देवी(कथा-कहानी)
रचनाकार: मुंशी प्रेमचुंद
आरम्भ
चरम स्थिति
अुंत
प्रस्ततत द्वारा: आशतोष गोएल
देवी: रचनाकार: मुंशी प्रेमचुंद
रात भीग चकी थी। मैं बरामदे में खडा था। सामने अमीनद्दौला पाकक नीुंद में डूबा खडा था । ससर्क एक औरत एक तककयादार बेंच पर बैठी हई थी । पाकक के
बाहर सडक के ककनारे एक फ़कीर खडा राहगीरों को दआयें दे रहा था - खदा और रसूल का वास्ता... राम और भगवान का वास्ता - इस अन्धे पर रहम करो ।
सडक पर मोटरों और सवाररयों का ताुंता बन्द हो चका था । इक्के -दक्के आदमी नजर आ जाते थे । फ़कीर की आवाज जो पहले नक्कारखाने में तूती की आवाज
थी, जब खले मैदानों की बलन्द पकार हो रही थी । एकाएक वह औरत उठी और इधर-उधर चौकन्नी आुंखों से देखकर फ़कीर के हाथ में कछ रख ददया और कर्र
बहत धीमे से कछ कहकर एक तरफ़ चली गई । फ़कीर के हाथ में कागज का एक टकडा नजर आया जजसे वह बार-बार मल रहा था । क्या उस औरत ने यह
कागज ददया है ?
यह क्या रहस्य है? उसको जानने के कतूहल से अधीर होकर मैं नीचे आया और फ़कीर के पास जाकर खडा हो गया ।
मेरी आहट आते ही फ़कीर ने उस कागज के पजे को उुंगसलयों से दबाकर मझे ददखाया और पूछा - बाबा, देखो यह क्या चीज है ?
मैंने देखा-दस रुपये का नोट था । बोला- दस रुपये का नोट है, कहााँ पाया ?
मैंने और कछ न कहा । उस औरत की तरफ़ दौडा जो अब अन्धेरे में बस एक सपना बनकर रह गई थी । वह कई गसलयों में होती हई एक टूटे-र्ू टे मकान के
दरवाजे पर रुकी, ताला खोला और अन्दर चली गई ।
रात को कछ पूछना ठीक न समझकर मैं लौट आया ।
रात भर जी उसी तरफ़ लगा रहा । एकदम तडके कफ़र मैं उस गली में जा पहुंचा । मालूम हआ, वह एक अनाथ ववधवा है । मैंने दरवाजे पर जाकर पकारा- देवी,
मैं तम्हारे दशकन करने आया हूाँ ।
औरत बाहर तनकल आई - गरीबी और बेकसी की जजन्दा तस्वीर ।
मैंने दहचकते हए कहा- रात आपने फ़कीर.......
देवी ने बात काटते हए कहा-" अजी, वह क्या बात थी, मझे वह नोट पडा समल गया था, मेरे ककस काम का था ।
मैंने उस देवी के कदमों पर ससर झका ददया ।
- प्रेमचुंद
[ साभार - लघकथा सादहत्य ]
देवी (कथा-कहानी): स्टोरीबोडक
साभार
देवी | लघकिा | Short Story by Munshi Premchand
"देवी | लघकथा | Short Story By Munshi Premchand". Bharatdarshan.co.nz. N.
p., 2016. Web. 7 Sept. 2016.
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देवी (कथा-कहानी)| रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद |

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    देवी(कथा-कहानी) रचनाकार: मुंशी प्रेमचुंद आरम्भ चरमस्थिति अुंत प्रस्ततत द्वारा: आशतोष गोएल
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    देवी: रचनाकार: मुंशीप्रेमचुंद रात भीग चकी थी। मैं बरामदे में खडा था। सामने अमीनद्दौला पाकक नीुंद में डूबा खडा था । ससर्क एक औरत एक तककयादार बेंच पर बैठी हई थी । पाकक के बाहर सडक के ककनारे एक फ़कीर खडा राहगीरों को दआयें दे रहा था - खदा और रसूल का वास्ता... राम और भगवान का वास्ता - इस अन्धे पर रहम करो । सडक पर मोटरों और सवाररयों का ताुंता बन्द हो चका था । इक्के -दक्के आदमी नजर आ जाते थे । फ़कीर की आवाज जो पहले नक्कारखाने में तूती की आवाज थी, जब खले मैदानों की बलन्द पकार हो रही थी । एकाएक वह औरत उठी और इधर-उधर चौकन्नी आुंखों से देखकर फ़कीर के हाथ में कछ रख ददया और कर्र बहत धीमे से कछ कहकर एक तरफ़ चली गई । फ़कीर के हाथ में कागज का एक टकडा नजर आया जजसे वह बार-बार मल रहा था । क्या उस औरत ने यह कागज ददया है ? यह क्या रहस्य है? उसको जानने के कतूहल से अधीर होकर मैं नीचे आया और फ़कीर के पास जाकर खडा हो गया । मेरी आहट आते ही फ़कीर ने उस कागज के पजे को उुंगसलयों से दबाकर मझे ददखाया और पूछा - बाबा, देखो यह क्या चीज है ? मैंने देखा-दस रुपये का नोट था । बोला- दस रुपये का नोट है, कहााँ पाया ? मैंने और कछ न कहा । उस औरत की तरफ़ दौडा जो अब अन्धेरे में बस एक सपना बनकर रह गई थी । वह कई गसलयों में होती हई एक टूटे-र्ू टे मकान के दरवाजे पर रुकी, ताला खोला और अन्दर चली गई । रात को कछ पूछना ठीक न समझकर मैं लौट आया । रात भर जी उसी तरफ़ लगा रहा । एकदम तडके कफ़र मैं उस गली में जा पहुंचा । मालूम हआ, वह एक अनाथ ववधवा है । मैंने दरवाजे पर जाकर पकारा- देवी, मैं तम्हारे दशकन करने आया हूाँ । औरत बाहर तनकल आई - गरीबी और बेकसी की जजन्दा तस्वीर । मैंने दहचकते हए कहा- रात आपने फ़कीर....... देवी ने बात काटते हए कहा-" अजी, वह क्या बात थी, मझे वह नोट पडा समल गया था, मेरे ककस काम का था । मैंने उस देवी के कदमों पर ससर झका ददया । - प्रेमचुंद [ साभार - लघकथा सादहत्य ]
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    साभार देवी | लघकिा| Short Story by Munshi Premchand "देवी | लघकथा | Short Story By Munshi Premchand". Bharatdarshan.co.nz. N. p., 2016. Web. 7 Sept. 2016. Clever Prototypes, L. Clever Prototypes, LLC. "Storyboard That: The World's Best FREE Online Storyboard Creator". Storyboard That. N. p., 2016. Web. 7 Sept. 2016.