छायावाद युग (१९१८-१९३८)
-एक प्रस्तुतत
मुम्ताज़ पि पि
छायावाद युग नामकरण
साहित्य के इततिास के यौवन काल "छायावाद युग" नाम से प्रततष्ठित
िुआ िै। सबसे पिले श्री.मुकु टधर पाांडेय ने इस काव्यधारा के ललए
छायावाद शब्द प्रयुक्त ककया था। उन्िोंने उस काव्य की सूक्ष्मता और
अस्पठटता की ओर ध्यान हदलाते िुए, व्यांग्यात्मक रूप में 'छाया' शब्द
रखा था, बाद में 'छायावाद' नाम स्वीकृ त िो गया। बाद में छायावादी
कववयों ने इस ववशेषण को प्यार से स्वीकार ककया।
श्री.मुकु टधर िाांडेय
छायावादी कपवता की मुख्य प्रवृपियााँ।
छायावादी कववयों ने एक ओर नारी सौंदयय
का सूक्ष्म वणयन ककया िै तो दूसरी ओर
उन्िोंने प्रकृ तत सौंदयय का भी मनोिर चित्रण
ककया िै।
सौंदयय
छायावादी कपवता की मुख्य प्रवृपियााँ।
छायावादी कववयों ने प्रेम का स्वछन्द,
सुन्दर, नया रूप प्रस्तुत ककया। उनका प्रेम
ककसी प्रकार की रूहि, मयायदा या तनयम के
बन्धनों में बांधा निीां िै।
प्रेम
छायावादी कपवता की मुख्य प्रवृपियााँ।
छायावादी कववता में स्वछांदता की प्रवृवि और
ववद्रोि का तत्व हदखाई पड़ते िै। इन कववयों
ने तत्कालीन समाज और साहित्य के क्षेत्र की
रूहियों का ववरोध ककया िै।
पवद्रोह
छायावादी कपवता की मुख्य प्रवृपियााँ।
छायावादी कववयों ने उस युग की राठरीय
िेतना की अलभव्यष्क्त की िै। तल्काललन
भारतीय जीवन में जो सांस्कृ तत, राजनीततक,
धालमयक और सामाष्जक नावोथान और जागरण
िो रिा था, उसका प्रभाव छायावादी कववता में
दृष्ठटगत िुआ था।
राष्ट्रीयचेतना
छायावादी कपवता की मुख्य प्रवृपियााँ।
छायावादी कववयों ने, ववशेषकर पांतजी ने
उन्मुक्त कल्पना ववशेष स्थान देकर कववता
ललखी िै। वे किी किी धरती और मानव
जीवन की किोर वास्तववकता से दूर िो जाते
िै।
कल्िना
छायावादी कपवता की मुख्य प्रवृपियााँ।
छायावादी कववयों के स्वछन्द दृष्ठटकोण का
पररिय के वल उनकी कववता के भाव-पक्ष में
िी निीां, बष्ल्क शैली या कलापक्ष में भी
लमलता िै। प्रतीकों और बबम्बों के द्वारा
कववता को मालमयक बनाया।
शैलीगत पवशेषताएाँ
छायावाद के प्रमुख
कवव और रिनाएँ
जयशांकर प्रसाद (1989-1937)
रचनाएाँ :
“कानन कु सुम”, “झरना”, “आाँसू”,
“लहर”, “कामायनी”।
सूययकाांत त्रििाठी ननराला (1897-1961)
रचनाएाँ :
“जूही की कली”, “तुलसीदास”,
“राम की शक्तत िूजा”, “सरोज
स्मृनत”, “अनाममका”, “िररमल”,
“गीनतका”।
सुममिानांद िांत (1900-1977)
रचनाएाँ :
“उच्छवास”, “ग्रक्थि”, “वीणा”,
“िल्लव”, “गुांजन”, “कला और
बूढ़ा चााँद”, “चचतम्बरा”,
“लोकायतन”।
महादेवी वमाय (1907-1987)
रचनाएाँ :
“नीहार”, “रक्मम”, “नीरजा”,
“साांध्यगीत”, “दीिमशखा”।
मुम्ताज़ पि पि

Romantism

  • 1.
    छायावाद युग (१९१८-१९३८) -एकप्रस्तुतत मुम्ताज़ पि पि
  • 2.
    छायावाद युग नामकरण साहित्यके इततिास के यौवन काल "छायावाद युग" नाम से प्रततष्ठित िुआ िै। सबसे पिले श्री.मुकु टधर पाांडेय ने इस काव्यधारा के ललए छायावाद शब्द प्रयुक्त ककया था। उन्िोंने उस काव्य की सूक्ष्मता और अस्पठटता की ओर ध्यान हदलाते िुए, व्यांग्यात्मक रूप में 'छाया' शब्द रखा था, बाद में 'छायावाद' नाम स्वीकृ त िो गया। बाद में छायावादी कववयों ने इस ववशेषण को प्यार से स्वीकार ककया। श्री.मुकु टधर िाांडेय
  • 3.
    छायावादी कपवता कीमुख्य प्रवृपियााँ। छायावादी कववयों ने एक ओर नारी सौंदयय का सूक्ष्म वणयन ककया िै तो दूसरी ओर उन्िोंने प्रकृ तत सौंदयय का भी मनोिर चित्रण ककया िै। सौंदयय
  • 4.
    छायावादी कपवता कीमुख्य प्रवृपियााँ। छायावादी कववयों ने प्रेम का स्वछन्द, सुन्दर, नया रूप प्रस्तुत ककया। उनका प्रेम ककसी प्रकार की रूहि, मयायदा या तनयम के बन्धनों में बांधा निीां िै। प्रेम
  • 5.
    छायावादी कपवता कीमुख्य प्रवृपियााँ। छायावादी कववता में स्वछांदता की प्रवृवि और ववद्रोि का तत्व हदखाई पड़ते िै। इन कववयों ने तत्कालीन समाज और साहित्य के क्षेत्र की रूहियों का ववरोध ककया िै। पवद्रोह
  • 6.
    छायावादी कपवता कीमुख्य प्रवृपियााँ। छायावादी कववयों ने उस युग की राठरीय िेतना की अलभव्यष्क्त की िै। तल्काललन भारतीय जीवन में जो सांस्कृ तत, राजनीततक, धालमयक और सामाष्जक नावोथान और जागरण िो रिा था, उसका प्रभाव छायावादी कववता में दृष्ठटगत िुआ था। राष्ट्रीयचेतना
  • 7.
    छायावादी कपवता कीमुख्य प्रवृपियााँ। छायावादी कववयों ने, ववशेषकर पांतजी ने उन्मुक्त कल्पना ववशेष स्थान देकर कववता ललखी िै। वे किी किी धरती और मानव जीवन की किोर वास्तववकता से दूर िो जाते िै। कल्िना
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    छायावादी कपवता कीमुख्य प्रवृपियााँ। छायावादी कववयों के स्वछन्द दृष्ठटकोण का पररिय के वल उनकी कववता के भाव-पक्ष में िी निीां, बष्ल्क शैली या कलापक्ष में भी लमलता िै। प्रतीकों और बबम्बों के द्वारा कववता को मालमयक बनाया। शैलीगत पवशेषताएाँ
  • 9.
  • 10.
    जयशांकर प्रसाद (1989-1937) रचनाएाँ: “कानन कु सुम”, “झरना”, “आाँसू”, “लहर”, “कामायनी”।
  • 11.
    सूययकाांत त्रििाठी ननराला(1897-1961) रचनाएाँ : “जूही की कली”, “तुलसीदास”, “राम की शक्तत िूजा”, “सरोज स्मृनत”, “अनाममका”, “िररमल”, “गीनतका”।
  • 12.
    सुममिानांद िांत (1900-1977) रचनाएाँ: “उच्छवास”, “ग्रक्थि”, “वीणा”, “िल्लव”, “गुांजन”, “कला और बूढ़ा चााँद”, “चचतम्बरा”, “लोकायतन”।
  • 13.
    महादेवी वमाय (1907-1987) रचनाएाँ: “नीहार”, “रक्मम”, “नीरजा”, “साांध्यगीत”, “दीिमशखा”।
  • 14.