प्रमेह
प्रस्तुत्कतता – मनीष क
ु मतर मतलवीय
Index
1.व्याधि परिचय
2. निरुक्ति
3. निदाि
4. संप्राक्ति
5. पूर्वरूप
6. लक्षण
7. भेद
8. साध्य असाध्यिा
9. उपद्रर्
संदर्ा :
चरक संहहतत - सू. स्थत. – 17
नन. स्थत. - 04
चच. स्थत. – 06
सुश्रुत संहहतत - नन. स्थत. -06
चच. स्थत. 11,12 , 13
अष्तंग हृदयम - नन. स्थत. – 10
मतधव ननदतन - 33
व्यतचध पररचय -
 प्रमेह ममथ्यत आहतर ववहतर से उत्पन्न ववक्रत त्रिदोष क
े द्वतरत होने वतले ववमिष् लक्षण समूह वतली
जह्ल व्यतचध है।
 आचतयों ने इसे महतगद मतनत है।
“ प्रकषेण प्रर्ूतं मूित्यतगं करोती यस्स्मन रोगे सत प्रमेह:”।। (मत. नन.)
मूि की मतित में वृद्चध होती है तथत मूि प्रवृवि की बहुलतत होती है
इस मलए इस व्यतचध को प्रमेह कहते हैं।
ननरुस्तत-
प्रमेह शब्द प्र उपसर्व पूर्वक ममहक्षिणे िािु से घञ् प्रत्यय कििे पि बिा है क्िसका अर्व है प्रभूि
मात्रा में वर्क्रि मूत्र का त्यार् कििा।
प्रमेह कत इनतहतस -
दक्ष प्रजतपनत क
े यज्ञ कत ववध्वंस हो जतने क
े बतद र्यर्ीत हुए प्रतणणयों में अफरततफरी
मच गई। र्गदड़ मचने, तैरने, र्तगने, क
ू दने लतंघने जैसी िरीर को पीडित करने
वतली घ्नतएं हो गयी। तत्पश्चतत उत्पन्न धततु क्षोर् को ितंत करने क
े मलए ककए
गए घृत पतन से प्रमेह की उत्पवि हो गयी।
प्रमेह क
े ननदतन
आस्यतसुखं स्वप्नसुखम दधीनन ग्रतम्यौदकतनूपरसताः पयतंमस ।
नवतन्नपतनं गुि वैक्रतम्च प्रमेह हेतु: कफकृ च्चसवाम्।। (च. चच. – 6/4)
1.सुखपूवाक गद्देदतर आसन पर बैठनत यत ियन करनत
2. दचध, ग्रतम्य, जलीय एवं अनूप मतंस कत अनतमतित में सेवन
3. अनतदुग्ध कत सेवन
4. नूतन अन्न तथत नूतन जल कत अत्यचधक सेवन
5. गुि क
े ववकतर यथत खंि ममश्री, ममठतई कत अनतसेवन
6. कफ वधाक पदतथों कत अनतसेवन
7. हदवतस्वप्न, अव्यतयतम तथत आलस्य
8. िीत, स्स्नग्ध, मधुर पदतथो कत अनतसेवन
संप्रतस्प्त
मेदश्च मतंसं च िरीरजं च तलेदम्कफोवस्स्तगतं प्रदूषय ।
करोनत मेहतन समुदीणामुषणैस्ततनेव वपिं प्रदूषय चतवप ।। (च. चच. 6/5)
सत प्रक
ु वपत स्तथतववधे िरीरे ववसपान यदत वसतमतदतय मूिवहतनन स्िोततंमस प्रनतपद्धते तदत वसतमेहम ्अमर्ननवातायनत; यदत
पुनमाज्जतनम् मूिवस्ततवकषाती तदत मज्जतमेहम्अमर्ननवातायनत; यदत तु लसीकतं मूितियेवमर्वहनन्मूिमनुबंधम्
च्योतयनत लसीकतनतबहूतवतदववक्षेपणतश्च वतयोाः खलवस्यतनतमूिप्रवृविसंग करोनत, तदत स मि इव गजाः क्षरत्यस्िं
मूिमवेगं, तं हस्स्तमेहहनतमतचक्षते; ओज: मधुरस्वर्तवमं, तद यदत रोक्ष्यतद्वतयु कषतयतत्वे नतमर्संसृज्य मूितियवमर्वहनत
तदत मधुमेहं करोनत ।। (च. नन. – 4/37)
ननदतनों क
े अत्यचधक सेवन से प्रक
ु वपत वतत, वपि तथत कफ दोष मूितिय में जत कर मूि को
दूवषत कर स्वलक्षणों वतले वततज, वपिज तथत कफज प्रमेह की उत्पवि करते हैं।
संप्राक्ति घटक –
दोष – कफ प्रधतन त्रिदोष
दूषय – रस, रतत, मतंस, मेद, मज्जत, िुक्र, वसत, अंबु,
ओज तथत लसीकत।
स्िोतस – मेदवह ,मूिवह
स्िोतस दुस्ष् – संघ और अनतप्रवृवि
स्वर्तव – चचरकतरी
अचधषठतन – बस्ती, सवा िरीर
अस्ग्न – धततु अस्ग्नमंद
सतध्य असतध्यतत – यतप्य/असतध्य
प्रमेह क
े र्ेद –
प्रमेह मुख्यत 3 प्रकतर कत होतत है :
1.कफ़ज
2. वपिज
3. वततज
प्रमेह क
े पूवारूप
स्वेदोवगंगन्धाःमिचथलतंगतत च िय्यतसनस्वप्नसुखे रनतश्च।
हृन्नेिस्जह्वतश्रवणोपदेहो घनतंगतत क
े िनखतनतवृस्ध्द।।
िीतवप्रयत्वं गलततलुिोषो मतधुयामतस्ये करपतददतह ।
र्र्ववषयते मेदगदस्य रुपं मूिेवमर्धतवस्न्त वपपीमलकतश्च ||
(च. चच.-6/13-14)
प्रमेह क
े पूवारूप -
1.अनतस्वेद
2. िरीर से ववस्िगंध आनत
3. मिचथलतंगतत
4. नेि, कतन, स्जह्वत, दताँत क
े मलों की अचधकतत
5. िीतल द्रव्यों की अचधक कतमनत
6. िरीर व मूि में चींह्यों कत लगनत
7. हस्त, पतद तथत तल में दतह
8. आलस्य
9. िरीर में र्तरीपन
10.तन्द्रत
प्रमेह क
े सतमतन्य लक्षण
“सतमतन्यम ्लक्षण तेषतम प्रर्ुत अववल मूितत”।।
 प्रचुि मात्रा में िर्ा प्रभुि मात्रा में मूत्र निर्वमि
 अवर्ल मूत्रिा
 श्र्ेि िर्ा घि मूत्र की प्रर्ृवि
 अकस्माि्मूत्र निर्वमि
 शिीि िाढ्यिा
सतध्य असतध्यतत :
1. समकक्रयत होने से कफ़ज प्रमेह सतध्य होते हैं अथतात्समतन गुण वतले मेद क
े
आश्रय होने से, कफ की प्रधतनतत से तथत दोष दूषयों की समतन
चचककत्सत से दसों कफज प्रमेह सतध्य होते हैं.
2. ववषम कक्रय होने से वपिज प्रमेह यतप्य होते हैं।
3. दोष व दूषयों की चचककत्सत ववरुद्ध होने से वतततज प्रमेह असतध्य होतत है।
4. उपद्रवों से युतत प्रमेह असतध्य होतत है।
उपद्रव :
उपद्रवतस्तु खलु प्रमेहहणतंतृषणततीसतरदतहदौबाल्यतरोचकतववपतकताः।
पूनतमतंसं वपिकतलजीद्र्धध्यतदयश्च तत्संगतद् र्वस्न्त ।।
(च. चच. – 4/42)
1.तृषणत (polydypsia)
2. अनतसतर (diarrhoea)
3. दतह (burning sensation)
4. दुबालतत (weakness)
5. अरोचक (anorexia)
6. अववपक (indigestion)
7. दुगंध (foul smell)
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  • 1.
  • 2.
    Index 1.व्याधि परिचय 2. निरुक्ति 3.निदाि 4. संप्राक्ति 5. पूर्वरूप 6. लक्षण 7. भेद 8. साध्य असाध्यिा 9. उपद्रर्
  • 3.
    संदर्ा : चरक संहहतत- सू. स्थत. – 17 नन. स्थत. - 04 चच. स्थत. – 06 सुश्रुत संहहतत - नन. स्थत. -06 चच. स्थत. 11,12 , 13 अष्तंग हृदयम - नन. स्थत. – 10 मतधव ननदतन - 33
  • 4.
    व्यतचध पररचय - प्रमेह ममथ्यत आहतर ववहतर से उत्पन्न ववक्रत त्रिदोष क े द्वतरत होने वतले ववमिष् लक्षण समूह वतली जह्ल व्यतचध है।  आचतयों ने इसे महतगद मतनत है। “ प्रकषेण प्रर्ूतं मूित्यतगं करोती यस्स्मन रोगे सत प्रमेह:”।। (मत. नन.) मूि की मतित में वृद्चध होती है तथत मूि प्रवृवि की बहुलतत होती है इस मलए इस व्यतचध को प्रमेह कहते हैं।
  • 5.
    ननरुस्तत- प्रमेह शब्द प्रउपसर्व पूर्वक ममहक्षिणे िािु से घञ् प्रत्यय कििे पि बिा है क्िसका अर्व है प्रभूि मात्रा में वर्क्रि मूत्र का त्यार् कििा। प्रमेह कत इनतहतस - दक्ष प्रजतपनत क े यज्ञ कत ववध्वंस हो जतने क े बतद र्यर्ीत हुए प्रतणणयों में अफरततफरी मच गई। र्गदड़ मचने, तैरने, र्तगने, क ू दने लतंघने जैसी िरीर को पीडित करने वतली घ्नतएं हो गयी। तत्पश्चतत उत्पन्न धततु क्षोर् को ितंत करने क े मलए ककए गए घृत पतन से प्रमेह की उत्पवि हो गयी।
  • 6.
    प्रमेह क े ननदतन आस्यतसुखंस्वप्नसुखम दधीनन ग्रतम्यौदकतनूपरसताः पयतंमस । नवतन्नपतनं गुि वैक्रतम्च प्रमेह हेतु: कफकृ च्चसवाम्।। (च. चच. – 6/4) 1.सुखपूवाक गद्देदतर आसन पर बैठनत यत ियन करनत 2. दचध, ग्रतम्य, जलीय एवं अनूप मतंस कत अनतमतित में सेवन 3. अनतदुग्ध कत सेवन 4. नूतन अन्न तथत नूतन जल कत अत्यचधक सेवन 5. गुि क े ववकतर यथत खंि ममश्री, ममठतई कत अनतसेवन 6. कफ वधाक पदतथों कत अनतसेवन 7. हदवतस्वप्न, अव्यतयतम तथत आलस्य 8. िीत, स्स्नग्ध, मधुर पदतथो कत अनतसेवन
  • 7.
    संप्रतस्प्त मेदश्च मतंसं चिरीरजं च तलेदम्कफोवस्स्तगतं प्रदूषय । करोनत मेहतन समुदीणामुषणैस्ततनेव वपिं प्रदूषय चतवप ।। (च. चच. 6/5) सत प्रक ु वपत स्तथतववधे िरीरे ववसपान यदत वसतमतदतय मूिवहतनन स्िोततंमस प्रनतपद्धते तदत वसतमेहम ्अमर्ननवातायनत; यदत पुनमाज्जतनम् मूिवस्ततवकषाती तदत मज्जतमेहम्अमर्ननवातायनत; यदत तु लसीकतं मूितियेवमर्वहनन्मूिमनुबंधम् च्योतयनत लसीकतनतबहूतवतदववक्षेपणतश्च वतयोाः खलवस्यतनतमूिप्रवृविसंग करोनत, तदत स मि इव गजाः क्षरत्यस्िं मूिमवेगं, तं हस्स्तमेहहनतमतचक्षते; ओज: मधुरस्वर्तवमं, तद यदत रोक्ष्यतद्वतयु कषतयतत्वे नतमर्संसृज्य मूितियवमर्वहनत तदत मधुमेहं करोनत ।। (च. नन. – 4/37) ननदतनों क े अत्यचधक सेवन से प्रक ु वपत वतत, वपि तथत कफ दोष मूितिय में जत कर मूि को दूवषत कर स्वलक्षणों वतले वततज, वपिज तथत कफज प्रमेह की उत्पवि करते हैं।
  • 9.
    संप्राक्ति घटक – दोष– कफ प्रधतन त्रिदोष दूषय – रस, रतत, मतंस, मेद, मज्जत, िुक्र, वसत, अंबु, ओज तथत लसीकत। स्िोतस – मेदवह ,मूिवह स्िोतस दुस्ष् – संघ और अनतप्रवृवि स्वर्तव – चचरकतरी अचधषठतन – बस्ती, सवा िरीर अस्ग्न – धततु अस्ग्नमंद सतध्य असतध्यतत – यतप्य/असतध्य
  • 10.
    प्रमेह क े र्ेद– प्रमेह मुख्यत 3 प्रकतर कत होतत है : 1.कफ़ज 2. वपिज 3. वततज
  • 13.
    प्रमेह क े पूवारूप स्वेदोवगंगन्धाःमिचथलतंगततच िय्यतसनस्वप्नसुखे रनतश्च। हृन्नेिस्जह्वतश्रवणोपदेहो घनतंगतत क े िनखतनतवृस्ध्द।। िीतवप्रयत्वं गलततलुिोषो मतधुयामतस्ये करपतददतह । र्र्ववषयते मेदगदस्य रुपं मूिेवमर्धतवस्न्त वपपीमलकतश्च || (च. चच.-6/13-14)
  • 14.
    प्रमेह क े पूवारूप- 1.अनतस्वेद 2. िरीर से ववस्िगंध आनत 3. मिचथलतंगतत 4. नेि, कतन, स्जह्वत, दताँत क े मलों की अचधकतत 5. िीतल द्रव्यों की अचधक कतमनत 6. िरीर व मूि में चींह्यों कत लगनत 7. हस्त, पतद तथत तल में दतह 8. आलस्य 9. िरीर में र्तरीपन 10.तन्द्रत
  • 15.
    प्रमेह क े सतमतन्यलक्षण “सतमतन्यम ्लक्षण तेषतम प्रर्ुत अववल मूितत”।।  प्रचुि मात्रा में िर्ा प्रभुि मात्रा में मूत्र निर्वमि  अवर्ल मूत्रिा  श्र्ेि िर्ा घि मूत्र की प्रर्ृवि  अकस्माि्मूत्र निर्वमि  शिीि िाढ्यिा
  • 16.
    सतध्य असतध्यतत : 1.समकक्रयत होने से कफ़ज प्रमेह सतध्य होते हैं अथतात्समतन गुण वतले मेद क े आश्रय होने से, कफ की प्रधतनतत से तथत दोष दूषयों की समतन चचककत्सत से दसों कफज प्रमेह सतध्य होते हैं. 2. ववषम कक्रय होने से वपिज प्रमेह यतप्य होते हैं। 3. दोष व दूषयों की चचककत्सत ववरुद्ध होने से वतततज प्रमेह असतध्य होतत है। 4. उपद्रवों से युतत प्रमेह असतध्य होतत है।
  • 17.
    उपद्रव : उपद्रवतस्तु खलुप्रमेहहणतंतृषणततीसतरदतहदौबाल्यतरोचकतववपतकताः। पूनतमतंसं वपिकतलजीद्र्धध्यतदयश्च तत्संगतद् र्वस्न्त ।। (च. चच. – 4/42) 1.तृषणत (polydypsia) 2. अनतसतर (diarrhoea) 3. दतह (burning sensation) 4. दुबालतत (weakness) 5. अरोचक (anorexia) 6. अववपक (indigestion) 7. दुगंध (foul smell)