पररचय
यह जेल अंडमानननकोबार द्वीप की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी हुई है। यह अंग्रेजों
द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनाननयों को कै द रखने के ललए बनाई गई थी,
जो कक मुख्य भारत भूलम से हजारों ककलोमीर्र दूर स्स्थत थी, व सागर से भी हजार
ककलोमीर्र दुगटम मागट पडता था। यह काला पानी के नाम से कु ख्यात थी।
3.
इनतहास
यह जेल अंडमानननकोबार द्वीप की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी हुई है। यह अंग्रेजों द्वारा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनाननयों को कै द रखने के ललए बनाई गई थी, जो कक मुख्य भारत
भूलम से हजारों ककलोमीर्र दूर स्स्थत थी, व सागर से भी हजार ककलोमीर्र दुगटम मागट पडता था।
यह काला पानी के नाम से कु ख्यात थी।
अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनाननयों पर ककए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस
जेल की नींव 1897 में रखी गई थी। इस जेल के अंदर 694 कोठररयां हैं। इन कोठररयों को
बनाने का उद्देश्य बंददयों के आपसी मेल जोल को रोकना था। आक्र्ोपस की तरह सात शाखाओं
में फै ली इस ववशाल कारागार के अब के वल तीन अंश बचे हैं। कारागार की दीवारों पर वीर शहीदों
के नाम ललखे हैं। यहां एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है स्जनसे
स्वतंत्रता सैनाननयों पर अत्याचार ककए जाते थे।
4.
ववनायक दामोदर सावरकर
ववनायकदामोदर सावरकर (जन्म: २८ मई १८८३ - मृत्यु: २६ फ़रवरी १९६६)[3] भारतीय
स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रग्रम पंस्क्त के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायः वीर
सावरकर के नाम से सम्बोग्रधत ककया जाता है। दहन्दू राष्ट्र की राजनीनतक ववचारधारा (दहन्दुत्व)
को ववकलसत करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। वे न के वल स्वाधीनता-संग्राम के
एक तेजस्वी सेनानी थे अवपतु महान क्रास्न्तकारी, ग्रचन्तक, लसद्धहस्त लेखक, कवव, ओजस्वी
वक्ता तथा दूरदशी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इनतहासकार भी हैं स्जन्होंने दहन्दू राष्ट्र की ववजय
के इनतहास को प्रामाणिक ढँग से ललवपबद्ध ककया है। उन्होंने १८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर का
सनसनीखेज व खोजपूिट इनतहास ललखकर ब्रिदर्श शासन को दहला कर रख ददया था[4]।
5.
जीवन वृत्त
ववनायक सावरकरका जन्म महाराष्ट्र (तत्कालीन नाम बम्बई) प्रान्त में नालसक के ननकर्
भागुर गाँव में हुआ था। उनकी माता जी का नाम राधाबाई तथा वपता जी का नाम दामोदर
पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गिेश (बाबाराव) व नारायि दामोदर सावरकर तथा एक
बहन नैनाबाई थीं। जब वे के वल नौ वर्ट के थे तभी हैजे की महामारी में उनकी माता जी का
देहान्त हो गया। इसके सात वर्ट बाद सन् १८९९ में प्लेग की महामारी में उनके वपता जी भी
स्वगट लसधारे। इसके बाद ववनायक के बडे भाई गिेश ने पररवार के पालन-पोर्ि का कायट
सँभाला। दुःख और कदठनाई की इस घडी में गिेश के व्यस्क्तत्व का ववनायक पर गहरा प्रभाव
पडा। ववनायक ने लशवाजी हाईस्कू ल नालसक से १९०१ में मैदरक की परीक्षा पास की। बचपन से
ही वे पढाकू तो थे ही अवपतु उन ददनों उन्होंने कु छ कववताएँ भी ललखी थीं। आग्रथटक संकर् के
बावजूद बाबाराव ने ववनायक की उच्च लशक्षा की इच्छा का समथटन ककया। इस अवग्रध में
ववनायक ने स्थानीय नवयुवकों को संगदठत करके लमत्र मेलों का आयोजन ककया। शीघ्र ही इन
नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना के साथ क्रास्न्त की ज्वाला जाग उठी।[4] सन् १९०१ में
रामचन्र त्रयम्बक ग्रचपलूिकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ उनका वववाह हुआ। उनके ससुर जी
ने उनकी ववश्वववद्यालय की लशक्षा का भार उठाया। १९०२ में मैदरक की पढाई पूरी करके
उन्होने पुिे के फर्गयुटसन कालेज से बी०ए० ककया।
6.
सेलुलर जेल में
सेलुलरजेल, पोर्ट ब्लेयर- जो काला पानी के नाम से कु ख्यात थीनालसक स्जले के कलेक्र्र जैकसन
की हत्या के ललए नालसक र्डयंत्र काण्ड के अंतगटत इन्हें ७ अप्रैल, १९११ को काला पानी की सजा
पर सेलुलर जेल भेजा गया। उनके अनुसार यहां स्वतंत्रता सेनाननयों को कडा पररश्रम करना पडता
था। कै ददयों को यहां नाररयल छीलकर उसमें से तेल ननकालना पडता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू
में बैल की तरह जुत कर सरसों व नाररयल आदद का तेल ननकालना होता था। इसके अलावा उन्हें
जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमी व पहाडी क्षेत्र को समतल भी
करना होता था। रुकने पर उनको कडी सजा व बेंत व कोडों से वपर्ाई भी की जाती थीं। इतने पर
भी उन्हें भरपेर् खाना भी नहीं ददया जाता था।।[6] सावरकर ४ जुलाई, १९११ से २१ मई, १९२१
तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे।
7.
नेताजी सुभार् चंरबोस
नेताजी सुभार् चंर बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उडीसा में कर्क के एक संपन्न बंगाली पररवार
में हुआ था। बोस के वपता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस
कर्क शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कु ल लमलाकर 14 संतानें थी, स्जसमें
6 बेदर्याँ और 8 बेर्े थे। सुभार् चंर उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेर्े थे। अपने सभी भाइयों में से
सुभार् को सबसे अग्रधक लगाव शरदचंर से था। नेताजी ने अपनी प्रारंलभक पढाई कर्क के रेवेंशॉव
कॉलेस्जएर् स्कू ल में हुई। तत्पश्चात् उनकी लशक्षा कलकत्ता के प्रेस़्िडेंसी कॉलेज और स्कॉदर्श चचट कॉलेज
से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासननक सेवा (इस्ण्डयन लसववल सववटस) की तैयारी के ललए उनके माता-
वपता ने बोस को इंर्गलैंड के कें ब्रिज ववश्वववद्यालय भेज ददया। अँग्रे़िी शासन काल में भारतीयों के ललए
लसववल सववटस में जाना बहुत कदठन था ककं तु उन्होंने लसववल सववटस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त
ककया। 1921 में भारत में बढती राजनीनतक गनतववग्रधयों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी
वापस ले ली और शीघ्र भारत लौर् आए। लसववल सववटस छोडने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के
साथ जुड गए। सुभार् चंर बोस महात्मा गांधी के अदहंसा के ववचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में
महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभार् चंर बोस जोशीले क्रांनतकारी दल के वप्रय थे।
महात्मा गाँधी और सुभार् चंर बोस के ववचार लभन्न-लभन्न थे लेककन वे यह अच्छी तरह जानते थे कक
महात्मा गाँधी और उनका मकसद एक है, यानी देश की आ़िादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रवपता कह
कर नेताजी ने ही संबोग्रधत ककया था।
8.
1938 में भारतीयराष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष ननवाटग्रचत होने के
बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन ककया। यह नीनत
गाँधीवादी आग्रथटक ववचारों के अनुकू ल नहीं थी। 1939 में बोस
पुन एक गाँधीवादी प्रनतद्वंदी को हराकर ववजयी हुए। गांधी ने
इसे अपनी हार के रुप में ललया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर
गांधी जी ने कहा कक बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने
लगा कक वह कांग्रेस वककिं ग कलमर्ी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी
जी के ववरोध के चलते इस ‘ववरोही अध्यक्ष’ ने त्यागपत्र देने
की आवश्यकता महसूस की। गांधी के लगातार ववरोध को
देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड दी।
इस बीच दूसरा ववश्व युद्ध नछड गया। बोस का मानना था कक
अंग्रेजों के दुश्मनों से लमलकर आ़िादी हालसल की जा सकती
है। उनके ववचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिदर्श सरकार ने
कोलकाता में ऩिरबंद कर ललया लेककन वह अपने भतीजे
लशलशर कु मार बोस की सहायता से वहां से भाग ननकले। वह
अफगाननस्तान और सोववयत संघ होते हुए जमटनी जा पहुंचे।
9.
सकक्रय राजनीनत मेंआने से पहले नेताजी ने पूरी दुननया का भ्रमि ककया। वह 1933 से 36
तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था दहर्लर के नाजीवाद और मुसोललनी के फासीवाद का।
नाजीवाद और फासीवाद का ननशाना इंर्गलैंड था, स्जसने पहले ववश्वयुद्ध के बाद जमटनी पर
एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंर्गलैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रे़िों का
कब्जा था और इंर्गलैंड के णखलाफ लडाई में नेताजी को दहर्लर और मुसोललनी में भववष्ट्य का
लमत्र ददखाई पड रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कक स्वतंत्रता
हालसल करने के ललए राजनीनतक गनतववग्रधयों के साथ-साथ कू र्नीनतक और सैन्य सहयोग की
भी जरूरत पडती है।
सुभार् चंर बोस ने 1937 में अपनी सेक्रे र्री और ऑस्स्रयन युवती एलमली से शादी की। उन
दोनों की एक अनीता नाम की एक बेर्ी भी हुई जो वतटमान में जमटनी में सपररवार रहती हैं।
नेताजी दहर्लर से लमले। उन्होंने ब्रिदर्श हुकू मत और देश की आजादी के ललए कई काम ककए।
उन्होंने 1943 में जमटनी छोड ददया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह लसंगापुर पहुंचे।
जहां उन्होंने कै प्र्न मोहन लसंह द्वारा स्थावपत आ़िाद दहंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले
ली। उस वक्त रास ब्रबहारी बोस आ़िाद दहंद फ़ौज के नेता थे। उन्होंने आ़िाद दहंद फ़ौज का
पुनगटठन ककया। मदहलाओं के ललए रानी झांसी रेस्जमेंर् का भी गठन ककया स्जसकी लक्ष्मी
सहगल कै प्र्न बनी।
10.
'नेताजी' के नामसे प्रलसद्ध सुभार् चन्र ने सशक्त क्रास्न्त द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के
उद्देश्य से 21 अक्र्ूबर, 1943 को 'आ़िाद दहन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आ़िाद दहन्द
फ़ौज' का गठन ककया इस संगठन के प्रतीक ग्रचह्न पर एक झंडे पर दहाडते हुए बाघ का ग्रचत्र
बना होता था। नेताजी अपनी आजाद दहंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बमाट पहुँचे। यहीं
पर उन्होंने अपना प्रलसद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" ददया।
18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी की मौत हवाई दुघटर्ना में
हो गई, लेककन उनका शव नहीं लमल पाया। नेताजी की मौत के कारिों पर आज भी वववाद
बना हुआ है।
11.
ज्वलन्त युवा क्रास्न्तकारीखुदीराम
बोस का रेखाग्रचत्रखुदीराम बोस (बांर्गला: ক্ষুদিরাম বসু, अंग्रेजी: Khudiram Bose, मलयालम:
ഖുദീരോാം ബ ോസ്, मराठी: खुदीराम बोस, जन्म: १८८९ - मृत्यु : १९०८) भारतीय स्वाधीनता
के ललये मात्र १९ साल की उम्र में दहन्दुस्तान की आजादी के ललये फाँसी पर चढ गये। कु छ
इनतहासकारों की यह धारिा है कक वे अपने देश के ललये फाँसी पर चढने वाले सबसे कम उम्र के
ज्वलन्त तथा युवा क्रास्न्तकारी देशभक्त थे। लेककन एक सच्चाई यह भी है कक खुदीराम से पूवट १७
जनवरी १८७२ को ६८ कू काओं के सावटजननक नरसंहार के समय १३ वर्ट का एक बालक भी शहीद
हुआ था। उपलब्ध तथ्यानुसार उस बालक को, स्जसका नम्बर ५०वाँ था, जैसे ही तोप के सामने
लाया गया, उसने लुग्रधयाना के तत्कालीन डडप्र्ी कलमश्नर कावन की दाढी कसकर पकड ली और
तब तक नहीं छोडी जब तक उसके दोनों हाथ तलवार से कार् नहीं ददये गये बाद में उसे उसी
तलवार से मौत के घार् उतार ददया गया था। (देखें सरफरोशी की तमन्ना भाग ४ पृष्ट्ठ १३)
मु़िफ्फरपुर जेल में स्जस मस्जस्रेर् ने उन्हें फाँसी पर लर्काने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में
बताया कक खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह ननभीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढा था।
जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 18 वर्ट थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकवप्रय हो
गए कक बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक खास ककस्म की धोती बुनने लगे।
12.
उनकी शहादत सेसमूचे देश में देशभस्क्त की लहर उमड पडी थी। उनके साहलसक योगदान
को अमर करने के ललए गीत रचे गए और उनका बललदान लोकगीतों के रूप में मुखररत हुआ।
उनके सम्मान में भावपूिट गीतों की रचना हुई स्जन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं।
13.
KANAILAL दत्ता
30 अगस्त1888 - 10 नवंबर 1908) युगांतर समूह से संबंग्रधत भारत की आजादी की
लडाई में एक क्रांनतकारी था। उन्होंने चन्दननगर, पस्श्चम बंगाल में पैदा हुआ था।
14.
प्रारंलभक जीवन
उनके वपता,चुन्नीलाल दत्ता, Bombay. Kanailal की प्रारंलभक स्कू ल जीवन में एक एकाउंर्ेंर्
ग्रगरगांव आयट एजुके शन सोसाइर्ी स्कू ल, मुंबई में शुरू ककया गया था और बाद में वह वापस
चन्दननगर के ललए आया था और चन्दननगर द्वैध Vidya mandir. In 1908 में दाणखला ललया
था, वह बीए परीक्षा से ददया हुगली कॉलेज, तब कलकत्ता ववश्वववद्यालय से संबद्ध।
अपने प्रारंलभक कॉलेज के ददनों के दौरान, Kanailal बंगाल के ववभाजन के णखलाफ आंदोलन के
दौरान क्रांनतकारी आंदोलन में शालमल होने के ललए प्रेररत ककया, जो प्रोफे सर चारु चंर रॉय के साथ
मुलाकात की। बंगाल के ववभाजन के णखलाफ 1905 के आंदोलन के दौरान, Kanai lal दत्ता
चन्दननगर समूह से क्षेत्र में अग्रिी था।
1908 में उन्होंने कोलकाता में ले जाया गया और कोलकाता आधाररत क्रांनतकारी समूह युगांतर में
शालमल हो गए। ककं र्गसफोडट हत्या के प्रयास के संबंध में, Kanailal 2 मई 1908 को ग्रगरफ्तार ककया
गया था और अलीपुर जेल में दहरासत में ललया। वहां उन्होंने और सत्येंरनाथ बसु (एक और बंदी)
नरेन गोस्वामी को मारने के ललए कहा गया था। 31 अगस्त 1908 को, वे उनके आदेश बाहर ले
गए और जेल अस्पताल के अंदर मृत उसे गोली मार दी
15.
चारु चंर बोस
मूलयोजना से कि या शीर्टक से हीनता का कोई संके त नहीं ददखाया जो शांत साहस, की
बात में, चारु चन्र बसु की कारटवाई भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इनतहास में एक अनूठा
स्थान है।
चारु जन्म से हथेली और दादहने हाथ की उंगललयों से रदहत एक छोर्ा लग रही है,
बीमार, पतली बनाया ककशोरी थी। वह अच्छी तरह से उसे जाना जाता है और शायद सबसे
अग्रधक स्जम्मेदार नौकरी शुरू करने के ललए अपनी क्षमता का ज्ञान पास था, जो उन लोगों
के ललए छोडकर जीवन के ककसी भी गंभीर तरीका है ज्ञात नहीं था। चारु, वप्रंदर्ंग प्रेस और
समाचार पत्र संगठनों कई में वपछले जा रहा है Hitaishi प्रेस, हावडा काम ककया।
उन्होंने नं 130, Russa रोड पर रह रहा था और कम से कम बारह साल के
ललए अच्छी कलकत्ता जाना जाता था। वह अपनी कारटवाई पर फै सला ककया है, वह
ररवाल्वर शूदर्ंग अभ्यास के ललए कई ददनों के ललए र्ॉलीगंज का दौरा ककया। उन्होंने कहा
कक अलीपुर ओ अदालतों के चारों ओर पाँच या छह ददनों के ललए अपने लशकार के ललए
अपनी घडी शुरू ककया। पूछताछ से चारु आशुतोर् ब्रबस्वास वह अपनी कारटवाई के ललए
तैयार हो गया है स्जस पर ददन पर उपनगरीय पुललस कोर्ट में आ जाएगा कक कु छ के ललए
पता करने के ललए आया था। ददन के कोसट के दौरान उन्होंने एक बार जज की कोर्ट में
ब्रबस्वास पर हमला करने की कोलशश की, लेककन उन्होंने कहा कक वह बहुत कम अनुकू ल
उसकी उम्मीदों से अच्छी तरह से संरक्षक्षत ककया जा करने के ललए जगह और अवसर
पाया क्योंकक ववचार देने के ललए ककया था।
16.
अलीपुर बार कीबढाया हुआ लोक अलभयोजक, आशु ब्रबस्वास, असामान्य उत्साह के साथ और
कभी कभी सब अंतरात्मा को आरोपी व्यस्क्तयों के ललए उग्रचत है और न ही कानूनी पेशे के
ललए सभ्य न तो थे जो साधन के साथ उन्हें अलभयोग से क्रांनतकाररयों के ललए खुद को अवप्रय
बना ददया था। पुललस के नीच आँखों के के न के तहत आया था, जो राजनीनतक की सजा की
सुववधा के ललए के रूप में वह इस तरह से कागजात और सुरक्षक्षत सबूत की व्यवस्था करने के
ललए पुललस को सलाह देने के ललए अपने रास्ते से बाहर जाना होगा। कायटकारी एक व्यस्क्त
ववरोहात्मक proclivities के ललए ग्रचस्ह्नत ककया गया था एक बार बच नहीं सकता यह देखा
कक जब यह समय था। और आशुतोर् Wiswas इस तरह के मामलों में पुललस अलभयोजन पक्ष
का मुख्य आधार था।
कु छ लोग कहीं न कहीं इस आदमी ने अपनी गनतववग्रधयों के क्षेत्र से हर्ाया जाना चादहए था।
दूसरे ददन पर सामान्य रूप में था, व्यस्त वकील अपने पेशेवर कतटव्यों के ननवटहन में ककसी
अन्य के ललए एक अदालत से चल रहा था, और वह एक coining मामले में, 10 फरवरी,
1909, उस ददन पर उपनगरीय पुललस मस्जस्रेर् के समक्ष पेश हुए।
आशु पूवी प्रवेश द्वार से 4-20 बजे अदालत छोड ददया और दक्षक्षिी ददशा में चल रहा था।
'एक शॉर् ननकाल ददया गया था इमारत और बीओपी-रे (ओह, वपताजी!) बाहर बुलाया घायल
आदमी के दक्षक्षि-पूवट कोने में हाईड्रेन्र् होने जा रही है और तेजी से दोनों हाथ आगे बढ जब
एक पस्श्चमी ददशा में भागा।
17.
मदन लाल ढींगरा
(1883-1909)मदन लाल ढींगरा एक भारतीय क्रांनतकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। इंर्गलैंड में पढाई के
दौरान [1], वह सर ववललयम हर् कजटन Wyllie, [2] एक ब्रिदर्श अग्रधकारी की हत्या कर दी
भारतीय में क्रांनत की पहली कृ त्यों में से एक के रूप में स्वागत 20 वीं सदी में स्वतंत्रता आंदोलन
ढींगरा 1900 अप तक एमबी इंर्रमीडडएर् कॉलेज में अमृतसर में अध्ययन ककया और कफर गवनटमेंर्
कॉलेज लाहौर में अध्ययन करने के ललए लाहौर के पास गया। 1904 में वह इंर्गलैंड से आयानतत
कपडे से बाहर कर ददया महाववद्यालय रंगीन जाके र् है करने के ललए वप्रंलसपल के आदेश के
णखलाफ एक छात्र ववरोध प्रदशटन का नेतृत्व ककया। उन्होंने कहा कक कॉलेज के बाहर फें क ददया गया
था। उस समय वह कला के परास्नातक के छात्र थे। उन्होंने कहा कक स्वदेशी की राष्ट्रवादी आंदोलन
के प्रभाव के तहत ककया गया था। वह गहरा स्वराज और स्वदेशी महत्वपूिट मुद्दों बन इन
समस्याओं के समाधान के रूप में, भारतीय गरीबी और अकाल के कारि के ववर्य में सादहत्य का
अध्ययन ककया। तब ढींगरा लशमला र्ोंगा (घोडे चाललत गाडी) खींचने, और एक कारखाने में मजदूर
को ब्रिदर्श पररवार के पररवहन के ललए चलाया जा रहा है एक र्ोंगा सेवा में कालका में, एक क्लकट
के रूप में काम करने के ललए ककया था। ढींगरा वहाँ एक संघ को संगदठत करने का प्रयास ककया,
लेककन बखाटस्त ककया गया था। वह अपने बडे भाई डॉ ब्रबहारी लाल की सलाह पर अलभनय और
उच्च लशक्षा के ललए इंर्गलैंड जाने से पहले मुंबई में कु छ समय के ललए काम ककया। 1906 में, मदन
लाल मैके ननकल इंजीननयररंग का अध्ययन करने के ललए, यूननवलसटर्ी कॉलेज, लंदन में भती करने
के ललए इंर्गलैंड के ललए चला गया। वह अपने बडे भाई और इंर्गलैंड में कु छ राष्ट्रवादी कायटकताटओं
द्वारा समग्रथटत ककया गया।
18.
ढींगरा ववख्यात भारतीयस्वतंत्रता और राजनीनतक कायटकताटओं ववनायक दामोदर सावरकर और
आजादी की लडाई के ललए अपने ध्यान के स्न्रत कर ददया जो ढींगरा की दृढता और तीव्र
देशभस्क्त से प्रभाववत थे जो श्यामजी कृ ष्ट्ि वमाट, के साथ संपकट में आया था। सावरकर ककसी
भी तरह से क्रांनत में ववश्वास है, और माना जाता है कक एक गुप्त समाज, अलभनव भारत मंडल
में सदस्यता से अलग ढींगरा हग्रथयार प्रलशक्षि, दे दी है। उन्होंने यह भी कहा कक भारत सभा,
भारतीय छात्र राजनीनतक गनतववग्रध के ललए आधार के एक सदस्य था।
इस अवग्रध के दौरान, सावरकर, ढींगरा और अन्य छात्र कायटकताटओं ऐसे खुदीराम बोस, Kanhai
लाल दत्त, सनतंदर पाल और भारत में पंडडत कांशीराम के रूप में स्वतंत्रता सेनाननयों के ननष्ट्पादन
के द्वारा नाराज थे। यह सही करने के ललए सावरकर और ढींगरा के नेतृत्व में होने के रूप में
कई इनतहासकारों द्वारा माना जाता है कक इस घर्ना है
1 जुलाई 1909 की शाम को, भारतीयों और अंग्रेजों की एक बडी संख्या इंडडयन नेशनल
एसोलसएशन के वावर्टक ददवस समारोह में भाग लेने के ललए एकत्र हुए थे। सर कजटन Wyllie,
भारत के ललए राज्य के सग्रचव को राजनीनतक सैन्यादेशवाहक, अपनी पत्नी के साथ हॉल में प्रवेश
ककया, ढींगरा सही उनके ननशाने पर लगा, स्जनमें से चार उसके चेहरे पर पांच गोललयां चलाईं।
Cowasji Lalkaka, सर कजटन बचाने की कोलशश की, जो एक पारसी ग्रचककत्सक, Lalkaka उसे
पकड ललया क्योंकक उत्तराद्टध ननकाल ददया जो मदन लाल के छठे और सातवें गोललयों की मृत्यु
हो गई।
बाद में वह अपनी कारटवाई के ललए पछता ब्रबना खडा था और पुललस द्वारा पकडा गया था।
19.
ढींगरा जुलाई 23को ओल्ड बेली में करने की कोलशश कर रहा था। उन्होंने कहा कक
वह अमानवीय ब्रिदर्श शासन से मुक्त भारत सेर् करने के क्रम में उसकी भूलमका
अदा की थी के रूप में वह कजटन Wyllie की हत्या पछतावा नहीं था कक कहा गया
है। इसके अलावा, वह इरादा नहीं था कक Cowasji Lalkaka को मारने के ललए।
उन्होंने कहा कक मौत की सजा सुनाई थी। न्यायाधीश ने अपने फै सले की घोर्िा के
बाद, ढींगरा की "मैं अपने देश के ललए अपने जीवन नीचे ब्रबछाने का सम्मान करने
के ललए गवट कर रहा हूँ। लेककन हम आने वाले ददनों में हमारे समय होगा याद ने
कहा," है करने के ललए कहा। ढींगरा भी शायद ही कभी उल्लेख ककया है जो एक और
बयान ददया 17 अगस्त 1909 मदन लाल पर फांसी पर लर्का ददया गया था। पृष्ट्ठ
138 पर मौत की स़िा का एक इनतहास में जॉन लारेंस के अनुसार, हा
Pierrepoint, उसके जल्लाद, उसे ननष्ट्पादन में आठ फीर्, तीन इंच का एक
अनावश्यक और inhumanely क्रू र लंबे बूंद दे दी है। इस के पीछे के कारिों अनजान
रहते हैं और के वल पर अनुमान लगाया जा सकता है।
20.
बीरेंर नाथ दत्ता
बीरेंरनाथ दत्ता (असलमया: বীৰেন্দ্ৰনাথ িত্ত, 1 माचट 1935) का जन्म एक भारतीय
ववद्वान, लोककथाओं के एक शोधकताट, एक गायक और असम के गीतकारों है। अपने
कै ररयर में वह मुख्य रूप से असम के ववलभन्न कॉलेजों में प्रोफे सर के रूप में काम ककया।
[1] [2] उन्होंने यह भी ववद्वानों पुस्तकें ललखी। 2009 में, उन्होंने कहा, "सादहत्य और
लशक्षा" क्षेत्र [3] में पद्म श्री, चौथे सवोच्च नागररक सम्मान से सम्माननत ककया गया था
और 2010 में वह जगद्धात्री-Harmohan दास सादहत्य पुरस्कार प्राप्त ककया। दत्ता उत्तरी
लखीमपुर सत्र, 2003 और Hojai सत्र 2004 के ललए असम सादहत्य सभा के अध्यक्ष के
रूप में ननवाटग्रचत ककया गया था 1957 में, दत्ता बी Barooah कॉलेज में प्राध्यापक के रूप
में अपना कै ररयर शुरू ककया। 1964 में, वह संस्थापक प्रधानाचायट के रूप में ननचले
असम में Gauripur पर प्रमथेश बरुआ कॉलेज में शालमल हो गए। उन्होंने कहा कक
गोलपाडा कॉलेज और पांडु कॉलेज में नालमत ककया गया है, जो के रूप में अच्छी तरह से
दो अन्य कॉलेजों में प्राचायट के रूप में काम ककया। [1]1974 में, वह Prafulladatta
गोस्वामी की देखरेख में लोकगीत में अपनी पीएचडी की डडग्री प्राप्त की। [1] 1979 में
उन्होंने एक पाठक के रूप में गुवाहार्ी ववश्वववद्यालय में शालमल हो गए और वह वहां भी
लोकगीत अनुसंधान ववभाग के प्रमुख बने। उन्होंने अनुरोध पर, 1995 में गुवाहार्ी
ववश्वववद्यालय से सेवाननवृत्त हुए, लेककन उन्होंने कफर से पारंपररक संस्कृ नत और कला
रूपों के ववभाग में एक प्रोफे सर के रूप में तेजपुर ववश्वववद्यालय में शालमल हुए
21.
दत्ता भी एकगायक और असम के गीतकारों था। 1961 में, उसके दो ग्रामोफोन
ररकॉडट को पहले से उसके द्वारा लोकवप्रय गीत जारी ककया है कक ननदहत HMV के
द्वारा जारी ककए गए थे। [6] उन्होंने यह भी कहा कक असम के श्रोताओं के बीच में
उसे लोकवप्रय बनाया था जो रेडडयो के ललए गाना जारी रखा। बीरेंर नाथ दत्ता द्वारा
गाया कु छ अववस्मरिीय गीत हैं - "Monor खोबर", "Bahudin Bokulor Gondh
पीओए Naai", "Meli Dilo मैन", "Rohimalaa Uronir Maajere", "सौ सीरीश
Daalat", "Tomaar Kaarane Jaau", "Aahinak Kone Anane "," समझौता ज्ञापन
Daaponar "," सीता Banabaash "," Bogoli Bogaa Phot डड जा "," Jilir Maate
"," हे Ghan Chirikaa "," Barashaa Tomaar "," Aakaashe Botaahe ","
आकाश Aamaak Akani आकाश दीया "आदद । उन्होंने यह भी कहा िोजेन बरूआ
द्वारा ननदेलशत ककया गया है, जो एक असलमया भार्ा की कफल्म, Smrtir Parash,
के ललए गीत गाया। [6
22.
भान लसंह
भान लसंह(डी। 1917), एक Ghadr कायटकताट, पंजाब के लुग्रधयाना
स्जले में, Sunet के गांव की, Savan लसंह का पुत्र था। एक युवक के
रूप में, भान लसंह शंघाई के ललए चले गए और वह Ghadr गनतववग्रधयों
में रुग्रच लेने शुरू कर ददया है, जहां उसके बाद अमेररका के ललए ले
जाया गया। उन्होंने कहा कक देश में Ghadr या सशस्त्र क्रांनत बनाने के
ललए भारत लौर् आए हैं, जो उन लोगों के बीच ककया गया था। तोसा
मारू द्वारा यात्रा में वह 19 अक्र्ूबर 1914 को कलकत्ता पहुंचे, लेककन
ग्रगरफ्तार कर ललया और मोंर्गोमरी जेल में interned ककया गया था।
प्रारंलभक पूछताछ के बाद, वह ककसी भी क्रांनतकारी गनतववग्रधयों में भाग
लेने से उसे रोकने के ललए अपने गांव में interned जा करने के ललए
नवंबर 1914 के अंत में दहरासत से ररहा ककया गया था। उन्होंने कहा
कक पहले लाहौर र्ड्यंत्र मामले में करने की कोलशश फरवरी 1915 में
rearrested ककया गया था, वह जीवन और संपवत्त की जब्ती के ललए
पररवहन की सजा सुनाई थी। भान लसंह पुललस यातना का एक पररिाम
के रूप में अंडमान में सेलुलर जेल में 1917 में ननधन हो गया।
23.
30 मई 1973को, फ्लाइर् 440 मरास (अब चेन्नई), नई ददल्ली के ललए तलमलनाडु
से एक अनुसूग्रचत घरेलू यात्री ववमान था। सारंगा नामक एक बोइंग 737 ववमान के
ललए इस्तेमाल ककया गया था। फ्लाइर् 440 धूल और एक आंधी ड्राइववंग में पालम
अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास है, ववमान न्यूनतम नीचे दृश्यता के साथ एक NDB
दृस्ष्ट्र्कोि के दौरान हाई र्ेंशन तारों मारा। ववमान दुघटर्नाग्रस्त हो गया और आग लग
गई। 65 याब्रत्रयों और दुघटर्ना में मारे गए बोडट की उडान 440 पर चालक दल के 48।
[2] बचाव अग्रधकाररयों के बचे ववमान के सामने थे। मृतकों में आयरन की भारतीय
और इस्पात मंत्री खान, मोहन कु मारमंगलम था। कु मारमंगलम समय में भारत के
प्रधानमंत्री थे, जो इंददरा गांधी के एक ववश्वासपात्र था। मेहताब-उद-दीन, एक वररष्ट्ठ
पंजाबी पत्रकार और लेखक के अनुसार, श्री भान लसंह Bhaura 'दुभाटर्गयपूिट' उडान में
भी था, लेककन सौभार्गय से वह बच गया। श्री भान लसंह Bhaura तो 5 वीं लोकसभा
(1971-1977) सीर् के ललए बदठंडा से सांसद (पंजाब) था। उन्होंने कहा कक एक
प्रनतबद्ध भाकपा सदस्य थे और वह कफर से 13 वीं लोकसभा (1999-2004) के ललए
सांसद चुने गए थे। श्रीमती इंददरा गांधी, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नई ददल्ली के
अस्पताल में 31 मई 1973 पर थोडा घायल श्री भान लसंह Bhaura से मुलाकात की
है, वह उसे करने के ललए कहा है, "श्री। Bhaura, आप एक हवाई दुघटर्ना से बच गया
है, अब आप भगवान में ववश्वास करना चादहए। "श्री Bhaura उन, ववमान दुघटर्ना में
मारे गए सभी भगवान में फमट ववश्वालसयों थे कक तुरंत उत्तर ददया। यह कम्युननस्र्ों
की सबसे नास्स्तक होने की अपेक्षा की जाती है कक यहाँ उल्लेख के लायक है। श्री
भान लसंह Bhaura खुद श्री मेहताब-उद-दीन को इसके बारे में बताया।
24.
चाफे कर बंधु
चाफेकर बंधु (भी वतटनी Caphekar या Chaphekar; मराठी चापेकर) -
(भी Wasudeva या Wasudev वतटनी 1879-1899), दामोदर हरर
चापेकर (1870-1897), बालकृ ष्ट्ि हरर चापेकर (1873-1899, भी
Bapurao कहा जाता है) और वासुदेव हरर चापेकर - डब्ल्यूसी रेंड, पुिे
ब्रिदर्श प्लेग आयुक्त की हत्या में शालमल भारतीय क्रांनतकाररयों थे।
भाइयों महाराष्ट्र, भारत के राज्य में, ग्रचंचवाड, पुिे के पास तो एक
गांव के थे। देर से 1896 में, पुिे र्ाऊन प्लेग, वैस्श्वक तीसरा प्लेग
महामारी का दहस्सा द्वारा मारा गया था; फ़रवरी 1897 के अंत तक,
महामारी दो बार मृत्यु दर के आदशट के साथ, उग्र था, और आधे शहर
की जनसंख्या छोड कर रही है।
25.
एक ववशेर् प्लेगसलमनत डब्ल्यूसी रैंड, एक भारतीय लसववल सेवा के
अग्रधकारी की अध्यक्षता में गठन ककया गया था, और सैननकों को
आपात स्स्थनत से ननपर्ने के ललए लाया गया। ननयोस्जत उपायों
अस्पतालों और अलगाव लशववरों को हर्ाने और ननजी संपवत्त को नष्ट्र्
करने के ललए, और प्रवेश या शहर छोडने से प्लेग मामलों को रोकने
के ललए मजबूर ननजी घरों में प्रवेश, रहने वालों की परीक्षा, ननकासी
शालमल थे। मई के अंत तक, महामारी ननयंत्रि के तहत ककया गया।
इन उपायों रेंड द्वारा नजरअंदाज कर ददया गया पुिे और लशकायतों
की जनता द्वारा दमनकारी पर ववचार ककया गया।
जून 1897 पर 22, डायमंड क्वीन ववक्र्ोररया, रेंड के राज्यालभर्ेक
की जयंती और अपने सैन्य सरकार सदन में समारोह से लौर्ते समय
लेस्फ्र्नेंर् Ayerst गोली मार दी थी अनुरक्षि। दोनों 3 जुलाई को
उसके घावों की हास्जर और रैंड पर Ayerst, मर गया। चाफे कर बंधु
और दो साग्रथयों ववलभन्न भूलमकाओं में हत्या, साथ ही दो मुखब्रबर की
शूदर्ंग और एक पुललस अग्रधकारी को गोली मार करने के प्रयास का
आरोप लगाया गया। सभी तीन भाइयों को दोर्ी पाया और फांसी पर
लर्का ददया गया, एक साथी दस साल के कठोर कारावास की सजा
सुनाई थी, एक और, कफर एक स्कू ल के ववद्याथी, इसी तरह से ननपर्ा
गया।
26.
भगत लसंह
भगत लसंह(आईपीए: [pəɡət̪ sɪŋɡ] (सुनने) 27/28 लसतंबर 1907 -
23 माचट 1931) [एक] भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली
क्रांनतकाररयों में से एक माना जाता है एक भारतीय समाजवादी था। वह
अक्सर दक्षक्षि एलशयाई और मध्य पूवी भार्ाओं की एक संख्या में
"शहीद" अथट "शहीद भगत लसंह", शब्द "शहीद" के रूप में जाना जाता
है। एक ककशोरी लसंह यूरोपीय क्रांनतकारी आंदोलनों का अध्ययन ककया
और अराजकतावादी और माक्सटवादी ववचारधारा की ओर आकवर्टत ककया
गया था के रूप में पहले, ब्रिदर्श राज के णखलाफ क्रांनतकारी
गनतववग्रधयों में शालमल ककया गया था, जो एक लसख पररवार में जन्मे।
उन्होंने कई क्रांनतकारी संगठनों में शालमल है, और जल्दी से अंततः
1928 में दहन्दुस्तान सोशललस्र् ररपस्ब्लकन एसोलसएशन (HSRA) के
ललए इसका नाम बदल रहा है, इसका मुख्य नेताओं में से एक बनने के
ललए दहन्दुस्तान ररपस्ब्लकन एसोलसएशन (एचआरए) के रैंक के माध्यम
से गुलाब हो गया।
27.
पुललस के हाथोंमें लाला लाजपत राय की मौत का बदला मांग, लसंह ब्रिदर्श पुललस
अग्रधकारी जॉन सॉन्डसट की हत्या में शालमल था। वह उसे कब्जा करने के ललए पुललस
द्वारा प्रयास नहीं लमल पाई। इसके तुरंत बाद, एक साथ बर्ुके श्वर दत्त के साथ, वह और
एक साथी के न्रीय ववधान सभा के अंदर दो बम और पत्रक फें क ददया। वे करने की
योजना बनाई थी, के रूप में दो पुरुर्ों को ग्रगरफ्तार ककया गया था। वह जेल में तेजी से
एक 116-ददन कराना पडा जब इस आरोप पर आयोस्जत ककया है, वह ब्रिदर्श और
भारतीय राजनीनतक कै ददयों के ललए समान अग्रधकारों की मांग, बडे पैमाने पर राष्ट्रीय
समथटन प्राप्त की। इस समय के दौरान, पयाटप्त सबूत इंर्गलैंड में वप्रवी काउंलसल में एक
ववशेर् दरब्यूनल द्वारा परीक्षि और अपील के बाद, सॉन्डसट मामले में सजा के ललए
उसके णखलाफ लाया गया था। उन्होंने कहा कक दोर्ी पाया और बाद में उनकी ववरासत
भारतीय स्वतंत्रता के ललए लड शुरू करने के ललए भारत में युवाओं के ललए प्रेररत ककया
और कहा कक वह आधुननक भारत में एक युवा मूनतट है, साथ ही कई कफल्मों के ललए
प्रेरिा बना हुआ है 23. वर्ट की आयु हत्या में अपनी भागीदारी के ललए फांसी पर लर्का
ददया गया था। उन्होंने कहा कक भारत की संसद में एक बडे कांस्य प्रनतमा है, साथ ही
अन्य स्मारकों की एक सीमा के साथ मनाया जाता है।