ है । यावण, कबकणद औय इन्िजीत की उत्तयकक्रमा कयाने भें श्रीयाभजी को कोई द्रे ष
                            ॊ
नहीॊ था क्मोंकक सभता उनका सहज मसद्ध स्वबाव है ।
                                          सभत्वॊ मोग उच्मते।
       हजाय वषद तक शीषादसन कयो, वषों तक ऩैदर तीथदमात्रा कयो, बखे यहो, खडेद्वयी औय
                                                              ू
तऩेद्वयी होकय तऩद्ळमाद कयो कपय बी एक ऺण की चचत्त की सभता क तऩ क आगे वह तम्हाया
                                                          े    े
तऩ छोटा हो जामगा। अत् चचत्त को सभता भें जस्थय कयो।
       काभ आता है तो ऩीडडत कय दे ता है , क्रोध आता है तो जराने रगता है , रोब आता है
तो गगरा कय दे ता है । इन ववकायों से आक्रान्त भत हो जाओ। काभ का उऩमोग कयो, क्रोध का
उऩमोग कयो, रोब का उऩमोग कयो।
       तभ कभये भें फैठे हो। अऩनी भौज से बीतय से दयवाजा फन्द कयक फैठो मह तम्हाया
                                                               े
स्वातन््म है । आधा घण्टा फैठो, चाहे दो घण्टा फैठो, चाहे चाय घण्टा फैठो, कोई फन्धन नहीॊ है ।
अगय दसया कोई फाहय से कडा रगाकय तभको कभये भें फन्द कय दे तो मह तम्हायी ऩयाधीनता
     ू                ॊ
है , चाहे वह दस मभनट क मरए ही क्मों न हो।
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       साधनों का उऩमोग कयना मह स्वाधीनता है । साधनों से अमबबूत हो जाना, साधनों के
गराभ हो जाना मह ऩयाधीनता है । क्रोध आ गमा तो अशाॊत हो गमे, रोब आ गमा तो हभ
रोबी हो गमे, काभ आ गमा तो हभ काभी हो गमे,            भोह आमा तो हभ भोही हो गमे। ववकाय
हभाया उऩमोग कय रेता है । काभ, क्रोध, रोब, भोह आहद का स्वतन्त्र ढॊ ग से उऩमोग कयना
चाहहए। जैसे गराफ का पर है । उसको सॉूघा, अच्छा रगा। ठीक है , उसकी सगन्ध का उऩमोग
                     ू
ककमा। अगय पर की सगन्ध भें आसडक्त हई तो हभ फॉध गमे।
           ू
       अऩने चचत्त भें ककसी बी ववकाय का आकषदण नहीॊ होना चाहहए। ववकायों का उऩमोग कयके
स्वमॊ को औय दसयों को ननववदकाय नायामण भें ऩहॉ चाने का प्रमत्न कयना चाहहए, न कक ववकायों भें
             ू
पस भयना चाहहए। कआ फनामा है तो शीतर ऩानी क मरए, न कक उसभें डूफ भयने क मरए।
 ॉ              ॉू                       े                          े
श्रीकृष्ण क चचत्त भें दवादसा की अॉगडाइमों क कायण ऺोब नहीॊ हआ। दवादसा ने दे खा कक
                   े                               े
भैंने इतने-इतने अशान्त कयने क फाण पक रेककन श्रीकृष्ण की शाॊनत अनूठी है । आणखय दवादसा
                             े     ें े
से यहा नहीॊ गमा। वे फोर उठे ्
        "कृ ष्ण ! अफ फताओ, तभ क्मा चाहते हो?"
        "गरुदे व ! आऩ सदा भझ ऩय प्रसन्न यहें । भेये मरए दननमा चाहे कछ बी फोरे, कछ बी
कय रे रेककन भेये गरुदे व भेये से न रूठें , फस भैं इतना ही चाहता हूॉ।"
      श्रीकृष्ण गरु की जगह ऩय ऩये गरु हैं। कृष्णॊ वन्दे जगदगरुभ ् औय मशष्म की जगह ऩय
                                   ू
ऩये मशष्म हैं।
 ू
       दवादसा ने छरकते हए आशीवादद हदमा् "कन्है मा ! भैं तो तेये ऩय प्रसन्न हूॉ ही रेककन जो
तेया नाभ रेगा वह बी प्रसन्न हो जामेगा। दे ख बैमा ! तने एक गल्ती की। भैंने तझे साये शयीय
                                                    ू
ऩय खीय चऩडने को कहा था। जहाॉ-जहाॉ वह खीय रगी वे सफ तेये अॊग वज्र जैसे अबेद्य फन गमे
रेककन ऩैयों क तरों को तने खीय नहीॊ रगामी। वह बाग कच्चा यह गमा। अऩने ऩैयों क तरवों
             े         ू                                                   े
को फचाना, फाकी सफ जगह तभ वज्रकाम फन गमे हो।"
        हभ जानते हैं कक आणखय भें उन्हीॊ     ऩैय क तरवे भें व्माध का फाण रगा औय उसी
                                                 े
ननमभत्त से वे भहाननवादण को प्राद्ऱ हए।
        श्रीकृष्ण ने बगवदगीता भें अक्रोध कह हदमा तो वे स्वमॊ बी अक्रोध होने भें उत्तीणद हए
हैं। हभाये जीवन भें बी जफ क्रोध आमा तफ हभ सावधान हों। सोचें कक भेयी जगह ऩय श्रीकृष्ण
होते तो क्मा कयते? श्रीयाभ होते तो क्मा कयते? फद्ध होते तो क्मा कयते? कफीयजी होते तो क्मा
कयते? क्रोध कयने की जगह तो उस सभम क्रोध कयो रेककन रृदम भें क्रोध उत्ऩन्न न हो, फाहय
से क्रोध कयने का नाटक हो। अगय क्रोध आता हो तो दे खो कक क्रोध आ यहा है । उस सभम शाॊत
हो जाओ, स्वस्थ हो जाओ। फाद भे ककसी को सभझाना हो तो सभझाओ, क्रोध का नाटक कय
रो, पपकाय भाय दो। अऩने ऩय क्रोध को हावी भत होने दो। हभ क्मा कयते हैं? क्रोध को दफाने
की कोमशश कयते हैं रेककन क्रोध दफता नहीॊ औय हभ बीतय से उरझते यहते हैं , सरगते यहते हैं,
जरते यहते हैं।
        जीवन भें त्माग कसा होना चाहहए? जो फीत गमा है उसको माद कय-कयक अऩने चचत्त
                        ै                                           े
को खयाफ न कयो। उसे बूर जाओ। बोग-साभग्री का अनत सॊग्रह कयक अऩने चचत्त को फोणझर न
                                                         े
फनाओ।
                                         त्मागात ् शाॊनतयनन्तयभ ्।
                                  'त्माग से तत्कार शाॊनत मभरती है ।'
                                                                                       (गीता)
जीवन भें बीतय से जजतना त्माग होगा उतनी ही शाॊनत यहे गी। कपय चाहे तम्हाये ऩास
सोने की द्रारयका हो औय वह डूफ यही हो कपय बी चचत्त भें शोक न होगा। श्रीकृष्ण की द्रारयका
सभि भें डूफी कपय बी उनक चचत्त भें कोई आसडक्त नहीॊ थी। उनका चचत्त त्माग से ऩूणद था।
                       े
       गाॊधायी ने श्रीकृष्ण को शाऩ हदमा कक 36 सार क फाद तम्हाये दे खते-दे खते तम्हाया मादव
                                                   े
वॊश नद्श-भ्रद्श हो जामगा औय श्रीकृष्ण क दे खते-दे खते ही मदवॊश का नाश हआ। कपय बी श्रीकृष्ण
                                       े
उहद्रनन नहीॊ हए।
       जीवन भें त्माग होना चाहहए, शाॊनत होना चाहहए। शाॊनत त्माग का अनगभन कयती हई
अऩने आऩ आ जाती है ।
       अऩैशनभ ् का अथद है चाडी-चगरी न कयना। कबी ककसी की ननन्दा, चाडी-चगरी,
आरोचना नहीॊ कयना चाहहए। कोई आदभी ककसी की ननन्दा कयता है तो सनने वारा उसभें
अऩना अथद जोड रेता है , कछ ज्मादा भसारा बय दे ता है । वह जफ तीसये आदभी क आगे
                                                                       े
फोरेगा तो वह बी अऩने भन का यॊ ग उसभें मभरा दे ता है । वह जफ चौथे क आगे फात कये गा तो
                                                                  े
औय कचया जड जामगा। भूर भें फात कोई छोटी-भोटी होती है रेककन फात कयने वारों क अऩने-
                                                                          े
अऩने ढॊ ग क ववकृत स्वबाव होने से वह फात न जाने कसा रूऩ रे रेती है । जया सी फात ने
           े                                    ै
भहाबायत का मद्ध कयवा हदमा।
       अस्त्र-शस्त्र का घाव तो सभम ऩाकय बय जाता है भगय बफना हड्डी की रूरी (जजह्वा) का
घाव नहीॊ मभटता, भयने ऩय बी नहीॊ मभटता। इसमरए वाणी फोरते सभम खफ सावधान यहो।
                                                             ू
                                वाणी ऐसी फोमरमे भनवा शीतर होम।
                              औयन को शीतर कये आऩहॉ शीतर होम।।
       शाह हाकपज ने कहा् "हे इन्सान ! तू हजाय भॊहदय तोड दे , हजाय भजस्जद तोड दे रेककन
ककसी का जजन्दा हदर भत तोडना, क्मोंकक उस हदर भें हदरफय खद यहता है ।"
       कफीय जी ने कहा्
                             कफीया ननन्दक ना मभरो ऩाऩी मभरो हजाय।
                           एक ननन्दक क भाथे ऩय राख ऩाऩीन को बाय।।
                                      े
       हे इन्सान ! ईद्वय क भागद ऩय जाने वारे साधक की श्रद्धा भत तोड।
                          े
       वववेकानन्द कहते थे् 'तभ ककसी का भकान छीन रो मह ऩाऩ तो है रेककन इतना नहीॊ।
वह घोय ऩाऩ नहीॊ है । ककसी क रूऩमे छीन रेना ऩाऩ है रेककन ककसी की श्रद्धा की डोय तोड दे ना
                           े
मह सफसे घोय फडा ऩाऩ है क्मोंकक उसी श्रद्धा से वह शाॊनत ऩाता था, उसी श्रद्धा क सहाये वह
                                                                             े
बगवान क तयप जाता था।
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       तभने ककसी का भकान छीन मरमा तो ककयामे क भकान से वह जीवन गजाय रेगा
                                             े
रेककन तभने उसकी श्रद्धा तोड दी, श्रद्धा का दरुऩमोग कय हदमा, ईद्वय से, शास्त्र से, गरु से,
बगवान क भागद से, साधन-बजन से उसको बटका हदमा तो वह अऩने भकान भें होते हए बी
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स्भशान भें है । रूऩमों क फीच होते हए बी वह फेचाया कगार है । उसक हदर की शाॊनत चरी गई
                        े                          ॊ           े
जीवन से श्रद्धा गई, शाॊनत गई, साधन-बजन गमा तो बीतय का खजाना बी गमा। फाहय के
खजाने भें आदभी ककतना बी रोट-ऩोट होता हो रेककन जजसक ऩास बडक्त, साधन, बजन, श्रद्धा
                                                  े
का खजाना नहीॊ है वह सचभच भें कगार है ।
                              ॊ
        श्रीकृष्ण कहते हैं-
                                श्रद्धावाॉल्रबते ऻानॊ तत्ऩय् सॊमतेजन्िम्।
                              ऻानॊ रब्धवा ऩयाॊ शाजन्तभचचये णाचधगच्छनत।।
        'जजतेजन्िम, साधनऩयामण औय श्रद्धावान भनष्म ऻान को प्राद्ऱ होता है तथा ऻान को प्राद्ऱ
होकय वह बफना ववरम्फ क तत्कार ही बगवत्प्रानद्ऱरूऩ ऩयभ शाजन्त को प्राद्ऱ हो जाता है ।'
                     े
                                                                               (गीता् 4.39)
        भनष्म श्रद्धार हो, तत्ऩय हो औय थोडा सॊमभ कये तो जल्दी से फेडा ऩाय हो जाम।
        जजसस ककसी गाॉव से गज़य यहे थे। रोगों ने दे खा कक सॊत आ यहे हैं। सज्जन रोगों ने
सत्काय ककमा, ननन्दकों ने ननन्दा की। ऩहरे से ही जजसस की अपवाह परी हई थी कक
                                                              ै
'भेकडरीन जैसी सन्दय वैश्मा जजसस क ऩास आती है , इत्र से जजसस क ऩैय धराती है , अऩने
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रम्फे-रम्फे ये शभ जैसे फारों से जजसस क ऩैय ऩोंछती है ।' आहद आहद। कप्रचाय कयने वारों ने
                                      े
जोयो का कप्रचाय ककमा था। इसीमरए जजसस को दे य-सफेय क्रॉस ऩय चढ़ना ऩडा था। हाॉ, जजसस
तो क्रॉस ऩय नहीॊ चढ़े थे, जजसस का शयीय जरूय क्रॉस ऩय चढ़ा होगा। जजन्होंने कप्रचाय ककमा था
वे रोग न जाने ककन नयकों भें सडते होंगे, जरते होंगे जफकक जजसस को अबी बी राखों जानते
हैं, भानते हैं।
        जजसस गाॉव भें आमे तो सज्जन रोग, ऩववत्र फवद्धवारे रोग कप्रचाय सनने क फावजद बी
                                                                           े    ू
जजसस का दशदन कयने ऩहॉ च। जजनकी भमरन भनत थी वे जजसस का नाभ सनकय आगफफरा
                       े                                           ू
हए।
        सज्जन रोगों ने ऩूछा् "हे परयश्ते ! इस इराक भें अकार ऩड यहा है । खेतों भें ऩानी नहीॊ
                                                  े
फयस यहा है । क्मा कायण है?"
        जजसस ने ऺणबय शाॊत होकय कहा् "इस गाॉव भें कई ननन्दक, चगरखोय रोग यहते हैं।
उनक ऩाऩों क कायण ऐसा हो यहा है ।"
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        "ऐसे कौन रोग हैं? आऩ उनक नाभ फताइमे, हभ उनको ठीक कय दें गे मा गाॉव से
                                े
ननकार दें गे।" सज्जन रोगों ने जजसस से ववनती की।
        जजसस ने कहा् "उन रोगों का नाभ फताने से भझे बी चगरखोय होना ऩडेगा। भैं नहीॊ
फताऊगा।" जजसस वहाॉ से आगे फढ़ गमे।
    ॉ
        हभाये चचत्त भें बी दमा होनी चाहहए। ऻानीजनों का तो दमार होना स्वत् स्वबाव फन
जाता है । जैसे दीवाय गई तो दीवाय ऩय अॊककत चचत्र बी गमा, जैसे फीज जर गमा तो फीज भें
छऩा हआ वऺ बी जर गमा, ऐसे ही जजसकी दे ह-वासना गई है , जजसका दे हाभ्मास गमा है ,
        ृ
ऩरयजच्छन्न अहॊ गमा है उनका अऩने कभों का कत्तादऩन बी चरा जाता है । सरयता मह नहीॊ
सोचती कक गाम ऩानी ऩी यही है उसको अभत जैसा जर औय शेय ऩानी ऩीने आवे उसको ववष
                                   ृ
जैसा ऩानी फना दॉ । नहीॊ.... वह तो सबी क मरए कर कर छर छर फहती है , सफको अऩने
                 ू                     े
शीतर जर से तद्ऱ कयती है । कपय कोई उसभें डूफ जाम तो उसकी भजी की फात है , सरयता
            ृ
ककसी को कद्श नहीॊ दे ती। ऐसे ही जजनक रृदम भें दमा बयी हई है , प्राणीभात्र का जो कल्माण
                                    े
चाहते हैं ऐसे सॊतों की तयह जजसका हदर है वह वास्तव भें दमारहदर कहा जाता है । जैसे फच्चे
का द्ख दे खकय भाॉ का हदर िववत हो जाता है ऐसे ही प्राणीभात्र का द्ख दे खकय दमार ऩरुषों
का हदर िववत हो जाता है , उसका द्ख मभटाने क मरए वे प्रमत्न कयते हैं। ऐसी दमा से चचत्त की
                                          े
शवद्ध होती है ।
        तभने अगय प्मासे को ऩानी वऩरामा, बखे को बोजन हदमा तो उसकी बख-प्मास मभटी
                                         ू                        ू
औय तम्हाये अॊत्कयण का ननभादण हआ। द्खी जन को तो ऐहहक द्ख मभटा रेककन तम्हाया
अॊत्कयण ऩववत्र हआ, जन्भ-जन्भ क द्ख मभटने का साधन फन गमा।
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        सज्जन क साथ सज्जनता का व्मवहाय तो सफ कय सकते हैं रेककन दजदन की गहयाई भें
               े
अऩने वप्रमतभ ऩयभ सज्जन को दे खने की जो आॉख है , अऩने आत्भा की भधयता, अऩने आत्भा
की शाद्वतता, अऩने ऩयभेद्वय की अभयता दे खने की जो आॉख है वह खर जाम तो दजदन क प्रनत
                                                                           े
बी रृदम भें करुणा होगी। कपय उसकी मोनमता क अनसाय उसक साथ व्मवहाय होगा।
                                         े         े
        दजदन को सज्जनता क भागद ऩय राना मह बी दमा है । दजदन को उसक कल्माण क मरए
                         े                                       े        े
थोडा सफक मसखाना मह बी उसक प्रनत दमा है । रेककन दजदन क प्रनत क्रय होकय उसका ववनाश
                         े                           े        ू
कयना मह क्रयता है । कपय बी, उसकी भत्म भें बी उसका कल्माण हो ऐसा ववचाय कयक श्रीकृष्ण
          ू                       ृ                                      े
औय श्रीयाभचन्ि जी दजदनों को भत्म दण्ड दे हदमा इसभें बी उनकी दमा है । क्मोंकक उन दजदनों
                             ृ
की दजदनता बफना ऑऩये शन क दय नहीॊ हो सकती थी।
                        े ू
        डॉक्टय भयीज का हहत चाहते हए फाहय से क्रय हदखने वारी शस्त्रकक्रमा कयता है तो बी
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उसक चचत्त भें क्रयता नहीॊ होती। ऐसे ही जो दमार ऩरुष हैं, भाता-वऩता, गरुजन औय बगवान
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आहद क चचत्त भें कबी, ककसी क मरए बी क्रयता नहीॊ होती।
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        एक भाॉ का फेटा डाक हो गमा था। डकती भें नाभचीन हो गमा, ऩकडा गमा औय कई क्रय
                          ू             ै                                      ू
अऩयाधों क कायण पाॉसी की सजा मभरी। पाॉसी से ऩहरे ऩूछा गमा कक तेयी आणखयी इच्छा क्मा
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है? वह फोरा कक भझे भेयी भाॉ से मभरना है । भाॉ को नजदीक रामा गमा तो उस रडक ने खफ
                                                                         े    ू
नज़दीक रऩककय अऩने दाॉतों से भाॉ का नाक काटकय अरग कय हदमा।
        न्मामाधीश ने ऩूछा् "तझे भाॉ क प्रनत इतना द्रे ष औय क्रोध क्मों?"
                                     े
        वह फोरा् "इस भेयी भाॉ ने ही भझे इतना फडा डाक फनने भें सहमोग हदमा है । भैं फचऩन
                                                    ू
भें जफ छोटी-छोटी चोरयमाॉ कयक घय भें आता था, ककसी को ऩेजन्सर चयाकय, ककसी की यफड
                            े
चयाकय भाॉ क ऩास जाता था तफ भेयी उन गरनतमों क प्रनत भाॉ राऩयवाह यही। भेयी गरनतमों
           े                                े
को ऩोषण मभरता यहा। ऐसा कयते कयते भैं फडा डाक हो गमा औय आज इस पाॉसी का पदा भेये
                                            ू                          ॊ
गरे भें आ ऩडा है । भेये जीवन क सत्मानाश क कायणों भें भाॉ का ननमभत्त फडा है ।"
                              े          े
      खेत भें खेती क ऩौधों क अरावा कई प्रकाय का दसया घास-पस बी उग ननकरता है ।
                    े       े                    ू        ू
उसक प्रनत ककसान अगय राऩयवाह यहे तो खेत भें काभ क ऩौधों क फदरे दसयी ही बीड-बाड हो
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जाती है , खेती ननकम्भी हो जाती है । फगीचा जॊगर फन जाता है । ऐसे ही जीवन भें थोडी-थोडी
राऩयवाही आगे चरकय फडी हाननकायक मसद्ध होती है ।
      एक मशष्म था। गरुसेवा कयता था रेककन राऩयवाह था। गरु उसको सभझाते थे कक्
"फेटा ! राऩयवाही भत कय। थोडी सी बी राऩयवाही आगे चरकय द्ख दे गी।" मशष्म कहता्
"इसभें क्मा है ? थोडा-सा दध ढर गमा तो क्मा हआ? औय सेयबय रे आता हूॉ।"
                          ू
       महाॉ जया से दध की फात नहीॊ है , आदत बफगडती है । दध का नकसान ज्मादा नहीॊ है,
                                                        ू
जीवन भें राऩयवाही फडा नकसान कय दे गी। मह फात मशष्म क गरे नहीॊ उतयती थी। गरु ने
                                                    े
सोचा कक इसको कोई सफक मसखाना ऩडेगा।
      गरुजी ने कहा् "चरो फेटा ! तीथदमात्रा को जाएॉगे।"
      दोनों तीथदमात्रा कयने ननकर ऩडे। गॊगा ककनाये ऩहॉ च, शीतर नीय भें गोता भाया। तन-भन
                                                       े
शीतर औय प्रसन्न हए। साजत्त्वक जर था, एकाॊत वातावयण था। गरु ने कहा्
      "गॊगा फह यही है । शीतर जर भें स्नान कयने का ककतना भजा आता है ! चरो, गहये
ऩानी भें जाकय थोडा तैय रेते हैं। तू ककयामे ऩय भशक रे आ। भशक क सहाये दय-दय तैयेंगे।"
                                                             े       ू ू
      भशकवारे क ऩास दो ही भशक फची थी। एक अच्छी थी, दसयी भें छोटा-सा सयाख हो
               े                                    ू
गमा था। मशष्म ने सोचा् इससे क्मा हआ? चरेगा। छोटे -से सयाख से क्मा बफगडने वारा है ।
अच्छी भशक गरुजी को दी, सयाखवारी भशक खद री। दोनों तैयते-तैयते भझधाय भें गमे। धीये -
धीये सयाखवारी भशक से हवा ननकर गई। मशष्म गोते खाने रगा। गरुजी को ऩकाया्
      "गरुजी ! भैं तो डूफ यहा हूॉ....।"
      गरुजी फोरे् "कोई फात नहीॊ। जया-सा सयाख है इससे क्मा हआ?
      "गरुजी, मह जया सा सयाख तो प्राण रे रेगा। अफ फचाओ.... फचाओ.....!"
     गरुजी ने अऩनी भशक दे दी औय फोरे् "भैं तो तैयना जानता हूॉ। तेये को सफक मसखाने
क मरए आमा हूॉ कक जीवन भें थोडा-सा बी दोष होगा वह धीये -धीये फडा हो जामगा औय जीवन
 े
नैमा को डफाने रगेगा। थोडी-सी गरती को ऩवद्श मभरती यहे गी, थोडी सी राऩयवाही को ऩोषण
मभरता यहे गा तो सभम ऩाकय फेडा गक होगा।"
                                द
      "एक फीडी पक री तो क्मा हआ?..... इतना जया-सा दे ख मरमा तो क्मा हआ? .... इतना
                ॉू
थोडा सा खा मरमा तो क्मा हआ?...."
अये ! थोडा-थोडा कयते-कयते कपय ज्मादा हो जाता है , ऩता बी नहीॊ चरता। जफ तक
साऺात्काय नहीॊ हआ है तफ तक भन धोखा दे गा। साऺात्काय हो गमा तो तभ ऩयभात्भा भें
हटकोगे। धोखे क फीच होते हए बी बीतय से तभ सयक्षऺत होगे।
              े
                                        उठत फैठत वही उटाने।
                                    कहत कफीय हभ उसी हठकाने।।
       प्राणामाभ कयने से कभेजन्िमाॉ मशचथर हो जाती हैं। द्वासोच््वास को ननहायते हए
अजऩाजाऩ कयने से भन की चॉ चरता कभ हो जाती है । भन की चॉ चरता कभ होते ही अऩनी
गरनतमाॉ ननकारने का फर फढ़ जाता है ।
                               भन् एव भनष्माणाॊ कायणॊ फन्धभोऺमो्।
                       भनष्मों का भन ही अऩने फन्धन औय भडक्त का कायण है ।
       अगय ककसी का उत्कषद दे खकय चचत्त भें ईष्माद होती है तो सभझो अऩना चचत्त भमरन है ।
'उसका मश का प्रायब्ध है तो उसको मश मभरेगा। उसक मश भें बी भेया ही ऩयभात्भा है .... ऐसा
                                              े
सोचकय उसक मश का आनन्द रो। ककसी को ऊचे आसन ऩय फैठा दे खकय उससे ईष्माद कयने क
         े                         ॉ                                       े
फजामे तभ बी ऊचे कभद कयो तो तभ बी ऊचे आसन ऩय ऩहॉ च जाओगे।' अबी जी ऊचे आसन
             ॉ                    ॉ                               ॉ
ऩय फैठे हैं उनभें ऩयभेद्वय की कृऩा से ऊचाई है । वाह प्रब ! तेयी रीरा अऩॊयऩाय है ....' ऐसा
                                       ॉ
सोचकय तभ ऊचे चरे आओ।
          ॉ
       ऊचे आसन ऩय फैठने से आदभी ऊचा नहीॊ हो जाता। नीचे आसन ऩय फैठने से आदभी
        ॉ                        ॉ
नीचा नहीॊ हो जाता। नीची सभझ है तो आदभी नीचा हो जाता है औय ऊची सभझ है तो आदभी
                                                           ॉ
ऊचा हो जाता है । ऊची सभझ उन्हीॊ की है जजनक स्वबाव भें अहहॊसा, सत्म, अक्रोध, त्माग,
 ॉ                ॉ                       े
शाॊनत आहद दै वी गणों का ववकास होता है ।
       ववषमों भें रोरऩता नहीॊ होनी चाहहए।
       यॊ गअवधत भहायाज नाये द्वयवारे फैठे थे। वरसाड से कोई व्मडक्त फहत फहढ़मा ककस्भ क
              ू                                                                      े
आभ अवधतजी क सभऺ रामा। आभ की बूयी बूयी प्रशॊसा कयने रगा औय काट कय अवधतजी
      ू    े                                                        ू
क साभने यखकय खाने क मरए ववनती की्
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       "गरुजी ! मे फहत फहढ़मा आभ हैं। आऩक मरए वरसाड से खास रामे हैं। खाइमे।"
                                         े
       अवधत जी ने कहा् "तभ सहज बाव से दे दे ते तो भैं खा रेता रेककन तभने इनकी
          ू
इतनी प्रशॊसा की कक मे आभ ऐसे हैं..... वैसे हैं..... कसयी हैं.... फहत भीठे हैं.... सगन्ध आती
                                                     े
है .... इतनी प्रशॊसा कयने ऩय बी अबी तक भेये भॉह भें ऩानी नहीॊ आमा। तभ ऐसा कछ कयो कक
भेये भॉह भें ऩानी आ जाम। भैं खाने क मरए रम्ऩटू हो जाऊ कपय खाऊगा, अफ नहीॊ खाता।
                                   े                 ॉ       ॉ
अऩनी श्रद्धा-बडक्त से आभ दो, तम्हायी प्रसन्नता क मरए भैं खा रॉ ूगा रेककन तभ आभ की
                                                े
प्रशॊसा कयो औय भेये भॉह भें ऩानी आ जाम तो भेयी अवधती भस्ती को चधक्काय है ।"
                                                  ू
भहादे व गोववन्द यानडे का नाभ आऩने सना होगा। उनकी ऩत्नी ने फहढ़मा आभ काटकय
उन्हें हदमा। यानडेजी की एक चीयी खामी कपय हाथ धो मरमे। फोरे्
         "वह नौकय है न याभा, उसको बी मह आभ दे ना, फच्चों को बी दे ना, ऩडोस की फच्ची को
बी दे ना।"
         "इतना फहढ़मा आभ है ....! आऩ ही क मरए काटा है । खट्टा है क्मा?" ऩत्नी ने ऩच्छा की।
                                         े                                        ृ
         यानडेजी फोरे् "नहीॊ, आभ खट्टा नहीॊ है , फहत फहढ़मा है , फहत भीठा है , स्वाहदद्श है ।"
         "फहत फहढ़मा है , भीठा है तो आऩ क्मों नहीॊ खाते?"
         "इसमरए नहीॊ खाता हूॉ कक फहढ़मा चीज फाॉटने क मरए होती है , बोगने क मरए नहीॊ
                                                    े                     े
होती।"
         ककसी चीज को फहढ़मा सभझकय बोगने रग गमे तो रोरऩता आ जामगी। फहढ़मा चीज
दसयों को फाॉटो ताकक फहढ़मा का आकषदण घट जाम, रोरऩत चरी जाम, अनासडक्तमोग मसद्ध हो
 ू
जाम, फहढ़मा से फहढ़मा जो आत्भा-ऩयभात्भा है उसभें जस्थनत हो जाम। श्रीकृष्ण कहते हैं-
अरोरप्त्वभ ्।
         हभ रोग क्मा कयते हैं? कोई चीज फहढ़मा होती है तो ठूॉस-ठूॉसकय खाते हैं, कपय अजीणद
हो जाता तो दयकाय नहीॊ। कोई बी चीज फहढ़मा मभरे तो उसे फाॉटना सीखो ताकक उसकी रोरऩता
चचत्त से हट जाम। रोरऩता फडा द्ख दे ती है ।
         दे ह का सौन्दमद फढ़ाने क मरए रोग क्मा-क्मा कयते हैं। सौन्दमद-प्रसाधनों का उऩमोग
                                 े
ककमा जाता है वे चीजें फनाने क मरए कई जीव-जन्त-प्राणणमों की हहॊसा होती है , हाननकायक
                             े
यसामनों का प्रमोग ककमा जाता है । ऩप-ऩावडय, रारी-मरऩजस्टक से सजामा हआ फाहय का दै हहक
सौन्दमद तो उधाय का सौन्दमद। उससे तो तम्हाया, ऩनत का, तभ ऩय जजनकी ननगाह ऩडती है
उनका ऩतन होता है रेककन जफ रृदम का सौन्दमद णखरता है तफ तम्हाया, तम्हाये सम्ऩक भें
                                                                            द
आने वारे का, ऩनत औय ऩडोमसमों का बी कल्माण होता है । भीया का सौन्दमद ऐसा ही था, शफयी
का सौन्दमद ऐसा ही था, गागी का सौन्दमद ऐसा ही था, भदारसा का सौन्दमद ऐसा ही था। हदर
तम्हाया हदरफय क यॉ ग जाम मह असरी सौन्दमद है । कृबत्रभ सौन्दमद-प्रसाधनों से सजामा हआ
               े
सौन्दमद कफ तक हटकगा? सच्चे बक्त क रृदम की ऩकाय होती है कक्
                 े               े
         "हे बगवान ! तू ऐसी कृऩा कय कक तेये भें भेया भन रग जाम।" बगवान कये कक बगवान
भें हभाया भन रग जाम। बगवान भें भन रगता है तो सचभच भें भन सन्दय होता है । बोगों भें
भन रगता है तो भन बद्दा हो जाता है । जफ चैतन्म स्वरूऩ ईद्वय क ध्मान भें , ईद्वय क चचन्तन
                                                            े                   े
भें , ईद्वय क ऻान भें हभाया भन रगता है तफ भन सन्दय होता है । ज्मों-ज्मों ववकायों भें , काभ
             े
भें , क्रोध भें , ईष्माद भें भन रगता है त्मों-त्मों हभाया तन औय भन असन्दय होता है ।
         ईसयदान नाभका एक कवव था। ऩत्नी चर फसी तो फडा द्खी हो यहा था। काका ने कहा
कक चरो, द्रारयका जाकय आमें। दे व-दशदन हो जामेंगे औय भन को बी भोड जर जामगा।
काका-बतीजा दोनों चरे। फीच भें जाभनगय आता था। वहाॉ का याजा जाभ कववता-शामयी
आहद का फडा शौकीन था। इन्होंने सोचा याजा कववता की कि कये गा, इनाभ मभरेगा तो मात्रा का
खचद बी ननकर आमगा औय अऩना नाभ बी हो जामगा।
          दोनों याजा जाभ क याजदयफाय भें गमे। अऩना कववत्व प्रस्तत ककमा। कववता-शामयी भें
                          े
याजा की प्रशजस्त अऩनी छटादाय शैरी भें सनामी। याजा झभ उठा। दयफायी रोग वाह वाह ऩकाय
                                                   ू
उठे । भॊत्री रोग बी चककत हए कक आज तक ऐसी कववता नहीॊ सनी।
          कववमों को ककतना इनाभ दे ना, कसी कि कयना इसका ननणदम कयने क मरए याजा ने
                                       ै                           े
एक उच्च कोहट क ववद्रान याजगरु ऩीताम्फयदास बट्ट को आदयऩवक अऩने दयफाय भें यखा था।
              े                                       ू द
ईसयदान की कववता सनकय याजा खश हए याजा ने कवव को ऩयस्काय दे ने क मरए ऩीताॊफय बट्ट
                                                              े
की ओय ननहाया।
          "जो उचचत रगे वह इनाभ इस कवव को दे हदमा जाम।"
          ऩीताॊफय बट्ट ने ननणदम सना हदमा कक इस कवव क मसय ऩय सात जते भाय हदमे जामॉ।
                                                    े            ू
सनकय सबा दॉ ग यह गई। ऩीताॊफय बट्ट का सबा भें प्रबाव था। उनकी आऻा का उल्रॊघन कसे
                                                                             ै
ककमा जाम? कवव क मसय ऩय सात जते भाय हदमे गमे। कवव क हदर भें चोट रग गई। 'इतनी
               े            ू                     े
फहढ़मा कववता सनाई औय ऩयस्काय भें सात जत? बयी सबा भें ऐसा अऩभान? औय बफना ककसी
                                      ू े
अऩयाध क? कछ बी हो, भैं इस ऩजण्डत को दे ख रॉ ूगा।' ईसयदान का खन उफर उठा।
       े                                                     ू
          कवव सबा छोडकय चरा गमा। भन ही भन ननधादरयत कय मरमा कक, 'इस ऩीताॊफय बट्ट को
आज ही मभसदन ऩहॉ चा दॉ गा। ऩत्नी भयने का द्ख इतना नहीॊ जजतना भेयी सयस्वती भाता क
                      ू                                                        े
अऩभान से द्ख हआ है । भेयी कववता का अऩभान हआ है ।
          कवव ने तरवाय तेज कय री। याबत्र भें ऩीताॊफय बट्ट का उनक घय भें मशच्छे द कयने क
                                                                े                      े
इयादे छऩकय कवव उनक घय ऩहॉ चा। ऩीताॊफय बट्ट हदन को कहीॊ औय जगह गमे थे। यात्री को दे य
                  े
से अऩने घय ऩहॉ च।
                े
          साये नगय भें बफजरी की तयह सबावारी फात ऩहॉ च गई थी। जगह-जगह चचाद हो यही थी
कक ऩीताॊफय बट्ट ने आज सबा भें एक मवान छटादाय कवव का घोय अऩभान कयवा हदमा। उसकी
कववता से ऩूयी सबा नाच उठी थी, याजा जाभ बी प्रसन्न हो गमे थे। रेककन ऩीताॊफय बट्ट के
प्रबाव भें आकय याजा ने कवव को बयी सबा भें सात जते रगवामे... फडा अन्माम हआ।
                                               ू
          ऩीताॊफय बट्ट की ऩत्नी सयस्वती ने मह सफ जाना। वह चचढ़ गई कक, 'सयस्वती की ऩूजा-
उऩासना कयने वारी कवव का ऐसा अऩभान भेये ऩनत ने ककमा !' वह रूठ गई। योष भें आकय घय
का दयवाजा बीतय से फन्द कयक, कडा रगाकय झरे ऩय फैठ गई, 'आज उनको घऱ भें नहीॊ आने
                          े  ॊ         ू
दॉ गी....।'
   ू
ऩीताॊफय बट्ट घय रौटे । बट्टजी ने दे खा कक घय का दयवाजा बीतय से फन्द है ! हययोज तो
ऩत्नी इन्तजाय कयती थी, ऩानी रेकय ऩैय धराने क मरए तैमाय यहती थी ! आज कहाॉ गई?
                                            े
दयवाजा खटखटामा तो ऩत्नी की आवाज आमी्
      "ऊह....! क्मा है ? भैं दयवाजा नहीॊ खोरॉ ूगी।"
        ॊ
      "वप्रमे ! तझे क्मा हो गमा? दयवाजा क्मों नहीॊ खोरेगी?" बट्टजी चककत हए।
      ऩत्नी झॊझराकय फोरी् "आऩ वे ही बट्ट जी है जजन्होंने एक कवव को बयी सबा भें सात-
सात जते रगवामे? भेये घय भें आऩक मरए जगह नहीॊ है ।"
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      ऩीताॊफय बट्ट कहते हैं- "रोग तो भझे नहीॊ सभझ ऩामे रेककन सयस्वती ! तू बी भझे नहीॊ
सभझती?"
      "इसभें क्मा सभझना है ? ककसी कवव को सात-सात जते भयवाना....! आऩ याजगरु हो गमे
                                                  ू
तो क्मा हो गमा? ऐसा घोय अन्माम....?" सयस्वती का योष नहीॊ उतया।
      बट्टजी ने कहा् "दे वी ! भैंने याजगरु क भद भें मा ईष्मादवश होकय जते नहीॊ भयवामे। तू
                                            े                         ू
दयवाजा खोर, तेये को सायी फात फताता हूॉ।"
      ऩत्नी ने द्राय खोरा। बट्टजी फैठे झरे ऩय। ऩत्नी चयणों भें फैठी। याजगरु कहने रगे्
                                        ू
      "कवव की कववता तो फहढ़मा थी रेककन उनभें नायामण क गण नहीॊ गामे थे , नय क गण
                                                     े                      े
गामे थे। कवव ने याजा की वाहवाही की थी, खशाभद की थी रेककन ऐसे हाड-भाॊस क हजायों-
                                                                       े
हजायों याजाओॊ को फना-फनाकय जो मभटा दे ता है कपय बी जजसक स्वरूऩ भें कोई पक नहीॊ ऩडता
                                                       े                 द
है ऐसे सवदद्वय ऩयभात्भा क मरए एक बी शब्द नहीॊ था उसकी कववता भें । "
                         े
      छऩकय फैठा हआ कवव ईसयदान चौकन्ना होकय ऩनत-ऩत्नी का सॊवाद सन यहा था। बट्टजी
आगे कहने रगे्
      "बगवान ने कवव को कववत्व-शडक्त दी है तो क्मा इन याजा-भहायाजाओॊ की, अहॊ काय के
ऩतरों की प्रशॊसा कयक उन्हें अचधक अहॊ कायी फनाकय नयक की ओय बेजने क मरए दी है ?
                    े                                            े
सवेद्वय ऩयभेद्वय क गीत गाने क मरए कववत्व-शडक्त मभरी है । कवव अऩनी वाणी का सदऩमोग
                  े          े
नहीॊ अवऩत दरुऩमोग कय यहा था। वह फडा ववद्रान था, सयस्वती का उऩासक था रेककन उसकी
ऩूयी कववता भें एक बी शब्द बगवान क मरए नहीॊ था। जजस जजह्वा ऩय बगवान का नाभ नहीॊ,
                                 े
जजस हदर भें ऩयभात्भा क मरए प्माय नहीॊ, जजस कववता भें ऩयभात्भा क मरए ऩकाय नहीॊ वह
                      े                                        े
कववता है कक फकवास है ? भैंने उस होनहाय कवव को सजा कयवा दी, ताकक वह अऩने गौयव भें
जाग जाम, शामद....।"
      ऩीताॊफय बट्ट की वाणी सनते ही ईसयदान का हदर वऩघर गमा् 'मे ऩीताॊफय बट्ट वास्तव
भें सरझे हए भहाऩरुष हैं। इनका वध कयने को आमा था....! चधक्काय है भझे !'
प्रामजद्ळत से ऩाऩ जर जाते हैं। ईसयदान आकय बट्ट जी क चयणों भें चगय ऩडा। अऩने
                                                          े
आॉसओॊ से उनक चयणों ऩय अमबषेक ककमा। याजगरु ने कवव को उठाकय अऩने गरे रगा मरमा
            े
औय आद्ळमद बी हआ।
       "कववयाज कववयाज....! ऐसी अॊधेयी भध्मयात्री भें महाॉ कसे?"
                                                           ै
       "भहायाज ! आमा था आऩकी हत्मा कयने क मरमे रेककन अफ ऩता चरा कक जन्भों-जन्भों
                                         े
से भैं अऩनी हत्मा कय यहा था। आज आऩने भेये हदररूऩी कऩाट ऩय जोयदाय चोट भायकय अनॊत
का द्राय खोर हदमा है । कववता वास्तव भें उस ऩयभ कवीद्वय क मरए होनी चाहहए, जजह्वा वास्तव
                                                        े
भें उस जीवनदाता क मरए चरनी चाहहए। जीवन इतना कीभती है मह भैं नहीॊ जानता था।
                 े
भहायाज ! भैं आऩका फारक हूॉ। भझे ऺभा कयना। भैं चाहता हूॉ कक आऩक चयणों भें फैठकय
                                                                  े
बागवत की कथा श्रवण करू, बागवत ऩढ़ॉू , बडक्तयस-ऩान करू। भझभें प्राणफर तो है , कक्रमाफर
                      ॉ                             ॉ
तो है रेककन बावफर आऩ मभरामेंगे तफ भझ ननफदर को उस ऩयभेद्वय का, उस दे वेद्वय का, उस
ववद्वेवद्वय का प्रेभफर प्राद्ऱ होगा जजससे जीवन साथदक हो जामगा। भहायाज ! भझे स्वीकाय
कीजजए। आऩक चयणों भें फैठने का अचधकाय दीजजए। भहायाज ! भझे बागवत धभद का उऩदे श
          े
दीजजए। बावना क बफना का जो फर है वह यावण औय कस जैसा है औय बावना सहहत का जो
              े                             ॊ
फर है वह फद्ध ऩरुषों का फर है । भहायाज ! भझभें बगवद् बाव बय जाम ऐसी कथा कृऩा कयके
सनाइमे।"
       ऩीताॊफय बट्ट प्रसन्न हए। कवव को बागवत की कथा सनाई। बगवच्चचाद, बगवत ्-ध्मान,
बगवद् गणानवाद से कवव बावववबोय हो गमा। कपय उसने 'बडक्तयस' नाभ का ग्रन्थ मरखा।
अऩनी कववता भें बागवत मरखा औय द्रारयकाधीश क चयणों भें अवऩदत कयने को गमा। कथा
                                          े
कहती है कक कवव ज्मों ही अऩन ग्रॊथ बगवान को अवऩदत कयने को गमा तो बगवान की भूनतद
भस्कयामी औय हाथ रम्फा कयक कवव क उस ग्रॊथ को स्वीकाय कय मरमा।
                         े     े
       हभायी वाणी, हभायी कववता, हभायी अक्र औय हभायी हमशमायी भें अगय ऩयभात्भ-प्रानद्ऱ
की हदशा नहीॊ है तो ऐसी वाणी, कववता, अक्र औय हमशमायी से क्मा राब? तरसीदास जी कहते
हैं-
                                 चतयाई चूल्हे ऩडी ऩूय ऩमो आचाय।
                             तरसी हरय क बजन बफन चायों वणद चभाय।।
                                       े
       वह चतयाई ककस काभ की जजस चतयाई भें चैतन्म का प्माय न हो ! वह कववता ककस
काभ की जजस कववता भें याभ क गीत न बये हों... प्रब क गीत न गॉूजते हों? वह जीवन ककस
                          े                       े
काभ का जजस जीवन भें जीवनदाता की ओय मात्रा न हो? ऐसे तो रोहाय की धौंकनी बी
द्वासोच््वास बयती है , ननकारती है ।
       ऩैसे फढ़ जामॉ तो क्मा फडी फात है ? गाडी आ जाम तो क्मा फडी फात है? भसीफत फढ़ी
औय क्मा हआ?
साहेफ ते इतना भाॉगूॊ नव कोहट सख सभाम।
                             भैं बी बूखा ना यहूॉ साधू बी बूखा न जाम।।
        तम्हायी बडक्त फडी कक नहीॊ फढ़ी, तम्हायी सभता फढ़ी कक नहीॊ फढ़ी, तम्हायी अहहॊसा फढ़ी
कक नहीॊ फढ़ी, तम्हायी प्रेभ की धाया फढ़ी कक नहीॊ फढ़ी अऩने बीतय का खजाना दे खो। रूऩमे फढ़
गमे, भकान फढ़ गमे, गाडडमाॉ फढ़ गईं तो तम्हाये मरए भसीफत फढ़ गई। साधन फढ़ें उसक साथ
                                                                              े
साधना नहीॊ फढ़ी तो आदभी बीतय से कगार होता जामेगा। बीतय से कगार होने क फजाम
                                 ॊ                         ॊ         े
फाहय से कगार होना हजाय गना अच्छा है ।
         ॊ
        इजन्िमों का अरोरप्त्व दृढ़ होना चाहहए। यॊ बा आ जाम कपय बी शकदे व जी चमरत नहीॊ
हए। सोरह हजाय एक सौ आठ अॊगनाएॉ श्रीकृष्ण क आगे ठभक-ठभक कय यही हैं कपय बी
                                          े
श्रीकृष्ण का चचत्त चमरत नहीॊ होता। इजन्िमों क ववषम उऩरब्ध होते हए बी चचत्त भें अरोरप्त्व
                                             े
आ जाम तो सभझ रेना, रृदम भें बगवान की बडक्त पर गई, चचत्त भें आत्भ प्रसाद जगभगा
यहा है , जीवन धन्म हआ है । उसकी भीठी ननगाह बी जजन ऩय ऩडती है वे बी धन्म होने रगती
हैं।
        दमोधन क साथ कवर शकनन ही यहता, बीष्भ जैसे प्रनतऻा भें दृढ़ औय कणद जैसे दानी
               े     े
नहीॊ यहते तो बायत की दशा जो आज है उससे फहत कछ उन्नत होती। बीष्भ औय कणद जैसे
रोग श्रीकृष्ण क दै वी कामद भें अऩनी शडक्त औय ओज रगाते, ऻान, बडक्त औय सत्कभद क प्रचाय-
               े                                                             े
प्रसाय भें अऩना साभर्थमद अवऩदत कयते तो आज क सभाज की यौनक कछ औय होती। मे भहायथी
                                           े
दमोधन औय शकनन क फीच जी-जीकय, उनक टकडे खा-खाकय फॉध गमे। उनभें तेज औय सत्त्व
               े                े
तो था रेककन ढॉ क गमा था।
        सज्जन आदभी दजदन क सम्ऩक भें ज्मादा यहे , ननन्दक क सॊग भें ज्मादा यहे तो सज्जन
                         े     द                         े
आदभी बी घसीटा जाता है । जैसे कणद घसीटा गमा, मचधवद्षय घसीटे गमे औय दे श को सहना
ऩडा।
        हभ रोग बी अऩने अडोस-ऩडोस भें दजदन क वातावयण भें घसीटे न जामें, अऩनी
                                           े
सज्जनता को ऩयभात्भा क ऻान से ऩयभात्भा क ध्मान से, ऩयभात्भा क जऩ से, ऩयभात्भा क
                     े     ,           े                    े                 े
स्भयण से हदव्म फनाकय श्रीकृष्ण-तत्त्व क साऺात्काय भें रगामें, सॊत औय बगवान क दै वी कामद
                                       े                                    े
भें रगामें....।
        नायामण.... नायामण..... नायामण..... नायामण.... नायामण.....।
                              ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
        साधक को ववद्वास कयना चाहहए कक बगवान भझे इसी वत्तदभान जन्भ भें ही अबी मभर
सकते हैं। इसभें कोई कहठनता नहीॊ है । क्मोंकक बगवान से हभायी दे शकार की दयी नहीॊ है । वे
                                                                        ू
हभायी जानत क हैं औय हभाये जीवन भें उनको प्राद्ऱ कय रेना ऩयभ आवश्मक है । बगवान क
            े                                                                  े
शयण होते हए ही बगवान हभें तयन्त अऩना रें गे। हभाये अनन्त जन्भों क दोष तयन्त मभटा
                                                                 े
दें गे। हभाये अमबभान ने ही हभें फाॉध यखा है ।
                                   ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
                                             अनक्रभ


                                     दै वी सम्ऩदा -3
                             (हदनाॊक् 5.8.1990 यवववाय, अभदावाद आश्रभ)
                                तेज् ऺभा धनत् शौचभिोहोनानतभाननता।
                                          ृ
                                 बवजन्त सॊऩदॊ दै वीभमबजातस्म बायत।।
       'तेज, ऺभा, धैम, आॊतय-फाह्य शवद्ध, ककसी भें बी शत्रबाव का न होना औय अऩने भें
                     द
ऩूज्मता क अमबभान का अबाव – मे सफ तो हे अजन ! दै वी सम्ऩदा को रेकय उत्ऩन्न हए ऩरुष
         े                               द
क रऺण हैं।'
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                                                                            (बगवद् गीता् 16.3)
       जजसक जीवन भें बी दै वी सम्ऩदा का प्रबाव है उसभें एक ववरऺण तेज आ जाता है ।
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खा-ऩीकय, चचकने ऩदाथद, ऩप-ऩावडय, रारी-मरऩजस्टक रगाकय दे दीप्मभान फनना मह तो याजसी
तेज है । फाह्य सौन्दमद वास्तववक सौन्दमद नहीॊ है । वास्तववक सौन्दमद दै वी सम्ऩदा है । दै वी सम्ऩदा
क तेज औय सौन्दमद से व्मडक्त आऩ बी खश यहता है , तद्ऱ यहता है । ननववदकायी सख ऩाता है औय
 े                                              ृ
दसयों को बी ननववदकायी नायामण क आनन्द भें सयाफोय कय दे ता है ।
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       याजसी औय आसयी सख आऩ बी भसीफत औय हहॊसा अहहॊसा का सहाया बोगा जाता है
औय जजनसे मह सख बोगता है उन रोगों का बी शोषण होता है ।
       जजसक जीवन भें दै वी सम्ऩदा है उसभें ऻानवान का तेज होता है । ऻानवान क सभीऩ
           े                                                               े
फैठने से अऩना चचत्त शाॊत होने रगता है , ईद्वय क अमबभख होने रगता है । उन भहाऩरुष की
                                               े
उऩजस्थनत भें हभाये कववचाय कभ होने रगते हैं। उनका तेज ऐसा होता है कक रृदम को शाॊनत,
शीतरता औय ऻान-प्रसाद से ऩावन कयता है । कबी कबी तो अनत क्रोधी, अनत क्रय आदभी मा
                                                                    ू
गॊडा तत्त्वों क कहने से बी रोग काभ कयने रगते हैं रेककन गॊडा तत्त्वों का तेज ववकाय का तेज
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है । वे अऩना भनचाहा कयवा रेते हैं। साभनेवारा उनका भनचाहा कय तो दे गा रेककन उसके
बीतय आनन्द औय शाॊनत नहीॊ होगी। भहाऩरुष का तेज ऐसा है कक वे अऩने भनचाहे कीतदन,
ध्मान, बजन, साधना, सदाचाय आहद भें रोगों को ढार दे ते हैं , ईद्वय क अमबभख फना दे ते हैं।
                                                                  े
भहाऩरुष क सॊकत क अनसाय जो ढरते हैं उनको बीतय आनन्द, शाॊनत, सख औय कछ ननयारा
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अरौककक अनबव होता है ।
कबी ककसी क डण्डे क तेज से कोई काभ कय दे तो काभ कयने वारे का कल्माण नहीॊ
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होता। काभ कयाने वारे का उल्रू सीधा होता है । भहाऩरुषों का तेज ऐसा होता है कक अऩना चचत्त
तो ऩयभात्भ-यस से ऩावन होता ही, जजनसे वे बडक्त, ऻान, सेवा, स्भयण, साधना कयवाते हैं,
जजनको बीतय से दै वी शडक्त का धक्का रगाते हैं उनक जीवन का बी उद्धाय हो जाता है ।
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भहाऩरुषों का ऐसा साजत्त्वक तेज होता है । दसयी ववशेष फात मह है कक जजनभें मे दै वी गण होते
                                          ू
हैं उन भहाऩरुषों भें अमबभान नहीॊ होता कक भझभें मे दै वी गण हैं, भझभें तेज है , भझभें ऺभा
है , भझभें धैम, शौच, उदायता, आचामोऩासना, दान, दभ इत्माहद है । इस प्रकाय का अहॊ उनक
              द                                                                   े
चचत्त भें नहीॊ होता। वे जानते हैं कक दै वी गण दे व क होते हैं। दे व तो ऩयभात्भा है । ववब,
                                                    े
व्माऩक, सजच्चदानन्द दे व है । गण हैं दे व क औय कोई अऩने भान रे तो दै वी गणों क साथ-साथ
                                           े                                  े
चचत्त भें जो आसयी स्वबाव है उसका यॊ ग रग जाता है । ककसी का सत्म फोरने का आग्रह, अच्छी
फात है , फहत सन्दय फात है रेककन 'भझभें सत्म फोरने का गण है ' मह अगय हदख यहा है ,
उसका अहॊ आ यहा है तो मह अहॊ आसयी है । ककसी भें ब्रह्मचमद-ऩारन का गण है , ऺभा का गण
है , रेककन 'भैं ऺभावान हूॉ मा भैं ब्रह्मचायी हूॉ' इस प्रकाय का बीतय अहॊ होता है तो दै वी गण के
साथ जो आसयी स्वबाव का जो हहस्सा ऩडा है वह काभ कयता है ।
        जजसक जीवन भें दै वी स्वबाव ओतप्रोत हो गमा है उसको मह बी नहीॊ होता है कक 'भैं
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सत्मवादी हूॉ... भैं ब्रह्मचायी हूॉ... भैं तेजस्वी हूॉ... भैं ऺभावान हूॉ.... भैं सच्चा हूॉ... भैं उदाय हूॉ.... भैं
आचामोऩासक हूॉ, भैं श्रद्धावान हूॉ.... कपय भझे द्ख क्मों मभरता है ? .... भैंने इतनी बडक्त की
कपय बी भेया ऐसा क्मों हो गमा?...।' उसक जीवन भें इस प्रकाय की छोटी-भोटी कल्ऩना की
                                      े
मशकामत नहीॊ होती। अगय मशकामत होती है तो दै वी सम्ऩदा से सम्ऩन्न भहाऩरुष उसे सभझाते
हैं कक् हे वत्स !
                                  अऩने द्ख भें योने वारे ! भस्कयाना सीख रे।
                                      दसयों क ददद भें आॉसू फहाना सीख रे।।
                                       ू     े
                                    जो णखराने भें भजा है आऩ खाने भें नहीॊ।
                                  जजन्दगी भें तू ककसी क काभ आना सीख रे।।
                                                       े
        अऩनी वासना मभटे गी तो दै वी सम्ऩदा फढ़े गी।
        अॊत्कयण की अशवद्ध दो कायणों से होती है ् एक कायण है सख की रारसा औय दसया
                                                                            ू
कायण है द्ख का बम। सख की रारसा औय द्ख का बम हभाया अॊत्कयण भमरन कय दे ता
है । अॊत्कयण भमरन होने से हभ तत्त्वत् दे व से ननकट होते हए बी अऩने को दे व से दय
                                                                               ू
भहसूस कयते हैं। सॊसाय की उरझनों भें उरझ जाते हैं। अत् अॊत्कयण भें जो सख की रारच है
उसको मभटाने क मरए सख दे ना सीख रे , दसये क काभ आना सीख रे। अऩने द्ख भें योने
             े                       ू    े
वारे ! तू भस्कयाना सीख रे।
जो अऩने द्ख को ऩकडकय योते यहते हैं उनको भस्कयाकय अऩने द्ख को ऩचा रेना
चाहहए औय सख फाॉटना चाहहए। इससे अॊत्कयण की भमरनता दय हो जामगी। अॊत्कयण की
                                                  ू
भमरनता दय होते ही वह तेज आने रगेगा।
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         खा-ऩीकय ऩद्श होकय अथवा ठण्डे प्रदे श भें यहकय चभडी का यॊ ग फदरकय तेजस्वी होना
मह उल्रू क ऩट्ठों का काभ है , ब्रह्मवेत्ताओॊ का काभ कछ ननयारा होता है ।
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         'भैं फडा तेजस्वी फनकय आमा, क्मोंकक इॊनरैण्ड भे यहा था, अभेरयका भे यहा था।'
         अये बैमा ! इॊनरैण्ड भें अगय तेजस्वी हो जाते हो, अभेरयका भें तेजस्वी हो जाते हो,
हहभारम भें यहकय तेजस्वी हो जाते हो तो मह तेज की ववशेषता चभडी की ववशेषता है , तम्हाये
उस वप्रम ऩणद ऩरुषोत्तभ ऩयभात्भा की ववशेषता का तम्हें ऻान नहीॊ है । अद्शावक्र भहायाज कहाॉ गमे
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थे इॊनरैण्ड औय अभेरयका भें चभडा फदरने को? उनका शयीय तो आठ वक्रताओॊ से अमबबत था।
                                                                          ू
ऐसे अद्शावक्र का तेज ववशार याज्म, ववशार फाह, ववशार ववद्या, ववशार धनयामश क स्वाभी याजा
                                                                         े
जनक को आकवषदत कयता है , आत्भशाॊनत प्रदान कयता है । अद्शावक्र क अॊग टे ढ़े, टाॉगे टे ढ़ी, चार
                                                              े
टे ढ़ी, रेककन उनकी वाणी भें ब्रह्मतेज था, चचत्त भें आत्भतेज था उसको दे खकय याजा जनक उनके
चयणों भें फैठे। भीया का तेज ऐसा था कक उसकी ननन्दा औय ववयोध कयने वारे रोग उसकी
हत्मा कयने क मरए तैमाय होकय भीया क ऩास आमे तो उनका चचत्त फदर गमा।
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         बगवान क बक्तों का औय ब्रह्मवेत्ताओॊ का तेज दसयों क द्ख-ददद को ननवायनेवारा होता
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है । साधक को मह तेज अऩने भें राना चाहहए।
         कई भहाऩरुष ऐसे होते हैं कक जजनभें मे दै वी सम्ऩदा क गण जन्भजात होते हैं। जैसे
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नाभदे व, ऻानेद्वय भहायाज, शकदे वजी भहायाज, भीया, सरबा आहद भें मे गण स्वबाव से ही थे।
उनका ऺभा, धैम, ब्रह्मचमद क तयप झकाव अऩने आऩ था। साधक को साधन-बजन, ननमभ-व्रत
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का सहाया रेकय मे गण अऩने भें राने होते हैं। जजनभें मे गण जन्भजात हैं उन्होंने कबी न
कबी मे गण साधे होंगे। हभ रोग अबी साध सकते हैं। जजनक कछ गण साधे हए हैं वे ज्मादा
                                                   े
साधकय दे व भें जस्थत हो सकते हैं।
         दै वी सम्ऩदा क गणों भें से जजतने अचधक गण अऩने जीवन भें होंगे उतना जीवन
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'टे न्शन' यहहत, चचॊतायहहत, बमयहहत, शोकयहहत, द्खयहहत, उद्रे गयहहत होगा। दै वी सम्ऩदा के
गण जजतने गहये होंगे उतना आदभी उदाय होगा, सहनशीर होगा, ऺभावान होगा, शूयवीय होगा,
धैमवान होगा, तेजस्वी होगा। मे साये गण उसक मरए औय उसक सम्ऩक भें आने वारों क मरए
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सखद हो जाते हैं।
         भहाऩरुषों की उस शडक्त का नाभ 'तेज' है कक जजसक प्रबाव से उनक साभने ववषमासक्त
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औय नीच प्रववत्तवारे भनष्म बी प्राम् अन्मामचयण औय दयाचाय से रुककय उनक कथनानसाय
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श्रेद्ष कभों भें प्रवत्त हो जाते हैं।
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         भहाऩरुषों भें दसया गण है ऺभा।
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ऺभा भोहवश बी की जाती है , बमवश बी की जाती है रेककन दै वी सम्ऩदा की ऺभा कछ
ववरऺण है । ऩत्र ने, ऩत्नी ने, कटम्फ ने कछ अऩयाध ककमा, उनभें भोह है तो चरो, घूॉट ऩी
मरमा, सह मरमा। मह भोहवश की गई ऺभा है ।
       इन्कभटै क्स का इन्सऩैक्टय आ गमा। ऐसा-वैसा फोरता है , कछ कडवी-भीठी सना यहा है ।
हदर भें होता है कक 'मह न फोरे तो अच्छा है , महाॉ से टरे तो अच्छा है । कपय बी क्मा कयें ?
चरो जाने दो।' मह बमवश की गई ऺभा है । अगय कछ फोरें गे तो वह कागजों से कडक व्मवहाय
कये गा, धन की हानन हो जामेगी।
       नौकय गरती कयता है । डाॉटेंगे तो चरा जामेगा। दसया आदभी अबी मभरता नहीॊ, चरो
                                                    ू
इसको ऺभा कय दो। जफ अच्छा नौकय मभर जामेगा तो इसे ननकार दें गे।
       भोह से, बम से, स्वाथद से मा औय ककसी कायण से जो ऺभा की जाती है वह दै वी
सम्ऩदा का गण नहीॊ है । दै वी सम्ऩदावारे की ऺभा की कछ ननयारी होती है । जैसे, बगवान
नायामण ऺीय सागय भें शेषशैय्मा ऩय रेटे हैं। बग ऋवष ने उनकी छाती भें रात भाय दी।
                                            ृ
नायामण अऩने नायामण तत्त्व भें इतने आनजन्दत औय प्रसन्न हैं, तद्ऱ हैं कक फाहय से ववऺेऩ आने
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ऩय बी अऩना आनन्द-स्वबाव प्रकटाने भें उन्हें कोई प्रमास नहीॊ कयना ऩडता।
       'भनीद्वय ! आऩक ऩैय भें कोई चोट तो नहीॊ रगी? दै त्म-दानवों क साथ मद्ध कयक हभाया
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रृदम जया कठोय हो गमा है । इस कठोय रृदम ऩय आऩका कोभर चयण रगा है तो आऩक चयण
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को कोई ठे स तो नहीॊ ऩहॉ ची?'
                               ऺभा फडन को होत है छोटन को उत्ऩात।
                           ववष्ण को क्मा घटी गमो जो बग ने भायी रात।।
                                                     ृ
       ब्रह्मवेत्ताओॊ भें ऺभा इस प्रकाय की ऺभा होती है ।
       ऺभाशीर होने भें दो फातें चाहहए। अऩने मरए फाहय की वस्तओॊ क सख-बोग का
                                                                े
आकषदण न हो। कोई अऩना कछ बफगाडे तो उसका अहहत कयने का बाव न हो। ऐसा आदभी
ऺभाशीर हो जाता है । वही सच्चा ऺभाशीर होता है ।
       जजसक ऩास ऺभारूऩी शस्त्र है , शत्र उसका कछ बी नहीॊ बफगाड सकता। जजसको कछ
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चाहहए, फदरा रेना है अथवा सख रेना है , जजसको कछ रेना है उसभें क्रयता है । जजसको कछ
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रेना नहीॊ, दे ना ही दे ना है उसक जीवन भें ऺभा ही ऺभा है , प्रसन्नता ही प्रसन्नता है , आनन्द
                                े
ही आनन्द है ।
       धनत का अथद है धैम। जो सत्कभद कयते हैं मा ईद्वय क भागद ऩय चरते हैं तो कोई ववघ्न-
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फाधा आमे तो धैमद से सहें । थोडा सा ववघ्न आमा, कद्श ऩडा तो सोचने रगा कक् "भैं आत्भहत्मा
कय रॉ .... भैं कहीॊ बाग जाऊ.... अथवा अरग भकान रेकय यहूॉ.....' मह दै वी सम्ऩदा नहीॊ है ,
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आसयी सम्ऩदा है । मह आसयी स्वबाव क रऺण हैं। दै वी स्वबाव मह है कक ककतने बी कद्श आ
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जाम, ककतनी बी भसीफतें आ जाम रेककन चचत्त ऩय ऺोब नहीॊ होता, चचत्त ववघ्नों से प्रबाववत
नहीॊ होता।
       भीया क जीवन भें न जाने ककतने ववघ्न आमे ! भीया क ससय साॊगा याणा क दे हावसान
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क फाद भीया क दे वय यतनमसॊह औय ननद उदा ने भीया को सताना चारू कय हदमा। यतनमसॊह ने
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भीया को सधायने क मरए अऩनी फहन उदा औय उसकी सहे री को काभ सौंऩा। 'भेवाड की यानी
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होकय भीया साध-फाफाओॊ से, न जाने कसे-कसे रोगों से मभरती है .....फात कयती है? उसको
                                 ै   ै
सधायो।'
       अफ, भीया को क्मा सधायना है ? वह तो प्रब क गीत गाती है । बफगडे हए रोग ककसी को
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सधायने का ठे का रेते हैं तो सत्सॊचगमों को सधायने का ही ठे का रेते हैं।
       उदा ने भीया को फहत द्ख हदमा रेककन भीया ने कबी नहीॊ सोचा कक, 'भैं अरग भहर
भें यहूॉ.... भैं बाग जाऊ... ककसी को जहय दे दॉ ू औय फदरा रॉ ू....' नहीॊ, भीया तो बगवान की
                        ॉ
बडक्त भें रगी हई थी। दै वी सम्ऩदा से सम्ऩन्न व्मडक्त फडा शाॊत होता है । उसका चचत्त ववरऺण
रऺणों से सम्ऩन्न होता है ।
       भीया की बडक्त दे खकय उदा जरती थी। उसको काभ सौंऩा गमा था कक भीया को सधायो।
कृष्ण-कन्है मा फॊसी फजैमा की सेवा-सश्रषा छोडकय जैसे औय रोग काभ-क्रोध क, रोब-भोह क
                                      ू                               े          े
दरदर भें पस भयते हैं ऐसे ही भीया बी पस भये ऐसा उनका प्रमोजन था। सॊसाय क दरदर भें
          ॉ                          ॉ                                 े
पस भयने वारे ऐसा नहीॊ भानते कक हभ पस भयते हैं। पस भयने वारे सभझते हैं कक मही
 ॉ                                 ॉ            ॉ
सच्चा जीवन है , बगत का जीवन ही फेकाय है । बक्त सोचता है कक मे फेचाये पस भये हैं, इनको
                                                                      ॉ
ननकारॉ ू तबी इन्हें सच्चे जीवन का ऩता चरेगा।
       जफ तक व्मडक्त क जीवन भें आॊतरयक प्रकाश नहीॊ आता तफ तक सभझता है कक खाना-
                      े
ऩीना, फहढ़मा कऩडे ऩहनना, ऩेट को हदल्री दयवाजा का फाजाय फनाकय उसभें ठूॉसते ही जाना,
मही जजन्दगी है ।
       नही...। ठूॉस-ठूॉसकय खाने को जजन्दगी नहीॊ कहते, ड्रामक्रीन कऩडे ऩहनने को जजन्दगी
नहीॊ कहते। हजाय-हजाय द्ख औय भसीफतों की आॉधी औय तूपान आमे कपय बी हदर को न
हहरा सक ऐसे हदरफय क साथ एक हो जाने को ही जजन्दगी कहते हैं।
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                                न खशी अच्छी है न भरार अच्छा है ।
                                माय जजसभें यख दे वह हार अच्छा है ।।
                                   हभायी न आयजू है न जस्तजू है ।
                               हभ याजी हैं उसभें जजसभें तेयी यजा है ।।
       प्रब की भस्ती भें जो भस्त हैं उनको दननमा क बोग-ववरासों की आवश्मकता क्मा है ? वे
                                                 े
बोजन तो कयें गे औषधवत ्। वस्त्र तो ऩहनें गे शयीय की आवश्मकता क भताबफक। आवास भें तो
                                                              े
यहें गे रेककन आवास क मरए जजन्दगी फयफाद नहीॊ कयें गे। बोजन औय वस्त्रों क मरए जजन्दगी
                    े                                                  े
फयफाद नहीॊ कयें गे। वे तो जजन्दगी को आफाद कयें गे जजन्दगी क अचधद्षान को जानने क मरए। मे
                                                           े                   े
दै वी सम्ऩदा क रोग होते हैं। ऐसे ऩरुषों का तेज ननयारा होता है । उनभें कापी धैमद होता है ।
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       शौच का अथद है शवद्ध। शवद्ध दो प्रकाय की होती है ् आॊतय शवद्ध औय फाह्य शवद्ध। फाह्य
शवद्ध तो साफन, मभट्टी, ऩानी से होती है औय आन्तय शवद्ध होती है याग, द्रे ष, वासना आहद के
अबाव से। जजनकी आन्तय शवद्ध हो जाती है उनको फाह्य शवद्ध की ऩयवाह नहीॊ यहती। जजनकी
फाह्य शवद्ध होती है उनको आन्तय शवद्ध कयने भें सहाम मभरती है । ऩतॊजमर भहायाज कहते हैं कक
शयीय को शद्ध यखने से वैयानम का जन्भ होता है । शयीय को शद्ध यखने से वैयानम का जन्भ कसे?
                                                                                   ै
जजसभें शायीरयक शवद्ध होती है उसको अऩने शयीय की गन्दगी का ऻान हो जाता है । जैसी
गन्दगी अऩने शयीय भें बयी है ऐसी ही गन्दगी दसयों क शयीय भें बी बयी है । अत् अऩने शयीय
                                           ू     े
भें अहॊ ता औय दसयों क शयीय क साथ ववकाय बोगने की भभता मशचथर हो जाती है । रृदम भें
               ू     े      े
छऩा हआ आनन्द-स्वरूऩ चैतन्म, ईद्वय, ऩयभात्भा हभाया रक्ष्म है – इस ऻान भें वे रग जाते हैं।
       ऩतॊजमर भहायाज कहते हैं-
                                शौच प्रनतद्षामाॊ स्वाॊगजगप्सा ऩयै यसॊसगद्।
       'जफ आन्तय-फाह्य दोनों प्रकाय क शौच दृढ़ हो जाते हैं तो मोगी को अऩने शयीय ऩय एक
                                     े
प्रकाय की घणा उत्ऩन्न होती है औय दसयों क शयीय क सॊसगद की इच्छा बी नहीॊ होती।'
           ृ                      ू     े      े
       शौच से शयीय भें आसडक्त कभ होती है । शयीय से ननकरने वारी गन्दगी से घणा होकय
                                                                          ृ
आदभी का चचत्त वासना से ननभक्त होने रगता है ।
                          द
       फद्ध क जभाने भें काशी भें एक नगय सेठ था। उसक ऩत्र का नाभ था मशकभाय।
             े                                     े
मशकभाय क मरए वऩता ने तीन भौसभ क मरए तीन भहर फनामे थे। याग-याचगनी आराऩने
        े                      े
वारी गानमकाएॉ, नतदककमाॉ, दामसमाॉ मशकभाय को घेये यहती थीॊ। अऩाय धनयामश थी। वऩता को
फडी उम्र भें फेटा हआ था इससे अत्मॊत राडरा था। उसे कहीॊ वैयानम न रग जाम, फद्ध के
मबऺकों का यॊ ग न रग जाम इसक मरए मह सफ इन्तजाभ ककमा गमा था। जैसे मसद्धाथद (फद्ध)
                           े
क मरए उनक वऩता याजा शद्धोधन ने मसद्धाथद को ऐहहक सखों भें गयकाव कयने क मरए व्मवस्था
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की थी ऐसे ही मशकभाय को उसक वऩता ने ऐहहक सखों भें गयकाव कय हदमा। रेककन बगवान
                          े
अऩने प्मायों को सदा गन्दगी भें , गन्दे -ववचायों भें ऩचने नहीॊ दे ना चाहते।
       एक याबत्र को गामन-वादन सनते-सनते, नत्म दे खते-दे खते मशकभाय ककसी कायणवशात ्
                                          ृ
जल्दी से सो गमा। नीॊद आ गई। याबत्र को जल्दी सोने से शयीय की थकान फहत अच्छी तयह से
मभटती है । इतय सभम की नीॊद की अऩेऺा याबत्र को नौ से फायह की नीॊद ढाई गना ज्मादा राब
कयती है । फायह से तीन की नीॊद दगना राब कयती है । तीन से छ् की नीॊद डेढ़ गना राब
कयती है । सूमोदम क फाद की नीॊद जीवन भें आरस्म-प्रभाद राकय हानन कयती है ।
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       दै वमोग से एक हदन याजकभाय जल्दी सो गमा। भध्मयाबत्र क फाद डेढ़ दो फजे उनकी नीॊद
                                                           े
खर गई। दे खता है कक नाचने गाने वारी जस्त्रमाॉ सफ सोई ऩडी है । खयादटे बय यही हैं.... ककसी के
भॉह से राय ननकर यही है , ककसी का हाथ ववचचत्र ढॊ ग भें ऩडा है , ऩप-ऩावडय, रारी-मरऩजस्टक
का 'भेक-अऩ' उस जभाने भें जो कछ होगा वह सफ गडफड हो गमा है , फार बफखये ऩडे हैं।
मशकभाय दीमे की रौ तेज कयक सफकी हारत दे ख यहा है । शाभ क वक्त हाय-मसॊगाय, वस्त्र-
                         े                             े
आबूषणों से सजी-धजी, हास्म-ववरास कयती हई यभणणमाॉ अबी घणास्ऩद हारत भें ऩडी हई
                                                     ृ
वीबत्स रग यही हैं। वह सोचने रगा्
        "क्मा इन्ही अॊगनाओॊ क ऩीछे भैं ऩागर हए जा यहा हूॉ? जजनक भॉह से राय ननकर यही
                             े                                   े
है , जजनक नाक भें गन्दगी बयी है मे ही जस्त्रमाॉ भझे सन्दय रग यही थी? इनभें सन्दयता जैसा है
          े
क्मा? भेया नाभ मशकभाय है ऩय अऩमश हामसर हो ऐसा काभ कय यहा हूॉ !
       इन हाड-भाॊस क सन्दय हदखने वारे ऩतरों भें सौन्दमद अऩना नहीॊ है । सौन्दमद तो ककसी
                    े
औय का है । उस तत्त्व का सॊऩक (कनेक्शन) टूट जाम तो भदे हो जाते हैं। चधक्काय है भझे कक
                            द
भैं इनक हाड-भाॊस क शयीय को प्माय कयते हए इनक साथ अऩना बी मौवन नद्श कयता हूॉ। इस
       े           े                           े
छोटी-सी उम्र भें भझे फढाऩे क रऺणों ने घेय मरमा है ! भैं मौवन भें ही फूढ़ा हो यहा हूॉ ! भेया
                            े
शयीय अबी से रुनण होने जा यहा है !'
                               जजतना भाणणमा बोग उतना बमा योग।
        "हाम ! मह भैं क्मा कय यहा हूॉ?"
        मशकभाय को अऩने आऩ ऩय नरानन हई। उसका हदभाग चकयाने रगा। वह धयती
ऩकडकय फैठ गमा। कपय से उन थक औय राय टऩकाती हई, खयादटे बयती, गन्दी औय अस्तव्मस्त
                          ू
राशों जैसी ऩडी हई नतदककमों को ननहायने रगा। मह दे खकय उसक चचत्त भें वैयानम का तूपान
                                                        े
उठा।
        अऩने दोषों की ननन्दा कयने से ऩाऩ जर जाते हैं। दसयों की ननन्दा कयने से ऩण्म जर
                                                       ू
जाते हैं।
        मशकभाय का अॊत्कयण थोडा शद्ध हआ। मशकभाय उठा। सीढ़ी का हाथा ऩकडते हए धीये
से नीचे उतया। चऩचाऩ... दयवाजे का खटका ककमे बफना फाहय ननकरा। भहर औय सॊसाय का
त्माग कयक मशकभाय वहाॉ से यवाना हो गमा।
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        प्रबात कार भें बगवान फद्ध गॊगाककनाये अऩने ववहाय भें टहर यहे थे। उनक चयणों भें
                                                                           े
मशकभाय जा ऩडा। फोरा्
        "बन्ते ! सॊसाय धोखा है , द्ख रूऩ है । उससे फाहय ननकरना दष्कय है , भजश्कर है ।"
        फद्ध ने कहा् "सॊसाय धोखा जरूय है , द्खरूऩ जरूय है रेककन उससे ननकरना आसान है
अगय ककसी सॊत का साजन्नध्म मभर जाम तो।"
        "बगवन ् ! भैं आऩकी शयण आमा हूॉ। भझे स्वीकाय कयो।"
        फद्ध ने मशकभाय को अऩना मरमा, थोडा उऩदे श हदमा।
सफह हई। भहर भें नतदककमाॉ, दामसमाॉ जागीॊ। दे खती हैं कक मशकभाय का कहीॊ ऩता नहीॊ
है । 'कहाॉ गमे हभाये स्वाभी? हभाये सवेसवाद? हभाये वप्रमतभ ्?'
       स्वाभी, सवेसवाद, वप्रमतभ सदा क मरए तो ककसी क यहते नहीॊ हैं। ककसी का बी सॊफॊध
                                     े             े
सदा क मरए नहीॊ यहता। कसा बी वप्रमतभ हो, कसी बी वप्रमा हो रेककन कबी न कबी, कहीॊ न
     े                ै                  ै
कहीॊ झगडा, ववयोध, ववनाश अवश्म हो आता ही है । जो एक दसये क हाड-भाॊस-चाभ को दे खकय
                                                    ू    े
शादी कय रेते हैं उनभें झगडा होना बफल्कर ननमत है । मह जरूयी बी है । प्रकृनत का मह ववधान
है कक जो प्रेभ ऩयभात्भा से कयना चाहे वह प्रेभ गन्दगी बये नाक से ककमा तो तम्हें धोखा
मभरना ही चाहहए। जो प्माय ईद्वय से कयना चाहहए वह अगय चभडे-यक्त-नसनाडडमों से, राय औय
थक से बये शयीय से ककमा, शयीय क बीतय फैठे ऩयभात्भा की ओय ननगाह नहीॊ गई तो उन
 ू                            े
शयीयों से द्ख, ददद , फेचनी, भसीफत, अशाॊनत, करह मभरना ही चाहहए। मह प्रकृनत का अकाट्म
                        ै
ननमभ है । जो बयोसा ऩयभेद्वय ऩय कयना चाहहए वह अगय फाहय की सत्ता ऩय ककमा तो गमे काभ
से। जो बयोसा ईद्वय ऩय कयना चाहहए वह बयोसा अगय ककसी ऩद ऩय, प्रनतद्षा ऩय, ककसी वस्त
मा व्मडक्त ऩय ककमा तो व्मडक्त, वस्त, ऩद-प्रनतद्षा खीॊच मरमे जामेंगे।
       ईद्वय क मसवाम का जो बी सहाया अॊत्कयण भें घस गमा है उस सहाये भें ववघ्न आता
              े
ही है । ववघ्न इसमरए आते हैं कक भौत क सभम मे सहाये छट जाएॉ उससे ऩहरे शाद्वत सहाये को
                                    े              ू
ऩाकय अभय हो जाओ।
       मशकभाय क वऩता भहर भें आमे, भाॉ आमी। ऩूछने रगे् "ऩत्र कहाॉ है ... फेटा कहाॉ है ?"
               े
       नतदककमाॉ, दामसमाॉ से यही हैं। ककसी ने हदखावे का योना यो मरमा तो भाॉ ने भोहमक्त योना
से मरमा। शोकभनन भाहौर फन गमा। अनचयों ने मशकभाय क ऩदचचन्हों का ऩीछा कयक ऩता
                                                े                     े
रगा मरमा कक मशकभाय फद्धववहाय भें ऩहॉ चा है । भाता-वऩता ऩत्र क ऩास गमे, सभझाने रगे कक्
                                                             े
       "हे ऩत्र ! इतना धन-वैबव, सख-सॊऩवत्त छोडकय तू मबऺक होकय इधय पकीयों क ऩास
                                                                          े
यहता है ? चर फेटा ! घर चर भेये राडरे !"
       फद्ध ने दे खा कक अबी-अबी इस मवक क चचत्त भें वैयानम क अॊकय ऩनऩे हैं। अबी इन
                                        े                  े
अॊकयों को सीॊचना चाहहए, न कक सॊसाय क ववषमों की तऩन दे कय जराना चाहहए। वे मशकभाय
                                    े
क भाता-वऩता से कहने रगे्
 े
       "हे श्रेवद्ष ! अबी इसक ऩण्म उहदत हए हैं इसमरए नद्वय छोडकय शाद्वत की ओय आमा
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है । अफ तम्हाये कहने से कपय सॊसाय क कीचड भें हाड-भाॊस चाटने-चॉथने भें अऩनी जजन्दगी
                                   े                          ू
फयफाद नहीॊ कये गा।" फद्ध ने मशकभाय क वैयानम को सहाया हदमा।
                                    े
       जो फोधवान ऩरुष हैं उनभें मह तेज होता है कक जजससे ववरासी औय ववकायी रोगों भें
ननववदकाय नायामण की ओय मात्रा कयने की रूचच हो जाम। कहीॊ कपसरते हों तो ऐसे भहाऩरुषों का
साजन्नध्म-सेवन कयें तो कपसराहट से फच जाएॉ। ऐसा हदव्म भहाऩरुषों का प्रबाव होता है ।
फद्ध ने कछ वचन मशकभाय को कहे औय भाता-वऩता को ऻान-वैयानम सभझामा। इतने भें
मशकभाय की फहन योती आमी्
         "बैमा ! तभ घय चरो...।''
         "बैमा तो घय चरे रेककन भत्म जफ आमगी तफ भत्म से बैमा को तू नहीॊ फचा ऩामेगी,
                                ृ               ृ
फहन !" अफ मशकभाय अऩने कटम्फीजनों को सभझाने रगा।
         "हे भाता-वऩता ! भौत भझे ऩकडकय शूकय-ककय फना दे गी तफ आऩ रोग भेया साथ नहीॊ
                                             ू
दे ऩाओगे। भौत आकय भझे शकय-ककय की मोनन भें धकर दे , वऺ-ऩाषाण फना दे उससे ऩहरे
                       ू   ू                े       ृ
भैं फद्ध क चयणों भें फैठकय ऩयभात्भा को ऩा रॉ । इसभें आऩ रोग भझे सहमोग दो।"
          े                                  ू
         कथा कहती है कक मशकभाय क दृढ़ ननद्ळम, फद्ध क शब सॊकल्ऩ औय सत्सॊग का प्रबाव
                                े                   े
उसक भाता-वऩता तथा बचगनी ऩय बी ऩडा। वे बी फद्ध क मशष्म फन गमे।
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         ककसी क चचत्त भें थोडा-सा बी वववेक-वैयानम आ जाम औय फोधवान भहाऩरुष का
               े
साजन्नध्म मभर जाम तो चगयाने वारे चाहे ककतने बी आ जाम कपय बी सॉबारनेवारे अकरे
                                                                          े
भहाऩरुष सॉबार रेते हैं। फद्ध ऩरुष क ऩक्क मशष्म को हजाय चगयाने वारे रोग बी चगया नहीॊ
                                   े    े
सकते। जफकक सत ् मशष्म हजायों का हाथ ऩकडकय उन्हें उफाय सकता है । मह दै वी गणों का
प्रबाव है ।
         जजसक चचत्त भें शवद्ध है उसकी फाहय बी शवद्ध स्वाबाववक यहने रगती है । जजसकी फाह्य
             े
शवद्ध होती है उसको आन्तय शवद्ध भें सहामता मभरती है । दै वी सम्ऩदावारे ऩरुष भें शायीरयक
शवद्ध औय अॊत्कयण की शवद्ध स्वाबाववक पयने रगती है ।
         कपय आता है अिोह।
         िोह से अऩना चचत्त जरता यहता है । कबी-कबी यजो, तभोगण क प्रबाव से चचत्त भें िोह
                                                              े
आ जाता है । जजनक जीवन भें सत्त्वगण है उनभें िोह नहीॊ होता।
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         दै वी सम्ऩदा का आणखयी गण है नानतभाननता। अनतभाननता का अथद है अऩने को श्रेद्ष
भानना। "भैं अनत श्रेद्ष हूॉ..... इन्होंने भझे भान हदमा रेककन कभ हदमा....' इस प्रकाय की अनत
भान की वासना है वह अहॊ काय की शूर बोंकती है । आदभी व्मथद भें फोणझरा जीवन जीता है ।
जजसक जीवन भें अनत भान का शूर नहीॊ है वह कई भसीफतों से अशाॊनत ऩैदा कयने वारे
    े
व्मवहाय से द्खद ऩरयजस्थनतमों क प्रादबादव से सहज ही फच जाता है ।
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         अनत भान चाहने वारा व्मडक्त थोडी-थोडी फात भें दोष-दशदन कयक अऩना चचत्त चमरत
                                                                  े
कयता यहता है । ऐसा आदभी न जाने ककतनी ही वथा भसीफतें भोर रेकय अऩने आऩको कोसता
                                         ृ
यहता है । जो अनत भान की वासना छोड दे ता है उसका जीवन सयर हो जाता है , सहज भें सखद
फन जाता है ।
         रोग थोडा-सा अच्छा काभ कयक कपय चाहते हैं कक हभाया सम्भान सभायोह हो जाम।
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सभायोह भें जफ सम्भान हदमा जाता है तफ मसकडकय ननयमबभान होने की चेद्शा कयते हए फोरता
तो है कक, "इसभें भेया कछ नहीॊ है .... सफ बगवान की कृऩा है .... भैं तो ननमभत्त भात्र हूॉ...'' आहद
आहद। रेककन ऐसा फोरकय बी अऩने को अच्छा कहराने की वासना है ।
       अच्छा कहराने का जो बीतय बूत फैठा है वह आदभी से फहत कछ फया कयवा रेता है ।
अच्छा काभ तो कये रेककन अच्छा कहराने का, अनत भान चाहने का जो दोष है उससे दै वी
सम्ऩदा क रोग स्वाबाववक ही फचते हैं। याजसी सम्ऩदा क रोग उऩदे श से फचते हैं औय ताभसी
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रोग उस दोष क मशकाय हो जाते हैं।
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       दे वों औय दानवों का मद्ध होता ही यहता था।
       एक फाय दानव रोग गमे ब्रह्माजी क ऩास औय ऩछा्
                                      े        ू
       "ब्रह्मन ् ! मह क्मा फात है कक बगवान जफ-जफ अवताय रेते हैं तफ-तफ दे वों का ही ऩऺ
रेते हैं? हभ रोगों क ऩास इतना फर होने क फावजूद बी हभ अशाॊत औय द्खी यहते हैं। दे वता
                    े                  े
फडे शाॊत, सखी यहते हैं औय ऩजे जाते हैं। हभको कोई ऩछता नहीॊ है । क्मा कायण है?"
                           ू                      ू
       ब्रह्माजी ने दे खा कक मे उऩदे श क अचधकायी नहीॊ है । इनको तो 'प्रेक्टीकर ऑऩये शन ्' की
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जरूयत है । उन्होंने दानवों से कहा् "दे वों औय दानवों का बोज-सभायोह यखेंगे, उसभें तभको
प्रमोगात्भक उऩदे श दॉ गा।"
                      ू
       ब्रह्माजी क वहाॉ बोज सभायोह यखा गमा। दानव बीतय ही बीतय सोचने रगे कक, 'ब्रह्माजी
                  े
तो दे वों को ऩहरे णखराएॉगे, फहढ़मा-फहढ़मा णखरामेंगे, हभको तो फाद भें दें गे कछ छोटा-भोटा
ऩदाथद।' कफ णखराएॉगे, क्मा णखराएॉगे, कस णखराएॉगे इसकी चचन्ता भें , सॊशम भें दानवों का चचत्त
                                     ै
उरझने रगा। दे वों क चचत्त भें शाॊनत थी। 'ब्रह्मदे व ने बोजन क मरए फरामा है , वऩताभह जो कछ
                   े                                         े
कयें गे हभाये बरे क मरए कयें गे।' वे फडे शाॊत थे।
                   े
       ब्रह्माजी ने घोषणा की कक ऩहरे दानवों को बोजन कयामा जामगा औय फाद भें दे वों को।
दोनों क मरए एक सभान ही बोज्म-ऩदाथद, ऩकवान-व्मॊजन आहद होंगे। दै त्मों को रगा कक वाह !
       े
वऩताभह तो वऩताभह ही हैं, फडे कृऩारू हैं।
       ऩहरे दानवों की ऩॊगत रगी। आभने साभने सफ दानवों को ऩॊडक्तमाॉ रगाकय बफठामा गमा।
ऩत्तर भें फहढ़मा-फहढ़मा बोजन ऩयोसा गमा। ककस्भ-ककस्भ क मभद्षान्न औय नभकीन ऩदाथद, कई
                                                     े
प्रकाय की सब्जी औय आचाय, ववमबन्न व्मॊजन औय ऩकवान। भधय खशफू उठ यही है ।
       ज्मों ही दानवों ने बोजन शरु ककमा कक तयन्त ब्रह्माजी क सॊकल्ऩ से सबी दानवों क हाथ
                                                            े                      े
की कोहननमों ने भडने से इन्काय कय हदमा। ऩत्तर से ग्रास उठामें तो सही रेककन हाथ को भोडे
बफना भॉह भें डारें कसे? हाथ को मसय से ऊऩय उठाकय भॉह को ऊचा कयक उसभें डारें तो आधा
                    ै                                   ॉ     े
ग्रास भॉह भें फाकी का आॉख भें ऊचा कयक उसभें डारें तो आधा ग्रास भॉह भें फाकी का आॉख भें
                               ॉ     े
ऩडे, इधय ऩडे उधय ऩडे। फडी भजश्कर से थोडा खामा थोडा चगयामा। आॉखें जरने रगीॊ, नाक भें
कछ कण जाने से छीॊक आने रगी। हाथ-ऩैय-ऩेट-कऩडे सफ जठे हो गमे। बोजन तो फहढ़मा था,
                                                 ू
चटऩटा था, भसारेदाय था, नभकीन था, भधय था, सन्दय था, सफ ककस्भ का था रेककन ब्रह्माजी
क सॊकल्ऩ क प्रबाव से हाथ कोहनी से न भडने से सफ गड गोफय हो गमा।
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       दानव आणखय अतद्ऱ होकय उठ गमे।
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       अफ दे वों की फायी आमी। उनको बी वही बोजन ऩयोसा गमा। उनक मरए बी ब्रह्माजी का
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वही सॊकल्ऩ था। उनकी कोहननमों ने बी भडने से इन्काय कय हदमा। रेककन दे वों क ऩास
                                                                         े
सत्त्वगण था। उनक चचत्त भें झट से सझाव आमा कक हाथ कोहनी से भडता नहीॊ तो कोई फात
                े
नहीॊ, ग्रास साभने वारे क भॉह भें डार दो। साभनेवारे ने बी इसक भॉह भें डार हदमा। आभने-
                        े                                   े
साभने वारे रोगों ने एक दसयों को णखराकय तद्ऱ कय हदमा। दानव तो दे खते ही यह गमे। अफ वे
                        ू               ृ
सोचने रगे कक हभ बी ऐसा कयते तो ? ऐसा कयते तो सही रेककन तभ असयों क ऩास ऐसी
                                                                 े
दै वी अक्र कहाॉ से आवे?
       अक्र तो सफ जगह चाहहए, ब्रह्मरोक भें बी अक्र चाहहए तो भत्मरोक भें बी अक्र
                                                             ृ
चाहहए, आश्रभ भें फैठने की बी अक्र चाहहए। घय भें उठने फैठने की बी अक्र चाहहए, खाने
औय फोरने की बी अक्र चाहहए। अक्र कभाने की बी अक्र चाहहए। इससे बी ज्मादा अक्र
भोऺ ऩाने क मरए चाहहए औय वह आती है दै वी गणों से। व्मडक्त भें जजतने-जजतने दै वी गण
          े
जस्थत होते हैं उतनी-उतनी अक्र ववकमसत होती है ।
       दै वी सम्ऩदा वारे ऩरुष से औय रोग फडे सन्तद्श यहते हैं। जजसभें दै वी सम्ऩदा आती है
उसका चचत्त दे व क सभीऩ यहता है । दे व भाने आत्भदे व। आत्भा सफको प्माया है । इसीमरए
                 े
आत्भऻानी सफको प्माया होता है । नायदजी आत्भवेत्ता थे। उनक वचन दे वता बी भानते थे औय
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दै त्म बी भानते थे। उनक वचन भनष्म तो भानते ही थे।
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       रोग अऩेऺा यखते हैं कक हभ चाहे जैसा फतादव कयें रेककन दसये रोग हभें भान दें । ऐसा
                                                            ू
नहीॊ हो सकता। जजसक जीवन भें अनतभान का दोष होता है वह अऩने सधयने की मा अऩभान
                  े
की फात नहीॊ सन सकता। कोई सनामे तो सपाई दे दे गा् भैं तो फडा ननदोष हूॉ। भझभें तो कवर
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गण ही गण हैं। अवगण का नाभोननशाॊ नहीॊ है ।
       जो गरती कयता है औय अऩनी गरती ढूॉढता नहीॊ मह तो गरती है रेककन कोई उसकी
गरती फताता है कपय बी स्वीकाय नहीॊ कयता वह ज्मादा गरती कयता है । कोई अऩन गरती
सनाए तो सनानेवारे को आदय से प्रणाभ कयना चाहहए।
       उत्तभ भनष्म अऩनी गरनतमाॉ ढूॉढने भें रगे यहते हैं, ऩयहहत भें रगे यहते हैं, ध्मान-बजन
भें रगे यहते हैं। रगे यहते हैं ऩयभात्भ-भस्ती भें , हरययस ऩीने औय वऩराने भें ।
       जीव अगय सजातीम प्रववत्त नहीॊ कये गा तो ववजातीम प्रववत्त होगी, सत्कभद नहीॊ कये गा तो
                          ृ                               ृ
दष्कभद होगा। ईद्वय क यास्ते नहीॊ चरेगा तो शैतान क यास्ते चरेगा।
                    े                            े
       अऩनी कोई गरती हदखामे तो उसका धन्मवाद दो, आदय सहहत उसका सत्काय कयो
ताकक हभाये चचत्त भें उसक मरए नपयत न यहे औय गरती हदखाने भें उसको सॊकोच न हो।
                        े
भीया को सधायने का जजसने ठे का रे यखा था उस उदा ने भीया को सभझामा-फझामा,
डाॉटा। भीया उसे प्रणाभ कयती।
        "ननद जी ! आऩ जो कहती हैं वह सफ ठीक है रेककन भेयी आदत ऩड गई है चगयधय
गोऩार क गीत गाने की। भैं क्मा करू?"
       े                        ॉ
        भीया जानती थी कक मह गरती नहीॊ है , वे रोग ही गरत हैं कपय बी भीया क चचत्त भें
                                                                          े
अनत भान का दोष नहीॊ था। अऩभान कयने वारों को बी भीया ने भान दे हदमा, बडक्त नहीॊ
छोडी।
        एक फाय याबत्र भें उदा को रगा कक भीया ककसी ऩयऩरुष से फात कय यही है । उदा बागती-
बागती अऩने बाई यतनमसॊह क ऩास आमी। कान का कच्चा, अक्र का कच्चा, भखद यतनमसॊह
                        े                                       ू
तरवाय रेकय बागा।
        'अफ भहर भें जी नहीॊ सकती। भहर भें ऩयऩरुष क साथ फात !'
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        यतनमसॊह ने भीया को फहत ऩीडा दी थी। उसक फाद याणा ववक्रभ आमा उसने बी भीया
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को त्रास दे ने भें कोई कसय नहीॊ यखी थी। भीया भें दे खो, ककतनी सहनशडक्त थी ! बडक्त भें
ककतनी दृढ़ता थी !
        रोग ऩजवाना तो चाहते हैं रेककन ऩजवाने से ऩहरे जो फमरदान दे ना ऩडता है उसक दय
                                                                                े ू
बागते हैं। भहान ् फनना चाहते हैं, ऩजवाना चाहते हैं, भक्त होना चाहते हैं, सदा सखी होना चाहते
हैं, ईद्वय क साथ एक होना चाहते हैं औय जया-से भान से, अऩभान से, भसीफत से, द्ख से,
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सॊघषद से, ववघ्न से, फाधा से ऩॉूछ दफाकय बागते कपयते हैं।
        उदा भीया ऩय न जाने ककतने-ककतने राॊछन रगाती थी रेककन भीया कबी मशकामत नहीॊ
कयती। यतनमसॊह ने भीया को गरत सभझकय कई फाय कछ का कछ सनामा होगा रेककन भीया
क चचत्त भें वही हरययस की भधयता फनी यही।
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        उदा की फात सनकय यतनमसॊह भध्मयाबत्र को तरवाय रेकय भीया क आवास भें घस गमा।
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आवेश भें घस तो गमा रेककन दे खा तो भीया फैठी है अऩने शाॊत बाव भें । भीया क भख भण्डर
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ऩय हदव्म आबा जगभगा यही है औय वह फोरे जा यही है कक्
       "प्रब ! भैं जैसी हूॉ, तम्हायी हूॉ। तभ हभाये हो। मह सॊसाय दे खने बय को है । महाॉ क सफ
                                                                                        े
सगे-सम्फन्धी कहने भात्र क हैं। तभ ही प्राणीभात्र क सच्चे सगे-सम्फन्धी हो।"
                             े                      े
        कपय भीया क रृदम से ऩरुष की आवाज भें श्रीकृष्ण फोरे्
                  े
        "तू चचन्ता भत कय। इस सॊसाय भें आसडक्त न हो इसमरए द्ख, ददद औय ऩीडा भेये बक्तों
को दे ता हूॉ ताकक वे कहीॊ सॊसाय भें चचऩक न जाएॉ, कहीॊ पस न जाएॉ। उन्हें भसीफतों क फीच
                                                       ॉ                         े
यखकय ऩरयऩक्व कयता हूॉ।"
यतनमसॊह चककत हो गमा कक भीया ही फोरती है औय भीया ही सनती है । कोई ऩयऩरुष
वहीॊ नहीॊ है । भीया   क शीतर दै वी तेज भें यतनमसॊह का रूख फदर गमा। उसकी आॉखों से
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ऩद्ळाताऩ क आॉसू फहे । वह भीया से फडा प्रबाववत हआ।
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        फाहय उदा इन्तजाय कय यही थी कक अफ कछ घटना घटे गी रेककन वह दे खती यह गमी
कक तरवाय क प्रहाय से भीया की चीख ननकरनी चाहहए, बम से भीया का आतदनाद ननकरना
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चाहहए जफकक वहाॉ तो सन्नाटा है ! यतनमसॊह खरी तरवाय क साथ भीया क ऩास गमा है , क्मा
                                                   े          े
ऩता क्मा कय यहा है ?
        इतने भें यतनमसॊह फाहय आमा। आॉखों भें आॉसू हैं, भख ऩय कोभर बाव उबय आमा है ,
रृदम भें ऩद्ळाताऩ है । तरवाय नीचे ऩटक दी औय भीया क प्रनत अहोबाव क वचन फोरने रगा्
                                                  े              े
        "भीया को हभ ऩहचानते नहीॊ। वहाॉ कोई ऩयऩरुष नहीॊ था। वह तो बगवान से वातादराऩ
कय यही थी....।"
        उदा उफर ऩडी् "क्मा जाद ू भाय हदमा उस याॊड ने तेये ऩय?"
        एक स्त्री दसयी स्त्री से स्वाबाववक ही ईष्माद कयती है । चाय जस्त्रमाॉ इकट्ठी होगी तो साये गाॉव
                   ू
की ननन्दा-कथरी भें रग जाएगी।
           ू
        फडफडाते हए उदा कभये भें गई तो भीया का वही स्थान वही साजत्त्वक हदव्म शाॊत तेज....
उदा दे खकय दॊ ग यह गई। भीया क भखभण्डर की शाॊत प्रसन्न आबा.... आॉखों से अश्रऩात... वह
                             े                                             ू
अश्रऩात सख का बी नहीॊ था द्ख का बी नहीॊ था। वह था बडक्त क यस का। एकटक भीया को
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ननहायते-ननहायते उदा की आॉख ऩववत्र हो गई। ऩववत्र आॉख हदर को बी ऩववत्र कय दे ती है ।
        ऻानेजन्िमों भें दो इजन्िमाॉ फडी सूक्ष्भ औय सॊवेदनशीर हैं। चचत्त ऩय उनका प्रबाव फहत
गहया ऩडता है । एक है नेत्र औय दसयी है जजह्वा। जजसकी जजह्वा औय आॉख ननमजन्त्रत है वह
                               ू
जल्दी उन्नत हो सकता है । दशदन औय वचन क द्राया आदभी जल्दी उन्नत होता है ।
                                      े
        भीया जो फोरे जा यही थी वे वचन उदा क कान भें ऩडते थे। भीया को सनते-सनते औय
                                           े
दे खते-दे खते उदा का चचत्त ऊध्वदगाभी होने रगा। जो यतनमसॊह ने कहा वही उदा ने बी कहा्
        "भीया ! सचभच हभ रोग तझे नहीॊ जानते। हभने तभको इतना-इतना सतामा रेककन
तभने कबी मशकामत नहीॊ की। आज बी भैंने अऩने बाई को फहकाकय बेजा कक तू ककसी ऩयऩरुष
से फात कय यही है रेककन तू तो ऩरुषोत्तभ से फात कय यही थी। मह भझे ऩता नहीॊ था। तेये ऩास
भैं ऺभामाचना करू इतनी भझभें मोनमता नहीॊ है रेककन तेयी उदायता दे खकय मह ऩाऩी उदा तेये
               ॉ
ऩैय ऩकडती है ....।"
        भीया क चयणों भें ननद उदा मरऩट यही है । भीया ने मह नहीॊ कहा कक, 'चर चर याॊड !
              े
तूने भझको इतना सतामा.... बगवान तेया सत्मानाश कये ।' नहीॊ नहीॊ। भीया ने उदा को दोनों
हाथों से उठाकय गरे रगा मरमा।
"कोई फात नहीॊ फहन जी ! अगय तभ इतना नहीॊ कयती तो शामद भैं कहीॊ सॊसाय भें
बटक जाती। बगवान क प्मायों ऩय तो कद्श आने ही चाहहए। कद्शभम औय भसीफत वारे सॊसाय से
                 े
सदा क मरए ननकरने क मरए बगवान क प्मायों ऩय कद्श औय भसीफत आनी ही चाहहए। भझे
     े            े           े
भसीफत दे ने भें तभने बी ककतनी भसीफत सही ! तभने अऩना चचत्त ककतना भमरन ककमा !
इसमरए हे उदा ! तभ भझे भाप कयो। भेयी बडक्त फढ़ाने क मरए तम्हाये अॊत्कयण को भमरन
                                                  े
होना ऩडा। भेयी साधना फढ़ाने क मरए तम्हें भेया ववयोध कयना ऩडा।"
                             े
       "अये बाबी ! तम्हायी साधना फढ़ाने क मरए नहीॊ, साधना मभटाने क मरए सफ ककमा,
                                         े                        े
भझे ऺभा कयो।" उदा यो ऩडी।
       भीया फोरी् "नहीॊ, मभटाने का बाव से बी उस प्माये ने तो भेयी बडक्त फढ़ा दी। तम्हाया
इसभें उऩमोग हआ।"
       उदा कहती है 'तभ भझे ऺभा कयो' औय भीया कहती है 'तभ भझे भाप कयो।' दै वी
सम्ऩदा भें ककतना तेज है ! ककतनी सभझ है ! ककतना स्नेह है ! ककतनी उदायता है !
       अरौककक, हदव्म, साजत्त्वक, शाॊत तेज क आगे आसयी तेजवारा ववयोधी बी रूऩाॊतरयत हो
                                           े
जाता है ।
       जीवन भें कछ इकट्ठा कयना हो तो दै वी सम्ऩदा को इकट्ठा कयो, आत्भऻान क ववचायों को
                                                                          े
इकट्ठा कयो, भोऺ क ववचायों को इकट्ठा कयो।
                 े
       नायामण.... नायामण.... नायामण..... नायामण..... नायामण......।
                                            अनक्रभ
                              ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


                         जीवन-ववकास औय प्राणोऩासना
       भनष्म क जीवन भें ववकास का क्रभ होता है । ववकास उसको फोरते हैं जो स्वतन्त्रता दे ।
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ववनाश उसको फोरते हैं जो ऩयाधीनता की ओय रे जाम।
       'स्व' क तॊत्र होना ववकास है । 'स्व' आत्भा है , ऩयभात्भा है । अऩने ऩयभात्भ-स्वबाव भें
              े
आना, हटकना, आत्भ-साऺात्काय क भागद ऩय चरना मह ववकास है औय इस भागद से दय यहना
                            े                                        ू
मह ववनाश है ।
       ववकास भें तीन सोऩान हैं। एक होता है कभद का सोऩान। अॊत्कयण अशद्ध होता है ,
भमरन होता है तो आदभी ऩाऩकभद की ओय जाता है , बोग, आरस्म, तॊिा आहद की ओय जाता
है । ऐसे रोग तभोगण प्रधान होने से भत्म क फाद वऺ, बॊड, शकय, ककय आहद अधभ मोननमों
                                   ृ    े     ृ    ू   ू    ू
भें जाते हैं.... ववनाश की ओय जाते हैं।
यजोगण की प्रधानता हो तो चचत्त भें ववऺेऩ होता है । ववऺेऩ से आदभी छोटी-छोटी फातों
भें द्खी हो जाता है ।
                                दननमावारे ने दननमा ऐसी फनामी है ।
                              हजायों खमशमाॉ होते हए आखरय रूराई है ।।
       ककतनी बी खमशमाॉ बोगो रेककन आणखय क्मा? खशी भन को होती है । जफ तक तन औय
भन से ऩाय नहीॊ गमे तफ तक खशी औय गभ ऩीछा नहीॊ छोडेंगे।
       अॊत्कयण की भमरनता मभटाने क मरए ननष्काभ कभद है । ननष्काभ कभद से अॊत्कयण
                                 े
शद्ध होता है । उऩासना से चचत्त का ववऺेऩ दय होता है । ऻान से अऻान दय होता है । कपय आदभी
                                         ू                        ू
ववकास की ऩयाकाद्षा ऩय ऩहॉ चता है ।
       हभाया शयीय जफ बायी होता है तफ वात औय कप का प्रबाव होता है । हभ जफ उऩासना
आहद कयते हैं तफ शयीय भें बायीऩन कभ होने रगता है । आरस्म, प्रभाद, ववऺेऩ आहद कभ होने
रगते हैं।
       वऩत्त की प्रधानता से तन भें स्पनतद आती है । भन, प्राण औय शयीय इन तीनों की आऩस
                                      ू
भें एकतानता है । प्राण चॊचर होता है तो भन चॊचर फनता है । भन चॊचर होता है तो तन बी
चॊचर यहता है । तन चॊचर फनने से भन औय प्राण बी चॊचर हो जाते हैं। इन तीनों भें से एक
बी गडफड होती है तो तीनों भें गडफड हो जाती है ।
       फच्चे क प्राण 'रयधभ' से चरते हैं। उसभें कोई आकाॊऺा, वासना, कोई प्रोब्रेभ, कोई
              े
टे न्शन नहीॊ है । इसमरए फच्चा खशहार यहता है । जफ फडा होता है , इच्छा वासना ऩनऩती है तो
अशाॊत सा हो जाता है ।
       अफ हभें कयना क्मा है ? प्राणामाभ आहद से अथवा प्राण को ननहायने क अभ्मास आहद
                                                                      े
साधनों से अऩने शयीय भें ववद्यत तत्त्व फढ़ाना है ताकक शयीय ननयोग यहे । प्राणों को तारफद्ध कयने
से भन एकाग्र फनता है । एकाग्र भन सभाचध का प्रसाद ऩाता है । ऩयाने जभाने भें अस्सी अस्सी
हजाय वषद तक सभाचध भें यहने वारे रोग थे ऐसा शास्त्रों भें ऩामा जाता है । रेककन 80 हजाय वषद
कोई नीॊद भें नहीॊ सो सकता। फहत-फहत तो कबकणद जैसा कोई ऩाभय हो, तऩद्ळमाद कयक नीॊद
                                       ॊ                                  े
का वयदान रे तो बी छ् भहीना ही सो सकता है । अस्सी हजाय सार तो क्मा 80 सार तक बी
कोई सो नहीॊ सकता।
       नीॊद तभोगण है । सभाचध सत्त्वगण की प्रधानता है ।
       सयोवय क ऊऩयी सतह ऩय कोई बफना हाथ ऩैय हहरामे ठीक अवस्था भें रेट जाम तो
              े
घण्टों बय तैय सकता है । रेककन ऩानी क तरे घण्टों बय यहना आसान नहीॊ है । अथादत ् नीचे
                                    े
यहना आसान नहीॊ है औय ऊऩय यहना सहज है । सभाचध भें औय सख भें आदभी वषों बय यह
सकता है । रेककन ववऺेऩ औय द्ख भें आदभी घडी बय बी यहना चाहता नहीॊ। अत् भानना
ऩडेगा कक द्ख, भसीफत औय ववऺेऩ तम्हाये अनकर नहीॊ है , तम्हाये स्वबाव भें नहीॊ है ।
                                        ू
भॉह भें दाॉत होना स्वाबाववक है । रेककन योटी सब्जी खाते-खाते कोई नतनका दाॉतों भें पस
                                                                                         ॉ
जाता है तो फाय फाय जजह्वा वहाॉ जाती है । जफ तक वह ननकर नहीॊ जाता तफ तक वह चैन नहीॊ
रेती क्मोंकक नतनका भॉह भें यहना स्वाबाववक नहीॊ है । उसको ननकारने क मरए रकडी की,
                                                                  े
प्राजस्टक की, वऩत्तर की, ताॉफे की, चाॉदी की, न जाने ककतनी ककतनी सराइमाॉ फनाई जाती हैं।
भॉह भें इतने ऩत्थय (दाॉत) ऩडे हैं उसकी मशकामत नहीॊ होती जफकक एक छोटा सा नतनका बी
असह्य फन जाता है । ....तो भॉह भें दाॉत होना स्वाबाववक है जफकक नतनका आहद होना
अस्वाबाववक है ।
       ऐसे ही सख हभाया स्वबाव है । ववऺेऩ औय द्ख हभाया स्वबाव नहीॊ है । इसमरए कोई
द्ख नहीॊ चाहता, कोई ववऺेऩ नहीॊ चाहता। कपय बी दननमावारे ने दननमा ऐसी फनामी है कक
तम्हें द्ख औय ववऺेऩ ननकारने का तयीका मभर जाम औय तभ स्वतॊत्र हो जाओ। 'स्व' क 'तॊत्र'।
                                                                           े
'स्व' कवर एक आत्भा है ।
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       अस्सी हजाय वषद की सभाचध रग सकती है रेककन नीॊद उतनी नहीॊ आस सकती। भन
औय प्राण को थोडा ननमॊबत्रत कयें तो हभ सभाचध क जगत भें प्रवेश कय सकते हैं।
                                             े
       जजन रोगों को ववचाय सभाचध प्राद्ऱ हई है , ऻानभागद भें प्रवेश मभरता है उन रोगों का
भन सहज भें आत्भववचाय भें यहता है तो जो आनन्द मभरता है , प्रसन्नता मभरती है उससे नीॊद
की भात्रा थोडी कभ हो जाम तो उनको ऩयवाह नहीॊ होती। डेढ़ दो घण्टा बी सो रें तो शयीय के
आयाभ की आवश्मकता ऩूयी हो जाती है । सभाचध का, ध्मान का, आत्भववचाय का जो सख है वह
नीॊद की कभी ऩूयी कय दे ता है । कोई अगय आठ घण्टे सभाचध भें फैठने का अभ्मास कय रे तो
वह सोरह घण्टे जाग्रत यह सकता है । उसको नीॊद की बफल्कर जरूयत नहीॊ ऩडेगी।

       हभ जो खाते ऩीते हैं वह कौन खाता ऩीता है ? गरती से हभ भन रेते हैं कक हभ खाते
ऩीते हैं। जड गमे प्राण से, भन से, शयीय से। वास्तव भें बख औय प्मास प्राणों को रगती है ।
                                                       ू
सख-द्ख भन को होता है । याग-द्रे ष फवद्ध को होता है । प्राण, भन, फवद्ध शयीय आहद सफ साधन
हैं। हभें ऻान नहीॊ है इसमरए साधन को भैं भानते हैं औय अऩने साध्म तत्त्व से वऩछडे यहते हैं।
                          बफछडे हैं जो प्माय से दय-फ-दय बटकते कपयते हैं।
       कबी ककसी की कख भें तो कबी ककसी की कख भें । कबी ककसी वऩता की इजन्िम से
                    ू                     ू
ऩटक जाते हैं तो कबी ककसी भाता से गबद भें रटक जाते हैं। वह भाता चाहे चाय ऩैयवारो, ऩाॉच
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ऩच्चीस ऩैय वारी हो, सौ ऩैय वारी हो मा दो ऩैय वारी हो, इससे कोई पक नहीॊ ऩडता। हय मोनन
                                                                 द
भें भसीफत तो सहनी ही ऩडती है ।
                                 तन धरयमा कोई न सणखमा दे खा।
                                    जो दे खा सो दणखमा ये....।।
इस प्रकाय ववचाय कयक जो साधक अऩना सहज स्वातॊ्म ऩाना चाहते हैं , 'स्व' क तॊत्र
                               े                                                  े
होना चाहते हैं उन रोगों क मरए आध्माजत्भक भागद सवदस्व है ।
                         े
            हभाया प्राण ननमॊबत्रत होगा तो शयीय भें ववद्यतशडक्त फनी यहे गी। शयीय ननयोग यहे गा, भन
एकाग्र फनेगा, फवद्ध का ववकास होगा। अगय भन को एकाग्र कयोगे तो प्राण ननमॊबत्रत यहें गे।
            सभाचध भें आॊतरयक सख से भन का सभाधान हो जाम तो फाहय क सख की माचना नहीॊ
                                                                े
यहती। आकषदण बी नहीॊ यहता। द्ख नहीॊ होता औय मभरने ऩय कोई फन्धन नहीॊ होता। द्ख का
भर है वासना औय वासना होती है सख ऩाने क मरए। वास्तव भें सख हभाया स्वबाव है । द्ख
 ू                                    े
हभाया स्वबाव नहीॊ है । भॉह       भें दाॉत यहना स्वबाव है , नतनका यहना स्वबाव नहीॊ है । सयोवय की
सतह ऩय घण्टों बय तैयना सॊबव है रेककन सयोवय क तरे भें दीघदकार तक यहना सॊबव नहीॊ है ।
                                            े
ऐसे ही द्ख नीचाई है । हभ कबी उसे ऩसन्द नहीॊ कयते रेककन वासना क कायण चगयते हैं , द्ख
                                                              े
ऩाते हैं।
            अफ हभें क्मा कयना चाहहए? प्राणों को, भन को औय शयीय को एकतान यखना चाहहए।
            जफ तभ जऩ कयो तफ कोई एक आसन ऩसन्द कय रो सखासन, मसद्धासन, ऩद्मासन
आहद। ककसी एक आसन भें फैठकय ही जऩ कयो। जजतना हो सक, जऩ कयते सभम इधय उधय
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झाॉक नहीॊ। दृवद्श नासाग्र यखें , द्वास ऩय यखें मा गरु गोववन्द क चचत्र ऩय यखें। तन एकाग्र होगा
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तो भन बी एकाग्र होगा। भन एकाग्र होगा तो स्थर प्राण को सूक्ष्भ कयने क मरए कण्डमरनी
                                           ू                        े
शडक्त जागत होगी। कपय शयीय रयधभ से हहरेगा। शयीय भें कहीॊ वात-वऩत्त-कप क दोष होंगे तो
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उन्हें शद्ध कयने क मरए बीतय से धक्का रगेगा प्राणों को तो अऩने आऩ मथा मोनम आसन होने
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रगें गे, तेजी से प्राणामाभ होने रगेगा। प्रायम्ब भें प्रनतहदन आठ-दस प्राणामाभ कयने का ननमभ
तो रे रें ककन्त जफ प्राणोत्थान होगा तो प्राणामाभ औय ववमबन्न आसन अऩने आऩ होने रगें गे।
सभथद सदगरु जफ सॊप्रेऺण शडक्त से भॊत्रदीऺा दे ते हैं तफ साथ ही साथ, सॊकल्ऩ क द्राया साधक
                                                                           े
क चचत्त भें फीज फो दे ते हैं। साधक अहोबाव से साधन-बजन भें रगा यहता है तो वह फीज शीघ्र
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ही ऩनऩ उठता है । साधक तीव्र गनत से साधना भें आगे फढ़ने रगता है । भहाभामा कण्डमरनी
शडक्त उसकी साधना की डोय सॉबार रेती है ।
            प्रायॊ ब भें इस फात का ऩता नहीॊ चरता कक ककतना फहढ़मा फीज हभाये चचत्त भें फोमा गमा
है । जैसे, ककसान खेत भें फोआई कयता है तफ दे खनेवारा जान नहीॊ सकता कक जभीन भें फीज
ऩडे हैं कक नहीॊ। रेककन ककसान जानता है । जफ खेत की मसॊचाई होती है औय फीज अॊकरयत
होकय ऩनऩ उठते हैं, छोटी-छोटी ऩवत्तमाॉ ननकर आती हैं , साया खेत रहरहा उठता है तफ याहदाही
बी जान सकते हैं कक ककसान ने फीज फोमे थे।
            ऐसे ही भॊत्रदीऺा क सभम साधक को जो मभरता है वह सफको ऻान नहीॊ होता। जफ
                              े
साधक साधना भें रगा यहता है तो सभम ऩाकय वह फीज कहो, गरुदे व का सॊकल्ऩ कहो,
आशीवादद कहो, शडक्तऩात कहो, चाहे जो कछ कहो, वह ऩनऩता है ।
भाॉ क उदय भें जफ गबादधान होता है , फच्चा आ जाता है उस सभम नहीॊ हदखता। कछ
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भहीने क फाद भाॉ को भहसूस होता है औय उसक फाद दय क रोगों को बी भहसूस होता है कक
       े                               े     ू े
मह भहहरा भाॉ होने वारी है ।
        साधक को जफ दीऺा मभरती है तफ उसका नवजन्भ होता है ।
        दीऺा का भतरफ इस प्रकाय है ् दी = दीमते, जो हदमा जाम। ऺा = जो ऩचामा जाम।
        दे ने मोनम तो सचभच कवर आध्माजत्भक प्रसाद है । फाकी की कोई बी चीज दी जाम, वह
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कफ तक यहे गी?
        जो ईद्वयीम प्रसाद दे ने की मोनमता यखते हैं वे गरु हैं। जो ऩचाने की मोनमता यखता है
वह साधक है , मशष्म है । दे ने वारे का अनग्रह औय ऩचाने वारे की श्रद्धा, इन दोनों का जफ भेर
होता है तफ 'दीऺा' की घटना घटती है ।
        दीऺा तीन प्रकाय की होती है ् शाॊबवी दीऺा, जो ननगाहों से दी जाती है । स्ऩशद दीऺा, जैसे
शकदे वजी ने ऩयीक्षऺत क मसय ऩय हाथ यखकय दी थी। तीसयी है भाॊबत्रक दीऺा। गरु-गोववन्द का,
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बगवान का कोई नाभ दे दे ना।
        भाॊबत्रक दीऺा भें भॊत्र दे ने वारे का चचत्त जैसी ऊचाई ऩय होता है वैसा उस भॊत्र का प्रबाव
                                                          ॉ
ऩडता है । कोई बाडबॉूजा तम्हें कह दे कक 'याभ याभ जऩो, कल्माण हो जामगा....' तो इतना गहया
कल्माण नहीॊ होगा जजतना कोई ब्रह्मवेत्ता सत्ऩरुष याभ भॊत्र दें औय कल्माण हो जाम। याभानॊद
स्वाभी ने ऐसे ही 'याभ.... याभ' उच्चायण ककमा औय कफीय जी ने गहयी श्रद्धा से ऩकड मरमा कक
गरुदे व क श्रीभख से भॊत्र मभर गमा है , तो कफीय जी उस भॊत्र से मसद्ध हो गमे। भॊत्र तो वही है
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रेककन भॊत्र दे ने वारे की भहहभा है । कोई चऩयासी कछ कह दे तो उसकी अऩनी कीभत है औय
प्रधान भॊत्री वही फात कह दे तो प्रबाव कछ औय ही ऩडेगा।
        आध्माजत्भकता भें जो उन्नत हैं उनक द्राया भॊत्र मभरता है औय साभने वारा श्रद्धा से
                                         े
साधना कयता है तो भॊत्र उसको ताय दे ता है । भॊत्र का अथद ही है ् भननात ् त्रामते इनत भॊत्र्।
जजसका भनन कयने से जो त्राण कये , यऺा कये वह है भॊत्र। अॊतय भें भनन कयने से भॊत्र भन को
ताय दे ता है ।
        भाॊबत्रक दीऺा भें जजतने शब्द कभ होते हैं औय भॊत्रोच्चायण जजतना तारफद्ध होता है उतनी
साधक को सववधा यहती है , वह जल्दी से आगे फढ़ता है ।

        भाॊबत्रक दीऺा भें अगय कोई सॊप्रदाम चराना है , कोई भजहफ ऩकड यखना है तो उसभें
ख्मार यखा जामगा कक भॊत्र दसयों से कछ ववरऺण हो। ऐसे भजहफ-सॊप्रदामों भें साधक की
                          ू
उन्ननत भख्म नहीॊ है , सॊप्रदाम का गठन भख्म है । सॊप्रदाम का गठन कयने वारे जो बी सॊप्रदाम
क आचामद हैं उनको उनका कामद भफायक हो। नायदजी ऐसे साॊप्रदानमक सॊत नहीॊ थे। नायदजी क
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मरए साभने वारे की उन्ननत भख्म थी। साभने वारे क जीवन की उन्ननत जजनकी दृवद्श भें भख्म
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होती है वे रोक सॊत होते हैं। नायद जी ने वामरमा रटे या को भॊत्र हदमा 'या....भ'। 'या' रम्फा औय
'भ' छोटा। वामरमा भूराधाय कन्ि, स्वाचधद्षान कन्ि भें जीने वारा आदभी है । उन कन्िों भें इस
                          े                 े                               े
भॊत्र क आन्दोरन ऩडेंगे तो धीये -धीये वह अनाहत कन्ि भें , रृदम कन्ि भें ऩहॉ चगा ऐसा सभझकय
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नायदजी ने भाॊबत्रक दीऺा दे ते सभम शाॊबवी दीऺा का बी दान कय हदमा, ननगाहों से उसक अॊतय
                                                                               े
भें अऩने ककयण डार हदमे। वामरमा रटे या रग गमा भॊत्र जाऩ भें । 'भया... भया.... भया...भया...'
तारफद्ध भॊत्र जऩते-जऩते उसकी सषद्ऱ कण्डमरनी शडक्त जाग्रत हई औय वामरमा रटे या आगे
जाकय वाल्भीकक ऋवष फन गमा।
        भॊत्रदीऺा दे ने वारे भहाऩरुष औय रेने वारा साधक दोनों फहढ़मा होते हैं तो साधना औय
मसवद्ध बी फहढ़मा हो जाती है । कबी-कबी ऐसा बी हो सकता है कक भॊत्रदीऺा रेने वारे की अत्मॊत
श्रद्धा है , साधना भें अत्मॊत रगन है , ननमभफद्ध अभ्मास है तो दे ने वारा कोई साधायण व्मडक्त बी
हो कपय बी रेने वारा आगे ननकर सकता है । अचधक राब तो तफ होता है जफ दे ने वारा बी
खफ ऊचे हों औय रेने वारा बी अडडग हो। ऐसे भौक ऩय कामद अचधक सन्दय औय सहावना होता
 ू  ॉ                                      े
है ।
        साधक अगय आसन, प्राणामाभ आहद ननमभ से कयता यहे तो उसका तन ननयोगी यहे गा,
प्राण थोडे ननमॊबत्रत यहें गे। प्राणामाभ कयने से प्राणों भें तारफद्धता आती है । हभाये प्राण तारफद्ध
नहीॊ हैं इसमरए छोटी-छोटी फातों भें हभाया भन चॊचर हो जाता है । साधायण रोग औय मोचगमों
भें इसी फात का पक है । मोगी फडी-फडी आऩवत्तमों भें इतने ववक्षऺद्ऱ नहीॊ होते क्मोंकक उन्होंने
                 द
प्राणामाभ आहद कयक भन औय प्राण को तारफद्ध ककमा हआ होता है । उनभें सफ ऩचा रेने की
                 े
शडक्त होती है ।
        ऩहरे सभम भें रकडे क ऩर होते थे। सेना की कोई फटामरमन जफ कच कयती है तफ
                           े                                    ू
एक... दो.... एक..... दो, इस प्रकाय तारफद्ध कदभ मभराकय चरती है । उस सभम भें जफ रकडे
क ऩर ऩय से सेना गजयती तफ कप्टन सेना को आऻा दे ता कक तार तोडो। तारफद्ध कदभ ऩडने
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से ताकत ऩैदा होती है औय उससे रकडे का ऩर टूट सकता है ।
        तारफद्धता भें शडक्त है । कोई बफना तार क गीत गामे तो भजा नहीॊ आएगा। साधनों क
                                               े                                   े
साथ स्वय मभराकय गामा जाम तो ऩूयी सबा डोरामभान हो सकती है । सॊगीत क साधन सफक
                                                                  े        े
स्वय मभराने भें सहमोग दे ते हैं।
        तारफद्धता भें एक प्रकाय का सख औय साभर्थमद छऩा है । हभाये प्राण अगय तारफद्ध चरने
रग जामें तो सूक्ष्भ फनेंगे। द्वास तारफद्ध होगा तो दोष अऩने आऩ दय हो जामॉगे। द्वास सक्ष्भ
                                                               ू                   ू
औय तारफद्ध नहीॊ है इसमरए काभ सताता है । द्वास तारफद्ध नहीॊ है इसमरए क्रोध प्रबाव डार
दे ता है । योग, शोक, भोह आहद सफ प्राणों की तारफद्धता क अबाव भें होते हैं। प्रनतहदन अगय
                                                      े
थोडा सभम बी द्वास मा प्राणों की तारफद्धता क मरए ननकारें तो फहत-फहत राब होगा।
                                           े
भानो, हभें क्रोध आ यहा है । उस सभम जाॉचो तो ऩता चरेगा कक द्वास का तार ववशेष
ववकृत होगा। उस सभम क्मा कयना चाहहए? अऩने द्वास को दे खो, सावधान होकय ननहायो प्राण
की गनत को। क्रोध ऩय ननमॊत्रण आ जाएगा।
      हभ कबी चचन्ता भें हैं। चचत्त भें कछ फोझा है । तो क्मा कयें ? शद्ध हवा भें भॉह क द्राया
                                                                                     े
रम्फे-रम्फे द्वास रो। नथनों से फाहय ननकारो। कपय भॉह से रम्फे द्वास रो औय नथनों से
ननकारो। इस प्रकाय दस फायह फाय कयो। तम्हायी उदासी भें , चचन्ता भें जरूय ऩरयवतदन आ
जामगा।
      भान रो, ककसी क चचत्त भें कोई ऩयानी गन्दी आदत है । कई मवकों को हस्तभैथन की
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आदत होती है । ऩाऩ की ऩयाकाद्षा है वह। ऐसी आदतवारे मवक को अगय फदरना है तो उसको
प्राणामाभ मसखामा जाम।
      हस्तभैथन जैसी बद्दी आदतवारा मवक यात को सोता है औय सफह को जफ उठता है तफ
उसका चेहया दे खकय   ऩता चरता है कक वह यात को अऩनी ऊजाद का सत्मानाश कयता है ।
भनष्म बीतय द्खी होता है तो औय द्ख का साभान इकट्ठा कयता है । सत्सॊग नहीॊ मभरता है ,
साधन-बजन ननममभत नहीॊ होता है , बीतय का थोडा-फहत यस नहीॊ आता। तफ आदभी काभचेद्शा
मा औय ऩाऩ कभद कयता है ।
      ऐसे रोगों को बी भोडना है , आगे फढ़ाना है तो उन्हें प्राणामाण मसखामा जाम। उनके
प्राणों भें थोडी सूक्ष्भता रामी जाम। वे फदर जाएॉगे। उनक जीवन भें भानो जाद ू हो जाएगा।
                                                       े
      इजन्िमों का स्वाभी भन है औय भन का स्वाभी प्राण है । मोचगमों का कहना है कक अगय
प्राण का ऩया प्रबत्व आ जाम तो चॊदा औय सूयज को गें द की तयह अऩनी इच्छा क भताबफक
          ू                                                            े
चरा सकते हो। सती शाजण्डरी ने सूयज को योका था। नऺत्रों को अऩनी जगह से तभ हहरा
सकते हो, अगय प्राणशडक्त को अत्मॊत सूक्ष्भ कय रो तो।
      जजसने कवरी कबक की साधना कय री है उसक आगे सॊसायी रोग अऩनी शब काभना
             े    ॊ                       े
की भनौती भाने तो उनक कामद होने रगते हैं। प्राणामाभ का ऊचा पर जजसने ऩामा है , प्राणों ऩय
                    े                                  ॉ
ननमॊत्रण ऩाकय जजसने भन को जीत मरमा है उसने सफ कछ जीत मरमा है । जजसने भन को
जीत मरमा उसने प्राण को जीत मरमा।
      कबी अऩने को हताश औय ननयाश न कयो, क्मोंकक तभ प्राण रेते हो औय भन बी तम्हाये
ऩास है । थोडा-फहत साधना का भागद बी तम्हाये ऩास है । ऐसी फात सभझने की थोडी फहत श्रद्धा,
बडक्त औय फवद्ध बी बगवान ने दी है । अत् घफडाना नहीॊ चाहहए। कसी बी कभजोयी हो, ऩहरे
                                                           ै
का कसा बी ऩरामनवाद घसा हो कपय बी उत्साहऩूवक ननद्ळम कयो कक्
    ै                                     द
      "भैं सफ कछ कय सकता हूॉ। ईद्वय का अनन्त फर भझभें सषद्ऱ ऩडा है । भैं उसे
जगाऊगा।"
    ॉ
भन औय प्राण प्रकृनत क हैं। प्रकृनत ऩयभात्भा की है । भन औय प्राण का उऩमोग तो कयो,
                            े
कपय भन औय प्राण बी ऩयभात्भा को अऩदण कय दो। प्राणामाभ आहद कयो, भन को एकाग्र कयो,
अऩने ननमॊत्रण राओ, कपय ऐसा चचन्तन कयो कक 'इन सफ को दे खने वारा भैं साऺी, चैतन्म
आत्भा हूॉ।' ऐसा चचन्तन ककमा तो भन औय प्राण ईद्वय को अवऩदत हो गमे। मह हो गमा बडक्त
मोग। इससे बाव की शवद्ध होगी औय फवद्ध ऩयभात्भा भें प्रनतवद्षत होगी।
       जो कभदकाण्ड का अचधकायी है उसको कभदकाण्ड भें रूचच फढ़े ऐसे रोगों का ही सॊग कयना
चाहहए। जो उऩासना का अचधकायी है , उसको उऩासना भें दृढ़ता यहे , उऩासना भें प्रीनत फढ़े ऐसे
वातावयण भें औय ऐसे सॊग भें यहना चाहहए। उऩासना कयने वारा अगय ववचाय कये गा, फवद्ध का
उऩमोग कये गा तो उऩासना से च्मत हो जामगा। उऩासना का भागद मह है कक तभ श्रद्धा से उन्नत
हो जाओ। जैस, है तो शामरग्राभ रेककन आहद नायामण हैं। है तो मशवमरॊग रेककन करासऩनत
           े                                                            ै
बगवान शॊकय हैं। करासऩनत भानकय उऩासना कयते हैं तो ठीक है रेककन उऩासक अगय ववचाय
                 ै
कये कक, 'करास भें बगवान शॊकय हैं कक नहीॊ, क्मा ऩता....' तो वह उऩासना से च्मत हो
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जामगा। ऩहरे क जभाने भें ऩैदर जाना होता था। करास भें करासऩनत है कक नहीॊ मह ऩता
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रगाने का कोई साधन नहीॊ था। वहाॉ बगवान हैं ही ऐसी श्रद्धा फनी यहती थी। रेककन आजकर
हे मरकोप्टय आहद साधनों से कहीॊ बी खोजफीन की जा सकती है ऩय उऩासना क मरए ऐसी फवद्ध
                                                                  े
चराना इद्श नहीॊ है । उऩासक को तो अऩनी श्रद्धा फढ़ा-फढ़ाकय आगे फढ़ना चाहहए। वहाॉ ववचाय की
आवश्मकता नहीॊ है ।
       कभदकाण्डी अगय सीधा उऩासना भें आ जाएगा तो कभद भें उसकी रूचच टूट जाएगी।
उऩासक अगय ववचाय भें आ जाएगा तो उऩासना भें रूचच टूट जाएगी। अत् जजस सभम जो कयते
हैं उसभें रग जाओ। जजस साधक को जो साधन ज्मादा अनकर ऩडता हो उसभें दृढ़ता से रग
                                                ू
जामे। तत्ऩयता से साधना कये ।
       अगय प्राणोऩासना भें कोई ठीक से रग जाम तो उसका कवरी कबक मसद्ध होता है ।
                                                      े    ॊ
जजसका कवरी कबक मसद्ध हो गमा हो उसक आगे दसये रोगों की भनोकाभनाएॉ ऩूणद होने रगती
       े    ॊ                     े     ू
हैं तो उसकी अऩनी काभनाओॊ का तो ऩछना ही क्मा?
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       भन, प्राण औय शयीय इन तीनों का आऩस भें जडवे बाई जैसा सम्फन्ध है । शयीय बायी
यहता हो तो प्राणामाभ आहद कयने से वह हल्का फन सकता है । एक फात खास माद यखें कक
कबी बफना आसन क न फैठो। इससे भन ऩय थोडा प्रबाव आएगा। भन ऩय प्रबाव आएगा तो
              े
प्राण सूक्ष्भ होने रगें गे। कण्डमरनी जगेगी। कपय जो कछ कक्रमा होने रगे उसको योको नहीॊ।
ध्मान कयते सभम शयीय घण्टी की तयह घूभता है मा उछरकद भचाता है तो उसको योको भत।
                                                 ू
रेककन ऐसे ही बजन भें फैठे हो तो शयीय को चॊचर भत यखो। फन्दय की तयह इधय हहरे, उधय
हहरे, इधय झाॉका, उधय झाॉका..... ऐसे नहीॊ। बफना प्रमोजन की पारतू चेद्शाओॊ से शयीय को
फचाओ। इससे भन की एकाग्रता फढ़े गी।
हभ साधन-बजन कयते हैं तो भन थोडा-सा एकाग्र होता है , प्राण थोडे सूक्ष्भ होते हैं।
शयीय भें एक प्रकाय की बफजरी ऩैदा होती है , वऩत्त का प्रबाव फढ़ता है । शयीय का बायीऩन औय
आरस्म दय होता है , स्पनतद आती है ।
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       तरसी क ऩत्ते सात हदन तक फासी नहीॊ भाने जाते। फेरपर तीन हदन तक फासी नहीॊ
             े
भाना जाता। कभर का पर दो हदन तक फासी नहीॊ भाना जाता। दसये पर एक हदन तक फासी
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नहीॊ भाने जाते।
       तरसी क ऩाॉच ऩत्ते चफाकय ऩानी वऩमें तो शयीय भें ववद्यत शडक्त फढ़ती है । तरसी भें
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ववद्यत तत्त्व ज्मादा है । तो क्मा तरसी दर ज्मादा खा रें? नहीॊ, नहीॊ। ऩाॉच ऩत्ते ही कापी हैं।
शयीय को तन्दरुस्त यखने भें सहामक होंगे।
       कबी-कबी अऩने इद्श को प्माय कयते हए ध्मान कयना चाहहए, उऩासना कयनी चाहहए। वे
इद्श चाहे बोरेनाथ हों, बगवान याभ हों, बगवान कृष्ण हों, कोई दे वी दे वता हो चाहे अऩने
सदगरुदे व हों, जजनभें तम्हायी अचधक श्रद्धा हो उन्हीॊ क चचन्तन भें यभ जाओ। योना हो तो उन्हीॊ
                                                      े
क ववयह भें योओ। हॉ सना हो तो उन्हीॊ को प्माय कयते हए हॉ सो। एकाग्र होना तो उन्हीॊ क चचत्र
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को एकटक ननहायते हए एकाग्र फनो।
       इद्श की रीरा का श्रवण कयना बी उऩासना है । इद्श का चचन्तन कयना बी उऩासना है ।
इद्श क मरए योना बी उऩासना है । भन ही भन इद्श क साथ चोयस खेरना बी उऩासना। इद्श क
      े                                       े                                े
साथ भानमसक कफड्डी खेरना बी उऩासना है । इद्श क कस्ती खेरना बी उऩासना है । ऐसा
                                             े
उऩासक शयीय की फीभायी क वक्त सोमे सोमे बी उऩासना कय सकता है । उऩासना सोते सभम बी
                      े
हो सकती है , रेटे रेटे बी हो सकती है , हॉ सते हॉसते बी हो सकती है, योते योते बी हो सकती है ।
फस, भन इद्शाकाय हो जाम।
       भेये इद्श गरुदे व थे। भैं नदी ऩय घूभने जाता तो भन ही भन उनसें फातें कयता। दोनों की
ओय होने वारा सॊवाद भन ही भन घड रेता। भझे फडा भजा आता था। दसये ककसी इद्श क
                                                          ू              े
प्रत्मऺ भें कबी फात हई नहीॊ थी, उसकी रीरा दे खी नहीॊ थी रेककन अऩने गरुदे व ऩूज्मऩाद
स्वाभी श्री रीराशाहजी बगवान का दशदन, उनका फोरना-चारना, व्मवहाय कयना आहद सफ भधय
रीराएॉ प्रत्य़ऺ भें दे खने को मभरती थी, उनसे फातचीत का भौका बी मभरा कयता था। अत्
एकान्त भें जफ अकरा होता तफ गरुदे व क साथ भनोभन अठखेमरमाॉ कय रेता। अबी बी कबी-
                े                   े
कबी ऩयाने अभ्मास क भताबफक घूभते-कपयते अऩने साॉईं से फातें कय रेता हूॉ, प्माय कय रेता हूॉ।
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साॉईं तो साकाय नहीॊ हैं, अऩने भन क ही दो हहस्से हो जाते हैं। एक साॉईं होकय प्रेयणा दे ता है
                                  े
दसया साधक होकय सनता है । क्मोंकक साॉईं तत्त्व व्माऩक होता है , गरुतत्त्व व्माऩक होता है ।
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       कबी-कबी उऩासक मशकामत कयता है कक भेया भन बगवान भें नहीॊ रगता है । इसी
प्रकाय कये तो ही बगवान भें भन रग सकता है । जो रोग थोडे बी उन्नत उऩासक हैं उनका भन
जफ चाहे तफ बगवान भें रग सकता है ।
भेये गरुदे व कबी-कबी अकरे कभये भें फैठे-फैठे बगवान क साथ ववनोद कयते। उनका
                             े                            े
बगवान तो तत्त्व रूऩ भें था। वे जगे हए भहाऩरुष थे। वे एकाॊत भें कबी-कबी ठहाका भायकय
हॉसते। भोय की तयह आवाज कयते्
      "वऩमू ऽऽऽऽ....!"
      कपय अऩने आऩको कहते्
      "फोर,रीराशाह !"
      वे अऩने आऩको 'शाह' नहीॊ फोरते थे, ऩहरे दो अऺय ही अऩने मरए फोरा कयते थे,
रेककन भझसे वह नाभ फोरा नहीॊ जाता। वे अऩने आऩसे सॊवाद-वाताद-ववनोद कयते्
      "जी साॉईं !"
      "योटी खाएगा?"
      "हाॉ, साॉईं ! बूख रगी है ।"
      "योटी तफ खामगा जफ सत्सॊग का भजा रेगा। रेगा न फेटा ?"
      "हाॉ भहायाज ! रॉ ूगा, जरूय रॉ ूगा।"
      "ककतनी योटी खाएगा। ?"
      "तीन तो चाहहए।"
      "तीन योटी चाहहए तो तीनों गणों से ऩाय होना है । फोर, होगा न ?"
      "हाॉ, साॉईं, ऩाय हो जाऊगा रेककन अबी तो बूख रगी है ।"
                             ॉ
      "अये बूख तझे रगी है ? झठ फोरता है ? बूख तेये प्राणों को रगी है ।"
                             ू
      "हाॉ साॉई, प्राणों की रगी है ।"
      "शाफाश ! अफ बरे योटी खा, रीराशाह ! योटी खा !"
      ऐसा कयक ववनोद कयते औय कपय बोजन ऩाते। उनको उऩासना कार का कोई अभ्मास
             े
ऩडा होगा तो नब्फे सार की उम्र भें बी ऐसा ककमा कयते थे.
      मह सफ फताने क ऩीछे भेया प्रमोजन मह है कक तम्हें बी उऩासना की कोई कजी हाथ
                   े                                                    ॊ
रग जाम।
      इद्श का चचन्तन कयना अथवा इद्शों का इद्श आत्भा अऩने को भानना औय शयीय क अऩने
                                                                           े
से अरग भानकय चेद्शा औय चचन्तन कयना मह बी उऩासना क अॊतगदत आ जाता है ।
                                                 े
      रडकी जफ ससयार जाती है तफ भामका छोडते हए कहठनाई रगती है । जफ ससयार भें
सेट हो जाती है तो भामक कबी-कबी ही आती है । आती है तफ बी उसक ऩैय अचधक हटकते
                      े                                    े
नहीॊ। कछ ही सभम भें वह चाहती है कक अफ जाऊ अऩने घय। आज तक जजसको अऩना घय
                                         ॉ
भान यही थी वह धीये -धीये बाई का घय हो जाता है , फाऩ का घय हो जाता है । ऩनत का घय ही
अऩना घय हो जाता है ।
ऐसे ही उऩासक अऩने इद्श क साथ ब्माहा जाता है तो उसको इद्श का चचन्तन अऩना
                                े
रगता है औय सॊसाय का चचन्तन ऩयामा रगता है ।
        सॊसाय तम्हाया ऩयामा घय है । असरी घय तो है बगवान, आत्भा-ऩयभात्भा। वह तम्हाया
फाऩ बी है , बाई बी है , ऩनत बी है , सखा बी है , जो भानो सो है । रडकी का ऩनत सफ नहीॊ हो
सकता रेककन साधक का ऩनत सफ हो सकता है । क्मोंकक ऩयभात्भा सफ कछ फना फैठा है ।
        गरु को जो शयीय भें ही दे खते हैं वे दे य-सफेय डगभग हो जाते हैं। गरु को शयीय भानना
औय शयीय को ही गरु भानना मह बर है । गरु तो ऐसे हैं जजससे श्रेद्ष औय कछ बी नहीॊ है ।
                            ू
'मशवभहहम्न स्तोत्र' भें आता है ्
                                          नाजस्त तत्त्वॊ गयो् ऩयभ ्।
        गरु से ऊऩय कोई बी तत्त्व नहीॊ है । गरु तत्त्व साये ब्रह्माण्ड भें व्माद्ऱ होता है । अत् गरु
को कवर दे ह भें ही दे खना, गरु को दे ह भानना मह बर है ।
    े                                            ू
         भैं अऩने गरुदे व को अऩने से कबी दय नहीॊ भानता हूॉ। आकाश से बी अचधक सक्ष्भ तत्त्व
                                          ू                                  ू
हैं वे। जफ चाहूॉ तफ गोता भायकय भराकात कय रेता हूॉ।
        ऐसे सवदव्माऩक ऩयभ प्रेभास्ऩद गरुतत्त्व को इसी जीवन भें ऩा रेने का रक्ष्म फना यहे ।
साधक मह रक्ष्म न बूरे। ध्मान-बजन भें बी रक्ष्म बूर जाएगा तो ननिा आमेगी, तॊिा आमेगी।
        साधक चचॊतन कयते यहे कक भेया रक्ष्म क्मा है । ऐसा नहीॊ कक चऩचाऩ फैठा यहे । ननिा,
तॊिा, यसास्वाद आहद ववघ्न आ जामें तो उससे फचना है । ध्मान कयते सभम द्वास ऩय ध्मान यहे ,
दृवद्श नासाग्र मा भ्रूभध्म भें यहे अथवा अऩने को साऺी बाव से दे खता यहे । इसभें बी एकाध
मभनट दे खेगा, कपय भनोयाज हो जामेगा। तफ रम्फा द्वास रेकय प्रणव का दीघद उच्चायण कये ्
'ओ....भ ् ऽऽऽऽ....'
        कपय दे खे कक भन क्मा कय यहा है । भन कछ न कछ जरूय कये गा, क्मोंकक ऩयानी आदत
है । तो कपय से गहया द्वास रेकय ओठ फन्द कयक 'ॐ' का गॊजन कये । इस गॊजन से शयीय भें
                                          े
आॊदोरन जगें गे, यजो-तभोगण थोडा ऺीण होगा। भन औय प्राण का तार फनेगा। आनन्द आने
रगेगा। अच्छा रगेगा। बीतय से खशी आमेगी। तम्हाया भन बीतय से प्रसन्न है तो फाहय से बी
प्रसन्नता फयसाने वारा वातावयण सहज भें मभरेगा। बीतय तभ चचॊनतत हो तो फाहय से बी चचॊता
फढ़ाने वारी फात मभरेगी। बीतय से तभ जैसे होते हो, फाहय क जगत से वैसा ही प्रनतबाव तम्हें
                                                       े
आ मभरगा।
        जगत तीन प्रकाय क हैं- एक स्थर जगत है जो हभ आॉखों से दे खते हैं, इन कानों से
                        े           ू
सनते हैं, इस जजह्वा से चखते हैं, इस नामसका से सॉूघते हैं। मह स्थर जगत है , दसया सूक्ष्भ
                                                                ू           ू
जगत है । स्थर जगत रौककक जगत है , दसया अरौककक जगत है । इन दोनों से ऩाय तीसया है
            ू                     ू
रोकातीत जगत। मह है रौककक अरौककक दोनों का आधाय, दोनों का साऺी।
जगत को दे खने की दृवद्श बी तीन प्रकाय की है ् एक है स्थर दृवद्श मा चऺ दृवद्श, दसयी
                                                              ू                       ू
भनदृवद्श औय तीसयी वास्तववक दृवद्श।
       स्थर जगत भें जो कछ हदखता है मह स्थर आॉखों से हदखता है । सूक्ष्भ जगत अॊदय क
          ू                              ू                                       े
भन् चऺ से हदखता है । जैसे, ककसी साधना क द्राया हभ अऩने इद्श मा सदगरु से अनसॊधान कय
                                       े
रें तो हभें दय का कछ अजीफ-सा दशदन होगा। वह रौककक नहीॊ होगा, अरौककक होगा। कबी
             ू
सॊगीतवाद्यों क भधय स्वय सनाई ऩडेंगे। कबी अरौककक सगन्ध आने रगेगी। इस प्रकाय क
              े                                                             े
अनबव हों तफ जानना कक भन रौककक जगत से हटकय अरौककक जगत भें प्रववद्श हआ है , फाह्य
चऺ से हटकय आॊतयऺ भें गमा है । आॊतयचऺ वारे साधक एक दसये को सभझ सकते हैं जफकक
                                                   ू
दसये रोग उनकी फातों की भजाक उडामेंगे।
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       साधक को अऩने आॊतय जगत क अनबव अत्मॊत फहहभख रोगों को नहीॊ सनाना चाहहए।
                              े                द
क्मोंकक फहहभख रोग तक-कतक कयक साधक क अनबव को ठे स ऩहॉ चा दे गा। फाहय क आदभी
            द       द   द   े      े                                 े
भें तक कयने की मोनमता ज्मादा होगी औय साधक तक क जगत भें नहीॊ है , बावना क जगत भें
      द                                     द े                         े
है । बाववारा अगय फौवद्धक जगत वारे क साथ टकयाता है तो उसक बाव भें मशचथरता आ जाती
                                   े                    े
है । इसीमरए साधकों को शास्त्र की आऻा है कक अऩना आध्माजत्भक अनबव नाजस्तक औय
ननगये , साधायण रोगों को नहीॊ सनाना चाहहए। आध्माजत्भक अनबव जजतना गोप्म यखा जाए
उतना ही उसका प्रबाव फढ़ता है ।
       भन, प्राण औय शयीय इन तीनों का एक दसये क साथ जडवे बाई जैसा सम्फन्ध है ।
                                         ू    े
इसमरए शयीय को ऐसा खयाक भत णखराओ कक ज्मादा स्थरता आ जाम। अगय नीॊफू प्रनतकर न
                                             ू                          ू
ऩडता हो तो साधक को बोजन भें नीॊफू रेना चाहहए। प्रनतहदन तरसी क ऩत्ते चफाने चाहहए। नॊगे
                                                             े
ऩैय कबी बी नहीॊ घूभना चाहहए। नॊगे ऩैय चरने कपयने से शयीय का ववद्यत तत्त्व बूमभ भें उतय
जाता है । बजन क प्रबाव से फढ़ा हआ ववद्यत तत्त्व कभ हो जाने से मशचथरता आ जाती है ।
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       शयीय भें बायीऩन यहने से ध्मान-बजन भें भजा नहीॊ आता, काभ कयने भें बी भजा नहीॊ
आता। जजसको ध्मान-बजन भें भजा आता है उस साधक को रौककक जगत भें से अरौककक
सूक्ष्भ जगत भें जाने की रूचच जगती है । रौककक जगत भें तो कभद कयक, ऩरयश्रभ कयक थोडा
                                                               े            े
सा भजा मभरता है जफकक बावना क जगत भें बफना कभद ककमे, बावना से ही आनन्द मभरता
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है । ध्मान क द्राया, प्रेभाबडक्त क द्राया साधक को जो भजा मभरता है वह रौककक जगत क ऩदाथों
            े                     े                                             े
से नहीॊ मभर सकता। बीतय का भजा ज्मों-ज्मों आता जाएगा त्मों-त्मों फाहय क ऩदाथों का
                                                                      े
आकषदण छटता जाएगा। आकषदण छटा तो वासना कभ होगी। वासना कभ होगी तो भन की
       ू                 ू
चॊचरता कभ होगी। भन की चॊचरता कभ होगी तो फवद्ध का ऩरयश्रभ कभ होगा। फवद्ध जस्थय होने
रगेगी तो ऻानमोग भें अचधकाय मभर जाएगा।
       ननष्काभ कभद उऩासना का ऩासऩोटद दे ता है उऩासना ऻान का ऩासऩोटद दे ती है । कपय बी
महद ककसी ने ऩहरे उऩासना कय यखी है , फवद्ध फहढ़मा है , श्रद्धा गहयी है औय सभथद सदगरु मभर
जाते हैं तो सीधा ऻान क भागद ऩय साधक चर ऩडता है । जैसे याजा जनक चर ऩडे थे वैसे कोई
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बी अचधकायी साधक जा सकता है । कोई उऩासना से शरु कय सकता है । प्राम् ऐसा होता है कक
सत्कभद, शबकभद कयते हए, सदाचाय से चरते हए साधक आगे फढ़ता है । कपय उऩासना भें प्रवेश
होता है । उऩासना ऩरयऩक्व होने ऩय ऻान भागद भें गनत होने रगती है ।
       प्रायॊ मबक साधक को सभाज भें यहते हए साधना कयने से मह तकरीप होती है कक उसके
इदद चगदद ऩच्चीस रोग भ्रद्शाचायी होते हैं औय साधक होता है सदाचायी। वे ऩच्चीस रो इसे भखद
                                                                                    ू
भानें गे। उन भ्रद्शाचारयमों को ऩता नहीॊ होता कक वे अऩना भन औय   जीवन भमरन कयक जो कछ
                                                                             े
इकट्ठा कय यहे हैं उसका बोग तो उनक बानम भें जजतना होगा उतना ही कय ऩाएॉगे। फाकी से तो
                                 े
उनका आहाय, तन औय भन अशद्ध होगा औय द्ख दे गा। रेककन वे रोग सभझते नहीॊ औय
साधक का भजाक उडाते हैं।
       बोगी ववरासी रोग यजो-तभोगण फढ़ानेवारे आहाय रेते हैं औय भानते हैं कक हभ 'पस्टद
क्रास' बोजन कयते हैं रेककन वास्तव भें इन्हीॊ आहायों से आदभी 'थडद क्रास' होता है । दननमा
की नजयों भें अच्छा आहाय है उसको साधक सभझता है कक मह नीचे क कन्िों भें रे जाने वारा
                                                          े े
आहाय है । मह 'थडद क्रास है ।' 'पस्टद क्रास' क आहाय तो शयीय को तन्दरुस्त यखता है भन को
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प्रसन्न यखता है औय फवद्ध को तेजस्वी फनाता है ।
       भैंने सनी है एक कहानी।
       एक भल्रा की प्रमसवद्ध दसये भल्रा-भौरववमों की असह्य हो यही थी। जफ तक आत्भ-
                              ू
साऺात्काय नहीॊ होता तफ तक धामभदक जगत हो जा व्मावहारयक जगत हो, याग-द्रे ष चरता यहता
है , एक दसये क ऩैय खीॊचने की चेद्शाएॉ होती ही यहती हैं। स्थर शयीय औय सूक्ष्भ शयीय जफ तक
         ू    े                                            ू
है तफ तक ऐसा होता ही यहे गा। दोनों शयीयों से जो ऩाय गमा, आत्भऻानी हो गमा उसक मरए
                                                                            े
मह झॊझट नहीॊ है , फाकी क मरए तो झॊझट यहे गी ही।
                        े
       दसये भौरववमों ने इस भल्रा क मरए फादशाह को मशकामत कय दी। उसक चारय्म
        ू                         े                               े
ववषमक कीचड उछार दीष फादशाह ने सोचा कक मह प्रमसद्ध भल्रा है । इसको अगय दॊ ड आहद
दें गे तो याज्म भें बी इसक चाहकों की फददआ रगेगी। वजीयों की याम री तो उन्होंने कहा कक
                          े
ऐसा उऩाम कयना चाहहए जजससे साॉऩ बी भय जाए औय राठी बी फच जाम। उन्होंने उऩाम बी
फता हदमा। फादशाह ने उस प्रकाय अऩने भहर क चाय कभये भें व्मवस्था कय दी। कपय भल्रा को
                                        े
फरवाकय कहा गमा कक आऩ यात बय महाॉ अकरे ही यहें गे। दसया कोई नहीॊ होगा। इन चाय
                                   े               ू
कभयों भें से ककसी बी एक कभये का उऩमोग कयोगे तो फादशाह सराभत खश होंगे औय आऩको
छोड हदमा जामगा। अगय उऩमोग नहीॊ ककमा तो जहाॉऩनाह का अनादय भाना जाएगा। कपय वे जो
पयभान कयें गे वैसा होगा।
उन चायों कभयों भें भल्रा ने दे खा। ऩहरे कभये भें पाॉसी रटक यही थी। इस कभये का
उऩमोग कयना भाने पाॉसी खाकय भय जाना। भल्रा आगे फढ़ गमा। दसये कभये भें हाय-मसॊगाय
                                                        ू
कयक नाज-नखये कयती हई वेश्मा फैठी थी। तीसये कभये भें भाॊस-कफाफ-अॊडे आहद आसयी खयाक
   े
खाने को यखे गमे थे। चौथे कभये भें दारू की फोतरें यखी गईं थीॊ।
      भल्रा ने सोचा कक ऐसी नाऩाक चीजों का उऩमोग भैं कसे करू। भैं दारू क्मों वऩऊ ?
                                                     ै    ॉ                    ॉ
भाॊसाहाय बी कसे कय सकता हूॉ ? वेश्मागभन से तो खदा फचाम ! तो क्मा पाॉसी खाकय भय
             ै
जाऊ ? क्मा ककमा जाम ?
    ॉ
      भल्रा इधय-उधय चक्कय काट यहा है । यात फीती जा यही है । प्मास बी रगी है । उसने
सोचा् दारू भें ऩानी बी होता है । ऩानी से हाथ बी साप ककमे जाते हैं। अफ फात यही थोडी-सी।
जया-सा दारू ऩी रॉ गा। प्मास बी फझ जामगी औय फादशाह सराभत की फात बी यह जामेगी। भैं
                  ू
भक्त हो जाऊगा।
           ॉ
      भल्रा ने थोडा दारू ऩी मरमा। जजह्वा ऩय थोडा अशद्ध आहाय आ गमा तो भन ऩय बी
उसका प्रबाव ऩड गमा। थोडा औय ऩी रॉ ू तो क्मा हजद है ? ऐसा सोचकय ककस्भ-ककस्भ क दारू
                                                                            े
क घूॉट बये , नशा चढ़ा। बूख बी खरी। भन, फवद्ध, प्राण नीचे आ गमे। बूख रगी है औय खदा ने
 े
तैमाय यख ही हदमा है तो चरो, खा रें । भल्रा ने भाॊस-अॊड-कफाफ आहद बय ऩेट खा मरमा। अॊडे
                                                      े
खामे तो इजन्िमाॉ उत्तेजजत हो गईं तो चरा गमा वेश्मा क कभये भें । 'वह फेचायी इन्तजाय कय यही
                                                    े
है । ककसी क भन को खश कयना मह बी तो ऩण्मकभद है ।' भन कसा फेवकप फना दे ता है इन्सान
           े                                         ै      ू
को?
      भल्रा वेश्मा क कभये भें गमा। सफह होते-होते उसका सत्त्व खत्भ हो गमा, शयीय भें फर
                    े
का फयी तयह ह्रास हो गमा। भल्रा का चचत्त नरानन से बय गमा। 'हाम ! मह भैंने क्मा कय
मरमा? दारू बी ऩी मरमा, अबक्ष्म बोजन बी खा मरमा औय वेश्मा क साथ कारा भॉह बी कय
                                                          े
मरमा। भैं धामभदक भल्रा ! ऩाॉच फाय नभाज ऩढ़नेवारा ! औय मह भैंने क्मा ककमा ? रोगों को
क्मा भॉह हदखाऊगा ?'
              ॉ
      हीन बाव से भल्रा आक्रान्त हो गमा औय चौथे कभये भें जाकय पाॉसी खाकय भय गमा।
ऩतन की शरुआत कहाॉ से हई ? 'जया-सा मह ऩी रें।' फस 'जया-सा.... जया-सा...' कयते-कयते भन
कहाॉ ऩहॉचाता है ! जया-सा मरहाज कयते हो तो भन चढ़ फैठता है । दजदन को जया सी उॉ गरी
ऩकडने दे ते हो तो वह ऩूया हाथ ऩकड रेता है । ऐसे ही जजसका भन ववकायों भें उरझा हआ है
उसक आगे मरहाज यखा तो अऩने भन भें छऩे हए ववकाय बी उबय आमेंगे। अगय भन को सॊतों
   े
क तयप, इद्श क तयप, सेवकों क तयप, सेवाकामों क तयप थोडा-सा फढ़ामा तो औय सेवकों का
 े           े             े                े
सहमोग मभर जाता है । उऩासना क तयप भन फढ़ामा तो औय उऩासक मभर जाते हैं। इस भागद
                            े
भें थोडा-थोडा फढ़ते-फढ़ते भन नायामण से मभरता है औय उधय अगय भन भड जाता है तो
आणखय भें असय से मभरता है ।
असय से मभरता है , तभस ् से मभरता है तो भन नीची मोननमों भें जाता है । भन अगय
साधकों का सॊग कयता है , सत्सॊग कयता है , इद्श क साथ जडता है तो इद्श क अनबव से एक हो
                                               े                     े
जाता है , अहॊ ब्रह्माजस्भ का अनबव कय रेता है । गरु का अनबव अऩना अनबव हो जाता है ,
श्रीकृष्ण का अनबव हो जाता है , मशवजी का अनबव अऩना अनबव हो जाता है , याभजी का
अनबव अऩना अनबव हो जाता है । अन्मथा तो कपय ऩश-ऩऺी, वऺ आहद मोननमों भें बटकना
                                                   ृ
ऩडता है ।
       भनष्म जीवन मभरा है । ऩयाधीनता की जॊजीयों भें जकडने वारे ववनाश की ओय चरो मा
ऩयभ स्वातॊ्म क द्राय खोरने वारे ववकास की ओय उन्भक्त फनो, भयजी तम्हायी।
              े
       नायामण..... नायामण.... नायामण.... नायामण.... नायामण....।
                                             अनक्रभ
                                   ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


                                       सत्सॊग सॊचम

                                            ऻानमोग
       श्री मोगवामशद्ष भहायाभामण भें 'अजनोऩदे श' नाभक सगद भें बगवान श्रीकृष्ण अजन से
                                        द                                       द
कहते हैं-
       "हे बायत ! जैसे दध भें घत औय जर भें यस जस्थत होता है वैसे ही सफ रोगों क रृदम
                        ू      ृ                                              े
भें तत्त्व रूऩ से जस्थत हूॉ। जैसे दध भें घत जस्थत है वैसे ही सफ ऩदाथों क बीतय भैं आत्भा
                                   ू      ृ                             े
जस्थत हूॉ। जैसे यत्नों क बीतय-फाहय प्रकाश होता है वैसे ही भैं सफ ऩदाथों क बीतय-फाहय जस्थत
                        े                                                े
हूॉ। जैसे अनेक घटों क बीतय-फाहय एक ही आकाश जस्थत है वैसे ही भैं अनेक दे हों भें बीतय
                     े
फाहय अव्मक्त रूऩ जस्थत हूॉ।"
         जैसे आकाश भें सफ व्माद्ऱ है वैसे भैं चचदाकाश रूऩ भें सवदत्र व्माद्ऱ हूॉ। फन्धन औ भडक्त
दोनों प्रकृनत भें होते हैं। ऩरुष को न फन्धन है न भडक्त है । जन्भ-भत्म आहद जो होता है वह सफ
                                                                    ृ
प्रकृनत भें खेर हो यहा है । ऩानी भें कछ नहीॊ, तयॊ गों भें टकयाव है । आकाश भें कछ नहीॊ, घडों भें
फनना बफगडना होता है ।
       तभ चचदघन चैतन्म आत्भा हो। जैसे दध भें घी होता है , मभठाई भें मभठाश होती है ,
                                       ू
नतरों भें तेर होता है ऐसे ही चैतन्म सवदत्र व्माद्ऱ होता है , सफभें ओतप्रोत है । नतरों भें से तेर
ननकार दो तो तेर अरग औय पोतये अरग हो जाएॉगे रेककन चैतन्म भें ऐसा नहीॊ है । जगत भें
से ब्रह्म अरग ननकार रो, ऐसा नहीॊ है । नतरों भें से तो तेर ननकार रे सकता है रेककन जगत
भें से ब्रह्म नहीॊ ननकर सकता।
जैसे जगत भें से आकाश नहीॊ ननकर सकता ऐसे ही आकाश भें से बी चचदाकाश नहीॊ
ननकर सकता। मह चचदाकाश ही ऩयभात्भ-तत्त्व है । वही हय जीव का अऩना आऩा है रेककन जीव
'भैं' औय 'भेया' कयक इजन्िमों क याज्म भें बटक गमा है इसमरए जन्भ-भयण हो यहा है । नहीॊ तो
                   े          े
जयाद-जयाद खदा है । खदा की कसभ, जयाद-जयाद खदा है । कोई उससे जदा नहीॊ है ।
                                 सफ घट भेया साॉईमा खारी घट ना कोम।
                                 फमरहायी वा घट की जा घट ऩयगट होम।।
                                    कफीया कआ एक है ऩननहारय अनेक।
                                           ॉ
                                 न्माये न्माये फतदनों भें ऩानी एक का एक।।
       ऻानमोग भें ननद्षय होकय ऻान का ववचाय कयें । वहाॉ मरहाज नहीॊ कयना है । श्रद्धा कयें ,
उऩासना कयें तो अन्धा होकय श्रद्धा कयें । उऩासना भें अन्धश्रद्धा चाहहए, गहयी श्रद्धा चाहहए। श्रद्धा
भें ववचाय की जरूयत नहीॊ है , अन्मथा श्रद्धा नततय-बफतय हो जामेगी। है तो ऩत्थय, है तो
शामरग्राभ रेककन बगवान है । वहाॉ ववचाय भत कयो। है तो मभट्टी का वऩॊड, रेककन दृढ़ बावना
यखो कक मशवमरॊग है , साऺात बगवान मशव हैं। श्रद्धा भें ववचाय को भत आने दो।
       हभ रोग क्मा कयते हैं? श्रद्धा भें ववचाय घसेड दे ते हैं.... ववचाय भें श्रद्धा घसेड दे ते हैं।
नहीॊ...। जफ आत्भववचाय कयो तफ ननद्षय होकय कयो। 'जगत कसे फना ? ब्रह्म क्मा है ? आत्भा
                                                    ै
क्मा है ? भैं आत्भा कसे ?' कतक तो नहीॊ रेककन तक अवश्म कयो। 'तक्मदताभ ्... भा
                     ै        द                द
कतक्मदताभ ्।' ववचाय कयो तो ननद्षय होकय कयो औय श्रद्धा कयो तो बफल्कर अन्धे होकय कयो।
अऩने ननद्ळम भें अडडग। चाहे कछ बी हो, सायी दननमा, सायी खदाई एक तयप हो रेककन भेया
इद्श, भेया खदा, भेया बगवान अनन्म है , भेये गरु का वचन आणखयी है ।
                                 ध्मानभूरॊ गयोभूदनतद् ऩूजाभूरॊ गयो् ऩदभ ्।
                                  भॊत्रभूरॊ गयोवादक्मॊ भोऺभूरॊ गयो् कृऩा।।
       श्रद्धा कयो तो ऐसी। ववचाय कयो तो ननद्षय होकय। श्रद्धार अगय कहे कक् 'अच्छा ! भैं
सोचॉगा.... ववचाय करूगा....' तो 'भैं' फना यहे गा, कपय योता यहे गा।
    ू              ॉ
       कभद कयो तो एकदभ भशीन होकय कयो। भशीन कभद कयती है , पर की इच्छा नहीॊ
कयती। वह तो धभाधभ चरती है । मॊत्र की ऩतरी की तयह कभद कयो। काभ कयने भें ढीरे न
फनो। झाडू रगाओ तो ऐसा रगाओ कक कहीॊ कचया यह न जाम। यसोई फनाओ तो ऐसी फनाओ
कक कोई दाना पारतू न जाम, कोई नतनका बफगडे नहीॊ। कऩडा धोओ तो ऐसा धोओ कक साफन
का खचद व्मथद न हो, कऩडा जल्दी न पटे कपय बी चभाचभ स्वच्छ फन जाम। कभद कयो तो ऐसे
सतक होकय कयो। ऐसा कभदवीय जल्दी सपर जो जाता है । हभ रोग थोडे कभद भें , थोडे आरस्म
   द
भें , थोडे Dull थोडे Lazy थोडे ऩरामनवादी होकय यह जाते हैं। न ही इधय क यहते हैं नहीॊ उधय
                                                                     े
क।
 े
       कभद कयो तो फस, भशीन होकय, बफल्कर सतकता से, Up-to-date काभ कयो।
                                           द
प्रीनत कयो तो फस, रैरा भजनॉू की तयह।
       एक फाय रैरा बागी जा यही थी। सना था कक भजनॉू कहीॊ फैठा है । मभरन क मरए ऩागर
                                                                        े
फनकय दौडी जा यही थी। यास्ते भें इभाभ चद्दय बफछाकय नभाज ऩढ़ यहा था रैरा उसकी चद्दय
ऩय ऩैय यखकय दौड गई। इभाभ क्रद्ध हो गमा। उसने जाकय फादशाह को मशकामत की् "भैं खदा
की फन्दगी कय यहा था.... भेयी चद्दय बफछी थी उस ऩय ऩैय यखकय वह ऩागर रडकी चरी गई।
उसने खदातारा का औय खदा की फन्दगी कयने वारे इभाभ का, दोनों का अऩभान ककमा है । उसे
फराकय सजा दी जाम।"
       इभाभ बी फादशाह का भाना हआ था। फादशाह ने रैरा को फरामा, उसे डाॉटते हए कहा्
       "भखद ऩागर रडकी ! इभाभ चद्दय बफछाकय खदातारा की फन्दगी कय यहा था औय तू
         ू
उसकी चद्दय ऩय ऩैय यखकय चरी गई ? तझे सजा दे नी ऩडेगी। तूने ऐसा क्मों ककमा ?"
       "जहाॉऩनाह ! मे फोरते हैं तो सही फात होगी कक भैं वहाॉ ऩैय यखकय गजयी होऊगी रेककन
                                                                             ॉ
भझे ऩता नहीॊ था। एक इन्सान क प्माय भें भझे मह नहीॊ हदखा रेककन मे इभाभ साये जहाॉ क
                            े                                                    े
भामरक खदातारा क प्माय भें ननभनन थे तो इनको भैं कसे हदख गई ? भजनॉू क प्माय भें भेये
               े                                ै                  े
मरए साया जहाॉ गामफ हो गमा था जफकक इभाभ साये जहाॉ क भामरक खदातारा क प्माय भें
                                                  े               े
ननभनन थे तो इनको भैं कसे हदख गई ? भजनॉू क प्माय भें भेये मरमे साया जहाॉ गामफ हो गमा
                      ै                  े
था जफकक इभाभ साये जहाॉ क भामरक से मभर यहे थे कपय बी उन्होंने भझे कसे दे ख मरमा ?"
                        े                                         ै
       फादशाह ने कहा् "रैरा ! तेयी भजनॉू भें प्रीनत सच्ची औय इभाभ की फन्दगी कच्ची। जा
तू भौज कय।"
       श्रद्धा कयो तो ऐसी दृढ़ श्रद्धा कयो। ववद्वासो परदामक्।
       आत्भववचाय कयो तो बफल्कर ननद्षय होकय कयो। उऩासना कयो तो असीभ श्रद्धा से कयो।
कभद कयो तो फडी तत्ऩयता से कयो, भशीन की तयह बफल्कर व्मवजस्थत औय पराकाॊऺा से यहहय
होकय कयो। बगवान से प्रेभ कयो तो फस, ऩागर रैरा की तयह कयो, भीया की तयह कयो, गौयाॊग
की तयह कयो।
       गौयाॊग की तयह कीतदन कयने वारे आनॊहदत हो जाते हैं। तभने अऩनी गाडी का एक
ऩहहमा ऑकपस भें यख हदमा है , दसया ऩहहमा गोदाभ भें यखा है । तीसया ऩहहमा ऩॊक्चयवारे क
                             ू                                                    े
ऩास ऩडा है । स्टीमरयॊग व्हीर घय भें यख हदमा है । इॊजजन गेयेज भें ऩडा है । अफ फताओ, तम्हायी
गाडी कसी चरेगी?
      ै
       ऐसे ही तभने अऩनी जीवन-गाडी का एक ऩजाद शत्र क घय यखा है , एक ऩजाद मभत्र क घय
                                                   े                           े
यखा है , दो ऩजे पारतू जगह ऩय यखे हैं। तो मह गाडी कसी चरेगी मह सोच रो। हदर का थोडा
                                                  ै
हहस्सा ऩरयचचतों भें , मभत्रों भें बफखेय हदमा, थोडा हहस्सा शत्रओॊ, ववयोचधमों क चचन्तन भें रगा
                                                                             े
हदमा, थोडा हहस्सा ऑकपस भें ववयोचधमों क चचन्तन भें रगा हदमा, थोडा हहस्सा ऑकपस भें ,
                                      े
दकान भें यख हदमा। फाकी हदर का जया सा हहस्सा फचा उसका बी ऩता नहीॊ कक कफ कहाॉ
बटक जाम ? फताओ, उद्धाय कसे हो?
                        ै
                                                अनक्रभ
                                     ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

                                           याभ क दीवाने
                                                े
        जजनक ऩास ऻान की शराका आ गई है , उनको योभ-योभ भें यभनेवारे याभतत्त्व का
            े
अनबव हो जाता है । वे याभ क दीवाने हो जाते हैं। याभ क दीवाने कसे होते हैं?
                          े                         े        ै
                               याभ क दीवानों को जग क सख की चाह नहीॊ।
                                    े               े
                            भसीफतों क ऩहाड टूटे भॉह से ननकरती आह नहीॊ।।
                                     े
        स्वाभी याभतीथद फोरते थे् "हे बगवान ! आज भसीफत बेजना बूर गमे क्मा? हभ योज
ताजी भसीफत चाहते हैं। आज कोई भसीफत नहीॊ आमी? कोई प्रोब्रेभ नहीॊ आमा?"
        याभतीथद क मरए कई कप्रचाय परामे जाते थे, कई अपवाहें चरती थीॊ। याभ फादशाह तो
                 े                ै
ॐ....ॐ....ॐ..... आनन्द.... भैं ब्रह्म हूॉ....' इस प्रकाय आत्भानॊद भें , ब्रह्मानॊद भें भस्त यहते, हॉ सते
यहते, नाचते यहते। तथा कचथत समाने रोग उनकी आरोचना कयते की ऐसा कोई सॊत होता है ?
उन्भाद हो गमा है उन्भाद। ऐसी चचहट्ठमाॉ बी रोग मरख दे ते थे। स्वाभी याभ कहते्
        "भझे सीख दे ने वारे ! भझे तो बरे उन्भाद हो गमा है रेककन तम्हें तो उन्भाद नहीॊ
हआ है । जाओ, तम्हें यभणणमाॉ फराती हैं। उनक हाड भाॊस तम्हें फरा यहे हैं। जाओ, चाटो....
                                          े
चसो। भैं तो भेये याभ की भस्ती भें हूॉ। भझे तो मही उन्भाद कापी है । तभ बरे यभणणमों क
  ू                                                                                े
उन्भाद भें खशी भनाओ। रेककन सावधान ! वह उन्भाद फाफया बूत है ! हदखता है अच्छा,
सन्दय, सहाना रेककन ज्मों ही आमरॊगन ककमा तयन्त सत्मानाश होगा। याभ यस क उन्भाद का
                                                                     े
अनबव एक फाय कयक दे खो, कपय जन्भों क उन्भाद दय हो जामेंगे।"
               े                   े        ू
        ककसी ने याभतीथद को खत मरखा कक, "आऩक ननकटवती मशष्म एन. एस. नायामण ने
                                           े
सॊन्मासी क वस्त्र उताय कय ऩेन्ट कोट ऩहन मरमा, सॊन्मासी भें से गहस्थी हो गमा ऻानी का
          े                                                    ृ
मशष्म, साध फना औय कपय गराभ फन गमा, नौकयी कयता है ! उसको जया सधायो।"
        याभतीथद ने जवाफ हदमा् "याभ फादशाह आऩ भें ही यभाता नहीॊ है । याभ फादशाह कोई
गडरयमा नहीॊ है कक बेड-फकरयमों को सॉबारता यहे । वह अऩनी इच्छा से भेये ऩास आमा, अऩनी
भयजी से साध फना, उसकी भयजी। सफ सफकी सॉबारे , याभ फादशाह अऩने आऩ भें भस्त हैं।"
        ऻानी को सफ सभेट रेने भें ककतनी दे य रगती है ? मशष्मों को सधायने क मरए ऩाॉच-दस
                                                                         े
फाय ऩरयश्रभ कय मरमा, अगय वे नहीॊ सधयते तो जामें। ऻानी उऩयाभ ही जाते हैं तो घाटा उन्हीॊ
भूखों को ऩडेगा। ऻानी को क्मा है ? वैसे भखों को हभ आज नहीॊ जानते रेककन स्वाभी याभतीथद
                                        ू
को राखों रोग जानते हैं, कयोडों रोग जानते हैं।
आऩ बी कृऩा कयक याभ की भस्ती की ओय उन्भख फनें । उन सौबानमशारी साधकों क
                         े                                                      े
अनबव की ओय चमरए कक्
                               याभ क दीवानों को जग क सख की चाह नहीॊ।
                                    े               े
                             भसीफतों क ऩहाड टूटे भॉह से ननकरती आह नहीॊ।।
                                      े
                                               अनक्रभ
                               ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

                                     मभयाज का 'डडऩाटद भेन्ट'
           ऩर्थवी ऩय कछ आत्भ-साऺात्कायी ब्रह्मवेत्ता भहाऩरुष आ गमे। उनका दशदन ऩाकय रोग
            ृ
खशहार हो जाते थे। उनक अभतवचन सनकय रोगों क कान ऩावन हो जाते थे। उनक उऩदे श
                     े  ृ                े                        े
का भनन कयने से भन ऩववत्र हो जाता था। उनक ऻान भें गोता भायने से फवद्ध फरवती हो जाती
                                        े
थी, जीवन तेजस्वी हो जाता था। रोग ऩण्मात्भा फनते थे, सॊमतेजन्िम होते थे। सूक्ष्भ शडक्तमों का
ववकास कयते थे। वे रोग तो तय जाते थे रेककन उनक ऩूवज बी जहाॉ जाते थे वहाॉ से ऊध्वदगनत
                                             े   द
प्राद्ऱ कय रेते थे। नयक भें ऩडे हए रोग अऩने इन सऩात्र सॊतानों क ऩण्मफर से नयक की
                                                               े
मातनाओॊ से छटकय स्वगद भें चरे जाते थे। नयक खारी होने रगा। नमे रोग नयक भें आते नहीॊ
            ू
औय ऩयाने छटकय चरे जाते। नयक का कायोफाय ठप्ऩ हो गमा।
          ू
           मभयाज चचजन्तत हो उठे कक भेये 'डडऩाटद भेन्ट' भें कोई काभ नहीॊ यहा ! सफ फेकाय हो गमे
!
           अऩना डडऩाटद भेन्ट धभाधभ चरता है तो आदभी खशहार यहता है । 'डडऩाटद भेन्ट' फन्द होने
रगे तो चचन्ता आ घेयती है ।
           मभयाज ऩहॉ चे ब्रह्माजी क ऩास। हाथ जोडकय प्राथदना की्
                                   े
           "ब्रह्मण ! भेये नयक भें कोई ऩाऩी अफ आते नहीॊ औय ऩयाने ऩाऩी जो फन्द थे उनक ऩत्र-
                                                                                    े
ऩरयवायवारे भत्मरोक भें ब्रह्मऻाननमों का सत्सॊग सनकय इतने ऩण्मात्भा हो जाते हैं कक उनक मे
            ृ                                                                        े
ऩूवज बी ऩण्मप्रताऩ से नयक छोडकय स्वगद भें चरे जाते हैं। भेया डडऩाटद भेन्ट खतये भें है । कृऩा
   द
कयक आऩ कछ उऩाम फताइमे। कभ-से-कभ भेया ववबाग तो चरता यहे ।"
   े
           ब्रह्माजी ने ऩद्मासन फाॉधा। कभण्डर से ऩानी रेकय जहाॉ से मोगेद्वयों का मोग मसद्ध होता
है , जजसभें मशवजी यभण कयते हैं , जजसभें बगवान नायामण ववश्राभ ऩाते हैं, जजसभें ऻानेद्वय
भहायाज प्रनतवद्षत होते थे, जजसभें औय ब्रह्मवेत्ता, ऻानी सत्ऩरुष ववयाजभान हैं उसी आत्भ-
ऩयभात्भदे व भें जस्थत होकय सॊकल्ऩ ककमा कक् "जफ-जफ ऩर्थवी रोक भें कोई ब्रह्मऻानी जाएॉगे।
                                                   ृ
तफ-तफ कोई न कोई ननन्दक रोग ऩैदा हआ कयें गे। मे ननन्दक रोग तो डूफेंगे ही, उनकी ननन्दा
सनकय बी रोग डूफेंगे। मे सफ रोग तम्हाये ऩास नयक भें आमेंगे। तम्हाया डडऩाटद भेन्ट चरता
यहे गा।"
तफ से रेकय आज तक मभयाज का डडऩाटद भेन्ट फन्द नहीॊ हआ फजल्क फढ़ता ही चरा
गमा।
        वमशद्षजी भहायाज फोरते हैं- "हे याभजी ! भैं फाजाय से गजयता हूॉ तो भूखद रोग भेये मरमे
क्मा-क्मा फकवास कयते हैं, मह भैं जानता हूॉ।"
       कफीयजी क मरए रोग फोरते थे। ऋवष दमानॊद को रोगों ने फाईस फाय जहय हदमा।
               े
वववेकानन्द क मरए रोग फकते थे, याभकृष्ण क मरए रोग फकते थे, याभतीथद क मरए रोग
            े                           े                          े
फकते थे, भहभद क बी ववयोधी थे।
               े
       ब्रह्म ऩयभात्भा चाहे याभ होकय आ जामें चाहे श्रीकृष्ण होकय आ जामें चाहे जगदगरु
शॊकयाचामद होकय आ जामें कपय बी ननन्दक तो मभरते ही हैं , क्मोंकक मभयाज का डडऩाटद भेन्ट
चारू यखना है । उस डडऩाटद भेन्ट भें जो अऩने कटम्फ-ऩरयवाय को बेजना चाहता है वह जरूय सॊतों
की ननन्दा कये , बगवान, बक्त औय साधकों क ववयोध भें यहे ।
                                       े
       श्रीकृष्ण क जभाने भें , श्रीयाभ क जभाने भें वह डडऩाटद भेन्ट चारू यहा था तो अफ क्मा
                  े                     े
फन्द गमा होगा ? अबी तो करजग है । वह डडऩाटद भेन्ट फहत फडा फन गमा होगा। ज्मादा रोग
यह सक ऐसी व्मवस्था हई होगी।
     ें
       नायामण.... नायामण..... नायामण.... नायामण..... नायामण....।
       जफ वमशद्ष जी को रोगों ने नहीॊ छोडा, कफीय औय       नानक को नहीॊ छोडा, श्रीयाभ औय
श्रीकृष्ण को नहीॊ छोडा तो जफ तम्हायी ननन्दा कये तो तभ घफयाओ नहीॊ। मसकडो भत। कोई
ननन्दा कये तो बगवान का भागद भत छोडो। कोई स्तनत कये तो परो भत, ननन्दा कये तो
                                                       ू
भयझाओ भत। सॊसाय इजन्िमों का धोखा है । ननन्दा स्तनत आने जाने वारी चीज है । तभ रगे यहो
अऩने रक्ष्म को मसद्ध कयने भें ।
                                          अनक्रभ
                                  ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

                                      सदगरु-भहहभा
                                  गरुबफन बवननचध तयहहॊ न कोई।
                                    चाहे ववयॊ चच शॊकय सभ होई।।
       ब्रह्माजी जैसा सवद्श सजदन का साभर्थमद हो, शॊकयजी जैसा प्ररम कयने का साभर्थमद हो कपय
                       ृ
बी जफ तक सदगरु तत्त्व की कृऩा नहीॊ होती तफ तक आवयण बॊग नहीॊ होता, आत्भ-साऺात्काय
नहीॊ होता। हदर भें छऩा हआ हदरफय कयोडों मगों से है , अबी बी है कपय बी हदखता नहीॊ।
       आदभी अऩने को आॉखवारा सभझता है । वास्तव भें वह आॉख है ही नहीॊ। फाहय की आॉख
चभद की आॉख है । वह तम्हायी आॉख नहीॊ है , तम्हाये शयीय की आॉख है । तम्हायी आॉख अगय एक
फाय खर जाम तो सख ब्रह्माजी को मभरता है , जजसभें बगवान मशव यभण कयते हैं , जजसभें आहद
नायामण बगवान ववष्ण ववश्राभ ऩाते हैं, जजसभें प्रनतवद्षत यहकय बगवान श्रीकृष्ण रीरा कयते हैं,
जजसभें ब्रह्मवेत्ता सत्ऩरुष भस्त यहते हैं वह ऩयभ सख-स्वरूऩ आत्भा-ऩयभात्भा तम्हाया अऩना
आऩा है ।
        आदभी को अऩने उस हदव्म स्वरूऩ का ऩता नहीॊ औय कहता यहता है ् 'भैं सफ जानता
हूॉ।'
        अये नादान ! चाहे सायी दननमा की जानकायी इकट्ठी कय रो रेककन अऩने आऩको नहीॊ
जानते तो क्मा खाक जानते हो ? आत्भवेत्ता भहाऩरुषों क ऩास फैठकय अऩने आऩको जानने क
                                                   े                           े
मरए तत्ऩय फनो। अऩने ऻानचऺ खरवाओ। तफ ऩता चरेगा कक वास्तव भें तभ कौन हो। तबी
तम्हाये मरए बवननचध तयना सॊबव होगा।
                                            अनक्रभ
                                ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

                                  ढाई अऺय प्रेभ का......
        एक फाय चैतन्म भहाप्रब को ववद्रानों ने घेय मरमा। ऩूछने रगे्
        "आऩ न्मामशास्त्र क फडे ववद्रान हो, वेदान्त क अच्छे ऻाता हो। हभ सभझ नहीॊ ऩाते कक
                          े                         े
इतने फडे बायी ववद्रान होने ऩय बी आऩ 'हरय फोर.... हरय फोर....' कयक सडकों ऩय नाचते हो,
                                                                 े
फारकों जैसी चेद्शा कयते हो, हॉसते हो, खेरते हो, कदते हो !"
                                                 ू
        चैतन्म भहाप्रब ने जवाफ हदमा् "फडा बायी ववद्रान होकय भझे फडा बायी अहॊ हो गमा था।
फडा धनवान होने का बी अहॊ है औय फडा ववद्रान होने का बी अहॊ है । मह अहॊ ईद्वय से दय
                                                                                ू
यखता है । इस अहॊ को मभटाने क मरए भैं सोचता हूॉ कक भैं कछ नहीॊ हूॉ......भेया कछ नहीॊ है । जो
                             े
कछ है सो तू है औय तेया है । ऐसा स्भयण कयते-कयते, हरय को प्माय कयते-कयते भैं जफ नाचता
हूॉ, कीतदन कयता हूॉ तो भेया 'भैं' खो जाता है औय उसका भैं हो जाता है । भैं जफ उसका होता है
तो शद्ध फद्ध सजच्चदानन्द होता है औय भैं जफ दे हाध्मास का होता है तो अशद्ध औय बमबीत
यहता है ।"
        हरयकीतदन कयते-कयते गौयाॊग कबी-कबी इतने भस्त हो जाते कक उनकी ननगाह जजन ऩय
ऩडती वे      रोग बी भस्ती भें आ जाते थे। फारवत ् जीवन था उनका, आनन्द भें यहते थे, भस्ती
रूटते थे। ववद्रान रोग फार की खार उतायने भें व्मस्त यहते थे, शास्त्रों क मसद्धान्त यटकय खोऩडी
                                                                       े
भें बय रेते थे् 'ब्रह्म ऐसा है , भामा ऐसी है , अववद्या ऐसी है ... बगवान गोरोकवासी हैं, साकत-
                                                                                          े
धाभवासी हैं....' अये बाई ! ब्रह्म का अनबव कयने क मरए सत्त्वगण चाहहए, अॊत्कयण की
                                                े
सयरता चाहहए, इजन्िमों का सॊमभ चाहहए। सॊमभ, सयरता औय सत्त्वगण क बफना कोये ववद्रान हो
                                                              े
गमे, अॊत्कयण से, दे हाध्मास से तादात्म्म तोडा नहीॊ तो क्मा राब ? कफीय जी ने कहा्
                             ऩोथी ऩढ़ ऩढ़ जग भूॊआ ऩॊडडत बमा न कोई।
ढाई अऺय प्रेभ का ऩढ़े सो ऩॊडडत होई।।
                                            अनक्रभ
                                 ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

                                 सपरता की नीॊव एकाग्रता
       गजयात क बूतऩूवद श्रीभन्नायामण ववऻान जगत क फडे सप्रमसद्ध जाने भाने वैऻाननक
              े                                 े
आइन्सटाइन से मभरने गमे। फातों क मसरमसरे भें श्रीभन्नायामण ने आइन्सटाइन से उनकी
                               े
इतनी फहढ़मा सववकमसत मोनमता का कायण ऩूछा। जवाफ भें आइन्स्टाइन उनका हाथ ऩकडकय
एक कभये भें रे गमे। वहाॉ कोई सन्दय भहॉ गा याचयरीरा नहीॊ था, सोपासेट आहद याजसी ठाठ
नहीॊ था। आडम्फय की कोई चीजें नहीॊ थी। कभया बफल्कर खारी, साप-सथया था। वहाॉ कवर
                                                                           े
एक चचत्र औय आसन था।
       रोग अऩने कभये को पनीचय से ऐसा बय दे ते हैं कक भानो कोई गोदाभ हो। चरने-कपयने
की बी जगह नहीॊ फचती। ककसी क घय का कचया दे ख आते हैं तो अऩने घय भें बी रे आते हैं।
                           े
कमसदमाॉ, टे फर, सोपासेट, हटऩोम, डाइननॊग टे फर, नतजोयी.... न जाने क्मा क्मा यख दे ते हैं। सख
क मरए घय को गोदाभ फना दे ते हैं रेककन वे ही सख क साधन द्ख रूऩ हो जाते हैं। उन्हीॊ
 े                                              े
साधनों की साप-सपाई भें रगे यहते हैं। हदर साप कयने क मरए जीवन मभरा था, वह पनीचय
                                                   े
साप कयने भें ऩूया हो जाता है ।
       आइन्स्टाइन ने श्रीभन्नायामण को अऩने खारी कभये भें आसन औय चचत्र हदखाते हए
कहा्
       "भेयी शडक्तमों का, सपरता का औय प्रमसवद्ध का कायण मह है । भैं योज महाॉ फैठकय
एकाग्रचचत्त होता हूॉ, ध्मान कयता हूॉ।"
       शाॊत एकाॊत स्थान भें , ववद्यत का अवाहक हो ऐसा आसन (हो सक तो गयभ आसन)
                                                               े
बफछाकय फैठो। आॉख की ऩरक न चगये इस प्रकाय ककसी बी चचत्र क तयप एकटक ननहायो। आॉखों
                       ें                               े
से ऩानी चगये तो चगयने दो। कछ हदनों क अभ्मास से एकाग्रता आमेगी। आऩक शयीय भें एक
                                    े                             े
प्रकाय का आबाभण्डर फनेगा। इजन्िमाॉ औय भन सॊमत होंगे। वात औय कप का प्रबाव कभ
होगा। तन से दोष दय होंगे।
                 ू
       दननमाबय क इराज औय औषचधमाॉ कयते यहो रेककन एकाग्रता औय सॊमभ का ऩाठ नहीॊ
                े
ऩढ़ा तो सपर नहीॊ होगे। इराज कयने वारे डॉक्टय खद फीभाय यहते हैं फेचाये ।
       घय छोडने से ऩहरे भेये तन भें फहत सायी फीभारयमाॉ थीॊ। ऩेट की तकरीप थी,
                                                                        ें
अऩेण्डीक्स था, कई फाय एक्स ये पोटो ननकरवामे, ब्रड चेक कयवामा, सगय चेक कयवाई,
डॉक्टयों क वहाॉ चक्कय काटे , न जाने क्मा-क्मा ककमा। जफ भझे सदगरु मभर गमे औय साधना-
          े
भागद ऩा मरमा तफ तन क साये द्ख ददद गामफ हो गमे। कपय आऩने 28 सार भें आज तक
                    े
कबी नहीॊ सना होगा कक आज फाऩू फीभाय हैं।
       जीवन जीने का थोडा-सा ढॊ ग आ जाम तो आदभी अऩने वैद्य हो जाता है । अन्मथा तो
फाहय क हकीभ, वैद्य, डॉक्टयों क वहाॉ चक्कय काटता है ही यहता है । सराह उनकी होती है औय
      े                       े
जेफ अऩनी होती है , दवाइमाॉ डारने क मरए ऩेट अऩना होता है ।
                                  े
       भैं मह चाहता हूॉ कक भेये साधक हकीभ क माय न फनेष भेये गरुदे व कहा कयते थे्
                                           े
                                    हकीभ का माय सदा फीभाय।
       गाॉधी जी कहा कयते थे् "वकीर औय डॉक्टय हभाये दे श भें बरे यहें , हभ भना नहीॊ कयते।
रेककन हे बगवान ! वे रोग भेये गाॉव से तो सत्रह कोस दय होने चाहहए।"
                                                   ू
       वकीर फढ़ें गे औय डॉक्टय फढ़ें गे तो फीभारयमाॉ फढ़े गी। डॉक्टय रोग बी क्मा कयें फेचाये !
हभ रोग असॊमभी होते हैं तो फीभारयमाॉ हो जाती हैं। फडे भें फडा सॊमभ आॊतय चेतना से प्राद्ऱ
होता है । एकाग्रता क द्राया आॊतय चेतना को जगाना चाहहए।
                    े
       श्रीभद् आद्य शॊकयाचामद ने कहा कक सफ धभों भें श्रेद्ष धभद है इजन्िमों ओय भन का सॊमभ।
       ऋवष ने कहा्
                                     तऩ्ष सवेष एकाग्रता ऩयॊ तऩ्।
       श्री कृष्ण ने कहा्
                            तऩजस्वभ्मोऽचधको मोगी ऻाननभ्मोऽवऩ भतोऽचधक्।
                              कमभदभ्मद्ळाचधको मोगी तस्भाद्योगी बवाजदन।।
       'मोगी तऩजस्वमों से श्रेद्ष है , शास्त्रऻाननमों से बी श्रेद्ष भाना गमा है औय सकाभ कभद कयने
वारों से बी मोगी श्रेद्ष है इससे हे अजन ! तू मोगी हो।'
                                      द
                                                                                    (गीता् 6.46)
       जो मोग नहीॊ कयता वह ववमोगी होता है । ववमोगी सदा द्खी यहता है ।
       'मोग' शब्द फडा व्माऩक है । आमवेद भें दो औषचधमों क भेर को 'मोग' कहा। सॊस्कृत क
                                                        े                           े
व्माकयण ने दो शब्दों की सॊचध को 'मोग' कहा। ऩतॊजरी भहायाज ने चचत्त की ववत्त का ननयोध
                                                                      ृ
कयने को 'मोग' कहा। श्रीकृष्ण का मोग अनूठा है । वे कहते हैं-
                                          सभत्वॊ मोग उच्मते।
       जजसक जीवन भें सभता क दो ऺण आ जाम तो उसक आगे ऩचास वषद की तऩद्ळमादवारा
           े               े                  े
तऩस्वी बी नन्हा भन्ना रगेगा। चचत्त की सभता राने क मरए एकाग्रता फडी सहाम कयती है ।
                                                 े
                                            अनक्रभ
                                    ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
'गरुत्मागात ् बवेन्भृत्म्.....'
       याजसी औय ताभसी बक्तों को दे खकय साजत्त्वक बक्त कबी कबी हहर जाते हैं। ककसी को
बी दे खकय बक्त को अऩने भागद से डगभग नहीॊ होना चाहहए।
       सभथद याभदास क इदद चगदद याजसी औय बोजन-बगत फहत हो गमे थे। तकायाभजी की बक्त
                    े
भण्डरी सादगी मक्त थी। तकायाभजी कहीॊ बी बजन-कीतदन कयने जाते तो कीतदन कयानेवारे
गहस्थ का सीया-ऩूडी, भारभमरदा आहद नहीॊ रेते थे। सादी-सूदी योटी, तॊदय की बाजी औय छाछ।
 ृ                                                                ू
ऩैदर चरकय जाते। घोडागाडी, ताॉगा आहद का उऩमोग नहीॊ कयते। नतनतऺ तऩस्वी का जीवन
था।
       तकायाभजी की मशष्म-भण्डरी का एक मशष्म दे खता है कक सभथद याभदास की भण्डरी भें
जो रोग जाते हैं वे अच्छे कऩडे ऩहनते हैं, सीया-ऩूडी खाते हैं, भार-भमरदा खाते हैं। कछ बी हो,
सभथद याभदास मशवाजी भहायाज क गरु हैं , याजगरु हैं। उनक खाने-ऩीने का, अभन-चभन का,
                           े                         े
खफ भौज है । उनक मशष्मों को सभाज भें भान बी मभरता है । हभाये गरु तकायाभजी भहायाज क
 ू             े                                                                 े
ऩास कछ नहीॊ है । भखभर क गद्दी-तककमे नहीॊ, खाने-ऩहनने की ठीक व्मवस्था नहीॊ। महाॉ यहकय
                       े
क्मा कयें ?
       ऐसा मशकामतवारा चचन्तन कयते-कयते उस मशष्म को सभथद याभदास की भण्डरी भें जाने
का आकषदण हआ। ऩहॉ चा सभथद क ऩास। हाथ जोडकय प्राथदना की्
                          े
      "भहायाज ! आऩ भझे अऩना मशष्म फनामें। आऩकी भण्डरी भें यहूॉगा, बजन-कीतदन आहद
करूगा। आऩकी सेवा भें यहूॉगा।"
  ॉ
       सभथद जी ने ऩछा् "तू ऩहरे कहाॉ यहा था ?"
                   ू
       "तकायाभजी भहायाज क वहाॉ।" मशष्म फोरा।
                         े
       "तकायाभजी भहायाज से तने भॊत्र मरमा है तो भैं तझे कसे भॊत्र दॉ ू ? अगय भेया मशष्म
                            ू                            ै
फनना है , भेया भॊत्र रेना है तो तकायाभजी को भॊत्र औय भारा वाऩस दे आ। ऩहरे गरुभॊत्र का
त्माग कय तो भैं तेया गरु फनॉ।"
                            ू
       सभथदजी ने उसको सत्म सभझाने क मरए वाऩस बेज हदमा। चेरा तो खश हो गमा कक
                                   े
भैं अबी तकायाभजी का त्माग कयक आता हूॉ।
                             े
       गरुबडक्तमोग क शास्त्र भें आता है कक एक फाय गरु कय रेने क फाद गरु का त्माग नहीॊ
                    े                                          े
कयना चाहहए। गरु का त्माग कयने से        तो मह अच्छा है कक मशष्म ऩहरे से ही गरु न कये औय
सॊसाय भें सडता यहे , बवाटवी भें बटकता यहे । एक फाय गरु कयक उनका त्माग कबी नहीॊ कयना
                                                          े
चाहहए। बगवान शॊकय बी गरुगीता भें कहते हैं-
                             गरुत्मागत ् बवेन्भत्म् भॊत्रत्मागात ् दरयिता।
                                               ृ
                                  गरुभॊत्रऩरयत्मागी यौयवॊ नयक व्रजेत ्।।
                                                             ॊ
तकायाभ जैसे सदगरु, जजनको सत्म भें प्रीनत है , जो आत्भ-साऺात्कायी भहाऩरुष हैं,
जजनका रृदम वैकण्ठ है ऐसे सदगरु का त्माग कयने की कफवद्ध आमी ?
       सभथदजी ने उसको सफक मसखाने का ननद्ळम ककमा।
       चेरा खश होता हआ तकायाभजी क ऩास ऩहॉ चा्
                                 े
       "भहायाज ! भझे आऩका मशष्म अफ नहीॊ यहना है ।"
       तकायाभजी ने कहा् "भैंने तझे मशष्म फनाने क मरए खत मरखकय फरामा ही कहाॉ था ?
                                                े
तू ही अऩने आऩ आकय मशष्म फना था, बाई ! कण्ठी भैंने कहाॉ ऩहनाई है ? तने ही अऩने हाथ
                                                                   ू
से फाॉधी है । भेये गरुदे व ने जो भॊत्र भझे हदमा था वह तझे फता हदमा। उसभें भेया कछ नहीॊ है । "
       "कपय बी भहायाज ! भझे मह कण्ठी नहीॊ चाहहए।"
       "नहीॊ चाहहए तो तोड दो।"
       चेरे ने खीॊचकय कण्ठी तोड दी।
       "अफ आऩका भॊत्र ?"
       "वह तो भेये गरुदे व आऩाजी चैतन्म का प्रसाद है । उसभें भेया कछ नहीॊ है ।"
       "भहायाज ! भझे वह नहीॊ चाहहए। भझे तो दसया गरु कयना है ।"
                                            ू
       "अच्छा, तो भॊत्र त्माग दे ।"
       "कसे त्मागॉू ?"
         ै
       "भॊत्र फोरकय ऩत्थय ऩय थक दे । भॊत्र का त्माग हो जामगा।"
                              ू
       उस अबागे ने गरुभॊत्र का त्माग कयने क मरए भॊत्र फोरकय ऩत्थय ऩय थक हदमा। तफ
                                           े                          ू
अजीफ-सी घटना घटी। ऩत्थय ऩय थकते ही वह भॊत्र उस ऩत्थय ऩय अॊककत हो गमा।
                            ू
       वह गमा सभथद जी क ऩास। फोरा् "भहायाज ! भैं भॊत्र औय कण्ठी वाऩस दे आमा हूॉ।
                       े
अफ भझे अऩना मशष्म फनाओ।"
       "भॊत्र का त्माग ककमा उस सभम क्मा हआ था ?"
       "वह भॊत्र ऩत्थय ऩय अॊककत हो गमा था।"
       "ऐसे गरुदे व का त्माग कयक आमा जजनका भॊत्र ऩत्थय ऩय अॊककत हो जाता है ? ऩत्थय
                                े
जैसे ऩत्थय ऩय भॊत्र का प्रबाव ऩडा रेककन तझ ऩय कोई प्रबाव नहीॊ ऩडा तो कभफख्त भेये ऩास
क्मा रेने आमा है ? ऩत्थय से बी गमा फीता है तो इधय तू क्मा कये गा ? रड्डू खाने क मरए
                                                                               े
आमा है ?"
       "भहायाज ! वहाॉ गरु का त्माग ककमा औय महाॉ आऩने भझे रटकता यखा ?"
       "तेये जैसे रटकते ही यहते हैं। अफ जा, घॊटी फजाता यह। अगरे जन्भ भें फैर फन जाना,
गधा फन जाना, घोडा फन जाना।"
       गरु का हदमा हआ भॊत्र त्मागने से आदभी दरयि हो जाता है । गरु को त्मागने से आदभी
रृदम का अन्धा हो जाता है । गरु क भागददशदन क अनसाय तभ दस वषद तक चरो, आनजन्दत हो
                                े          े
जाओ, कपय अगय गरु भें सन्दे ह कयो मा गरुननन्दा भें रग जाओ तो वाऩस वहीॊ ऩहॉ च जाओगे
जहाॉ से शरु हए थे। दस सार की कभाई का नाश हो जाएगा।
             सभथद जी सना हदमा् "तेये जैसे गरुिोही को भैं मशष्म फनाऊगा ? जा बाई, जा। अऩना
                                                                   ॉ
यास्ता नाऩ।"
             वह तो याभदासजी क सभझ कान ऩकडकय उठ-फैठ कयने रगा, नाक यगडने रगा। योते-
                             े
योते प्राथदना कयने रगा। तफ करुणाभूनतद स्वाभी याभदास ने कहा्
             "तकायाभजी उदाय आत्भा हैं। वहाॉ जा। भेयी ओय से प्राथदना कयना। कहना कक सभथद ने
प्रणाभ कहे हैं। अऩनी गरती की ऺभा भाॉगना।"
             मशष्म अऩने गरु क ऩास वाऩस रौटा। तकायाभजी सभझ गमे कक सभथद का बेजा हआ है
                             े
तो भैं इन्काय कसे करू ? फोरे्
               ै    ॉ
             "अच्छा बाई ! तू आमा था, कण्ठी मरमा था। हभने दी, तने छोडी। कपय रेने आमा है तो
                                                              ू
कपय दे दे ते हैं। सभथद ने बेजा है तो चरो ठीक है । सभथद की जम हो !"
             सॊत उदायात्भा होते हैं। ऐसे बटक हए मशष्मों को थोडा-सा सफक मसखाकय हठकाने रगा
                                            े
दे ते हैं।
             कबी दो गरु नहीॊ हैं, एक ही हैं औय मशष्म का ऩतन होता है तो गरु सभझाते हैं। तफ
उल्टी खोऩडी का मशष्म सभझता है कक भझे मशष्म फनामे यखने क मरए गरु चगडचगडाते हैं। अये
                                                       े
भूखद ! वे चगडचगडाते नहीॊ हैं, तेया सत्मानाश न हो जाम इसमरए तझे सभझाते हैं।
             जजस मशष्म भें कछ सत्त्व होता है वह कपसरते-कपसरते बी फच जाता है । जजसक जीवन
                                                                                  े
भें सत्त्व नहीॊ होता वह ककतना बी सॊसाय की चीजों से फचा हआ हदखे कपय बी उसका कोई
फचाव नहीॊ होता। आणखय भें मभदत उसे घसीट रे जाते हैं। कपय वह फैर फनता है फेचाया, ऩेड
                            ू
फनता है , शूकय, ककय फनता है । न जाने ककतने-ककतने धोखे खाता है ! इसमरए कफीयजी ने
                 ू
कहा्
                                  कफीया इस सॊसाय भें फहत से कीने भीत।
                                  जजन हदर फाॉधा एक से वे सोमे ननजद्ळन्त।।
             एक ऩयभात्भा से जो हदर फाॉध दे ता है उसका सत्त्वगण फढ़ता है , उसक जीवन भें
                                                                             े
अॊतयात्भा का सख आता है । वह महाॉ बी सखी यहता है औय ऩयरोक भें बी सख सख-स्वरूऩ
ईद्वय भें मभर जाता है । वह तयता है, उसका कर बी तयता है , उसक ऩूवजों का बी रृदम प्रसन्न
                                                            े   द
फनता है ।
                                           तयनत शोक आत्भववत ्।
                                                   ॊ
             वह आत्भवेत्ता होकय सॊसाय क शोक सागय से तय जाता है ।
                                       े
                                              अनक्रभ
                                        ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
ऩष्ऩ-चमन
        भनष्म महद अऩनी वववेक शडक्त का आदय न कये , उसका सदऩमोग न कयक बोगों क
                                                                   े       े
सख को ही अऩना जीवन भान रे तो वह ऩश-ऩक्षऺमों से बी गमा-फीता है । क्मोंकक ऩश-ऩऺी
आहद तो कभदपर-बोग क द्राया ऩूवकृत कभों का ऺम कयक उन्ननत की ओय फढ़ यहे हैं ककन्त
                  े          द                 े
वववेक का आदय न कयने वारा भनष्म तो उरटा अऩने को नमे कभों से जकड यहा है , अऩने
चचत्त को औय बी अशद्ध फना यहा है ।
        अत् साधक को चाहहए कक प्राद्ऱ वववेक का आदय कयक उसक द्राया इस फात को सभझे
                                                     े   े
कक मह भनष्म शयीय उसे ककसमरए मभरा है , इसका क्मा उऩमोग है । ववचाय कयने ऩय भारभ
                                                                            ू
होगा कक मह साधन-धाभ है । इसभें प्राणी चचत्त शद्ध कयक अऩने ऩयभ रक्ष्म की प्रानद्ऱ कय सकता
                                                    े
है ।
        भनष्म जफ सभि की ओय दे खता है तफ उसे सभि ही सभि हदखता है औय ऩीछे की
ओय दे खता है तो स्थर ही स्थर नजय आता है । इसी प्रकाय सॊसाय की ओय दे खने से सॊसाय ही
सॊसाय हदखेगा औय सॊसाय की ओय ऩीठ कय रेने ऩय प्रब ही प्रब हदखराई दें गे।
        कभद सीमभत होता है इसमरए उसका पर बी कभद क अनरूऩ सीमभत ही मभरता है । प्रब
                                                े
अनन्त हैं, उनकी कृऩा बी अनन्त है अत् उनकी कृऩा से जो कछ मभरता है वह बी अनन्त
मभरता है । प्रब की प्रानद्ऱ का साधन बी प्रब की कृऩा से ही मभरता है ऐसा भानकय साधक को
अऩने साधन भें सदबाव यखना चाहहए। साधन भें अटर ववद्वासऩूवक सदबाव होने से ही साध्म
                                                       द
की प्रानद्ऱ होती है ।
        जो साधक ककसी प्रकाय क अबाव भें दीन नहीॊ होता अथादत ् उसकी चाह नहीॊ कयता एवॊ
                             े
प्राद्ऱ वस्त मा फर का अमबभान नहीॊ कयता अथादत ् उसे अऩना नहीॊ भानता, सफ कछ अऩने प्रब
को भानता है , वह सच्चा बक्त है । चाहयहहत होने से ही दीनता मभटती है । जहाॉ ककसी प्रकाय के
सख का उऩबोग होता है , वहीॊ भनष्म चाह की ऩूनतद क सख भें आफद्ध हो जाता है औय ऩन्
                                               े
नमी चाह उत्ऩन्न हो जाती है । उसकी दीनता का अन्त नहीॊ होता। दीनता मभटाने क मरए चाह
                                                                         े
को मभटाओ।
        काभना की ननववत्त से होनेवारी जस्थनत फडी उच्च कोहट की है । उस जस्थनत भें
                    ृ
ननववदकल्ऩता आ जाती है , फवद्ध सभ हो जाती है , जजतेजन्िमता प्राद्ऱ हो जाती है । उसक प्राद्ऱ होने
                                                                                  े
ऩय भनष्म स्वमॊ 'कल्ऩतरू' हो जाता है । जजसको रोग कल्ऩतरू कहते हैं उससे तो हहत औय
अहहत दोनों ही होते हैं। ऩय मह कल्ऩतरू तो ऐसा है, जजससे कबी ककसी का बी अहहत नहीॊ
होता। इससे भनष्म को मोग, फोध औय प्रेभ प्राद्ऱ होता है ।
        ककसी बी वस्त को अऩना न भानना त्माग है । त्माग से वीतयागता उत्ऩन्न होती है । याग
की ननववत्त होने ऩय सफ दोष मभट जाते हैं।
      ृ
कहठनाई मा अबाव को हषदऩूवक सहन कयना तऩ है । तऩ से साभर्थमद मभरता है । इस
                               द
साभर्थमद को सेवा भें रगा दे ना चाहहए।
       अहॊ ता औय भभता का नाश ववचाय से होता है । सत्म क फोध से सभस्त द्ख मभट जाते
                                                      े
हैं। सत्म क प्रेभ से अनन्त यस, ऩयभ आनन्द प्राद्ऱ होता है । अऩने को शयीय न भानने से
           े
ननवादसना आती है औय सदा यहने वारी चचय शाॊनत मभरती है ।
                                            अनक्रभ
                               ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


                               बडक्तभनत यानी यत्नावती
       जमऩय क ऩास आॊफेयगढ़ है । वहाॉ क याजा का नाभ था भानमसॊह। भानमसॊह का छोटा बाई
             े                        े
था भाधवमसॊह। भाधवमसॊह की ऩत्नी यत्नावती। यत्नावती का स्वबाव फडा भधय था। दामसमों क साथ
                                                                                 े
बी भधय व्मवहाय कयती थी। वह ठीक से सभझती थी, भानती थी कक हभ जजससे व्मवहाय कयते
हैं वह कोई भशीन नहीॊ है , भनष्म है । उसे बी साॊत्वना चाहहए, सहानबूनत चाहहए, प्माय चाहहए।
अऩने भधय व्मवहाय से, भधय वाणी से, फहढ़मा आचयण से साये भहर भें आदयणीम स्थान प्राद्ऱ
कय चकी थी। दामसमाॉ बी उसक प्रनत फडा आदय-बाव यखती थीॊ।
                         े
       भान दे ने वारे को भान मभरता है , प्रेभ दे ने वारे को प्रेभ मभरता है ।
                         औयों को शक्कय दे ता है वह खद बी शक्कय खा ा है ।
                                                                त
                         औयों को डारे चक्कय भें वह खद बी चक्कय खाता है ।।
       इन ननमनत क भताबफक, जो दसयों का हहत चाहता है , दसयों को स्नेह, भान, आदय, प्रेभ
                 े            ू                       ू
दे ता है , दसये रोग बी उसका हहत चाहते हैं, स्नेह, भान, आदय, प्रेभ दे ते हैं। सफ भें छऩा हआ
            ू
चैतन्म ऩयभात्भा उसका ऩयभ हहत कय दे ता है ।
       यत्नावती का भधय, उदाय, नीनतऩूण, सयर औय सहानबूनत व्मवहाय दास-दामसमों क साथ
                                     द                                      े
भहर क साये ऩरयवाय जनों को सन्तद्श यखता था। जजसका व्मवहाय अनेकों को सॊतद्श कयता है
     े
वह स्वमॊ तवद्शवान फनता है । उसक चचत्त भें बगवान का प्रसाद आ जाता है । उसक रृदम भें प्रब
                               े                                         े
बडक्त क अॊकय पटते हैं।
       े      ू
                                 अद्रे द्शा सवदबूतानाॊ भैत्र् करूण एव च।
                                ननभदभो ननयहॊ काय् सभद्खसख् ऺभी।।
                                सॊतद्श् सततॊ मोगी मतात्भा दृढ़ननद्ळम्।
                              भय्मवऩदतभनोफवद्धमो भदबक्त् स भे वप्रम्।।
       'जो ऩरुष सफ बतों भें द्रे षबाव से यहहत, स्वाथदयहहत, सफका प्रेभी औय हे तयहहत दमार है
                    ू
तथा भभता से यहहत, अहॊ काय से यहहत, सख-द्ख की प्रानद्ऱ भें सभ औय ऺभावान है अथादत ्
अऩयाध कयनेवारे को बी अबम दे ने वारा है तथा जो मोगी ननयन्तय सॊतद्श है , भन-इजन्िमों
सहहत शयीय को वश भें ककमे हए हैं औय भझभें दृढ़ ननद्ळमवारा है वह भझभें अऩदण ककमे हए
भन-फवद्धवारा भेया बक्त भझको वप्रम है ।
                                                                          (गीता् 12.13,14)
       एक भध्म याबत्र को यत्नावती ने दे खा कक अऩनी ववशेष कृऩाऩात्र दासी अऩने कभये    भें
फैठी आॉसू फहा यही है .... यो यही है । दास-दामसमों क सख-द्ख भें सहबागी होने वारी
                                                   े
वात्सल्मभमी यत्नावती ने जाकय ऩछा्
                              ू
       "फहन ! क्मों यो यही है ? तझे क्मा द्ख है ? क्मा तकरीप, ऩीडा, आऩवत्त है ? ककसने
तझे सतामा है ? ऩनभ की यात है .... चाॉद चभक यहा है .... औय तू यो यही है ऩगरी ? भझे फता
                ू
भैं तेया कद्श दय कय दॉ गी।"
               ू       ू
       दासी णखरणखराकय हॉ स ऩडी। फोरी्
       "भाता जी ! आऩक होते हए इस याजभहर भें भझे कोई द्ख नहीॊ है ।"
                     े
       "द्ख नहीॊ है तो कपय भध्मयाबत्र भें यो क्मों यही है ?"
      "यानी साहहफा ! भैं सच कहती हूॉ। भझे कोई कद्श नहीॊ है । भै आनन्द भें हूॉ। भझे बीतय
से जो भधयता मभर यही है न ! वह कसे फताऊ ? भेयी आॉखों भें तो आनन्द क आॉसू हैं। भैं
                                 ै        ॉ                            े
फहत फहत खशी भें हूॉ।" दासी क भख ऩय भधय भस्कान उबय आई।
                            े
       यत्नावती को आद्ळमद हआ् "यो यही है औय फोरती है 'भैं आनन्द भें हूॉ !' आॉखों भें आॉसू
औय भख ऩय भस्कान एक साथ ! कभार है !''
       सॊसारयमों को हॉ सने भें बी भजा नहीॊ आता वह भजा बगवान क प्मायों को बगवान क
                                                             े                  े
ववयह भें योने भें आता है । उस आनन्द की तो फात ही ननयारी है । बोग-ववरास, खान-ऩान औय
अन्म ववषमों से जो मभरता है वह तो हषद है , आनन्द नहीॊ है । बगवान की बडक्त भें जो सख है,
जो आनन्द है वह कछ ननयारा ही है ।
       यानी यत्नावती दे खकय ठगी-सी यह गई। दासी क फदन ऩय हदव्म तेज था, ओज था, ऩववत्र
                                                े
भस्कान थी, प्रबबडक्त की भस्ती थी। उसक आॉसओॊ भें कछ अभत हदख यहा था। वे मशकामत क
                                     े               ृ                        े
आॉसू नहीॊ थे, ननयाशा क आॉसू नहीॊ थे, हताशा क आॉसू नहीॊ थे। वे ऐसे आॉसू थे कक एक-एक
                      े                     े
आॉसू ऩय ववद्वबय क सफ भोती न्मौछावय कय दो कपय फी जजसका भूल्म न चक सक ऐसे हदरफय
                 े                                                 े
क मरए आॉसू थे, प्रबप्रेभ क आॉसू थे, बगवदबडक्त क आॉसू थे।
 े                        े                    े
       यत्नावती आद्ळमदभनध होकय ऩछने रगी्
                                ू
       "इन आॉसूओॊ भें तझे भजा आता है ? आॉसूओॊ को भैं द्खदामी भानती थी। अये ऩगरी !
फता तो सही, इतना आनन्द ककस फात का है ? तेये ऩास कोई बोग-ववरास नहीॊ है , ववशेष खान
ऩान नहीॊ है , कपय फी तेये बीतय खशी सभाती नहीॊ। चेहये ऩय उबय आती है । क्मा फात है?"
दासी ने कहा् "भाता जी! मे तो प्रब प्रेभ क आॉसू हैं, बगवद् बडक्त की भस्ती है । मह तो
                                                े
ऩयभात्भा का प्रसाद है ।"
       "अच्छा ! बगवान की बडक्त भें इतना भजा आता है ! मह बडक्त कसे की जाती है ? भझे
                                                               ै
फतामेगी ?" यत्नावती की जजऻासा अफ अॊकरयत होने रगी।
       अफ सॊमत होकय दासी कहने रगी्
       "यानी साहे फा ! आऩ तो भहरों भें यहने वारी, ये शभी वस्त्र, यत्नजडडत सवणद-अरॊकाय धायण
कयने वारी, सोने-चाॉदी क फतदनों भें बोजन कयने वारी भहायानी हैं..... याजा साहफ की वप्रमा हैं।
                       े
आऩको भैं क्मा फताऊ ? भैं तो आऩकी सेववका ठहयी।"
                  ॉ
       "नहीॊ नहीॊ, ऐसा भत फोर फहन ! सच्ची औय कल्माणकायी फात तो फच्चों से बी री
जाती है । तू सॊकोच भत कय। भझे बी तेये आनन्द भें सहबागी होने दे ।"
       "भहायानी ! बगवान की बडक्त कयना कोई सहज नहीॊ है । मह तो शयों का भागद है । मसय
                                                               ू
का सौदा कयक बडक्त का प्रसाद मभर सकता है ।" दासी ने अऩनी ओजस्वी भिा भें कहा।
           े
       यानी जानती थी कक अऩनी वप्रम दासी ऩववत्र स्वबाव की है , बक्त है , सत्त्वशीर नायी है ।
प्रात्कार जल्दी उठकय बफस्तय भें सवदप्रथभ ऩयभात्भा का चचन्तन कयती है , कपय हदनचमाद का
प्रायॊ ब कयती है । हदन भें बी फाय-फाय दीनानाथ का स्भयण कयती है । उस दासी क मरए यत्नावती
                                                                          े
को भान था, स्नेह था। वह उत्कहठत होकय ऩूछने रगी्
                            ॊ
       "अबी-अबी तू आॉसू फहा यही थी, बाव ववबोय बी हो यही थी.... बडक्त भें कसा होता है ?
                                                                          ै
तझे क्मा अनबव हो यहा था, भझे फता न !"
       "भाता जी ! जाने दो, मह फात भत ऩूछो। बगवान औय बक्त क फीच जो घटनाएॉ घटती
                                                          े
हैं उन्हें बगवान औय बक्त ही जानते हैं। यानी साहे फा ! ऺभा कयो। भझे आऻा कयो, भैं आऩकी
सेवा भें रग जाऊ।"
               ॉ
       यत्नावती सभझ गई की दासी फात टार यही है । उसने कछ यहस्मभम अभत ऩामा है ।
                                                                  ृ
उसक फदन ऩय इतनी भधयता, इतनी शाॊनत छा गई है तो उसक अॊत्कयण भें ककतनी भधयता
   े                                             े
बयी होगी ! यत्नावती की जजऻासा ऩैनी हो उठी। वह कपय से प्रेभऩवक दासी को ऩूछने रगी,
                                                           ू द
यहस्म फताने क मरए भनाने रगी्
             े
       "फहन ! भझे फता, तझे क्मा हआ है ? तेयी आॉखों भें आॉसू हैं औय चेहये ऩय हदव्मता
हदखाई दे यही है ! तू अबी क्मा कय यही थी ? तझे क्मा मभरा है ?"
       दासी ने हॉ सते हए कहा् "भाता जी ! भैं कछ बी नहीॊ कयती थी। भन जो ववचाय कय यहा
था उसे दे खती थी। भैं अऩने चगयधय गोऩार को स्नेह कयती थी, औय कछ नहीॊ कयती थी। 'हे
प्रब ! कयण-कयावणहाय तू ही चैतन्म ऩयभात्भा है ।' इस प्रकाय अऩने रृदमेद्वय क साथ गोवद्ष कय
                                                                          े
यही थी, बाव-भाधमद का आस्वाद रे यही थी।"
       "सखी, भझे ववस्तायऩूवक फता।"
                           द
दासी बडक्त की गोऩनीम फात फताने भें हहचककचाने रगी, फात टारने रगी तो यत्नावती
की उत्सकता औय फढ़ गई। इन्काय बी आभॊत्रण दे ता है ।
        यत्नावती की उत्कठा फढ़ गई। कसे बी कयक बडक्तभागद ववषमक यहस्म फताने क मरए
                        ॊ           ै        े                             े
दासी को याजी कय मरमा। दासी ने अऩनी अनबूनतमों का वणदन ककमा क्मोंकक यानी यत्नावती
अचधकायी नायी थी। बगवद् बडक्त क मरए उऩमक्त सदगण उसभें थे। उसक चचत्त भें दीन-द्खी
                              े                             े
रोगों क मरए सहानबूनत थी, दमा-बावना थी। उसक स्वबाव भें यानी ऩद का अहॊ काय नहीॊ था।
       े                                  े
ऐसे सदगणों क कायण यानी को अचधकायी सभझकय दासी ने बगवद् बडक्त क यहस्म उसक आगे
            े                                                े         े
प्रकट ककमे। यानी क चचत्त भें प्रबप्रीनत की प्रानद्ऱ क मरए तडऩ जाग उठी। वह सोचने रगी्
                  े                                  े
     "भैं कहराती हूॉ यानी रेककन भझे जो सख औय आनन्द नहीॊ मभरता वह सख औय
आनन्द मह गयीफ सी दासी ऩा यही है । सख औय आनन्द अगय यानीऩद भें मा धन-वैबव भें होता
तो सफ धनवान औय सत्तावान स्त्री-ऩरुष सखी औय आनजन्दत होते। सख अन्त्कयण की सॊऩवत्त
है । अन्त्कयण जजतना अॊतयतभ चैतन्म भें प्रववद्श होता है उतना वह आदभी सखी यहता है ।
साधन एक सववधा भात्र है । सख उससे ननयारी चीज है । सववधा शयीय को मभरती है जफकक सख
अॊत्कयण को मभरता है । रोग सववधा को सख भानकय अऩने को सच्चे सख से वॊचचत यख दे ते
हैं।
        यानी को अॊत्कयण क खजाने खोरने की उत्कठा जाग उठी। बगवान की बडक्त क मरए
                         े                   ॊ                           े
चचत्त व्माकर हो उठा। दासी कहने रगी्
        "भाता जी ! आऩ यहने दो। मह दगदभ भागद है । इस भागद ऩय चरना कहठन है । रोग
टोकगे, है यान कयें गे, भझे बी कडी नज़य से दे खेंगे। जीवन जैसे चरता है वैसे ही चरने दो। बडक्त
   ें
क भागद ऩय प्रायॊ ब भें खफ सहना ऩडता है । हाॉ, जफ मभरता है तफ अभूल्म औय शाद्वत खजाना
 े                      ू
मभरता है । उसक मरए ववषम-ववरास औय अहॊ ऩने का भूल्म चकाना ऩडता है । अहॊ का भूल्म हदमे
              े
बफना वह अभूल्म मभरता नहीॊ है । फीज अऩने आऩका फमरदान दे दे ता है तफ वऺ फन ऩाता है ।
                                                                    ृ
सासाॊरयक भोह-भभता, ववषम बोगों का फमरदान दे ने से ऩयभात्भ-प्रीनत का द्राय खरता है । अत्
यानी साहे फा ! मह गोतेखोयों का काभ है , कामयों का काभ नहीॊ है । अगय आऩ बडक्त क भागद ऩय
                                                                              े
आमेंगी तो भहर भें भझे कछ का कछ सनना ऩडेगा।"
        यत्नावती ने कहा् "फहन ! तू घफयाना भत। आज से तू भेयी गरु है । तेया अनबव सनकय
भझे नटवय नागय, चगरयधय गोऩार क मरए प्रीनत जागी है । चधक्काय है इस ववषम-ववरास वारे
                             े
यानी ऩद को ! हभ रोग भहरों भें यहकय ववकायी सख भें जीवन नघस डारते हैं औय तू एक
झोंऩडी भें बी ननववदकायी नायामण क सख भें जीवन धन्म कय यही है । भहर बी सख का साधन
                                े
नहीॊ है औय झोंऩडा बी सख का साधन नहीॊ है । सख का सच्चा साधन तो तम्हाया वह साध्म
ऩयभात्भदे व है ।"
यत्नावती को बडक्त का यॊ ग रगा। दासी क सत्सॊग से उसभें सत्त्वगण फढ़ा। बडक्त जजसक
                                             े                                         े
अॊत्कयण भें हो, हदर भें हो, रृदम भें हो वह चाहे दासी क शयीय भें हो चाहे दास क शयीय भें
                                                      े                      े
हो, जडबयत जी क शयीय भें हो चाहे , शकदे व जी क शयीय भे हो, उसको हजाय-हजाय प्रणाभ है ।
              े                              े
        बडक्तभती दासी क सत्सॊग से यानी सत्सॊगी फन गई। ये शभी वस्त्राबूषण उतायकय सूती सादे
                       े
वस्त्र ऩहन मरमे। कण्ठ भें चभकती हई भोनतमों की भारा उताय कय तरसी की भारा धायण कय
री। हाथ भें यत्नजडडत कगन औय सवणद की अॉगूहठमाॉ शोबा दे यही थीॊ वे सफ उताय दीॊ।
                      ॊ
        जफ बडक्त शरु होती है तफ बीतय का कल्भष दय होने रगता है । दसये बक्तों का सॊग
                                               ू                 ू
अच्छा रगता है । आहाय-ववहाय फदर कय साजत्त्वक हो जाता है । सदगण ऩनऩने रगते हैं। व्मडक्त
क चचत्त भें हदव्म चेतना का प्रबाव औय आनन्द ववकमसत होने रगता है ।
 े
        यानी क अॊत्कयण भें यस-स्वरूऩ ऩयभात्भा का प्रसाद ववकमसत होने रगा। जहाॉ
              े
ववरासबवन था वहाॉ बगवान का रीराबवन फन गमा। बगवान का नाभजऩ, साधन-बजन-
कीतदन, ऩजा-ऩाठ, ऩष्ऩ-चॊदन, धऩ-दीऩ होने रगे। सायी हदनचमाद बगवान से ओतप्रोत फन गई।
        ू                   ू
उसका फोरना चारना कभ हो गमा, हास्म-ववरास कभ हो गमा। इजन्िमों की चॊचरता की जो
साभग्री थी वह यानी रेती नहीॊ। आवश्मकता होती उतना ही खाती, आवश्मकता होती उतना ही
फोरती। उसकी वाणी भें फडा आकषदण आ गमा।
        जो कभ फोरता है , कवर जरूयी होता है उतना ही फोरता है उसकी वाणी भें शडक्त आती
                          े
है । जो व्मथद की फडफडाहट कयता है , दो रोग मभरें तो फोरने रग जाता है , भण्डरी फनाकय
फकवास कयता यहे वह अऩनी सूक्ष्भ शडक्तमाॉ ऺीण कय दे ता है । उसकी वाणी का कोई भूल्म नहीॊ
यहता।
        यत्नावती की वाणी भें सॊमभ का ओज प्रकट हो यहा था।
        स्त्री भें मह गण है । एक फाय अगय बडक्त को, ऻान को, सेवा को ठीक से ऩकड रेती है
तो कपय जल्दी से छोडती नहीॊ। ऩरुष छोड दे ता है । स्त्री नहीॊ छोडती। भीया ने श्रीकृष्ण की बडक्त
ऩकड री तो ऩकड री। शफयी ने भतॊग ऋवष क चयणों भें अऩना जीवन सेवा औय साधनाभम
                                    े
कय मरमा।
        स्त्री भें ऐसे गण बी होते हैं। बम, कऩट, अऩववत्रता आहद दगण ऩरुष की अऩेऺा स्त्री
                                                                द
शयीय भें ववशेष रूऩ से यहते हैं तो श्रद्धा, सभऩदण, सेवा आहद सदगण, सेवा आहद सदगण बी
ऩरुष की अऩेऺा ववशेष रूऩ से यहते हैं।
        यत्नावती ने अऩने सदगण फढ़ामे तो दगण ऺीण हो गमे।
                                          द
                             बडक्त कये कोई सूयभा जानत वयण कर खोम।
        बडक्त का भागद ऐसा है कक एक फाय थोडा-सा ककसी को मभर जाता है । उसका यॊ ग-ढॊ ग ही
फदर जाता है । एक फाय उस चगरयधय गोऩार की, भाधमददाता की भधयता की थोडी सी ही झरक
मभर जाम कपय मह जगत पीका ऩड जाता है । षडयस सफ पीक ऩड जाते हैं। अॊतय का यस ही
                                                े
ऐसा है ।
         यत्नावती ने बोग ववरास क बवन को हरयबडक्त का बवन फना हदमा। वह कबी नाचती है
                                े
तो कबी बडक्त यस क ऩद गाती-आराऩती है , कबी आयती कयती है , कबी भौन धायण कयती है ।
                 े
         चचत्त भें एक सदगण आता है तो दसयों को वह खीॊच रे आता है । जॊजीय की एक कडी
                                      ू
हाथ भें आ गई तो व्मडक्त ऩूयी जॊजीय को खीॊच सकता है ।
         यत्नावती की ऩण्माई फढ़ी तो उसे याभामण की चोऩाई चरयताथद कयने की उत्कठा अऩने
                                                                            ॊ
आऩ जागी।
                                  प्रथभ बडक्त सॊतन कय सॊगा.....।
         उसने दासी से कहा् "हे दासी ! तू तो भेये मरए सॊत है ही। औय सॊत बी गाॉव भें आमे
हैं। सावन का भहीना है । अगय मह यानीऩद का खटा न होता तो भैं तेये साथ आती।"
                                          ॉू
       कपय सोचते-सोचते यत्नावती को ववचाय आमा कक् "भैं यानी हूॉ तो भझभें क्मा यानी है ?
भेया हाथ यानी है कक ऩैय यानी है ? भेया भॉह यानी है कक भस्तक यानी है ? मह यानीऩद कहाॉ
घसा है ?' दासी को अऩना ववचायववभशद फताने ऩय दासी ने कहा्
         "यानी जी ! मह तो सन-सनकय ऩक्का ककमा है , वास्तव भें यानीऩद है ही नहीॊ।"
         "तफ तो भैंने इस यानीऩद को छोडा।" यत्नावती कहने रगी् "चरो, हभ सॊत-दशदन को
चरें।"
         प्रथभ तो दासी घफडामी, कपय सहभत होकय यानी क साथ सॊतों की भण्डरी भे गई।
                                                   े
         उस जभाने भें यानी साध-भण्डरी भें जाम तो हो गमा ऩूया। सफ ऊगरी उठाने रगे। साये
                              ू                                   ॉ
गाॉव भें फात पर गई।
              ै
         अये बैमा ! कथा भें तो तू बगवान का है औय बगवान तेये हैं। अऩने ऩद औय प्रनतद्षा को
छोड दे ।
         रोग कहने रगे् "यानी साहे फा ! घय चरो। आऩ महाॉ कसे आमे..... क्मों आमे....?" आहद
                                                        ै
आहद।
         यानी को हआ कक मह कौन से ऩाऩ का पर है कक कथा सनने भें बी भझे तकरीप ऩड
यही है ? मे ऩद-प्रनतद्षा तो कथा सनने की जगह ऩय फैठने बी नहीॊ दे ते।
                             बडक्त कये कोई सूयभा जानत वयण कर खोम।
                              काभी क्रोधी रारची उनसे बडक्त न होम।।
         काभ, क्रोध, रोब आहद ववकायों को छोडने की हहम्भत हो उसी की बडक्तरूऩी फेमर फढ़ती
है ।
यत्नावती ऐसी ननडय थी। उसने हहम्भत की, सच्चे रृदम से प्राथदना की कक् "हे प्रब ! भैं
तो तेयी हूॉ। यानीऩद को आग रगे। भझे तो तेयी बडक्त दे ना। भैं यानी नहीॊ, तेयी बगतनी फन
जाऊ ऐसा कयना।"
   ॉ
       ऩववत्र स्थान भें ककमा हआ सॊकल्ऩ जल्दी परता है । जहाॉ सत्सॊग होता हो, हरयचचाद होती
हो, हरयकीतदन होता हो वहाॉ अगय शब सॊकल्ऩ ककमा जाम तो जल्दी मसद्ध होता है । अऩने ऩाऩ
का प्रामजद्ळत कयक दफाया वह ऩाऩ नहीॊ कयने का ननद्ळम ककमा जाम तो जल्दी ननष्ऩाऩ हआ
                 े
जाता है ।
         यानी की भनोकाभना परी। उसने ऐसा ननद्ळम ककमा कक अफ भैं ऐसी यहूॉगी कक रोग भझे
दे खें तो उन्हें 'यानी आमी' ऐसा नहीॊ अवऩत 'बगताणी आमी' ऐसा भहसस हो।
                                                              ू
       फाय-फाय सत्सॊग कयने से बडक्त ऩद्श होती है । साधन-बजन से सत्सॊग भें रूचच होती है ।
सत्सॊग कयने से साधन भें रूचच होती है । जैसे भेघ सयोवय को ऩद्श कयता है औय सयोवय भेघ को
ऩद्श कयता है वैसे ही सत्सॊग साधन को ऩोसता है औय साधन सत्सॊग को ऩोसता है ।
       यत्नावती की साधना फढ़ी। उन हदनों याजा भाधवमसॊह हदल्री भें था। यत्नावती क बडक्त
                                                                               े
बाव की फात गाॉव भें परी तफ वजीय ने चचट्ठी मरखी की यत्नावती को बडक्त का यॊ ग रगा है ।
                     ै
याजभहर छोडकय भोडों क (साधओॊ क) सॊग भे घण्टों तक फैठी यहती है । अफ आऩकी जो आऻा।
                    े        े
       भाधवमसॊह रारऩीरा हो गमा् 'भेयी ऩत्नी याजभहर छोडकय भोडों की भण्डरी भें !' उसका
हाथ तरवाय ऩय गमा। ऩास भें उसका रडका खडा था प्रेभमसॊह। उसने कहा्
       "वऩता जी ! आऩ क्रोध भत कयो।"
       प्रेभमसॊह ऩूवजन्भ का कोई सत्ऩात्र होगा। भाॉ की बडक्त का यॊ ग रगा तो उसने बी गरे भें
                    द
तरसी की भारा ऩहन री थी। ऩत्र क गरे भें तरसी की भारा औय रराट ऩय नतरक दे खकय
                              े
भाधवमसॊह का गस्सा औय बडका। उसने जोय से डाॉटा्
       "जा भोडी का ! भेये साभने क्मों आमा ?"
       प्रेभमसॊह कहता है ् "वऩताजी ! आऩ धन्म हैं कक भेयी भाता को भोडी कह हदमा। भैं बी
अफ भोडी का फेटा होकय हदखाऊगा।"
                          ॉ
       वऩता क क्रोध का बी उसने अच्छा ही अथद ननकारा। भाॉ को ऩत्र मरखा कक्
             े
       "भाॉ ! तू धन्म है । तेयी कोख से भैंने जन्भ मरमा है । भेये वऩता को तेयी बडक्त का
सभाचाय मभरा तो कोऩामभान हए हैं। उन्होंने भझे तम्हाये प्रनत अच्छे बाववारी फात कयते
जानकय भझे तो वयदान ही दे हदमा है , 'चरा जा भोडी का ! तू बी भोडा हो जा, साधडी का
साधू हो जा। भैंने तो उनकी आऻा मशयोधामद की है । भेयी भाॉ साध्वी फने औय भैं साधू फनॉू तबी
भेये वऩता क वचन का ऩरन होगा। तो भाता ! भैं तेयी कोख से जन्भा हूॉ। भेये वऩता का वचन
           े
खारी न जाम।"
प्रेभमसॊह ने हदल्री भें भाॉ को ऐसा ऩत्र मरख हदमा। भाॉ को फडा आनन्द हआ कक, 'वाह !
भेया ऩत्र साधू होता है ! धन्म है !'
        अफ बडक्तभती यत्नावती बी यानीऩने क थोडे फहत जो बी चचन्ह थे उन्हें छोडकय एकदभ
                                         े
सादे वस्त्र से मक्त होकय ऩववत्र, तेजस्वी, ऩण्मशीरा साध्वी फन गई।
        आऩ कसे वस्त्र ऩहनते हो उसका बी भन ऩय प्रबाव ऩडता है । कसी ऩस्तक ऩढ़ते हो, कहाॉ
            ै                                                  ै
यहते हो, कभये भें कसा पनीचय औय कसे चचत्र यखे हैं उसका बी भन ऩय प्रबाव ऩडता है ।
                   ै            ै
आऩक ववचायों क अनरूऩ सक्ष्भ ऩयभाण आऩकी ओय प्रवाहहत होते हैं। क्रोधी को क्रोधाजनन फढ़े
   े         े       ू
ऐसे ऩयभाण मभरते हैं। अशाॊत को अशाॊनत फढ़े , सॊशमात्भा का सॊशम फढ़े , प्रेभी का प्रेभ फढ़े औय
बक्त की बडक्त फढ़े ऐसे ही ऩयभाण औय भाहौर मभर जाता है ।
        नायामण.... नायामण.... नायामण.... नायामण..... नायामण.....।
        फाई यत्नावती को ऩक्का यॊ ग रग गमा। उसने बगवान क आगे सॊकल्ऩ ककमा कक, "भेये
                                                       े
फेटे को 'भोडी का फेटा' कहा है तो भैं बी सच्ची बक्तानी होकय यहूॉगी। वाह भेये प्रब ! भैंने तो
कवर भेये मरए ही बडक्त भाॉगी थी। तूने तो भाॉ औय फेटे, दोनों को उसक वऩता से वयदान हदरा
 े                                                                   े
हदमा। वाह भेये प्रब !
        मे भेये कोई नहीॊ थे। आज तक भैं भानती थी कक भेया ऩनत है , भेया दे वय है रेककन वे
अऩनी वासनाओॊ क गराभ हैं। वे भझे प्माय नहीॊ कयते थे, अऩनी इच्छा-वासनाओॊ को प्माय
              े
कयते थे, अफ भझे ऩता चरा। भझे तो हे ववद्वनाथ ! तू ही प्माय कयता है अभय फनाने के
मरए।"
        ऩनत औय ऩत्नी का सम्फन्ध वास्तव भें वासना की कच्ची दीवाय ऩय आधारयत है । सेठ
औय नौकय का सम्फन्ध रोब औय धन की दीवाय ऩय आधारयत है । मभत्र-मभत्र का सम्फन्ध बी
प्राम् ऐसा ही होता है । कोई कोई मभत्र हो उनकी फात अरग है । सॊसाय क जो-जो सम्फन्ध हैं वे
                                                                  े
दसयों से अऩना उल्रू सीधा कयने क मरए हैं।
 ू                             े
        बक्त औय सॊत का सम्फन्ध, गरु औय मशष्म का सम्फन्ध ईद्वय क नाते होता है । इसमरए
                                                               े
मह शद्ध सम्फन्ध है , फाकी क साये सम्फन्ध स्वाथदभूरक हैं।
                           े
        बगत औय जगत का कफ फना है ? बगत-जगत का ववयोध सदा से चरता आ यहा है ।
स्त्री को यॊ ग रग जाता है तो ऩरुष नायाज हो जाता है । ऩरुष को यॊ ग रग जाता है तो स्त्री
मशकामत कयती है ।
        तकायाभ का एक कठोय ननन्दक मशवोफा ननन्दा कयते-कयते तकायाभ क अचधक सॊऩक भें
                                                                 े         द
आमा तो उसको यॊ ग रग गमा, वह बक्त फन गमा।
        कई रोगों को यॊ ग रगता है रेककन ऩण्मों भें कभी होती है तो वे ननन्दक फन जाते हैं।
कबी ननन्दक बी फदरकय साधक फन जाता है । ऐसा होता यहता है । इसी का नाभ सॊसाय है ।
मभत्र शत्र हो जाता है , शत्र मभत्र हो जाता है ।
मशवोफा तकायाभजी का साधक फन गमा तो उसकी ऩत्नी को रगा कक भेये ऩनत को इस
भहायाज ने बगत फना हदमा, भैं भहायाज को दे ख रॉ ूगी। उसने उफरता हआ ऩानी तकायाभजी की
ऩीठ ऩय ढोर हदमा।
       ऩनत को बडक्त का यॊ ग रगता है तो ऩत्नी का चचत्त उफरता है , ऩत्नी को यॊ ग रगता है तो
ऩनत का चचत्त उफरता है । दोनों को यॊ ग रगता है तो दसये कटम्फी नायाज होते हैं। साये कटम्फ
                                                  ू
को यॊ ग रगता है तो ऩडोसी नायाज हो जाते हैं। फोरते हैं कक साया बगतडा हो गमा है ।
       जजनको यजो-तभोगण औय ववकायों को ऩोसकय जीना है औय जजनको ईद्वयीम भस्ती भें
जीना है , सत्त्वगणी होकय जीना है उन दोनों की हदशाएॉ अरग हो जाती हैं। जैसे, प्रह्लाद औय
हहयण्मकमशऩ, भीया औय ववक्रभ याणा।
       बडक्त क भागद ऩय आदभी चरता है तो कबी-कबी ताभसी तत्त्ववारे रोग ववयोध कयते हैं
              े
रेककन बक्त उस ववयोध क कायण बडक्त छोड नहीॊ दे ता है ।
                     े
       यानी यत्नावती बी सॊत-चरयत्र सन-सनकय ऩद्श हो गई थी। अऩने भागद ऩय अडडगता से
आगे फढ़ यही थी।
       भाधवमसॊह उसी सभम वहाॉ से चरा आॉफेयगढ़ क मरए। अऩने नगय भें आमा तफ शयाफी-
                                              े
कफाबफमों ने यत्नावती क फाये भें फढ़ा-चढ़ाकय सनामा। क्रोधी को क्रोध फढ़ानेवारा साभान मभर
                      े
गमा। उन्हीॊ रोगों औय भॊबत्रमों से ववचाय-ववभशद ककमा कक यानी को भत्मदण्ड हदमा जाम। भॊबत्रमों
                                                               ृ
ने कहा्
       "अऩनी ही यानी को आऩ भत्मदण्ड दें गे तो कर ऩय करॊक रगेगा औय याज्म भें योष
                            ृ
परेगा।"
 ै
       याजा ने कहा् "दसया कोई उऩाम खोजो। अफ उसका भॉह नहीॊ दे खना है । खद बी बफगडी,
                      ू
रडक को बी बफगाडा।"
   े
       बफगडे हए रोगों को बगवान क बक्त बफगडे हए हदखते हैं। वास्तव भें वे बक्त ही सधयते
                                े
हैं।
                                सनो भेये बाईमों ! सनो भेये मभतवा !
                                       कफीया बफगड गमो ये ...
       काशी भें औय कोई दारू नहीॊ ऩीता होगा ? फस, कवर कफीय ही मभर गमे दारू ऩीनेवारे
                                                  े
? कफीय भाॊस खाते हैं..... कफीय वेश्मा क ऩास जाते हैं.....' कफीय तो कबी गमे बी नहीॊ होंगे
                                       े
भगय बफगडे हए रोग बक्तों को ऐसे ऩये शान कयते हैं, क्मोंकक ऩयाऩूवद से कदयत का ऐसा ननमभ
है । बक्त की बडक्त भजफूत कयनी हो तो ऐसा कछ चाहहए।
       सफने मभरकय षडमॊत्र यच हदमा् "बूखे शेय को वऩॊजये भें फन्द कयक वऩॊजया भोडी क
                                                                   े             े
भहर क द्राय ऩय यखकय दयवाजा खोर दें गे। बखा शेय भनष्म की गन्ध आते ही भोडी का
     े                                  ू
मशकाय कय रेगा। हभाया काॉटा दय हो जाएगा। नगय भें जाहहय कय दें गे कक नौकयों की
                            ू
असावधानी से शेय खर गमा औय दघदटना भें यानी खऩ गई। हभ ऩय करॊक नहीॊ रगेगा।'
       करॊककत व्मडक्त ककतना बी फचना चाहे ऩय करॊक रगे रगे औय रगे ही।
       ऩयभात्भा ऩयभ दमार हैं। बक्त की राज यखने भें , अबक्त को जया चभत्काय हदखाने भें
बगवान ऩीछे नहीॊ यहते।
       शाभ का सभम था। वऩॊजया रामा गमा। वऩॊजये का दयवाजा खरा कक शेय गजदना कयता
हआ यानी यत्नावती क कभये की ओय गमा। बडक्तभनत यत्नावती प्रब-भॊहदय भें ठाकयजी की भनतद क
                  े                                                            ू    े
साभने बावववबोय फैठी थी। ध्मान-भनन जैसी दशा.... आॉखों भें से हषद क अश्रू फह यहे हैं। दासी
                                                                 े
ने शेय को दे खा तो चचल्रा उठी्
       "भाता जी ! शेय आमा.... शेय....!!"
       यत्नावती ने सना, दे खा, उदगाय ननकरा्
       "नहीॊ नहीॊ..... मे तो नमसॊह बगवान हैं।" यानी ऩजा की थारी रेकय शेय क साभने गई।
                              ृ                      ू                    े
       'जरे ववष्ण् स्थरे ववष्ण्......' शेय क अॊतय भें बी वही चैतन्म आत्भा है । यानी को वह
                                            े
मसॊह नमसॊह क रूऩ भे हदखा। उसका ऩजन ककमा। याजा क षडमॊत्रफाज नौकय रोग दे खते यहे कक
      ृ     े                   ू              े
मह बखा शेय चऩचाऩ खडा है ! ....औय उसकी ऩूजा !
    ू
       उनको शेय हदखता है औय यानी को ऩयभात्भा। दृवद्शये व सवद्श्। जैसी दृवद्श वैसी सवद्श।
                                                          ृ                        ृ
       दासी दे ख यही है औय यत्नावती बावऩूवक शेय का ऩूजन कय यही है ्
                                          द
       "बगवान ! प्रह्लाद क आगे आऩ नमसॊह क रूऩ भें आमे थे। आज भेये आगे मसॊह क रूऩ भें
                          े        ृ     े                                  े
आमे हो ! भेये चगयधय ! भेये चैतन्म ! आज मह दे श रेकय आमे ? आऩ तो प्राणीभात्र क आधाय
                                                                             े
हो। हे सवादधाय ! आऩ मसॊह फने हो ?"
       ऐसा कहते हए यत्नावती प्रणाभ कयती है , भन-ही-भन बाव सभाचध का आस्वादन रेती है ।
वह बफल्कर शाॊत हो गई है ।
       फाहय रोगों ने सोचा, यत्नावती को शेय खा गमा। शेय ने यत्नावती को तो खामा नहीॊ रेककन
यत्नावती क दे हाध्मास को उस दे हातीत तत्त्व ने अऩने चयणों भें सभा मरमा।
          े
                                 जा को याखे साॉईमाॉ भाय न सक कोई।
                                                            े
                             फार न फाॉका कय सक चाहे जग वैयी होम।।
                                              े
       जजसभें सत्त्वगण फढ़ता है , बाव की दृढ़ता फढ़ती है उसक मरए शत्र ककतना बी आमोजन
                                                            े
कय रे, अगय उसका प्रायब्ध शेष है तो कोई उसे भाय नहीॊ सकता। महद प्रायब्ध शेष नहीॊ है तो
सफ मभरकय जजरा बी नहीॊ सकते बैमा ! अत् बगवान का बक्त इन तत्त्वों से डयता नहीॊ, अऩनी
बडक्त छोडता नहीॊ।
शेय अफ वहाॉ से रौटा औय जो दय से दे ख यहे थे उनको स्वधाभ ऩहॉ चा हदमा। ककसी का
                                  ू
नास्ता ककमा, ककसी को ऐसे ही सीधा मभऩयी ऩहॉ चामा। सफको ठीक कयक शेय वाऩस वऩॊजये भें
                                                             े
घस गमा।
       भाधवमसॊह भहर की अटायी से मह सफ दे ख यहा था। उसको रगा कक बगवान क प्रबाव
                                                                      े
क बफना मह नहीॊ हो सकता। शेय कभये भें जाम औय यानी उसकी आयती उताये , शेय मसय
 े
झकाकय वाऩस आवे औय नौकयों को खा जाम.... मह चभत्काय है । वास्तव भें भैंने यानी को
सभझने भें बर की है । ऐसी यानी कबी गस्से भें आकय भझे कछ कह दे गी तो भेया क्मा होगा ?
           ू
याज्म का क्मा होगा ?
       बोगी को चायों ओय से बम क ववचाय घेये ही यहते हैं। आऩने कई फाय कथाएॉ सनी होगी
                               े
कक ककसी भनन ने तऩस्मा की औय इन्ि का आसन हहरा। जफ-जफ हहरता है तफ-तफ इन्ि का
आसन ही हहरता है , कबी बी मभयाज का आसन ऩाडा हहरा हो ऐसा सना ? कबी नहीॊ। वास्तव
भें तो मभयाज का ऩाडा हहरना चाहहए। भगय जफ हहरा है तफ इन्ि का आसन ही हहरा है । जहाॉ
बोगववत्त हो, रगाव हो उसका ही हदर हहरता है । जहाॉ त्माग हो, अनशासन हो वहाॉ क्मा हहरेगा
    ृ
? आज तक भैंने मह नहीॊ सना कक ककसी तऩस्वी भनन ने तऩस्मा की औय मभयाज का ऩाडा
हहरा। मह तो सना है कक ववद्वामभत्र ने तऩ ककमा, नय-नायामण ने तऩ ककमा औय इन्ि का
आसन हहरा। आऩने बी सना होगा।
       याजा घफडामा। ऩण्मशीर सशीर व्मडक्त का दशदन कयने से बी अॊतय भें , आॉखों भें ऩववत्रता
आती है । भाधवमसॊह को रगा कक भैंने यानी क साथ अन्माम ककमा है । वह यानी क भहर भें
                                        े                              े
गमा औय आदयऩूवक यानी को प्रणाभ कयने रगा्
             द
       "हे दे वी ! भझे ऺभा कयो।"
       यानी तो बाव-सभाचध भें ननभनन थी। दासी ने कहा् "यत्नावती भाॉ ! याजा साहफ प्रणाभ
कय यहे हैं।"
       यानी ने कहा् "भझे प्रणाभ नहीॊ कयते, वे तो ठाकय जी को प्रणाभ कयते हैं।"
       भाधवमसॊह की दृवद्श फदर गई। दृवद्श फदर जाम तो सवद्श सखभम हो जाम। यानी तो वही
                                                     ृ
की वही थी। उसको द्रे षफवद्ध से दे खकय याजा का खन गयभ हो गमा था। अफ बडक्तफवद्ध से
                                               ू
दे खकय याजा क रृदम भें बडक्त फढ़ी।
             े
       बक्त तो वही का वही होता है । कोई उसभें दोषफवद्ध कये तो वह ऩाऩ का बागी होता है
औय आदयफवद्ध कये तो ऩण्म की प्रानद्ऱ होती है । ऩण्म फढ़ता है तो ऩयभ ऩण्मशीर ऩयभात्भा की
बडक्त उसे मभरती है ।
       अफ यानी स्वतॊत्र होकय बडक्तबाव भें सवदथा रग गई। भाधवमसॊह ने उसकी भजी के
भताबफक सफ व्मवस्था फदर दी।
एक हदन भाधवमसॊह अऩने फडे बाई भानमसॊह क साथ मात्रा ऩय गमा। नदी ऩाय कयना
                                             े
था। नदी फाढ़ भें आमी हई थी। ऩानी का वेग फडा प्रफर था। नाव उरट-ऩरट हो यही थी।
भाधवमसॊह ने भानमसॊह से कहा्
        "बाई ! अफ फचना भजश्कर है । भगय भैं आऩको सराह दे ता हूॉ कक आऩकी अनजवधू
अथादत ् भेयी ऩत्नी बगवान की ऩयभ बक्त है । उसका ऩत्र बी बक्त है , उसकी दासी बी बक्त है ।
उसक नाश क मरए भैंने षडमॊत्र यचा तो बी भझे बडक्त मभरी। अफ हभ दोनों मभरकय सच्चे रृदम
   े     े
से उसे माद कयें तो हभायी सयऺा हो जामेगी, अन्मथा फेभौत भयना ऩडेगा।"
       बाई सहभत हो गमा। दोनों ने ऩतवाय छोड दी। सच्चे रृदम से बावऩवक बडक्तभती यानी
                                                                 ू द
यत्नावती का स्भयण कयने रगे। भानो, उसक चचन्तन भें तल्रीन हो गमे। अनजाने भें अऩनी
                                     े
अॊतयात्भा भें ऩहॉ च गमे।
       दै वमोग कहो, बगवान की रीरा कहो, यत्नावती की ऩण्माई कहो, कसे बी कयक फाढ़ क
                                                                ै        े      े
तपान भें टकयाती नाव आणखय ककनाये ऩहॉ च गई। भाधवमसॊह को तो यत्नावती भें श्रद्धा थी ही, अफ
 ू
भानमसॊह को बी श्रद्धा हो गई।
       बोगी को अगय मोग मभरे, अबक्त को अगय बडक्त मभरे, अशाॊत को अगय ऩयभ शाॊनत
दे नेवारा यास्ता मभरे तो वह भनष्म ऊचा बी उतना ही उठ सकता है , आगे फढ़ सकता है । जो
                                   ॉ
यानी याजभहर भे बोग-ववरास भें , सॊसाय क कीचड भें पसी जा यही थी उसे बक्तरृदमा दासी का
                                      े          ॉ
सॊऩक हआ तो वह यानी स्वमॊ तो तय गई, उसका चचन्तन कयने वारे रोग बी ऩाय हो गमे।
    द
                               बडक्त कये ऩातार भें प्रकट होम आकाश।
                                 दाफी ऩण दफे नहीॊ कस्तूयी सवास।।
                                          ू
       हरय की बडक्त, हरयऻान औय हरय क बक्तों का सॊग जजसको मभर गमा उसको सच्चा धन
                                    े
मभर गमा। उसक मसवाम जो कछ मभरा वह उऩाचध है ।
            े
                               हरयकथा ही कथा फाकी सफ जगव्मथा।
                                          अनक्रभ
                                ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
       साधक को ऐसा नहीॊ भानना चाहहए कक अभक वस्त, व्मडक्त, अवस्था मा ऩरयजस्थनत क न
                                                                               े
मभरने क कायण साधना नहीॊ हो सकती है मा उस व्मडक्त ने साधना भें ववघ्न डार हदमा। उसे
       े
तो मही भानना चाहहए कक कोई बी व्मडक्त साधना भें ववघ्न नहीॊ डार सकता। बगवान तो ववघ्न
डारते नहीॊ, सफ प्रकाय से सहामता कयते हैं औय अन्म ककसी की साभर्थमद नहीॊ है । अत् भेयी
दफदरता ही ववघ्न है ।
       वास्तव भें तो साधक का ववद्वास औय प्रेभ ही साधना भें रूचच औय तत्ऩयता उत्ऩन्न
कयता है । साधना क मरए फाह्य सहामता आवश्मक नहीॊ है ।
                 े
साधक को चाहहए कक कयने मोनम हये क काभ को साधन सभझे। छोटे - से-छोटा जो बी
काभ प्राद्ऱ हो, उसे ऩूयी मोनमता रगाकय उत्साहऩूवक, जैसे कयना चाहहए वैसे ठीक-ठीक कये । जो
                                               द
काभ बगवान क नाते, बगवान की प्रसन्नता क मरए ककमे जाते हैं वे सबी काभ साधना हैं।
           े                          े
                                        अनक्रभ
                              ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

Daivi sampada

  • 2.
    प्रात् स्भयणीम ऩयभऩूज्म सॊत श्री आसायाभजी फाऩू के सत्सॊग-प्रवचन दै वी सॊऩदा ननवेदन जजतने बी द्ख, ददद , ऩीडाएॉ हैं, चचत्त को ऺोब कयाने वारे.... जन्भों भें बटकानेवारे...... अशाॊनत दे ने वारे कभद हैं वे सफ सदगणों क अबाव भें ही होते हैं े बगवान श्रीकृष्ण ने जीवन भें कसे सदगणों की अत्मॊत आवश्मकता है मह बगवद् गीता ै क 'दै वासयसम्ऩदाववबागमोग' नाभ क सोरहवें अध्माम क प्रथभ तीन द्ऴोंकों भें फतामा है । उन े े े दै वी सम्ऩदा क छब्फीस सदगणों को धायण कयने से सख, शाॊनत, आनन्दभम जीवन जीने की े कजी मभर जाती है , धभद, अथद, काभ औय भोऺ, मे चायों ऩरुषाथद सहज भें ही मसद्ध हो जाते हैं , ॊ क्मोंकक दै वी सम्ऩदा आत्भदे व की है । इस ग्रॊथ भें सॊतों ने सयर औय उत्साह-प्रेयक प्रवचनों क द्राया दै वी सम्ऩदा भें जस्थत बक्तों े क, सॊतों क जीवन-प्रसॊग ऩय प्रकाश डारते हए हभें प्रसाद फाॉटा है । आऩ इस ऻान-प्रसाद का े े ऩठन-भनन कयें गे तो अवश्म राबाजन्वत होंगे। ववनीत, श्री मोग वेदान्त सेवा समभनत अभदावाद आश्रभ अनक्रभ ननवेदन............................................................................................................................................... 2 दै वी सम्ऩदा – 1 ................................................................................................................................. 3 दै वी सम्ऩदा – 2 ............................................................................................................................... 17 दै वी सम्ऩदा -3 ................................................................................................................................. 34 जीवन-ववकास औय प्राणोऩासना ........................................................................................................... 47 सत्सॊग सॊचम .................................................................................................................................... 61 ऻानमोग ....................................................................................................................................... 61 याभ क दीवाने ............................................................................................................................... 64 े मभयाज का 'डडऩाटद भेन्ट' ................................................................................................................. 65 सदगरु-भहहभा ............................................................................................................................... 66
  • 3.
    ढाई अऺय प्रेभका...... ................................................................................................................... 67 सपरता की नीॊव एकाग्रता.............................................................................................................. 68 'गरुत्मागात ् बवेन्भत्म्.....' ............................................................................................................. 70 ृ ऩष्ऩ-चमन .................................................................................................................................... 73 बडक्तभनत यानी यत्नावती ...................................................................................................................... 74 दै वी सम्ऩदा – 1 (हदनाॊक् 22-7-1990 यवववाय, अभदावाद आश्रभ) अबमॊ सत्त्वसॊशवद्धऻादनमोगव्मवजस्थनत्। दानॊ दभद्ळ मऻद्ळ स्वाध्मामस्तऩ आजदवभ ्।। 'बम का सवदथा अबाव, अॊत्कयण की ऩणद ननभदरता, तत्त्वऻान क मरए ध्मानमोग भें ू े ननयॊ तय दृढ़ जस्थनत, साजत्त्वक दान, इजन्िमों का दभन, बगवान, दे वता औय गरुजनों की ऩजा तथा ू अजननहोत्र आहद उत्तभ कभों का आचयण एवॊ वेदशास्त्रों का ऩठन-ऩाठन तथा बगवान क नाभ औय े गणों का सॊकीतदन, स्वधभदऩारन क मरए कद्शसहन औय शयीय तथा इजन्िमों क सहहत अॊत्कयण े े की सयरता – मे सफ दै वी सम्ऩदा को रेकय उत्ऩन्न हए ऩरुष क रऺण हैं।' े (बगवद् गीता् 16.1) जीवन भें ननबदमता आनी चाहहए। बम ऩाऩ है , ननबदमता जीवन है । जीवन भें अगय ननबदमता आ जाम तो द्ख, ददद , शोक, चचन्ताएॉ दय हो जाती हैं। बम अऻानभूरक है , ू अववद्याभूरक है औय ननबदमता ब्रह्मववद्याभूरक हैं। जो ऩाऩी होता है , अनत ऩरयग्रही होता है वह बमबीत यहता है । जो ननष्ऩाऩ है , ऩरयग्रहयहहत है अथवा जजसक जीवन भें सत्त्वगण की प्रधानता े है वह ननबदम यहता है । जजसक जीवन भें दै वी रऺण हैं वह महाॉ बी सखी यहता है औय ऩयरोक बी उसक मरए े े सखभम हो जाता है । जजसक जीवन भें दै वी रऺण की कभी है वह महाॉ बी द्खी यहता है औय े ऩयरोक भें बी द्ख ऩाता यहता है । जीवन भें अगय सख, चैन, आयाभ, अभन-चभन चाहहए तो 'अभन होना ऩडेगा। अभन भाना भन क सॊकल्ऩ-ववकल्ऩ कभ हों। अभनी बाव को प्राद्ऱ हो तो े जीवन भें चभन फढ़ता है । भनष्म की वास्तववक अॊतयात्भा इतनी भहान ् है कक जजसका वणदन कयते वेद बगवान बी 'नेनत.... नेनत.....' ऩकाय दे ते हैं। भानव का वास्तववक तत्त्व, वास्तववक स्वरूऩ ऐसा भहान ् है रेककन बम ने, स्वाथद ने, यजो-तभोगण क प्रबाव ने उसे दीन-हीन फना हदमा है । े द्ख भनष्म का स्वबाव नहीॊ है इसमरए वह द्ख नहीॊ चाहता है । सख भनष्म का स्वबाव है इसमरए वह सख चाहता है । जैसे, भॉह भें दाॉत यहना स्वाबाववक है तो कबी ऐसा नहीॊ
  • 4.
    होता कक दाॉतननकारकय पक दॉ । जफ तक दाॉत तन्दरुस्त यहते हैं तफ तक उन्हें पकने की ें ू ें इच्छा नहीॊ होती। बोजन कयते वक्त कछ अन्न का कण, सब्जी का नतनका दाॉतों भें पस जाता है ॉ तो रूरी (जजह्वा) फाय-फाय वहाॉ रटका कयती है । जफ तक वह कचया ननकरा नहीॊ जाता तफ तक चैन नहीॊ रेती। क्मोंकक दाॉतों भें वह कचया यहना स्वाबाववक नहीॊ है । ऐसे ही सख तम्हाये जीवन भें आता है तो कोई हजद नहीॊ है रेककन द्ख आता है तो उसे ननकारने क मरए तभ तत्ऩय हो जाते हो। दाॉतों भें नतनका यहना अस्वाबाववक रगता है वैसे े रृदम भें द्ख यहना तम्हें अस्वाबाववक रगता है । द्ख होता है यजो-तभोगण की प्रधानता से। बगवान कहते हैं कक बम का सवदथा अबाव कय दें । जीवन भें बम न आवे। ननबदम यहें । ननबदम वही हो सकता है जो दसयों को बमबीत न कयें । ननबदम वही यह सकता है जो ननष्ऩाऩ ू होने की तत्ऩय हो जाम। जो ववरासयहहत हो जामगा वह ननबदम हो जामगा। ननबदमता ऐसा तत्त्व है कक उससे ऩयभात्भ-तत्त्व भें ऩहॉ चने की शडक्त आती है । ककसी को रगेगा कक 'फडे-फडे डाक रोग, गन्डा तत्त्व ननबदम होते हैं....' नहीॊ नहीॊ..... ऩाऩी कबी ननबदम नहीॊ ू हो सकता। गन्डे रोग तो कामयों क आगे योफ भायते हैं। जो रोग भचगदमाॉ खाकय भहकपर कयते े हैं, दारू ऩीकय नशे भें चय होते हैं , नशे भें आकय सीधे-सादे रोगों को डाॉटते हैं तो ऐसी डाॉट से ू रोग घफया जाते हैं। रोगों की घफयाहट का पामदा गन्डे रोग उठाते हैं। वास्तव भें चॊफर की घाटी का हो चाहे उसक फाऩ हो रेककन जजसभें सत्त्वगण नहीॊ है अथवा जो आत्भऻानी नहीॊ है वह ननबदम नहीॊ हो सकता। ननबदम वही आदभी होगा जो सत्त्वगणी हो। फाकी क ननबदम हदखते े हए रोग डाभेच होते हैं, ऩाऩी औय ऩाभय होते हैं। बमबीत आदभी दसये को बमबीत कयता है । ू डयऩोक ही दसये को डयाता है । ू जो ऩूया ननबदम होता है वह दसयों को ननबदम नायामण तत्त्व भें रे जाता है । जो डय यहा है ू वह डयऩोक है । डाभेच औय गॊडा स्वबाव का आदभी दसयों का शोषण कयता है । ननबीक दसयों का ू ू शोषण नहीॊ कयता, ऩोषण कयता है । अत् जीवन भें ननबदमता रानी चाहहए। फॊगार भें हगरी जजरे क दे ये गाॉव भें खदीयाभ नाभ क व्मडक्त यहते थे। गाॉव क जल्भी े े े जभीॊदाय ने उन्हें अऩने भकद्दभें भें झठी गवाही दे ने क मरए दभ भाया। उन्हें डयाते हए वह फोरा् ू े "याजा क आगे भेये ऩऺ भॊ गवाही दे दो। याजा तभ ऩय ववद्वास कयें गे औय भेया काभ फन े जामेगा। अगय तभ भेये ऩऺ भें नहीॊ फोरे तो जानते हो, भैं कौन हूॉ? भैंने कइमों क घयों को े फयफाद कय हदमा है । तम्हाया बी वही हार होगा। दे ये गाॉव भें यहना असॊबव हो जाएगा।" खदीयाभ ने ननबदमता से जवाफ दे हदमा् "गाॉव भें यहना असॊबव हो जामे तो बरे हो जाम रेककन भैं झठी गवाही हयचगज नहीॊ दॉ गा। भैं तो जो सत्म है वही फोर दॉ गा।" ू ू ू उस दद्श ने खदीयाभ को ऩये शान कयना शरु कय हदमा। खदीयाभ फेचाये सीधे सादे प्राभाणणक इन्सान थे। वे गाॉव छोडकय चरे गमे। कई बफघा, जभीन, गाम-बैंस, घय-फाय की हानन हई कपय बी सत्म ऩय खदीयाभ अडडग यहे ।
  • 5.
    रोगों की नजयोंभें खदीयाभ को हानन हई होगी थोडी-फहत रेककन सत्म की गवाही दे ने भें अडडग यहने से खदीयाभ ईद्वय को, ऩयभात्भा को स्वीकाय हो गमे। गाॉव छोडना ऩडा, जभीन छोडनी ऩडी, ननबीक यहकय सत्म क ऩऺ भें यहे , झठी गवाही नहीॊ दी ऐसे सज्जन को दद्श ने े ू फाह्य हानन ऩहॉ चा दी रेककन ऐसी फाह्य हानन ऩहॉ चने ऩय बी बक्त का कबी कछ नहीॊ बफगडता मह मसद्ध कयने क मरमे बगवान ने उन्हीॊ दे हाती आदभी खदीयाभ क घय एक भहान ् आत्भा को े े अवतरयत ककमा। वे भहान ् आत्भा श्री याभकृष्ण ऩयभहॊ स होकय प्रमसद्ध हए। उनकी कृऩा ऩाकय वववेकानन्द ववद्वववख्मात हए। धन्म है उस दे हाती खदीयाभ की सच्चाई औय सत्म ननद्षा। जीवन भें ननबदमता आनी चाहहए। ऩाऩ क साभने, अनाचाय क साभने कबी फोरना ऩडे तो े े फोर दे ना चाहहए। सभाज भें रोग डयऩोक होकय गण्डा तत्त्वों को ऩोसते यहते हैं औय स्वमॊ शोषे जाते हैं। कछ अननद्श घटता हआ दे खते हैं तो उसका प्रनतकाय नहीॊ कयते। 'हभाया क्मा..... हभाया क्मा.....? कये गा सो बये गा....।' ऐसी दफदर भनोदशा से मसकड जाते हैं। सज्जन रोग मसकड जाते हैं, चनाव रडने वारे नेताओॊ को बी गण्डे तत्त्वों को हाथ भें यखना ऩडता है । क्मोंकक सभाज के डयऩोक रोगों ऩय उन्हीॊ की धाकधभकी चरती है । अत् अऩने जीवन भें औय साये सभाज भें अभन-चभन राना हो तो बगवान श्रीकृष्ण की फात को आज ध्मान से सनें । ननबदमता का मह भतरफ नहीॊ है कक फहू सास का अऩभान कय दे ् 'भैं ननबदम हूॉ....।' ननबदमता का मह भतरफ नहीॊ कक छोया भाॉ-फाऩ का कहना भाने नहीॊ। ननबदमता का मह भतरफ नहीॊ कक मशष्म गरु को कह दे कक, 'भैं ननबदम हूॉ, आऩकी फात नहीॊ भानॉूगा।' मह तो खड्डे भें चगयने का भागद है । रोग ननबदमता का ऐसा गरत अथद रगा रेते हैं। हरयद्राय भें घाटवारे फाफा वेदान्ती सॊत थे। सत्सॊग भें फाय-फाय कहते कक ननबदम यहो। उनकी एक मशष्मा ने फाफाजी की मह फात ऩकड री। वह फूढ़ी थी। हदल्री से फाफाजी क ऩास े आती थी। एक हदन खट्टे आभ की ऩकौडडमाॊ फना कय फाफाजी क ऩास रे आमी। फाफाजी ने कहा् े "अबी भैंने दध ऩीमा है । दध क ऊऩय ऩकौडे नहीॊ खाने चाहहए।" ू ू े वह फोरी् फाफाजी ! "भैंने भेहनत कयक आऩक मरम फनामा है । खाओ न....।" े े "भेहनत कयक फनामा है तो क्मा भैं खाकय फीभाय ऩडूॉ? नहीॊ खाना है , रे जा।" े फाफाजी ने डाॉटते हए कहा् "क्मा भतरफ?" "आऩ ही ने तो कहा है कक ननबदम यहो। भैं ननबदम यहूॉगी। आऩ बरे ककतना बी डाॉटो। भैं तो णखराकय यहूॉगी।" वह भहहरा फोरी। गरु मशष्मा का वह सॊवाद भैं सन यहा था। भैंने सोचा् याभ.... याभ.... याभ....। भहाऩरुष कसी ननबदमता फता यहे हैं औय भूढ़ रोग कसी ननबदमता ऩकड रेते हैं ! ननबदम फनने का भतरफ ै ै मह नहीॊ कक जो हभें ननबदम फनामें उनका ही ववयोध कयक अऩने औय उनक जीवन का ह्रास कयें । े े
  • 6.
    ननबदमता का भतरफनकट्टा होना नहीॊ। ननबदमता का भतरफ भन का गराभ होना नहीॊ। ननबदमता का भतरफ है जजसभें बगवद् गीता क भताबफक दै वी सम्ऩदा क छब्फीस रऺण बय जामें। े े ननबदम जऩे सकर बव मभटे । सॊत कृऩा ते प्राणी छटे ।। ू ऐसे ननबदम नायामण तत्त्व भें जगने को ननबदमता चाहहए। इसमरमे अॊत्कयण भें बम का सवदथा अबाव होना चाहहए। अॊत्कयण ननभदर होगा तो ननबदमता आमेगी। ऻानमोग भें जस्थनत होगी, आत्भाकाय ववत्त ृ फनाने भें रूचच होगी वह आदभी ननबदम यहे गा। ईद्वय भें दृढ़ ववद्वास होगा तो ननबदमता आमेगी। जीवन भें दान-ऩण्म का बी फडा भहत्त्व है । दान बक्त बी कयता है ऻानी बी कयता है । बक्त का दान है रूऩमा-ऩैसा, चीज-वस्तएॉ, अन्न-वस्त्राहद। ऻानी का दान है ननबदमता का, ऻानी का दान है आत्भा जागनत का। ृ नद्वय चीजों को दान भें दे कय कोई दानी फन जाम वह बक्त है । अऩने आऩको, अऩने स्व- स्वरूऩ को सभाजच भें फाॉटकय, सफको आत्भानॊद का अभत चखानेवारे ऻानी भहादानी हो जाते ृ हैं। दीन-हीन, रूरे-रॉ गडे, गयीफ रोगों को सहामता कयना मह दमा है । जो रोग ववद्रान हैं, फवद्धभान हैं, सत्त्वगण प्रधान है । जो ऻानदान कयते कयाते हैं ऐसे रोगों की सेवा भें जो चीजें अवऩदत की जाती हैं वह दान कहा जाता है । बगवान क भागद चरने वारे रोगों का सहाम रूऩ े होना मह दान है । इतय रोगों को सहाम रूऩ होना मह दमा है । दमा धभद का भूर है । दान सत्त्वगण फढ़ाता है । जीवन भें ननबदमता राता है । ऻानमोग भें ननयॊ तय दृढ़ जस्थनत कयने क मरए जीवन भें दान औय इजन्िम दभन होना े चाहहए। इजन्िम दभन का भतरफ है जजतना आवश्मक हो उतना ही इजन्िमों को आहाय दे ना। आॉख को जजतना जरूयी हो उतना ही दृश्म हदखाओ, व्मथद भें इधय-उधय न बटकाओ। कान को जो जरूयी हो वह सनाओ। व्मथद चचाद, ककसी की ननन्दा सनाकय कान की श्रवण-शडक्त का अऩव्मम न कयो। फोरने-चखने भें जजह्वा का उऩमोग जजतना जरूयी हो उतना कयो। व्मथद भें इजन्िमों की शडक्त को फाहय ऺीण भत कयो। इजन्िमों की शडक्त ऺीण कयने से जीवन की सूक्ष्भ शडक्त का ह्रास होता है । परत् आदभी फहहभख यहता है , चचत्त भें शाॊनत नहीॊ यहती औय आत्भा द भें जस्थनत कयने का साभर्थमद ऺीण हो जाता है । अगय जीवन को हदव्म फनाना है , ऩयभ तेजस्वी फनाना है , सफ द्खों से सदा क मरए दय े ू होकय ऩयभ सख-स्वरूऩ आत्भा का साऺात्काय कयना है तो सूक्ष्भ शडक्तमों की जरूयत ऩडती है । सूक्ष्भ शडक्तमाॉ इजन्िमों क सॊमभ से ववकमसत होती हैं , सयक्षऺत यहती हैं। इजन्िमों का असॊमभ े कयने से सूक्ष्भ शडक्तमाॉ ऺीण हो जाती हैं। योजी-योटी क मरए तडपनेवारे भजदय भें औय मोगी े ू
  • 7.
    ऩरुष भें इतनाही पक है । साभान्म आदभी ने अऩनी सूक्ष्भ शडक्तमों का जतन नहीॊ ककमा जफकक द मोगी ऩरुष शडक्तमों का सॊमभ कयक साभर्थमदवान फन जाते हैं। े चरते-चरते फात कयते हैं तो हदभाग की शडक्त कभजोय हो जाती है । न खाने जैसा खा रेते हैं, न बोगने जैसा बोग रेते हैं। वे न सॊसाय का सख ठीक से बोग जाते हैं न आत्भा का सख रे ऩाते हैं। दस-फीस रूऩमे की राचायी भें हदनबय भेहनत कयते हैं। खाने-ऩीने का ढॊ ग नहीॊ है , बोगने का ढॊ ग नहीॊ है तो फेचाये योगी यहते हैं। मोगीऩरुष इहरोक का ही नहीॊ, ब्रह्मरोक तक का सख बी बोगते हैं औय भडक्तराब बी रेते हैं। वे जानते हैं कक सक्ष्भ शडक्तमों का सदऩमोग कसे ककमा जाम। ू ै सक्ष्भ ू शडक्तमों का सॊयऺण औय सॊवधदन कयने क मरए अऩने आहाय-ववहाय भें सजग े यहना जरूयी है । दोऩहय को बय ऩेट बोजन ककमा हो तो शाभ को जया उऩवास जैसा कय रेना चाहहए। हदनबय बखे यहे तो याबत्र को सोने क दो घण्टे ऩहरे अच्छी तयह बोजन कय रेना ू े चाहहए। बोजन क फीच भें ऩानी ऩीना ऩवद्शदामक है । अजीणद भें ऩानी औषध है । बूखे ऩेट ऩानी े ऩीना ववष हो जाता है । खफ बूख रगी है औय चगरास दो चगरास ऩानी ऩी मरमा तो शयीय ू दफरा-ऩतरा औय कभजोय हो जामगा। क्मा खाना, कफ खाना, ककतना खाना, कसे खाना..... क्मा फोरना, कफ फोरना, ककतना ै फोरना, कसे फोरना, ककससे फोरना.... क्मा सनना, कफ सनना, ककतना सनना, ककसका ै सनना.... इस प्रकाय हभाये स्थर-सूक्ष्भ सफ आहाय भें वववेक यखना चाहहए। बोरे बारे रोग ू फेचाये जजस ककसी की जैसी तैसी फातें सन रेते हैं , ननन्दा क बोग फन जाते हैं। े 'भैं क्मा करू.....? वह आदभी भेये ऩास आमा....। उसने ननन्दा सनाई तो भैंने सन री।' ॉ अये बाई ! तूने ननन्दा सन री? ननन्दकों की ऩॊडक्त भें शामभर हो गमा? कफीया ननन्दक ना मभरो ऩाऩी मभरो हजाय। एक ननन्दक क भाथे ऩय राख ऩाऩीन को बाय।। े इस जीवन भें अऩना ही कभद कट जाम तो बी कापी है । दसयों की ननन्दा सनकय क्मों ू दसयों क ऩाऩ अऩने मसय ऩय रेना? जजसकी ननन्दा कयते हैं , सनते हॊ वह तो आइस्क्रीभ खाता ू े होगा औय हभ उसकी ननन्दा सनकय अशाॊनत क्मों भोर रें । कफ सनना, क्मा सनना, ककसका सनना औय उस ऩय ककतना ववद्वास यखना इसभें बी अक्र चाहहए। अक्र फढ़ाने क मरए बी े अक्र चाहहए। तऩ फढ़ाने क मरए बी तऩ चाहहए। धन फढ़ाने क मरए बी धन चाहहए। े े जीवनदाता से मभरने क बी जीवन जीने का सच्चा ढॊ ग चाहहए। जीवन भें दै वी सॊऩदा होनी े चाहहए। दै वी सॊऩदा क कछ रऺण फताते हए बगवान श्रीकृष्ण मह द्ऴोक कह यहे हैं- े 'बम का सवदथा अबाव, अॊत्कयण की ऩूणद ननभदरता, तत्त्वऻान क मरए ध्मानमोग भें े ननयॊ तय दृढ़ जस्थनत औय साजत्त्वक दान, इजन्िमों का दभन, बगवान, दे वता औय गरुजनों की ऩजा ू तथा अजननहोत्राहद उत्तभ कभों का आचयण एवॊ वेदशास्त्रों का ऩठन-ऩाठन तथा बगवान क नाभ े
  • 8.
    औय गणों काकीतदन, स्वधभद-ऩारन क मरए कद्शसहन औय शयीय व इजन्िमों क सहहत, े े अॊत्कयण की सयरता मे सफ दै वी सम्ऩदावान ऩरुष क रऺण हैं।' े बगवान, दे वता औय गरुजनों की ऩूजा से तऩ-तेज फढ़ता है । बगवान मा ककसी ब्रह्मवेत्ता सदगरु क चचत्र क सभऺ जफ भौका मभरे , फैठ जाओ। शयीय को जस्थय कयक उन्हें एकटक े े े ननहायते जाओ। नेत्र की जस्थयता क द्राया भन को जस्थय कयने का अभ्मास कयो। ऐसे तऩ होता े है । तऩ से तेज फढ़ता है । इजन्िम-सॊमभ फढ़ता है । जीवन की शडक्तमों भें ववद्ध होती है , फवद्ध भें ृ सक्ष्भता आती है । सभस्माएॉ सरझाने की प्रेयणा मभरती है । व्मवहाय भें बी आदभी सपर होता ू है , ऩयभाथद भें बी आगे फढ़ता है । जीवन भें ऐसा अभ्मास है नहीॊ, इजन्िम-सॊमभ है नहीॊ औय ठाकयजी क भॊहदय भें जाता है , े घॊट फजाता है । कपय बी योता यहता है । सद ऩय रूऩमे राता है , आचथदक फोझ भें दफता चरा जाता ू है । मशकामत कयता यहता है कक, 'मह दननमाॉ फहत खयाफ है । भैं तो आऩघात कयक भय जाऊ तो े ॉ अच्छा।' अये , डफा दे जो जहाजों को उसे तूपान कहते हैं। जो तूपानों से टक्कय रे उसे इन्सान कहते हैं ।। व्मवहाय जगत क तपान तो क्मा, भौत का तूपान आमे उससे बी टक्कय रेने का े ू साभर्थमद आ जाम इसका नाभ है साऺात्काय। इसका नाभ है भनष्म जीवन की सपरता। जया जया-सी फात भें डय यहे हैं? जया जया-सी फात भें मसकड यहे हैं? हो होकय क्मा होगा? जो बी हो गमा वह दे ख मरमा। जो हो यहा है वह दे ख यहे हैं। जो होगा वह बी दे खा जामेगा। भॉूछ ऩय ताव दे ते हए.... बगवान को प्माय कयते हए तभ आगे फढ़ते जाओ। ननबदम..... ननबदम.... ननबदम.... ननबदम..... ननबदम.....। अये , बगवान का दास होकय, गरु का सेवक होकय, भनष्म का तन ऩाकय ऩाऩी ऩाभयों से, भचगदमाॉ खानेवारे कफाफी-शयाफी रोगों से डय यहे हो? वे अऩने आऩ अऩने ऩाऩों भें डूफ यहे हैं, भय यहे हैं। भहाबायत भें अजन जैसा आदभी दमोधन से डय यहा है । सोच यहा है कक ऐसे-ऐसे रोग द उसक ऩऺ भें हैं। े श्रीकृष्ण ने अजन से कहा कक् द क्रैब्मॊ भा स्भ गभ् ऩाथद नैतत्त्वय्मऩऩद्यते। ऺिॊ रृदमदौफदल्मॊ त्मक्त्वोवत्तद्ष ऩयॊ तऩ।। 'हे अजन ! नऩॊसकता को भत प्राद्ऱ हो। तेये मरमे मह उचचत नहीॊ है । हे ऩयॊ तऩ ! रृदम द की तच्छ दफदरता को त्मागकय मद्ध क मरए खडा हो जा।' े (गीता् 2.3) सभाज भें सज्जन रोगों की सॊख्मा ज्मादा है रेककन सज्जन रो सज्जनता-सज्जनता भें मसकड जाते हैं औय दजदन रोग मसय ऩय सवाय हो जाते हैं।
  • 9.
    तभ डयो भत।घफडाओ भत। अबमॊ सत्त्वसॊशवद्ध.... ननबदम फनो। ववकट ऩरयजस्थनतमों भें भागद खोजो। भागद अगय नहीॊ मभरता हो तो बगवान अथवा सदगरु क चचत्र क सभऺ फैठ जाओ, े े ॐकाय अथवा स्वजस्तक क चचत्र सभऺ फैठ जाओ। एकटक ननहायो.... ननहायो.... ननहायो....। सफह े भें समोदम से ऩहर उठ जाओ, स्नानाहद कयक ऩाॉच-सात प्राणामाभ कयो। शयीय की जस्थयता, ू े प्राण औय भन की जस्थयता कयो। कपय 'प्रोब्रेभ का सोल्मूशन' खोजो। मूॉ चटकी फजाते मभर जामगा। जजतने तभ डयते हो, जजतने जजतने तभ घफयाते हो, जजतने जजतने तभ ववनम्र होकय मसकडते हो उतना मे गण्डा तत्त्ववारे सभझते हैं कक हभ फडे हैं औय मे हभसे छोटे हैं। तभ जजतना बीतय से ननबीक होकय जीते हो उतना उन रोगों क आगे सपर होते हो। े हभें मभटा सक मे जभाने भें दभ नहीॊ। े हभसे जभाना है जभाने से हभ नहीॊ।। हभाया चैतन्म-स्वरूऩ ईद्वय हभाये साथ है , हभ ईभानदायी से जीते हैं, दसयों का हभ अहहत ू नहीॊ कयते, अहहत नहीॊ चाहते कपय हभाया फया कसे हो सकता है? फया होता हआ हदखे तो डयो ै भत। सायी दननमा उल्टी होकय टॉ ग जाम कपय बी तभ सच्चाई भें अडडग यहोगे तो ववजम तम्हायी ही होगी। ताभसी तत्त्वों से, आसयी तत्त्वों से कबी डयना नहीॊ चाहहए। बीतय से सत्त्वगण औय ननबदमता फढ़ाकय सभाज का अभन-चभन फढ़ाने क मरए मत्न कयना चाहहए। े 'हभाया क्मा.....? जो कये गा सो बये गा...' ऐसी कामयता प्राम् बगतडों भें आ जाती है । ऐसे रोग बक्त नहीॊ कहे जाते, बगतडे कहे जाते हैं। बक्त तो वह है जो सॊसाय भें यहते हए, भामा भें यहते हए भामा से ऩाय यहे । बगत जगत को ठगत है बगत को ठगे न कोई। एक फाय जो बगत ठगे अखण्ड मऻ पर होई।। बक्त उसका नाभ नहीॊ जो बागता यहे । बक्त उसका नाभ नहीॊ जो कामय हो जाम। बक्त उसका नाभ नहीॊ जो भाय खाता यहे । जजसस ने कहा था् 'तम्हें कोई एक थप्ऩड भाय दे तो दसया गार धय दे ना, क्मोंकक उसकी ू इच्छा ऩयी हो। उसभें बी बगवान है ।' ू जजसस ने मह कहा, ठीक है । इसमरए कहा था कक कोई आवेश भें आ गमा हो तो तभ थोडी सहन शडक्त जटा रो, शामद उसका द्रे ष मभट जाम, रृदम का ऩरयवतदन हो जामे। जजसस का एक प्माया मशष्म था। ककसी गॊडा तत्त्व ने उसका तभाचा ठोक हदमा। कपय ऩूछा् "दसया गार कहाॉ है ?" मशष्म ने दसया गार धय हदमा। उस दद्श ने महाॉ बी तभाचा जभा ू ू हदमा। कपय बी उस असय को सॊतोष नहीॊ हआ। उसने कहा् "अफ तीसया कहाॉ यख?" ॉू
  • 10.
    जजसस क मशष्मने उस दद्श क गार ऩय जोयदाय तभाचा जड हदमा औय फोरा् "तीसया े े गार मह है ।" "तम्हाये गरु ने तो भना ककमा था। उनका उऩदे श नहीॊ भानते?" "गरु ने इसमरए भना ककमा था कक अहहॊसा की सयऺा हो। हहॊसा न हो। रेककन तम्हें दो फाय भौका मभरा कपय बी तम्हाया हहॊसक स्वबाव नहीॊ मभटा। तभ असय हो। सफक मसखामे बफना सीधे नहीॊ होओगे।" अनशासन क बफना आसयी तत्त्व ननमॊत्रण भें नहीॊ यहते। यावण औय दमोधन को ऐसे ही े छोड दे ते तो आज हभ रोगों का सभाज शामद इस अवस्था भें न जी ऩाता। नैनतक औय साभाजजक अन्धाधधी हो जाती। जफ-जफ सभाज भें ऐसा वैसा हो जाम तफ साजत्त्वक रोगों को ॊू सतक होकय, हहम्भतवान फनकय तेजस्वी जीवन बफताने का मत्न कयना चाहहए। आऩ ननबदम यहे , द दसयों को ननबदम कये । सत्त्वगण की ववद्ध कये । जीवन भें दै वी फर चाहहए, आध्माजत्भक फर ू ृ चाहहए। कवर व्मथद ववराऩ नहीॊ कयना चाहहए कक, 'हे भेये बगवान ! हे भेये प्रब " भेयी यऺा े कयो... यऺा कयो...।' भैंने सनी है एक कहानी। गराभ नफीय ने योजे यखे। थोडा फहत बगत था औय ठगतों क साथ दोस्थी बी थी। े उसका धन्धा चोयी कयने का था। योजे क हदनों भें उसने चोयी छोड यखी थी। मभत्रों ने सभझामा् े "ऐसा बगतडा फनेगा तो काभ कसे चरेगा? पराने ककसान क वहाॉ फहढ़मा फैर आमे हैं। जा, ै े खोर क रे आ।" े गराभ नफीय फैर चयाने चरा गमा। नमा मसक्खड था। फैर खोरकय रे जाने रगा तो फैर क गरे भें फॉधी हई घॊहटमाॉ फजने रगीॊ। रोग जग गमे औय चोय का ऩीछा ककमा। गराभ नफीय े आगे चरा तो ऩीछे हल्रा गल्रा सनाई दे ने रगा। उसने डयक भाये खदा से प्राथदना की् "हे े खदातारा ! भैंने योजा यखा है , भैं कभजोय हो गमा हूॉ। तू भझे सहाम कय। भेये ऊऩय यहे भत कय। दफाया मह धन्धा नहीॊ करूगा। इस फाय फचा रे।" ॉ उसक रृदमाकाश भें आकाशवाणी हई, प्रेयणा मभरी कक, "फैरों को छोडकय बाग जा तो े फच जामगा। दफाया चोयी भत कयना।" "भामरक ! भैं योजा यख यहा हूॉ। भझभें दौडने की शडक्त नहीॊ है । दमा कयक आऩ ही भझे े फचाओ।" "अच्छा, तू दौड नहीॊ सकता है तो जल्दी से चरकय साभनेवारी झाडी भें छऩ जा। फैरों को छोड दे ।" "भझभें इतनी बी शडक्त नहीॊ है । तू यहे भत कय.... तू यहे भत कय....." गराभ नफीय इस प्रकाय चगडचगडाता यहा। इतने भें रोगों ने आकय उसे ऩकड मरमा्
  • 11.
    "भूखद ! फोरताहै 'यहे भत कय... यहे भत कय....?' भार चयाते सभम यहे भत नही की औय अफ ऩकडा गमा तो यहे भत कय.. यहे भत कय...?" रोगों ने फयाफय भेथीऩाक चखामा, यात बय कोठयी भें फन्द यखा, सफह भें ऩमरस को सौंऩ हदमा। गराभ नफीय अॊत्प्रेयणा की आवाज सनकय हहम्भत कयता तो फच जाता। हहम्भते भदाद तो भददे खदा। फेहहम्भत फन्दा तो फेजाय खदा।। जो नाहहम्भत हो जाता है उसको फचाने भें बगवान बी फेजाय हो जाते हैं , राचाय हो जाते हैं। अऩना ऩरुषाथद जगाना चाहहए, हहम्भतवान फनना चाहहए। मह कौन-सा उकदा जो हो नहीॊ सकता? तेया जी न चाहे तो हो नहीॊ सकता। छोटा-सा कीडा ऩत्थय भें घय कये.... इन्सान क्मा हदरे हदरफय भें घय न कये? तभभें ईद्वय की अथाह शडक्त छऩी है । ऩयभात्भा का अनऩभ फर छऩा है । तभ चाहो तो ऐसी ऊचाई ऩय ऩहॉ च सकते हो कक तम्हाया दीदाय कयक रोग अऩना बानम फना रें । तभ ब्रह्मवेत्ता ॉ े फन सकते हो ऐसा तत्त्व तभभें छऩा है । रेककन अबागे ववषमों ने, तम्हाये नकायात्भक ववचायों ने, दफदर ख्मारों ने, चगरी, ननन्दा औय मशकामत की आदतों ने, यजो औय तभोगण ने तम्हायी शडक्त को बफखेय हदमा है । इसीमरए श्रीकृष्ण कहते हैं- अबमॊ सत्त्वसॊशवद्ध्.....। जीवन भें दै वी सम्ऩदा क रऺण बयो औय ननबदम फनो। जजतनी तम्हायी आध्माजत्भक े उन्ननत होगी उतनी ठीक से साभाजजक उन्ननत बी होगी। अगय आध्माजत्भक उन्ननत शून्म है तो नैनतक उन्ननत भात्र बाषा होगी। आध्माजत्भक उन्ननत क बफना नैनतक उन्ननत नहीॊ हो सकती। े नैनतक उन्ननत नहीॊ होगी तो बौनतक उन्ननत हदखेगी रेककन वास्तव भें वह उन्ननत नहीॊ होगी, जॊजीयें होगी तम्हाये मरमे। रोगों की नजयों भें फडा भकान, फडी गाडडमाॉ, फहत रूऩमे-ऩैसे हदखेंगे रेककन तम्हाये बीतय टे न्शन ही टे न्शन होगा, भसीफतें ही भसीफतें होगी। आध्माजत्भक उन्ननत जजतने अनऩात भें होती है उतने अनऩात भें नैनतक फर फढ़ता है । जजतने अनऩात भें नैनतक फर फढ़ता है उतने अनऩात भें तभ जागनतक वस्तओॊ का ठीक उऩमोग औय उऩबोग कय सकते हो। रोग जगत की वस्तओॊ का उऩबोग थोडे ही कयते हैं, वे तो बोग फन जाते हैं। वस्तएॉ उन्हें बोग रेती हैं। धन की चचन्ता कयते-कयते सेठ को 'हाटद -अटै क' हो गमा तो धन ने सेठ को बोग मरमा। क्मा खाक सेठ ने बोगा धन को? काय भें तो ड्रामवय घूभ यहा है , सेठ तो ऩडे हैं बफस्तय भें । रड्डू तो यसोईमा उडा यहा है, सेठ तो डामबफटीज़ से ऩीडडत हैं। बोग तो नौकय-चाकय बोग यहे हैं औय सेठ चचन्ता भें सूख यहा है ।
  • 12.
    अऩने को सेठ,साहफ औय सखी कहरानेवारे तथा-कचथत फडे-फडे रोगों क ऩास अगय े सत्त्वगण नहीॊ है तो उनकी वस्तओॊ का उऩबोग दसये रोग कयते हैं। ू तम्हाये जीवन भें जजतने अनऩात भें सत्त्वगण होगा उतने अनऩात भें आध्माजत्भक शडक्तमाॉ ववकमसत होगी। जजतने अनऩात भें आध्माजत्भक शडक्तमाॉ होगी उतने अनऩात भें नैनतक फर फढ़े गा। जजतने अनऩात भें नैनतक फर होगा उतने अनऩात भें व्मवहारयक सच्चाई होगी, चीज- वस्तओॊ का व्मावहारयक सदऩमोग होगा। तम्हाये सॊऩक भें आनेवारों का हहत होगा। जीवन भें द आध्माजत्भक उन्ननत नहीॊ होगी तो नैनतक फर नहीॊ आएगा। उतना ही जीवन डावाॉडोर यहे गा। डावाॉडोर आदभी खद तो चगयता है , उसका सॊग कयने वारे बी ऩये शान होते हैं। इजन्िमों का दभन नहीॊ कयने से सक्ष्भ शडक्तमाॉ बफखय जाती हैं तो आध्माजत्भक उन्ननत ू नहीॊ होती। वाणी का सॊमभ कयना भाने चगरी, ननन्दा नहीॊ कयना, कट बाषा न फोरना, झठ-कऩट ू न कयना, मह वाणी का तऩ है । आचामद की उऩासना कयना, बगवान की उऩासना कयना, मह भन का तऩ है । शयीय को गरत जगह ऩय न जाने दे ना, व्रत-उऩवास आहद कयना मह शायीरयक तऩ है । व्रत-उऩवास की भहहभा सनकय कछ भहहराएॉ रम्फे-रम्फे व्रत यखने रग जाती है । जो सहाचगन जस्त्रमाॉ है , जजनका ऩनत हमात है ऐसी भहहराओॊ को अचधक भात्रा भें व्रत उऩवास नहीॊ कयना चाहहए। सहाचगन अगय अचधक उऩवास कये गी तो ऩनत की आम ऺीण होगी। सद्ऱाह भें , ऩन्िह हदन भें एक उऩवास शयीय क मरए बी ठीक है औय व्रत क मरए बी ठीक है । े े कछ रोग योज-योज ऩेट भें ठूॉस-ठूॉसकय खाते हैं, अजीणद फना रेते हैं औय कछ रोग खफ ू बूखाभयी कयते हैं, सोचते हैं कक भझे जल्दी बगवान मभर जाम। नहीॊ, व्मवहाय भें थोडा दऺ फनने की जरूयत है । कफ खाना, क्मा खाना, कसे खाना, कफ व्रत यखना, कसे यखना मह ठीक ै ै से सभझकय आदभी अगय तऩस्वी जीवन बफताता है तो उसका फर, तेज फढ़ता है । प्राणामाभ से भन एकाग्र होता है । प्राणामाभ से प्राण की रयधभ अगय ठीक हो जाम तो शयीय भें वात औय कप ननमॊबत्रत हो जाते हैं। कपय फाहय की दवाइमों की ओय 'भेननेट थेयाऩी' आहद की जरूयत नहीॊ ऩडती है । इन्जैक्शन की सइमाॉ बोंकाने की बी जरूयत नहीॊ ऩडती है । कवर अऩने प्राणों की गनत को ठीक से सभझ रो तो कापी झॊझटो से छट्टी हो जामगी। े जऩ कयने से एक प्रकाय का आबाभण्डर फनता है , सूक्ष्भ तेज फनता है । उससे शयीय भें स्पनतद आती है , भन-फवद्ध भें फर फढ़ता है । जऩ कयते सभम अगय आसन ऩय नहीॊ फैठोगे तो ू शयीय की ववद्यत ् शडक्त को अथींग मभर जामगा। आबा, तेज, ओज, फर की सयऺा नही होगी। अत् आसन ऩय फैठकय प्राणामाभ, जऩ-तऩ, ध्मान-बजन कयना चाहहए। शयीय तन्दरुस्त यहे गा, भन एकाग्र फनेगा, फवद्ध तेजस्वी होगी, जीवन भें सत्त्वगण की ववद्ध होगी। ृ सत्त्वात ् सॊजामते ऻानभ ्।
  • 13.
    सत्त्वगण की ववद्धसे ऻान उत्ऩन्न होता है । ृ आदभी जजतना बी ऩाभय हो, उसभें ककतने बी दोष हों, अगय थोडे ही हदन इन साधनों का अवरॊफन रे तो उसक दोष अऩने आऩ ननकरने रगें गे। े सूक्ष्भ शडक्तमों से स्थर शडक्तमाॉ सॊचामरत होती हैं। भोटयकाय भें ऩेट्रोर से इॊजजन क बीतय ू े थोडी-सी आग जरती है । इससे इतनी फडी गाडी बागती है । ट्रे न क फोइरय भें थोडे गेरन ऩानी े होता है , उफरता है , वाष्ऩ फनता है , उससे हजायों भन, राखों टन वजन को रेकय इॊजजन को बागता है । ऐसे ही भन जफ ध्मान-बजन कयक सक्ष्भ होता है तो राखों भसीफतों को काटकय अऩने े ू बगवत्प्राद्ऱरूऩी भोऺ क द्राय ऩय ऩहॉ च जाता है । फाहय की गाडी तो वाष्ऩ क फर से तम्हें े े अभदावाद से हदल्री ऩहॉ चाती है जफकक तम्हायी हदर की गाडी अगय सत्त्वगण फढ़े तो हदरफय तक ऩयभात्भा तक, ऩहॉ चा दे ती है । भनष्म को कबी बी हताश नहीॊ होना चाहहए। आध्माजत्भक याह को योशन कयने वारे याहफय मभरे हैं, साधना का उत्तभ वातावयण मभर यहा है , इन फातों को आत्भसात ् कयने क मरए े श्रद्धा-बडक्त औय फवद्ध बी है तो जजतना हो सक, अचधक से अचधक चर रेना चाहहए। ककसी बी े द्खों से, ककसी बी ऩरयजस्थनतमों से रुकना नहीॊ चाहहए। गभ की अन्धेयी यात भें हदर को न फेकयाय कय। सफह जरूय आमेगी सफह का इन्तजाय कय।। घफयाहट से तम्हायी मोनमता ऺीण हो जाती है । जफ डय आमे तो सभझो मह ऩाऩ का द्योतक है । ऩाऩ की उऩज डय है । अववद्या की उऩज डय है । अऻान की उऩज डय है । ननबदमता ऻान की उऩज है । ननबदमता आती है इजन्िमों का सॊमभ कयने से, आत्भववचाय कयने से। 'भैं दे ह नहीॊ हूॉ.... भैं अभय आत्भा हूॉ। एक फभ ही नहीॊ, ववद्वबय क सफ फभ मभरकय बी शयीय क ऊऩय चगय े े ऩडें तो बी शयीय क बीतय का जो आत्भचैतन्म है उसका फार फाॉका बी नहीॊ होता। वह चैतन्म े आत्भा भैं हूॉ। सोऽहभ ्.... इस प्रकाय आत्भा भें जागने का अभ्मास कयो। 'सोऽहभ ् का अजऩाजाऩ कयो। अऩने सोऽहभ ् स्वबाव भें हटको। ववकायों से ज्मों-ज्मों फचते जाओगे त्मों-त्मों आध्माजत्भक उन्ननत होगी, नैनतक फर फढ़े गा। तभ सॊसाय का सदऩमोग कय ऩाओगे। अबी सॊसाय का सदऩमोग नहीॊ होता। सयकनेवारी चीजों का सदऩमोग नहीॊ होता, उनक दरुऩमोग होता है । साथ ही साथ हभाये भन-इजन्िमों का बी दरुऩमोग हो जाता है , हभाये जीवन का बी दरुऩमोग हो जाता है । कहाॉ तो दरदब भनष्म जन्भ..... दे वता रोग बी बायत भें भनष्म जन्भ रेने क मरए रारानमत यहते हैं... वह भनष्म े जन्भ ऩाकय आदभी दो योटी क मरए इधय उधय धक्का खा यहा है । दो ऩैसे क भकान क मरए े े े चगडचगडा यहा है ! चाय ऩैसे की रोन रेने क मरए राईन भें खडा है ! साहफों को औय एजेन्टों े को सराभ कयता है , मसकडता यहता है । जजतना मसकडता है उतना ज्मादा धक्क खाता है । ज्मादा े
  • 14.
    कभीशन दे नाऩडता है । तफ कहीॊ रोन ऩास होता है । मह क्मा भनष्म का दबादनम है? भानव जीवन जीने का ढॊ ग ही हभ रोगों ने खो हदमा है । ववरामसता फढ़ गई है । ऐश-आयाभी जीवन (Luxurious Life) जीकय सखी यहना चाहते हैं वे रोग ज्मादा द्खी हैं फेचाये । जो भ्रद्शाचाय (Corruption) कयक सखी यहना चाहते हैं उनको अऩने े फेटों क द्राया, फेहटमों क द्राया औय कोई प्रोब्रेभ क द्राया चचत्त भें अशाॊनत की आग जरती यहती े े े है । अगय आयाभ चाहे तू दे आयाभ खरकत को। सताकय गैय रोगों को मभरेगा कफ अभन तझको।। दसयों का फाह्य ठाठ-ठठाया दे खकय अऩने शाॊनतभम आनन्दभम, तऩस्वी औय त्मागी जीवन ू को धधरा भत कयो। सख-वैबव की वस्तएॉ ऩाकय जो अऩने को सखी सभझकय उन जैसे होने क ॉ े मरए जो रोग नीनत छोडकय दयाचाय क तयप रगते हैं उन ऩय हभें दगनी दमा आती है । मे रोग े जीवन जीने का ढॊ ग ही नहीॊ सभझते। फहढ़मा भकान हो, फहढ़मा गाडी हो, फहढ़मा मह हो, फहढ़मा वह हो तो आदभी सखी हो जाम? अगय ऐसा होता तो यावण ऩूया सखी हो जाता। दमोधन ऩूया सखी हो जाता। नहीॊ, नहीॊ, ऐसा नहीॊ है । शक्कय णखरा शक्कय मभरे टक्कय णखरा टक्कय मभरे। नेकी का फदरा नेक है फदों को फदी दे ख रे। दननमाॉ ने जान इसको मभमाॉ सागय की मह भझदाय है । औयों का फेडा ऩाय तो तेया फेडा ऩाय है ।। करजग नहीॊ कयजग है मह इस हाथ दे उस हाथ रे।। भैंने सनी है एक सत्म घटना। अभदावाद, शाहीफाग भें डपनारा क ऩास हाईकोटद क एक जज सफह भें दातन कयते हए े े घूभने ननकरे थे। नदी क तयप दो यॊ गरूट जवान आऩस भें हॉ सी-भजाक कय यहे थे। एक ने े मसगये ट सरगाने क मरए जज से भाचचस भाॉगा। जज ने इशाये से इन्काय कय हदमा। थोडी दे य े इधय-उधय टहरकय जज हवा खाने क मरए कहीॊ फैठ गमे। दे ख यहे थे उन दोनों को। इतने भें वे े यॊ गरूट हॉसी-भजाक, तू-भैं-तू-भैं कयते हए रड ऩडे। एक ने याभऩयी चक्क ननकारकय दसये को ू ू घसेड हदमा, खन कय डारा औय ऩरामन हो गमा। जज ने ऩमरस को पोन आहद सफ ककमा ू होगा। खन का कस फना। सेशन कोटद से वह क घूभता घाभता कछ सभम क फाद आणखय हाई ू े े े कोटद भें उसी जज क ऩास आमा। कस जाॉचा। उन्हें ऩता चरा कक कस वही है । उस हदन वारी े े े घटना का उन्हें ठीक स्भयण था। उन्होंने दे खा तो ऩामा कक मह उस हदन वारा अऩयाधी तो नहीॊ है । वे जज कभदपर क अकाट्म मसद्धान्त को भाननेवारे थे। वे सभझते थे कक राॊच-रयद्वत मा े औय कोई बी अशब कभद उस सभम तो अच्छा रगता है रेककन सभम ऩाकय उसक पर बोगने े
  • 15.
    ही ऩडते हैं।ऩाऩ कयते सभम अच्छा रगता है रेककन बोगना ऩडता है । कछ सभम क मरए े आदभी ककन्हीॊ कायणों से चाहे छट जाम रेककन दे य सवेय कभद का पर उसे मभरता है , मभरता है ू औय मभरता ही है । जज ने दे खा कक मह अऩयाधी तो फूढ़ा है जफकक खन कयने वारा यॊ गरूट तो जवान था। ू उन्होंने फढ़े को अऩनी चेम्फय भें फरामा। फूढ़ा योने रगा् ू "साहफ ! डपनारा क ऩास, साफयभती का ककनाया.... मह सफ घटना भैं बफल्कर जानता े ही नहीॊ हूॉ। बगवान की कसभ, भैं ननदोष भाया जा यहा हूॉ।" जज सत्त्वगणी थे, सज्जन थे, ननभदर ववचायों वारे, खरे भन क थे। ननबदम थे। नन्स्वाथी े औय साजत्वक आदभी ननबदम यहता है । उन्होंने फढ़े से कहा् ू "दे खो, तभ इस भाभरे भें कछ नहीॊ जानते मह ठीक है रेककन सेशन कोटद भें तभ ऩय मह अऩयाध बफल्कर कपट हो गमा है । हभ तो कवर कानन का चकादा दे ते हैं। अफ हभ इसभें े ू औय कछ नहीॊ कय सकते। इस कस भें तभ नहीॊ थे ऐसा तो भेया भन बी कहता है कपय बी मह फात बी उतनी ही े ननजद्ळत है कक अगय तभने जीवनबय कहीॊ बी ककसी इन्सान की हत्मा नहीॊ की होती तो आज सेशन कोटद क द्राया ऐसा जडफेसराक कस तभ ऩय फैठ नहीॊ सकता था। े े काका ! अफ सच फताओ, तभने कहीॊ न कहीॊ, कबी न कबी, अऩनी जवानी भें ककसी भनष्म को भाया था?" उस फूढ़े ने कफूर कय मरमा् "साहफ ! अफ भेये आणखयी हदन हैं। आऩ ऩछते हैं तो फता ू दे ते हूॉ कक आऩकी फात सही है भैंने दो खन ककमे थे। राॊच-रयद्वत दे कय छट गमा था।" ू ू जज फोरे् "तभ तो दे कय छट गमे रेककन जजन्होंने मरमा उनसे कपय उनक फेटे रेंगे, ू े उनकी फेहटमाॉ रेंगी, कदयत ककसी न ककसी हहसाफ से फदरा रेगी। तभ वहाॉ दे कय छटे तो महाॉ ू कपट हो गमे। उस सभम रगता है कक छट गमे रेककन कभद का पर तो दे य-सवेय बोगना ही ू ऩडता है ।" कभद का पर जफ बोगना ही ऩडता है तो क्मों न फहढ़मा कभद कयें ताकक फहढ़मा पर मभरे? फहढ़मा कभद कयक कभद बगवान को ही क्मों न दे दें ताकक बगवान ही मभर जामें? े नायामण..... नायामण.... नायामण...... नायामण.... नायामण...... सत्त्वसॊशवद्ध क मरए, ननबदमता क मरए बगवान का ध्मान बगवन्नाभ का जऩ, बगवान े े क गणों का सॊकीतदन, बगवान औय गरुजनों का ऩूजन आहद साधन हैं। अजननहोत्र आहद उत्तभ े कभों का आचयण कयना सत्त्वगण फढ़ाने क मरए हहतावह है । ऩहरे क जभाने भें मऻ-माग होते े े थे। कपय उसका स्थान इद्श की भूनतदऩूजा ने मरमा। भूनतदऩूजा बी चचत्तशवद्ध का एक फहढ़मा साधन है । वेदशास्त्रों का ऩठन-ऩाठन, जऩ, कीतदन आहद से सत्त्वगण फढ़ता है । सत्त्वगण फढ़ने से भनोकाभना जल्दी से ऩणद होती है । हर की काभना कयने से तऩ खचद हो जाता है । ऊचे से ऊची ू ॉ ॉ
  • 16.
    मह काभना कयेंकक, 'हे बगवान ् ! हभायी कोई काभना न यहे । अगय कोई काभना यहे तो तझे ऩाने की ही काभना यहे ।' ऐसी काभना से तऩ घटता नहीॊ, औय चाय गना फढ़ जाता है । जऩ-तऩ कयक, बगवन्नाभ सॊकीतदन से सत्त्वगण फढ़ाओ। स्वधभदऩारन कयने भें जो कद्श े सहना ऩडे वह सहो। तभ जहाॉ जो कत्तदव्म भें रगे हो, वहाॉ उसी भें फहढ़मा काभ कयो। नौकय हो तो अऩनी नौकयी का कत्तदव्म ठीक से फजाओ। दसये रोग आरस्म भें मा गऩशऩ भें सभम फयफाद ू कयते हों तो वे जानें रेककन तभ अऩना काभ ईभानदायी से उत्साहऩूवक कयो। स्वधभदऩारन कयो। द भहहरा हो तो घय को ठीक साप सथया यखो, स्वगद जैसा फनाओ। आश्रभ क मशष्म हो तो आश्रभ े को ऐसा सहावना फनाओ कक आने वारों का चचत्त प्रसन्न हो जाम, जल्दी से बगवान क ध्मान- े बजन भें रग जाम। तम्हें ऩण्म होगा। अऩना स्वधभद ऩारने भें कद्श तो सहना ही ऩडेगा। सदी-गभी, बख-प्मास, भान-अऩभान ू सहना ऩडेगा। अये चाय ऩैसे कभाने क मरए यातऩारीवारों को सहना ऩडता है , हदनऩारीवारों को े सहना ऩडता है तो 'ईद्वयऩारी' कयने वारा थोडा सा सह रे तो क्मा घाटा है बैमा? .....तो स्वधभदऩारन क मरए कद्श सहें । शयीय तथा इजन्िमों क सहहत अॊत्कयण की े े सयरता यखें । चचत्त भें क्रयता औय कहटरता नहीॊ यखें। जफ-जफ ध्मान-बजन भें मा ऐसे ही फैठें ू तफ सीधे, टट्टाय फैठें। झककय मा ऐसे-वैसे फैठने से जीवन-शडक्त का ह्रास होता है । जफ फैठें तफ हाथ ऩयस्ऩय मभरे हए हों, ऩारथी फॉधी हई हो। इससे जीवन-शडक्त का अऩव्मम होना रुक जामगा। सूक्ष्भ शडक्त की यऺा होगी। तन तन्दरुस्त यहे गा। भन प्रसन्न यहे गा। सत्त्वगण भें जस्थनत कयने भें सहाम मभरेगी। स्वधभदऩारन भें कद्श सहने ऩडे तो हॉ सते-हॉ सते सह रो मह दै वी सम्ऩदावान ऩरुष क रऺण हैं। ऐसे ऩरुष की फवद्ध ब्रह्मसख भें जस्थत होने रगती है । जजसकी फवद्ध े ब्रह्मसख भें जस्थत होने रगती है उसक आगे सॊसाय का सख ऩारे हए कत्ते की तयह हाजजय हो े जाता है । उसकी भौज ऩडे तो जया सा उऩमोग कय रेता है , नहीॊ तो उससे भॉह भोड रेता है । जजसक जीवन भें सत्त्वगण नहीॊ हैं , दै वी सॊऩवत्त नहीॊ है वह सॊसाय क सख क ऩीछे बटक- े े े बटककय जीवन खत्भ कय दे ता है । सख तो जया-सा मभरा न मभरा रेककन द्ख औय चचन्ताएॉ उसक बानम भें सदा फनी यहती हैं। े सफ द्खों की ननववत्त औय ऩयभ सख की प्रानद्ऱ अगय कोई कयना चाहे तो अऩने जीवन भें ृ सत्त्वगण की प्रधानता रामे। ननबदमता, दान, इजन्िमदभन, सॊमभ, सयरता आहद सदगणों को ऩद्श कये । सदगणों भें प्रीनत होगी तो दगण अऩने आऩ ननकर जामेंगे। सदगणों भें प्रीनत नहीॊ है , द इसमरए दगणों को हभ ऩोसते हैं। थोडा जभा थोडा उधाय.... थोडा जभा थोडा उधाय... ऐसा हभाया द खाता चरता यहता है । ऩाभयों को, कऩहटमों को दे खकय उनका अनकयण कयने क मरए उत्सक हो े जाते हैं। भ्रद्शाचाय कयक बी धन इकट्ठा कयने की चाह यखते हैं। अये बैमा ! वे रोग जो कयते हैं े वे बैंसा फन कय बोगें गे, वऺ फनकय कल्हाडे क घाव सहें गे, मह तो फाद भें ऩता चरेगा। उनकी ृ े नकर क्मों कय यहे हो?
  • 17.
    जीवन भें कोईबी ऩरयजस्थनत आमे तो सोचो कक कफीय होते तो क्मा कयते? याभजी होते तो क्मा कयते? रखनरारा होते तो क्मा कयते? सीताजी होती तो क्मा कयती? गागी होती तो क्मा कयती? भदारसा होती तो क्मा कयती? शफयी बीरनी होती तो क्मा कयती? ऐसा सोचकय अऩना जीवन हदव्म फनाना चाहहए। हदव्म जीवन फनाने क मरए दृढ़ सॊकल्ऩ कयना चाहहए। दृढ़ े सॊकल्ऩ क मरए सफह जल्दी उठो। सूमोदम से ऩहरे स्नानाहद कयक थोडे हदन ही अभ्मास कयो, े े तम्हाया अॊत्कयण ऩावन होगा। सत्त्वगण फढ़े गा। एक गण दसये गणों को रे आता है । एक ू अवगण दसये अवगणों को रे आता है । एक ऩाऩ दसये ऩाऩों को रे आता है औय एक ऩण्म दसये ू ू ू ऩण्मों को रे आता है । तभ जजसको सहाया दोगे वह फढ़े गा। सदगण को सहाया दोगे तो ऻान शोबा दे गा। अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ दै वी सम्ऩदा – 2 (हदनाॊक् 29.7.1990 यवववाय, अभदावाद आश्रभ) अहहॊसा सत्मभक्रोधस्त्माग् शाजन्तयऩैशनभ ्। दमा बूतेष्वरोरद्ऱवॊ भादद वॊ ह्रीयचाऩरभ ्।। 'भन, वाणी औय शयीय से ककसी प्रकाय बी ककसी को कद्श न दे ना, मथाथद औय वप्रम बाषण, अऩना अऩकाय कयने वारे ऩय बी क्रोध का न होना, कभों भें कत्तादऩन क अमबभान का े त्माग, अन्त्कयण की उऩयनत अथादत ् चचत्त की चॊचरता का अबाव, ककसी की बी ननन्दा आहद न कयना, सफ बूतप्राणणमों भें हे त यहहत दमा, इजन्िमों का ववषमों क साथ सॊमोग होने ऩय बी उनभें े आसडक्त का न होना, कोभरता, रोक औय शास्त्र से ववरुद्ध आचयण भें रज्जा औय व्मथद चेद्शाओॊ का अबाव (मे दै वी सम्ऩदा को रेकय उत्ऩन्न हए ऩरुष क रऺण हैं।) े (बगवद् गीता् 16.2) साधक को कसा होना चाहहए, जीवन का सवाांगी ववकास कयने क मरए कसे गण धायण ै े ै कयने चाहहए, जीवन का सवाांगी ववकास कयने क मरए कसे गण धायण कयने चाहहए इसका े ै वणदन बगवान श्रीकृष्ण 'दै वीसम्ऩद् ववबागमोग' भें कयते हैं। कछ ऐसे भहाऩरुष होते हैं जजनके जीवन भें मे गण जन्भजात होते हैं। कछ ऐसे बक्त होते हैं जजनक जीवन भें बडक्त-बाव से मे े गण धीये -धीये आते हैं। उनको महद सत्सॊग मभर जाम, वे थोडा ऩरुषाथद कये तो गण जल्दी से आते हैं। साधक रोग साधन-बजन कयक गण अऩने भें बय रेते हैं। े
  • 18.
    दै वी सम्ऩदाआत्भानबव की जननी है । दै वी सम्ऩदा आत्भा क ननकट है , आत्भा का े स्वबाव है , जजनभें दै वी सम्ऩदा होती है वे रोग फहत रोगों क प्माये होते हैं। दै वी सम्ऩदा भें े छब्फीस सदगण फतामे गमे हैं। आऩने व्मवहाय भें बी दे खा होगा कक आदभी ककतना बी फेईभान हो, फदभाश हो, रटे या हो, डाक हो रेककन वह नहीॊ चाहता है कक भेये साथ दसया कोई फदभाशी कये । फेईभान आदभी बी ू ू अऩना भनीभ ईभानदाय चाहता है । फदभाश आदभी बी अऩना कोषाध्मऺ मा साथी, सॊगी ईभानदाय चाहता है । ईभानदाय रोग तो ईभानदाय आदभी को प्माय कयते ही हैं रेककन फेईभान रोगों को बी ईभानदाय आदभी की आवश्मकता होती है । अथादत ् दै वी गण आत्भा क ननकटवती हैं े इसमरए दै वी गणवारों को प्राम् सफ रोग प्माय कयते हैं। आसयी स्वबाव क रोग बी दै वी े गणवारे क प्रनत बीतय से झक हए होते हैं, कवर फाहय से पपकायते हैं। श्रीयाभजी क प्रनत े े े े यावण बीतय से झका हआ था रेककन फाहय से पपकायते पपकायते भय गमा। कस श्री कृष्ण क ॊ े प्रनत बीतय से प्रबाववत था रेककन फाहय से दद्शता कयता यहा। इस प्रकाय जजसभें दै वी गण होते हैं उसक कटम्फी, ऩडोसी आद फाहय से चाहे उसकी हदल्रगी उडामें, उऩहास कयें रेककन बीतय भें े उससे प्रबाववत होते जाते हैं। अत् साधक को चाहहए कक अगय आसयी स्वबाव क दस-फीस रोग े उसका भजाक उडामें, उसका ववयोध कयें , उसकी ननन्दा कयें मा कोई आयोऩ-राॊछन रगामें तो साधक को चचॊनतत नहीॊ होना चाहहए। साधक को कबी बमबीत नहीॊ होना चाहहए। उसे सदा माद यखना चाहहए कक् इरजाभ रगाने वारों ने इरजाभ रगामे राख भगय। तेयी सौगात सभझ हभ मसय ऩे उठामे जाते हैं।। मे सॊत-भहात्भा-सत्ऩरुष-सदगरुओॊ की भहानता है । वमशद्षजी भहायाज कहते हैं- "हे याभजी ! भैं फाजाय से गजयता हूॉ तफ ऩाऩी रोग भेये मरए क्मा क्मा फोरते हैं मह सफ भैं जानता हूॉ रेककन भेया दमार स्वबाव है ।" साधक क जीवन भें बी बीतय दमा होनी चाहहए। दमा का भतरफ मह नहीॊ है कक सदा े भूखद फना यहे । कबी दद्शजन क प्रनत पपकाय बी कय दे रेककन बीतय से अऩने चचत्त को चैतन्म े ू क यस से सयाफोय कयता जाम। े बगवान श्रीकृष्ण साधक क जीवन भें साध्म तत्त्व का जल्दी से साऺात्काय हो जाम े इसमरए दै वी गणों का वणदन कय यहे हैं। दै वी सम्ऩदा क गण दे व की अनबूनत क कयीफ रे जाते े े हैं। दे व वह ऩयभेद्वय है जो सवदत्र है , सवदशडक्तभान है , सूक्ष्भानतसूक्ष्भ है । कहा है कक् 'भातदेवो ृ बव..... वऩतदेवो बव.... आचामददेवो बव.... अनतचथदे वो बव.....।' इन भाता, वऩता, आचामद, ृ अनतचथ आहद हाथ-ऩैय, नाक-भॉहवारे दे वों भें जो वास्तववक दे व है , जो अन्तमादभी दे व है वह ऩयभात्भा तम्हाये अन्त्कयण भें बी फैठा है । उस दे व का अनबव कयने क मरए दै वी सम्ऩदा े ननतान्त आवश्मक है । दै वी सम्ऩदा आत्भा-ऩयभात्भा क साऺात्काय तक ऩहॉचा दे ती है । े
  • 19.
    स्थर-शयीयधायी को सवदथाअहहॊसक होना तो सॊबव नहीॊ रेककन अऩने स्वाथद क कायण ू े ककसी चचत्त को, ककसी क तन-भन को, ककसी क जीवन को कद्श न दे ना मह अहहॊसा है । डॉक्टय े े शल्म कक्रमा कयता है , भयीज को ऩीडा ऩहॉ चाता है रेककन उसका ऩीडा ऩहॉ चाने का स्वाथद नहीॊ है । उसका स्वाथद है कक भयीज ननयोग हो जाम। इसमरम अॊगों की काटाकटी कयना, यक्त फहाना डॉक्टय क मरए हहॊसा नहीॊ भानी जाती। े हहॊसा का जन्भ तभोगण से होता है । प्रनतहहॊसा यजोगण से ऩैदा होती है । अहहॊसा सत्त्वगण से ऩैदा होती है । श्रीकृष्ण की अहहॊसा सत्त्व-यजो-तभोगणजन्म नहीॊ है । श्रीकृष्ण की अहहॊसा मह है कक जजस तत्त्व की कबी भत्म नहीॊ होती उसभें हटककय व्मवहाय कयना। मह ऩयभ अहहॊसा है , ृ अहहॊसा का सक्ष्भतभ स्वरूऩ है । ू अहहॊसा ऩयभो धभद्। ऩयभ तत्त्व भें जो हटक गमा, अचर तत्त्व भें जो प्रनतवद्षत हो गमा वही इस ऩयभ धभद को उऩरब्ध होता है । प्रकृते् कक्रमभाणानन गणै् कभादणण सवदश्। अहॊ कायववभूढात्भा कतादहमभनत भन्मते।। 'वास्तव भें सम्ऩूणद कभद सफ प्रकाय से प्रकृनत क गणों द्राया ककमे जाते हैं तो बी जजसका े अॊत्कयण अहॊ काय से भोहहत हो यहा है ऐसा अऻानी 'भैं कत्ताद हूॉ' ऐसा भानता है ।' (गीता् 3.27) प्रकृनत भें होने वारे कभों को जो कत्ताद फनकय अऩने भें थोऩता है वह ककतना बी अहहॊसक हो जाम कपय बी उसक द्राया हहॊसा हो जामगी औय अऩने स्वरूऩ भें हटककय नयो वा े कजयो वा की रीरा कयवाकय ऩाऩी तत्त्वों को जगत से हटवाते हैं तबी बी श्रीकृष्ण सदा अहहॊसक ॊ हैं। सत्म का भतरफ है मथाथद औय वप्रम बाषण। अॊत्कयण औय इजन्िमों क द्राया जैसा े ननद्ळम ककमा हो वैसा ही वप्रम शब्दों भें कहने का नाभ है सत्म बाषण। सत्म भधय औय हहतकायी होता है । भाॉ भधय वचन फोरती है , उसभें फारक हहत है रेककन डाककनी भधय वचन फोरती है रेककन उसका वचन आदभी क तेज-ओज-वीमद का सत्मानाश कयने वारा होता है । े 'सेल्सभैन' भधय वचन फोरता है तो उसभें अऩना सौदा कयने का स्वाथद बया होता है । भाॉ भधय वचन फोरती है तो उसक वचन भें अऩने सॊतान-ऩत्र-ऩत्री-कटम्फी का हहत छऩा हआ है । े अत् भधय वचन सत्म होना चाहहए औय साथ ही साथ हहतकय होना चाहहए। अहहॊसा वह है जजसभें भन, कभद, वचन से ककसी क तन-भन-जीवन को स्वाथद क मरए सताने का प्रमास न े े ककमा जाम। क्रोध का न होना अक्रोध है । श्रीयाभचन्िजी क चचत्त भें ऩूयी शाजन्त थी। उनक ननकटवती े े रोगों को चचन्ता हई कक याभजी इतने शान्त यहें गे तो यावण भये गा कसे? उन्होंने याभ जी से ै
  • 20.
    ववनती की कक्"प्रब ! आऩ क्रोध कीजजए।" कपय याभजी ने क्रोध का आवाहन ककमा् 'हे क्रोध ! अहॊ त्वॊ आवाहमामभ। भैं तम्हाया आवाहन कयता हूॉ।' श्रीयाभजी ने उऩमोग कयने क मरए क्रोध को े फरामा। ऩरयवाय भें अनशासन कयने क मरए, व्मवहाय-जीवन भें पपकायने क मरए कबी क्रोध े े कयना ऩडे मह एक फात है रेककन हभ रोग प्राम् क्रोध का उऩमोग नहीॊ कयते अवऩत क्रोध से आक्रान्त हो जाते है , क्रोध हभाये ऊऩय सवाय हो जाता है । क्रोध आग जैसा खतयनाक है । घय भें चोयी हो जाम तो कछ न कछ साभान फचा यहता है , फाढ़ का ऩानी आ जाम कपय बी साभान फचा यहता है , फाढ़ का ऩानी आ जाम कपय बी साभान फचा यहता है रेककन घय भें आग रग जाम तो सफ कछ स्वाहा हो जाता है , कछ बी फचता नहीॊ। उसी प्रकाय अऩने अन्त्कयण भें महद रोब, भोहरूऩी चोय प्रववद्श हो जाम तो कछ ऩण्म ऺीण हो जाम, कपय बी चचत्त भें शाॊनत औय प्रसन्नता का कछ अॊश फचता है रेककन अन्त्कयण भें क्रोधरूऩी आग रग जाम तो सायी शाॊनत बॊग हो जाती है , जऩ-तऩ-दान आहद ऩण्म-प्रबाव ऺीण होने रगता है । इसीमरए बगवान कहते हैं - जीवन भें अक्रोध राना चाहहए। स्वबाव भें से क्रोध को ववदा कयना चाहहए। प्रद्ल होगा कक दवादसा आहद इतना क्रोध कयते थे कपय बी भहान ् ऋवष थे। मह कसे? ै दवादसा ऻानी थे। क्रोध कयते हए हदखते थे, श्राऩ दे ते हए हदखते थे। कपय बी वे अऩने स्वरूऩ भें प्रनतवद्षत थे। ऻानी को सॊसायी तयाजू भें नहीॊ तोरा जाता। साभान्म आदभी क्रोध कये तो उसका तऩ ऺीण हो जाता है । उसका वचन मसद्ध नहीॊ होता। दवादसा कहीॊ अऩनी भस्ती भें फैठे थे। आधा भीर दय से कोई ब्राह्मण गज़य यहा था। ू दवादसा ने चचल्रा कय उसे अऩने ऩास फरामा् "एइ.... इधय आ, ब्राह्मण क फच्चे....!" े वह ऩास आकय हाथ जोडते हए फोरा् "जी भहायाज !" "कहाॉ गमा था तू?" "भैं तऩ कयने गमा था। फेटा नहीॊ हो यहा था। भाता जी की प्रसन्नता क मरए भैंने तीन े सार तक तऩ ककमा। भाॉ प्रकट हई, भझे ऩत्र-प्रानद्ऱ का वयदान हदमा।" "हाॉ, ऩत्र-प्रानद्ऱ का वयदान हदमा....! तझे ऩता नहीॊ, दवादसा महाॉ फैठे हैं? प्रणाभ ककमे बफना तू उधय से ही चरा जाता है ? जा, वयदान कन्सर है । तझे ऩत्र नहीॊ होगा। क्मा सभझता है ..." े दय से गजयते हए आदभी को इस प्रकाय श्राऩ दे दे ना...! इतना क्रोध होने ऩय बी दवादसा ू का वचन पमरत होता था, क्मोंकक दवादसा ब्रह्मवेत्ता थे। दवादसा क्रोध कयते हए हदखते थे। उस ब्राह्मण क वास्तववक कल्माण क मरए मह होना जरूयी था इसमरए दवादसा क द्राया क्रोध हो गमा। े े े दवादसा श्रीकृष्ण क वहाॉ अनतचथ होकय यहे , चचत्र-ववचचत्र चेद्शाएॉ कयक उनको उहद्रनन कयने े े का, क्रोचधत कयने का प्रमास ककमा रेककन श्रीकृष्ण अऩनी सत्तासभान भें जस्थत यहे । श्रीकृष्ण की
  • 21.
    सभता का जगतको दशदन कयाने क मरए दवादसा ने रीरा की थी। उन्हें जजस खण्ड भें ठहयामा े गमा था उस खण्ड भें जो फहढ़मा चीज वस्तएॉ थी, सय-सभान था, सन्दय बफछौने, गद्दी-तककमे, चन्दनकाद्ष की फनी हई चीजें आहद सफ खण्ड क फीच इकट्ठा कयक आग रगा दी। अऩने फार े े खोरकय वहाॉ 'होरी... होरी....' कयक नाचने रगे कपय बी श्री कृष्ण को क्रोध नहीॊ आमा। े दवादसा ने खाने क मरए फहत सायी खीय फनाई। कछ खीय खाई। फाकी फची हई जठी खीय े ू श्रीकृष्ण को दे ते हए आऻा की् 'मह खीय अऩने शयीय ऩय चऩड दो।' श्रीकृष्ण ने गरुदे व की फची हई खीय उठा कय अऩने भख सहहत सवद अॊगों ऩय चऩड दी। दवादसा ने दे खा कक श्रीकृष्ण क चचत्त े भें कोई मशकामत नहीॊ है । भस्कयाकय गभ का जहय जजनको ऩीना आ गमा। मह हकीकत है कक जहाॉ भें उनको जीना आ गमा।। श्रीकृष्ण की प्रसन्नता औय भस्ती ज्मों-की-त्मों फनी यही। क्मा अदबत है सभता ! ककससे व्मवहाय कयना, कहाॉ कयना, कफ कयना, कसा कयना, ककतना कयना मह श्रीकृष्ण जानते हैं। वे ै ऻान की भूनतद हैं। दवादसा उनको क्रोचधत कयने क मरए, उहद्रनन कयने क मरए चेद्शा कयते हैं े े रेककन श्रीकृष्ण क चचत्त भें कोई मशकामत नहीॊ है । एक फाय दवादसा ऋवष क आगे मसय झका े े हदमा, अनतचथ दे व की आवबगत कय दी कपय उनक मरए मशकामत कसी? े ै जो भॊजजर चरते हैं वे मशकवा नहीॊ ककमा कयते। जो मशकवा ककमा कयते हैं वे भॊजजर नहीॊ ऩहॉ चा कयते।। रूजक्भणी गरु-मशष्म की रीरा दे ख यही है , भस्कया यही है कक गरु तो ऩक्क हैं रेककन े चेरे बी कच्चे नहीॊ हैं, चेरे बी गरु ही हैं। उनका चचत्त प्रसन्न हो यहा है कक भेये कृष्ण का चचत्त ककतनी सभता भें जस्थत है ! दवादसा की नजय रुजक्भणी क हास्म ऩय गई तो गयज उठे ् े "अये ! तू हॉ स यही है ? इधय आ।" रुजक्भणी जी क फार ऩकडकय उनक भख ऩय दवादसा ने अऩने हाथ से जठी खीय चऩड े े ू दी। कपय नतयछी आॉख से श्रीकृष्ण की ओय ननहायते हैं। श्रीकृष्ण स्वरूऩ भें शान्त औय सभ हैं। दवादसा ने दे खा कक मह फाण बी पर हो गमा। अफ नमा ननशाना ताका् े "ऐ कृष्ण ! भझे यथ ऩय फैठकय नगयमात्रा कयनी है । घोडों क फदरे तभ दोनों यथ े खीॊचोगे।" "जो आऻा।" श्रीकृष्ण औय रुजक्भणी दोनों यथ भें जत गमे औय दवादसा यथारूढ़ हए। नगय क याजभागद े से यथ गजय यहा है । दवादसा दोनों ऩय कोडे पटकायते जा यहे हैं। कोभर अॊगना रुजक्भणी जी की क्मा हारत हई होगी ! फाजाय क रोग आद्ळमद भें डूफे जा यहे हैं कक द्रायकाधीश श्रीकृष्ण कौन से े फाफा क चक्कय भें आ गमे हैं ! े
  • 22.
    श्रीकृष्ण कहते हैंकक चौयासी क चक्कय से ननकरना हो, भन क चक्कय से ननकरना हो े े तो दवादसा ऋवष क चयणों भें औय उनक चक्कयों भें जरूय आना चाहहए। े े कोई स्त्री क चक्कय भें है , कोई फच्चों क चक्कय भें है , कोई धन क चक्कय भें है , कोई े े े सत्ता क चक्कय भें है , कोई भन क चक्कय भें है । इन साये चक्कयों से ननकरने क मरए कन्है मा े े े गरु क चक्कय भें है । े बगवद् गीता का इतना भाहात्म्म क्मों है ? क्मोंकक उसभें श्रीकृष्ण जो कहते हैं वह उनके जीवन भें है । अक्रोध भाना अक्रोध। क्रोध कहाॉ कयना चाहहए मह वे बरी प्रकाय जानते हैं। कस ॊ को आमरॊगन कयते-कयते मभसदन ऩहॉ चा हदमा। कपय उसकी उत्तयकक्रमा कयाने भें श्रीकृष्ण क चचत्त े भें द्रे ष नहीॊ है । यावण, कबकणद औय इन्िजीत की उत्तयकक्रमा कयाने भें श्रीयाभजी को कोई द्रे ष ॊ नहीॊ था क्मोंकक सभता उनका सहज मसद्ध स्वबाव है । सभत्वॊ मोग उच्मते। हजाय वषद तक शीषादसन कयो, वषों तक ऩैदर तीथदमात्रा कयो, बखे यहो, खडेद्वयी औय ू तऩेद्वयी होकय तऩद्ळमाद कयो कपय बी एक ऺण की चचत्त की सभता क तऩ क आगे वह तम्हाया े े तऩ छोटा हो जामगा। अत् चचत्त को सभता भें जस्थय कयो। काभ आता है तो ऩीडडत कय दे ता है , क्रोध आता है तो जराने रगता है , रोब आता है तो गगरा कय दे ता है । इन ववकायों से आक्रान्त भत हो जाओ। काभ का उऩमोग कयो, क्रोध का उऩमोग कयो, रोब का उऩमोग कयो। तभ कभये भें फैठे हो। अऩनी भौज से बीतय से दयवाजा फन्द कयक फैठो मह तम्हाया े स्वातन््म है । आधा घण्टा फैठो, चाहे दो घण्टा फैठो, चाहे चाय घण्टा फैठो, कोई फन्धन नहीॊ है । अगय दसया कोई फाहय से कडा रगाकय तभको कभये भें फन्द कय दे तो मह तम्हायी ऩयाधीनता ू ॊ है , चाहे वह दस मभनट क मरए ही क्मों न हो। े साधनों का उऩमोग कयना मह स्वाधीनता है । साधनों से अमबबूत हो जाना, साधनों के गराभ हो जाना मह ऩयाधीनता है । क्रोध आ गमा तो अशाॊत हो गमे, रोब आ गमा तो हभ रोबी हो गमे, काभ आ गमा तो हभ काभी हो गमे, भोह आमा तो हभ भोही हो गमे। ववकाय हभाया उऩमोग कय रेता है । काभ, क्रोध, रोब, भोह आहद का स्वतन्त्र ढॊ ग से उऩमोग कयना चाहहए। जैसे गराफ का पर है । उसको सॉूघा, अच्छा रगा। ठीक है , उसकी सगन्ध का उऩमोग ू ककमा। अगय पर की सगन्ध भें आसडक्त हई तो हभ फॉध गमे। ू अऩने चचत्त भें ककसी बी ववकाय का आकषदण नहीॊ होना चाहहए। ववकायों का उऩमोग कयके स्वमॊ को औय दसयों को ननववदकाय नायामण भें ऩहॉ चाने का प्रमत्न कयना चाहहए, न कक ववकायों भें ू पस भयना चाहहए। कआ फनामा है तो शीतर ऩानी क मरए, न कक उसभें डूफ भयने क मरए। ॉ ॉू े े
  • 23.
    श्रीकृष्ण क चचत्तभें दवादसा की अॉगडाइमों क कायण ऺोब नहीॊ हआ। दवादसा ने दे खा कक े े भैंने इतने-इतने अशान्त कयने क फाण पक रेककन श्रीकृष्ण की शाॊनत अनूठी है । आणखय दवादसा े ें े से यहा नहीॊ गमा। वे फोर उठे ् "कृ ष्ण ! अफ फताओ, तभ क्मा चाहते हो?" "गरुदे व ! आऩ सदा भझ ऩय प्रसन्न यहें । भेये मरए दननमा चाहे कछ बी फोरे, कछ बी कय रे रेककन भेये गरुदे व भेये से न रूठें , फस भैं इतना ही चाहता हूॉ।" श्रीकृष्ण गरु की जगह ऩय ऩये गरु हैं। कृष्णॊ वन्दे जगदगरुभ ् औय मशष्म की जगह ऩय ू ऩये मशष्म हैं। ू दवादसा ने छरकते हए आशीवादद हदमा् "कन्है मा ! भैं तो तेये ऩय प्रसन्न हूॉ ही रेककन जो तेया नाभ रेगा वह बी प्रसन्न हो जामेगा। दे ख बैमा ! तने एक गल्ती की। भैंने तझे साये शयीय ू ऩय खीय चऩडने को कहा था। जहाॉ-जहाॉ वह खीय रगी वे सफ तेये अॊग वज्र जैसे अबेद्य फन गमे रेककन ऩैयों क तरों को तने खीय नहीॊ रगामी। वह बाग कच्चा यह गमा। अऩने ऩैयों क तरवों े ू े को फचाना, फाकी सफ जगह तभ वज्रकाम फन गमे हो।" हभ जानते हैं कक आणखय भें उन्हीॊ ऩैय क तरवे भें व्माध का फाण रगा औय उसी े ननमभत्त से वे भहाननवादण को प्राद्ऱ हए। श्रीकृष्ण ने बगवदगीता भें अक्रोध कह हदमा तो वे स्वमॊ बी अक्रोध होने भें उत्तीणद हए हैं। हभाये जीवन भें बी जफ क्रोध आमा तफ हभ सावधान हों। सोचें कक भेयी जगह ऩय श्रीकृष्ण होते तो क्मा कयते? श्रीयाभ होते तो क्मा कयते? फद्ध होते तो क्मा कयते? कफीयजी होते तो क्मा कयते? क्रोध कयने की जगह तो उस सभम क्रोध कयो रेककन रृदम भें क्रोध उत्ऩन्न न हो, फाहय से क्रोध कयने का नाटक हो। अगय क्रोध आता हो तो दे खो कक क्रोध आ यहा है । उस सभम शाॊत हो जाओ, स्वस्थ हो जाओ। फाद भे ककसी को सभझाना हो तो सभझाओ, क्रोध का नाटक कय रो, पपकाय भाय दो। अऩने ऩय क्रोध को हावी भत होने दो। हभ क्मा कयते हैं? क्रोध को दफाने की कोमशश कयते हैं रेककन क्रोध दफता नहीॊ औय हभ बीतय से उरझते यहते हैं , सरगते यहते हैं, जरते यहते हैं। जीवन भें त्माग कसा होना चाहहए? जो फीत गमा है उसको माद कय-कयक अऩने चचत्त ै े को खयाफ न कयो। उसे बूर जाओ। बोग-साभग्री का अनत सॊग्रह कयक अऩने चचत्त को फोणझर न े फनाओ। त्मागात ् शाॊनतयनन्तयभ ्। 'त्माग से तत्कार शाॊनत मभरती है ।' (गीता)
  • 24.
    जीवन भें बीतयसे जजतना त्माग होगा उतनी ही शाॊनत यहे गी। कपय चाहे तम्हाये ऩास सोने की द्रारयका हो औय वह डूफ यही हो कपय बी चचत्त भें शोक न होगा। श्रीकृष्ण की द्रारयका सभि भें डूफी कपय बी उनक चचत्त भें कोई आसडक्त नहीॊ थी। उनका चचत्त त्माग से ऩूणद था। े गाॊधायी ने श्रीकृष्ण को शाऩ हदमा कक 36 सार क फाद तम्हाये दे खते-दे खते तम्हाया मादव े वॊश नद्श-भ्रद्श हो जामगा औय श्रीकृष्ण क दे खते-दे खते ही मदवॊश का नाश हआ। कपय बी श्रीकृष्ण े उहद्रनन नहीॊ हए। जीवन भें त्माग होना चाहहए, शाॊनत होना चाहहए। शाॊनत त्माग का अनगभन कयती हई अऩने आऩ आ जाती है । अऩैशनभ ् का अथद है चाडी-चगरी न कयना। कबी ककसी की ननन्दा, चाडी-चगरी, आरोचना नहीॊ कयना चाहहए। कोई आदभी ककसी की ननन्दा कयता है तो सनने वारा उसभें अऩना अथद जोड रेता है , कछ ज्मादा भसारा बय दे ता है । वह जफ तीसये आदभी क आगे े फोरेगा तो वह बी अऩने भन का यॊ ग उसभें मभरा दे ता है । वह जफ चौथे क आगे फात कये गा तो े औय कचया जड जामगा। भूर भें फात कोई छोटी-भोटी होती है रेककन फात कयने वारों क अऩने- े अऩने ढॊ ग क ववकृत स्वबाव होने से वह फात न जाने कसा रूऩ रे रेती है । जया सी फात ने े ै भहाबायत का मद्ध कयवा हदमा। अस्त्र-शस्त्र का घाव तो सभम ऩाकय बय जाता है भगय बफना हड्डी की रूरी (जजह्वा) का घाव नहीॊ मभटता, भयने ऩय बी नहीॊ मभटता। इसमरए वाणी फोरते सभम खफ सावधान यहो। ू वाणी ऐसी फोमरमे भनवा शीतर होम। औयन को शीतर कये आऩहॉ शीतर होम।। शाह हाकपज ने कहा् "हे इन्सान ! तू हजाय भॊहदय तोड दे , हजाय भजस्जद तोड दे रेककन ककसी का जजन्दा हदर भत तोडना, क्मोंकक उस हदर भें हदरफय खद यहता है ।" कफीय जी ने कहा् कफीया ननन्दक ना मभरो ऩाऩी मभरो हजाय। एक ननन्दक क भाथे ऩय राख ऩाऩीन को बाय।। े हे इन्सान ! ईद्वय क भागद ऩय जाने वारे साधक की श्रद्धा भत तोड। े वववेकानन्द कहते थे् 'तभ ककसी का भकान छीन रो मह ऩाऩ तो है रेककन इतना नहीॊ। वह घोय ऩाऩ नहीॊ है । ककसी क रूऩमे छीन रेना ऩाऩ है रेककन ककसी की श्रद्धा की डोय तोड दे ना े मह सफसे घोय फडा ऩाऩ है क्मोंकक उसी श्रद्धा से वह शाॊनत ऩाता था, उसी श्रद्धा क सहाये वह े बगवान क तयप जाता था। े तभने ककसी का भकान छीन मरमा तो ककयामे क भकान से वह जीवन गजाय रेगा े रेककन तभने उसकी श्रद्धा तोड दी, श्रद्धा का दरुऩमोग कय हदमा, ईद्वय से, शास्त्र से, गरु से, बगवान क भागद से, साधन-बजन से उसको बटका हदमा तो वह अऩने भकान भें होते हए बी े
  • 25.
    स्भशान भें है। रूऩमों क फीच होते हए बी वह फेचाया कगार है । उसक हदर की शाॊनत चरी गई े ॊ े जीवन से श्रद्धा गई, शाॊनत गई, साधन-बजन गमा तो बीतय का खजाना बी गमा। फाहय के खजाने भें आदभी ककतना बी रोट-ऩोट होता हो रेककन जजसक ऩास बडक्त, साधन, बजन, श्रद्धा े का खजाना नहीॊ है वह सचभच भें कगार है । ॊ श्रीकृष्ण कहते हैं- श्रद्धावाॉल्रबते ऻानॊ तत्ऩय् सॊमतेजन्िम्। ऻानॊ रब्धवा ऩयाॊ शाजन्तभचचये णाचधगच्छनत।। 'जजतेजन्िम, साधनऩयामण औय श्रद्धावान भनष्म ऻान को प्राद्ऱ होता है तथा ऻान को प्राद्ऱ होकय वह बफना ववरम्फ क तत्कार ही बगवत्प्रानद्ऱरूऩ ऩयभ शाजन्त को प्राद्ऱ हो जाता है ।' े (गीता् 4.39) भनष्म श्रद्धार हो, तत्ऩय हो औय थोडा सॊमभ कये तो जल्दी से फेडा ऩाय हो जाम। जजसस ककसी गाॉव से गज़य यहे थे। रोगों ने दे खा कक सॊत आ यहे हैं। सज्जन रोगों ने सत्काय ककमा, ननन्दकों ने ननन्दा की। ऩहरे से ही जजसस की अपवाह परी हई थी कक ै 'भेकडरीन जैसी सन्दय वैश्मा जजसस क ऩास आती है , इत्र से जजसस क ऩैय धराती है , अऩने े े े रम्फे-रम्फे ये शभ जैसे फारों से जजसस क ऩैय ऩोंछती है ।' आहद आहद। कप्रचाय कयने वारों ने े जोयो का कप्रचाय ककमा था। इसीमरए जजसस को दे य-सफेय क्रॉस ऩय चढ़ना ऩडा था। हाॉ, जजसस तो क्रॉस ऩय नहीॊ चढ़े थे, जजसस का शयीय जरूय क्रॉस ऩय चढ़ा होगा। जजन्होंने कप्रचाय ककमा था वे रोग न जाने ककन नयकों भें सडते होंगे, जरते होंगे जफकक जजसस को अबी बी राखों जानते हैं, भानते हैं। जजसस गाॉव भें आमे तो सज्जन रोग, ऩववत्र फवद्धवारे रोग कप्रचाय सनने क फावजद बी े ू जजसस का दशदन कयने ऩहॉ च। जजनकी भमरन भनत थी वे जजसस का नाभ सनकय आगफफरा े ू हए। सज्जन रोगों ने ऩूछा् "हे परयश्ते ! इस इराक भें अकार ऩड यहा है । खेतों भें ऩानी नहीॊ े फयस यहा है । क्मा कायण है?" जजसस ने ऺणबय शाॊत होकय कहा् "इस गाॉव भें कई ननन्दक, चगरखोय रोग यहते हैं। उनक ऩाऩों क कायण ऐसा हो यहा है ।" े े "ऐसे कौन रोग हैं? आऩ उनक नाभ फताइमे, हभ उनको ठीक कय दें गे मा गाॉव से े ननकार दें गे।" सज्जन रोगों ने जजसस से ववनती की। जजसस ने कहा् "उन रोगों का नाभ फताने से भझे बी चगरखोय होना ऩडेगा। भैं नहीॊ फताऊगा।" जजसस वहाॉ से आगे फढ़ गमे। ॉ हभाये चचत्त भें बी दमा होनी चाहहए। ऻानीजनों का तो दमार होना स्वत् स्वबाव फन जाता है । जैसे दीवाय गई तो दीवाय ऩय अॊककत चचत्र बी गमा, जैसे फीज जर गमा तो फीज भें
  • 26.
    छऩा हआ वऺबी जर गमा, ऐसे ही जजसकी दे ह-वासना गई है , जजसका दे हाभ्मास गमा है , ृ ऩरयजच्छन्न अहॊ गमा है उनका अऩने कभों का कत्तादऩन बी चरा जाता है । सरयता मह नहीॊ सोचती कक गाम ऩानी ऩी यही है उसको अभत जैसा जर औय शेय ऩानी ऩीने आवे उसको ववष ृ जैसा ऩानी फना दॉ । नहीॊ.... वह तो सबी क मरए कर कर छर छर फहती है , सफको अऩने ू े शीतर जर से तद्ऱ कयती है । कपय कोई उसभें डूफ जाम तो उसकी भजी की फात है , सरयता ृ ककसी को कद्श नहीॊ दे ती। ऐसे ही जजनक रृदम भें दमा बयी हई है , प्राणीभात्र का जो कल्माण े चाहते हैं ऐसे सॊतों की तयह जजसका हदर है वह वास्तव भें दमारहदर कहा जाता है । जैसे फच्चे का द्ख दे खकय भाॉ का हदर िववत हो जाता है ऐसे ही प्राणीभात्र का द्ख दे खकय दमार ऩरुषों का हदर िववत हो जाता है , उसका द्ख मभटाने क मरए वे प्रमत्न कयते हैं। ऐसी दमा से चचत्त की े शवद्ध होती है । तभने अगय प्मासे को ऩानी वऩरामा, बखे को बोजन हदमा तो उसकी बख-प्मास मभटी ू ू औय तम्हाये अॊत्कयण का ननभादण हआ। द्खी जन को तो ऐहहक द्ख मभटा रेककन तम्हाया अॊत्कयण ऩववत्र हआ, जन्भ-जन्भ क द्ख मभटने का साधन फन गमा। े सज्जन क साथ सज्जनता का व्मवहाय तो सफ कय सकते हैं रेककन दजदन की गहयाई भें े अऩने वप्रमतभ ऩयभ सज्जन को दे खने की जो आॉख है , अऩने आत्भा की भधयता, अऩने आत्भा की शाद्वतता, अऩने ऩयभेद्वय की अभयता दे खने की जो आॉख है वह खर जाम तो दजदन क प्रनत े बी रृदम भें करुणा होगी। कपय उसकी मोनमता क अनसाय उसक साथ व्मवहाय होगा। े े दजदन को सज्जनता क भागद ऩय राना मह बी दमा है । दजदन को उसक कल्माण क मरए े े े थोडा सफक मसखाना मह बी उसक प्रनत दमा है । रेककन दजदन क प्रनत क्रय होकय उसका ववनाश े े ू कयना मह क्रयता है । कपय बी, उसकी भत्म भें बी उसका कल्माण हो ऐसा ववचाय कयक श्रीकृष्ण ू ृ े औय श्रीयाभचन्ि जी दजदनों को भत्म दण्ड दे हदमा इसभें बी उनकी दमा है । क्मोंकक उन दजदनों ृ की दजदनता बफना ऑऩये शन क दय नहीॊ हो सकती थी। े ू डॉक्टय भयीज का हहत चाहते हए फाहय से क्रय हदखने वारी शस्त्रकक्रमा कयता है तो बी ू उसक चचत्त भें क्रयता नहीॊ होती। ऐसे ही जो दमार ऩरुष हैं, भाता-वऩता, गरुजन औय बगवान े ू आहद क चचत्त भें कबी, ककसी क मरए बी क्रयता नहीॊ होती। े े ू एक भाॉ का फेटा डाक हो गमा था। डकती भें नाभचीन हो गमा, ऩकडा गमा औय कई क्रय ू ै ू अऩयाधों क कायण पाॉसी की सजा मभरी। पाॉसी से ऩहरे ऩूछा गमा कक तेयी आणखयी इच्छा क्मा े है? वह फोरा कक भझे भेयी भाॉ से मभरना है । भाॉ को नजदीक रामा गमा तो उस रडक ने खफ े ू नज़दीक रऩककय अऩने दाॉतों से भाॉ का नाक काटकय अरग कय हदमा। न्मामाधीश ने ऩूछा् "तझे भाॉ क प्रनत इतना द्रे ष औय क्रोध क्मों?" े वह फोरा् "इस भेयी भाॉ ने ही भझे इतना फडा डाक फनने भें सहमोग हदमा है । भैं फचऩन ू भें जफ छोटी-छोटी चोरयमाॉ कयक घय भें आता था, ककसी को ऩेजन्सर चयाकय, ककसी की यफड े
  • 27.
    चयाकय भाॉ कऩास जाता था तफ भेयी उन गरनतमों क प्रनत भाॉ राऩयवाह यही। भेयी गरनतमों े े को ऩोषण मभरता यहा। ऐसा कयते कयते भैं फडा डाक हो गमा औय आज इस पाॉसी का पदा भेये ू ॊ गरे भें आ ऩडा है । भेये जीवन क सत्मानाश क कायणों भें भाॉ का ननमभत्त फडा है ।" े े खेत भें खेती क ऩौधों क अरावा कई प्रकाय का दसया घास-पस बी उग ननकरता है । े े ू ू उसक प्रनत ककसान अगय राऩयवाह यहे तो खेत भें काभ क ऩौधों क फदरे दसयी ही बीड-बाड हो े े े ू जाती है , खेती ननकम्भी हो जाती है । फगीचा जॊगर फन जाता है । ऐसे ही जीवन भें थोडी-थोडी राऩयवाही आगे चरकय फडी हाननकायक मसद्ध होती है । एक मशष्म था। गरुसेवा कयता था रेककन राऩयवाह था। गरु उसको सभझाते थे कक् "फेटा ! राऩयवाही भत कय। थोडी सी बी राऩयवाही आगे चरकय द्ख दे गी।" मशष्म कहता् "इसभें क्मा है ? थोडा-सा दध ढर गमा तो क्मा हआ? औय सेयबय रे आता हूॉ।" ू महाॉ जया से दध की फात नहीॊ है , आदत बफगडती है । दध का नकसान ज्मादा नहीॊ है, ू जीवन भें राऩयवाही फडा नकसान कय दे गी। मह फात मशष्म क गरे नहीॊ उतयती थी। गरु ने े सोचा कक इसको कोई सफक मसखाना ऩडेगा। गरुजी ने कहा् "चरो फेटा ! तीथदमात्रा को जाएॉगे।" दोनों तीथदमात्रा कयने ननकर ऩडे। गॊगा ककनाये ऩहॉ च, शीतर नीय भें गोता भाया। तन-भन े शीतर औय प्रसन्न हए। साजत्त्वक जर था, एकाॊत वातावयण था। गरु ने कहा् "गॊगा फह यही है । शीतर जर भें स्नान कयने का ककतना भजा आता है ! चरो, गहये ऩानी भें जाकय थोडा तैय रेते हैं। तू ककयामे ऩय भशक रे आ। भशक क सहाये दय-दय तैयेंगे।" े ू ू भशकवारे क ऩास दो ही भशक फची थी। एक अच्छी थी, दसयी भें छोटा-सा सयाख हो े ू गमा था। मशष्म ने सोचा् इससे क्मा हआ? चरेगा। छोटे -से सयाख से क्मा बफगडने वारा है । अच्छी भशक गरुजी को दी, सयाखवारी भशक खद री। दोनों तैयते-तैयते भझधाय भें गमे। धीये - धीये सयाखवारी भशक से हवा ननकर गई। मशष्म गोते खाने रगा। गरुजी को ऩकाया् "गरुजी ! भैं तो डूफ यहा हूॉ....।" गरुजी फोरे् "कोई फात नहीॊ। जया-सा सयाख है इससे क्मा हआ? "गरुजी, मह जया सा सयाख तो प्राण रे रेगा। अफ फचाओ.... फचाओ.....!" गरुजी ने अऩनी भशक दे दी औय फोरे् "भैं तो तैयना जानता हूॉ। तेये को सफक मसखाने क मरए आमा हूॉ कक जीवन भें थोडा-सा बी दोष होगा वह धीये -धीये फडा हो जामगा औय जीवन े नैमा को डफाने रगेगा। थोडी-सी गरती को ऩवद्श मभरती यहे गी, थोडी सी राऩयवाही को ऩोषण मभरता यहे गा तो सभम ऩाकय फेडा गक होगा।" द "एक फीडी पक री तो क्मा हआ?..... इतना जया-सा दे ख मरमा तो क्मा हआ? .... इतना ॉू थोडा सा खा मरमा तो क्मा हआ?...."
  • 28.
    अये ! थोडा-थोडाकयते-कयते कपय ज्मादा हो जाता है , ऩता बी नहीॊ चरता। जफ तक साऺात्काय नहीॊ हआ है तफ तक भन धोखा दे गा। साऺात्काय हो गमा तो तभ ऩयभात्भा भें हटकोगे। धोखे क फीच होते हए बी बीतय से तभ सयक्षऺत होगे। े उठत फैठत वही उटाने। कहत कफीय हभ उसी हठकाने।। प्राणामाभ कयने से कभेजन्िमाॉ मशचथर हो जाती हैं। द्वासोच््वास को ननहायते हए अजऩाजाऩ कयने से भन की चॉ चरता कभ हो जाती है । भन की चॉ चरता कभ होते ही अऩनी गरनतमाॉ ननकारने का फर फढ़ जाता है । भन् एव भनष्माणाॊ कायणॊ फन्धभोऺमो्। भनष्मों का भन ही अऩने फन्धन औय भडक्त का कायण है । अगय ककसी का उत्कषद दे खकय चचत्त भें ईष्माद होती है तो सभझो अऩना चचत्त भमरन है । 'उसका मश का प्रायब्ध है तो उसको मश मभरेगा। उसक मश भें बी भेया ही ऩयभात्भा है .... ऐसा े सोचकय उसक मश का आनन्द रो। ककसी को ऊचे आसन ऩय फैठा दे खकय उससे ईष्माद कयने क े ॉ े फजामे तभ बी ऊचे कभद कयो तो तभ बी ऊचे आसन ऩय ऩहॉ च जाओगे।' अबी जी ऊचे आसन ॉ ॉ ॉ ऩय फैठे हैं उनभें ऩयभेद्वय की कृऩा से ऊचाई है । वाह प्रब ! तेयी रीरा अऩॊयऩाय है ....' ऐसा ॉ सोचकय तभ ऊचे चरे आओ। ॉ ऊचे आसन ऩय फैठने से आदभी ऊचा नहीॊ हो जाता। नीचे आसन ऩय फैठने से आदभी ॉ ॉ नीचा नहीॊ हो जाता। नीची सभझ है तो आदभी नीचा हो जाता है औय ऊची सभझ है तो आदभी ॉ ऊचा हो जाता है । ऊची सभझ उन्हीॊ की है जजनक स्वबाव भें अहहॊसा, सत्म, अक्रोध, त्माग, ॉ ॉ े शाॊनत आहद दै वी गणों का ववकास होता है । ववषमों भें रोरऩता नहीॊ होनी चाहहए। यॊ गअवधत भहायाज नाये द्वयवारे फैठे थे। वरसाड से कोई व्मडक्त फहत फहढ़मा ककस्भ क ू े आभ अवधतजी क सभऺ रामा। आभ की बूयी बूयी प्रशॊसा कयने रगा औय काट कय अवधतजी ू े ू क साभने यखकय खाने क मरए ववनती की् े े "गरुजी ! मे फहत फहढ़मा आभ हैं। आऩक मरए वरसाड से खास रामे हैं। खाइमे।" े अवधत जी ने कहा् "तभ सहज बाव से दे दे ते तो भैं खा रेता रेककन तभने इनकी ू इतनी प्रशॊसा की कक मे आभ ऐसे हैं..... वैसे हैं..... कसयी हैं.... फहत भीठे हैं.... सगन्ध आती े है .... इतनी प्रशॊसा कयने ऩय बी अबी तक भेये भॉह भें ऩानी नहीॊ आमा। तभ ऐसा कछ कयो कक भेये भॉह भें ऩानी आ जाम। भैं खाने क मरए रम्ऩटू हो जाऊ कपय खाऊगा, अफ नहीॊ खाता। े ॉ ॉ अऩनी श्रद्धा-बडक्त से आभ दो, तम्हायी प्रसन्नता क मरए भैं खा रॉ ूगा रेककन तभ आभ की े प्रशॊसा कयो औय भेये भॉह भें ऩानी आ जाम तो भेयी अवधती भस्ती को चधक्काय है ।" ू
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    भहादे व गोववन्दयानडे का नाभ आऩने सना होगा। उनकी ऩत्नी ने फहढ़मा आभ काटकय उन्हें हदमा। यानडेजी की एक चीयी खामी कपय हाथ धो मरमे। फोरे् "वह नौकय है न याभा, उसको बी मह आभ दे ना, फच्चों को बी दे ना, ऩडोस की फच्ची को बी दे ना।" "इतना फहढ़मा आभ है ....! आऩ ही क मरए काटा है । खट्टा है क्मा?" ऩत्नी ने ऩच्छा की। े ृ यानडेजी फोरे् "नहीॊ, आभ खट्टा नहीॊ है , फहत फहढ़मा है , फहत भीठा है , स्वाहदद्श है ।" "फहत फहढ़मा है , भीठा है तो आऩ क्मों नहीॊ खाते?" "इसमरए नहीॊ खाता हूॉ कक फहढ़मा चीज फाॉटने क मरए होती है , बोगने क मरए नहीॊ े े होती।" ककसी चीज को फहढ़मा सभझकय बोगने रग गमे तो रोरऩता आ जामगी। फहढ़मा चीज दसयों को फाॉटो ताकक फहढ़मा का आकषदण घट जाम, रोरऩत चरी जाम, अनासडक्तमोग मसद्ध हो ू जाम, फहढ़मा से फहढ़मा जो आत्भा-ऩयभात्भा है उसभें जस्थनत हो जाम। श्रीकृष्ण कहते हैं- अरोरप्त्वभ ्। हभ रोग क्मा कयते हैं? कोई चीज फहढ़मा होती है तो ठूॉस-ठूॉसकय खाते हैं, कपय अजीणद हो जाता तो दयकाय नहीॊ। कोई बी चीज फहढ़मा मभरे तो उसे फाॉटना सीखो ताकक उसकी रोरऩता चचत्त से हट जाम। रोरऩता फडा द्ख दे ती है । दे ह का सौन्दमद फढ़ाने क मरए रोग क्मा-क्मा कयते हैं। सौन्दमद-प्रसाधनों का उऩमोग े ककमा जाता है वे चीजें फनाने क मरए कई जीव-जन्त-प्राणणमों की हहॊसा होती है , हाननकायक े यसामनों का प्रमोग ककमा जाता है । ऩप-ऩावडय, रारी-मरऩजस्टक से सजामा हआ फाहय का दै हहक सौन्दमद तो उधाय का सौन्दमद। उससे तो तम्हाया, ऩनत का, तभ ऩय जजनकी ननगाह ऩडती है उनका ऩतन होता है रेककन जफ रृदम का सौन्दमद णखरता है तफ तम्हाया, तम्हाये सम्ऩक भें द आने वारे का, ऩनत औय ऩडोमसमों का बी कल्माण होता है । भीया का सौन्दमद ऐसा ही था, शफयी का सौन्दमद ऐसा ही था, गागी का सौन्दमद ऐसा ही था, भदारसा का सौन्दमद ऐसा ही था। हदर तम्हाया हदरफय क यॉ ग जाम मह असरी सौन्दमद है । कृबत्रभ सौन्दमद-प्रसाधनों से सजामा हआ े सौन्दमद कफ तक हटकगा? सच्चे बक्त क रृदम की ऩकाय होती है कक् े े "हे बगवान ! तू ऐसी कृऩा कय कक तेये भें भेया भन रग जाम।" बगवान कये कक बगवान भें हभाया भन रग जाम। बगवान भें भन रगता है तो सचभच भें भन सन्दय होता है । बोगों भें भन रगता है तो भन बद्दा हो जाता है । जफ चैतन्म स्वरूऩ ईद्वय क ध्मान भें , ईद्वय क चचन्तन े े भें , ईद्वय क ऻान भें हभाया भन रगता है तफ भन सन्दय होता है । ज्मों-ज्मों ववकायों भें , काभ े भें , क्रोध भें , ईष्माद भें भन रगता है त्मों-त्मों हभाया तन औय भन असन्दय होता है । ईसयदान नाभका एक कवव था। ऩत्नी चर फसी तो फडा द्खी हो यहा था। काका ने कहा कक चरो, द्रारयका जाकय आमें। दे व-दशदन हो जामेंगे औय भन को बी भोड जर जामगा।
  • 30.
    काका-बतीजा दोनों चरे।फीच भें जाभनगय आता था। वहाॉ का याजा जाभ कववता-शामयी आहद का फडा शौकीन था। इन्होंने सोचा याजा कववता की कि कये गा, इनाभ मभरेगा तो मात्रा का खचद बी ननकर आमगा औय अऩना नाभ बी हो जामगा। दोनों याजा जाभ क याजदयफाय भें गमे। अऩना कववत्व प्रस्तत ककमा। कववता-शामयी भें े याजा की प्रशजस्त अऩनी छटादाय शैरी भें सनामी। याजा झभ उठा। दयफायी रोग वाह वाह ऩकाय ू उठे । भॊत्री रोग बी चककत हए कक आज तक ऐसी कववता नहीॊ सनी। कववमों को ककतना इनाभ दे ना, कसी कि कयना इसका ननणदम कयने क मरए याजा ने ै े एक उच्च कोहट क ववद्रान याजगरु ऩीताम्फयदास बट्ट को आदयऩवक अऩने दयफाय भें यखा था। े ू द ईसयदान की कववता सनकय याजा खश हए याजा ने कवव को ऩयस्काय दे ने क मरए ऩीताॊफय बट्ट े की ओय ननहाया। "जो उचचत रगे वह इनाभ इस कवव को दे हदमा जाम।" ऩीताॊफय बट्ट ने ननणदम सना हदमा कक इस कवव क मसय ऩय सात जते भाय हदमे जामॉ। े ू सनकय सबा दॉ ग यह गई। ऩीताॊफय बट्ट का सबा भें प्रबाव था। उनकी आऻा का उल्रॊघन कसे ै ककमा जाम? कवव क मसय ऩय सात जते भाय हदमे गमे। कवव क हदर भें चोट रग गई। 'इतनी े ू े फहढ़मा कववता सनाई औय ऩयस्काय भें सात जत? बयी सबा भें ऐसा अऩभान? औय बफना ककसी ू े अऩयाध क? कछ बी हो, भैं इस ऩजण्डत को दे ख रॉ ूगा।' ईसयदान का खन उफर उठा। े ू कवव सबा छोडकय चरा गमा। भन ही भन ननधादरयत कय मरमा कक, 'इस ऩीताॊफय बट्ट को आज ही मभसदन ऩहॉ चा दॉ गा। ऩत्नी भयने का द्ख इतना नहीॊ जजतना भेयी सयस्वती भाता क ू े अऩभान से द्ख हआ है । भेयी कववता का अऩभान हआ है । कवव ने तरवाय तेज कय री। याबत्र भें ऩीताॊफय बट्ट का उनक घय भें मशच्छे द कयने क े े इयादे छऩकय कवव उनक घय ऩहॉ चा। ऩीताॊफय बट्ट हदन को कहीॊ औय जगह गमे थे। यात्री को दे य े से अऩने घय ऩहॉ च। े साये नगय भें बफजरी की तयह सबावारी फात ऩहॉ च गई थी। जगह-जगह चचाद हो यही थी कक ऩीताॊफय बट्ट ने आज सबा भें एक मवान छटादाय कवव का घोय अऩभान कयवा हदमा। उसकी कववता से ऩूयी सबा नाच उठी थी, याजा जाभ बी प्रसन्न हो गमे थे। रेककन ऩीताॊफय बट्ट के प्रबाव भें आकय याजा ने कवव को बयी सबा भें सात जते रगवामे... फडा अन्माम हआ। ू ऩीताॊफय बट्ट की ऩत्नी सयस्वती ने मह सफ जाना। वह चचढ़ गई कक, 'सयस्वती की ऩूजा- उऩासना कयने वारी कवव का ऐसा अऩभान भेये ऩनत ने ककमा !' वह रूठ गई। योष भें आकय घय का दयवाजा बीतय से फन्द कयक, कडा रगाकय झरे ऩय फैठ गई, 'आज उनको घऱ भें नहीॊ आने े ॊ ू दॉ गी....।' ू
  • 31.
    ऩीताॊफय बट्ट घयरौटे । बट्टजी ने दे खा कक घय का दयवाजा बीतय से फन्द है ! हययोज तो ऩत्नी इन्तजाय कयती थी, ऩानी रेकय ऩैय धराने क मरए तैमाय यहती थी ! आज कहाॉ गई? े दयवाजा खटखटामा तो ऩत्नी की आवाज आमी् "ऊह....! क्मा है ? भैं दयवाजा नहीॊ खोरॉ ूगी।" ॊ "वप्रमे ! तझे क्मा हो गमा? दयवाजा क्मों नहीॊ खोरेगी?" बट्टजी चककत हए। ऩत्नी झॊझराकय फोरी् "आऩ वे ही बट्ट जी है जजन्होंने एक कवव को बयी सबा भें सात- सात जते रगवामे? भेये घय भें आऩक मरए जगह नहीॊ है ।" ू े ऩीताॊफय बट्ट कहते हैं- "रोग तो भझे नहीॊ सभझ ऩामे रेककन सयस्वती ! तू बी भझे नहीॊ सभझती?" "इसभें क्मा सभझना है ? ककसी कवव को सात-सात जते भयवाना....! आऩ याजगरु हो गमे ू तो क्मा हो गमा? ऐसा घोय अन्माम....?" सयस्वती का योष नहीॊ उतया। बट्टजी ने कहा् "दे वी ! भैंने याजगरु क भद भें मा ईष्मादवश होकय जते नहीॊ भयवामे। तू े ू दयवाजा खोर, तेये को सायी फात फताता हूॉ।" ऩत्नी ने द्राय खोरा। बट्टजी फैठे झरे ऩय। ऩत्नी चयणों भें फैठी। याजगरु कहने रगे् ू "कवव की कववता तो फहढ़मा थी रेककन उनभें नायामण क गण नहीॊ गामे थे , नय क गण े े गामे थे। कवव ने याजा की वाहवाही की थी, खशाभद की थी रेककन ऐसे हाड-भाॊस क हजायों- े हजायों याजाओॊ को फना-फनाकय जो मभटा दे ता है कपय बी जजसक स्वरूऩ भें कोई पक नहीॊ ऩडता े द है ऐसे सवदद्वय ऩयभात्भा क मरए एक बी शब्द नहीॊ था उसकी कववता भें । " े छऩकय फैठा हआ कवव ईसयदान चौकन्ना होकय ऩनत-ऩत्नी का सॊवाद सन यहा था। बट्टजी आगे कहने रगे् "बगवान ने कवव को कववत्व-शडक्त दी है तो क्मा इन याजा-भहायाजाओॊ की, अहॊ काय के ऩतरों की प्रशॊसा कयक उन्हें अचधक अहॊ कायी फनाकय नयक की ओय बेजने क मरए दी है ? े े सवेद्वय ऩयभेद्वय क गीत गाने क मरए कववत्व-शडक्त मभरी है । कवव अऩनी वाणी का सदऩमोग े े नहीॊ अवऩत दरुऩमोग कय यहा था। वह फडा ववद्रान था, सयस्वती का उऩासक था रेककन उसकी ऩूयी कववता भें एक बी शब्द बगवान क मरए नहीॊ था। जजस जजह्वा ऩय बगवान का नाभ नहीॊ, े जजस हदर भें ऩयभात्भा क मरए प्माय नहीॊ, जजस कववता भें ऩयभात्भा क मरए ऩकाय नहीॊ वह े े कववता है कक फकवास है ? भैंने उस होनहाय कवव को सजा कयवा दी, ताकक वह अऩने गौयव भें जाग जाम, शामद....।" ऩीताॊफय बट्ट की वाणी सनते ही ईसयदान का हदर वऩघर गमा् 'मे ऩीताॊफय बट्ट वास्तव भें सरझे हए भहाऩरुष हैं। इनका वध कयने को आमा था....! चधक्काय है भझे !'
  • 32.
    प्रामजद्ळत से ऩाऩजर जाते हैं। ईसयदान आकय बट्ट जी क चयणों भें चगय ऩडा। अऩने े आॉसओॊ से उनक चयणों ऩय अमबषेक ककमा। याजगरु ने कवव को उठाकय अऩने गरे रगा मरमा े औय आद्ळमद बी हआ। "कववयाज कववयाज....! ऐसी अॊधेयी भध्मयात्री भें महाॉ कसे?" ै "भहायाज ! आमा था आऩकी हत्मा कयने क मरमे रेककन अफ ऩता चरा कक जन्भों-जन्भों े से भैं अऩनी हत्मा कय यहा था। आज आऩने भेये हदररूऩी कऩाट ऩय जोयदाय चोट भायकय अनॊत का द्राय खोर हदमा है । कववता वास्तव भें उस ऩयभ कवीद्वय क मरए होनी चाहहए, जजह्वा वास्तव े भें उस जीवनदाता क मरए चरनी चाहहए। जीवन इतना कीभती है मह भैं नहीॊ जानता था। े भहायाज ! भैं आऩका फारक हूॉ। भझे ऺभा कयना। भैं चाहता हूॉ कक आऩक चयणों भें फैठकय े बागवत की कथा श्रवण करू, बागवत ऩढ़ॉू , बडक्तयस-ऩान करू। भझभें प्राणफर तो है , कक्रमाफर ॉ ॉ तो है रेककन बावफर आऩ मभरामेंगे तफ भझ ननफदर को उस ऩयभेद्वय का, उस दे वेद्वय का, उस ववद्वेवद्वय का प्रेभफर प्राद्ऱ होगा जजससे जीवन साथदक हो जामगा। भहायाज ! भझे स्वीकाय कीजजए। आऩक चयणों भें फैठने का अचधकाय दीजजए। भहायाज ! भझे बागवत धभद का उऩदे श े दीजजए। बावना क बफना का जो फर है वह यावण औय कस जैसा है औय बावना सहहत का जो े ॊ फर है वह फद्ध ऩरुषों का फर है । भहायाज ! भझभें बगवद् बाव बय जाम ऐसी कथा कृऩा कयके सनाइमे।" ऩीताॊफय बट्ट प्रसन्न हए। कवव को बागवत की कथा सनाई। बगवच्चचाद, बगवत ्-ध्मान, बगवद् गणानवाद से कवव बावववबोय हो गमा। कपय उसने 'बडक्तयस' नाभ का ग्रन्थ मरखा। अऩनी कववता भें बागवत मरखा औय द्रारयकाधीश क चयणों भें अवऩदत कयने को गमा। कथा े कहती है कक कवव ज्मों ही अऩन ग्रॊथ बगवान को अवऩदत कयने को गमा तो बगवान की भूनतद भस्कयामी औय हाथ रम्फा कयक कवव क उस ग्रॊथ को स्वीकाय कय मरमा। े े हभायी वाणी, हभायी कववता, हभायी अक्र औय हभायी हमशमायी भें अगय ऩयभात्भ-प्रानद्ऱ की हदशा नहीॊ है तो ऐसी वाणी, कववता, अक्र औय हमशमायी से क्मा राब? तरसीदास जी कहते हैं- चतयाई चूल्हे ऩडी ऩूय ऩमो आचाय। तरसी हरय क बजन बफन चायों वणद चभाय।। े वह चतयाई ककस काभ की जजस चतयाई भें चैतन्म का प्माय न हो ! वह कववता ककस काभ की जजस कववता भें याभ क गीत न बये हों... प्रब क गीत न गॉूजते हों? वह जीवन ककस े े काभ का जजस जीवन भें जीवनदाता की ओय मात्रा न हो? ऐसे तो रोहाय की धौंकनी बी द्वासोच््वास बयती है , ननकारती है । ऩैसे फढ़ जामॉ तो क्मा फडी फात है ? गाडी आ जाम तो क्मा फडी फात है? भसीफत फढ़ी औय क्मा हआ?
  • 33.
    साहेफ ते इतनाभाॉगूॊ नव कोहट सख सभाम। भैं बी बूखा ना यहूॉ साधू बी बूखा न जाम।। तम्हायी बडक्त फडी कक नहीॊ फढ़ी, तम्हायी सभता फढ़ी कक नहीॊ फढ़ी, तम्हायी अहहॊसा फढ़ी कक नहीॊ फढ़ी, तम्हायी प्रेभ की धाया फढ़ी कक नहीॊ फढ़ी अऩने बीतय का खजाना दे खो। रूऩमे फढ़ गमे, भकान फढ़ गमे, गाडडमाॉ फढ़ गईं तो तम्हाये मरए भसीफत फढ़ गई। साधन फढ़ें उसक साथ े साधना नहीॊ फढ़ी तो आदभी बीतय से कगार होता जामेगा। बीतय से कगार होने क फजाम ॊ ॊ े फाहय से कगार होना हजाय गना अच्छा है । ॊ इजन्िमों का अरोरप्त्व दृढ़ होना चाहहए। यॊ बा आ जाम कपय बी शकदे व जी चमरत नहीॊ हए। सोरह हजाय एक सौ आठ अॊगनाएॉ श्रीकृष्ण क आगे ठभक-ठभक कय यही हैं कपय बी े श्रीकृष्ण का चचत्त चमरत नहीॊ होता। इजन्िमों क ववषम उऩरब्ध होते हए बी चचत्त भें अरोरप्त्व े आ जाम तो सभझ रेना, रृदम भें बगवान की बडक्त पर गई, चचत्त भें आत्भ प्रसाद जगभगा यहा है , जीवन धन्म हआ है । उसकी भीठी ननगाह बी जजन ऩय ऩडती है वे बी धन्म होने रगती हैं। दमोधन क साथ कवर शकनन ही यहता, बीष्भ जैसे प्रनतऻा भें दृढ़ औय कणद जैसे दानी े े नहीॊ यहते तो बायत की दशा जो आज है उससे फहत कछ उन्नत होती। बीष्भ औय कणद जैसे रोग श्रीकृष्ण क दै वी कामद भें अऩनी शडक्त औय ओज रगाते, ऻान, बडक्त औय सत्कभद क प्रचाय- े े प्रसाय भें अऩना साभर्थमद अवऩदत कयते तो आज क सभाज की यौनक कछ औय होती। मे भहायथी े दमोधन औय शकनन क फीच जी-जीकय, उनक टकडे खा-खाकय फॉध गमे। उनभें तेज औय सत्त्व े े तो था रेककन ढॉ क गमा था। सज्जन आदभी दजदन क सम्ऩक भें ज्मादा यहे , ननन्दक क सॊग भें ज्मादा यहे तो सज्जन े द े आदभी बी घसीटा जाता है । जैसे कणद घसीटा गमा, मचधवद्षय घसीटे गमे औय दे श को सहना ऩडा। हभ रोग बी अऩने अडोस-ऩडोस भें दजदन क वातावयण भें घसीटे न जामें, अऩनी े सज्जनता को ऩयभात्भा क ऻान से ऩयभात्भा क ध्मान से, ऩयभात्भा क जऩ से, ऩयभात्भा क े , े े े स्भयण से हदव्म फनाकय श्रीकृष्ण-तत्त्व क साऺात्काय भें रगामें, सॊत औय बगवान क दै वी कामद े े भें रगामें....। नायामण.... नायामण..... नायामण..... नायामण.... नायामण.....। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ साधक को ववद्वास कयना चाहहए कक बगवान भझे इसी वत्तदभान जन्भ भें ही अबी मभर सकते हैं। इसभें कोई कहठनता नहीॊ है । क्मोंकक बगवान से हभायी दे शकार की दयी नहीॊ है । वे ू हभायी जानत क हैं औय हभाये जीवन भें उनको प्राद्ऱ कय रेना ऩयभ आवश्मक है । बगवान क े े
  • 34.
    शयण होते हएही बगवान हभें तयन्त अऩना रें गे। हभाये अनन्त जन्भों क दोष तयन्त मभटा े दें गे। हभाये अमबभान ने ही हभें फाॉध यखा है । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अनक्रभ दै वी सम्ऩदा -3 (हदनाॊक् 5.8.1990 यवववाय, अभदावाद आश्रभ) तेज् ऺभा धनत् शौचभिोहोनानतभाननता। ृ बवजन्त सॊऩदॊ दै वीभमबजातस्म बायत।। 'तेज, ऺभा, धैम, आॊतय-फाह्य शवद्ध, ककसी भें बी शत्रबाव का न होना औय अऩने भें द ऩूज्मता क अमबभान का अबाव – मे सफ तो हे अजन ! दै वी सम्ऩदा को रेकय उत्ऩन्न हए ऩरुष े द क रऺण हैं।' े (बगवद् गीता् 16.3) जजसक जीवन भें बी दै वी सम्ऩदा का प्रबाव है उसभें एक ववरऺण तेज आ जाता है । े खा-ऩीकय, चचकने ऩदाथद, ऩप-ऩावडय, रारी-मरऩजस्टक रगाकय दे दीप्मभान फनना मह तो याजसी तेज है । फाह्य सौन्दमद वास्तववक सौन्दमद नहीॊ है । वास्तववक सौन्दमद दै वी सम्ऩदा है । दै वी सम्ऩदा क तेज औय सौन्दमद से व्मडक्त आऩ बी खश यहता है , तद्ऱ यहता है । ननववदकायी सख ऩाता है औय े ृ दसयों को बी ननववदकायी नायामण क आनन्द भें सयाफोय कय दे ता है । ू े याजसी औय आसयी सख आऩ बी भसीफत औय हहॊसा अहहॊसा का सहाया बोगा जाता है औय जजनसे मह सख बोगता है उन रोगों का बी शोषण होता है । जजसक जीवन भें दै वी सम्ऩदा है उसभें ऻानवान का तेज होता है । ऻानवान क सभीऩ े े फैठने से अऩना चचत्त शाॊत होने रगता है , ईद्वय क अमबभख होने रगता है । उन भहाऩरुष की े उऩजस्थनत भें हभाये कववचाय कभ होने रगते हैं। उनका तेज ऐसा होता है कक रृदम को शाॊनत, शीतरता औय ऻान-प्रसाद से ऩावन कयता है । कबी कबी तो अनत क्रोधी, अनत क्रय आदभी मा ू गॊडा तत्त्वों क कहने से बी रोग काभ कयने रगते हैं रेककन गॊडा तत्त्वों का तेज ववकाय का तेज े है । वे अऩना भनचाहा कयवा रेते हैं। साभनेवारा उनका भनचाहा कय तो दे गा रेककन उसके बीतय आनन्द औय शाॊनत नहीॊ होगी। भहाऩरुष का तेज ऐसा है कक वे अऩने भनचाहे कीतदन, ध्मान, बजन, साधना, सदाचाय आहद भें रोगों को ढार दे ते हैं , ईद्वय क अमबभख फना दे ते हैं। े भहाऩरुष क सॊकत क अनसाय जो ढरते हैं उनको बीतय आनन्द, शाॊनत, सख औय कछ ननयारा े े े अरौककक अनबव होता है ।
  • 35.
    कबी ककसी कडण्डे क तेज से कोई काभ कय दे तो काभ कयने वारे का कल्माण नहीॊ े े होता। काभ कयाने वारे का उल्रू सीधा होता है । भहाऩरुषों का तेज ऐसा होता है कक अऩना चचत्त तो ऩयभात्भ-यस से ऩावन होता ही, जजनसे वे बडक्त, ऻान, सेवा, स्भयण, साधना कयवाते हैं, जजनको बीतय से दै वी शडक्त का धक्का रगाते हैं उनक जीवन का बी उद्धाय हो जाता है । े भहाऩरुषों का ऐसा साजत्त्वक तेज होता है । दसयी ववशेष फात मह है कक जजनभें मे दै वी गण होते ू हैं उन भहाऩरुषों भें अमबभान नहीॊ होता कक भझभें मे दै वी गण हैं, भझभें तेज है , भझभें ऺभा है , भझभें धैम, शौच, उदायता, आचामोऩासना, दान, दभ इत्माहद है । इस प्रकाय का अहॊ उनक द े चचत्त भें नहीॊ होता। वे जानते हैं कक दै वी गण दे व क होते हैं। दे व तो ऩयभात्भा है । ववब, े व्माऩक, सजच्चदानन्द दे व है । गण हैं दे व क औय कोई अऩने भान रे तो दै वी गणों क साथ-साथ े े चचत्त भें जो आसयी स्वबाव है उसका यॊ ग रग जाता है । ककसी का सत्म फोरने का आग्रह, अच्छी फात है , फहत सन्दय फात है रेककन 'भझभें सत्म फोरने का गण है ' मह अगय हदख यहा है , उसका अहॊ आ यहा है तो मह अहॊ आसयी है । ककसी भें ब्रह्मचमद-ऩारन का गण है , ऺभा का गण है , रेककन 'भैं ऺभावान हूॉ मा भैं ब्रह्मचायी हूॉ' इस प्रकाय का बीतय अहॊ होता है तो दै वी गण के साथ जो आसयी स्वबाव का जो हहस्सा ऩडा है वह काभ कयता है । जजसक जीवन भें दै वी स्वबाव ओतप्रोत हो गमा है उसको मह बी नहीॊ होता है कक 'भैं े सत्मवादी हूॉ... भैं ब्रह्मचायी हूॉ... भैं तेजस्वी हूॉ... भैं ऺभावान हूॉ.... भैं सच्चा हूॉ... भैं उदाय हूॉ.... भैं आचामोऩासक हूॉ, भैं श्रद्धावान हूॉ.... कपय भझे द्ख क्मों मभरता है ? .... भैंने इतनी बडक्त की कपय बी भेया ऐसा क्मों हो गमा?...।' उसक जीवन भें इस प्रकाय की छोटी-भोटी कल्ऩना की े मशकामत नहीॊ होती। अगय मशकामत होती है तो दै वी सम्ऩदा से सम्ऩन्न भहाऩरुष उसे सभझाते हैं कक् हे वत्स ! अऩने द्ख भें योने वारे ! भस्कयाना सीख रे। दसयों क ददद भें आॉसू फहाना सीख रे।। ू े जो णखराने भें भजा है आऩ खाने भें नहीॊ। जजन्दगी भें तू ककसी क काभ आना सीख रे।। े अऩनी वासना मभटे गी तो दै वी सम्ऩदा फढ़े गी। अॊत्कयण की अशवद्ध दो कायणों से होती है ् एक कायण है सख की रारसा औय दसया ू कायण है द्ख का बम। सख की रारसा औय द्ख का बम हभाया अॊत्कयण भमरन कय दे ता है । अॊत्कयण भमरन होने से हभ तत्त्वत् दे व से ननकट होते हए बी अऩने को दे व से दय ू भहसूस कयते हैं। सॊसाय की उरझनों भें उरझ जाते हैं। अत् अॊत्कयण भें जो सख की रारच है उसको मभटाने क मरए सख दे ना सीख रे , दसये क काभ आना सीख रे। अऩने द्ख भें योने े ू े वारे ! तू भस्कयाना सीख रे।
  • 36.
    जो अऩने द्खको ऩकडकय योते यहते हैं उनको भस्कयाकय अऩने द्ख को ऩचा रेना चाहहए औय सख फाॉटना चाहहए। इससे अॊत्कयण की भमरनता दय हो जामगी। अॊत्कयण की ू भमरनता दय होते ही वह तेज आने रगेगा। ू खा-ऩीकय ऩद्श होकय अथवा ठण्डे प्रदे श भें यहकय चभडी का यॊ ग फदरकय तेजस्वी होना मह उल्रू क ऩट्ठों का काभ है , ब्रह्मवेत्ताओॊ का काभ कछ ननयारा होता है । े 'भैं फडा तेजस्वी फनकय आमा, क्मोंकक इॊनरैण्ड भे यहा था, अभेरयका भे यहा था।' अये बैमा ! इॊनरैण्ड भें अगय तेजस्वी हो जाते हो, अभेरयका भें तेजस्वी हो जाते हो, हहभारम भें यहकय तेजस्वी हो जाते हो तो मह तेज की ववशेषता चभडी की ववशेषता है , तम्हाये उस वप्रम ऩणद ऩरुषोत्तभ ऩयभात्भा की ववशेषता का तम्हें ऻान नहीॊ है । अद्शावक्र भहायाज कहाॉ गमे ू थे इॊनरैण्ड औय अभेरयका भें चभडा फदरने को? उनका शयीय तो आठ वक्रताओॊ से अमबबत था। ू ऐसे अद्शावक्र का तेज ववशार याज्म, ववशार फाह, ववशार ववद्या, ववशार धनयामश क स्वाभी याजा े जनक को आकवषदत कयता है , आत्भशाॊनत प्रदान कयता है । अद्शावक्र क अॊग टे ढ़े, टाॉगे टे ढ़ी, चार े टे ढ़ी, रेककन उनकी वाणी भें ब्रह्मतेज था, चचत्त भें आत्भतेज था उसको दे खकय याजा जनक उनके चयणों भें फैठे। भीया का तेज ऐसा था कक उसकी ननन्दा औय ववयोध कयने वारे रोग उसकी हत्मा कयने क मरए तैमाय होकय भीया क ऩास आमे तो उनका चचत्त फदर गमा। े े बगवान क बक्तों का औय ब्रह्मवेत्ताओॊ का तेज दसयों क द्ख-ददद को ननवायनेवारा होता े ू े है । साधक को मह तेज अऩने भें राना चाहहए। कई भहाऩरुष ऐसे होते हैं कक जजनभें मे दै वी सम्ऩदा क गण जन्भजात होते हैं। जैसे े नाभदे व, ऻानेद्वय भहायाज, शकदे वजी भहायाज, भीया, सरबा आहद भें मे गण स्वबाव से ही थे। उनका ऺभा, धैम, ब्रह्मचमद क तयप झकाव अऩने आऩ था। साधक को साधन-बजन, ननमभ-व्रत द े का सहाया रेकय मे गण अऩने भें राने होते हैं। जजनभें मे गण जन्भजात हैं उन्होंने कबी न कबी मे गण साधे होंगे। हभ रोग अबी साध सकते हैं। जजनक कछ गण साधे हए हैं वे ज्मादा े साधकय दे व भें जस्थत हो सकते हैं। दै वी सम्ऩदा क गणों भें से जजतने अचधक गण अऩने जीवन भें होंगे उतना जीवन े 'टे न्शन' यहहत, चचॊतायहहत, बमयहहत, शोकयहहत, द्खयहहत, उद्रे गयहहत होगा। दै वी सम्ऩदा के गण जजतने गहये होंगे उतना आदभी उदाय होगा, सहनशीर होगा, ऺभावान होगा, शूयवीय होगा, धैमवान होगा, तेजस्वी होगा। मे साये गण उसक मरए औय उसक सम्ऩक भें आने वारों क मरए द े े द े सखद हो जाते हैं। भहाऩरुषों की उस शडक्त का नाभ 'तेज' है कक जजसक प्रबाव से उनक साभने ववषमासक्त े े औय नीच प्रववत्तवारे भनष्म बी प्राम् अन्मामचयण औय दयाचाय से रुककय उनक कथनानसाय ृ े श्रेद्ष कभों भें प्रवत्त हो जाते हैं। ृ भहाऩरुषों भें दसया गण है ऺभा। ू
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    ऺभा भोहवश बीकी जाती है , बमवश बी की जाती है रेककन दै वी सम्ऩदा की ऺभा कछ ववरऺण है । ऩत्र ने, ऩत्नी ने, कटम्फ ने कछ अऩयाध ककमा, उनभें भोह है तो चरो, घूॉट ऩी मरमा, सह मरमा। मह भोहवश की गई ऺभा है । इन्कभटै क्स का इन्सऩैक्टय आ गमा। ऐसा-वैसा फोरता है , कछ कडवी-भीठी सना यहा है । हदर भें होता है कक 'मह न फोरे तो अच्छा है , महाॉ से टरे तो अच्छा है । कपय बी क्मा कयें ? चरो जाने दो।' मह बमवश की गई ऺभा है । अगय कछ फोरें गे तो वह कागजों से कडक व्मवहाय कये गा, धन की हानन हो जामेगी। नौकय गरती कयता है । डाॉटेंगे तो चरा जामेगा। दसया आदभी अबी मभरता नहीॊ, चरो ू इसको ऺभा कय दो। जफ अच्छा नौकय मभर जामेगा तो इसे ननकार दें गे। भोह से, बम से, स्वाथद से मा औय ककसी कायण से जो ऺभा की जाती है वह दै वी सम्ऩदा का गण नहीॊ है । दै वी सम्ऩदावारे की ऺभा की कछ ननयारी होती है । जैसे, बगवान नायामण ऺीय सागय भें शेषशैय्मा ऩय रेटे हैं। बग ऋवष ने उनकी छाती भें रात भाय दी। ृ नायामण अऩने नायामण तत्त्व भें इतने आनजन्दत औय प्रसन्न हैं, तद्ऱ हैं कक फाहय से ववऺेऩ आने ृ ऩय बी अऩना आनन्द-स्वबाव प्रकटाने भें उन्हें कोई प्रमास नहीॊ कयना ऩडता। 'भनीद्वय ! आऩक ऩैय भें कोई चोट तो नहीॊ रगी? दै त्म-दानवों क साथ मद्ध कयक हभाया े े े रृदम जया कठोय हो गमा है । इस कठोय रृदम ऩय आऩका कोभर चयण रगा है तो आऩक चयण े को कोई ठे स तो नहीॊ ऩहॉ ची?' ऺभा फडन को होत है छोटन को उत्ऩात। ववष्ण को क्मा घटी गमो जो बग ने भायी रात।। ृ ब्रह्मवेत्ताओॊ भें ऺभा इस प्रकाय की ऺभा होती है । ऺभाशीर होने भें दो फातें चाहहए। अऩने मरए फाहय की वस्तओॊ क सख-बोग का े आकषदण न हो। कोई अऩना कछ बफगाडे तो उसका अहहत कयने का बाव न हो। ऐसा आदभी ऺभाशीर हो जाता है । वही सच्चा ऺभाशीर होता है । जजसक ऩास ऺभारूऩी शस्त्र है , शत्र उसका कछ बी नहीॊ बफगाड सकता। जजसको कछ े चाहहए, फदरा रेना है अथवा सख रेना है , जजसको कछ रेना है उसभें क्रयता है । जजसको कछ ू रेना नहीॊ, दे ना ही दे ना है उसक जीवन भें ऺभा ही ऺभा है , प्रसन्नता ही प्रसन्नता है , आनन्द े ही आनन्द है । धनत का अथद है धैम। जो सत्कभद कयते हैं मा ईद्वय क भागद ऩय चरते हैं तो कोई ववघ्न- ृ द े फाधा आमे तो धैमद से सहें । थोडा सा ववघ्न आमा, कद्श ऩडा तो सोचने रगा कक् "भैं आत्भहत्मा कय रॉ .... भैं कहीॊ बाग जाऊ.... अथवा अरग भकान रेकय यहूॉ.....' मह दै वी सम्ऩदा नहीॊ है , ू ॉ आसयी सम्ऩदा है । मह आसयी स्वबाव क रऺण हैं। दै वी स्वबाव मह है कक ककतने बी कद्श आ े
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    जाम, ककतनी बीभसीफतें आ जाम रेककन चचत्त ऩय ऺोब नहीॊ होता, चचत्त ववघ्नों से प्रबाववत नहीॊ होता। भीया क जीवन भें न जाने ककतने ववघ्न आमे ! भीया क ससय साॊगा याणा क दे हावसान े े े क फाद भीया क दे वय यतनमसॊह औय ननद उदा ने भीया को सताना चारू कय हदमा। यतनमसॊह ने े े भीया को सधायने क मरए अऩनी फहन उदा औय उसकी सहे री को काभ सौंऩा। 'भेवाड की यानी े होकय भीया साध-फाफाओॊ से, न जाने कसे-कसे रोगों से मभरती है .....फात कयती है? उसको ै ै सधायो।' अफ, भीया को क्मा सधायना है ? वह तो प्रब क गीत गाती है । बफगडे हए रोग ककसी को े सधायने का ठे का रेते हैं तो सत्सॊचगमों को सधायने का ही ठे का रेते हैं। उदा ने भीया को फहत द्ख हदमा रेककन भीया ने कबी नहीॊ सोचा कक, 'भैं अरग भहर भें यहूॉ.... भैं बाग जाऊ... ककसी को जहय दे दॉ ू औय फदरा रॉ ू....' नहीॊ, भीया तो बगवान की ॉ बडक्त भें रगी हई थी। दै वी सम्ऩदा से सम्ऩन्न व्मडक्त फडा शाॊत होता है । उसका चचत्त ववरऺण रऺणों से सम्ऩन्न होता है । भीया की बडक्त दे खकय उदा जरती थी। उसको काभ सौंऩा गमा था कक भीया को सधायो। कृष्ण-कन्है मा फॊसी फजैमा की सेवा-सश्रषा छोडकय जैसे औय रोग काभ-क्रोध क, रोब-भोह क ू े े दरदर भें पस भयते हैं ऐसे ही भीया बी पस भये ऐसा उनका प्रमोजन था। सॊसाय क दरदर भें ॉ ॉ े पस भयने वारे ऐसा नहीॊ भानते कक हभ पस भयते हैं। पस भयने वारे सभझते हैं कक मही ॉ ॉ ॉ सच्चा जीवन है , बगत का जीवन ही फेकाय है । बक्त सोचता है कक मे फेचाये पस भये हैं, इनको ॉ ननकारॉ ू तबी इन्हें सच्चे जीवन का ऩता चरेगा। जफ तक व्मडक्त क जीवन भें आॊतरयक प्रकाश नहीॊ आता तफ तक सभझता है कक खाना- े ऩीना, फहढ़मा कऩडे ऩहनना, ऩेट को हदल्री दयवाजा का फाजाय फनाकय उसभें ठूॉसते ही जाना, मही जजन्दगी है । नही...। ठूॉस-ठूॉसकय खाने को जजन्दगी नहीॊ कहते, ड्रामक्रीन कऩडे ऩहनने को जजन्दगी नहीॊ कहते। हजाय-हजाय द्ख औय भसीफतों की आॉधी औय तूपान आमे कपय बी हदर को न हहरा सक ऐसे हदरफय क साथ एक हो जाने को ही जजन्दगी कहते हैं। े े न खशी अच्छी है न भरार अच्छा है । माय जजसभें यख दे वह हार अच्छा है ।। हभायी न आयजू है न जस्तजू है । हभ याजी हैं उसभें जजसभें तेयी यजा है ।। प्रब की भस्ती भें जो भस्त हैं उनको दननमा क बोग-ववरासों की आवश्मकता क्मा है ? वे े बोजन तो कयें गे औषधवत ्। वस्त्र तो ऩहनें गे शयीय की आवश्मकता क भताबफक। आवास भें तो े यहें गे रेककन आवास क मरए जजन्दगी फयफाद नहीॊ कयें गे। बोजन औय वस्त्रों क मरए जजन्दगी े े
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    फयफाद नहीॊ कयेंगे। वे तो जजन्दगी को आफाद कयें गे जजन्दगी क अचधद्षान को जानने क मरए। मे े े दै वी सम्ऩदा क रोग होते हैं। ऐसे ऩरुषों का तेज ननयारा होता है । उनभें कापी धैमद होता है । े शौच का अथद है शवद्ध। शवद्ध दो प्रकाय की होती है ् आॊतय शवद्ध औय फाह्य शवद्ध। फाह्य शवद्ध तो साफन, मभट्टी, ऩानी से होती है औय आन्तय शवद्ध होती है याग, द्रे ष, वासना आहद के अबाव से। जजनकी आन्तय शवद्ध हो जाती है उनको फाह्य शवद्ध की ऩयवाह नहीॊ यहती। जजनकी फाह्य शवद्ध होती है उनको आन्तय शवद्ध कयने भें सहाम मभरती है । ऩतॊजमर भहायाज कहते हैं कक शयीय को शद्ध यखने से वैयानम का जन्भ होता है । शयीय को शद्ध यखने से वैयानम का जन्भ कसे? ै जजसभें शायीरयक शवद्ध होती है उसको अऩने शयीय की गन्दगी का ऻान हो जाता है । जैसी गन्दगी अऩने शयीय भें बयी है ऐसी ही गन्दगी दसयों क शयीय भें बी बयी है । अत् अऩने शयीय ू े भें अहॊ ता औय दसयों क शयीय क साथ ववकाय बोगने की भभता मशचथर हो जाती है । रृदम भें ू े े छऩा हआ आनन्द-स्वरूऩ चैतन्म, ईद्वय, ऩयभात्भा हभाया रक्ष्म है – इस ऻान भें वे रग जाते हैं। ऩतॊजमर भहायाज कहते हैं- शौच प्रनतद्षामाॊ स्वाॊगजगप्सा ऩयै यसॊसगद्। 'जफ आन्तय-फाह्य दोनों प्रकाय क शौच दृढ़ हो जाते हैं तो मोगी को अऩने शयीय ऩय एक े प्रकाय की घणा उत्ऩन्न होती है औय दसयों क शयीय क सॊसगद की इच्छा बी नहीॊ होती।' ृ ू े े शौच से शयीय भें आसडक्त कभ होती है । शयीय से ननकरने वारी गन्दगी से घणा होकय ृ आदभी का चचत्त वासना से ननभक्त होने रगता है । द फद्ध क जभाने भें काशी भें एक नगय सेठ था। उसक ऩत्र का नाभ था मशकभाय। े े मशकभाय क मरए वऩता ने तीन भौसभ क मरए तीन भहर फनामे थे। याग-याचगनी आराऩने े े वारी गानमकाएॉ, नतदककमाॉ, दामसमाॉ मशकभाय को घेये यहती थीॊ। अऩाय धनयामश थी। वऩता को फडी उम्र भें फेटा हआ था इससे अत्मॊत राडरा था। उसे कहीॊ वैयानम न रग जाम, फद्ध के मबऺकों का यॊ ग न रग जाम इसक मरए मह सफ इन्तजाभ ककमा गमा था। जैसे मसद्धाथद (फद्ध) े क मरए उनक वऩता याजा शद्धोधन ने मसद्धाथद को ऐहहक सखों भें गयकाव कयने क मरए व्मवस्था े े े की थी ऐसे ही मशकभाय को उसक वऩता ने ऐहहक सखों भें गयकाव कय हदमा। रेककन बगवान े अऩने प्मायों को सदा गन्दगी भें , गन्दे -ववचायों भें ऩचने नहीॊ दे ना चाहते। एक याबत्र को गामन-वादन सनते-सनते, नत्म दे खते-दे खते मशकभाय ककसी कायणवशात ् ृ जल्दी से सो गमा। नीॊद आ गई। याबत्र को जल्दी सोने से शयीय की थकान फहत अच्छी तयह से मभटती है । इतय सभम की नीॊद की अऩेऺा याबत्र को नौ से फायह की नीॊद ढाई गना ज्मादा राब कयती है । फायह से तीन की नीॊद दगना राब कयती है । तीन से छ् की नीॊद डेढ़ गना राब कयती है । सूमोदम क फाद की नीॊद जीवन भें आरस्म-प्रभाद राकय हानन कयती है । े दै वमोग से एक हदन याजकभाय जल्दी सो गमा। भध्मयाबत्र क फाद डेढ़ दो फजे उनकी नीॊद े खर गई। दे खता है कक नाचने गाने वारी जस्त्रमाॉ सफ सोई ऩडी है । खयादटे बय यही हैं.... ककसी के
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    भॉह से रायननकर यही है , ककसी का हाथ ववचचत्र ढॊ ग भें ऩडा है , ऩप-ऩावडय, रारी-मरऩजस्टक का 'भेक-अऩ' उस जभाने भें जो कछ होगा वह सफ गडफड हो गमा है , फार बफखये ऩडे हैं। मशकभाय दीमे की रौ तेज कयक सफकी हारत दे ख यहा है । शाभ क वक्त हाय-मसॊगाय, वस्त्र- े े आबूषणों से सजी-धजी, हास्म-ववरास कयती हई यभणणमाॉ अबी घणास्ऩद हारत भें ऩडी हई ृ वीबत्स रग यही हैं। वह सोचने रगा् "क्मा इन्ही अॊगनाओॊ क ऩीछे भैं ऩागर हए जा यहा हूॉ? जजनक भॉह से राय ननकर यही े े है , जजनक नाक भें गन्दगी बयी है मे ही जस्त्रमाॉ भझे सन्दय रग यही थी? इनभें सन्दयता जैसा है े क्मा? भेया नाभ मशकभाय है ऩय अऩमश हामसर हो ऐसा काभ कय यहा हूॉ ! इन हाड-भाॊस क सन्दय हदखने वारे ऩतरों भें सौन्दमद अऩना नहीॊ है । सौन्दमद तो ककसी े औय का है । उस तत्त्व का सॊऩक (कनेक्शन) टूट जाम तो भदे हो जाते हैं। चधक्काय है भझे कक द भैं इनक हाड-भाॊस क शयीय को प्माय कयते हए इनक साथ अऩना बी मौवन नद्श कयता हूॉ। इस े े े छोटी-सी उम्र भें भझे फढाऩे क रऺणों ने घेय मरमा है ! भैं मौवन भें ही फूढ़ा हो यहा हूॉ ! भेया े शयीय अबी से रुनण होने जा यहा है !' जजतना भाणणमा बोग उतना बमा योग। "हाम ! मह भैं क्मा कय यहा हूॉ?" मशकभाय को अऩने आऩ ऩय नरानन हई। उसका हदभाग चकयाने रगा। वह धयती ऩकडकय फैठ गमा। कपय से उन थक औय राय टऩकाती हई, खयादटे बयती, गन्दी औय अस्तव्मस्त ू राशों जैसी ऩडी हई नतदककमों को ननहायने रगा। मह दे खकय उसक चचत्त भें वैयानम का तूपान े उठा। अऩने दोषों की ननन्दा कयने से ऩाऩ जर जाते हैं। दसयों की ननन्दा कयने से ऩण्म जर ू जाते हैं। मशकभाय का अॊत्कयण थोडा शद्ध हआ। मशकभाय उठा। सीढ़ी का हाथा ऩकडते हए धीये से नीचे उतया। चऩचाऩ... दयवाजे का खटका ककमे बफना फाहय ननकरा। भहर औय सॊसाय का त्माग कयक मशकभाय वहाॉ से यवाना हो गमा। े प्रबात कार भें बगवान फद्ध गॊगाककनाये अऩने ववहाय भें टहर यहे थे। उनक चयणों भें े मशकभाय जा ऩडा। फोरा् "बन्ते ! सॊसाय धोखा है , द्ख रूऩ है । उससे फाहय ननकरना दष्कय है , भजश्कर है ।" फद्ध ने कहा् "सॊसाय धोखा जरूय है , द्खरूऩ जरूय है रेककन उससे ननकरना आसान है अगय ककसी सॊत का साजन्नध्म मभर जाम तो।" "बगवन ् ! भैं आऩकी शयण आमा हूॉ। भझे स्वीकाय कयो।" फद्ध ने मशकभाय को अऩना मरमा, थोडा उऩदे श हदमा।
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    सफह हई। भहरभें नतदककमाॉ, दामसमाॉ जागीॊ। दे खती हैं कक मशकभाय का कहीॊ ऩता नहीॊ है । 'कहाॉ गमे हभाये स्वाभी? हभाये सवेसवाद? हभाये वप्रमतभ ्?' स्वाभी, सवेसवाद, वप्रमतभ सदा क मरए तो ककसी क यहते नहीॊ हैं। ककसी का बी सॊफॊध े े सदा क मरए नहीॊ यहता। कसा बी वप्रमतभ हो, कसी बी वप्रमा हो रेककन कबी न कबी, कहीॊ न े ै ै कहीॊ झगडा, ववयोध, ववनाश अवश्म हो आता ही है । जो एक दसये क हाड-भाॊस-चाभ को दे खकय ू े शादी कय रेते हैं उनभें झगडा होना बफल्कर ननमत है । मह जरूयी बी है । प्रकृनत का मह ववधान है कक जो प्रेभ ऩयभात्भा से कयना चाहे वह प्रेभ गन्दगी बये नाक से ककमा तो तम्हें धोखा मभरना ही चाहहए। जो प्माय ईद्वय से कयना चाहहए वह अगय चभडे-यक्त-नसनाडडमों से, राय औय थक से बये शयीय से ककमा, शयीय क बीतय फैठे ऩयभात्भा की ओय ननगाह नहीॊ गई तो उन ू े शयीयों से द्ख, ददद , फेचनी, भसीफत, अशाॊनत, करह मभरना ही चाहहए। मह प्रकृनत का अकाट्म ै ननमभ है । जो बयोसा ऩयभेद्वय ऩय कयना चाहहए वह अगय फाहय की सत्ता ऩय ककमा तो गमे काभ से। जो बयोसा ईद्वय ऩय कयना चाहहए वह बयोसा अगय ककसी ऩद ऩय, प्रनतद्षा ऩय, ककसी वस्त मा व्मडक्त ऩय ककमा तो व्मडक्त, वस्त, ऩद-प्रनतद्षा खीॊच मरमे जामेंगे। ईद्वय क मसवाम का जो बी सहाया अॊत्कयण भें घस गमा है उस सहाये भें ववघ्न आता े ही है । ववघ्न इसमरए आते हैं कक भौत क सभम मे सहाये छट जाएॉ उससे ऩहरे शाद्वत सहाये को े ू ऩाकय अभय हो जाओ। मशकभाय क वऩता भहर भें आमे, भाॉ आमी। ऩूछने रगे् "ऩत्र कहाॉ है ... फेटा कहाॉ है ?" े नतदककमाॉ, दामसमाॉ से यही हैं। ककसी ने हदखावे का योना यो मरमा तो भाॉ ने भोहमक्त योना से मरमा। शोकभनन भाहौर फन गमा। अनचयों ने मशकभाय क ऩदचचन्हों का ऩीछा कयक ऩता े े रगा मरमा कक मशकभाय फद्धववहाय भें ऩहॉ चा है । भाता-वऩता ऩत्र क ऩास गमे, सभझाने रगे कक् े "हे ऩत्र ! इतना धन-वैबव, सख-सॊऩवत्त छोडकय तू मबऺक होकय इधय पकीयों क ऩास े यहता है ? चर फेटा ! घर चर भेये राडरे !" फद्ध ने दे खा कक अबी-अबी इस मवक क चचत्त भें वैयानम क अॊकय ऩनऩे हैं। अबी इन े े अॊकयों को सीॊचना चाहहए, न कक सॊसाय क ववषमों की तऩन दे कय जराना चाहहए। वे मशकभाय े क भाता-वऩता से कहने रगे् े "हे श्रेवद्ष ! अबी इसक ऩण्म उहदत हए हैं इसमरए नद्वय छोडकय शाद्वत की ओय आमा े है । अफ तम्हाये कहने से कपय सॊसाय क कीचड भें हाड-भाॊस चाटने-चॉथने भें अऩनी जजन्दगी े ू फयफाद नहीॊ कये गा।" फद्ध ने मशकभाय क वैयानम को सहाया हदमा। े जो फोधवान ऩरुष हैं उनभें मह तेज होता है कक जजससे ववरासी औय ववकायी रोगों भें ननववदकाय नायामण की ओय मात्रा कयने की रूचच हो जाम। कहीॊ कपसरते हों तो ऐसे भहाऩरुषों का साजन्नध्म-सेवन कयें तो कपसराहट से फच जाएॉ। ऐसा हदव्म भहाऩरुषों का प्रबाव होता है ।
  • 42.
    फद्ध ने कछवचन मशकभाय को कहे औय भाता-वऩता को ऻान-वैयानम सभझामा। इतने भें मशकभाय की फहन योती आमी् "बैमा ! तभ घय चरो...।'' "बैमा तो घय चरे रेककन भत्म जफ आमगी तफ भत्म से बैमा को तू नहीॊ फचा ऩामेगी, ृ ृ फहन !" अफ मशकभाय अऩने कटम्फीजनों को सभझाने रगा। "हे भाता-वऩता ! भौत भझे ऩकडकय शूकय-ककय फना दे गी तफ आऩ रोग भेया साथ नहीॊ ू दे ऩाओगे। भौत आकय भझे शकय-ककय की मोनन भें धकर दे , वऺ-ऩाषाण फना दे उससे ऩहरे ू ू े ृ भैं फद्ध क चयणों भें फैठकय ऩयभात्भा को ऩा रॉ । इसभें आऩ रोग भझे सहमोग दो।" े ू कथा कहती है कक मशकभाय क दृढ़ ननद्ळम, फद्ध क शब सॊकल्ऩ औय सत्सॊग का प्रबाव े े उसक भाता-वऩता तथा बचगनी ऩय बी ऩडा। वे बी फद्ध क मशष्म फन गमे। े े ककसी क चचत्त भें थोडा-सा बी वववेक-वैयानम आ जाम औय फोधवान भहाऩरुष का े साजन्नध्म मभर जाम तो चगयाने वारे चाहे ककतने बी आ जाम कपय बी सॉबारनेवारे अकरे े भहाऩरुष सॉबार रेते हैं। फद्ध ऩरुष क ऩक्क मशष्म को हजाय चगयाने वारे रोग बी चगया नहीॊ े े सकते। जफकक सत ् मशष्म हजायों का हाथ ऩकडकय उन्हें उफाय सकता है । मह दै वी गणों का प्रबाव है । जजसक चचत्त भें शवद्ध है उसकी फाहय बी शवद्ध स्वाबाववक यहने रगती है । जजसकी फाह्य े शवद्ध होती है उसको आन्तय शवद्ध भें सहामता मभरती है । दै वी सम्ऩदावारे ऩरुष भें शायीरयक शवद्ध औय अॊत्कयण की शवद्ध स्वाबाववक पयने रगती है । कपय आता है अिोह। िोह से अऩना चचत्त जरता यहता है । कबी-कबी यजो, तभोगण क प्रबाव से चचत्त भें िोह े आ जाता है । जजनक जीवन भें सत्त्वगण है उनभें िोह नहीॊ होता। े दै वी सम्ऩदा का आणखयी गण है नानतभाननता। अनतभाननता का अथद है अऩने को श्रेद्ष भानना। "भैं अनत श्रेद्ष हूॉ..... इन्होंने भझे भान हदमा रेककन कभ हदमा....' इस प्रकाय की अनत भान की वासना है वह अहॊ काय की शूर बोंकती है । आदभी व्मथद भें फोणझरा जीवन जीता है । जजसक जीवन भें अनत भान का शूर नहीॊ है वह कई भसीफतों से अशाॊनत ऩैदा कयने वारे े व्मवहाय से द्खद ऩरयजस्थनतमों क प्रादबादव से सहज ही फच जाता है । े अनत भान चाहने वारा व्मडक्त थोडी-थोडी फात भें दोष-दशदन कयक अऩना चचत्त चमरत े कयता यहता है । ऐसा आदभी न जाने ककतनी ही वथा भसीफतें भोर रेकय अऩने आऩको कोसता ृ यहता है । जो अनत भान की वासना छोड दे ता है उसका जीवन सयर हो जाता है , सहज भें सखद फन जाता है । रोग थोडा-सा अच्छा काभ कयक कपय चाहते हैं कक हभाया सम्भान सभायोह हो जाम। े सभायोह भें जफ सम्भान हदमा जाता है तफ मसकडकय ननयमबभान होने की चेद्शा कयते हए फोरता
  • 43.
    तो है कक,"इसभें भेया कछ नहीॊ है .... सफ बगवान की कृऩा है .... भैं तो ननमभत्त भात्र हूॉ...'' आहद आहद। रेककन ऐसा फोरकय बी अऩने को अच्छा कहराने की वासना है । अच्छा कहराने का जो बीतय बूत फैठा है वह आदभी से फहत कछ फया कयवा रेता है । अच्छा काभ तो कये रेककन अच्छा कहराने का, अनत भान चाहने का जो दोष है उससे दै वी सम्ऩदा क रोग स्वाबाववक ही फचते हैं। याजसी सम्ऩदा क रोग उऩदे श से फचते हैं औय ताभसी े े रोग उस दोष क मशकाय हो जाते हैं। े दे वों औय दानवों का मद्ध होता ही यहता था। एक फाय दानव रोग गमे ब्रह्माजी क ऩास औय ऩछा् े ू "ब्रह्मन ् ! मह क्मा फात है कक बगवान जफ-जफ अवताय रेते हैं तफ-तफ दे वों का ही ऩऺ रेते हैं? हभ रोगों क ऩास इतना फर होने क फावजूद बी हभ अशाॊत औय द्खी यहते हैं। दे वता े े फडे शाॊत, सखी यहते हैं औय ऩजे जाते हैं। हभको कोई ऩछता नहीॊ है । क्मा कायण है?" ू ू ब्रह्माजी ने दे खा कक मे उऩदे श क अचधकायी नहीॊ है । इनको तो 'प्रेक्टीकर ऑऩये शन ्' की े जरूयत है । उन्होंने दानवों से कहा् "दे वों औय दानवों का बोज-सभायोह यखेंगे, उसभें तभको प्रमोगात्भक उऩदे श दॉ गा।" ू ब्रह्माजी क वहाॉ बोज सभायोह यखा गमा। दानव बीतय ही बीतय सोचने रगे कक, 'ब्रह्माजी े तो दे वों को ऩहरे णखराएॉगे, फहढ़मा-फहढ़मा णखरामेंगे, हभको तो फाद भें दें गे कछ छोटा-भोटा ऩदाथद।' कफ णखराएॉगे, क्मा णखराएॉगे, कस णखराएॉगे इसकी चचन्ता भें , सॊशम भें दानवों का चचत्त ै उरझने रगा। दे वों क चचत्त भें शाॊनत थी। 'ब्रह्मदे व ने बोजन क मरए फरामा है , वऩताभह जो कछ े े कयें गे हभाये बरे क मरए कयें गे।' वे फडे शाॊत थे। े ब्रह्माजी ने घोषणा की कक ऩहरे दानवों को बोजन कयामा जामगा औय फाद भें दे वों को। दोनों क मरए एक सभान ही बोज्म-ऩदाथद, ऩकवान-व्मॊजन आहद होंगे। दै त्मों को रगा कक वाह ! े वऩताभह तो वऩताभह ही हैं, फडे कृऩारू हैं। ऩहरे दानवों की ऩॊगत रगी। आभने साभने सफ दानवों को ऩॊडक्तमाॉ रगाकय बफठामा गमा। ऩत्तर भें फहढ़मा-फहढ़मा बोजन ऩयोसा गमा। ककस्भ-ककस्भ क मभद्षान्न औय नभकीन ऩदाथद, कई े प्रकाय की सब्जी औय आचाय, ववमबन्न व्मॊजन औय ऩकवान। भधय खशफू उठ यही है । ज्मों ही दानवों ने बोजन शरु ककमा कक तयन्त ब्रह्माजी क सॊकल्ऩ से सबी दानवों क हाथ े े की कोहननमों ने भडने से इन्काय कय हदमा। ऩत्तर से ग्रास उठामें तो सही रेककन हाथ को भोडे बफना भॉह भें डारें कसे? हाथ को मसय से ऊऩय उठाकय भॉह को ऊचा कयक उसभें डारें तो आधा ै ॉ े ग्रास भॉह भें फाकी का आॉख भें ऊचा कयक उसभें डारें तो आधा ग्रास भॉह भें फाकी का आॉख भें ॉ े ऩडे, इधय ऩडे उधय ऩडे। फडी भजश्कर से थोडा खामा थोडा चगयामा। आॉखें जरने रगीॊ, नाक भें कछ कण जाने से छीॊक आने रगी। हाथ-ऩैय-ऩेट-कऩडे सफ जठे हो गमे। बोजन तो फहढ़मा था, ू
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    चटऩटा था, भसारेदायथा, नभकीन था, भधय था, सन्दय था, सफ ककस्भ का था रेककन ब्रह्माजी क सॊकल्ऩ क प्रबाव से हाथ कोहनी से न भडने से सफ गड गोफय हो गमा। े े दानव आणखय अतद्ऱ होकय उठ गमे। ृ अफ दे वों की फायी आमी। उनको बी वही बोजन ऩयोसा गमा। उनक मरए बी ब्रह्माजी का े वही सॊकल्ऩ था। उनकी कोहननमों ने बी भडने से इन्काय कय हदमा। रेककन दे वों क ऩास े सत्त्वगण था। उनक चचत्त भें झट से सझाव आमा कक हाथ कोहनी से भडता नहीॊ तो कोई फात े नहीॊ, ग्रास साभने वारे क भॉह भें डार दो। साभनेवारे ने बी इसक भॉह भें डार हदमा। आभने- े े साभने वारे रोगों ने एक दसयों को णखराकय तद्ऱ कय हदमा। दानव तो दे खते ही यह गमे। अफ वे ू ृ सोचने रगे कक हभ बी ऐसा कयते तो ? ऐसा कयते तो सही रेककन तभ असयों क ऩास ऐसी े दै वी अक्र कहाॉ से आवे? अक्र तो सफ जगह चाहहए, ब्रह्मरोक भें बी अक्र चाहहए तो भत्मरोक भें बी अक्र ृ चाहहए, आश्रभ भें फैठने की बी अक्र चाहहए। घय भें उठने फैठने की बी अक्र चाहहए, खाने औय फोरने की बी अक्र चाहहए। अक्र कभाने की बी अक्र चाहहए। इससे बी ज्मादा अक्र भोऺ ऩाने क मरए चाहहए औय वह आती है दै वी गणों से। व्मडक्त भें जजतने-जजतने दै वी गण े जस्थत होते हैं उतनी-उतनी अक्र ववकमसत होती है । दै वी सम्ऩदा वारे ऩरुष से औय रोग फडे सन्तद्श यहते हैं। जजसभें दै वी सम्ऩदा आती है उसका चचत्त दे व क सभीऩ यहता है । दे व भाने आत्भदे व। आत्भा सफको प्माया है । इसीमरए े आत्भऻानी सफको प्माया होता है । नायदजी आत्भवेत्ता थे। उनक वचन दे वता बी भानते थे औय े दै त्म बी भानते थे। उनक वचन भनष्म तो भानते ही थे। े रोग अऩेऺा यखते हैं कक हभ चाहे जैसा फतादव कयें रेककन दसये रोग हभें भान दें । ऐसा ू नहीॊ हो सकता। जजसक जीवन भें अनतभान का दोष होता है वह अऩने सधयने की मा अऩभान े की फात नहीॊ सन सकता। कोई सनामे तो सपाई दे दे गा् भैं तो फडा ननदोष हूॉ। भझभें तो कवर े गण ही गण हैं। अवगण का नाभोननशाॊ नहीॊ है । जो गरती कयता है औय अऩनी गरती ढूॉढता नहीॊ मह तो गरती है रेककन कोई उसकी गरती फताता है कपय बी स्वीकाय नहीॊ कयता वह ज्मादा गरती कयता है । कोई अऩन गरती सनाए तो सनानेवारे को आदय से प्रणाभ कयना चाहहए। उत्तभ भनष्म अऩनी गरनतमाॉ ढूॉढने भें रगे यहते हैं, ऩयहहत भें रगे यहते हैं, ध्मान-बजन भें रगे यहते हैं। रगे यहते हैं ऩयभात्भ-भस्ती भें , हरययस ऩीने औय वऩराने भें । जीव अगय सजातीम प्रववत्त नहीॊ कये गा तो ववजातीम प्रववत्त होगी, सत्कभद नहीॊ कये गा तो ृ ृ दष्कभद होगा। ईद्वय क यास्ते नहीॊ चरेगा तो शैतान क यास्ते चरेगा। े े अऩनी कोई गरती हदखामे तो उसका धन्मवाद दो, आदय सहहत उसका सत्काय कयो ताकक हभाये चचत्त भें उसक मरए नपयत न यहे औय गरती हदखाने भें उसको सॊकोच न हो। े
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    भीया को सधायनेका जजसने ठे का रे यखा था उस उदा ने भीया को सभझामा-फझामा, डाॉटा। भीया उसे प्रणाभ कयती। "ननद जी ! आऩ जो कहती हैं वह सफ ठीक है रेककन भेयी आदत ऩड गई है चगयधय गोऩार क गीत गाने की। भैं क्मा करू?" े ॉ भीया जानती थी कक मह गरती नहीॊ है , वे रोग ही गरत हैं कपय बी भीया क चचत्त भें े अनत भान का दोष नहीॊ था। अऩभान कयने वारों को बी भीया ने भान दे हदमा, बडक्त नहीॊ छोडी। एक फाय याबत्र भें उदा को रगा कक भीया ककसी ऩयऩरुष से फात कय यही है । उदा बागती- बागती अऩने बाई यतनमसॊह क ऩास आमी। कान का कच्चा, अक्र का कच्चा, भखद यतनमसॊह े ू तरवाय रेकय बागा। 'अफ भहर भें जी नहीॊ सकती। भहर भें ऩयऩरुष क साथ फात !' े यतनमसॊह ने भीया को फहत ऩीडा दी थी। उसक फाद याणा ववक्रभ आमा उसने बी भीया े को त्रास दे ने भें कोई कसय नहीॊ यखी थी। भीया भें दे खो, ककतनी सहनशडक्त थी ! बडक्त भें ककतनी दृढ़ता थी ! रोग ऩजवाना तो चाहते हैं रेककन ऩजवाने से ऩहरे जो फमरदान दे ना ऩडता है उसक दय े ू बागते हैं। भहान ् फनना चाहते हैं, ऩजवाना चाहते हैं, भक्त होना चाहते हैं, सदा सखी होना चाहते हैं, ईद्वय क साथ एक होना चाहते हैं औय जया-से भान से, अऩभान से, भसीफत से, द्ख से, े सॊघषद से, ववघ्न से, फाधा से ऩॉूछ दफाकय बागते कपयते हैं। उदा भीया ऩय न जाने ककतने-ककतने राॊछन रगाती थी रेककन भीया कबी मशकामत नहीॊ कयती। यतनमसॊह ने भीया को गरत सभझकय कई फाय कछ का कछ सनामा होगा रेककन भीया क चचत्त भें वही हरययस की भधयता फनी यही। े उदा की फात सनकय यतनमसॊह भध्मयाबत्र को तरवाय रेकय भीया क आवास भें घस गमा। े आवेश भें घस तो गमा रेककन दे खा तो भीया फैठी है अऩने शाॊत बाव भें । भीया क भख भण्डर े ऩय हदव्म आबा जगभगा यही है औय वह फोरे जा यही है कक् "प्रब ! भैं जैसी हूॉ, तम्हायी हूॉ। तभ हभाये हो। मह सॊसाय दे खने बय को है । महाॉ क सफ े सगे-सम्फन्धी कहने भात्र क हैं। तभ ही प्राणीभात्र क सच्चे सगे-सम्फन्धी हो।" े े कपय भीया क रृदम से ऩरुष की आवाज भें श्रीकृष्ण फोरे् े "तू चचन्ता भत कय। इस सॊसाय भें आसडक्त न हो इसमरए द्ख, ददद औय ऩीडा भेये बक्तों को दे ता हूॉ ताकक वे कहीॊ सॊसाय भें चचऩक न जाएॉ, कहीॊ पस न जाएॉ। उन्हें भसीफतों क फीच ॉ े यखकय ऩरयऩक्व कयता हूॉ।"
  • 46.
    यतनमसॊह चककत होगमा कक भीया ही फोरती है औय भीया ही सनती है । कोई ऩयऩरुष वहीॊ नहीॊ है । भीया क शीतर दै वी तेज भें यतनमसॊह का रूख फदर गमा। उसकी आॉखों से े ऩद्ळाताऩ क आॉसू फहे । वह भीया से फडा प्रबाववत हआ। े फाहय उदा इन्तजाय कय यही थी कक अफ कछ घटना घटे गी रेककन वह दे खती यह गमी कक तरवाय क प्रहाय से भीया की चीख ननकरनी चाहहए, बम से भीया का आतदनाद ननकरना े चाहहए जफकक वहाॉ तो सन्नाटा है ! यतनमसॊह खरी तरवाय क साथ भीया क ऩास गमा है , क्मा े े ऩता क्मा कय यहा है ? इतने भें यतनमसॊह फाहय आमा। आॉखों भें आॉसू हैं, भख ऩय कोभर बाव उबय आमा है , रृदम भें ऩद्ळाताऩ है । तरवाय नीचे ऩटक दी औय भीया क प्रनत अहोबाव क वचन फोरने रगा् े े "भीया को हभ ऩहचानते नहीॊ। वहाॉ कोई ऩयऩरुष नहीॊ था। वह तो बगवान से वातादराऩ कय यही थी....।" उदा उफर ऩडी् "क्मा जाद ू भाय हदमा उस याॊड ने तेये ऩय?" एक स्त्री दसयी स्त्री से स्वाबाववक ही ईष्माद कयती है । चाय जस्त्रमाॉ इकट्ठी होगी तो साये गाॉव ू की ननन्दा-कथरी भें रग जाएगी। ू फडफडाते हए उदा कभये भें गई तो भीया का वही स्थान वही साजत्त्वक हदव्म शाॊत तेज.... उदा दे खकय दॊ ग यह गई। भीया क भखभण्डर की शाॊत प्रसन्न आबा.... आॉखों से अश्रऩात... वह े ू अश्रऩात सख का बी नहीॊ था द्ख का बी नहीॊ था। वह था बडक्त क यस का। एकटक भीया को ू े ननहायते-ननहायते उदा की आॉख ऩववत्र हो गई। ऩववत्र आॉख हदर को बी ऩववत्र कय दे ती है । ऻानेजन्िमों भें दो इजन्िमाॉ फडी सूक्ष्भ औय सॊवेदनशीर हैं। चचत्त ऩय उनका प्रबाव फहत गहया ऩडता है । एक है नेत्र औय दसयी है जजह्वा। जजसकी जजह्वा औय आॉख ननमजन्त्रत है वह ू जल्दी उन्नत हो सकता है । दशदन औय वचन क द्राया आदभी जल्दी उन्नत होता है । े भीया जो फोरे जा यही थी वे वचन उदा क कान भें ऩडते थे। भीया को सनते-सनते औय े दे खते-दे खते उदा का चचत्त ऊध्वदगाभी होने रगा। जो यतनमसॊह ने कहा वही उदा ने बी कहा् "भीया ! सचभच हभ रोग तझे नहीॊ जानते। हभने तभको इतना-इतना सतामा रेककन तभने कबी मशकामत नहीॊ की। आज बी भैंने अऩने बाई को फहकाकय बेजा कक तू ककसी ऩयऩरुष से फात कय यही है रेककन तू तो ऩरुषोत्तभ से फात कय यही थी। मह भझे ऩता नहीॊ था। तेये ऩास भैं ऺभामाचना करू इतनी भझभें मोनमता नहीॊ है रेककन तेयी उदायता दे खकय मह ऩाऩी उदा तेये ॉ ऩैय ऩकडती है ....।" भीया क चयणों भें ननद उदा मरऩट यही है । भीया ने मह नहीॊ कहा कक, 'चर चर याॊड ! े तूने भझको इतना सतामा.... बगवान तेया सत्मानाश कये ।' नहीॊ नहीॊ। भीया ने उदा को दोनों हाथों से उठाकय गरे रगा मरमा।
  • 47.
    "कोई फात नहीॊफहन जी ! अगय तभ इतना नहीॊ कयती तो शामद भैं कहीॊ सॊसाय भें बटक जाती। बगवान क प्मायों ऩय तो कद्श आने ही चाहहए। कद्शभम औय भसीफत वारे सॊसाय से े सदा क मरए ननकरने क मरए बगवान क प्मायों ऩय कद्श औय भसीफत आनी ही चाहहए। भझे े े े भसीफत दे ने भें तभने बी ककतनी भसीफत सही ! तभने अऩना चचत्त ककतना भमरन ककमा ! इसमरए हे उदा ! तभ भझे भाप कयो। भेयी बडक्त फढ़ाने क मरए तम्हाये अॊत्कयण को भमरन े होना ऩडा। भेयी साधना फढ़ाने क मरए तम्हें भेया ववयोध कयना ऩडा।" े "अये बाबी ! तम्हायी साधना फढ़ाने क मरए नहीॊ, साधना मभटाने क मरए सफ ककमा, े े भझे ऺभा कयो।" उदा यो ऩडी। भीया फोरी् "नहीॊ, मभटाने का बाव से बी उस प्माये ने तो भेयी बडक्त फढ़ा दी। तम्हाया इसभें उऩमोग हआ।" उदा कहती है 'तभ भझे ऺभा कयो' औय भीया कहती है 'तभ भझे भाप कयो।' दै वी सम्ऩदा भें ककतना तेज है ! ककतनी सभझ है ! ककतना स्नेह है ! ककतनी उदायता है ! अरौककक, हदव्म, साजत्त्वक, शाॊत तेज क आगे आसयी तेजवारा ववयोधी बी रूऩाॊतरयत हो े जाता है । जीवन भें कछ इकट्ठा कयना हो तो दै वी सम्ऩदा को इकट्ठा कयो, आत्भऻान क ववचायों को े इकट्ठा कयो, भोऺ क ववचायों को इकट्ठा कयो। े नायामण.... नायामण.... नायामण..... नायामण..... नायामण......। अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जीवन-ववकास औय प्राणोऩासना भनष्म क जीवन भें ववकास का क्रभ होता है । ववकास उसको फोरते हैं जो स्वतन्त्रता दे । े ववनाश उसको फोरते हैं जो ऩयाधीनता की ओय रे जाम। 'स्व' क तॊत्र होना ववकास है । 'स्व' आत्भा है , ऩयभात्भा है । अऩने ऩयभात्भ-स्वबाव भें े आना, हटकना, आत्भ-साऺात्काय क भागद ऩय चरना मह ववकास है औय इस भागद से दय यहना े ू मह ववनाश है । ववकास भें तीन सोऩान हैं। एक होता है कभद का सोऩान। अॊत्कयण अशद्ध होता है , भमरन होता है तो आदभी ऩाऩकभद की ओय जाता है , बोग, आरस्म, तॊिा आहद की ओय जाता है । ऐसे रोग तभोगण प्रधान होने से भत्म क फाद वऺ, बॊड, शकय, ककय आहद अधभ मोननमों ृ े ृ ू ू ू भें जाते हैं.... ववनाश की ओय जाते हैं।
  • 48.
    यजोगण की प्रधानताहो तो चचत्त भें ववऺेऩ होता है । ववऺेऩ से आदभी छोटी-छोटी फातों भें द्खी हो जाता है । दननमावारे ने दननमा ऐसी फनामी है । हजायों खमशमाॉ होते हए आखरय रूराई है ।। ककतनी बी खमशमाॉ बोगो रेककन आणखय क्मा? खशी भन को होती है । जफ तक तन औय भन से ऩाय नहीॊ गमे तफ तक खशी औय गभ ऩीछा नहीॊ छोडेंगे। अॊत्कयण की भमरनता मभटाने क मरए ननष्काभ कभद है । ननष्काभ कभद से अॊत्कयण े शद्ध होता है । उऩासना से चचत्त का ववऺेऩ दय होता है । ऻान से अऻान दय होता है । कपय आदभी ू ू ववकास की ऩयाकाद्षा ऩय ऩहॉ चता है । हभाया शयीय जफ बायी होता है तफ वात औय कप का प्रबाव होता है । हभ जफ उऩासना आहद कयते हैं तफ शयीय भें बायीऩन कभ होने रगता है । आरस्म, प्रभाद, ववऺेऩ आहद कभ होने रगते हैं। वऩत्त की प्रधानता से तन भें स्पनतद आती है । भन, प्राण औय शयीय इन तीनों की आऩस ू भें एकतानता है । प्राण चॊचर होता है तो भन चॊचर फनता है । भन चॊचर होता है तो तन बी चॊचर यहता है । तन चॊचर फनने से भन औय प्राण बी चॊचर हो जाते हैं। इन तीनों भें से एक बी गडफड होती है तो तीनों भें गडफड हो जाती है । फच्चे क प्राण 'रयधभ' से चरते हैं। उसभें कोई आकाॊऺा, वासना, कोई प्रोब्रेभ, कोई े टे न्शन नहीॊ है । इसमरए फच्चा खशहार यहता है । जफ फडा होता है , इच्छा वासना ऩनऩती है तो अशाॊत सा हो जाता है । अफ हभें कयना क्मा है ? प्राणामाभ आहद से अथवा प्राण को ननहायने क अभ्मास आहद े साधनों से अऩने शयीय भें ववद्यत तत्त्व फढ़ाना है ताकक शयीय ननयोग यहे । प्राणों को तारफद्ध कयने से भन एकाग्र फनता है । एकाग्र भन सभाचध का प्रसाद ऩाता है । ऩयाने जभाने भें अस्सी अस्सी हजाय वषद तक सभाचध भें यहने वारे रोग थे ऐसा शास्त्रों भें ऩामा जाता है । रेककन 80 हजाय वषद कोई नीॊद भें नहीॊ सो सकता। फहत-फहत तो कबकणद जैसा कोई ऩाभय हो, तऩद्ळमाद कयक नीॊद ॊ े का वयदान रे तो बी छ् भहीना ही सो सकता है । अस्सी हजाय सार तो क्मा 80 सार तक बी कोई सो नहीॊ सकता। नीॊद तभोगण है । सभाचध सत्त्वगण की प्रधानता है । सयोवय क ऊऩयी सतह ऩय कोई बफना हाथ ऩैय हहरामे ठीक अवस्था भें रेट जाम तो े घण्टों बय तैय सकता है । रेककन ऩानी क तरे घण्टों बय यहना आसान नहीॊ है । अथादत ् नीचे े यहना आसान नहीॊ है औय ऊऩय यहना सहज है । सभाचध भें औय सख भें आदभी वषों बय यह सकता है । रेककन ववऺेऩ औय द्ख भें आदभी घडी बय बी यहना चाहता नहीॊ। अत् भानना ऩडेगा कक द्ख, भसीफत औय ववऺेऩ तम्हाये अनकर नहीॊ है , तम्हाये स्वबाव भें नहीॊ है । ू
  • 49.
    भॉह भें दाॉतहोना स्वाबाववक है । रेककन योटी सब्जी खाते-खाते कोई नतनका दाॉतों भें पस ॉ जाता है तो फाय फाय जजह्वा वहाॉ जाती है । जफ तक वह ननकर नहीॊ जाता तफ तक वह चैन नहीॊ रेती क्मोंकक नतनका भॉह भें यहना स्वाबाववक नहीॊ है । उसको ननकारने क मरए रकडी की, े प्राजस्टक की, वऩत्तर की, ताॉफे की, चाॉदी की, न जाने ककतनी ककतनी सराइमाॉ फनाई जाती हैं। भॉह भें इतने ऩत्थय (दाॉत) ऩडे हैं उसकी मशकामत नहीॊ होती जफकक एक छोटा सा नतनका बी असह्य फन जाता है । ....तो भॉह भें दाॉत होना स्वाबाववक है जफकक नतनका आहद होना अस्वाबाववक है । ऐसे ही सख हभाया स्वबाव है । ववऺेऩ औय द्ख हभाया स्वबाव नहीॊ है । इसमरए कोई द्ख नहीॊ चाहता, कोई ववऺेऩ नहीॊ चाहता। कपय बी दननमावारे ने दननमा ऐसी फनामी है कक तम्हें द्ख औय ववऺेऩ ननकारने का तयीका मभर जाम औय तभ स्वतॊत्र हो जाओ। 'स्व' क 'तॊत्र'। े 'स्व' कवर एक आत्भा है । े अस्सी हजाय वषद की सभाचध रग सकती है रेककन नीॊद उतनी नहीॊ आस सकती। भन औय प्राण को थोडा ननमॊबत्रत कयें तो हभ सभाचध क जगत भें प्रवेश कय सकते हैं। े जजन रोगों को ववचाय सभाचध प्राद्ऱ हई है , ऻानभागद भें प्रवेश मभरता है उन रोगों का भन सहज भें आत्भववचाय भें यहता है तो जो आनन्द मभरता है , प्रसन्नता मभरती है उससे नीॊद की भात्रा थोडी कभ हो जाम तो उनको ऩयवाह नहीॊ होती। डेढ़ दो घण्टा बी सो रें तो शयीय के आयाभ की आवश्मकता ऩूयी हो जाती है । सभाचध का, ध्मान का, आत्भववचाय का जो सख है वह नीॊद की कभी ऩूयी कय दे ता है । कोई अगय आठ घण्टे सभाचध भें फैठने का अभ्मास कय रे तो वह सोरह घण्टे जाग्रत यह सकता है । उसको नीॊद की बफल्कर जरूयत नहीॊ ऩडेगी। हभ जो खाते ऩीते हैं वह कौन खाता ऩीता है ? गरती से हभ भन रेते हैं कक हभ खाते ऩीते हैं। जड गमे प्राण से, भन से, शयीय से। वास्तव भें बख औय प्मास प्राणों को रगती है । ू सख-द्ख भन को होता है । याग-द्रे ष फवद्ध को होता है । प्राण, भन, फवद्ध शयीय आहद सफ साधन हैं। हभें ऻान नहीॊ है इसमरए साधन को भैं भानते हैं औय अऩने साध्म तत्त्व से वऩछडे यहते हैं। बफछडे हैं जो प्माय से दय-फ-दय बटकते कपयते हैं। कबी ककसी की कख भें तो कबी ककसी की कख भें । कबी ककसी वऩता की इजन्िम से ू ू ऩटक जाते हैं तो कबी ककसी भाता से गबद भें रटक जाते हैं। वह भाता चाहे चाय ऩैयवारो, ऩाॉच े ऩच्चीस ऩैय वारी हो, सौ ऩैय वारी हो मा दो ऩैय वारी हो, इससे कोई पक नहीॊ ऩडता। हय मोनन द भें भसीफत तो सहनी ही ऩडती है । तन धरयमा कोई न सणखमा दे खा। जो दे खा सो दणखमा ये....।।
  • 50.
    इस प्रकाय ववचायकयक जो साधक अऩना सहज स्वातॊ्म ऩाना चाहते हैं , 'स्व' क तॊत्र े े होना चाहते हैं उन रोगों क मरए आध्माजत्भक भागद सवदस्व है । े हभाया प्राण ननमॊबत्रत होगा तो शयीय भें ववद्यतशडक्त फनी यहे गी। शयीय ननयोग यहे गा, भन एकाग्र फनेगा, फवद्ध का ववकास होगा। अगय भन को एकाग्र कयोगे तो प्राण ननमॊबत्रत यहें गे। सभाचध भें आॊतरयक सख से भन का सभाधान हो जाम तो फाहय क सख की माचना नहीॊ े यहती। आकषदण बी नहीॊ यहता। द्ख नहीॊ होता औय मभरने ऩय कोई फन्धन नहीॊ होता। द्ख का भर है वासना औय वासना होती है सख ऩाने क मरए। वास्तव भें सख हभाया स्वबाव है । द्ख ू े हभाया स्वबाव नहीॊ है । भॉह भें दाॉत यहना स्वबाव है , नतनका यहना स्वबाव नहीॊ है । सयोवय की सतह ऩय घण्टों बय तैयना सॊबव है रेककन सयोवय क तरे भें दीघदकार तक यहना सॊबव नहीॊ है । े ऐसे ही द्ख नीचाई है । हभ कबी उसे ऩसन्द नहीॊ कयते रेककन वासना क कायण चगयते हैं , द्ख े ऩाते हैं। अफ हभें क्मा कयना चाहहए? प्राणों को, भन को औय शयीय को एकतान यखना चाहहए। जफ तभ जऩ कयो तफ कोई एक आसन ऩसन्द कय रो सखासन, मसद्धासन, ऩद्मासन आहद। ककसी एक आसन भें फैठकय ही जऩ कयो। जजतना हो सक, जऩ कयते सभम इधय उधय े झाॉक नहीॊ। दृवद्श नासाग्र यखें , द्वास ऩय यखें मा गरु गोववन्द क चचत्र ऩय यखें। तन एकाग्र होगा े े तो भन बी एकाग्र होगा। भन एकाग्र होगा तो स्थर प्राण को सूक्ष्भ कयने क मरए कण्डमरनी ू े शडक्त जागत होगी। कपय शयीय रयधभ से हहरेगा। शयीय भें कहीॊ वात-वऩत्त-कप क दोष होंगे तो ृ े उन्हें शद्ध कयने क मरए बीतय से धक्का रगेगा प्राणों को तो अऩने आऩ मथा मोनम आसन होने े रगें गे, तेजी से प्राणामाभ होने रगेगा। प्रायम्ब भें प्रनतहदन आठ-दस प्राणामाभ कयने का ननमभ तो रे रें ककन्त जफ प्राणोत्थान होगा तो प्राणामाभ औय ववमबन्न आसन अऩने आऩ होने रगें गे। सभथद सदगरु जफ सॊप्रेऺण शडक्त से भॊत्रदीऺा दे ते हैं तफ साथ ही साथ, सॊकल्ऩ क द्राया साधक े क चचत्त भें फीज फो दे ते हैं। साधक अहोबाव से साधन-बजन भें रगा यहता है तो वह फीज शीघ्र े ही ऩनऩ उठता है । साधक तीव्र गनत से साधना भें आगे फढ़ने रगता है । भहाभामा कण्डमरनी शडक्त उसकी साधना की डोय सॉबार रेती है । प्रायॊ ब भें इस फात का ऩता नहीॊ चरता कक ककतना फहढ़मा फीज हभाये चचत्त भें फोमा गमा है । जैसे, ककसान खेत भें फोआई कयता है तफ दे खनेवारा जान नहीॊ सकता कक जभीन भें फीज ऩडे हैं कक नहीॊ। रेककन ककसान जानता है । जफ खेत की मसॊचाई होती है औय फीज अॊकरयत होकय ऩनऩ उठते हैं, छोटी-छोटी ऩवत्तमाॉ ननकर आती हैं , साया खेत रहरहा उठता है तफ याहदाही बी जान सकते हैं कक ककसान ने फीज फोमे थे। ऐसे ही भॊत्रदीऺा क सभम साधक को जो मभरता है वह सफको ऻान नहीॊ होता। जफ े साधक साधना भें रगा यहता है तो सभम ऩाकय वह फीज कहो, गरुदे व का सॊकल्ऩ कहो, आशीवादद कहो, शडक्तऩात कहो, चाहे जो कछ कहो, वह ऩनऩता है ।
  • 51.
    भाॉ क उदयभें जफ गबादधान होता है , फच्चा आ जाता है उस सभम नहीॊ हदखता। कछ े भहीने क फाद भाॉ को भहसूस होता है औय उसक फाद दय क रोगों को बी भहसूस होता है कक े े ू े मह भहहरा भाॉ होने वारी है । साधक को जफ दीऺा मभरती है तफ उसका नवजन्भ होता है । दीऺा का भतरफ इस प्रकाय है ् दी = दीमते, जो हदमा जाम। ऺा = जो ऩचामा जाम। दे ने मोनम तो सचभच कवर आध्माजत्भक प्रसाद है । फाकी की कोई बी चीज दी जाम, वह े कफ तक यहे गी? जो ईद्वयीम प्रसाद दे ने की मोनमता यखते हैं वे गरु हैं। जो ऩचाने की मोनमता यखता है वह साधक है , मशष्म है । दे ने वारे का अनग्रह औय ऩचाने वारे की श्रद्धा, इन दोनों का जफ भेर होता है तफ 'दीऺा' की घटना घटती है । दीऺा तीन प्रकाय की होती है ् शाॊबवी दीऺा, जो ननगाहों से दी जाती है । स्ऩशद दीऺा, जैसे शकदे वजी ने ऩयीक्षऺत क मसय ऩय हाथ यखकय दी थी। तीसयी है भाॊबत्रक दीऺा। गरु-गोववन्द का, े बगवान का कोई नाभ दे दे ना। भाॊबत्रक दीऺा भें भॊत्र दे ने वारे का चचत्त जैसी ऊचाई ऩय होता है वैसा उस भॊत्र का प्रबाव ॉ ऩडता है । कोई बाडबॉूजा तम्हें कह दे कक 'याभ याभ जऩो, कल्माण हो जामगा....' तो इतना गहया कल्माण नहीॊ होगा जजतना कोई ब्रह्मवेत्ता सत्ऩरुष याभ भॊत्र दें औय कल्माण हो जाम। याभानॊद स्वाभी ने ऐसे ही 'याभ.... याभ' उच्चायण ककमा औय कफीय जी ने गहयी श्रद्धा से ऩकड मरमा कक गरुदे व क श्रीभख से भॊत्र मभर गमा है , तो कफीय जी उस भॊत्र से मसद्ध हो गमे। भॊत्र तो वही है े रेककन भॊत्र दे ने वारे की भहहभा है । कोई चऩयासी कछ कह दे तो उसकी अऩनी कीभत है औय प्रधान भॊत्री वही फात कह दे तो प्रबाव कछ औय ही ऩडेगा। आध्माजत्भकता भें जो उन्नत हैं उनक द्राया भॊत्र मभरता है औय साभने वारा श्रद्धा से े साधना कयता है तो भॊत्र उसको ताय दे ता है । भॊत्र का अथद ही है ् भननात ् त्रामते इनत भॊत्र्। जजसका भनन कयने से जो त्राण कये , यऺा कये वह है भॊत्र। अॊतय भें भनन कयने से भॊत्र भन को ताय दे ता है । भाॊबत्रक दीऺा भें जजतने शब्द कभ होते हैं औय भॊत्रोच्चायण जजतना तारफद्ध होता है उतनी साधक को सववधा यहती है , वह जल्दी से आगे फढ़ता है । भाॊबत्रक दीऺा भें अगय कोई सॊप्रदाम चराना है , कोई भजहफ ऩकड यखना है तो उसभें ख्मार यखा जामगा कक भॊत्र दसयों से कछ ववरऺण हो। ऐसे भजहफ-सॊप्रदामों भें साधक की ू उन्ननत भख्म नहीॊ है , सॊप्रदाम का गठन भख्म है । सॊप्रदाम का गठन कयने वारे जो बी सॊप्रदाम क आचामद हैं उनको उनका कामद भफायक हो। नायदजी ऐसे साॊप्रदानमक सॊत नहीॊ थे। नायदजी क े े मरए साभने वारे की उन्ननत भख्म थी। साभने वारे क जीवन की उन्ननत जजनकी दृवद्श भें भख्म े
  • 52.
    होती है वेरोक सॊत होते हैं। नायद जी ने वामरमा रटे या को भॊत्र हदमा 'या....भ'। 'या' रम्फा औय 'भ' छोटा। वामरमा भूराधाय कन्ि, स्वाचधद्षान कन्ि भें जीने वारा आदभी है । उन कन्िों भें इस े े े भॊत्र क आन्दोरन ऩडेंगे तो धीये -धीये वह अनाहत कन्ि भें , रृदम कन्ि भें ऩहॉ चगा ऐसा सभझकय े े े े नायदजी ने भाॊबत्रक दीऺा दे ते सभम शाॊबवी दीऺा का बी दान कय हदमा, ननगाहों से उसक अॊतय े भें अऩने ककयण डार हदमे। वामरमा रटे या रग गमा भॊत्र जाऩ भें । 'भया... भया.... भया...भया...' तारफद्ध भॊत्र जऩते-जऩते उसकी सषद्ऱ कण्डमरनी शडक्त जाग्रत हई औय वामरमा रटे या आगे जाकय वाल्भीकक ऋवष फन गमा। भॊत्रदीऺा दे ने वारे भहाऩरुष औय रेने वारा साधक दोनों फहढ़मा होते हैं तो साधना औय मसवद्ध बी फहढ़मा हो जाती है । कबी-कबी ऐसा बी हो सकता है कक भॊत्रदीऺा रेने वारे की अत्मॊत श्रद्धा है , साधना भें अत्मॊत रगन है , ननमभफद्ध अभ्मास है तो दे ने वारा कोई साधायण व्मडक्त बी हो कपय बी रेने वारा आगे ननकर सकता है । अचधक राब तो तफ होता है जफ दे ने वारा बी खफ ऊचे हों औय रेने वारा बी अडडग हो। ऐसे भौक ऩय कामद अचधक सन्दय औय सहावना होता ू ॉ े है । साधक अगय आसन, प्राणामाभ आहद ननमभ से कयता यहे तो उसका तन ननयोगी यहे गा, प्राण थोडे ननमॊबत्रत यहें गे। प्राणामाभ कयने से प्राणों भें तारफद्धता आती है । हभाये प्राण तारफद्ध नहीॊ हैं इसमरए छोटी-छोटी फातों भें हभाया भन चॊचर हो जाता है । साधायण रोग औय मोचगमों भें इसी फात का पक है । मोगी फडी-फडी आऩवत्तमों भें इतने ववक्षऺद्ऱ नहीॊ होते क्मोंकक उन्होंने द प्राणामाभ आहद कयक भन औय प्राण को तारफद्ध ककमा हआ होता है । उनभें सफ ऩचा रेने की े शडक्त होती है । ऩहरे सभम भें रकडे क ऩर होते थे। सेना की कोई फटामरमन जफ कच कयती है तफ े ू एक... दो.... एक..... दो, इस प्रकाय तारफद्ध कदभ मभराकय चरती है । उस सभम भें जफ रकडे क ऩर ऩय से सेना गजयती तफ कप्टन सेना को आऻा दे ता कक तार तोडो। तारफद्ध कदभ ऩडने े े से ताकत ऩैदा होती है औय उससे रकडे का ऩर टूट सकता है । तारफद्धता भें शडक्त है । कोई बफना तार क गीत गामे तो भजा नहीॊ आएगा। साधनों क े े साथ स्वय मभराकय गामा जाम तो ऩूयी सबा डोरामभान हो सकती है । सॊगीत क साधन सफक े े स्वय मभराने भें सहमोग दे ते हैं। तारफद्धता भें एक प्रकाय का सख औय साभर्थमद छऩा है । हभाये प्राण अगय तारफद्ध चरने रग जामें तो सूक्ष्भ फनेंगे। द्वास तारफद्ध होगा तो दोष अऩने आऩ दय हो जामॉगे। द्वास सक्ष्भ ू ू औय तारफद्ध नहीॊ है इसमरए काभ सताता है । द्वास तारफद्ध नहीॊ है इसमरए क्रोध प्रबाव डार दे ता है । योग, शोक, भोह आहद सफ प्राणों की तारफद्धता क अबाव भें होते हैं। प्रनतहदन अगय े थोडा सभम बी द्वास मा प्राणों की तारफद्धता क मरए ननकारें तो फहत-फहत राब होगा। े
  • 53.
    भानो, हभें क्रोधआ यहा है । उस सभम जाॉचो तो ऩता चरेगा कक द्वास का तार ववशेष ववकृत होगा। उस सभम क्मा कयना चाहहए? अऩने द्वास को दे खो, सावधान होकय ननहायो प्राण की गनत को। क्रोध ऩय ननमॊत्रण आ जाएगा। हभ कबी चचन्ता भें हैं। चचत्त भें कछ फोझा है । तो क्मा कयें ? शद्ध हवा भें भॉह क द्राया े रम्फे-रम्फे द्वास रो। नथनों से फाहय ननकारो। कपय भॉह से रम्फे द्वास रो औय नथनों से ननकारो। इस प्रकाय दस फायह फाय कयो। तम्हायी उदासी भें , चचन्ता भें जरूय ऩरयवतदन आ जामगा। भान रो, ककसी क चचत्त भें कोई ऩयानी गन्दी आदत है । कई मवकों को हस्तभैथन की े आदत होती है । ऩाऩ की ऩयाकाद्षा है वह। ऐसी आदतवारे मवक को अगय फदरना है तो उसको प्राणामाभ मसखामा जाम। हस्तभैथन जैसी बद्दी आदतवारा मवक यात को सोता है औय सफह को जफ उठता है तफ उसका चेहया दे खकय ऩता चरता है कक वह यात को अऩनी ऊजाद का सत्मानाश कयता है । भनष्म बीतय द्खी होता है तो औय द्ख का साभान इकट्ठा कयता है । सत्सॊग नहीॊ मभरता है , साधन-बजन ननममभत नहीॊ होता है , बीतय का थोडा-फहत यस नहीॊ आता। तफ आदभी काभचेद्शा मा औय ऩाऩ कभद कयता है । ऐसे रोगों को बी भोडना है , आगे फढ़ाना है तो उन्हें प्राणामाण मसखामा जाम। उनके प्राणों भें थोडी सूक्ष्भता रामी जाम। वे फदर जाएॉगे। उनक जीवन भें भानो जाद ू हो जाएगा। े इजन्िमों का स्वाभी भन है औय भन का स्वाभी प्राण है । मोचगमों का कहना है कक अगय प्राण का ऩया प्रबत्व आ जाम तो चॊदा औय सूयज को गें द की तयह अऩनी इच्छा क भताबफक ू े चरा सकते हो। सती शाजण्डरी ने सूयज को योका था। नऺत्रों को अऩनी जगह से तभ हहरा सकते हो, अगय प्राणशडक्त को अत्मॊत सूक्ष्भ कय रो तो। जजसने कवरी कबक की साधना कय री है उसक आगे सॊसायी रोग अऩनी शब काभना े ॊ े की भनौती भाने तो उनक कामद होने रगते हैं। प्राणामाभ का ऊचा पर जजसने ऩामा है , प्राणों ऩय े ॉ ननमॊत्रण ऩाकय जजसने भन को जीत मरमा है उसने सफ कछ जीत मरमा है । जजसने भन को जीत मरमा उसने प्राण को जीत मरमा। कबी अऩने को हताश औय ननयाश न कयो, क्मोंकक तभ प्राण रेते हो औय भन बी तम्हाये ऩास है । थोडा-फहत साधना का भागद बी तम्हाये ऩास है । ऐसी फात सभझने की थोडी फहत श्रद्धा, बडक्त औय फवद्ध बी बगवान ने दी है । अत् घफडाना नहीॊ चाहहए। कसी बी कभजोयी हो, ऩहरे ै का कसा बी ऩरामनवाद घसा हो कपय बी उत्साहऩूवक ननद्ळम कयो कक् ै द "भैं सफ कछ कय सकता हूॉ। ईद्वय का अनन्त फर भझभें सषद्ऱ ऩडा है । भैं उसे जगाऊगा।" ॉ
  • 54.
    भन औय प्राणप्रकृनत क हैं। प्रकृनत ऩयभात्भा की है । भन औय प्राण का उऩमोग तो कयो, े कपय भन औय प्राण बी ऩयभात्भा को अऩदण कय दो। प्राणामाभ आहद कयो, भन को एकाग्र कयो, अऩने ननमॊत्रण राओ, कपय ऐसा चचन्तन कयो कक 'इन सफ को दे खने वारा भैं साऺी, चैतन्म आत्भा हूॉ।' ऐसा चचन्तन ककमा तो भन औय प्राण ईद्वय को अवऩदत हो गमे। मह हो गमा बडक्त मोग। इससे बाव की शवद्ध होगी औय फवद्ध ऩयभात्भा भें प्रनतवद्षत होगी। जो कभदकाण्ड का अचधकायी है उसको कभदकाण्ड भें रूचच फढ़े ऐसे रोगों का ही सॊग कयना चाहहए। जो उऩासना का अचधकायी है , उसको उऩासना भें दृढ़ता यहे , उऩासना भें प्रीनत फढ़े ऐसे वातावयण भें औय ऐसे सॊग भें यहना चाहहए। उऩासना कयने वारा अगय ववचाय कये गा, फवद्ध का उऩमोग कये गा तो उऩासना से च्मत हो जामगा। उऩासना का भागद मह है कक तभ श्रद्धा से उन्नत हो जाओ। जैस, है तो शामरग्राभ रेककन आहद नायामण हैं। है तो मशवमरॊग रेककन करासऩनत े ै बगवान शॊकय हैं। करासऩनत भानकय उऩासना कयते हैं तो ठीक है रेककन उऩासक अगय ववचाय ै कये कक, 'करास भें बगवान शॊकय हैं कक नहीॊ, क्मा ऩता....' तो वह उऩासना से च्मत हो ै जामगा। ऩहरे क जभाने भें ऩैदर जाना होता था। करास भें करासऩनत है कक नहीॊ मह ऩता े ै ै रगाने का कोई साधन नहीॊ था। वहाॉ बगवान हैं ही ऐसी श्रद्धा फनी यहती थी। रेककन आजकर हे मरकोप्टय आहद साधनों से कहीॊ बी खोजफीन की जा सकती है ऩय उऩासना क मरए ऐसी फवद्ध े चराना इद्श नहीॊ है । उऩासक को तो अऩनी श्रद्धा फढ़ा-फढ़ाकय आगे फढ़ना चाहहए। वहाॉ ववचाय की आवश्मकता नहीॊ है । कभदकाण्डी अगय सीधा उऩासना भें आ जाएगा तो कभद भें उसकी रूचच टूट जाएगी। उऩासक अगय ववचाय भें आ जाएगा तो उऩासना भें रूचच टूट जाएगी। अत् जजस सभम जो कयते हैं उसभें रग जाओ। जजस साधक को जो साधन ज्मादा अनकर ऩडता हो उसभें दृढ़ता से रग ू जामे। तत्ऩयता से साधना कये । अगय प्राणोऩासना भें कोई ठीक से रग जाम तो उसका कवरी कबक मसद्ध होता है । े ॊ जजसका कवरी कबक मसद्ध हो गमा हो उसक आगे दसये रोगों की भनोकाभनाएॉ ऩूणद होने रगती े ॊ े ू हैं तो उसकी अऩनी काभनाओॊ का तो ऩछना ही क्मा? ू भन, प्राण औय शयीय इन तीनों का आऩस भें जडवे बाई जैसा सम्फन्ध है । शयीय बायी यहता हो तो प्राणामाभ आहद कयने से वह हल्का फन सकता है । एक फात खास माद यखें कक कबी बफना आसन क न फैठो। इससे भन ऩय थोडा प्रबाव आएगा। भन ऩय प्रबाव आएगा तो े प्राण सूक्ष्भ होने रगें गे। कण्डमरनी जगेगी। कपय जो कछ कक्रमा होने रगे उसको योको नहीॊ। ध्मान कयते सभम शयीय घण्टी की तयह घूभता है मा उछरकद भचाता है तो उसको योको भत। ू रेककन ऐसे ही बजन भें फैठे हो तो शयीय को चॊचर भत यखो। फन्दय की तयह इधय हहरे, उधय हहरे, इधय झाॉका, उधय झाॉका..... ऐसे नहीॊ। बफना प्रमोजन की पारतू चेद्शाओॊ से शयीय को फचाओ। इससे भन की एकाग्रता फढ़े गी।
  • 55.
    हभ साधन-बजन कयतेहैं तो भन थोडा-सा एकाग्र होता है , प्राण थोडे सूक्ष्भ होते हैं। शयीय भें एक प्रकाय की बफजरी ऩैदा होती है , वऩत्त का प्रबाव फढ़ता है । शयीय का बायीऩन औय आरस्म दय होता है , स्पनतद आती है । ू ू तरसी क ऩत्ते सात हदन तक फासी नहीॊ भाने जाते। फेरपर तीन हदन तक फासी नहीॊ े भाना जाता। कभर का पर दो हदन तक फासी नहीॊ भाना जाता। दसये पर एक हदन तक फासी ू ू नहीॊ भाने जाते। तरसी क ऩाॉच ऩत्ते चफाकय ऩानी वऩमें तो शयीय भें ववद्यत शडक्त फढ़ती है । तरसी भें े ववद्यत तत्त्व ज्मादा है । तो क्मा तरसी दर ज्मादा खा रें? नहीॊ, नहीॊ। ऩाॉच ऩत्ते ही कापी हैं। शयीय को तन्दरुस्त यखने भें सहामक होंगे। कबी-कबी अऩने इद्श को प्माय कयते हए ध्मान कयना चाहहए, उऩासना कयनी चाहहए। वे इद्श चाहे बोरेनाथ हों, बगवान याभ हों, बगवान कृष्ण हों, कोई दे वी दे वता हो चाहे अऩने सदगरुदे व हों, जजनभें तम्हायी अचधक श्रद्धा हो उन्हीॊ क चचन्तन भें यभ जाओ। योना हो तो उन्हीॊ े क ववयह भें योओ। हॉ सना हो तो उन्हीॊ को प्माय कयते हए हॉ सो। एकाग्र होना तो उन्हीॊ क चचत्र े े को एकटक ननहायते हए एकाग्र फनो। इद्श की रीरा का श्रवण कयना बी उऩासना है । इद्श का चचन्तन कयना बी उऩासना है । इद्श क मरए योना बी उऩासना है । भन ही भन इद्श क साथ चोयस खेरना बी उऩासना। इद्श क े े े साथ भानमसक कफड्डी खेरना बी उऩासना है । इद्श क कस्ती खेरना बी उऩासना है । ऐसा े उऩासक शयीय की फीभायी क वक्त सोमे सोमे बी उऩासना कय सकता है । उऩासना सोते सभम बी े हो सकती है , रेटे रेटे बी हो सकती है , हॉ सते हॉसते बी हो सकती है, योते योते बी हो सकती है । फस, भन इद्शाकाय हो जाम। भेये इद्श गरुदे व थे। भैं नदी ऩय घूभने जाता तो भन ही भन उनसें फातें कयता। दोनों की ओय होने वारा सॊवाद भन ही भन घड रेता। भझे फडा भजा आता था। दसये ककसी इद्श क ू े प्रत्मऺ भें कबी फात हई नहीॊ थी, उसकी रीरा दे खी नहीॊ थी रेककन अऩने गरुदे व ऩूज्मऩाद स्वाभी श्री रीराशाहजी बगवान का दशदन, उनका फोरना-चारना, व्मवहाय कयना आहद सफ भधय रीराएॉ प्रत्य़ऺ भें दे खने को मभरती थी, उनसे फातचीत का भौका बी मभरा कयता था। अत् एकान्त भें जफ अकरा होता तफ गरुदे व क साथ भनोभन अठखेमरमाॉ कय रेता। अबी बी कबी- े े कबी ऩयाने अभ्मास क भताबफक घूभते-कपयते अऩने साॉईं से फातें कय रेता हूॉ, प्माय कय रेता हूॉ। े साॉईं तो साकाय नहीॊ हैं, अऩने भन क ही दो हहस्से हो जाते हैं। एक साॉईं होकय प्रेयणा दे ता है े दसया साधक होकय सनता है । क्मोंकक साॉईं तत्त्व व्माऩक होता है , गरुतत्त्व व्माऩक होता है । ू कबी-कबी उऩासक मशकामत कयता है कक भेया भन बगवान भें नहीॊ रगता है । इसी प्रकाय कये तो ही बगवान भें भन रग सकता है । जो रोग थोडे बी उन्नत उऩासक हैं उनका भन जफ चाहे तफ बगवान भें रग सकता है ।
  • 56.
    भेये गरुदे वकबी-कबी अकरे कभये भें फैठे-फैठे बगवान क साथ ववनोद कयते। उनका े े बगवान तो तत्त्व रूऩ भें था। वे जगे हए भहाऩरुष थे। वे एकाॊत भें कबी-कबी ठहाका भायकय हॉसते। भोय की तयह आवाज कयते् "वऩमू ऽऽऽऽ....!" कपय अऩने आऩको कहते् "फोर,रीराशाह !" वे अऩने आऩको 'शाह' नहीॊ फोरते थे, ऩहरे दो अऺय ही अऩने मरए फोरा कयते थे, रेककन भझसे वह नाभ फोरा नहीॊ जाता। वे अऩने आऩसे सॊवाद-वाताद-ववनोद कयते् "जी साॉईं !" "योटी खाएगा?" "हाॉ, साॉईं ! बूख रगी है ।" "योटी तफ खामगा जफ सत्सॊग का भजा रेगा। रेगा न फेटा ?" "हाॉ भहायाज ! रॉ ूगा, जरूय रॉ ूगा।" "ककतनी योटी खाएगा। ?" "तीन तो चाहहए।" "तीन योटी चाहहए तो तीनों गणों से ऩाय होना है । फोर, होगा न ?" "हाॉ, साॉईं, ऩाय हो जाऊगा रेककन अबी तो बूख रगी है ।" ॉ "अये बूख तझे रगी है ? झठ फोरता है ? बूख तेये प्राणों को रगी है ।" ू "हाॉ साॉई, प्राणों की रगी है ।" "शाफाश ! अफ बरे योटी खा, रीराशाह ! योटी खा !" ऐसा कयक ववनोद कयते औय कपय बोजन ऩाते। उनको उऩासना कार का कोई अभ्मास े ऩडा होगा तो नब्फे सार की उम्र भें बी ऐसा ककमा कयते थे. मह सफ फताने क ऩीछे भेया प्रमोजन मह है कक तम्हें बी उऩासना की कोई कजी हाथ े ॊ रग जाम। इद्श का चचन्तन कयना अथवा इद्शों का इद्श आत्भा अऩने को भानना औय शयीय क अऩने े से अरग भानकय चेद्शा औय चचन्तन कयना मह बी उऩासना क अॊतगदत आ जाता है । े रडकी जफ ससयार जाती है तफ भामका छोडते हए कहठनाई रगती है । जफ ससयार भें सेट हो जाती है तो भामक कबी-कबी ही आती है । आती है तफ बी उसक ऩैय अचधक हटकते े े नहीॊ। कछ ही सभम भें वह चाहती है कक अफ जाऊ अऩने घय। आज तक जजसको अऩना घय ॉ भान यही थी वह धीये -धीये बाई का घय हो जाता है , फाऩ का घय हो जाता है । ऩनत का घय ही अऩना घय हो जाता है ।
  • 57.
    ऐसे ही उऩासकअऩने इद्श क साथ ब्माहा जाता है तो उसको इद्श का चचन्तन अऩना े रगता है औय सॊसाय का चचन्तन ऩयामा रगता है । सॊसाय तम्हाया ऩयामा घय है । असरी घय तो है बगवान, आत्भा-ऩयभात्भा। वह तम्हाया फाऩ बी है , बाई बी है , ऩनत बी है , सखा बी है , जो भानो सो है । रडकी का ऩनत सफ नहीॊ हो सकता रेककन साधक का ऩनत सफ हो सकता है । क्मोंकक ऩयभात्भा सफ कछ फना फैठा है । गरु को जो शयीय भें ही दे खते हैं वे दे य-सफेय डगभग हो जाते हैं। गरु को शयीय भानना औय शयीय को ही गरु भानना मह बर है । गरु तो ऐसे हैं जजससे श्रेद्ष औय कछ बी नहीॊ है । ू 'मशवभहहम्न स्तोत्र' भें आता है ् नाजस्त तत्त्वॊ गयो् ऩयभ ्। गरु से ऊऩय कोई बी तत्त्व नहीॊ है । गरु तत्त्व साये ब्रह्माण्ड भें व्माद्ऱ होता है । अत् गरु को कवर दे ह भें ही दे खना, गरु को दे ह भानना मह बर है । े ू भैं अऩने गरुदे व को अऩने से कबी दय नहीॊ भानता हूॉ। आकाश से बी अचधक सक्ष्भ तत्त्व ू ू हैं वे। जफ चाहूॉ तफ गोता भायकय भराकात कय रेता हूॉ। ऐसे सवदव्माऩक ऩयभ प्रेभास्ऩद गरुतत्त्व को इसी जीवन भें ऩा रेने का रक्ष्म फना यहे । साधक मह रक्ष्म न बूरे। ध्मान-बजन भें बी रक्ष्म बूर जाएगा तो ननिा आमेगी, तॊिा आमेगी। साधक चचॊतन कयते यहे कक भेया रक्ष्म क्मा है । ऐसा नहीॊ कक चऩचाऩ फैठा यहे । ननिा, तॊिा, यसास्वाद आहद ववघ्न आ जामें तो उससे फचना है । ध्मान कयते सभम द्वास ऩय ध्मान यहे , दृवद्श नासाग्र मा भ्रूभध्म भें यहे अथवा अऩने को साऺी बाव से दे खता यहे । इसभें बी एकाध मभनट दे खेगा, कपय भनोयाज हो जामेगा। तफ रम्फा द्वास रेकय प्रणव का दीघद उच्चायण कये ् 'ओ....भ ् ऽऽऽऽ....' कपय दे खे कक भन क्मा कय यहा है । भन कछ न कछ जरूय कये गा, क्मोंकक ऩयानी आदत है । तो कपय से गहया द्वास रेकय ओठ फन्द कयक 'ॐ' का गॊजन कये । इस गॊजन से शयीय भें े आॊदोरन जगें गे, यजो-तभोगण थोडा ऺीण होगा। भन औय प्राण का तार फनेगा। आनन्द आने रगेगा। अच्छा रगेगा। बीतय से खशी आमेगी। तम्हाया भन बीतय से प्रसन्न है तो फाहय से बी प्रसन्नता फयसाने वारा वातावयण सहज भें मभरेगा। बीतय तभ चचॊनतत हो तो फाहय से बी चचॊता फढ़ाने वारी फात मभरेगी। बीतय से तभ जैसे होते हो, फाहय क जगत से वैसा ही प्रनतबाव तम्हें े आ मभरगा। जगत तीन प्रकाय क हैं- एक स्थर जगत है जो हभ आॉखों से दे खते हैं, इन कानों से े ू सनते हैं, इस जजह्वा से चखते हैं, इस नामसका से सॉूघते हैं। मह स्थर जगत है , दसया सूक्ष्भ ू ू जगत है । स्थर जगत रौककक जगत है , दसया अरौककक जगत है । इन दोनों से ऩाय तीसया है ू ू रोकातीत जगत। मह है रौककक अरौककक दोनों का आधाय, दोनों का साऺी।
  • 58.
    जगत को देखने की दृवद्श बी तीन प्रकाय की है ् एक है स्थर दृवद्श मा चऺ दृवद्श, दसयी ू ू भनदृवद्श औय तीसयी वास्तववक दृवद्श। स्थर जगत भें जो कछ हदखता है मह स्थर आॉखों से हदखता है । सूक्ष्भ जगत अॊदय क ू ू े भन् चऺ से हदखता है । जैसे, ककसी साधना क द्राया हभ अऩने इद्श मा सदगरु से अनसॊधान कय े रें तो हभें दय का कछ अजीफ-सा दशदन होगा। वह रौककक नहीॊ होगा, अरौककक होगा। कबी ू सॊगीतवाद्यों क भधय स्वय सनाई ऩडेंगे। कबी अरौककक सगन्ध आने रगेगी। इस प्रकाय क े े अनबव हों तफ जानना कक भन रौककक जगत से हटकय अरौककक जगत भें प्रववद्श हआ है , फाह्य चऺ से हटकय आॊतयऺ भें गमा है । आॊतयचऺ वारे साधक एक दसये को सभझ सकते हैं जफकक ू दसये रोग उनकी फातों की भजाक उडामेंगे। ू साधक को अऩने आॊतय जगत क अनबव अत्मॊत फहहभख रोगों को नहीॊ सनाना चाहहए। े द क्मोंकक फहहभख रोग तक-कतक कयक साधक क अनबव को ठे स ऩहॉ चा दे गा। फाहय क आदभी द द द े े े भें तक कयने की मोनमता ज्मादा होगी औय साधक तक क जगत भें नहीॊ है , बावना क जगत भें द द े े है । बाववारा अगय फौवद्धक जगत वारे क साथ टकयाता है तो उसक बाव भें मशचथरता आ जाती े े है । इसीमरए साधकों को शास्त्र की आऻा है कक अऩना आध्माजत्भक अनबव नाजस्तक औय ननगये , साधायण रोगों को नहीॊ सनाना चाहहए। आध्माजत्भक अनबव जजतना गोप्म यखा जाए उतना ही उसका प्रबाव फढ़ता है । भन, प्राण औय शयीय इन तीनों का एक दसये क साथ जडवे बाई जैसा सम्फन्ध है । ू े इसमरए शयीय को ऐसा खयाक भत णखराओ कक ज्मादा स्थरता आ जाम। अगय नीॊफू प्रनतकर न ू ू ऩडता हो तो साधक को बोजन भें नीॊफू रेना चाहहए। प्रनतहदन तरसी क ऩत्ते चफाने चाहहए। नॊगे े ऩैय कबी बी नहीॊ घूभना चाहहए। नॊगे ऩैय चरने कपयने से शयीय का ववद्यत तत्त्व बूमभ भें उतय जाता है । बजन क प्रबाव से फढ़ा हआ ववद्यत तत्त्व कभ हो जाने से मशचथरता आ जाती है । े शयीय भें बायीऩन यहने से ध्मान-बजन भें भजा नहीॊ आता, काभ कयने भें बी भजा नहीॊ आता। जजसको ध्मान-बजन भें भजा आता है उस साधक को रौककक जगत भें से अरौककक सूक्ष्भ जगत भें जाने की रूचच जगती है । रौककक जगत भें तो कभद कयक, ऩरयश्रभ कयक थोडा े े सा भजा मभरता है जफकक बावना क जगत भें बफना कभद ककमे, बावना से ही आनन्द मभरता े है । ध्मान क द्राया, प्रेभाबडक्त क द्राया साधक को जो भजा मभरता है वह रौककक जगत क ऩदाथों े े े से नहीॊ मभर सकता। बीतय का भजा ज्मों-ज्मों आता जाएगा त्मों-त्मों फाहय क ऩदाथों का े आकषदण छटता जाएगा। आकषदण छटा तो वासना कभ होगी। वासना कभ होगी तो भन की ू ू चॊचरता कभ होगी। भन की चॊचरता कभ होगी तो फवद्ध का ऩरयश्रभ कभ होगा। फवद्ध जस्थय होने रगेगी तो ऻानमोग भें अचधकाय मभर जाएगा। ननष्काभ कभद उऩासना का ऩासऩोटद दे ता है उऩासना ऻान का ऩासऩोटद दे ती है । कपय बी महद ककसी ने ऩहरे उऩासना कय यखी है , फवद्ध फहढ़मा है , श्रद्धा गहयी है औय सभथद सदगरु मभर
  • 59.
    जाते हैं तोसीधा ऻान क भागद ऩय साधक चर ऩडता है । जैसे याजा जनक चर ऩडे थे वैसे कोई े बी अचधकायी साधक जा सकता है । कोई उऩासना से शरु कय सकता है । प्राम् ऐसा होता है कक सत्कभद, शबकभद कयते हए, सदाचाय से चरते हए साधक आगे फढ़ता है । कपय उऩासना भें प्रवेश होता है । उऩासना ऩरयऩक्व होने ऩय ऻान भागद भें गनत होने रगती है । प्रायॊ मबक साधक को सभाज भें यहते हए साधना कयने से मह तकरीप होती है कक उसके इदद चगदद ऩच्चीस रोग भ्रद्शाचायी होते हैं औय साधक होता है सदाचायी। वे ऩच्चीस रो इसे भखद ू भानें गे। उन भ्रद्शाचारयमों को ऩता नहीॊ होता कक वे अऩना भन औय जीवन भमरन कयक जो कछ े इकट्ठा कय यहे हैं उसका बोग तो उनक बानम भें जजतना होगा उतना ही कय ऩाएॉगे। फाकी से तो े उनका आहाय, तन औय भन अशद्ध होगा औय द्ख दे गा। रेककन वे रोग सभझते नहीॊ औय साधक का भजाक उडाते हैं। बोगी ववरासी रोग यजो-तभोगण फढ़ानेवारे आहाय रेते हैं औय भानते हैं कक हभ 'पस्टद क्रास' बोजन कयते हैं रेककन वास्तव भें इन्हीॊ आहायों से आदभी 'थडद क्रास' होता है । दननमा की नजयों भें अच्छा आहाय है उसको साधक सभझता है कक मह नीचे क कन्िों भें रे जाने वारा े े आहाय है । मह 'थडद क्रास है ।' 'पस्टद क्रास' क आहाय तो शयीय को तन्दरुस्त यखता है भन को े प्रसन्न यखता है औय फवद्ध को तेजस्वी फनाता है । भैंने सनी है एक कहानी। एक भल्रा की प्रमसवद्ध दसये भल्रा-भौरववमों की असह्य हो यही थी। जफ तक आत्भ- ू साऺात्काय नहीॊ होता तफ तक धामभदक जगत हो जा व्मावहारयक जगत हो, याग-द्रे ष चरता यहता है , एक दसये क ऩैय खीॊचने की चेद्शाएॉ होती ही यहती हैं। स्थर शयीय औय सूक्ष्भ शयीय जफ तक ू े ू है तफ तक ऐसा होता ही यहे गा। दोनों शयीयों से जो ऩाय गमा, आत्भऻानी हो गमा उसक मरए े मह झॊझट नहीॊ है , फाकी क मरए तो झॊझट यहे गी ही। े दसये भौरववमों ने इस भल्रा क मरए फादशाह को मशकामत कय दी। उसक चारय्म ू े े ववषमक कीचड उछार दीष फादशाह ने सोचा कक मह प्रमसद्ध भल्रा है । इसको अगय दॊ ड आहद दें गे तो याज्म भें बी इसक चाहकों की फददआ रगेगी। वजीयों की याम री तो उन्होंने कहा कक े ऐसा उऩाम कयना चाहहए जजससे साॉऩ बी भय जाए औय राठी बी फच जाम। उन्होंने उऩाम बी फता हदमा। फादशाह ने उस प्रकाय अऩने भहर क चाय कभये भें व्मवस्था कय दी। कपय भल्रा को े फरवाकय कहा गमा कक आऩ यात बय महाॉ अकरे ही यहें गे। दसया कोई नहीॊ होगा। इन चाय े ू कभयों भें से ककसी बी एक कभये का उऩमोग कयोगे तो फादशाह सराभत खश होंगे औय आऩको छोड हदमा जामगा। अगय उऩमोग नहीॊ ककमा तो जहाॉऩनाह का अनादय भाना जाएगा। कपय वे जो पयभान कयें गे वैसा होगा।
  • 60.
    उन चायों कभयोंभें भल्रा ने दे खा। ऩहरे कभये भें पाॉसी रटक यही थी। इस कभये का उऩमोग कयना भाने पाॉसी खाकय भय जाना। भल्रा आगे फढ़ गमा। दसये कभये भें हाय-मसॊगाय ू कयक नाज-नखये कयती हई वेश्मा फैठी थी। तीसये कभये भें भाॊस-कफाफ-अॊडे आहद आसयी खयाक े खाने को यखे गमे थे। चौथे कभये भें दारू की फोतरें यखी गईं थीॊ। भल्रा ने सोचा कक ऐसी नाऩाक चीजों का उऩमोग भैं कसे करू। भैं दारू क्मों वऩऊ ? ै ॉ ॉ भाॊसाहाय बी कसे कय सकता हूॉ ? वेश्मागभन से तो खदा फचाम ! तो क्मा पाॉसी खाकय भय ै जाऊ ? क्मा ककमा जाम ? ॉ भल्रा इधय-उधय चक्कय काट यहा है । यात फीती जा यही है । प्मास बी रगी है । उसने सोचा् दारू भें ऩानी बी होता है । ऩानी से हाथ बी साप ककमे जाते हैं। अफ फात यही थोडी-सी। जया-सा दारू ऩी रॉ गा। प्मास बी फझ जामगी औय फादशाह सराभत की फात बी यह जामेगी। भैं ू भक्त हो जाऊगा। ॉ भल्रा ने थोडा दारू ऩी मरमा। जजह्वा ऩय थोडा अशद्ध आहाय आ गमा तो भन ऩय बी उसका प्रबाव ऩड गमा। थोडा औय ऩी रॉ ू तो क्मा हजद है ? ऐसा सोचकय ककस्भ-ककस्भ क दारू े क घूॉट बये , नशा चढ़ा। बूख बी खरी। भन, फवद्ध, प्राण नीचे आ गमे। बूख रगी है औय खदा ने े तैमाय यख ही हदमा है तो चरो, खा रें । भल्रा ने भाॊस-अॊड-कफाफ आहद बय ऩेट खा मरमा। अॊडे े खामे तो इजन्िमाॉ उत्तेजजत हो गईं तो चरा गमा वेश्मा क कभये भें । 'वह फेचायी इन्तजाय कय यही े है । ककसी क भन को खश कयना मह बी तो ऩण्मकभद है ।' भन कसा फेवकप फना दे ता है इन्सान े ै ू को? भल्रा वेश्मा क कभये भें गमा। सफह होते-होते उसका सत्त्व खत्भ हो गमा, शयीय भें फर े का फयी तयह ह्रास हो गमा। भल्रा का चचत्त नरानन से बय गमा। 'हाम ! मह भैंने क्मा कय मरमा? दारू बी ऩी मरमा, अबक्ष्म बोजन बी खा मरमा औय वेश्मा क साथ कारा भॉह बी कय े मरमा। भैं धामभदक भल्रा ! ऩाॉच फाय नभाज ऩढ़नेवारा ! औय मह भैंने क्मा ककमा ? रोगों को क्मा भॉह हदखाऊगा ?' ॉ हीन बाव से भल्रा आक्रान्त हो गमा औय चौथे कभये भें जाकय पाॉसी खाकय भय गमा। ऩतन की शरुआत कहाॉ से हई ? 'जया-सा मह ऩी रें।' फस 'जया-सा.... जया-सा...' कयते-कयते भन कहाॉ ऩहॉचाता है ! जया-सा मरहाज कयते हो तो भन चढ़ फैठता है । दजदन को जया सी उॉ गरी ऩकडने दे ते हो तो वह ऩूया हाथ ऩकड रेता है । ऐसे ही जजसका भन ववकायों भें उरझा हआ है उसक आगे मरहाज यखा तो अऩने भन भें छऩे हए ववकाय बी उबय आमेंगे। अगय भन को सॊतों े क तयप, इद्श क तयप, सेवकों क तयप, सेवाकामों क तयप थोडा-सा फढ़ामा तो औय सेवकों का े े े े सहमोग मभर जाता है । उऩासना क तयप भन फढ़ामा तो औय उऩासक मभर जाते हैं। इस भागद े भें थोडा-थोडा फढ़ते-फढ़ते भन नायामण से मभरता है औय उधय अगय भन भड जाता है तो आणखय भें असय से मभरता है ।
  • 61.
    असय से मभरताहै , तभस ् से मभरता है तो भन नीची मोननमों भें जाता है । भन अगय साधकों का सॊग कयता है , सत्सॊग कयता है , इद्श क साथ जडता है तो इद्श क अनबव से एक हो े े जाता है , अहॊ ब्रह्माजस्भ का अनबव कय रेता है । गरु का अनबव अऩना अनबव हो जाता है , श्रीकृष्ण का अनबव हो जाता है , मशवजी का अनबव अऩना अनबव हो जाता है , याभजी का अनबव अऩना अनबव हो जाता है । अन्मथा तो कपय ऩश-ऩऺी, वऺ आहद मोननमों भें बटकना ृ ऩडता है । भनष्म जीवन मभरा है । ऩयाधीनता की जॊजीयों भें जकडने वारे ववनाश की ओय चरो मा ऩयभ स्वातॊ्म क द्राय खोरने वारे ववकास की ओय उन्भक्त फनो, भयजी तम्हायी। े नायामण..... नायामण.... नायामण.... नायामण.... नायामण....। अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सत्सॊग सॊचम ऻानमोग श्री मोगवामशद्ष भहायाभामण भें 'अजनोऩदे श' नाभक सगद भें बगवान श्रीकृष्ण अजन से द द कहते हैं- "हे बायत ! जैसे दध भें घत औय जर भें यस जस्थत होता है वैसे ही सफ रोगों क रृदम ू ृ े भें तत्त्व रूऩ से जस्थत हूॉ। जैसे दध भें घत जस्थत है वैसे ही सफ ऩदाथों क बीतय भैं आत्भा ू ृ े जस्थत हूॉ। जैसे यत्नों क बीतय-फाहय प्रकाश होता है वैसे ही भैं सफ ऩदाथों क बीतय-फाहय जस्थत े े हूॉ। जैसे अनेक घटों क बीतय-फाहय एक ही आकाश जस्थत है वैसे ही भैं अनेक दे हों भें बीतय े फाहय अव्मक्त रूऩ जस्थत हूॉ।" जैसे आकाश भें सफ व्माद्ऱ है वैसे भैं चचदाकाश रूऩ भें सवदत्र व्माद्ऱ हूॉ। फन्धन औ भडक्त दोनों प्रकृनत भें होते हैं। ऩरुष को न फन्धन है न भडक्त है । जन्भ-भत्म आहद जो होता है वह सफ ृ प्रकृनत भें खेर हो यहा है । ऩानी भें कछ नहीॊ, तयॊ गों भें टकयाव है । आकाश भें कछ नहीॊ, घडों भें फनना बफगडना होता है । तभ चचदघन चैतन्म आत्भा हो। जैसे दध भें घी होता है , मभठाई भें मभठाश होती है , ू नतरों भें तेर होता है ऐसे ही चैतन्म सवदत्र व्माद्ऱ होता है , सफभें ओतप्रोत है । नतरों भें से तेर ननकार दो तो तेर अरग औय पोतये अरग हो जाएॉगे रेककन चैतन्म भें ऐसा नहीॊ है । जगत भें से ब्रह्म अरग ननकार रो, ऐसा नहीॊ है । नतरों भें से तो तेर ननकार रे सकता है रेककन जगत भें से ब्रह्म नहीॊ ननकर सकता।
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    जैसे जगत भेंसे आकाश नहीॊ ननकर सकता ऐसे ही आकाश भें से बी चचदाकाश नहीॊ ननकर सकता। मह चचदाकाश ही ऩयभात्भ-तत्त्व है । वही हय जीव का अऩना आऩा है रेककन जीव 'भैं' औय 'भेया' कयक इजन्िमों क याज्म भें बटक गमा है इसमरए जन्भ-भयण हो यहा है । नहीॊ तो े े जयाद-जयाद खदा है । खदा की कसभ, जयाद-जयाद खदा है । कोई उससे जदा नहीॊ है । सफ घट भेया साॉईमा खारी घट ना कोम। फमरहायी वा घट की जा घट ऩयगट होम।। कफीया कआ एक है ऩननहारय अनेक। ॉ न्माये न्माये फतदनों भें ऩानी एक का एक।। ऻानमोग भें ननद्षय होकय ऻान का ववचाय कयें । वहाॉ मरहाज नहीॊ कयना है । श्रद्धा कयें , उऩासना कयें तो अन्धा होकय श्रद्धा कयें । उऩासना भें अन्धश्रद्धा चाहहए, गहयी श्रद्धा चाहहए। श्रद्धा भें ववचाय की जरूयत नहीॊ है , अन्मथा श्रद्धा नततय-बफतय हो जामेगी। है तो ऩत्थय, है तो शामरग्राभ रेककन बगवान है । वहाॉ ववचाय भत कयो। है तो मभट्टी का वऩॊड, रेककन दृढ़ बावना यखो कक मशवमरॊग है , साऺात बगवान मशव हैं। श्रद्धा भें ववचाय को भत आने दो। हभ रोग क्मा कयते हैं? श्रद्धा भें ववचाय घसेड दे ते हैं.... ववचाय भें श्रद्धा घसेड दे ते हैं। नहीॊ...। जफ आत्भववचाय कयो तफ ननद्षय होकय कयो। 'जगत कसे फना ? ब्रह्म क्मा है ? आत्भा ै क्मा है ? भैं आत्भा कसे ?' कतक तो नहीॊ रेककन तक अवश्म कयो। 'तक्मदताभ ्... भा ै द द कतक्मदताभ ्।' ववचाय कयो तो ननद्षय होकय कयो औय श्रद्धा कयो तो बफल्कर अन्धे होकय कयो। अऩने ननद्ळम भें अडडग। चाहे कछ बी हो, सायी दननमा, सायी खदाई एक तयप हो रेककन भेया इद्श, भेया खदा, भेया बगवान अनन्म है , भेये गरु का वचन आणखयी है । ध्मानभूरॊ गयोभूदनतद् ऩूजाभूरॊ गयो् ऩदभ ्। भॊत्रभूरॊ गयोवादक्मॊ भोऺभूरॊ गयो् कृऩा।। श्रद्धा कयो तो ऐसी। ववचाय कयो तो ननद्षय होकय। श्रद्धार अगय कहे कक् 'अच्छा ! भैं सोचॉगा.... ववचाय करूगा....' तो 'भैं' फना यहे गा, कपय योता यहे गा। ू ॉ कभद कयो तो एकदभ भशीन होकय कयो। भशीन कभद कयती है , पर की इच्छा नहीॊ कयती। वह तो धभाधभ चरती है । मॊत्र की ऩतरी की तयह कभद कयो। काभ कयने भें ढीरे न फनो। झाडू रगाओ तो ऐसा रगाओ कक कहीॊ कचया यह न जाम। यसोई फनाओ तो ऐसी फनाओ कक कोई दाना पारतू न जाम, कोई नतनका बफगडे नहीॊ। कऩडा धोओ तो ऐसा धोओ कक साफन का खचद व्मथद न हो, कऩडा जल्दी न पटे कपय बी चभाचभ स्वच्छ फन जाम। कभद कयो तो ऐसे सतक होकय कयो। ऐसा कभदवीय जल्दी सपर जो जाता है । हभ रोग थोडे कभद भें , थोडे आरस्म द भें , थोडे Dull थोडे Lazy थोडे ऩरामनवादी होकय यह जाते हैं। न ही इधय क यहते हैं नहीॊ उधय े क। े कभद कयो तो फस, भशीन होकय, बफल्कर सतकता से, Up-to-date काभ कयो। द
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    प्रीनत कयो तोफस, रैरा भजनॉू की तयह। एक फाय रैरा बागी जा यही थी। सना था कक भजनॉू कहीॊ फैठा है । मभरन क मरए ऩागर े फनकय दौडी जा यही थी। यास्ते भें इभाभ चद्दय बफछाकय नभाज ऩढ़ यहा था रैरा उसकी चद्दय ऩय ऩैय यखकय दौड गई। इभाभ क्रद्ध हो गमा। उसने जाकय फादशाह को मशकामत की् "भैं खदा की फन्दगी कय यहा था.... भेयी चद्दय बफछी थी उस ऩय ऩैय यखकय वह ऩागर रडकी चरी गई। उसने खदातारा का औय खदा की फन्दगी कयने वारे इभाभ का, दोनों का अऩभान ककमा है । उसे फराकय सजा दी जाम।" इभाभ बी फादशाह का भाना हआ था। फादशाह ने रैरा को फरामा, उसे डाॉटते हए कहा् "भखद ऩागर रडकी ! इभाभ चद्दय बफछाकय खदातारा की फन्दगी कय यहा था औय तू ू उसकी चद्दय ऩय ऩैय यखकय चरी गई ? तझे सजा दे नी ऩडेगी। तूने ऐसा क्मों ककमा ?" "जहाॉऩनाह ! मे फोरते हैं तो सही फात होगी कक भैं वहाॉ ऩैय यखकय गजयी होऊगी रेककन ॉ भझे ऩता नहीॊ था। एक इन्सान क प्माय भें भझे मह नहीॊ हदखा रेककन मे इभाभ साये जहाॉ क े े भामरक खदातारा क प्माय भें ननभनन थे तो इनको भैं कसे हदख गई ? भजनॉू क प्माय भें भेये े ै े मरए साया जहाॉ गामफ हो गमा था जफकक इभाभ साये जहाॉ क भामरक खदातारा क प्माय भें े े ननभनन थे तो इनको भैं कसे हदख गई ? भजनॉू क प्माय भें भेये मरमे साया जहाॉ गामफ हो गमा ै े था जफकक इभाभ साये जहाॉ क भामरक से मभर यहे थे कपय बी उन्होंने भझे कसे दे ख मरमा ?" े ै फादशाह ने कहा् "रैरा ! तेयी भजनॉू भें प्रीनत सच्ची औय इभाभ की फन्दगी कच्ची। जा तू भौज कय।" श्रद्धा कयो तो ऐसी दृढ़ श्रद्धा कयो। ववद्वासो परदामक्। आत्भववचाय कयो तो बफल्कर ननद्षय होकय कयो। उऩासना कयो तो असीभ श्रद्धा से कयो। कभद कयो तो फडी तत्ऩयता से कयो, भशीन की तयह बफल्कर व्मवजस्थत औय पराकाॊऺा से यहहय होकय कयो। बगवान से प्रेभ कयो तो फस, ऩागर रैरा की तयह कयो, भीया की तयह कयो, गौयाॊग की तयह कयो। गौयाॊग की तयह कीतदन कयने वारे आनॊहदत हो जाते हैं। तभने अऩनी गाडी का एक ऩहहमा ऑकपस भें यख हदमा है , दसया ऩहहमा गोदाभ भें यखा है । तीसया ऩहहमा ऩॊक्चयवारे क ू े ऩास ऩडा है । स्टीमरयॊग व्हीर घय भें यख हदमा है । इॊजजन गेयेज भें ऩडा है । अफ फताओ, तम्हायी गाडी कसी चरेगी? ै ऐसे ही तभने अऩनी जीवन-गाडी का एक ऩजाद शत्र क घय यखा है , एक ऩजाद मभत्र क घय े े यखा है , दो ऩजे पारतू जगह ऩय यखे हैं। तो मह गाडी कसी चरेगी मह सोच रो। हदर का थोडा ै हहस्सा ऩरयचचतों भें , मभत्रों भें बफखेय हदमा, थोडा हहस्सा शत्रओॊ, ववयोचधमों क चचन्तन भें रगा े हदमा, थोडा हहस्सा ऑकपस भें ववयोचधमों क चचन्तन भें रगा हदमा, थोडा हहस्सा ऑकपस भें , े
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    दकान भें यखहदमा। फाकी हदर का जया सा हहस्सा फचा उसका बी ऩता नहीॊ कक कफ कहाॉ बटक जाम ? फताओ, उद्धाय कसे हो? ै अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ याभ क दीवाने े जजनक ऩास ऻान की शराका आ गई है , उनको योभ-योभ भें यभनेवारे याभतत्त्व का े अनबव हो जाता है । वे याभ क दीवाने हो जाते हैं। याभ क दीवाने कसे होते हैं? े े ै याभ क दीवानों को जग क सख की चाह नहीॊ। े े भसीफतों क ऩहाड टूटे भॉह से ननकरती आह नहीॊ।। े स्वाभी याभतीथद फोरते थे् "हे बगवान ! आज भसीफत बेजना बूर गमे क्मा? हभ योज ताजी भसीफत चाहते हैं। आज कोई भसीफत नहीॊ आमी? कोई प्रोब्रेभ नहीॊ आमा?" याभतीथद क मरए कई कप्रचाय परामे जाते थे, कई अपवाहें चरती थीॊ। याभ फादशाह तो े ै ॐ....ॐ....ॐ..... आनन्द.... भैं ब्रह्म हूॉ....' इस प्रकाय आत्भानॊद भें , ब्रह्मानॊद भें भस्त यहते, हॉ सते यहते, नाचते यहते। तथा कचथत समाने रोग उनकी आरोचना कयते की ऐसा कोई सॊत होता है ? उन्भाद हो गमा है उन्भाद। ऐसी चचहट्ठमाॉ बी रोग मरख दे ते थे। स्वाभी याभ कहते् "भझे सीख दे ने वारे ! भझे तो बरे उन्भाद हो गमा है रेककन तम्हें तो उन्भाद नहीॊ हआ है । जाओ, तम्हें यभणणमाॉ फराती हैं। उनक हाड भाॊस तम्हें फरा यहे हैं। जाओ, चाटो.... े चसो। भैं तो भेये याभ की भस्ती भें हूॉ। भझे तो मही उन्भाद कापी है । तभ बरे यभणणमों क ू े उन्भाद भें खशी भनाओ। रेककन सावधान ! वह उन्भाद फाफया बूत है ! हदखता है अच्छा, सन्दय, सहाना रेककन ज्मों ही आमरॊगन ककमा तयन्त सत्मानाश होगा। याभ यस क उन्भाद का े अनबव एक फाय कयक दे खो, कपय जन्भों क उन्भाद दय हो जामेंगे।" े े ू ककसी ने याभतीथद को खत मरखा कक, "आऩक ननकटवती मशष्म एन. एस. नायामण ने े सॊन्मासी क वस्त्र उताय कय ऩेन्ट कोट ऩहन मरमा, सॊन्मासी भें से गहस्थी हो गमा ऻानी का े ृ मशष्म, साध फना औय कपय गराभ फन गमा, नौकयी कयता है ! उसको जया सधायो।" याभतीथद ने जवाफ हदमा् "याभ फादशाह आऩ भें ही यभाता नहीॊ है । याभ फादशाह कोई गडरयमा नहीॊ है कक बेड-फकरयमों को सॉबारता यहे । वह अऩनी इच्छा से भेये ऩास आमा, अऩनी भयजी से साध फना, उसकी भयजी। सफ सफकी सॉबारे , याभ फादशाह अऩने आऩ भें भस्त हैं।" ऻानी को सफ सभेट रेने भें ककतनी दे य रगती है ? मशष्मों को सधायने क मरए ऩाॉच-दस े फाय ऩरयश्रभ कय मरमा, अगय वे नहीॊ सधयते तो जामें। ऻानी उऩयाभ ही जाते हैं तो घाटा उन्हीॊ भूखों को ऩडेगा। ऻानी को क्मा है ? वैसे भखों को हभ आज नहीॊ जानते रेककन स्वाभी याभतीथद ू को राखों रोग जानते हैं, कयोडों रोग जानते हैं।
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    आऩ बी कृऩाकयक याभ की भस्ती की ओय उन्भख फनें । उन सौबानमशारी साधकों क े े अनबव की ओय चमरए कक् याभ क दीवानों को जग क सख की चाह नहीॊ। े े भसीफतों क ऩहाड टूटे भॉह से ननकरती आह नहीॊ।। े अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ मभयाज का 'डडऩाटद भेन्ट' ऩर्थवी ऩय कछ आत्भ-साऺात्कायी ब्रह्मवेत्ता भहाऩरुष आ गमे। उनका दशदन ऩाकय रोग ृ खशहार हो जाते थे। उनक अभतवचन सनकय रोगों क कान ऩावन हो जाते थे। उनक उऩदे श े ृ े े का भनन कयने से भन ऩववत्र हो जाता था। उनक ऻान भें गोता भायने से फवद्ध फरवती हो जाती े थी, जीवन तेजस्वी हो जाता था। रोग ऩण्मात्भा फनते थे, सॊमतेजन्िम होते थे। सूक्ष्भ शडक्तमों का ववकास कयते थे। वे रोग तो तय जाते थे रेककन उनक ऩूवज बी जहाॉ जाते थे वहाॉ से ऊध्वदगनत े द प्राद्ऱ कय रेते थे। नयक भें ऩडे हए रोग अऩने इन सऩात्र सॊतानों क ऩण्मफर से नयक की े मातनाओॊ से छटकय स्वगद भें चरे जाते थे। नयक खारी होने रगा। नमे रोग नयक भें आते नहीॊ ू औय ऩयाने छटकय चरे जाते। नयक का कायोफाय ठप्ऩ हो गमा। ू मभयाज चचजन्तत हो उठे कक भेये 'डडऩाटद भेन्ट' भें कोई काभ नहीॊ यहा ! सफ फेकाय हो गमे ! अऩना डडऩाटद भेन्ट धभाधभ चरता है तो आदभी खशहार यहता है । 'डडऩाटद भेन्ट' फन्द होने रगे तो चचन्ता आ घेयती है । मभयाज ऩहॉ चे ब्रह्माजी क ऩास। हाथ जोडकय प्राथदना की् े "ब्रह्मण ! भेये नयक भें कोई ऩाऩी अफ आते नहीॊ औय ऩयाने ऩाऩी जो फन्द थे उनक ऩत्र- े ऩरयवायवारे भत्मरोक भें ब्रह्मऻाननमों का सत्सॊग सनकय इतने ऩण्मात्भा हो जाते हैं कक उनक मे ृ े ऩूवज बी ऩण्मप्रताऩ से नयक छोडकय स्वगद भें चरे जाते हैं। भेया डडऩाटद भेन्ट खतये भें है । कृऩा द कयक आऩ कछ उऩाम फताइमे। कभ-से-कभ भेया ववबाग तो चरता यहे ।" े ब्रह्माजी ने ऩद्मासन फाॉधा। कभण्डर से ऩानी रेकय जहाॉ से मोगेद्वयों का मोग मसद्ध होता है , जजसभें मशवजी यभण कयते हैं , जजसभें बगवान नायामण ववश्राभ ऩाते हैं, जजसभें ऻानेद्वय भहायाज प्रनतवद्षत होते थे, जजसभें औय ब्रह्मवेत्ता, ऻानी सत्ऩरुष ववयाजभान हैं उसी आत्भ- ऩयभात्भदे व भें जस्थत होकय सॊकल्ऩ ककमा कक् "जफ-जफ ऩर्थवी रोक भें कोई ब्रह्मऻानी जाएॉगे। ृ तफ-तफ कोई न कोई ननन्दक रोग ऩैदा हआ कयें गे। मे ननन्दक रोग तो डूफेंगे ही, उनकी ननन्दा सनकय बी रोग डूफेंगे। मे सफ रोग तम्हाये ऩास नयक भें आमेंगे। तम्हाया डडऩाटद भेन्ट चरता यहे गा।"
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    तफ से रेकयआज तक मभयाज का डडऩाटद भेन्ट फन्द नहीॊ हआ फजल्क फढ़ता ही चरा गमा। वमशद्षजी भहायाज फोरते हैं- "हे याभजी ! भैं फाजाय से गजयता हूॉ तो भूखद रोग भेये मरमे क्मा-क्मा फकवास कयते हैं, मह भैं जानता हूॉ।" कफीयजी क मरए रोग फोरते थे। ऋवष दमानॊद को रोगों ने फाईस फाय जहय हदमा। े वववेकानन्द क मरए रोग फकते थे, याभकृष्ण क मरए रोग फकते थे, याभतीथद क मरए रोग े े े फकते थे, भहभद क बी ववयोधी थे। े ब्रह्म ऩयभात्भा चाहे याभ होकय आ जामें चाहे श्रीकृष्ण होकय आ जामें चाहे जगदगरु शॊकयाचामद होकय आ जामें कपय बी ननन्दक तो मभरते ही हैं , क्मोंकक मभयाज का डडऩाटद भेन्ट चारू यखना है । उस डडऩाटद भेन्ट भें जो अऩने कटम्फ-ऩरयवाय को बेजना चाहता है वह जरूय सॊतों की ननन्दा कये , बगवान, बक्त औय साधकों क ववयोध भें यहे । े श्रीकृष्ण क जभाने भें , श्रीयाभ क जभाने भें वह डडऩाटद भेन्ट चारू यहा था तो अफ क्मा े े फन्द गमा होगा ? अबी तो करजग है । वह डडऩाटद भेन्ट फहत फडा फन गमा होगा। ज्मादा रोग यह सक ऐसी व्मवस्था हई होगी। ें नायामण.... नायामण..... नायामण.... नायामण..... नायामण....। जफ वमशद्ष जी को रोगों ने नहीॊ छोडा, कफीय औय नानक को नहीॊ छोडा, श्रीयाभ औय श्रीकृष्ण को नहीॊ छोडा तो जफ तम्हायी ननन्दा कये तो तभ घफयाओ नहीॊ। मसकडो भत। कोई ननन्दा कये तो बगवान का भागद भत छोडो। कोई स्तनत कये तो परो भत, ननन्दा कये तो ू भयझाओ भत। सॊसाय इजन्िमों का धोखा है । ननन्दा स्तनत आने जाने वारी चीज है । तभ रगे यहो अऩने रक्ष्म को मसद्ध कयने भें । अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सदगरु-भहहभा गरुबफन बवननचध तयहहॊ न कोई। चाहे ववयॊ चच शॊकय सभ होई।। ब्रह्माजी जैसा सवद्श सजदन का साभर्थमद हो, शॊकयजी जैसा प्ररम कयने का साभर्थमद हो कपय ृ बी जफ तक सदगरु तत्त्व की कृऩा नहीॊ होती तफ तक आवयण बॊग नहीॊ होता, आत्भ-साऺात्काय नहीॊ होता। हदर भें छऩा हआ हदरफय कयोडों मगों से है , अबी बी है कपय बी हदखता नहीॊ। आदभी अऩने को आॉखवारा सभझता है । वास्तव भें वह आॉख है ही नहीॊ। फाहय की आॉख चभद की आॉख है । वह तम्हायी आॉख नहीॊ है , तम्हाये शयीय की आॉख है । तम्हायी आॉख अगय एक फाय खर जाम तो सख ब्रह्माजी को मभरता है , जजसभें बगवान मशव यभण कयते हैं , जजसभें आहद
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    नायामण बगवान ववष्णववश्राभ ऩाते हैं, जजसभें प्रनतवद्षत यहकय बगवान श्रीकृष्ण रीरा कयते हैं, जजसभें ब्रह्मवेत्ता सत्ऩरुष भस्त यहते हैं वह ऩयभ सख-स्वरूऩ आत्भा-ऩयभात्भा तम्हाया अऩना आऩा है । आदभी को अऩने उस हदव्म स्वरूऩ का ऩता नहीॊ औय कहता यहता है ् 'भैं सफ जानता हूॉ।' अये नादान ! चाहे सायी दननमा की जानकायी इकट्ठी कय रो रेककन अऩने आऩको नहीॊ जानते तो क्मा खाक जानते हो ? आत्भवेत्ता भहाऩरुषों क ऩास फैठकय अऩने आऩको जानने क े े मरए तत्ऩय फनो। अऩने ऻानचऺ खरवाओ। तफ ऩता चरेगा कक वास्तव भें तभ कौन हो। तबी तम्हाये मरए बवननचध तयना सॊबव होगा। अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ ढाई अऺय प्रेभ का...... एक फाय चैतन्म भहाप्रब को ववद्रानों ने घेय मरमा। ऩूछने रगे् "आऩ न्मामशास्त्र क फडे ववद्रान हो, वेदान्त क अच्छे ऻाता हो। हभ सभझ नहीॊ ऩाते कक े े इतने फडे बायी ववद्रान होने ऩय बी आऩ 'हरय फोर.... हरय फोर....' कयक सडकों ऩय नाचते हो, े फारकों जैसी चेद्शा कयते हो, हॉसते हो, खेरते हो, कदते हो !" ू चैतन्म भहाप्रब ने जवाफ हदमा् "फडा बायी ववद्रान होकय भझे फडा बायी अहॊ हो गमा था। फडा धनवान होने का बी अहॊ है औय फडा ववद्रान होने का बी अहॊ है । मह अहॊ ईद्वय से दय ू यखता है । इस अहॊ को मभटाने क मरए भैं सोचता हूॉ कक भैं कछ नहीॊ हूॉ......भेया कछ नहीॊ है । जो े कछ है सो तू है औय तेया है । ऐसा स्भयण कयते-कयते, हरय को प्माय कयते-कयते भैं जफ नाचता हूॉ, कीतदन कयता हूॉ तो भेया 'भैं' खो जाता है औय उसका भैं हो जाता है । भैं जफ उसका होता है तो शद्ध फद्ध सजच्चदानन्द होता है औय भैं जफ दे हाध्मास का होता है तो अशद्ध औय बमबीत यहता है ।" हरयकीतदन कयते-कयते गौयाॊग कबी-कबी इतने भस्त हो जाते कक उनकी ननगाह जजन ऩय ऩडती वे रोग बी भस्ती भें आ जाते थे। फारवत ् जीवन था उनका, आनन्द भें यहते थे, भस्ती रूटते थे। ववद्रान रोग फार की खार उतायने भें व्मस्त यहते थे, शास्त्रों क मसद्धान्त यटकय खोऩडी े भें बय रेते थे् 'ब्रह्म ऐसा है , भामा ऐसी है , अववद्या ऐसी है ... बगवान गोरोकवासी हैं, साकत- े धाभवासी हैं....' अये बाई ! ब्रह्म का अनबव कयने क मरए सत्त्वगण चाहहए, अॊत्कयण की े सयरता चाहहए, इजन्िमों का सॊमभ चाहहए। सॊमभ, सयरता औय सत्त्वगण क बफना कोये ववद्रान हो े गमे, अॊत्कयण से, दे हाध्मास से तादात्म्म तोडा नहीॊ तो क्मा राब ? कफीय जी ने कहा् ऩोथी ऩढ़ ऩढ़ जग भूॊआ ऩॊडडत बमा न कोई।
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    ढाई अऺय प्रेभका ऩढ़े सो ऩॊडडत होई।। अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सपरता की नीॊव एकाग्रता गजयात क बूतऩूवद श्रीभन्नायामण ववऻान जगत क फडे सप्रमसद्ध जाने भाने वैऻाननक े े आइन्सटाइन से मभरने गमे। फातों क मसरमसरे भें श्रीभन्नायामण ने आइन्सटाइन से उनकी े इतनी फहढ़मा सववकमसत मोनमता का कायण ऩूछा। जवाफ भें आइन्स्टाइन उनका हाथ ऩकडकय एक कभये भें रे गमे। वहाॉ कोई सन्दय भहॉ गा याचयरीरा नहीॊ था, सोपासेट आहद याजसी ठाठ नहीॊ था। आडम्फय की कोई चीजें नहीॊ थी। कभया बफल्कर खारी, साप-सथया था। वहाॉ कवर े एक चचत्र औय आसन था। रोग अऩने कभये को पनीचय से ऐसा बय दे ते हैं कक भानो कोई गोदाभ हो। चरने-कपयने की बी जगह नहीॊ फचती। ककसी क घय का कचया दे ख आते हैं तो अऩने घय भें बी रे आते हैं। े कमसदमाॉ, टे फर, सोपासेट, हटऩोम, डाइननॊग टे फर, नतजोयी.... न जाने क्मा क्मा यख दे ते हैं। सख क मरए घय को गोदाभ फना दे ते हैं रेककन वे ही सख क साधन द्ख रूऩ हो जाते हैं। उन्हीॊ े े साधनों की साप-सपाई भें रगे यहते हैं। हदर साप कयने क मरए जीवन मभरा था, वह पनीचय े साप कयने भें ऩूया हो जाता है । आइन्स्टाइन ने श्रीभन्नायामण को अऩने खारी कभये भें आसन औय चचत्र हदखाते हए कहा् "भेयी शडक्तमों का, सपरता का औय प्रमसवद्ध का कायण मह है । भैं योज महाॉ फैठकय एकाग्रचचत्त होता हूॉ, ध्मान कयता हूॉ।" शाॊत एकाॊत स्थान भें , ववद्यत का अवाहक हो ऐसा आसन (हो सक तो गयभ आसन) े बफछाकय फैठो। आॉख की ऩरक न चगये इस प्रकाय ककसी बी चचत्र क तयप एकटक ननहायो। आॉखों ें े से ऩानी चगये तो चगयने दो। कछ हदनों क अभ्मास से एकाग्रता आमेगी। आऩक शयीय भें एक े े प्रकाय का आबाभण्डर फनेगा। इजन्िमाॉ औय भन सॊमत होंगे। वात औय कप का प्रबाव कभ होगा। तन से दोष दय होंगे। ू दननमाबय क इराज औय औषचधमाॉ कयते यहो रेककन एकाग्रता औय सॊमभ का ऩाठ नहीॊ े ऩढ़ा तो सपर नहीॊ होगे। इराज कयने वारे डॉक्टय खद फीभाय यहते हैं फेचाये । घय छोडने से ऩहरे भेये तन भें फहत सायी फीभारयमाॉ थीॊ। ऩेट की तकरीप थी, ें अऩेण्डीक्स था, कई फाय एक्स ये पोटो ननकरवामे, ब्रड चेक कयवामा, सगय चेक कयवाई, डॉक्टयों क वहाॉ चक्कय काटे , न जाने क्मा-क्मा ककमा। जफ भझे सदगरु मभर गमे औय साधना- े
  • 69.
    भागद ऩा मरमातफ तन क साये द्ख ददद गामफ हो गमे। कपय आऩने 28 सार भें आज तक े कबी नहीॊ सना होगा कक आज फाऩू फीभाय हैं। जीवन जीने का थोडा-सा ढॊ ग आ जाम तो आदभी अऩने वैद्य हो जाता है । अन्मथा तो फाहय क हकीभ, वैद्य, डॉक्टयों क वहाॉ चक्कय काटता है ही यहता है । सराह उनकी होती है औय े े जेफ अऩनी होती है , दवाइमाॉ डारने क मरए ऩेट अऩना होता है । े भैं मह चाहता हूॉ कक भेये साधक हकीभ क माय न फनेष भेये गरुदे व कहा कयते थे् े हकीभ का माय सदा फीभाय। गाॉधी जी कहा कयते थे् "वकीर औय डॉक्टय हभाये दे श भें बरे यहें , हभ भना नहीॊ कयते। रेककन हे बगवान ! वे रोग भेये गाॉव से तो सत्रह कोस दय होने चाहहए।" ू वकीर फढ़ें गे औय डॉक्टय फढ़ें गे तो फीभारयमाॉ फढ़े गी। डॉक्टय रोग बी क्मा कयें फेचाये ! हभ रोग असॊमभी होते हैं तो फीभारयमाॉ हो जाती हैं। फडे भें फडा सॊमभ आॊतय चेतना से प्राद्ऱ होता है । एकाग्रता क द्राया आॊतय चेतना को जगाना चाहहए। े श्रीभद् आद्य शॊकयाचामद ने कहा कक सफ धभों भें श्रेद्ष धभद है इजन्िमों ओय भन का सॊमभ। ऋवष ने कहा् तऩ्ष सवेष एकाग्रता ऩयॊ तऩ्। श्री कृष्ण ने कहा् तऩजस्वभ्मोऽचधको मोगी ऻाननभ्मोऽवऩ भतोऽचधक्। कमभदभ्मद्ळाचधको मोगी तस्भाद्योगी बवाजदन।। 'मोगी तऩजस्वमों से श्रेद्ष है , शास्त्रऻाननमों से बी श्रेद्ष भाना गमा है औय सकाभ कभद कयने वारों से बी मोगी श्रेद्ष है इससे हे अजन ! तू मोगी हो।' द (गीता् 6.46) जो मोग नहीॊ कयता वह ववमोगी होता है । ववमोगी सदा द्खी यहता है । 'मोग' शब्द फडा व्माऩक है । आमवेद भें दो औषचधमों क भेर को 'मोग' कहा। सॊस्कृत क े े व्माकयण ने दो शब्दों की सॊचध को 'मोग' कहा। ऩतॊजरी भहायाज ने चचत्त की ववत्त का ननयोध ृ कयने को 'मोग' कहा। श्रीकृष्ण का मोग अनूठा है । वे कहते हैं- सभत्वॊ मोग उच्मते। जजसक जीवन भें सभता क दो ऺण आ जाम तो उसक आगे ऩचास वषद की तऩद्ळमादवारा े े े तऩस्वी बी नन्हा भन्ना रगेगा। चचत्त की सभता राने क मरए एकाग्रता फडी सहाम कयती है । े अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
  • 70.
    'गरुत्मागात ् बवेन्भृत्म्.....' याजसी औय ताभसी बक्तों को दे खकय साजत्त्वक बक्त कबी कबी हहर जाते हैं। ककसी को बी दे खकय बक्त को अऩने भागद से डगभग नहीॊ होना चाहहए। सभथद याभदास क इदद चगदद याजसी औय बोजन-बगत फहत हो गमे थे। तकायाभजी की बक्त े भण्डरी सादगी मक्त थी। तकायाभजी कहीॊ बी बजन-कीतदन कयने जाते तो कीतदन कयानेवारे गहस्थ का सीया-ऩूडी, भारभमरदा आहद नहीॊ रेते थे। सादी-सूदी योटी, तॊदय की बाजी औय छाछ। ृ ू ऩैदर चरकय जाते। घोडागाडी, ताॉगा आहद का उऩमोग नहीॊ कयते। नतनतऺ तऩस्वी का जीवन था। तकायाभजी की मशष्म-भण्डरी का एक मशष्म दे खता है कक सभथद याभदास की भण्डरी भें जो रोग जाते हैं वे अच्छे कऩडे ऩहनते हैं, सीया-ऩूडी खाते हैं, भार-भमरदा खाते हैं। कछ बी हो, सभथद याभदास मशवाजी भहायाज क गरु हैं , याजगरु हैं। उनक खाने-ऩीने का, अभन-चभन का, े े खफ भौज है । उनक मशष्मों को सभाज भें भान बी मभरता है । हभाये गरु तकायाभजी भहायाज क ू े े ऩास कछ नहीॊ है । भखभर क गद्दी-तककमे नहीॊ, खाने-ऩहनने की ठीक व्मवस्था नहीॊ। महाॉ यहकय े क्मा कयें ? ऐसा मशकामतवारा चचन्तन कयते-कयते उस मशष्म को सभथद याभदास की भण्डरी भें जाने का आकषदण हआ। ऩहॉ चा सभथद क ऩास। हाथ जोडकय प्राथदना की् े "भहायाज ! आऩ भझे अऩना मशष्म फनामें। आऩकी भण्डरी भें यहूॉगा, बजन-कीतदन आहद करूगा। आऩकी सेवा भें यहूॉगा।" ॉ सभथद जी ने ऩछा् "तू ऩहरे कहाॉ यहा था ?" ू "तकायाभजी भहायाज क वहाॉ।" मशष्म फोरा। े "तकायाभजी भहायाज से तने भॊत्र मरमा है तो भैं तझे कसे भॊत्र दॉ ू ? अगय भेया मशष्म ू ै फनना है , भेया भॊत्र रेना है तो तकायाभजी को भॊत्र औय भारा वाऩस दे आ। ऩहरे गरुभॊत्र का त्माग कय तो भैं तेया गरु फनॉ।" ू सभथदजी ने उसको सत्म सभझाने क मरए वाऩस बेज हदमा। चेरा तो खश हो गमा कक े भैं अबी तकायाभजी का त्माग कयक आता हूॉ। े गरुबडक्तमोग क शास्त्र भें आता है कक एक फाय गरु कय रेने क फाद गरु का त्माग नहीॊ े े कयना चाहहए। गरु का त्माग कयने से तो मह अच्छा है कक मशष्म ऩहरे से ही गरु न कये औय सॊसाय भें सडता यहे , बवाटवी भें बटकता यहे । एक फाय गरु कयक उनका त्माग कबी नहीॊ कयना े चाहहए। बगवान शॊकय बी गरुगीता भें कहते हैं- गरुत्मागत ् बवेन्भत्म् भॊत्रत्मागात ् दरयिता। ृ गरुभॊत्रऩरयत्मागी यौयवॊ नयक व्रजेत ्।। ॊ
  • 71.
    तकायाभ जैसे सदगरु,जजनको सत्म भें प्रीनत है , जो आत्भ-साऺात्कायी भहाऩरुष हैं, जजनका रृदम वैकण्ठ है ऐसे सदगरु का त्माग कयने की कफवद्ध आमी ? सभथदजी ने उसको सफक मसखाने का ननद्ळम ककमा। चेरा खश होता हआ तकायाभजी क ऩास ऩहॉ चा् े "भहायाज ! भझे आऩका मशष्म अफ नहीॊ यहना है ।" तकायाभजी ने कहा् "भैंने तझे मशष्म फनाने क मरए खत मरखकय फरामा ही कहाॉ था ? े तू ही अऩने आऩ आकय मशष्म फना था, बाई ! कण्ठी भैंने कहाॉ ऩहनाई है ? तने ही अऩने हाथ ू से फाॉधी है । भेये गरुदे व ने जो भॊत्र भझे हदमा था वह तझे फता हदमा। उसभें भेया कछ नहीॊ है । " "कपय बी भहायाज ! भझे मह कण्ठी नहीॊ चाहहए।" "नहीॊ चाहहए तो तोड दो।" चेरे ने खीॊचकय कण्ठी तोड दी। "अफ आऩका भॊत्र ?" "वह तो भेये गरुदे व आऩाजी चैतन्म का प्रसाद है । उसभें भेया कछ नहीॊ है ।" "भहायाज ! भझे वह नहीॊ चाहहए। भझे तो दसया गरु कयना है ।" ू "अच्छा, तो भॊत्र त्माग दे ।" "कसे त्मागॉू ?" ै "भॊत्र फोरकय ऩत्थय ऩय थक दे । भॊत्र का त्माग हो जामगा।" ू उस अबागे ने गरुभॊत्र का त्माग कयने क मरए भॊत्र फोरकय ऩत्थय ऩय थक हदमा। तफ े ू अजीफ-सी घटना घटी। ऩत्थय ऩय थकते ही वह भॊत्र उस ऩत्थय ऩय अॊककत हो गमा। ू वह गमा सभथद जी क ऩास। फोरा् "भहायाज ! भैं भॊत्र औय कण्ठी वाऩस दे आमा हूॉ। े अफ भझे अऩना मशष्म फनाओ।" "भॊत्र का त्माग ककमा उस सभम क्मा हआ था ?" "वह भॊत्र ऩत्थय ऩय अॊककत हो गमा था।" "ऐसे गरुदे व का त्माग कयक आमा जजनका भॊत्र ऩत्थय ऩय अॊककत हो जाता है ? ऩत्थय े जैसे ऩत्थय ऩय भॊत्र का प्रबाव ऩडा रेककन तझ ऩय कोई प्रबाव नहीॊ ऩडा तो कभफख्त भेये ऩास क्मा रेने आमा है ? ऩत्थय से बी गमा फीता है तो इधय तू क्मा कये गा ? रड्डू खाने क मरए े आमा है ?" "भहायाज ! वहाॉ गरु का त्माग ककमा औय महाॉ आऩने भझे रटकता यखा ?" "तेये जैसे रटकते ही यहते हैं। अफ जा, घॊटी फजाता यह। अगरे जन्भ भें फैर फन जाना, गधा फन जाना, घोडा फन जाना।" गरु का हदमा हआ भॊत्र त्मागने से आदभी दरयि हो जाता है । गरु को त्मागने से आदभी रृदम का अन्धा हो जाता है । गरु क भागददशदन क अनसाय तभ दस वषद तक चरो, आनजन्दत हो े े
  • 72.
    जाओ, कपय अगयगरु भें सन्दे ह कयो मा गरुननन्दा भें रग जाओ तो वाऩस वहीॊ ऩहॉ च जाओगे जहाॉ से शरु हए थे। दस सार की कभाई का नाश हो जाएगा। सभथद जी सना हदमा् "तेये जैसे गरुिोही को भैं मशष्म फनाऊगा ? जा बाई, जा। अऩना ॉ यास्ता नाऩ।" वह तो याभदासजी क सभझ कान ऩकडकय उठ-फैठ कयने रगा, नाक यगडने रगा। योते- े योते प्राथदना कयने रगा। तफ करुणाभूनतद स्वाभी याभदास ने कहा् "तकायाभजी उदाय आत्भा हैं। वहाॉ जा। भेयी ओय से प्राथदना कयना। कहना कक सभथद ने प्रणाभ कहे हैं। अऩनी गरती की ऺभा भाॉगना।" मशष्म अऩने गरु क ऩास वाऩस रौटा। तकायाभजी सभझ गमे कक सभथद का बेजा हआ है े तो भैं इन्काय कसे करू ? फोरे् ै ॉ "अच्छा बाई ! तू आमा था, कण्ठी मरमा था। हभने दी, तने छोडी। कपय रेने आमा है तो ू कपय दे दे ते हैं। सभथद ने बेजा है तो चरो ठीक है । सभथद की जम हो !" सॊत उदायात्भा होते हैं। ऐसे बटक हए मशष्मों को थोडा-सा सफक मसखाकय हठकाने रगा े दे ते हैं। कबी दो गरु नहीॊ हैं, एक ही हैं औय मशष्म का ऩतन होता है तो गरु सभझाते हैं। तफ उल्टी खोऩडी का मशष्म सभझता है कक भझे मशष्म फनामे यखने क मरए गरु चगडचगडाते हैं। अये े भूखद ! वे चगडचगडाते नहीॊ हैं, तेया सत्मानाश न हो जाम इसमरए तझे सभझाते हैं। जजस मशष्म भें कछ सत्त्व होता है वह कपसरते-कपसरते बी फच जाता है । जजसक जीवन े भें सत्त्व नहीॊ होता वह ककतना बी सॊसाय की चीजों से फचा हआ हदखे कपय बी उसका कोई फचाव नहीॊ होता। आणखय भें मभदत उसे घसीट रे जाते हैं। कपय वह फैर फनता है फेचाया, ऩेड ू फनता है , शूकय, ककय फनता है । न जाने ककतने-ककतने धोखे खाता है ! इसमरए कफीयजी ने ू कहा् कफीया इस सॊसाय भें फहत से कीने भीत। जजन हदर फाॉधा एक से वे सोमे ननजद्ळन्त।। एक ऩयभात्भा से जो हदर फाॉध दे ता है उसका सत्त्वगण फढ़ता है , उसक जीवन भें े अॊतयात्भा का सख आता है । वह महाॉ बी सखी यहता है औय ऩयरोक भें बी सख सख-स्वरूऩ ईद्वय भें मभर जाता है । वह तयता है, उसका कर बी तयता है , उसक ऩूवजों का बी रृदम प्रसन्न े द फनता है । तयनत शोक आत्भववत ्। ॊ वह आत्भवेत्ता होकय सॊसाय क शोक सागय से तय जाता है । े अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
  • 73.
    ऩष्ऩ-चमन भनष्म महद अऩनी वववेक शडक्त का आदय न कये , उसका सदऩमोग न कयक बोगों क े े सख को ही अऩना जीवन भान रे तो वह ऩश-ऩक्षऺमों से बी गमा-फीता है । क्मोंकक ऩश-ऩऺी आहद तो कभदपर-बोग क द्राया ऩूवकृत कभों का ऺम कयक उन्ननत की ओय फढ़ यहे हैं ककन्त े द े वववेक का आदय न कयने वारा भनष्म तो उरटा अऩने को नमे कभों से जकड यहा है , अऩने चचत्त को औय बी अशद्ध फना यहा है । अत् साधक को चाहहए कक प्राद्ऱ वववेक का आदय कयक उसक द्राया इस फात को सभझे े े कक मह भनष्म शयीय उसे ककसमरए मभरा है , इसका क्मा उऩमोग है । ववचाय कयने ऩय भारभ ू होगा कक मह साधन-धाभ है । इसभें प्राणी चचत्त शद्ध कयक अऩने ऩयभ रक्ष्म की प्रानद्ऱ कय सकता े है । भनष्म जफ सभि की ओय दे खता है तफ उसे सभि ही सभि हदखता है औय ऩीछे की ओय दे खता है तो स्थर ही स्थर नजय आता है । इसी प्रकाय सॊसाय की ओय दे खने से सॊसाय ही सॊसाय हदखेगा औय सॊसाय की ओय ऩीठ कय रेने ऩय प्रब ही प्रब हदखराई दें गे। कभद सीमभत होता है इसमरए उसका पर बी कभद क अनरूऩ सीमभत ही मभरता है । प्रब े अनन्त हैं, उनकी कृऩा बी अनन्त है अत् उनकी कृऩा से जो कछ मभरता है वह बी अनन्त मभरता है । प्रब की प्रानद्ऱ का साधन बी प्रब की कृऩा से ही मभरता है ऐसा भानकय साधक को अऩने साधन भें सदबाव यखना चाहहए। साधन भें अटर ववद्वासऩूवक सदबाव होने से ही साध्म द की प्रानद्ऱ होती है । जो साधक ककसी प्रकाय क अबाव भें दीन नहीॊ होता अथादत ् उसकी चाह नहीॊ कयता एवॊ े प्राद्ऱ वस्त मा फर का अमबभान नहीॊ कयता अथादत ् उसे अऩना नहीॊ भानता, सफ कछ अऩने प्रब को भानता है , वह सच्चा बक्त है । चाहयहहत होने से ही दीनता मभटती है । जहाॉ ककसी प्रकाय के सख का उऩबोग होता है , वहीॊ भनष्म चाह की ऩूनतद क सख भें आफद्ध हो जाता है औय ऩन् े नमी चाह उत्ऩन्न हो जाती है । उसकी दीनता का अन्त नहीॊ होता। दीनता मभटाने क मरए चाह े को मभटाओ। काभना की ननववत्त से होनेवारी जस्थनत फडी उच्च कोहट की है । उस जस्थनत भें ृ ननववदकल्ऩता आ जाती है , फवद्ध सभ हो जाती है , जजतेजन्िमता प्राद्ऱ हो जाती है । उसक प्राद्ऱ होने े ऩय भनष्म स्वमॊ 'कल्ऩतरू' हो जाता है । जजसको रोग कल्ऩतरू कहते हैं उससे तो हहत औय अहहत दोनों ही होते हैं। ऩय मह कल्ऩतरू तो ऐसा है, जजससे कबी ककसी का बी अहहत नहीॊ होता। इससे भनष्म को मोग, फोध औय प्रेभ प्राद्ऱ होता है । ककसी बी वस्त को अऩना न भानना त्माग है । त्माग से वीतयागता उत्ऩन्न होती है । याग की ननववत्त होने ऩय सफ दोष मभट जाते हैं। ृ
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    कहठनाई मा अबावको हषदऩूवक सहन कयना तऩ है । तऩ से साभर्थमद मभरता है । इस द साभर्थमद को सेवा भें रगा दे ना चाहहए। अहॊ ता औय भभता का नाश ववचाय से होता है । सत्म क फोध से सभस्त द्ख मभट जाते े हैं। सत्म क प्रेभ से अनन्त यस, ऩयभ आनन्द प्राद्ऱ होता है । अऩने को शयीय न भानने से े ननवादसना आती है औय सदा यहने वारी चचय शाॊनत मभरती है । अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ बडक्तभनत यानी यत्नावती जमऩय क ऩास आॊफेयगढ़ है । वहाॉ क याजा का नाभ था भानमसॊह। भानमसॊह का छोटा बाई े े था भाधवमसॊह। भाधवमसॊह की ऩत्नी यत्नावती। यत्नावती का स्वबाव फडा भधय था। दामसमों क साथ े बी भधय व्मवहाय कयती थी। वह ठीक से सभझती थी, भानती थी कक हभ जजससे व्मवहाय कयते हैं वह कोई भशीन नहीॊ है , भनष्म है । उसे बी साॊत्वना चाहहए, सहानबूनत चाहहए, प्माय चाहहए। अऩने भधय व्मवहाय से, भधय वाणी से, फहढ़मा आचयण से साये भहर भें आदयणीम स्थान प्राद्ऱ कय चकी थी। दामसमाॉ बी उसक प्रनत फडा आदय-बाव यखती थीॊ। े भान दे ने वारे को भान मभरता है , प्रेभ दे ने वारे को प्रेभ मभरता है । औयों को शक्कय दे ता है वह खद बी शक्कय खा ा है । त औयों को डारे चक्कय भें वह खद बी चक्कय खाता है ।। इन ननमनत क भताबफक, जो दसयों का हहत चाहता है , दसयों को स्नेह, भान, आदय, प्रेभ े ू ू दे ता है , दसये रोग बी उसका हहत चाहते हैं, स्नेह, भान, आदय, प्रेभ दे ते हैं। सफ भें छऩा हआ ू चैतन्म ऩयभात्भा उसका ऩयभ हहत कय दे ता है । यत्नावती का भधय, उदाय, नीनतऩूण, सयर औय सहानबूनत व्मवहाय दास-दामसमों क साथ द े भहर क साये ऩरयवाय जनों को सन्तद्श यखता था। जजसका व्मवहाय अनेकों को सॊतद्श कयता है े वह स्वमॊ तवद्शवान फनता है । उसक चचत्त भें बगवान का प्रसाद आ जाता है । उसक रृदम भें प्रब े े बडक्त क अॊकय पटते हैं। े ू अद्रे द्शा सवदबूतानाॊ भैत्र् करूण एव च। ननभदभो ननयहॊ काय् सभद्खसख् ऺभी।। सॊतद्श् सततॊ मोगी मतात्भा दृढ़ननद्ळम्। भय्मवऩदतभनोफवद्धमो भदबक्त् स भे वप्रम्।। 'जो ऩरुष सफ बतों भें द्रे षबाव से यहहत, स्वाथदयहहत, सफका प्रेभी औय हे तयहहत दमार है ू तथा भभता से यहहत, अहॊ काय से यहहत, सख-द्ख की प्रानद्ऱ भें सभ औय ऺभावान है अथादत ्
  • 75.
    अऩयाध कयनेवारे कोबी अबम दे ने वारा है तथा जो मोगी ननयन्तय सॊतद्श है , भन-इजन्िमों सहहत शयीय को वश भें ककमे हए हैं औय भझभें दृढ़ ननद्ळमवारा है वह भझभें अऩदण ककमे हए भन-फवद्धवारा भेया बक्त भझको वप्रम है । (गीता् 12.13,14) एक भध्म याबत्र को यत्नावती ने दे खा कक अऩनी ववशेष कृऩाऩात्र दासी अऩने कभये भें फैठी आॉसू फहा यही है .... यो यही है । दास-दामसमों क सख-द्ख भें सहबागी होने वारी े वात्सल्मभमी यत्नावती ने जाकय ऩछा् ू "फहन ! क्मों यो यही है ? तझे क्मा द्ख है ? क्मा तकरीप, ऩीडा, आऩवत्त है ? ककसने तझे सतामा है ? ऩनभ की यात है .... चाॉद चभक यहा है .... औय तू यो यही है ऩगरी ? भझे फता ू भैं तेया कद्श दय कय दॉ गी।" ू ू दासी णखरणखराकय हॉ स ऩडी। फोरी् "भाता जी ! आऩक होते हए इस याजभहर भें भझे कोई द्ख नहीॊ है ।" े "द्ख नहीॊ है तो कपय भध्मयाबत्र भें यो क्मों यही है ?" "यानी साहहफा ! भैं सच कहती हूॉ। भझे कोई कद्श नहीॊ है । भै आनन्द भें हूॉ। भझे बीतय से जो भधयता मभर यही है न ! वह कसे फताऊ ? भेयी आॉखों भें तो आनन्द क आॉसू हैं। भैं ै ॉ े फहत फहत खशी भें हूॉ।" दासी क भख ऩय भधय भस्कान उबय आई। े यत्नावती को आद्ळमद हआ् "यो यही है औय फोरती है 'भैं आनन्द भें हूॉ !' आॉखों भें आॉसू औय भख ऩय भस्कान एक साथ ! कभार है !'' सॊसारयमों को हॉ सने भें बी भजा नहीॊ आता वह भजा बगवान क प्मायों को बगवान क े े ववयह भें योने भें आता है । उस आनन्द की तो फात ही ननयारी है । बोग-ववरास, खान-ऩान औय अन्म ववषमों से जो मभरता है वह तो हषद है , आनन्द नहीॊ है । बगवान की बडक्त भें जो सख है, जो आनन्द है वह कछ ननयारा ही है । यानी यत्नावती दे खकय ठगी-सी यह गई। दासी क फदन ऩय हदव्म तेज था, ओज था, ऩववत्र े भस्कान थी, प्रबबडक्त की भस्ती थी। उसक आॉसओॊ भें कछ अभत हदख यहा था। वे मशकामत क े ृ े आॉसू नहीॊ थे, ननयाशा क आॉसू नहीॊ थे, हताशा क आॉसू नहीॊ थे। वे ऐसे आॉसू थे कक एक-एक े े आॉसू ऩय ववद्वबय क सफ भोती न्मौछावय कय दो कपय फी जजसका भूल्म न चक सक ऐसे हदरफय े े क मरए आॉसू थे, प्रबप्रेभ क आॉसू थे, बगवदबडक्त क आॉसू थे। े े े यत्नावती आद्ळमदभनध होकय ऩछने रगी् ू "इन आॉसूओॊ भें तझे भजा आता है ? आॉसूओॊ को भैं द्खदामी भानती थी। अये ऩगरी ! फता तो सही, इतना आनन्द ककस फात का है ? तेये ऩास कोई बोग-ववरास नहीॊ है , ववशेष खान ऩान नहीॊ है , कपय फी तेये बीतय खशी सभाती नहीॊ। चेहये ऩय उबय आती है । क्मा फात है?"
  • 76.
    दासी ने कहा्"भाता जी! मे तो प्रब प्रेभ क आॉसू हैं, बगवद् बडक्त की भस्ती है । मह तो े ऩयभात्भा का प्रसाद है ।" "अच्छा ! बगवान की बडक्त भें इतना भजा आता है ! मह बडक्त कसे की जाती है ? भझे ै फतामेगी ?" यत्नावती की जजऻासा अफ अॊकरयत होने रगी। अफ सॊमत होकय दासी कहने रगी् "यानी साहे फा ! आऩ तो भहरों भें यहने वारी, ये शभी वस्त्र, यत्नजडडत सवणद-अरॊकाय धायण कयने वारी, सोने-चाॉदी क फतदनों भें बोजन कयने वारी भहायानी हैं..... याजा साहफ की वप्रमा हैं। े आऩको भैं क्मा फताऊ ? भैं तो आऩकी सेववका ठहयी।" ॉ "नहीॊ नहीॊ, ऐसा भत फोर फहन ! सच्ची औय कल्माणकायी फात तो फच्चों से बी री जाती है । तू सॊकोच भत कय। भझे बी तेये आनन्द भें सहबागी होने दे ।" "भहायानी ! बगवान की बडक्त कयना कोई सहज नहीॊ है । मह तो शयों का भागद है । मसय ू का सौदा कयक बडक्त का प्रसाद मभर सकता है ।" दासी ने अऩनी ओजस्वी भिा भें कहा। े यानी जानती थी कक अऩनी वप्रम दासी ऩववत्र स्वबाव की है , बक्त है , सत्त्वशीर नायी है । प्रात्कार जल्दी उठकय बफस्तय भें सवदप्रथभ ऩयभात्भा का चचन्तन कयती है , कपय हदनचमाद का प्रायॊ ब कयती है । हदन भें बी फाय-फाय दीनानाथ का स्भयण कयती है । उस दासी क मरए यत्नावती े को भान था, स्नेह था। वह उत्कहठत होकय ऩूछने रगी् ॊ "अबी-अबी तू आॉसू फहा यही थी, बाव ववबोय बी हो यही थी.... बडक्त भें कसा होता है ? ै तझे क्मा अनबव हो यहा था, भझे फता न !" "भाता जी ! जाने दो, मह फात भत ऩूछो। बगवान औय बक्त क फीच जो घटनाएॉ घटती े हैं उन्हें बगवान औय बक्त ही जानते हैं। यानी साहे फा ! ऺभा कयो। भझे आऻा कयो, भैं आऩकी सेवा भें रग जाऊ।" ॉ यत्नावती सभझ गई की दासी फात टार यही है । उसने कछ यहस्मभम अभत ऩामा है । ृ उसक फदन ऩय इतनी भधयता, इतनी शाॊनत छा गई है तो उसक अॊत्कयण भें ककतनी भधयता े े बयी होगी ! यत्नावती की जजऻासा ऩैनी हो उठी। वह कपय से प्रेभऩवक दासी को ऩूछने रगी, ू द यहस्म फताने क मरए भनाने रगी् े "फहन ! भझे फता, तझे क्मा हआ है ? तेयी आॉखों भें आॉसू हैं औय चेहये ऩय हदव्मता हदखाई दे यही है ! तू अबी क्मा कय यही थी ? तझे क्मा मभरा है ?" दासी ने हॉ सते हए कहा् "भाता जी ! भैं कछ बी नहीॊ कयती थी। भन जो ववचाय कय यहा था उसे दे खती थी। भैं अऩने चगयधय गोऩार को स्नेह कयती थी, औय कछ नहीॊ कयती थी। 'हे प्रब ! कयण-कयावणहाय तू ही चैतन्म ऩयभात्भा है ।' इस प्रकाय अऩने रृदमेद्वय क साथ गोवद्ष कय े यही थी, बाव-भाधमद का आस्वाद रे यही थी।" "सखी, भझे ववस्तायऩूवक फता।" द
  • 77.
    दासी बडक्त कीगोऩनीम फात फताने भें हहचककचाने रगी, फात टारने रगी तो यत्नावती की उत्सकता औय फढ़ गई। इन्काय बी आभॊत्रण दे ता है । यत्नावती की उत्कठा फढ़ गई। कसे बी कयक बडक्तभागद ववषमक यहस्म फताने क मरए ॊ ै े े दासी को याजी कय मरमा। दासी ने अऩनी अनबूनतमों का वणदन ककमा क्मोंकक यानी यत्नावती अचधकायी नायी थी। बगवद् बडक्त क मरए उऩमक्त सदगण उसभें थे। उसक चचत्त भें दीन-द्खी े े रोगों क मरए सहानबूनत थी, दमा-बावना थी। उसक स्वबाव भें यानी ऩद का अहॊ काय नहीॊ था। े े ऐसे सदगणों क कायण यानी को अचधकायी सभझकय दासी ने बगवद् बडक्त क यहस्म उसक आगे े े े प्रकट ककमे। यानी क चचत्त भें प्रबप्रीनत की प्रानद्ऱ क मरए तडऩ जाग उठी। वह सोचने रगी् े े "भैं कहराती हूॉ यानी रेककन भझे जो सख औय आनन्द नहीॊ मभरता वह सख औय आनन्द मह गयीफ सी दासी ऩा यही है । सख औय आनन्द अगय यानीऩद भें मा धन-वैबव भें होता तो सफ धनवान औय सत्तावान स्त्री-ऩरुष सखी औय आनजन्दत होते। सख अन्त्कयण की सॊऩवत्त है । अन्त्कयण जजतना अॊतयतभ चैतन्म भें प्रववद्श होता है उतना वह आदभी सखी यहता है । साधन एक सववधा भात्र है । सख उससे ननयारी चीज है । सववधा शयीय को मभरती है जफकक सख अॊत्कयण को मभरता है । रोग सववधा को सख भानकय अऩने को सच्चे सख से वॊचचत यख दे ते हैं। यानी को अॊत्कयण क खजाने खोरने की उत्कठा जाग उठी। बगवान की बडक्त क मरए े ॊ े चचत्त व्माकर हो उठा। दासी कहने रगी् "भाता जी ! आऩ यहने दो। मह दगदभ भागद है । इस भागद ऩय चरना कहठन है । रोग टोकगे, है यान कयें गे, भझे बी कडी नज़य से दे खेंगे। जीवन जैसे चरता है वैसे ही चरने दो। बडक्त ें क भागद ऩय प्रायॊ ब भें खफ सहना ऩडता है । हाॉ, जफ मभरता है तफ अभूल्म औय शाद्वत खजाना े ू मभरता है । उसक मरए ववषम-ववरास औय अहॊ ऩने का भूल्म चकाना ऩडता है । अहॊ का भूल्म हदमे े बफना वह अभूल्म मभरता नहीॊ है । फीज अऩने आऩका फमरदान दे दे ता है तफ वऺ फन ऩाता है । ृ सासाॊरयक भोह-भभता, ववषम बोगों का फमरदान दे ने से ऩयभात्भ-प्रीनत का द्राय खरता है । अत् यानी साहे फा ! मह गोतेखोयों का काभ है , कामयों का काभ नहीॊ है । अगय आऩ बडक्त क भागद ऩय े आमेंगी तो भहर भें भझे कछ का कछ सनना ऩडेगा।" यत्नावती ने कहा् "फहन ! तू घफयाना भत। आज से तू भेयी गरु है । तेया अनबव सनकय भझे नटवय नागय, चगरयधय गोऩार क मरए प्रीनत जागी है । चधक्काय है इस ववषम-ववरास वारे े यानी ऩद को ! हभ रोग भहरों भें यहकय ववकायी सख भें जीवन नघस डारते हैं औय तू एक झोंऩडी भें बी ननववदकायी नायामण क सख भें जीवन धन्म कय यही है । भहर बी सख का साधन े नहीॊ है औय झोंऩडा बी सख का साधन नहीॊ है । सख का सच्चा साधन तो तम्हाया वह साध्म ऩयभात्भदे व है ।"
  • 78.
    यत्नावती को बडक्तका यॊ ग रगा। दासी क सत्सॊग से उसभें सत्त्वगण फढ़ा। बडक्त जजसक े े अॊत्कयण भें हो, हदर भें हो, रृदम भें हो वह चाहे दासी क शयीय भें हो चाहे दास क शयीय भें े े हो, जडबयत जी क शयीय भें हो चाहे , शकदे व जी क शयीय भे हो, उसको हजाय-हजाय प्रणाभ है । े े बडक्तभती दासी क सत्सॊग से यानी सत्सॊगी फन गई। ये शभी वस्त्राबूषण उतायकय सूती सादे े वस्त्र ऩहन मरमे। कण्ठ भें चभकती हई भोनतमों की भारा उताय कय तरसी की भारा धायण कय री। हाथ भें यत्नजडडत कगन औय सवणद की अॉगूहठमाॉ शोबा दे यही थीॊ वे सफ उताय दीॊ। ॊ जफ बडक्त शरु होती है तफ बीतय का कल्भष दय होने रगता है । दसये बक्तों का सॊग ू ू अच्छा रगता है । आहाय-ववहाय फदर कय साजत्त्वक हो जाता है । सदगण ऩनऩने रगते हैं। व्मडक्त क चचत्त भें हदव्म चेतना का प्रबाव औय आनन्द ववकमसत होने रगता है । े यानी क अॊत्कयण भें यस-स्वरूऩ ऩयभात्भा का प्रसाद ववकमसत होने रगा। जहाॉ े ववरासबवन था वहाॉ बगवान का रीराबवन फन गमा। बगवान का नाभजऩ, साधन-बजन- कीतदन, ऩजा-ऩाठ, ऩष्ऩ-चॊदन, धऩ-दीऩ होने रगे। सायी हदनचमाद बगवान से ओतप्रोत फन गई। ू ू उसका फोरना चारना कभ हो गमा, हास्म-ववरास कभ हो गमा। इजन्िमों की चॊचरता की जो साभग्री थी वह यानी रेती नहीॊ। आवश्मकता होती उतना ही खाती, आवश्मकता होती उतना ही फोरती। उसकी वाणी भें फडा आकषदण आ गमा। जो कभ फोरता है , कवर जरूयी होता है उतना ही फोरता है उसकी वाणी भें शडक्त आती े है । जो व्मथद की फडफडाहट कयता है , दो रोग मभरें तो फोरने रग जाता है , भण्डरी फनाकय फकवास कयता यहे वह अऩनी सूक्ष्भ शडक्तमाॉ ऺीण कय दे ता है । उसकी वाणी का कोई भूल्म नहीॊ यहता। यत्नावती की वाणी भें सॊमभ का ओज प्रकट हो यहा था। स्त्री भें मह गण है । एक फाय अगय बडक्त को, ऻान को, सेवा को ठीक से ऩकड रेती है तो कपय जल्दी से छोडती नहीॊ। ऩरुष छोड दे ता है । स्त्री नहीॊ छोडती। भीया ने श्रीकृष्ण की बडक्त ऩकड री तो ऩकड री। शफयी ने भतॊग ऋवष क चयणों भें अऩना जीवन सेवा औय साधनाभम े कय मरमा। स्त्री भें ऐसे गण बी होते हैं। बम, कऩट, अऩववत्रता आहद दगण ऩरुष की अऩेऺा स्त्री द शयीय भें ववशेष रूऩ से यहते हैं तो श्रद्धा, सभऩदण, सेवा आहद सदगण, सेवा आहद सदगण बी ऩरुष की अऩेऺा ववशेष रूऩ से यहते हैं। यत्नावती ने अऩने सदगण फढ़ामे तो दगण ऺीण हो गमे। द बडक्त कये कोई सूयभा जानत वयण कर खोम। बडक्त का भागद ऐसा है कक एक फाय थोडा-सा ककसी को मभर जाता है । उसका यॊ ग-ढॊ ग ही फदर जाता है । एक फाय उस चगरयधय गोऩार की, भाधमददाता की भधयता की थोडी सी ही झरक
  • 79.
    मभर जाम कपयमह जगत पीका ऩड जाता है । षडयस सफ पीक ऩड जाते हैं। अॊतय का यस ही े ऐसा है । यत्नावती ने बोग ववरास क बवन को हरयबडक्त का बवन फना हदमा। वह कबी नाचती है े तो कबी बडक्त यस क ऩद गाती-आराऩती है , कबी आयती कयती है , कबी भौन धायण कयती है । े चचत्त भें एक सदगण आता है तो दसयों को वह खीॊच रे आता है । जॊजीय की एक कडी ू हाथ भें आ गई तो व्मडक्त ऩूयी जॊजीय को खीॊच सकता है । यत्नावती की ऩण्माई फढ़ी तो उसे याभामण की चोऩाई चरयताथद कयने की उत्कठा अऩने ॊ आऩ जागी। प्रथभ बडक्त सॊतन कय सॊगा.....। उसने दासी से कहा् "हे दासी ! तू तो भेये मरए सॊत है ही। औय सॊत बी गाॉव भें आमे हैं। सावन का भहीना है । अगय मह यानीऩद का खटा न होता तो भैं तेये साथ आती।" ॉू कपय सोचते-सोचते यत्नावती को ववचाय आमा कक् "भैं यानी हूॉ तो भझभें क्मा यानी है ? भेया हाथ यानी है कक ऩैय यानी है ? भेया भॉह यानी है कक भस्तक यानी है ? मह यानीऩद कहाॉ घसा है ?' दासी को अऩना ववचायववभशद फताने ऩय दासी ने कहा् "यानी जी ! मह तो सन-सनकय ऩक्का ककमा है , वास्तव भें यानीऩद है ही नहीॊ।" "तफ तो भैंने इस यानीऩद को छोडा।" यत्नावती कहने रगी् "चरो, हभ सॊत-दशदन को चरें।" प्रथभ तो दासी घफडामी, कपय सहभत होकय यानी क साथ सॊतों की भण्डरी भे गई। े उस जभाने भें यानी साध-भण्डरी भें जाम तो हो गमा ऩूया। सफ ऊगरी उठाने रगे। साये ू ॉ गाॉव भें फात पर गई। ै अये बैमा ! कथा भें तो तू बगवान का है औय बगवान तेये हैं। अऩने ऩद औय प्रनतद्षा को छोड दे । रोग कहने रगे् "यानी साहे फा ! घय चरो। आऩ महाॉ कसे आमे..... क्मों आमे....?" आहद ै आहद। यानी को हआ कक मह कौन से ऩाऩ का पर है कक कथा सनने भें बी भझे तकरीप ऩड यही है ? मे ऩद-प्रनतद्षा तो कथा सनने की जगह ऩय फैठने बी नहीॊ दे ते। बडक्त कये कोई सूयभा जानत वयण कर खोम। काभी क्रोधी रारची उनसे बडक्त न होम।। काभ, क्रोध, रोब आहद ववकायों को छोडने की हहम्भत हो उसी की बडक्तरूऩी फेमर फढ़ती है ।
  • 80.
    यत्नावती ऐसी ननडयथी। उसने हहम्भत की, सच्चे रृदम से प्राथदना की कक् "हे प्रब ! भैं तो तेयी हूॉ। यानीऩद को आग रगे। भझे तो तेयी बडक्त दे ना। भैं यानी नहीॊ, तेयी बगतनी फन जाऊ ऐसा कयना।" ॉ ऩववत्र स्थान भें ककमा हआ सॊकल्ऩ जल्दी परता है । जहाॉ सत्सॊग होता हो, हरयचचाद होती हो, हरयकीतदन होता हो वहाॉ अगय शब सॊकल्ऩ ककमा जाम तो जल्दी मसद्ध होता है । अऩने ऩाऩ का प्रामजद्ळत कयक दफाया वह ऩाऩ नहीॊ कयने का ननद्ळम ककमा जाम तो जल्दी ननष्ऩाऩ हआ े जाता है । यानी की भनोकाभना परी। उसने ऐसा ननद्ळम ककमा कक अफ भैं ऐसी यहूॉगी कक रोग भझे दे खें तो उन्हें 'यानी आमी' ऐसा नहीॊ अवऩत 'बगताणी आमी' ऐसा भहसस हो। ू फाय-फाय सत्सॊग कयने से बडक्त ऩद्श होती है । साधन-बजन से सत्सॊग भें रूचच होती है । सत्सॊग कयने से साधन भें रूचच होती है । जैसे भेघ सयोवय को ऩद्श कयता है औय सयोवय भेघ को ऩद्श कयता है वैसे ही सत्सॊग साधन को ऩोसता है औय साधन सत्सॊग को ऩोसता है । यत्नावती की साधना फढ़ी। उन हदनों याजा भाधवमसॊह हदल्री भें था। यत्नावती क बडक्त े बाव की फात गाॉव भें परी तफ वजीय ने चचट्ठी मरखी की यत्नावती को बडक्त का यॊ ग रगा है । ै याजभहर छोडकय भोडों क (साधओॊ क) सॊग भे घण्टों तक फैठी यहती है । अफ आऩकी जो आऻा। े े भाधवमसॊह रारऩीरा हो गमा् 'भेयी ऩत्नी याजभहर छोडकय भोडों की भण्डरी भें !' उसका हाथ तरवाय ऩय गमा। ऩास भें उसका रडका खडा था प्रेभमसॊह। उसने कहा् "वऩता जी ! आऩ क्रोध भत कयो।" प्रेभमसॊह ऩूवजन्भ का कोई सत्ऩात्र होगा। भाॉ की बडक्त का यॊ ग रगा तो उसने बी गरे भें द तरसी की भारा ऩहन री थी। ऩत्र क गरे भें तरसी की भारा औय रराट ऩय नतरक दे खकय े भाधवमसॊह का गस्सा औय बडका। उसने जोय से डाॉटा् "जा भोडी का ! भेये साभने क्मों आमा ?" प्रेभमसॊह कहता है ् "वऩताजी ! आऩ धन्म हैं कक भेयी भाता को भोडी कह हदमा। भैं बी अफ भोडी का फेटा होकय हदखाऊगा।" ॉ वऩता क क्रोध का बी उसने अच्छा ही अथद ननकारा। भाॉ को ऩत्र मरखा कक् े "भाॉ ! तू धन्म है । तेयी कोख से भैंने जन्भ मरमा है । भेये वऩता को तेयी बडक्त का सभाचाय मभरा तो कोऩामभान हए हैं। उन्होंने भझे तम्हाये प्रनत अच्छे बाववारी फात कयते जानकय भझे तो वयदान ही दे हदमा है , 'चरा जा भोडी का ! तू बी भोडा हो जा, साधडी का साधू हो जा। भैंने तो उनकी आऻा मशयोधामद की है । भेयी भाॉ साध्वी फने औय भैं साधू फनॉू तबी भेये वऩता क वचन का ऩरन होगा। तो भाता ! भैं तेयी कोख से जन्भा हूॉ। भेये वऩता का वचन े खारी न जाम।"
  • 81.
    प्रेभमसॊह ने हदल्रीभें भाॉ को ऐसा ऩत्र मरख हदमा। भाॉ को फडा आनन्द हआ कक, 'वाह ! भेया ऩत्र साधू होता है ! धन्म है !' अफ बडक्तभती यत्नावती बी यानीऩने क थोडे फहत जो बी चचन्ह थे उन्हें छोडकय एकदभ े सादे वस्त्र से मक्त होकय ऩववत्र, तेजस्वी, ऩण्मशीरा साध्वी फन गई। आऩ कसे वस्त्र ऩहनते हो उसका बी भन ऩय प्रबाव ऩडता है । कसी ऩस्तक ऩढ़ते हो, कहाॉ ै ै यहते हो, कभये भें कसा पनीचय औय कसे चचत्र यखे हैं उसका बी भन ऩय प्रबाव ऩडता है । ै ै आऩक ववचायों क अनरूऩ सक्ष्भ ऩयभाण आऩकी ओय प्रवाहहत होते हैं। क्रोधी को क्रोधाजनन फढ़े े े ू ऐसे ऩयभाण मभरते हैं। अशाॊत को अशाॊनत फढ़े , सॊशमात्भा का सॊशम फढ़े , प्रेभी का प्रेभ फढ़े औय बक्त की बडक्त फढ़े ऐसे ही ऩयभाण औय भाहौर मभर जाता है । नायामण.... नायामण.... नायामण.... नायामण..... नायामण.....। फाई यत्नावती को ऩक्का यॊ ग रग गमा। उसने बगवान क आगे सॊकल्ऩ ककमा कक, "भेये े फेटे को 'भोडी का फेटा' कहा है तो भैं बी सच्ची बक्तानी होकय यहूॉगी। वाह भेये प्रब ! भैंने तो कवर भेये मरए ही बडक्त भाॉगी थी। तूने तो भाॉ औय फेटे, दोनों को उसक वऩता से वयदान हदरा े े हदमा। वाह भेये प्रब ! मे भेये कोई नहीॊ थे। आज तक भैं भानती थी कक भेया ऩनत है , भेया दे वय है रेककन वे अऩनी वासनाओॊ क गराभ हैं। वे भझे प्माय नहीॊ कयते थे, अऩनी इच्छा-वासनाओॊ को प्माय े कयते थे, अफ भझे ऩता चरा। भझे तो हे ववद्वनाथ ! तू ही प्माय कयता है अभय फनाने के मरए।" ऩनत औय ऩत्नी का सम्फन्ध वास्तव भें वासना की कच्ची दीवाय ऩय आधारयत है । सेठ औय नौकय का सम्फन्ध रोब औय धन की दीवाय ऩय आधारयत है । मभत्र-मभत्र का सम्फन्ध बी प्राम् ऐसा ही होता है । कोई कोई मभत्र हो उनकी फात अरग है । सॊसाय क जो-जो सम्फन्ध हैं वे े दसयों से अऩना उल्रू सीधा कयने क मरए हैं। ू े बक्त औय सॊत का सम्फन्ध, गरु औय मशष्म का सम्फन्ध ईद्वय क नाते होता है । इसमरए े मह शद्ध सम्फन्ध है , फाकी क साये सम्फन्ध स्वाथदभूरक हैं। े बगत औय जगत का कफ फना है ? बगत-जगत का ववयोध सदा से चरता आ यहा है । स्त्री को यॊ ग रग जाता है तो ऩरुष नायाज हो जाता है । ऩरुष को यॊ ग रग जाता है तो स्त्री मशकामत कयती है । तकायाभ का एक कठोय ननन्दक मशवोफा ननन्दा कयते-कयते तकायाभ क अचधक सॊऩक भें े द आमा तो उसको यॊ ग रग गमा, वह बक्त फन गमा। कई रोगों को यॊ ग रगता है रेककन ऩण्मों भें कभी होती है तो वे ननन्दक फन जाते हैं। कबी ननन्दक बी फदरकय साधक फन जाता है । ऐसा होता यहता है । इसी का नाभ सॊसाय है । मभत्र शत्र हो जाता है , शत्र मभत्र हो जाता है ।
  • 82.
    मशवोफा तकायाभजी कासाधक फन गमा तो उसकी ऩत्नी को रगा कक भेये ऩनत को इस भहायाज ने बगत फना हदमा, भैं भहायाज को दे ख रॉ ूगी। उसने उफरता हआ ऩानी तकायाभजी की ऩीठ ऩय ढोर हदमा। ऩनत को बडक्त का यॊ ग रगता है तो ऩत्नी का चचत्त उफरता है , ऩत्नी को यॊ ग रगता है तो ऩनत का चचत्त उफरता है । दोनों को यॊ ग रगता है तो दसये कटम्फी नायाज होते हैं। साये कटम्फ ू को यॊ ग रगता है तो ऩडोसी नायाज हो जाते हैं। फोरते हैं कक साया बगतडा हो गमा है । जजनको यजो-तभोगण औय ववकायों को ऩोसकय जीना है औय जजनको ईद्वयीम भस्ती भें जीना है , सत्त्वगणी होकय जीना है उन दोनों की हदशाएॉ अरग हो जाती हैं। जैसे, प्रह्लाद औय हहयण्मकमशऩ, भीया औय ववक्रभ याणा। बडक्त क भागद ऩय आदभी चरता है तो कबी-कबी ताभसी तत्त्ववारे रोग ववयोध कयते हैं े रेककन बक्त उस ववयोध क कायण बडक्त छोड नहीॊ दे ता है । े यानी यत्नावती बी सॊत-चरयत्र सन-सनकय ऩद्श हो गई थी। अऩने भागद ऩय अडडगता से आगे फढ़ यही थी। भाधवमसॊह उसी सभम वहाॉ से चरा आॉफेयगढ़ क मरए। अऩने नगय भें आमा तफ शयाफी- े कफाबफमों ने यत्नावती क फाये भें फढ़ा-चढ़ाकय सनामा। क्रोधी को क्रोध फढ़ानेवारा साभान मभर े गमा। उन्हीॊ रोगों औय भॊबत्रमों से ववचाय-ववभशद ककमा कक यानी को भत्मदण्ड हदमा जाम। भॊबत्रमों ृ ने कहा् "अऩनी ही यानी को आऩ भत्मदण्ड दें गे तो कर ऩय करॊक रगेगा औय याज्म भें योष ृ परेगा।" ै याजा ने कहा् "दसया कोई उऩाम खोजो। अफ उसका भॉह नहीॊ दे खना है । खद बी बफगडी, ू रडक को बी बफगाडा।" े बफगडे हए रोगों को बगवान क बक्त बफगडे हए हदखते हैं। वास्तव भें वे बक्त ही सधयते े हैं। सनो भेये बाईमों ! सनो भेये मभतवा ! कफीया बफगड गमो ये ... काशी भें औय कोई दारू नहीॊ ऩीता होगा ? फस, कवर कफीय ही मभर गमे दारू ऩीनेवारे े ? कफीय भाॊस खाते हैं..... कफीय वेश्मा क ऩास जाते हैं.....' कफीय तो कबी गमे बी नहीॊ होंगे े भगय बफगडे हए रोग बक्तों को ऐसे ऩये शान कयते हैं, क्मोंकक ऩयाऩूवद से कदयत का ऐसा ननमभ है । बक्त की बडक्त भजफूत कयनी हो तो ऐसा कछ चाहहए। सफने मभरकय षडमॊत्र यच हदमा् "बूखे शेय को वऩॊजये भें फन्द कयक वऩॊजया भोडी क े े भहर क द्राय ऩय यखकय दयवाजा खोर दें गे। बखा शेय भनष्म की गन्ध आते ही भोडी का े ू
  • 83.
    मशकाय कय रेगा।हभाया काॉटा दय हो जाएगा। नगय भें जाहहय कय दें गे कक नौकयों की ू असावधानी से शेय खर गमा औय दघदटना भें यानी खऩ गई। हभ ऩय करॊक नहीॊ रगेगा।' करॊककत व्मडक्त ककतना बी फचना चाहे ऩय करॊक रगे रगे औय रगे ही। ऩयभात्भा ऩयभ दमार हैं। बक्त की राज यखने भें , अबक्त को जया चभत्काय हदखाने भें बगवान ऩीछे नहीॊ यहते। शाभ का सभम था। वऩॊजया रामा गमा। वऩॊजये का दयवाजा खरा कक शेय गजदना कयता हआ यानी यत्नावती क कभये की ओय गमा। बडक्तभनत यत्नावती प्रब-भॊहदय भें ठाकयजी की भनतद क े ू े साभने बावववबोय फैठी थी। ध्मान-भनन जैसी दशा.... आॉखों भें से हषद क अश्रू फह यहे हैं। दासी े ने शेय को दे खा तो चचल्रा उठी् "भाता जी ! शेय आमा.... शेय....!!" यत्नावती ने सना, दे खा, उदगाय ननकरा् "नहीॊ नहीॊ..... मे तो नमसॊह बगवान हैं।" यानी ऩजा की थारी रेकय शेय क साभने गई। ृ ू े 'जरे ववष्ण् स्थरे ववष्ण्......' शेय क अॊतय भें बी वही चैतन्म आत्भा है । यानी को वह े मसॊह नमसॊह क रूऩ भे हदखा। उसका ऩजन ककमा। याजा क षडमॊत्रफाज नौकय रोग दे खते यहे कक ृ े ू े मह बखा शेय चऩचाऩ खडा है ! ....औय उसकी ऩूजा ! ू उनको शेय हदखता है औय यानी को ऩयभात्भा। दृवद्शये व सवद्श्। जैसी दृवद्श वैसी सवद्श। ृ ृ दासी दे ख यही है औय यत्नावती बावऩूवक शेय का ऩूजन कय यही है ् द "बगवान ! प्रह्लाद क आगे आऩ नमसॊह क रूऩ भें आमे थे। आज भेये आगे मसॊह क रूऩ भें े ृ े े आमे हो ! भेये चगयधय ! भेये चैतन्म ! आज मह दे श रेकय आमे ? आऩ तो प्राणीभात्र क आधाय े हो। हे सवादधाय ! आऩ मसॊह फने हो ?" ऐसा कहते हए यत्नावती प्रणाभ कयती है , भन-ही-भन बाव सभाचध का आस्वादन रेती है । वह बफल्कर शाॊत हो गई है । फाहय रोगों ने सोचा, यत्नावती को शेय खा गमा। शेय ने यत्नावती को तो खामा नहीॊ रेककन यत्नावती क दे हाध्मास को उस दे हातीत तत्त्व ने अऩने चयणों भें सभा मरमा। े जा को याखे साॉईमाॉ भाय न सक कोई। े फार न फाॉका कय सक चाहे जग वैयी होम।। े जजसभें सत्त्वगण फढ़ता है , बाव की दृढ़ता फढ़ती है उसक मरए शत्र ककतना बी आमोजन े कय रे, अगय उसका प्रायब्ध शेष है तो कोई उसे भाय नहीॊ सकता। महद प्रायब्ध शेष नहीॊ है तो सफ मभरकय जजरा बी नहीॊ सकते बैमा ! अत् बगवान का बक्त इन तत्त्वों से डयता नहीॊ, अऩनी बडक्त छोडता नहीॊ।
  • 84.
    शेय अफ वहाॉसे रौटा औय जो दय से दे ख यहे थे उनको स्वधाभ ऩहॉ चा हदमा। ककसी का ू नास्ता ककमा, ककसी को ऐसे ही सीधा मभऩयी ऩहॉ चामा। सफको ठीक कयक शेय वाऩस वऩॊजये भें े घस गमा। भाधवमसॊह भहर की अटायी से मह सफ दे ख यहा था। उसको रगा कक बगवान क प्रबाव े क बफना मह नहीॊ हो सकता। शेय कभये भें जाम औय यानी उसकी आयती उताये , शेय मसय े झकाकय वाऩस आवे औय नौकयों को खा जाम.... मह चभत्काय है । वास्तव भें भैंने यानी को सभझने भें बर की है । ऐसी यानी कबी गस्से भें आकय भझे कछ कह दे गी तो भेया क्मा होगा ? ू याज्म का क्मा होगा ? बोगी को चायों ओय से बम क ववचाय घेये ही यहते हैं। आऩने कई फाय कथाएॉ सनी होगी े कक ककसी भनन ने तऩस्मा की औय इन्ि का आसन हहरा। जफ-जफ हहरता है तफ-तफ इन्ि का आसन ही हहरता है , कबी बी मभयाज का आसन ऩाडा हहरा हो ऐसा सना ? कबी नहीॊ। वास्तव भें तो मभयाज का ऩाडा हहरना चाहहए। भगय जफ हहरा है तफ इन्ि का आसन ही हहरा है । जहाॉ बोगववत्त हो, रगाव हो उसका ही हदर हहरता है । जहाॉ त्माग हो, अनशासन हो वहाॉ क्मा हहरेगा ृ ? आज तक भैंने मह नहीॊ सना कक ककसी तऩस्वी भनन ने तऩस्मा की औय मभयाज का ऩाडा हहरा। मह तो सना है कक ववद्वामभत्र ने तऩ ककमा, नय-नायामण ने तऩ ककमा औय इन्ि का आसन हहरा। आऩने बी सना होगा। याजा घफडामा। ऩण्मशीर सशीर व्मडक्त का दशदन कयने से बी अॊतय भें , आॉखों भें ऩववत्रता आती है । भाधवमसॊह को रगा कक भैंने यानी क साथ अन्माम ककमा है । वह यानी क भहर भें े े गमा औय आदयऩूवक यानी को प्रणाभ कयने रगा् द "हे दे वी ! भझे ऺभा कयो।" यानी तो बाव-सभाचध भें ननभनन थी। दासी ने कहा् "यत्नावती भाॉ ! याजा साहफ प्रणाभ कय यहे हैं।" यानी ने कहा् "भझे प्रणाभ नहीॊ कयते, वे तो ठाकय जी को प्रणाभ कयते हैं।" भाधवमसॊह की दृवद्श फदर गई। दृवद्श फदर जाम तो सवद्श सखभम हो जाम। यानी तो वही ृ की वही थी। उसको द्रे षफवद्ध से दे खकय याजा का खन गयभ हो गमा था। अफ बडक्तफवद्ध से ू दे खकय याजा क रृदम भें बडक्त फढ़ी। े बक्त तो वही का वही होता है । कोई उसभें दोषफवद्ध कये तो वह ऩाऩ का बागी होता है औय आदयफवद्ध कये तो ऩण्म की प्रानद्ऱ होती है । ऩण्म फढ़ता है तो ऩयभ ऩण्मशीर ऩयभात्भा की बडक्त उसे मभरती है । अफ यानी स्वतॊत्र होकय बडक्तबाव भें सवदथा रग गई। भाधवमसॊह ने उसकी भजी के भताबफक सफ व्मवस्था फदर दी।
  • 85.
    एक हदन भाधवमसॊहअऩने फडे बाई भानमसॊह क साथ मात्रा ऩय गमा। नदी ऩाय कयना े था। नदी फाढ़ भें आमी हई थी। ऩानी का वेग फडा प्रफर था। नाव उरट-ऩरट हो यही थी। भाधवमसॊह ने भानमसॊह से कहा् "बाई ! अफ फचना भजश्कर है । भगय भैं आऩको सराह दे ता हूॉ कक आऩकी अनजवधू अथादत ् भेयी ऩत्नी बगवान की ऩयभ बक्त है । उसका ऩत्र बी बक्त है , उसकी दासी बी बक्त है । उसक नाश क मरए भैंने षडमॊत्र यचा तो बी भझे बडक्त मभरी। अफ हभ दोनों मभरकय सच्चे रृदम े े से उसे माद कयें तो हभायी सयऺा हो जामेगी, अन्मथा फेभौत भयना ऩडेगा।" बाई सहभत हो गमा। दोनों ने ऩतवाय छोड दी। सच्चे रृदम से बावऩवक बडक्तभती यानी ू द यत्नावती का स्भयण कयने रगे। भानो, उसक चचन्तन भें तल्रीन हो गमे। अनजाने भें अऩनी े अॊतयात्भा भें ऩहॉ च गमे। दै वमोग कहो, बगवान की रीरा कहो, यत्नावती की ऩण्माई कहो, कसे बी कयक फाढ़ क ै े े तपान भें टकयाती नाव आणखय ककनाये ऩहॉ च गई। भाधवमसॊह को तो यत्नावती भें श्रद्धा थी ही, अफ ू भानमसॊह को बी श्रद्धा हो गई। बोगी को अगय मोग मभरे, अबक्त को अगय बडक्त मभरे, अशाॊत को अगय ऩयभ शाॊनत दे नेवारा यास्ता मभरे तो वह भनष्म ऊचा बी उतना ही उठ सकता है , आगे फढ़ सकता है । जो ॉ यानी याजभहर भे बोग-ववरास भें , सॊसाय क कीचड भें पसी जा यही थी उसे बक्तरृदमा दासी का े ॉ सॊऩक हआ तो वह यानी स्वमॊ तो तय गई, उसका चचन्तन कयने वारे रोग बी ऩाय हो गमे। द बडक्त कये ऩातार भें प्रकट होम आकाश। दाफी ऩण दफे नहीॊ कस्तूयी सवास।। ू हरय की बडक्त, हरयऻान औय हरय क बक्तों का सॊग जजसको मभर गमा उसको सच्चा धन े मभर गमा। उसक मसवाम जो कछ मभरा वह उऩाचध है । े हरयकथा ही कथा फाकी सफ जगव्मथा। अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ साधक को ऐसा नहीॊ भानना चाहहए कक अभक वस्त, व्मडक्त, अवस्था मा ऩरयजस्थनत क न े मभरने क कायण साधना नहीॊ हो सकती है मा उस व्मडक्त ने साधना भें ववघ्न डार हदमा। उसे े तो मही भानना चाहहए कक कोई बी व्मडक्त साधना भें ववघ्न नहीॊ डार सकता। बगवान तो ववघ्न डारते नहीॊ, सफ प्रकाय से सहामता कयते हैं औय अन्म ककसी की साभर्थमद नहीॊ है । अत् भेयी दफदरता ही ववघ्न है । वास्तव भें तो साधक का ववद्वास औय प्रेभ ही साधना भें रूचच औय तत्ऩयता उत्ऩन्न कयता है । साधना क मरए फाह्य सहामता आवश्मक नहीॊ है । े
  • 86.
    साधक को चाहहएकक कयने मोनम हये क काभ को साधन सभझे। छोटे - से-छोटा जो बी काभ प्राद्ऱ हो, उसे ऩूयी मोनमता रगाकय उत्साहऩूवक, जैसे कयना चाहहए वैसे ठीक-ठीक कये । जो द काभ बगवान क नाते, बगवान की प्रसन्नता क मरए ककमे जाते हैं वे सबी काभ साधना हैं। े े अनक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ