नवाब अब्दुर्रहीम खानखाना मध्यकालीन भार्त के
कु शल र्ाजनीततवेत्ता, वीर्- बहादुर् योद्धा और् भार्तीय
साांस्कृ ततक समन्वय का आदशर प्रस्तुत कर्ने वाले
ममी कवव माने जाते हैं। उनकी गिनती ववित चार्
शताब्ब्दयों से ऐततहाससक पुरुष के अलावा भार्त माता
के सच्चे सपूत के रुप में ककया जाता र्हा है। आपके
अांदर् वह सब िुण मौजूद थे, जो महापुरुषों में पाये
जाते हैं।
6.
र्हीम कहते हैंकक प्रेम का नाता नाजुक होता है । इसे
झटका देकर् तोड़ना उगचत नहीां होता ।
प्रेम से भर्ा रर्श्ता कभी ककसी छोटी सी बात पर्
बबना सोचे समझे नही तोड़ देना चाहहए ।
यहद यह प्रेम का धािा एक बार् टूट जाता है तो किर्
इसे समलाना कहिन होता है और् यहद समल भी जाए
तो टूटे हुए धािों के बीच में िााँि पड़ जाती है.
11.
गचत्रकू ट मेंर्सम र्हे, र्हहमन अवध-नर्ेस ।
जा पर् बबपदा पड़त है, सो आवत यह देस ॥
15.
धतन र्हीम जलपांक को लघु ब्जय वपअत आघाय ।
उदगध बड़ाई कौन है , जित वपआसो जाय ॥
17.
नाद र्ीझझ तनदेत मृि, नर् धन हेत समेत
ते र्हीम पशु से अगधक, र्ीझेिु कछु न देत ॥
19.
बबिर्ी बात बनेनहीां, लाख कर्ो ककन कोय
र्हहमन िाटे दूध को, मथे न माखन होय ॥
21.
र्हहमन देझख बड़ेनको, लघु न दीब्जए डारर्
। ज आवे सुई, कहा कर्े तर्वारर् ॥
22.
र्हीम कहते हैंकक बड़ी वस्तु
को देख कर् छोटी वस्तु को
िें क नहीां देना चाहहए. जहाां
छोटी सी सुई काम आती है,
वहााँ तलवार् बेचार्ी क्या कर्
सकती है ?
23.
र्हहमन तनज सांपततबबना, कोउ न बबपतत सहाय ।
बबनु पानी ज्यों जलज को, नहीां र्वव सके बचाय ॥
इस दोहे मेंर्हीम ने पानी को तीन अथों में प्रयोि
ककया है।
पानी का पहला अथर मनुष्य के सांदभर में है जब इसका
मतलब ववनम्रता से है। र्हीम कह र्हे हैं कक मनुष्य में
हमेशा ववनम्रता (पानी) होना चाहहए।
पानी का दूसर्ा अथर आभा, तेज या चमक से है ब्जसके
बबना मोती का कोई मूल्य नहीां।
पानी का तीसर्ा अथर जल से है ब्जसे आटे (चून) से
जोड़कर् दशारया िया है।
र्हीम का कहना है कक ब्जस तर्ह आटे का अब्स्तत्व
पानी के बबना नम्र नहीां हो सकता और् मोती का मूल्य
उसकी आभा के बबना नहीां हो सकता है, उसी तर्ह
मनुष्य को भी अपने व्यवहार् में हमेशा पानी (ववनम्रता)
र्खना चाहहए ब्जसके बबना उसका मूल्यह्रास होता है।