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Overcoming Anger Overcoming Anger Presentation Transcript

  • क्रोध पर विजय स्वामी बुधानन्द के एक लेख का सार
    • स्वामी बुधानन्द (1917-1983), रामकृष्ण मिशन से सम्बद्ध संत थे . उनकी लेखनी अत्यंत सशक्त थी . अमेरिका में बहुत समय तक उन्होंने वेदांत का प्रसार किया .
    • उनकी पुस्तकों में से मन और उसका निग्रह तथा चरित्र निर्माण कैसे करें आपमें से बहुतों ने पढ़ी होंगी . स्वामीजी लम्बे अर्से तक प्रबुद्ध - भारत के सम्पादक रहे .
  • क्रोध पर विजय के लिये एकीकृत प्रणाली की आवश्यकता
    • प्राचीन धार्मिक विधानों पर एक नवीन दृष्टि डालने की आवश्यकता है , ताकि हम सुस्पष्ट और अर्थपूर्ण जीवन जी सकें .
    • समाजविज्ञानी हमारी देशी परम्पराओं का “द्वन्द्व पर विजय और दुरुह परिस्थितियों के प्रबन्धन” के लिये अध्ययन कर रहे हैं .
    • आधुनिक लोगों को क्रोध और द्वन्द्व के प्रबन्धन के लिये हमारी धार्मिक शिक्षा की जरूरत है .
    • आत्मानुशासन की जरूरत हमारे पूर्वजों की अपेक्षा हमें आज कहीं ज्यादा है .
  • क्या क्रोध पर विजय सम्भव है ?
    • संतों के विचार और भग्वद्गीता बताते हैं कि क्रोध पर पूरा नियंत्रण किया जा सकता है .
    • ‘ दुख से जिसमें उद्वेग नहीं होता और सुख में जो निस्पृह रहता है ; जिसमें राग भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं ; ऐसा व्यक्ति स्थिर बुद्धि कहा जाता है . ’ – गीता (2.56)
    • यह विवरण एक पंहुची हुई स्थिति का है . अत : कोई सन्देह नहीं होना चाहिये कि क्रोध पर विजय पायी जा सकती है .
  • एक समग्र प्रणाली
    • सभी धर्म क्रोध पर विजय के तरीकों पर अपने - अपने मतानुसार ध्यान देते हैं .
    • लेकिन उचित होगा कि साधक एकीकृत प्रणाली का अनुसरण करें .
    • श्री कृष्ण , पतंजलि , बुद्ध और ईसा मसीह इस एकीकृत प्रणाली की दिशा बता सकते हैं .
  • उपयोगी प्रणाली
    • अपने अन्दर सबसे पहले सभी के प्रति सद्भावना , मैत्री , शांति और समभाव का विकास करें .
    • यह दिनचर्या में संस्कृत के श्लोकों और भगवान बुद्ध की बताई प्रार्थनाओं को समाहित कर किया जा सकता है .
    • अपनी जागृत अवस्था में नैसर्गिक अच्छाई , वैश्विक सद्भावना , सतत प्रसन्नता का प्रसार , कुटिलता , क्रोध और द्वेष के पूर्ण अभाव का भाव रखने का यत्न करें .
  • निर्धारित प्रणाली - प्रार्थना
    • ओम , सर्वत्र गहन शांति व्याप्त हो . सभी विघ्न - बाधाओं से मुक्त हों . सभी अच्छाई को प्राप्त करें . सभी सद्विचारों से प्रेरित हों . सभी हर स्थान पर प्रफुल्लित रहें . सभी प्रसन्न हों . सभी निरोग हों . किसी को कोई दुख न हो . कुटिल व्यक्ति सदाचारी बनें . सदाचारी परमानन्द प्राप्त करें . परमानन्द उन्हें सभी बन्धनों से मुक्त कर दे . सभी मुक्त व्यक्ति दूसरों को मुक्त करें .
    • यह मानसिक संकल्प आंतरिक शांति , सद्भाव और विश्व के प्रति समभाव से परिपुष्ट होगा .
  • यम और नियम का पालन
    • अक्रोध का अभ्यास हमारे अचेतन मन से उपजने वाले विघटन कारी विचारों से छिन्न - भिन्न हो जाता है .
    • इन विघटक शक्तियों को वश में करना जरूरी है . अन्यथा क्रोध पर विजय की कोशिशें कुण्ठित हो जायेंगी .
    • यह यम और नियम के अनुशासन के सतत पालन से हो सकता है .
    • यम में आते हैं : अहिंसा , सत्य , अस्तेय ( चोरी का अभाव ), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( किसी लोभ से प्रेरित उपहार को स्वीकार न करना ) .
    • नियम में निम्न का अभ्यास निहित है : बाहरी और भीतरी शुद्धता ( शौच ), संतोष , तप , स्वाध्याय और ईश्वर का पूजन .
    • ये अनुशासन व्यक्ति को मानसिक शुद्धता प्रदान करते हैं . इससे सही और पवित्र कार्य करने के लिये ऊर्जा मिलती है .
  • गायत्री के प्रभाव
    • गायत्री मंत्र बुद्धि को प्रकाशमय करने के लिये है .
    • केवल दैवी प्रेरणा से ही बुद्धि जान सकती है कि क्रोध पर विजय क्यों जरूरी है , उसे कैसे किया जा सकता है और उसके लिये अंतिम विजय तक ऊर्जा कहां से पाई जा सकती है .
    • हममें से कई आधे में ही छोड़ बैठते हैं , क्योंकि वे अपने आप में अचानक ऊर्जा का अभाव पाने लगते हैं .
  • सत्व की बहुलता की आवश्यकता है
    • अबतक बताये अभ्यास के बाद हम क्रोध पर विजय के सबसे प्रभावी तरीके पर अमल की ओर बढ़ सकते है .
    • और वह तरीका अपने में सत्वगुण के विकास का है .
    • जब हममें रजस और तमस का बाहुल्य होता है तब हम अपने में से राग और द्वेष को नहीं निकाल सकते .
    • राग और द्वेष क्रोध के मूल हैं .
    • जब तक हममें सत्व उन्मीलित दशा में है , हम क्रोध पर विजय नहीं पा सकते .
  • एकात्मता की जड़ें
    • अगर आप क्रोध पर विजय पाना चाहते हैं तो दूसरों में क्रोध न उपजायें .
    • अत : एकता , शांति और समरसता के लिये सोचना , कहना और कार्य करना सीखें .
    • अगर कोई अपने पड़ोसी के घर में आग लगाता है तो वह अपने घर को जलने से नहीं बचा सकता .
  • एकात्मता की जड़ें ...2
    • बुद्ध ने बताया है कि एकात्मता चेतना के 6 चरणों पर निर्भर करती है :
      • अपने साथ वालों से भाईचारे के व्यवहार पर .
      • पूरी निष्ठा से कहे जाने वाले सद्भावना के वचनों पर .
      • पूरी निष्ठा से सद्भावना के विचारों पर यकीन करने से .
      • अपने पास के अंतिम अन्न के टुकड़े को भी दूसरों से बांटने से .
      • अपने उच्च और दोष रहित जीवन को दूसरों के साथ जीने से .
      • अपने पास के सभी दुर्गुणों को अपने पवित्र प्रेम से दूर करने से .
  • अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...1
    • दिन प्रारम्भ करने के पहले घर पर अकेले चुपचाप बैठें .
      • आज दिन में जिन परिस्थितियों और लोगों से सामना होना है , उनपर विचार करें .
      • उन सभी प्रिय और अप्रिय बातों , उद्वेगों , वासनाओं और परेशानियों के बारे में सोचें जो सामने आ सकती हैं .
      • क्रोध से निपटने की तैयारी पहले से करें . तैयारी करें कि विस्फोटक स्थितियों को बिना विस्फोट किये कैसे सम्भाला जायेगा .
      • अपने में सतत मधुर मैत्री पूर्ण भाव को उपजाने का यत्न करें . यह लोगों के स्नायुओं को परेशान करने की बजाय उन्हें मरहम प्रदान करेगा .
  • अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...2
    • अपने में जीवंत हास्य को बनाये रखें और जीवन के विनोद पक्ष को हमेशा देखने का प्रयास करें .
    • बोलने में संयम सदैव क्रोध पर विजय में सहायक होता है .
      • अप्रिय वचन बोलने से – घर और बाहर दोनों जगह बचें .
      • जो लोग कट्टर विचार रखते हों , उनसे विवादास्पद विषयों पर चर्चा से बचें .
      • बोलने में संयम का सूत्र है – सत्य - हितकारी - प्रिय शब्दों का प्रयोग करना .
      • ज्यादा सुनें , कम बोलें और विषय पर ही बोलें .
  • अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...3
    • क्रोध का प्रत्युत्तर कैसे दें ?
      • क्रोध को ईन्धन न उपलब्ध करायें .
      • याद रखें ; जैसे आग के लिये पेट्रोल है , वैसे क्रोध के लिये क्रोध है . जैसे आग के लिये पानी है , वैसे क्रोध के लिये विनम्रता है .
      • बुद्ध का कहा मानें : “ मानव क्रोध को विनम्रता से जीते .” विनम्रता बम से ज्यादा शक्तिशाली है .
      • बुद्ध कहते हैं : “ अगर तुम अपना दर्प अलग नहीं कर सकते तो तुम अपना क्रोध नहीं छोड़ सकते .”
      • दर्प के मूल में अहंकार है . जब अहंकार को निकाल दिया जाता है , तब क्रोध निकल जाता है .
      • धैर्य से क्रोध को सहन करें . विनम्रता से क्रोध पर विजय प्राप्त करें .
  • अक्रोध के लिये नित्य जीवन की नियोजित तैयारी ...4
    • क्रोध का सीमित और यदा - कदा प्रयोग का यत्न छोड़ दें .
      • जैसे कि सीमित कौमार्य का कोई अर्थ नहीं है , वैसे ही तर्कसंगत क्रोध का कोई अस्तित्व नहीं है .
      • बुद्ध चेतावनी देते हैं : ‘ शरीर , वचन और मन के क्रोध से सावधान रहो . अपने शरीर , जिह्वा और मन पर संयम करो .’
  • क्रोध की विस्फोटक स्थितियों का सामना कैसे करें ?
    • जब प्रश्न ‘मेरे क्रोध’ का न हो वरन मैं स्वयं क्रोध बन गया होऊं , तब क्या किया जाये ?
      • वैसा करें जैसा ईसाई साधू करते थे : जब आपमें क्रोध का तूफान चल रहा हो , तब अपने हृदय में सो रहे ईश्वर का आह्वान करें . वे जागेंगे और क्रोध के बवण्डर को शांत कर देंगे .
      • पतंजलि ने सिखाया है : क्रोध की लहरें शांत करने के लिये अपने में प्रेम की लहरें उठाओ .
  • क्रोध की विस्फोटक स्थितियों का सामना कैसे करें ?...2
    • कुछ अन्य सुझाव हैं :
      • जिसपर आपने क्रोध का विस्फोट किया हो , उससे बिना समय गंवाये दैन्यभाव ( meekness ) प्रदर्शित करें .
      • कभी भी क्रोध को अपने हृदय पर साम्राज्य स्थापित न करने दें .
      • क्रोध में कोई कदम उठाने में देरी करें . चेहरे पर क्रोध छलकाने से बचें . क्रोध छ्लक आया हो तो कटु शब्द बोलने से बचें . कटु बोल गये हों तो हाथ उठाने से बचें . पर अगर आप हाथ उठा चुके हों तो बिना समय गंवाये आंसू पोंछें और पूरी ईमानदारी और विनम्रता से क्षमा याचना करें .
      • ईश्वर सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं . इन जीवित मन्दिरों को तुच्छ निर्जीव वस्तुयें मत समझें .
  • विस्फोटक स्थितियों के फिर आने को कैसे रोकें ?
    • शांति के समय में अपने को प्रर्थनायुक्त मधुरता , अगाध शांति , दैन्यभाव और सौम्यता से भर दें .
    • क्रोध न रोक पाने के लिये अपने आप पर बहुत कड़ाई से पेश न आयें . अपने आप को पूरी निष्ठा और सौम्यता से संभालें .
    • दूसरों में गलतियां ढ़ूंढ़ने की प्रवृत्ति से बचें . अपनी कमियां देखें . ईश्वर से उन्हें दूर करने में सहायता मांगें . पर अपनी या औरों की गलतियों पर बहुत ज्यादा न सोचें .
    • अहंकार , अपने को सही मानने की वृत्ति , और स्वार्थ को निकाल बाहर फैंकें .
  • विस्फोटक स्थितियों के फिर आने को कैसे रोकें ?...2
    • औरों के लिये अपनी समझ में स्थान रखें . उन लोगों को समझने का यत्न करें ; जो आपको उद्वेलित करते हैं . उनके लिये प्रार्थना करें .
    • द्वन्द्व की अवस्था में मूलभूत तत्वों की खोज करें . छोटे तत्व को बड़े तत्व के सामने त्यागने का भाव रखें .
    • अपने में व अपने आसपास सतर्कता का भाव रखें . बुराई को अपने अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर न जाने दें .
    • अपने में मधुर विवेक विकसित करें .
  • अक्रोध में दृढ़ता से और अनंतिम रूप से कैसे बने रहें ?
    • जीव की एक अवस्था है जिसमें यह कहा जा सकता है कि उसे क्रोध पर पूर्ण प्रभुत्व मिल गया है .
    • आत्म ज्ञान से व्यक्ति अक्रोध की अवस्था में स्थिर हो जाता है .
    • गीता ( अध्याय 5,6) में वैराज्ञ और ध्यान के विषय बताते हुये इस अवस्था को पाने के तरीके बताये गये हैं .
    • जब व्यक्ति अपने को सब में और सब को अपने में अनुभूत करने लगता है , तब वह सदा - सदा के लिये क्रोध हीन हो जाता है . वह क्रोध से ऊपर उठ कर शांति और समभाव में स्थित हो जाता है .
  • समाप्त