1
पत्नी: जैनेंद्र क
ु मार की कहानी
शहर के एक ओर तिरस्कृि मकान. दूसरा िल्ला, वहाां चौके में एक स्त्री अांगीठी सामने तलए बैठी है. अांगीठी की
आग राख हुई जा रही है. वह जाने क्या सोच रही है. उसकी अवस्था बीस-बाईस के लगभग होगी. देह से कुछ दुबली है
और सांभ्ाांि कुल की मालूम होिी है.
एकाएक अांगीठी में राख होिी आग की ओर स्त्री का ध्यान गया. घुटनों पर हाथ देकर वह उठी. उठकर कुछ कोयले लाई.
कोयले अांगीठी में डालकर तिर तकनारे ऐसे बैठ गई मानो याद करना चाहिी है तक अब क्या कर
ां ? घर में और कोई नहीं
और समय बारह से ऊपर हो गया है.
उपन्यासः 'परख' (1929), 'सुनीिा' (1935),
'त्यागपत्र' (1937), 'कल्याणी' (1939), 'तववित'
(1953), 'सुखदा' (1953), 'व्यिीि' (1953)
िथा 'जयवर्तन' (1956) और 'मुति-बोर्'(कथा
के पात्र-मैं, पत्नी-राजी, बेटी-अांजु(अन्जो)
कहानी संग्रहः 'िााँसी' (1929), 'वािायन'
(1930), 'नीलम देश की राजकन्या' (1933),
'एक राि' (1934), 'दो तचत़ियााँ' (1935), 'पाजेब'
(1942), 'जयसांतर्' (1949) िथा 'जैनेंद्र की
कहातनयााँ' (साि भाग)।।
अनूदित ग्रंथः 'मांदातलनी' (नाटक-1935), 'प्रेम में
भगवान' (कहानी सांग्रह-1937), िथा 'पाप और
प्रकाश' (नाटक-1953)।
सह लेखनः 'तपोभूमि' (उपन्यास,ऋषभचरण
जैन क
े साथ-1932)।
संपादित-ग्रंथः 'सातहत्य
चयन' (तनबांर् सांग्रह-1951)
िथा 'तवचारवल्लरी' (तनबांर्
सांग्रह-1952)। (सहायक
ग्रांथ- जैनेंद्र- सातहत्य और
समीक्ााः रामरिन भटनागर।)
2
दो प्राणी घर में रहिे हैं-पति और पत्नी. पति सवेरे से गए हैं तक लौटे नहीं और पत्नी चौके में बैठी है.
सुनन्दा सोचिी है- नहीं, सोचिी कहाां है? असल-भाव से वह िो वहाां बैठी ही है. सोचने को है िो यही तक कोयले न बुझ
जाएां.
…वे जाने कब आ जाएांगे? एक बज गया है. कुछ हो, आदमी को अपनी देह की तिक्र करनी चातहए. …और सुनन्दा
बैठी है. वह कुछ कर नहीं रही है. जब वे आएांगे िब रोटी बना देगी. वे जाने कहाां-कहाां देर लगा देिे है. और कब िक
बैठूां? मुझसे नहीं बैठा जािा. कोयले भी लहक आए हैं. और उसने झल्लाकर िवा अांगीठी पर रख तदया. नहीं, अब वह
रोटी बना ही देगी. उसने खीझकर जोर से आटे की थाली सामने खींच ली और रोटी बेलने लगी. थो़िी देर बाद उसने जीने
पर पैरों की आहट सुनी. उसके मुख पर कुछ िल्लीनिा आई. क्ण-भर वह आभा उसके चेहरे पर रहकर चली गई और
वह तिर उसी भाांति काम में लग गई.
कातलांदीचरण पति आए. उनके पीछे-पीछे िीन और उनके तमत्र भी आए. ये आपस में बािें करिे आ रहे थे और
खूब गमत थे. कातलांदीचरण अपने तमत्रों के साथ सीर्े अपने कमरे में चले गए. उनमें बहस तछ़िी थी. कमरे में पहुांचकर
रुकी बहस तिर तछ़ि गई. ये चारों व्यति देशोद्धार के सांबांर् में कतटबद्ध हैं. चचात उसी तसलतसले में चल रही है. भारिमािा
को स्विांत्र कराना होगा- और नीति-अनीति तहांसा-अतहांसा को देखने का यह समय नहीं है. मीठी बािों का पररणाम बहुि
देखा. मीठी बािों से बाघ के मुांह से अपना तसर नहीं तनकाला जा सकिा. उस वि बाघ मारना ही एक इलाज है. आिांक!
हाां, आिांक. हमें क्या आिांकवाद से डरना होगा? लोग हैं, जो कहिे हैं! आिांकवादी मूखत हैं, वे बच्चे हैं. हाां, वे हैं बच्चे
और मूखत. उन्हें बुजगी और बुतद्धमानी नहीं चातहए. हमें नहीं अतभलाषा अपने जीने की. हमें नहीं मोह अपने बाल-बच्चों
का. हमें नहीं गजत र्न-दौलि की. िब हम मरने के तलए आजाद क्यों नहीं हैं? जुल्म को तमटाने के तलए कुछ जुल्म होगा
ही. उससे वे डरें जो डरिे हैं. डर हम जवानों के तलए नहीं है.
तिर वे चारों आदमी तनश्चय करने लगे तक उन्हें खुद क्या करना चातहए.
इिने में कातलांदीचरण को ध्यान आया तक न उसने खाना खाया है, न तमत्रों को खाने के तलए पूछा है. उसने अपने तमत्रों से
मािी माांगकर छुट्टी ली और सुनन्दा की िरि चला.
सुनन्दा जहाां थी, वहाां है. वह रोटी बना चुकी है. अांगीठी के कोयले उलटे िवे से दबे हैं. माथे को उांगतलयों पर
तटकाकर वह बैठी है. बैठी-बैठी सूनी-सी देख रही है. सुन रही है तक उसके पति कातलांदीचरण अपने तमत्रों के साथ क्यों
और क्या बािें कर रहे हैं. उसे जोश का कारण नहीं समझ में आिा. उत्साह उसके तलए अपररतचि है. वह उसके तलए
कुछ दूर की वस्िु है, स्पृहणीय, मनोरम और हररयाली. वह भारिमािा की स्विांत्रिा को समझना चाहिी है, पर उसको न
भारिमािा समझ में आिी है, न स्विांत्रिा समझ में आिी है. उसे इन लोगों की इस जोरों की बािचीि का मिलब ही नहीं
समझ में आिा. तिर भी, सच उत्साह की उसमें ब़िी भूख है. जीवन की हौंस उसमें बुझिी-सी जा रही है, पर वह जीना
चाहिी है. उसने बहुि चाहा तक पति उससे भी कुछ देश की बाि करें. उसमें बुतद्ध िो जरा कम है, पर तिर र्ीरे-र्ीरे क्या
वह भी समझने नहीं लगेगी. सोचिी है, कम पढ़ी हां, िो इसमें मेरा क्या कसूर है? अब िो पढ़ने को िैयार हां. लेतकन पत्नी
के साथ पति का र्ीरज खो जािा है. खैर, उसने सोचा उसका काम िो सेवा है.
बस यह मानकर उसने कुछ समझने की चाह ही छो़ि रखी है. वह अनायास भाव से पति के साथ रहिी है और
कभी उनकी राह के बीच में आने की नहीं सोचिी! वह एक बाि जानिी है तक उसके पति ने अगर आराम छो़ि तदया है,
घर का मकान छो़ि तदया है, जान-बूझकर उख़िे-उख़िे और मारे-मारे जो तिरिे हैं, इसमें वे कुछ भला ही सोचिे होगें.
इसी बाि को पक़िकर वह आपतिशून्य भाव से पति के साथ तवपदा-पर-तवपदा उठािी रही है. पति ने कहा भी है तक िुम
मेरे साथ दुख क्यों उठािी हो, पर यह सुनकर वह चुप रह गई है. सोचिी रह गई तक देखो, कै सी बािें करिे हैं.
3
वह जानिी है तक तजसे सरकार कहिे हैं, वह सरकार उनके इस िरह के कामों से बहुि नाराज है. सरकार सरकार
है. उसके मन में कोई स्पष्ट भावना नहीं है तक सरकार क्या होिी है, पर यह तजिने हातकम लोग हैं, वे ब़िे जबरदस्ि होिे हैं
और उनके पास ब़िी-ब़िी िाकिे हैं. इिनी िौज, पुतलस के तसपाही और मतजस्रेट और मुांश और चपरासी और थानेदार
और वायसरा-ये सब सरकार ही हैं. इन सबसे कै से ल़िा जा सकिा है? हातकम से ल़िना ठीक बाि नहीं है, पर यह उसी
ल़िने में िन-मन तबसार बैठे हैं. खैर, लेतकन ये सब-के -सब इिने जोर से क्यों बोलिे हैं? उसको यही बहुि बुरा लगिा है.
सीर्े-सादे कप़िे में एक खुतिया पुतलस का आदमी हरदम उनके घर के बाहर रहिा है. ये लोग इस बाि को क्यों भूल
जािे हैं? इिने जोर से क्यों बोलिे हैं?
बैठे-बैठे वह इसी िरह की बािें सोच रही हैं. देखो, अब दो बजेगें. उन्हें न खाने की तिक्र, न मेरी तिक्र. मेरी िो
खैर कुछ नहीं, पर अपने िन का ध्यान िो रखना चातहए. ऐसी ही बेपरवाही से िो वह बच्चा चला गया. उसका मन
तकिना भी भी इर्र-उर्र डोले, पर अके ली जब होिी है िब भटक-भटकाकर वह मन अांि में उसी बच्चे के अभाव पर
आ पहुांचिा है. िब उसे बच्चे की वही-वही बािें याद आिी हैं- वे ब़िी प्यारी आांखें, छोटी-छोटी उांगतलयाां और नन्हें-नन्हें
ओांठ याद आिे है. अठखेतलयाां याद आिी हैं. सबसे ज्यादा उसका मरना याद आिा है. ओह! यह मरना क्या है? इस
मरने की िरि िो उससे देखा नहीं जािा. यद्यतप वह जानिी है तक मरना सबको है-उसको मरना है, उसके पति को मरना
है. पर उस िरि भूल से छनभर देखिी है िो भय से भर जािी है. यह उससे सहा नहीं जािा. बच्चे की याद उसे मथ देिी
है. िब वह तवह्वल होकर आांखें पोंछिी है और हठाि इर्र-उर्र की तकसी काम की बाि में अपने को उलझा लेना चाहिी
है. पर अके ले में, वह कुछ करे, रह-रहकर वहीं याद-वही, वह मरने की बाि उसके सामने हो रहिी है और उसका तचि
बेबस हो जािा है.
वह उठी. अब उठकर बरिनों को माांज डालेगी, चौका भी साि करना है. ओह! खाली बैठी मैं क्या सोचिी रहा करिी हां.
इिने में कातलांदीचरण चौके में आए.
सुनन्दा कठोरिापूवतक शून्य को देखिी रही. उसने पति की ओर नहीं देखा.
कातलांदी ने कहा, “सुनन्दा खाने वाले हम चार हैं. खाना हो गया!”
सुनन्दा चून की थाली और चकला-बेलन और बटलोई, खाली बरिन वगैरह उठाकर चल दी, कुछ भी नहीं बोली.
कातलांदी ने कहा, “सुनिी हो, िीन आदमी मेरे साथ और हैं. खाना बन सके िो कहो, नहीं िो इिने में ही काम चला लेंगे.”
सुनन्दा कुछ भी नहीं बोली. उसके मन में बेहद गुस्सा उठने लगा. यह उससे क्मा-प्राथी से क्यों बाि कर रहे हैं, हांसकर
क्यों नहीं कह देिे तक कुछ और खाना बना दो. जैसे मैं गैर हां. अच्छी बाि है, िो मैं भी गुलाम नहीं हां तक इनके ही काम में
लगी रहां. मैं कुछ नहीं जानिी खाना-वाना और वह चुप रही.
कातलांदीचरण ने जरा जोर से कहा, “सुनन्दा!”
सुनन्दा के जी में ऐसा हुआ तक हाथ की बटलोई को खूब जोर से िें क दें. तकसी का गुस्सा सहने के तलए वह नहीं हैं. उसे
ितनक भी सुर् न रही तक अभी बैठे-बैठे इन्हीं अपने पति के बारे में कै सी प्रीति की और भलाई की बािें सोच रही थी. इस
वि भीिर-ही-भीिर गुस्से से घुटकर रह गई.
“क्यों? बोल भी नहीं सकिी!”
सुनन्दा नहीं बोली.
“िो अच्छी बाि है. खाना कोई भी नहीं खाएगा.”
यह कहकर कातलांदी िैश में पैर पटकिे लौटकर चले गए.
4
कातलांदीचरण अपने दल में उग्र नहीं समझे जािे, तकसी कदर उदार समझे जािे हैं. सदस्य अतर्किर तववातहि हैं,
कातलांदीचरण तववातहि ही नहीं हैं, वह एक बच्चा खो चुके हैं. उनकी बाि का दल में आदर हैं. कुछ लोग उनके र्ीमेपन
से रुष्ट भी हैं. वह दल में तववेक के प्रतितनतर् है और उत्पाि पर अांकुश का काम करिे हैं.
बहस इिनी बाि पर थी तक कातलांदी का मि था तक हमें आिांक को छो़िने की ओर बढ़ना चातहए. आिांक से
तववेक कुां तठि होिा है और या िो मनुष्य उससे उिेतजि ही रहिा है या उसके भय से दबा रहिा है. दोनों ही तस्थतियाां श्रेष्ठ
नहीं हैं. हमारा लक्ष्य बुतद्ध को चारों ओर से जगाना है, उसे आिांतकि करना नहीं. सरकार व्यति और राष्र के तवकास के
ऊपर बैठकर उसे दबाना चाहिी है. हम इसी तवकास के अवरोर् को हटाना चाहिें हैं- इसी को मुि करना चाहिें हैं.
आिांक से वह काम नहीं होगा. जो शति के मद में उन्मि हैं, असली काम िो उनका मद उिाराने और उनमें कितव्यभावना
का प्रकाश जगाने का है. हम स्वीकार करें तक उसका मद टक्कर खाकर, चोट पाकर ही उिरेगा. यह चोट देने के तलए हमें
अवश्य िैयार रहना चातहए, पर यह नोचा-नाची उपयुि नहीं. इससे सिा का कुछ तबग़ििा िो नहीं, उलटे उसे अपने
औतचत्य पर सांिोष हो जािा है.
पर जब सुनन्दा के पास से लौटकर आया, िब देखा गया तक कातलांदी अपने पक् पर दृढ़ नहीं है. वह सहमि हो
सकिा है तक हाां, आिांक जररी भी है. “हाां” उसने कहा, “यह ठीक है तक हम लोग कुछ काम शुर कर दें”. इसके साथ
ही कहा, “आप लोगों को भूख नहीं लगी है क्या? उनकी िबीयि खराब है, इससे यहाां िो खाना बना नहीं. बिाओ, क्या
तकया जाए? कही होटल चलें!”
एक ने कहा तक कुछ बाजार से यही मांगा लेना चातहए. दूसरे की राय हुई तक होटल ही चलना चातहए. इसी िरह की बािों
में लगे थे तक सुनन्दा ने एक ब़िी से थाली में खाना परोसकर उनके बीच ला रखा. रखकर वह चुपचाप चली गई.
तिर आकर पास ही चार तगलास पानी के रख तदए और तिर उसी भाांति चुपचाप चली गई.
कातलांदी को जैसे तकसी ने काट तलया.
िीनों तमत्र चुप रहे. उन्हें अनुभव हो रहा था तक पति-पत्नी के बीच तस्थति में कही कुछ िनाव प़िा हुआ है. अांि में एक ने
कहा, “कातलांदी, िुम िो कहिे थे, खाना बना नहीं हैं.”
कातलांदी ने झेंपकर कहा, “मेरा मिलब था, कािी नहीं है.”
दूसरे ने कहा, “कािी है. सब चल जाएगा.”
“देखूां, कुछ और हो िो” कहकर कातलांदी उठ गया.
आकर सुनन्दा से बोला, “यह िुमसे तकसने कहा था तक खाना वहाां ले आओ! मैंने क्या कहा था?
“चलो, उठा लाओ थाली. हमें तकसी को यहाां नहीं खाना है. हम होटल जाएांगे.”
सुनन्दा नहीं बोली. कातलांदी भी कुछ देर गुम ख़िा रहा. िरह-िरह की बािें उनके मन में और कां ठ में आिी थीं. उसे अपना
अपमान मालूम हो रहा था और अपमान असह्य था.
उसने कहा, “सुनिी नहीं हो तक कोई क्या कह रहा है? क्यों?”
सुनन्दा ने मुांह िे र तलया.
“क्या मैं बकिे रहने के तलए हां?”
सुनन्दा भीिर-ही-भीिर घुट गई.
“मै पूछिा हां तक जब मैं कह गया था िब खाना ले जाने की क्या जररि थीं? सुनन्दा ने मु़िकर और अपने को दबाकर
र्ीमे से कहा- “खाओगे नहीं! एक िो बज गया.”
कातलांदी तनरस्त्र होने लगा. यह उसे बुरा मालूम हुआ. उसने मानो र्मकी के साथ पूछा, “खाना और है!”
सुनन्दा ने र्ीमे से कहा, “अचार लेिे जाओ.”
5
“खाना और नहीं है! अच्छा, लाओ अचार.”
सुनन्दा ने अचार ला तदया और कातलांदी भी चला गया.
सुनन्दा ने अपने तलए कुछ भी बचाकर नहीं रखा था. उसे यह सूझा ही न था तक उसे भी खाना है. अब कातलांदी
के लौटने पर ही जैसे उसे मालूम हुआ तक उसने अपने तलए कुछ भी बचाकर नहीं रखा है. वह अपने से रुष्ट हई. उसका
मन कठोर हुआ. इसतलए नहीं तक क्यों उसने खाना नहीं बचाया. इस पर िो उसमें स्वातभमान का भाव जागिा था. मन
कठोर यों हुआ तक वह इस िरह की बाि सोचिी ही क्यों है? तछाः! यह भी सोचने की बाि है? और उसमें क़िवाहट भी
िै ली. हठाि यह उसके मन को लगिा ही है तक देखो उनन्होंने एक बार भी नहीं पूछा तक िुम क्या खाओगी. क्या मैं यह
सह सकिी थी तक मैं िो खाऊ
ां और उनके तमत्र भूखें रहें! पर पूछ लेिे िो क्या था? इस बाि पर उसका मन टूटिा-सा है.
मानों उसका जो ितनक-सा मान था वह भी कुचल गया हो. वह रह-रहकर अपने को स्वयां तिरस्कृि कर लेिी हुई कहिी है
तक ‘तछाःतछाः सुनन्दा, िुझे ऐसी जरा बाि का अब िक ख्याल होिा है. िुझे िो खुश होना चातहए तक उनके तलए एक रोज
भूखे रहने का पुण्य िुझे तमला है. में क्यों उन्हें नाराज करिी हां? अब से नाराज न कर
ां गी. पर वह अपने िन की भी सुर् िो
नहीं रखिे. यह ठीक नहीं है. मैं क्या कर
ां ?
और वह अपने बरिन माांजने में लग गई. उसे सुन प़िा तक वे लोग तिर जोर-शोर से बहस करने में लग गए हैं.
बीच-बीच में हांसी के कहकहे भी उसे सुनाई तदए. ओह! सहसा उसे ख्याल हुआ, बरिन िो पीछे भी मल सकिी हां.
लेतकन उन्हें कुछ जररि हुई िो, यह सोंचकर झटपट हाथ र्ो वह कमरे के दरवाजे के बाहर दीवार से लगकर ख़िी हो
गई.
एक तमत्र ने कहा, “अचार और है! अचार और मांगाओ, यार!”
कातलांदी ने अभ्यासवश जोर से पुकारा, ‘‘अचार लाना भाई, अचार.” मानो सुनन्दा कहीं बहुि दूर हो. पर वह िो बाहर
लगी ख़िी ही थी. उसने चुपचाप अचार लाकर रख तदया.
जाने लगी िो कातलांदी ने ितनक तस्नग्र् वाणी से कहा, “थो़िा पानी भी लाना.”
और सुनन्दा ने पानी ला तदया. देकर लौटी तिर बाहर द्वार से लगकर ओट में ख़िी हो गई तजससे कातलांदी कुछ माांगें िो
जल्दी से ला दे.
जैनेन्र कु मार :-
दनबंध संग्रहः 'प्रस्िुि प्रश्न' (1936), 'ज़ि की बाि' (1945), 'पूवोदय' (1951), 'सातहत्य का श्रेय और प्रेय' (1953), 'मांथन'
(1953), 'सोच तवचार' (1953), 'काम, प्रेम और पररवार' (1953), 'ये और वे' (1954), इिस्ििाः (1963), समय और हम
(1964), पररप्रेक्ष्य (1977), सातहत्य और सांस्कृति—इनके साहित्य और संस्कृहि संबंधी हनबंधों का संग्रि िै हिसे लहलि
शुक्ल ने संपाहिि करके प्रकाहशि हकया था। (1979)।
पुरस्कार / सम्मान
 1971 में पद्म भूषण
 1979 में सातहत्य अकादमी पुरस्कार

पत्नी-जैनेंद्र कुमार की कहानी और जीवन परिचय

  • 1.
    1 पत्नी: जैनेंद्र क ुमार की कहानी शहर के एक ओर तिरस्कृि मकान. दूसरा िल्ला, वहाां चौके में एक स्त्री अांगीठी सामने तलए बैठी है. अांगीठी की आग राख हुई जा रही है. वह जाने क्या सोच रही है. उसकी अवस्था बीस-बाईस के लगभग होगी. देह से कुछ दुबली है और सांभ्ाांि कुल की मालूम होिी है. एकाएक अांगीठी में राख होिी आग की ओर स्त्री का ध्यान गया. घुटनों पर हाथ देकर वह उठी. उठकर कुछ कोयले लाई. कोयले अांगीठी में डालकर तिर तकनारे ऐसे बैठ गई मानो याद करना चाहिी है तक अब क्या कर ां ? घर में और कोई नहीं और समय बारह से ऊपर हो गया है. उपन्यासः 'परख' (1929), 'सुनीिा' (1935), 'त्यागपत्र' (1937), 'कल्याणी' (1939), 'तववित' (1953), 'सुखदा' (1953), 'व्यिीि' (1953) िथा 'जयवर्तन' (1956) और 'मुति-बोर्'(कथा के पात्र-मैं, पत्नी-राजी, बेटी-अांजु(अन्जो) कहानी संग्रहः 'िााँसी' (1929), 'वािायन' (1930), 'नीलम देश की राजकन्या' (1933), 'एक राि' (1934), 'दो तचत़ियााँ' (1935), 'पाजेब' (1942), 'जयसांतर्' (1949) िथा 'जैनेंद्र की कहातनयााँ' (साि भाग)।। अनूदित ग्रंथः 'मांदातलनी' (नाटक-1935), 'प्रेम में भगवान' (कहानी सांग्रह-1937), िथा 'पाप और प्रकाश' (नाटक-1953)। सह लेखनः 'तपोभूमि' (उपन्यास,ऋषभचरण जैन क े साथ-1932)। संपादित-ग्रंथः 'सातहत्य चयन' (तनबांर् सांग्रह-1951) िथा 'तवचारवल्लरी' (तनबांर् सांग्रह-1952)। (सहायक ग्रांथ- जैनेंद्र- सातहत्य और समीक्ााः रामरिन भटनागर।)
  • 2.
    2 दो प्राणी घरमें रहिे हैं-पति और पत्नी. पति सवेरे से गए हैं तक लौटे नहीं और पत्नी चौके में बैठी है. सुनन्दा सोचिी है- नहीं, सोचिी कहाां है? असल-भाव से वह िो वहाां बैठी ही है. सोचने को है िो यही तक कोयले न बुझ जाएां. …वे जाने कब आ जाएांगे? एक बज गया है. कुछ हो, आदमी को अपनी देह की तिक्र करनी चातहए. …और सुनन्दा बैठी है. वह कुछ कर नहीं रही है. जब वे आएांगे िब रोटी बना देगी. वे जाने कहाां-कहाां देर लगा देिे है. और कब िक बैठूां? मुझसे नहीं बैठा जािा. कोयले भी लहक आए हैं. और उसने झल्लाकर िवा अांगीठी पर रख तदया. नहीं, अब वह रोटी बना ही देगी. उसने खीझकर जोर से आटे की थाली सामने खींच ली और रोटी बेलने लगी. थो़िी देर बाद उसने जीने पर पैरों की आहट सुनी. उसके मुख पर कुछ िल्लीनिा आई. क्ण-भर वह आभा उसके चेहरे पर रहकर चली गई और वह तिर उसी भाांति काम में लग गई. कातलांदीचरण पति आए. उनके पीछे-पीछे िीन और उनके तमत्र भी आए. ये आपस में बािें करिे आ रहे थे और खूब गमत थे. कातलांदीचरण अपने तमत्रों के साथ सीर्े अपने कमरे में चले गए. उनमें बहस तछ़िी थी. कमरे में पहुांचकर रुकी बहस तिर तछ़ि गई. ये चारों व्यति देशोद्धार के सांबांर् में कतटबद्ध हैं. चचात उसी तसलतसले में चल रही है. भारिमािा को स्विांत्र कराना होगा- और नीति-अनीति तहांसा-अतहांसा को देखने का यह समय नहीं है. मीठी बािों का पररणाम बहुि देखा. मीठी बािों से बाघ के मुांह से अपना तसर नहीं तनकाला जा सकिा. उस वि बाघ मारना ही एक इलाज है. आिांक! हाां, आिांक. हमें क्या आिांकवाद से डरना होगा? लोग हैं, जो कहिे हैं! आिांकवादी मूखत हैं, वे बच्चे हैं. हाां, वे हैं बच्चे और मूखत. उन्हें बुजगी और बुतद्धमानी नहीं चातहए. हमें नहीं अतभलाषा अपने जीने की. हमें नहीं मोह अपने बाल-बच्चों का. हमें नहीं गजत र्न-दौलि की. िब हम मरने के तलए आजाद क्यों नहीं हैं? जुल्म को तमटाने के तलए कुछ जुल्म होगा ही. उससे वे डरें जो डरिे हैं. डर हम जवानों के तलए नहीं है. तिर वे चारों आदमी तनश्चय करने लगे तक उन्हें खुद क्या करना चातहए. इिने में कातलांदीचरण को ध्यान आया तक न उसने खाना खाया है, न तमत्रों को खाने के तलए पूछा है. उसने अपने तमत्रों से मािी माांगकर छुट्टी ली और सुनन्दा की िरि चला. सुनन्दा जहाां थी, वहाां है. वह रोटी बना चुकी है. अांगीठी के कोयले उलटे िवे से दबे हैं. माथे को उांगतलयों पर तटकाकर वह बैठी है. बैठी-बैठी सूनी-सी देख रही है. सुन रही है तक उसके पति कातलांदीचरण अपने तमत्रों के साथ क्यों और क्या बािें कर रहे हैं. उसे जोश का कारण नहीं समझ में आिा. उत्साह उसके तलए अपररतचि है. वह उसके तलए कुछ दूर की वस्िु है, स्पृहणीय, मनोरम और हररयाली. वह भारिमािा की स्विांत्रिा को समझना चाहिी है, पर उसको न भारिमािा समझ में आिी है, न स्विांत्रिा समझ में आिी है. उसे इन लोगों की इस जोरों की बािचीि का मिलब ही नहीं समझ में आिा. तिर भी, सच उत्साह की उसमें ब़िी भूख है. जीवन की हौंस उसमें बुझिी-सी जा रही है, पर वह जीना चाहिी है. उसने बहुि चाहा तक पति उससे भी कुछ देश की बाि करें. उसमें बुतद्ध िो जरा कम है, पर तिर र्ीरे-र्ीरे क्या वह भी समझने नहीं लगेगी. सोचिी है, कम पढ़ी हां, िो इसमें मेरा क्या कसूर है? अब िो पढ़ने को िैयार हां. लेतकन पत्नी के साथ पति का र्ीरज खो जािा है. खैर, उसने सोचा उसका काम िो सेवा है. बस यह मानकर उसने कुछ समझने की चाह ही छो़ि रखी है. वह अनायास भाव से पति के साथ रहिी है और कभी उनकी राह के बीच में आने की नहीं सोचिी! वह एक बाि जानिी है तक उसके पति ने अगर आराम छो़ि तदया है, घर का मकान छो़ि तदया है, जान-बूझकर उख़िे-उख़िे और मारे-मारे जो तिरिे हैं, इसमें वे कुछ भला ही सोचिे होगें. इसी बाि को पक़िकर वह आपतिशून्य भाव से पति के साथ तवपदा-पर-तवपदा उठािी रही है. पति ने कहा भी है तक िुम मेरे साथ दुख क्यों उठािी हो, पर यह सुनकर वह चुप रह गई है. सोचिी रह गई तक देखो, कै सी बािें करिे हैं.
  • 3.
    3 वह जानिी हैतक तजसे सरकार कहिे हैं, वह सरकार उनके इस िरह के कामों से बहुि नाराज है. सरकार सरकार है. उसके मन में कोई स्पष्ट भावना नहीं है तक सरकार क्या होिी है, पर यह तजिने हातकम लोग हैं, वे ब़िे जबरदस्ि होिे हैं और उनके पास ब़िी-ब़िी िाकिे हैं. इिनी िौज, पुतलस के तसपाही और मतजस्रेट और मुांश और चपरासी और थानेदार और वायसरा-ये सब सरकार ही हैं. इन सबसे कै से ल़िा जा सकिा है? हातकम से ल़िना ठीक बाि नहीं है, पर यह उसी ल़िने में िन-मन तबसार बैठे हैं. खैर, लेतकन ये सब-के -सब इिने जोर से क्यों बोलिे हैं? उसको यही बहुि बुरा लगिा है. सीर्े-सादे कप़िे में एक खुतिया पुतलस का आदमी हरदम उनके घर के बाहर रहिा है. ये लोग इस बाि को क्यों भूल जािे हैं? इिने जोर से क्यों बोलिे हैं? बैठे-बैठे वह इसी िरह की बािें सोच रही हैं. देखो, अब दो बजेगें. उन्हें न खाने की तिक्र, न मेरी तिक्र. मेरी िो खैर कुछ नहीं, पर अपने िन का ध्यान िो रखना चातहए. ऐसी ही बेपरवाही से िो वह बच्चा चला गया. उसका मन तकिना भी भी इर्र-उर्र डोले, पर अके ली जब होिी है िब भटक-भटकाकर वह मन अांि में उसी बच्चे के अभाव पर आ पहुांचिा है. िब उसे बच्चे की वही-वही बािें याद आिी हैं- वे ब़िी प्यारी आांखें, छोटी-छोटी उांगतलयाां और नन्हें-नन्हें ओांठ याद आिे है. अठखेतलयाां याद आिी हैं. सबसे ज्यादा उसका मरना याद आिा है. ओह! यह मरना क्या है? इस मरने की िरि िो उससे देखा नहीं जािा. यद्यतप वह जानिी है तक मरना सबको है-उसको मरना है, उसके पति को मरना है. पर उस िरि भूल से छनभर देखिी है िो भय से भर जािी है. यह उससे सहा नहीं जािा. बच्चे की याद उसे मथ देिी है. िब वह तवह्वल होकर आांखें पोंछिी है और हठाि इर्र-उर्र की तकसी काम की बाि में अपने को उलझा लेना चाहिी है. पर अके ले में, वह कुछ करे, रह-रहकर वहीं याद-वही, वह मरने की बाि उसके सामने हो रहिी है और उसका तचि बेबस हो जािा है. वह उठी. अब उठकर बरिनों को माांज डालेगी, चौका भी साि करना है. ओह! खाली बैठी मैं क्या सोचिी रहा करिी हां. इिने में कातलांदीचरण चौके में आए. सुनन्दा कठोरिापूवतक शून्य को देखिी रही. उसने पति की ओर नहीं देखा. कातलांदी ने कहा, “सुनन्दा खाने वाले हम चार हैं. खाना हो गया!” सुनन्दा चून की थाली और चकला-बेलन और बटलोई, खाली बरिन वगैरह उठाकर चल दी, कुछ भी नहीं बोली. कातलांदी ने कहा, “सुनिी हो, िीन आदमी मेरे साथ और हैं. खाना बन सके िो कहो, नहीं िो इिने में ही काम चला लेंगे.” सुनन्दा कुछ भी नहीं बोली. उसके मन में बेहद गुस्सा उठने लगा. यह उससे क्मा-प्राथी से क्यों बाि कर रहे हैं, हांसकर क्यों नहीं कह देिे तक कुछ और खाना बना दो. जैसे मैं गैर हां. अच्छी बाि है, िो मैं भी गुलाम नहीं हां तक इनके ही काम में लगी रहां. मैं कुछ नहीं जानिी खाना-वाना और वह चुप रही. कातलांदीचरण ने जरा जोर से कहा, “सुनन्दा!” सुनन्दा के जी में ऐसा हुआ तक हाथ की बटलोई को खूब जोर से िें क दें. तकसी का गुस्सा सहने के तलए वह नहीं हैं. उसे ितनक भी सुर् न रही तक अभी बैठे-बैठे इन्हीं अपने पति के बारे में कै सी प्रीति की और भलाई की बािें सोच रही थी. इस वि भीिर-ही-भीिर गुस्से से घुटकर रह गई. “क्यों? बोल भी नहीं सकिी!” सुनन्दा नहीं बोली. “िो अच्छी बाि है. खाना कोई भी नहीं खाएगा.” यह कहकर कातलांदी िैश में पैर पटकिे लौटकर चले गए.
  • 4.
    4 कातलांदीचरण अपने दलमें उग्र नहीं समझे जािे, तकसी कदर उदार समझे जािे हैं. सदस्य अतर्किर तववातहि हैं, कातलांदीचरण तववातहि ही नहीं हैं, वह एक बच्चा खो चुके हैं. उनकी बाि का दल में आदर हैं. कुछ लोग उनके र्ीमेपन से रुष्ट भी हैं. वह दल में तववेक के प्रतितनतर् है और उत्पाि पर अांकुश का काम करिे हैं. बहस इिनी बाि पर थी तक कातलांदी का मि था तक हमें आिांक को छो़िने की ओर बढ़ना चातहए. आिांक से तववेक कुां तठि होिा है और या िो मनुष्य उससे उिेतजि ही रहिा है या उसके भय से दबा रहिा है. दोनों ही तस्थतियाां श्रेष्ठ नहीं हैं. हमारा लक्ष्य बुतद्ध को चारों ओर से जगाना है, उसे आिांतकि करना नहीं. सरकार व्यति और राष्र के तवकास के ऊपर बैठकर उसे दबाना चाहिी है. हम इसी तवकास के अवरोर् को हटाना चाहिें हैं- इसी को मुि करना चाहिें हैं. आिांक से वह काम नहीं होगा. जो शति के मद में उन्मि हैं, असली काम िो उनका मद उिाराने और उनमें कितव्यभावना का प्रकाश जगाने का है. हम स्वीकार करें तक उसका मद टक्कर खाकर, चोट पाकर ही उिरेगा. यह चोट देने के तलए हमें अवश्य िैयार रहना चातहए, पर यह नोचा-नाची उपयुि नहीं. इससे सिा का कुछ तबग़ििा िो नहीं, उलटे उसे अपने औतचत्य पर सांिोष हो जािा है. पर जब सुनन्दा के पास से लौटकर आया, िब देखा गया तक कातलांदी अपने पक् पर दृढ़ नहीं है. वह सहमि हो सकिा है तक हाां, आिांक जररी भी है. “हाां” उसने कहा, “यह ठीक है तक हम लोग कुछ काम शुर कर दें”. इसके साथ ही कहा, “आप लोगों को भूख नहीं लगी है क्या? उनकी िबीयि खराब है, इससे यहाां िो खाना बना नहीं. बिाओ, क्या तकया जाए? कही होटल चलें!” एक ने कहा तक कुछ बाजार से यही मांगा लेना चातहए. दूसरे की राय हुई तक होटल ही चलना चातहए. इसी िरह की बािों में लगे थे तक सुनन्दा ने एक ब़िी से थाली में खाना परोसकर उनके बीच ला रखा. रखकर वह चुपचाप चली गई. तिर आकर पास ही चार तगलास पानी के रख तदए और तिर उसी भाांति चुपचाप चली गई. कातलांदी को जैसे तकसी ने काट तलया. िीनों तमत्र चुप रहे. उन्हें अनुभव हो रहा था तक पति-पत्नी के बीच तस्थति में कही कुछ िनाव प़िा हुआ है. अांि में एक ने कहा, “कातलांदी, िुम िो कहिे थे, खाना बना नहीं हैं.” कातलांदी ने झेंपकर कहा, “मेरा मिलब था, कािी नहीं है.” दूसरे ने कहा, “कािी है. सब चल जाएगा.” “देखूां, कुछ और हो िो” कहकर कातलांदी उठ गया. आकर सुनन्दा से बोला, “यह िुमसे तकसने कहा था तक खाना वहाां ले आओ! मैंने क्या कहा था? “चलो, उठा लाओ थाली. हमें तकसी को यहाां नहीं खाना है. हम होटल जाएांगे.” सुनन्दा नहीं बोली. कातलांदी भी कुछ देर गुम ख़िा रहा. िरह-िरह की बािें उनके मन में और कां ठ में आिी थीं. उसे अपना अपमान मालूम हो रहा था और अपमान असह्य था. उसने कहा, “सुनिी नहीं हो तक कोई क्या कह रहा है? क्यों?” सुनन्दा ने मुांह िे र तलया. “क्या मैं बकिे रहने के तलए हां?” सुनन्दा भीिर-ही-भीिर घुट गई. “मै पूछिा हां तक जब मैं कह गया था िब खाना ले जाने की क्या जररि थीं? सुनन्दा ने मु़िकर और अपने को दबाकर र्ीमे से कहा- “खाओगे नहीं! एक िो बज गया.” कातलांदी तनरस्त्र होने लगा. यह उसे बुरा मालूम हुआ. उसने मानो र्मकी के साथ पूछा, “खाना और है!” सुनन्दा ने र्ीमे से कहा, “अचार लेिे जाओ.”
  • 5.
    5 “खाना और नहींहै! अच्छा, लाओ अचार.” सुनन्दा ने अचार ला तदया और कातलांदी भी चला गया. सुनन्दा ने अपने तलए कुछ भी बचाकर नहीं रखा था. उसे यह सूझा ही न था तक उसे भी खाना है. अब कातलांदी के लौटने पर ही जैसे उसे मालूम हुआ तक उसने अपने तलए कुछ भी बचाकर नहीं रखा है. वह अपने से रुष्ट हई. उसका मन कठोर हुआ. इसतलए नहीं तक क्यों उसने खाना नहीं बचाया. इस पर िो उसमें स्वातभमान का भाव जागिा था. मन कठोर यों हुआ तक वह इस िरह की बाि सोचिी ही क्यों है? तछाः! यह भी सोचने की बाि है? और उसमें क़िवाहट भी िै ली. हठाि यह उसके मन को लगिा ही है तक देखो उनन्होंने एक बार भी नहीं पूछा तक िुम क्या खाओगी. क्या मैं यह सह सकिी थी तक मैं िो खाऊ ां और उनके तमत्र भूखें रहें! पर पूछ लेिे िो क्या था? इस बाि पर उसका मन टूटिा-सा है. मानों उसका जो ितनक-सा मान था वह भी कुचल गया हो. वह रह-रहकर अपने को स्वयां तिरस्कृि कर लेिी हुई कहिी है तक ‘तछाःतछाः सुनन्दा, िुझे ऐसी जरा बाि का अब िक ख्याल होिा है. िुझे िो खुश होना चातहए तक उनके तलए एक रोज भूखे रहने का पुण्य िुझे तमला है. में क्यों उन्हें नाराज करिी हां? अब से नाराज न कर ां गी. पर वह अपने िन की भी सुर् िो नहीं रखिे. यह ठीक नहीं है. मैं क्या कर ां ? और वह अपने बरिन माांजने में लग गई. उसे सुन प़िा तक वे लोग तिर जोर-शोर से बहस करने में लग गए हैं. बीच-बीच में हांसी के कहकहे भी उसे सुनाई तदए. ओह! सहसा उसे ख्याल हुआ, बरिन िो पीछे भी मल सकिी हां. लेतकन उन्हें कुछ जररि हुई िो, यह सोंचकर झटपट हाथ र्ो वह कमरे के दरवाजे के बाहर दीवार से लगकर ख़िी हो गई. एक तमत्र ने कहा, “अचार और है! अचार और मांगाओ, यार!” कातलांदी ने अभ्यासवश जोर से पुकारा, ‘‘अचार लाना भाई, अचार.” मानो सुनन्दा कहीं बहुि दूर हो. पर वह िो बाहर लगी ख़िी ही थी. उसने चुपचाप अचार लाकर रख तदया. जाने लगी िो कातलांदी ने ितनक तस्नग्र् वाणी से कहा, “थो़िा पानी भी लाना.” और सुनन्दा ने पानी ला तदया. देकर लौटी तिर बाहर द्वार से लगकर ओट में ख़िी हो गई तजससे कातलांदी कुछ माांगें िो जल्दी से ला दे. जैनेन्र कु मार :- दनबंध संग्रहः 'प्रस्िुि प्रश्न' (1936), 'ज़ि की बाि' (1945), 'पूवोदय' (1951), 'सातहत्य का श्रेय और प्रेय' (1953), 'मांथन' (1953), 'सोच तवचार' (1953), 'काम, प्रेम और पररवार' (1953), 'ये और वे' (1954), इिस्ििाः (1963), समय और हम (1964), पररप्रेक्ष्य (1977), सातहत्य और सांस्कृति—इनके साहित्य और संस्कृहि संबंधी हनबंधों का संग्रि िै हिसे लहलि शुक्ल ने संपाहिि करके प्रकाहशि हकया था। (1979)। पुरस्कार / सम्मान  1971 में पद्म भूषण  1979 में सातहत्य अकादमी पुरस्कार