आदिकाल के नामकरणकी समस्या
नामकरण की समस्या-आदिकाल के नामकरण की समस्या पर विचार
करने से पूिव हमें इस बात पर विचार करना होगा नामकरण की समस्या
क्या है। जिस प्रकार ककसी घर में बच्चा पैिा होने पर पररिार के
विममन्न सिस्य उस बच्ची का नामकरण प्रसाि ने-अपने मतानुसार कर
िेते है तो उस बच्चे के मलए एक स्थायी नाम की समस्या उत्पन्न हो
िाती है, उसी प्रकार िम विमिन्न विद्िान सादहत्यकार ककमी अध्याय
अय्या काल का नामकरण अपने-अपने मतानुसार करने लगते हैं, तब
िहााँ िी उस अप्याय िगया काल डे स्पा नाम की समस्या उत्पन्न हो
िाती है। अस्तु, सादहत्य में ककसी काल, खण्ड, अध्याय अथिा विषय के
नाम को बारे में विमिन्न विषय विशनों के विमिन्न मत होना ही
तत्संबंधी नामकरण की समस्या कहलाती है।
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दहन्िी सादहत्य मेंआदिकाल का नामकरण : दहन्िी सादहत्य की धारा की से
ननकाली तथा इसका नामकरण कै से और क्या उत्सुकता लेकर यदि चचन्तन और
अध्ययन करें तो हमे अब से लेकर लगिग एक हिार िषव पीछे का छन विचधयां
इनतहास पत्ता होगा। दहन्िी सादहत्य का नामकरण करने िाले विद्िानों की एक
तम्बी श्रंखला रही है। अतः समय-समय पर उनके बादि को मारा ककए गए इसके
नामकरणों पर प्रश्न उठते रहे हैं। हालांकक सिी विद्िान इस बात पर सहकत है कक
आचायव रामचन्र शुक्ल द्िारा दहंिी की ककया गया दहन्िी सादहत्य के इनतहास का
काल-वििािन िो इस प्रकार है-
1. िीरगाथा काल सं. 1050-1375 (ई. 993-1318)
2. िजक्तकाल सं. 1375-1700 (ई. 1318-1643)
3. रीनतकाल सं. 1700-1900 (ई. 1643-1843)
4. आधुननक काल सं. 1900 से अब तक (ई. 1843 से अब तक)
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परन्तु विमिन्न विििानशुक्ल िी द्िारा ककए गए िीरगाथा काल (1050-1375)
नाम से असहमत हैं। यही नहीं, अन्य बहुत से विद्िानों ने िी इस काल का अपने-
अपने दहसाब से नामकरण ककया है। परन्तु यह िानने के मलए कक इस काल का
सबसे उपयुक्त नाम क्या हो सकता है, हमें विमिन्न विद्िानों द्िारा ककए गए इस
काल के नामकरणों पर दृजटिपात करना होगा।
1. चारण काल- चियसवन
2. आरंमिक काल- ममश्बन्धु
3. िीरगाथा काल- आचायव रामचंर शुक्ल
4. मसद्धसामंत काल- राहुल सांकर त्यायन
5. बीििपन काल- महािीरप्रसाि द्वििेिी
6. िीरकाल- विश्िनाथ प्रसाि ममश्
7. आदिकाल- हिारी प्रसाि द्वििेिी
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1. चारण काल-चियसवन ने इस नामकरण के पीछे ठोस प्रमाण नहीं दिए। उन्होंने
चारण काल को 653 ई० से माना है, ककं तु 1000 ई० से पूिव चारण कवियों की
रचनाओं के कोई िी साक्ष्य नहीं ममलते। अतः यह आधारहीन एिं अप्रमाणणक
मसद्ध हुआ।
2. आरंभिक काल- यह नाम सादहजत्यक प्रिरनत का द्योतक नहीं है। यह एक संज्ञा
मात्र है, िो काल के आरंि को बताता है। अतः तकव संगत नहीं है।
3. वीरगाथाकाल- आचायव रामचंर शुक्ल ने इस परकार अपने काल वििािन का
नामकरण ककया है, उनके अनुसार शुरू में विशेष सादहजत्यक प्रिरनत का अिाि
है। धमव, नीनत, श्रंगार, िीर आदि सिी प्रकार की रचनाएाँ ममलती हैं। दहंिी
सादहत्य के इनतहास में उस काल के 12 प्रमुख िंथ चुने तथा इन िंथों में
िीरता की प्रमुख प्रिरनत के आधार पर इसका नाम ‘िीरगाथा काल’ रख
दिया।परंतु निीन खोिो के अनुसार इनके कु छ िंथ अपभ्रंश सादहत्य के हैं।
बीसलिेि और खुमानरासो 15िीं शताब्िी के बाि की रचनाएं मसद्ध हुई।
परमालरासो और परथ्िीरािरासो का समय आि िी स्पटि नही हो पाया है।
ियचंि प्रकाश और ियमयंक िस चंदरका का मूल रूप आि िी उपलब्ध नहीं
है। अतः यह मत िी विद्िानों को रास नहीं आया।
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4. भसद्धसामंत काल-राहुल सांस्कर त्यायन के अनुसार िीिन में मसद्धों और
रािनीनत में सामंतो का बोलबाला था। कवियों ने अपनी रचनाओं में सामंतो का
मदहमामंडन ककया है। तत्कालीन सामंती व्ययस्था का बोध तो होता है, ककं तु
विशेष सादहजत्यक प्रिरनत का उल्लेख नहीं हो पाता। ककसी रािा या सामंत के
नाम को लेकर ककसी सदहजत्यक काल का नामकरण करना उचचत नहीं है।
5. बीजवपन काल- आचायव महािीरप्रसाि द्वििेिी ने इस कालखंड का नामकरण
बीििपन काल ककया है। यह नाम िी उचचत नहीं है। बीििपन का अथव है बीि
का बोना। उनके अनुसार दहंिी सादहत्य का बीि इस काल में बोया गया। परन्तु
ऐसा नहीं है क्योंकक इस काल में अपने पूिविती सादहत्य की प्राय सिी
काव्यरूदियों और परंपराओं का सफलतापूिवक ननिावह हुआ है।
6. वीरकाल- ककसी निीन तथ्य को प्रस्तुत नहीं करता है।
7. आदिकाल- आचायव हिारीप्रसाि के अनुसार यह काल प्रारम्ि का सूचक न होकर
परंपरा के विकास का सूचक है। आदिकाल नाम में दहंिी काव्यरूपों और िाषा के
अंकु ररत होने का िाि आ िाता है। यही नाम उपयुक्त ठहरता है। अचधकांश
विद्िानों ने इसे ही स्िीकार ककया है।
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डॉ. नागेन्र नेिी उनके द्िारा दिए गए इस नाम का समथवन ककया है। उनके
अनुसार - "िास्ति में, आदि ही ऐसा नाम है जिसे ककसी न ककसी रूप में सिी
सादहत्यकारों ने स्िीकार ककया है तथा जिससे दहन्िी सादहत्य के इनतहास की िाषा,
िाि, विचार, मशल्प आदि विषयों की सहि अनुिूनत प्राप्त है।“
अतः उपयुवक्त वििेचन के आधार पर कहा िा सकता है कक चूंकक आदिकाल के
उपलब्ध सादहत्य के आधार पर इस काल में ककसी विमशटि सादहजत्यक प्रिरवत्त तथा
ककसी विमशटि व्यजक्त के कर नतत्ि के िशवन नहीं होते हैं, इसमलए इसे आदिकाल
नाम िेना उपयुक्त है।