Gurutva jyotish july 2011

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guru poornima-2011, guru purnima-2011, shravan mas-2011, srawan masha, गुरु पुर्णिमा, गुरु पूर्णीमा, गुरु पूर्णीमा, श्रीहरि शयनी एकादशी, देव शयनी एकादशी व्रत, चातुर्मास व्रत-नियम प्रारंभ, गुरु पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, स्नान-दान हेतु उत्तम आषाढ़ी पूर्णिमा, मुड़िया पूनम-गोवर्धन परिक्रमा (ब्रज), दक्षिणामूर्ति-पूजन,

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Gurutva jyotish july 2011

  1. 1. Font Help >> http://gurutvajyotish.blogspot.comगु व कायालय ारा तुत मािसक ई-प का जुलाई- 2011 गु मं के भाव से ई दशन ीम आ शंकराचायक सदगु े गु ाथना ीकृ ण क गु सेवा दे व ष नारद ने एक म लाह स गु क याग से े को अपना गु बनाया द र ता आती ह मं क जप से अलौ कक े गु मं के भाव से िस या ा होती ह ई दशन जब दवासाजी ने ु ी कृ ण क प र ाली। NON PROFIT PUBLICATION
  2. 2. FREE E CIRCULAR गु व योितष प का जुलाई 2011संपादक िचंतन जोशी गु व योितष वभागसंपक गु व कायालय 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIAफोन 91+9338213418, 91+9238328785, gurutva.karyalay@gmail.com,ईमेल gurutva_karyalay@yahoo.in, http://gk.yolasite.com/वेब http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/प का तुित िचंतन जोशी, व तक.ऎन.जोशीफोटो ाफ स िचंतन जोशी, व तक आटहमारे मु य सहयोगी व तक.ऎन.जोशी ( व तक सो टे क इ डया िल) ई- ज म प का E HOROSCOPE अ याधुिनक योितष प ित ारा Create By Advanced Astrology उ कृ भ व यवाणी क साथ े Excellent Prediction १००+ पेज म तुत 100+ Pages हं द / English म मू य मा 750/- GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  3. 3. 3 जुलाई 2011 वशेष लेखगु ाथना 5 ािभषेक से कामनापूित 33जब दवासाजी ने ु ी कृ ण क प र ाली। 7 ािभषेक तो 35गु मं क भाव से ई दशन े 11 सोमवार को िशवपूजन का मह व या ह? 36गु मं क भाव से र ा े 13 िशव कृ पा हे तु उ म ावण मास 37गु मं क जप से अलौ कक िस े या ा होती ावण मास क सोमवार े त से भौितक क ो से 14 40ह मु िमलती हआ ण क गु भ 18 आ या मक उ नित हे तु उ म चातुमास त 41स गु क याग से द र ता आती ह े 19 य िशव को य ह बेल प ? 43मं जप से ा हवा शा ु ान 21 ावण सोमवार त कसे कर? ै 45एकल य क गु भ 22 ा धारण से कामनापूित 46 ीकृ ण क गु सेवा 23 एक मुखी से 12 मुखी ा धारण करने क लाभ े 48दे व ष नारद ने एक म लाह को अपना गु 25 चातुमास म मांगिलक काय व जत ह। 50बनाया ीम आ शंकराचाय सदगु 27 अनु मसंपादक य 4 मं िस साम ी 67गुव कम ् 6 जुलाई 2011 - वशेष योग 68 ीकृ ण बीसा यं 10 दै िनक शुभ एवं अशुभ समय ान तािलका 68 ी गु तो म ् 31 दन-रात क चौघ डये े 69ह तरे खा ान 32 दन-रात क होरा सूय दय से सूया त तक 70सव काय िस कवच 51 ह चलन जुलाई -2011 71राम र ा यं 42 सव रोगनाशक यं /कवच 72 व ा ाि हे तु सर वती कवच और यं 53 मं िस कवच 74मं िस प ना गणेश 53 YANTRA LIST 75मं िस साम ी 54 GEM STONE 77मािसक रािश फल 57 BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION 78रािश र 61 सूचना 79जुलाई 2011 मािसक पंचांग 60 हमारा उ े य 81जुलाई -2011 मािसक त-पव- यौहार 64
  4. 4. 4 जुलाई 2011 संपादक य य आ मय बंधु/ ब हन जय गु दे वमहापु षो क मतानुशार य े को अपने जीवन म पूण ता कसी स ु गु क शरण म जाने से ा हो सकती ह।भारतीय धमशा ो म गु को व प कहां गया ह। कसी स गु के ा होने पर य क सभी धम-अधम, पाप-पु य आ द समा े हो जाते ह। य य मरणमा ेण ानमु प ते वयम ् । सः एव सवस प ः त मा संपूजये गु म् ।।अथात: जनके मरण मा से ान अपने आप कट होने लगता है और वे ह सव स पदा प ह, अतः ी गु दे व कपूजा करनी चा हए।हमारे ऋ ष मुिन क मतानुशार गु े उसे मानना चा हये जो ेरकः सूचक ैव वाचको दशक तथा । िश को बोधक ैव षडे ते गुरवः मृ ताः ॥अथात: ेरणा दे नेवाले, सूचन दे नेवाले, सच बतानेवाले, सह रा ता दखानेवाले, िश ण दे नेवाले, और बोध करानेवाले येसब गु समान ह।गु श द क प रभाषा श दो म िलखना या बताना एक मूख ता ह एक ओछापन ह। यो क गु क म हमा अनंत हअपार ह। इस िलये क बरजी ने िलखा ह। गु गो वंद दोनो खड़े काक लागू पांव, गु े बिलहार आपने गो वंद दयो बताए।गु क तुलना कसी अ य से करना कभी भी संभव नह ं ह। इस िलये शा कहते ह। ा तो नैव भुवनजठरे स रो ानदातुः पश े ु कल यः स नयित यदहो व ताम मसारम ् । न पश वं तथा प ि तचरगुणयुगे स ु ः वीयिश ये वीयं सा यं वधते भवित िन पम तेवालौ ककोऽ प ॥अथात: तीन लोक, वग, पृ वी, पाताल म ान दे नेवाले गु क िलए कोई उपमा नह ं दखाई दे ती । गु े को पारसम णक जैसा मानते है , तो वह ठ क नह ं है , कारण पारसम ण कवल लोहे को सोना बनाता है , पर े े वयं जैसा न ह बनाता !स ु तो अपने चरण का आ य लेनेवाले िश य को अपने जैसा बना दे ता है ; इस िलए गु दे व क िलए कोई उपमा न ह ेहै , गु तो अलौ कक है ।इस किलयुग म धम क नाम पर गु क नाम का ठ गी चोला पहनने वालो क भी कमी नह ं ह इस िलये शा ो म े ेिलखा ह। सवािभला षणः सवभो जनः सप र हाः । अ चा रणो िम योपदे शा गुरवो न तु ॥अथात: अिभलाषा रखनेवाले, सब भोग करनेवाले, सं ह करनेवाले, चय का पालन न करनेवाले, और िम या उपदे शकरनेवाले, गु न ह होते है । िचंतन जोशी
  5. 5. 5 जुलाई 2011 गु ाथना  िचंतन जोशी गु ा ु व णुः गु दवो महे रः । गु ः सा ात ् परं त मै ी गुरवे नमः ॥ भावाथ: गु ा ह, गु व णु ह, गु ह शंकर ह; गु ह सा ात ् पर ह; एसे स ु को नमन । यानमूलं गु मू ितः पूजामूलम गु र पदम। ् मं मूलं गु रवा यं मो मूलं गु र कृ पा।।भावाथ: गु क मूित यान का मूल कारण है , गु क चरण पूजा का मूल कारण ह, वाणी जगत क े ेसम त मं का और गु क कृ पा मो ाि का मूल कारण ह। अख डम डलाकारं या ं येन चराचरम। ् त पदं दिशतं येन त मै ीगुरवे नमः।। वमेव माता च पता वमेव वमेव बंधु सखा वमेव। वमेव व ा वणं वमेव वमेव सव मम दे व दे व।। ानंदं परमसुखदं कवलं े ानमूित ं ातीतं गगनस शं त वम या दल यम ् । एक िन यं वमलमचलं सवधीसा ं भुतं भावातीतं गुणर हतं स ु ं तं नमािम ॥ भावाथ: ा क आनंद प परम ् सुख प, े ानमूित, ं से परे , आकाश जैसे िनलप, और सू म "त वमिस" इस ईशत व क अनुभूित ह जसका ल य है ; अ तीय, िन य वमल, अचल, भावातीत, और गुणर हत - ऐसे स ु को म णाम करता हँू ।
  6. 6. 6 जुलाई 2011 गुव कम्शर रं सु पं तथा वा कल , ं अर ये न वा व य गेहे न काय, (५) जन महानुभाव क चरण कमल ेयश ा िच ं धनं मे तु यम। ् न दे हे मनो वतते मे वन य। भूम डल क राजा-महाराजाओं से िन य ेमन ेन ल नं गुरोरि प , े मन ेन ल नं गुरोरि प , े पू जत रहते ह , कतु उनका मन य द गु ंततः क ततः क ततः क ततः कम॥१॥ ं ं ं ् ततः क ततः क ततः क ततः कम॥८॥ ं ं ं ् क ीचरण क ित आस े े न हो तो इसकल ं धनं पु पौ ा दसव, गुरोर क यः पठे पुरायदे ह , ं सदभा य से या लाभ?गृ हो बा धवाः सवमेत जातम। ् यितभूपित चार च गेह । (६) दानवृ क ताप से जनक क ित ेमन ेन ल नं गुरोरि प , े चारो दशा म या हो, अित उदार गु क लमे ा छताथं पदं सं , ंततः क ततः क ततः क ततः कम॥२॥ ं ं ं ् सहज कृ पा से ज ह संसार क सारे े गुरो वा ये मनो य य ल नम॥९॥ ्षड़ं गा दवेदो मुखे शा व ा, सुख-ए य ह तगत ह , कतु उनका मन ं ॥इित ीमद आ शंकराचाय वरिचतम्क व वा द ग ं सुप ं करोित। गुव कम ् संपूण म॥ ् य द गु क ीचरण म आस भाव न ेमन ेन ल नं गुरोरि प , े भावाथ: (१) य द शर र पवान हो, प ी रखता हो तो इन सारे एशवय से या लाभ?ततः क ततः क ततः क ततः कम॥३॥ ं ं ं ् भी पसी हो और स क ित चार दशाओं म (७) जनका मन भोग, योग, अ , रा य, व त रत हो, सुमे पवत क तु य अपार ेवदे शेषु मा यः वदे शेषु ध यः, ी-सुख और धन भोग से कभी वचिलत धन हो, कतु गु क ीचरण म य द मन ं ेसदाचारवृ ेषु म ो न चा यः। न होता हो, फर भी गु क ीचरण क ित े े आस न हो तो इन सार उपल धय सेमन ेन ल नं गुरोरि प , े या लाभ? आस न बन पाया हो तो मन क इसततः क ततः क ततः क ततः कम॥४॥ ं ं ं ् (२) य द प ी, धन, पु -पौ , कटु ं ब, गृ ह ु अटलता से या लाभ? माम डले भूपभूपलबृ दै ः, एवं वजन, आ द ार ध से सव सुलभ हो (८) जनका मन वन या अपने वशाल कतु गु क ीचरण म य द मन आस ं े नसदा से वतं य य पादार व दम। ् भवन म, अपने काय या शर र म तथा हो तो इस ार ध-सुख से या लाभ?मन ेन ल नं गुरोरि प , े अमू य भ डार म आस न हो, पर गु के (३) य द वेद एवं ६ वेदांगा द शा ज हततः क ततः क ततः क ततः कम॥५॥ ं ं ं ् ीचरण म भी वह मन आस न हो पाये कठ थ ह , जनम सु दर का य िनमाण क ंयशो मे गतं द ु दान तापात ्, ितभा हो, कतु उनका मन य द गु क ं े तो इन सार अनास य का या लाभ?जग तु सव करे य सादात। ् ीचरण क ित आस े न हो तो इन (९) जो यित, राजा, चार एवं गृ ह थ इस सदगुण से या लाभ?मन ेन ल नं गुरोरि प , े गु अ क का पठन-पाठन करता है और (४) ज ह वदे श म समान आदर िमलताततः क ततः क ततः क ततः कम॥६॥ ं ं ं ् जसका मन गु क वचन म आस े है , वह हो, अपने दे श म जनका िन य जय-न भोगे न योगे न वा वा जराजौ, पु यशाली शर रधार अपने इ छताथ एवं जयकार से वागत कया जाता हो औरन क तामुखे नैव व ेषु िच म। ् जसक समान दसरा कोई सदाचार भ े ू पद इन दोन को सं ा कर लेता है यहमन ेन ल नं गुरोरि प , े नह ं, य द उनका भी मन गु क ीचरण क े े िन त है । ित आस न हो तो सदगुण से या लाभ?ततः क ततः क ततः क ततः कम॥७॥ ं ं ं ् ***
  7. 7. 7 जुलाई 2011 जब दवासाजी ने ु ी कृ ण क प र ाली।  िचंतन जोशी ह द ु शा ो क अनुशार दवासाजी े ु ानी महापु ष म ऐसा भी रख द जए। घर का सामान उठाकर दे नेवालाहोने क साथ ह अ तीय योगबल क े े वामी थे जस कोई िमल जाये तो आप दोगे, आप उठा तो नह ं सकोगे।कारण समय-समय पर दवासाजी अपनी योगलीला रचते ु आप चाह तो घर को भी जला द तो भी हमारे मन मरहते थे। एक बार दवासाजी ने ु ी कृ ण क साथ े कभी दःख नह ं होगा। ुयोगलीला रचने का मन बनाया। महाराज ! आप आइये, हमारे अितिथ बिनये।" एक बार दवासाजी ने चुनौती द क , ह कोई जो ु दवासा ऋ ष अितिथ बनकर आये, अितिथ बनकर ुमुझे अितिथ रखने को तैयार हो। ी कृ ण ने दे खा तो उनको तो करनी थी कछ लीला। अितिथ स कार म कह ं ुदवासा जी ! आज तो दवासा जी को अितिथ रखने क ु ु कछ चूक हो जाये तो दवासाजी िच लाव, झूठ कसे बोल? ु ु ैचुनौती िमल रह है । यहाँ तो सब ठ क-ठाक था। ीकृ णजी आये और बोलेः "महाराज ! आप दवासाजी बोलेः "तो हम अभी जायगे और थोड़ ुआइये, हमारे अितिथ बिनये।" दे र म वापस आयगे। हमारे जो भगत ह गे उनको भी दवासाजी बोलेः "अितिथ तो बन जाऊ पर मेर ु साथ लायगे। भोजन तैयार हो।"शत है ।" दवासाजी जाय, आय तो भोजन तैयार िमले। ुम जब आऊ-जाऊ, जो चाहँू , जहाँ चाहँू , ँ ँ जतना चाहँू कसी को बाँट, बँटवाय, कछ भी कर। फर भी दे खा क ुखाऊ, जनको चाहँू खलाऊ, जनको जो चाहँू दे दँ, जो भी ँ ँ ू ीकृ ण कसी भी गलती म नह ं आते परं तु मुझे लानालुटाऊ, जतना भी लुटाऊ, कछ भी क ँ , ँ ँ ु है । मुझे न कोई रोक न कोई टोक। बाहर े े अब मुझे ीकृ ण को अथवा मणी को अ छा से तो या मन से भी कोई मुझे नह ं लगे ऐसा कछ करना है । शत है क ना बोल दगे ु रोकगा-टोकगा तो शाप े े दँ गा। सुन ू अथवा अंदर से भी कछ बोल दगे तो फर म शाप दँ गा। ु ू ले, कान खोल कर! जो दवासाजी ु ीकृ ण को शाप दे ने का मौका ढँू ढ रहे मुझे अितिथ रखता है , तो थे। सती अनुसूयाजी क पु े दवासा ऋ ष कसे ह! ु ै सामने आ जाय। एक दन दोपहर क समय दवासाजी वचार करने े ु "महाराज ! आपने जो कह ं लगे क सब चल रहा है । जो माँगता हंू, तैयार िमलता वे सभी शत वीकार ह और जो है । जो माँगता हँू ीकृ ण या तो कट कर दे ते ह या आप भूल गये ह या जतनी भी फर िस क बल से े कट कर दे ते ह। सब िस याँ और शत ह वे भी वीकार ह।" इनक पास मौजूद ह, 64 कलाओं क जानकार ह। े े महाराज! ये तो ठ क है परं तु घर का अब ऐसा कछ कया जाएं क ु ीकृ ण नाराज हो सामान कसी को दे दँ, ू कसी को जाय। दलाऊ, चाहे जलाऊ...। ँ ँ दवासाजी ने घर का सारा लकड़ ु का सामान ीकृ ण बोलेः "महाराज ! अपनी शत इक ठा कया। फर आग लगा द और बोलेः "होली रे
  8. 8. 8 जुलाई 2011 होली कृ ण ! दे खो, अ छ लगती है ? आप कस समय या माँगगे? यह तो होली जल रह है ।" आपक मन म आयेगा न? मन म आयेगा, उसक गहराई े ीकृ ण बोलेः "हाँ, म तो हम ह।" गु जी ! होली रे दवासाजी खीर खा रहे ह। दे खा क ु मणी हँ स होली" रह है । "अरे ! य हँ सी? मणी?" दवासाजी बोलेः अरे , ु "गु जी ! आप तो महान ह, पर तु आपका िश य भी कृ ण ! तेरा ये सब कम नह ं है । आप माँगेगे खीर यह जानकर उ ह ने पहले लकड़ का सामान से ह कह दया क खीर का कड़ाह तैयार रखो। जल रहा है ! थोड़ बनाते तो डाँट पड़ती आप आयगे और ढे र सार ीकृ ण बोलेः"हाँ, खीर माँगेगे तो इस कड़ाहे म खीर भी ढे र सार है । जैसा गु जी ! मेर सार आपने माँगा, वैसा हमारे भु ने पहले से ह तैयार सृ याँ कई बार रखवाया है । इस बात क हँ सी आती है ।"जलती ह, कई बार बनती ह, गु जी ! होली रे होली !" "हाँ, बड़ हँ सी आरह ह तुझे सफलता दखती है अपने"कृ ण ! तेरे दय म चोट नह ं लगती है ?" भु क ?" इधर आ ।"आप गु ओं का साद है तो मुझे चोट य लगेगी?" मणीजी आयीं तो दवासाजी ने ु मणी कअ छा ! ीकृ ण दवासाजी क झांसे म फसे नह , और ु े ँ ं चोट पकड़ और उनक मुँह पर झुठ खीर मल द । ेउपर से हँ स रहे ह। एक दन दवासा जी बोलेः "हम ु अब कोई पित कसे दे खे ै क कोई बाबा उसकनहाने जा रहे ह।" प ी क चोट पकड़ कर उस क मुहं पर झुठ खीर मल ेकृ णः "गु जी ! आप आयगे तो आपक िलए भोजन े या रहा है ? थोड़ा बहत कछ तो होगा क यह ु ु या? अगरहोगा?" ीकृ ण क चेहरे पर थोड़ भी िशकन आयेगी तो सेवा ेदवासाजी बोले: "हम नहाकर आयगे तब जो इ छा होगी ु सब न और शाप दँ गा, शाप। यह शत थी। ूबोल दगे, वह भोजन दे दे ना। दवासाजी ने ु ीकृ ण क ओर दे खा तो ीकृ ण केदवासा जी मन ह मन म सोच रहे थे पहले बोलकर ु चेहरे पर िशकन नह ं है । अ दर से कोई रोष नह ं है । ीजायगे तो सब तैयार िमलेगा। आकर ऐसी चीज माँगूगा कृ ण य -क- य खड़े ह। ेजो घर म तैयार न हो। कृ ण लेने जायगे या मँगवायगे " ी कृ ण ! कसी लगती है ये ै मणी?"तो म ठ जाऊगा ँ "हाँ, गु जी ! जैसी आप चाहते ह, वैसी ह लगतीदवासा जी नहाकर आये और बोलेः "मुझे ढे र सार खीर ु है ।"खानी है ।" अगर अ छ लगती है बोल जो वो है नह ं और ीकृ ण बड़ा कड़ाह भरकर ले आयेः "ली जए, गु जी !" ठ क नह ं लगती बोल तो गलती िनकाल दे । इसिलएदवासाजी बोले: "अरे , तुमको कसे पता चला?" ु ै ीकृ ण ने कहाः "गु जी ! जैसा आप चाहते ह, वैसी आप यह बोलनेवाले ह, मुझे पता चल गया तो लगती है ।"मने तैयार करक रखवा े दया। जहाँ से आपका वचार दवासाजी ने दे खा क प ी को ऐसा कया तो भी ुउठता है वहाँ तो म रहता हँू । आपको कौन-सी चीज कृ ण म कोई फक नह ं पड़ा। मणी तो अधािगनी है ।
  9. 9. 9 जुलाई 2011कृ ण को कछ गड़बड़ कर तो ु मणी क चेहरे पर े या ह यह बाबा जानते ह।िशकन पड़े गी ऐसा सोचकर कृ ण को बुलायाः ा रका क लोग इक ठे हो गये, चौराहे पर रथ े"कृ ण ! यह खीर बहत अ छ है ।" ु आ गया है फर भी ीकृ ण को कोई फक नह ं पड़ रहा"हाँ, गु जी ! अ छ है ।" है ? दवासाजी उतरे और जैस, घोड़े को पुचकारते ह वैसे ु े"तो फर या दे खते हो? खाओ।" ह पुचकारते हए पूछाः " य ु मणी ! कसा रहा?" ै ीकृ ण ने खीर खायी। "गु जी आनंद है ।""इतना ह नह ं, सारे शर र को खीर लगाओ। जैसे "कृ ण ! कसा रहा?" ैमुलतानी िम ट लगाते ह ऐसे पूरे शर र को लगाओ। "जैसा आपको अ छा लगता है , वैसा ह अ छा है ।"घुँघराले बाल म लगाओ। सब जगह लगाओ।" दवासाजी ने ु ीकृ ण से कहाः "कृ ण ! म तु हार सेवा"हाँ, गु जी।" पर, समता पर, सजगता पर, सूझबूझ पर स न हँू ।"कसे लग रहे हो, कृ ण?" ै प र थितयाँ सब माया म ह और म मायातीत हँू ,"गु जी, जैसा आप चाहते ह वैसा।" तु हार ये समझ इतनी ब ढ़या है क इससे म बहत खुश ुदवासा जी ने दे खा क अभी-भी ये नह ं फसे। ु ँ या क ँ ? हँू । तुम जो वरदान माँगना चाहो, माँग लो। परंतु दे खोफर बोलेः कृ ण ! तुमने एक गलती क । मने कहा खीर चुपड़ो,"मुझे रथ म बैठना है , रथ मँगवाओ। नहाना नह , ऐसे ं तुमने खीर सारे शर र पर चुपड़ पर हे क है या ! पैर केह चलो।" रथ मँगवाया। तलुओं पर नह ं चुपड़ । तु हारा सारा शर र अब व कायदवासाजी बोलेः "घोड़े हटा दो।" घोड़े हटा दये गये। "म ु हो गया है । इस शर र पर अब कोई हिथयार सफल नह ंरथ म बैठूँगा। एक तरफ मणी, एक तरफ ी कृ ण, होगा, परं तु पैर क तलुओं का े याल करना। पैर केरथ खींचेगे।" तलुओं म कोई बाण न लगे, य क तुमने वहाँ मेर जूठदवासाजी को हआ अब तो ना बोलगे क ऐसी ु ु थित खीर नह ं लगायी है ।"म? खीर लगी हई है , ु मणी क मुँह पर भी खीर लगी े पौरा णक कथा क अनुशार: े ीकृ ण को िशकार ने मृ गहई है । ु जानकर बाण मारा और पैर क तलुए म लगा। और जगह े परं तु दोन ने रथ खींचा। जैस, घोड़े को चलाते ह े लगता तो कोई असर नह ं होता। यु क मैदान म ेऐसे दवासाजी ने ु ी कृ ण और मणी को चलाया। रथ ीकृ ण अजु न का रथ चला रहे थे वहाँ पर श ु प केचौराहे पर पहँु चा। लोग क भीड़ इक ठ हो गयी क बाण का उन पर कोई वशेष भाव नह ं पड़ा था। ीकृ ण कौन-से बाबा क च कर म आ गये? े दवासाजीः " या चा हए, कृ ण?" ु लोग ने दे खा क यह या ! दवासाजी रथ पर ु "गु जी ! आप स न रह।"बैठे ह। खीर और पसीने से तरबतर ी कृ ण और "म तो स न हँू , परं तु कृ ण ! जहाँ कोई तु हारा नाम मणी जी दोन रथ हाँक रहे ह? मुँह पर, सवाग पर लेगा वहाँ भी आनंद हो जायेगा, वरदान दे ता हँू ." ीकृ णखीर लगी हई है ? ु का नाम लेते ह आनंद हो जाता है । ीकृ ण का नामउस नजारे खो दे खने वाले लोग को ीकृ ण पर तरस लेने से स नता िमलेगी - ये दवासा ऋ ष क वचन ु ेआया क "कसे बाबा क चककर म आ गये ह?" ै े अभी तक कृ ित स य कर रह है ।अब ये बाबा या ह यह ीकृ ण जानते ह और ीकृ ण
  10. 10. 10 जुलाई 2011 ीकृ ण बीसा यं कसी भी य का जीवन तब आसान बन जाता ह जब उसक चार और का माहोल उसक अनु प उसक वश े े ेम ह । जब कोई य का आकषण दसरो क उपर एक चु बक य ु े भाव डालता ह, तब लोग उसक सहायता एवंसेवा हे तु त पर होते है और उसके ायः सभी काय बना अिधक क व परे शानी से संप न हो जाते ह। आज केभौितकता वा द युग म हर य क िलये दसरो को अपनी और खीचने हे तु एक े ू भावशािल चुंबक व को कायमरखना अित आव यक हो जाता ह। आपका आकषण और य व आपक चारो ओर से लोग को आक षत करे इस ेिलये सरल उपाय ह, ीकृ ण बीसा यं । यो क भगवान ी कृ ण एक अलौ कव एवं दवय चुंबक य य व केधनी थे। इसी कारण से ीकृ ण बीसा यं क पूजन एवं दशन से आकषक य े व ा होता ह। ीकृ ण बीसा यं क साथ े य को ढ़ इ छा श एवं उजा ाहोती ह, ज से य हमेशा एक भीड म हमेशा आकषण का क रहता ह। ीकृ ण बीसा कवच य द कसी य को अपनी ितभा व आ म व ास के तर म वृ ,अपने िम ो व प रवारजनो क बच म र तो म सुधार करने क ई छा होती े ीकृ ण बीसा कवच को कवल ेह उनक िलये े ीकृ ण बीसा यं का पूजन एक सरल व सुलभ मा यम वशेष शुभ मुहु त म िनमाण कयासा बत हो सकता ह। जाता ह। कवच को व ान कमकांड ीकृ ण बीसा यं पर अं कत श शाली वशेष रे खाएं, बीज मं एवं ाहमण ारा शुभ मुहु त म शा ोअंको से य को अ त आंत रक श यां ा होती ह जो य को विध- वधान से विश तेज वी मं ो ुसबसे आगे एवं सभी े ो म अ णय बनाने म सहायक िस होती ह। ारा िस ाण- ित त पूण चैत य ीकृ ण बीसा यं क पूजन व िनयिमत दशन क मा यम से भगवान े े यु करक िनमाण कया जाता ह। े ीकृ ण का आशीवाद ा कर समाज म वयं का अ तीय थान था पत कर। जस क फल े व प धारण करता ीकृ ण बीसा यं अलौ कक ांड य उजा का संचार करता ह, जो य को शी पूण लाभ ा होताएक ाकृ मा यम से य क भीतर स भावना, समृ , सफलता, उ म े ह। कवच को गले म धारण करने वा य, योग और यान क िलये एक श े शाली मा यम ह! से वहं अ यंत भाव शाली होता  ीकृ ण बीसा यं क पूजन से य े क सामा जक मान-स मान व े ह। गले म धारण करने से कवच पद- ित ा म वृ होती ह। हमेशा दय क पास रहता ह ज से े  व ानो क मतानुशार े ीकृ ण बीसा यं क म यभाग पर े यान योग य पर उसका लाभ अित ती क त करने से य क चेतना श जा त होकर शी उ च तर एवं शी ात होने लगता ह। मूलय मा : 1900 को ा होती ह ।  जो पु ष और म हला अपने साथी पर अपना भाव डालना चाहते ह और उ ह अपनी और आक षत करना चाहते ह। उनक िलये े ीकृ ण बीसा यं उ म उपाय िस हो सकता ह।  पित-प ी म आपसी म क वृ और सुखी दा प य जीवन क िलये े ीकृ ण बीसा यं लाभदायी होता ह। मू य:- Rs. 550 से Rs. 8200 तक उ ल GURUTVA KARYALAY Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  11. 11. 11 जुलाई 2011 गु मं के भाव से ई दशन  व तक.ऎन.जोशी व ानो क अनुशार शा ो े उ लेख ह क कोई "सं यासी बोले नह ं ....पहले उनक दशन करो फर उनक े ेभी मं िन त प से अपना भाव अव य रखते ह। शा पर ट का िलखो। लो यह मं । छः मह ने इसका जस कार पानी म ककड़-प थर डालने से उसम ं अनु ान करो। भगवान कट ह गे। उनसे ेरणा िमलेतरं गे उठती ह उसी कार से मं जप के भाव से हमारे फर लेखनकाय का ारं भ करो।"भीतर आ या मक तरं ग उ प न होती ह। जो हमारे मं दे कर बाबाजी चले गये। ी मधुसूदनजी ने अनु ानइद-िगद सू म प से एक सुर ा शु कया। अनु ान क छः मह ने पूण ेकवच जैसा कािशत वलय (अथात गणेश ल मी यं हो गये ले कन ीकृ ण क दशन न ेओरा) का िनमाण होता ह। उन ओरा हए। अनु ान म कछ ु ु ु ट रह गई ाण- ित त गणेश ल मी यं कोका सू म जगत म उसका भाव पड़ता होगी ऐसा सोचकर ी मधुसूदनजी ने अपने घर-दकान-ओ फस-फ टर ु ैहै । जो खुली आंखो से सामा य य दसरे ू छः मह ने म दसरा अनु ान ू म पूजन थान, ग ला या अलमारको उसका भाव दखाई नह ं दे ता। कया फर भी ीकृ ण दशन न हए। ु म था पत करने यापार म वशेषउस सुर ा कवच से य को दो बार अनु ान के उरांत लाभ ा होता ह। यं क भाव से ेनकारा मक भावी जीव व श या असफलता ा होने पर ी मधुसूदन भा य म उ नित, मान- ित ा एवंउसक पास नह ं आ सकतीं। े क िच े म लािन हो गई। सोचा यापर म वृ होती ह एवं आिथक ीमदभगवदगीता क ी कः कसी अजनबी बाबाजी क कहने ेमधुसूदनी ट का चिलत एवं मह वपूण थम सुधार होता ह। गणेश ल मी से मने बारह मास बगाड़ दयेट काओं म से एक ह। इस ट का के यं को था पत करने से भगवान अनु ान म।रचियता ी मधुसूदन सर वतीजी जब गणेश और दे वी ल मी का संयु सबम माननेवाला म हे कृ ण ...हेसंक प करक लेखनकाय क िलए बैठे े े आशीवाद ा होता ह। भगवान ...दशन दो ...दशन दो... ऐसेह थे क एक तेज वी आभा िलये मेरा िगड़िगड़ाना ? Rs.550 से Rs.8200 तकपरमहं स सं यासी अचानक घर का ार जो ीकृ ण क आ मा है वह मेरखोलकर भीतर आये और बोलेः "अरे मधुसूदन! तू गीता आ मा है । उसी आ मा म म त रहता तो ठ क रहता।पर ट का िलखता है तो गीताकार से िमला भी है क ऐसे ीकृ ण आये नह ं और पूरा वष भी चला गया। अब याह कलम उठाकर बैठ गया है ? तूने कभी भगवान ीकृ ण ट का िलखना ?"क दशन े कये ह क ऐसे ह उनक वचन े पर ट का वे ऊब गये। अब न ट का िलख सकते ह न तीसरािलखने लग गया?" अनु ान कर सकते ह। चले गये या ा करने को तीथ म। ी मधुसूदनजी तो थे वेदा ती, अ ै तवाद । वे वहाँ पहँु चे तो सामने से एक चमार आ रहा था। उसबोलेः "दशन तो नह ं कये। िनराकार -परमा मा सबम चमार ने इनको पहली बार दे खा और ी मधुसूदनजी नेएक ह है । ीकृ ण के प म उनका दशन करने का भी चमार को पहली बार दे खा।हमारा योजन भी नह ं है । हम तो कवल उनक गीता े चमार ने कहाः "बस, वामीजी! थक गये न दो अनु ानका अथ प करना है ।" करक?" े
  12. 12. 12 जुलाई 2011 ीमधुसूदन वामी च क ! सोचाः "अरे मने अनु ान कये, े ी मधुसूदनजी ने कहाः "नह ं दखा।"यह मेरे िसवा और कोई जानता नह । इस चमार को कसे ं ै चमार ने कहाः "म उसे रोज बुलाता हँू , रोज दे खता हँू ।पता चला?" ठह रये, म बुलाता हँू , उसे।" वह गया एक तरफ औरवे चमार से बोलेः "तेरे को कसे पता चला?", "कसे भी ै ै अपनी विध करक उस भूत को बुलाया, भूत से बात क ेपता चला। बात स ची करता हँू क नह ं ? दो अनु ान और वापस आकर बोलाःकरक थककर आये हो। ऊब गये, तभी े "बाबा जी ! वह भूत बोलता है कइधर आये हो। बोलो, सच क नह ?" ं मधुसूदन वामी ने य ह मेरा नाम"भाई ! तू भी अ तयामी गु जैसा लग मरण कया, तो म खंचकर आनेरहा है । सच बता, तूने कसे जाना ?" ै लगा। ले कन उनक कर ब जाने से मेरे े" वामी जी ! म अ तयामी भी नह ं को आग जैसी तपन लगी। उनका तेजऔर गु भी नह । म तो हँू जाित का ं मेरे से सहा नह ं गया। उ ह नेचमार। मने भूत को अपने वश म सकारा मक श ओं का अनु ान कयाकया है । मेरे भूत ने बतायी आपके है तो उनका आ या मक ओज इतनाअ तःकरण क बात।" बढ़ गया है क हमारे जैसे तु छ ी मधुसूदनजी बोले "भाई ! दे ख मं िस प ना गणेश श यां उनक कर ब खड़े े नह ं रह ीकृ ण क तो दशन नह ं हए, कोई े ु भगवान ी गणेश बु और िश ा के सकते। अब तुम मेर ओर से उनकोबात नह । ं णव का जप कया, कोई कारक ह बुध क अिधपित दे वता े हाथ जोड़कर ाथना करना क वे फरदशन नह ं हए। गाय ी का जप कया, ु ह। प ना गणेश बुध क सकारा मक े से अनु ान कर तो सब ितब ध दर ूदशन नह ं हए। अब तू अपने भूत का भाव को बठाता ह एवं नकारा मक हो जायगे और भगवान ीकृ ण ु भाव को कम करता ह।. प नह दशन करा दे , चल।" िमलगे। बाद म जो गीता क ट का गणेश के भाव से यापार और धनचमार ने कहाः " वामी जी ! मेरा भूत िलखगे। वह बहत ु िस होगी।" म वृ म वृ होती ह। ब चो कतो तीन दन क अंदर ह े दशन दे ी मधुसूदन जी ने फर से अनु ान पढाई हे तु भी वशेष फल द हसकता है । 72घ टे म ह वह आ कया, भगवान ीकृ ण क दशन हए े ु प ना गणेश इस के भाव से ब चेजायेगा। लो यह मं और उसक क बु कशा ू होकर उसके और बाद म भगवदगीता पर ट काविध।" आ म व ास म भी वशेष वृ होती िलखी। आज भी वह ी मधुसूदनी ी मधुसूदनजी ने चमार ारा ह। मानिसक अशांित को कम करने म ट का क नाम से पूरे े व म िसबताई गई पूण विध जाप कया। एक मदद करता ह, य ारा अवशो षत है ।दन बीता, दसरा बीता, तीसरा भी बीत ू हर व करण शांती दान करती ह, ज ह स भा य से गु मंगया और चौथा शु हो गया। 72घ टे य क शार र क तं को िनयं त े े िमला है और वहं पूण िन ा व व ासतो पूरे हो गये। भूत आया नह ं। गये करती ह। जगर, फफड़े , जीभ, े से विध- वधान से उसका जप करता म त क और तं का तं इ या द रोगचमार के पास। ी मधुसूदनजी है । उसे सभी कार क िस या वतः म सहायक होते ह। क मती प थरबोलेः " ी कृ ण क दशन तो नह ं हए े ु ा हो जाती ह। उसे नकारा मक मरगज क बने होते ह। ेमुझे तेरा भूत भी नह ं दखता?" चमार श यां व भावीजीव क नह ं पहंू चाने कहाः " वामी जी! दखना चा हए।" Rs.550 से Rs.8200 तक सकते।
  13. 13. 13 जुलाई 2011 गु मं के भाव से र ा  व तक.ऎन.जोशी क द पुराण के ो र ख ड म उ लेख है ः भी आपने शराब पीनेवाली वे याओं के साथ औरकाशी नरे श क क या कलावती क साथ मथुरा क दाशाह े े कलटाओं क साथ भोग भोगे ह।" ु ेनामक राजा का ववाह हआ। ु राजाः "तु ह इस बात का पता कसे चल गया?" ै ववाह क बाद राजा ने अपनी प ी को बुलाया े प ीः "नाथ ! दय शु होता है तो यह यालऔर संसार- यवहार थापीत करने क बात कह ं परं तु वतः आ जाता है ।"प ी ने इ कार कर दया। तब राजा ने जबद ती करने राजा भा वत हआ और रानी से बोलाः "तुम मुझे ुक बात कह । भी भगवान िशव का वह मं दे दो।" प ी ने कहाः " ी क साथ संसार- यवहार करना े रानीः "आप मेरे पित ह। म आपक गु नह ं बनहो तो बल- योग नह , यार ं नेह- योग करना चा हए। सकती। हम दोन गगाचाय महाराज क पास चलते ह।" े प ी ने कहाः नाथ ! म आपक प ी हँू , फर भी दोन गगाचायजी क पास गये और उनसे े ाथनाआप मेरे साथ बल- योग करक संसार- यवहार न कर।" े क । उ ह ने नाना द से प व हो, यमुना तट पर अपने आ खर वह राजा था। प ी क बात सुनी-अनसुनी िशव व प के यान म बैठकर राजा-रानी को ीपात सेकरक प ी क नजद क गया। े े य ह उसने प ी का पावन कया। फर िशवमं दे कर अपनी शांभवी द ा से पश कया य ह उसक शर र म े व ुत जैसा करं ट राजा पर श पात कया। व ानो क मतानुशार कथा मे ेलगा। उसका पश करते ह राजा का अंग-अंग जलने उ लेख ह क दे खते-ह -दे खते सैकडो तु छ परमाणु राजालगा। वह दर हटा और बोलाः " या बात है ? तुम इतनी ू क शर र से िनकल-िनकलकर पलायन कर गये। ेसु दर और कोमल हो फर भी तु हारे शर र के पश सेमुझे जलन होने लगी?" या आप जानते ह? प ीः "नाथ ! मने बा यकाल म दवासा ऋ ष से ु  महाभारत क रचना इसी गु पू णमा क दन पूण ेगु मं िलया था। वह जपने से मेर सा वक ऊजा का हई थी। ुवकास हआ है । ु  व क सु िस े आष ंथ सू का लेखन काय जैस, रात और दोपहर एक साथ नह ं रहते उसी े गु पू णमा क आरं भ कया गया था। ेतरह आपने शराब पीने वाली वे याओं क साथ और े  दे वलोक म दे वताओं ने वेद यासजी का पूजन गुकलटाओं क साथ जो संसार-भोग भोगा ह, उससे आपक ु े े पू णमा क दन कया था। इस िलये इस दन वेद ेपाप क कण आपक शर र म, मन म, बु े े म अिधक है यास का पूजन कया जाता ह एवं इस पू णमाऔर मने जो मं जप कया है उसक कारण मेरे शर र म े को यासपू णमा भी कहा जाता ह।ओज, तेज, आ या मक कण अिधक ह। इसिलए म  व ानो क मत मे गु े पू णमा क दन गु े काआपक नजद क नह ं आती थी ब क आपसे थोड़ दर े ू पूजन कर नेसे वषभर क पव मनाने क समान े ेरहकर आपसे ाथना करती थी। आप बु मान ह बलवान फल ा होता ह।ह, यश वी ह धम क बात भी आपने सुन रखी है । फर
  14. 14. 14 जुलाई 2011 गु मं क जप से अलौ कक िस या े ा होती ह  िचंतन जोशी, व तक.ऎन.जोशी क ड यपुर म शशांगर नाम क राजा रा य करते े तनपान कराने लगी। धीरे -धीरे बालक बड़ा होने लगा।थे। वे जापालक थे। उनक रानी मंदा कनी भी पित ता, वह बालक कृ णा नद क संगम- थान पर े ा होने केधमपरायण थी। ले कन संतान न होने क कारण दोन े कारण उसका नाम कृ णागर रखा गया।दःखी रहते थे। उ ह ने रामे र जाकर ु राजा-रानी कृ णागर को लेकरसंतान ाि क िलए िशवजी क पूजा, े मंगल यं अपनी राजधानी क ड युपर म वापसतप या का वचार कया। प ी को लौट आये। ऐसे अलौ कक बालक कोलेकर राजा रामे र क ओर चल पड़े । से ऋण मु दे खने के िलए सभी रा यवासीमाग म कृ णा-तुंगभ ा नद क संगम- े मंगल यं को जमीन- राजभवन म आये। बड़े उ साह के थल पर दोन ने नान कया और जायदाद क ववादो को हल करने े साथ समारोहपूव क उ सव मनायावह ं िनवास करते हए वे िशवजी क ु क काम म लाभ दे ता ह, इस क े े गया।आराधना करने लगे। अित र य को ऋण मु जब कृ णागर 17 वष का एक दन नान करक दोन े हे तु मंगल साधना से अित शी युवक हआ तब राजा ने अपने मं य ुलौट रहे थे क राजा को िम सरोवर लाभ ा होता ह। ववाह आ द को कृ णागर क िलए उ म क या ेम एक िशविलंग दखाई पड़ा। उ ह ने म मंगली जातक क क याण क े े ढँू ढने क आ ा द । परं तु कृ णागर केवह िशविलंग उठा िलया और अ यंत िलए मंगल यं क पूजा करने से यो य क या उ ह कह ं भी न िमली। ा से उसक ाण- ित ा क । राजा वशेष लाभ ा होता ह। उसक बाद कछ ह े ु दन म रानीरानी पूण िन ा से िशवजी क पूजा- ाण ित त मंगल यं के मंदा कनी क मृ यु हो गयी। अपनीअचना करने लगे। संगम म नान पूजन से भा योदय, शर र म खून य रानी क मर जाने का राजा को ेकरक िशविलंग क पूजा करना उनका े क कमी, गभपात से बचाव, बुखार, बहत ु दःख ु हआ। ु उ ह ने वषभरिन य म बन गया। चेचक, पागलपन, सूजन और घाव, ा ाद सभी काय पूरे कये और एक दन कृ णा नद म नान यौन श म वृ , श ु वजय, तं अपनी मदन-पीड़ा क कारण िच कट े ूकरक राजा सूय दे वता को अ य दे ने क े े मं क द ु े भा, भूत- ेत भय, वाहन क राजा भुज वज क नवयौवना क या ेिलए अंजिल म जल ले रहे थे, तभी दघटनाओं, हमला, चोर इ याद से ु भुजावंती क साथ दसरा ववाह कया। े ूउ ह एक िशशु दखाई दया। उ ह बचाव होता ह। उस समय भुजावंती क उ 13 वषआसपास दर-दर तक कोई à

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