Shri krishnadarshan

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Shri krishnadarshan

  1. 1. प्रात् स्भयणीम ऩूज्मऩाद सॊत श्री आसायाभजी फाऩू के सत्सॊग-प्रवचन श्रीकृष्ण दर्शन ननवेदन जजतना भनुष्म जन्भ दरब है उससे बी ज्मादा भनुष्मता दरब है औय उससे बी ज्मादा ु श ु श भानुषी र्यीय से, भन से, फुद्धि से ऩाय ऩयभात्भदे व का साऺात्काय दरब है । श्रीकृष्ण क अवताय ु श े से मह ऩयभ दरब कामश सहज सुरब हो ऩामा। याजसी वातावयण भें , मुि क भैदान भें ु श े ककॊकर्त्शव्मभूढ़ अवस्था भें ऩडा अजन आत्भऻान ऩाकय – 'नद्शो भोह् स्भनतरशब्धा' – अऩने आत्भ- ुश ृ वैबव को ऩाकय साये कभशफन्धनों से छट गमा। जीते जी भुक्ति का ऐसा दरब अनुबव कय ऩामा। ू ु श श्रीकृष्ण को अगय भानुषी दृद्धद्श से दे खा जामे तो वे आदर्श ऩुरूष थे। उनका उद्देश्म था भनुष्मत्व का आदर्श उऩजस्थत कयना। भनुष्म व्मावहारयक भोह-भभता से ग्रस्त न होकय, धभाशनुद्षान कयता हुआ दरब ऐसे ु श आत्भफोध को ऩा रे, इस हे तु भनुष्म भें र्ौमश, वीमश, प्राणफर की आवश्मकता है । इस छोटे से ग्रॊथ भें सॊग्रहहत प्रात् स्भयणीम ऩूज्मऩाद सॊत श्री आसायाभजी फाऩू क अनुबवससि प्रमोग औय े उऩदे र्ों से हभायी प्राणर्क्ति, जीवनर्क्ति, भन्र्क्ति औय फुद्धि का द्धवकास कयक हभ इहरोक औय े ऩयरोक भें ऊचे सर्खयों को सय कय सकते हैं। औय तीव्र द्धववेक-वैयाग्मसम्ऩन्न जजऻासु रोकातीत, ॉ दे र्ातीत, कारातीत अऩना आत्भ-साऺात्काय का दरब अनुबव ऩाने भें अग्रसय हो सकता है । ु श आज हभ सफ बी यजो-तभोगुणी वातावयण भें ऩनऩे हैं औय घसीटे जा यहे हैं। बीतय द्धवकायों-आकाॊऺाओॊ का मुि भचा है । इस सभम श्रीकृष्ण की रीरा, चरयत्र, ऻानोऩदे र्, प्राणोऩासना, जीवनमोग औय द्धवसबन्न प्रसॊगों ऩय अनुबव-प्रकार् डारते हुए प्रात्स्भयणीम ऩूज्मऩाद सॊत श्री आसायाभजी फाऩू ने आज क भानव की आवश्मकता अनुसाय ऩथ-प्रदर्शन ककमा े है । सॊतों क वचनों को सरद्धऩफि कयक सऻ ऩाठकों क कयकभरों भें अद्धऩशत कयते हैं। े े ु े श्री मोग वेदान्त ससभनत अभदावाद आश्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
  2. 2. अनुक्रभ ननवेदन............................................................................................................................................... 2 श्रीकृष्ण-दर्शन ...................................................................................................................................... 3 अवताय ............................................................................................................................................... 9 श्रीकृष्ण औय रूजमभणी ....................................................................................................................... 15 हययामदासजी भहायाज औय फादर्ाह ..................................................................................................... 30 जीवनमोग......................................................................................................................................... 33 वेदभासर ब्राह्मण की आत्भोऩरजब्ध........................................................................................................ 53 अदबत प्राणोऩासना............................................................................................................................ 63 ु अनठी भहहभा...... सत्सॊग की औय सदगरू की ...................................................................................... 75 ू ु ऩूणाशवताय श्रीकृष्ण.............................................................................................................................. 77 ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ श्रीकृष्ण-दर्शन बगवान श्रीकृष्ण ने जेर भें प्रकट होना ऩसॊद ककमा। योहहणी नऺत्र, श्रावण क कृष्णऩऺ े की अद्शभी, अन्धकायभम यात्रत्र औय वह बी भध्मयात्रत्र। जो ननत्म, भुि, प्रकार्भम है वह अन्धकाय की यात्रत्र ऩसॊद कय रेता है । जो घट-घटवासी है वह कायावास को ऩसॊद कय रेता है । जो ननत्म है , ननयॊ जन है , अगभ है , अगोचय है वह साकाय नन्हा-भुन्ना रूऩ स्वीकाय कय रेता है । बगवान की मह गरयभा है , भहहभा है कक वे फन्धन भें ऩडे हुए को भुि कय दें , त्रफछडे हुए ु को सभरा दें , अऻानी को ऻान दे दें । र्ोकातुयों का र्ोक ननवर्त् कयने क सरए फॉसी फजानी ऩडे ृ े मा फछडे की ऩॉूछ ऩकडनी ऩडे कपय बी उनको कोई फाधा नहीॊ आती। बगवान को कोई बी काभ छोटा नहीॊ रगता। जजसे कोई सेवाकामश छोटा न रगे वही तो वास्तव भें फडा है । श्रीकृष्ण क जीवन भें ऐसे-ऐसे उताय औय चढ़ाव आते हैं कक जजनको सभझने से हभाये नय े जीवन भें नायामण का प्रकार् हो जाम। श्रीकृष्ण जफ कयीफ 70 सार क थे तफ घोय आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ भें गमे। तेयह वषश े े उन्होंने एकान्त भें उऩननषदों का अभ्मास ककमा। छान्दोग्म उऩननषद (3.17.6) भें मह कथा आती है । श्रीकृष्ण क जीवन भें ऻान बी अव्वर नॊफय का था। मुि क भैदान भें उन्होंने बगवद् े े ऻान फयसामा है । उनक जीवन भें उताय-चढ़ाव बी कसे आमे ! े ै बगवान क जीवन का एक दृश्म औय दे खो। कारमवन की सायी सॊऩद्धर्त् हागथमों, े फैरगाक्तडमों, बैंसों, घोडों औय गधों ऩय रादकय मदवॊर्ी द्रायका जा यहे थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कक ु
  3. 3. मह सॊऩद्धर्त् हभाये घय भें जामेगी तो कछ न कछ हानन ऩहुॉचाएगी। हभाये कर क रोगों की सॊऩद्धर्त् ु ु ु े फढ़े गी तो उनभें द्धवराससता आ जामेगी। ऩरयश्रभ कयक सॊऩद्धर्त्, धन-दौरत सभरे तो ठीक, अगय े ऐसे ही सभर जाम तो जीवन को द्धवरासी फना दे ती है , खोखरा कय दे ती है । इससरए श्रीकृष्ण ने जयासॊघ को छे ड हदमा तो उसने मदवॊसर्मों ऩय आक्रभण कय हदमा। ु उनकी सायी सॊऩद्धर्त् छीन री। श्रीकृष्ण औय फरयाभ जयासन्ध का साभना कयना उगचत न सभझकय बाग ननकरे। हभाये ऩयभ प्रेभास्ऩद बगवान नॊगे ऩैय, नॊगे ससय बाग यहे हैं। साथ भें कवर एक धोती। े भाॉगकय खाते हैं, धयती ऩय सोते हैं, साधओॊ क आश्रभों भें यहते हैं, सत्सॊग कयते हैं। मह बी एक ु े झाॉकी है श्रीकृष्ण क जीवन की। े गगयनाय क ऩवशतों भें यहते थे, वहाॉ आग रगी तो वहाॉ से बी बागे औय सभद्र भें द्रायका े ु फसामी। उस नगयी ऩय बी र्ाल्व ने वाममान से आक्रभण ककमा। उनक ससय क घय भें डाका ु े ु े ऩडा, वे भाये गमे। उनक वहाॉ से स्मभॊतक भणण की चोयी हो गमी। स्वमॊ श्रीकृष्ण क ऊऩय भणण े े चयाने का आयोऩ रगामा गमा। फडे बाई फरयाभजी बी उन्हीॊ क ऊऩय र्ॊका की। बागवत भें स्वमॊ ु े श्रीकृष्ण कहते हैं- ककन्तु भाभग्रज् सम्मङ् न प्रत्मेनत भणणॊ प्रनत। 'फरयाभ जी भणण क फाये भें भेया द्धवद्वास नहीॊ कयते।' े जीवन भें ऐसे-ऐसे द्धवयोधी प्रसॊग आने ऩय बी श्रीकृष्ण क गचर्त् भें ऺोब नहीॊ हुआ। े श्रीकृष्ण सदा साध-सॊतों का सॊग कयते थे। घोय आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ भें वषों तक ु े उऩननषद का अध्ममन ककमा औय एकान्त-द्धवयिता भें यहे । दवाशसा जैसे ऋद्धष का आनतथ्म खफ ु ू प्रेभ से ककमा। जफकक श्रीकृष्ण क कर भें उत्ऩन्न हुए मदवॊर्ी साध-सॊतों की भजाक उडाते थे। े ु ु ु जाम्फवतीनन्दन साम्फ को स्त्री का वेर् ऩहनाकय कपय ऋद्धष से जाकय ऩूछते हैं कक, "भहायाज ! मह सुॊदयी गबशवती है । उसे फेटा होगा कक फेटी होगी ?" ऋद्धष ने कहा् "तुभ सॊतों की भजाक उडाते हो तो जाओ, न फेटा होगा न फेटा होगी। ऩेट ऩय जो भूसर फाॉधा है उसी से तुम्हाया सत्मानार् होगा।" ....तो श्रीकृष्ण साध-सॊतों का आदय कयते थे जफकक उनक कटुम्फीजन साध-सॊतों ू े ु ू की भजाक उडाते थे। श्रीकृष्ण तो सॊमभी होकय ब्रह्मानन्द भें यभण कयते थे औय उनक कर क रोग े ु े र्याफ ऩीते थे। श्रीकृष्ण क जीवन क चढ़ाव-उताय सभाज को मह फताते हैं कक तुम्हाया जन्भ अगय े े हथकक्तडमोंवारे भाॉ फाऩ क घय हो गमा हो तबी बी तुभ अऩने को दीन हीन भत भानना। े हे जीव ! तेया जन्भ अगय कायावास भें हो गमा हो तबी बी तू गचन्ता भत कय। अऩने आन्तरयक हदव्मत्व को जगा। उन्नत कामश कय। सत्सॊग कय। सभागध रगा। धभश, नीनत औय आत्भऻान क अनकर आचयण कय। अऩने छऩे हुए बगवदबाव को प्रकट कय ममोंकक तू भेया े ु ू ु
  4. 4. स्वरूऩ है । तेये कटुम्फी तेये द्धवयोधी हों कपय बी तू घफडाना नहीॊ। कबी भाभा से बानजे की ु अनफन हो जाम औय दोनों का मुि हो जाम, भाभा चर फसे तबी बी गचन्ता, दीनता, हीनता भहसूस नहीॊ कयना। तेये ऩरयवाय वारे तेये कहने भें न चरें तबी बी तू ननयार् नहीॊ होना। जयासॊध जैसा याजा तुझसे मुि कये तो तू वीय होकय उसका भुकाफरा कयना। सत्रह-सत्रह फाय श्रीकृष्ण ने जयासॊध को बगामा। अठायहवीॊ फाय श्रीकृष्ण स्वमॊ जानफूझकय बागे। उनक बागे भें े बी राब था। अऩने कटुम्फीजनों को सफक ससखाना था। ु श्रीकृष्ण क जीवन भें कबी हतार्ा नहीॊ आमी, कबी ननयार्ा नहीॊ आमी, कबी ऩरामनवाद े नहीॊ आमा, कबी उद्रे ग नहीॊ आमा, कबी गचन्ता नहीॊ आमी, कबी बम नहीॊ आमा, कबी र्ोक नहीॊ आमा, कबी द्धवषाद नहीॊ आमा औय कबी ऺुद्र अहॊ काय नहीॊ आमा कक मह दे ह भैं हूॉ। अजन्तभ सभम भें श्रीकृष्ण क कटुजम्फमों की भनत ऋद्धष क र्ाऩ से द्धवऩयीत हो गई औय े ु े आऩस भें रड भये । श्रीकृष्ण का बी अऩभान कय हदमा, कछ का कछ सना हदमा, कपय बी ु ु ु श्रीकृष्ण क गचर्त् भें ऺोब नहीॊ हुआ। े उनका भत्मु बी कसा ? उनका दे हद्धवरम सभागध कयते हुए मा ऩरॊग ऩय आयाभ कयते- ृ ै कयते प्राण छोडे मा तुरसीदर भॉुह भें डारकय प्राण छोडे ऐसा नहीॊ हुआ। एक फहे सरमे ने फाण भाया। आणखयी घक्तडमाॉ हैं तफ बी उनक गचर्त् की सभता नहीॊ जाती। फाण भायने वारे को बी े ऺभा कयते हुए फोरते हैं- "तू गचन्ता भत कयना। ऐसा ही होने वारा था। ननमनत भें जो होना ननजद्ळत हुआ था वही हुआ।" श्रीकृष्ण ने इजन्द्रमों को भन भें रगा हदमा, भन को फुद्धि भें औय फुद्धि को अऩने र्ुि-फुि गचदघन चैतन्म आत्भा क गचन्तन भें रगाकय करेवय त्माग हदमा। े श्रीकृष्ण का जो प्रागटम है वह नय को अऩने नायामण स्वबाव भें जगाने का प्रागटम है । जन्भाद्शभी एक ऐसा उत्सव है कक ककतना बी हाया थका जीव हो, उसे अऩने बीतय क यस, प्रेभ े को प्रकटाने की प्रेयणा सभर जाम। हॉ सते-खेरते, प्रेभ को छरकाते, फाॉटते-फयसाते, अहॊ कारयमों को औय र्ोषकों को सफक ससखाते, थक-भाॊदे-असहामों को सहाया दे ते, ननफशरों भें फर पकते, सभाज े ॉू भें आध्माजत्भक क्राॊनत कयते हुए, नय को अऩने नायामण स्वरूऩ भें ऩहुॉचाने का अदबुत सपर प्रमास श्रीकृष्ण-रीरा से हुआ। मह कृष्ण-अवतयण योहहणी नऺत्र भें हुआ। भध्मयात्रत्र क घोय अन्धकाय भें बी बगवान ने े प्रकार् कय हदमा। जो कद से फाहय आ जामें वे बगवान हैं। हभ बी तो कद भें फैठे हैं , जैसे ै ै वसुदेव-दे वकी कस की जेर भें फन्द थे। हभाया बी जीवरूऩी वसुदेव औय फद्धिरूऩी दे वकी ॊ ु दे हासबभान क कायावास भें ऩडे हैं। हभ हाड-भाॊस क र्यीय भें फन्द हैं। इस कद से हभ फाहय आ े े ै जामें। इस दे ह को 'भैं' भानने की गरती से फाहय आ जामें। इस दे ह की उऩरजब्धमाॉ दे ह के द्धवमोग वास्तव भें हभाये आत्भा ऩय कोई प्रबाव नहीॊ डारते हैं। इस फात का ऻान हो जाम तो
  5. 5. जोगी का जोग, तऩी का तऩ, जऩी का जऩ औय सदगहस्थ का सदाचायमुि जीवन सपर हो ृ जाता है । भनुष्म अगय तत्ऩय हो जाम तो द्ख खोजने ऩय ु बी नहीॊ सभरेगा। सत्म को सभझने के सरए, अऩने को खोजने क सरए अगय वह तत्ऩय हो जाम तो द्ख खोजने ऩय नहीॊ सभरेगा। हभ े ु अऩनी अससरमत को खोजने भें तत्ऩय नहीॊ हैं अत् सुखी होने क सरए खफ मत्न कयते हैं। सुफह े ू से र्ाभ तक औय जीवन से भौत तक प्राणीभात्र मह कयता है ् द्ख को हटाना औय सुख को ु थाभना। धन कभाते हैं तो बी सख क सरमे, धन खचश कयते हैं तो बी सख क सरमे। र्ादी कयते ु े ु े हैं तो बी सख क सरए औय ऩत्नी को भामक बेजते हैं तो बी सख क सरमे। ऩत्नी क सरमे हीया- ु े े ु े े जवाहयात रे आते हैं तो बी सख क सरमे औय तराक बी दे ते हैं तो बी सख क सरमे। प्राणीभात्र ु े ु े जो कछ चेद्शा कयता है वह सख क सरए ही कयता है । सख को थाभना औय द्ख को हटाना। ु ु े ु ु कपय बी दे खा जामे तो आदभी द्खी ही द्खी है ममोंकक जहाॉ सख है वहाॉ उसने खोज नहीॊ की। ु ु ु जहाॉ द्ख का प्रवेर् नहीॊ उस आत्भा भें जीव जाता नहीॊ। बगवान हभाये ऩयभ सुरृद हैं। उन ऩयभ ु सुरृद क उऩदे र् को सुनकय अगय जीव बीतय अऩने स्वरूऩ भें जाम तो सुख औय द्ख की चोटों े ु से ऩये ऩयभानन्द का अनुबव हो जाम। श्रीकृष्ण सॊगधदत होकय गमे। मुि टारने की कोसर्र् की, मुि टरा नहीॊ। सॊगध न हो ऩामी ू कपय बी बीष्भ का सत्काय ककमा, भान हदमा। 'भैं सॊगध कयने गमा.... भेयी फात मे रोग नहीॊ भानते....' ऐसा सभझकय उनको चोट नहीॊ रगी। चोट हभेर्ा अहॊ काय को रगती है , आत्भा को नहीॊ रगती। द्ख हभेर्ा अहॊ काय को होता है , भन को होता है , आत्भा को नहीॊ होता। साधायण ु जीव भन भें जीते हैं औय उन साधायण जीवों को अऩने सर्वत्व का ऻान कयाने क सरए बगवान े को जो आद्धवबाशव हुआ उसे फोरते हैं कृष्णावताय। भैंने सुनी है एक कहानी। एक फाय अॊगूय औय कये रों की भुराकात हुई। अॊगूयों ने कहा् "हभ ककतने भीठे -भधय औयु स्वाहदद्श हैं। हभको दे खकय रोगों क भॉुह भें ऩानी आ जाता है । तभ तो कडुवे कडुवे कये रे।" े ु कये रों ने कहा् "फस फस, चऩ फैठो। तुभको दे खकय रोगों क भन की रोरुऩता फढ़ ु े जाती है । तुम्हाया स्वाद रेते हैं, भजा रेते हैं तो उनको सूइमाॉ (इन्जैमर्न) चबानी ऩडती हैं। ु रोग फीभाय होते हैं, भधप्रभेह (डामत्रफटीज़) हो जाता है । हभ जफ रोगों की जजह्वा ऩय जाते हैं तो ु कडुवे जरूय रगते हैं, ककन्तु रोगों भें स्पनतश रे आते हैं, डामत्रफटीज़ को भाय बगाते हैं औय ू तन्दरूस्ती का दान कयते हैं। रगते कडुवे हैं ऩय काभ फहढ़मा कयते हैं।'' ु कबी-कबी कोई प्रसॊग, कोई द्ख आ जाता है तो रगता कडुवा है ऩय वह द्ख बी ु ु सत्सॊग भें बेज दे ता है । सॊसाय की सभस्माएॉ बी हरय क चयणों तक ऩहुॉचा दे ती हैं। द्ख आमे े ु तफ सभझ रेना कक वह कये रे का काभ कयता है ।
  6. 6. हभ भीठी-भीठी कथाएॉ सुने, भीठे -भीठे चटकरे सुनें, अच्छा-अच्छा रगे वह सुनें, दे खें, ु ु खामे, द्धऩमें – मह तो सफ ठीक रेककन कबी-कबी ब्रह्मऻान की सूक्ष्भ फात बी सुनना चाहहए। सभझ भें न आमे तफ बी सुनना चाहहए। अच्छा न रगे तफ बी स्वास्थ्म-सुयऺा क सरए े भधप्रभेहवारों को कये रे का यस ऩीना ऩडता है । ऐसे ही जन्भ भयण की डामत्रफटीज़ रगी है तो ु साधन-बजनरूऩी कये रों का यस अच्छा न रगे तफ बी आदय से ऩीना चाहहए। जफ व्मास जी फोरते हैं, नायदजी फोरते हैं, बगवान फोरते हैं, र्ास्त्र फोरते हैं वह सफ भीठा भीठा ही रगे मह जरूयी नहीॊ है । फद्धि की सक्ष्भता कसी होगी ? विा जजतना ऊचा है , ु ू ै ॉ भहान ् है , उन्नत है औय श्रोता बी फहढ़मा मोग्मता वारा है तो उन दोनों क फीच का सॊवाद हभ े रोगों क सरए उन्ननत कयने वारा है । चक्रभ की कथाएॉ, नावेर औय साधायण ककस्से-कहाननमाॉ- े कथाएॉ ऩढ़ें -सनें तो वे अच्छे तो रगते हैं भगय फद्धि को स्थर फना दे ते हैं। उऩननषद, ब्रह्मसत्र ु ु ू ू आहद कहठन तो रगते हैं भगय फद्धि को सक्ष्भ फना दे ते हैं औय सक्ष्भ फद्धि ही ठीक आजत्भक ु ू ू ु प्रकार् ऩा सकती है । बगवान की कथा जफ ऩढ़ते हैं , फोरते हैं, सुनते हैं उस सभम बीतय अन्त्कयण धरता ु है , गचर्त् भें प्रसन्नता आती है , विा की कर्रता से श्रोताओॊ भें आत्भानन्द छरकता है । भानो ु कबी उफासी बी आमे कपय बी बगवान की कथा, हरयचचाश, सत्सॊग कल्माणकायी है । बगवान श्रीकृष्ण की रीराएॉ फडी अनूठी है । उनक जीवन क चढ़ाव उताय से जीव को े े सीखने को सभरता है कक हभाये जीवन भें बी उताय चढ़ाव आ जाम तो ममा फडी फात है ? जफ सोरह कराधायी ऩूणाशवताय बगवान श्रीकृष्ण क कटुम्फी उनक द्धवयोधी हो सकते हैं तो हभायी े ु े श्रीभती, हभाये श्रीभान मा फेटा-फेटी हभाया कहा नहीॊ भानते तो ममा फडी फात है ? श्रीकृष्ण भें इतनी र्क्ति थी कक सत्रह फाय जयासॊध को भाय बगामा कपय बी अठायहवाॉ फाय खद को बागना ु ऩडा तो कबी-कबी हभें बी घय छोडकय, गाॉव छोडकय कहीॊ औय जगह जाना ऩडे त ममा हो गमा ? "फाऩू ! भेयी फदरी होती है । भझे अऩना घय, गाॉव छोडना ऩडता है ।" ु अये , तेये बगवान को बी छोडना ऩडा था तो तू ममों घफडाता है ? हाये हुए जीव को बगवान की रीराओॊ से आद्वासन सभर जाता है । उदास को प्रेभ का दान सभर जाता है । अहॊ कायी को ननयहॊ कायी होने का सफक सभर जाता है । कहाॉ सॊकल्ऩ भात्र से उथर-ऩथर कय दे ने का साभथ्मश यखने वारे श्रीकृष्ण औय कहाॉ नॊगे ु ऩैय, नॊगे ससय, एक ही धोती भें तीन भहीने तक उनका ऋद्धषमों क आश्रभ भें यहना। टुकडा े भाॉगकय खामा औय सत्सॊग सुना। तेयह वषश घोय आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ भें उऩननषदों का े अध्ममन ककमा औय द्धवयि जीवन जजमे एकान्त भें । एकान्त भें द्धवयि जीवन जीने से मोग्मता फढ़ती है , र्क्ति फढ़ती है । श्रीकृष्ण का प्रबाव फढ़ गमा, साभथ्मश फढ़ गमा, मर् फढ़ गमा। घोय
  7. 7. आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ का एकान्तवास औय उऩननषद का अध्ममन मुि क भैदान भें बगवद् े े गीता होकय प्रकट हो गमा। श्रीकृष्ण क चरयत्र भहाबायत भें , हरयवॊर्ऩुयाण भें ब्रह्मवैवतशऩुयाण भें , बागवत भें आते हैं। े उन चरयत्रों से आऩ अऩने खटकने वारे जो बाव जीवन भें हैं उनको हटाकय, सॊसाय की ऩरयवतशनर्ीरता को सभझकय, अऩने अऩरयवतशनर्ीर कटस्थ आत्भा को ऩहचान कय आऩ बी ू श्रीकृष्ण-तत्त्व का साऺात्काय कये । इससरए श्रीकृष्ण-जन्भाद्शभी का उत्सव होता है । श्रीकृष्ण का जीवन सवाांगी द्धवकससत है । उन्हें चाय वेदों का ऻान है । गीता वेदों का प्रसाद है , उऩननषदों का ऻान है । चाय वेद हैं- ऋगवेद, मजवेद, साभवेद औय अथवशवेद। चाय उऩवेद हैं- ु आमवेद, धनवेद, स्थाऩत्मवेद औय गाॊधवशवेद। आमवेद भें बी श्रीकृष्ण कर्र थे। आयोग्म क ु ु ु ु े ससिान्त फहढ़मा जानते थे। गीता भें बी उन्होंने कहा् मुिाहायद्धवहायस्म मुिचेद्शस्म कभशसु। मुिस्वप्नाफोधस्म मोगो बवनत द्खहा।। ु 'द्खों का नार् कयने वारा मोग तो मथामोग्म आहाय-द्धवहाय कयने वारे का, कभों भें ु मथामोग्म चेद्शा कयने वारे का औय मथामोग्म सोने तथा जागने वारे का ही ससि होता है ।' (बगवद् गीता् 6.17) मुि क भैदान भें बी तॊदरूस्ती की तयप इर्ाया कय हदमा। मुि भें थक, भाॊदे, घावों से े ु े बये घोडों को र्ाभ क सभम ऐसी भयहभऩट्टी ऐसी भासरर् कयते थे कक दसये हदन वे कपय से े ू बागदौड कयने क सरए तैमाय हो जाते थे। े धनुद्धवशद्या, र्स्त्रद्धवद्या भें बी वे अदबुत थे। सत्रह फाय जयासॊध को त्रफना र्स्त्र ही हया हदमा। मुि की द्धवद्या भें ऐसे कर्र थे। याजनीनत भें बी अव्वर नॊफय थे। ु स्थाऩत्म वेद का ऻान बी श्रीकृष्ण भें खफ था। द्रारयका नगयी फनामी। यथों क चरने की ू े सडक अरग, ऩैदर जाने वारों का यास्ता अरग। फीच भें फगीचे, द्धवश्राभगह, प्माऊ आहद। आदभी ृ को वैकण्ठ जैसा सुख सभरे ऐसी यचना थी, ऐसा सुन्दय नमर्ा फनामा, फडी अनूठी द्रारयका ु फसामी। गाॊधवशवेद भें बी उन्होंने अऩनी कर्रता हदखामी। गाॊधवशवेद भें नत्म, गीत औय वाद्य होते ु ृ हैं, गाना-फजाना होता है । फजाना बी दो प्रकाय का होता है ् एक ठोककय फजामा जाता है , जैसे तफरा, ढोरक, भॊजीया आहद। दसया पककय फजामा जाता है , जैसे फॉसी, त्रफगुर, तुयी, र्हनाई ू ॉू आहद। ठोककय फजाने वारे वाद्यों से पककय फजामे जाने वारे वाद्य अच्छे भाने जाते हैं। उसभें ॉू बी फॉसी फहढ़मा है । श्रीकृष्ण फॉसी ऐसी फजाते कक जो दध क सरए द्धवयह भें छटऩटाने वारे फछडे भाॉ आने ऩय ू े दध ऩीने रगते वे श्रीकृष्ण की फॉसी सुनकय दध ऩीना बूर जाते औय फॉसी का सुख ऩाकय तन्भम ू ू
  8. 8. हो जाते। श्रीकृष्ण अऩनी फॉसी भें अऩने ऐसे प्राण पकते, प्रेभ पकते कक सुनने वारों क गचर्त् ॉू ॉू े चया रेते। ु अनुक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अवताय जीव का जीवन सवाांगी द्धवकससत हो इससरए बगवान क अवताय होते हैं। उस सभम उन े अवतायों से तो जीव को प्रेयणा सभरती है , हजायों वषों क फाद बी प्रेयणा सभरती यहती है । े ईद्वय क कई अवताय भाने गमे हैं- ननत्म अवताय, नैसभद्धर्त्क अवताय, आवेर् अवताय, े प्रवेर् अवताय, स्पनतश अवताय, आद्धवबाशव अवताय, अन्तमाशभी रूऩ से अवताय, द्धवबूनत अवताय, ू आमुध अवताय आहद। बगवान की अनन्त-अनन्त कराएॉ जजस बगवान की सभद्धद्श करा से स्परयत होती है , उन ु कराओॊ भें से कछ कराएॉ जो सॊसाय व्मवहाय को चराने भें ऩमाशद्ऱ हो जाती हैं वे सफ कराएॉ ु सभरकय सोरह होती हैं। इससरए बगवान श्रीकृष्ण को षोडर् कराधायी बी कहते हैं औय ऩूणाशवताय बी कहते हैं। वास्तव भें , बगवान भें सोरह कराएॉ ही हैं ऐसी फात नहीॊ है । अनन्त- अनन्त कराओॊ का सागय है वह। कपय बी हभाये जीवन को मा इस जगत को चराने क सरए े बगवान ऩयब्रह्म ऩयभात्भा, सजच्चदानन्द की सोरह कराएॉ ऩमाशद्ऱ होती हैं। कबी दस कराओॊ से प्रकट होने की आवश्मकता ऩडती है तो कबी दो कराओॊ से काभ चर जाता है , कबी एक करा से। एक करा से बी कभ भें जफ काभ चर जाता है , ऐसा जफ अवताय होता है उसे अॊर्ावताय कहते हैं। उससे बी कभ करा से काभ कयना होता है तो उसे द्धवबूनत अवताय कहते हैं। अवताय का अथश ममा है ? अवतयनत इनत अवताय्। जो अवतयण कये , जो ऊऩय से नीचे आमे। कहाॉ तो ऩयात्ऩय ऩयब्रह्म, ननगुण, ननयाकाय, सत ् गचत ् आनन्द, अव्मि, अजन्भा.... औय वह जन्भ रेकय आमे ! श अव्मि व्मि हो जाम ! अजन्भा जन्भ को स्वीकाय कय रे , अकर्त्ाश कतत्व को स्वीकाय कय रे, शृ अबोिा बोग को स्वीकाय कय रे। मह अवताय है । अवतयनत इनत अवताय्। ऊऩय से नीचे आना। जो र्ुि फुि ननयाकाय हो वह साकाय हो जाम। जजसको कोई आवश्मकता नहीॊ वह छनछमन बयी छाछ ऩय नाचने रग जामे। जजसको कोई बगा न सक उसको बागने की रीरा े कयनी ऩडे। ऐसा अवताय भनष्म क सरए है , कल्माण क सरए है । ु े े बगवान का एक अवताय होता है प्रतीक अवताय, जैसे बि बगवान की प्रनतभा फना रेता है , जजस सभम बोग रगाता है , जो बोग रगाता है , जजस बाव से रगा दे ता है , ऩत्र, ऩष्ऩ औय ु जो कछ बी अऩशण कयता है उस रूऩ भें ग्रहण कयक वह बगवान अन्तमाशभी प्रनतभा अवताय भें ु े
  9. 9. बि की बावना औय र्क्ति ऩुद्श कयते हैं। कबी बगवान की भूनतश से, प्रनतभा से, गचत्र से पर मा ू परभारा गगय ऩडी तो वह बि की ऩूजा स्वीकाय हो गई इसका सॊकत सभझा जाता है । ू े हभ जफ साधना कार क प्रायॊ ब भें ऩूजा कयते थे तफ कबी-कबी ऐसा होता था। पर की े ू भारा बगवान को चढ़ा दी, कपय ऩूजा भें तन्भम हो गमे। एकाएक भारा गगय ऩडी तो गचर्त् भें फडी प्रसन्नता होती कक दे व प्रसन्न हैं। प्रनतभा भें बगवद् फुद्धि कयक उऩासना की औय प्रनतभा से र्ाॊनत, आनॊद औय प्रेयणा े सभरने रगी। मह प्रनतभा अवताय। कोई श्रीकृष्ण की प्रनतभा यखता है कोई श्रीयाभ की की, कोई ककसी औय की। धन्ना जाट जैसे को ऩजण्डत जी ने बाॉग घोटने का ससरफट्टा दे हदमा 'मह ठाकयजी हैं' कहकय। धन्ना जाट ने उसभें बगवान की दृढ़ बावना की तो बगवान प्रकट हो गमे। ु बगवान प्रनतभा क द्राया हभायी उन्ननत कय दें , प्रनतभा क द्राया अवतरयत हो जामें उसको े े कहते हैं प्रनतभा अवताय। जजस प्रनतभा को आऩ श्रिा-बक्ति से ऩत्र-ऩष्ऩ अऩशण कयते हो, बोग ु रगाते हो, उस प्रनतभा से आऩको प्रेयणा सभरती है । अॊतमाशभी अवताय दो प्रकाय का होता है । सफक अॊतमाशभी बगवान सफको सर्त्ा-स्पनतश दे ते े ू हैं, कछ कहते नहीॊ। जन-साधायण क साथ बी बगवान हैं। वह उन्हें भाने चाहे न भाने, आजस्तक ु े हो मा नाजस्तक, बगवान को गासरमाॉ दे ता हो कपय बी बगवान उसकी आॉख को दे खने की सर्त्ा दे ते हैं, कान को सुनने की सर्त्ा दे ते हैं। ऩेट भें उसका बोजन ऩचाने को र्क्ति दे ते हैं। दयाचायी ु से दयाचायी, ऩाऩी से बी ऩाऩी, भहाऩाऩी हो उसको बी अऩनी सर्त्ा, स्पनतश औय चेतना दे ते हैं ु ू ममोंकक वे प्राणणभात्र क सुरृद हैं। वे सफको बीतय अॊतमाशभी आत्भा होकय फैठे हैं। 'मह दद्श भझे े ु ु भानता नहीॊ, बजता नहीॊ.... चरो उसक रृदम को फॊद कय दॉ ...' ऐसा बगवान 'नहीॊ' कबी नहीॊ े ू कहते। त्रफजरी का त्रफर दो भहीने तक नहीॊ बयो तो 'Connection Cut' हो जाता है , ककन्तु बगवान को दस सार तक सराभ न बयो, याभनाभ का त्रफर न बयो तो बी आऩको जीवन चेतना का Connection Cut नहीॊ होता। जजतने द्वास उसक बाग्म भें होते हैं उतने चरने दे ते हैं। मह बगवान े का अॊतमाशभी अवताय अॊतमाशभी सर्त्ा स्वरूऩ से सफ जनों क सरए होता है । बिजनों क सरए है े े अन्तमाशभी प्रेयणा अवताय। जो बि हैं, जो बक्ति कयते हैं , उनका अॊतमाशभी प्रेयक होता है , गचर्त् भें प्रेयणा दे ता है कक् 'अफ मह कयो, वह कयो। सावन का भहीना आमा है तो अनुद्षान कयो। इतने जऩ तऩ हो गम, अफ आत्भऻान क सत्सॊग भें जाओ। गुरूभुख फनो। ननगुये यहने से कोई काभ े नहीॊ फनेगा....' इस प्रकाय अॊतमाशभी बगवान प्रेयणा दे ते हैं। इस प्रकाय क बगवान क कई तयह क अवताय होते हैं। मुग-मुग भें , वि-वि ऩय, हय े े े हदर औय हय व्मक्ति की मोग्मता ऩय सबन्न-सबन्न प्रेयणा औय प्रकार् सभरे ऐसे अवताय होते हैं। श्रीकृष्ण का अवताय सोरह करा से सम्ऩन्न, सवाांगी द्धवकास कयाने वारा, सफ साधकों को, बिों को प्रकार् सभर सक, दजनों का दभन हो सक, भदोन्भर्त् याजाओॊ का भद चय कय े ु श े ू सक, भारी, कब्जा, दजी औय तभाभ साधायण जीवों ऩय अहै तकी कृऩा फयसा सक ऐसा ऩणश े ु ु े ू
  10. 10. रीरा अवताय था। जो फॉधे हुए को छडा दे , ननयार् को आद्वासन दे , रूखे को यस से बय दे , ु प्मास को प्रेभ से बय दे ऐसा अवताय था श्रीकृष्ण का। कबी-कबी छोटे -भोटे काभ क सरए े आवेर्ावताय हो जाता है , कबी अॊर्ावताय हो जाता है , जैसे वाभन अवताय, नससॊह अवताय, ृ ऩयर्ुयाभ अवताय। कबी आमुधावताय हो जाते हैं। कबी सॊकल्ऩ ककमा औय बगवान क ऩास े आमुध आ जाता है , सुदर्शन चक्र आहद आ जाता है । ऩयात्ऩय ऩयब्रह्म की र्क्ति कबी अॊर्ावताय भें तो कबी आमुध-अवताय भें तो कबी सॊतों के रृदम द्राया सॊत-अवताय भें तो कबी कायक अवताय भें अवतरयत होते हुए भानव जात को अऩने उन्नत सर्खयों ऩय रे जाने का काभ कयती है । भानव अगय तत्ऩय होकय अऩने उन्नत सर्खयों ऩय ऩहुॉचे तो उसे सख औय द्ख दोनों हदखाई ऩडता है णखरवाड, उऩरजब्ध औय हानन दोनों ु ु हदखाई ऩडता है णखरवाड, र्यीय औय र्यीय क सम्फन्ध हदखाई ऩडते हैं णखरवाड। उसे अऩनी े आत्भा की सत्मता का अनबव हो जाता है । ु आत्भा की सत्मता का अनबव हो जामे तो ऐसा कोई आदभी नहीॊ जो द्ख खोजे औय ु ु उसे द्ख सभर जामे। ऐसा कोई आदभी नहीॊ जो भुि न हो। अऩने आत्भा की अनुबूनत हो जामे ु तो कपय आऩको द्ख नहीॊ होगा, आऩक सॊऩक भें आने वारे रोग बी ननदश ्ख जीवन जीने क ु े श ु े भागश ऩय आगे कच कय सकते हैं। ू श्रीकृष्ण को जो प्रेभ कये उसको तो वे प्रेभ दें ही, उनको जो दे खे नहीॊ उस ऩय बी प्रेभ से फयस ऩडे ऐसे श्रीकृष्ण दमारु थे। वे भथया भें गमे तो दजी से ग्वारफारों क कऩडे ठीक कयवा ु े कय उसका उिाय ककमा। ऩय कब्जा ? जजसने श्रीकृष्ण की ओय दे खा तक नहीॊ कपय बी उसका ु कल्माण कयना चक नहीॊ। ू े द्धवकायी व्मक्तिमों का, बोग-वासना भें पसे हुए रोगों का सॊऩक कयने वारी फुद्धि कब्जा है । ॉ श ु कब्जा छोटी जानत की थी। याजा-भहायाजाओॊ को तेर-भासरर् कयती, अॊगयाग रगाती, कस ु ॊ की चाकयी कयती। ऐसा उसका धॊधा था। श्रीकृष्ण का दर्शन कयने क सरए साया भथया उभड ऩडा था रेककन कब्जा कृष्ण क साथ े ु ु े ही ऩैदर जा यही है कपय बी आॉख उठाकय दे खती नहीॊ। श्रीकृष्ण तो उदायता का उदगध थे। उन्होंने सोचा् जफ इतने साये रोग आनजन्दत हो यहे है , प्रसन्न हो यहे हैं तो मह ममों थोफडा चढ़ाकय जाती है ? कृष्ण कहने रगे् "हे सुन्दयी !" कब्जा सोचने रगी कक भैं सुन्दयी नहीॊ.... आज तक भुझे ककसी ने सुन्दयी कहा ही नहीॊ। ु मे ककसी औय को फुराते होंगे। कब्जा ने सुना अनसुना कय हदमा। श्रीकृष्ण ने दफाया कहा् ु ु "हे सुन्दयी !" कब्जा ने सोचा् "कोई औय सुन्दयी होगी। भगय ग्वारफारों क टोरे भें तो कोई स्त्री नहीॊ ु े थी। जफ तीसयी फाय श्रीकृष्ण ने कहा्
  11. 11. "हे सुन्दयी !" तफ कब्जा से यहा न गमा। वह फोर उठी् ु "फोरो सुन्दय ! ममा फोरते हो ?" जो करूऩ भें बी सौन्दमश को दे ख रें वे कृष्ण हैं। सच ऩूछो तो करूऩ से करूऩ आदभी ु ु ु बी आत्भ-सौन्दमश छऩा है । श्रीकृष्ण को उस करूऩ कब्जा भें बी अऩना सौन्दमश स्वरूऩ ु ु ु सजच्चदानॊद हदखा। उन्होंने कब्जा से कहा् ु "मह चन्दन तू भझे दे गी ?" ु "हाॉ रो, रगा दो अऩने फदन ऩय।" उस कब्जा को ककसी ने सन्दय कहा नहीॊ था औय श्रीकृष्ण जो कछ कहते, सच्चे रृदम से ु ु ु कहते। उनका व्मवहाय कृत्रत्रभ नहीॊ था। कछ द्धवनोद बरे ककसी से कय रें वह अरग फात है , ु फाकी बीतय से जो बी कयते, गहयाई से कयते। ऩणाशवताय तो जो कछ कये गा, ऩणश ही कये गा। ू ु ू द्धवनोद कयते तो ऩया, उऩदे र् कयते तो ऩया, नयो वा कजयो वा का आमोजन ककमा तो ऩया, सॊगध- ू ू ॊु ू दत होकय गमे तो ऩूये, सर्र्ुऩार को ऺभा की तो ऩये, ऩूयी सौ गासरमाॉ सुन री। वे जो कछ बी ू ू ु कयते हैं, ऩूया कयते है कपय बी कबी कतत्व बाय से फोणझर नहीॊ होते। मह नायामण की रीरा शृ नय को जगा दे ती है कक हे नय ! तू बी फोझीर भत हो। चाय ऩैसे का कऩडा, रकडा, ककयाना फेचकय, 'भैंने इतना साया धॊधा ककमा' मह अहॊ काय भत यख। ऩाॉच-ऩच्चीस हजाय की सभठाई फेचकय अऩने को सभठाईवारा भत भान। तू तो ब्रह्मवारा है । 'भैं सभठाईवारा हूॉ.... भैं कऩडे वारा हूॉ.... भैं सोने-चाॉदी वारा हूॉ.... भैं भकानवारा हूॉ... भैं दकानवारा हूॉ.... भैं ऑकपसवारा हूॉ... भैं ऩें टवारा हूॉ..... भैं दाढ़ीवारा हूॉ..... ' मह सफ भन का ु धोखा है । 'भैं आत्भावारा हूॉ... भैं ब्रह्मवारा हूॉ...' इस प्रकाय हे जीव ! तू तो ऩयभात्भावारा है । तेयी सच्ची भडी तो ऩयभात्भा-यस है । ू श्रीकृष्ण ऐसे भहान नेता थे कक उनक कहने भात्र से याजाओॊ ने याजऩाट का त्माग कयक े े ऋद्धष जीवन जीना स्वीकाय कय सरमा। ऐसे श्रीकृष्ण थे कपय बी फडे त्मागी थे, व्मवहाय भें अनासि थे। रृदम भें प्रेभ.... आॉखों भें हदव्म दृद्धद्श....। ऐसा जीवन जीवनदाता ने जीकय प्राणीभात्र को, भनुष्म भात्र को ससखामा क हे जीव ! तू भेया ही अॊर् है । तू चाहे तो तू बी ऐसा हो सकता े है । भभैवाॊर्ो जीवरोक जीवबूत् सनातन्। े भन् षद्षानीजन्द्रमाणण प्रकृनतस्थानन कषशनत।। 'इस दे ह भें मह सनातन जीव भेया ही अॊर् है औय वही इन प्रकृनत भें जस्थत भन औय ऩाॉचों इजन्द्रमों को आकषशण कयता है ।' (बगवद् गीता् 15.7)
  12. 12. तुभ भेये अॊर् हो, तुभ बी सनातन हो। जैस, भेये कई हदव्म जन्भ हो गमे, भैं उनको े जानता हूॉ। हे अजुन ! तुभ नहीॊ जानते हो, फाकी तुभ बी ऩहरे से हो। श अजुन को ननसभर्त् कयक बगवान सफको उऩदे र् दे ते हैं कक आऩ बी अनाहद कार से हो। श े इस र्यीय क ऩहरे तुभ थे। फदरने वारे र्यीयों भें कबी न फदरने वारे ऻानस्वरूऩ आत्भा को े जान रेना ही भनुष्म जन्भ का पर है । 'भैं हूॉ' जहाॉ से उठता है उस ऻानस्वरूऩ अगधद्षान भें जो द्धवश्राॊनत ऩा रेता है वह श्रीकृष्ण क स्वरूऩ को ठीक से जान रेता है । े इस ऻान को ऩचाने क सरए फद्धि की ऩद्धवत्रता चाहहए। फद्धि की ऩद्धवत्रता क सरए मऻ, े ु ु े होभ, हवन, दान, ऩण्म से सफ फहहयॊ ग साधन हैं। धायणा, ध्मान आहद अॊतयॊ ग साधन हैं औय ु आत्भऻान का सत्सॊग ऩयभ अॊतयॊ ग साधन हैं। सत्सॊग की फसरहायी है । सत्सॊग सनने से जजतना ऩण्म होता है उसका ममा फमान कयें ! ु ु तीयथ नहामे एक पर सॊत सभरे पर चाय। सदगुरू सभरे अनन्त पर कहे कफीय द्धवचाय।। तीथश भें स्नान कयो तो ऩुण्म फढ़े गा। सॊत का साजन्नध्म सभरे तो धभश, अथश, काभ औय भोऺ इन चायों क द्राय खर जाएॉगे। वे ही सॊत जफ सदगुरू क रूऩ भें सभर जाते हैं तो उनकी े ु े वाणी हभाये रृदम भें ऐसा गहया प्रबाव डारती है कक हभ अऩने वास्तद्धवक 'भैं' भें ऩहुॉच जाते हैं। हभाया 'भैं' तत्त्व से दे खा जाम तो अनन्त है । एक र्यीय भें ही नहीॊ फजल्क हये क र्यीय भें जो 'भैं.... भैं.... भैं... भैं....' चर यहा है वह अनन्त है । उस अनन्त ऩयभात्भा का ऻान जीव को प्राद्ऱ हो जाता है । इससरए कफीय जी न ठीक ही कहा है कक् तीयथ नहामे एक पर सॊत सभरे पर चाय। सदगुरू सभरे अनन्त पर कहे कफीय द्धवचाय।। सदगुरू भेया सूयभा कये र्ब्द की चोट। भाये गोरा प्रेभ का हये बयभ की कोट।। जीव को भ्रभ हुआ है कक 'मह करू तो सुखी हो जाऊ, मह सभरे तो सुखी हो जाऊ....' ॉ ॉ ॉ रेककन आज तक जो सभरा है , आज क फाद जो बी सॊसाय का सभरेगा, आज तक जो बी सॊसाय े का जाना है औय आज क फाद जो बी जानोगे, वह भत्मु क एक झटक भें सफ ऩयामा हो े ृ े े जामेगा। भत्मु झटका भायकय सफ छीन रे उसक ऩहरे, जहाॉ भौत की गनत नहीॊ उस अऩने आत्भा ृ े को 'भैं' स्वरूऩ भें जान रे, अऩने कृष्ण तत्त्व को जान रे, उसका फेडा हो जाता है । श्रीकृष्ण कहते हैं- अभतॊ चैव भत्मुद्ळ सदसच्चाहभजुशन। ृ ृ 'हे अजन ! भैं अभत हूॉ, भैं भत्मु हूॉ, भैं सत ् हूॉ औय भैं असत ् हूॉ।' ुश ृ ृ
  13. 13. (गीता् 9.19) ककतना हदव्म अनुबव ! ककतनी आत्भननद्षा ! ककतना सवाशत्भबाव ! सवशत्र एकात्भदृद्धद्श ! जड-चेतन भें अऩनी सर्त्ा, चेतनता औय आनन्दरूऩता जो द्धवरस यही है उसक प्रत्मऺ अनुबव ! आऩ दननमाॉ की भजहफी ऩोगथमों, भत-भताॊतयों, ऩीय-ऩैगम्फयों को ऩढ़ रीजजमे , सुन ु रीजजमे। उनभें से ककसी भें ऐसा कहने की हहम्भत है ? ककन्तु श्रीकृष्ण बगवान क इस कथन से े सवशत्र एकात्भदृद्धद्श औय उनक ऩूणाशवताय, ऩूणश ऻान, ऩूणश प्रेभ, ऩूणश सभता आहद छरकते हैं। े श्रीकृष्ण जेर भें ऩैदा हुए हैं , भस्कया यहे हैं। भथया भें धनषमऻ भें जाना ऩडता है तो बी ु ु ु ु भस्कया यहे हैं। भाभा क षडमॊत्रों क सभम बी भस्कया यहे हैं। सॊगधदत होकय गमे तफ बी भस्कया ु े े ु ू ु यहे हैं। सर्र्ऩार सौ-सौ फाय अऩभान कयता है , हय अऩभान का फदरा भत्मदॊड हो सकता है , कपय ु ृ ु बी गचर्त् की सभता वही की वही। मि क भैदान भें अऩने ऻानाभत से भस्कयाते हुए उरझे, थक, ु े ृ ु े हाये अजन को बक्ति का, मोग का, ऻान का आत्भ-अभतऩान कयाते हैं। ुश ृ सॊसाय की ककसी बी ऩरयजस्थनत ने उन ऩय प्रबाव नहीॊ डारा। जेर भें ऩैदा होने से, ऩतना ू क द्धवषऩान कयाने से, भाभा कस क जल्भों से, भाभा को भायने से, नगय छोडकय बागने से, े ॊ े ु सबऺा भाॉगते ऋद्धषमों क आश्रभ भें ननवास कयने से, धयती ऩय सोने से, रोगों का औय स्वमॊ े अऩने बाई का बी अद्धवद्वास होने से, फच्चों क उद्दण्ड होने से, ककसी बी कायण से श्रीकृष्ण क े े चेहये ऩय सर्कन नहीॊ ऩडती। उनका गचर्त् कबी उहद्रग्न नहीॊ हुआ। सदा सभता क साम्राज्म भें । े सभगचर्त् श्रीकृष्ण का चेहया कबी भुयझामा नहीॊ। ककसी बी वस्तु की प्रानद्ऱ-अप्रानद्ऱ से, ककसी बी व्मक्ति की ननन्दा-स्तुनत से श्रीकृष्ण की भुखप्रबा म्रान नहीॊ हुई। नोदे नत नास्तभेत्मेषा सुखे द्खे भुखप्रबा। ु श्रीकृष्ण मह नहीॊ कहते कक आऩ भॊहदय भें , तीथशस्थान भें मा उर्त्भ कर भें प्रगट होगे ु तबी भुि होगे। श्रीकृष्ण तो कहते हैं कक अगय आऩ ऩाऩी से बी ऩाऩी हो, दयाचायी से बी ु दयाचायी हो कपय बी भुक्ति क अगधकायी हो। ु े अद्धऩ चेदसस ऩाऩेभ्म् सवशभ्म् ऩाऩकृर्त्भ्। सवां ऻानप्रवेनैव वजजनॊ सॊतरयष्मसस।। ृ 'महद तू अन्म सफ ऩाद्धऩमों से बी अगधक ऩाऩ कयने वारा है , तो बी तू ऻानरूऩ नौका द्राया नन्सन्दे ह सॊऩूणश ऩाऩ-सभुद्र से बरी-बाॉनत तय जामेगा।' (बगवद् गीता् 4.36) हे साधक ! इस जन्भाद्शभी क प्रसॊग ऩय तेजस्वी ऩूणाशवताय श्रीकृष्ण की जीवन-रीराओॊ े से, उऩदे र्ों से औय श्रीकृष्ण की सभता औय साहसी आचयणों से सफक सीख, सभ यह, प्रसन्न यह, र्ाॊत हो, साहसी हो, सदाचायी हो। आऩ धभश भें जस्थय यह, औयों को धभश क भागश भें रगाता े यह। भस्कयाते हुए आध्माजत्भक उन्ननत कयता यह। औयों को सहाम कयता यह। कदभ आगे यख। ु हहम्भत यख। द्धवजम तेयी है । सपर जीवन जीने का ढॊ ग मही है ।
  14. 14. जम श्रीकृष्ण ! कृष्ण कन्है मारार की जम....! अनुक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ श्रीकृष्ण औय रूजमभणी उदासीना वमॊ नूनॊ न स््माऩत्माथशकाभुका्। आत्भरब्ध्माऽऽस्भहे ऩूणाश गेहमोज्मशनतयकक्रमा्।। 'ननद्ळम ही हभ उदासीन हैं। हभ स्त्री, सॊतान औय धन क रोरुऩ नहीॊ हैं। ननजष्क्रम औय े दे ह-गेह से सम्फन्धयहहत हैं दीऩसर्खा क सभान साऺी भात्र हैं। हभ अऩने आत्भा क साऺात्काय े े से ही ऩूणकाभ हैं।' श (श्रीभद् बागवत् 10.60.20) बगवान श्रीकृष्ण रुजमभणी से कह यहे हैं। रुजमभणी ने श्रीकृष्ण को ऩत्र सरखा था। साध- ब्राह्मणों से रुजमभणी ने श्रीकृष्ण ने गुण, ु मर्, ऩयाक्रभ, चातुम, सहजता, सयरता, ननद्रश न्द्रता, ननयाभमता आहद सदगुण सुनकय भन ही भन श सॊकल्ऩ ककमा कक वरूगी तो गगयधय गोऩार को ही। उसक बाई रुजमभ, द्धऩता, बीष्भक तथा अन्म ॉ े रोगों की भजी सर्र्ुऩार क साथ उसका द्धववाह कयने की थी, जफकक रुजमभणी की भजी श्रीकृष्ण े क साथ द्धववाह कयने की थी। े जीव जफ बगवान की सहजता, आनन्द, भुिता, यसभमता जानता है तो वह बी इच्छा कयता है कक भैं बगवान को ही प्राद्ऱ हो जाऊ। जैसे श्रीकृष्ण को सन्दे र्ा ऩहुॉचाने क सरए ॉ े रुजमभणी को ब्राह्मण की जरूयत ऩडी थी ऐसे ही जीव को ब्रह्मवेर्त्ा सदगुरू की आवश्मकता ऩडती है कक ऩयभात्भ-स्वरूऩ भें सन्दे र्ा ऩहुॉचा दें । रुजमभणी ने ऩत्र सरखकय श्रीकृष्ण को ऩहुॉचाने क सरए एक ब्राह्मण को द्रारयका बेजा। े ब्राह्मणदे व द्रारयका ऩहुॉचे औय ऩत्र दे हदमा। उस ऩत्र भें रुजमभणी ने श्रीकृष्ण को द्धवनती की थी कक भेये कटुम्फीजन भेया द्धववाह ऐहहक भोह-भामा भें ऩडे हुए, वासना क कीडे सभान याजाओॊ से ु े कयना चाहते हैं रेककन भैं आऩको हदर से वय चकी। ु रुजमभणी की तयह जस्त्रमाॉ जफ जजऻासु फनती हैं तफ सोचती हैं कक सॊसाय का वय हभको छोडकय चरा जाम तो हभ द्धवधवा हो जाती है अथवा हभ उसको छोडकय चरी जामें तो दसये ू जन्भ भें दसये वय को वयना ऩडता है । इस दे ह क वय तो ककतने ही जन्भों भें ककतने ही फदरे ू े औय इस जन्भ भें बी न जाने कौन ककतना ककसक साथ यहे गा, कोई ऩता नहीॊ। इन वयों क साथ े े यहते हुए बी जो भहहराएॉ आत्भवय को वयने क सरए तत्ऩय यहती हैं वे जजऻासु कही जाती है । े भैं तो वरू भेये गगयधय गोऩार को ॉ ,
  15. 15. भेयो चुडरो अभय हो जाम। रुजमभणी श्रीकृष्ण को वयना चाहती है । मह जीव जफ अऩने र्ुि, फुि चैतन्म स्वरूऩ को वयना चाहता है तो वह प्रेभ भें चढ़ता है । जीव ककसी हाड-भाॊस क ऩनत मा ऩत्नी को वयकय द्धवकायी सुख बोगना चाहता है तफ वह प्रेभ े भें ऩडता है । र्यीय क द्राया जफ सुख रेने की रारच होती है तो प्रेभ भें ऩडता है औय अन्तभुख े श होकय जफ ऩयभ सुख भें गोता भायने की इच्छा होती है तफ वह प्रेभ भें चढ़ता है । प्रेभ ककमे फना तो कोई यह ही नहीॊ सकता। कोई प्रेभ भें ऩडता है तो कोई प्रेभ भें चढ़ता है । प्रेभ भें जो ऩडे वह सॊसाय है ....... प्रेभ भें जो चढ़े वह साऺात्काय है । रुजमभणी का सन्दे र्ा ऩाकय श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए कक मह जीव भझे वयना चाहता है । ईद्वय ु का मह सहज स्वबाव है कक अगय कोई उन्हें ऩाना चाहे तो वे उसका हाथ ऩकड रेते हैं। ककसी बी सभम, कसा बी प्रमोग कयक जीव का हाथ ऩकड ही रेते हैं। ै े जीव जफ ईद्वय का साऺात्काय कयने चरता है तफ दे वता रोग प्रसन्न नहीॊ होते, ममोंकक जीव होगा तो जन्भेगा, मऻ होभ-हवन-ऩूजन कये गा, बोग चढ़ामेगा, दे वताओॊ आहद का गाडा चरता यहे गा। जीव अगय साऺात्काय कये गा तो उनक साये प्रबावों से अरग हो जामेगा, ऊऩय उठ े जामगा। दे वी-दे वता तो नहीॊ चाहते कक तुभ साऺात्काय कय रो, तुम्हाये कटुम्फीजन बी नहीॊ ु चाहते, तुम्हायी ऩत्नी बी नहीॊ चाहती औय तुम्हाया ऩनत बी नहीॊ चाहता। अगय तुभ थोडा-सा ही साऺात्काय क भागश ऩय आगे फढ़े तो टाॉग खीॊचने वारे तैमाय ही हैं। े बक्ति क भागश ऩय, ईद्वय क भागश ऩय नहीॊ चरोगे तो रोग फोरेंगे नाजस्तक है । थोडा सा े े चरोगे औय सवशसाभान्म ढॊ ग से भॊहदय गमे, घॊटनाद कय हदमा, आयती कय दी, टीरा-टऩका कय हदमा, ककसी सॊप्रदाम का बि कहरा हदमा....... तफ तक तो ठीक है । जफ आत्भा-ऩयभात्भा की एकता की तयप आगे कदभ यखोगे तो कटुम्फी रोग तुभको द्धवघ्न डारें गे। जो तुभको ध्मान ु ससखाते थे, जो तुभको भॊहदय भें , आश्रभ भें रे गमे वे ही तुम्हें कपय सभझाएॉगे कक, 'इतनी सायी बक्ति ममा कयना ? हभ बी तो बि हैं, हभ बी तो फाऩू क सर्ष्म हैं। आऩ जया ध्मान बजन े कयना कभ कयो कभ.... ऐसे कछ चरता है ममा ?' ु जो भाॉ ध्मान ससखाती थी वही भाॉ आसुभर को सभझाने रगी थी कक, 'फेटा इतना साया बजन नहीॊ कयना चाहहए। भुझे ऩडोसी भाई फोरती है कक तुम्हाया फेटा प्रबात भें बगवान के ध्मान भें फैठा यहता है , यात को बी घण्टों तक फैठा यहता है । वह फहुत बजन कयता है तो बगवान को फाय-फाय द्धवऺेऩ होता होगा। रक्ष्भी जी की सेवा रेना छोडकय उन्हें फाय-फाय बगत के ऩास आना ऩडता होगा तो रक्ष्भी जी रूठ जामेगी तुम्हाये घय से। अत् फेटा ! ज्मादा ध्मान बजन कयना ठीक नहीॊ।' बोरी भाॉ ने हभें सभझामा कक ज्मादा बक्ति नहीॊ कयना, र्ामद रक्ष्भी रूठ जाम तो ?
  16. 16. जो रोग आऩको ईद्वय क भागश रे जाते हैं वे ही रोग आऩको योकगे, महद आऩकी साधना े ें की गाडी ने जोय ऩकडा तो। अगय वे रोग नहीॊ योकते अथवा उनक योकने से आऩ नहीॊ रुक तो े े दे वता रोग कछ न कछ प्ररोबन बेजेंगे। अथवा मर् आ जामगा, रयद्धि-ससद्धि आ जामेगी, सत्म- ु ु सॊकल्ऩ ससद्धि आ जामगी। भहसूस कयोगे कक भैं जो सॊकल्ऩ कयता हूॉ वह ऩूणश होने रगता है । अऩने आश्रभ क एक साधक ने ऩॊचड (यतराभ) क आश्रभ भें यहकय साठ हदन का े े े अनुद्षान ककमा। छोटी-भोटी कछ इच्छा हुई औय जया सा ऐसा हो गमा। उसने गाॉठ फाॉध री कक ु भेये ऩास सत्म-सॊकल्ऩ ससद्धि आ गमी। अये बाई ! इतने भें ही सॊतद्श हो गमे ? साधना भें रुक ु गमे ? ससतायों से आगे जहाॉ कछ औय है । ु इश्क क इम्तीहाॉ कछ औय हैं ।। े ु आगे फढ़ो। मह तो कवर र्रूआत है । थोडी सी सॊसाय की रोरऩता कभ होने से े ु ु अन्त्कयण र्ि होता है । अन्त्कयण र्ि होता है तो कछ-कछ आऩक सॊकल्ऩ पसरत होते हैं। ु ु ु ु े सॊकल्ऩ पसरत हुआ औय उसक बोग भें आऩ ऩड गमे तो आऩ प्रेभ भें ऩड जामेंगे। अगय े सॊकल्ऩ-पर क बोग भें नहीॊ ऩडे औय ऩयभात्भा को ही चाहा तो आऩ प्रेभ से चढ़ जाओगे। प्रेभ े भें ऩडना एक फात है औय प्रेभ भें चढ़ना कोई ननयारी ही फात है । थोडी फहुत साधना कयने से ऩुण्म फढ़ते हैं, सुद्धवधाएॉ आ जाती है , जो नहीॊ फुराते थे वे फुराने रगें गे, ककन्तु भनुष्म जन्भ कवर इसीसरए नहीॊ है कक रोग भान से दे खने रग जाएॉ। े जजसको वे दे खेंगे वह (दे ह) बी तो स्भर्ान भें जरकय खाक हो जामेगा बाई ! भनुष्म जन्भ इससरए बी नहीॊ है कक फहढ़मा भकान सभर जाम यहने को। 'हभें तो ठाठ से यहना है .....।' मह तो अहॊ काय ऩोसने की फात है । न ठाठ से यहना ठीक है न फाट से यहना ठीक है, जजससे यहने का द्धवचाय उत्ऩन्न होता है वह अन्त्कयण जजससे सॊचासरत होता है उस तत्त्व को अऩने आत्भा क रूऩ भें जानना अथाशत ् आत्भ-साऺात्काय कयना ही ठीक है , फाकी à

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