अर्न्तव्यथा
- श्रीमती शक
ु न्तला प्रसाद
शालिनी जी पेशे से अध्यापिका हैं। उम्र 40-45 क
े आसपास होगी।
एक बेटी है, रानू जो बी.कॉम. फाईनल ईयर में पढ़ रही है। पति भिलाई स्टील प्लान्ट
में काम करते हैं।
कारखाने की तरफ से ही एक बढ़िया क्वाटर मिला हुआ है। पति अपने में ही मग्न
रहते हैं, दोस्ती यारी भी बहुत कम है।
ऑफिस से घर, घर से ऑफिस और बचा हुआ वक्त परिवार क
े साथ बिताते हैं।
शालिनी जी अच्छी डील - डौल वाली दोहरे कद की महिला हैं।
अध्यापिका होने की वजह से समय की बहुत पाबन्द हैं। घर का सारा काम वक्त पर
होना ज़रूरी है।
पति और बेटी से भी इसमें पूरी मदद मिलती है। थोड़ी दबंग स्वभाव और नौकरी
पेशा होने की वजह से पड़ोसियों से गपशप करने का वक्त नहीं मिल पाता है, फिर
भी मुहल्ले की पूरी ख़बर रखती हैं।
रोज़ शाम को सब्जी - भाजी लेकर, एक घण्टे की सैर करते हुए घर लौटना उनकी
दिनचर्या का हिस्सा है। अध्यापक वर्ग की यूँ भी समाज में बहुत इज्जत होती है, -
साथ, अपनी व्यवहार क
ु शलता क
े लिए भी लेकिन शालिनी जी इस मान क
े साथ
मशहूर हैं।
उस दिन संयोग से,
शालिनी जी क
े पति ऑफिस क
े किसी जरूरी काम क
े लिए घर से बाहर गए हुए थे।
शालिनी जी क
े स्क
ू ल की भी छ
ु ट्टी थी। दोपहर का खाना खा कर दोनों माँ-बेटी
टेलीवीज़न देखने बैठ गईं।
काफी देर तक प्रोग्राम देखने क
े बाद, दोनों की आँख कब लगी पता ही नहीं चला।
शाम को साढ़े चार बजे जब रानू की म्यूज़िक टीचर ने डोर बेल बजाई, तभी दोनों
हड़बड़ा कर उठीं।
हाथ-मुँह धोकर शालिनी जी ने चाय बनाई।
चाय पी कर रानू संगीत सीखने बैठ गई। उसकी म्यूज़िक टीचर सप्ताह में दो दिन,
दो घण्टे क
े लिए आती हैं।
शालिनी जी तैयार हो कर सैर पर निकलने लगीं, तो रानू से बोलीं,"लौटने में थोड़ी देर
हो जाएगी, मीरा जी से मिल कर आऊ
ँ गी।
वे दो-तीन दिन से स्क
ू ल नहीं आई हैं।" शालिनी जी घर से निकल कर बड़े पार्क की
ओर न जा कर, घर से 5-6 ब्लॉक पीछे एक छोटा सा पार्क है, वहीं जाने लगीं।
रोज़ वे घर से दूर बड़े वाले पार्क में घूमने जाया करती थीं। इस पार्क में सैर करने क
े
लिए अच्छी सड़क और रोशनी का इन्तजाम भी बढ़िया है। यह पार्क टहलने क
े लिए
रात नौ बजे तक खुला रहता है।
लॉन टेनिस और बैडमिन्टन खेलने का इन्तज़ाम होने की वजह से पार्क में 9-10 बजे
तक खूब रौनक रहती है।
दूसरी सबसे अच्छी बात,
पार्क क
े बगल में मौजूद बाज़ार है,
जहाँ आमतौर पर ज़रूरत की हर चीज़ मिल जाती है।
शालिनी जी सैर करने क
े बाद, इसी बाज़ार से ज़रूरत की चीज़े लेकर घर लौटती हैं,
लेकिन आज उन्हें सब्जी वगैरह क
ु छ नहीं खरीदना था।
मीरा जी का घर भी छोटे पार्क से पास पड़ेगा, सोचकर आज उन्होंने इधर कर रूख
किया था।
इस पार्क में दो गेट हैं, इनमें से एक हमेशा बन्द रहता है । बन्द गेट क
े पास बच्चों ने
दीवार तोड़ कर पार्क में आने-जाने का रास्ता बना लिया था।
इस पार्क में बच्चों की संख्या अच्छी-खासी रहती है। आसपास क
े सभी बच्चे
खेलने-क
ू दने क
े लिए यहीं आते हैं।
झूले बच्चों की कमज़ोरी होते हैं, मानिए कि बच्चों की बिन मागे मुराद पूरी हो गई
हो। क्योंकि किसी आदमी को खुशी देने वाली दो आँखों की तरह, पार्क में बच्चों क
े
लिए दो झूले भी लगे थे।
कहीं बच्चे गेंद से उछल क
ू द कर रहे हैं, तो कहीं अठखेलियाँ करती लड़कियाँ
रूमाल-चोर खेल रही हैं।
शालिनी जी पार्क क
े भीतर वाली सड़क पर टहलने लगीं। क
ु छ लोग पहले से ही टहल
रहे थे।
क
ु छ महिलाएं पार्क की बैंच पर बैठी गप्पों में मशगूल थीं।
चलते चलते जब शालिनी जी थक गई तो एक बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगीं।
अचानक उनका ध्यान पार्क क
े एक कोने में पत्थर की बेंच पर बैठी एक महिला पर
गई, वह काफी देर से गुमसुम सी अक
े ले बैठी थी।
थोड़ी देर तक शालिनी जी उसे देखती रहीं, और जब उनसे न रहा गया तो उसी बेंच
पर, उसक
े पास जा बैठीं।
वह 70–80 साल की एक उम्र दराज महिला थी।
तन पर सफ
े द सूती घोती. गोरा रंग, दुबला-पतला शरीर, वह शायद रो रही थी।
अंधेरा होने लगा था. लेकिन अभी तक पार्क की बत्तियां नहीं जली थीं, इसलिए क
ु छ
स्पष्ट नहीं हो रहा था।
वह बैंच पर पैर मोड़ कर बैठी थी, शालिनी जी को देख कर उसने पैर नीचे कर लिए।
थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप बैठी रहीं।
धीरे-धीरे पार्क की गहमागहमी छंटने लगी और बत्तियां भी जल गईं, लेकिन वह
चुपचाप वैसे ही बैठी रही। शालिनी जी को आज कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बेटी को देर
से आने क
े बारे में बता ही आई थीं। इस बूढ़ी औरत को देखने क
े बाद, मीरा जी क
े घर
जाने का विचार त्याग कर, शालिनी जी वहीं बैठ गईं।
बूढ़ी औरत से बात शुरू करने क
े लिए कोई भूमिका सोच ही रही थीं कि तीन
लड़कियां दौड़ती हुई आईं और उस बूढ़ी औरत से बोलीं, “दादी दादी.... घर चलो" ।
वृद्धा जो अभी तक अनमनी सी बैठी थी, तैश में आकर कड़क आवाज़ में बोली,
"तुम लोग यहां क्या करने आई हो, चलो भागो यहाँ से."
तीनों लड़कियां जैसी आई थीं, वैसे ही पलट गईं।
शालिनी जी ने महसूस किया कि, उसकी आवाज़ में बहुत दम था,
ऐसा लग रहा था कि शरीर की सारी ताकत गले में समा गई हो। थोड़ा साहस जुटा
कर शालिनी जी ने उससे पूछा,
"अम्माँ , कहाँ की रहने वाली हो?" वृद्धा ने शालिनी जी की ओर देखा, शालिनी जी
क
े दिमाग में विचार कौंधा , "जरूर यह कहेगी कि तुम्हें इससे मतलब लेकिन वृद्धा
ने जवाब दिया, "मीठापुर की"।
अब यह मीठापुर कहां है, ज़्यादा पूछताछ करने से कहीं अम्मा का पारा न चढ़ जाए,
इस विचार क
े साथ शालिनी जी अपने बारे में ही बताने लगीं।
मैं यहीं पास में रहती हूं स्क
ू ल में टीचर हूं…
बात को अधूरा सा छोड़कर यकायक पूछ बैठी, -
"ये तीनो लड़कियां क्या आपकी पोतियां हैं?"
अम्मा क
ु छ सहज हो चुकी थी,
"नहीं वह जो लाल स्कर्ट पहने थी न... बस वही मेरी पोती, बाकी दोनों पड़ोस क
े
शर्मा जी की बेटियां थीं।
मेरा एक पोता है, पांचवीं में पढ़ता है, वो अभी ट्यूशन पढ़ने गया होगा।"
शालिनी जी ने पूछा, "अम्मा, आप यहां पर कहां रहती हो, मीठापुर तो आपका गांव
होगा न । "
अम्मा ने पार्क क
े बन्द गेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यही गेट जो बन्द रहता
है न... उसी क
े सामने वाले मकान में...... बेटा कारखाने में अफसर है, उसी क
े साथ
रहती हूं।
मीठापुर में घर-द्वारा है, ज़मीन-जायदाद है, देवर और उनक
े बच्चे वहीं रहते हैं।
मेरी तीन लड़कियां है, सबका ब्याह हो चुका है, सबकी सब बाल-बच्चेदार हैं। मेरी
छोटी बेटी भी हाई स्क
ू ल में पढ़ाती है।
सब बहनों से छोटा, यही लड़का है।
एक ही लड़का है, लेकिन इसकी पत्नी बहुत झगड़ालू स्वभाव की है।
घुन्नी है, मुंह से तो कम बोलेगी, मगर करती मनमानी है। किसी से नहीं बनती
उसकी।
सारे मुहल्ले वाले हंसते हैं, लेकिन उसको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
यह सब क
ु छ सुनने क
े बाद, शालिनी जी को सहसा अपनी महरी की बातें याद आ
गईं।
एक दिन बता गई थी कि, "पीछे क
े ब्लॉक में करण साहब रहते हैं, उन्होंने अपनी
मर्जी से शादी की है।
करण साहब खुद तो देखने में काफी सुन्दर हैं, लेकिन उनकी पत्नी बस ठीक-ठाक ही
है, रंग भी सांवला है।
दुबला-पतला शरीर..... साहब की अम्मा साथ ही रहती हैं। एकदम बुढ़िया लेकिन,
गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श, लम्बी, दुबली-पतली हैं।
इस उम्र में भी उनक
े सामने बहू पानी भरती है। करण साहब की तीन बहनें भी हैं,
कभी-कभी आती-जाती हैं, उनक
े घर में तो सब बहुत सुन्दर और खूबसूरत हैं।
सास-बहू में एकदम पटरी नहीं खाती...
बहू क
ु छ बोलती भी नहीं है, लेकिन अम्मा हमेशा क
ु छ न क
ु छ बड़बड़ाती रहती हैं।
साहब ने अपनी मर्ज़ी से शादी की है न... इसलिए अम्मा नाराज़ रहती हैं।
करण साहब की हालत तो सांप और छछ
ुं दर वाली हो जाती है,
माँ की तरफ से बोले तो पत्नी नाराज़ और पत्नी की तरफ से एक भी शब्द मुंह से
निकला नहीं कि अम्मा अन्न-जल त्यागने लगती हैं।”
शायद यह अम्मा वही हैं,
हुलिया भी वही है जो महरी ने बताया था...
शालिनी जी ने अपने मन में सोचा...
जब बात निकल ही गई है तो क्यों न पूछ ही पक्का कर लूं कि वही है या कोई और!
इसलिए शालिनी जी ने पूछ लिया, “अम्मा.... शादी क
े समय लड़की और उसका
घर-परिवार नहीं देखा था क्या. ..?
हम लोग तो सब क
ु छ पता लगाते हैं।" अम्मा ने अपना माथा पकड़ते हुए आवज़ में
जवाब दिया, "अरे बिटिया... देखती क्या...
इसने तो लड़क
े पर ऐसा जादू चला दिया था कि वह और किसी से शादी करने को
तैयार ही नहीं था। एक से एक सुन्दर लड़कियों क
े फोटो दिखाए, लेकिन ये टस से
मस नहीं हुआ, जो भाग्य में लिखा होता है वही तो होता है। हार कर इसक
े पिता जी
ने रजामन्दी दे दी।
बाकी घर-परिवार में इस शादी क
े पक्ष में कोई नहीं था।
करण क
े चाचा ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर करण दूसरी जगह शादी को
तैयार नहीं है तो न करे शादी।
इस लड़की का न तो घर-परिवार हमारे लायक है और न ही लड़की। पहले तो करण
क
े पिता जी ने भी मना कर दिया था,
लेकिन 'हइ है वही जो राम रचि राखा’, बहू क
े पिता पीछे पड़े रहे। कहने लगे कि
आपक
े हाथ जोड़ता हूं, एक लड़की का उद्धार कर दो।
मीठापुर क
े पास क
े गांव क
े थे, करण क
े पिता जी क
े साथ एक ही स्क
ू ल में पढ़ते थे।
दोस्ती तो कोई खास नहीं थी, लेकिन पुरानी जान-पहचान ज़रूर कह सकते हैं।
शहर में नौकरी करते थे,
वहीं पर करण कॉलेज में पढ़ता था।
जान-पहचान की वजह से आना-जाना हो गया, बस लड़की ने डाल डोरे फ
ं सा लिया।
करण क
े पिता जी सीधे स्वभाव क
े थे, इन लोगों ने उन्हें उलटी-सीधी पट्टी पढ़ा कर
उनकी मति भ्रष्ट कर दी थी।
इधर करण ने भी घर को अशान्त कर रखा था, सो करण क
े पिता जी उलटा हम
सबको ही समझाने लगे... लड़की सुन्दर नहीं है तो क्या हुआ,
सब एक जैसे तो नहीं होते, फिर सबसे बड़ी बात तो ये है कि लड़क
े को पसन्द है तो
हम लोगों का क्या? रही बात घर परिवार कमज़ोर होने की, तो कौन हम लोग उनक
े
घर अपनी लड़की देने जा रहे हैं।
लड़की जात-बिरादरी की है.
इकलौता लड़का है,
इसका दिल तोड़ना ठीक नहीं, इसलिए सब लोग शादी क
े लिए हां कर दो और ये
शादी होने दो।
इस तरह बेटे की ज़िद पर उन्होंने यह शादी होने दी।
मेरे देवर ने भी बड़े भाई क
े खिलाफ एक शब्द नहीं कहा, फिर भी वो बारात में
शामिल नहीं हुए।
बहू क
े पिता ने ठीक ही कहा था, एक लड़की का उद्धार कर दो, सो उनकी लड़की का
उद्धार तो हो गया, लेकिन हमारे नसीब फ
ू ट गए।
खुद तो चले गए और मेरी छाती पर मूंग दलने को ये यमराज बिठा गए।"
...
इतना कह कर बूढ़ी औरत शान्त हो गई, शायद क
ु छ सोच रही थीं, और सहसा बोलीं,
“सुबह चौका-बर्तन महरी करती है, छः बजे उठकर दरवाज़ा मैं खोल देती हूं । जब
काम करक
े चली जाती है, पूरा घर तब सो कर उठता है।
बहू... अरे बहू से तो नौ बजे तक खाना भी तैयार नहीं होता। कभी दाल कच्ची तो
कभी सब्जी कच्ची रह जाएगी। मैनें तो बोलना ही छोड़ दिया है, जो मर्जी हो सो
करो। जैसे-तैसे घर का काम निबटा कर बच्चों को स्क
ू ल और पति को ऑफिस भेज
दिया और लगी मुहल्ले की सैर करने। कभी महिला मण्डली इनक
े घर जमेगी, तो
कभी ये किसी क
े घर में जमेंगी। अगर किसी दिन ऐसा नहीं हुआ तो सारा दिन पलंग
तोड़ेंगी। एक हमारा समय था....... घर क
े काम-काज से फ
ु रसत ही नहीं मिलती थी।
बड़ा परिवार था, गृहस्थ का घर था, रोज खेत में काम करने वाले मज़दूरों का भी
खाना बनता था। सब लोग अपने-अपने समय पर खाना खाने आते थे। खाना देने से
पहले चौका लगता था, फिर आसन बिछता था। दाल-सब्जी सब क
े लिए
अलग-अलग कटोरिया होती थीं। आजकल की तरह नहीं कि खाना निकाल कर मेज़
पर रख दिया जिसको खाना है खाओ, जिसको नहीं खाना है... सो मत खाओ। जग में
पानी रख दिया, सब उसी से लेकर पियो, खाना भी खुद परोसो एक ही मेज़ पर पति,
उसी पर पत्नी, और वहीं बच्चे। जूठे से कोई परहेज नहीं, बड़ों का कोई लिहाज ही
नहीं। टेबल पर प्लास्टिक की चादर बिछा दी, कपड़े से पोंछ दिया, बस हो गया सब
क
ु छ पवित्र ।
अब तो बच्चों को भी बंधे हुए समय से खाना मिलता है। मेरा करण जब छोटा था तब
जब में खाना खाने बैठूं तब तक वह चार बार खा चुका होता था। मेरी बेटियां भी
लंबी-चौड़ी हैं। मेरी पोती को देखा.... क
ै सी चुहिया सी है, बारह वर्ष की हो गई है,
अरे..... कोई कहेगा देखकर ! दोनों मां-बेटी को बस फ
ै शन का ध्यान रहता है। बेटी तो
बच्ची है, भला उसका क्या दोष, लेकिन मां को तो समझाना चाहिए न...। कितनी
बार बहू से कहा, बेटा गुड़िया की फ्राक घुटने से नीचे बनवाओ, उसकी स्कर्ट-फ्राक
सब घुटने से चार अंगुल ऊपर रहते हैं, बड़े-बड़े पैर दिखते हैं सो अच्छा नहीं लगता,
लेकिन बहू को मेरी बात अच्छी नहीं लगी, "बोली आजकल का यही फ
ै शन है।” भला
टांगें दिखाना कोई फ
ै शन है? बच्ची को बिगाड़ कर रख देगी। करण ने तो बहू को
सिर पर बिठा रखा है। वह कभी भी मेरे सामने सिर नहीं ढकती है, पता नहीं अपने
को कहां की हेमामालिनी समझती है?
जी में तो आता है पुछ
ूं - रोज जो आइना देखती हो, उसमें तुमको अपनी शक्ल नहीं
दिखती है, लेकिन बेटे का मुंह देख कर चुप रह जाती हूं। इसकी मां ने कोई
तौर-तरीका भी नहीं सिखाया, बस चालाकी जाने कहां से सीख कर आई है? करण क
े
सामने तो मां जी... मां जी. . करती रहेगी, करण को लगता है कि उसकी पत्नी मां
का कितना ध्यान रखती है !!! किसी क
े सामने मुंह नहीं खोलेगी, सबको लगता है
कितनी भली है।
सबको तो इसने बता रखा है कि हम लोगों ने अपनी पसंद से शादी की है, इसलिए
माताजी को मैं नहीं सुहाती हूं तुम्हीं बताओ बेटा इसकी सूरत से मुझे क्या
लेना-देना? कम से कम सीरत तो अच्छी होती। शालिनी जी ने कहा, "बिल्क
ु ल ठीक
कहती हो अम्मा। सूरत तो भगवान ने बनाई है, उसमें किसी का वश नहीं चलता।"
शालिनी जी को अम्मा की बातें सुनना बड़ा अच्छा लग रहा था, कहीं चुप न हो जाएं
इसलिए बोलीं, "मेरी महरी ने भी यही बताया था कि साहब ने अपनी पसंद से शादी
की थी, इसलिए अम्मा हमेशा उन पर गुस्सा करती रहती हैं। यह तो अच्छा हुआ
आज आपका दर्शन हो गया और सारी बातें साफ हो गईं। वृद्धा की आंखें चमकने
लगीं। चालाकी तो कोई इससे सीखे। गुस्से में मैं चिल्लाने लगती हूं और वह चुप हो
जाएगी या क
ु छ ऐसा बोल देगी कि मेरा गुस्सा और बढ़ जाए, लोग मेरी आवाज़
सुनेगें तो मुझे ही बुरा बोलेगें न। मैं क्या करू
ं , इसकी कितनी बातें बरदाश्त करू
ं ?
पहले तो मैं खून का घूंट पी कर रह जाती थी, अब नहीं रहा जाता। कभी अगर चुप
भी रह जाती हूं तो इसकी अक्ल में घुसता ही नहीं, हार कर मुझे बोलना ही पड़ता है।
बहुत राह देखी, सोचती थी धीरे-धीरे समझ जाएगी, लेकिन यह तो जैसे-जैसे पुरानी
हुई. इसकी दुम मोटी ही होती चली गई। मेरी तो यह तनिक भी परवाह नहीं करती
है। आप ही सोचो बेटा, जब सास ज़मीन पर चटाई बिछा कर बैठी हो तो बहु को पलंग
पर बैठना शोभा देगा? हमेशा बरदाश्त कर जाती थी, सोचती थी ध्यान नहीं जाता
होगा, पर इसने तो आदत बना ली है। जब मैं ज़मीन पर बैठ कर खाना खा रही होती
या क
ु छ पढ़ती होती तो यह क
ु र्सी पर बैठ कर क
ु छ करने लगती। दो-चार बार तो मुझे
ऐसा लगा जैसे जान-बूझ कर ऐसा करती है, तभी हमेशा करण क
े पीछे से ऐसा
करती, अगर अनजाने में ऐसा होता तो कभी तो उसक
े सामने भी बैठती। तब भी मैं
क
ु छ नहीं बोली। मन ही मन में सोचा- किसी दिन करण क
े सामने जब मैं नीचे बैठी
होऊ
ँ , तब तुम ऊपर बैठना। एक न एक दिन तुम से चूक होगी ही, कितने दिन
चालाक बनोगी, फिर देखती हूं करण तुम्हें क
ु छ बोलता भी है या जोस का गुलाम बन
कर मुंह बंद किए रहेगा? एक साल पहले की बात है, मेरा धैर्य जवाब दे गया, ग्यारह
बजे क
े करीब नहा-धो कर, पूजा-पाठ करक
े , मैं खाना खाने बैठी थी। सर्दी का दिन
था... सो बहू से बोली मुझे आंगन में ही खाना दे दो, टेबल-क
ु र्सी पर बैठ कर खाने में
मेरा मन नहीं भरता है। आंगन में चटाई बिछी थी, उसी पर बैठ कर मैं खाने लगी। मैं
खाना खा ही रही थी कि पड़ोस की दो औरतें आ गई। आजकल तो घर में किसी को
कोई काम रहता ही नहीं है। सब बाजार से क
ु टा–पिसा आ गया, चौका बर्तन क
े लिए
घर-घर महरी हैं, एक दो बच्चे हैं, जो स्क
ू ल चले जाते हैं। पति जो सुबह से निकला
शाम को ही आएगा। रामायण, गीता पढ़ने से कोई मतलब ही नहीं है। अब तो एक ही
काम बचा, इस घर से उस घर क
े चक्कर काटना। दोनों औरतें हाथ में ऊन-कांटा लिए
सीधे आंगन में आ गईं। बहु को तो समझाना चाहिए था न कि अम्मा खाना खा रही
हैं, सब बैठक में बैठो।
वृद्धा ने शालिनी जी की ओर देखकर पूंछा, "क्या मैं गलत बोल रही हूं?"
नहीं.. अम्मा आप बिल्क
ु ल ठीक कह रही हैं, इतना तो तौर तरीका होना ही चाहिए।
शालिनी जी क
े जवाब से वष्ट्वा संतुष्ट होकर बोली- आंगन में चारपाई बिछी थी,
दोनों उस पर बैठ गईं। मुझे नमस्ते भर किया और कोई बात नहीं की। पास में चटाई
पर बैठ कर खाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, परन्तु क्या करती इन्हें तो क
ु छ कहा
नहीं जा सकता था, ये तो मेहमान थीं। यह तो बहू को समझना चाहिए था न... पर
हाय रे करम!!! इतने में मेरी बहू बगीचे से एक क
ु र्सी ले आई और खाट से सटाकर
क
ु र्सी पर बैठ गई। मेरा पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। मैंनें बहुत अपमानित
महसूस किया। मैं खाना छोड़कर चुपचाप उठ गई। बहू को ज़रूर खटका लगा होगा,
तभी उसने पूंछा था, "अम्मा खाना क्यों छोड़ दिया?" सारा दिन मेरा मन कचोटता
रहा, अब ये दिन भी आ गए। बहू क
ु र्सी पर बिराजेगी और सास को उनक
े पैर क
े पास
बैठ कर रोटी खानी पड़ेगी। अभी भी मीठापुर में मेरा मकान है, खेती-बाड़ी है। करण
क
े पिताजी मेरे लिए बहुत क
ु छ छोड़ कर गए हैं। मेरी जिन्दगी अब कितने दिनों की
है। अम्मा बोलते-बोलते रुक गई. उनका गला रुंध गया था।
थोड़ी देर बाद पुनः बोली, मीठापुर में अभी देवर भी हैं। दो बरस पहले उनकी पत्नी
गुजर गई है। उनका एक बेटा शहर में कमाता है। जब से उसकी मां गुजरी है, तब से
पत्नी और बच्चों को गांव में लाकर रख दिया है। गांव वाले और सगे सम्बन्धियों ने
उसे बहुत समझाया, बच्चों को शहर से लाकर गांव क्यों छोड़ रहे हो? वहां पढ़ कर
क
ु छ अच्छा बन पाएंगे, लेकिन वह नहीं माना, बोला- मैं तो यहीं से पढ़-लिख कर
शहर में नौकरी करता हूं, बच्चे अभी छोटे हैं, यहां पढ़ें, जब बड़े होकर अक
े ले मेरे साथ
रहने लायक होंगे तब वहां पढ़ेंगे। मैं बड़ा लड़का हूं, पिता क
े प्रति मेरा भी तो क
ु छ
फर्ज है। छोटा भाई सारा दिन खेत-खलिहान में व्यस्त रहता है, सब तो वही देखता
है, उसकी पत्नी क
े तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। पिता जी अक्सर अस्वस्थ्य हो जाते हैं।
छोटी बहू, बच्चे और पिता जी सबकी देखभाल क
ै से कर सक
े गी? यह तो हम लोगों
को समझना पड़ेगा। अगर हम अपना फर्ज भूलेंगे, तब मेरा बेटा क्या सीखेगा?
शालिनी जी ने कहा- "वाह बहुत समझदार हैं। दोनों क्या आपक
े बेटे से छोटे हैं?"
वृद्धा ने कहा- हां! देवर जी की शादी मेरी शादी क
े पांच साल बाद हुई थी। उनको भी
पहले चार लड़कियां हुईं, फिर बाद में दो लड़क
े हुए। बड़ा लड़का करण से दो साल
छोटा है और छोटा लड़का छः बरस छोटा है। मेरी देवरानी बड़ी भाग्यवाली थी. उतनी
ही होशियार थी। चारों बेटियां अच्छे घरों में ब्याही गईं हैं। दोनों बेटे पढ़े-लिखे हैं। बड़ा
शहर में रहता है तो छोटा खेती-बाड़ी देखता है, चाहता तो वह भी शहर में नौकरी
करता, फिर घर द्वार और माता-पिता को कौन देखता? दोनों बहुएं जितनी सुन्दर
हैं, उतनी ही भली मानस। दोनों ही मुझे बार-बार गांव बुलाती हैं, कहती हैं आप यहीं
गांव में रहो अम्मा। आपक
े गांव में रहने से रौनक रहती है। जब भी मैं वहां जाती हूं,
एक काम नहीं करने देती हैं, कहती हैं- अम्मा आप बैठो. अगर आपको काम करना
पड़े तो हम लोग किसलिए हैं? जब तक मैं खाना न खा लूं तब तक दोनों भूखी-प्यासी
बैठी रहेगीं। एक अपनी बहू है, सुबह सो कर उठी नहीं कि चाय क
े साथ एक पैक
े ट
बिस्क
ु ट चबा जाती है।
शालिनी जी इतना तो समझ गई थीं कि वृद्धा की बहू विचारवान नहीं होगी, वर्ना
कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जो बहू क
े नाक में नक
े ल डालती हो। शालिनी जी ने कहा
अम्मा आप तो बिल्क
ु ल मेरी मां जैसी हो, आपकी बेटी भी टीचर है और मैं भी टीचर
हूं। आपकी बातें सुनकर मुझे बहुत अफसोस हुआ। आपने उस दिन खाना कब खाया
यह बताइए ।
उस दिन तो मुझे बहुत गुस्सा था। जितनी मैंने इसको छ
ू ट दी, जितना बर्दाश्त किया
उतना ही ये मेरे सिर पर चढ़ती गई। शाम को जब मेरा बेटा आया तब मैंने सामने
उसे सारी बातें बता दी। बहू को सामने इसलिए खड़ा किया कि बाद में कहीं ये न बोले
कि मैं झूठ बोलकर घर में आग लगाती हूं। मैंने बेटे को भी कह दिया कि अगर तुम्हें
मैं भारी लगती हूं, तो तुरन्त मुझे गांव पहुंचा दो। तुमने अपनी मर्जी से शादी की,
मैने मान लिया, तुम्हें बहू बहुत पसंद है, इसमें मुझे कोई दुःख नहीं है, लेकिन मैं
इसक
े बाप की नौकरानी नहीं, तुम्हारी मां हूं. इस बात का इसे सदा ख्याल रखना
होगा और भी गुस्से में बहुत क
ु छ अनाप-शनाप बोल दिया। बहू तो एकदम शान्त हो
गई। उससे तो क
ु छ बोलते ही नहीं बना। गलती तो उसने की थी, सो आसू बहाने
लगी। उस दिन इनक
े मगरमच्छी आंसू काम नहीं आए। करण ने मेरे सामने बहुत
फटकार लगाई, दोबारा ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए। तुम्हारी चाहे जितनी बातें सुन
लूं, लेकिन मां क
े शान क
े खिलाफ क
ु छ बर्दाश्त नहीं करू
ं गा। उस दिन से आजतक
फिर इसने कभी ऐसी बदमिजाजी नहीं की।
शालिनी जी ने कहा, “बिल्क
ु ल अम्मा ऐसा ही होना चाहिए। सास की कद्र करने वाली
बहू की सभी प्रशंसा करते हैं।" शालिनी जी को लगा बहू इतनी बदमिज़ाज क्यों है? हो
सकता है प्रेम विवाह में क
ु छ दान-दहेज नहीं मिला हो और यह बहू को हमेशा ताना
देती हों, इसी से बहू खफा होगी। थोड़ी देर दोनों चुप रहीं, शालिनी जी सोचती रहीं
क
ै से पूछ
ू ? थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करक
े शालिनी जी ने पूछा- "शादी क्या
आपक
े रीति-रिवाज क
े मुताबिक हुई थी, या उन लोगों ने सोचा कि जब प्रेम-विवाह
हो रहा है, तो क
ु छ देने की क्या ज़रूरत, जितना कम में हो जाए उतना अच्छा।”
बिल्क
ु ल ठीक कहा तुमने बेटा। इसक
े बाप ने क
ु छ नहीं दिया। गहना - जेवर तो दूर
की बात है, सबक
े लिए कपड़े भी नहीं दिए। बारात को किसी तरह खिला कर एक
दिन में ही विदा कर दिया। वह तो मेरी देवरानी बहुत होशियार थी, सबक
े सामने
बक्सा ही नहीं खोला, चाभी गुम होने का बहाना बना दिया। जब गांव की औरतें चली
गईं, तब उसने धीरे से बताया कि बक्सा बिल्क
ु ल हल्का है। चाभी तो अभी भाई
साहब क
े पास होगी, उन्होनें अभी अन्दर भेजी नहीं है। उसने सबक
े सामने इज़्जत
रख ली और मैं उल्टा उसे ही डांट रही थी कि उसने चामी गुम कर दिया। एक बक्से
में चार-पांच सूती साड़ियां थीं, चार पांच मरदानी धोतियां थीं। उसमें से क्या सास
लेगी और क्या नन्दों को देगी? बहू क
े बक्से का वही हाल था। जो क
ु छ भी हम लोगों
ने भेजा था..... बस उसी में दो साड़ियां और रख कर बड़ा सा ताला
जड़कर दे दिया था।
मैं करण क
े पिता जी पर गुस्सा होने लगी, "इकलौते बेटे की शादी थी, कोई शौक पूरा
होने की बात तो दूर रही, उन्होंने तो मुंह छ
ु पाने लायक भी क
ु छ नहीं दिया। करण क
े
पिता जी उलटा मुझे ही डांटने लगे बोले, "क
ु छ पल्ले रहता तभी तो देते। उन्होंने तो
पहले ही कह दिया था, "लड़की का उद्धार कर दो। उनक
े पास तो सिर्फ बेटी थी, सो
तुम्हें दे दी। अब कभी क
ु छ न कहना। उनकी इज्जत भी अब हमारी इज्जत है। तब
हम लोग क्या करते, अपने बर्तन - जेवर रख कर गांव वालों को दिखा दिए। खुद
मिठाइयां बनवा कर बांटी थीं और कह दिया कि समधी क
े यहां से आई हैं। कसम ले
लो जो एक बार कभी बहू को ताना मारा हो। लेकिन इसकी आंखों में पानी नहीं है।
सबने मुझे चेताया था, अपना जेवर बहू को मत दो... अभी अपने पास रखो। जब मर
जाओगी, तो उसक
े बाद सब क
ु छ इसी का तो होगा, लेकिन मैं नहीं मानी, मैं जेवर
लादे घूमूं और मेरी बहू क
े पास एक कील तक न हो, क
ै सा लगेगा? आधे से अधिक
बहू को दे दिया। इसकी तरसती आत्मा को इतने पर भी शान्ति नहीं मिली। बाप क
े
घर तो कभी क
ु छ देखा नहीं था, सो भरती भी क
ै से... जब अपने भाई की शादी में जा
रही थी, तो मैनें अपना दस तोले का नेकलेस इसे दे दिया, सोचा एक ही तो बहू है ...
भाई की शादी में पहन लेगी। वह नेकलेस मेरी सास का था, उन्होंने करण क
े जन्म
पर दिया था। जानती हो बेटा उस नेकलेस क
े साथ इसने क्या किया... अरे मैक
े से
आई... मुझे दिखाते हुए बोली, "एक नेकलेस को तुड़वा कर मैंने तीन चीजें बनवा दी
हैं"। एक जोड़ी झुमका, एक अंगूठी और गले से सटा एकदम हल्का नेकलेस"। मैंने
इस बारे में बहुत सोचा... अरे कम से कम मेरी भावनाओं का ही ख़्याल किया होता।
नए डिज़ाईन क
े चक्कर में ने सुनार हल्का-फ
ु ल्का बना कर थमा दिया होगा और
बाकी का खरा सोना डकार गया होगा। मगर बेटा समझदार है बोला, "अम्मा... तुम
दुःखी मत हो... अब असल जेवर टूटने क
े बाद क
ु छ नहीं किया जा सकता है। आगे से
इसे क
ु छ मत देना और मुझे अपनी कसम दे डाली। अब तो बिटिया जहां भी जाती हूं
न... बचे-खुचे गहनों की पोटली साथ लिए फिरती हूं, अगर बहू सहेज कर रखने वाली
होती... तो सब क
ु छ उसे ही थमा कर मैं हल्की हो जाती। शालिनी जी को बार बार
ऐसा लग रहा था कि जैसे अम्मा किसी का इन्तज़ार कर रही हैं। सात बजने को थे,
अम्मा को छोड़ कर जाने का मन भी नहीं कर रहा था। अम्मा जहां एक ओर बहुत
समझदार लग रही थीं, बहू कम अक्ल की प्रतीत होती थी, शायद इसीलिए दोनों में
न पटती हो। शालिनी जी बरबस फिर पूछ बैठीं, "अम्मा बहू कभी हाथ-पैर तो दबा ही
देती होगी"? यह सुनते ही अम्मा ने मुंह बनाकर कहा, "अरे... बिटिया ! हाथ-पैर तो
नहीं दबाती है, ज़रूरत पड़ने पर गला ज़रूर दबा देगी। हां बेटा ज़रूर दबा देता है। एक
दस साल का पोता है, वह तो मेरे साथ ही सोता है, उसे मेरे बगैर चैन ही नहीं पड़ता
है। ट्यूशन पढ़ने गया है, अब आने ही वाला होगा। रात को जब सोती हूं न... वही
दीवार पकड़ कर पूरे शरीर को चढ़कर दबाता है। भगवान उसे लम्बी उमर दे, बिल्क
ु ल
अपने बाप पर गया है। रात में जब भी पानी पीने उठेगा, तो मुझसे भी पूछता है, "
दादी पानी पियोगी? घर आते ही दौड़ा आएगा। उसे पता है कि मै यहीं पर बैठती हूं।
वृद्धा का अपने पोते क
े लिए प्यार उमड़ रहा था।
...अम्मा... आप इतनी समझदार हैं, बुद्धिमती हैं फिर भी आज किस बात पर बहू
से नाराज़ हैं, क
ु छ कहा-सुनी हो गई क्या?- शालिनी जी ने सहज लेकिन कौतूहल क
े
भाव से पूछा वृद्धा ने हाथ चमकाते हुए कहा, "अरे नहीं... बहू में इतनी हिम्मत कहां
है कि वो मुझसे मुंहजोरी करे, बस मुंह फ
ु लाए इधर से उधर घूमती रहेगी। कल मैंने
बहू से बस इतना कहा कि थोड़ा पानी गरम कर दो, पैर सेक
ूं गी।" फिर शालिनी जी
को अपना पैर दिखाते हुए बोलीं, "देखो कितनी सूजन है, दर्द भी होता है।" शालिनी
जी ने भी अम्मा को जैसे एक ठण्डी निगाह से देखा हो, वाकई सूजा हुआ था। बरबस
ही बोली, "हां अम्मा ये तो बहुत सूजा हुआ है। पैर नीचे क्यों लटका रखा है, ऊपर कर
लीजिए ... पैर नीचे रहेगा तो और सूजन आ जाएगी... रात को सोते समय एक
तकिया पैर क
े नीचे रख लीजीएगा। इससे सूजन कम हो जाएगी... तो क्या बहू ने
पानी गरम नहीं किया...!!!" अम्मा ने ढीली आवाज़ में जवाब दिया, "किया तो जरूर,
लेकिन पानी इतना कम था कि पैर उसमें डूबा ही नहीं। मैंने कहा अरे बहू थोड़ा पानी
और गरम कर दो... तो पानी की बस ठण्ड छ
ु ड़ाई और ला कर बालटी में डाल दिया।
जो क
ु छ पहले वाला पानी गरम था, उसका भी कल्याण हो गया... फिर क्या था हो
गई सिकाई ... रह गया पैर वैसे का वैसा ही। आज सुबह की ही बात है खाने क
े बाद
उससे चाय बनाने को कहा तो खुद बैठी रही और गुड़िया से चाय बनवा दी। वह छोटी
सी लड़की अभी क्या चाय बनाएगी...? इतनी चीनी डाल दी कि चाय पी ही नहीं गई।
क्या एक कप चाय बनाने में उसक
े हाथ टूट जाते? अभी पार्क में आने से पहले चाय
बनाने को कहा तो अनसुना कर दिया। दुबारा कहा चाय बना दो, मैं पार्क में जाऊ
ं गी,
तो उठी और बाथरूम में चली गई। सोचा होगा गुड़िया से बनवाएगी तो गुड़िया पहले
से ही खेलने जा चुकी थी। मुझे बहुत गुस्सा आया । बिना चाय पिए आ गई हूं,
बोलकर आई हूं कभी तुम्हारे हाथ की चाय नहीं पिऊ
ं गी। अब पति क
े सामने रो-रो
कर बताएगी कि उसने सुना नहीं। अभी ऑफिस से आता होगा। सात बजे आता है।
सात बज गए क्या बेटा? अम्मा ने पूछा ।
तभी एक 35-40 साल का युवक अम्मा क
े पास आकर, उनका हाथ पकड़कर उठाने
लगा। पुत्र को सामने देखकर अम्मा नरम पड़ गईं। युवक ने फिर कहा अम्मा घर
चलो। वृद्धा स्वर में बेरूखी लाकर बोली, "बेटा मुझे वहां मत ले जा, मैं तुम्हारी
पत्नी को नहीं सुहाती हूं। मुझे पार्क में मर जाने दो।" मरें तुम्हारे दुश्मन अम्मा।
तुम्हारे रहने से मुझे हौसला रहता है और तुम मरने की बात करती हो? उसका
स्वभाव खराब है, तुम जानती हो। मैं निर्वाह कर रहा हूं न, तुम भी अपने बेटे की
खातिर जैसे अब तक निर्वाह किया वैसे ही आगे भी कर लो। रही खराब खाना बनाने
की बात तो सब लोग वही खाना खाते हैं न। वह भी तो वही खाती है। सबक
े वश में
नही है अच्छा खाना बनाना। तुम्हारे पकाए खाने क
े स्वाद से अगर तुलना करू
ं गा तो
भूखे रहना पड़ेगा। स्वादिष्ट भोजन किसको पसंद नहीं होगा? इस उम्र में तुम खाना
बनाओगी तो मुझसे खाया नहीं जाएगा। अब तुम्हारा आराम करने का समय है।
अपने समय में तुमने बहुत किया है, अब तुम्हारी बहू करेगी। वृद्धा अभी तक बेटे
का हाथ पकड़े बेंच पर बैठी, उसकी इन बातों में खो सी गई थी... करण फिर बोला...
उठो चप्पल पहनो अम्मा।
मुझे गांव पहुंचा दो बेटा।
तुम्हारे घर चली जाऊ
ं गी तो बहू फिर से क्लेश करेगी।
मुझे क्लेश से बहुत डर लगता है—अम्मा ने कराहती आवाज़ में कहा।
वह क्या क्लेश करेगी अम्मा, जब से तुम यहां बैठी हो, वह गेट पर खड़ी है।
तुम्हें तो दिखता नही हैं, वह तुम्हें देख रही है। दो बार बच्चों को बुलाने भेजा तो
तुमने डांट कर उन्हें भगा दिया।
वह स्वयं आने से डर रही है। अभी ऑफिस से आया हूं, जूते भी नहीं उतारने दिए
और कहने लगी पहले अम्मा को ले आइए,
वे गुस्सा हो कर पार्क में जा बैठी हैं। शाम की चाय भी नहीं पी है। तुमने उससे चाय
बनाने को कहा था, उसने सुना नहीं और वह बाथरूम में चली गई।
वृद्धा ने थोड़े तल्ख़ अन्दाज़ में कहा,
"अरे वाह...
सुना क
ै से नहीं,
यह क्यों नहीं कहती कि सुन कर भी अनसुना कर दिया।"
युवक थोड़ा मुस्क
ु राया और और फिर शालिनी जी की ओर देखकर बोला,
“अम्मा...... तुम्हारे गुस्से से तो मैं भी डरता हूं, तो वह किस खेत की मूली है?"
इकलौते बेटे की बातें सुनकर वृद्धा का दिल जैसे क
ु छ पसीज गया हो और गुस्सा भी
क
ु छ ठण्डा हो गया।
कलेजे को ठण्डक मिली तो बोली, "बेकार की बातें न बना... अच्छी तरह से जानती हूं
किसी को मेरी कोई परवाह नहीं है?"
वृद्धा ने अपनी खुशी छ
ु पाते हुए कहा, "छोड़ मेरा हाथ।" युवक अपनी मां का हाथ
पकड़े रहा और पूछा - नहीं मां पहले तुम्हें बताना होगा.....
क्या मुझे तुम्हारी कोई परवाह नहीं है। शालिनी जी ने बैंच क
े नीचे पड़ी अम्मा की
छड़ी उन्हें देते हुए कहा, "भैया आपकी परवाह नहीं करेंगे तो और किसकी करेंगे?
दुनिया में मां से बढ़कर बेटे क
े लिए और क्या होगा?
आप मां हैं, आपने बच्चों की ग़लतियों को कितनी बार माफ किया है,
फिर बहू तो आपक
े सब बच्चों से छोटी है, इसलिए उसकी गलतियों को भी उसकी
नासमझी मान कर माफ कर दें।"
युवक खुश होकर हंसते हुए बोला देखा अम्मा आज जो बहन जी कह रही हैं, यही
बात तो मैं हमेशा तुमसे कहता हूं।
आप सिर्फ मेरी ही मां नहीं हो... बहू की भी मां हो। बहू भी तो आपको मां ही कहती
है। जाने अनजाने में गलतियां किससे नहीं होती,
लेकिन इसका मतलब ये तो कतई न हुआ ना...कि मां की चिन्ता ही नहीं है किसी
को.....।
मां का महत्व भला कभी कम होता है... यह सब सुनते ही वृद्धा का झुर्रियों भरा,
तमतमाया हुआ चेहरा . अब मां की गरिमा से दमकने लगा।
तभी एक लड़का दौड़ता हुआ आया और वृद्धा क
े हाथ में से छड़ी लेकर खड़ा हो गया।
वृद्धा शालिनी जी की ओर देखते हुए बोली.
"यही है पोता।"
उसक
े सिर पर हाथ फ
े रते हुए बोली, "आ गया... ट्यूशन पढ़कर !!!"
लड़क
े ने हां में सिर हिला दिया।
वृद्धा पुत्र और पौत्र क
े साथ घर की ओर ऐसे चलीं मानो कोई किला जीत कर आ रही
हों।
पार्क से निकल कर शालिनी जी भी घर की ओर बढ़ने लगीं। पार्क क
े कोने में पत्थर
की बेंच पर बैठी वह वृद्धा शालिनी जी क
े मन में गहराई तक उतर गई थी।
समय की करवट,
गांव और शहर क
े परिवेश को नकारती,
बड़े पैमाने पर व्याप्त रूढ़ीवादी परम्पराओं से जकड़ी नाती-पोतों वाली 'वह' सास क
े
गरिमामय पद पर आसीन थीं।
अपने लिए भी वह ठीक वैसा ही आदर व सम्मान चाहती थीं, जैसा उन्होंने अपने
बड़ों को दिया था, लेकिन अब शरीर से लाचार, पुत्र पर आश्रित, चालाक और आलसी
बहू क
े साथ रहने की विवशता ही इस वृद्धा की अर्न्तव्यथा है । सोचते-सोचते
शालिनी जी मायूस हो गईं और उनकी आंखें भर आईं।
लेखिका : श्रीमती शक
ु न्तला प्रसाद
अर्न्तव्यथा  (Short Story- [Non-fiction], Hindi).pdf

अर्न्तव्यथा (Short Story- [Non-fiction], Hindi).pdf

  • 1.
    अर्न्तव्यथा - श्रीमती शक ुन्तला प्रसाद शालिनी जी पेशे से अध्यापिका हैं। उम्र 40-45 क े आसपास होगी। एक बेटी है, रानू जो बी.कॉम. फाईनल ईयर में पढ़ रही है। पति भिलाई स्टील प्लान्ट में काम करते हैं। कारखाने की तरफ से ही एक बढ़िया क्वाटर मिला हुआ है। पति अपने में ही मग्न रहते हैं, दोस्ती यारी भी बहुत कम है। ऑफिस से घर, घर से ऑफिस और बचा हुआ वक्त परिवार क े साथ बिताते हैं। शालिनी जी अच्छी डील - डौल वाली दोहरे कद की महिला हैं। अध्यापिका होने की वजह से समय की बहुत पाबन्द हैं। घर का सारा काम वक्त पर होना ज़रूरी है। पति और बेटी से भी इसमें पूरी मदद मिलती है। थोड़ी दबंग स्वभाव और नौकरी पेशा होने की वजह से पड़ोसियों से गपशप करने का वक्त नहीं मिल पाता है, फिर भी मुहल्ले की पूरी ख़बर रखती हैं। रोज़ शाम को सब्जी - भाजी लेकर, एक घण्टे की सैर करते हुए घर लौटना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। अध्यापक वर्ग की यूँ भी समाज में बहुत इज्जत होती है, - साथ, अपनी व्यवहार क ु शलता क े लिए भी लेकिन शालिनी जी इस मान क े साथ मशहूर हैं। उस दिन संयोग से, शालिनी जी क े पति ऑफिस क े किसी जरूरी काम क े लिए घर से बाहर गए हुए थे। शालिनी जी क े स्क ू ल की भी छ ु ट्टी थी। दोपहर का खाना खा कर दोनों माँ-बेटी टेलीवीज़न देखने बैठ गईं। काफी देर तक प्रोग्राम देखने क े बाद, दोनों की आँख कब लगी पता ही नहीं चला। शाम को साढ़े चार बजे जब रानू की म्यूज़िक टीचर ने डोर बेल बजाई, तभी दोनों हड़बड़ा कर उठीं। हाथ-मुँह धोकर शालिनी जी ने चाय बनाई।
  • 2.
    चाय पी कररानू संगीत सीखने बैठ गई। उसकी म्यूज़िक टीचर सप्ताह में दो दिन, दो घण्टे क े लिए आती हैं। शालिनी जी तैयार हो कर सैर पर निकलने लगीं, तो रानू से बोलीं,"लौटने में थोड़ी देर हो जाएगी, मीरा जी से मिल कर आऊ ँ गी। वे दो-तीन दिन से स्क ू ल नहीं आई हैं।" शालिनी जी घर से निकल कर बड़े पार्क की ओर न जा कर, घर से 5-6 ब्लॉक पीछे एक छोटा सा पार्क है, वहीं जाने लगीं। रोज़ वे घर से दूर बड़े वाले पार्क में घूमने जाया करती थीं। इस पार्क में सैर करने क े लिए अच्छी सड़क और रोशनी का इन्तजाम भी बढ़िया है। यह पार्क टहलने क े लिए रात नौ बजे तक खुला रहता है। लॉन टेनिस और बैडमिन्टन खेलने का इन्तज़ाम होने की वजह से पार्क में 9-10 बजे तक खूब रौनक रहती है। दूसरी सबसे अच्छी बात, पार्क क े बगल में मौजूद बाज़ार है, जहाँ आमतौर पर ज़रूरत की हर चीज़ मिल जाती है। शालिनी जी सैर करने क े बाद, इसी बाज़ार से ज़रूरत की चीज़े लेकर घर लौटती हैं, लेकिन आज उन्हें सब्जी वगैरह क ु छ नहीं खरीदना था। मीरा जी का घर भी छोटे पार्क से पास पड़ेगा, सोचकर आज उन्होंने इधर कर रूख किया था। इस पार्क में दो गेट हैं, इनमें से एक हमेशा बन्द रहता है । बन्द गेट क े पास बच्चों ने दीवार तोड़ कर पार्क में आने-जाने का रास्ता बना लिया था। इस पार्क में बच्चों की संख्या अच्छी-खासी रहती है। आसपास क े सभी बच्चे खेलने-क ू दने क े लिए यहीं आते हैं। झूले बच्चों की कमज़ोरी होते हैं, मानिए कि बच्चों की बिन मागे मुराद पूरी हो गई हो। क्योंकि किसी आदमी को खुशी देने वाली दो आँखों की तरह, पार्क में बच्चों क े लिए दो झूले भी लगे थे। कहीं बच्चे गेंद से उछल क ू द कर रहे हैं, तो कहीं अठखेलियाँ करती लड़कियाँ रूमाल-चोर खेल रही हैं।
  • 3.
    शालिनी जी पार्कक े भीतर वाली सड़क पर टहलने लगीं। क ु छ लोग पहले से ही टहल रहे थे। क ु छ महिलाएं पार्क की बैंच पर बैठी गप्पों में मशगूल थीं। चलते चलते जब शालिनी जी थक गई तो एक बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगीं। अचानक उनका ध्यान पार्क क े एक कोने में पत्थर की बेंच पर बैठी एक महिला पर गई, वह काफी देर से गुमसुम सी अक े ले बैठी थी। थोड़ी देर तक शालिनी जी उसे देखती रहीं, और जब उनसे न रहा गया तो उसी बेंच पर, उसक े पास जा बैठीं। वह 70–80 साल की एक उम्र दराज महिला थी। तन पर सफ े द सूती घोती. गोरा रंग, दुबला-पतला शरीर, वह शायद रो रही थी। अंधेरा होने लगा था. लेकिन अभी तक पार्क की बत्तियां नहीं जली थीं, इसलिए क ु छ स्पष्ट नहीं हो रहा था। वह बैंच पर पैर मोड़ कर बैठी थी, शालिनी जी को देख कर उसने पैर नीचे कर लिए। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप बैठी रहीं। धीरे-धीरे पार्क की गहमागहमी छंटने लगी और बत्तियां भी जल गईं, लेकिन वह चुपचाप वैसे ही बैठी रही। शालिनी जी को आज कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बेटी को देर से आने क े बारे में बता ही आई थीं। इस बूढ़ी औरत को देखने क े बाद, मीरा जी क े घर जाने का विचार त्याग कर, शालिनी जी वहीं बैठ गईं। बूढ़ी औरत से बात शुरू करने क े लिए कोई भूमिका सोच ही रही थीं कि तीन लड़कियां दौड़ती हुई आईं और उस बूढ़ी औरत से बोलीं, “दादी दादी.... घर चलो" । वृद्धा जो अभी तक अनमनी सी बैठी थी, तैश में आकर कड़क आवाज़ में बोली, "तुम लोग यहां क्या करने आई हो, चलो भागो यहाँ से." तीनों लड़कियां जैसी आई थीं, वैसे ही पलट गईं। शालिनी जी ने महसूस किया कि, उसकी आवाज़ में बहुत दम था, ऐसा लग रहा था कि शरीर की सारी ताकत गले में समा गई हो। थोड़ा साहस जुटा कर शालिनी जी ने उससे पूछा,
  • 4.
    "अम्माँ , कहाँकी रहने वाली हो?" वृद्धा ने शालिनी जी की ओर देखा, शालिनी जी क े दिमाग में विचार कौंधा , "जरूर यह कहेगी कि तुम्हें इससे मतलब लेकिन वृद्धा ने जवाब दिया, "मीठापुर की"। अब यह मीठापुर कहां है, ज़्यादा पूछताछ करने से कहीं अम्मा का पारा न चढ़ जाए, इस विचार क े साथ शालिनी जी अपने बारे में ही बताने लगीं। मैं यहीं पास में रहती हूं स्क ू ल में टीचर हूं… बात को अधूरा सा छोड़कर यकायक पूछ बैठी, - "ये तीनो लड़कियां क्या आपकी पोतियां हैं?" अम्मा क ु छ सहज हो चुकी थी, "नहीं वह जो लाल स्कर्ट पहने थी न... बस वही मेरी पोती, बाकी दोनों पड़ोस क े शर्मा जी की बेटियां थीं। मेरा एक पोता है, पांचवीं में पढ़ता है, वो अभी ट्यूशन पढ़ने गया होगा।" शालिनी जी ने पूछा, "अम्मा, आप यहां पर कहां रहती हो, मीठापुर तो आपका गांव होगा न । " अम्मा ने पार्क क े बन्द गेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यही गेट जो बन्द रहता है न... उसी क े सामने वाले मकान में...... बेटा कारखाने में अफसर है, उसी क े साथ रहती हूं। मीठापुर में घर-द्वारा है, ज़मीन-जायदाद है, देवर और उनक े बच्चे वहीं रहते हैं। मेरी तीन लड़कियां है, सबका ब्याह हो चुका है, सबकी सब बाल-बच्चेदार हैं। मेरी छोटी बेटी भी हाई स्क ू ल में पढ़ाती है। सब बहनों से छोटा, यही लड़का है। एक ही लड़का है, लेकिन इसकी पत्नी बहुत झगड़ालू स्वभाव की है।
  • 5.
    घुन्नी है, मुंहसे तो कम बोलेगी, मगर करती मनमानी है। किसी से नहीं बनती उसकी। सारे मुहल्ले वाले हंसते हैं, लेकिन उसको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।” यह सब क ु छ सुनने क े बाद, शालिनी जी को सहसा अपनी महरी की बातें याद आ गईं। एक दिन बता गई थी कि, "पीछे क े ब्लॉक में करण साहब रहते हैं, उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की है। करण साहब खुद तो देखने में काफी सुन्दर हैं, लेकिन उनकी पत्नी बस ठीक-ठाक ही है, रंग भी सांवला है। दुबला-पतला शरीर..... साहब की अम्मा साथ ही रहती हैं। एकदम बुढ़िया लेकिन, गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श, लम्बी, दुबली-पतली हैं। इस उम्र में भी उनक े सामने बहू पानी भरती है। करण साहब की तीन बहनें भी हैं, कभी-कभी आती-जाती हैं, उनक े घर में तो सब बहुत सुन्दर और खूबसूरत हैं। सास-बहू में एकदम पटरी नहीं खाती... बहू क ु छ बोलती भी नहीं है, लेकिन अम्मा हमेशा क ु छ न क ु छ बड़बड़ाती रहती हैं। साहब ने अपनी मर्ज़ी से शादी की है न... इसलिए अम्मा नाराज़ रहती हैं। करण साहब की हालत तो सांप और छछ ुं दर वाली हो जाती है, माँ की तरफ से बोले तो पत्नी नाराज़ और पत्नी की तरफ से एक भी शब्द मुंह से निकला नहीं कि अम्मा अन्न-जल त्यागने लगती हैं।” शायद यह अम्मा वही हैं, हुलिया भी वही है जो महरी ने बताया था... शालिनी जी ने अपने मन में सोचा... जब बात निकल ही गई है तो क्यों न पूछ ही पक्का कर लूं कि वही है या कोई और! इसलिए शालिनी जी ने पूछ लिया, “अम्मा.... शादी क े समय लड़की और उसका घर-परिवार नहीं देखा था क्या. ..? हम लोग तो सब क ु छ पता लगाते हैं।" अम्मा ने अपना माथा पकड़ते हुए आवज़ में जवाब दिया, "अरे बिटिया... देखती क्या...
  • 6.
    इसने तो लड़क ेपर ऐसा जादू चला दिया था कि वह और किसी से शादी करने को तैयार ही नहीं था। एक से एक सुन्दर लड़कियों क े फोटो दिखाए, लेकिन ये टस से मस नहीं हुआ, जो भाग्य में लिखा होता है वही तो होता है। हार कर इसक े पिता जी ने रजामन्दी दे दी। बाकी घर-परिवार में इस शादी क े पक्ष में कोई नहीं था। करण क े चाचा ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर करण दूसरी जगह शादी को तैयार नहीं है तो न करे शादी। इस लड़की का न तो घर-परिवार हमारे लायक है और न ही लड़की। पहले तो करण क े पिता जी ने भी मना कर दिया था, लेकिन 'हइ है वही जो राम रचि राखा’, बहू क े पिता पीछे पड़े रहे। कहने लगे कि आपक े हाथ जोड़ता हूं, एक लड़की का उद्धार कर दो। मीठापुर क े पास क े गांव क े थे, करण क े पिता जी क े साथ एक ही स्क ू ल में पढ़ते थे। दोस्ती तो कोई खास नहीं थी, लेकिन पुरानी जान-पहचान ज़रूर कह सकते हैं। शहर में नौकरी करते थे, वहीं पर करण कॉलेज में पढ़ता था। जान-पहचान की वजह से आना-जाना हो गया, बस लड़की ने डाल डोरे फ ं सा लिया। करण क े पिता जी सीधे स्वभाव क े थे, इन लोगों ने उन्हें उलटी-सीधी पट्टी पढ़ा कर उनकी मति भ्रष्ट कर दी थी। इधर करण ने भी घर को अशान्त कर रखा था, सो करण क े पिता जी उलटा हम सबको ही समझाने लगे... लड़की सुन्दर नहीं है तो क्या हुआ, सब एक जैसे तो नहीं होते, फिर सबसे बड़ी बात तो ये है कि लड़क े को पसन्द है तो हम लोगों का क्या? रही बात घर परिवार कमज़ोर होने की, तो कौन हम लोग उनक े घर अपनी लड़की देने जा रहे हैं। लड़की जात-बिरादरी की है. इकलौता लड़का है, इसका दिल तोड़ना ठीक नहीं, इसलिए सब लोग शादी क े लिए हां कर दो और ये शादी होने दो। इस तरह बेटे की ज़िद पर उन्होंने यह शादी होने दी। मेरे देवर ने भी बड़े भाई क े खिलाफ एक शब्द नहीं कहा, फिर भी वो बारात में शामिल नहीं हुए।
  • 7.
    बहू क े पिताने ठीक ही कहा था, एक लड़की का उद्धार कर दो, सो उनकी लड़की का उद्धार तो हो गया, लेकिन हमारे नसीब फ ू ट गए। खुद तो चले गए और मेरी छाती पर मूंग दलने को ये यमराज बिठा गए।" ... इतना कह कर बूढ़ी औरत शान्त हो गई, शायद क ु छ सोच रही थीं, और सहसा बोलीं, “सुबह चौका-बर्तन महरी करती है, छः बजे उठकर दरवाज़ा मैं खोल देती हूं । जब काम करक े चली जाती है, पूरा घर तब सो कर उठता है। बहू... अरे बहू से तो नौ बजे तक खाना भी तैयार नहीं होता। कभी दाल कच्ची तो कभी सब्जी कच्ची रह जाएगी। मैनें तो बोलना ही छोड़ दिया है, जो मर्जी हो सो करो। जैसे-तैसे घर का काम निबटा कर बच्चों को स्क ू ल और पति को ऑफिस भेज दिया और लगी मुहल्ले की सैर करने। कभी महिला मण्डली इनक े घर जमेगी, तो कभी ये किसी क े घर में जमेंगी। अगर किसी दिन ऐसा नहीं हुआ तो सारा दिन पलंग तोड़ेंगी। एक हमारा समय था....... घर क े काम-काज से फ ु रसत ही नहीं मिलती थी। बड़ा परिवार था, गृहस्थ का घर था, रोज खेत में काम करने वाले मज़दूरों का भी खाना बनता था। सब लोग अपने-अपने समय पर खाना खाने आते थे। खाना देने से पहले चौका लगता था, फिर आसन बिछता था। दाल-सब्जी सब क े लिए अलग-अलग कटोरिया होती थीं। आजकल की तरह नहीं कि खाना निकाल कर मेज़ पर रख दिया जिसको खाना है खाओ, जिसको नहीं खाना है... सो मत खाओ। जग में पानी रख दिया, सब उसी से लेकर पियो, खाना भी खुद परोसो एक ही मेज़ पर पति, उसी पर पत्नी, और वहीं बच्चे। जूठे से कोई परहेज नहीं, बड़ों का कोई लिहाज ही नहीं। टेबल पर प्लास्टिक की चादर बिछा दी, कपड़े से पोंछ दिया, बस हो गया सब क ु छ पवित्र । अब तो बच्चों को भी बंधे हुए समय से खाना मिलता है। मेरा करण जब छोटा था तब जब में खाना खाने बैठूं तब तक वह चार बार खा चुका होता था। मेरी बेटियां भी लंबी-चौड़ी हैं। मेरी पोती को देखा.... क ै सी चुहिया सी है, बारह वर्ष की हो गई है, अरे..... कोई कहेगा देखकर ! दोनों मां-बेटी को बस फ ै शन का ध्यान रहता है। बेटी तो बच्ची है, भला उसका क्या दोष, लेकिन मां को तो समझाना चाहिए न...। कितनी बार बहू से कहा, बेटा गुड़िया की फ्राक घुटने से नीचे बनवाओ, उसकी स्कर्ट-फ्राक सब घुटने से चार अंगुल ऊपर रहते हैं, बड़े-बड़े पैर दिखते हैं सो अच्छा नहीं लगता, लेकिन बहू को मेरी बात अच्छी नहीं लगी, "बोली आजकल का यही फ ै शन है।” भला टांगें दिखाना कोई फ ै शन है? बच्ची को बिगाड़ कर रख देगी। करण ने तो बहू को
  • 8.
    सिर पर बिठारखा है। वह कभी भी मेरे सामने सिर नहीं ढकती है, पता नहीं अपने को कहां की हेमामालिनी समझती है? जी में तो आता है पुछ ूं - रोज जो आइना देखती हो, उसमें तुमको अपनी शक्ल नहीं दिखती है, लेकिन बेटे का मुंह देख कर चुप रह जाती हूं। इसकी मां ने कोई तौर-तरीका भी नहीं सिखाया, बस चालाकी जाने कहां से सीख कर आई है? करण क े सामने तो मां जी... मां जी. . करती रहेगी, करण को लगता है कि उसकी पत्नी मां का कितना ध्यान रखती है !!! किसी क े सामने मुंह नहीं खोलेगी, सबको लगता है कितनी भली है। सबको तो इसने बता रखा है कि हम लोगों ने अपनी पसंद से शादी की है, इसलिए माताजी को मैं नहीं सुहाती हूं तुम्हीं बताओ बेटा इसकी सूरत से मुझे क्या लेना-देना? कम से कम सीरत तो अच्छी होती। शालिनी जी ने कहा, "बिल्क ु ल ठीक कहती हो अम्मा। सूरत तो भगवान ने बनाई है, उसमें किसी का वश नहीं चलता।" शालिनी जी को अम्मा की बातें सुनना बड़ा अच्छा लग रहा था, कहीं चुप न हो जाएं इसलिए बोलीं, "मेरी महरी ने भी यही बताया था कि साहब ने अपनी पसंद से शादी की थी, इसलिए अम्मा हमेशा उन पर गुस्सा करती रहती हैं। यह तो अच्छा हुआ आज आपका दर्शन हो गया और सारी बातें साफ हो गईं। वृद्धा की आंखें चमकने लगीं। चालाकी तो कोई इससे सीखे। गुस्से में मैं चिल्लाने लगती हूं और वह चुप हो जाएगी या क ु छ ऐसा बोल देगी कि मेरा गुस्सा और बढ़ जाए, लोग मेरी आवाज़ सुनेगें तो मुझे ही बुरा बोलेगें न। मैं क्या करू ं , इसकी कितनी बातें बरदाश्त करू ं ? पहले तो मैं खून का घूंट पी कर रह जाती थी, अब नहीं रहा जाता। कभी अगर चुप भी रह जाती हूं तो इसकी अक्ल में घुसता ही नहीं, हार कर मुझे बोलना ही पड़ता है। बहुत राह देखी, सोचती थी धीरे-धीरे समझ जाएगी, लेकिन यह तो जैसे-जैसे पुरानी हुई. इसकी दुम मोटी ही होती चली गई। मेरी तो यह तनिक भी परवाह नहीं करती है। आप ही सोचो बेटा, जब सास ज़मीन पर चटाई बिछा कर बैठी हो तो बहु को पलंग पर बैठना शोभा देगा? हमेशा बरदाश्त कर जाती थी, सोचती थी ध्यान नहीं जाता होगा, पर इसने तो आदत बना ली है। जब मैं ज़मीन पर बैठ कर खाना खा रही होती या क ु छ पढ़ती होती तो यह क ु र्सी पर बैठ कर क ु छ करने लगती। दो-चार बार तो मुझे ऐसा लगा जैसे जान-बूझ कर ऐसा करती है, तभी हमेशा करण क े पीछे से ऐसा करती, अगर अनजाने में ऐसा होता तो कभी तो उसक े सामने भी बैठती। तब भी मैं क ु छ नहीं बोली। मन ही मन में सोचा- किसी दिन करण क े सामने जब मैं नीचे बैठी
  • 9.
    होऊ ँ , तबतुम ऊपर बैठना। एक न एक दिन तुम से चूक होगी ही, कितने दिन चालाक बनोगी, फिर देखती हूं करण तुम्हें क ु छ बोलता भी है या जोस का गुलाम बन कर मुंह बंद किए रहेगा? एक साल पहले की बात है, मेरा धैर्य जवाब दे गया, ग्यारह बजे क े करीब नहा-धो कर, पूजा-पाठ करक े , मैं खाना खाने बैठी थी। सर्दी का दिन था... सो बहू से बोली मुझे आंगन में ही खाना दे दो, टेबल-क ु र्सी पर बैठ कर खाने में मेरा मन नहीं भरता है। आंगन में चटाई बिछी थी, उसी पर बैठ कर मैं खाने लगी। मैं खाना खा ही रही थी कि पड़ोस की दो औरतें आ गई। आजकल तो घर में किसी को कोई काम रहता ही नहीं है। सब बाजार से क ु टा–पिसा आ गया, चौका बर्तन क े लिए घर-घर महरी हैं, एक दो बच्चे हैं, जो स्क ू ल चले जाते हैं। पति जो सुबह से निकला शाम को ही आएगा। रामायण, गीता पढ़ने से कोई मतलब ही नहीं है। अब तो एक ही काम बचा, इस घर से उस घर क े चक्कर काटना। दोनों औरतें हाथ में ऊन-कांटा लिए सीधे आंगन में आ गईं। बहु को तो समझाना चाहिए था न कि अम्मा खाना खा रही हैं, सब बैठक में बैठो। वृद्धा ने शालिनी जी की ओर देखकर पूंछा, "क्या मैं गलत बोल रही हूं?" नहीं.. अम्मा आप बिल्क ु ल ठीक कह रही हैं, इतना तो तौर तरीका होना ही चाहिए। शालिनी जी क े जवाब से वष्ट्वा संतुष्ट होकर बोली- आंगन में चारपाई बिछी थी, दोनों उस पर बैठ गईं। मुझे नमस्ते भर किया और कोई बात नहीं की। पास में चटाई पर बैठ कर खाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, परन्तु क्या करती इन्हें तो क ु छ कहा नहीं जा सकता था, ये तो मेहमान थीं। यह तो बहू को समझना चाहिए था न... पर हाय रे करम!!! इतने में मेरी बहू बगीचे से एक क ु र्सी ले आई और खाट से सटाकर क ु र्सी पर बैठ गई। मेरा पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। मैंनें बहुत अपमानित महसूस किया। मैं खाना छोड़कर चुपचाप उठ गई। बहू को ज़रूर खटका लगा होगा, तभी उसने पूंछा था, "अम्मा खाना क्यों छोड़ दिया?" सारा दिन मेरा मन कचोटता रहा, अब ये दिन भी आ गए। बहू क ु र्सी पर बिराजेगी और सास को उनक े पैर क े पास बैठ कर रोटी खानी पड़ेगी। अभी भी मीठापुर में मेरा मकान है, खेती-बाड़ी है। करण क े पिताजी मेरे लिए बहुत क ु छ छोड़ कर गए हैं। मेरी जिन्दगी अब कितने दिनों की है। अम्मा बोलते-बोलते रुक गई. उनका गला रुंध गया था। थोड़ी देर बाद पुनः बोली, मीठापुर में अभी देवर भी हैं। दो बरस पहले उनकी पत्नी गुजर गई है। उनका एक बेटा शहर में कमाता है। जब से उसकी मां गुजरी है, तब से पत्नी और बच्चों को गांव में लाकर रख दिया है। गांव वाले और सगे सम्बन्धियों ने उसे बहुत समझाया, बच्चों को शहर से लाकर गांव क्यों छोड़ रहे हो? वहां पढ़ कर क ु छ अच्छा बन पाएंगे, लेकिन वह नहीं माना, बोला- मैं तो यहीं से पढ़-लिख कर
  • 10.
    शहर में नौकरीकरता हूं, बच्चे अभी छोटे हैं, यहां पढ़ें, जब बड़े होकर अक े ले मेरे साथ रहने लायक होंगे तब वहां पढ़ेंगे। मैं बड़ा लड़का हूं, पिता क े प्रति मेरा भी तो क ु छ फर्ज है। छोटा भाई सारा दिन खेत-खलिहान में व्यस्त रहता है, सब तो वही देखता है, उसकी पत्नी क े तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। पिता जी अक्सर अस्वस्थ्य हो जाते हैं। छोटी बहू, बच्चे और पिता जी सबकी देखभाल क ै से कर सक े गी? यह तो हम लोगों को समझना पड़ेगा। अगर हम अपना फर्ज भूलेंगे, तब मेरा बेटा क्या सीखेगा? शालिनी जी ने कहा- "वाह बहुत समझदार हैं। दोनों क्या आपक े बेटे से छोटे हैं?" वृद्धा ने कहा- हां! देवर जी की शादी मेरी शादी क े पांच साल बाद हुई थी। उनको भी पहले चार लड़कियां हुईं, फिर बाद में दो लड़क े हुए। बड़ा लड़का करण से दो साल छोटा है और छोटा लड़का छः बरस छोटा है। मेरी देवरानी बड़ी भाग्यवाली थी. उतनी ही होशियार थी। चारों बेटियां अच्छे घरों में ब्याही गईं हैं। दोनों बेटे पढ़े-लिखे हैं। बड़ा शहर में रहता है तो छोटा खेती-बाड़ी देखता है, चाहता तो वह भी शहर में नौकरी करता, फिर घर द्वार और माता-पिता को कौन देखता? दोनों बहुएं जितनी सुन्दर हैं, उतनी ही भली मानस। दोनों ही मुझे बार-बार गांव बुलाती हैं, कहती हैं आप यहीं गांव में रहो अम्मा। आपक े गांव में रहने से रौनक रहती है। जब भी मैं वहां जाती हूं, एक काम नहीं करने देती हैं, कहती हैं- अम्मा आप बैठो. अगर आपको काम करना पड़े तो हम लोग किसलिए हैं? जब तक मैं खाना न खा लूं तब तक दोनों भूखी-प्यासी बैठी रहेगीं। एक अपनी बहू है, सुबह सो कर उठी नहीं कि चाय क े साथ एक पैक े ट बिस्क ु ट चबा जाती है। शालिनी जी इतना तो समझ गई थीं कि वृद्धा की बहू विचारवान नहीं होगी, वर्ना कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जो बहू क े नाक में नक े ल डालती हो। शालिनी जी ने कहा अम्मा आप तो बिल्क ु ल मेरी मां जैसी हो, आपकी बेटी भी टीचर है और मैं भी टीचर हूं। आपकी बातें सुनकर मुझे बहुत अफसोस हुआ। आपने उस दिन खाना कब खाया यह बताइए । उस दिन तो मुझे बहुत गुस्सा था। जितनी मैंने इसको छ ू ट दी, जितना बर्दाश्त किया उतना ही ये मेरे सिर पर चढ़ती गई। शाम को जब मेरा बेटा आया तब मैंने सामने उसे सारी बातें बता दी। बहू को सामने इसलिए खड़ा किया कि बाद में कहीं ये न बोले कि मैं झूठ बोलकर घर में आग लगाती हूं। मैंने बेटे को भी कह दिया कि अगर तुम्हें मैं भारी लगती हूं, तो तुरन्त मुझे गांव पहुंचा दो। तुमने अपनी मर्जी से शादी की,
  • 11.
    मैने मान लिया,तुम्हें बहू बहुत पसंद है, इसमें मुझे कोई दुःख नहीं है, लेकिन मैं इसक े बाप की नौकरानी नहीं, तुम्हारी मां हूं. इस बात का इसे सदा ख्याल रखना होगा और भी गुस्से में बहुत क ु छ अनाप-शनाप बोल दिया। बहू तो एकदम शान्त हो गई। उससे तो क ु छ बोलते ही नहीं बना। गलती तो उसने की थी, सो आसू बहाने लगी। उस दिन इनक े मगरमच्छी आंसू काम नहीं आए। करण ने मेरे सामने बहुत फटकार लगाई, दोबारा ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए। तुम्हारी चाहे जितनी बातें सुन लूं, लेकिन मां क े शान क े खिलाफ क ु छ बर्दाश्त नहीं करू ं गा। उस दिन से आजतक फिर इसने कभी ऐसी बदमिजाजी नहीं की। शालिनी जी ने कहा, “बिल्क ु ल अम्मा ऐसा ही होना चाहिए। सास की कद्र करने वाली बहू की सभी प्रशंसा करते हैं।" शालिनी जी को लगा बहू इतनी बदमिज़ाज क्यों है? हो सकता है प्रेम विवाह में क ु छ दान-दहेज नहीं मिला हो और यह बहू को हमेशा ताना देती हों, इसी से बहू खफा होगी। थोड़ी देर दोनों चुप रहीं, शालिनी जी सोचती रहीं क ै से पूछ ू ? थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करक े शालिनी जी ने पूछा- "शादी क्या आपक े रीति-रिवाज क े मुताबिक हुई थी, या उन लोगों ने सोचा कि जब प्रेम-विवाह हो रहा है, तो क ु छ देने की क्या ज़रूरत, जितना कम में हो जाए उतना अच्छा।” बिल्क ु ल ठीक कहा तुमने बेटा। इसक े बाप ने क ु छ नहीं दिया। गहना - जेवर तो दूर की बात है, सबक े लिए कपड़े भी नहीं दिए। बारात को किसी तरह खिला कर एक दिन में ही विदा कर दिया। वह तो मेरी देवरानी बहुत होशियार थी, सबक े सामने बक्सा ही नहीं खोला, चाभी गुम होने का बहाना बना दिया। जब गांव की औरतें चली गईं, तब उसने धीरे से बताया कि बक्सा बिल्क ु ल हल्का है। चाभी तो अभी भाई साहब क े पास होगी, उन्होनें अभी अन्दर भेजी नहीं है। उसने सबक े सामने इज़्जत रख ली और मैं उल्टा उसे ही डांट रही थी कि उसने चामी गुम कर दिया। एक बक्से में चार-पांच सूती साड़ियां थीं, चार पांच मरदानी धोतियां थीं। उसमें से क्या सास लेगी और क्या नन्दों को देगी? बहू क े बक्से का वही हाल था। जो क ु छ भी हम लोगों ने भेजा था..... बस उसी में दो साड़ियां और रख कर बड़ा सा ताला जड़कर दे दिया था। मैं करण क े पिता जी पर गुस्सा होने लगी, "इकलौते बेटे की शादी थी, कोई शौक पूरा होने की बात तो दूर रही, उन्होंने तो मुंह छ ु पाने लायक भी क ु छ नहीं दिया। करण क े पिता जी उलटा मुझे ही डांटने लगे बोले, "क ु छ पल्ले रहता तभी तो देते। उन्होंने तो पहले ही कह दिया था, "लड़की का उद्धार कर दो। उनक े पास तो सिर्फ बेटी थी, सो तुम्हें दे दी। अब कभी क ु छ न कहना। उनकी इज्जत भी अब हमारी इज्जत है। तब
  • 12.
    हम लोग क्याकरते, अपने बर्तन - जेवर रख कर गांव वालों को दिखा दिए। खुद मिठाइयां बनवा कर बांटी थीं और कह दिया कि समधी क े यहां से आई हैं। कसम ले लो जो एक बार कभी बहू को ताना मारा हो। लेकिन इसकी आंखों में पानी नहीं है। सबने मुझे चेताया था, अपना जेवर बहू को मत दो... अभी अपने पास रखो। जब मर जाओगी, तो उसक े बाद सब क ु छ इसी का तो होगा, लेकिन मैं नहीं मानी, मैं जेवर लादे घूमूं और मेरी बहू क े पास एक कील तक न हो, क ै सा लगेगा? आधे से अधिक बहू को दे दिया। इसकी तरसती आत्मा को इतने पर भी शान्ति नहीं मिली। बाप क े घर तो कभी क ु छ देखा नहीं था, सो भरती भी क ै से... जब अपने भाई की शादी में जा रही थी, तो मैनें अपना दस तोले का नेकलेस इसे दे दिया, सोचा एक ही तो बहू है ... भाई की शादी में पहन लेगी। वह नेकलेस मेरी सास का था, उन्होंने करण क े जन्म पर दिया था। जानती हो बेटा उस नेकलेस क े साथ इसने क्या किया... अरे मैक े से आई... मुझे दिखाते हुए बोली, "एक नेकलेस को तुड़वा कर मैंने तीन चीजें बनवा दी हैं"। एक जोड़ी झुमका, एक अंगूठी और गले से सटा एकदम हल्का नेकलेस"। मैंने इस बारे में बहुत सोचा... अरे कम से कम मेरी भावनाओं का ही ख़्याल किया होता। नए डिज़ाईन क े चक्कर में ने सुनार हल्का-फ ु ल्का बना कर थमा दिया होगा और बाकी का खरा सोना डकार गया होगा। मगर बेटा समझदार है बोला, "अम्मा... तुम दुःखी मत हो... अब असल जेवर टूटने क े बाद क ु छ नहीं किया जा सकता है। आगे से इसे क ु छ मत देना और मुझे अपनी कसम दे डाली। अब तो बिटिया जहां भी जाती हूं न... बचे-खुचे गहनों की पोटली साथ लिए फिरती हूं, अगर बहू सहेज कर रखने वाली होती... तो सब क ु छ उसे ही थमा कर मैं हल्की हो जाती। शालिनी जी को बार बार ऐसा लग रहा था कि जैसे अम्मा किसी का इन्तज़ार कर रही हैं। सात बजने को थे, अम्मा को छोड़ कर जाने का मन भी नहीं कर रहा था। अम्मा जहां एक ओर बहुत समझदार लग रही थीं, बहू कम अक्ल की प्रतीत होती थी, शायद इसीलिए दोनों में न पटती हो। शालिनी जी बरबस फिर पूछ बैठीं, "अम्मा बहू कभी हाथ-पैर तो दबा ही देती होगी"? यह सुनते ही अम्मा ने मुंह बनाकर कहा, "अरे... बिटिया ! हाथ-पैर तो नहीं दबाती है, ज़रूरत पड़ने पर गला ज़रूर दबा देगी। हां बेटा ज़रूर दबा देता है। एक दस साल का पोता है, वह तो मेरे साथ ही सोता है, उसे मेरे बगैर चैन ही नहीं पड़ता है। ट्यूशन पढ़ने गया है, अब आने ही वाला होगा। रात को जब सोती हूं न... वही दीवार पकड़ कर पूरे शरीर को चढ़कर दबाता है। भगवान उसे लम्बी उमर दे, बिल्क ु ल अपने बाप पर गया है। रात में जब भी पानी पीने उठेगा, तो मुझसे भी पूछता है, " दादी पानी पियोगी? घर आते ही दौड़ा आएगा। उसे पता है कि मै यहीं पर बैठती हूं। वृद्धा का अपने पोते क े लिए प्यार उमड़ रहा था।
  • 13.
    ...अम्मा... आप इतनीसमझदार हैं, बुद्धिमती हैं फिर भी आज किस बात पर बहू से नाराज़ हैं, क ु छ कहा-सुनी हो गई क्या?- शालिनी जी ने सहज लेकिन कौतूहल क े भाव से पूछा वृद्धा ने हाथ चमकाते हुए कहा, "अरे नहीं... बहू में इतनी हिम्मत कहां है कि वो मुझसे मुंहजोरी करे, बस मुंह फ ु लाए इधर से उधर घूमती रहेगी। कल मैंने बहू से बस इतना कहा कि थोड़ा पानी गरम कर दो, पैर सेक ूं गी।" फिर शालिनी जी को अपना पैर दिखाते हुए बोलीं, "देखो कितनी सूजन है, दर्द भी होता है।" शालिनी जी ने भी अम्मा को जैसे एक ठण्डी निगाह से देखा हो, वाकई सूजा हुआ था। बरबस ही बोली, "हां अम्मा ये तो बहुत सूजा हुआ है। पैर नीचे क्यों लटका रखा है, ऊपर कर लीजिए ... पैर नीचे रहेगा तो और सूजन आ जाएगी... रात को सोते समय एक तकिया पैर क े नीचे रख लीजीएगा। इससे सूजन कम हो जाएगी... तो क्या बहू ने पानी गरम नहीं किया...!!!" अम्मा ने ढीली आवाज़ में जवाब दिया, "किया तो जरूर, लेकिन पानी इतना कम था कि पैर उसमें डूबा ही नहीं। मैंने कहा अरे बहू थोड़ा पानी और गरम कर दो... तो पानी की बस ठण्ड छ ु ड़ाई और ला कर बालटी में डाल दिया। जो क ु छ पहले वाला पानी गरम था, उसका भी कल्याण हो गया... फिर क्या था हो गई सिकाई ... रह गया पैर वैसे का वैसा ही। आज सुबह की ही बात है खाने क े बाद उससे चाय बनाने को कहा तो खुद बैठी रही और गुड़िया से चाय बनवा दी। वह छोटी सी लड़की अभी क्या चाय बनाएगी...? इतनी चीनी डाल दी कि चाय पी ही नहीं गई। क्या एक कप चाय बनाने में उसक े हाथ टूट जाते? अभी पार्क में आने से पहले चाय बनाने को कहा तो अनसुना कर दिया। दुबारा कहा चाय बना दो, मैं पार्क में जाऊ ं गी, तो उठी और बाथरूम में चली गई। सोचा होगा गुड़िया से बनवाएगी तो गुड़िया पहले से ही खेलने जा चुकी थी। मुझे बहुत गुस्सा आया । बिना चाय पिए आ गई हूं, बोलकर आई हूं कभी तुम्हारे हाथ की चाय नहीं पिऊ ं गी। अब पति क े सामने रो-रो कर बताएगी कि उसने सुना नहीं। अभी ऑफिस से आता होगा। सात बजे आता है। सात बज गए क्या बेटा? अम्मा ने पूछा । तभी एक 35-40 साल का युवक अम्मा क े पास आकर, उनका हाथ पकड़कर उठाने लगा। पुत्र को सामने देखकर अम्मा नरम पड़ गईं। युवक ने फिर कहा अम्मा घर चलो। वृद्धा स्वर में बेरूखी लाकर बोली, "बेटा मुझे वहां मत ले जा, मैं तुम्हारी पत्नी को नहीं सुहाती हूं। मुझे पार्क में मर जाने दो।" मरें तुम्हारे दुश्मन अम्मा। तुम्हारे रहने से मुझे हौसला रहता है और तुम मरने की बात करती हो? उसका स्वभाव खराब है, तुम जानती हो। मैं निर्वाह कर रहा हूं न, तुम भी अपने बेटे की खातिर जैसे अब तक निर्वाह किया वैसे ही आगे भी कर लो। रही खराब खाना बनाने
  • 14.
    की बात तोसब लोग वही खाना खाते हैं न। वह भी तो वही खाती है। सबक े वश में नही है अच्छा खाना बनाना। तुम्हारे पकाए खाने क े स्वाद से अगर तुलना करू ं गा तो भूखे रहना पड़ेगा। स्वादिष्ट भोजन किसको पसंद नहीं होगा? इस उम्र में तुम खाना बनाओगी तो मुझसे खाया नहीं जाएगा। अब तुम्हारा आराम करने का समय है। अपने समय में तुमने बहुत किया है, अब तुम्हारी बहू करेगी। वृद्धा अभी तक बेटे का हाथ पकड़े बेंच पर बैठी, उसकी इन बातों में खो सी गई थी... करण फिर बोला... उठो चप्पल पहनो अम्मा। मुझे गांव पहुंचा दो बेटा। तुम्हारे घर चली जाऊ ं गी तो बहू फिर से क्लेश करेगी। मुझे क्लेश से बहुत डर लगता है—अम्मा ने कराहती आवाज़ में कहा। वह क्या क्लेश करेगी अम्मा, जब से तुम यहां बैठी हो, वह गेट पर खड़ी है। तुम्हें तो दिखता नही हैं, वह तुम्हें देख रही है। दो बार बच्चों को बुलाने भेजा तो तुमने डांट कर उन्हें भगा दिया। वह स्वयं आने से डर रही है। अभी ऑफिस से आया हूं, जूते भी नहीं उतारने दिए और कहने लगी पहले अम्मा को ले आइए, वे गुस्सा हो कर पार्क में जा बैठी हैं। शाम की चाय भी नहीं पी है। तुमने उससे चाय बनाने को कहा था, उसने सुना नहीं और वह बाथरूम में चली गई। वृद्धा ने थोड़े तल्ख़ अन्दाज़ में कहा, "अरे वाह... सुना क ै से नहीं, यह क्यों नहीं कहती कि सुन कर भी अनसुना कर दिया।" युवक थोड़ा मुस्क ु राया और और फिर शालिनी जी की ओर देखकर बोला, “अम्मा...... तुम्हारे गुस्से से तो मैं भी डरता हूं, तो वह किस खेत की मूली है?" इकलौते बेटे की बातें सुनकर वृद्धा का दिल जैसे क ु छ पसीज गया हो और गुस्सा भी क ु छ ठण्डा हो गया। कलेजे को ठण्डक मिली तो बोली, "बेकार की बातें न बना... अच्छी तरह से जानती हूं किसी को मेरी कोई परवाह नहीं है?" वृद्धा ने अपनी खुशी छ ु पाते हुए कहा, "छोड़ मेरा हाथ।" युवक अपनी मां का हाथ पकड़े रहा और पूछा - नहीं मां पहले तुम्हें बताना होगा..... क्या मुझे तुम्हारी कोई परवाह नहीं है। शालिनी जी ने बैंच क े नीचे पड़ी अम्मा की छड़ी उन्हें देते हुए कहा, "भैया आपकी परवाह नहीं करेंगे तो और किसकी करेंगे?
  • 15.
    दुनिया में मांसे बढ़कर बेटे क े लिए और क्या होगा? आप मां हैं, आपने बच्चों की ग़लतियों को कितनी बार माफ किया है, फिर बहू तो आपक े सब बच्चों से छोटी है, इसलिए उसकी गलतियों को भी उसकी नासमझी मान कर माफ कर दें।" युवक खुश होकर हंसते हुए बोला देखा अम्मा आज जो बहन जी कह रही हैं, यही बात तो मैं हमेशा तुमसे कहता हूं। आप सिर्फ मेरी ही मां नहीं हो... बहू की भी मां हो। बहू भी तो आपको मां ही कहती है। जाने अनजाने में गलतियां किससे नहीं होती, लेकिन इसका मतलब ये तो कतई न हुआ ना...कि मां की चिन्ता ही नहीं है किसी को.....। मां का महत्व भला कभी कम होता है... यह सब सुनते ही वृद्धा का झुर्रियों भरा, तमतमाया हुआ चेहरा . अब मां की गरिमा से दमकने लगा। तभी एक लड़का दौड़ता हुआ आया और वृद्धा क े हाथ में से छड़ी लेकर खड़ा हो गया। वृद्धा शालिनी जी की ओर देखते हुए बोली. "यही है पोता।" उसक े सिर पर हाथ फ े रते हुए बोली, "आ गया... ट्यूशन पढ़कर !!!" लड़क े ने हां में सिर हिला दिया। वृद्धा पुत्र और पौत्र क े साथ घर की ओर ऐसे चलीं मानो कोई किला जीत कर आ रही हों। पार्क से निकल कर शालिनी जी भी घर की ओर बढ़ने लगीं। पार्क क े कोने में पत्थर की बेंच पर बैठी वह वृद्धा शालिनी जी क े मन में गहराई तक उतर गई थी। समय की करवट, गांव और शहर क े परिवेश को नकारती, बड़े पैमाने पर व्याप्त रूढ़ीवादी परम्पराओं से जकड़ी नाती-पोतों वाली 'वह' सास क े गरिमामय पद पर आसीन थीं। अपने लिए भी वह ठीक वैसा ही आदर व सम्मान चाहती थीं, जैसा उन्होंने अपने बड़ों को दिया था, लेकिन अब शरीर से लाचार, पुत्र पर आश्रित, चालाक और आलसी बहू क े साथ रहने की विवशता ही इस वृद्धा की अर्न्तव्यथा है । सोचते-सोचते शालिनी जी मायूस हो गईं और उनकी आंखें भर आईं। लेखिका : श्रीमती शक ु न्तला प्रसाद