Begane Mausam - by Ramesh Joshi (Hindi poetry)
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This book is an amazing account of the last 4 decades of social changes, by retired Hindi teacher and vice-principal Kendriya Vidyalaya, in the form of gazals and poems. The poet observes and laments ...

This book is an amazing account of the last 4 decades of social changes, by retired Hindi teacher and vice-principal Kendriya Vidyalaya, in the form of gazals and poems. The poet observes and laments the social, economic, political issues at whose heart are changing values which find no place for human-ness in the fray of consumerism.

The simple and little things that can give joy are lost somewhere in the new rat-race of corporate craze, multinational companies and enormous scandals and scams whose sizes were unimaginable.

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Begane Mausam - by Ramesh Joshi (Hindi poetry) Begane Mausam - by Ramesh Joshi (Hindi poetry) Document Transcript

  • This is a WEB SAMPLE of my print book BégānéMausam (बेगाने मौसम). Please support by purchasinga print copy or the Kindle version. For furtherinformation, or to order the print copy of the book,please visit: http://ThinkingHeartsOnline.comPlease visit my blogshttp://JhoothaSach.blogspot.com& http://JoshiKavi.blogspot.comfor latest articles and poetry.
  • csxkus e©le रमेश जोशी
  • Copyright © 2011 Ramesh JoshiAll rights reserved.Cover Design © Shashikant JoshiCover Photo by Kim Dong Hyun, Forest Fire Division, Korea ForestResearch Institute.Email comments to: JoshiKaviRai@Gmail.comBlog: http://JhoothaSach.blogspot.comPublished by:Thinking Hearts, IndiaWebsite: http://ThinkingHeartsOnline.comEmail: Info@ThinkingHeartsOnline.comNo part of this book may be reproduced or utilized in any form or by anymeans, electronic or mechanical including photocopying, recording or byany information storage and retrieval system without the express writtenpermission of the publisher.The moral right of the author has been asserted.Bégāné Mausam (Hindi Poetry)by Ramesh JoshiFirst Edition 2011Price: 120 (India) / US $4.99 (Worldwide)Hindi Poetry ISBN: 978-81-920743-2-0बेगाने मौसम (गज़ल-गीततकाएँ) मूल्य 120- रमेश जोशी
  • जीवनसंतगनी रमा को,तजसके साथ 10 मइ 2011 को जीवन के 52 वषष पूरे हुए – रमेश जोशी
  • बेगाने मौसम ऄँतधयारों के यार ईजाले 13 ऄन्न बजे और ऄन्न बजावै 14 अँधी और तूफ़ान अ गये 15 अओ ईसकी बात करें 16 अजकल कर्फ़यूष शहर में है 17 अपका पूरा प्रदशषन हो गया है 18 आधर ईधर चेहरे ही चेहरे 19 ईनका प्यार तसव्वुर तनकला 20 ईनका साया जहाँ-जहाँ पर 21 ईनको ददष बताना मुतककल 22 ईनसे ऄगर लगाव न होता 23 ईनसे सारी ईमर ठनी 24 उचे लोगों से व्यवहार ँ 25 एक तूफ़ानी नदी है, और हम 26 एक सँकरी डगर है तमयाँ 27 एड़ी नीचे कील, फील गुड 28 कब तक यह ठहराव तजयेंगे 29 ककतने सीधे-सादे तुम 30ककसी भटके मुसाकफ़र का सहारा हँ 31 कु छ भी नहीं ईगाएँ अप 32 क़ै द में तनदोष, ऄपराधी बरी है 33 कोइ बात न माने मौसम 34 क्या रखा है काम में 35 क्या रुकना बुतखानों में 36 खेतीहर तो बेगारी है 37 घर लेकर ऄरमानों में 38 चट्टानों से छन कर तनकले 39 5
  • रमेश जोशी चाहे रस्ते काले हों 40 छु प कर लोग मचानों में 41 जनता से सरकार हो गए 42 जब करनी थीं सड़कें चौड़ी 43 जब तक तेरे पास रहे 44 जब दस्तानों से ही हाथ तमलाना है 45 जब से तेरे खयालों में 46 ज़हर फै ला हो जहाँ पररवेश में 47 जैसे तैसे बात बनाइ 48 जैसे कदखते बाहर-बाहर 49 ठु ड्डी घुटनों तक पहुँचाइ 50 ढू ँढते हैं वे मनोरंजन ख़बर में 51 तुम तजस को भी याद रहे 52 तुमने क्या ना कहा ज़ज़दगी 53 ददष भले क़तरा भर है 54 ददष होता वो या दवा होता 55 दाल नहीं, ना पानी है 56 कदन बीता और शाम हो गइ 57 दुहरी होने लगी कमर 58 देख झरोखे, जाली देख 59 दो बातें, दो पल कर देखो 60 नदी-ककनारों में ऄनबन है 61 ना काया, ना छाया है 62 ना रोटी, ना पानी की 63 ना हम ककसी तहसाब में हैं 64 ना ही रुतबा, ना ही ज़र है 65 पररदा डर रहा है असमाँ से 66 6
  • बेगाने मौसम पैसे चार कमाने में 67 फ़ाआलों में फ़सल हो रहे हैं 68 बचकर मेरी नज़र से तनकलें 69 बनी हवेली ईनके मन की 70 बहुत कदनों के बाद तमले 71 बात राजा को यही खलने लगी है 72 बातें सभी पुरानी हैं 73भावना तबन क्या धरा है व्याकरण में 74 मेरा साथ तनभाने वाले 75 या तो रौनक बाज़ारों में 76 यूँ तो चाँद-तसतारे अप 77 यूँ तो वह कमज़ोर नहीं है 78 यूँ भी अँख चुराना क्या 79 रहते रहे शरीरों में 80 रोज़ शहर में अते लोग 81 लकड़ी है ऄनाज के भाव 82लूट-मार, चोरी-डाका कु छ हुअ नहीं 83 वक्त का मारा हुअ है अदमी 84 वही ग़ज़ल ना हुइ पुरानी 85 वो शायद ग़मज़दा बहुत है 86 सबका खस्ता हाल वही 87 सर पर है झीना-सा ऄम्बर 88 सारा खेल ईधार हो गया 89 सूरज चन्दा सारे तारे 90 सूरज रोज़ सफ़र में है 91 हम ईनको समझाने तनकले 92 हम तजन से भी लड़ने तनकले 93 हर हालत में साथ चलें 94 7
  • रमेश जोशी 8
  • बेगाने मौसम अमुख तपछले सात-अठ दशक का समय न तो बहुत पुराना हैऔर न ऄनजाना, सृति के कालचक्र में तो समुद्र में एक बूँद से भीकम । चौथे दशक के ऄंत में दूसरे तवश्वयुद्ध की शुरुअत, लीगऑफ नेशंस का भंग होना, जमषनी में साठ लाख यहकदयों कासंहार, भारत में तत्कालीन तिरटश सरकार द्वारा कृ तिम रूप सेसृतजत ‘बंगाल के ऄकाल’ में कइ लाख लोगों की भूख से मृत्यु ...लगा, कतलयुग ऄपने ऄंततम चरण में चरम पर है । आसके बाद सकदयों से ईपतनवेश के शोषण और गुलामीभोग रहे ऄफ्रीका और एतशया के देशों में स्वाधीनता अंदोलनोंकी शुरुअत, तवश्वयुद्ध की समाति, संयुक्त राष्ट्र का गठन । लगादुतनया के ऄच्छे कदन अने वाले हैं । भारत की तिरटश ईपतनवेशसे स्वतंिता, कफर ईसका औद्योतगक तवकास – होल्डर का तनबभी न बनाने वाला देश ऄब हवाइ जहाज और कम्प्यूटर बनानेलगा; तवदेशों से सड़ा गला ऄनाज अयात करने वाला देश कृ तषमें अत्मतनभषर होकर ऄन्न का तनयाषत करने लगा । हमारा यह अशावाद नइ शताब्दी के प्रथम दशक केसमाि होते-होते कायम नहीं रह सका । लगा, हम ईसी पुरानीकफल्म का रीमेक तो नहीं देख रहे हैं, जैसे कक धूम-2 । तवदेशीमाल की होली जलाकर औद्योतगक तवकास की राह पर चल पड़ेदेश के बाज़ार ऄचानक तवदेशी माल से पट गए, देशी तकनीकऔर कारीगर ऄचानक नेपथ्य में चले गए; बंगाल के ऄकाल कीतरह देशी सरकार के गोदाम भरे पड़े हैं मगर यह तय नहीं हो पारहा है कक आस ऄनाज को देश के भूखे लोगों में बाँट कदया जाए याआसे गोदामों में सड़ा कर कफर फफकवाने का खचाष ककया जाए ।तवभाजन के बाद लाखों लोग बेघर हो गए थे मगर आसी देश केलोगों ने ईन्हें ऄपने अँचल में सहारा कदया और वह घाव भर 9
  • रमेश जोशीगया मगर अज तवकास के नाम पर ईजड़े अकदवासी, छोटेग्रामीण ककसान और अतंकवाद के मारे ककमीरी पंतडत ऄपने हीदेश में दर-दर भटकते कफर रहे हैं और ककसी को ईनका दुःख-ददषपूछने तक का समय नहीं है । पहले जहाँ साधनहीनता में भी देश,समाज, पररवार में संवाद था वहाँ अज सारे साधनों के होते हुएभी संवादहीनता है जो सब को ऄतधक भयभीत, कुं रठत औरकमजोर ककए हुए हैं । आसतलए यह समय पहले से ऄतधक करठनहै और हर सोचने वाले के तलए यही सबसे बड़ी ज़चता है । अज संवाद, सहयोग और समझ की सबसे ज्यादा ज़रूरतहै । ये रचनाएँ आसी ज़चता और चाह का तवधान रचाने कीकोतशश हैं जो तपछले दो दशकों में आस नकारात्मक पररवतषन कीतीव्र होती गतत के साथ-साथ और गहन होती गइ हैं । थोड़ा सासमय तनकाल कर आन रचनाओं से संवाद करने का प्रयत्न करें ।शायद ये अपकी हमसफ़र हो जाएँ । आनमें हम सब की साझीज़चताएँ हैं जो एक दूसरे के तनकट अने से ही कम होंगी । अओ कसकर हाथ पकड़ लें हम दोनों का साझा डर है । - रमेश जोशी बेंगलूरु, जून 2011 10
  • बेगाने मौसमभावना तबन क्या धरा है व्याकरण में ।शब्द का ऄनुवाद तो हो अचरण में । 11
  • रमेश जोशी 12
  • बेगाने मौसमऄँतधयारों के यार ईजाले ।हैं ककतने मक्कार ईजाले ।बार बार अँखें चुँतधया करखो जाते हुतशयार ईजाले ।चौबारों-छज्जों पर बैठेकरते हैं ज़सगार ईजाले ।‘होरी’ की झुग्गी में झाँकेंआतने कहाँ ईदार ईजाले ।कल थोड़ा सकु चा कर करतेकाले कारोबार ईजाले ।बीच सड़क में लगा रहे हैंअज ‘मुक्त बाज़ार’ ईजाले ।जो जलते हैं, वे पाते हैंतमलते नहीं ईधार ईजाले ।हम नादाँ थे तुमसे माँगेए मेरी सरकार! ईजाले । 2 फरवरी 1995 13
  • रमेश जोशीऄन्न बजे और ऄन्न बजावै ।ऄन्न ही सारे नाच कदखावै ।पलना-लोरी कहने भर कोऄन्न ही सोवै, ऄन्न सुलावै ।माया की बदनामी झूठीऄन्न ही दुतनया को भरमावै ।कम्प्यूटर, टी.वी. कदखलाकरकाहे भूखों को भरमावै ।ऄन्न तमले तो गाना सूझेऄन्न तबना कु छ भी ना भावै ।ऄन्न तबना सब शोर-शराबाऄन्न-िह्म ही ऄनहद गावै । 18 फ़रवरी 2001 14
  • बेगाने मौसमअँधी और तूफ़ान अ गये ।तचर-पररतचत मेहमान अ गए ।घुटन, ऄँधेरा, ददष, ईदासीजीने के सामान अ गए ।ईनका नाम तलया तो हम परसब के सब आल्ज़ाम अ गए ।ईनके घर के हर रस्ते मेंछोटे-बड़े मकान अ गए ।दो गज़ का ऄरमान ककया तोकु की के फरमान अ गए ।ईन्हें मनाना असाँ था परमन में गरब-गुमान अ गए । 8 जून 1995 15
  • रमेश जोशीअओ ईसकी बात करें ।कदन-सी ईजली रात करें ।हमसे तुमसे ही दुतनयाहमीं सुने औ’ हमीं कहें ।जो सब की अँखों का होऐसा कोइ ख्वाब बुनें ।एक रठकाना ऐसा होतजसमें सारा जग रह ले ।थोड़ी-सी तो ईमर बचीजल्दी से कह लें, सुन लें । 9 जुलाइ 2005 16
  • बेगाने मौसमअजकल कर्फ़यूष शहर में है ।लोग सहमे, डरे घर में हैं ।पाँव लटके कि में तो क्याहाथ कु सी की कमर में हैं ।ज़हर-ऄमृत में नहीं कु छ फ़कषबात तो सारी ऄसर में है ।देख लेना सत्य ही होंगेख्वाब जो मेरी नज़र में हैं ।रहनुमा का खौफ़ तबसे हैअदमी जबसे सफ़र में है ।मंतजलें मुतककल बहुत, तो क्याहौसला ऄब भी बशर में है । 16 नवम्बर 1995 17
  • रमेश जोशीअपका पूरा प्रदशषन हो गया है ।हर जगह पर दूरदशषन हो गया है ।ऄब न बदलेंगे यहाँ मौसम कभीमुल्क का वातानुकूलन हो गया है ।तखलतखलाती कु र्ससयाँ अयोजनों मेंलोकमत तनबषल-तनवेदन हो गया है ।वंश बढ़ता जा रहा है लम्पटों कासत्य का जबरन तनयोजन हो गया है ।अआये ऄब तो करें बातें हृदय कीदेह का सम्पूणष शोषण हो गया है ।काँपती है एक बूढ़ी झोंपडीअज मलयातनल प्रभंजन हो गया है । 6 माचष 1979 18
  • बेगाने मौसमआधर ईधर चेहरे ही चेहरे ।ऄन्दर तछछले, बाहर गहरे ।तरह तरह की दौड़ लगातेलेककन एक जगह पर ठहरे ।दुहरी हुइ कमर जनता कीझंडा उचा-उचा फहरे । ँ ँसकदयों से संवाद चल रहाश्रोता गूँगे, वक्ता बहरे ।तपछवाड़े से सेंध लग गयीदरवाजों पर पक्के पहरे । 9 नवम्बर 2000 19
  • रमेश जोशीईनका प्यार तसव्वुर तनकला ।ककतना सच, मेरा डर तनकला ।ककया जहाँ भी रैन-बसेराबटमारों का ही घर तनकला ।सबको साया देने वालाअँचल अँसू से तर तनकला ।शीशे के घर वालों की थींतजन जेबों में पत्थर तनकला ।ईनका ख़त तबन पढ़ा रह गयासारा तंि तनरक्षर तनकला ।जीवन भर परबत खोदा परजब तनकला चूहा भर तनकला । 23 माचष 2005 20
  • बेगाने मौसमईनका साया जहाँ-जहाँ पर ।ततनका तक ना ईगा वहाँ पर ।ऄपना नाम तलखे दाने कोढू ँढा जाने कहाँ-कहाँ पर ।दुतनया का मातलक है तो कफरक्यों ना अता ऄभी, यहाँ पर ।कदल में है तो, कदल को पढ़ लेहम ना लाते दुअ ज़ुबाँ पर ।गुल को भी तो तखलने की तज़दक्यूँ सारे आल्ज़ाम तखजाँ पर । 10 ऄप्रेल 2010 21
  • रमेश जोशीसूरज चन्दा सारे तारे ।धरती और अकाश तुम्हारे ।सारा चारा अप चर गएलोग ऄभी तक हैं बेचारे ।ओठों से कु छ और बोलतेअँख करे कु छ और आशारे ।एक टाँग पर मुल्क खड़ा हैअप सो रहे हैं टाँग पसारे ।बाट जोतते ईतजयारे कीऄब भी बस्ती गाँव दुअरे । 4 तसतम्बर 1997 90
  • बेगाने मौसमसूरज रोज़ सफ़र में है ।कफ़र तू ही क्यों घर में है ?ऄपने बाज़ू तोलो तोपानी हर पत्थर में है ।वो परदे के ऄन्दर हैंलेककन मेरी नज़र में हैं ।नहीं लगे जनता के सुरलेककन तंि बहर में है ।जो गतलयों में ढू ँढ रहेक़ाततल ईनके घर में है ।पाल ईठा दो नावों केकु छ संकेत लहर में है ।थकी ऄमीना राह तकेहातमद1 मगर शहर में है ।1 मुंशी प्रेमचंद की प्रतसद्ध कहानी इदगाह का मुख्य पाि 3 जुलाइ 1994 91
  • रमेश जोशीहम ईनको समझाने तनकले ।मतलब धोखा खाने तनकले ।नाम बताएँ हम ककस-ककस कासब जाने पहचाने तनकले ।तजन्हें हकीक़त समझा हमनेवो के वल ऄफ़साने तनकले ।तजनमें खोये रहे ईमर भरवो सब ख़्वाब पुराने तनकले ।सब बच तनकले पतली गतलयोंएक हमीं टकराने तनकले ।सूरत ने सब कु छ कह डालाझूठे सभी बहाने तनकले ।ज्यों की त्यों धर चले चदररयाहम ऐसे दीवाने तनकले । 1 ऄप्रेल 2005 92
  • बेगाने मौसमहम तजन से भी लड़ने तनकले ।वे सब के सब ऄपने तनकले ।वो तो मन में ही बैठा थातजसकी माला जपने तनकले ।मेरी अँखों ने जो देखेवे तेरे ही सपने तनकले ।बस वे ही ज़जदा रह पायेकफन बाँध जो मरने तनकले ।ऄणु परमाणु सभी तो घूमेकफर तुम कहाँ ठहरने तनकले ।जन्म हुअ तो मरना भी हैकफर हम ककससे बचने तनकले ।छोटे-छोटे से दुःख-सुख हीहम कतवता में रचने तनकले । 25 ऄप्रेल 2000 93
  • रमेश जोशीहर हालत में साथ चलें ।ले हाथों में हाथ चलें ।ऐसी कोइ बात बनेतजसकी सकदयों बात चले ।ईतना जलना दीपक कोतजतनी लम्बी रात चले ।बंद न हो संवाद कभीचाहे लाख तववाद चले ।कभी नहीं तन्हा थे हमसाथ तुम्हारी याद चले । 16 ऄप्रेल 2000 94
  • बेगाने मौसम95
  • रमेश जोशी रमेश जोशी18 ऄगस्त 1942 को तचड़ावा (झुंझुनू-राजस्थान) में जन्म । राजस्थानतवश्वतवद्यालय से तहन्दी में एम.ए. और भोपाल तवश्वतवद्यालय से बी.एड. ।पोरबंदर से पोटष ब्लेयर तक देश के तवतभन्न तवद्यालयों में तहन्दी तशक्षण । सन2002 में कें द्रीय तवद्यालय नं. 3, जयपुर से ईपप्राचायष के पद से सेवातनवृत्त ।सन 1958 से देश के स्तरीय समाचार पिों और पतिकाओं में व्यंग्य रचनाएँप्रकातशत । अकाशवाणी राजकोट, जयपुर, पोटषब्लेयर, कदल्ली से व्यंग्यरचनाएँ प्रसाररत । कदल्ली, पोटषब्लेयर, सीकर की कइ संस्थाओं द्वारासम्मातनत ।प्रकातशत कृ ततयाँ- कजे के ठाठ (व्यंग्य, कुं डतलया संग्रह, 1996), रामधुन(व्यंग्य, कुं डतलया संग्रह, 1998), रास्ते में ऄटकी ईपलतब्धयाँ (व्यंग्य, तनबंधसंग्रह, 2009), माइ लेटसष टु जाजष बुश (व्यंग्य, 2011) । दो ऄन्य संकलनप्रकाशनाधीन ।कजे के ठाठ, रामधुन –‘कुं डतलया छं द में ऄपने समय की सभी तवडंबनाओं पर मारक व्यंग्य करतीसाहसी रचनाएँ’ – कादतम्बनीरास्ते में ऄटकी ईपलतब्धयाँ –‘व्यंग्यकार की सूक्ष्म और तीक्ष्ण दृति से कोइ भी छोटी-बड़ी घटना में तनतहततवडंबना बच नहीं पाती है ...जोशी का रचना संसार समुद्र की तरह है जोकभी घटने वाला नहीं है...जोशी का लेखन भयावह तचि कथाओं वाला एकदपषण है....सत्ता-संस्कृ तत का बतहष्कार करने वाले जोशी की यह पुस्तक हमेंतनाव देने के साथ-साथ गुदगुदाने में भी समथष है’ – आतडडया टु डे 96