NON PROFIT PUBLICATION
गुरुत्व कामाारम द्राया प्रस्तुत भाससक ई-ऩत्रिका अगस्त- 2014
Our Web Site: www.gurutvajyotish.com Fo...
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E CIRCULAR
ई- जन्भ ऩत्रिकागुरुत्व ज्मोसतष ऩत्रिका
अगस्त 2014
सॊऩादक
अत्माधुसनक ज्मोसतष ऩद्धसत द्राया
उत्कृ द्श बत्रवष...
अनुक्रभ
नाग ऩॊिभी का धासभाक भहत्व 7 भनोकाभना ऩूसता हेतु त्रवसबन्न कृ ष्ण भॊि 36
ऩुिदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवाय) ...
कृ ष्णॊ वन्दे जगत गुरु
त्रप्रम आस्त्भम
फॊधु/ फफहन
जम गुरुदेव
यऺाफॊधन अथाात ्प्रेभ का फॊधन। यऺाफॊधन के फदन फहन बाई के हाथ ऩ...
इस अॊक भं प्रकासशत श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेष से सॊफॊसधत जानकायीमं के त्रवषम भं साधक एवॊ त्रवद्रान ऩाठको से
अनुयोध हं, ...
6 अगस्त 2014
***** श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत सूिना *****
 ऩत्रिका भं प्रकासशत श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्र...
7 अगस्त 2014
नाग ऩॊिभी का धासभाक भहत्व
 त्रवजम ठाकु य
नाग ऩॊिभी व्रत श्रावण शुक्र ऩॊिभीको फकमा
जाता है । रेफकन रोकािाय व ...
8 अगस्त 2014
औय इस प्रकाय वह उसके घय ऩहुॊि गई। वहाॉ के धन-
ऐद्वमा को देखकय वह िफकत हो गई।
वह सऩा ऩरयवाय अके साथ आनॊद से यह...
9 अगस्त 2014
सॊतानप्रासद्ऱ
त्रवशेष
ऩुिदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवाय)
 सिॊतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
ऩौयास्णक कारस...
10 अगस्त 2014
तो फकसी मोग्म त्रवद्रान ब्राह्मण से बी ऩूजन कयवा सकते
हं।) बगवान त्रवष्णु को शुद्ध जर से स्नान कयाए। फपय
ऩॊि...
11 अगस्त 2014
सवा कामा ससत्रद्ध कवि
स्जस व्मत्रि को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के फादबी उसे भनोवाॊसछत सपरतामे एवॊ
फकमे गम...
12 अगस्त 2014
ऩुिदा (ऩत्रविा) एकादशी व्रत की ऩौयास्णक कथा
 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
श्रावण : शुक्र ऩऺ
एक फाय मुसधत्रद्षय बगवान श...
13 अगस्त 2014
सभम, एक जराशम ऩय जर ऩीने गमा। उसी स्थान ऩय
एक तत्कार की प्रसूता हुई प्मासी गौ जर ऩी यही थी।
याजा ने उस प्मास...
14 अगस्त 2014
अजा (जमा) एकादशी व्रत की ऩौयास्णक कथा
 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
बाद्रऩद भास कृ ष्णऩऺ की एकादशी
एक फाय मुसधत्रद्षय ...
15 अगस्त 2014
फहन्दू सॊस्कृ सत भं कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत का भहत्व
 सिॊतन जोशी
श्री कृ ष्णजन्भाद्शभी को बगवान श्री कृ ष्ण ...
16 अगस्त 2014
भॊि ससद्ध स्पफटक श्री मॊि
"श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्रिशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है ...
17 अगस्त 2014
कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत की ऩौयास्णक कथा
 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, सॊदीऩ शभाा
एक फाय इॊद्र ने नायद जी से कहा "हे भु...
18 अगस्त 2014
उस दुद्श भ्राता ने भेये कई ऩुिं का वध कय फदमा। इस
सभम भेये गबा भं आठवाॉ ऩुि है। वह इसका बी वध कय
डारेगा, क्म...
GURUTVA JYOTISH AUGUST-2014
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GURUTVA JYOTISH AUGUST-2014

  1. 1. NON PROFIT PUBLICATION गुरुत्व कामाारम द्राया प्रस्तुत भाससक ई-ऩत्रिका अगस्त- 2014 Our Web Site: www.gurutvajyotish.com Font Help >> http://gurutvajyotish.blogspot.com
  2. 2. FREE E CIRCULAR ई- जन्भ ऩत्रिकागुरुत्व ज्मोसतष ऩत्रिका अगस्त 2014 सॊऩादक अत्माधुसनक ज्मोसतष ऩद्धसत द्राया उत्कृ द्श बत्रवष्मवाणी के साथ १००+ ऩेज भं प्रस्तुत सिॊतन जोशी सॊऩका गुरुत्व ज्मोसतष त्रवबाग गुरुत्व कामाारम 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA पोन E HOROSCOPE 91+9338213418, 91+9238328785, ईभेर gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Create By Advanced Astrology Excellent Prediction 100+ Pages >> Order Now | Call Now | Email US वेफ www.gurutvakaryalay.com http://gk.yolasite.com/ www.gurutvakaryalay.blogspot.com/ ऩत्रिका प्रस्तुसत सिॊतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी पोटो ग्राफपक्स फहॊदी/ English भं भूल्म भाि 750/- सिॊतन जोशी, स्वस्स्तक आटा हभाये भुख्म सहमोगी GURUTVA KARYALAY BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com स्वस्स्तक.ऎन.जोशी (स्वस्स्तक सोफ्टेक इस्न्डमा सर)
  3. 3. अनुक्रभ नाग ऩॊिभी का धासभाक भहत्व 7 भनोकाभना ऩूसता हेतु त्रवसबन्न कृ ष्ण भॊि 36 ऩुिदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवाय) 9 कृ ष्ण भॊि 37 ऩुिदा (ऩत्रविा) एकादशी व्रत की ऩौयास्णक कथा 12 ऩमूाषण भहाऩवा का भहत्व 38 अजा (जमा) एकादशी व्रत की ऩौयास्णक कथा 14 श्री नवकाय भॊि (नभस्काय भहाभॊि) 39 फहन्दू सॊस्कृ सत भं कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत का भहत्व 15 देवदशान स्तोिभ ् 40 कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत की ऩौयास्णक कथा 17 बगवान भहावीय की भाता त्रिशरा के अद्भुत स्वप्न 41 बायतीम सॊस्कृ सत भं याखी ऩूस्णाभा का भहत्व 21 त्रवसबन्न िभत्कायी जैन भॊि 43 याखी ऩूस्णाभा से जुफड ऩौयास्णक कथाएॊ 23 जैन धभा के िौफीस तीथंकायं के जीवन का … 47 कृ ष्ण के भुख भं ब्रह्माॊड दशान 25 श्री भॊगराद्शक स्तोि (जैन) 48 शॊख ध्वसन से योग बगाएॊ ! 26 अथ नवग्रह शाॊसत स्तोि (जैन) 48 कृ ष्ण स्भयण का आध्मास्त्भक भहत्व 29 ॥ भहावीयाद्शक-स्तोिभ ् ॥ 49 श्री कृ ष्ण का नाभकयण सॊस्काय 30 ॥ भहावीय िारीसा ॥ 50 ॥ श्रीकृ ष्ण िारीसा ॥ 31 जफ भहावीय ने एक ज्मोसतषी को कहाॊ तुम्हायी… 51 त्रवप्रऩत्नीकृ त श्रीकृ ष्णस्तोि 32 गौतभ के वरी भहात्रवद्या (प्रद्लावरी) 52 प्राणेद्वय श्रीकृ ष्ण भॊि 33 शीघ्र काभना ऩूसता हेतु इद्श ऩूजन भं कये सही… 56 ब्रह्मा यसित कृ ष्णस्तोि 34 कहीॊ आऩकी कुॊ डरी भं ऋणग्रस्त होने के मोग… 58 श्रीकृ ष्णाद्शकभ ् 35 स्थामी औय अन्म रेख सॊऩादकीम 4 दैसनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका 87 अगस्त 2014 भाससक ऩॊिाॊग 69 फदन-यात के िौघफडमे 88 अगस्त 2014 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय 74 फदन-यात फक होया 89 अगस्त 2014 -त्रवशेष मोग 87 ग्रह िरन अगस्त -2014 90 हभाये उत्ऩाद सवा कामा ससत्रद्ध कवि 11 नवयत्न जफित श्री मॊि 74 भॊि ससद्ध स्पफटक श्री मॊि 16 वाहन दुघाटना नाशक भारुसत मॊि/ श्री हनुभान मॊि 75 श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि / कवि 28 त्रवसबन्न देवताओॊ के मॊि 76 भॊि ससद्ध ऩन्ना गणेश 34 यासश यत्न 78 भॊि ससद्ध दुराब साभग्री/भॊि ससद्ध भारा 37 भॊि ससद्ध रूद्राऺ 79 त्रवद्या प्रासद्ऱ हेतु सयस्वती कवि औय मॊि 55 जैन धभाके त्रवसशद्श मॊिो की सूिी81 81 भॊि ससद्ध बाग्म रक्ष्भी फडब्फी 60 घॊटाकणा भहावीय सवा ससत्रद्ध भहामॊि 82 भॊि ससद्ध ऩायद प्रसतभा 62 अभोघ भहाभृत्मुॊजम कवि 83 भॊि ससद्ध गोभसत िक्र 63 सवा योगनाशक मॊि/कवि 91 हभाये त्रवशेष मॊि/ त्रवसबन्न रक्ष्भी मॊि 64 भॊि ससद्ध कवि सूसि 93 सवाससत्रद्धदामक भुफद्रका 65 YANTRA LIST 94 द्रादश भहा मॊि 66 Gemstone Price List 96 ऩुरुषाकाय शसन मॊि /शसन तैसतसा मॊि 73 सूिना 97
  4. 4. कृ ष्णॊ वन्दे जगत गुरु त्रप्रम आस्त्भम फॊधु/ फफहन जम गुरुदेव यऺाफॊधन अथाात ्प्रेभ का फॊधन। यऺाफॊधन के फदन फहन बाई के हाथ ऩय याखी फाॉधती हं। यऺाफॊधन के साथ फह बाई को अऩने सन्स्वाथा प्रेभ से फाॉधती है।बायतीम सॊस्कृ सत भं आज के बौसतकतावादी सभाज भं बोग औय स्वाथा भं सरद्ऱ त्रवद्व भं बी प्राम् सबी सॊफॊधं भं सन्स्वाथा औय ऩत्रवि होता हं। बायतीम सॊस्कृ सत सभग्र भानव जीवन को भहानता के दशान कयाने वारी सॊस्कृ सत हं। बायतीम सॊस्कृ सत भं स्त्री को के वर भाि बोगदासी न सभझकय उसका ऩूजन कयने वारी भहान सॊस्कृ सत हं। सकृ न्भन् कृ ष्णाऩदायत्रवन्दमोसनावेसशतॊ तद्गुणयासग मैरयह। न ते मभॊ ऩाशबृतद्ळ तद्भटान्स्वप्नेऽत्रऩ ऩश्मस्न्त फह िीणासनष्कृ ता्॥ बावाथा: जो भनुष्म के वर एक फाय श्रीकृ ष्ण के गुणं भं प्रेभ कयने वारे अऩने सित्त को श्रीकृ ष्ण के ियण कभरं भं रगा देते हं, वे ऩाऩं से छू ट जाते हं, फपय उन्हं ऩाश हाथ भं सरए हुए मभदूतं के दशान स्वप्न भं बी नहीॊ हो सकते। श्री कृ ष्णजन्भाद्शभी को बगवान श्री कृ ष्ण के जनभोत्स्व के रुऩ भं भनामा जाता है। बगवान श्रीकृ ष्ण के बगवद गीता भं वस्णात उऩदेश ऩुयातन कार से ही फहन्दु सॊस्कृ सत भं आदशा यहे हं। जन्भाद्शभी का त्मौहाय ऩुये त्रवद्व भं हषोल्रास एवॊ आस्था से भनामा जाता हं। श्रीकृ ष्ण का जन्भ बाद्रऩद भाह की कृ ष्ण ऩऺ की अद्शभी को भध्मयात्रि को भथुया भं कायागृह भं हुवा। जैसे की इस स्जन सभग्र सॊसाय के ऩारन कताा स्वमॊ अवतरयत हुएॊ थे। अत: इस फदन को कृ ष्ण जन्भाद्शभी के रूऩ भं भनाने की ऩयॊऩया सफदमं से िरी आयही हं। श्रीकृ ष्ण जन्भोत्सव के सरए देश-दुसनमा के त्रवसबन्न कृ ष्ण भॊफदयं को त्रवशेष तौय ऩय सजामा जाता है। जन्भाद्शभी के फदन व्रती फायह फजे तक व्रत यखते हं। इस फदन भॊफदयं भं बगवान श्री कृ ष्ण की त्रवसबन्न झाॊकीमाॊ सजाई जाती है औय यासरीरा का आमोजन होता है। बगवान श्री कृ ष्ण की फार स्वरुऩ प्रसतभा को त्रवसबन्न शृॊगाय साभग्रीमं से सुसस्ज्जत कय प्रसतभा को ऩारने भं स्थात्रऩत कय कृ ष्ण भध्मयािी को झूरा झुरामा जाता हं। धभाशास्त्रं के जानकायं ने श्रीकृ ष्णजन्भाद्शभीका व्रत सनातन-धभाावरॊत्रफमं के सरए त्रवशेष भहत्व ऩूणा फतामा है। इस फदन उऩवास यखने तथा अन्न का सेवन नहीॊ कयने का त्रवधान धभाशास्त्रं भं वस्णात हं। श्री इस त्रवशेषाॊक भं बगवान श्रीकृ ष्ण की त्रवशेष कृ ऩा प्रासद्ऱ हेतु बगवान श्री कृ ष्ण के सयर भॊि-द्ऴोक-व्रत-ऩूजन इत्माफद सयर उऩामोको देने का प्रमास फकमा हं स्जससे साधायण व्मत्रि बी त्रवशेष राब प्राद्ऱ कय सकं ।
  5. 5. इस अॊक भं प्रकासशत श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेष से सॊफॊसधत जानकायीमं के त्रवषम भं साधक एवॊ त्रवद्रान ऩाठको से अनुयोध हं, मफद दशाामे गए भॊि, द्ऴोक, व्रत, ऩूजन त्रवसध इत्मादी के सॊकरन, प्रभाण ऩढ़ने, सॊऩादन भं, फडजाईन भं, टाईऩीॊग भं, त्रप्रॊफटॊग भं, प्रकाशन भं कोई िुफट यह गई हो, तो उसे स्वमॊ सुधाय रं मा फकसी मोग्म ज्मोसतषी, गुरु मा त्रवद्रान से सराह त्रवभशा कय रे । क्मोफक त्रवद्रान ज्मोसतषी, गुरुजनो एवॊ साधको के सनजी अनुबव शास्त्र एवॊ ग्रॊथं भं वस्णात भॊि, द्ऴोक, व्रत, ऩूजन त्रवसध, उऩामं, मॊि, साधना, उऩाम के प्रबावं का वणान कयने भं बेद होने ऩय सॊफॊसधत ऩूजन त्रवसध इत्माफद भं सबन्नता एवॊ उसके प्रबावं भं सबन्नता सॊबव हं। आऩका जीवन सुखभम, भॊगरभम हो बगवान श्रीकृ ष्ण की कृ ऩा आऩके ऩरयवाय ऩय फनी यहे। बगवान श्रीकृ ष्ण से महीॊ प्राथना हं… जैन फॊधु/फहनं कओ ऩमूाषण भहाऩवा की अनेक-अनेक शुबकाभनाएॊ। गुरुत्व कामाारम की औय से सबी को "सभच्छाभी दुक्कडभ ्" सिॊतन जोशी गुरुत्व ज्मोसतष भाससक ई-ऩत्रिका भं रेखन हेतु फ्रीराॊस (स्वतॊि) रेखकं का स्वागत हं... GURUTVA JYOTISH Monthly Astrology E-Magazines. Non Profitable Publication by Public Intrest A Part of GURUTVA KARYALAY गुरुत्व ज्मोसतष भाससक ई-ऩत्रिका भं रेखन हेतु फ्रीराॊस (स्वतॊि) रेखकं का स्वागत हं... गुरुत्व ज्मोसतष भाससक ई-ऩत्रिका भं आऩके द्राया सरखे गमे भॊि, मॊि, तॊि, ज्मोसतष, अॊक ज्मोसतष, वास्तु, पं गशुई, टैयं, येकी एवॊ अन्म आध्मास्त्भक ऻान वधाक रेख को प्रकासशत कयने हेतु बेज सकते हं। मफद आऩ रेखक नहीॊ हं औय आऩके ऩास इन त्रवषमं से सॊफॊसधत ऻान वधाक रेख, शास्त्र, ग्रॊथ इत्माफद की प्रसत, स्कै न कोऩी मा ई-ऩुस्तक हं तो आऩ उन ऻान वधाक साभग्रीमं को हजायं-राखं ऩाठकं के ऻान वधान, भागादशान के उद्देश्म से बेज सकते हं... अऩने रेख के साथ आऩ अऩना नाभ/ऩता/नॊफय दे सकते हं। (*पोटो बी बेज सकते हं।) कोई बी रेख इत्माफद बेजने से ऩूवा फ्रीराॊस रेखको से अनुयोध हं की गुरुत्व कामाारम भं सॊऩका कय सनमभ सूसि ई-भेर द्राया प्राद्ऱ कयरे, फपय रेख बेजे असधक जानकायी हेतु आऩ कामाारम भं सॊऩका कय सकते हं। GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us: gurutva.karyalay@gmail.com | chintan_n_joshi@yahoo.co.in
  6. 6. 6 अगस्त 2014 ***** श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत सूिना *****  ऩत्रिका भं प्रकासशत श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत रेख गुरुत्व कामाारम के असधकायं के साथ ही आयस्ऺत हं।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक भं वस्णात रेखं को नास्स्तक/अत्रवद्वासु व्मत्रि भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हं।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक का त्रवषम आध्मात्भ से सॊफॊसधत होने के कायण इसे त्रवसबन्न शास्त्रं से प्रेरयत होकय प्रस्तुत फकमा हं।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत त्रवषमो फक सत्मता अथवा प्राभास्णकता ऩय फकसी बी प्रकाय की स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हं।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत सबी जानकायीकी प्राभास्णकता एवॊ प्रबाव की स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की नहीॊ हं औय ना हीॊ प्राभास्णकता एवॊ प्रबाव की स्जन्भेदायी के फाये भं जानकायी देने हेतु कामाारम मा सॊऩादक फकसी बी प्रकाय से फाध्म हं।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत रेखो भं ऩाठक का अऩना त्रवद्वास होना आवश्मक हं। फकसी बी व्मत्रि त्रवशेष को फकसी बी प्रकाय से इन त्रवषमो भं त्रवद्वास कयने ना कयने का अॊसतभ सनणाम स्वमॊ का होगा।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक भं वस्णात रेख से सॊफॊसधत फकसी बी प्रकाय की आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।  इस अॊक भं वस्णात सॊफॊसधत रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ अनुशॊधान के आधाय ऩय फदए गमे हं। हभ फकसी बी व्मत्रि त्रवशेष द्राया प्रमोग फकमे जाने वारे, भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोकी स्जन्भेदायी नफहॊ रेते हं। मह स्जन्भेदायी भॊि-मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोको कयने वारे व्मत्रि फक स्वमॊ फक होगी।  क्मोफक इन त्रवषमो भं नैसतक भानदॊडं, साभास्जक, कानूनी सनमभं के स्खराप कोई व्मत्रि मफद नीजी स्वाथा ऩूसता हेतु प्रमोग कताा हं अथवा प्रमोग के कयने भे िुफट होने ऩय प्रसतकू र ऩरयणाभ सॊबव हं।  श्रीकृ ष्ण जन्भाद्शभी त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत जानकायी को भाननने से प्राद्ऱ होने वारे राब, राब की हानी मा हानी की स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की नहीॊ हं।  हभाये द्राया ऩोस्ट की गई सबी जानकायी एवॊ भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय स्वमॊ ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधुगण ऩय प्रमोग फकमे हं स्जस्से हभे हय प्रमोग मा कवि, भॊि-मॊि मा उऩामो द्राया सनस्द्ळत सपरता प्राद्ऱ हुई हं।  असधक जानकायी हेतु आऩ कामाारम भं सॊऩका कय सकते हं। (सबी त्रववादो के सरमे के वर बुवनेद्वय न्मामारम ही भान्म होगा।)
  7. 7. 7 अगस्त 2014 नाग ऩॊिभी का धासभाक भहत्व  त्रवजम ठाकु य नाग ऩॊिभी व्रत श्रावण शुक्र ऩॊिभीको फकमा जाता है । रेफकन रोकािाय व सॊस्कृ सत- बेद के कायण नाग ऩॊिभी व्रत को फकसी जगह कृ ष्णऩऺभं बी फकमा जाता है । इसभे ऩयत्रवद्धा मुि ऩॊिभी री जाती है । ऩौयास्णक भान्मता के अनुशाय इस फदन नाग-सऩा को दूधसे स्त्रान औय ऩूजन कय दूध त्रऩराने से व्रती को ऩुण्म पर की प्रासद्ऱ होती हं। अऩने घय के भुख्म द्राय के दोनं ओय गोफयके सऩा फनाकय उनका दही, दूवाा, कु शा, गन्ध, अऺत, ऩुष्ऩ, भोदक औय भारऩुआ इत्माफदसे ऩूजन कय ब्राह्मणंको बोजन कयाकय एकबुि व्रत कयनेसे घयभं सऩंका बम नहीॊ होता है । सऩात्रवष दूय कयने हेतु सनम्न सनम्नसरस्खत भॊि का जऩ कयने का त्रवधान हं। "ॐ कु रुकु ल्मे हुॊ पद स्वाहा।" नाग ऩॊिभी की ऩौयास्णक कथा ऩौयास्णक कथा के अनुशाय प्रािीन कार भं फकसी नगय के एक सेठजी के सात ऩुि थे। सातं ऩुिं के त्रववाह हो िुके थे। सफसे छोटे ऩुि की ऩत्नी श्रेद्ष िरयि की त्रवदुषी औय सुशीर थी, रेफकन उसका कोई बाई नहीॊ था। एक फदन फिी फहू ने घय रीऩने के सरए ऩीरी सभट्टी राने हेतु सबी फहुओॊ को साथ िरने को कहा तो सबी फहू उस के साथ सभट्टी खोदने के औजाय रेकय िरी गई औय फकसी स्थान ऩय सभट्टी खोदने रगी, तबी वहाॊ एक सऩा सनकरा, स्जसे फिी फहू खुयऩी से भायने रगी। मह देखकय छोटी फहू ने फिी फहू को योकते हुए कहा "भत भायो इस सऩा को? मह फेिाया सनयऩयाध है।" छोटी फहू के कहने ऩय फिी फहू ने सऩा को नहीॊ भाया औय सऩा एक ओय जाकय फैठ गमा। तफ छोटी फहू ने सऩा से कहा "हभ अबी रौट कय आती हं तुभ महाॊ से कहीॊ जाना भत" इतना कहकय वह सफके साथ सभट्टी रेकय घय िरी गई औय घय के काभकाज भं पॉ सकय सऩा से जो वादा फकमा था उसे बूर गई। उसे दूसये फदन वह फात माद आई तो सफ फहूओॊ को साथ रेकय वहाॉ ऩहुॉिी औय सऩा को उस स्थान ऩय फैठा देखकय फोरी "सऩा बैमा नभस्काय!" सऩा ने कहा तू बैमा कह िुकी है, इससरए तुझे छोि देता हूॊ, नहीॊ तो झूठे वादे कयने के कायण तुझे अबी डस रेता। छोटी फहू फोरी बैमा भुझसे बूर हो गई, उसकी ऺभा भाॉगती हूॊ, तफ सऩा फोरा- अच्छा, तू आज से भेयी फफहन हुई औय भं तेया बाई हुआ। तुझे जो भाॊगना हो, भाॉग रे। वह फोरी- बैमा! भेया कोई नहीॊ है, अच्छा हुआ जो तू भेया बाई फन गमा। कु छ फदन व्मतीत होने ऩय वह सऩा भनुष्म का रूऩ धयकय उसके घय आमा औय फोरा फक "भेयी फफहन को फुरा दो, भं उसे रेने आमा हूॉ" सफने कहा फक इसके तो कोई बाई नहीॊ था! तो वह फोरा- भं दूय के रयश्ते भं इसका बाई हूॉ, फिऩन भं ही फाहय िरा गमा था। उसके त्रवद्वास फदराने ऩय घय के रोगं ने छोटी को उसके साथ बेज फदमा। उसने भागा भं फतामा फक "भं वहीॊ सऩा हूॉ, इससरए तू डयना नहीॊ औय जहाॊ िरने भं कफठनाई हो वहाॊ भेया हाथ ऩकि रेना। उसने कहे अनुसाय ही फकमा नाग ऩॊिभी त्रवशेष
  8. 8. 8 अगस्त 2014 औय इस प्रकाय वह उसके घय ऩहुॊि गई। वहाॉ के धन- ऐद्वमा को देखकय वह िफकत हो गई। वह सऩा ऩरयवाय अके साथ आनॊद से यहने रगी। एक फदन सऩा की भाता ने उससे कहा "भं एक काभ से फाहय जा यही हूॉ, तू अऩने बाई को ठॊडा दूध त्रऩरा देना। उसे मह फात ध्मान न यही औय उससे गरसत से गभा दूध त्रऩरा फदमा, स्जसभं उसका भुहॉ फुयी तयह जर गमा। मह देखकय सऩा की भाता फहुत क्रोसधत हुई। ऩयॊतु सऩा के सभझाने ऩय भाॉ िुऩ हो गई। तफ सऩा ने कहा फक फफहन को अफ उसके घय बेज देना िाफहए। तफ सऩा औय उसके त्रऩता ने उसे बेट स्वरुऩ फहुत सा सोना, िाॉदी, जवाहयात, वस्त्र-बूषण आफद देकय उसके घय ऩहुॉिा फदमा। साथ रामा ढेय साया धन देखकय फिी फहू ने ईषाा से कहा तुम्हायाॊ बाई तो फिा धनवान है, तुझे तो उससे औय बी धन राना िाफहए। सऩा ने मह विन सुना तो सफ वस्तुएॉ सोने की राकय दे दीॊ। मह देखकय फिी फहू की रारि फढ़ गई उसने फपय कहा "इन्हं झािने की झािू बी सोने की होनी िाफहए" तफ सऩा ने झाडू बी सोने की राकय यख दी। सऩा ने अऩने फफहन को हीया-भस्णमं का एक अद्भुत हाय फदमा था। उसकी प्रशॊसा उस देश की यानी ने बी सुनी औय वह याजा से फोरी फक "सेठ की छोटी फहू का हाय महाॉ आना िाफहए।" याजा ने भॊिी को हुक्भ फदमा फक उससे वह हाय रेकय शीघ्र उऩस्स्थत हो भॊिी ने सेठजी से जाकय कहा फक "भहायानीजी ने छोटी फहू का हाय भॊगवामा हं, तो वह हाय अऩनी फहू से रेकय भुझे दे दो"। सेठजी ने डय के कायण छोटी फहू से हाय भॊगाकय दे फदमा। छोटी फहू को मह फात फहुत फुयी रगी, उसने अऩने सऩा बाई को माद फकमा औय आने ऩय प्राथाना की- बैमा ! यानी ने भेया हाय छीन सरमा है, तुभ कु छ ऐसा कयो फक जफ वह हाय उसके गरे भं यहे, तफ तक के सरए सऩा फन जाए औय जफ वह भुझे रौटा दे तफ वह ऩुन् हीयं औय भस्णमं का हो जाए। सऩा ने ठीक वैसा ही फकमा। जैसे ही यानी ने हाय ऩहना, वैसे ही वह सऩा फन गमा। मह देखकय यानी िीख ऩिी औय योने रगी। मह देख कय याजा ने सेठ के ऩास खफय बेजी फक छोटी फहू को तुयॊत बेजो। सेठजी डय गए फक याजा न जाने क्मा कयेगा? वे स्वमॊ छोटी फहू को साथ रेकय उऩस्स्थत हुए। याजा ने छोटी फहू से ऩूछा "तुने क्मा जादू फकमा है, भं तुझे दण्ड दूॊगा।" छोटी फहू फोरी "याजन ! धृद्शता ऺभा कीस्जए" मह हाय ही ऐसा है फक भेये गरे भं हीयं औय भस्णमं का यहता है औय दूसये के गरे भं सऩा फन जाता है। मह सुनकय याजा ने वह सऩा फना हाय उसे देकय कहा- अबी ऩहनकय फदखाओ। छोटी फहू ने जैसे ही उसे ऩहना वैसे ही हीयं-भस्णमं का हो गमा। मह देखकय याजा को उसकी फात का त्रवद्वास हो गमा औय उसने प्रसन्न होकय उसे बेट भं फहुत सी भुद्राएॊ बी ऩुयस्काय भं दीॊ। छोटी वह अऩने हाय औय बेट सफहत घय रौट आई। उसके धन को देखकय फिी फहू ने ईषाा के कायण उसके ऩसत को ससखामा फक छोटी फहू के ऩास कहीॊ से धन आमा है। मह सुनकय उसके ऩसत ने अऩनी ऩत्नी को फुराकय कहा सि-सि फताना फक मह "धन तुझे कौन देता है?" तफ वह सऩा को माद कयने रगी। तफ उसी सभम सऩा ने प्रकट होकय कहा मफद भेयी धभा फफहन के आियण ऩय सॊदेह प्रकट कयेगा तो भं उसे डॊस रूॉगा। मह सुनकय छोटी फहू का ऩसत फहुत प्रसन्न हुआ औय उसने सऩा देवता का फिा सत्काय फकमा। भान्मता हं की उसी फदन से नागऩॊिभी का त्मोहाय भनामा जाता है औय स्स्त्रमाॉ सऩा को बाई भानकय उसकी ऩूजा कयती हं।
  9. 9. 9 अगस्त 2014 सॊतानप्रासद्ऱ त्रवशेष ऩुिदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवाय)  सिॊतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी ऩौयास्णक कारसे ही फहॊदू धभा भं एकादशी व्रत का त्रवशेष धासभाक भहत्व यहा है। श्रावण भास के शुक्र ऩऺ की एकादशी को ऩुिदा एकादशी अथवा ऩत्रविा एकादशी बी कहते हं। एकादशी के फदन बगवान त्रवष्णु के फदन काभना ऩूसता के सरए व्रत-ऩूजन फकमा जाता है। इस वषा ऩुिदा एकादशी 07-अगस्त-2014 गुरुवाय के फदन है, गुरुवाय को बगवान त्रवष्णु के ऩूजन हेतु श्रेद्ष भाना जाता हं औय इस वषा ऩुिदा एकादशी औय गुरुवाय का सॊमोग एक साथ हो यहा हं, जो त्रवद्रानं के भतानुशाय असत उत्तभ हं। ज्मोसतष गणना के अनुशाय इस वषा 07-अगस्त-2014 सूमोदम के सभम कका रग्न होगा, रग्नेश नीि िॊद्रभा की ऩॊिभ बाव भं भॊगर के घय भं स्स्थती बी सॊतान प्रासद्ऱ की इच्छा यखने वारो के सरए उत्तभ भानी गई हं। उसी के साथ ही इस फदन फकमा गमा धासभाक ऩूजन-व्रत इत्माफद आध्मास्त्भक कामा शुब ग्रहं के प्रबाव से शीघ्र एवॊ त्रवशेष पर प्रदान कयने वारा ससद्ध होगा क्मोफक उच्ि का गुरु षद्षेश एवॊ बाग्मेश हो कय रग्न गृह भं स्स्थत होकय ऩॊिभ बाव (सॊतान गृह), सद्ऱभ बाव (जीवन साथी) एवॊ नवभ बाव(बाग्म बाग) को देख यहा हं। गुरु के साथ सूमा स्स्थत हं जो आध्मास्त्भक कामं भं वृत्रद्ध का सॊके त देता हं। सूमा के साथ फुध का फुधाफदत्म मोग बी त्रवशेष शुबदाम भाना गमा हं। ऩुि कायक ग्रह वक्री के तु के ऩॊिभ बाव ऩय शुब दृद्शी सॊतान प्रासद्ऱ हेतु सहामक यहेगी। फकन्तु भॊगर+शसन की मुसत सॊके त दे यही हं की सॊतान प्रासद्ऱ की इच्छा यखने वारे दॊऩत्रत्तमं को त्रवशेष सावधानी अवश्म यखनी, फकसी बी तयह की राऩयवाही, भनभुटाव इत्माफद से त्रवऩरयत ऩरयणाभ सॊबव हं। सॊतान प्रासद्ऱ की इच्छा यखने वारे दॊऩत्रत्तमं को ऩुिदा एकादशी व्रत का सनमभ ऩारन दशभी सतसथ (6 अगस्त 2014, फुधवाय) की यात्रि से ही शुरु कयं शुद्ध सित्त से ब्रह्मिमा का ऩारन कयं। गुरुवाय के फदन सुफह जल्दी उठकय सनत्मकभा से सनवृत्त होकय स्वच्छ वस्त्र धायण कय बगवान त्रवष्णु की प्रसतभा के साभने फैठकय व्रत का सॊकल्ऩ कयं। व्रत हेतु उऩवास यखं अन्न ग्रहण नहीॊ कयं, एक मा दो सभम पराहाय कय सकते हं। तत्ऩद्ळमात बगवान त्रवष्णु का ऩूजन ऩूणा त्रवसध- त्रवधान से कयं। (मफद स्वमॊ ऩूजन कयने भं असभथा हं सॊतान गोऩार मॊि उत्तभ सॊतान प्रासद्ऱ हेतु शास्त्रोि त्रवसध-त्रवधान से असबभॊत्रित सॊतान गोऩार मॊि का ऩूजन एवॊ अनुद्षान त्रवशेष राबप्रद भाना गमा हं। सॊतान प्रासद्ऱ मॊि एवॊ कवि से सॊफॊसधत असधक जानकायी हेतु गुरुत्व कामाारम भं सॊऩका कय सकते हं। Ask Now
  10. 10. 10 अगस्त 2014 तो फकसी मोग्म त्रवद्रान ब्राह्मण से बी ऩूजन कयवा सकते हं।) बगवान त्रवष्णु को शुद्ध जर से स्नान कयाए। फपय ऩॊिाभृत से स्नान कयाएॊ स्नान के फाद के वर ऩॊिाभृत के ियणाभृत को व्रती (व्रत कयने वारा) अऩने औय ऩरयवाय के सबी सदस्मं के अॊगं ऩय सछिके औय उस ियणाभृत को ऩीए। तत ऩद्ळमात ऩुन् शुद्ध जर से स्नान कयाकय प्रसतभाक स्वच्छ कऩिे से ऩोछरं। इसके फाद बगवान को गॊध, ऩुष्ऩ, धूऩ, दीऩ, नैवेद्य आफद ऩूजन साभग्री अत्रऩात कयं। त्रवष्णु सहस्त्रनाभ का जऩ कयं एवॊ ऩुिदा एकादशी व्रत की कथा सुनं। यात को बगवान त्रवष्णु की भूसता के सभीऩ शमन कयं औय दूसये फदन अथाात द्रादशी 8- अगस्त-2014 जुराई, शुक्रवाय के फदन त्रवद्रान ब्राह्मणं को बोजन कयाकय व सप्रेभ दान-दस्ऺणा इत्माफद देकय उनका आशीवााद प्राद्ऱ कयं। इस प्रकाय ऩत्रविा एकादशी व्रत कयने से मोग्म सॊतान की प्रासद्ऱ होती है। त्रवशेष सूिना: ऩुि प्रासद्ऱ का तात्ऩमा के वर उत्तभ सॊतान की प्रासद्ऱ सभझे। क्मोफक, उऩयोि वस्णात ऩुि प्रासद्ऱ एकादशी से सॊफॊसधत सबी जानकायी शास्त्रोि वस्णात हं, अत् व्रत से के वर ऩुि सॊतान की प्रासद्ऱ हो ऐसा नहीॊ हं इस व्रत से उत्तभ सॊतान की प्रासद्ऱ होती हं, िाहे वह सॊतान ऩुि हो मा कन्मा। आज के आधुसनक मुग भं ऩुि सॊतान व कन्मा सॊतान भं कोई त्रवशेष पका नहीॊ यहा हं। कन्मा मा भफहराएॊ बी ऩुि मा ऩुरुष के सभान ही सफर एवॊ शत्रिशारी हं। अत् के वर ऩुि सॊतान की काभना कयना व्मथा हं। अत् के वर उत्तभ सॊतान की काभना से व्रत कये। जानकाय एवॊ त्रवद्रानं के अनुबव के अनुशाय ऩीछरे कु छ वषो भं उन्हं अऩने अनुशॊधान से मह तथ्म सभरे हं की के वर ऩुि काभना से की गई असधकतय साधानाएॊ, व्रत-उऩवास इत्माफद उऩामं से दॊऩत्रत्त को ऩुि की जगह उत्तभ कन्म सॊतान की प्रासद्ऱ हुवी हं, औय वह कन्मा सॊतान ऩुि सॊतान से कई असधक फुत्रद्धभान एवॊ भाता-त्रऩता का नाभ सभाज भं योशन कयने वारी यही हं। सॊबवत इस मुग भं नायीमं की कभ होती जनसॊख्मा के कायण इद्वयने बी अऩने सनमभ फदर सरमे हंगे इस सरए ऩुि काभना के परस्वरुऩ उत्तभ कन्मा सॊतान की प्रासद्ऱ हो यही होगी। दस्ऺणावसता शॊख आकाय रॊफाई भं पाईन सुऩय पाईन स्ऩेशर आकाय रॊफाई भं पाईन सुऩय पाईन स्ऩेशर 0.5" ईंि 180 230 280 4" to 4.5" ईंि 730 910 1050 1" to 1.5" ईंि 280 370 460 5" to 5.5" ईंि 1050 1250 1450 2" to 2.5" ईंि 370 460 640 6" to 6.5" ईंि 1250 1450 1900 3" to 3.5" ईंि 460 550 820 7" to 7.5" ईंि 1550 1850 2100 हभाये महाॊ फिे आकाय के फकभती व भहॊगे शॊख जो आधा रीटय ऩानी औय 1 रीटय ऩानी सभाने की ऺभता वारे होते हं। आऩके अनुरुध ऩय उऩरब्ध कयाएॊ जा सकते हं। >> Order Now | Ask Now  स्ऩेशर गुणवत्ता वारा दस्ऺणावसता शॊख ऩूयी तयह से सपे द यॊग का होता हं।  सुऩय पाईन गुणवत्ता वारा दस्ऺणावसता शॊख पीके सपे द यॊग का होता हं।  पाईन गुणवत्ता वारा दस्ऺणावसता शॊख दं यॊग का होता हं। GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 | Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com
  11. 11. 11 अगस्त 2014 सवा कामा ससत्रद्ध कवि स्जस व्मत्रि को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के फादबी उसे भनोवाॊसछत सपरतामे एवॊ फकमे गमे कामा भं ससत्रद्ध (राब) प्राद्ऱ नहीॊ होती, उस व्मत्रि को सवा कामा ससत्रद्ध कवि अवश्म धायण कयना िाफहमे। कवि के प्रभुख राब: सवा कामा ससत्रद्ध कवि के द्राया सुख सभृत्रद्ध औय नव ग्रहं के नकायात्भक प्रबाव को शाॊत कय धायण कयता व्मत्रि के जीवन से सवा प्रकाय के दु:ख-दारयद्र का नाश हो कय सुख-सौबाग्म एवॊ उन्नसत प्रासद्ऱ होकय जीवन भे ससब प्रकाय के शुब कामा ससद्ध होते हं। स्जसे धायण कयने से व्मत्रि मफद व्मवसाम कयता होतो कायोफाय भे वृत्रद्ध होसत हं औय मफद नौकयी कयता होतो उसभे उन्नसत होती हं।  सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं सवाजन वशीकयण कवि के सभरे होने की वजह से धायण कताा की फात का दूसये व्मत्रिओ ऩय प्रबाव फना यहता हं।  सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं अद्श रक्ष्भी कवि के सभरे होने की वजह से व्मत्रि ऩय सदा भाॊ भहा रक्ष्भी की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना यहता हं। स्जस्से भाॊ रक्ष्भी के अद्श रुऩ (१)- आफद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)- धैमा रक्ष्भी, (४)-गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)- त्रवजम रक्ष्भी, (७)-त्रवद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी रुऩो का अशीवााद प्राद्ऱ होता हं।  सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं तॊि यऺा कवि के सभरे होने की वजह से ताॊत्रिक फाधाए दूय होती हं, साथ ही नकायात्भक शत्रिमो का कोइ कु प्रबाव धायण कताा व्मत्रि ऩय नहीॊ होता। इस कवि के प्रबाव से इषाा-द्रेष यखने वारे व्मत्रिओ द्राया होने वारे दुद्श प्रबावो से यऺा होती हं।  सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं शिु त्रवजम कवि के सभरे होने की वजह से शिु से सॊफॊसधत सभस्त ऩयेशासनओ से स्वत् ही छु टकाया सभर जाता हं। कवि के प्रबाव से शिु धायण कताा व्मत्रि का िाहकय कु छ नही त्रफगाि सकते। अन्म कवि के फाये भे असधक जानकायी के सरमे कामाारम भं सॊऩका कये: फकसी व्मत्रि त्रवशेष को सवा कामा ससत्रद्ध कवि देने नही देना का अॊसतभ सनणाम हभाये ऩास सुयस्ऺत हं। >> Order Now GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Website: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com | www.gurutvakaryalay.blogspot.com Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
  12. 12. 12 अगस्त 2014 ऩुिदा (ऩत्रविा) एकादशी व्रत की ऩौयास्णक कथा  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी श्रावण : शुक्र ऩऺ एक फाय मुसधत्रद्षय बगवान श्रीकृ ष्ण से ऩूछते हं, हे बगवान! श्रावण शुक्र एकादशी का क्मा नाभ है? इसभं फकस देवता की ऩूजा की जाती है औय इसका व्रत कयने से क्मा पर सभरता है ?" व्रत कयने की त्रवसध तथा इसका भाहात्म्म कृ ऩा कयके कफहए। बगवान श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक इस एकादशी का नाभ ऩुिदा एकादशी है। अफ आऩ शाॊसतऩूवाक इस व्रतकी कथा सुसनए। इसके सुनने भाि से ही वाजऩेमी मऻ / अनन्त मऻ का पर सभरता है। द्राऩय मुग के आयॊब भं भफहष्भसत नाभ की एक नगयी थी, स्जसभं भफहष्भती नाभ का याजा याज्म कयता था, रेफकन ऩुिहीन होने के कायण याजा को याज्म सुखदामक नहीॊ रगता था। उसका भानना था फक स्जसके सॊतान न हो, उसके सरए मह रोक औय ऩयरोक दोनं ही दु:खदामक होते हं। ऩुि सुख की प्रासद्ऱ के सरए याजा ने अनेक उऩाम फकए ऩयॊतु याजा को ऩुि की प्रासद्ऱ नहीॊ हुई। वृद्धावस्था आती देखकय याजा ने प्रजा के प्रसतसनसधमं को फुरामा औय कहा- हे प्रजाजनं! भेये खजाने भं अन्माम से उऩाजान फकमा हुआ धन नहीॊ है। न भंने कबी देवताओॊ तथा ब्राह्मणं का धन छीना है। फकसी दूसये की धयोहय बी भंने नहीॊ री, प्रजा को ऩुि के सभान ऩारता यहा। भं अऩयासधमं को ऩुि तथा फाॉधवं की तयह दॊड देता यहा। कबी फकसी से घृणा नहीॊ की। सफको सभान भाना है। सज्जनं की सदा ऩूजा कयता हूॉ। इस प्रकाय धभामुि याज्म कयते हुए बी भेये ऩुि नहीॊ है। सो भं अत्मॊत दु:ख ऩा यहा हूॉ, इसका क्मा कायण है? याजा भफहष्भती की इस फात को त्रविायने के सरए भॊिी तथा प्रजा के प्रसतसनसध वन को गए। वहाॉ फिे-फिे ऋत्रष-भुसनमं के दशान फकए। याजा की उत्तभ काभना की ऩूसता के सरए फकसी श्रेद्ष तऩस्वी भुसन को खोजते-फपयते यहे। एक आश्रभ भं उन्हंने एक अत्मॊत वमोवृद्ध धभा के ऻाता, फिे तऩस्वी, ऩयभात्भा भं भन रगाए हुए सनयाहाय, स्जतंद्रीम, स्जतात्भा, स्जतक्रोध, सनातन धभा के गूढ़ तत्वं को जानने वारे, सभस्त शास्त्रं के ऻाता भहात्भा रोभश भुसन को देखा, स्जनका कल्ऩ के व्मतीत होने ऩय एक योभ सगयता था। सफने जाकय ऋत्रष को प्रणाभ फकमा। उन रोगं को देखकय भुसन ने ऩूछा फक आऩ रोग फकस कायण से आए हं? सन:सॊदेह भं आऩ रोगं का फहत करूॉ गा। भेया जन्भ के वर दूसयं के उऩकाय के सरए हुआ है, इसभं सॊदेह भत कयो। रोभश ऋत्रष के ऐसे विन सुनकय सफ रोग फोरे- हे भहषे! आऩ हभायी फात जानने भं ब्रह्मा से बी असधक सभथा हं। अत: आऩ हभाये इस सॊदेह को दूय कीस्जए। भफहष्भसत ऩुयी का धभाात्भा याजा भफहष्भती प्रजा का ऩुि के सभान ऩारन कयता है। फपय बी वह ऩुिहीन होने के कायण दु:खी है। उन रोगं ने आगे कहा फक हभ रोग उसकी प्रजा हं। अत: उसके दु:ख से हभ बी दु:खी हं। आऩके दशान से हभं ऩूणा त्रवद्वास है फक हभाया मह सॊकट अवश्म दूय हो जाएगा क्मंफक भहान ऩुरुषं के दशान भाि से अनेक कद्श दूय हो जाते हं। अफ आऩ कृ ऩा कयके याजा के ऩुि होने का उऩाम फतराएॉ। मह वाताा सुनकय ऐसी करुण प्राथाना सुनकय रोभश ऋत्रष नेि फन्द कयके याजा के ऩूवा जन्भं ऩय त्रविाय कयने रगे औय याजा के ऩूवा जन्भ का वृत्ताॊत जानकय कहने रगे फक मह याजा ऩूवा जन्भ भं एक सनधान वैश्म था। सनधान होने के कायण इसने कई फुये कभा फकए। मह एक गाॉव से दूसये गाॉव व्माऩाय कयने जामा कयता था। ज्मेद्ष भास के शुक्र ऩऺ की एकादशी के फदन वह दो फदन से बूखा-प्मासा था भध्माह्न के
  13. 13. 13 अगस्त 2014 सभम, एक जराशम ऩय जर ऩीने गमा। उसी स्थान ऩय एक तत्कार की प्रसूता हुई प्मासी गौ जर ऩी यही थी। याजा ने उस प्मासी गाम को जराशम से जर ऩीते हुए हटा फदमा औय स्वमॊ जर ऩीने रगा, इसीसरए याजा को मह दु:ख सहना ऩिा। एकादशी के फदन बूखा यहने से वह याजा हुआ औय प्मासी गौ को जर ऩीते हुए हटाने के कायण ऩुि त्रवमोग का दु:ख सहना ऩि यहा है। ऐसा सुनकय सफ रोग कहने रगे फक हे ऋत्रष! शास्त्रं भं ऩाऩं का प्रामस्द्ळत बी सरखा है। अत: स्जस प्रकाय याजा का मह ऩाऩ नद्श हो जाए, आऩ ऐसा उऩाम फताइए। रोभश भुसन कहने रगे फक श्रावण शुक्र ऩऺ की एकादशी को स्जसे ऩुिदा एकादशी बी कहते हं, तुभ सफ रोग व्रत कयो औय यात्रि को जागयण कयो तो इससे याजा का मह ऩूवा जन्भ का ऩाऩ नद्श हो जाएगा, साथ ही याजा को ऩुि की अवश्म प्रासद्ऱ होगी। याजा के सभस्त दु्ख नष्ट हो जामंगे। "रोभश ऋत्रष के ऐसे विन सुनकय भॊत्रिमं सफहत सायी प्रजा नगय को वाऩस रौट आई औय जफ श्रावण शुक्र एकादशी आई तो ऋत्रष की आऻानुसाय सफने ऩुिदा एकादशी का व्रत औय जागयण फकमा। इसके ऩद्ळात द्रादशी के फदन इसके ऩुण्म का पर याजा को सभर गमा। उस ऩुण्म के प्रबाव से यानी ने गबा धायण फकमा औय नौ भहीने के ऩश्िात ् ही उसके एक अत्मन्त तेजस्वी ऩुियत्न ऩैदा हुआ । इससरए हे याजन! इस श्रावण शुक्र एकादशी का नाभ ऩुिदा ऩिा। अत: सॊतान सुख की इच्छा यखने वारे भनुष्म को िाफहए के वे त्रवसधऩूवाक श्रावण भास के शुक्र ऩऺ की एकादशी का व्रत कयं। इसके भाहात्म्म को सुनने से भनुष्म सफ ऩाऩं से भुि हो जाता है औय इस रोक भं सॊतान सुख बोगकय ऩयरोक भं स्वगा को प्राद्ऱ होता है। कथा का उद्देश्म : ऩाऩ कयते सभम हभ मह नहीॊ सोिते फक हभ क्मा कय यहे है, रेफकन शास्िं से त्रवफदत होता है फक हभाये द्राया फकमा गमे गमे छोटे मा फडे ऩाऩ से हभं कष्ट बोगना ऩिता है, अत् हभं ऩाऩ से फिना िाफहए। क्मंफक ऩाऩ के कायण ऩीछरे जन्भ भं फकमा गमा कभा का पर दूसये जन्भ भं बी बोगना ऩि सकता हं। इस सरए हभं िाफहए फक सत्मव्रत का ऩारन कय ईश्वयभं ऩूणा आस्था एवॊ सनष्ठा यखे औय मह फात सदैव ध्मान यखे फक फकसी की बी आत्भा को गल्ती से बी कद्श ना हो। नवयत्न जफित श्री मॊि शास्त्र विन के अनुसाय शुद्ध सुवणा मा यजत भं सनसभात श्री मॊि के िायं औय मफद नवयत्न जिवा ने ऩय मह नवयत्न जफित श्री मॊि कहराता हं। सबी यत्नो को उसके सनस्द्ळत स्थान ऩय जि कय रॉके ट के रूऩ भं धायण कयने से व्मत्रि को अनॊत एद्वमा एवॊ रक्ष्भी की प्रासद्ऱ होती हं। व्मत्रि को एसा आबास होता हं जैसे भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हं। नवग्रह को श्री मॊि के साथ रगाने से ग्रहं की अशुब दशा का धायण कयने वारे व्मत्रि ऩय प्रबाव नहीॊ होता हं। गरे भं होने के कायण मॊि ऩत्रवि यहता हं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो जर त्रफॊदु शयीय को रगते हं, वह गॊगा जर के सभान ऩत्रवि होता हं। इस सरमे इसे सफसे तेजस्वी एवॊ परदासम कहजाता हं। जैसे अभृत से उत्तभ कोई औषसध नहीॊ, उसी प्रकाय रक्ष्भी प्रासद्ऱ के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भं नहीॊ हं एसा शास्त्रोि विन हं। इस प्रकाय के नवयत्न जफित श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्राया शुब भुहूता भं प्राण प्रसतत्रद्षत कयके फनावाए जाते हं। Rs: 2800, 3250, 3700, 4600, 5500 से 10,900 से असधक >> OrderNow | Ask Now GURUTVA KARYALAY : Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
  14. 14. 14 अगस्त 2014 अजा (जमा) एकादशी व्रत की ऩौयास्णक कथा  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी बाद्रऩद भास कृ ष्णऩऺ की एकादशी एक फाय मुसधत्रद्षय बगवान श्रीकृ ष्ण से ऩूछते हं, हे बगवान! बाद्रऩद कृ ष्ण एकादशी का क्मा नाभ है? इसभं फकस देवता की ऩूजा की जाती है औय इसका व्रत कयने से क्मा पर सभरता है? " व्रत कयने की त्रवसध तथा इसका भाहात्म्म कृ ऩा कयके कफहए। बगवान श्रीकृ ष्ण कहने रगे फक इस एकादशी का नाभ अजा एकादशी है। अफ आऩ शाॊसतऩूवाक इस व्रतकी कथा सुसनए। अजा एकादशी व्रत सभस्त प्रकाय के ऩाऩं का नाश कयने वारी हं। जो भनुष्म इस फदन बगवान ऋत्रषके श की ऩूजा कयता है उसको वैकुॊ ठ की प्रासद्ऱ अवश्म होती है। अफ आऩ इसकी कथा सुसनए। प्रािीनकार भं आमोध्मा नगयी भं हरयशिॊद्र नाभक एक िक्रवतॉ याजा याज्म कयता था। हरयशिॊद्र अत्मन्त वीय, प्रताऩी तथा सत्मवादी था। एक फाय दैवमोग से उसने अऩना याज्म स्वप्न भं फकसी ऋत्रष को दान कय फदमा औय ऩरयस्स्थसतवश के वशीबूत होकय अऩना साया याज्म व धन त्माग फदमा, साथ ही अऩनी स्त्री, ऩुि तथा स्वमॊ को बी फेि फदमा। उसने उस िाण्डार के महाॊ भृतकं के वस्त्र रेने का काभ फकमा । भगय फकसी प्रकाय से सत्म से त्रविसरत नहीॊ हुआ। जफ इसी प्रकाय उसे कई वषा फीत गमे तो उसे अऩने इस कभा ऩय फिा दु्ख हुआ औय वह इससे भुक्त होने का उऩाम खोजने रगा । कई फाय याजा सिॊता भं डूफकय अऩने भन भं त्रविाय कयने रगता फक भं कहाॉ जाऊॉ , क्मा करूॉ , स्जससे भेया उद्धाय हो। इस प्रकाय याजा को कई वषा फीत गए। एक फदन याजा इसी सिॊता भं फैठा हुआ था फक फहाॉ गौतभ ऋत्रष आ गए। याजा ने उन्हं देखकय प्रणाभ फकमा औय अऩनी सायी दु:खबयी कहानी कह सुनाई। मह फात सुनकय गौतभ ऋत्रष कहने रगे फक याजन तुम्हाये बाग्म से आज से सात फदन फाद बाद्रऩद कृ ष्ण ऩऺ की अजा नाभ की एकादशी आएगी, तुभ त्रवसधऩूवाक व्रत कयो तथा यात्रि को जागयण कयो। गौतभ ऋत्रष ने कहा फक इस व्रत के ऩुण्म प्रबाव से तुम्हाये सभस्त ऩाऩ नद्श हो जाएॉगे। इस प्रकाय याजा से कहकय गौतभ ऋत्रष उसी सभम अॊतध्माान हो गए। याजा ने उनके कथनानुसाय एकादशी आने ऩय त्रवसधऩूवाक व्रत व जागयण फकमा। उस व्रत के प्रबाव से याजा के सभस्त ऩाऩ नद्श हो गए। स्वगा से फाजे-नगािे फजने रगे औय ऩुष्ऩं की वषाा होने रगी। उसने अऩने साभने ब्रह्मा, त्रवष्णु, भहादेवजी तथा इन्द्र आफद देवताओॊ को खिा ऩामा । उसने अऩने भृतक ऩुि को जीत्रवत औय अऩनी स्त्री को वस्त्र तथा आबूषणं से मुि देखा। वास्तव भं एक ऋत्रष ने याजा की ऩयीऺा रेने के सरए मह सफ कौतुक फकमा था । फकन्तु अजा एकादशी के व्रत के प्रबाव से साया षडमॊि सभाप्त हो गमा औय व्रत के प्रबाव से याजा को ऩुन: याज्म सभर गमा। अॊत भं वह अऩने ऩरयवाय सफहत स्वगा को गमा। हे याजन! मह सफ अजा एकादशी के प्रबाव से ही हुआ। अत: जो भनुष्म मत्न के साथ त्रवसधऩूवाक इस व्रत को कयते हुए यात्रि जागयण कयते हं, उनके सभस्त ऩाऩ नद्श होकय अॊत भं वे स्वगारोक को प्राद्ऱ होते हं। इस एकादशी की कथा के श्रवणभाि से अद्वभेध मऻ का पर प्राद्ऱ होता है। कथा का उद्देश्म : हभं को ईश्वय के प्रसत ऩूणा आस्था एवॊ सनष्ठा यखनी िाफहए । त्रवऩरयत ऩरयस्स्थसतमं भं बी हभं सत्म का भागा नहीॊ छोिना िाफहए।
  15. 15. 15 अगस्त 2014 फहन्दू सॊस्कृ सत भं कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत का भहत्व  सिॊतन जोशी श्री कृ ष्णजन्भाद्शभी को बगवान श्री कृ ष्ण के जनभोत्स्व के रुऩ भं भनामा जाता है। बगवान श्रीकृ ष्ण के बगवद गीता भं वस्णात उऩदेश ऩुयातन कार से ही फहन्दु सॊस्कृ सत भं आदशा यहे हं। जन्भाद्शभी का त्मौहाय ऩुये त्रवद्व भं हषोल्रास एवॊ आस्था से भनामा जाता हं। श्रीकृ ष्ण का जन्भ बाद्रऩद भाह की कृ ष्ण ऩऺ की अद्शभी को भध्मयात्रि को भथुया भं कायागृह भं हुवा। जैसे की इस स्जन सभग्र सॊसाय के ऩारन कताा स्वमॊ अवतरयत हुएॊ थे। अत: इस फदन को कृ ष्ण जन्भाद्शभी के रूऩ भं भनाने की ऩयॊऩया सफदमं से िरी आयही हं। श्रीकृ ष्ण जन्भोत्सव के सरए देश- दुसनमा के त्रवसबन्न कृ ष्ण भॊफदयं को त्रवशेष तौय ऩय सजामा जाता है। जन्भाद्शभी के फदन व्रती फायह फजे तक व्रत यखते हं। इस फदन भॊफदयं भं बगवान श्री कृ ष्ण की त्रवसबन्न झाॊकीमाॊ सजाई जाती है औय यासरीरा का आमोजन होता है। बगवान श्री कृ ष्ण की फार स्वरुऩ प्रसतभा को त्रवसबन्न शृॊगाय साभग्रीमं से सुसस्ज्जत कय प्रसतभा को ऩारने भं स्थात्रऩत कय कृ ष्ण भध्मयािी को झूरा झुरामा जाता हं। धभाशास्त्रं के जानकायं ने श्रीकृ ष्णजन्भाद्शभीका व्रत सनातन-धभाावरॊत्रफमं के सरए त्रवशेष भहत्व ऩूणा फतामा है। इस फदन उऩवास यखने तथा अन्न का सेवन नहीॊ कयने का त्रवधान धभाशास्त्रं भं वस्णात हं। गौतभीतॊिभं मह उल्रेख है- उऩवास: प्रकताव्मोन बोिव्मॊकदािन। कृ ष्णजन्भफदनेमस्तुबुड्क्िे सतुनयाधभ:। सनवसेन्नयके घोयेमावदाबूतसम्प्रवभ्॥ अथाात: अभीय-गयीफ सबी रोग मथाशत्रि- मथासॊबव उऩिायं से मोगेद्वय कृ ष्ण का जन्भोत्सव भनाएॊ। जफ तक उत्सव सम्ऩन्न न हो जाए तफ तक बोजन त्रफल्कु र न कयं। जो वैष्णव कृ ष्णाद्शभी के फदन बोजन कयता है, वह सनद्ळम ही नयाधभ है। उसे प्ररम होने तक घोय नयक भं यहना ऩडता है। इसी सरए जन्भाद्शभी के फदन बगवान श्रीकृ ष्ण की प्रसतभा का त्रवसध-त्रवधान से ऩूजन इत्माफद कयने का त्रवशेष भहत्व सनातन धभा भं यहा हं। धभाग्रॊथं भं जन्भाद्शभी की यात्रि भं जागयण का त्रवधान बी फतामा गमा है। त्रवद्रानं का भत हं की कृ ष्णाद्शभी की यात भं बगवान श्रीकृ ष्ण के नाभ का सॊकीतान इत्माफद कयने से बि को श्रीकृ ष्ण की त्रवशेष कृ ऩा प्रासद्ऱ होती हं। धभाग्रॊथं भं जन्भाद्शभी के व्रत भं ऩूये फदन उऩवास यखने का सनमभ है, ऩयॊतु इसभं असभथा रोग पराहाय कय सकते हं।
  16. 16. 16 अगस्त 2014 भॊि ससद्ध स्पफटक श्री मॊि "श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्रिशारी मॊि है। "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त शुब फ़रदमी मॊि है। जो न के वर दूसये मन्िो से असधक से असधक राब देने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्रि के सरए पामदेभॊद सात्रफत होता है। ऩूणा प्राण-प्रसतत्रद्षत एवॊ ऩूणा िैतन्म मुि "श्री मॊि" स्जस व्मत्रि के घय भे होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससद्ध होता है उसके दशान भाि से अन-सगनत राब एवॊ सुख की प्रासद्ऱ होसत है। "श्री मॊि" भे सभाई अफद्रतीम एवॊ अद्रश्म शत्रि भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे सभथा होसत है। स्जस्से उसका जीवन से हताशा औय सनयाशा दूय होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता फक औय सनयन्तय गसत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौसतक सुखो फक प्रासद्ऱ होसत है। "श्री मॊि" भनुष्म जीवन भं उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दूय कय सकायत्भक उजाा का सनभााण कयने भे सभथा है। "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थात्रऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु से सम्फस्न्धत ऩयेशासन भे न्मुनता आसत है व सुख-सभृत्रद्ध, शाॊसत एवॊ ऐद्वमा फक प्रसद्ऱ होती है। >> >> >> >> >> Order Now गुरुत्व कामाारम भे "श्री मॊि" 12 ग्राभ से 2250 Gram (2.25Kg) तक फक साइज भे उप्रब्ध है . भूल्म:- प्रसत ग्राभ Rs. 12.50 से Rs.28.00 GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: www.gurutvakaryalay.com | www.gurutvajyotish.com बत्रवष्मऩुयाण भं उल्रेख हं स्जस याद्स मा प्रदेश भं मह व्रत-उत्सव त्रवसध- त्रवधान से भनामा जाता है, वहाॊ ऩय प्राकृ सतक प्रकोऩ मा भहाभायी इत्माफद नहीॊ होती। भेघ ऩमााद्ऱ वषाा कयते हं तथा पसर खूफ होती है। जनता सुख-सभृत्रद्ध प्राद्ऱ कयती है। इस व्रत के अनुद्षान से सबी व्रतीमं को ऩयभ श्रेम की प्रासद्ऱ होती है। व्रत कताा बगवत्कृ ऩा का बागी फनकय इस रोक भं सफ सुख बोगता है औय अन्त भं वैकुॊ ठ जाता है। कृ ष्णाद्शभी का व्रत कयने वारे के सबी प्रकाय क्रेश दूय हो जाते हं। उसका दुख-दरयद्रता से उद्धाय होता है। स्कन्द ऩुयाण भं उल्रेख हं फक जो बी व्मत्रि इस व्रत के भहत्व को जानकय बी कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत को नहीॊ कयता, वह भनुष्म जॊगर भं सऩा औय व्माघ्र होता है। बत्रवष्म ऩुयाण उल्रेख हं, फक कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत को जो भनुष्म नहीॊ कयता, वह क्रू य याऺस होता है। के वर अद्शभी सतसथ भं ही उऩवास कयना कहा गमा है। मफद वही सतसथ योफहणी नऺि से मुि हो तो उसे 'जमॊती' नाभ से सॊफोसधत की जाएगी। त्रवसबन्न धभाशास्त्रं भं उल्रेख हं, फक जो उत्तभ भनुष्म है। वे सनस्द्ळत रूऩ से जन्भाद्शभी व्रत को इस रोक भं कयते हं। उनके ऩास सदैव स्स्थय रक्ष्भी होती है। इस व्रत के कयने के प्रबाव से उनके सभस्त कामा ससद्ध होते हं। मफद आधी यात के सभम योफहणी भं जफ कृ ष्णाद्शभी हो तो उसभं कृ ष्ण का अिान औय ऩूजन कयने से तीन जन्भं के ऩाऩं का नाश होता है। भहत्रषा बृगु ने कहा है- जन्भाद्शभी, योफहणी औय सशवयात्रि मे ऩूवात्रवद्धा ही कयनी िाफहए तथा सतसथ एवॊ नऺि के अन्त भं ऩायणा कयं। इसभं के वर योफहणी उऩवास ही ससद्ध है। शास्त्रकायं नं श्रीकृ ष्ण-जन्भाद्शभी की यात्रि को भोहयात्रि कहा है। इस यात भं बगवान श्रीकृ ष्ण का ध्मान, नाभ अथवा भॊि जऩते हुए जागयण कयने से सॊसाय की भोह-भामा से आसत्रि दूय होती है। जन्भाद्शभी के व्रत को व्रतयाज कहाॊ गमा है। क्मोफक, इस व्रत को ऩूणा त्रवसध- त्रवधान से कयने से भनुष्म को अनेक व्रतं से प्राद्ऱ होने वारे भहान ऩुण्म का पर के वर इस व्रत के कयने से प्राद्ऱ हो जाता हं।
  17. 17. 17 अगस्त 2014 कृ ष्ण जन्भाद्शभी व्रत की ऩौयास्णक कथा  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, सॊदीऩ शभाा एक फाय इॊद्र ने नायद जी से कहा "हे भुसनमं भं सवाश्रेद्ष, सबी शास्त्रं के ऻाता, हे देव, व्रतं भं उत्तभ उस व्रत को फताएॉ, स्जस व्रत के कयने से भनुष्मं को भुत्रि, राब प्राद्ऱ हो तथा उस व्रत से प्रास्णमं को बोग व भोऺ दोनो की प्रासद्ऱ हो जाए।" देवयाज इॊद्र के विनं को सुनकय नायद जी ने कहा "िेता मुग के अॊत भं औय द्राऩय मुग के प्रायॊब सभम भं धृस्णत कभा को कयने वारा कॊ स नाभ का एक अत्मॊत ऩाऩी दैत्म हुआ। उस दुद्श व दुयािायी कॊ स की देवकी नाभ की एक सुॊदय व सुशीर फहन थी। उस देवकी के गबा से उत्ऩन्न आठवाॉ ऩुि कॊ स का वध कयेगा।" नायद जी की फातं सुनकय इॊद्र ने कहा हे प्रबो "उस दुयािायी कॊ स की कथा का त्रवस्तायऩूवाक वणान कीस्जए। क्मा देवकी के गबा से उत्ऩन्न आठवाॉ ऩुि अऩने भाभा कॊ स की हत्मा कयेगा! मह सॊबव है।" इॊद्र की सन्देह बयी फातं को सुनकय नायदजी ने कहा हे अफदसत ऩुि इॊद्र! एक सभम की फात है। उस दुद्श कॊ स ने एक ज्मोसतषी से ऩूछा "भेयी भृत्मु फकस प्रकाय औय फकसके द्राया होगी।" ज्मोसतषी फोरे "हे दानवं भं श्रेद्ष कॊ स! "वसुदेव की ऩत्नी देवकी है औय आऩकी फहन बी है। उसी के गबा से उत्ऩन्न उसका आठवाॊ ऩुि जो फक शिुओॊ को ऩयास्जत कय इस सॊसाय भं "कृ ष्ण" के नाभ से त्रवख्मात होगा, वही एक सभम सूमोदम कार भं आऩका वध कयेगा।" ज्मोसतषी की फातं को सुनकय कॊ स ने कहा "हे दैवज, अफ आऩ मह फताएॊ फक देवकी का आठवाॊ ऩुि फकस भास भं फकस फदन भेया वध कयेगा।" ज्मोसतषी फोरे "हे भहायाज! भाघ भास की शुक्र ऩऺ की सतसथ को सोरह कराओॊ से ऩूणा श्रीकृ ष्ण से आऩका मुद्ध होगा। उसी मुद्ध भं वे आऩका वध कयंगे। इससरए हे भहायाज! आऩ अऩनी यऺा मत्नऩूवाक कयं।" इतना फताने के ऩद्ळात नायद जी ने इॊद्र से कहा "ज्मोसतषी द्राया फताए गए सभम ऩय ही कॊ स की भृत्मु कृ ष्ण के हाथ सन्सॊदेह होगी।" तफ इॊद्र ने कहा "हे भुसन! उस दुयािायी कॊ स की कथा का वणान कीस्जए, औय फताइए फक कृ ष्ण का जन्भ कै से होगा तथा कॊ स की भृत्मु कृ ष्ण द्राया फकस प्रकाय होगी।" इॊद्र की फातं को सुनकय नायदजी ने ऩुन् कहना प्रायॊब फकमा "उस दुयािायी कॊ स ने अऩने एक द्रायऩार से कहा भेयी इस प्राणं से त्रप्रम फहन देवकी की ऩूणा सुयऺा कयना।" द्रायऩार ने कहा "ऐसा ही होगा भहायाज।" कॊ स के जाने के ऩद्ळात उसकी छोटी फहन देवकी दु्स्खत होते हुए जर रेने के फहाने घिा रेकय ताराफ ऩय गई। उस ताराफ के फकनाये एक वृऺ के नीिे फैठकय देवकी योने रगी। उसी सभम एक सुॊदय स्त्री, स्जसका नाभ मशोदा था, उसने आकय देवकी से त्रप्रम वाणी भं कहा "हे देवी! इस प्रकाय तुभ क्मं त्रवराऩ कय यही हो। अऩने योने का कायण भुझसे फताओ।" तफ दुखी देवकी ने मशोदा से कहा "हे फहन! नीि कभं भं आसि दुयािायी भेया ज्मेद्ष भ्राता कॊ स है।
  18. 18. 18 अगस्त 2014 उस दुद्श भ्राता ने भेये कई ऩुिं का वध कय फदमा। इस सभम भेये गबा भं आठवाॉ ऩुि है। वह इसका बी वध कय डारेगा, क्मंफक भेये ज्मेद्ष भ्राता को मह बम है फक भेये अद्शभ ऩुि से उसकी भृत्मु अवश्म होगी।" देवकी की फातं सुनकय मशोदा ने कहा "हे फहन! त्रवराऩ भत कयो। भं बी गबावती हूॉ। मफद भुझे कन्मा हुई तो तुभ अऩने ऩुि के फदरे उस कन्मा को रे रेना। इस प्रकाय तुम्हाया ऩुि कॊ स के हाथं भाया नहीॊ जाएगा।" कॊ स ने वाऩस आकय अऩने द्रायऩार से ऩूछा "देवकी कहाॉ है? इस सभम वह फदखाई नहीॊ दे यही है।" तफ द्रायऩार ने कॊ स से नम्रवाणी भं कहा "हे भहायाज! आऩकी फहन जर रेने ताराफ ऩय गई हुई हं।" मह सुनते ही कॊ स क्रोसधत हो उठा औय उसने द्रायऩार को उसी स्थान ऩय जाने को कहा जहाॊ वह गई हुई है। द्रायऩार की दृत्रद्श ताराफ के ऩास देवकी ऩय ऩिी। तफ उसने कहा फक "आऩ फकस कायण से महाॉ आई हं।" उसकी फातं सुनकय देवकी ने कहा फक "भेये घय भं जर नहीॊ था, भं जर रेने जराशम ऩय आई हूॉ।" इसके ऩद्ळात देवकी अऩने घय की ओय िरी गई। कॊ स ने ऩुन् द्रायऩार से कहा फक इस घय भं भेयी फहन की तुभ ऩूणात् यऺा कयो। अफ कॊ स को इतना बम रगने रगा फक घय के बीतय दयवाजं भं त्रवशार तारे फॊद कयवा फदए जैसे कोई कायागाय हो औय दयवाज़े के फाहय दैत्मं औय याऺसं को ऩहयेदायी के सरए सनमुि कय फदमा। कॊ स हय प्रकाय से अऩने प्राणं को फिाने के प्रमास कय यहा था। तफ सबी प्रकाय के शुब भुहूता भं श्री कृ ष्ण का जन्भ हुआ औय श्रीकृ ष्ण के प्रबाव से ही उसी ऺण फन्दीगृह के दयवाज़े स्वमॊ खुर गए। द्राय ऩय ऩहया देने वारे ऩहयेदाय याऺस सबी भूस्च्छात हो गए। देवकी ने उसी ऺण अऩने ऩसत वसुदेव से कहा "हे स्वाभी! आऩ सनद्रा का त्माग कयं औय भेये इस ऩुि को गोकु र भं रे जाएॉ, वहाॉ इस ऩुि को नॊद गोऩ की धभाऩत्नी मशोदा को दे दं। उस सभम मभुनाजी ऩूणारूऩ से फाढ़ग्रस्त थीॊ, फकन्तु जफ वसुदेवजी फारक कृ ष्ण को सूऩ भं रेकय मभुनाजी को ऩाय कयने के सरए उतये उसी ऺण फारक के ियणं का स्ऩशा होते ही मभुनाजी अऩने ऩूवा स्स्थय रूऩ भं आ गईं। फकसी प्रकाय वसुदेवजी गोकु र ऩहुॉिे औय नॊद के घय भं प्रवेश कय उन्हंने अऩना ऩुि तत्कार उन्हं दे फदमा औय उसके फदरे भं उनकी कन्मा रे री। वे तत्कार वहाॊ से वाऩस आकय कॊ स के फॊदी गृह भं ऩहुॉि गए। प्रात्कार जफ सबी याऺस ऩहयेदाय सनद्रा से जागे तो कॊ स ने द्रायऩार से ऩूछा फक अफ देवकी के गबा से क्मा हुआ? इस फात का ऩता रगाकय भुझे फताओ। द्रायऩारं ने भहायाज की आऻा को भानते हुए कायागाय भं जाकय देखा तो वहाॉ देवकी की गोद भं एक कन्मा थी। स्जसे देखकय द्रायऩारं ने कॊ स को सूसित फकमा, फकन्तु कॊ स को तो उस कन्मा से बम होने रगा। अत् वह स्वमॊ कायागाय भं गमा औय उसने देवकी की गोद से कन्मा को झऩट सरमा औय उसे एक ऩत्थय की िट्टान ऩय ऩटक फदमा फकन्तु वह कन्मा त्रवष्णु की भामा से आकाश की ओय िरी गई औय अॊतरयऺ भं जाकय त्रवद्युत के रूऩ भं ऩरयस्णत हो गई। बगवान त्रवष्णु ने आकाशवाणी कय कॊ स से कहा फक "हे दुद्श! तुझे भायने वारा गोकु र भं नॊद के घय भं उत्ऩन्न हो िुका है औय उसी से तेयी भृत्मु सुसनस्द्ळत है। भेया नाभ तो वैष्णवी है, भं सॊसाय के कताा बगवान त्रवष्णु की भामा से उत्ऩन्न हुई हूॉ।" इतना कहकय वह स्वगा की ओय िरी गई। उस आकाशवाणी को सुनकय कॊ स क्रोसधत हो उठा। उसने नॊद के घय भं ऩूतना, के शी

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