जयशंकर प्रसाद
आत्मकथ्य
आरुषि त्यागी
ROLL NO. 03
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जयशंकर प्रसाद
हिन्दी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार तथा ननबन्धकार थे। िे
हिन्दी के छायािादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक िैं। उन्िोंने
हिंदी काव्य में छायािाद की स्थापना की जिसके द्िारा खड़ी बोली के
काव्य में कमऩीय माधुयय की रसससद्ध धारा प्रिाहित िुई और िि
काव्य की ससद्ध भाषा बन गई।
आधुननक हिंदी साहित्य के इनतिास में इनके कृ नतत्ि का गौरि
अक्षुण्ण िै। िे एक युगप्रितयक लेखक थे जिन्िोंने एक िी साथ
कविता, नाटक, किाऩी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरि करने
लायक कृ नतयााँ दीं। कवि के रूप में िे ननराला, पन्त, मिादेि़ी के साथ
छायािाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रनतजठित िुए िै; नाटक लेखन में
भारतेंदु के बाद िे एक अलग धारा बिाने िाले युगप्रितयक नाटककार
रिे जिनके नाटक आि भ़ी पािक चाि से पढते िैं। इसके अलािा
किाऩी और उपन्यास के क्षेत्र में भ़ी उन्िोंने कई यादगार कृ नतयााँ दीं।
विविध रचनाओं के माध्यम से मानि़ीय करूणा और भारत़ीय मऩीषा
के अनेकानेक गौरिपूणय पक्षों का उद्घाटन। ४८ िषो के छोटे से ि़ीिन
में कविता, किाऩी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक ननबंध आहद
विसभन्न विधाओं में रचनाएं की।
आत्मकथ्य
मधुप गुन-गुनाकर कि िाता कौन किाऩी अपऩी यि,
मुरझाकर गगर रिीं पवियााँ देखो ककतऩी आि घऩी।
इस गंभ़ीर अनंत-ऩीसलमा में असंख्य ि़ीिन-इनतिास
यि लो, करते िी रिते िैं अपने व्यंग्य मसलन उपिास
तब भ़ी किते िो-कि डालूाँ दुबयलता अपऩी ब़ीत़ी।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यि गागर रीत़ी।
ककं तु किीं ऐसा न िो कक तुम िी खाली करने िाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपऩी भरने िाले।
यि विडंबना! अरी सरलते िाँस़ी तेरी उडाऊाँ मैं।
भूलें अपऩी या प्रिंचना औरों की हदखलाऊाँ मैं।
उज्‍ज्‍िल गाथा कै से गाऊाँ , मधुर चााँदऩी रातों की।
आत्मकथ्य
अरे खखल-खखलाकर िाँसतने िाली उन बातों की।
समला किााँ िि सुख जिसका मैं स्िप्न देकर िाग गया।
आसलंगन में आते-आते मुसक्या कर िो भाग गया।
जिसके अरूण-कपोलों की मतिाली सुन्दर छाया में।
अनुरागगऩी उषा लेत़ी थ़ी ननि सुिाग मधुमाया में।
उसकी स्मृनत पाथेय बऩी िै थके पगथक की पंथा की।
स़ीिन को उधेड कर देखोगे क्यों मेरी कं था की?
छोटे से ि़ीिन की कै से बडे कथाएाँ आि किूाँ?
क्या यि अच्छा निीं कक औरों की सुनता मैं मौन रिूाँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा?
अभ़ी समय भ़ी निीं, थकी सोई िै मेरी मौन व्यथा।
QUESTION AND ANSWERS
1. कवि आत्मकथा सलखने से क्यों बचना चािते िैं ?
Answer: कवि आत्मकथा सलखने से बचना चािते िैं क्योंकक ि़ीिन में बिुत सारी
प़ीडादायक घटनाएाँ िुई िैं । अपऩी सरलता के कारण उसने कई बार धोखा भ़ी खाया िै
। कवि के पास मात्र कु छ सुनिरे क्षणों की स्मृनतयााँ िी शेष िैं जिसके सिारे िि
अपऩी ि़ीिन - यात्रा पूरी कर रिा िै । उन यादो को उसने अपने अंतर मन साँिोकर
रखा िै और उन्िें िि प्रकट करना निीं चािता िै। कवि को लगता िै की उनकी
आत्मकथा में ऐसा कु छ भ़ी निीं िैं जिसे मिान और सेिक मानकर लोग आनंहदत
िोंगें ।
2. स्मृनत को 'पाथेय' बनाने से कवि का क्या आशय िै ?
Answer: स्मृनत को 'पाथेय' बनाने से कवि का आशय ि़ीिनमागय के प्रेरणा से िै ।
कवि ने िो सुख का स्िप्न देखा था, िि उसे कभ़ी प्राप्त निीं िुआ। इससलए कवि
स्ियं को ि़ीिन - यात्रा से थका िुआ मानता िै। जिस प्रकार 'पाथेय' यात्रा में यात्ऱी
को सिारा देता िै, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता िै हिक उस़ी प्रकार स्िप्न में देखे िुए
ककं गचत सुख की स्मृनत भ़ी कवि को ि़ीिन - मागय में आगे बढ़ने का सिारा देता िै
।
QUESTION AND ANSWERS
3. भाि स्पठट कीजिए -
(क) समला किााँ िि सुख जिसका मैं स्िप्न देखकर िाग गया ।
आसलंगन में आते - आते मुसक्या कर भाग गया ।
(ख) जिसके अरुण कपोलों की मतिाली सुन्दर छाया में ।
अनुरागगऩी उषा लेत़ी थ़ी ननि सुिाग मधुमाया में ।
Answer:
(क) मुझे िि सुख किााँ समल पाया जिसका सपना देखते - देखते मैं िाग गया था,
िो सुख मेरे गले लगते - लगते मुस्कु राते िुए भागकर गया था ।
भाि यि िै कक कवि ने जिस सुख की कल्पना की थ़ी िि उसे कभ़ी प्राप्त न िुआ
और उसका ि़ीिन िमेशा उस सुख से िंगचत िी रिा ।
(ख) कवि ने इन पंजक्तयों में स्िप्न में देखे गए सुख के स्िरुप को स्पठट ककया िै
। कवि के वप्रय का रूप बिुत मनमोिक िै । ऐसा लगता िै मानो उसके लाल गालों
से अनुराग झलक रिा िै और गालों की लाली प्राप्त करत़ी िै । ऐसा लगता िै िैसे
वप्रय की गालों की यि लालीमा प्रातःकालीन आकाश में प्रनतबबंबबत िो रिी िै ।
QUESTION AND ANSWERS
4. 'उज्‍ििल गाथा कै से गाऊाँ , मधुर चााँदऩी रातों की' - कथन के माध्यम से कवि
क्या किना चािता िै ?
Answer: उक्त पंक्तोयों से से कवि का आशय ननि़ी प्रेम का उन मधुर और
सुख-भरे क्षणों से िै, िो कवि ने अपऩी प्रेसमका के साथ व्यत़ीत ककये थे ।
चााँदऩी रातों में बबताए गए िे सुखदायक क्षण ककस़ी उज्‍ज्‍िल गाथा की तरि िी
पवित्र िै िो कवि के सलए अपने अन्धकारमय ि़ीिन में आगे बढ़ने का एकमात्र
सिारा बनकर रि गया । इस़ीसलए कवि अपने ि़ीिन की उन मधुर स्मृनतयों को
ककस़ी से बााँटना निीं चािता बजल्क अपने तक िी स़ीसमत रखना चािता िै ।
5. कवि ने िो सुख का स्िप्न देखा था उसे कविता में ककस रूप में असभव्यक्त
ककया िै ?
Answer: कवि ने िो सुख का स्िप्न देखा था उसे िि अपने प्रेसमका के रूप में
व्यक्त ककया िै । यि प्रेसमका स्िप्न में कवि के पास आते-आते मुस्कराकर दूर
चली िात़ी िै और कवि को सुख से िंगचत िी रिना पडता िै । कवि किता िै
की अपने ि़ीिन में िि िो सुख का सपना देखा था,, िि उसे कभ़ी प्राप्त निीं
िुआ ।

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    जयशंकर प्रसाद हिन्दी कवि,नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार तथा ननबन्धकार थे। िे हिन्दी के छायािादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक िैं। उन्िोंने हिंदी काव्य में छायािाद की स्थापना की जिसके द्िारा खड़ी बोली के काव्य में कमऩीय माधुयय की रसससद्ध धारा प्रिाहित िुई और िि काव्य की ससद्ध भाषा बन गई। आधुननक हिंदी साहित्य के इनतिास में इनके कृ नतत्ि का गौरि अक्षुण्ण िै। िे एक युगप्रितयक लेखक थे जिन्िोंने एक िी साथ कविता, नाटक, किाऩी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरि करने लायक कृ नतयााँ दीं। कवि के रूप में िे ननराला, पन्त, मिादेि़ी के साथ छायािाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रनतजठित िुए िै; नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद िे एक अलग धारा बिाने िाले युगप्रितयक नाटककार रिे जिनके नाटक आि भ़ी पािक चाि से पढते िैं। इसके अलािा किाऩी और उपन्यास के क्षेत्र में भ़ी उन्िोंने कई यादगार कृ नतयााँ दीं। विविध रचनाओं के माध्यम से मानि़ीय करूणा और भारत़ीय मऩीषा के अनेकानेक गौरिपूणय पक्षों का उद्घाटन। ४८ िषो के छोटे से ि़ीिन में कविता, किाऩी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक ननबंध आहद विसभन्न विधाओं में रचनाएं की।
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    आत्मकथ्य मधुप गुन-गुनाकर कििाता कौन किाऩी अपऩी यि, मुरझाकर गगर रिीं पवियााँ देखो ककतऩी आि घऩी। इस गंभ़ीर अनंत-ऩीसलमा में असंख्य ि़ीिन-इनतिास यि लो, करते िी रिते िैं अपने व्यंग्य मसलन उपिास तब भ़ी किते िो-कि डालूाँ दुबयलता अपऩी ब़ीत़ी। तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यि गागर रीत़ी। ककं तु किीं ऐसा न िो कक तुम िी खाली करने िाले- अपने को समझो, मेरा रस ले अपऩी भरने िाले। यि विडंबना! अरी सरलते िाँस़ी तेरी उडाऊाँ मैं। भूलें अपऩी या प्रिंचना औरों की हदखलाऊाँ मैं। उज्‍ज्‍िल गाथा कै से गाऊाँ , मधुर चााँदऩी रातों की।
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    आत्मकथ्य अरे खखल-खखलाकर िाँसतनेिाली उन बातों की। समला किााँ िि सुख जिसका मैं स्िप्न देकर िाग गया। आसलंगन में आते-आते मुसक्या कर िो भाग गया। जिसके अरूण-कपोलों की मतिाली सुन्दर छाया में। अनुरागगऩी उषा लेत़ी थ़ी ननि सुिाग मधुमाया में। उसकी स्मृनत पाथेय बऩी िै थके पगथक की पंथा की। स़ीिन को उधेड कर देखोगे क्यों मेरी कं था की? छोटे से ि़ीिन की कै से बडे कथाएाँ आि किूाँ? क्या यि अच्छा निीं कक औरों की सुनता मैं मौन रिूाँ? सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा? अभ़ी समय भ़ी निीं, थकी सोई िै मेरी मौन व्यथा।
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    QUESTION AND ANSWERS 1.कवि आत्मकथा सलखने से क्यों बचना चािते िैं ? Answer: कवि आत्मकथा सलखने से बचना चािते िैं क्योंकक ि़ीिन में बिुत सारी प़ीडादायक घटनाएाँ िुई िैं । अपऩी सरलता के कारण उसने कई बार धोखा भ़ी खाया िै । कवि के पास मात्र कु छ सुनिरे क्षणों की स्मृनतयााँ िी शेष िैं जिसके सिारे िि अपऩी ि़ीिन - यात्रा पूरी कर रिा िै । उन यादो को उसने अपने अंतर मन साँिोकर रखा िै और उन्िें िि प्रकट करना निीं चािता िै। कवि को लगता िै की उनकी आत्मकथा में ऐसा कु छ भ़ी निीं िैं जिसे मिान और सेिक मानकर लोग आनंहदत िोंगें । 2. स्मृनत को 'पाथेय' बनाने से कवि का क्या आशय िै ? Answer: स्मृनत को 'पाथेय' बनाने से कवि का आशय ि़ीिनमागय के प्रेरणा से िै । कवि ने िो सुख का स्िप्न देखा था, िि उसे कभ़ी प्राप्त निीं िुआ। इससलए कवि स्ियं को ि़ीिन - यात्रा से थका िुआ मानता िै। जिस प्रकार 'पाथेय' यात्रा में यात्ऱी को सिारा देता िै, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता िै हिक उस़ी प्रकार स्िप्न में देखे िुए ककं गचत सुख की स्मृनत भ़ी कवि को ि़ीिन - मागय में आगे बढ़ने का सिारा देता िै ।
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    QUESTION AND ANSWERS 3.भाि स्पठट कीजिए - (क) समला किााँ िि सुख जिसका मैं स्िप्न देखकर िाग गया । आसलंगन में आते - आते मुसक्या कर भाग गया । (ख) जिसके अरुण कपोलों की मतिाली सुन्दर छाया में । अनुरागगऩी उषा लेत़ी थ़ी ननि सुिाग मधुमाया में । Answer: (क) मुझे िि सुख किााँ समल पाया जिसका सपना देखते - देखते मैं िाग गया था, िो सुख मेरे गले लगते - लगते मुस्कु राते िुए भागकर गया था । भाि यि िै कक कवि ने जिस सुख की कल्पना की थ़ी िि उसे कभ़ी प्राप्त न िुआ और उसका ि़ीिन िमेशा उस सुख से िंगचत िी रिा । (ख) कवि ने इन पंजक्तयों में स्िप्न में देखे गए सुख के स्िरुप को स्पठट ककया िै । कवि के वप्रय का रूप बिुत मनमोिक िै । ऐसा लगता िै मानो उसके लाल गालों से अनुराग झलक रिा िै और गालों की लाली प्राप्त करत़ी िै । ऐसा लगता िै िैसे वप्रय की गालों की यि लालीमा प्रातःकालीन आकाश में प्रनतबबंबबत िो रिी िै ।
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    QUESTION AND ANSWERS 4.'उज्‍ििल गाथा कै से गाऊाँ , मधुर चााँदऩी रातों की' - कथन के माध्यम से कवि क्या किना चािता िै ? Answer: उक्त पंक्तोयों से से कवि का आशय ननि़ी प्रेम का उन मधुर और सुख-भरे क्षणों से िै, िो कवि ने अपऩी प्रेसमका के साथ व्यत़ीत ककये थे । चााँदऩी रातों में बबताए गए िे सुखदायक क्षण ककस़ी उज्‍ज्‍िल गाथा की तरि िी पवित्र िै िो कवि के सलए अपने अन्धकारमय ि़ीिन में आगे बढ़ने का एकमात्र सिारा बनकर रि गया । इस़ीसलए कवि अपने ि़ीिन की उन मधुर स्मृनतयों को ककस़ी से बााँटना निीं चािता बजल्क अपने तक िी स़ीसमत रखना चािता िै । 5. कवि ने िो सुख का स्िप्न देखा था उसे कविता में ककस रूप में असभव्यक्त ककया िै ? Answer: कवि ने िो सुख का स्िप्न देखा था उसे िि अपने प्रेसमका के रूप में व्यक्त ककया िै । यि प्रेसमका स्िप्न में कवि के पास आते-आते मुस्कराकर दूर चली िात़ी िै और कवि को सुख से िंगचत िी रिना पडता िै । कवि किता िै की अपने ि़ीिन में िि िो सुख का सपना देखा था,, िि उसे कभ़ी प्राप्त निीं िुआ ।