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भारतनन्दन विवेकानन्द
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भारतनन्दन विवेकानन्द

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My article published in the special issue of "Sanchetana" (published from Ujjain) dedicated to Swami Vivekananda on his 150th Birth Anniversary.

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भारतनन्दन विवेकानन्द Document Transcript

  • 1. भारतन दन ववेकान द भारत क बेजोड़ भ यता उसक आ याि मक एवं सां कृ तक वरासत को आभार है । उ हं क सबल नींव ने भारत क अि त व को संजोये रखा है , उस पर हु ए आ मण और परतं ता क बल े े हार क आगे उसे नामशेष होने से बचाए रखा है । े वैभव से वलास क ओर लु ढ़कने क भू ल भारतीय शासक ने भले ह क और भु गती हो, पर और क रा े का पाप भरतीय सं कार म नह ं है । स य, अ हंसा, क गौरव-गथाएँ दमन और शोषण क वष-च े परतं ेम को आहत करने और ललकारने ेम, क णा, शां त, स ावना, शौय और धैय क बीच भी पनपती रह ं । े भारत दो मू लभू त चु नौ तय से लड़ रहा था – आ या म से स दायवाद, जा तवाद और ि य क धम क नाम पर अवहे लना क ओर भटक धम को अपनी राह पर पु न: लाने क आंत रक चुनौती े े और परतं ता क भीषण लपट से शो षत-पी ड़त आहत आ मगौरव को जगाने क बा य चु नौती । पि चम क सा ा यवाद ने जहाँ अम रक महा वीप क मू ल नवासी रे ड इं डयन , े े नवासी माओ रय और ऑ दया, वहाँ अ यु ज़ीलड क मू ल े े लया क मू ल नवा सय को गु मनामी और अवन त क ओर धकल े े क महा वीप क जा तय को गु लामी क मृ त ाय जीवन म झ क दया । इसी े सा ा यवाद क काल छाया भारत पर भी पड़ी और उसक अि धयार से झू झते भारत क संत त मन े े को “ऊठो, जागो !” क एक माता क महान सपू त े कोलकाता क े चंड गजना ने नई आ म-चेतना से भर दया । वामी ववेकान द क ! ी व वनाथ द त और भु वने वर दे वी क चरं जीवी नरे े रामकृ ण परमहं स क प श य क े े हु ए । प म संयास हण करक े नाथ द त द ेरणा बु इसी गु ण से हण करते ह – राम, कृ ण, बु का स श त होता है, उसक का शत हमारे अवतार और वभू तय क जीवन से हम े .... । ववेक से र हत ेम मोह बन जाता है , प ले लेती है और अ धकार-सू झ कत य-शू य हो कर हाहाकार मचाती है । मन, जीवन एवं समाज म अशां त और वनाश फलता है । ऐसे अथ-पू ण, ै करने वाले ी म छपा है – “ ववेकन द” ! न य-अ न य, सह -गलत क ववेक क सहारे ह तो मनव-जीवन का माग े े होती है ! णे वर क े वामी ववेकान द क नाम से े मानव-जीवन क सम त दु वधाओं का अंत उनक नाम-मा े साथकता स यह गजना थी भारत ा वनाशक प रणाम व प ेरणादायी नाम को धारण वामी ववेकान द ने 39 वष क अपनी अ प आयु यावधी म अपने तप:पू त वचार-वाणी- यवहार से ऐसी द य ऊजा वा हत क क आज भी वे व व-भर म लाख लोग क लए े ेरणा- ोत ह, पथ-दशक ह । अपने गु दे व ी रामकृ ण परमहंस क आ ानु सार म अपने जीवन को सम पत कया । क थापना क । वामीजी ने जीव-मा म बसे नारायण क सेवा इसी उ े य को पू रा करने क लए उ ह ने “रामकृ ण मशन” े भारत-भर म प र मण करक उ ह ने समकाल न भारत क प रि थ त का े अ ययन करक भारतीय जनमानस म व भ न े तर पर बसी अ छाइय और समझा और उसक सम याओं क सह समाधान का माग े श त कया । ु टय को जाना- स ांत / आदश और उन 1
  • 2. पर आधा रत यव था क े त गलत समझ और उसक फल व प हु ए दोष े -यु त यांवयन से उ प न सम याओं म ब हमु खी मानस अ सर स ांत / आदश और यव थाओं का दोष दे खता है । धम और पर पराओं स ब धी सम याओं म अ धकतर यह होता है । कालांतर म स ांत / आदश म न हत भाव व लन हो जाता है और जड़ बा याचार का यापक, खोखला बनाता रहता है । व प समाज को दु बल बाल- ववाह, स त- था, म हलाओं / (तथाक थत) ‘ न न’ वग क लोग को श ण े से वं चत रखना, म हलाओं का शोषण, अ पृ यता, जा तवाद वगेरे ऐसे ह सामािजक दोष थे और ह । समाज म या त इस तक पहु ँचाने क लए े कार क दू षण क उ मू लन और धम एवं पर पराओं क सह समझ लोग े े वामीजी ने न कवल जीवन े -पयत “रामकृ ण मशन” जैसे सं थान क यास कए, बि क “रामकृ ण मठ” और थपना कर क यह काय अ वरत चलता रहे ऐसा आयोजन भी े उ ह ने कया । भारत से बाहर भारत एवं भारतीय सं कृ त और ह दू धम क बारे म सह, सकारा मक समझ फलाने े ै का काय भी खर वामीजी ने कया । उनक वाणी का ा, अ वतीय भाव अ ु त था ! और मरण-शि त, एका ता और क णा-सभर एक उ च कोट क संगीतकार और गायक भी थे वे ! े उ तम हो, यह य न हो ? कशा ु बु , दय स प न होने क साथ-साथ े ऐसे गु ण क धनी यि त व क अ भ यि त े वाभा वक ह है । शकागो व वधम प रषद (11 सत बर, 1893) म उनका वचन ऐ तहा सक एवं अ व मरणीय बन गया । ह दू धम क मौ लकता – स ह णु ता और सव यापकता को वहाँ उ ह ने उजागर कया । भारतीय सनातन (आ याि मक) वचारधारा क अक-समान वैि वक े स दभ क आधार पर सव-धम ऐ य / समंवय और व व- ेम का स दे श उ ह ने दया । अम रका े तथा यू रोप म उनक अनेक े मे लाउड, भ गनी शंसक, अनु यायी और श य बन गए । उनम से भ गनी नवे दता, मस ट न, से वयर द पि त, आ द श य ने वामीजी क काय को अपना जीवन े सम पत कया । धम क उ चत समझ को जा तवाद और ि ि वमीजी श ण का आधार मानते थे । भारत क मू लभू त सम याओं – य क अवहेलना – क नवारण क लए यो य श ण को वे अ नवाय मानते थे । े े य क “ि थ त सु धारने” और “पु न थान” क वषय म उनका मत मौ लक होने क साथ-साथ े े एकदम तक एवं स वेदना संगत था – ि नणय वयं लेने क य को सह वतं ता द जानी चा हए । श ण दे कर उ ह अपने जीवन स ब धी उनक ओर से उनक जीवन क नणय लेकर े े उनक अि मता का तर कार करने क भू ल से उ प न सा त सम याओं को वे इस कार नमू ल करना चाहते थे । एक स यासी क प रचय समान उनक आष- ि ट और जीव-मा े वाणी- यवहार म क े त उनक क णा उनक वचारे त ण छलकती थी ऐसा उनक वचार - या यान को पढ़कर और उनक वषय म े े लखे गए सा ह य को पढ़कर सु प ट हो जाता है । भारत क पावन भू म पर अंक रत हो फल ु ू फल आ या म पर परा, उसक धम- भा भारत क ओर से व व को सवा धक बहु मू य दान होगा 2
  • 3. ऐसा उ ह व वास था । सवा धक और भारत क इसी पु य भू म पर मानव-जीवन क दा ण दु दशा उ ह य थत करती थी । यह वेदना छलकती थी । उनक वामीजी क अपू व रा -भि त म भारत क े श या भ गनी नवे दता कहती थीं क त अहोभाव क साथ े वामीजी क मु ख से “भारत” े श द का उ चारण इतना भावभरा होता था क सु ननेवाला अ भभू त हो जाता था । श या मस मेकलाउड ने एक बार उनसे पू छा, “ वामीजी, हम आपक लए े मला, “भारत से तो ेम करो ....” ववेकाननद ( वचार क ववर रवी उनक एक और या कर ?” तु रंत उ तर नाथ ठाक र ने कहा था, “य द भारत को जानना हो, ु / सा ह य) का अ ययन करो ....” 12 जनवर , 1921 क े ववेकान द क ज मो सव म भाग लेने बेलू र मठ म पधारे रा े दन वामी पता महा मा गा धी ने कहा था, “ वामी ववेकान द क पु तक पढ़कर मेर रा -भि त म हज़ार गु ना वृ ी हो गई है ....” । रोमा रोलाँ ने वामी ववेकान द को शि त / ऊजा का जीवंत वराजमान नारायण का वे आ वान करते थे । मौ लक स य उ घो षत करक उ ह ने हर े मानव मा मानव मा म वयं पर व वास न करना नाि तकता है , यह कार क दु बलता–द नता से मु त होने क राह दखाई । म न हत एक ह ईश त व क वेदांत को उ ह ने जीवन म उतारा था । द यता क वैदां तक स य को उ ह ने पु नजागृ त कया । े वामीजी क भारतीयता म वैि वकता समाई थी, िजसक े आगे उनक समय का जन-मन नतम तक हो गया था । े ने व प कहा था । व व भर म उनक समय क हर महापु ष े े ी रामकृ ण परमहं स स हत उनक दै द यमान आभा का गु णगान कया । वामीजी ने भारत क गौरव को ऐसी ऊचाइय को सर करते दशन कया था िजसक आगे उसक े ँ े अतीत क भ यता सामा य-सी लगने लगे । क लए े क नाम पर आंकड़ क खेल म झु लसे भारत े े वामीजी क 150वीं ज म-जयं त पर आइए चं तन कर – सामािजक वषमता दू र करने क े भाव क लाश को ढोती आर ण- यव था, र हमार लोकतं / नकलखोर से श ण- यव था को कसे उबार और इसम हम ै प रवार-जीवन, म हलाओं, सफलता, या योगदान दे सकते ह ? वतं ता और पार प रकता क े वामी ववेकान द क पु य- मृ त को व दन करक, आइए े भारत और भारतीयता क े - त हमार उ न त- ग त का आधार, त आचरण-मू लक त हमारा ि टकोण या र त , व थ है ? ाथना कर क हर भारतीय का दय ा और भि त भर जाए । व नता ठ कर वडोदरा ( का शत : “कालजयी वामी ववेकान द” संचेतना क वशेष तु त – श क संचेतना, राजभाषा संघष स म त एवं अ खल भारतीय सा ह य प रषद, उ जैन का संयु त उप म) 3