कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक'
के नाम से प्रससद्ध है। इसके तीन
भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी यह
पंजाबी, राजस्थानी, खडी बोली,
अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आसद कई
भाषाओंकी सखचडी है।कबीर
परमात्मा को समत्र, माता, सपता और
पसत के रूप में देखते हैं।यही तो
मनुष्य के सवाासधक सनकट रहते हैं।
एकै साध सब सधै, सब साधे सब जाय ।
जो तू सींचे मूल को, फू ले फल अघाय ॥
पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ, पंडित भय न कोय|
ढायीआखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय||
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लगे अडतदूर||
साई इतना दीडजए जामें कु टुंब समाय।
मैं भी भूखा ना रहं साधु न भूखा जाय॥
गुरु गोडबंद तौ एक है, दूजा यहु आकार|
आपा मेट जीवत, मरै तै पावै करतार||
kabir das
kabir das

kabir das

  • 7.
    कबीर की वाणीका संग्रह 'बीजक' के नाम से प्रससद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी यह पंजाबी, राजस्थानी, खडी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आसद कई भाषाओंकी सखचडी है।कबीर परमात्मा को समत्र, माता, सपता और पसत के रूप में देखते हैं।यही तो मनुष्य के सवाासधक सनकट रहते हैं।
  • 8.
    एकै साध सबसधै, सब साधे सब जाय । जो तू सींचे मूल को, फू ले फल अघाय ॥ पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ, पंडित भय न कोय| ढायीआखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय|| बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंथी को छाया नहीं फल लगे अडतदूर|| साई इतना दीडजए जामें कु टुंब समाय। मैं भी भूखा ना रहं साधु न भूखा जाय॥ गुरु गोडबंद तौ एक है, दूजा यहु आकार| आपा मेट जीवत, मरै तै पावै करतार||