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<ul><li>जन्म : २ अक्तूबर १८६९पोरबंदर, काठियावाड़, भारत
मृत्यु:३० जनवरी १९४८ (७८ वर्ष की आयु में)नई दिल्ली, भारत
मृत्यु का कारण:हत्या
राष्ट्रीयता:भारतीय
अन्य नाम: महात्मा गाँधी
शिक्षा :युनिवर्सिटी कॉलिज, लंदन
प्रसिद्धि कारण:भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
राजनैतिक पार्टी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
धार्मिक मान्यता:हिन्दू
जीवनसाथी:कस्तूरबा गाँधी
बच्चे:हरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदास</li></li></ul><li><ul><li>गांधीजी के जीवन और दर्शन में मितव्ययता और अपरिग्रह के सर्वश...
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Gandhi ji

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Gandhi ji

  1. 1.
  2. 2. <ul><li>जन्म : २ अक्तूबर १८६९पोरबंदर, काठियावाड़, भारत
  3. 3. मृत्यु:३० जनवरी १९४८ (७८ वर्ष की आयु में)नई दिल्ली, भारत
  4. 4. मृत्यु का कारण:हत्या
  5. 5. राष्ट्रीयता:भारतीय
  6. 6. अन्य नाम: महात्मा गाँधी
  7. 7. शिक्षा :युनिवर्सिटी कॉलिज, लंदन
  8. 8. प्रसिद्धि कारण:भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
  9. 9. राजनैतिक पार्टी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  10. 10. धार्मिक मान्यता:हिन्दू
  11. 11. जीवनसाथी:कस्तूरबा गाँधी
  12. 12. बच्चे:हरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदास</li></li></ul><li><ul><li>गांधीजी के जीवन और दर्शन में मितव्ययता और अपरिग्रह के सर्वश्रेष्ठ सूत्रों का सार मिलता है. उन्होंने अपने जीवन के हर पक्ष में सादगी और मितव्ययता को अपनाया और इन्हीं के कारण उनका जीवन एक अनुकरणीय उदाहरण है.
  13. 13. गांधीजी के जैसा जीवन जीनेवाला और कोई व्यक्ति दोबारा न होगा. अपनी मृत्यु के समय वे उसी दरिद्रनारायण की प्रतिमूर्ति थे जिनके श्रेय के लिए उन्होंने अपने शरीर को भी ढंकना उचित न जाना. उनके जीवन प्रसंग युगों-युगों तक सभी को प्रेरणा देते रहेंगे.
  14. 14. अपने अंतिम दिनों में गांधीजी के पास कुल जमा दस-बारह वस्तुएं ही रह गईं थीं जो उनके निजी उपयोग में आती थीं. ये थीं उनका चश्मा, घड़ी, चप्पलें, लाठी और खाने के बर्तन. अपना घर और फ़ार्म आदि वे बहुत पहले ही लोक को अर्पित कर चुके थे.</li></li></ul><li><ul><li>यह तो हम जानते ही हैं कि गांधीजी का जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था और उन्हें वे सभी सुख-सुविधाएँ मिलीं जो आज भी अधिकांश भारतीयों को दुर्लभ हैं. उन दिनों क़ानून की पढ़ाई के लिए लन्दन जाने में कई सप्ताह लग जाते थे. बचपन में धन-संपत्ति के बीच पले-बढ़े युवा मोहनदास ने जीवन के हर मोड़ पर सबक सीखे और अंततः स्वयं को व्यय और अर्जन के जंजाल से मुक्त कर दिया. जिस अवस्था में युवाओं को नित-नूतनता आकर्षित करती है उसमें उन्होंने कठोरतापूर्वक न केवल स्वयं को बल्कि अपने सानिध्य में आनेवाले हर व्यक्ति को सादगी पूर्ण जीवन जीने में प्रवृत्त किया. इसके महत्वपूर्ण सूत्र ये थे:
  15. 15. सादा भोजन करें - गांधीजी को कभी भी मोटापे के डर ने नहीं सताया. वे अपना शाकाहारी भोजन स्वयं उगाते और बनाते थे. धातु के एक ही पात्र में वे भोजन करते थे. इस प्रकार भोजन संतुलित मात्रा में ग्रहण कर लिया जाता है. भोजन के पहले और बाद में वे प्रार्थना भी करते थेI</li></li></ul><li>सादे वस्त्र पहनें - गांधीजी के सादे वस्त्रों में कपडा तो कम होता था पर उनका सन्देश बड़ा था. जब वे लन्दन में किंग से मिलने गए तब भी उन्होंने छोटी धोती और शाल पहना हुआ था. इस बारे में एक पत्रकार ने उनसे पूछा – “मिस्टर गांधी, किंग से मिलते समय आपको यह नहीं लगा कि आपने वास्तव में लगभग कुछ-नहीं पहना हुआ था?” गांधीजी ने इसका उत्तर दिया – “नहीं. किंग ने इतने वस्त्र पहने थे जो हम दोनों के लिए पर्याप्त थे.”<br />
  16. 16. <ul><li>तनावमुक्त जीवन जियें - गांधीजी को कभी किसी ने तनावग्रस्त नहीं देखा. कई अवसरों पर वे विषादग्रस्त और व्यथित ज़रूर हुए लेकिन दुःख के क्षणों में उन्होंने आत्ममंथन और प्रार्थना का ही सहारा लिया.
  17. 17. गांधीजी वैश्विक स्तर के नेता थे भले ही वे किसी राजनैतिक पद पर कभी नहीं रहे. करोड़ों व्यक्ति आज भी उन्हें पूजते हैं और उनके प्रति असीम श्रद्धा रखते हैं. अपने सरल जीवन में उन्होंने किसी भटकाव या वचनबद्धता को नहीं आने दिया. बच्चों के साथ समय बिताने के लिए वे अपनी राजनैतिक बैठकें भी निरस्त कर दिया करते थे.
  18. 18. गांधीजी के आसपास हर समय उपस्थित रहनेवाले लोग उनकी हर ज़रुरत और सुविधा का ध्यान रखते थे लेकिन उन्होंने हमेशा अपने हाथों से ही सभी काम करने को तरजीह दी. आत्मनिर्भरता उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण सद्गुण था.</li></li></ul><li><ul><li>अपने जीवन को अपना सन्देश बनायें - गांधीजी बहुत अच्छे लेखक और प्रभावशाली वक्ता थे पर निजी माहौल में वे शांत ही रहा करते थे और उतना ही बोलते थे जितना ज़रूरी हो. उनका लेखन टु-द-पॉइंट होता था. अपनी लेखनी से अधिक शब्द उन्होंने अपने जीवन के मार्फ़त दिए.
  19. 19. सरल-सहज जीवन जीने की योग्यता ने गांधीजी को सदैव महत्तर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए गतिमान रखा. जनता और विश्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धताएं उनकी प्राथमिकता थीं.
  20. 20. गांधीजी जैसा न तो कोई दोबारा कभी होगा और न ही कोई हो सकता है.</li></li></ul><li>इंग्लैंड में युवा गांधी की शिक्षा<br />मैट्रिक करने के बाद गांधीजी ने भावनगर के समलदास कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ का वातावरण उन्हें रास नहीं आया, उन्हें पढ़ाई करने में काफी कठिनाइयाँ आ रही थी। इसी बीच सन् 1885 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। उनके परिवार के विश्वसनीय मित्र भावजी दवे चाहते थे कि मोहनदास अपने दादा व पिता की तरह मंत्री बनें। इस पद के लिए कानून की जानकारी सबस महत्वपूर्ण थी। इसलिए उन्होंने सलाह दी कि मोहनदास इंग्लैंड जाकर बैरिस्टरी की पढ़ाई करें। मोहनदास इसे सुनते ही खूब प्रसन्न हुए। उनकी माँ उन्हें विदेश भेजने के खिलाफ थीं। किंतु काफी मान-मनौवल के बाद जब वे राजी हुईं तब उन्होंने मोहनदास से यह संकल्प कराया कि वे शराब, त्री और मांस को भूलकर भी नहीं छुएँगे।<br />
  21. 21. “महात्मा”<br />भारत में गांधीजी ने जो कुछ किया और कहा उसकी सही रिपोर्ट जो नाताल नहीं पहुँची। उसे बढ़ा-चढ़ाकर तोड़-मरोड़ कर वहाँ पेश किया गया। इसे लेकर वहाँ के गोरे वाशिंदे गुस्से से आग बबुला हो उठे थे। 'क्रूरलैंड` नामक जहाज से जब गांधीजी नाताल पहुँचे तो वहाँ के गोरों ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। उन पर सड़े अंडों और कंकड़ पत्थर की बौछार होने लगी। भीड़ ने उन्हें लात-घूसों से पीटा। अगर पुलिस सुपरिंटेंडंट की पत्नी ने बीच-बचाव न किया होता तो उस दिन उनके प्राण पखेरू उड़ गये होते। उधर लंदन के उपनिवेश मंत्री ने गांधीजी पर हमला करने वालों पर कार्रवाई करने के लिए नाताल सरकार को तार भेजा। गांधीजी ने ओरपियों को पहचानने से इंकार करते हुए उनके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई न करने का अनुरोध किया। गांधीजी ने कहा, "वे गुमराह किये गये हैं, जब उन्हें सच्चाई का पता चलेगा तब उन्हें अपने किये का पश्चाताप खुद होगा। मैं उन्हें क्षमा करता हूँ।" ऐसा लग रहा था जैसे ये वाक्य गांधीजी के न होकर उनके भीतर स्पंदित हो रहे किसी महात्मा के होंl<br />
  22. 22. देश को मिली आजादी<br />आखिर वह दिन भी आ गया, जब भारत आजाद हुआ। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। गांधीजी ने इस दिन आयोजित किये गये समारोह में भाग न लेकर कलकत्ता जाना उचित समझा। जहाँ सांप्रदायिक दंगों की आग सब कुछ तहस-नहस कर रही थी। गांधीती के वहाँ जाने पर धीरे-धीरे स्थिति शांत हो गई। कुछ दिन वहाँ पर गांधीजी ने प्रार्थना एवं उपवास में गुजारें। दुर्भाग्य से 31 अगस्त को कलकत्ता दंगों की आग में जलने लगा। सांप्रदायिक दंगों की आड़ में लूट, हत्या, बलात्कार का भीषण कांड शुरू हुआ। अब गांधीजी के पा एक ही विकल्प था 'अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक व्रत करना।' गांधीजी की इस घोषणा ने सारी स्थिति ही बदल डाली। उनका जादू लोगों पर चल गया। 4 सितंबर को विभिन्न धर्मों के नेताओं ने उनसे इस धार्मिक पागलपन के लिए माफी माँगी। साथ ही यह प्रतिज्ञा की कि अब कलकत्ता में दंगे नहीं होंगे। नेताओं की इस शपथ के बाद गांधीजी ने व्रत तोड़ दिया। कलकत्ता तो शांत हो गया किंतु भारत-पाक विभाजन के कारण अन्य शहरों में दंगों ने जोर पकड़ लिया।<br />
  23. 23.
  24. 24. अनंतअग्रवाल<br />X-B <br />

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