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Gram shree by sumitranandan pant

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Gram shree by sumitranandan pant

  1. 1. ग्राम श्री
  2. 2. लेखक सुमित्रानंदन पंत का जन्ि उतराखंड के अल्िोडा जजले के कौसौनी गााँव िे २० िई सन १९०० ई. िे हुआ था | जन्ि के कु छ घंटे बाद ही उनकी िाता का देहांत हो गया | उनकी प्राजभिक मिक्षा अल्िोडा जजले िे हुई | १९१९ िे उन्होने उच्च मिक्षा के मलये भयोर सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद िे प्रवेि मलया उन्ही ददनों गााँधी जी के नेतृत्व िे चल रहे असहयोग आन्दोलन से जुड गए और पढाई छोड दी | उन्होंने प्रगततिील सादहत्य के प्रचार-प्रिार के मलए रूपाि नािक पत्रत्रका का प्रकािन कर िहत्त्वपूर्ण िूमिका तनिाई | सन १९५० से १९५७ तक पंत जी आकािवार्ी दहंदी के पराििणदाता रहे | उत्कृ ष्ट सादहत्य साधना के मलए उन्हें "सोवियत" भूमम ने नेहरु पुरस्कार, साहहत्य अकादमी पुरस्कार तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सभिातनत ककया | सन १९७१ िें िारत सरकार ने 'पदम ् भूषण' की उपाधध से वविूवित ककया | सन १९७७ िें पंत जी का तनधन हो गया|
  3. 3. सुममत्रानंदन पंत की रचनाएँ सुमित्रानंदन पंत संवेदनिील, िानवतावादी और प्रकृ तत प्रेिी कवव है | प्रकृ तत धचत्रर् के क्षेत्र िें वे अपना सनी नहीं रखते उनकी और रचनाओ िें िीणा, ग्रंथथ, पल्लि, गुंजन, युगान्त, युगिाणी, ग्राम्य, उतरा, स्िणण ककरण, कला और बुढा चाँद, थचदंबरा, लोकायतन आदद प्रिुख कृ ततया है | सुममत्रानंदन पंत की भाषा शैली सुमित्रा नन्द पंत ने अपनी रचानो के मलए साहहत्त्यक खडी बोली को अपनाया है | उनकी िािा सरल स्वािाववक एवं िावनाकु ल है | उन्होंने तत्सि िब्दों की बाहुबल के साथ साथ अरबी, ग्रीक, फारसी, अंग्रेजी िािाओ के िब्दों का िी प्रयोग ककया है | "उदहारण- ग्राि श्री कववता िें इसकी झलक देखने को मिल सकती है | ग्राि श्री का अथण है गााँव की लक्ष्िी, गााँव की सभपन्नता कवव इस कववता िें िारतीय गााँव की प्राकृ ततक सुििा का वर्णन करता है | िारतीय गााँव िें हरी-िरी लहलहाती फसले, फल-फू लो से िरे पेड नदी- तट की बालू आदद कवव को िुग्ध कर देती है यहााँ गंगा के रेत का िनोहारी वर्णन ककया जा रहा है | बालू के सापों से अंककत गंगा की सतरंगी रेती सुन्दर लगती संपत छाई तट पर तरबूजो के खेती; आंगुली की कं घी से बगुले कलंगी सवारते है कोई ततरते जल िें सुरखाव, पुमलत पर िगरोठी रहती सोई | बालू पर बने तनिाने को " बालू के सांप कहकर संबोधधत ककया है | गंगा की रेती जो सूयण का प्रकाि पडने के कारर् सतरंगी बनकर चिक रही है वह बालू के सांपो से अंककत है उसके चारो और सरपट की बनी झाडडयो और तट पर तरबूजो के खेत बडे सुन्दर लगते है | जल िें अपने एक पैर को उठा उठा कर सर खुजलाते बगुले ऐसे ददखाई पडते है जैसे बालो िें खंघी कर रहे हो | गंगा के उस प्रवाहिान जल िें कही सुखणन तैर रहे है तो कही ककनारे पर िगरोठी (एक विशेष थचड़िया) ऊाँ घती हुई िी ददखाई पड रही है |
  4. 4. Question 1: कवव ने गााँव को 'हरता जन िन' क्यों कहा है? Answer : गााँव का वातावरर् अत्यंत िनिोहक है। यहााँ प्रकृ तत का सौंदयण सिी लोगों के िन को अच्छा लगता है। इसमलए कवव ने गााँव को 'हरता जन िन' कहा है। Question 2: कववता िें ककस िौसि के सौंदयण का वर्णन है? Answer : प्रस्तुत कववता िें कवव ने सरसों के पीले फू ल के खखलने का वर्णन ककया है, जोकक वसंत ऋतु िें ही खखलते हैं। इस िौसि िें चारों तरफ़ हररयाली होती है। अत: कवव ने वसंत ऋतु के सौन्दयण का वर्णन ककया है।
  5. 5. Question 3: गााँव को 'िरकत डडब्बे सा खुला' क्यों कहा गया है? Answer : 'िरकत' 'पन्ना' नािक रत्न को कहते हैं। जजसका रंग हरा होता है। िरकत के खुले डडब्बे से सब कु छ साफ़-साफ़ ददखता है। िरकत के हरे रंग की तुलना गााँव की हररयाली से की गई है। गााँव का वातावरर् िी िरकत के खुले डडब्बे के सिान हरा िरा तथा खुला-खुला सा लगता है। इसमलए गााँव को 'िरकत डडब्बे सा खुला' कहा गया है। Question 4: अरहर और सनई के खेत कवव को कै से ददखाई देते हैं? Answer : अरहर और सनई के खेत कवव को सोने की ककं कखर्यों (करधनी) के सिान प्रतीत होते हैं।
  6. 6. Question 5: िाव स्पष्ट कीजजए - (क) बालू के सााँपों से अंककत गंगा की सतरंगी रेती (ख) हाँसिुख हररयाली दहि-आतप सुख से अलसाए-से सोए Answer : (क) प्रस्तुत पंजक्तयों िें गंगा नदी के तट वाली ज़िीन को सतरंगी कहा गया है। रेत पर टेढी-िेढी रेखाएाँ हैं, जो सूरज की ककरर्ों के प्रिाव से चिकने लगती हैं। ये रेखाएाँ टेढी चाल चलने वाले सााँपों के सिान प्रतीत होती हैं। (ख) इन पंजक्तयों िें गााँव की हररयाली का वर्णन प्रस्तुत ककया गया है। हाँसते हुए िुख के सिान गााँव की हररयाली सददणयों की धूप िें आलस्य से सो रही प्रतीत होती है।
  7. 7. Question 6: तनभन पंजक्तयों िें कौन-सा अलंकार है? ततनकों के हरे हरे तन पर दहल हररत रुधधर है रहा झलक Answer : हरे हरे िें पुनरुजक्त अलंकार है। दहल हररत िें अनुप्रास अलंकार है। Question 7: इस कववता िें जजस गााँव का धचत्रर् हुआ है वह िारत के ककस िू- िाग पर जस्थत है? Answer : इस कववता िें उत्तरी िारत के गााँव का धचत्रर् हुआ है। उत्तरी िारत, िारत के खेती प्रधान राज्यों िें प्रिुख है।
  8. 8. Question 8: िाव और िािा की दृजष्ट से आपको यह कववता कै सी लगी? उसका वर्ण न अपने िब्दों िें कीजजए। Answer : प्रस्तुत कववता िाव तथा िािा दोनों ही तरफ़ से अत्यंत आकिणक है। यहााँ प्रकृ तत का िनिोहक रुप प्रस्तुत ककया गया है तथा प्रकृ तत का िानवीकरर् ककया गया है। कववता की िािा अत्यंत सरल तथा सहज है। कववता को कदठन िािा के प्रयोग से बोखझल नहीं बनाया गया है। अलंकारो का प्रयोग करके कववता के सौन्दयण को बढाया गया है। रुपक, उपिा, अनुप्रास अलंकारो का प्रयोग उधचत स्थान पर ककया गया है।
  9. 9. नाि = त्रबक्रानत रॉय. कक्षा = नौवीं. धारा ='सी'. वविय = दहन्दी. स्कू ल = के न्रीय ववद्यालया बी.ई.जी, पुर्े – 06.

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