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तुम बिन जाएँ कहाँ

A hilarious poem on my mum's predicament

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तुम बिन जाएँ कहाँ

  1. 1. तुम बिन जाएँ कहाँ --- ? मेरे वैसे तो ररश्तेदार हैं अनगिनत, किसी से ररश्ता है ही नहीीं पर | जी हााँ ! नातेदार हैं अनेिानेि, नाता तो है ही नहीीं किसी से | पहचानवालों िी है सींख्या भारी, पर पहचान है नहीीं किसी से | ममत्र-मींड़ली है ज़रूर बड़ी, पर किसीिी है नहीीं ममत्रता सच्ची | देखिर मुस्िु राने, मसर हहलानेवाले हैं िई, िुज़रते हैं मोच िे िारण िरदन में यों ही | िु छ ऐसे हैं जो चाहते जी से मुझे जान-से बढ़िर हाँ मै उनिे मलए | बबलिु ल चाहती हाँ नही मैं उन्हें द्वार सारे उनिे मलए हैं सदा बन्द | िोई वातायान खुला नहीीं िहीीं-िभी छज्जे पर भी है जाली-िााँच िा आवरण | आिमन िे मलए भी, लक्ष्मी मााँ िे खुलता तो, सावधानी सहहत क्षण भर द्वार | चौखट पर न फल न हल्दी-अक्षत ्, दोनों ओर सजे रहते नाफ़तमलन बॉल | दरवाज़े पर सदा महिती रहती है हहट-स्रे िी सुिींध, िले में खराश | कफर भी न जाने आते िहााँ से वे जीव --- िभी हदखाई देते रसोई में बरतनों िे बीच |
  2. 2. कफर िभी हदखते पजा घर में भिवान िे पीछे िभी छज्जे में तो और िभी और िहीीं | मुझसे इतना क्या लिाव इतना अपार प्यार .. ? ताि िाली-िोल आाँखों से सरर से छछप जाते | िाड़ी-चालि माहहर है उन्हें पिड़ता फें ि आता अछत दर, कफर भी उनिा पीछा रहता बना | िभी वेिु अम क्लीनर से फाँ सािर छोड़ आता िहीीं िड़े में उन्हें रहने िे मलए | मैं पजा क्या िरती ? ! लिा रहता उन्हीीं िा ड़र, िब वे हदखाई दे िहीीं .. ? हे ईश्वर िृ पा िर | सींसार इतना बड़ा है, ज़मीन इतनी बड़ी है, वे क्यों आ जाते मेरे आवास ? न ममला उत्तर | हे मेरे शुभ-गचन्ति ! आप भी मााँिे दुआ मेरे मलए, ताकि मैं सााँस लाँ आराम से बािी जीवन-िाल ! अब बताती हाँ वह जीव है – जानी दुश्मन छिपकलियाँ, मेरी दृष्टट में बसा रहता सदा उन्हीीं िा रूप | मानो वे मुझसे िहते - िहतीीं तुम बबन जाएाँ िहााँ … ? समझ न आता – क्या िरूाँ ..? क्या िहाँ.. ?

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