सामािजक वस्था और िववाह
मनुष्य स्वभाव से संगठनिपर्य है । अपनी सुरक्षा तथा उ ित के िलए वह सहायता की अपेक्षा करता है ।
अपने सुख दुःख को वह दूसर के साथ बांटना चाहता है । इसी मानिसकता से पर्ेिरत होकर वह उत्सव, तीज-
त्योहार का आयोजन करता है । मनुष्य की इस पर्वृि के कारण ही समाज बनता है । समाज अपने संगिठत
स्वरूप को बनाए रखने के िलए तथा िनरन्तर उ ित -सुख-सुिवधा के अिधकािधक संगर्हण- के िलए अपने
समाज के िलए िनयम- वस्था बनाता है । यह िनयम- वस्था पर्ितिदन वहार म परखी जाती है । समाज
को जो वस्था रास आती है वह स्थाई हो जाती है और जो कसौटी पर खरी नह उतरती उसे छोड िदया जाता
है या उसम बदलाव आता है । िकसी भी जीिवत समाज म वस्था का यह बदलाव िनरन्तर होने वाली पर्िकर्या
है । वस्था म बदलाव के अनेक कारण होते ह । सबसे बडा कारण देश-काल का पर्भाव होता है जो अन्य
समाज के साि ध्य से समाज म पर्वेश करता है । िजस समाज म यह लचीलापन नह होता उसकी वस्था
म ठहराव आजाता है और वह समाज वस्था के िछ िभ होने से स्वतः कालकविलत हो जाता है ।
सामािजक संगठन के पर्मुख आधार धमर्, जाित तथा आवास-क्षेतर् होते ह । िनवासस्थान के िवस्तार या
संकोच के कारण िकसी सामािजक संगठन का फै लाव िवस्तृत अथवा सीिमत होता रहता है । इस संगठन की
इकाई पिरवार और पिरवार का उ म िववाह से होता है । िकसी भी समाज म मनुष्य िववाह करने के िलए पूणर्
रूप से स्वतन्तर् नह है । िववाह का एक सामािजक तथा कानूनी पक्ष भी है । वरवधू के चुनाव को िनयम से
विस्थत िकया गया है । पिरणय सहवास मातर् नह है । िकसी भी मानव समाज म नरनारी को उस समय तक
दाम्पत्य जीवन िबताने और संतान उत्प करने का अिधकार नह िदया जाता, जब तक इसके िलये समाज की
स्वीकृ ित न हो । यह स्वीकृ ित धािमक कमर्काण्ड को अथवा कानून ारा िनि त िविधय को पूरा करने से तथा
िववाह से उत्प होने वाले दाियत्व को स्वीकार करने से पर्ा होती है । िववाह वरवधू की सहमित से बना
अनुबन्ध होने पर भी इस अथर् म अन्य अनुबन्ध से िभ है िक इसकी शत –कतर् और दाियत्व के वल वरवधु
तय नह करते इसम समाज की परम्पराय तथा कानून का भी हाथ होता है । िववाह का सामािजक और नैितक
पक्ष भी महत्वपूणर् है । िववाह से उत्प होने वाली संतित पिरवार म रहते हुए ही समुिचत िवकास और
पर्िशक्षण पर्ा करके समाज का उपयोगी अंग बनती है । िववाह मानव समाज की अत्यन्त महत्वपूणर् पर्था या
संस्था है । यह समाज का िनमार्ण करने वाली सब से छोटी इकाई –पिरवार- का मूल है । िबना िववाह के
सहवास और संतित उत्प करना पिरवार और समाज की संस्था को नकार कर मानव सभ्यता को उस आिदम
छोर पर ले जाने वाला कायर् है जहां से िववाह की संस्था का आरम्भ हुआ । मानव समाज की आिदम अवस्था म
िववाह का कोई बन्धन नह था । सब नरनािरय को यथेच्छ कामसुख का अिधकार था । महाभारत (1-122 /
3-31) म पाण्डु ने अपनी प ी कु न्ती को िनयोग के िलए पर्ेिरत करते हुए कहा िक पुराने जमाने म िववाह की
कोई पर्था नह थी । ी पुरुष को यौन सम्बन्ध रखने की पूणर् स्वतन्तर्ता थी । कहते ह भारतवषर् म ेतके तु ने
सवर्पर्थम िववाह की मयार्दा स्थािपत की । जब वह ी जो उनके साथ रहती थी उन्ह छोडकर िकसी अन्य के
साथ जाने लगी और छोटा बच्चा रोने लगा तो ेतके तु ने कहा बालक रो मत हमारे साथ कोई और ी आ
जायेगी । बाद म िवचार करने पर इस समस्या को सुलझाने के िलये िववाह की संस्था िस्थर हुई । यह पर्संग
सचमुच घिटत हुआ हो या न हुआ हो इस से इन्कार नह िकया जा सकता िक पिरवार या कु टु म्ब मानव समाज
की एक अिनवायर् इकाई है । इसके टूटने पर समाज की स ा और उसपर आिशर्त मानव-सभ्यता का टूटना स्वतः
ही आरम्भ हो जाता है ।
लगभग सभी समाज म वधु चुनने के संबन्ध म आधारभूत िनयम दो होते ह - अन्तिववाह और
बिहिववाह । अन्तिववाह के अनुसार एक िविश वगर् के िक्तय को उसी वगर् के अन्दर रहने वाले िक्तय म
से वधु को चुनना होता है । दूसरे पर्कार के िनयम बिहिववाह के अन्तगर्त पर्त्येक िक्त को एक िविश समुदाय
के बाहर से ही वधु का चुनाव करना होता है । यह दोन िनयम परस्पर िवरोधी पर्तीत होते हुए भी वस्तुतः
2.
परस्पर िवरोधी नहह क्य िक इनका संबन्ध िभ पर्कार के समूह से होता है । इन िनयम को वृ के
उदाहरण से समझा जा सकता है । पर्त्येक समाज म एक िवशाल बाहरी वृ होता है और इस बडे वृ के भीतर
अनेक छोटे छोटे वृ होते ह । िहन्दु समाज म इस पर्कार का िवशाल वृ जाित का और इस िवशाल वृ के
अन्तगर्त छोटे छोटे गोतर् के वृ ह । सामािजक वस्था की अपेक्षा यह रहती है िक हमारे समाज का िक्त
अपने िवस्तृत वृ से उस वधु का चुनाव करे जो छोटे वृ से बाहर की हो । इस वस्था का तकर् संगत आधार
है । िववािहत युगल के दाम्पत्य सुख की कामना वर-वधु दोन ही पिरवार करते ह । दोन पिरवार के
रीितिरवाज, रहन-सहन, भोजन-आच्छादन, मान्यताय, िव ास, भाषा आिद के समान होने पर इस सुख की
संभावना अपेक्षाकृ त अिधक होती है । पर्त्येक समाज अपने संगठन को सुदढ बनाये रखना चाहता है । इस
ृ
मजबूती के िलये जरूरी है िक समाज के सभी सदस्य को परस्पर संब रखा जाये । दूसरे समाज से सम्बन्ध की
पर्वृि बढने पर यह संभावना ही अिधक होती है िक अपने समाज के पर्ितभावान युवक युवितयाँ धीरे धीरे
अपने समाज से कटते जाय । इत्यािद कारण से पर्त्येक समाज स्वभावतः अन्तिववाह का पक्षधर होता है ।
जाित के िवशाल बा वृ के अन्तगर्त छोटे गोतर् वृ से बिहिववाह का मुख्य कारण िवशेषतः युवावगर् की
चािरितर्क शुिचता को बनाये रखना है । गाँव-गुहाण्ड के सभी िनवासी पर्ायः एक ही गोतर् के होते ह । छह-सात
पीढी पहले तक यिद टटोला जाए तो ये सब एक पूवर् पुरुष की सन्तान होते ह । गाँव के रहन-सहन म पर्ायः घर
से बाहर खेत-खिलहान म अपेक्षाकृ त अिधक रहना होता है । बच्चे जो एक साथ रहते-खेलते बडे होते ह जब
यौवन की दहलीज पर पैर रखते ह तो उन्ह पर्बल यौन-आकषर्ण से बचाना पिरवार और समाज का कतर् है ।
परस्पर बहन-भाई के सम्बन्ध की मानिसकता, जो पिरवेष तथा संस्कार से पर्ा होकर समूचे िक्तत्व का
अपिरहायर् िहस्सा बन चुकी होती है , युवक के चिरतर् का संरक्षण करती है । गोतर् संबन्ध की यह मानिसकता
उ रभारत के राजस्थान, िदल्ली, हिरयाणा, पि मी उ रपर्देश, पंजाब और िहमाचल म पर्चिलत परस्पर
मान-सम्मान के सूचक अनेक रीितिरवाज से कदम कदम पर पु होती रहती है । इसके अितिरक्त यह वैज्ञािनक
तथ्य है िक अपने वगर् (गोतर्) म िववाह करने से सन्तान स्वस्थ नह होगी । इसके िवपरीत िभ वगर् म िववाह से
उत्प सन्तान स्वस्थ बलवती और दीघर्जीवी होगी । िहन्दु िववाह कानून म भी खून और दूध के सम्बन्ध अथार्त्
माता िपता की सन्तित (भाई-बिहन) से िववाह को विजत माना गया है । वजर्ना का यह न्यूनतम दायरा है ।
धमर्शा म इसका िवस्तार सात पीढी तक िकया गया है । सामािजक वस्था ने इसे सरल करके पूरे गोतर् तक
फै लाया है । गर्ामीण वातावरण और रहनसहन प ित को देखते हुए वजर्ना का यह िवस्तार युिक्त संगत ही
पर्तीत होता है ।
गत कु छ वष म उ रभारत म िवशेष रूप से हिरयाणे म सगोतर् िववाह की कु छ घटनाय हुई ह । इन
पर्संग म िववािहत युवक के पिरवार ने स्वयं या क्षेतर्ीय गोतर् (खाप) पंचायत ने जो आपि जताई उसके
पिरणाम स्वरूप सगोतर्ीय िववाह करने वाले युवक को जान से मारा गया, आत्महत्या करने के िलये बाध्य
िकया गया या अन्य पर्कार से पर्तािडत िकया गया । उन युवक ने सामािजक वस्था को तोडा परन्तु उन्हे
दिण्डत करने वाल ने कानून तोड कर अपराध िकया । समाज ने अपनी िनगाह म अपनी गिरमा की रक्षा करली
और न्याय पर्िकर्या ने अपरािधय को दिण्डत करके अपने कतर् का िनवार्ह कर िलया । दोन पक्ष के दिण्डत
होने पर भी समस्या ज्य की त्य बनी रही । समस्या का िनदान समाज को, िजसका नेतृत्व खाप या सवर्खाप
पंचायत कर रही ह और सरकार जो समाज के िहत और स्वस्थ िवकास के िलये ही कानून बनाती है , को िमल
कर करना चािहये । इस माहौल म मीिडया िनरपवाद रूप से आग म घी डालने का काम कर रहा है । उसे
पहले पूवार्गर्ह को छोडकर समस्या को समझना चािहये और िफर एक स्वस्थ दृि कोण अपना कर अपने कतर्
का िनवार्ह करना चािहये ।
राजनीितक दल को यह समझना होगा िक कायर्पािलका भी उस समाज का िहस्सा है जो समाज सगोतर्
िववाह की वजर्ना को बनाये रखना चाहता है । के वल मातर् आदेश के बल पर पूरे समाज के िवरु लोकतन्तर् म
कायर्वाही करना आसान नह होता । खाप पंचायत को भी यह समझना चािहये िक सामािजक िनयम- वस्था
3.
समाज के सदस्यस्वयं अपनी इच्छा से स्वीकार करते ह बल पूवर्क इसके िलये िकसी को बाध्य नह िकया जा
सकता । आप यह तो कर सकते ह िक िनयम तोडने वाले से अपना संबन्ध न रख उसके साथ हुक्का-पानी न पीय,
कोई संबन्ध न कर परन्तु कानून के दायरे म आने वाला कोई दण्ड देने का अिधकार आप को नह है । बेहतर
होगा िक पर्शासन से िमलकर बातचीत के जिरये आप िहन्दु िववाह कानून म अपेिक्षत बदलाव के िलये पर्य
कर । परन्तु यह सब करने के िलये िजस संगिठत आधार की जरूरत होती है पहले उसे पर्ा करना होगा । देश म
िविध सम्मत चुनी हुई पंचायत ह और समानान्तर खाप पंचायत ह । खाप पंचायत को लोकतािन्तर्क स्वरूप म
आना होगा । िफर एक सवर्सम्मत वस्था के अनुरूप ही सवर्खाप पंचायत का गठन करना होगा । तभी इस
सामािजक संगठन को वह शिक्त िमलेगी िजसके आधार पर इसके िनणर्य समाज म पर्भावी ह गे । इन्ह िदन
पािकस्तान के िकर्के ट-िखलाडी और भारतीय आयशा िसि की के िववाद को िजस तरह मुिस्लम समाज के मान्य
लोग ने सुलझाया वह सराहनीय है । इस पर्कार के सामािजक िववाद पुिलस या कोटर्-कचहरी से तो सुलझते
कम और उलझते अिधक ह ।
पंचायती संगठन को और पिरवार को यह भी जान लेना चािहये िक समाज के युवा सदस्य़ जब िकसी
मयार्दा का उल्लंघन करते है तो िकसी हद तक समाज भी दोषी होता ह । पिरवार और समाज ही शायद उन्ह
ठीक से वह संस्कार नह दे सके िजससे वे समाज और रूढ मयार्दा को अपना समझ कर उसकी सीमा म रहते
या परस्पर संवाद करके परम्परा म बदलाव के िलये संगिठत आवाज उठाते ।
जयपाल िव ालंकार
210, वैशाली, पीतमपुरा, िदल्ली 110 034
9810256995