आत्मा
उपनिषदों में बार-बारआत्मा शब्द हमें प्राप्त होता है। 'आत्मा वा अरे श्रोतव्यो, मनतव्यो,
मिदिध्यासितव्यो' आत्मा ही श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन करने योग्य है। उस आत्मा के दर्शन
से, श्रवण, मनन, निदिध्यासन से और उसके विज्ञान से सारे विश्व के रहस्य को पाया जा सकता
है। यह आत्मा हमारे जीवन का सार है। पंचभूतात्मक सृष्टि इसी का स्थूलतम् विस्तार है। मनुष्य
ने जब अपनी खोज की तब इन्द्रियों के साथ, 'करण' के साथ, सहयोग करनेवाला एक अंदरूनी
करण भी उसने पाया। उसने उसे अंतःकरण कहा। इस अंतःकरण को समझने की कोशिश करते
चित्त, चित्तवृत्ति, मन, बुद्धि, अहंकार आदि उत्तरोत्तर और सूक्ष्म तत्त्वों को उसने पहचान लिया
और बाद में इन सबके परे जो है अथवा अन्दर जो है, उसे उसने 'अंतरतर' कहा। वही आत्मा है।
3.
ब्रह्म
जिस तरह अंदरूनीउपासना में अहंकर के बाद आत्मा की प्राप्ति हुई, उसी तरह बाह्य उपासना में आकाश के बाद अक्षर ब्रह्म
की प्राप्ति हुई। जो बड़ा है, बृहत् है, बृहत्तर, बृहत्तम है, वही है ब्रह्म। ब्रह्म से बढ़कर कुछ है ही नहीं।
वरुण के पुत्र भृगु ने एक बार उनसे पूछा था भगवान, 'ब्रह्म' क्या है? कृपया इस संबंध में मुझे प्रबुद्ध करें। वरुण ने उन्हें
बताया था कि जिससे सभी प्राणियों का जन्म होता है, पोषण होता है और अंततः वह 'ब्रह्म' में विलीन हो जाते हैं - यतो वा
इमानी भूतानि जायन्ते। जिससे जन्म लेने वाले जीवित रहते हैं। जिसे वे अनुभव करते हैं और उसमें प्रवेश करते हैं वह ब्रह्म
है (तैत्रिय उपनिषद-3/1)। उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम सत्य है। वह आत्मा का अद्वैत स्वरूप है। सत्य, ज्ञान और
अनन्त स्वरूप। माधवाचार्य के अनुसार, जिसमें गुणों की पूर्णता है, वह ब्रह्म है: वृहन्तो यस्मिन गुणः। उपनिषदों के अनुसार
ब्रह्म सत्, चित् और आनन्द स्वरूप सच्चिदानन्द है। वही सबकी आत्मा है और उसी में यह नामरूपात्मक संसार रचा गया है।
ब्रह्म को सार्वभौम कहा जाता है क्योंकि वह सबमें व्याप्त है। ब्रह्म ब्रह्माण्ड का अव्याकृत रूप है। वह सभी चीजों का अंतिम
कारण है। यह दुनिया की सभी चीजों और शक्तियों का आधार है। यही ब्रह्म सृष्टि के समय सभी निर्मित वस्तुओं में प्रविष्ट
हुआ है। फिर उन्होंने सत्-असत्, निरुक्त-अनिरुक्त, ज्ञान-विज्ञान, ऋत-अनृत (तैत्रिय उपनिषद-11/7) दोनों रूप धारण किये
हैं। संपूर्ण प्रकृति ब्रह्म की रचना है, ब्रह्म-जनित, ब्रह्म-प्रेरित। ब्रह्म इस सृष्टि का रचयिता है।
4.
ब्रह्म के दोस्वरूप
उपनिषदों में 'ब्रह्म' के दो स्वरूपों का वर्णन मिलता है- (1) सविशेष अर्थात् सगुण रूप एवं (2) निर्विशेष
अर्थात् निर्गुण रूप। निर्गुण ब्रह्म को 'परब्रह्म' कहा गया है। यह 'परब्रह्म' सच्चिदानन्दरूप और निरुपाधि
होने के कारण अनिर्वचनीय है। उसे ही तैत्तिरीयोपनिषद् में सत्य, ज्ञानरूप और अनन्त कहा गया है- सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यह ब्रह्म रसरूप है। इसे ही प्राप्त कर आत्मा आनन्दमय हो जाती है- रसो वै सः, रस
ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति (तैत्तिरीयोपनिषद् - 2/7)। सविशेषभाव ठीक इसके विपरीत होता है।
इसमें गुण, चिह्न, लक्षण तथा विशेषणों की सत्ता विद्यमान रहती है, जिसके द्वारा उसका उक्त स्वरूप
हृदयाबगम किया जा सकता है। इन दोनों भावों को प्रदर्शित करने के लिए उपनिषदों ने दो प्रकार की
बातों को प्रयुक्त किया है- एक निर्विशेष लिब और दूसरा सविशेष लिब। सविशेषलिब श्रुतियाँ सर्वकर्मा,
सर्वकामः, सर्वगन्धः, सर्वरसः इत्यादि है एवं निर्विशेषलिब श्रुतियाँ अस्थूलम्, अनणु, अझस्वम्, अदीर्घम्
है। यथा-
सन्ति उभयलिबाः श्रुतयो ब्रह्मविषयाः। सर्वकर्मेत्याद्याः सविशेषलिबाः, अस्थूलमनणु इत्येवमाद्याश्च
निर्विशेषलिबाः। (शांकरभाष्य)
इन वाक्यों में एक विशेषता द्रष्टव्य है। सगुण ब्रह्म के लिए जहाँ पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग किया गया है,
वही निर्गुण ब्रह्म के लिए नपुंसक लिंग का प्रयोग किया गया है। यही कारण है कि परब्रह्म के लिए
सर्वनाम 'सः' की जगह 'तत्' शब्द का सर्वत्र प्रयोग किया गया है। ध्यान रखना चाहिए कि इस अन्तर के
5.
सगुण ब्रह्म
ब्रह्म कीइस अवस्था को 'अपर-ब्रह्म' कहा जाता है। इसे प्रमाणों द्वारा वर्णन किया जा सकता है। इसके दो लक्षण हैं- (1)
तटस्थ लक्षण, (2) स्वरूप लक्षण।
जिसके द्वारा वस्तु के शुद्ध स्वरूप का परिचय प्राप्त किया जाता है; वस्तु के तात्त्विक रूप की उपलब्धि होती है; यथा-
ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तस्वरूप है- सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। उसे ही स्वरूपलक्षण कहा गया है तथा तटस्थ लक्षण के द्वारा
वस्तु के अस्थायी, परिवर्तनशील गुणों का वर्णन किया जाता है; जैसे- ब्रह्म से ही सभी जीवों की उत्पत्ति होती है तथा वे
उसी में लीन हो जाते हैं। 'यतो वा इमानि भूतानि' इत्यादि 'अपर-ब्रह्म' का तटस्थ लक्षण है।
छान्दोग्योपनिषद् में सगुण ब्रह्म का विवेचन 'तज्जलान्' शब्द के द्वारा किया गया है। इस शब्द का विवेचन इस प्रकार
किया गया है- 'तज्ज' तत्ज अर्थात् ब्रह्म में लीन हो जायेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि सगुण ब्रह्म ही इस संसार का
उत्पादक, धारक एवं संहारक है। इस कथन की संपुष्टि तैत्तिरीयोपनिषद्- 3/1 ने भी की है। इनके अनुसार- जिसमें सभी
प्राणी उत्पन्न होते हैं, जीवित रहते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं, वही सगुण ब्रह्म है। इस तरह सगुण ब्रह्म ही इस संसार
का कारण है। वही सबका स्वामी है, वही सर्वज्ञ और सर्वव्यापक है। वही इस नाम- रूपात्मक जगत् का अधिष्ठाता है। वही
संसार का नित्य और उपादान कारण है। वही सगुण ब्रह्म इस जगत् को नियन्ता है।
6.
निर्गुण ब्रह्म
निर्गुण ब्रह्म'परब्रह्म' है। सच्चिदानन्द स्वरूप एवं अनिर्वचनीय है। निर्गुण ब्रह्म को न तो किसी विशेषण से
विशेषित किया जा सकता है और न तो किसी चिह्न से चिह्नित। जो अनन्त है, अनिवर्चनीय है अर्थात् जिसका
निर्वचन हम कर ही नहीं सकते क्योंकि वह हमारे इन्द्रियों का विषय नहीं है। इन्द्रियों का विषय होते ही ब्रह्म
सीमित हो जाएगा। सीमित ब्रह्म इस जगत का परम अधिष्ठान् नहीं हो सकता। अतः ब्रह्म को निर्गुण कहा गया।
अर्थात् जिसका निर्वचन हम गुणों के द्वारा नहीं कर सकते। निर्गुण ब्रह्म गुणों से परे की अवस्था है इसलिए
लौकिक विशेषणों का प्रयोग इसके लिए नहीं हो सकता। यही कारण है कि निर्गुण ब्रह्म की विवेचना 'नेति-नेति'
रूप में हुआ है।
ध्यान देने योग्य यहाँ यह है कि ब्रह्म के निषेधार्थक वर्णन का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म कुछ नहीं है, बल्कि ब्रह्म ही
सब कुछ है। अतः यहाँ ब्रह्म के सम्बन्ध में निषेध विधेयपरक है। अभाव का अर्थ भाव है। अभावात्मक विशेषणों
का तात्पर्य यहाँ भावात्मक है। इस दृष्टि से ब्रह्म अलक्षण, अचिन्त्य और अनिर्वाच्य या अव्यपदेश है।
7.
सगुण और निर्गुणब्रह्म की एकरूपता
सगुण और निर्गुण के उपर्युक्त विवेचन से हमें इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि ब्रह्म संख्यात्मक रूप से दो हैं।
ब्रह्म एक ही है किन्तु हमारे सीमित विचारशक्ति के कारण इसके दो रूप उपलब्ध होते प्रतीत होते हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् 2/3/1 के अनुसार परब्रह्म अमूर्त और अमर्त्य है। ठीक इसके विपरीत अपर ब्रह्म मूर्त
और मर्त्य है। परब्रह्म यत् अर्थात् चर है और अपर ब्रह्म स्थित है। परब्रह्म तत् है और अपर ब्रह्म सत् है। सत् और
त्यत् मिलकर सत्य बनता है। निर्गुण, निराकार और निरूपाख्य तत् अर्थात् परब्रह्म और सगुण, साकार और
बोधगम्य सत् अर्थात् अपर ब्रह्म दोनों एक-दूसरे से अभिन्न हैं।
यथार्थतः दोनों में कोई तात्विक भेद है ही नहीं दोनों एक ही ब्रह्म के दो दृष्टिकोण हैं। यही कारण है कि
अनेक स्थलों की समान पृष्ठभूमि में ब्रह्म के उभयविध वर्णन उपलब्ध होते हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् (6/11) में एक
ओर उसे सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, कर्माध्यक्ष तथा साक्षी कहा गया है तो दूसरी ओर उसे निर्गुण कहा गया है।
यथा-
एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणस्य ।।
ब्रह्म के ऐसे दोनों रूपों के वर्णन के पश्चात् उसकी अपनी विशिष्टता और विलक्षणता स्पष्ट हो जाती है। अतः
उस असीम को ससीम पार्थिव इन्द्रियों से कैसे आँका जा सकता है। अतः उसे अनिर्वचनीय कहा गया है। संक्षेप में
हम इतना कह सकते हैं कि परब्रह्म निर्गुण और निराकार है एवं अपर ब्रह्म सगुण और साकार है। परब्रह्म परा
विद्या का और अपर ब्रह्म अपरा विद्या का विषय होते हुए भी एक ती तत्त्व के दो अलग-अलग रूप हैं।
8.
आत्मा और ब्रह्म
येदोनों शब्द एक ही सत्ता के दो पक्ष हैं। मुण्डकोपनिषद में इस सन्दर्भ में कहा गया है कि ब्रह्म और आत्मा दोनों
ही मित्रभाव से शरीररूपी वृक्ष पर निवास करते हैं। उनमें से एक 'जीवात्मा' कर्मफलों का भोग करता है और
दूसरा 'परमात्मा' उसे साक्षीभाव से देखता है। यथा मुण्डकोपनिषद्-3/1/1 द्रष्टव्य है-
द्वा-सुपर्णा सजुया सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरनयः पिप्पलं स्वादवत्रूनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।
बृहदारण्यकोपनिषद् में भी यही तथ्य इस रूप में कहा गया है- अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः (2/2/11)। यह
आत्मा ही ब्रह्म है, जो सबका अनुभव करती है। यह अखिल ब्रह्माण्ड एकमात्र ब्रह्म का विस्तार है। 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
ऐसा प्राणी को समझना चाहिए। यथा- ब्र या इदमग्र आसीत्। तदात्मानमेवाऽवोचत् अहं ब्रह्मास्मि इति (बृह. उ.
14/10)। छान्दोग्योपनिषद् में श्वेतकेतु की एक कथा है। उस कथा में जीव और ब्रह्म की एकरूपता पर विशेष
टिप्पणियाँ की गई हैं। उसमें कहा गया है- यह जो अणिमा है, तद्रूप ही यह सब कुछ है। वही, वही सत्य है, वही
आत्मा है। हे श्वेतकेतो! वही तुम हो। ऊपर-नीचे, दाँये-बाँये, आगे-पीछे चारों ओर वही तो है। वह आत्मा ही तो
सबकुछ है। यह अखिल ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म है। उसी ब्रह्म से इसकी उत्पत्ति होती है और उसी में यह लीन हो जाता है।
जिस प्रकार आकाश में सारा संसार समाहित है उसी प्रकार ब्रह्म में सभी जड़-चेतन समाहित हैं। समस्त नाम-रूप
जिसके अन्दर है, वह ब्रह्म है। वह अमर्त्य है, वही आत्मा है (छान्दोग्योपनिषद-6/87, 7/55/2, 3/14/1,
8/14/1)। यह विराट विश्व ब्रह्म का विस्तार है। आत्मा भी ब्रह्म है- सर्वमेतद् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म
(मुण्डकोपनिषद्-2)। आत्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं। यह परमात्मा (ब्रह्म) क्या है? जिसका ज्ञान हो जाने
पर शेष सब कुछ स्वतः ज्ञात हो जाता है- कस्मिन् खलु भगवतो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति (मुण्डकोपनिषद्-
1/1/3)। ब्रह्म को जानते ही जानने वाला स्वयं ब्रह्म हो जाता है।