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Bhikshuk (भिक्षुक)

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रसिद्‌ध कविता "भिक्षुक" पर आधारित PPT

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Bhikshuk (भिक्षुक)

  1. 1. भिक्षुक सूर्यकाांत त्रिपाठी निराला
  2. 2. कवि परिचय सूर्यकाांत त्रिपाठी निराला हिन्दी की छार्ावादी काल के प्रमुख कवव िैं। इन्िें बांगला, अांग्रेजी और सांस्कृ त का अच्छा ज्ञाि था। निराला बिुमुखी प्रनतभा के धिी साहित्र्कार थे। इन्िोंिे कववताओां के अनतररक्त किानिर्ााँ, आलोचिाएाँ, निबांध आहद भी ललखे िैं। सि 1916 में इन्िोंिे "जूिी जी कली" की रचिा की।​ इन्िोंिे अपिी कववताओां में प्रकृ नत-वर्यि के अनतररक्त शोषर् के ववरुद्ध ववद्रोि, शोवषतों एवां दीििीि जि के प्रनत सिािुभूनत तथा पाखांड के प्रनत व्र्ांग्र् की अलभव्र्क्क्त की िै। निराला की भाषा सिज, भावािुकू ल िै क्जसमें सांस्कृ त के शब्दों का प्रर्ोग लमलता िै। प्रमुख रचिाएाँ - पररमल, गीनतका, अिालमका, तुलसीदास, कु कु रमुत्ता, अणर्मा, अपरा, बेला, िए पत्ते, राम की शक्क्त पूजा आहद।
  3. 3. कविता का के न्द्रीय िाि लभक्षुक’ कववता निराला जी की प्रगनतवादी रचिा िै क्जसमें कवव लभक्षुक की दर्िीर् और करुर् दशा को देखकर दुखी और आित िै। उिका मि घोर पश्चाताप और वेदिा से फटिे लगता िै। उस लभक्षुक के साथ उसके दो बच्चे भी िैं जो दर्ा दृक्टट पािे के ललए आतुर िैं। भूख से बेिाल और बेचैि िोकर वे अपिे आत्मसम्माि का पररत्र्ाग कर फें की िुई जूठी पत्तल उठाकर चाटिे को मज़बूर िैं। उिके भाग्र् में जूठी पत्तलें भी ििीां िैं। कु त्ते भी उिसे उि जूठी पत्तलों को छीििे के ललए तत्पर िैं। कवव के हृदर् में लभक्षुक के प्रनत सिािुभूनत िै। कवव ’लभक्षुक’ कववता के माध्र्म से समाज के प्रबुद्ध और पढ़े-ललखे व्र्क्क्तर्ों को प्रेररत करते िैं कक उन्िें आगे बढ़कर समाज के इि साधििीि वगों की दशा सुधारिे की कोलशश करिी चाहिए। कवव अपिे प्रगनतवादी ववचारों के द्वारा र्ि कििा चािते िैं कक समाज में आर्थयक समािता िोिी चाहिए।
  4. 4. कववता से सांबांर्धत कु छ तस्वीरें...
  5. 5. कठिन शब्दार्थ  दो टूक कलेजे के करता – हृदर् को बिुत दुख पिुाँचाता िुआ  पछताता – पश्चाताप करता िुआ  लकु हटर्ा – लाठी  टेक – सिारे, हटकाकर  दाता भाग्र् ववधाता – देिे वाला, भाग्र् का निमायर् करिे वाला ईश्वर  अड़े िुए – तत्पर  अमृत – अमर करिे वाला पेर् पदाथय  झपट लेिा – छीि लेिा
  6. 6. प्रश्नोत्तिी - 1 वि आता – दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।/पेट-पीठ दोिों लमलकर िैं एक चल रिा लकु हटर्ा टेक, मुटठी-भर दािे को – भूख लमटािे को / मुाँि फटी-पुरािी झोली को फै लाता – दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। / साथ दो बच्चे भी िैं सदा िाथ फै लाए, बाएाँ से वे मलते िुए पेट को चलते, / और दाहििा दर्ा-दृक्टट पािे की ओर बढ़ाए। भूख से सूख ओांठ जब जाते / दाता-भाग्र्-ववधाता से क्र्ा पाते ? घूाँट आाँसुओां के पीकर रि जाते। प्रश्न: (i) र्िााँ ककसके आिे की बात की जा रिी िै ? उसका कवव पर क्र्ा प्रभाव पड़ता िै ? (ii) कवव िे उसकी गरीबी का वर्यि ककस प्रकार ककर्ा िै ? (iii) लभखारी के साथ कौि िै ? वे क्र्ा कर रिे िैं ? (iv) “दाता-भाग्र्-ववधाता से क्र्ा पाते” का भाव स्पटट कीक्जए।
  7. 7. संिावित उत्ति (i) कवव िे प्रस्तुत कववता में लभखारी का मालमयक र्थाथयपरक र्चिर् ककर्ा िै। कवव सड़क पर एक लभखारी को आते िुए देख रिे िैं। उस लभखारी की दर्िीर् दशा को देखकर कवव आित िो जाते िैं। उिका मि दुख और वेदिा से फटिे लगता िै। (ii) कवव िे उसकी गरीबी का वर्यि करते िुए किा िै कक भोजि के अभाव और मािलसक र्चन्ता से वि अत्र्ांत कमज़ोर िो गर्ा िै। वि इतिा कमज़ोर िो गर्ा िै कक लाठी के सिारे के त्रबिा उसका चलिा भी िामुमकीि िै। उसका पेट और पीठ भोजि ि लमलिे के कारर् एक-दूसरे से लमला िुआ-सा प्रतीत िोता िै। मुटठी-भर अन्ि पािे के ललए वि दर-दर जाकर अपिी फटी िुई झोली का मुाँि फै लाता िै। अपिे स्वालभमाि को त्र्ागकर दुखी मि से मागय पर चलता जाता िै।
  8. 8. संिावित उत्ति (iii) लभक्षुक के साथ उसके दो बच्चे भी िैं। वे भी बेिाल िैं और भूख लमटािे के ललए अपिे बाएाँ िाथ से पेट मल रिे िैं तथा दाएाँ िाथ को भीख मााँगिे के ललए लोगों के सामिे फै ला रिे िैं। वे दोिों बच्चे र्ि सोचकर ऐसा कर रिे िैं कक उिकी दर्िीर् दशा को देखकर ककसी के मि में दर्ा र्ा सिािुभूनत का भाव जग जाए और तरस खाकर उन्िें कु छ खािे को दे दें। (iv) “दाता-भाग्र्-ववधाता” का तात्पर्य िै देिे वाला, भाग्र् का निमायर् करिे वाला, ईश्वर। मािा जाता िै कक सम्पूर्य सृक्टट का निमायर् परमवपता ईश्वर िे ककर्ा िै और वे मिुटर् के सुख-दुख में उसका ख्र्ाल रखते िैं ककन्तु कवव किते िैं कक वे लभक्षुक अपिे भाग्र् निमायता से भूख, अपमाि और समाज की उपेक्षा के अनतररक्त क्र्ा पाते िैं। कवव का इशारा समाज के उि साधि-सम्पन्ि वगों से िै जो अपिे स्वाथय और लालच में डूबे िुए िैं लेककि उन्िें इि गरीब, लाचार और साधििीि व्र्क्क्तर्ों से कोई मतलब ििीां।
  9. 9. प्रश्नोत्तिी - 2 चाट रिे झूठी पत्तल वे कभी सड़क पर खड़े िुए, और झपट लेिे को उिसे कु त्ते भी िैं अड़े िुए। ठिरो, अिो मेरे हृदर् में िै अमृत, मैं सीांच दूाँगा अलभमन्र्ु जैसे िो सकोगे तुम, तुम्िारे दुख मैं अपिे हृदर् में खीांच लूाँगा। प्रश्न: (i) जूठी पत्तल चाटिे के ललए कौि और क्र्ों मज़बूर िो जाते िैं ? (ii) कु त्तों के झपटिे का उल्लेख कवव िे क्र्ों ककर्ा िै ? स्पटट कीक्जए। (iii) अलभमन्र्ु कौि था ? कवव िे अलभमन्र्ु की तुलिा लभक्षुक से क्र्ों की िै ? (iv) लभक्षुक कववता के माध्र्म से कवव िे िमारे हृदर् को ककस प्रकार आांदोललत ककर्ा िै ? समझाकर ललणखए।
  10. 10. संिावित उत्ति (i) लभखारी और उसके दोिों बच्चों को जब भूख ववकल कर देती िै, िोंठ भूख से सूख जाते िैं, खािा लमल ििीां पाता िै, तब वे जूठी पत्तलों को उठाकर चाटिे के ललए मज़बूर िो जाते िैं। (ii) कवव िे कु त्तों के झपटिे का उल्लेख कर मिुटर् की दर्िीर् दशा का हृदर्-ववदारक र्चिर् ककर्ा िै। लभखारी भूख से व्र्ाकु ल िोकर सड़क पर फें की गई जूठी पत्तलों से अपिा और अपिे बच्चों का पेट भरिे की कोलशश करता िै और कु त्ते उिसे झूठी पत्तल झपटिे के ललए तत्पर िैं। कवव िे जूठी पत्तल चाटिे की बात किकर सामाक्जक ववषमता पर करारा प्रिार ककर्ा िै।
  11. 11. संिावित उत्ति (iii) अलभमन्र्ु मिाभारतकालीि अजुयि का पुि था। अजुयि की अिुपक्स्थनत में अलभमन्र्ु चक्रव्र्ूि को भेदिे के ललए गर्ा था। वि सोलि वषय का बालक था। सात र्ोद्धाओां द्वारा वि मारा गर्ा। कवव उि लभखाररर्ों की तुलिा अलभमन्र्ु से करते िुए किते िैं कक उिके हृदर् में उिके ललए प्रेम, दर्ा और सिािुभूनत रूपी अमृत िै। वि लभक्षुक को अपिी कववता के माध्र्म से समाज में न्र्ार् हदलाएाँगे। कििे का तात्पर्य िै कक कवव समाज के पढ़े-ललखे, समझदार और प्रबुद्ध लोगों को प्रेररत करेंगे कक वे आगे बढ़े और इि गरीब, लाचार और बेबस लोगों को उिका अर्धकार हदलािे में सिर्ोग करें। र्े साधि-सम्पन्ििीि लोग समाज की सांवेदिा प्राप्त कर अलभमन्र्ु की भााँनत सांघषयशील बिें।
  12. 12. संिावित उत्ति (iv) लभक्षुक कववता के माध्र्म से कवव िे एक लभखारी और उसके दो बच्चों की करुर् दशा का र्चिर् ककर्ा िै। उिकी क्स्थनत देखकर कवव आित िैं। लभखारी जब जूठी पत्तलों को चाटता िै और उि पत्तलों को झपटिे के ललए कु त्ते भी अड़े िुए िैं तब कवव का हृदर् दर्ा और सिािुभूनत से भर जाता िै। कवव अपिी सांवेदिा प्रकट करते िुए िमें आांदोललत करते िैं कक िमें आगे बढ़कर इि बेसिारा साधििीि गरीब लोगों की मदद करिी चाहिए। कवव अपिे प्रगनतवादी ववचारों के आधार पर र्ि कििा चािते िैं कक आर्थयक ववषमता के कारर् िी समाज में दो वगय बि गए िैं एक, क्जसके पास सुख-सुववधा के सभी साधि मौजूद िैं और दूसरे, वे जो अभाव, अज्ञाि और सांताप की क्ज़न्दगी जीिे के ललए मज़बूर िैं।

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