आलम आरा मेहर विज के द्वारा
वे सभी सजीव हैं  , साँस ले रहे   हैं ,  अठत्तर  मुर्दा   इंसान जिन्दा हो गए ,  उनको बोलते ,  बातें करते देखो   I  
आरम्भिक आलमआरा   ( विश्व की रौशनी ) 1931  में बनी  हिन्दी भाषा  और भारत की पहली  सवाक   ( बोलती )  फिल्म है।  इस फिल्म के निर्देशक  अर्देशिर ईरानी  हैं। ईरानी ने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुये ,  आलमआरा को और कई समकालीन सवाक फिल्मों से पहले पूरा किया।
आरम्भिक आलम आरा का प्रथम प्रदर्शन मुंबई  ( तब बंबई )  के मैजेस्टिक सिनेमा में  14  मार्च  1931  को हुआ था। यह पहली भारतीय सवाक इतनी लोकप्रिय हुई कि  " पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण करने के लिए सहायता बुलानी पड़ी थी " ।
अब हम आपको आलम आरा की कुछ तस्वीरे दिखान्गे
 
 
 
 
 
संक्षेप - आलमआरा का एक दृश्य आलमआरा एक राजकुमार और बंजारन लड़की की प्रेम कथा है।  यह   जोसफ डेविड द्वारा लिखित एक पारसी नाटक पर आधारित है। जोसफ डेविड ने बाद में ईरानी की फिल्म कम्पनी में लेखक का काम किया। फिल्म की कहानी एक काल्पनिक ,  ऐतिहासिक कुमारपुर नगर के शाही परिवार पर आधारित है।
 
संक्षेप - आलमआरा का एक दृश्य फिल्म में एक राजा और उसकी दो झगड़ालू पत्नियां दिलबहार और नवबहार है।  दोनों के बीच झगड़ा तब और बढ़ जाता है जब एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि राजा के उत्तराधिकारी को नवबहार जन्म देगी। गुस्साई दिलबहार बदला लेने के लिए राज्य के प्रमुख मंत्री आदिल से प्यार की गुहार करती है पर आदिल उसके इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है।
संक्षेप - आलमआरा का एक दृश्य गुस्से में आकर दिलबहार आदिल को कारागार में डलवा देती है और उसकी बेटी आलमआरा को देशनिकाला दे देती है। आलमआरा को बंजारे पालते हैं। युवा होने पर आलमआरा महल में वापस लौटती है और राजकुमार से प्यार करने लगती है।  अंत में दिलबहार को उसके किए की सजा मिलती है ,  राजकुमार और आलमआरा की शादी होती है और आदिल की रिहाई।
महत्व फिल्म और इसका संगीत दोनों को ही व्यापक रूप से सफलता प्राप्त हुई ,  फिल्म का गीत  " दे दे खुदा के नाम पर "  जो भारतीय सिनेमा का भी पहला गीत था ,  और इसे अभिनेता  वज़ीर मोहम्मद खान  ने गाया था , जिन्होने फिल्म में एक फकीर का चरित्र निभाया था ,  बहुत प्रसिद्ध हुआ। उस समय भारतीय फिल्मों में पार्श्व गायन शुरु नहीं हुआ था ,  इसलिए इस गीत को हारमोनियम और तबले के संगीत की संगत के साथ सजीव रिकॉर्ड किया गया था।
महत्व फिल्म ने भारतीय फिल्मों में फिल्मी संगीत की नींव भी रखी ,  फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने फिल्म की चर्चा करते हुए कहा है , " यह सिर्फ एक सवाक फिल्म नहीं थी बल्कि यह बोलने और गाने वाली फिल्म थी जिसमें बोलना कम और गाना अधिक था।  इस फिल्म में कई गीत थे और इसने फिल्मों में गाने के द्वारा कहानी को कहे जाने या बढा़ये जाने की परम्परा का सूत्रपात किया। "
निर्माण तरन ध्वनि प्रणाली का उपयोग कर ,  अर्देशिर ईरानी ने ध्वनि रिकॉर्डिंग विभाग स्वंय संभाला था। फिल्म का छायांकन टनर एकल - प्रणाली कैमरे द्वारा किया गया था जो ध्वनि को सीधे फिल्म पर दर्ज करते थे   क्योंकि उस समय साउंडप्रूफ स्टूडियो उपलब्ध नहीं थे इसलिए दिन के शोरशराबे से बचने के लिए इसकी शूटिंग ज्यादातर रात में की गयी थी। शूटिंग के समय माइक्रोफ़ोन को अभिनेताओं के पास छिपा कर रखा जाता था।
मुख्य कलाकार मास्टर विट्ठल जुबैदा पृथ्वीराज कपूर
धन्यवाद 

Alam ara

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      आलम आरामेहर विज के द्वारा
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    वे सभी सजीव हैं ,साँस ले रहे हैं ,  अठत्तर  मुर्दा   इंसान जिन्दा हो गए , उनको बोलते , बातें करते देखो I  
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    आरम्भिक आलमआरा ( विश्व की रौशनी ) 1931 में बनी हिन्दी भाषा और भारत की पहली सवाक ( बोलती ) फिल्म है। इस फिल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी हैं। ईरानी ने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुये , आलमआरा को और कई समकालीन सवाक फिल्मों से पहले पूरा किया।
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    आरम्भिक आलम आराका प्रथम प्रदर्शन मुंबई ( तब बंबई ) के मैजेस्टिक सिनेमा में 14 मार्च 1931 को हुआ था। यह पहली भारतीय सवाक इतनी लोकप्रिय हुई कि " पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण करने के लिए सहायता बुलानी पड़ी थी " ।
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    संक्षेप - आलमआराका एक दृश्य आलमआरा एक राजकुमार और बंजारन लड़की की प्रेम कथा है। यह जोसफ डेविड द्वारा लिखित एक पारसी नाटक पर आधारित है। जोसफ डेविड ने बाद में ईरानी की फिल्म कम्पनी में लेखक का काम किया। फिल्म की कहानी एक काल्पनिक , ऐतिहासिक कुमारपुर नगर के शाही परिवार पर आधारित है।
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    संक्षेप - आलमआराका एक दृश्य फिल्म में एक राजा और उसकी दो झगड़ालू पत्नियां दिलबहार और नवबहार है। दोनों के बीच झगड़ा तब और बढ़ जाता है जब एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि राजा के उत्तराधिकारी को नवबहार जन्म देगी। गुस्साई दिलबहार बदला लेने के लिए राज्य के प्रमुख मंत्री आदिल से प्यार की गुहार करती है पर आदिल उसके इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है।
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    संक्षेप - आलमआराका एक दृश्य गुस्से में आकर दिलबहार आदिल को कारागार में डलवा देती है और उसकी बेटी आलमआरा को देशनिकाला दे देती है। आलमआरा को बंजारे पालते हैं। युवा होने पर आलमआरा महल में वापस लौटती है और राजकुमार से प्यार करने लगती है। अंत में दिलबहार को उसके किए की सजा मिलती है , राजकुमार और आलमआरा की शादी होती है और आदिल की रिहाई।
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    महत्व फिल्म औरइसका संगीत दोनों को ही व्यापक रूप से सफलता प्राप्त हुई , फिल्म का गीत " दे दे खुदा के नाम पर " जो भारतीय सिनेमा का भी पहला गीत था , और इसे अभिनेता वज़ीर मोहम्मद खान ने गाया था , जिन्होने फिल्म में एक फकीर का चरित्र निभाया था , बहुत प्रसिद्ध हुआ। उस समय भारतीय फिल्मों में पार्श्व गायन शुरु नहीं हुआ था , इसलिए इस गीत को हारमोनियम और तबले के संगीत की संगत के साथ सजीव रिकॉर्ड किया गया था।
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    महत्व फिल्म नेभारतीय फिल्मों में फिल्मी संगीत की नींव भी रखी , फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने फिल्म की चर्चा करते हुए कहा है , " यह सिर्फ एक सवाक फिल्म नहीं थी बल्कि यह बोलने और गाने वाली फिल्म थी जिसमें बोलना कम और गाना अधिक था। इस फिल्म में कई गीत थे और इसने फिल्मों में गाने के द्वारा कहानी को कहे जाने या बढा़ये जाने की परम्परा का सूत्रपात किया। "
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    निर्माण तरन ध्वनिप्रणाली का उपयोग कर , अर्देशिर ईरानी ने ध्वनि रिकॉर्डिंग विभाग स्वंय संभाला था। फिल्म का छायांकन टनर एकल - प्रणाली कैमरे द्वारा किया गया था जो ध्वनि को सीधे फिल्म पर दर्ज करते थे क्योंकि उस समय साउंडप्रूफ स्टूडियो उपलब्ध नहीं थे इसलिए दिन के शोरशराबे से बचने के लिए इसकी शूटिंग ज्यादातर रात में की गयी थी। शूटिंग के समय माइक्रोफ़ोन को अभिनेताओं के पास छिपा कर रखा जाता था।
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    मुख्य कलाकार मास्टरविट्ठल जुबैदा पृथ्वीराज कपूर
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