मातृभूमम
• कवव-भगवतिचरण वर्ााजी का जन्र् उन्नाव
जजले क
े शफ़ीपुर गााँव र्ें ३० अगस्ि १९०३
को ुआ था।
• इल ाबाद से इन् ोने बी.ए ,एल.एल.बी की
डिग्रि प्राप्ि की।
• “ववचार” “नवजीवन” पत्रिकाओिं का सिंपादन
ककया ।
5.
• इनसे रग्रचि“अग्रचलेखा” उपन्यास पर दो
बार कफ़ल्र् तनर्ााण ुआ ै।
• “भूले-त्रबसरे ग्रचि” उपन्यास को साह त्य
अकािर्ी पुरस्कार प्राप्ि ुआ ै।
• उपन्यास,क ानी, नाटक , कवविाओिं की
रचना इन् ोंने ककया ै।
7.
• कवव प्रस्िुिकवविा क
े द्वारा र्ािॄभूमर्
की ववशेषिाओिं पर प्रकाश िालले ैं।
र्ािृभूमर् को प्रणार् करिे ुए कवव
वनसिंपदा,खतनज सिंपवि का वणान करिे
ुए देश क
े ववभूतियों का स्र्रण करिे ैं।
कवव भारि र्ािा को शि-शि बार नर्न
करना चा िे ैं।
8.
इस पावनधरिी पर कई वीरों ने जन्र्
लेकर भारि र्ािा की सेवा ककया ै।
भारि र्ािा क
े गोद र्ें गााँधी,बुद्ध ,रार्
जैसे कई र् ान जस्ियााँ सोए ैं।
ऐसे पावन भूमर् क
े नागररक वे ैं इसमलए
वे प्रणार् करना चा िे ैं।
10.
पर्ातर्िाची शब्द
प्रणार् अमभवादन,नर्स्कारजननी-र्ािा,र्ााँ
भू- धरिी, भूमर् शतयि- सोया ुआ
नैसग्रगाक रूप र्ें भारि अत्यिंि सर्ृद्ध ै।
य ााँ क
े खेि रे-भरे,वन,बगीचें फ़ल-फ़
ू लों से
ल रािे ैं।
य ााँ की मर्ट्टी र्ें अपार खतनज सिंपवि प
ु पी ैं।
भारि र्ािा अपने र्ुक्ि ाथों से इस सिंपवि को
अपने सिंिानों र्ें बााँट र ी ै।
12.
पर्ातर्िाची शब्द
सुाना- र्नर्ो क-आकषाक
फ़
ू ल- क
ु सुर्,सुर्न
उपवन- बगीचा, वाहटका
स्ि- ाथ ,कर
कवव भारि र्ािा का स्वरूप का वणान
करिे ुए क िे ैं कक उसक
े एक ाथ र्ें
ज्ञान दीप ै, िो दूसरे ाथ र्ें न्याय
पिाका।
13.
आज र्ािाक
े साथ करोिों की सिंख्या
र्ें उनक
े सिंिान उनक
े साथ ैं।
र्ााँ कवव जग का काया पलट करने की
प्रथाना करिे ैं।
नगर और िार्ों र्ें “जय ह िंद” का नाद
गूाँज उठे ये उनकी इच्पा ै।