Grey Minimalist Professional Project Presentation.pptx.pptx
1.
IMPORTANCE OF GHRIT
ANDDUGDH IN JWAR
By Group B
Shivalik Institute of
Ayurveda And
Research
Submitted to:-
Dr. Tarranum
Dept. Of Kaya Chikitsa
2.
चरक निदान प्रथमअध्याय
च०नि०१/३६:– चिकित्सा सूत्र में दोष अनुसार दूध आदि का प्रयोग वर्णन है।
च ०नि०१/३७:– जीर्णज्वार मैं घी का महत्व
औषध से पकाए हुए घी का प्रयोग करते हैं क्योंकि
१.घी स्नेह के कारण वात का शमन करता है
२.संस्कार से कफ का और शीत वीर्य से पित्त और ऊष्मा का शमन करता है
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3.
चरक चिकित्सा ज्वर
अध्याय
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अतऊर्ध्व कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे ॥१६४॥
परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्यानं यथाऽमृतम् ।
ज्वर में घृतपान की अवस्था कफ के मन्द होने पर या वात, पित्त प्रधान ज्वर में दोषों के पक जाने पर १० दिन के बाद
दोषानुसार औषध से सिद्ध किए हुए घृत का पान करना चाहिए। यह घृत अमृत के समान लाभकारी होता है।।
4.
निर्दशाहमपि ज्ञात्वा कफोत्तरमलङ्गितम्॥१६५॥ न सर्पिः पाययेद्वैद्यः कषायैस्तमुपाचरेत्
।
घृतपान में अपवाद-दस दिन बीत जाने पर भी ज्वर में कफ की प्रधानता हो और लङ्घन
के लक्षण पूर्ण उपस्थित न हों, तो ऐसी अवस्था में घृतपान नहीं कराना चाहिए। उस
अवस्था में कषाय पिलाकर चिकित्सा करनी चाहिए।।
दाहतृष्णापरीतस्य वातपित्तोत्तरं ज्वरम् ॥१६७॥
बद्धप्रच्युतदोषं वा निरामं पयसा जयेत् ।
ज्वर में दुग्धपान का काल-दाह और तृष्णा से पीड़ित का वात-पित्त प्रधान ज्वर में जिसमें
दोष बँध गये हों और अल्प मात्रा में अपने स्थान से निकलते हों ऐसे विसम ज्वर को दूध से
जीतना चाहिए।
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5.
ज्वरक्षीणस्य न हितंवमनं न विरेचनम् ॥ १६९॥
कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ।
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क्षीण व्यक्ति में बस्ति या दुग्धपान - ज्वर से क्षीण मनुष्यों के लिए
वमन और विरेचन हितकारी नहीं होता है। पर यदि रोगी के मल को
निकालना आवश्यक हो, तो दूध पिलाकर निरूहबस्ति देकर
निकालना चाहिए।। १६९.२-१७०.१।।
6.
रूक्षं तेजो ज्वरकरंतेजसा रूक्षितस्य च । यः स्वादनुबलो धातुः स्नेह वध्यः स
चानिलः ॥२१७॥
रोगी के शरीर में रूक्षता हो, तो उन रोगियों की चिकित्सा घृत द्वारा की
जाती है। रूक्ष तेज (द्रवहीन पित्त) ज्वर को उत्पन्न करता है, तेज से शरीर के
रूक्ष हो जाने के बाद वात का कोप होता है, वह अनुबल (बाद में प्रकुपित)
वात धातु स्नेहवध्य अर्थात् स्नेह से नष्ट किया जा सकता है।। २१६-२१७।।
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कासाच्छवासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाच्चिरज्वरात् । मुच्यतेज्वरितः पीत्वा
पञ्चमूलीश्रृतं पयः ॥२३४॥
पञ्चमूलसाधित क्षीरपाक - लघु पञ्चमूल से सिद्ध किया हुआ गोदुग्ध पीकर ज्वर से
पीड़ित रोगी कास, श्वास, शिरःशूल और जीर्ण ज्वर से मुक्त हो जाता है।। २३४।।
एरण्डमूलोत्क्वथितं ज्वरात् सपरिकर्तिकात् । पयो विमुच्यते पीत्वा
तद्वद्विल्वशलाटुभिः ॥२३५॥
एरण्डमूलादि क्षीरपाक-एरण्डमूल क्वाथ से अथवा कच्चे बेल की गुद्दी से सिद्ध किया
हुआ दूध का पान करने से परिकर्तिका (गुदा में कैंची से काटने की सी पीड़ा) से युक्त
ज्वर से रोगीमुक्त हो जाता है।।२३५।।
8.
त्रिकण्टकबलाव्याघ्घ्रीगुडनागरसाधितम् । वर्चोमूत्रविबन्धघ्नं
शोफज्वरहरंपयः ॥२३६॥
त्रिकण्टकादिक्षीर पाक- गोखरू, बरियरा का मूल, भटकटैया की जड़, सोंठ,
इनके समान भाग कल्क से सिद्ध किये हुए गोदुग्ध में गुड़ मिलाकर पीने से मल
और मूत्र का विबन्ध (रुकावट) दूर होता है तथा शोथ और ज्वर का नाश होता
है।। २३६॥
सनागरं समृद्वीकं सघृतक्षौद्रशर्करम् । शृतं पयः सखर्जूरं पिपासाज्वरनाशनम् ॥
२३७॥
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चतुर्गुणेनाम्भसा वा श्रृतंज्वरहरं पयः । धारोष्णं वा पयः सद्यो
वातपितज्वरं जयेत् ॥२३८॥
केवल दुग्ध का प्रयोग- चौगुने जल के साथ पकाया हुआ गोदुग्ध पीने से
ज्वरनाशक होता है तथा धारोष्ण गोदुग्ध पीने से शीघ्र ही मनुष्य वात-
पित्तजन्य ज्वर पर विजय प्राप्त कर लेता है।।२३८।।
जीर्णज्वराणां सर्वेषां पयः प्रशमनं परम् । पेयं तदुष्णं शीतं वा यथास्वं
भेषजैः शृतम् ॥२३९॥
जीर्ण ज्वर में दुग्ध की श्रेष्ठता - सभी प्रकार के जीर्ण ज्वरों को शान्त
करने में दूध उत्तम होता है। उस दूध को दोष के अनुसार औषधियों से
पकाकर गर्म या शीतल पीना चाहिए।। २३९।।
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अष्टांग हृदय चिकित्सास्थान के प्रथम अध्याय
कषायपानपथ्यान्नैर्दशाह इति लङ्घिते सर्पिर्दद्यात्कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे ।
पक्केषु दोषेष्वमृतं तद्विषोपममन्यथा ॥८२॥
दशाहे स्यादतीतेऽपि ज्वरोपद्रववृद्धिकृत् ।
लङ्घनादिक्रमं तत्र कुर्यादाकफसङ्क्षयात् ॥८३॥"**
जब कषाय (औषधि का काढ़ा), पान और पथ्य आहार के द्वारा दस दिन तक लंघन किया जाए, तब ज्वर
के रोगी को जिसमें कफ मंद हो और वात-पित्त की अधिकता हो, उसे घृत का सेवन कराना चाहिए। जब
दोष पके हुए हों तो घृत अमृत के समान लाभकारी होता है, परंतु कच्चे (आम) दोषों में यह विष के समान
हानिकारक होता है।
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"ज्वरक्षीणस्य न हितंवमनं न विरेचनम् ॥१०५॥
कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ।
क्षीरोचितस्य प्रक्षीणश्लेष्मणो दाहतृड्वतः ॥१०६॥
क्षीरं पित्तानिलार्तस्य पथ्यमप्यतिसारिणः ।
तद्वपुर्लङ्घनोत्तप्तं वनमिवाग्निना ॥१०७॥
प्लुष्टं दिव्याम्बु जीवयेत्तस्य ज्वरं चाशु नियच्छति ।
संस्कृतं शीतमुष्णं वा तस्माद्धारोष्णमेव वा ॥१०८॥"
ज्वर से क्षीण व्यक्ति के लिए वमन और विरेचन उचित नहीं है। जिसके लिए दूध उपयुक्त हो, जिसका कफ
क्षीण हो गया हो, दाह और प्यास से परेशान हो, वात-पित्त से पीड़ित हो, यहाँ तक कि अतिसार से पीड़ित
हो, उसके लिए दूध पथ्य है। यह लंघन से तप्त शरीर को वैसे ही जीवन देता है जैसे अग्नि से नष्ट हुए वन को
दिव्य जल जीवन देता है।