महिलाओं की भागीदारीऔर नेतृत्व को मजबूत
करना।
महिलाओं का प्रतततनधित्व कम क्यों िै?
ऐसी कई बािाएँ िैं जो महिलाओं को समाज के सभी स्तरों पर तनर्णय लेने में शाममल िोने से रोकती िैं। जो महिलाएं
हिंसा, गरीबी और भेदभाव का सामना करती िैं, उन्िें तनर्णय लेने से बािर ककए जाने की संभावना अधिक िोती िै।
भेदभावपूर्णकानून, मशक्षाकीकमी औरअधिक देखभालकीज़िम्मेदाररयाँ जैसी बािाएँ महिलाओं को नेता बनने या
चुनावमें मतदान करने से रोकती िैं। कु छ महिलाओं को अपने मतपत्र देखने की अनुमतत निीं िै, क्योंकक पररवार के
पुरुष सदस्य उनके नाम पर वोट डालते िैं। दुतनया भर की सरकारों और समुदायों में मतदाताओं और नेताओं के रूप
में महिलाओं का प्रतततनधित्व कम िै।
जब महिलाएं कायाणलय के मलए दौड़ती िैं, तो उनके पास सफल िोने के मलए संपकण और आत्मववश्वास िोने की
संभावना कम िोती िै। और जो लोग नेतृत्व की जस्ितत तक पिुंचते िैं, उन्िें दैतनक पूवाणग्रि, उत्पीड़न और हिंसा का
सामना करना पड़ सकता िै।
िमें महिला नेताओं की आवश्यकता क्यों िै?
महिलाओं को सावणजतनक और राजनीततक जीवन में पूर्ण और समान रूप से भाग लेने और सावणजतनक बिस और
तनर्णयों में अपना अनूठा अनुभव लाने का अधिकार िै।
सत्ता पररवतणन
महिलाओंकी सावणजतनक और राजनीततक भागीदारी एक संख्या खेल से किीं अधिक िै। महिलाओं को कानूनों और
प्रिाओं को आकार देने के मलए तनर्णयों पर उनका वास्तववक प्रभाव िोना चाहिए।
2.
एक समान भववष्यबनाने के मलए, िमें भेदभाव की मौजूदा प्रर्ामलयों को बदलने की जरूरत िै ताकक महिलाएं
राजनीततक स्तरसहित समाज के िर स्तर पर तनर्णय ले सकें । िम लैंधगक भूममकाओं, रूह़िवाहदता, दृजष्टकोर् और
ववश्वासों को चुनौती देने और सत्ता में बैठे लोगों द्वारा मलए गए तनर्णयों को प्रभाववत करने के मलए महिलाओं और
लड़ककयों को संगहठत करने के मलए महिला अधिकार संगठनों और आंदोलनों के साि काम कर रिे िैं।
िम एक साि िैं:
महिलाओं के मलए बोलने और अपने अधिकारों का दावा करने के मलए जगि बनाना
अन्य महिलाओं का प्रतततनधित्व करने के मलए आत्मववश्वास, कौशल और ज्ञान िामसल करने के मलए महिला
नेताओं का समिणन करना
स्िानीयनेतृत्वमें महिलाओंके प्रतततनधित्वमेंसुिारकरनाक्योंकक यिीं पर महिलाओंके जीवन को प्रभाववत करने
वाले कई तनर्णय मलए जाते िैं
तनर्णय तनमाणताओंकोजजम्मेदारठिरानाऔरयि सुतनजश्चतकरनाकक वे महिलाओंकीप्रािममकताओंऔर जरूरतों
पर प्रततकिया दें, जजनमें ववकलांग महिलाएं, तनम्न वगण या जातत की महिलाएं, और समलैंधगक, उभयमलंगी और
ट्ांसजेंडर महिलाएं शाममल िैं।
महिलाओं को चुनौती देने और उनके प्रतत दृजष्टकोर् बदलने के मलए समुदायों के साि काम करना
क्या वतणमान राजनीतत में महिलाओं की भागीदारी वैसी निीं िै जैसी बीस साल पिले िी ? इस
सवाल पर अक्सर डेटा का आकलन ककया जाता िै। बड़े पैमाने पर , महिलाओं की राजनीतत में
भागीदारी के प्रततशत में आजादी के बाद उत्तरोत्तर सुिार िुआ िै। सबसे पिले , लैंधगक समानता के
मसद्िांत को भारतीय संवविान की प्रस्तावना , मौमलक अधिकार , मौमलक कतणव्यों और तनदेशक
मसद्िांतों में प्रस्ताववत ककया गया िै। संवविान ने न के वल महिलाओं को समानता का दजाण हदया
िै , बजकक महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपाय करने के मलए राज्य को सशक्त
बनाया िै। जजसकी आज जरूरत भी िै। अन्य क्षेत्रों में , महिलाओं को अपने प्रभुत्व को स्िावपत
करते िुए एक ऊजाणवान और ठोस तरीके से चुनौततयों का सामना करना पड़ रिा िै। राजनीतत के
नए आयाम बनाए जा रिे िैं जजसमें महिलाओं को समान रूप से प्रोत्साहित ककया जा रिा िै , भले
िी वि पंचायती स्तर पर िी क्यों न िो। गाँव के सरपंच ने कई पंचायत स्तर के चुनावों में
महिला उम्मीदवारों को जीता और उन्नतत के नए द्वार खोले। घर की सीमा से लेकर मशक्षा ,
बैंककंग , कॉरपोरेट क्षेत्र में उन्िोंने अपनी योग्यता को पुरुषों के रूप में साबबत ककया िै और अपने
मलए सम्मानजनक स्िान बनाया िै। चुनावों में समान भागीदारी की व्यवस्िा िोनी चाहिए , लेककन
इसके मलए सामाजजक सोच , प्रर्ालीगत बदलाव , सामाजजक ववकास और सबसे अधिक मशक्षक्षत और
3.
स्वस्ि वातावरर् आवश्यकिै। साि िी उच्च मसद्िांतों को शाममल करना बिुत मित्वपूर्ण िै।
जमीनी स्तर पर भी , कु छ पिल करनी िोगी जजसमें मशक्षक्षत महिलाएं , भले िी वे ग्रामीर् इलाकों
की िों , उन्िें आगे आने का मौका ममलता िै। ऐसे प्रयास जजसमें स्वस्ि स्तर पर महिलाओं की
भागीदारी संभव िो
िालाँकक ऐसीकई संस्िाएँिैं जो महिलाओंकीनागररक भागीदारी और राजनीततक भागीदारी को ब़िावा देती िैं, कफर
भी महिलाओं की राजनीततक भागीदारी और नेतृत्व में बािाएँ बनी रिती िैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं के कम
आधिणक संसािनउनकीअधिक देखभाल करने वाली जजम्मेदाररयां, मित्वपूर्ण समिणन तक उनकी अधिक सीममत
पिुंच जो उन्िें कायाणलय के मलए दौड़ने में मदद करेगी, और कायाणलय िारकों के रूप में सफल िोगी , और महिला
उम्मीदवारों को
भारत में महिलाएँ
भारतमें महिलाओंकीजस्िततनेवपछलीकु छ सहदयों में कई बड़े बदलावों का सामना ककया िै। प्राचीन काल में पुरुषों
के साि बराबरी की जस्ितत से लेकर मध्ययुगीन काल के तनम्न स्तरीय जीवन और साि िी कई सुिारकों द्वारा
समान अधिकारोंकोब़िावाहदएजानेतक,भारत में महिलाओं का इततिास काफी गततशील रिा िै। आिुतनक भारत
में महिलाएं राष्ट्पतत, प्रिानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, प्रततपक्ष की नेता आहद जैसे शीषण पदों पर आसीन िुई िैं।
इततिास
ववशेष रूप से महिलाओं की भूममका की चचाण करने वाले साहित्य के स्रोत बिुत िी कम िैं ; 1730 ई. के आसपास
तंजावुर के एक अधिकारी त्र्यम्बकयज्वन का स्त्रीिमणपद्ितत इसका एक मित्वपूर्ण अपवाद िै। इस पुस्तक में
प्राचीनकालके अपस्तंभसूत्र (चौिीशताब्दीई.पू.) के कालके नारीसुलभ आचरर्संबंिीतनयमोंकोसंकमलत ककया
गया िै।
ववद्वानों का मानना िै कक प्राचीन भारत में महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साि बराबरी का दजाण
िामसल िा। िालांकक कु छ अन्य ववद्वानों का ऩिररया इसके ववपरीत िै। पतंजमल और कात्यायन जैसे प्राचीन
भारतीय व्याकरर्ववदों का किना िै कक प्रारजम्भक वैहदक काल में महिलाओं को मशक्षा दी जाती िी। ऋग्वेहदक
ऋचाएंयि बतातीिैं कक महिलाओंकीशादीएक पररपक्वउम्रमें िोती िी औरसंभवतः उन्िें अपनापततचुनने की भी
आजादीिी।[11] ऋग्वेद और उपतनषद जैसेग्रंि कई महिलासाजध्वयों औरसंतों के बारेमें बताते िैं जजनमेंगागी और
मैत्रेयी के नाम उकलेखनीय िैं।
4.
प्राचीन भारत केकु छ साम्राज्यों में नगरविु (“नगर की दुकिन”) जैसी परंपराएं मौजूद िीं। महिलाओं में नगरविु के
प्रततजष्ठत सम्मान के मलये प्रततयोधगता िोती िी। आम्रपाली नगरविु का सबसे प्रमसद्ि उदािरर् रिी िै।
अध्ययनोंके अनुसारप्रारंमभक वैहदक कालमें महिलाओंकोबराबरी कादजाणऔर अधिकारममलतािा।िालांकक बाद
में (लगभग 500 ईसा पूवण में) स्मृततयों(ववशेषकर मनुस्मृतत) के साि महिलाओं की जस्ितत में धगरावट आनी शुरु िो
गयी और बाबर एवंमुगल साम्राज्य के इस्लामीआिमर्के साि और इसके बाद ईसाइयत ने महिलाओं की आजादी
और अधिकारों को सीममत कर हदया।
िालांकक जैन िमणजैसेसुिारवादीआंदोलनोंमेंमहिलाओंकोिाममणक अनुष्ठानों में शाममल िोने की अनुमतत दी गयी
िै, भारत में महिलाओंकोकमोबेशदासताऔरबंहदशोंका िी सामना करना पड़ा िै। माना जाता िै कक बाल वववाि की
प्रिा छठी शताब्दी के आसपास शुरु िुई िी।
मध्ययुगीन काल
समाज में भारतीय महिलाओं की जस्ितत में मध्ययुगीन काल क
े दौरान और अधिक धगरावट आयी जब भारत क
े क
ु छ
समुदायों में सती प्रिा, बाल वववाि और वविवा पुनववणवाि पर रोक, सामाजजक जजंदगी का एक हिस्सा बन गयी िी।
भारतीय उपमिाद्वीप में मुसलमानों की जीत ने परदा प्रिा को भारतीय समाज में ला हदया। राजस्िान क
े राजपूतों में
जौिर की प्रिा िी। भारत क
े क
ु छ हिस्सों में देवदामसयां या मंहदर की महिलाओं को यौन शोषर् का मशकार िोना पड़ा िा।
बिुवववाि की प्रिा हिन्दू क्षबत्रय शासकों में व्यापक रूप से प्रचमलत िी। कई मुजस्लम पररवारों में महिलाओं को जनाना क्षेत्रों
तक िी सीममत रखा गया िा।
इन पररजस्िततयों क
े बावजूद भी क
ु छ महिलाओं ने राजनीतत, साहित्य, मशक्षा और िमण क
े क्षेत्रों में सफलता िामसल की।
रज़िया सुकतान हदकली पर शासन करने वाली एकमात्र महिला सम्राज्ञी बनीं। गोंड की मिारानी दुगाणवती ने 1564 में मुगल
सम्राट अकबर क
े सेनापतत आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने से पिले पंद्रि वषों तक शासन ककया िा। चांद बीबी ने
1590 क
े दशक में अकबर की शजक्तशाली मुगल सेना क
े खखलाफ़ अिमदनगर की रक्षा की। जिांगीर की पत्नी नूरजिाँ ने
राजशािी शजक्त का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल ककया और मुगल राजगद्दी क
े पीछे वास्तववक शजक्त क
े रूप में पिचान
िामसल की। मुगल राजक
ु मारी जिाँआरा और जेबुजन्नसा सुप्रमसद्ि कववतयबत्रयाँ िीं और उन्िोंने सत्तारू़ि प्रशासन को भी
प्रभाववत ककया। मशवाजी की माँ जीजाबाई को एक योद्िा और एक प्रशासक क
े रूप में उनकी क्षमता क
े कारर् क्वीन रीजेंट
क
े रूप में पदस्िावपत ककया गया िा। दक्षक्षर् भारत में कई महिलाओं ने गाँवों, शिरों और जजलों पर शासन ककया और
सामाजजक एवं िाममणक संस्िानों की शुरुआत की।
5.
भजक्त आंदोलन नेमहिलाओं की बेितर जस्ितत को वापस िामसल करने की कोमशश की और प्रभुत्व क
े स्वरूपों पर सवाल
उठाया। एक महिला संत-कवतयत्री मीराबाई भजक्त आंदोलन क
े सबसे मित्वपूर्ण चेिरों में से एक िीं। इस अवधि की क
ु छ
अन्य संत-कवतयबत्रयों में अक्का मिादेवी, रामी जानाबाई और लाल देद शाममल िैं। हिंदुत्व क
े अंदर मिानुभाव, वरकारी
और कई अन्य जैसे भजक्त संप्रदाय, हिंदू समुदाय में पुरुषों और महिलाओं क
े बीच सामाजजक न्याय और समानता की खुले
तौर पर वकालत करने वाले प्रमुख आंदोलन िे।
भजक्त आंदोलन क
े क
ु छ िी समय बाद मसक्खों क
े पिले गुरु, गुरु नानक ने भी पुरुषों और महिलाओं क
े बीच समानता क
े
संदेश को प्रचाररत ककया। उन्िोंने महिलाओं को िाममणक संस्िानों का नेतृत्व करने; सामूहिक प्रािणना क
े रूप में गाये जाने
वाले वाले कीतणन या भजन को गाने और इनकी अगुआई करने; िाममणक प्रबंिन सममततयों क
े सदस्य बनने; युद्ि क
े मैदान
में सेना का नेतृत्व करने; वववाि में बराबरी का िक और अमृत (दीक्षा) में समानता की अनुमतत देने की वकालत की। अन्य
मसख गुरुओं ने भी महिलाओं क
े प्रतत भेदभाव क
े खखलाफ उपदेश हदए।
आधी आबादी क
े रूप में महिलायें
भारत में विभभन्न संस्क
ृ वतयों का संगम है। स्री हर संस्कृ वत के कें द्र में होकर भी कें द्र से दूर है। ससमोन द बोउिार का
कथन है, “स्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।” समाज अपनी आिश्यकता के अनुसार स्री को ढालता आया है।
उसक
े सोचने से लेकर उसक
े जीिन जीने के ढंग को पुरुष अभी तक वनयंवरत करता आया है और आज भी करने
की कोसिि करता रहता है। वपतृसत्तात्मक समाज ने िह सब अपने अनुसार तय वकया है। जब-जब सिसिकरण
का सिाल उठता है तब-तब समाज ही कठघरे में खडा होता है । समाज में लगातार बदलािों के सलए संघषष चलता
रहता है ।
मातृसत्तात्मक समाज
भारत व समूचा ववश्व वपतृसत्तात्मक समाज के ढांचे में रिता आया िै। यिाँ यि स्पष्ट कर देना आवश्यक िै कक जब
िम महिलाओं के सशजक्तकरर् की बात कर रिे िैं, तो उसका आशय यि निीं िै कक अब वपतृसत्तात्मक समाज को
बदल कर मातृसत्तात्मक समाज में बदल हदया जाए। भारत में पूवोत्तर की खासी व कु छ अन्य जनजाततयों में
मातृसत्तात्मक समाज कीअविारर्ादेखीजातीिैजिाँ नारी कीप्रिानतािै। ववश्वकी कु छ जनजाततयों जैसेचीनकी
मोसुओ, कोस्टा ररका की बिबि जनजातत, न्यू गुयाना की नागोववसी जनजातत मातृसत्तात्मक िै। यिाँ महिलायें िी
राजनीतत, अिणव्यवस्िा व सामाजजक कियाकलापों से जुड़े तनर्णय लेती िैं। यहद समाज को स्वस्ि हदशा में आगे
6.
ब़िना िै तोसमाज मातृ या वपतृसत्तात्मक िोने के बजाय इनसे तनरपेक्ष िो तो एक बेितर सामाजजक संरचना तैयार
िोगी और सिी मायनों में पुरुष-स्त्री समान रूप से सशक्त िोंगे।
महिला सशजक्तकरर् का आिार- ववश्व में नारी आंदोलन व भारत में इसका प्रभाव
ववश्व में नारी आंदोलन की नींव 19वीं शताब्दी में िी रखी गई। पजश्चम के कई राष्ट् उस दौर में इस आंदोलन में
भागीदार बने। नारी आंदोलन जब सामने आए तब िी स्त्री सशजक्तकरर् की एक अविारर्ा दुतनया के समक्ष
प्रमुखतासे आई। इसमलए स्त्री सशजक्तकरर् को समझने के मलए नारी आंदोलन को समझना भी अततआवश्यक िै।
सरल शब्दों में किें तो नारी आंदोलन की शुरुआत समाज द्वारा नारी को तनम्नतर समझने से िुई। नारीवाद का
मित्वपूर्ण मसद्िांत िै कक इस वपतृसत्तात्मक समाज में स्त्री को िीन दजाण प्राप्त िै। यि समाज िी उसके मलए जीवन
जीने के तनयम और स्वरूप को गहठत करता िै। स्त्री के स्वतंत्र व्यजक्तत्व को नकार देता िै। नारी आंदोलन ककसी
पुरुषका निीं बजकक वपतृसत्तात्मक ववचारकाववरोि करतािै।यि आंदोलनमानतािै कक स्त्री को भी पुरुष के बराबर
सम्मान,अधिकारवअवसर ममले। नारी आंदोलन लैंधगक असमानता के स्िान पर इस अविारर्ा को मानता िै कक
स्त्री भी एक मनुष्य िै। मनुष्य िोने के साि-साि वि दुतनया की आिी आबादी िै। सृजष्ट के तनमाणर् में उसका भी
उतना िी सियोग िै जजतना कक पुरुष का।
नारी आंदोलन का पिला चरर् 19वीं सदी का उत्तरािण और बीसवीं सदी के प्रारंभ िोने का िै। अमरीका के शिरी,
उदारवादी और औद्योधगक मािौल में महिलाओं के मलए समान अवसर उपलब्ि कराना इसका पिला उद्देश्य िा।
दूसरीलिर साठ के दशक से शुरू िुई मानी जातीिै। इसमें यि पिचान की गयी कक कानून व वास्तववक असमानताएं
दोनों आपस में जहटलतापूवणक जुड़ी िुई िैं एवं इसे दूर ककया जाना चाहिए। तीसरी लिर नब्बे के दशक से प्रारंभ िोती
िै। यि द्ववतीय लिर की प्रततकिया के फलस्वरूप उत्पन्न िुई। इसमें दूसरी लिर के द्वारा नारीत्व की दी िुई
पररभाषाकोचुनौती दी गई। वैजश्वक रूप में जजस प्रकार नारीवाद को देखा जा रिा िा, उसे ग़िा जा रिा िा, उसी िम
में उसी के साि भारत में भी महिलाओं की जस्िततयों को लेकर लगातार समाज सुिार के व्यापक प्रयास िो रिे िे।
लेककन इसका स्वरूप वैसा निीं िा जैसा वि पजश्चम में रिा िै। भारत में नवजागरर् अिाणत उन्नीसवीं शताब्दी के
उत्तरािण से इसकी शुरुआत मानी जाती िै जो 1915 के आस पास तक रिती िै। यि उत्िान समाज सुिार व राष्ट्ीय
आंदोलन के साि जुड़कर आगे ब़ि रिा िा।
सशक्त नारी, सशक्त भारत
7.
महिला सशक्तीकरर् केमलए मूल मसद्िांत िैं कक महिलाओं को सामाजजक और राजनीततक अधिकार, ववत्तीय
सुरक्षा,न्यातयक शजक्तऔर वे सारे अधिकारजो पुरुषोंकोप्राप्त िैं वि ममलना चाहिए । मतलब ये कक महिलाओं को
पुरूषों के समान अधिकारों का आनंद ममलना चाहिए। अगर साफ शब्दों में किें तो मलंग आिाररत कोई पूवाणग्रि निीं
िोना चाहिए । िालांकक परंपरागत मानदंड और ये प्रिा तेजी से बदल रिे िैं, कफर भी महिलाओं को ये जानना चाहिए
कक उनके मूलऔर सामाजजक अधिकारक्यािै। सशक्तमहिलाओंका मतलबिै कक महिलाओंकोअपनेव्यजक्तगत
लाभों के साि िी साि िी समाज के मलए अपने स्वयं के तनर्णय ले सकने में सक्षम िो । महिला सशजक्तकरर् का
मतलब ये कक अब ये महिलाएं के साि वपतृसत्ता का स्िान ले रिा िै।
प्रिान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कें द्र सरकार ने महिला ववकास पर ववशेष ध्यान कें हद्रत ककया िै। भारत की
महिलाएंराष्ट् की प्रगततमें एक मित्वपूर्णभूममकातनभातीिैं औरसरकारउनके योगदानऔर क्षमता को पिचानती
िै। सरकार ने महिला सशजक्तकरर् को लेकर कई मजबूत कदम उठाए िैं। बेटी बचाओ, बेटी प़िाओ से लेकर बेितर
स्वास््यऔरमशक्षासुवविाओंऔरउनके दैतनक जीवनऔर उनकीदीघणकामलक संभावनाओंकोसुिारनेके मलएकई
पिल की िै। कें द्र सरकार ने अपने कामकाज की बदौलत एक तरि से महिलाओं को एक साि जोड़ हदया िै।
प्रिानमंत्री के रूप में पदभार ग्रिर् करने से पिले, श्री नरेंद्र मोदी ने उन महिलाओं के साि सिानुभूतत व्यक्त की िी
जो असुरक्षक्षतऔरअस्वास््यकरवातावरर् में अपने पररवारों के मलए खाना पकाया करती िी । लकड़ी से तनकलने
वालें िुएं,औरस्टोव के िुएं के खतरनाक प्रभाव से महिलाओं को मुक्त करने के मलए उज्ज्वळा योजना शुरू की गई।
गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) के पररवारों को बेितर जीवन के मलए सरकार ने उन्िें बेितर और स्वस्ि वातावरर्
प्रदान ककया।
बेटी बचाओ, बेटी प़िाओ , न के वल मलंग समानता की हदशा में पररवतणनकारी पिल िै बजकक इसने जनता और
सरकारके बीच ववश्वासको मजबूतभी ककयािै। इस योजनाका पररर्ामिररयार्ामें काफी िद तक हदखाई देने भी
लगा िै , जिां िर 1000 पुरुषों के मलए मलंग अनुपात 950 महिलाओं तक पिुंच गया िै िाल तक यिां के आंकड़ें काफी
धचंताजनक िे इस योजनाके माध्यमसे, सरकार का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा और मशक्षा के बारे में जागरूकता
लाकरसमाज को बेितर बनानािै। ये योजना सहदयोंपुरानीिारर्ाओंऔरप्रिाओंकोसमाप्त करने की हदशा में भी
काम करती िै, जाहिर िै ये सब गततववधियां महिलाओं के ववकास के मलए सिायक िै
तनष्कषण
8.
आज अगर महिलाओंकीजस्िततकीतुलनासैकड़ोंसालपिले के िालात से की जाए तो यिी हदखता िै महिलायें पिले
से किीं ज्यादातेज गतत से अपने सपने पूरे कर रिी िै। पर वास्तववक पररपेक्ष में देखा जाए तो महिलाओं का ववकास
सभी हदशाओंमेंनिीं हदखताखासकरग्रामीर्इलाक़ोंमें। अपनेपैरों पर खड़े िोने के बाद भी महिलाओंको समाज की
बेड़ड़याँ तोड़ने में अभी भी काफी लंबा सफर तय करना िै। आज भी समाज की भेदभाव की ऩिरों से बचना महिलाओं
के मलए नामुमककन सा हदखता िै। ऐसा लगता िै की पुरुष और महिला के बीच की इस खाई को भरने के मलए अभी
काफी वक़्त और लग सकता िै।
कई अवसरोंपर देखागया िै की महिलाओंके साि तनम्नदजेका बताणवककयाजाता िै। उन्िें अपने दफ्तरों में भी बड़ी
जजम्मेदारी देने से मना कर हदया जाता िै। कई औरतें अपने साि िोते इस सुलूक को िी अपनी ककस्मत मान लेती िै
और जो उनके साि िो रिा िै उसके साि िी अपना जीवनयापन कर लेती िै। पर सबके साि ऐसा निीं िै। समाज में
महिलाओंके कई ऐसे उदािरर् भी िै जो छोटी उम्र की लड़ककयों के मलए प्रेरर्ा िै। इनमें ऐसी भी लड़ककयाँ िै जजनका
खुद का पररवार िी उनका साि देने को तैयार निीं िा पर उन्िोंने अपने दम पर समाज की ववचारिारा को बदल कर
रख हदया।
ग्रामीर् क्षेत्रोंमें महिलावपछड़ेपन का एकमात्र कारर् सिी मशक्षा प्रबंि का न िोना िै। गांव में पुरुष भी अपनी ज़िंदगी
का एकमात्र लक्ष्य यिी मानता िै की उसे मसफण दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करना िै। ऐसे मािौल में पुरुषों से महिला
सशजक्तकरर्कीउम्मीद करनाबेकारिै। महिलाओंको जरुरतिै कक वे अपनी क्षमताकोपिचानें औरप्रयास करे की
अपने पररवार के साि साि देश और समाज के ववकास के प्रतत भी अपनी भूममका को तनभा सके । सरकार को भी
ज्यादा से ज्यादा योजना महिलाओं के ववकास मलए चलानी चाहिए। ये बदलाव तभी संभव िै जब सारा समाज एक
साि खड़ा िोकर सकारात्मक रुख से काम करे।