ॐ श्री सद्ुकरु प मात्मनतनन नत
    अविाण मदवस मवशनष्ंक                               v a r j -u k n
                                       “गरुकल क शिक्षकों का अपना माशिक िमाचार पत्र”
                                         ु ु   े
                            न
        प्रक्शक : ुकरु पकल कन्द्रीय प्रबंधन समतमि, संि श्री आश्ा्तजी आश्रत, स्बातिी, अहतद्ब्द-380005.
                         क

                                                               वषष : १ अंक: ९                                                   त्र्ष २०१२
                                                           समाचार                                                       फरवरी २०१२
 छ िंदवाडा गुरुकुल के 400 से भी ऄधधक धिद्याधथि यों ने होली के शभ ऄिसर पर
                                                                       ु                                                  फरवरी २०१२
 नागपर में पूज्य बापूजी के करकमलों द्वारा बरसाए गए पलाश के फूलों के रंग से
       ु
 ऄपना तन तो रंगिाया ही, साथ ही सत्संग और प्यारे गरुदेि के साधनध्य से ऄपना
                                                        ु
 ह्रदय भी रंगिा धलया | गरुदेि ने बोडि की परीक्षा िाले धिद्याधथि यों को अशीिाि द देते
                         ु
 हुए कहा धक धनधचंत हो कर पढ़ना, सब मंगल ही होगा | साथ ही गरुदेि ने याद    ु
 धदलाया धक डाक्टर बनना हो या देश की सेिा करना हो, पहले इश्वर को पा लो                  धछलया गुरुकुल के नौधनहालों को १४ फरिरी को
                                                                                          ु
 ऄन्यथा बड़े बड़े लोग भी भ्रष्टाचार और ऄहंकार के पोषण में फं स कर रह जाते हैं |          मातृ- छपतृ पूजन छदवस के पािन ऄिसर पर अमलनेर
 अहमदाबाद गुरुकुल के कुछ धिद्याधथि यों को गधणत-धिज्ञानं प्रदशि नी तथा गजरात   ु        में पूज्य गरुदेि के साधनध्य और अशीिाि द का दलिभ
                                                                                                  ु                                     ु
 खेल कुम्भ में राज्य स्तर पर कइ परस्कार प्राप्त हुए हैं | ऄधधक जानकारी के धलए
                                    ु                                                  लाभ धमला | गरुकुल के धिद्याधथि यों ने गरुदेि के समक्ष
                                                                                                       ु                        ु
 देधखये ऊधष प्रसाद माचि २०१२ पष्ठ २८ – बापू के बच्चे, पक्के और अच् े |
                                  ृ                                                    सन्दर सांस्कृधतक कायि क्रम भी प्रस्तुत धकया |
                                                                                            ु

                    पज्य बापूिी का ७२ वााँ अवतरण जिवस – ११ अप्रैि, २०१२
                     ू
 भगिान और भगिदस्िरूप ब्रह्मज्ञानी संतों का जन्म करुणा-परिश होकर होता है आसधलए ईनका जन्म छदव्य है, अवतरण है | हमारे कष्ट
                        ्
 धमटाने के धलए ईनका जो भी ऄितार हो: प्रेमाितार, ज्ञानाितार या मयाि दाितार- िे हमारी तरह हाँसते-रोते हैं, खाते-धखलाते हैं, सब करते हुए
 भी सम रहते हैं - के िल हमको ईन्नत करने के धलए | ईन्नत करने के धलए जो जन्म होता है, िह अवतार है |
 पूज्य बापूजी के सरल ि धनराले जीिन-लीला से हमें प्रेरणा धमलती है धक बाल्यकाल से ही यधद भधि, परदखकातरता, सद-भाि, साहस, धैयि,
                                                                                                             ु               ्
 तत्परता, सेिाभाि जैसे दैिी गणों के संस्कार धिद्याधथि यों को धमल जाएाँ तो िे धकतने महान हो सकते हैं | बापूजी की माताजी सत्संग में जो
                                 ु
 ऄच्छी बातें और प्रेरक प्रसंग सनती, िे बालक असमल को ऄिश्य सनाती | हम भी तो गरुकुल में ऄपने धिद्याधथि यों के मात-धपतृ जैसे ही हैं,
                                   ु                  ु                   ु                    ु                                ृ
 तो हम भी आस धदव्य-सेिा को प्रयत्नपूििक और बढ़ाएं | सत्संग सने और परस्पर सनाएाँ | सात से चौदह िषि की अयु में धिद्याधथि यों का
                                                                        ु                   ु
 स्िाधधष्ठान कें द्र धिकधसत होता है | आस दौरान धिद्याधथि यों में जैसी भािना भर देंगें, िे िैसा करने में सफल हो जायेंगें | १२-१३ िषि की अयु में
 रणजीत धसंह के धपता ने ईसमे िीरता के संस्कार भर धदए तो िह ऄफगाधनस्तान से कोधहनूर हीरा लाने में सफल हो गया | धशक्षक धिद्याधथि यों
 में हीन भािना न अने दें, ईनकी योग्यता और सद-गण बताकर ईनका ईत्साह बढ़ायें | ईनमें महान धिचार भरें धक िे तो सखी-दखी होने िाले
                                                   ् ु                                                                         ु ु
 मन नहीं, धनणि य करने िाली बधु ि नहीं, िे तो शि-बि-चैतन्य ऄजर-ऄमर अत्मा हैं | कधमयां तो मन में हैं और बापूजी द्वारा सत्संग में बताइ
                                                ु ु
 गइ यधु ियों के अश्रय से हम ऄिश्य आन कधमयों को खदेड़ सकते हैं | हमारे धलए सब कुछ संभि है | बापजी के बच्चे, नहीं रहते कच्चे!!
                                                                                                           ू

िीवन िीते जकस जिए हैं?                                                                            स्वास््य कजियााँ
                                                                                                            ुं
पढ़ते हैं- कमाने के धलए, कमाते हैं- खाने के धलए, खाते हैं- जीने के धलए, जीते धकस धलए हैं?          बवासीर का इलाज- रोज १० ग्राम मक्खन
धकसी को सही पता नहीं है| रधििार की छुट्टी होती है तो सब खुश होते हैं क्योंधक सब मधु ि चाहते       के साथ १० ग्राम काले धतल चबा के खाएं –
                                                                                                  ऄधधक जानकारी के धलए देखें फरिरी महीने
हैं, बंधन धकसी को स्िीकार नहीं| िास्ति में हम जीते हैं दखों से मि होने के धलए, परन्तु यह
                                                        ु        ु
                                                                                                  का ‘ऊधष दशि न’|
मधु ि कै से हो, आसका अज तक हमें पता नहीं | यह पता पूज्य बापूजी बता रहें हैं | हम जैसे हैं,        फ़ूड पोइज़छनिंग व सािंप काटने पर मंत्र जपें
धजस ऄिस्था में है, हम दखों से मि हो सरलता से गरुकृपा से परम सख पा सकते हैं | मधु ि
                        ु         ु                ु                 ु                            ‘नगर नगर...’| गर का ऄथि धिष है, आसधलए
यधु ि से होती है और यह सरल यधु ियााँ गरुदेि हमें सत्संग में सहजता से बता रहें हैं |
                                        ु                                                         नगर जपने से धिष का ऄसर न हो जाता है|
जिक्षा और िीक्षा
 एक होती है धशक्षा और दसरी होती है दीक्षा | धशक्षा से आस जगत का ज्ञान होता है, िस्तुओ ं का ईपयोग करने की कला अती है | परन्तु धशक्षा के
                           ू
 साथ-साथ िैधदक दीक्षा न हो तो मनष्य ऐसी िस्तओ ं के पीछे ही पड़ जाता है | मानि दानि जैसा जीिन धबताने लगता है | धशक्षा मनष्य को
                                      ु            ु                                                                              ु
 धशधक्षत बनाती है | धशधक्षत मनष्य धजतनी कुशलता से सेिा कर सकता है ईतना शायद ऄधशधक्षत कभी नहीं कर सकता | लेधकन साथ ही
                                 ु
 ऄधशधक्षत व्यधि कभी आतना सत्यानाश नहीं कर सकता धजतना धशधक्षत व्यधि कर सकता है| समग्र मानिजाधत को धिनाश के गति में
 धके लनेिाले जो एटम बम बने हैं ऄथिा बम धड़ाके करके हजारों धनदोषों को मार डाला और करोड़ों की संपधि का धिनाश कर धदया, िह धशधक्षत
 व्यधियों द्वारा बनाये गये बम से ही ना | ऄतः धशधक्षत मनष्य के जीिन में दीक्षा ऄत्यंत जरुरी है | मनष्य की गहराइ में बसे हुए माधलक की धदशा
                                                        ु                                         ु
 देनिाला िेदांती ज्ञान ‚परस्पर देिो भि:’’ की सन्दर भािना एिं मानि-मानि में स्नेह हो तो संसार की िस्तओ ं पर धिजय प्राप्त की जा सकती है |
     े                                        ु                                                        ु
 दीक्षा रधहत धशक्षा सख-शांधत और तनाि रधहत जीिन कभी नहीं दे सकती, मधु ि नहीं दे सकती, आधन्द्रय –संयम नहीं दे सकती, सदाचार संयि
                      ु                                                                                                               ु
 स्नेह नहीं दे सकती | ऄतः व्यधि, समाज, देश या धिश्ि को ‚अत्मनः प्रधतकूलाधन परेषां न समाचरेत...’ ऄपने प्रधतकूल हो ऐसा व्यिहार दूसरों
 के साथ नहीं करना चाधहए | ‚परस्पर देिो भि:’’ की धदशा देनेिाली दीक्षा की मनष्य को ऄत्यंत जरूरत है | संयम, सदाचार, सहानभूधत अधद
                                                                                ु                                               ु
 दैिी गणों का धिकास हो ऐसी दीक्षा की जरूरत है | बाहर की धशक्षा पाओ, धकन्तु ईस धशक्षा को िैधदक दीक्षा की लगाम देना जरुरी है |
        ु

              अवतरण जिवस- सेवा जिवस का आध्यात्मीकरण                                                          ‚पॉवर पॉइिंट‛ का
पंचभौधतक शरीर एिं भौधतक िस्तुओ ं का अध्यात्मीकरण कै से धकया जाता है, आसका सन्दर ईदाहरण प्रस्तुत
                                                                                  ु                          आध्य्मनतीकाण
करता है पूज्य बापूजी का - ऄितरण धदिस | सामान्य लोग तो जन्मधदिस पर पाटी देकर स्ियं ि दूसरों को                किं प्यूटर कक्षा ९ : ऍम एस
खानपान और नाच-गान में ईलझाते हैं | बापूजी की प्रेरणा से बापूजी के साधक ऄितरण- धदिस पर धिधभन्न                पॉिर पॉआंट के ऄंतगि त हम
सेिाओं की धिशेष श्रंखलाएं शरू करते हुए यह धदन मनाते हैं | बापूजी कहते हैं धक सेिा करके हम धकसी पर
                       ृ       ु                                                                             धिधभन्न स्लाआडों में धचत्र,
                                                                                                             टेक्स्ट ि् ग्राधफक्स का
ईपकार नहीं कर रहे हैं, सेिा के माध्यम से हम ‘वासुदेवः सवं इछत’ और ‘तुझमें राम, मझमें राम, सबमें राम
                                                                                    ु                        ईपयोग करके               सन्दर
                                                                                                                                       ु
समाया है, कर लो जगत में प्यार सभी से, कोई नहीं पराया है...’ –जैसे सूत्रों को ऄपने व्यिहार में लाने का        प्रोजेक्शन (प्रस्तुधत) करते हैं|
ऄभ्यास कर रहें हैं | पूज्य गरुदेि तो सेिा जैसे पण्यदायी कमि का भी हमारे धलए अध्यात्मीकरण कर देते हैं !
                             ु                   ु                                                           यह जीिन भी इश्वर द्वारा धदया
         ऄितरण धदिस पर सभी के जीिन में ज्ञान का ईजाला करने के धलए धिद्याओं में सिि श्रेष्ठ अत्मधिद्या से     गया ब्लैंक (Blank)प्रोजेक्शन
भरपूर बापूजी के (िीधडयो) सत्संग अयोधजत धकये जाते हैं | दररद्र-नारायणो में भोजन-प्रसाद, कपडे, ऄन्न,           है, धजसमे हम बचपन,
कम्बल, फल, धमठाइ, औषधध, जूते-चप्पल, टोपी अधद का धितरण देश धिदेश में धकया जाता है | धिद्याधथि यों में         धकशोरािस्था, यिािस्था, ु
नोटबक, पेन, पेधन्सल, सत्साधहत्य अधद का, बीमारों में औषधध, फल अधद का धितरण धकया जाता है |                     बढ़ापा अधद स्लाआडों में सेिा,
                                                                                                                ु
      ु
                                                                                                             ज्ञान, भधि और प्रेम के रंग
िक्षारोपण, व्यसन-मधु ि ऄधभयान अधद कइ सेिाएं समाज रूपी देि के धलए धकये जाते हैं | संसार की अपा-धापी
  ृ                                                                                                          भरकर सन्दर प्रोजेक्शन
                                                                                                                           ु
के िातािरण में माधयि ि सद्-भाि के संचार हेतु कीति न यात्राएं भी धनकाली जाती हैं | सेिा लेने िाले से भी
                     ु                                                                                       प्रस्तुत कर सकते हैं|
सेिाकरने िाले का ऄधधक भला होता है | हम धशक्षक भी पाठ् यक्रम के अध्यात्मीकरण की सेिा तत्परता से करके                   -दीछपका कुमारी,
के िल ऄपने धिद्याधथि यों को ही ईन्नत नहीं करते, बधल्क ऄपनी समझ और भाग्य और उचा बना सकते हैं |
                                                                             ं                                      ऄहमदाबाद गरुकुल
                                                                                                                                  ु
                                                                  ज्ञान जपपासा
धपछले ऄंक में प्रश्न था ‚हम छजतना छजतना ________ करते हैं उतना ही जीवन में उन्द्नत होते जाते हैं ?” ऄहमदाबाद गरुकुल के कइ धशक्षकों
                                                                                                                      ु
को साधोिाद है धक ईन्होंने व्याख्या सधहत बड़े सन्दर ईिर भेजे हैं | ईनके ईिर हैं सत्कमि , भगिदधचंतन, सत्संग श्रिण अधद | आसका ईिर गरुदेि
                                                   ु                                                                                  ु
के सत्संग के अधार पर आस प्रकार है : ‚हम धजतना धजतना आत्म-छवश्रािंछत करते हैं ईतना ही जीिन में ईन्नत होते जाते हैं |‛ और यह सत्कमि ,
सत्संग श्रिण, साधना अधद का ही फल है धक हम सद-गरु द्वारा प्रदान धकये गए आस अत्म-धचंतन में धिश्रांधत पाने लगते हैं धक ‘मैं बीमार-स्िस्थ
                                                         ् ु
रहनेिाला शरीर नहीं, दखी-सखी होनेिाला मन नहीं, ऄच्छे -बरे धनणि य लेनेिाली बधु ि नहीं, मैं के िल एक शरीर में ही नहीं, सिि रूपों में ऄजर-ऄमर
                          ु        ु                            ु
अत्मा ह’ाँ ‛ | सत्संग के आन िचनों पर मनन-धचंतन करने से और गरुअज्ञा के पालन से बड़ी सहजता से हम अत्म धिश्रांधत का रस ले सकते हैं और
                                                                   ु
ईन्नत हो सकते हैं |
आस बार का प्रश्न है: कु बच्चे तो छनभभय होते हैं और कु डर के कारण बोल नहीं पाते, उनमें छनभभयता कै से आये? ऄपना ईिर व्याख्या सधहत
इ-मेल या पत्र द्वारा हमें भेजें | प्रश्न का ईिर ऄगले ऄंक में धदया जायेगा | सही ईिर देने िालों का नाम भी छापा जायेगा |

 आपकी किम से : आस पधत्रका को साथि क बनाने हेतु सभी गरुकुल धशक्षकों से ईनके ऄनभि, पाठ् यक्रम के अध्यात्मीकरण और ईपयोगीकरण के
                                                    ु                        ु
 ईदाहरण, गरुकुलों के धक्रयाकलापों पर लेख अधद अमंधत्रत हैं | यह सब अप हमें धनम्नधलधखत पते पर डाक ऄथिा E-mail/Fax से भेज सकते हैं |
          ु
                  गरुकुल के न्द्रीय प्रबिंधन सछमछत, सिंत श्री आशारामजी आश्रम, साबरमती, अहमदाबाद-380005.
                   ु
                         E-mail: gurukul@ashram.org, Ph: 079-39877787, 88. Fax: 079-27505012.

Antarnaad march 2012_final

  • 1.
    ॐ श्री सद्ुकरुप मात्मनतनन नत अविाण मदवस मवशनष्ंक v a r j -u k n “गरुकल क शिक्षकों का अपना माशिक िमाचार पत्र” ु ु े न प्रक्शक : ुकरु पकल कन्द्रीय प्रबंधन समतमि, संि श्री आश्ा्तजी आश्रत, स्बातिी, अहतद्ब्द-380005. क वषष : १ अंक: ९ त्र्ष २०१२  समाचार  फरवरी २०१२ छ िंदवाडा गुरुकुल के 400 से भी ऄधधक धिद्याधथि यों ने होली के शभ ऄिसर पर ु फरवरी २०१२ नागपर में पूज्य बापूजी के करकमलों द्वारा बरसाए गए पलाश के फूलों के रंग से ु ऄपना तन तो रंगिाया ही, साथ ही सत्संग और प्यारे गरुदेि के साधनध्य से ऄपना ु ह्रदय भी रंगिा धलया | गरुदेि ने बोडि की परीक्षा िाले धिद्याधथि यों को अशीिाि द देते ु हुए कहा धक धनधचंत हो कर पढ़ना, सब मंगल ही होगा | साथ ही गरुदेि ने याद ु धदलाया धक डाक्टर बनना हो या देश की सेिा करना हो, पहले इश्वर को पा लो धछलया गुरुकुल के नौधनहालों को १४ फरिरी को ु ऄन्यथा बड़े बड़े लोग भी भ्रष्टाचार और ऄहंकार के पोषण में फं स कर रह जाते हैं | मातृ- छपतृ पूजन छदवस के पािन ऄिसर पर अमलनेर अहमदाबाद गुरुकुल के कुछ धिद्याधथि यों को गधणत-धिज्ञानं प्रदशि नी तथा गजरात ु में पूज्य गरुदेि के साधनध्य और अशीिाि द का दलिभ ु ु खेल कुम्भ में राज्य स्तर पर कइ परस्कार प्राप्त हुए हैं | ऄधधक जानकारी के धलए ु लाभ धमला | गरुकुल के धिद्याधथि यों ने गरुदेि के समक्ष ु ु देधखये ऊधष प्रसाद माचि २०१२ पष्ठ २८ – बापू के बच्चे, पक्के और अच् े | ृ सन्दर सांस्कृधतक कायि क्रम भी प्रस्तुत धकया | ु पज्य बापूिी का ७२ वााँ अवतरण जिवस – ११ अप्रैि, २०१२ ू भगिान और भगिदस्िरूप ब्रह्मज्ञानी संतों का जन्म करुणा-परिश होकर होता है आसधलए ईनका जन्म छदव्य है, अवतरण है | हमारे कष्ट ् धमटाने के धलए ईनका जो भी ऄितार हो: प्रेमाितार, ज्ञानाितार या मयाि दाितार- िे हमारी तरह हाँसते-रोते हैं, खाते-धखलाते हैं, सब करते हुए भी सम रहते हैं - के िल हमको ईन्नत करने के धलए | ईन्नत करने के धलए जो जन्म होता है, िह अवतार है | पूज्य बापूजी के सरल ि धनराले जीिन-लीला से हमें प्रेरणा धमलती है धक बाल्यकाल से ही यधद भधि, परदखकातरता, सद-भाि, साहस, धैयि, ु ् तत्परता, सेिाभाि जैसे दैिी गणों के संस्कार धिद्याधथि यों को धमल जाएाँ तो िे धकतने महान हो सकते हैं | बापूजी की माताजी सत्संग में जो ु ऄच्छी बातें और प्रेरक प्रसंग सनती, िे बालक असमल को ऄिश्य सनाती | हम भी तो गरुकुल में ऄपने धिद्याधथि यों के मात-धपतृ जैसे ही हैं, ु ु ु ु ृ तो हम भी आस धदव्य-सेिा को प्रयत्नपूििक और बढ़ाएं | सत्संग सने और परस्पर सनाएाँ | सात से चौदह िषि की अयु में धिद्याधथि यों का ु ु स्िाधधष्ठान कें द्र धिकधसत होता है | आस दौरान धिद्याधथि यों में जैसी भािना भर देंगें, िे िैसा करने में सफल हो जायेंगें | १२-१३ िषि की अयु में रणजीत धसंह के धपता ने ईसमे िीरता के संस्कार भर धदए तो िह ऄफगाधनस्तान से कोधहनूर हीरा लाने में सफल हो गया | धशक्षक धिद्याधथि यों में हीन भािना न अने दें, ईनकी योग्यता और सद-गण बताकर ईनका ईत्साह बढ़ायें | ईनमें महान धिचार भरें धक िे तो सखी-दखी होने िाले ् ु ु ु मन नहीं, धनणि य करने िाली बधु ि नहीं, िे तो शि-बि-चैतन्य ऄजर-ऄमर अत्मा हैं | कधमयां तो मन में हैं और बापूजी द्वारा सत्संग में बताइ ु ु गइ यधु ियों के अश्रय से हम ऄिश्य आन कधमयों को खदेड़ सकते हैं | हमारे धलए सब कुछ संभि है | बापजी के बच्चे, नहीं रहते कच्चे!! ू िीवन िीते जकस जिए हैं? स्वास््य कजियााँ ुं पढ़ते हैं- कमाने के धलए, कमाते हैं- खाने के धलए, खाते हैं- जीने के धलए, जीते धकस धलए हैं? बवासीर का इलाज- रोज १० ग्राम मक्खन धकसी को सही पता नहीं है| रधििार की छुट्टी होती है तो सब खुश होते हैं क्योंधक सब मधु ि चाहते के साथ १० ग्राम काले धतल चबा के खाएं – ऄधधक जानकारी के धलए देखें फरिरी महीने हैं, बंधन धकसी को स्िीकार नहीं| िास्ति में हम जीते हैं दखों से मि होने के धलए, परन्तु यह ु ु का ‘ऊधष दशि न’| मधु ि कै से हो, आसका अज तक हमें पता नहीं | यह पता पूज्य बापूजी बता रहें हैं | हम जैसे हैं, फ़ूड पोइज़छनिंग व सािंप काटने पर मंत्र जपें धजस ऄिस्था में है, हम दखों से मि हो सरलता से गरुकृपा से परम सख पा सकते हैं | मधु ि ु ु ु ु ‘नगर नगर...’| गर का ऄथि धिष है, आसधलए यधु ि से होती है और यह सरल यधु ियााँ गरुदेि हमें सत्संग में सहजता से बता रहें हैं | ु नगर जपने से धिष का ऄसर न हो जाता है|
  • 2.
    जिक्षा और िीक्षा एक होती है धशक्षा और दसरी होती है दीक्षा | धशक्षा से आस जगत का ज्ञान होता है, िस्तुओ ं का ईपयोग करने की कला अती है | परन्तु धशक्षा के ू साथ-साथ िैधदक दीक्षा न हो तो मनष्य ऐसी िस्तओ ं के पीछे ही पड़ जाता है | मानि दानि जैसा जीिन धबताने लगता है | धशक्षा मनष्य को ु ु ु धशधक्षत बनाती है | धशधक्षत मनष्य धजतनी कुशलता से सेिा कर सकता है ईतना शायद ऄधशधक्षत कभी नहीं कर सकता | लेधकन साथ ही ु ऄधशधक्षत व्यधि कभी आतना सत्यानाश नहीं कर सकता धजतना धशधक्षत व्यधि कर सकता है| समग्र मानिजाधत को धिनाश के गति में धके लनेिाले जो एटम बम बने हैं ऄथिा बम धड़ाके करके हजारों धनदोषों को मार डाला और करोड़ों की संपधि का धिनाश कर धदया, िह धशधक्षत व्यधियों द्वारा बनाये गये बम से ही ना | ऄतः धशधक्षत मनष्य के जीिन में दीक्षा ऄत्यंत जरुरी है | मनष्य की गहराइ में बसे हुए माधलक की धदशा ु ु देनिाला िेदांती ज्ञान ‚परस्पर देिो भि:’’ की सन्दर भािना एिं मानि-मानि में स्नेह हो तो संसार की िस्तओ ं पर धिजय प्राप्त की जा सकती है | े ु ु दीक्षा रधहत धशक्षा सख-शांधत और तनाि रधहत जीिन कभी नहीं दे सकती, मधु ि नहीं दे सकती, आधन्द्रय –संयम नहीं दे सकती, सदाचार संयि ु ु स्नेह नहीं दे सकती | ऄतः व्यधि, समाज, देश या धिश्ि को ‚अत्मनः प्रधतकूलाधन परेषां न समाचरेत...’ ऄपने प्रधतकूल हो ऐसा व्यिहार दूसरों के साथ नहीं करना चाधहए | ‚परस्पर देिो भि:’’ की धदशा देनेिाली दीक्षा की मनष्य को ऄत्यंत जरूरत है | संयम, सदाचार, सहानभूधत अधद ु ु दैिी गणों का धिकास हो ऐसी दीक्षा की जरूरत है | बाहर की धशक्षा पाओ, धकन्तु ईस धशक्षा को िैधदक दीक्षा की लगाम देना जरुरी है | ु अवतरण जिवस- सेवा जिवस का आध्यात्मीकरण ‚पॉवर पॉइिंट‛ का पंचभौधतक शरीर एिं भौधतक िस्तुओ ं का अध्यात्मीकरण कै से धकया जाता है, आसका सन्दर ईदाहरण प्रस्तुत ु आध्य्मनतीकाण करता है पूज्य बापूजी का - ऄितरण धदिस | सामान्य लोग तो जन्मधदिस पर पाटी देकर स्ियं ि दूसरों को किं प्यूटर कक्षा ९ : ऍम एस खानपान और नाच-गान में ईलझाते हैं | बापूजी की प्रेरणा से बापूजी के साधक ऄितरण- धदिस पर धिधभन्न पॉिर पॉआंट के ऄंतगि त हम सेिाओं की धिशेष श्रंखलाएं शरू करते हुए यह धदन मनाते हैं | बापूजी कहते हैं धक सेिा करके हम धकसी पर ृ ु धिधभन्न स्लाआडों में धचत्र, टेक्स्ट ि् ग्राधफक्स का ईपकार नहीं कर रहे हैं, सेिा के माध्यम से हम ‘वासुदेवः सवं इछत’ और ‘तुझमें राम, मझमें राम, सबमें राम ु ईपयोग करके सन्दर ु समाया है, कर लो जगत में प्यार सभी से, कोई नहीं पराया है...’ –जैसे सूत्रों को ऄपने व्यिहार में लाने का प्रोजेक्शन (प्रस्तुधत) करते हैं| ऄभ्यास कर रहें हैं | पूज्य गरुदेि तो सेिा जैसे पण्यदायी कमि का भी हमारे धलए अध्यात्मीकरण कर देते हैं ! ु ु यह जीिन भी इश्वर द्वारा धदया ऄितरण धदिस पर सभी के जीिन में ज्ञान का ईजाला करने के धलए धिद्याओं में सिि श्रेष्ठ अत्मधिद्या से गया ब्लैंक (Blank)प्रोजेक्शन भरपूर बापूजी के (िीधडयो) सत्संग अयोधजत धकये जाते हैं | दररद्र-नारायणो में भोजन-प्रसाद, कपडे, ऄन्न, है, धजसमे हम बचपन, कम्बल, फल, धमठाइ, औषधध, जूते-चप्पल, टोपी अधद का धितरण देश धिदेश में धकया जाता है | धिद्याधथि यों में धकशोरािस्था, यिािस्था, ु नोटबक, पेन, पेधन्सल, सत्साधहत्य अधद का, बीमारों में औषधध, फल अधद का धितरण धकया जाता है | बढ़ापा अधद स्लाआडों में सेिा, ु ु ज्ञान, भधि और प्रेम के रंग िक्षारोपण, व्यसन-मधु ि ऄधभयान अधद कइ सेिाएं समाज रूपी देि के धलए धकये जाते हैं | संसार की अपा-धापी ृ भरकर सन्दर प्रोजेक्शन ु के िातािरण में माधयि ि सद्-भाि के संचार हेतु कीति न यात्राएं भी धनकाली जाती हैं | सेिा लेने िाले से भी ु प्रस्तुत कर सकते हैं| सेिाकरने िाले का ऄधधक भला होता है | हम धशक्षक भी पाठ् यक्रम के अध्यात्मीकरण की सेिा तत्परता से करके -दीछपका कुमारी, के िल ऄपने धिद्याधथि यों को ही ईन्नत नहीं करते, बधल्क ऄपनी समझ और भाग्य और उचा बना सकते हैं | ं ऄहमदाबाद गरुकुल ु ज्ञान जपपासा धपछले ऄंक में प्रश्न था ‚हम छजतना छजतना ________ करते हैं उतना ही जीवन में उन्द्नत होते जाते हैं ?” ऄहमदाबाद गरुकुल के कइ धशक्षकों ु को साधोिाद है धक ईन्होंने व्याख्या सधहत बड़े सन्दर ईिर भेजे हैं | ईनके ईिर हैं सत्कमि , भगिदधचंतन, सत्संग श्रिण अधद | आसका ईिर गरुदेि ु ु के सत्संग के अधार पर आस प्रकार है : ‚हम धजतना धजतना आत्म-छवश्रािंछत करते हैं ईतना ही जीिन में ईन्नत होते जाते हैं |‛ और यह सत्कमि , सत्संग श्रिण, साधना अधद का ही फल है धक हम सद-गरु द्वारा प्रदान धकये गए आस अत्म-धचंतन में धिश्रांधत पाने लगते हैं धक ‘मैं बीमार-स्िस्थ ् ु रहनेिाला शरीर नहीं, दखी-सखी होनेिाला मन नहीं, ऄच्छे -बरे धनणि य लेनेिाली बधु ि नहीं, मैं के िल एक शरीर में ही नहीं, सिि रूपों में ऄजर-ऄमर ु ु ु अत्मा ह’ाँ ‛ | सत्संग के आन िचनों पर मनन-धचंतन करने से और गरुअज्ञा के पालन से बड़ी सहजता से हम अत्म धिश्रांधत का रस ले सकते हैं और ु ईन्नत हो सकते हैं | आस बार का प्रश्न है: कु बच्चे तो छनभभय होते हैं और कु डर के कारण बोल नहीं पाते, उनमें छनभभयता कै से आये? ऄपना ईिर व्याख्या सधहत इ-मेल या पत्र द्वारा हमें भेजें | प्रश्न का ईिर ऄगले ऄंक में धदया जायेगा | सही ईिर देने िालों का नाम भी छापा जायेगा | आपकी किम से : आस पधत्रका को साथि क बनाने हेतु सभी गरुकुल धशक्षकों से ईनके ऄनभि, पाठ् यक्रम के अध्यात्मीकरण और ईपयोगीकरण के ु ु ईदाहरण, गरुकुलों के धक्रयाकलापों पर लेख अधद अमंधत्रत हैं | यह सब अप हमें धनम्नधलधखत पते पर डाक ऄथिा E-mail/Fax से भेज सकते हैं | ु गरुकुल के न्द्रीय प्रबिंधन सछमछत, सिंत श्री आशारामजी आश्रम, साबरमती, अहमदाबाद-380005. ु E-mail: gurukul@ashram.org, Ph: 079-39877787, 88. Fax: 079-27505012.