Overcoming Anger

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Overcoming Anger

  1. 1. क्रोध पर विजय स्वामी बुधानन्द के एक लेख का सार
  2. 2. <ul><li>स्वामी बुधानन्द (1917-1983), रामकृष्ण मिशन से सम्बद्ध संत थे . उनकी लेखनी अत्यंत सशक्त थी . अमेरिका में बहुत समय तक उन्होंने वेदांत का प्रसार किया . </li></ul><ul><li>उनकी पुस्तकों में से मन और उसका निग्रह तथा चरित्र निर्माण कैसे करें आपमें से बहुतों ने पढ़ी होंगी . स्वामीजी लम्बे अर्से तक प्रबुद्ध - भारत के सम्पादक रहे . </li></ul>
  3. 3. क्रोध पर विजय के लिये एकीकृत प्रणाली की आवश्यकता <ul><li>प्राचीन धार्मिक विधानों पर एक नवीन दृष्टि डालने की आवश्यकता है , ताकि हम सुस्पष्ट और अर्थपूर्ण जीवन जी सकें . </li></ul><ul><li>समाजविज्ञानी हमारी देशी परम्पराओं का “द्वन्द्व पर विजय और दुरुह परिस्थितियों के प्रबन्धन” के लिये अध्ययन कर रहे हैं . </li></ul><ul><li>आधुनिक लोगों को क्रोध और द्वन्द्व के प्रबन्धन के लिये हमारी धार्मिक शिक्षा की जरूरत है . </li></ul><ul><li>आत्मानुशासन की जरूरत हमारे पूर्वजों की अपेक्षा हमें आज कहीं ज्यादा है . </li></ul>
  4. 4. क्या क्रोध पर विजय सम्भव है ? <ul><li>संतों के विचार और भग्वद्गीता बताते हैं कि क्रोध पर पूरा नियंत्रण किया जा सकता है . </li></ul><ul><li>‘ दुख से जिसमें उद्वेग नहीं होता और सुख में जो निस्पृह रहता है ; जिसमें राग भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं ; ऐसा व्यक्ति स्थिर बुद्धि कहा जाता है . ’ – गीता (2.56) </li></ul><ul><li>यह विवरण एक पंहुची हुई स्थिति का है . अत : कोई सन्देह नहीं होना चाहिये कि क्रोध पर विजय पायी जा सकती है . </li></ul>
  5. 5. एक समग्र प्रणाली <ul><li>सभी धर्म क्रोध पर विजय के तरीकों पर अपने - अपने मतानुसार ध्यान देते हैं . </li></ul><ul><li>लेकिन उचित होगा कि साधक एकीकृत प्रणाली का अनुसरण करें . </li></ul><ul><li>श्री कृष्ण , पतंजलि , बुद्ध और ईसा मसीह इस एकीकृत प्रणाली की दिशा बता सकते हैं . </li></ul>
  6. 6. उपयोगी प्रणाली <ul><li>अपने अन्दर सबसे पहले सभी के प्रति सद्भावना , मैत्री , शांति और समभाव का विकास करें . </li></ul><ul><li>यह दिनचर्या में संस्कृत के श्लोकों और भगवान बुद्ध की बताई प्रार्थनाओं को समाहित कर किया जा सकता है . </li></ul><ul><li>अपनी जागृत अवस्था में नैसर्गिक अच्छाई , वैश्विक सद्भावना , सतत प्रसन्नता का प्रसार , कुटिलता , क्रोध और द्वेष के पूर्ण अभाव का भाव रखने का यत्न करें . </li></ul>
  7. 7. निर्धारित प्रणाली - प्रार्थना <ul><li>ओम , सर्वत्र गहन शांति व्याप्त हो . सभी विघ्न - बाधाओं से मुक्त हों . सभी अच्छाई को प्राप्त करें . सभी सद्विचारों से प्रेरित हों . सभी हर स्थान पर प्रफुल्लित रहें . सभी प्रसन्न हों . सभी निरोग हों . किसी को कोई दुख न हो . कुटिल व्यक्ति सदाचारी बनें . सदाचारी परमानन्द प्राप्त करें . परमानन्द उन्हें सभी बन्धनों से मुक्त कर दे . सभी मुक्त व्यक्ति दूसरों को मुक्त करें . </li></ul><ul><li>यह मानसिक संकल्प आंतरिक शांति , सद्भाव और विश्व के प्रति समभाव से परिपुष्ट होगा . </li></ul>
  8. 8. यम और नियम का पालन <ul><li>अक्रोध का अभ्यास हमारे अचेतन मन से उपजने वाले विघटन कारी विचारों से छिन्न - भिन्न हो जाता है . </li></ul><ul><li>इन विघटक शक्तियों को वश में करना जरूरी है . अन्यथा क्रोध पर विजय की कोशिशें कुण्ठित हो जायेंगी . </li></ul><ul><li>यह यम और नियम के अनुशासन के सतत पालन से हो सकता है . </li></ul><ul><li>यम में आते हैं : अहिंसा , सत्य , अस्तेय ( चोरी का अभाव ), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( किसी लोभ से प्रेरित उपहार को स्वीकार न करना ) . </li></ul><ul><li>नियम में निम्न का अभ्यास निहित है : बाहरी और भीतरी शुद्धता ( शौच ), संतोष , तप , स्वाध्याय और ईश्वर का पूजन . </li></ul><ul><li>ये अनुशासन व्यक्ति को मानसिक शुद्धता प्रदान करते हैं . इससे सही और पवित्र कार्य करने के लिये ऊर्जा मिलती है . </li></ul>
  9. 9. गायत्री के प्रभाव <ul><li>गायत्री मंत्र बुद्धि को प्रकाशमय करने के लिये है . </li></ul><ul><li>केवल दैवी प्रेरणा से ही बुद्धि जान सकती है कि क्रोध पर विजय क्यों जरूरी है , उसे कैसे किया जा सकता है और उसके लिये अंतिम विजय तक ऊर्जा कहां से पाई जा सकती है . </li></ul><ul><li>हममें से कई आधे में ही छोड़ बैठते हैं , क्योंकि वे अपने आप में अचानक ऊर्जा का अभाव पाने लगते हैं . </li></ul>
  10. 10. सत्व की बहुलता की आवश्यकता है <ul><li>अबतक बताये अभ्यास के बाद हम क्रोध पर विजय के सबसे प्रभावी तरीके पर अमल की ओर बढ़ सकते है . </li></ul><ul><li>और वह तरीका अपने में सत्वगुण के विकास का है . </li></ul><ul><li>जब हममें रजस और तमस का बाहुल्य होता है तब हम अपने में से राग और द्वेष को नहीं निकाल सकते . </li></ul><ul><li>राग और द्वेष क्रोध के मूल हैं . </li></ul><ul><li>जब तक हममें सत्व उन्मीलित दशा में है , हम क्रोध पर विजय नहीं पा सकते . </li></ul>
  11. 11. एकात्मता की जड़ें <ul><li>अगर आप क्रोध पर विजय पाना चाहते हैं तो दूसरों में क्रोध न उपजायें . </li></ul><ul><li>अत : एकता , शांति और समरसता के लिये सोचना , कहना और कार्य करना सीखें . </li></ul><ul><li>अगर कोई अपने पड़ोसी के घर में आग लगाता है तो वह अपने घर को जलने से नहीं बचा सकता . </li></ul>
  12. 12. एकात्मता की जड़ें ...2 <ul><li>बुद्ध ने बताया है कि एकात्मता चेतना के 6 चरणों पर निर्भर करती है : </li></ul><ul><ul><li>अपने साथ वालों से भाईचारे के व्यवहार पर . </li></ul></ul><ul><ul><li>पूरी निष्ठा से कहे जाने वाले सद्भावना के वचनों पर . </li></ul></ul><ul><ul><li>पूरी निष्ठा से सद्भावना के विचारों पर यकीन करने से . </li></ul></ul><ul><ul><li>अपने पास के अंतिम अन्न के टुकड़े को भी दूसरों से बांटने से . </li></ul></ul><ul><ul><li>अपने उच्च और दोष रहित जीवन को दूसरों के साथ जीने से . </li></ul></ul><ul><ul><li>अपने पास के सभी दुर्गुणों को अपने पवित्र प्रेम से दूर करने से . </li></ul></ul>
  13. 13. अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...1 <ul><li>दिन प्रारम्भ करने के पहले घर पर अकेले चुपचाप बैठें . </li></ul><ul><ul><li>आज दिन में जिन परिस्थितियों और लोगों से सामना होना है , उनपर विचार करें . </li></ul></ul><ul><ul><li>उन सभी प्रिय और अप्रिय बातों , उद्वेगों , वासनाओं और परेशानियों के बारे में सोचें जो सामने आ सकती हैं . </li></ul></ul><ul><ul><li>क्रोध से निपटने की तैयारी पहले से करें . तैयारी करें कि विस्फोटक स्थितियों को बिना विस्फोट किये कैसे सम्भाला जायेगा . </li></ul></ul><ul><ul><li>अपने में सतत मधुर मैत्री पूर्ण भाव को उपजाने का यत्न करें . यह लोगों के स्नायुओं को परेशान करने की बजाय उन्हें मरहम प्रदान करेगा . </li></ul></ul>
  14. 14. अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...2 <ul><li>अपने में जीवंत हास्य को बनाये रखें और जीवन के विनोद पक्ष को हमेशा देखने का प्रयास करें . </li></ul><ul><li>बोलने में संयम सदैव क्रोध पर विजय में सहायक होता है . </li></ul><ul><ul><li>अप्रिय वचन बोलने से – घर और बाहर दोनों जगह बचें . </li></ul></ul><ul><ul><li>जो लोग कट्टर विचार रखते हों , उनसे विवादास्पद विषयों पर चर्चा से बचें . </li></ul></ul><ul><ul><li>बोलने में संयम का सूत्र है – सत्य - हितकारी - प्रिय शब्दों का प्रयोग करना . </li></ul></ul><ul><ul><li>ज्यादा सुनें , कम बोलें और विषय पर ही बोलें . </li></ul></ul>
  15. 15. अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...3 <ul><li>क्रोध का प्रत्युत्तर कैसे दें ? </li></ul><ul><ul><li>क्रोध को ईन्धन न उपलब्ध करायें . </li></ul></ul><ul><ul><li>याद रखें ; जैसे आग के लिये पेट्रोल है , वैसे क्रोध के लिये क्रोध है . जैसे आग के लिये पानी है , वैसे क्रोध के लिये विनम्रता है . </li></ul></ul><ul><ul><li>बुद्ध का कहा मानें : “ मानव क्रोध को विनम्रता से जीते .” विनम्रता बम से ज्यादा शक्तिशाली है . </li></ul></ul><ul><ul><li>बुद्ध कहते हैं : “ अगर तुम अपना दर्प अलग नहीं कर सकते तो तुम अपना क्रोध नहीं छोड़ सकते .” </li></ul></ul><ul><ul><li>दर्प के मूल में अहंकार है . जब अहंकार को निकाल दिया जाता है , तब क्रोध निकल जाता है . </li></ul></ul><ul><ul><li>धैर्य से क्रोध को सहन करें . विनम्रता से क्रोध पर विजय प्राप्त करें . </li></ul></ul>
  16. 16. अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...4 <ul><li>क्रोध का सीमित और यदा - कदा प्रयोग का यत्न छोड़ दें . </li></ul><ul><ul><li>जैसे कि सीमित कौमार्य का कोई अर्थ नहीं है , वैसे ही तर्कसंगत क्रोध का कोई अस्तित्व नहीं है . </li></ul></ul><ul><ul><li>बुद्ध चेतावनी देते हैं : ‘ शरीर , वचन और मन के क्रोध से सावधान रहो . अपने शरीर , जिह्वा और मन पर संयम करो .’ </li></ul></ul>
  17. 17. क्रोध की विस्फोटक स्थितियों का सामना कैसे करें ? <ul><li>जब प्रश्न ‘मेरे क्रोध’ का न हो वरन मैं स्वयं क्रोध बन गया होऊं , तब क्या किया जाये ? </li></ul><ul><ul><li>वैसा करें जैसा ईसाई साधू करते थे : जब आपमें क्रोध का तूफान चल रहा हो , तब अपने हृदय में सो रहे ईश्वर का आह्वान करें . वे जागेंगे और क्रोध के बवण्डर को शांत कर देंगे . </li></ul></ul><ul><ul><li>पतंजलि ने सिखाया है : क्रोध की लहरें शांत करने के लिये अपने में प्रेम की लहरें उठाओ . </li></ul></ul>
  18. 18. क्रोध की विस्फोटक स्थितियों का सामना कैसे करें ?...2 <ul><li>कुछ अन्य सुझाव हैं : </li></ul><ul><ul><li>जिसपर आपने क्रोध का विस्फोट किया हो , उससे बिना समय गंवाये दैन्यभाव ( meekness ) प्रदर्शित करें . </li></ul></ul><ul><ul><li>कभी भी क्रोध को अपने हृदय पर साम्राज्य स्थापित न करने दें . </li></ul></ul><ul><ul><li>क्रोध में कोई कदम उठाने में देरी करें . चेहरे पर क्रोध छलकाने से बचें . क्रोध छ्लक आया हो तो कटु शब्द बोलने से बचें . कटु बोल गये हों तो हाथ उठाने से बचें . पर अगर आप हाथ उठा चुके हों तो बिना समय गंवाये आंसू पोंछें और पूरी ईमानदारी और विनम्रता से क्षमा याचना करें . </li></ul></ul><ul><ul><li>ईश्वर सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं . इन जीवित मन्दिरों को तुच्छ निर्जीव वस्तुयें मत समझें . </li></ul></ul>
  19. 19. विस्फोटक स्थितियों के फिर आने को कैसे रोकें ? <ul><li>शांति के समय में अपने को प्रर्थनायुक्त मधुरता , अगाध शांति , दैन्यभाव और सौम्यता से भर दें . </li></ul><ul><li>क्रोध न रोक पाने के लिये अपने आप पर बहुत कड़ाई से पेश न आयें . अपने आप को पूरी निष्ठा और सौम्यता से संभालें . </li></ul><ul><li>दूसरों में गलतियां ढ़ूंढ़ने की प्रवृत्ति से बचें . अपनी कमियां देखें . ईश्वर से उन्हें दूर करने में सहायता मांगें . पर अपनी या औरों की गलतियों पर बहुत ज्यादा न सोचें . </li></ul><ul><li>अहंकार , अपने को सही मानने की वृत्ति , और स्वार्थ को निकाल बाहर फैंकें . </li></ul>
  20. 20. विस्फोटक स्थितियों के फिर आने को कैसे रोकें ?...2 <ul><li>औरों के लिये अपनी समझ में स्थान रखें . उन लोगों को समझने का यत्न करें ; जो आपको उद्वेलित करते हैं . उनके लिये प्रार्थना करें . </li></ul><ul><li>द्वन्द्व की अवस्था में मूलभूत तत्वों की खोज करें . छोटे तत्व को बड़े तत्व के सामने त्यागने का भाव रखें . </li></ul><ul><li>अपने में व अपने आसपास सतर्कता का भाव रखें . बुराई को अपने अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर न जाने दें . </li></ul><ul><li>अपने में मधुर विवेक विकसित करें . </li></ul>
  21. 21. अक्रोध में दृढ़ता से और अनंतिम रूप से कैसे बने रहें ? <ul><li>जीव की एक अवस्था है जिसमें यह कहा जा सकता है कि उसे क्रोध पर पूर्ण प्रभुत्व मिल गया है . </li></ul><ul><li>आत्म ज्ञान से व्यक्ति अक्रोध की अवस्था में स्थिर हो जाता है . </li></ul><ul><li>गीता ( अध्याय 5,6) में वैराज्ञ और ध्यान के विषय बताते हुये इस अवस्था को पाने के तरीके बताये गये हैं . </li></ul><ul><li>जब व्यक्ति अपने को सब में और सब को अपने में अनुभूत करने लगता है , तब वह सदा - सदा के लिये क्रोध हीन हो जाता है . वह क्रोध से ऊपर उठ कर शांति और समभाव में स्थित हो जाता है . </li></ul>
  22. 22. समाप्त

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