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आखिरी_शिकार_आशीष_गौतम_सीरीज_Book.pdf

Jahanzeb Khan
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Motivational Books

आखिरी_शिकार_आशीष_गौतम_सीरीज_Book.pdf

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आिखरी िशकार
उप यास के सभी पा , थान एवं घटनाएं का पिनक ह। कसी भी जीिवत या मृत ि ,
समुदाय अथवा थान से उनक समानता संयोग मा होगी। उप यास म िनिहत त य का
योग कहानी को रोचक बनाने के िलए कया गया है, उनका वा तिवकता से कोई संबंध
नह है। कसी भी कार के िववाद क ि थित म याय े द ली ही रहेगा।
लेखक प रचय
लेखक संतोष पाठक का ज म 19 जुलाई 1978 को, उ र देश के गाजीपुर िजले के बेटाबर
खूद गांव म एक ाह ण प रवार म आ। ारि भक िश ा गांव से पूरी करने के बाद वष
1987 म आप अपने िपता ी ओम काश पाठक और माता ीमित उ मला पाठक के साथ
द ली चले गये। जहां से आपनेे उ िश ा हािसल क । आपक पहली रचना वष 1998 म
मश र िह दी अखबार नवभारत टाई स म कािशत ई, िजसके बाद आपनेे कभी पीछे
मुड़कर नह देखा। वष 2004 म आपको िह दी अकादमी ारा उ कृ लेखन के िलए
पुर कृत कया गया। आपने स े क से, स पस कहािनयां, मनोरम कहािनयां इ या द
पि का तथा शैि क कताब का साल तक स पादन कया है। आपने िह दी अखबार
के िलए यूज रपो टग करने के अलावा सैकड़ क तादात म स यकथाएं तथा फ सन
िलखे ह।
लेखक क कलम से
मेरी नवीनतम रचना आपके हाथ म है। िजसके ज रए एक बार फर आपसे ब होने
का फ मुझे हािसल हो रहा है। ‘आिखरी िशकार‘ भी मेरे िपछले उप यास ‘अनदेखा
खतरा‘ क तरह स पस ि लर है! िजसे मने बड़े ही मनोयोग से आपके िलए तैयार कया
है। हमेशा क तरह इस बार भी म कथानक म रोमांस और कॉमेडी का तड़का लगाना नह
भूला ं, िलहाजा वाद बरकरार रहेगा। अलब ा पहले से यादा पाईसी बन पड़ा है या
नह इसका फै सला तो आप ही करगे।
‘आिखरी िशकार‘ म एक बार फर आपक मुलाकात ‘खबरदार‘ के चीफ रपोटर आशीष
कुमार गौतम से होगी, जो यक नन आपको इंवे टीगेशन क एक नई दुिनया से ब
करायेगा। िलहाजा हमेशा क तरह इस बार भी उप यास का हीरो आशीष ही होगा, इसम
कोई दो राय हो ही नह सकती। उप यास क नाियका क बात कर तो उसे लेकर म थोड़ा
उलझन म ं! िलहाजा इस बाबत कोई फै सला म आप पर ही छोड़ता ं। उप यास पढ़ने के
बाद आप ही फै सला कर क सही मायने म ‘आिखरी िशकार‘ क हीरोइन का िखताब कसे
िमलना चािहए।
मुझे खेद है क मेरा पूव कािशत उप यास ‘अनदेखा खतरा‘ अपने तयशुदा व म
कािशत नह हो सका था। इसिलए आपके हाथ तक िवल ब से प ंचा और ब त से
पाठक तक शायद अभी प ंच भी नह पाया है। अलब ा िजसने भी उप यास पढ़ा, उ ह
बेहद वाह! वाह! लगा।
कुछ पाठक ने िशकायत दज कराई है क ‘अनदेखा खतरा‘ म अपराधी एकदम चम कृत
प से सामने आता है, जब क पूरे उप यास म उसका िज ब त ही कम कया गया है।
जनाब म आपक बात से पूरी तरह सहमत ं, मगर य क म तहे दल से आपको च काना
चाहता ं इसिलए ऐसी हरकत ना चाहते ए भी करनी पड़ती ह।
कुछ लोग ने ‘िव ांत‘ और ‘‘शीला‘ जैसे ओ ड फै शन के नाम पर भी ऐतराज जताया है।
लखनऊ के एक पाठक सदािशव पांडे जी ने अपने मेल म िलखा है क - ‘‘मने अनदेखा
खतरा पढ़ा, पढ़कर बेशक मजा आ गया। पूरी कहानी मने एक ही बैठक म पढ़ डाली।
खासतौर से उप यास का लाईमै स तो कमाल का था। मगर हैरानी होती है ये जानकर
क इतने मॉडन करदार का नाम चुनने म आपने कोई दािनशमंदी नह दखाई। भला
िव ांत और शीला जैसे नाम भी कोई रखता है आजकल!‘‘
इसी िसलिसले म िबहार के रंजीत राय साहब क मेल देिखए- ‘कमाल का स पस था,
कमाल क कहानी थी। लग रहा था जैसे आंख के सामने ही सबकुछ घ टत हो रहा हो।
खासतौर से काितल के बारे म जानकर तो म उछल ही पड़ा। िव ांत और शीला दोन का
करदार ब त अ छा था। कई बार हंसा कर लोट-पोट भी कर दया। ले कन शीला के नाम
के साथ आपने याय नह कया, यक न जािनए अगर आप उसके ह थे चढ़ गये तो बेशक
वो आपको गोली मार देगी।‘
बहरहाल िव ांत गोखले और शीला के नाम से भले ही लोग को ऐतराज आ हो मगर
उनके करदार से कसी भी पाठक ने नाउ मीदी जािहर नह क । सभी को उन दोन का
करदार और उप यास का कथानक ब त-ब त पसंद आया, िजसक क मुझे बेहद खुशी
है।
आप मेरी रचनाएं कंडल बु स, और डेलीहंट के अलावा सीधा मेरी वेबसाइट
www.santoshpathak.in से भी खरीद सकते ह। जहां मेरी पूरी कोिशश होती है क
आपको कम से कम दाम म पु तक उपल ध करा सकूं।
आप सभी क हौसला-अफजाई के िलए म तहे दल से शु गुजार ं।
हमेशा क तरह तुत रचना के ित आपक अमू य राय के इंतजार म-
आपका शुभाकां ी
संतोष पाठक
स पकः
skpathaknovel@gmail.com
www.santoshpathak.in
दनांक 24-04-2017
आिखरी िशकार
सरोजनी नगर इलाके म दािखल होकर आशीष ‘ वागत‘ रे टोरट प ंचा। एस.एन. माकट
के िपछले िह से म ि थत ‘ वागत‘ रे टोरट बेहद तड़क-भड़क वाला अ याधुिनक रे टोरट
था िजसके एक पोशन म िड कोथेक भी था। वैसे तो ‘ वागत‘ कदरन नई जगह थी कंतु
िड कोथेक क वजह से वो ज दी ही युवा वग क पहली पसंद बन गया था। शाम िघरते ही
नौजवान लड़के-लड़ कय का वहां जमावड़ा लग जाता था और नौ बजते-बजते भीड़ का
आलम ये हो जाता था क िड कोथेक क एं ी बंद करनी पड़ जाती थी। खासतौर से वीकड
पर तो नौ बजे के बाद िड को म एं ी पाना और कार म बैठकर मंगल ह पर जाने क
सोचना एक ही बात सािबत होनी थी।
पा कग म मोटरसाइ कल खड़ी करने के बाद आशीष अपनी कलाई घड़ी पर दृि पात
करता आ रे टोरट म दािखल आ। दस बजने को थे, वो िनधा रत व से एक घंटा लेट
वहां प ंचा था।
डाइ नंग हॉल इस व खचाखच भरा आ था। कह कोई टेबल खाली नह थी। वहां
प ँचकर इधर-उधर फसलती उसक िनगाह दा ओर क आिखरी टेबल पर गई तो
नीलेश ितवारी को वहां मौजूद पाकर उसने चैन क सांस ली। उस व वहां कुल जमा आठ
लोग मौजूद थे, जो दावत उड़ाने म इस कदर त थे क उ ह ने नये मेहमान पर यान
देने क कोिशश तक नह क ।
वो एक छोटी सी िडनर पाट थी िजसम आशीष बतौर गे ट इनवाइट था। पाट का
मेजबान नीलेश ितवारी था िजसका क आज ज म दन था। नीलेश ितवारी को वो एक
अरसे से जानता था मगर िजगरी-यार जैसी कोई बात उन दोन के बीच म अभी तक नह
बन पाई थी।
आशीष को आया देख नीलेश फौरन उठ खड़ा आ और यूं बगलगीर होकर िमला जैसे
स दय के िबछुड़े ए दो भाई अचानक आमने-सामने आ गये ह । ये जुदा बात थी क
उनक आिखरी मुलाकात अभी दो दन पहले ही होकर हटी थी।
नीलेश ितवारी सताइस-अठाइस साल का पतला-दुबला नौजवान था, जो आज के जमाने
म भी न बे के दशक जैसे फै शन करता था। अपनी चाल-ढाल एवं पहनावे से वो बेहद
लापरवाह कंतु श लो-सूरत से िनहायत भोला-भाला युवक दखाई देता था। इस व वो
बादामी कलर का सूट और उससे मैच करती टाई लगाये था। ये दोन चीज साल पुरानी
थ और अपनी चमक-दमक पूरी तरह खो चुक थ , िजसका कोई एहसास नीलेश को होता
हो ऐसा कम से कम उसक सूरत से तो नह लगता था। अब तो उसके इस खास प रधान से
हर कोई वा कफ हो चुका था। िजसे वो कसी भी खास मौके पर पहन िलया करता था।
उसके फटेहाल होने क पोल खोलने वाली एक और चीज थी - उसके जूते, िजनके तले बुरी
तरह िघसे ए थे। बे यानी म कभी वो पैर ऊपर उठाता तो तल म बने छेद दूर से ही नजर
आ जाते थे।
आशीष यह सोचकर हैरान था क नीलेश जैसे ‘जेब से फक र‘ श स ने ज म दन क पाट
के िलए ‘ वागत‘ जैसे ए सपिसव रे टोरट को चुना था।
”ज म दन मुबारक हो लेखक साहब।“
”शु या“ - आशीष के मुंह से अपने िलए ‘लेखक साहब‘ का संबोधन सुनकर जैसे उसपर
कोई नशा सा सवार हो गया हो, वो तर ुम म बोला - ‘‘तु हारी राह तक थी हमने,
आमद क आहट भी सुनी थी हमने। शमा-ए-मह फल रोशन होगी ज र, इसी उ मीद म,
कुछ िज दगी और जी ली थी हमने।“
‘‘वाह! या बात है, मजा आ गया।‘‘
कहकर आशीष तिनक हँसा, फर वहाँ मौजूद बाक मेहमान को - िजनम से एक को भी
वो नह जानता था - हाय-हैलो करके एक कुस पर िवराजमान आ।
बैठे-बैठे उसने एक बार फर नीलेश का नये िसरे से मुआयना कया। कोई नई बात नजर
नह आई, िसवाय इसके क आज वो हमेशा क तरह कोई टूटा आ, िज दगी से हारा आ,
इंसान नह लग रहा था। बि क उसके चेहरे पर रौनक थी, एक अजीब सा सकून था जो
आज से पहले कभी नीलेश ितवारी के चेहरे पर नह दखाई दया था।
नीलेश से उसक दो ती कब और कैसे हो गई, ये बात आज भी उसके समझ से परे थी।
अलब ा वो जब भी नीलेश ितवारी से िमलता उसे यूं महसूस होता जैसे वो पहली बार
उससे िमल रहा हो। उसने कई बार नीलेश क िज दगी के ‘डाक-कानर‘ म सघ लगाने क
कोिशश क थी मगर अभी तक नाकामयाब ही रहा था। अलब ा ऐसी हर कोिशश म उसे
महसूस होता था क नीलेश ितवारी के ि व म कोई खास बात ज र थी जो लोग
सहज ही उसक ओर खंचे चले आते थे। ये जुदा बात थी क य तः उसे नीलेश म कुछ

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  • 2. आिखरी िशकार उप यास के सभी पा , थान एवं घटनाएं का पिनक ह। कसी भी जीिवत या मृत ि , समुदाय अथवा थान से उनक समानता संयोग मा होगी। उप यास म िनिहत त य का योग कहानी को रोचक बनाने के िलए कया गया है, उनका वा तिवकता से कोई संबंध नह है। कसी भी कार के िववाद क ि थित म याय े द ली ही रहेगा। लेखक प रचय लेखक संतोष पाठक का ज म 19 जुलाई 1978 को, उ र देश के गाजीपुर िजले के बेटाबर खूद गांव म एक ाह ण प रवार म आ। ारि भक िश ा गांव से पूरी करने के बाद वष 1987 म आप अपने िपता ी ओम काश पाठक और माता ीमित उ मला पाठक के साथ द ली चले गये। जहां से आपनेे उ िश ा हािसल क । आपक पहली रचना वष 1998 म मश र िह दी अखबार नवभारत टाई स म कािशत ई, िजसके बाद आपनेे कभी पीछे मुड़कर नह देखा। वष 2004 म आपको िह दी अकादमी ारा उ कृ लेखन के िलए पुर कृत कया गया। आपने स े क से, स पस कहािनयां, मनोरम कहािनयां इ या द पि का तथा शैि क कताब का साल तक स पादन कया है। आपने िह दी अखबार के िलए यूज रपो टग करने के अलावा सैकड़ क तादात म स यकथाएं तथा फ सन िलखे ह।
  • 3. लेखक क कलम से मेरी नवीनतम रचना आपके हाथ म है। िजसके ज रए एक बार फर आपसे ब होने का फ मुझे हािसल हो रहा है। ‘आिखरी िशकार‘ भी मेरे िपछले उप यास ‘अनदेखा खतरा‘ क तरह स पस ि लर है! िजसे मने बड़े ही मनोयोग से आपके िलए तैयार कया है। हमेशा क तरह इस बार भी म कथानक म रोमांस और कॉमेडी का तड़का लगाना नह भूला ं, िलहाजा वाद बरकरार रहेगा। अलब ा पहले से यादा पाईसी बन पड़ा है या नह इसका फै सला तो आप ही करगे। ‘आिखरी िशकार‘ म एक बार फर आपक मुलाकात ‘खबरदार‘ के चीफ रपोटर आशीष कुमार गौतम से होगी, जो यक नन आपको इंवे टीगेशन क एक नई दुिनया से ब करायेगा। िलहाजा हमेशा क तरह इस बार भी उप यास का हीरो आशीष ही होगा, इसम कोई दो राय हो ही नह सकती। उप यास क नाियका क बात कर तो उसे लेकर म थोड़ा उलझन म ं! िलहाजा इस बाबत कोई फै सला म आप पर ही छोड़ता ं। उप यास पढ़ने के बाद आप ही फै सला कर क सही मायने म ‘आिखरी िशकार‘ क हीरोइन का िखताब कसे िमलना चािहए। मुझे खेद है क मेरा पूव कािशत उप यास ‘अनदेखा खतरा‘ अपने तयशुदा व म कािशत नह हो सका था। इसिलए आपके हाथ तक िवल ब से प ंचा और ब त से पाठक तक शायद अभी प ंच भी नह पाया है। अलब ा िजसने भी उप यास पढ़ा, उ ह बेहद वाह! वाह! लगा। कुछ पाठक ने िशकायत दज कराई है क ‘अनदेखा खतरा‘ म अपराधी एकदम चम कृत प से सामने आता है, जब क पूरे उप यास म उसका िज ब त ही कम कया गया है। जनाब म आपक बात से पूरी तरह सहमत ं, मगर य क म तहे दल से आपको च काना चाहता ं इसिलए ऐसी हरकत ना चाहते ए भी करनी पड़ती ह। कुछ लोग ने ‘िव ांत‘ और ‘‘शीला‘ जैसे ओ ड फै शन के नाम पर भी ऐतराज जताया है। लखनऊ के एक पाठक सदािशव पांडे जी ने अपने मेल म िलखा है क - ‘‘मने अनदेखा खतरा पढ़ा, पढ़कर बेशक मजा आ गया। पूरी कहानी मने एक ही बैठक म पढ़ डाली। खासतौर से उप यास का लाईमै स तो कमाल का था। मगर हैरानी होती है ये जानकर क इतने मॉडन करदार का नाम चुनने म आपने कोई दािनशमंदी नह दखाई। भला िव ांत और शीला जैसे नाम भी कोई रखता है आजकल!‘‘
  • 4. इसी िसलिसले म िबहार के रंजीत राय साहब क मेल देिखए- ‘कमाल का स पस था, कमाल क कहानी थी। लग रहा था जैसे आंख के सामने ही सबकुछ घ टत हो रहा हो। खासतौर से काितल के बारे म जानकर तो म उछल ही पड़ा। िव ांत और शीला दोन का करदार ब त अ छा था। कई बार हंसा कर लोट-पोट भी कर दया। ले कन शीला के नाम के साथ आपने याय नह कया, यक न जािनए अगर आप उसके ह थे चढ़ गये तो बेशक वो आपको गोली मार देगी।‘ बहरहाल िव ांत गोखले और शीला के नाम से भले ही लोग को ऐतराज आ हो मगर उनके करदार से कसी भी पाठक ने नाउ मीदी जािहर नह क । सभी को उन दोन का करदार और उप यास का कथानक ब त-ब त पसंद आया, िजसक क मुझे बेहद खुशी है। आप मेरी रचनाएं कंडल बु स, और डेलीहंट के अलावा सीधा मेरी वेबसाइट www.santoshpathak.in से भी खरीद सकते ह। जहां मेरी पूरी कोिशश होती है क आपको कम से कम दाम म पु तक उपल ध करा सकूं। आप सभी क हौसला-अफजाई के िलए म तहे दल से शु गुजार ं। हमेशा क तरह तुत रचना के ित आपक अमू य राय के इंतजार म- आपका शुभाकां ी संतोष पाठक स पकः skpathaknovel@gmail.com www.santoshpathak.in दनांक 24-04-2017
  • 5. आिखरी िशकार सरोजनी नगर इलाके म दािखल होकर आशीष ‘ वागत‘ रे टोरट प ंचा। एस.एन. माकट के िपछले िह से म ि थत ‘ वागत‘ रे टोरट बेहद तड़क-भड़क वाला अ याधुिनक रे टोरट था िजसके एक पोशन म िड कोथेक भी था। वैसे तो ‘ वागत‘ कदरन नई जगह थी कंतु िड कोथेक क वजह से वो ज दी ही युवा वग क पहली पसंद बन गया था। शाम िघरते ही नौजवान लड़के-लड़ कय का वहां जमावड़ा लग जाता था और नौ बजते-बजते भीड़ का आलम ये हो जाता था क िड कोथेक क एं ी बंद करनी पड़ जाती थी। खासतौर से वीकड पर तो नौ बजे के बाद िड को म एं ी पाना और कार म बैठकर मंगल ह पर जाने क सोचना एक ही बात सािबत होनी थी। पा कग म मोटरसाइ कल खड़ी करने के बाद आशीष अपनी कलाई घड़ी पर दृि पात करता आ रे टोरट म दािखल आ। दस बजने को थे, वो िनधा रत व से एक घंटा लेट वहां प ंचा था। डाइ नंग हॉल इस व खचाखच भरा आ था। कह कोई टेबल खाली नह थी। वहां प ँचकर इधर-उधर फसलती उसक िनगाह दा ओर क आिखरी टेबल पर गई तो नीलेश ितवारी को वहां मौजूद पाकर उसने चैन क सांस ली। उस व वहां कुल जमा आठ लोग मौजूद थे, जो दावत उड़ाने म इस कदर त थे क उ ह ने नये मेहमान पर यान देने क कोिशश तक नह क । वो एक छोटी सी िडनर पाट थी िजसम आशीष बतौर गे ट इनवाइट था। पाट का मेजबान नीलेश ितवारी था िजसका क आज ज म दन था। नीलेश ितवारी को वो एक अरसे से जानता था मगर िजगरी-यार जैसी कोई बात उन दोन के बीच म अभी तक नह बन पाई थी। आशीष को आया देख नीलेश फौरन उठ खड़ा आ और यूं बगलगीर होकर िमला जैसे स दय के िबछुड़े ए दो भाई अचानक आमने-सामने आ गये ह । ये जुदा बात थी क उनक आिखरी मुलाकात अभी दो दन पहले ही होकर हटी थी। नीलेश ितवारी सताइस-अठाइस साल का पतला-दुबला नौजवान था, जो आज के जमाने म भी न बे के दशक जैसे फै शन करता था। अपनी चाल-ढाल एवं पहनावे से वो बेहद लापरवाह कंतु श लो-सूरत से िनहायत भोला-भाला युवक दखाई देता था। इस व वो
  • 6. बादामी कलर का सूट और उससे मैच करती टाई लगाये था। ये दोन चीज साल पुरानी थ और अपनी चमक-दमक पूरी तरह खो चुक थ , िजसका कोई एहसास नीलेश को होता हो ऐसा कम से कम उसक सूरत से तो नह लगता था। अब तो उसके इस खास प रधान से हर कोई वा कफ हो चुका था। िजसे वो कसी भी खास मौके पर पहन िलया करता था। उसके फटेहाल होने क पोल खोलने वाली एक और चीज थी - उसके जूते, िजनके तले बुरी तरह िघसे ए थे। बे यानी म कभी वो पैर ऊपर उठाता तो तल म बने छेद दूर से ही नजर आ जाते थे। आशीष यह सोचकर हैरान था क नीलेश जैसे ‘जेब से फक र‘ श स ने ज म दन क पाट के िलए ‘ वागत‘ जैसे ए सपिसव रे टोरट को चुना था। ”ज म दन मुबारक हो लेखक साहब।“ ”शु या“ - आशीष के मुंह से अपने िलए ‘लेखक साहब‘ का संबोधन सुनकर जैसे उसपर कोई नशा सा सवार हो गया हो, वो तर ुम म बोला - ‘‘तु हारी राह तक थी हमने, आमद क आहट भी सुनी थी हमने। शमा-ए-मह फल रोशन होगी ज र, इसी उ मीद म, कुछ िज दगी और जी ली थी हमने।“ ‘‘वाह! या बात है, मजा आ गया।‘‘ कहकर आशीष तिनक हँसा, फर वहाँ मौजूद बाक मेहमान को - िजनम से एक को भी वो नह जानता था - हाय-हैलो करके एक कुस पर िवराजमान आ। बैठे-बैठे उसने एक बार फर नीलेश का नये िसरे से मुआयना कया। कोई नई बात नजर नह आई, िसवाय इसके क आज वो हमेशा क तरह कोई टूटा आ, िज दगी से हारा आ, इंसान नह लग रहा था। बि क उसके चेहरे पर रौनक थी, एक अजीब सा सकून था जो आज से पहले कभी नीलेश ितवारी के चेहरे पर नह दखाई दया था। नीलेश से उसक दो ती कब और कैसे हो गई, ये बात आज भी उसके समझ से परे थी। अलब ा वो जब भी नीलेश ितवारी से िमलता उसे यूं महसूस होता जैसे वो पहली बार उससे िमल रहा हो। उसने कई बार नीलेश क िज दगी के ‘डाक-कानर‘ म सघ लगाने क कोिशश क थी मगर अभी तक नाकामयाब ही रहा था। अलब ा ऐसी हर कोिशश म उसे महसूस होता था क नीलेश ितवारी के ि व म कोई खास बात ज र थी जो लोग सहज ही उसक ओर खंचे चले आते थे। ये जुदा बात थी क य तः उसे नीलेश म कुछ
  • 7. भी पेशल नह दखाई देता था। आशीष और नीलेश म समानता क बात कर तो दोन म महज एक बात कॉमन थी, जहाँ आशीष ‘खबरदार‘ जैसे तीि त अखबार का चीफ रपोटर था। वह नीलेश ितवारी भी एक साँ य दैिनक अखबार म लाउंस रपो टग करता था। यानी उसक हालत बेरोजगार से तिनक ही बेहतर थी। इसके अलावा नीलेश को कहािनयाँ, िवशेषकर उप यास िलखने का बेहद शौक था। उसके स पक म आने वाला हर ि जानता था क वो लेखन क दुिनया म छा जाने का तम ाई था। बावजूद इसके अभी तक पूत के पांव पालने म ही थे। उसक कुल जमा बीस कहािनयाँ ऐसी थ जो क िविभ अखबार और पि का के ज रए कािशत हो चुक थ । उपलि ध क ेणी म उसके पास िह दी अकादमी ारा सव े कहानी लेखन के िलये दी गयी एक ॉफ थी, िजसे वो हर आने-जाने वाले को दखा चुका था। यहां तक क अखबार और दूधवाला भी उसक ॉफ और उससे संबंिधत कहानी से वा कफ थे। इन छोटी-मोटी सफलता को अगर नजरअंदाज कर द तो वो िज दगी से हारा आ एक ऐसा नाकामयाब श स था, जो अब महज सपन क दुिनयां म जीने का आदी हो चुका था। यही या कम था क वो अपनी नाकामयाबी को शराब क बोतल म घोलकर नह पीने लगा था, जो क उसके जैसे जंदगी से हारे ए लोग क पहली पसंद होती है। ” या सोचने लगे रपोटर साहब?“ नीलेश ने आशीष के आगे चुटक बजाई। ”कुछ नह ।“ -वो तनकर बैठता आ बोला- ”बस यूँ ही।“ ”तु हारे िलए या मँगवाऊ ँ ?“ ”अभी नह जरा ठहरकर मंगाना।“ ‘‘ठहरने के िलए म कॉफ मंगवाये लेता ं।‘‘ आशीष ने ऐतराज नह कया। नीलेश ने एक वेटर को बुलाकर कॉफ का आडर दे दया। नीलेश ितवारी के बारे म आशीष क अपनी राय भी कोई बुरी नह थी। उसे यक न था क नीलेश एक दन सचमुच लेखन क दुिनया म छा जायेगा। बस ज रत थी एक सही ेक िमलने क । िजसक अभी दूर-दूर तक कोई उ मीद दखाई नह देती थी।
  • 8. कॉफ आ गई। दोन ने अपना-अपना कप उठा िलया। ”पाट कस खुशी म दे रहे हो?“ ”तु ह कॉफ से नशा हो जाता है या?‘‘ नीलेश ने सवाल के बदले सवाल कर दया। ”मने ऐसा कब कहा।‘‘ ” फर बहक य रहे हो यार!“ - नीलेश झुँझलाया सा बोला - ”ज म दन क मुबारकबाद देने के बाद पूछ रहे हो पाट कस खुशी म दी। ये तो वही बात ई जैसे कसी क शादी के बाद उससे पूछा जाय बता भाई सुहागरात कस खुशी म मना रहा है।‘‘ ”बकोमत, तु हारे ज म दन सेिल ेशन म म िपछले तीन साल से शािमल होता आ रहा ँ। जो क तुम दो-चार लोग के बीच कसी थड- लास ढाबे म या तु हारे लैट पर अरज करते थे, ना क ‘ वागत’ जैसे कसी ए सपिसव जगह पर।“ ”शक करना तो जैसे तु हारी आदत म शुमार हो गया है।‘‘ ”बात को हवा म मत उड़ाओ लेखक साहब, साफ-साफ बताओ असल माजरा या है?“ ”तु ह या लगता है?“ ”या तो तु हारा स ा लग गया है या फर तु हारा दमाग िहल गया है।“ ”दूसरी बात कदरन यादा सही है।“ - नीलेश मु कराता आ बोला - ‘‘समझ लो मेरा दमाग िहल गया है।“ ”यानी क नह बताओगे।“ ‘‘तुम बात को यूं समझ लो क आज म ब त खुश ँ, बि क खुशी से पागल आ जा रहा ँ। यक न जानो इन दन अगर मेरी माली हालत ख ता नह होती तो आज क पाट कसी फाईव टार होटल म अरज करता और पूरे शहर को बुला भेजता।“ ”िसफ इन दन ख ता है तु हारी माली हालत!“ ”मेरा मतलब है हमेशा क तरह इन दन भी।“ आशीष हँस पड़ा।
  • 9. ‘‘तुम मेरा मजाक उड़ा रहे हो।‘‘ ”अरे नह यार! म तो िसफ तु ह वाब क दुिनया से िनकालकर हक कत के धरातल पर लाना चाहता ँ।“ - वह नीलेश के हाथ पर हाथ रखता आ समझाने वाले अंदाज म बोला - ”तुम लेखक-किव-शायर टाइप लोग क सबसे बड़ी ेजडी यही होती है क व िमलते ही क पना के घोड़े क सवारी करना शु कर देते हो और फर जहाँ न प ँच जाओ वही कम है। कसी ने सच ही कहा है - लेखक और ठरक कह भी जा सकते ह।“ ”ठरक !“ ”िजसका दमाग िहला आ हो, जो सनक हो।“ ”तु हारा मतलब है म सनक ँ।“ ”तुम बेहतर जानते हो।“ ”देखो रपोटर साहब!‘‘ - वो तिनक आहत भाव से बोला - ‘‘म जानता ँ लोग मुझे िनक मा और कािहल समझते ह। मेरे पीठ पीछे मुझपर हंसते भी ह तो कोई बड़ी बात नह । अपने बाप क नजर म भी म यही सब था, तभी तो आिजज आकर उसनेे मुझे घर से िनकाल दया था। मगर इ मीनान रखो अब वो मुबारक घड़ी आ गयी है, जब लोग अपने कहे पर पछतायगे और तब पहली बार म जी खोलकर हँस सकूँगा। समझ लो मेरे माथे पर लगी बद क मती क मुहर अब िमट चुक है। मेरे खुदा को शायद रहम आ गया मुझपर और मेरी िज लत भरी जंदगी दोन पर! ज दी ही तुम वो सबकुछ मुझे हािसल करते देखोगे िजसका क म खुद को हकदार समझता ं।“ कहकर जब वो खामोश आ तो उसक आँख छलक आ थ । ”सॉरी यार! म तु हारा दल नह दुखाना चाहता था, मगर या क ं जुबान पर काबू नह रख पाता ं।“ - आशीष उस ब जा टॉिपक को बदलने क नीयत से बोला - ”अब जरा अपने आज के मेहमान के बारे म बताओ, कौन लोग ह ये, खासतौर पर तीन लड़ कय के बारे म मुझे बताओ। मने उ ह पहले कभी नह देखा।“ जवाब म नीलेश ने एक बार वहाँ बैठी युवितय पर गौर कया, फर बोला, ”सबसे कोने म जो क मदाना टाइप क शट पहनकर बैठी है, उसका नाम क पना लाल है। वह पहले कॉलेज म और अब क यूटर इं टी ूट म मेरे साथ है। कॉलेज के जमाने म भले ही उसे
  • 10. मेरी तरफ देखना गंवारा नह था, मगर अब हमारी अ छी बनती है। दूसरी कटे ए घुंघराले बाल वाली जो युवती क पना लाल के बगल म बैठी है, उसका नाम मोिनका जैन है, वो शादीशुदा है और उसका एक ब ा भी है।‘‘ ‘‘कमाल है!‘‘ - आशीष हैरान िनगाह से मोिनका का जायजा लेता आ बोला - ‘‘इसे देखकर लगता तो नह है क ये शादी जैसा फु ल टाइम जॉब करती होगी।‘‘ ‘‘शी! धीरे बोलो यार!‘‘ - नीलेश उसे टोकता आ बोला। ‘‘हाउस वाईफ है?‘‘ ‘‘नह जॉब करती है। क यूटर टीचर है, मुझे क यूटर क एबीसीडी इसी ने िसखाई थी।‘‘ ‘‘और मोिनका के बगल म जो तीसरी मोहतरमा ह, वो कौन ह?‘‘ ‘‘उसका नाम ‘वषा’ है, िबहार क रहने वाली है।“ ‘‘ये या करती है?‘‘ ‘‘एक ाईवेट कूल म अं ेजी पढ़ाती है, मुझे भी पढ़ा चुक है।‘‘ ‘‘ कूल म?‘‘ आशीष हैरानी से बोला। ‘‘नह यार! िपछले साल म इंि लश पी कंग कोस कर रहा था, वह पर! कूल वाली जॉब तो इसने अभी तीन महीने पहले ही वाइन क है।‘‘ ”कमाल है यार! तु हारी टीचस कुछ यादा ही मेहरबान नह ह तुम पर! जो यूं तु हारी पाट अटड करती फरती ह। मेरी समझ म नह आता तुम लड़ कय को यूं अपनी तरफ ख च कैसे लेते हो। तु हारी तो श ल भी कसी फ मी हीरो से नह िमलती। ऊपर से तु ह एक नजर देखकर ही पता चल जाता है क जेब से कतने बड़े कड़के हो। इन दोन ॉली फकेशंस के िबना लड़ कयां तुमपर फदा कैसे हो जाती ह। कौन सा जादू आजमाते हो भाई तुम!“ ‘‘तुम गलत सोच रहे हो! इसम फदा होने जैसी कोई बात नह है, बस ये सब ट करती ह मुझपर। मने िव ास जीता है इनका और इनके जैसी बा कय का भी। ये उसी िव ास
  • 11. का ज रा है क वो मुझे कसी भी बात के िलए ना नह करत । बावजूद इसके क वो मुझे अपना वाय ड नह समझत और म उ ह अपनी गल ड नह समझता। म इन सबसे ब त यार करता ं, इ त करता ं इनक और उन सबक िज ह क म जानता ँ और उनक भी िज ह म नह जानता। फर चाहे वो मद हो या औरत! मेरी मोह बत का िह सेदार है और म खुद को उनके यार का मेजर शेेयर हो डर समझता ँ।“ ” फलॉसफ अ छी झाड़ लेते हो, आिखर लेखक जो ठहरे।“ ”यह कोई फलॉसफ नह है! बि क मेरे जीवन क एक ऐसी स ाई है िजसको मेरे िसवाय कोई नह समझ सकता।“ - नीलेश पुरजोर लहजे म बोला - ‘‘कभी आजमा कर देखना, कभी कसी लड़क को इ त देकर देखना। उसे उसके वजूद क अहिमयत समझाकर देखना। कभी उसका िव ास हांिसल करके देखना। तुम पाओगे क दुिनया क हर लड़क तु हारी तरफ आक षत है। तु हारी यह सोच क लड़ कयां िसफ खूबसूरत या पैसे वाले लड़क क तरफ आक षत होती ह - िनहायत घ टया और पु षवादी मानिसकता को उजागर करने वाली है। - हक कत तो ये है रपोटर साहब क कोई भी लड़क सबसे पहले कसी स े लड़के क तरफ आक षत होती है। एक ऐसे लड़के क तरफ जो उसे समझ सके, उसक इ त कर सके, िजसपर वो आंख बंद करके ट कर सके। बाक सभी तो मेल ेन िनकलने के बाद पैसजर ेन क ेणी म आते ह, मजबूरन सफर करना ही पड़ता है।‘‘ आशीष भ च ा सा उसक श ल देखता रह गया। ‘‘ या आ खबरीलाल मुझे ऐसे य घूर रहे हो जैसे क मेरे िसर पर स घ िनकल आए ह ।‘‘ ‘‘कुछ नह ।‘‘ - कहकर आशीष हौले से हंसा फर बोला - ‘‘वैसे तो मुझे पहले से ही उ मीद थी क तुम एक ना एक दन लेखन क दुिनया के शाह ख खान बनोगे! मगर आज तु हारी बात सुनने के बाद मुझे सौ फ सदी यक न हो गया क तु हारा नाम भी दुिनया के महान लेखक म िगना जायेगा।‘‘ ‘‘वो व भी आ ही गया समझो, अब लोग को मेरे भीतर के लेखक से ब होने का मौका िमलेगा। एक ऐसा लेखक जो जीवन क वा तिवकता को लोग के सामने लायेगा, उ ह यार-मोह बत क एक नई दुिनयां से ब करायेगा। तुम देखना लोग-बाग मेरी कताब पढ़कर हैरान रह जायगे।“
  • 12. ”तुम फर शु हो गये।“ - आशीष ख झकर बोला - ”तुम अगर यह सोच रहे हो क, दो- चार स ती पि का म छपी तु हारी कहािनय को पढ़कर लोग-बाग तु हारी लेखनी के दीवाने हो जायगे, तो ऐसा सोचकर तुम महज खुद को तस ली देने क कोिशश कर रहे हो। म मानता ँ तुम अ छा िलखते हो, आगे और भी अ छा िलखोगे। पर महज िलखने भर से कसी को महानता हािसल नह हो जाती। लेखन का सारा कारोबार पाठक क पसंद पर िनभर करता है। जब तक तु हारी िलखी कताब लोग तक नह प ंचती, तु हारा िलखना ना िलखना सब बराबर है। तुमसे अ छे तो वो लोग ह, जो अपने मन क भड़ास फे सबुक और ि वटर पर िनकाल लेते ह और कुछ लोग उसे पसंद-नापसंद करके अपने याल जािहर कर देते ह। जब क तु हे तो ये एडवांटेज भी हािसल नह है। हक कत तो ये है क तुम एक ऐसे लेखक हो िजसक कभी कोई कताब नह छपी। एक ऐसे लेखक हो जो अपनी रचनाय खुद पढ़कर आनं दत होता रहता है। अब हलवाई अगर अपनी िमठाई खुद खाकर उसका गुणगान करता रहे और इस बात पर फू ला ना समाये क उसने कतनी वा द िमठाई बनाई है, तो इससे उसे िसि तो िमलने से रही। जरा सोचो उस िमठाई को बनाने का फायदा ही या िजसका कोई खरीदार ना हो, िजसे चखकर कोई वाद तक बताने वाला ना हो।“ ”तुमने शायद गौर नह कया रपोटर साहब, म कब से कह रहा ं क व बदल चुका है, मेरे बुरे दन पर फु ल टॉप लग चुका है। य क कामयाबी के मुकाम क पहली सीढ़ी म चढ़ चुका ं। तु हारी उ मीद से भी बड़ा ेक िमला है मुझे लेखन क दुिनया म। ब त ज द तुम देखोगे क पूरे िह दो तान के लोग मुझे बाई नेम जानगे और एक दन तु हारे भाई-बंधु मेरा इंटर ू लेने के िलए अ वाइंटमट मांगते फरगे।“ ”तुमने ंक कया है?“ ‘‘नह म शराब नह पीता और ये बात तुम अ छी तरह से जानते हो।‘‘ ‘‘ फर यूं बहक -बहक बात य कर रहे हो?‘‘ ‘‘सोचो कोई तो वजह होगी।‘‘ ‘‘खुद बता दो?‘‘ ”ठीक है“ - कहते ए नीलेश ने कुस से सटाकर रखे अपने बैग से एक मोटी सी कताब िनकालकर उसके सामने टेबल पर रख दया फर बोला - ”म अभी इसे दखाना नह
  • 13. चाहता था, मगर तुमने मुझे इतना बड़ा नकारा सािबत कर दया क म खुद को रोक नह पाया। जानते हो ये उप यास म सबसे पहले उस बेवफा को नजर करना चाहता था, िजसक बेवफाई ने मुझे इतनी टीस द क उन टीस को म कागज पर उतारने को मजबूर हो गया, नतीजा तु हारे सामने है - और सुनकर तुम हैरान रह जाआगे क बीस उप यास का अि म कां े ट साइन कर चुका ं। हर उप यास का एक लाख और तीस फ सदी रॉय टी, अब कहकर दखाओ क म नकारा ं! अपनी िमठाई खुद चखकर खुश होने वाला हलवाई ं।“ कहकर वो बड़े ही गव से मु कराया। आशीष हकबकाकर उसका मुंह तकने लगा। फर उसने उप यास उठाकर देखा टाइटल था, ‘आवारा लेखक‘ लेखक के नाम वाली जगह पर नीलेश ितवारी िलखा था। बैक साईड म उसक फोटो भी छपी थी। उसे मेरठ के ‘मॉडन पि लशर‘ ने कािशत कया था। शक क कोई गुंजाइश नह थी। आशीष को एक अजीब सा शकून हािसल आ, मानो वो कामयाबी नीलेश क नह बि क उसक खुद क थी। बहरहाल पाट चलती रही, देर रात तक चलती रही। साढ़े दस बजे के करीब कुछ और मेहमान वहां आ प ंचे थे। िडनर के बाद लड़ कयां वापस लौट ग । फर नये िसरे से ंक और िडनर का दौर शु आ जो क काफ ल बा खंचता चला गया। रात के बारह बजे नीलेश से िवदा लेकर आशीष अपने लैट पर प ंचा और सूट-बूट म ही िब तर पर पसर गया। अगली सुबह वो सोकर उठा तो नौ बज चुके थे। तैयार होकर वो ऑ फस के िलए िनकलने ही लगा था क तभी उसका मोबाईल रंग होने लगा। फोन उसके एडीटर अिनल सलूजा का था। िजसने उसे बताया क एक बजे क लाईट से उसे एक पेशल असाइनमट पर कोलकाता जाना है। जहां उसे चार या पांच दन लग सकते थे, इसिलए उसे पूरी तैयारी के साथ वहां के िलए रवाना होना था। आशीष ने घड़ी पर िनगाह डाली तो पाया क साढ़े यारह तो हो भी चुके थे। बड़ी मुि कल से वो इस शाट नो टस पर लाईट पकड़ने म कामयाब हो पाया। तीन बीस के करीब उसक लाईट कोलकाता के नेताजी सुभाष चं बोस इंटरनेशनल एयरपोट पर लड ई। जहां उसे लेने के िलए ‘खबरदार‘ के कोलकाता ऑ फस का एिडटर खुद आया आ था। आशीष उसके साथ उसक कार म सवार हो गया। अगले दो-तीन दन इतनी तता म बीते क आशीष को कसी और बात क तरफ यान देने क फु सत ही नह िमली।
  • 14. इतनी कहानी सुना चुकने के प ात आशीष ने अपने सामने बैठे यूज एडीटर अिनल सलूजा क तरफ देखा, और खामोशी से नेवीकट का पैकेट िनकालकर एक िसगरेट सुलगाने लगा। ” फर या आ?“ अिनल सलूजा उ सुक वर म बोला। ”अगली सुबह वो अपने लैट म मरा आ पाया गया था। इसक खबर मुझे उसक मौत के तीन दन बाद, कोलकाता म ही लगी थी। बाद म जब मने फोन करके संबंिधत थाने से उसक मौत के बारे म जानना चाहा तो आईओ ने बताया क जांच म पता चला था क उसक मौत बाथ म म पैर फसल जाने क वजह से ई थी।“ ”बात कुछ समझ म नह आई।“ - सलूजा बोला - ‘‘जरा खुलकर बताओ, भला बाथ म म पैर फसलने से भी कसी क मौत होती है।‘‘ ”उसक ई थी, मौत कोई दरवाजे पर द तक देकर नह आती जो आदमी उससे बचने का इंतजाम कर सके। या पता अभी मेरे सामने कुस पर बैठे-बैठे ही तु हारा हाट फे ल हो जाय! या सी लंग फै न टूटकर तु हारे िसर पर आ िगरे और तुम दुिनया से चलते बनो, या...।‘‘ ‘‘अरे म समझ गया भाई, अब बस भी करो।‘‘ - सलूजा तिनक हड़बड़ाहट भरे लहजे म बोला - ‘‘बात नीलेश क मौत क हो रही थी।‘‘ ‘‘हां सुनो, दरअसल उस रात पाट से लौटकर जब वो अपने लैट पर प ंचा तो वहां उसने ंक करना शु कर दया। पो टमाटम रपोट के अनुसार अ कोहल क िजतनी मा ा उसके शरीर म पाई गई थी, उस िहसाब से उसने दो लाज या तीन मॉल पैग डकारा हो सकता है। मगर य क उसने पहले कभी शराब नह पी थी, इसिलए ज दी ही वो नशे म धु हो गया। फर नशे क हालत म वो कसी व बाथ म म प ँचा, जहाँ पैर फसलने क वजह से उसका िसर बाथ म क दीवार से टकराकर फू ट गया। िसर पर आई चोट इतनी ग भीर थी क वो अपनी चेतना गवां बैठा, नतीजा ये आ क बेहोशी क हालत म उसके िसर से लगातार खून बहता रहा, िजसक वजह से सुबह सात बजे के करीब उसक मौत हो गई थी।“ ”तु हारा मतलब है वो दीवार से िसर टकराने क वजह से नह मरा था, बि क उसक मौत बेहोशी के दौरान खून अिधक बह जाने क वजह से ई थी।“
  • 15. ”ठीक समझे।“ कहकर आशीष ने िसगरेट का एक गहरा कश िलया। ‘‘तुम अभी-अभी बताकर हटे हो क वो कभी शराब नह पीता था, फर उस रात उसके ंक करने क ज र कोई खास वजह रही होगी?“ ”िसवाय इसके और या वजह हो सकती है क उसक िज दगी के दन पूरे हो गये थे। ‘आवारा लेखक‘ के काशन क खुशी ने उसका दमाग िहला दया था। वरना दूसर को शराब ना पीने क नसीहत देने वाला उस रोज खुद शराब को गले ना लगा बैठता। सच पूछो तो ये उसक बद क मती ही कही जायेगी क िजस मुकाम को हािसल करने के िलए उसने दन-रात एक कर दया था। उसके हािसल से िमलने वाली वाह-वाही को इं वॉय कये िबना ही वो दुिनया से शत हो गया।“ ”चलो मान ली तु हारी बात! अब तुम मुझे ये बताओ क रात के बारह-एक बजे उसे शराब कहाँ से हांिसल ई। वो कोई डेली ंकर होता तो हम मान लेते क उसने घर म बोतल रखी ई होगी। मगर बतौर तु हारे वो तो ंक करता ही नह था। ऐसे म यह बात तु ह कुछ अजीब नह लगती क आधी रात के बाद ना िसफ उसे ंक करना सूझा था बि क उसे शराब क बोतल भी हािसल हो गयी थी।“ ”तुम आ मह या य नह कर लेते।“ ” या कह रहे हो यार!“ सलूजा हड़बड़ाया सा बोला। ”मरने के बाद उसी से कर लेना ये सारे सवालात।“ ”मजाक कर रहे हो।“ ”और या क ँ ?“ - आशीष झ लाता आ बोला - ‘‘उसक मौत मुझपर कतनी भारी गुजरी थी, इसका अंदाजा भी तुम नह लगा सकते। बस खामखाह गड़े मद उखाड़कर मेरे ज म को ताजा कर रहे हो। या म पूछ सकता ँ आज उसक मौत के सात-आठ दन बाद तु ह उसके बारे म सवाल करने क य कर सूझी?“ ‘‘बेवजह तो नह सूझी।‘‘ ‘‘वजह बोलो।‘‘ ‘‘एक िच ी आई है।‘‘
  • 16. ‘‘तौबा! मोबाईल और ई-मे स के जमाने म भी िच ी।‘‘ ‘‘हां िच ी।‘‘ - कहकर सलूजा ने अपने मेज के ायर से एक कागज िनकालकर उसके सामने रख दया - ” कसी औरत ने बेनाम भेजी है, पढ़कर देखो, खुद समझ जाओगे क म नीलेश ितवारी क बाबत इतने सवालात य कर रहा ं।“ िच ी एक खूबसूरत लगने वाले रंगीन कागज पर िलखी गई थी और कसी लेटर पैड का िह सा मालूम पड़ती थी। िच ी के तह को खोलकर आशीष ने पढ़ना शु कया, जो क िबना कसी स बोधन के कुछ यूं िलखी गई थी- ‘म आपके अखबार ‘खबरदार‘ के ज रए लोग को यह बताना चाहती ँ क आठ तारीख क सुबह सात बजे के करीब ई नीलेश ितवारी क मौत उसके साथ गुजरा कोई खतरनाक हादसा नह था। बि क कसी ने सोच-समझकर, लान करके उसक ह या इस तरीके से क थी क उसक मौत ह या क बजाय दुघटना नजर आए। यहां िजन बात क तरफ म सभी का यान ख चना चाहती ं उनम सबसे अहम बात ये है क नीलेश ंक नह करता था। इसके बावजूद उस सुबह अगर कसी वजह से उसने शराब पीने क ठान ही ली थी, तो सवाल यह उठता है क अल मा नग उसे शराब कहाँ से हािसल ई। सुबह के चार बजे तक म उसके साथ उसके लैट म थी। तब तक उसने डंªक नह कया था, म इस बात क गवाह ं। उसके बाद म उसे सोने क तैयारी करती छोड़कर वापस लौट गई थी। ऐसे म या ये मानने वाली बात है क उसने सुबह के चार बजे शराब से मुंह धोना शु कर दया था। दूसरी गौर करने वाली बात ये है क उसका िसर बुरी तरह से फू टा आ पाया गया था। इतना बुरा हाल महज पैर फसलने पर दीवार से िसर टकरा जाने क वजह से नह आ हो सकता। उस ि थित म यादा से यादा उसके िसर पर गूमड़ िनकल सकता था! या छोटा-मोटा कट लग सकता था। तीसरी हैरान कर देने वाली बात ये है क उसका पैर फसला, वो दीवार से टकराया और धे मुंह फश पर जा िगरा! मगर ना तो उसक नाक फू टी ना ही उसके चेहरे पर कसी कार क चोट आई। मुझे स त हैरानी है क इतनी अहम बात पर पुिलस ने अपनी जांच के दौरान कोई यान नह दया। उसक मौत क बाबत मेरा िनजी अंदाजा ये है क काितल उसका कोई पहचान वाला था। िजसने उसे मनुहार करके या फर मजबूर करके पहले शराब िपलाया, फर उसे बाथ म म ले गया। जहां उसके िसर को बाल से पकड़कर जोर से दीवार पर दे मारा! तभी उसके िसर
  • 17. म इतनी भयंकर चोट प ंची थी, अ य कोई बात हो ही नह सकती। मुझे उ मीद है आप मेरी बात को कोरी क पना समझकर मेरी िच ी को ड टबीन म डालने क बजाय मेरी बात पर गहनता से िवचार करगे। -एक िज मेदार शहरी िच ी पढ़कर आशीष ह ा-ब ा रह गया। उसने ज दी-ज दी िच ी दो-तीन दफा और पढ़ डाला। ”देखो हम नह मालूम क िच ी िलखने वाली क दलील म कतना दम है, मगर हम पता लगा कर रहगे।“ - सलूजा बोला - ”तुम अभी से इस काम पर लग जाओ और जानने क कोिशश करो क ये सब या च र है। सबसे पहले ये पता करो क इस गुमनाम िच ी को िलखने वाली औरत कौन है। आिखर मरने वाला तु हारा दो त था, अगर सचमुच उसका क ल आ है तो काितल कानून के पंजे म होना ही चािहए। वरना तु हारे मर म दो त क आ मा भटकती रहेगी।“ जवाब म आशीष ने उसे घूर कर देखा। ”क... या आ?“ सलूजा सकपकाया। ”म तु ह खूब पहचानता ँ एडीटर साहब। तु ह नीलेश क मौत से कोई लेना-देना नह है और ना ही मुझसे कोई हमदद है। बि क तुम उस सनसनीखेज टोरी के िलए मरे जा रहे हो, जो क अगर िनलेश ितवारी का क ल आ सािबत हो गया, तो तु ह हािसल होगी।“ ”दोन बात ह यार!“ ”िसफ दूसरी बात है।“ ”वही सही यार!“ - सलूजा झपता आ बोला - ” या कर हमारा धंधा ही ऐसा है। अब कुछ करके दखाओ तो बात बने।“ ”करना ही पड़ेगा, अभी तक मने इस िसलिसले म कोई खोज-खबर नह ली थी तो इसक अहम वजह ये थी क म सपने म भी नह सोच सकता था क नीलेश ितवारी क मौत म कोई भेद हो सकता है। यक न तो मुझे अभी भी नह आता - वो तो िनरा ‘ना का से दो ती ना का से बैर‘ टाईप का लड़का था। भला उसके क ल म कसी क या दलच पी
  • 18. हो सकती है।“ ‘‘तु हारी बात अपनी जगह है, मगर हम इस िच ी िलखने वाली क दलील को नजरअंदाज भी तो नह कर सकते।‘‘ ‘‘मतलब ही नह बनता, अब तुम एक काम कर के दखाओ, तो कुछ बात बने।‘‘ ” या?“ ”इस िच ी को य का य ‘खबरदार’ के कल के एडीशन म ं ट पेज पर छाप दो।“ ”पागल ए हो म ऐसा कैसे कर सकता ँ! जब क हम ये भी नह मालूम क यह िच ी कसने िलखी है।“ ” या फक पड़ता है?“ ”ये हमारे अखबार क इमेज का सवाल है।“ ”और तुम खबरदार के एडीटर हो, कोई घास नह छीलते।“ ” या कहना चाहते हो?“ ”अमूनन तो तुमसे जवाब-तलबी होगी ही नह , और ई तो मुझे यक न है तुम सामने वाले को कोई सजता सा जवाब दे सकते हो, तु हारी काबीिलयत पर मुझे पूरा भरोसा है।“ ”ऐसा करना ठीक नह होगा यार।‘‘ आशीष ने उसे घूर कर देखा। ”अरे भाई समझने क कोिशश करो?“ ‘‘ठीक है म इसे कसी और अखबार को दे देता ं।‘‘ कहकर आशीष ने मेज पर रखी िच ी उठाकर अपनी जेब म ठूंस ली।‘‘ ‘‘मने पहला रपोटर देखा है जो अपने एडीटर से यूं पेश आता हो।‘‘ सलूजा गहरी सांस लेते ए बोला। ‘‘तो मेरी कं लेन कर दो, नौकरी से िनकाल दो मुझे, बंदा चला।‘‘
  • 19. ”अरे सुनो तो।“ ” या फायदा?“ ”अरे बैठ जा मेरे बाप! य मेरे स का इ तीहान ले रहा है, म करता ं कुछ, देता ं इस लव-लेटर को ि टंग म।“ आशीष दोबारा बैठ गया। ”अब कम से कम ये तो बता दो क तुम इस िच ी को कािशत कराके या हांिसल होने क उ मीद कर रहे हो।“ ”िसफ इतना क अगर सचमुच नीलेश क मौत म कोई फाऊल ले है, तो ‘खबरदार’ म कािशत इस िच ी को पढ़कर काितल यक नन बौखला उठेगा। वह समझ जायेगा क उसका एहितयात बरतना कसी काम नह आया था। ऐसे म कोई ना कोई िहल-डुल ज र होगी, बस हम उसी पर िनगाह रखनी है।‘‘ ”यह ब त दूर क कौड़ी है।“ ”मगर कौड़ी तो है, तुम इसे छापो फर देखते ह या नतीजा िनकलता है।“ ”अरे बोल तो दया।“ ”कल के एडीशन म।“ सलूजा ने सहमती म िसर िहला दया। ”गुड! अब फटाफट पांच हजार पये िनकालो।“ ” कसिलए?“ ”मोटरसाइ कल म पे ोल डलवाना है।“ ‘‘पांच हजार का?‘‘ सलूजा च कता आ बोला। ‘‘डलवाना तो म बीस हजार का चाहता ं मगर वो तु हारे बस का नह है।‘‘ सलूजा ने चुपचाप उसे पांच हजार का बाउचर बनाकर पकड़ा दया और बोला कैिशयर से ले लेना।
  • 20. आशीष उठ खड़ा आ। इमारत से बाहर आकर वो अपनी मोटरसाइ कल पर सवार हो गया। बारह बजे के करीब वो आर.के.पुरम थाना प ंचा। िडयूटी म म दो लेडी कां टेबल और एक हवलदार बैठे ग पे हांकने म मशगूल थे। आशीष हवलदार के करीब प ंचा। ‘‘ या हाल है दयाराम जी।‘‘ वो उसके सामने मौजूद एक कुस पर बैठता आ बोला। हवलदार ने िसर उठाकर उसक ओर देखा, त काल उसके चेहरे पर पहचान के भाव उभरे, ‘‘ या बात है भैया सब खै रयत तो है।‘‘ ‘‘अभी तक तो है, आगे इस बात पर मुनसर है क आप या रवैया अपनाते ह।‘‘ ‘‘ या कहते हो भैया, हम या मरना है तुम पच वाल से दु मनी मोल लेकर! बताओ या सेवा कर।‘‘ ‘‘बस कुछ मु तर सी याद ताजा करनी ह।‘‘ ‘‘बताओ तो सही या जानना चाहते हो।‘‘ ‘‘जरा गुजरी ई आठ तारीख को अपने जहन म ताजा करके दखाइए! आपके इलाके म नीलेश ितवारी नाम का एक श स अपने लैट के बाथ म म मरा पाया गया था, याद आया कुछ!‘‘ ‘‘याद तो खूब है, तकरीबन तमाम बात दोहरा सकता ं, ले कन अ छा होता अगर उस िसलिसले म तुम अिनल यादव साहब से बात कर लेते। केस का इंवेि टगेशन ऑफ सर होने के नाते वो तु ह यादा बेहतर जानकारी दे सकते ह।‘‘ ‘‘थाने म ही ह।‘‘ ‘‘हां, वो एसएचओ साहब के बगल वाला कमरा है, उसी म बैठे ह।‘‘ सहमित म िसर िहलाता आशीष उठकर हवलदार ारा बताये गये कमरे क ओर बढ़ गया। उसके पीठ फे रते ही हवलदार दोबारा ग पे हांकने के िनहायत ज री काम म मश फ हो गया। एसआई अिनल यादव कुस पर अधलेटा सा बैठा था। उसने अपनी दोन टांग सामने मेज पर फै ला रखी थ और बड़े ही रलै स मूड म िसगरेट के कश लगाने के अहमतरीन काम
  • 21. को अंजाम दे रहा था। वो तीस के पेटे म प ंचा आ, छह फु ट से तिनक ऊपर िनकलते कद वाला युवक था। िजसपर पुिलस क वद बेहद फब रही थी। आशीष को देखकर उसने बड़ी मश त से अपनी टांग को मेज से नीचे उतार कर साइड म रखा। अलब ा इंसान वाले पोज म वो अभी भी नह आया था। आिखरकार दो िसतार वाला पुिलिसया था, भाव खाना तो बनता ही था। उसका यही एहसान या कम था जो उसने आशीष को बैठने का इशारा कर दया। ‘‘ या हाल है रपोटर साहब।‘‘ वो लापरवाही से बोला। ‘‘तु हारे िजतने मजे म तो नह ं अलब ा कल क अपे ा आज बेहतर महसूस कर रहा ं।‘‘ ‘‘ऐसा या हो गया था कल?‘‘ वो िसगरेट का एक गहरा कश लेकर नाक से धुंआ उगलता आ बोला। ‘‘हॉ पीटल केस बन गया था, पूरी रात इमरजसी वाड म वटीलेटर पर रहना पड़ा था।‘‘ ‘‘अरे! कोई फौजदारी हो गयी थी या?‘‘ कहता आ यादव सीधा होकर बैठ गया। ‘‘नह तबीयत खराब हो गयी थी।‘‘ ‘‘ऐसा भी या हो गया था।‘‘ ‘‘पूरे चार बार खांसी आ गई थी, डॉ टर का कहना था अगर एक बार और आ जाती तो यक नन खांसी क दवा लेनी पड़ती। शु है खुदा का, बचा िलया उसने।‘‘ कहकर आशीष ने ऊपर छत क तरफ देखते ए दोन हाथ जोड़ दये। एसआई अिनल यादव कुछ ण अजीब िनगाह से उसे घूरता रहा फर दोबारा उसने अपने शरीर को कुस पर ढीला छोड़ दया और िसगरेट का एक ल बा कश लेकर बोला, ‘‘सारे अखबार वाले तु हारे जैसे ही होते ह, या तुम पेशल हो।‘‘ ‘‘लोग कहते तो ह क म आसमान से उतरा ं! अब इस बात म कतनी स ाई है कहना मुहाल है।‘‘ ‘‘िलहाजा फु सत म हो।‘‘
  • 22. ‘‘कमाल है तु हे कैसे पता चला।‘‘ ‘‘पुिलस वाला ं भाई, यही सब ताड़ने क और तुम जैस क बकवास सुनने क ही तो त वाह देती है सरकार हम! लीज बी कंटी यू, मेेरे पास ब त टाईम है! अगले साल दो साल म भी ये बता दोगे क यहां य आये हो तो भी चलेगा।‘‘ ‘‘नीलेश ितवारी तो याद होगा तु हे!‘‘ - आशीष त काल मतलब क बात पर आता आ बोला - ‘‘अभी कल क ही तो बात है।‘‘ ‘‘अब उसके बारे म नया या जानना चाहते हो, फोन पर जो सवालात कये थे तुमने, उसम या कोई कसर रह गयी थी, जो अब पूरी करना चाहते हो।‘‘ ‘‘उस रोज लाइन म थोड़ी िड टवस थी, बात ढ़ंग से समझ म नह आई थी।‘‘ जवाब म यादव ने एक आह! सी भरी फर बोला, ‘‘पूछो या पूछना चाहते हो।‘‘ ‘‘खबर कैसे लगी उसक मौत क ।‘‘ ‘‘उसके नै ट डोर नेबर ने सौ न बर पर फोन करके इि ला दी थी। भला सा नाम था उसका - हां याद आया िनहाल संह, पेशे से डॉ टर है। उसी ने नीलेश ितवारी क डैड बॉडी बरामद क थी।‘‘ ‘‘तुमने उससे सवाल तो कया ही होगा क इतनी सुबह-सुबह वो नीलेश के लैट म या करने गया था?‘‘ ‘‘नह भई, इतनी ान क बात तु हारे बताये बगैर हमारे भेजे म कैसे आ सकती थी, जो हम उससे इस बाबत कोई सवाल करते।‘‘ ‘‘ या बताया था उसने।‘‘ आशीष उसके ं य को नजरअंदाज करके बोला। ‘‘कुछ नह ! कहता था लैट का दरवाजा आधा खुला आ था, वो सामने से गुजरा तो उसक िनगाह एक कु े पर पड़ी, जो क ितवारी के लैट म घुसा आ था। तब वो नीलेश को आवाज देता भीतर दािखल हो गया। आगे जब उसक िनगाह बाथ म के खुले दरवाजे से भीतर गयी तो वहां उसने नीलेश को फश पर पड़ा पाया। ये देखने को क उसे कोई दौरा-वौरा तो नह पड़ गया, वो बाथ म म दािखल आ। तब जाकर उसे दखाई दया क नीलेश ितवारी खून से लतपथ पड़ा था। वो पहली नजर म ही भांप गया था क वो मर
  • 23. चुका है। फर भी उसने ितवारी क न ज टटोलकर देखी, उसक धड़कन चेक क , शक क कोई गुंजाइश नह थी। बाहर आकर उसने एक नेक शहरी क तरह पुिलस कं ोल म को फोन खटकाया और पीसीआर के प ंचने तक घटना थल पर डटा रहा था।‘‘ ‘‘बेचारा!‘‘ ‘‘कौन नीलेश ितवारी।‘‘ ‘‘नह िनहाल संह! अब बार-बार पछता रहा होगा क उसने नेक शहरी बनने क िहमाकत य दखाई।‘‘ ‘‘ऐसी कोई बात नह है, हमने बस उससे दो-चार टीन के सवाल ही कये थे।‘‘ ‘‘मुझे मालूम है द ली पुिलस के टीन के सवाल कैसे होते ह।‘‘ - आशीष बोला - ‘‘बहरहाल वो कहानी फर कभी। तो तुम पीसीआर के बाद वहां प ंचे थे।‘‘ ‘‘हां मगर सारी इंवे टीगेशन हम लोग ने ही क थी। पीसीआर ने तो वहां प ंचकर बस ये सुिनि त कया था क कोई घटना थल से छेड़खानी ना करे।‘‘ ‘‘तो अपनी इंवेि टगेशन से तुमने ये िन कष िनकाला क वो नशे क हालत म बाथ म म प ंचा था। जहां उसका संतुलन िबगड़ गया। िगरते व उसका िसर दीवार से टकराकर ना िसफ फू ट गया, बि क उस चोट क वजह से वो अपनी चेतना गवां बैठा था।‘‘ ‘‘हां ऐसा ही था। फर बेहोशी क हालत म उसके िसर से लगातार खून बहता रहा, जो क उसक मौत का कारण बना था। पो टमाटम करने वाले डॉ टर का कथन है क अगर उसक मौत से बीस िमनट पहले भी उसे उपचार िमल जाता तो उसक िज दगी बचाई जा सकती थी।‘‘ ‘‘यूं दम तोड़ने म कतना टाइम लगा होगा उसे।‘‘ ‘‘देखो उसक मौत सुबह करीब सात बजे ई थी, इसको यान म रखकर मैिडकल ए जािमनर ने जो नतीजा िनकाला है उसके अनुसार मृतक के िसर पर करीब पांच बजे वो चोट लगी हो सकती है। तुम इसे थोड़ा ए टड करके ये मान लो क पौने पांच और सवा पांच के बीच वो घायल आ था।‘‘ ‘‘यूं दीवार से िसर टकराने पर इतनी भयंकर चोट आते तो नह देखा कसी को।‘‘
  • 24. ‘‘ या कहना चाहते हो भई?‘‘ ‘‘ या ऐसा नह हो सकता क कसी ने ह या क नीयत से उसका िसर जोर से दीवार पर दे मारा हो।‘‘ ‘‘पुिलस िडपाटमट को या तुम मीिडया वाल ने उ लू का प ा समझ रखा है। जो तुम सोचते हो क इस बाबत हम याल ही नह आया होगा।‘‘ ‘‘यािन आया था।‘‘ ‘‘बेशक आया था, मगर कसी काितल से हम ये अपे ा नह कर सकते क वो अपने िशकार को अधमरा छोड़कर इस उ मीद म वहां से दफा हो जाता क अब तो साला मर ही जाएगा। उ टा अगर यह क ल का केस होता तो काितल ने पहले वार के बाद उसे िज दा पाकर दूसरा-तीसरा या फर चौथा वार भी कर दया होता। वो तब तक वार करता रहता जब तक क उसे अपने िशकार क मौत का इ मीनान नह हो जाता। कहने का ता पय ये है क कोई भी काितल अपने िशकार को अधमरा छोड़कर जाने का र क नह ले सकता।‘‘ ‘‘ या पता वो जाना नह चाहता हो, मगर अचानक ऊपर से कोई वहां प ंच गया हो, िजसक वजह से काितल को वहां से भागना पड़ा।‘‘ ‘‘नह हो सकता, वो टू बीएचके का छोटा सा लैट है ना क कोई बड़ा सा राजा- महाराजा का बंगला! जहां कसी के आने पर काितल िछप गया और बाद म मौका पाकर भाग िनकला। वहां से केप का िसफ एक ही रा ता है मेन गेट! जहां से िनकलने पर वो आगंतुक क िनगाह से िछपा नह रह सकता था।‘‘ ‘‘पो टमाटम क रपोट तो होगी तु हारे पास।‘‘ ‘‘हां तु हारे िलए एक कॉपी कराकर पहले से रखी ई है।‘‘ ‘‘मजाक कर रहे हो।‘‘ वो हंसा। फर मेज क दराज से रपोट क कॉपी िनकाल कर उसने आशीष को थमा दी। ‘‘एक मेहरबानी और कर दो।‘‘ ‘‘वो भी बोलो।‘‘
  • 25. ‘‘घटना थल क कोई त वीर िमल जाती तो मजा आ जाता।‘‘ यादव ने उसक वो तम ा भी पूरी कर दी। ‘‘और कुछ?‘‘ ‘‘एक आिखरी सवाल! तुमने बताया था क मरने वाले ने ता जंदगी कभी शराब नह पी थी, इसिलए उस रोज दो-तीन पैग ने ही उसे नशे के आसमान पर प ंचा दया था। अब मेरा सवाल ये है क इस बाबत तु हे पता कैसे चला?‘‘ ‘‘उसके दो त - र तेदार से पूछताछ करके। यहां तक क उसके पड़ोसी भी इस बात के गवाह बने थे क ितवारी को उ ह ने कभी ंक करते नह देखा था। ऊपर से मैिडकल ए जािमनर क रपोट से भी इस बात का खुलासा आ था, क वो डेली ंकर नह था। और फर लाख पये क बात ये क िबना नशे के भी आदमी का पांव फसल सकता है। िजसक आई होती है उसने जाना ही होता है। इसिलए ंक वाली बात पर जोर देने का कोई फायदा नह है।‘‘ ‘‘मेरा जोर उस बात पर नह है, बि क इस बात पर है क कभी ंक ना करने वाले नीलेश ितवारी कोे उस रोज ंक करना य कर सूझा था।‘‘ ‘‘इस बारे म कोई पु ता जानकारी तो हमारे पास नह है अलब ा उसके जानकार का कहना है क उस रोज वो बेहद खुश था। उसका कोई उप यास वगैरह कािशत आ था, िजसका इंतजार वो मु त से कर रहा था। अब पीने क तीन ही वजह होती है - इंसान दुख म पीता है, खुशी म पीता है और आदतन पीता है। आदत वाली बात उसम थी नह । कोई दुःखी करने वाली बात अभी तक सामने आई नह , िलहाजा उस रोज खुशी म ही पी ली होगी उसने। वैसे भी इंसानी दमागा का या भरोसा! जीवन म ब त सारे काम ऐसे होते ह जो हम अचानक कर जाते ह और भारी नुकसान उठाते ह। फर कहते ह क मत ही खराब थी वरना आज तक तो ऐसा नह कया था, अब य करता? मृतक के बारे म भी तुम यही मान लो, क उसक क मत ही खराब थी।‘‘ जवाब म आशीष ने सहमित म िसर िहलाया। तभी उसक िनगाह घटना थल पर ली गई उस त वीर पर पड़ी जो क अभी-अभी यादव उसे देकर हटा था। त काल उसके चेहरे पर च कने वाले भाव उभरे। ‘‘कोई खास बात दखाई दे गयी त वीर म।‘‘ यादव उसके चेहरे पर िनगाह गड़ाए ए
  • 26. बोला। ‘‘है तो कुछ ऐसा ही।‘‘ ‘‘ या दखाई दया।‘‘ ‘‘च पल के िनशान!‘‘ ‘‘उसम या खास बात है?‘‘ ‘‘खास बात ये है क पंज क तरफ के िनशान काफ गहरे ह, जब क एिड़य वाले साइड के िनशान लगभग ना बनने जैसे ह। उधर का इं ेशन ब त ह का है।‘‘ ‘‘ या कहना चाहते हो।‘‘ वो सं द ध भाव से बोला। ‘‘देखो जब हम च पल या जूते पहन कर कसी गीली जगह या क चड़ म चलते ह तो पैर तले जो इं ेशन बनते ह उनम सबसे गहरा एिड़य वाले साइड का होता है, य क पंज क अपे ा एिड़य पर दबाव अिधक पड़ता है।‘‘ ‘‘कभी आजमाकर तो नह देखा, अलब ा इतने बड़े अखबार का इतना बड़ा रपोटर ये बात कह रहा है तो गलत तो नह हो सकती।‘‘ ‘‘तारीफ का शु या! भले ही तुमने तंज ही य ना कसा हो।‘‘ ‘‘अरे नह भाई।‘‘ ‘‘इ स ओके! अब आगे सुनो, इस त वीर म िजतने भी फु ट मा स दखाई दे रहे ह उनम कुछ को छोड़कर बा कय म िसफ च पल के अगले िह से के ही इं ेशन दखाई दे रहे ह।‘‘ ‘‘च पल का िपछला िह सा यादा िघसा आ होगा भई।‘‘ ‘‘नह हो सकता अभी म वह बताकर हटा ं क कुछ िनशान ऐसे भी ह िजनम पूरे फु ट ंट दखाई दे रहे ह।‘‘ ‘‘कहां, दखाओ मुझे।‘‘ कहकर उसने त वीर आशीष के हाथ से वापस ले ली और गौर से देखने लगा। फर उसने अपने पास से कुछ और त वीर िनकालकर उनपर गौर कया तो पाया क सभी त वीर म फु ट ं स का यही हाल था।
  • 27. ‘‘भई बात तो तुम सही कह रहे हो ले कन मतलब या आ इसका।‘‘ ‘‘यादव साहब जो मतलब समझ म आता है वो तु हे रास नह आने वाला।‘‘ ‘‘तुम बोलो तो सही।‘‘ ‘‘ये आधे िह से म बने ं स बाथ म म कसी दूसरे ि क आमद क चुगली करते ह। वो कोई ऐसा ि रहा हो सकता है, िजसके पैर का नाप नीलेश के पैर से कम से कम दो या तीन इंच छोटा था। वह बाथ म म नीलेश क च पल पहन कर घुसा था। ये अधुरे फु ट ं स यक नन उसी के ह। पैर का साइज छोटा होने क वजह से उसक एिड़यां च पल के िपछले िह से तक प ंच ही नह पाई ह गी! इसीिलए उधर का इं ेशन ब त ह का, ना होने जैसा बना है। अब या ये खाका ख च कर समझाना पड़ेगा क वो दूसरा ि ही काितल था।‘‘ ‘‘हां समझाना ही पड़ेगा य क म ये सात ज म म भी मानने को तैयार नह होने वाला क नीलेश ितवारी क ह या क गयी थी। वह महज एक हादसा था िजसम मृतक अपनी जान गवां बैठा था। हादसे के अलावा वो और कुछ हो ही नह सकता।‘‘ ‘‘इस त वीर म वो िबना च पल के दखाई दे रहा है, या उसक डैड बॉडी ऐसे ही बरामद ई थी, नंगे पांव!‘‘ ‘‘हां।‘‘ ‘‘और च पल! वो कहां िमली थी तु हे।‘‘ ‘‘बेड म म पलंग के नीचे।‘‘ ‘‘ या च पल गीली थ ?‘‘ ‘‘बरामदगी के व तो सूखी थ , अलब ा च पल के नीचे का फश हम गीला िमला था, हमारा अंदाजा है क उसने अपनी मौत से पहले कसी व बाथ म म जाने के िलए उस च पल का इ तेमाल कया था।‘‘ ‘‘ फर दोबारा बाथ म जाने के िलए उसने च पल पहनने क कोिशश य नह क !‘‘ ‘‘ य क उसके पास व नह था।‘‘
  • 28. ‘‘ कस बात का!‘‘ आशीष तिनक हैरानी से बोला। ‘‘च पल पहनने का! हमारा अपना अंदाजा ये कहता है क शराब पीने के बाद कसी व अचानक उसे उबकाई आयी और वह दौड़ता आ बाथ म म प ंचा जहां उसने उ टी क । अब तुम खुद सोचो क ऐसे म वो च पल य कर पहन पाता।‘‘ ‘‘वॉश बेिसन म उ टी के अवशेष िमले थे?‘‘ ‘‘नह मगर वो कोई बड़ी बात नह है, उसने पानी चलाकर उसे साफ कर दया होगा।‘‘ ‘‘बात कुछ हजम नह ई यादव साहब, एक तरफ तो तुम ये कहते हो क वो इतने नशे म था क बाथ म म अपना संतुलन खो बैठा! दूसरी तरफ तुम ये कहते हो क वो उबकाई आने पर दौड़ता आ बाथ म म प ंचा जहां उसने ना िसफ उि टयां क , बि क उसे वॉश बेिसन को पानी चलाकर साफ करना भी याद रहा था। अब िजस आदमी को उ टी आने पर बाथ म म जाने का याल आ सकता है, वॉश बेिसन को साफ करने का याल आ सकता है, वो नशे म धु तो नह कहा जा सकता। अगर ऐसा होता तो वो बाथ म तक प ंचने से पहले ही िगर गया होता। या फर उसने कमरे म ही उ टी कर दी होती।‘‘ ‘‘तो नह होगा नशे म भाई!‘‘ - यादव िचढ़े ए वर म बोला - ‘‘समझ लो मेरी दूसरी बात ही सही है, उसक क मत ही खराब थी।‘‘ ‘‘और उस खराब क मत क शु आत उसके शराब पीने क वजह से ई थी, नह ?‘‘ ‘‘हे भगवान! तुम तो पागल कर दोगे मुझे।‘‘ - वो ख झता आ बोला - ‘‘कुछ भी आ हो सकता है, अब म या तुम उसक मौत के व वहां मौजूद तो थे नह , जो वहां का घटना म य का य बयान कर सक। थोड़ा ब त तो इधर-उधर हो ही जाता है, यौरी और ै टकल म! अहम बात ये है क मरने वाला मर चुका है। हम उसक मौत को दुघटना मानकर केस क फाइल लोज कर चुके ह। ऐसे म मेरी समझ म ये नह आता क अचानक तु हे उसक मौत म या दलच पी हो आई है।‘‘ ‘‘यादव साहब कसी केस क फाइल पुिलस ारा लोज कर दये जाने का मतलब ये नह होता क उसे दोबारा नह खोला जा सकता! बस दरकरार होती है एक ठोस वजह क , जो क इस केस म बस आई ही समझो। कोई बड़ी बात नह अगर तारीख बदलते ही तु हे केस को री-इंवेि टगेट करने का फरमान सुना दया जाय, या केस को कसी बड़े ऑफ सर को
  • 29. इंवेि टगेशन के िलए स प दया जाय।‘‘ यादव हकबकाकर उसक श ल देखने लगा, ‘‘ऐसा भी या खास हो गया इस केस म। वो या कसी िमिन टर का सगेवाला था?‘‘ ‘‘नह वो तो शायद अपने इलाके के िनगम पाषद को भी नह जानता होगा, मगर फर भी वो सबकुछ होकर रहेगा िजसका िज अभी-अभी म तुमसे करके हटा ं।‘‘ ‘‘िलहाजा वो सब तु हारे कये होगा।‘‘ आशीष ने जवाब नह दया। ‘‘म भी तो सुनूं ऐसा या खास हाथ लग गया तु हारे िजसके बूते इतनी लंबी-लंबी हांके जा रहे हो।‘‘ ‘‘कल का खबरदार पढ़ना, पूछने क ज रत ही नह पड़ेगी।‘‘ ‘‘एक बात यान रखना रपोटर साहब, अगर अपने अखबार म तुमने ये िलखा क मने केस क सही ढंग से त तीश नह क थी, तो तु हारी खैर नह , पछताओगे तुम।‘‘ ‘‘धमक दे रहे हो।‘‘ ‘‘अरे नह यार!‘‘ - उसने एकदम से पतरा बदला - ‘‘तु हे धमक देकर मरना है मुझे, वो तो बस यूंही िनकल गया था मुंह से, पुरानी आदत है क ब त कभी भी दमाग पर सवार हो जाती है।‘‘ ‘‘वैसे बरती थी तुमने कोई कोताही।‘‘ ‘‘अरे नह यार! चाहो तो कसम उठवा लो, फर मुझे ज रत ही या थी कोई ढील बरतने क , साफ-साफ तो दखाई दे रहा था क वहां या आ था।‘‘ ‘‘िलहाजा तुम इस बात से िहलकर नह दोगे क नीलेश ितवारी दुघटना का िशकार आ था।‘‘ ‘‘अब तु हारे कहने से या म दुघटना क वारदात को ह या कहना शु कर दूं। मु क का िनजाम या तु हारे इशारे पर चलता है, जो हम तु हारी पसंद और नापंसद का याल रखकर नतीजे िनकालगे।‘‘
  • 30. आशीष हंसा। ‘‘तु हारी झ लाहट बता रही है क अब तु हारे स का कोटा ख म होने वाला है। इससे पहले क पूरी तरह से ख म हो जाय, बंदा इजाजत चाहेगा।‘‘ कहकर आशीष उठ खड़ा आ और उससे हाथ िमलाकर बाहर िनकल आया। वो आर.के.पुरम प ंचा। जहां सै टर दो के एक लैट म मृतक नीलेश ितवारी िपछले तीन साल से रहता आ रहा था। जैसी क उसे उ मीद थी। नीलेश ितवारी का लैट बंद पड़ा था। वो अगले दरवाजे के सामने जा खड़ा आ। दीवार के साथ एक नेम लेट लगी थी, िजसपर मोटे-मोटे अ र म िलखा था - डॉ टर िनहाल संह, एमबीबीएस! उसने हाथ बढ़ाकर नेम लेट के ठीक नीचे लगी घंटी का ि वच पुश कर दया। जवाब म भीतर से उभरती िपयानो क मधुर आवाज उसे सुनाई दी। वो इंतजार करने लगा। दो िमनट बाद दरवाजा खुला। खुले दरवाजे पर एक ह ा-क ा पहलवान जैसे डील-डोल वाला, क ावर ि गट आ। अगर वही िनहाल संह था तो वो डॉ टर कम और रेसलर यादा नजर आ रहा था। उसने वाचक नजर से आशीष को देखा। ‘‘िनहाल संह जी!‘‘ ‘‘हां जी म ही ं, आप कौन!‘‘ ‘‘बंदे को अशीष कहते ह, आशीष कुमार गौतम, खबरदार का कॉरे प डट ं, हमारे अखबार के नाम से तो वा कफ ही ह गे आप!‘‘ ‘‘वा कफ ं भई, अखबार से भी और तु हारे नाम से भी, बस कभी ब मुलाकात नह ई थी इसिलए पहचान नह सका। ‘‘शु या, दरअसल म यहां....!‘‘ ‘‘भीतर चलकर इ मीनान से बात कर तो कैसा रहेगा।‘‘ िनहाल संह उसक बात काटकर बोला। ‘‘जैसा आप ठीक समझ।‘‘