Prof Sriram Chandra Mishra
Kayachikitsa Department
VYDS Ayurved Mahavidyalaya,
Khurja
Paribhasa (Definition)
• मूत्रकृ छ्रेण इति मूत्रस्य़ कृ छ्रेण महिा दुःखेन प्रवृतृत ुः । (Madhukosha)
Difficulty in micturition or dysuria is known as mutrakrichhra.
मूत्रकृ छ्र मूत्राघाियोश्चायं तवृतशेष (diff. diagnosis with Mutraghata )
मूत्रकृ छ्रे कृ छ्रत्वमतिशतििम ् इषि् ववबन्ध,
मूत्राघािे िु ववबन्धो बलवान, कृ छ्रत्वमल्पममति । (Madhukosha)
Nirukti (Derivation)
• 'मूत्र्यिे इति मूत्रम ् । 'मूत्रप्रस्त्रवृतणे' (च.उ.से.) घञ् (3.3.19)। (अमरकोष- रामाश्रमी 2.6.67)
'मूत्र प्रस्रवृतणे' धाि से धञ् प्रत्यय करने पर ' मूत्र ' शब्द बनिा है ।
• कृ न्िाति इति कृ च्छ्छ्रम् । 'कृ िी छेदने' (िदादद प.से.) कृ िेश्छ : क्र
ू च (उ.सू. 2.21)।
'कृ िी छेदने‘ धाि से 'रक्' प्रत्यय िथा 'छ' आदेश होने पर कृ च्छ्छ्र शब्द बनिा है;
जिसका अथथ है- शरीर में पीडा होना ।
• इस प्रकार 'मूत्र का अत्यन्ि पीडा क
े साथ तनकलना मूत्रकृ च्छ्छ्र है' । यथा मूत्रे
कृ च्छ्छ्रमत्र, इति मूत्रकृ च्छ्छ्रम ् । अमर . रामाश्रमी 2.6.56
(C. CHI. 26/27)
NIDAN
• अधधक व्यायाम
• िीक्ष्ण औषध
• रूक्ष पदाथथ
• अति मद्यपान
• िेि चलनेवृताले घोडे आदद की पीठ पर तनत्य सवृतारी करना
• िलचर पश - पक्षक्षयों क
े मांस का सेवृतन करना
• पहले ककये गये भोिन क
े बबना पचे पनुः भोिन करना
• अिीणथ होना
SAMPRAPTI
(C. CHI. 26/28)
स्वृतकारणों से प्रकतपि हए वृताि आदद दोष पृथक् - पृथक् अथवृता एक साथ (या द्वृतंद्वृति
अथवृता साजन्नपातिक) िब बजस्ि में पहुँचकर मूत्रमागथ में संकोच, दबावृत या क्षोभ आदद
उत्पन्न करिे हैं, िब मूत्रत्याग करिे समय रोगी को कष्ट होिा है और इसी पररजस्थति
को मूत्रकृ च्छ्छ्र कहिे हैं ।
SAMPRAPTI CHAKRA
स्वकारणसे त्रत्रदोष दुष्टी (अपान दुष्टी अधधक)
↓
बस्स्ि प्रवेश
↓
मूत्रमार्गमें संकोच स्रोिोरोध, क्षोभ
↓
बस्िीक
े स्थानमें शोथ मूत्रवह स्रोिसमें संर्
↓ अपान दुष्टी
मूत्रप्रवृत्तीक
े समि वेदना / कष्ट अधधक होनेपर
↓
मूत्रकृ च्छ्छ्र वाि और पुरीष का भी अवरोध
SAMPRAPTI VIGHATANA
• दोष – त्रत्रदोष (वािप्रधान)
• दूष्ि – मूत्र, उदक (जल)
• अधधष्ठान - वस्स्ि, मूत्रमार्ग
• स्त्रोिस - मूत्रवह
• स्रोिोदुस्ष्ट – संर्
• स्वभाव - आशुकारी
• साध्िासाध्ििा - साध्ि
CHARAK SUSRUTA A. HRIDAYA MADHAV
Vata Vata Vata Vata
Pitta Pitta Pitta Pitta
Kapha Kapha Kapha Kapha
Sannipata Sannipata Sannipata Sannipata
Asmari Asmari Asmari
Sarkara Sarkara Sukra
Sukra Purisha Purisha
Sonita Abhighata Shalya
BHEDA (Types)– 8 types
एषा अश्मरी मारुि मभन्न मू्तिगिः स्य़ाि शक
ग रा मूत्र पथाि् क्षरन्िी। (Dridhabala)
(C. CHI. 26/27)
Lakshana (Symptoms)
• VATA NEUROGENIC / TRAUMATIC
• PITTA ACUTE U.T.I.
• KAPHA SUBACUTE U.T.I.
• SANNIPATA ACUTE/CHRONIC U.T.I.
• ASMARI/SARKARA URINARY CALCULI
• PURISAJA CONSTIPATIONAL DYSURIA
• SUKRA STAGNATION OF SEMEN
• SONITA TRAUMATIC / U.T.I.
• सामान्ि लक्षण
कष्ट (painful) क
े साथ रुक - रुक (obstructed) कर , थोडा - थोडा (mild in quantity)
और बार - बार मूत्रत्याग (frequent urination) होिा है ।
• ववशेष लक्षण -
1. वािज मूत्रकृ च्छ्छ्र
िीव्रा रुिो वृतंक्षणबजस्िमेढे स्वृतल्पं महमूथत्रयिीह वृतािाि् । (च.धच. 26/34)
 वृतंक्षण, बजस्ि और मूत्रेजन्िय में िीव्र वृतेदना (pain in groin, bladder and phallus regions) |
 बार - बार और थोडा - थोडा मूत्रत्याग होना (frequent and scanty micturtion) |
 रोगी पीडडि प्रदेशों को मलिा या दबािा है (pressing of affected regions) ।
2. वपत्तज मूत्रकृ च्छ्छ्र
पीिं सरक्िं सरुिं सदाहं कृ च्छ्छ्रान्महमूथत्रयिीह तप ाि् ।। (च.धच. 26/34)
 मष्क, मूत्रेजन्िय िथा बजस्ि में दाह (burning sensation in phallus and bladder region) |
 बार - बार, पीला या लाल और थोडा मूत्रत्याग (frequent and scanty passage of yellowish or
reddish urine) ।
 पीडा एवृतं दाहयक्ि अत्यष्ण मूत्र (warm urination accompanied with pain and burning
sensation) ।
3. कफज मूत्रकृ च्छ्छ्र
बस्िेुः सललंगस्य गरुत्वृतशोथौ मूत्रं सतपच्छ्छं कफमूत्रकृ च्छ्छ्रे । (च.धच. 26/35)
 बजस्ि, अण्डकोष और मूत्रेजन्िय में भारीपन (heaviness in bladder , scrotum and urethral
regions) |
 बजस्ि, अण्डकोष और मूत्रेजन्िय में शोथ (Oedema over bladder, scrotum and urethra) |
 तपजच्छ्छल , जस्नग्ध , शक्लवृतणथ िथा शीि मूत्र (slimy, unctuous, whitish and cool urination)|
4. सस्न्नपािज मूत्रकृ च्छ्छ
सवृताथणण रूपाणण ि सजन्नपािाद्भवृतजन्ि िि् कृ च्छ्छ्रिमं दह कृ च्छ्छ्रम् ।। (च.धच. 26/35)
 इसमें सभी दोषों क
े लक्षण लमलिे हैं ।
 यह प्रकृ तिसमवृतायारब्ध होिा है, अि: लक्षणों में वृतैधचत्र्य नहीं ।
 मूत्रप्रवृतृत अतिकष्टमय होिी है और यह कष्टसाध्य होिा है ।
5. अमभघािज मूत्रकृ च्छ्छ्र
क्षिालभघािाि् क्षििं क्षयाद्वृता प्रकोतषिं बजस्िगि तवृतबद्धम् ।। िीव्रातिथ मूत्रेण
सहाश्मरीत्वृतमायाति िजस्मन्नतिसंधचिे च । आध्माििां तवृतन्दति गौरवृतं च बस्िेलथघत्वृतं च
तवृततनुःसृिेऽजस्मन् । (च.धच. 26/43-44)
 मूत्रवृताही स्रोिों (urinary system) में आभ्यन्िर शल्य से अथवृता बाह्य आघाि लगने से क्षि
होने पर भयंकर मूत्र कृ च्छ्छ्ररोग उत्पन्न होिा है ।
 आघाि से बजस्ि (bladder) में क्षि हो िािा है और उससे रक्ि तनकलिा है ।
 िब रक्ि वृतहाुँ िम (pool) िािा है और वृतह मूत्रमागथ से बाहर तनकलिा है, िब अतिशय पीडा
(pain) होिी है, बजस्ि फ
ू ल िािी है (distension of bladder) और उसमें भारीपन (heaviness)
मालूम पडिा है ।
 िब रक्ि बाहर तनकल िािा है, िो हलकापन (lightness) मालूम होिा है ।
 इसमें वृतािि मूत्रकृ च्छ्छ्र क
े समान लक्षण होिे हैं ।
6. शुक्रज मूत्रकृ च्छ्छ्र
रेिोऽलभघािालभहिस्य पंसुः प्रवृतिथिे यस्य ि मूत्रकृ च्छ्छ्रम ् । स्याद्वृतेदना वृतंक्षणबजस्िमेढे
िस्यातिशूलं वृतृषणातिवृतृ े ।। शक्र
े ण संरुद्धगतिप्रवृताहो मूत्रं स कृ च्छ्छ्रेण तवृतमञ्चिीह|
िमण्डयो : स्िब्धलमति ब्रवृतजन्ि रेिोऽलभघािाि् प्रवृतदजन्ि कृ च्छ्छ्रम् ।। शक्र
ं मलाश्चैवृत
पृथक् पृथग्वृता मूत्राशयस्था : प्रतिवृतारयजन्ि । िद्व्याहिं मेहनबजस्िशूलं मूत्रं सशक्र
ं
करुिे तवृतबद्धम ् ।। स्िब्धश्च शूनो भृशवृतेदनश्च िद्येि बजस्िवृतृथषणौ च िस्य ।
(च.धच. 26/40-43)
 अपने स्थान से च्छ्यि हआ शक्र िब दोषों क
े प्रकोप से मूत्रमागथ में अवृतरुद्ध हो िािा
है , िो उस समय वृतंक्षणसजन्ध (groin) , बजस्ि (bladder) िथा लशश्न (urethra) में
वृतेदना होिी है ।
 रोगी शक्रसदहि मूत्रत्याग करिा है (passage of urine mixed with semen)
 मूत्र तनकलने में बडा कष्ट होिा है (dysuria) ।
7. अश्मरीज मूत्रकृ च्छ्छ्र / शक
ग राज मूत्रकृ च्छ्छ्र
तवृतशोषयेद्बजस्िगिं सशक्र
ं मूत्रं सतप ं पवृतनुः कफ
थ वृता यदा िदाऽश्मयथपिायिे ि क्रमेण
तप ेजष्वृतवृत रोचना गोुः ।। कदम्बपष्पाकृ तिरश्मिल्या श्लक्ष्णा बत्रपट्यप्यथवृताऽतप मृद्वृती।
मूत्रस्य चेन्मागथमपैति रुदवृता मूत्रं रुिं िस्य करोति बस्िौ ।। ससेवृतनी मेहनबजस्िशूलं
तवृतशीणथधार च करोति मूत्रम् । मृद्गाति मेढ्रं स ि वृतेदनाि महुः शकृ न्मञ्चति मेहिे च
।। क्षोभाि् क्षिे मूत्रयिीह सासूक् िस्याुः सखं मेहति च व्यपायाि् । (च.धच. 26/36-39)
 अश्मरी (calculi) मूत्रमागथ में गति करिे समय बहि वृतेदना (excruciating pain) होिी है ।
 वृताय िब अश्मरी को िोड देिा है, िो उसक
े टकडे शक
थ रा (gravels ) कहलािे हैं ।
 िब यह शक
थ रा मूत्रमागथ (urinary passage) से बाहर तनकलिी है, िो उसकी गतिशीलिा
से बहि शूल (immense pain) होिा है ।
 हृदयशूल (cardiac discomfort), हस्ि - पादकम्प (tremors in limbs), कक्षक्ष एवृतं बजस्ि में
शूल (pain in abdomen and bladder regions) , मूच्छ्छाथ (fainting) और दारुण मूत्रकृ च्छ्छ्र
होिा है ।
8. शकृ द्ववघािज मूत्रकृ च्छ्छ्र
शकृ िस्ि प्रिीघािाद्वृतायतवृतथगणिां गिुः ।। आध्मानं च सशूलं च मूत्रसंगं करोति दह ।
(स.उ. 59/9-10)
 परीष क
े वृतेग को रोकने से अपानवृताय तवृतलोमगति होकर उदर में आध्मान (tympanites),
वृतािि शूल िथा मूत्रावृतरोध (dysuria) कर देिा है ।
Chikitsa sutra(Treatment Principle)
• तनदान पररवृतिथन ।
• स्नेहन, स्वृतेदन, वृतािानलोमक, संशोधन - जस्नग्ध तवृतरेचन ।
• उ रवृतजस्ि यथावृतश्यकिा यजक्िपूवृतथक ।
• संशमन धचककत्सा : वृतािहरकमथ, मूत्रतवृतरेचनीय, मूत्रतवृतशोधनीय, मूत्र तवृतरिनीय िथा
अश्मरीहर िव्यों का यथावृतश्यकिा स्वृतकल्पना पूवृतथक प्रयोग ।
• सामान्ि प्रिुक्ि संशमन औषधिोर्
 रस भस्म – चन्िकला रस, पाषाण वृतज्ररस, बत्रतवृतक्रम रस, श्वृतेि पपथटी, मूत्रकृ च्छ्छ्रान्िक रस,
िारक
े श्वृतर रस, यवृतक्षार, पननथवृतामंडर आदद ।
 वटी – चन्दनादद वृतटी, चन्िप्रभा वृतटी, गोक्षरादद गग्गल, कपील दहंग्वृतादद वृतटी, लशवृतागदटका,
दग्धवृतदट।
 चूणग — त्रट्यादद चूणथ, पाषाणभेदादद चूणथ, व्योषादद चूणथ, एवृताथरूबीि योग, उशीरादद चूणथ ।
 क्वाथ - गोक्षरादद, पननथवृतादद, शिावृतयाथदद, पाषाण भेदादद, दरालभादद, िृणपंचमल,
शोणणिामृि, वृतृहत्यादद,
 आसव - पननथवृतासवृत, चन्दनासवृत, मधकासवृत, उशीरसवृत,
 घृि – बत्रकण्टकादद, श्वृतदंष्रादद।
 अवलेह – दशमलहरीिकक, गडआिक
VATAJA MUTRAKRICHHRA
C.Chi 26/38
 वृतािनाशक िैलाभ्यङ्ग ।
 जस्नग्ध उपनाह, पररषेक, अवृतगाह एवृतं िापस्वृतेद का प्रयोग करना चादहए ।
 तनरुह एवृतं उ रवृतजस्ि का प्रयोग करें ।
 जस्थरादद वृतगथ एवृतं वृतािहर िव्यों से लसद्ध क्वृताथ का पान करायें एवृतं उसक
े लसद्ध
मांस रस खाने को देना चादहए ।
PITTAJA MUTRAKRICHHRA
C.Chi 26/42
 शीिल िव्यों क
े क्वृताथ से पररषेक, अवृतगाह एवृतं प्रदेह करना चादहए ।
(Abagaha in winter, Pradeha in summer)
 ग्रीष्म ऋिचयाथ का पालन करना चादहए ।
 वृतजस्ि, पेया (क्षीरपान) एवृतं तवृतरेचन का प्रयोग करें ।
 िाक्षारस, तवृतदारी स्वृतरस, ईक्षरस एवृतं घृि आदद का प्रयोग करना चादहए ।,
KAPHAJA MUTRAKRICHHRA
C.Chi 26/47
 क्षार, उष्ण, िीक्ष्ण एवृतं कटरस वृताले अन्नपान का सेवृतन करना चादहए ।
 स्वृतेदन का प्रयोग ।
 यवृत से बने खाद्य पदाथों का सेवृतन ।
 तनरुह वृतजस्ि एवृतं िक्र का प्रयोग दहिकर है ।
 तिक्ि िव्यों से लसद्ध िैल का अभ्यंग एवृतं पान दहिकर है ।
SANNIPATAJA MUTRAKRICHHRA –
सवृतं बत्रदोषप्रभवृते ि वृतायोुः स्थानानपूव्याथ प्रसमीक्ष्य कायथम् ।
बत्रभ्योऽधधक
े प्राग्वृतमनं कफ
े स्याि् तप े तवृतरेकुः पवृतने ि बजस्िुः ॥ (C.Chi 26/51)
 वृताय क
े स्थान का तवृतचार कर धचककत्सा करनी चादहए ।
 कफ दोषाधधक्थ हो िो वृतमन करायें ।
 तप दोषाधधक्थ हो िो तवृतरेचन करायें ।
 वृताि दोषाधधक्थ हो िो वृतजस्ि करायें ।
ASMARIJA / SARKARAJA MUTRAKRICHHRA –
कक्रया दहिा साऽश्मररशक
थ राभ्यां कृ च्छ्छ्रे यथैवृतेह कफातनलाभ्याम् ।
कायाथऽश्मरीभेदनपािनाय तवृतशेषयक्िं शृण कमथ लसद्धम ् ॥ (C.Chi 26/52)
 कफ एवृतं वृताि से होने वृताले मूत्रकृ च्छ्छ्र की धचककत्सा करनी चादहए ।
 अश्मरी में अश्मरी भेदन एवृतं पािन धचककत्सा करनी चादहए ।
 अश्मरी प्रकरण में वृतणणथि योगों का प्रयोग अश्मरीि एवृतं शक
थ राि मूत्रकृ च्छ्छ
में करना चादहए ।
 वृताि दोषाधधक्थ हो िो वृतजस्ि करायें ।
SUKRAJA MUTRAKRICHHRA –
• रेिोलभघािप्रभवृते ि कृ च्छ्छ्रे समीक्ष्य दोषं प्रतिकमथ कयाथि् ।
कापाथसमूलं वृतृषकाश्मभेदौ बला जस्थरादीतन गवृतेधका च ॥ (C.Chi 26/69)
• एवृतं न चेच्छ्छाम्यति िस्य यञ््याि् सरां पराणां मधकासवृतं वृता ॥
तवृतहङ्गमांसातन च बृंहणाय बस्िींश्च शक्राशयशोधनाथथम् ।
शद्धस्य िृप्िस्य च वृतृष्ययोगैुः तप्रयानक
ू लाुः प्रमदा तवृतधेयाुः ॥ (C.Chi 26/71-72)
 दोष प्रधानिा क
े अनसार धचककत्सा करनी चादहए ।
 पराण मददरा या मधूकासवृत का पान करना चादहए ।
 बृंहणाथथ तवृतहङ्ग मांस एवृतं मांस रस णखलाना चादहए ।
 उ रवृतजस्ि का प्रयोग शोधनाथथ करना चादहए ।
 वृतािीकरण औषधधयों से िृप्ि कर मनोनक
ू ल जस्त्रयों क
े पाश प्रेररि करना
चादहए ।
SHALYAJA/ABHIGHATAJA MUTRAKRICHHRA
• तपबेि् लसिाक्षौियिातन खादेददक्ष तवृतदारीं त्रपषाणण चैवृत ॥ (C.Chi 26/72)
• यन्मूत्रकृ च्छ्छ्रे तवृतदहिं ि पै े कायं ि िच्छ्छोणणिमूत्रकृ च्छ्छ्रे ॥ (C.Chi 26/68)
 सद्योव्रण की िरह उपचार - व्यवृतस्था करनी चादहए ।
 मधरवृतगथ िव्यों से लसद्ध क्वृताथ में मध एवृतं लमश्री लमलाकर पीने को देना
चादहए ।
 इक्षरस का सेवृतन दहिकर है ।
 इसमें तप ि मूत्रकृ च्छ्छ्र की धचककत्सा करनी चादहए ।
PURISHAJA MUTRAKRICHHRA (तवृतड्तवृतघाििन्य/ शकृ ्िािे)
मूत्रकृ च्छ्छ्रे शकृ ्िािे कायाथ वृतािहरी कक्रया ।
स्वृतेदावृतगाहावृतभ्यङ्गबजस्ि चूणथकक्रयास्िथा ॥ (SU.U 59/27)
 स्नेह अभ्यंग, स्वृतेदन िथा वृतािानलोमन उपचार करे ।
 तवृतरेचनाथथ फलवृततिथ एवृतं बजस्ि का प्रयोग करे ।
 एरण्डिैल आदद का जस्नग्ध तवृतरेचन देना चादहए ।
 उपनाह स्वृतेदन करना दहिकर है ।
 स्नेहप्रक्षेपयक्ि उष्ण िल क
े पात्र (टब) में अवृतगाहन
 वृतािि मूत्रकृ च्छ्छ्र की िरह वृतािानलोमन धचककत्सा करे (चूणथ और रस कक्रया)।
• पथ्य - पराने िथा लालवृतणथ क
े शाललचावृतल, क्षारपदाथथ, िो िथा उष्ण पदाथथ, मट्ठा - दूध - दही,
िङ्गली पश पक्षक्षयों का मांस, मंग की दाल का पानी, शक
थ रा, कष्माण्ड का फल, पटोल का शाक,
िंगली अदरख, गोखरू, घृिकमारर, सपारी, खिूथर फल, कच्छ्चा नाररयल फल, िाड की मस्िक,
हरड, िाड क
े फल की धगरी, खीरा, छोटी इलायची, शीिल अन्न-पान, नदी का स्वृतच्छ्छ िल, कपूथर
।। (BR 34/67-89)
• अपथ्य - मद्यपान, पररश्रम, स्त्रीसम्भोग*, हाथी और घोडे की सवृतारी, सवृतथ प्रकार क
े तवृतरुद्ध िैसे
िीर - मत्स्यादद का संयक्ि भोिन िथा तवृतषम अथाथि् असमय में अल्प अथवृता अधधक भोिन,
िाम्बूल सेवृतन, मत्स्य, लवृतण, आिथक, िैलभजिथि या िैल में िले हए पदाथथ, तिलों की तपष्टी,
हींग, तिल, सरसों, मत्रादद वृतेगतवृतधारण उडदी की दाल या इससे बने हए अन्य पदाथथ, करीरफल
िथा अन्य अत्यन्ि िीक्षण, तवृतदाहिनक, रूच और अम्ल वृतजिथि कर देना चादहये । (BR 34/70-71)
In Asmarija mutrakrichhra
व्यायामसंधारणशष्करुक्षतपष्टान्नवृतािाक
थ करव्यवृतायान् खिूथरशालूककतपत्थिम्बूबबसं कषायं
न रसं भिेि ॥ (C. Chi. 26/76)
Dysuria is a symptom of pain, discomfort, or burning
when urinating.
• It is more common in women than in men.
• In men, it is more common in older men than younger
men.
Dysuria is a symptom may be indicative of
• Cystitis
• Infection anywhere in urinary tract
• Urethritis
• Urethral stricture
• Metritis (inflammation of uterus) / PID
• Pelvic peritonitis
• Hypertrophied/Cancerous/Ulcerated prostrate in male
• Prolapse of uterus in female
• Cancer of cervix
• Dysmenorrhoea
• Psychological abnormalities
• Concentrated acid urine
• Certain medicines like Opiates, Anti motion sickness medicines
Mutrakricchra

Mutrakricchra

  • 1.
    Prof Sriram ChandraMishra Kayachikitsa Department VYDS Ayurved Mahavidyalaya, Khurja
  • 2.
    Paribhasa (Definition) • मूत्रकृछ्रेण इति मूत्रस्य़ कृ छ्रेण महिा दुःखेन प्रवृतृत ुः । (Madhukosha) Difficulty in micturition or dysuria is known as mutrakrichhra. मूत्रकृ छ्र मूत्राघाियोश्चायं तवृतशेष (diff. diagnosis with Mutraghata ) मूत्रकृ छ्रे कृ छ्रत्वमतिशतििम ् इषि् ववबन्ध, मूत्राघािे िु ववबन्धो बलवान, कृ छ्रत्वमल्पममति । (Madhukosha)
  • 3.
    Nirukti (Derivation) • 'मूत्र्यिेइति मूत्रम ् । 'मूत्रप्रस्त्रवृतणे' (च.उ.से.) घञ् (3.3.19)। (अमरकोष- रामाश्रमी 2.6.67) 'मूत्र प्रस्रवृतणे' धाि से धञ् प्रत्यय करने पर ' मूत्र ' शब्द बनिा है । • कृ न्िाति इति कृ च्छ्छ्रम् । 'कृ िी छेदने' (िदादद प.से.) कृ िेश्छ : क्र ू च (उ.सू. 2.21)। 'कृ िी छेदने‘ धाि से 'रक्' प्रत्यय िथा 'छ' आदेश होने पर कृ च्छ्छ्र शब्द बनिा है; जिसका अथथ है- शरीर में पीडा होना । • इस प्रकार 'मूत्र का अत्यन्ि पीडा क े साथ तनकलना मूत्रकृ च्छ्छ्र है' । यथा मूत्रे कृ च्छ्छ्रमत्र, इति मूत्रकृ च्छ्छ्रम ् । अमर . रामाश्रमी 2.6.56
  • 4.
    (C. CHI. 26/27) NIDAN •अधधक व्यायाम • िीक्ष्ण औषध • रूक्ष पदाथथ • अति मद्यपान • िेि चलनेवृताले घोडे आदद की पीठ पर तनत्य सवृतारी करना • िलचर पश - पक्षक्षयों क े मांस का सेवृतन करना • पहले ककये गये भोिन क े बबना पचे पनुः भोिन करना • अिीणथ होना
  • 5.
    SAMPRAPTI (C. CHI. 26/28) स्वृतकारणोंसे प्रकतपि हए वृताि आदद दोष पृथक् - पृथक् अथवृता एक साथ (या द्वृतंद्वृति अथवृता साजन्नपातिक) िब बजस्ि में पहुँचकर मूत्रमागथ में संकोच, दबावृत या क्षोभ आदद उत्पन्न करिे हैं, िब मूत्रत्याग करिे समय रोगी को कष्ट होिा है और इसी पररजस्थति को मूत्रकृ च्छ्छ्र कहिे हैं ।
  • 6.
    SAMPRAPTI CHAKRA स्वकारणसे त्रत्रदोषदुष्टी (अपान दुष्टी अधधक) ↓ बस्स्ि प्रवेश ↓ मूत्रमार्गमें संकोच स्रोिोरोध, क्षोभ ↓ बस्िीक े स्थानमें शोथ मूत्रवह स्रोिसमें संर् ↓ अपान दुष्टी मूत्रप्रवृत्तीक े समि वेदना / कष्ट अधधक होनेपर ↓ मूत्रकृ च्छ्छ्र वाि और पुरीष का भी अवरोध
  • 7.
    SAMPRAPTI VIGHATANA • दोष– त्रत्रदोष (वािप्रधान) • दूष्ि – मूत्र, उदक (जल) • अधधष्ठान - वस्स्ि, मूत्रमार्ग • स्त्रोिस - मूत्रवह • स्रोिोदुस्ष्ट – संर् • स्वभाव - आशुकारी • साध्िासाध्ििा - साध्ि
  • 8.
    CHARAK SUSRUTA A.HRIDAYA MADHAV Vata Vata Vata Vata Pitta Pitta Pitta Pitta Kapha Kapha Kapha Kapha Sannipata Sannipata Sannipata Sannipata Asmari Asmari Asmari Sarkara Sarkara Sukra Sukra Purisha Purisha Sonita Abhighata Shalya BHEDA (Types)– 8 types एषा अश्मरी मारुि मभन्न मू्तिगिः स्य़ाि शक ग रा मूत्र पथाि् क्षरन्िी। (Dridhabala) (C. CHI. 26/27)
  • 9.
    Lakshana (Symptoms) • VATANEUROGENIC / TRAUMATIC • PITTA ACUTE U.T.I. • KAPHA SUBACUTE U.T.I. • SANNIPATA ACUTE/CHRONIC U.T.I. • ASMARI/SARKARA URINARY CALCULI • PURISAJA CONSTIPATIONAL DYSURIA • SUKRA STAGNATION OF SEMEN • SONITA TRAUMATIC / U.T.I. • सामान्ि लक्षण कष्ट (painful) क े साथ रुक - रुक (obstructed) कर , थोडा - थोडा (mild in quantity) और बार - बार मूत्रत्याग (frequent urination) होिा है । • ववशेष लक्षण -
  • 10.
    1. वािज मूत्रकृच्छ्छ्र िीव्रा रुिो वृतंक्षणबजस्िमेढे स्वृतल्पं महमूथत्रयिीह वृतािाि् । (च.धच. 26/34)  वृतंक्षण, बजस्ि और मूत्रेजन्िय में िीव्र वृतेदना (pain in groin, bladder and phallus regions) |  बार - बार और थोडा - थोडा मूत्रत्याग होना (frequent and scanty micturtion) |  रोगी पीडडि प्रदेशों को मलिा या दबािा है (pressing of affected regions) । 2. वपत्तज मूत्रकृ च्छ्छ्र पीिं सरक्िं सरुिं सदाहं कृ च्छ्छ्रान्महमूथत्रयिीह तप ाि् ।। (च.धच. 26/34)  मष्क, मूत्रेजन्िय िथा बजस्ि में दाह (burning sensation in phallus and bladder region) |  बार - बार, पीला या लाल और थोडा मूत्रत्याग (frequent and scanty passage of yellowish or reddish urine) ।  पीडा एवृतं दाहयक्ि अत्यष्ण मूत्र (warm urination accompanied with pain and burning sensation) ।
  • 11.
    3. कफज मूत्रकृच्छ्छ्र बस्िेुः सललंगस्य गरुत्वृतशोथौ मूत्रं सतपच्छ्छं कफमूत्रकृ च्छ्छ्रे । (च.धच. 26/35)  बजस्ि, अण्डकोष और मूत्रेजन्िय में भारीपन (heaviness in bladder , scrotum and urethral regions) |  बजस्ि, अण्डकोष और मूत्रेजन्िय में शोथ (Oedema over bladder, scrotum and urethra) |  तपजच्छ्छल , जस्नग्ध , शक्लवृतणथ िथा शीि मूत्र (slimy, unctuous, whitish and cool urination)| 4. सस्न्नपािज मूत्रकृ च्छ्छ सवृताथणण रूपाणण ि सजन्नपािाद्भवृतजन्ि िि् कृ च्छ्छ्रिमं दह कृ च्छ्छ्रम् ।। (च.धच. 26/35)  इसमें सभी दोषों क े लक्षण लमलिे हैं ।  यह प्रकृ तिसमवृतायारब्ध होिा है, अि: लक्षणों में वृतैधचत्र्य नहीं ।  मूत्रप्रवृतृत अतिकष्टमय होिी है और यह कष्टसाध्य होिा है ।
  • 12.
    5. अमभघािज मूत्रकृच्छ्छ्र क्षिालभघािाि् क्षििं क्षयाद्वृता प्रकोतषिं बजस्िगि तवृतबद्धम् ।। िीव्रातिथ मूत्रेण सहाश्मरीत्वृतमायाति िजस्मन्नतिसंधचिे च । आध्माििां तवृतन्दति गौरवृतं च बस्िेलथघत्वृतं च तवृततनुःसृिेऽजस्मन् । (च.धच. 26/43-44)  मूत्रवृताही स्रोिों (urinary system) में आभ्यन्िर शल्य से अथवृता बाह्य आघाि लगने से क्षि होने पर भयंकर मूत्र कृ च्छ्छ्ररोग उत्पन्न होिा है ।  आघाि से बजस्ि (bladder) में क्षि हो िािा है और उससे रक्ि तनकलिा है ।  िब रक्ि वृतहाुँ िम (pool) िािा है और वृतह मूत्रमागथ से बाहर तनकलिा है, िब अतिशय पीडा (pain) होिी है, बजस्ि फ ू ल िािी है (distension of bladder) और उसमें भारीपन (heaviness) मालूम पडिा है ।  िब रक्ि बाहर तनकल िािा है, िो हलकापन (lightness) मालूम होिा है ।  इसमें वृतािि मूत्रकृ च्छ्छ्र क े समान लक्षण होिे हैं ।
  • 13.
    6. शुक्रज मूत्रकृच्छ्छ्र रेिोऽलभघािालभहिस्य पंसुः प्रवृतिथिे यस्य ि मूत्रकृ च्छ्छ्रम ् । स्याद्वृतेदना वृतंक्षणबजस्िमेढे िस्यातिशूलं वृतृषणातिवृतृ े ।। शक्र े ण संरुद्धगतिप्रवृताहो मूत्रं स कृ च्छ्छ्रेण तवृतमञ्चिीह| िमण्डयो : स्िब्धलमति ब्रवृतजन्ि रेिोऽलभघािाि् प्रवृतदजन्ि कृ च्छ्छ्रम् ।। शक्र ं मलाश्चैवृत पृथक् पृथग्वृता मूत्राशयस्था : प्रतिवृतारयजन्ि । िद्व्याहिं मेहनबजस्िशूलं मूत्रं सशक्र ं करुिे तवृतबद्धम ् ।। स्िब्धश्च शूनो भृशवृतेदनश्च िद्येि बजस्िवृतृथषणौ च िस्य । (च.धच. 26/40-43)  अपने स्थान से च्छ्यि हआ शक्र िब दोषों क े प्रकोप से मूत्रमागथ में अवृतरुद्ध हो िािा है , िो उस समय वृतंक्षणसजन्ध (groin) , बजस्ि (bladder) िथा लशश्न (urethra) में वृतेदना होिी है ।  रोगी शक्रसदहि मूत्रत्याग करिा है (passage of urine mixed with semen)  मूत्र तनकलने में बडा कष्ट होिा है (dysuria) ।
  • 14.
    7. अश्मरीज मूत्रकृच्छ्छ्र / शक ग राज मूत्रकृ च्छ्छ्र तवृतशोषयेद्बजस्िगिं सशक्र ं मूत्रं सतप ं पवृतनुः कफ थ वृता यदा िदाऽश्मयथपिायिे ि क्रमेण तप ेजष्वृतवृत रोचना गोुः ।। कदम्बपष्पाकृ तिरश्मिल्या श्लक्ष्णा बत्रपट्यप्यथवृताऽतप मृद्वृती। मूत्रस्य चेन्मागथमपैति रुदवृता मूत्रं रुिं िस्य करोति बस्िौ ।। ससेवृतनी मेहनबजस्िशूलं तवृतशीणथधार च करोति मूत्रम् । मृद्गाति मेढ्रं स ि वृतेदनाि महुः शकृ न्मञ्चति मेहिे च ।। क्षोभाि् क्षिे मूत्रयिीह सासूक् िस्याुः सखं मेहति च व्यपायाि् । (च.धच. 26/36-39)  अश्मरी (calculi) मूत्रमागथ में गति करिे समय बहि वृतेदना (excruciating pain) होिी है ।  वृताय िब अश्मरी को िोड देिा है, िो उसक े टकडे शक थ रा (gravels ) कहलािे हैं ।  िब यह शक थ रा मूत्रमागथ (urinary passage) से बाहर तनकलिी है, िो उसकी गतिशीलिा से बहि शूल (immense pain) होिा है ।  हृदयशूल (cardiac discomfort), हस्ि - पादकम्प (tremors in limbs), कक्षक्ष एवृतं बजस्ि में शूल (pain in abdomen and bladder regions) , मूच्छ्छाथ (fainting) और दारुण मूत्रकृ च्छ्छ्र होिा है ।
  • 15.
    8. शकृ द्ववघािजमूत्रकृ च्छ्छ्र शकृ िस्ि प्रिीघािाद्वृतायतवृतथगणिां गिुः ।। आध्मानं च सशूलं च मूत्रसंगं करोति दह । (स.उ. 59/9-10)  परीष क े वृतेग को रोकने से अपानवृताय तवृतलोमगति होकर उदर में आध्मान (tympanites), वृतािि शूल िथा मूत्रावृतरोध (dysuria) कर देिा है ।
  • 16.
    Chikitsa sutra(Treatment Principle) •तनदान पररवृतिथन । • स्नेहन, स्वृतेदन, वृतािानलोमक, संशोधन - जस्नग्ध तवृतरेचन । • उ रवृतजस्ि यथावृतश्यकिा यजक्िपूवृतथक । • संशमन धचककत्सा : वृतािहरकमथ, मूत्रतवृतरेचनीय, मूत्रतवृतशोधनीय, मूत्र तवृतरिनीय िथा अश्मरीहर िव्यों का यथावृतश्यकिा स्वृतकल्पना पूवृतथक प्रयोग ।
  • 17.
    • सामान्ि प्रिुक्िसंशमन औषधिोर्  रस भस्म – चन्िकला रस, पाषाण वृतज्ररस, बत्रतवृतक्रम रस, श्वृतेि पपथटी, मूत्रकृ च्छ्छ्रान्िक रस, िारक े श्वृतर रस, यवृतक्षार, पननथवृतामंडर आदद ।  वटी – चन्दनादद वृतटी, चन्िप्रभा वृतटी, गोक्षरादद गग्गल, कपील दहंग्वृतादद वृतटी, लशवृतागदटका, दग्धवृतदट।  चूणग — त्रट्यादद चूणथ, पाषाणभेदादद चूणथ, व्योषादद चूणथ, एवृताथरूबीि योग, उशीरादद चूणथ ।  क्वाथ - गोक्षरादद, पननथवृतादद, शिावृतयाथदद, पाषाण भेदादद, दरालभादद, िृणपंचमल, शोणणिामृि, वृतृहत्यादद,  आसव - पननथवृतासवृत, चन्दनासवृत, मधकासवृत, उशीरसवृत,  घृि – बत्रकण्टकादद, श्वृतदंष्रादद।  अवलेह – दशमलहरीिकक, गडआिक
  • 18.
    VATAJA MUTRAKRICHHRA C.Chi 26/38 वृतािनाशक िैलाभ्यङ्ग ।  जस्नग्ध उपनाह, पररषेक, अवृतगाह एवृतं िापस्वृतेद का प्रयोग करना चादहए ।  तनरुह एवृतं उ रवृतजस्ि का प्रयोग करें ।  जस्थरादद वृतगथ एवृतं वृतािहर िव्यों से लसद्ध क्वृताथ का पान करायें एवृतं उसक े लसद्ध मांस रस खाने को देना चादहए ।
  • 19.
    PITTAJA MUTRAKRICHHRA C.Chi 26/42 शीिल िव्यों क े क्वृताथ से पररषेक, अवृतगाह एवृतं प्रदेह करना चादहए । (Abagaha in winter, Pradeha in summer)  ग्रीष्म ऋिचयाथ का पालन करना चादहए ।  वृतजस्ि, पेया (क्षीरपान) एवृतं तवृतरेचन का प्रयोग करें ।  िाक्षारस, तवृतदारी स्वृतरस, ईक्षरस एवृतं घृि आदद का प्रयोग करना चादहए ।,
  • 20.
    KAPHAJA MUTRAKRICHHRA C.Chi 26/47 क्षार, उष्ण, िीक्ष्ण एवृतं कटरस वृताले अन्नपान का सेवृतन करना चादहए ।  स्वृतेदन का प्रयोग ।  यवृत से बने खाद्य पदाथों का सेवृतन ।  तनरुह वृतजस्ि एवृतं िक्र का प्रयोग दहिकर है ।  तिक्ि िव्यों से लसद्ध िैल का अभ्यंग एवृतं पान दहिकर है ।
  • 21.
    SANNIPATAJA MUTRAKRICHHRA – सवृतंबत्रदोषप्रभवृते ि वृतायोुः स्थानानपूव्याथ प्रसमीक्ष्य कायथम् । बत्रभ्योऽधधक े प्राग्वृतमनं कफ े स्याि् तप े तवृतरेकुः पवृतने ि बजस्िुः ॥ (C.Chi 26/51)  वृताय क े स्थान का तवृतचार कर धचककत्सा करनी चादहए ।  कफ दोषाधधक्थ हो िो वृतमन करायें ।  तप दोषाधधक्थ हो िो तवृतरेचन करायें ।  वृताि दोषाधधक्थ हो िो वृतजस्ि करायें ।
  • 22.
    ASMARIJA / SARKARAJAMUTRAKRICHHRA – कक्रया दहिा साऽश्मररशक थ राभ्यां कृ च्छ्छ्रे यथैवृतेह कफातनलाभ्याम् । कायाथऽश्मरीभेदनपािनाय तवृतशेषयक्िं शृण कमथ लसद्धम ् ॥ (C.Chi 26/52)  कफ एवृतं वृताि से होने वृताले मूत्रकृ च्छ्छ्र की धचककत्सा करनी चादहए ।  अश्मरी में अश्मरी भेदन एवृतं पािन धचककत्सा करनी चादहए ।  अश्मरी प्रकरण में वृतणणथि योगों का प्रयोग अश्मरीि एवृतं शक थ राि मूत्रकृ च्छ्छ में करना चादहए ।  वृताि दोषाधधक्थ हो िो वृतजस्ि करायें ।
  • 23.
    SUKRAJA MUTRAKRICHHRA – •रेिोलभघािप्रभवृते ि कृ च्छ्छ्रे समीक्ष्य दोषं प्रतिकमथ कयाथि् । कापाथसमूलं वृतृषकाश्मभेदौ बला जस्थरादीतन गवृतेधका च ॥ (C.Chi 26/69) • एवृतं न चेच्छ्छाम्यति िस्य यञ््याि् सरां पराणां मधकासवृतं वृता ॥ तवृतहङ्गमांसातन च बृंहणाय बस्िींश्च शक्राशयशोधनाथथम् । शद्धस्य िृप्िस्य च वृतृष्ययोगैुः तप्रयानक ू लाुः प्रमदा तवृतधेयाुः ॥ (C.Chi 26/71-72)  दोष प्रधानिा क े अनसार धचककत्सा करनी चादहए ।  पराण मददरा या मधूकासवृत का पान करना चादहए ।  बृंहणाथथ तवृतहङ्ग मांस एवृतं मांस रस णखलाना चादहए ।  उ रवृतजस्ि का प्रयोग शोधनाथथ करना चादहए ।  वृतािीकरण औषधधयों से िृप्ि कर मनोनक ू ल जस्त्रयों क े पाश प्रेररि करना चादहए ।
  • 24.
    SHALYAJA/ABHIGHATAJA MUTRAKRICHHRA • तपबेि्लसिाक्षौियिातन खादेददक्ष तवृतदारीं त्रपषाणण चैवृत ॥ (C.Chi 26/72) • यन्मूत्रकृ च्छ्छ्रे तवृतदहिं ि पै े कायं ि िच्छ्छोणणिमूत्रकृ च्छ्छ्रे ॥ (C.Chi 26/68)  सद्योव्रण की िरह उपचार - व्यवृतस्था करनी चादहए ।  मधरवृतगथ िव्यों से लसद्ध क्वृताथ में मध एवृतं लमश्री लमलाकर पीने को देना चादहए ।  इक्षरस का सेवृतन दहिकर है ।  इसमें तप ि मूत्रकृ च्छ्छ्र की धचककत्सा करनी चादहए ।
  • 25.
    PURISHAJA MUTRAKRICHHRA (तवृतड्तवृतघाििन्य/शकृ ्िािे) मूत्रकृ च्छ्छ्रे शकृ ्िािे कायाथ वृतािहरी कक्रया । स्वृतेदावृतगाहावृतभ्यङ्गबजस्ि चूणथकक्रयास्िथा ॥ (SU.U 59/27)  स्नेह अभ्यंग, स्वृतेदन िथा वृतािानलोमन उपचार करे ।  तवृतरेचनाथथ फलवृततिथ एवृतं बजस्ि का प्रयोग करे ।  एरण्डिैल आदद का जस्नग्ध तवृतरेचन देना चादहए ।  उपनाह स्वृतेदन करना दहिकर है ।  स्नेहप्रक्षेपयक्ि उष्ण िल क े पात्र (टब) में अवृतगाहन  वृतािि मूत्रकृ च्छ्छ्र की िरह वृतािानलोमन धचककत्सा करे (चूणथ और रस कक्रया)।
  • 26.
    • पथ्य -पराने िथा लालवृतणथ क े शाललचावृतल, क्षारपदाथथ, िो िथा उष्ण पदाथथ, मट्ठा - दूध - दही, िङ्गली पश पक्षक्षयों का मांस, मंग की दाल का पानी, शक थ रा, कष्माण्ड का फल, पटोल का शाक, िंगली अदरख, गोखरू, घृिकमारर, सपारी, खिूथर फल, कच्छ्चा नाररयल फल, िाड की मस्िक, हरड, िाड क े फल की धगरी, खीरा, छोटी इलायची, शीिल अन्न-पान, नदी का स्वृतच्छ्छ िल, कपूथर ।। (BR 34/67-89) • अपथ्य - मद्यपान, पररश्रम, स्त्रीसम्भोग*, हाथी और घोडे की सवृतारी, सवृतथ प्रकार क े तवृतरुद्ध िैसे िीर - मत्स्यादद का संयक्ि भोिन िथा तवृतषम अथाथि् असमय में अल्प अथवृता अधधक भोिन, िाम्बूल सेवृतन, मत्स्य, लवृतण, आिथक, िैलभजिथि या िैल में िले हए पदाथथ, तिलों की तपष्टी, हींग, तिल, सरसों, मत्रादद वृतेगतवृतधारण उडदी की दाल या इससे बने हए अन्य पदाथथ, करीरफल िथा अन्य अत्यन्ि िीक्षण, तवृतदाहिनक, रूच और अम्ल वृतजिथि कर देना चादहये । (BR 34/70-71) In Asmarija mutrakrichhra व्यायामसंधारणशष्करुक्षतपष्टान्नवृतािाक थ करव्यवृतायान् खिूथरशालूककतपत्थिम्बूबबसं कषायं न रसं भिेि ॥ (C. Chi. 26/76)
  • 27.
    Dysuria is asymptom of pain, discomfort, or burning when urinating. • It is more common in women than in men. • In men, it is more common in older men than younger men.
  • 28.
    Dysuria is asymptom may be indicative of • Cystitis • Infection anywhere in urinary tract • Urethritis • Urethral stricture • Metritis (inflammation of uterus) / PID • Pelvic peritonitis • Hypertrophied/Cancerous/Ulcerated prostrate in male • Prolapse of uterus in female • Cancer of cervix • Dysmenorrhoea • Psychological abnormalities • Concentrated acid urine • Certain medicines like Opiates, Anti motion sickness medicines