दुगा आरती
जय अे गौरी मैया जय मंगल मू त।
तुमको न श दन ावत ह र ा शव री टेक॥
मांग सदूर बराजत टीको मृगमद को ।
उ ल से दोउ नैना चं बदन नीको ॥जय॥
कनक समान कलेवर र ा र राजै।
र पु गल माला कं ठन पर साजै ॥जय॥
के ह र वाहन राजत ख ग ख रधारी ।
सुर-नर मु नजन सेवत तनके दुःखहारी ॥जय॥
कानन कु ल शो भत नासा े मोती ।
को टक चं दवाकर राजत सम ो त ॥जय॥
शु नशु बडारे म हषासुर घाती ।
धू वलोचन नैना न श दन मदमाती ॥जय॥
च सठ यो ग न मंगल गाव नृ करत भै ।
बाजत ताल मृदंगा अ बाजत डम ॥जय॥
भुजा चार अ त शो भत ख ग ख रधारी।
मनवां छत फल पावत सेवत नर नारी ॥जय॥
कं चन थाल वराजत अगर कपूर बाती ।
ी मालके तु म राजत को ट रतन ो त ॥जय॥
ी अ ेजी क आरती जो कोई नर गावै ।
कहत शवानंद ामी सुख-स पावै ॥जय॥
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