SARDAR PATEL AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE
& HOSPITAL BALAGHAT
DEPARTMENT OF AGAD TANTRA EVAM VIDHI
VAIDYAKA
Guided by :-
• Dr. Chaitanya Baraskar
• Dr. Kanchan Gaidhani
Presented by:-
 Gunjan Kayarkar
 Rhugvedi Tundurwar
 Aarti Patle
विष क
े िेग
धात्वन्तरेषु यााः सप्त कलााः संपररकीवतितााः ।
तास्वेक
ै कामवतक्रम्य िेगं प्रक
ु रुते विषम् ।।(सु.क. 4/40)
अर्ाित् धात्वाशयान्तरमयािाा
की जो सात कलाएँ िवणित की
गयी हैं उनमें एक-एक का
आश्रय लेकर विष क
े सात
'िेग' होते हैं।
रस, रक्त, मांस, मेा आवा सात धातुएँ हैं। इनमें से प्रत्येक धातु क
े बीच में
एक-एक कला होती है। विष क्रम से इन धातुओं में प्रिेश करता है। एक
धातु से ाू सरी धातु में प्रविष्ट होने क
े क्रम में उसे इन धातुओं क
े मध्य
कलाओं से होकर गुजरना पड़ता है। इसमें क
ु छ समय लगता है। जब-
जब विष एक धातु से ाू सरी धातु में प्रविष्ट होकर उसको ाू वषत करता है,
तब-तब विष का एक िेग उठता है।
विष-िेग की परिभाषा
िेगान्ति (Vegantara)
येनान्तरेण तु कलां कालकल्पं विनवि वह।
समीरणेनोह्यमानं तिु िेगान्तरं स्मृतम्।। (सु.क. 4/41)
िायु से प्रेररत हुआ विष एक धातु से ाू सरी धातु में
प्रविष्ट होते समय धातुओं क
े मध्य स्थर्त कला को
पार करने में वजतना समय लगता है, उसे
'िेगान्तर' कहते हैं।
विवभन्न आचार्यों क
े मतानुसाि िेग ोंकी सोंख्या
आचार्यय चिक मतेन आचार्यय सुश्रुत मतेन
मनुष्ों में 8 7
पशुओं में 4 4
पवियों में 3 3
आचार्यय चिक ने िेग ोंक
े सामान्य लक्षण ोंका वनरूपण किते हुए
कहा है –
तृष्णामोहान्तहषिप्रसेकिमर्ुक्लमा ििन्त्याद्ये।
िेगे रसप्राोषाासृक्प्राोषावाद्वतीये तु।।
िैिर्ण्िभ्रमिेपर्ुमूर्च्ाि जृम्ांगवचवमवचमातमकााः।
ाुष्टवपवितािृतीये मण्डलकण्ड
ू श्वयर्ुकोठााः।।
िातावाजाितुर्े ााहर्च्द्यंगशूलमूर्च्ािद्यााः।
नीलााीनां तमसि ाशिनं पञ्चमे िेगे।।
षष्ठे वहक्का, िंगाः स्कन्धस्य तु सप्तमेऽष्टमे मरणम्।
(च.वच. 23/18-21)
मानि
प्रावणर्य ोंमें
िेग ोंक
े
सामान्य
लक्षण
(Symptoms of
Poison Vegas -
Among Human
Beings)
 प्रर्म िेग क
े लिण पहले िेग में
रस धातु की विक
ृ वत से:
• तृष्णा (thirst)
• मोह (आंवशक संज्ञाहीनता) (stupor)
• ान्तहषि (increased sensitivity of teeth)
• प्रसेक (profuse salivation)
• िमन (vomiting)
• क्लम (सुस्ती) (fatigue) आवा क
े लिण
प्रकट होते हैं।
 वद्वतीय िेग क
े लिण ाू सरे िेग में
रक्त की विक
ृ वत हो जाने से :
• शरीर में वििणिता (discoloration)
• भ्रम (vertigo)
• िेपर्ु (tremors)
• मृर्च्ा (fainting)
• जृम्ा (excessive yawning)
• सारे अंगों में चुनचुनाहर (generalized
tingling sensation)
• तमक श्वास (asthma)
 तृतीय िेग क
े लिण तीसरे िेग में
मांस धातु की विक
ृ वत से
• शरीर में मण्डल अर्ाित गोल-
गोल चकिे उिर आना
(urticaria)
• कण्ड
ू (itching)
• श्वयर्ु (swelling).
• कोठ (skin rashes) आवा
लिण प्रकट होते हैं |
 चतुर्ि िेग क
े लिण चौर्े िेग में
िातावा ाोषों क
े अवधक क
ु वपत हो
जाने क
े कारण :
• ााह (burning sensation)
• छवाि (vomiting)
• अंगों में शूल (malaise)
• मूर्च्ाि (fainting) आवा
लिण उत्पन्न होते हैं।
 पञ्चम िेग क
े लिण - पाँचिें िेग में
दृवष्टमण्डलों क
े ाू वषत हो जाने से :
• कोई िी िस्तु नील िणि (bluish colored) की
ाीखती है तर्ा
• तम:प्रिेश (black-outs) होने लगता है।
 षष्ठ िेग क
े लिण –
• छठे िेग में (मृत्युसूचक) वहक्का
(hiccups) आना प्रारम् हो जाती
हैं।
 सप्तम िेग क
े लिण –
• स्कन्धिंग (drooping
shoulders) हो जाता है।
 अष्टम िेग क
े लिण –
• प्राणी की मृत्यु (death) हो
जाती है।
 आचायि सुश्रुत अनुसार:-
मतेनथर्ािरस्योपयुक्तस्य िेगे तु प्रर्मे नृणाम्।
श्यािा वजह्वा ििेत्स्तब्धा मूर्च्ाि श्वासि जायते ।।
वद्वतीये िेपर्ुाः सााो ााहाः कण्ठरुजस्तर्ा ।
विषमामाशयप्राप्तं क
ु रुते हृवा िेानाम् ।।
तालुशोषं तृतीये तु शूलं चामाशये िृशम्।
ाुििणं हररते शूने जायेते चास्य लोचने ।।
पक्वामाशययोस्तोाो वहक्का कासोऽन्त्रक
ू जनम् ।
चतुर्े जायते िेगे वशरसिावतगौरिम् ।।
कफप्रसेको िैिर्ण्ि पिििेाि पञ्चमे ।
सििाोषप्रकोपि पक्वाधाने च िेाना ।।
षष्ठे प्रज्ञाप्रणाशि िृशं चाप्यवतसायिते ।
स्कन्धपृष्ठकटीिंगाः सवन्नरोधि सप्तमे ।।(सु.क. 2/34-39)
 प्रर्म िेग क
े लिण मनुष्ों में थर्ािर
विष की विषाक्तािथर्ा क
े 'प्रर्म िेग'
में :
• जीि श्याििणि (bluish discoloration) और
• जकड़ाहट (stiffiness) से युक्त हो जाती है|
• मूर्च्ाि (Fainting)
• श्वास (dyspnea) होते हैं।
 वद्वतीय िेग क
े लिण –
• कम्प (tremors)
• अंगों में शैवर्ल्य (laxity)
• ााह (burning sensation)
• गले में पीड़ा (throat pain)
• आमाशय में पहुँचने पर विष से
हृायप्राेश में िेाना (pain in
cardiac region) होने लगती है।
तृतीय िेग क
े लिण –
• तालुशोष (dryness of palate)
• आमाशय में तीव्र शूल (severe
abdominal pain)
• नेत्ों में वििणिता (discoloration),
हरापन (greenish discoloration तर्ा
(edema) हो जाती है।
चतुर्ि िेग क
े लिण-
 इसमें पक्वाशय और आमाशय में पहुंचने पर विष से :
• सूचीिेधित् िेाना (pricking pain)
• वहक्का (hiccup)
• कास (cough)
• आंतों में गुड़गुड़ाहट (borborgymi)
• वशर में िारीपन (heaviness of head)
 पञ्चम िेग क
े लिण –
• कफ का स्राि (secretion of mucus)
• वििणिता (pallor)
• सस्न्धशूल (arthralgia)
• सििाोषप्रकोप
• पक्वाशय में िेाना (lower abdominal pain)
 षष्ठ िेग क
े
लिण-
• बुस्िविभ्रंश
(stupor)
• तीव्र अवतसार
(profuse diarrhea)
 सप्तम िेग क
े लिण - कन्ये (shoulders), पीठ (back)
और कमर (waist) का टू टना (pain) तर्ा श्वासािरोध
(dyspnea) होते हैं।
 आचायि िाग्भट मतेन
थर्ािरस्योपयुक्तस्य िेगे पूिे प्रजायते ।
वजह्वायााः श्यािता स्तम्ो मूर्च्ाि त्ासाः क्लमो िवमाः ।।
वद्वतीये िेपर्ुाः स्वेाो ााहाः कण्ठे च िेाना ।
विषं चामाशयं प्राप्तं क
ु रुते हृवा िेानाम् ।।
तालुशोषस्तृतीये तु शूलं चामाशये िृशम्।
ाुबिले हररते शूने जायेते चास्य लोचने ।।
पक्वाशयगते तोावहध्माकासान्त्रक
ू जनम् ।
चतुर्े जायते िेगे वशरसिावतगौरिम् ।।
कफप्रसेको िैिर्ण्ि पिििेाि पञ्चमे ।
सििाोषप्रकोपि पक्वाधाने च िेाना ।।
षष्ठे संज्ञाप्रणाशि सुिृशं चावतसायिते ।
स्कन्धपृष्ठकटीिंगो ििेन्मृत्युि सप्तमे ।। (अ.हृ.उ. 35/11-16)
 प्रर्म िेग क
े लिण पहले िेग में
• जीि में कालापन (blackishness of tongue)
• स्तब्धता (अकड़न) (stiffness)
• बेहोशी (fainting)
• घबडाहर (anxiety)
• क्लम (confusion)
• िमन (vomiting) आने लगती हैं।
 वद्वतीय िेग क
े लिण
• क
ं पकपी (tremors) का होना
• पसीना (sweating)
• शरीर में जलन (burning sensation)
• गले में पोड़ा (throat pain) होना लिण
होते हैं
• जब विष आमाशय में पहुँच जाता है
cardiac region) होती है।
 तृतीय िेग क
े लिण
• तालु सूखने लगता है (dryness of palate) वजसक
े कारण
रोगी को प्यास (thirst) लगती है
• आमाशय में असा शूल (severe abdominal pain)
• आंखे ाुबिल हो जाती हैं अर्ाित् कम वाखाई ाेने लगता (loss
of visual acuity)
• नेत्गोलक हरे वाखाई ाेते हैं (greenish discoloration of
eyes) तर्ा आँखों पर सूजन (orbital edema) ही जाती
है।यवा विष का प्रिाि पार पड़ गया तो
• सुई चुिने कीसीपी (pricking pain)
• वहक्का (वहयको) (hiccups)
• काम (खाँची (cough)) तर्ा
• अंतवड़यों में गुड़गुड़हर (borborgymi) लगती है।
 चतुर्ि िेग क
े लिण इसमें :
• वशर प्राेश में अत्यन्त िारीपन (heaviness of head region) का
अनुिि होने लगता है।
 पञ्चम िेग क
े लिण –
• मुख से वनरन्तर लार का चूना (profuse
salivation)
• शरीर का विशेषकर मुखमण्डल का िणि विक
ृ त
हो जाता है (loss of complexion)
• पिो (जोड़-जोड़ों में फटने की जैसी पीड़ा का होना
(breaking pain in the joints)
• िात आवा तोनों ाोषों का प्रक
ु वपत होना
• मनाशय में पीड़ा (colic) होना ये लिण होते हैं।
 षष्ठ िेग क
े लिण इसमें
• बेहोशी (fainting)
• बार बार अवतसार (ास्त) (diarrhea) होते
हैं।
 सप्तम िेग क
े लिण –
• कन्धे (shoulders), पीठ (back) और
कवटप्राेश (waist) टू ट (severe pain/
dislocation) जाते हैं|
• रोगी मर (death) जाता है।
पशु पवक्षर्य ोंमें िेग ोंक
े सामान्य लक्षण
(Symptoms of Poison Vegas Among Animals
and Birds)
पशुओों में िेग क
े लक्षण (Symptoms of poison vegas among animals)
आचार्यय चिक मतेन(च.वच. 23/22)
सीात्याद्ये भ्रमवत च, चतुष्पाो िेपते, तताः शून्याः।
मन्दाहारो वियते श्वासेन वह चतुर्ििेगे तु ।।
• प्रर्म िेग क
े लिण - पशुओं में प्रर्म िेग में
1. शरीर में पीड़ा (malaise) होती है और 2. चक्कर (vertigo) आने लगते हैं।
 वद्वतीय िेग क
े लिण –
ाू सरे िेग में रोगी कॉपने (tremors) लगता है।
तृतीय िेग क
े लिण –
• वनस्ियता (loss of movements) और
• िोजन क
े प्रवत उाासीन (anorexia) हो जाता है।
 चतुर्ि िेग क
े लिण –
श्वास की गवत में िृस्ि (dyspnea) होकर मृत्यु (death) |
पवक्षर्य ों में िेग क
े लक्षण (Symptoms of poison vegas
among birds)
आचायि चरक मतेन
ध्यार्यवत विहगः प्रथमे िेगे, प्रभ्राम्यवत वितीर्ये तु।
स्रस्ाोंगश्च तृतीर्ये विषिेगे र्यावत पञ्चत्वम् ।। (च.वच. 23/23)
• प्रर्म िेग क
े लिण- पिी प्रर्म िेग में उवद्वग्न (restless) हो जाता है।
• वद्वतीय िेग क
े लिण - ाू सरे में पिी चक्कर (incoherent motion) लगाने लगता है।
• तृतीय िेग क
े लिण - तीसरे िेग में पिी क
े समस्त अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं (laxity of body-parts) और िह पञ्चत्व
(death) को प्राप्त हो जाता है ।
agadtantra vish ke veg  according to charaka vagbhatta and sushuruta final.pptx

agadtantra vish ke veg according to charaka vagbhatta and sushuruta final.pptx

  • 1.
    SARDAR PATEL AYURVEDICMEDICAL COLLEGE & HOSPITAL BALAGHAT DEPARTMENT OF AGAD TANTRA EVAM VIDHI VAIDYAKA Guided by :- • Dr. Chaitanya Baraskar • Dr. Kanchan Gaidhani Presented by:-  Gunjan Kayarkar  Rhugvedi Tundurwar  Aarti Patle
  • 2.
  • 3.
    धात्वन्तरेषु यााः सप्तकलााः संपररकीवतितााः । तास्वेक ै कामवतक्रम्य िेगं प्रक ु रुते विषम् ।।(सु.क. 4/40) अर्ाित् धात्वाशयान्तरमयािाा की जो सात कलाएँ िवणित की गयी हैं उनमें एक-एक का आश्रय लेकर विष क े सात 'िेग' होते हैं। रस, रक्त, मांस, मेा आवा सात धातुएँ हैं। इनमें से प्रत्येक धातु क े बीच में एक-एक कला होती है। विष क्रम से इन धातुओं में प्रिेश करता है। एक धातु से ाू सरी धातु में प्रविष्ट होने क े क्रम में उसे इन धातुओं क े मध्य कलाओं से होकर गुजरना पड़ता है। इसमें क ु छ समय लगता है। जब- जब विष एक धातु से ाू सरी धातु में प्रविष्ट होकर उसको ाू वषत करता है, तब-तब विष का एक िेग उठता है। विष-िेग की परिभाषा
  • 4.
    िेगान्ति (Vegantara) येनान्तरेण तुकलां कालकल्पं विनवि वह। समीरणेनोह्यमानं तिु िेगान्तरं स्मृतम्।। (सु.क. 4/41) िायु से प्रेररत हुआ विष एक धातु से ाू सरी धातु में प्रविष्ट होते समय धातुओं क े मध्य स्थर्त कला को पार करने में वजतना समय लगता है, उसे 'िेगान्तर' कहते हैं।
  • 5.
    विवभन्न आचार्यों क ेमतानुसाि िेग ोंकी सोंख्या आचार्यय चिक मतेन आचार्यय सुश्रुत मतेन मनुष्ों में 8 7 पशुओं में 4 4 पवियों में 3 3
  • 6.
    आचार्यय चिक नेिेग ोंक े सामान्य लक्षण ोंका वनरूपण किते हुए कहा है – तृष्णामोहान्तहषिप्रसेकिमर्ुक्लमा ििन्त्याद्ये। िेगे रसप्राोषाासृक्प्राोषावाद्वतीये तु।। िैिर्ण्िभ्रमिेपर्ुमूर्च्ाि जृम्ांगवचवमवचमातमकााः। ाुष्टवपवितािृतीये मण्डलकण्ड ू श्वयर्ुकोठााः।। िातावाजाितुर्े ााहर्च्द्यंगशूलमूर्च्ािद्यााः। नीलााीनां तमसि ाशिनं पञ्चमे िेगे।। षष्ठे वहक्का, िंगाः स्कन्धस्य तु सप्तमेऽष्टमे मरणम्। (च.वच. 23/18-21) मानि प्रावणर्य ोंमें िेग ोंक े सामान्य लक्षण (Symptoms of Poison Vegas - Among Human Beings)
  • 7.
     प्रर्म िेगक े लिण पहले िेग में रस धातु की विक ृ वत से: • तृष्णा (thirst) • मोह (आंवशक संज्ञाहीनता) (stupor) • ान्तहषि (increased sensitivity of teeth) • प्रसेक (profuse salivation) • िमन (vomiting) • क्लम (सुस्ती) (fatigue) आवा क े लिण प्रकट होते हैं।  वद्वतीय िेग क े लिण ाू सरे िेग में रक्त की विक ृ वत हो जाने से : • शरीर में वििणिता (discoloration) • भ्रम (vertigo) • िेपर्ु (tremors) • मृर्च्ा (fainting) • जृम्ा (excessive yawning) • सारे अंगों में चुनचुनाहर (generalized tingling sensation) • तमक श्वास (asthma)
  • 8.
     तृतीय िेगक े लिण तीसरे िेग में मांस धातु की विक ृ वत से • शरीर में मण्डल अर्ाित गोल- गोल चकिे उिर आना (urticaria) • कण्ड ू (itching) • श्वयर्ु (swelling). • कोठ (skin rashes) आवा लिण प्रकट होते हैं |  चतुर्ि िेग क े लिण चौर्े िेग में िातावा ाोषों क े अवधक क ु वपत हो जाने क े कारण : • ााह (burning sensation) • छवाि (vomiting) • अंगों में शूल (malaise) • मूर्च्ाि (fainting) आवा लिण उत्पन्न होते हैं।
  • 9.
     पञ्चम िेगक े लिण - पाँचिें िेग में दृवष्टमण्डलों क े ाू वषत हो जाने से : • कोई िी िस्तु नील िणि (bluish colored) की ाीखती है तर्ा • तम:प्रिेश (black-outs) होने लगता है।  षष्ठ िेग क े लिण – • छठे िेग में (मृत्युसूचक) वहक्का (hiccups) आना प्रारम् हो जाती हैं।  सप्तम िेग क े लिण – • स्कन्धिंग (drooping shoulders) हो जाता है।  अष्टम िेग क े लिण – • प्राणी की मृत्यु (death) हो जाती है।
  • 10.
     आचायि सुश्रुतअनुसार:- मतेनथर्ािरस्योपयुक्तस्य िेगे तु प्रर्मे नृणाम्। श्यािा वजह्वा ििेत्स्तब्धा मूर्च्ाि श्वासि जायते ।। वद्वतीये िेपर्ुाः सााो ााहाः कण्ठरुजस्तर्ा । विषमामाशयप्राप्तं क ु रुते हृवा िेानाम् ।। तालुशोषं तृतीये तु शूलं चामाशये िृशम्। ाुििणं हररते शूने जायेते चास्य लोचने ।। पक्वामाशययोस्तोाो वहक्का कासोऽन्त्रक ू जनम् । चतुर्े जायते िेगे वशरसिावतगौरिम् ।। कफप्रसेको िैिर्ण्ि पिििेाि पञ्चमे । सििाोषप्रकोपि पक्वाधाने च िेाना ।। षष्ठे प्रज्ञाप्रणाशि िृशं चाप्यवतसायिते । स्कन्धपृष्ठकटीिंगाः सवन्नरोधि सप्तमे ।।(सु.क. 2/34-39)
  • 11.
     प्रर्म िेगक े लिण मनुष्ों में थर्ािर विष की विषाक्तािथर्ा क े 'प्रर्म िेग' में : • जीि श्याििणि (bluish discoloration) और • जकड़ाहट (stiffiness) से युक्त हो जाती है| • मूर्च्ाि (Fainting) • श्वास (dyspnea) होते हैं।  वद्वतीय िेग क े लिण – • कम्प (tremors) • अंगों में शैवर्ल्य (laxity) • ााह (burning sensation) • गले में पीड़ा (throat pain) • आमाशय में पहुँचने पर विष से हृायप्राेश में िेाना (pain in cardiac region) होने लगती है।
  • 12.
    तृतीय िेग क ेलिण – • तालुशोष (dryness of palate) • आमाशय में तीव्र शूल (severe abdominal pain) • नेत्ों में वििणिता (discoloration), हरापन (greenish discoloration तर्ा (edema) हो जाती है। चतुर्ि िेग क े लिण-  इसमें पक्वाशय और आमाशय में पहुंचने पर विष से : • सूचीिेधित् िेाना (pricking pain) • वहक्का (hiccup) • कास (cough) • आंतों में गुड़गुड़ाहट (borborgymi) • वशर में िारीपन (heaviness of head)
  • 13.
     पञ्चम िेगक े लिण – • कफ का स्राि (secretion of mucus) • वििणिता (pallor) • सस्न्धशूल (arthralgia) • सििाोषप्रकोप • पक्वाशय में िेाना (lower abdominal pain)  षष्ठ िेग क े लिण- • बुस्िविभ्रंश (stupor) • तीव्र अवतसार (profuse diarrhea)  सप्तम िेग क े लिण - कन्ये (shoulders), पीठ (back) और कमर (waist) का टू टना (pain) तर्ा श्वासािरोध (dyspnea) होते हैं।
  • 14.
     आचायि िाग्भटमतेन थर्ािरस्योपयुक्तस्य िेगे पूिे प्रजायते । वजह्वायााः श्यािता स्तम्ो मूर्च्ाि त्ासाः क्लमो िवमाः ।। वद्वतीये िेपर्ुाः स्वेाो ााहाः कण्ठे च िेाना । विषं चामाशयं प्राप्तं क ु रुते हृवा िेानाम् ।। तालुशोषस्तृतीये तु शूलं चामाशये िृशम्। ाुबिले हररते शूने जायेते चास्य लोचने ।। पक्वाशयगते तोावहध्माकासान्त्रक ू जनम् । चतुर्े जायते िेगे वशरसिावतगौरिम् ।। कफप्रसेको िैिर्ण्ि पिििेाि पञ्चमे । सििाोषप्रकोपि पक्वाधाने च िेाना ।। षष्ठे संज्ञाप्रणाशि सुिृशं चावतसायिते । स्कन्धपृष्ठकटीिंगो ििेन्मृत्युि सप्तमे ।। (अ.हृ.उ. 35/11-16)
  • 15.
     प्रर्म िेगक े लिण पहले िेग में • जीि में कालापन (blackishness of tongue) • स्तब्धता (अकड़न) (stiffness) • बेहोशी (fainting) • घबडाहर (anxiety) • क्लम (confusion) • िमन (vomiting) आने लगती हैं।  वद्वतीय िेग क े लिण • क ं पकपी (tremors) का होना • पसीना (sweating) • शरीर में जलन (burning sensation) • गले में पोड़ा (throat pain) होना लिण होते हैं • जब विष आमाशय में पहुँच जाता है cardiac region) होती है।  तृतीय िेग क े लिण • तालु सूखने लगता है (dryness of palate) वजसक े कारण रोगी को प्यास (thirst) लगती है • आमाशय में असा शूल (severe abdominal pain) • आंखे ाुबिल हो जाती हैं अर्ाित् कम वाखाई ाेने लगता (loss of visual acuity) • नेत्गोलक हरे वाखाई ाेते हैं (greenish discoloration of eyes) तर्ा आँखों पर सूजन (orbital edema) ही जाती है।यवा विष का प्रिाि पार पड़ गया तो • सुई चुिने कीसीपी (pricking pain) • वहक्का (वहयको) (hiccups) • काम (खाँची (cough)) तर्ा • अंतवड़यों में गुड़गुड़हर (borborgymi) लगती है।
  • 16.
     चतुर्ि िेगक े लिण इसमें : • वशर प्राेश में अत्यन्त िारीपन (heaviness of head region) का अनुिि होने लगता है।  पञ्चम िेग क े लिण – • मुख से वनरन्तर लार का चूना (profuse salivation) • शरीर का विशेषकर मुखमण्डल का िणि विक ृ त हो जाता है (loss of complexion) • पिो (जोड़-जोड़ों में फटने की जैसी पीड़ा का होना (breaking pain in the joints) • िात आवा तोनों ाोषों का प्रक ु वपत होना • मनाशय में पीड़ा (colic) होना ये लिण होते हैं।  षष्ठ िेग क े लिण इसमें • बेहोशी (fainting) • बार बार अवतसार (ास्त) (diarrhea) होते हैं।  सप्तम िेग क े लिण – • कन्धे (shoulders), पीठ (back) और कवटप्राेश (waist) टू ट (severe pain/ dislocation) जाते हैं| • रोगी मर (death) जाता है।
  • 17.
    पशु पवक्षर्य ोंमेंिेग ोंक े सामान्य लक्षण (Symptoms of Poison Vegas Among Animals and Birds) पशुओों में िेग क े लक्षण (Symptoms of poison vegas among animals) आचार्यय चिक मतेन(च.वच. 23/22) सीात्याद्ये भ्रमवत च, चतुष्पाो िेपते, तताः शून्याः। मन्दाहारो वियते श्वासेन वह चतुर्ििेगे तु ।। • प्रर्म िेग क े लिण - पशुओं में प्रर्म िेग में 1. शरीर में पीड़ा (malaise) होती है और 2. चक्कर (vertigo) आने लगते हैं।
  • 18.
     वद्वतीय िेगक े लिण – ाू सरे िेग में रोगी कॉपने (tremors) लगता है। तृतीय िेग क े लिण – • वनस्ियता (loss of movements) और • िोजन क े प्रवत उाासीन (anorexia) हो जाता है।  चतुर्ि िेग क े लिण – श्वास की गवत में िृस्ि (dyspnea) होकर मृत्यु (death) |
  • 19.
    पवक्षर्य ों मेंिेग क े लक्षण (Symptoms of poison vegas among birds) आचायि चरक मतेन ध्यार्यवत विहगः प्रथमे िेगे, प्रभ्राम्यवत वितीर्ये तु। स्रस्ाोंगश्च तृतीर्ये विषिेगे र्यावत पञ्चत्वम् ।। (च.वच. 23/23) • प्रर्म िेग क े लिण- पिी प्रर्म िेग में उवद्वग्न (restless) हो जाता है। • वद्वतीय िेग क े लिण - ाू सरे में पिी चक्कर (incoherent motion) लगाने लगता है। • तृतीय िेग क े लिण - तीसरे िेग में पिी क े समस्त अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं (laxity of body-parts) और िह पञ्चत्व (death) को प्राप्त हो जाता है ।