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Shri krishnadarshan

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  • 1. प्रात् स्भयणीम ऩूज्मऩाद सॊत श्री आसायाभजी फाऩू के सत्सॊग-प्रवचन श्रीकृष्ण दर्शन ननवेदन जजतना भनुष्म जन्भ दरब है उससे बी ज्मादा भनुष्मता दरब है औय उससे बी ज्मादा ु श ु श भानुषी र्यीय से, भन से, फुद्धि से ऩाय ऩयभात्भदे व का साऺात्काय दरब है । श्रीकृष्ण क अवताय ु श े से मह ऩयभ दरब कामश सहज सुरब हो ऩामा। याजसी वातावयण भें , मुि क भैदान भें ु श े ककॊकर्त्शव्मभूढ़ अवस्था भें ऩडा अजन आत्भऻान ऩाकय – 'नद्शो भोह् स्भनतरशब्धा' – अऩने आत्भ- ुश ृ वैबव को ऩाकय साये कभशफन्धनों से छट गमा। जीते जी भुक्ति का ऐसा दरब अनुबव कय ऩामा। ू ु श श्रीकृष्ण को अगय भानुषी दृद्धद्श से दे खा जामे तो वे आदर्श ऩुरूष थे। उनका उद्देश्म था भनुष्मत्व का आदर्श उऩजस्थत कयना। भनुष्म व्मावहारयक भोह-भभता से ग्रस्त न होकय, धभाशनुद्षान कयता हुआ दरब ऐसे ु श आत्भफोध को ऩा रे, इस हे तु भनुष्म भें र्ौमश, वीमश, प्राणफर की आवश्मकता है । इस छोटे से ग्रॊथ भें सॊग्रहहत प्रात् स्भयणीम ऩूज्मऩाद सॊत श्री आसायाभजी फाऩू क अनुबवससि प्रमोग औय े उऩदे र्ों से हभायी प्राणर्क्ति, जीवनर्क्ति, भन्र्क्ति औय फुद्धि का द्धवकास कयक हभ इहरोक औय े ऩयरोक भें ऊचे सर्खयों को सय कय सकते हैं। औय तीव्र द्धववेक-वैयाग्मसम्ऩन्न जजऻासु रोकातीत, ॉ दे र्ातीत, कारातीत अऩना आत्भ-साऺात्काय का दरब अनुबव ऩाने भें अग्रसय हो सकता है । ु श आज हभ सफ बी यजो-तभोगुणी वातावयण भें ऩनऩे हैं औय घसीटे जा यहे हैं। बीतय द्धवकायों-आकाॊऺाओॊ का मुि भचा है । इस सभम श्रीकृष्ण की रीरा, चरयत्र, ऻानोऩदे र्, प्राणोऩासना, जीवनमोग औय द्धवसबन्न प्रसॊगों ऩय अनुबव-प्रकार् डारते हुए प्रात्स्भयणीम ऩूज्मऩाद सॊत श्री आसायाभजी फाऩू ने आज क भानव की आवश्मकता अनुसाय ऩथ-प्रदर्शन ककमा े है । सॊतों क वचनों को सरद्धऩफि कयक सऻ ऩाठकों क कयकभरों भें अद्धऩशत कयते हैं। े े ु े श्री मोग वेदान्त ससभनत अभदावाद आश्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
  • 2. अनुक्रभ ननवेदन............................................................................................................................................... 2 श्रीकृष्ण-दर्शन ...................................................................................................................................... 3 अवताय ............................................................................................................................................... 9 श्रीकृष्ण औय रूजमभणी ....................................................................................................................... 15 हययामदासजी भहायाज औय फादर्ाह ..................................................................................................... 30 जीवनमोग......................................................................................................................................... 33 वेदभासर ब्राह्मण की आत्भोऩरजब्ध........................................................................................................ 53 अदबत प्राणोऩासना............................................................................................................................ 63 ु अनठी भहहभा...... सत्सॊग की औय सदगरू की ...................................................................................... 75 ू ु ऩूणाशवताय श्रीकृष्ण.............................................................................................................................. 77 ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ श्रीकृष्ण-दर्शन बगवान श्रीकृष्ण ने जेर भें प्रकट होना ऩसॊद ककमा। योहहणी नऺत्र, श्रावण क कृष्णऩऺ े की अद्शभी, अन्धकायभम यात्रत्र औय वह बी भध्मयात्रत्र। जो ननत्म, भुि, प्रकार्भम है वह अन्धकाय की यात्रत्र ऩसॊद कय रेता है । जो घट-घटवासी है वह कायावास को ऩसॊद कय रेता है । जो ननत्म है , ननयॊ जन है , अगभ है , अगोचय है वह साकाय नन्हा-भुन्ना रूऩ स्वीकाय कय रेता है । बगवान की मह गरयभा है , भहहभा है कक वे फन्धन भें ऩडे हुए को भुि कय दें , त्रफछडे हुए ु को सभरा दें , अऻानी को ऻान दे दें । र्ोकातुयों का र्ोक ननवर्त् कयने क सरए फॉसी फजानी ऩडे ृ े मा फछडे की ऩॉूछ ऩकडनी ऩडे कपय बी उनको कोई फाधा नहीॊ आती। बगवान को कोई बी काभ छोटा नहीॊ रगता। जजसे कोई सेवाकामश छोटा न रगे वही तो वास्तव भें फडा है । श्रीकृष्ण क जीवन भें ऐसे-ऐसे उताय औय चढ़ाव आते हैं कक जजनको सभझने से हभाये नय े जीवन भें नायामण का प्रकार् हो जाम। श्रीकृष्ण जफ कयीफ 70 सार क थे तफ घोय आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ भें गमे। तेयह वषश े े उन्होंने एकान्त भें उऩननषदों का अभ्मास ककमा। छान्दोग्म उऩननषद (3.17.6) भें मह कथा आती है । श्रीकृष्ण क जीवन भें ऻान बी अव्वर नॊफय का था। मुि क भैदान भें उन्होंने बगवद् े े ऻान फयसामा है । उनक जीवन भें उताय-चढ़ाव बी कसे आमे ! े ै बगवान क जीवन का एक दृश्म औय दे खो। कारमवन की सायी सॊऩद्धर्त् हागथमों, े फैरगाक्तडमों, बैंसों, घोडों औय गधों ऩय रादकय मदवॊर्ी द्रायका जा यहे थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कक ु
  • 3. मह सॊऩद्धर्त् हभाये घय भें जामेगी तो कछ न कछ हानन ऩहुॉचाएगी। हभाये कर क रोगों की सॊऩद्धर्त् ु ु ु े फढ़े गी तो उनभें द्धवराससता आ जामेगी। ऩरयश्रभ कयक सॊऩद्धर्त्, धन-दौरत सभरे तो ठीक, अगय े ऐसे ही सभर जाम तो जीवन को द्धवरासी फना दे ती है , खोखरा कय दे ती है । इससरए श्रीकृष्ण ने जयासॊघ को छे ड हदमा तो उसने मदवॊसर्मों ऩय आक्रभण कय हदमा। ु उनकी सायी सॊऩद्धर्त् छीन री। श्रीकृष्ण औय फरयाभ जयासन्ध का साभना कयना उगचत न सभझकय बाग ननकरे। हभाये ऩयभ प्रेभास्ऩद बगवान नॊगे ऩैय, नॊगे ससय बाग यहे हैं। साथ भें कवर एक धोती। े भाॉगकय खाते हैं, धयती ऩय सोते हैं, साधओॊ क आश्रभों भें यहते हैं, सत्सॊग कयते हैं। मह बी एक ु े झाॉकी है श्रीकृष्ण क जीवन की। े गगयनाय क ऩवशतों भें यहते थे, वहाॉ आग रगी तो वहाॉ से बी बागे औय सभद्र भें द्रायका े ु फसामी। उस नगयी ऩय बी र्ाल्व ने वाममान से आक्रभण ककमा। उनक ससय क घय भें डाका ु े ु े ऩडा, वे भाये गमे। उनक वहाॉ से स्मभॊतक भणण की चोयी हो गमी। स्वमॊ श्रीकृष्ण क ऊऩय भणण े े चयाने का आयोऩ रगामा गमा। फडे बाई फरयाभजी बी उन्हीॊ क ऊऩय र्ॊका की। बागवत भें स्वमॊ ु े श्रीकृष्ण कहते हैं- ककन्तु भाभग्रज् सम्मङ् न प्रत्मेनत भणणॊ प्रनत। 'फरयाभ जी भणण क फाये भें भेया द्धवद्वास नहीॊ कयते।' े जीवन भें ऐसे-ऐसे द्धवयोधी प्रसॊग आने ऩय बी श्रीकृष्ण क गचर्त् भें ऺोब नहीॊ हुआ। े श्रीकृष्ण सदा साध-सॊतों का सॊग कयते थे। घोय आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ भें वषों तक ु े उऩननषद का अध्ममन ककमा औय एकान्त-द्धवयिता भें यहे । दवाशसा जैसे ऋद्धष का आनतथ्म खफ ु ू प्रेभ से ककमा। जफकक श्रीकृष्ण क कर भें उत्ऩन्न हुए मदवॊर्ी साध-सॊतों की भजाक उडाते थे। े ु ु ु जाम्फवतीनन्दन साम्फ को स्त्री का वेर् ऩहनाकय कपय ऋद्धष से जाकय ऩूछते हैं कक, "भहायाज ! मह सुॊदयी गबशवती है । उसे फेटा होगा कक फेटी होगी ?" ऋद्धष ने कहा् "तुभ सॊतों की भजाक उडाते हो तो जाओ, न फेटा होगा न फेटा होगी। ऩेट ऩय जो भूसर फाॉधा है उसी से तुम्हाया सत्मानार् होगा।" ....तो श्रीकृष्ण साध-सॊतों का आदय कयते थे जफकक उनक कटुम्फीजन साध-सॊतों ू े ु ू की भजाक उडाते थे। श्रीकृष्ण तो सॊमभी होकय ब्रह्मानन्द भें यभण कयते थे औय उनक कर क रोग े ु े र्याफ ऩीते थे। श्रीकृष्ण क जीवन क चढ़ाव-उताय सभाज को मह फताते हैं कक तुम्हाया जन्भ अगय े े हथकक्तडमोंवारे भाॉ फाऩ क घय हो गमा हो तबी बी तुभ अऩने को दीन हीन भत भानना। े हे जीव ! तेया जन्भ अगय कायावास भें हो गमा हो तबी बी तू गचन्ता भत कय। अऩने आन्तरयक हदव्मत्व को जगा। उन्नत कामश कय। सत्सॊग कय। सभागध रगा। धभश, नीनत औय आत्भऻान क अनकर आचयण कय। अऩने छऩे हुए बगवदबाव को प्रकट कय ममोंकक तू भेया े ु ू ु
  • 4. स्वरूऩ है । तेये कटुम्फी तेये द्धवयोधी हों कपय बी तू घफडाना नहीॊ। कबी भाभा से बानजे की ु अनफन हो जाम औय दोनों का मुि हो जाम, भाभा चर फसे तबी बी गचन्ता, दीनता, हीनता भहसूस नहीॊ कयना। तेये ऩरयवाय वारे तेये कहने भें न चरें तबी बी तू ननयार् नहीॊ होना। जयासॊध जैसा याजा तुझसे मुि कये तो तू वीय होकय उसका भुकाफरा कयना। सत्रह-सत्रह फाय श्रीकृष्ण ने जयासॊध को बगामा। अठायहवीॊ फाय श्रीकृष्ण स्वमॊ जानफूझकय बागे। उनक बागे भें े बी राब था। अऩने कटुम्फीजनों को सफक ससखाना था। ु श्रीकृष्ण क जीवन भें कबी हतार्ा नहीॊ आमी, कबी ननयार्ा नहीॊ आमी, कबी ऩरामनवाद े नहीॊ आमा, कबी उद्रे ग नहीॊ आमा, कबी गचन्ता नहीॊ आमी, कबी बम नहीॊ आमा, कबी र्ोक नहीॊ आमा, कबी द्धवषाद नहीॊ आमा औय कबी ऺुद्र अहॊ काय नहीॊ आमा कक मह दे ह भैं हूॉ। अजन्तभ सभम भें श्रीकृष्ण क कटुजम्फमों की भनत ऋद्धष क र्ाऩ से द्धवऩयीत हो गई औय े ु े आऩस भें रड भये । श्रीकृष्ण का बी अऩभान कय हदमा, कछ का कछ सना हदमा, कपय बी ु ु ु श्रीकृष्ण क गचर्त् भें ऺोब नहीॊ हुआ। े उनका भत्मु बी कसा ? उनका दे हद्धवरम सभागध कयते हुए मा ऩरॊग ऩय आयाभ कयते- ृ ै कयते प्राण छोडे मा तुरसीदर भॉुह भें डारकय प्राण छोडे ऐसा नहीॊ हुआ। एक फहे सरमे ने फाण भाया। आणखयी घक्तडमाॉ हैं तफ बी उनक गचर्त् की सभता नहीॊ जाती। फाण भायने वारे को बी े ऺभा कयते हुए फोरते हैं- "तू गचन्ता भत कयना। ऐसा ही होने वारा था। ननमनत भें जो होना ननजद्ळत हुआ था वही हुआ।" श्रीकृष्ण ने इजन्द्रमों को भन भें रगा हदमा, भन को फुद्धि भें औय फुद्धि को अऩने र्ुि-फुि गचदघन चैतन्म आत्भा क गचन्तन भें रगाकय करेवय त्माग हदमा। े श्रीकृष्ण का जो प्रागटम है वह नय को अऩने नायामण स्वबाव भें जगाने का प्रागटम है । जन्भाद्शभी एक ऐसा उत्सव है कक ककतना बी हाया थका जीव हो, उसे अऩने बीतय क यस, प्रेभ े को प्रकटाने की प्रेयणा सभर जाम। हॉ सते-खेरते, प्रेभ को छरकाते, फाॉटते-फयसाते, अहॊ कारयमों को औय र्ोषकों को सफक ससखाते, थक-भाॊदे-असहामों को सहाया दे ते, ननफशरों भें फर पकते, सभाज े ॉू भें आध्माजत्भक क्राॊनत कयते हुए, नय को अऩने नायामण स्वरूऩ भें ऩहुॉचाने का अदबुत सपर प्रमास श्रीकृष्ण-रीरा से हुआ। मह कृष्ण-अवतयण योहहणी नऺत्र भें हुआ। भध्मयात्रत्र क घोय अन्धकाय भें बी बगवान ने े प्रकार् कय हदमा। जो कद से फाहय आ जामें वे बगवान हैं। हभ बी तो कद भें फैठे हैं , जैसे ै ै वसुदेव-दे वकी कस की जेर भें फन्द थे। हभाया बी जीवरूऩी वसुदेव औय फद्धिरूऩी दे वकी ॊ ु दे हासबभान क कायावास भें ऩडे हैं। हभ हाड-भाॊस क र्यीय भें फन्द हैं। इस कद से हभ फाहय आ े े ै जामें। इस दे ह को 'भैं' भानने की गरती से फाहय आ जामें। इस दे ह की उऩरजब्धमाॉ दे ह के द्धवमोग वास्तव भें हभाये आत्भा ऩय कोई प्रबाव नहीॊ डारते हैं। इस फात का ऻान हो जाम तो
  • 5. जोगी का जोग, तऩी का तऩ, जऩी का जऩ औय सदगहस्थ का सदाचायमुि जीवन सपर हो ृ जाता है । भनुष्म अगय तत्ऩय हो जाम तो द्ख खोजने ऩय ु बी नहीॊ सभरेगा। सत्म को सभझने के सरए, अऩने को खोजने क सरए अगय वह तत्ऩय हो जाम तो द्ख खोजने ऩय नहीॊ सभरेगा। हभ े ु अऩनी अससरमत को खोजने भें तत्ऩय नहीॊ हैं अत् सुखी होने क सरए खफ मत्न कयते हैं। सुफह े ू से र्ाभ तक औय जीवन से भौत तक प्राणीभात्र मह कयता है ् द्ख को हटाना औय सुख को ु थाभना। धन कभाते हैं तो बी सख क सरमे, धन खचश कयते हैं तो बी सख क सरमे। र्ादी कयते ु े ु े हैं तो बी सख क सरए औय ऩत्नी को भामक बेजते हैं तो बी सख क सरमे। ऩत्नी क सरमे हीया- ु े े ु े े जवाहयात रे आते हैं तो बी सख क सरमे औय तराक बी दे ते हैं तो बी सख क सरमे। प्राणीभात्र ु े ु े जो कछ चेद्शा कयता है वह सख क सरए ही कयता है । सख को थाभना औय द्ख को हटाना। ु ु े ु ु कपय बी दे खा जामे तो आदभी द्खी ही द्खी है ममोंकक जहाॉ सख है वहाॉ उसने खोज नहीॊ की। ु ु ु जहाॉ द्ख का प्रवेर् नहीॊ उस आत्भा भें जीव जाता नहीॊ। बगवान हभाये ऩयभ सुरृद हैं। उन ऩयभ ु सुरृद क उऩदे र् को सुनकय अगय जीव बीतय अऩने स्वरूऩ भें जाम तो सुख औय द्ख की चोटों े ु से ऩये ऩयभानन्द का अनुबव हो जाम। श्रीकृष्ण सॊगधदत होकय गमे। मुि टारने की कोसर्र् की, मुि टरा नहीॊ। सॊगध न हो ऩामी ू कपय बी बीष्भ का सत्काय ककमा, भान हदमा। 'भैं सॊगध कयने गमा.... भेयी फात मे रोग नहीॊ भानते....' ऐसा सभझकय उनको चोट नहीॊ रगी। चोट हभेर्ा अहॊ काय को रगती है , आत्भा को नहीॊ रगती। द्ख हभेर्ा अहॊ काय को होता है , भन को होता है , आत्भा को नहीॊ होता। साधायण ु जीव भन भें जीते हैं औय उन साधायण जीवों को अऩने सर्वत्व का ऻान कयाने क सरए बगवान े को जो आद्धवबाशव हुआ उसे फोरते हैं कृष्णावताय। भैंने सुनी है एक कहानी। एक फाय अॊगूय औय कये रों की भुराकात हुई। अॊगूयों ने कहा् "हभ ककतने भीठे -भधय औयु स्वाहदद्श हैं। हभको दे खकय रोगों क भॉुह भें ऩानी आ जाता है । तभ तो कडुवे कडुवे कये रे।" े ु कये रों ने कहा् "फस फस, चऩ फैठो। तुभको दे खकय रोगों क भन की रोरुऩता फढ़ ु े जाती है । तुम्हाया स्वाद रेते हैं, भजा रेते हैं तो उनको सूइमाॉ (इन्जैमर्न) चबानी ऩडती हैं। ु रोग फीभाय होते हैं, भधप्रभेह (डामत्रफटीज़) हो जाता है । हभ जफ रोगों की जजह्वा ऩय जाते हैं तो ु कडुवे जरूय रगते हैं, ककन्तु रोगों भें स्पनतश रे आते हैं, डामत्रफटीज़ को भाय बगाते हैं औय ू तन्दरूस्ती का दान कयते हैं। रगते कडुवे हैं ऩय काभ फहढ़मा कयते हैं।'' ु कबी-कबी कोई प्रसॊग, कोई द्ख आ जाता है तो रगता कडुवा है ऩय वह द्ख बी ु ु सत्सॊग भें बेज दे ता है । सॊसाय की सभस्माएॉ बी हरय क चयणों तक ऩहुॉचा दे ती हैं। द्ख आमे े ु तफ सभझ रेना कक वह कये रे का काभ कयता है ।
  • 6. हभ भीठी-भीठी कथाएॉ सुने, भीठे -भीठे चटकरे सुनें, अच्छा-अच्छा रगे वह सुनें, दे खें, ु ु खामे, द्धऩमें – मह तो सफ ठीक रेककन कबी-कबी ब्रह्मऻान की सूक्ष्भ फात बी सुनना चाहहए। सभझ भें न आमे तफ बी सुनना चाहहए। अच्छा न रगे तफ बी स्वास्थ्म-सुयऺा क सरए े भधप्रभेहवारों को कये रे का यस ऩीना ऩडता है । ऐसे ही जन्भ भयण की डामत्रफटीज़ रगी है तो ु साधन-बजनरूऩी कये रों का यस अच्छा न रगे तफ बी आदय से ऩीना चाहहए। जफ व्मास जी फोरते हैं, नायदजी फोरते हैं, बगवान फोरते हैं, र्ास्त्र फोरते हैं वह सफ भीठा भीठा ही रगे मह जरूयी नहीॊ है । फद्धि की सक्ष्भता कसी होगी ? विा जजतना ऊचा है , ु ू ै ॉ भहान ् है , उन्नत है औय श्रोता बी फहढ़मा मोग्मता वारा है तो उन दोनों क फीच का सॊवाद हभ े रोगों क सरए उन्ननत कयने वारा है । चक्रभ की कथाएॉ, नावेर औय साधायण ककस्से-कहाननमाॉ- े कथाएॉ ऩढ़ें -सनें तो वे अच्छे तो रगते हैं भगय फद्धि को स्थर फना दे ते हैं। उऩननषद, ब्रह्मसत्र ु ु ू ू आहद कहठन तो रगते हैं भगय फद्धि को सक्ष्भ फना दे ते हैं औय सक्ष्भ फद्धि ही ठीक आजत्भक ु ू ू ु प्रकार् ऩा सकती है । बगवान की कथा जफ ऩढ़ते हैं , फोरते हैं, सुनते हैं उस सभम बीतय अन्त्कयण धरता ु है , गचर्त् भें प्रसन्नता आती है , विा की कर्रता से श्रोताओॊ भें आत्भानन्द छरकता है । भानो ु कबी उफासी बी आमे कपय बी बगवान की कथा, हरयचचाश, सत्सॊग कल्माणकायी है । बगवान श्रीकृष्ण की रीराएॉ फडी अनूठी है । उनक जीवन क चढ़ाव उताय से जीव को े े सीखने को सभरता है कक हभाये जीवन भें बी उताय चढ़ाव आ जाम तो ममा फडी फात है ? जफ सोरह कराधायी ऩूणाशवताय बगवान श्रीकृष्ण क कटुम्फी उनक द्धवयोधी हो सकते हैं तो हभायी े ु े श्रीभती, हभाये श्रीभान मा फेटा-फेटी हभाया कहा नहीॊ भानते तो ममा फडी फात है ? श्रीकृष्ण भें इतनी र्क्ति थी कक सत्रह फाय जयासॊध को भाय बगामा कपय बी अठायहवाॉ फाय खद को बागना ु ऩडा तो कबी-कबी हभें बी घय छोडकय, गाॉव छोडकय कहीॊ औय जगह जाना ऩडे त ममा हो गमा ? "फाऩू ! भेयी फदरी होती है । भझे अऩना घय, गाॉव छोडना ऩडता है ।" ु अये , तेये बगवान को बी छोडना ऩडा था तो तू ममों घफडाता है ? हाये हुए जीव को बगवान की रीराओॊ से आद्वासन सभर जाता है । उदास को प्रेभ का दान सभर जाता है । अहॊ कायी को ननयहॊ कायी होने का सफक सभर जाता है । कहाॉ सॊकल्ऩ भात्र से उथर-ऩथर कय दे ने का साभथ्मश यखने वारे श्रीकृष्ण औय कहाॉ नॊगे ु ऩैय, नॊगे ससय, एक ही धोती भें तीन भहीने तक उनका ऋद्धषमों क आश्रभ भें यहना। टुकडा े भाॉगकय खामा औय सत्सॊग सुना। तेयह वषश घोय आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ भें उऩननषदों का े अध्ममन ककमा औय द्धवयि जीवन जजमे एकान्त भें । एकान्त भें द्धवयि जीवन जीने से मोग्मता फढ़ती है , र्क्ति फढ़ती है । श्रीकृष्ण का प्रबाव फढ़ गमा, साभथ्मश फढ़ गमा, मर् फढ़ गमा। घोय
  • 7. आॊगगयस ऋद्धष क आश्रभ का एकान्तवास औय उऩननषद का अध्ममन मुि क भैदान भें बगवद् े े गीता होकय प्रकट हो गमा। श्रीकृष्ण क चरयत्र भहाबायत भें , हरयवॊर्ऩुयाण भें ब्रह्मवैवतशऩुयाण भें , बागवत भें आते हैं। े उन चरयत्रों से आऩ अऩने खटकने वारे जो बाव जीवन भें हैं उनको हटाकय, सॊसाय की ऩरयवतशनर्ीरता को सभझकय, अऩने अऩरयवतशनर्ीर कटस्थ आत्भा को ऩहचान कय आऩ बी ू श्रीकृष्ण-तत्त्व का साऺात्काय कये । इससरए श्रीकृष्ण-जन्भाद्शभी का उत्सव होता है । श्रीकृष्ण का जीवन सवाांगी द्धवकससत है । उन्हें चाय वेदों का ऻान है । गीता वेदों का प्रसाद है , उऩननषदों का ऻान है । चाय वेद हैं- ऋगवेद, मजवेद, साभवेद औय अथवशवेद। चाय उऩवेद हैं- ु आमवेद, धनवेद, स्थाऩत्मवेद औय गाॊधवशवेद। आमवेद भें बी श्रीकृष्ण कर्र थे। आयोग्म क ु ु ु ु े ससिान्त फहढ़मा जानते थे। गीता भें बी उन्होंने कहा् मुिाहायद्धवहायस्म मुिचेद्शस्म कभशसु। मुिस्वप्नाफोधस्म मोगो बवनत द्खहा।। ु 'द्खों का नार् कयने वारा मोग तो मथामोग्म आहाय-द्धवहाय कयने वारे का, कभों भें ु मथामोग्म चेद्शा कयने वारे का औय मथामोग्म सोने तथा जागने वारे का ही ससि होता है ।' (बगवद् गीता् 6.17) मुि क भैदान भें बी तॊदरूस्ती की तयप इर्ाया कय हदमा। मुि भें थक, भाॊदे, घावों से े ु े बये घोडों को र्ाभ क सभम ऐसी भयहभऩट्टी ऐसी भासरर् कयते थे कक दसये हदन वे कपय से े ू बागदौड कयने क सरए तैमाय हो जाते थे। े धनुद्धवशद्या, र्स्त्रद्धवद्या भें बी वे अदबुत थे। सत्रह फाय जयासॊध को त्रफना र्स्त्र ही हया हदमा। मुि की द्धवद्या भें ऐसे कर्र थे। याजनीनत भें बी अव्वर नॊफय थे। ु स्थाऩत्म वेद का ऻान बी श्रीकृष्ण भें खफ था। द्रारयका नगयी फनामी। यथों क चरने की ू े सडक अरग, ऩैदर जाने वारों का यास्ता अरग। फीच भें फगीचे, द्धवश्राभगह, प्माऊ आहद। आदभी ृ को वैकण्ठ जैसा सुख सभरे ऐसी यचना थी, ऐसा सुन्दय नमर्ा फनामा, फडी अनूठी द्रारयका ु फसामी। गाॊधवशवेद भें बी उन्होंने अऩनी कर्रता हदखामी। गाॊधवशवेद भें नत्म, गीत औय वाद्य होते ु ृ हैं, गाना-फजाना होता है । फजाना बी दो प्रकाय का होता है ् एक ठोककय फजामा जाता है , जैसे तफरा, ढोरक, भॊजीया आहद। दसया पककय फजामा जाता है , जैसे फॉसी, त्रफगुर, तुयी, र्हनाई ू ॉू आहद। ठोककय फजाने वारे वाद्यों से पककय फजामे जाने वारे वाद्य अच्छे भाने जाते हैं। उसभें ॉू बी फॉसी फहढ़मा है । श्रीकृष्ण फॉसी ऐसी फजाते कक जो दध क सरए द्धवयह भें छटऩटाने वारे फछडे भाॉ आने ऩय ू े दध ऩीने रगते वे श्रीकृष्ण की फॉसी सुनकय दध ऩीना बूर जाते औय फॉसी का सुख ऩाकय तन्भम ू ू
  • 8. हो जाते। श्रीकृष्ण अऩनी फॉसी भें अऩने ऐसे प्राण पकते, प्रेभ पकते कक सुनने वारों क गचर्त् ॉू ॉू े चया रेते। ु अनुक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अवताय जीव का जीवन सवाांगी द्धवकससत हो इससरए बगवान क अवताय होते हैं। उस सभम उन े अवतायों से तो जीव को प्रेयणा सभरती है , हजायों वषों क फाद बी प्रेयणा सभरती यहती है । े ईद्वय क कई अवताय भाने गमे हैं- ननत्म अवताय, नैसभद्धर्त्क अवताय, आवेर् अवताय, े प्रवेर् अवताय, स्पनतश अवताय, आद्धवबाशव अवताय, अन्तमाशभी रूऩ से अवताय, द्धवबूनत अवताय, ू आमुध अवताय आहद। बगवान की अनन्त-अनन्त कराएॉ जजस बगवान की सभद्धद्श करा से स्परयत होती है , उन ु कराओॊ भें से कछ कराएॉ जो सॊसाय व्मवहाय को चराने भें ऩमाशद्ऱ हो जाती हैं वे सफ कराएॉ ु सभरकय सोरह होती हैं। इससरए बगवान श्रीकृष्ण को षोडर् कराधायी बी कहते हैं औय ऩूणाशवताय बी कहते हैं। वास्तव भें , बगवान भें सोरह कराएॉ ही हैं ऐसी फात नहीॊ है । अनन्त- अनन्त कराओॊ का सागय है वह। कपय बी हभाये जीवन को मा इस जगत को चराने क सरए े बगवान ऩयब्रह्म ऩयभात्भा, सजच्चदानन्द की सोरह कराएॉ ऩमाशद्ऱ होती हैं। कबी दस कराओॊ से प्रकट होने की आवश्मकता ऩडती है तो कबी दो कराओॊ से काभ चर जाता है , कबी एक करा से। एक करा से बी कभ भें जफ काभ चर जाता है , ऐसा जफ अवताय होता है उसे अॊर्ावताय कहते हैं। उससे बी कभ करा से काभ कयना होता है तो उसे द्धवबूनत अवताय कहते हैं। अवताय का अथश ममा है ? अवतयनत इनत अवताय्। जो अवतयण कये , जो ऊऩय से नीचे आमे। कहाॉ तो ऩयात्ऩय ऩयब्रह्म, ननगुण, ननयाकाय, सत ् गचत ् आनन्द, अव्मि, अजन्भा.... औय वह जन्भ रेकय आमे ! श अव्मि व्मि हो जाम ! अजन्भा जन्भ को स्वीकाय कय रे , अकर्त्ाश कतत्व को स्वीकाय कय रे, शृ अबोिा बोग को स्वीकाय कय रे। मह अवताय है । अवतयनत इनत अवताय्। ऊऩय से नीचे आना। जो र्ुि फुि ननयाकाय हो वह साकाय हो जाम। जजसको कोई आवश्मकता नहीॊ वह छनछमन बयी छाछ ऩय नाचने रग जामे। जजसको कोई बगा न सक उसको बागने की रीरा े कयनी ऩडे। ऐसा अवताय भनष्म क सरए है , कल्माण क सरए है । ु े े बगवान का एक अवताय होता है प्रतीक अवताय, जैसे बि बगवान की प्रनतभा फना रेता है , जजस सभम बोग रगाता है , जो बोग रगाता है , जजस बाव से रगा दे ता है , ऩत्र, ऩष्ऩ औय ु जो कछ बी अऩशण कयता है उस रूऩ भें ग्रहण कयक वह बगवान अन्तमाशभी प्रनतभा अवताय भें ु े
  • 9. बि की बावना औय र्क्ति ऩुद्श कयते हैं। कबी बगवान की भूनतश से, प्रनतभा से, गचत्र से पर मा ू परभारा गगय ऩडी तो वह बि की ऩूजा स्वीकाय हो गई इसका सॊकत सभझा जाता है । ू े हभ जफ साधना कार क प्रायॊ ब भें ऩूजा कयते थे तफ कबी-कबी ऐसा होता था। पर की े ू भारा बगवान को चढ़ा दी, कपय ऩूजा भें तन्भम हो गमे। एकाएक भारा गगय ऩडी तो गचर्त् भें फडी प्रसन्नता होती कक दे व प्रसन्न हैं। प्रनतभा भें बगवद् फुद्धि कयक उऩासना की औय प्रनतभा से र्ाॊनत, आनॊद औय प्रेयणा े सभरने रगी। मह प्रनतभा अवताय। कोई श्रीकृष्ण की प्रनतभा यखता है कोई श्रीयाभ की की, कोई ककसी औय की। धन्ना जाट जैसे को ऩजण्डत जी ने बाॉग घोटने का ससरफट्टा दे हदमा 'मह ठाकयजी हैं' कहकय। धन्ना जाट ने उसभें बगवान की दृढ़ बावना की तो बगवान प्रकट हो गमे। ु बगवान प्रनतभा क द्राया हभायी उन्ननत कय दें , प्रनतभा क द्राया अवतरयत हो जामें उसको े े कहते हैं प्रनतभा अवताय। जजस प्रनतभा को आऩ श्रिा-बक्ति से ऩत्र-ऩष्ऩ अऩशण कयते हो, बोग ु रगाते हो, उस प्रनतभा से आऩको प्रेयणा सभरती है । अॊतमाशभी अवताय दो प्रकाय का होता है । सफक अॊतमाशभी बगवान सफको सर्त्ा-स्पनतश दे ते े ू हैं, कछ कहते नहीॊ। जन-साधायण क साथ बी बगवान हैं। वह उन्हें भाने चाहे न भाने, आजस्तक ु े हो मा नाजस्तक, बगवान को गासरमाॉ दे ता हो कपय बी बगवान उसकी आॉख को दे खने की सर्त्ा दे ते हैं, कान को सुनने की सर्त्ा दे ते हैं। ऩेट भें उसका बोजन ऩचाने को र्क्ति दे ते हैं। दयाचायी ु से दयाचायी, ऩाऩी से बी ऩाऩी, भहाऩाऩी हो उसको बी अऩनी सर्त्ा, स्पनतश औय चेतना दे ते हैं ु ू ममोंकक वे प्राणणभात्र क सुरृद हैं। वे सफको बीतय अॊतमाशभी आत्भा होकय फैठे हैं। 'मह दद्श भझे े ु ु भानता नहीॊ, बजता नहीॊ.... चरो उसक रृदम को फॊद कय दॉ ...' ऐसा बगवान 'नहीॊ' कबी नहीॊ े ू कहते। त्रफजरी का त्रफर दो भहीने तक नहीॊ बयो तो 'Connection Cut' हो जाता है , ककन्तु बगवान को दस सार तक सराभ न बयो, याभनाभ का त्रफर न बयो तो बी आऩको जीवन चेतना का Connection Cut नहीॊ होता। जजतने द्वास उसक बाग्म भें होते हैं उतने चरने दे ते हैं। मह बगवान े का अॊतमाशभी अवताय अॊतमाशभी सर्त्ा स्वरूऩ से सफ जनों क सरए होता है । बिजनों क सरए है े े अन्तमाशभी प्रेयणा अवताय। जो बि हैं, जो बक्ति कयते हैं , उनका अॊतमाशभी प्रेयक होता है , गचर्त् भें प्रेयणा दे ता है कक् 'अफ मह कयो, वह कयो। सावन का भहीना आमा है तो अनुद्षान कयो। इतने जऩ तऩ हो गम, अफ आत्भऻान क सत्सॊग भें जाओ। गुरूभुख फनो। ननगुये यहने से कोई काभ े नहीॊ फनेगा....' इस प्रकाय अॊतमाशभी बगवान प्रेयणा दे ते हैं। इस प्रकाय क बगवान क कई तयह क अवताय होते हैं। मुग-मुग भें , वि-वि ऩय, हय े े े हदर औय हय व्मक्ति की मोग्मता ऩय सबन्न-सबन्न प्रेयणा औय प्रकार् सभरे ऐसे अवताय होते हैं। श्रीकृष्ण का अवताय सोरह करा से सम्ऩन्न, सवाांगी द्धवकास कयाने वारा, सफ साधकों को, बिों को प्रकार् सभर सक, दजनों का दभन हो सक, भदोन्भर्त् याजाओॊ का भद चय कय े ु श े ू सक, भारी, कब्जा, दजी औय तभाभ साधायण जीवों ऩय अहै तकी कृऩा फयसा सक ऐसा ऩणश े ु ु े ू
  • 10. रीरा अवताय था। जो फॉधे हुए को छडा दे , ननयार् को आद्वासन दे , रूखे को यस से बय दे , ु प्मास को प्रेभ से बय दे ऐसा अवताय था श्रीकृष्ण का। कबी-कबी छोटे -भोटे काभ क सरए े आवेर्ावताय हो जाता है , कबी अॊर्ावताय हो जाता है , जैसे वाभन अवताय, नससॊह अवताय, ृ ऩयर्ुयाभ अवताय। कबी आमुधावताय हो जाते हैं। कबी सॊकल्ऩ ककमा औय बगवान क ऩास े आमुध आ जाता है , सुदर्शन चक्र आहद आ जाता है । ऩयात्ऩय ऩयब्रह्म की र्क्ति कबी अॊर्ावताय भें तो कबी आमुध-अवताय भें तो कबी सॊतों के रृदम द्राया सॊत-अवताय भें तो कबी कायक अवताय भें अवतरयत होते हुए भानव जात को अऩने उन्नत सर्खयों ऩय रे जाने का काभ कयती है । भानव अगय तत्ऩय होकय अऩने उन्नत सर्खयों ऩय ऩहुॉचे तो उसे सख औय द्ख दोनों हदखाई ऩडता है णखरवाड, उऩरजब्ध औय हानन दोनों ु ु हदखाई ऩडता है णखरवाड, र्यीय औय र्यीय क सम्फन्ध हदखाई ऩडते हैं णखरवाड। उसे अऩनी े आत्भा की सत्मता का अनबव हो जाता है । ु आत्भा की सत्मता का अनबव हो जामे तो ऐसा कोई आदभी नहीॊ जो द्ख खोजे औय ु ु उसे द्ख सभर जामे। ऐसा कोई आदभी नहीॊ जो भुि न हो। अऩने आत्भा की अनुबूनत हो जामे ु तो कपय आऩको द्ख नहीॊ होगा, आऩक सॊऩक भें आने वारे रोग बी ननदश ्ख जीवन जीने क ु े श ु े भागश ऩय आगे कच कय सकते हैं। ू श्रीकृष्ण को जो प्रेभ कये उसको तो वे प्रेभ दें ही, उनको जो दे खे नहीॊ उस ऩय बी प्रेभ से फयस ऩडे ऐसे श्रीकृष्ण दमारु थे। वे भथया भें गमे तो दजी से ग्वारफारों क कऩडे ठीक कयवा ु े कय उसका उिाय ककमा। ऩय कब्जा ? जजसने श्रीकृष्ण की ओय दे खा तक नहीॊ कपय बी उसका ु कल्माण कयना चक नहीॊ। ू े द्धवकायी व्मक्तिमों का, बोग-वासना भें पसे हुए रोगों का सॊऩक कयने वारी फुद्धि कब्जा है । ॉ श ु कब्जा छोटी जानत की थी। याजा-भहायाजाओॊ को तेर-भासरर् कयती, अॊगयाग रगाती, कस ु ॊ की चाकयी कयती। ऐसा उसका धॊधा था। श्रीकृष्ण का दर्शन कयने क सरए साया भथया उभड ऩडा था रेककन कब्जा कृष्ण क साथ े ु ु े ही ऩैदर जा यही है कपय बी आॉख उठाकय दे खती नहीॊ। श्रीकृष्ण तो उदायता का उदगध थे। उन्होंने सोचा् जफ इतने साये रोग आनजन्दत हो यहे है , प्रसन्न हो यहे हैं तो मह ममों थोफडा चढ़ाकय जाती है ? कृष्ण कहने रगे् "हे सुन्दयी !" कब्जा सोचने रगी कक भैं सुन्दयी नहीॊ.... आज तक भुझे ककसी ने सुन्दयी कहा ही नहीॊ। ु मे ककसी औय को फुराते होंगे। कब्जा ने सुना अनसुना कय हदमा। श्रीकृष्ण ने दफाया कहा् ु ु "हे सुन्दयी !" कब्जा ने सोचा् "कोई औय सुन्दयी होगी। भगय ग्वारफारों क टोरे भें तो कोई स्त्री नहीॊ ु े थी। जफ तीसयी फाय श्रीकृष्ण ने कहा्
  • 11. "हे सुन्दयी !" तफ कब्जा से यहा न गमा। वह फोर उठी् ु "फोरो सुन्दय ! ममा फोरते हो ?" जो करूऩ भें बी सौन्दमश को दे ख रें वे कृष्ण हैं। सच ऩूछो तो करूऩ से करूऩ आदभी ु ु ु बी आत्भ-सौन्दमश छऩा है । श्रीकृष्ण को उस करूऩ कब्जा भें बी अऩना सौन्दमश स्वरूऩ ु ु ु सजच्चदानॊद हदखा। उन्होंने कब्जा से कहा् ु "मह चन्दन तू भझे दे गी ?" ु "हाॉ रो, रगा दो अऩने फदन ऩय।" उस कब्जा को ककसी ने सन्दय कहा नहीॊ था औय श्रीकृष्ण जो कछ कहते, सच्चे रृदम से ु ु ु कहते। उनका व्मवहाय कृत्रत्रभ नहीॊ था। कछ द्धवनोद बरे ककसी से कय रें वह अरग फात है , ु फाकी बीतय से जो बी कयते, गहयाई से कयते। ऩणाशवताय तो जो कछ कये गा, ऩणश ही कये गा। ू ु ू द्धवनोद कयते तो ऩया, उऩदे र् कयते तो ऩया, नयो वा कजयो वा का आमोजन ककमा तो ऩया, सॊगध- ू ू ॊु ू दत होकय गमे तो ऩूये, सर्र्ुऩार को ऺभा की तो ऩये, ऩूयी सौ गासरमाॉ सुन री। वे जो कछ बी ू ू ु कयते हैं, ऩूया कयते है कपय बी कबी कतत्व बाय से फोणझर नहीॊ होते। मह नायामण की रीरा शृ नय को जगा दे ती है कक हे नय ! तू बी फोझीर भत हो। चाय ऩैसे का कऩडा, रकडा, ककयाना फेचकय, 'भैंने इतना साया धॊधा ककमा' मह अहॊ काय भत यख। ऩाॉच-ऩच्चीस हजाय की सभठाई फेचकय अऩने को सभठाईवारा भत भान। तू तो ब्रह्मवारा है । 'भैं सभठाईवारा हूॉ.... भैं कऩडे वारा हूॉ.... भैं सोने-चाॉदी वारा हूॉ.... भैं भकानवारा हूॉ... भैं दकानवारा हूॉ.... भैं ऑकपसवारा हूॉ... भैं ऩें टवारा हूॉ..... भैं दाढ़ीवारा हूॉ..... ' मह सफ भन का ु धोखा है । 'भैं आत्भावारा हूॉ... भैं ब्रह्मवारा हूॉ...' इस प्रकाय हे जीव ! तू तो ऩयभात्भावारा है । तेयी सच्ची भडी तो ऩयभात्भा-यस है । ू श्रीकृष्ण ऐसे भहान नेता थे कक उनक कहने भात्र से याजाओॊ ने याजऩाट का त्माग कयक े े ऋद्धष जीवन जीना स्वीकाय कय सरमा। ऐसे श्रीकृष्ण थे कपय बी फडे त्मागी थे, व्मवहाय भें अनासि थे। रृदम भें प्रेभ.... आॉखों भें हदव्म दृद्धद्श....। ऐसा जीवन जीवनदाता ने जीकय प्राणीभात्र को, भनुष्म भात्र को ससखामा क हे जीव ! तू भेया ही अॊर् है । तू चाहे तो तू बी ऐसा हो सकता े है । भभैवाॊर्ो जीवरोक जीवबूत् सनातन्। े भन् षद्षानीजन्द्रमाणण प्रकृनतस्थानन कषशनत।। 'इस दे ह भें मह सनातन जीव भेया ही अॊर् है औय वही इन प्रकृनत भें जस्थत भन औय ऩाॉचों इजन्द्रमों को आकषशण कयता है ।' (बगवद् गीता् 15.7)
  • 12. तुभ भेये अॊर् हो, तुभ बी सनातन हो। जैस, भेये कई हदव्म जन्भ हो गमे, भैं उनको े जानता हूॉ। हे अजुन ! तुभ नहीॊ जानते हो, फाकी तुभ बी ऩहरे से हो। श अजुन को ननसभर्त् कयक बगवान सफको उऩदे र् दे ते हैं कक आऩ बी अनाहद कार से हो। श े इस र्यीय क ऩहरे तुभ थे। फदरने वारे र्यीयों भें कबी न फदरने वारे ऻानस्वरूऩ आत्भा को े जान रेना ही भनुष्म जन्भ का पर है । 'भैं हूॉ' जहाॉ से उठता है उस ऻानस्वरूऩ अगधद्षान भें जो द्धवश्राॊनत ऩा रेता है वह श्रीकृष्ण क स्वरूऩ को ठीक से जान रेता है । े इस ऻान को ऩचाने क सरए फद्धि की ऩद्धवत्रता चाहहए। फद्धि की ऩद्धवत्रता क सरए मऻ, े ु ु े होभ, हवन, दान, ऩण्म से सफ फहहयॊ ग साधन हैं। धायणा, ध्मान आहद अॊतयॊ ग साधन हैं औय ु आत्भऻान का सत्सॊग ऩयभ अॊतयॊ ग साधन हैं। सत्सॊग की फसरहायी है । सत्सॊग सनने से जजतना ऩण्म होता है उसका ममा फमान कयें ! ु ु तीयथ नहामे एक पर सॊत सभरे पर चाय। सदगुरू सभरे अनन्त पर कहे कफीय द्धवचाय।। तीथश भें स्नान कयो तो ऩुण्म फढ़े गा। सॊत का साजन्नध्म सभरे तो धभश, अथश, काभ औय भोऺ इन चायों क द्राय खर जाएॉगे। वे ही सॊत जफ सदगुरू क रूऩ भें सभर जाते हैं तो उनकी े ु े वाणी हभाये रृदम भें ऐसा गहया प्रबाव डारती है कक हभ अऩने वास्तद्धवक 'भैं' भें ऩहुॉच जाते हैं। हभाया 'भैं' तत्त्व से दे खा जाम तो अनन्त है । एक र्यीय भें ही नहीॊ फजल्क हये क र्यीय भें जो 'भैं.... भैं.... भैं... भैं....' चर यहा है वह अनन्त है । उस अनन्त ऩयभात्भा का ऻान जीव को प्राद्ऱ हो जाता है । इससरए कफीय जी न ठीक ही कहा है कक् तीयथ नहामे एक पर सॊत सभरे पर चाय। सदगुरू सभरे अनन्त पर कहे कफीय द्धवचाय।। सदगुरू भेया सूयभा कये र्ब्द की चोट। भाये गोरा प्रेभ का हये बयभ की कोट।। जीव को भ्रभ हुआ है कक 'मह करू तो सुखी हो जाऊ, मह सभरे तो सुखी हो जाऊ....' ॉ ॉ ॉ रेककन आज तक जो सभरा है , आज क फाद जो बी सॊसाय का सभरेगा, आज तक जो बी सॊसाय े का जाना है औय आज क फाद जो बी जानोगे, वह भत्मु क एक झटक भें सफ ऩयामा हो े ृ े े जामेगा। भत्मु झटका भायकय सफ छीन रे उसक ऩहरे, जहाॉ भौत की गनत नहीॊ उस अऩने आत्भा ृ े को 'भैं' स्वरूऩ भें जान रे, अऩने कृष्ण तत्त्व को जान रे, उसका फेडा हो जाता है । श्रीकृष्ण कहते हैं- अभतॊ चैव भत्मुद्ळ सदसच्चाहभजुशन। ृ ृ 'हे अजन ! भैं अभत हूॉ, भैं भत्मु हूॉ, भैं सत ् हूॉ औय भैं असत ् हूॉ।' ुश ृ ृ
  • 13. (गीता् 9.19) ककतना हदव्म अनुबव ! ककतनी आत्भननद्षा ! ककतना सवाशत्भबाव ! सवशत्र एकात्भदृद्धद्श ! जड-चेतन भें अऩनी सर्त्ा, चेतनता औय आनन्दरूऩता जो द्धवरस यही है उसक प्रत्मऺ अनुबव ! आऩ दननमाॉ की भजहफी ऩोगथमों, भत-भताॊतयों, ऩीय-ऩैगम्फयों को ऩढ़ रीजजमे , सुन ु रीजजमे। उनभें से ककसी भें ऐसा कहने की हहम्भत है ? ककन्तु श्रीकृष्ण बगवान क इस कथन से े सवशत्र एकात्भदृद्धद्श औय उनक ऩूणाशवताय, ऩूणश ऻान, ऩूणश प्रेभ, ऩूणश सभता आहद छरकते हैं। े श्रीकृष्ण जेर भें ऩैदा हुए हैं , भस्कया यहे हैं। भथया भें धनषमऻ भें जाना ऩडता है तो बी ु ु ु ु भस्कया यहे हैं। भाभा क षडमॊत्रों क सभम बी भस्कया यहे हैं। सॊगधदत होकय गमे तफ बी भस्कया ु े े ु ू ु यहे हैं। सर्र्ऩार सौ-सौ फाय अऩभान कयता है , हय अऩभान का फदरा भत्मदॊड हो सकता है , कपय ु ृ ु बी गचर्त् की सभता वही की वही। मि क भैदान भें अऩने ऻानाभत से भस्कयाते हुए उरझे, थक, ु े ृ ु े हाये अजन को बक्ति का, मोग का, ऻान का आत्भ-अभतऩान कयाते हैं। ुश ृ सॊसाय की ककसी बी ऩरयजस्थनत ने उन ऩय प्रबाव नहीॊ डारा। जेर भें ऩैदा होने से, ऩतना ू क द्धवषऩान कयाने से, भाभा कस क जल्भों से, भाभा को भायने से, नगय छोडकय बागने से, े ॊ े ु सबऺा भाॉगते ऋद्धषमों क आश्रभ भें ननवास कयने से, धयती ऩय सोने से, रोगों का औय स्वमॊ े अऩने बाई का बी अद्धवद्वास होने से, फच्चों क उद्दण्ड होने से, ककसी बी कायण से श्रीकृष्ण क े े चेहये ऩय सर्कन नहीॊ ऩडती। उनका गचर्त् कबी उहद्रग्न नहीॊ हुआ। सदा सभता क साम्राज्म भें । े सभगचर्त् श्रीकृष्ण का चेहया कबी भुयझामा नहीॊ। ककसी बी वस्तु की प्रानद्ऱ-अप्रानद्ऱ से, ककसी बी व्मक्ति की ननन्दा-स्तुनत से श्रीकृष्ण की भुखप्रबा म्रान नहीॊ हुई। नोदे नत नास्तभेत्मेषा सुखे द्खे भुखप्रबा। ु श्रीकृष्ण मह नहीॊ कहते कक आऩ भॊहदय भें , तीथशस्थान भें मा उर्त्भ कर भें प्रगट होगे ु तबी भुि होगे। श्रीकृष्ण तो कहते हैं कक अगय आऩ ऩाऩी से बी ऩाऩी हो, दयाचायी से बी ु दयाचायी हो कपय बी भुक्ति क अगधकायी हो। ु े अद्धऩ चेदसस ऩाऩेभ्म् सवशभ्म् ऩाऩकृर्त्भ्। सवां ऻानप्रवेनैव वजजनॊ सॊतरयष्मसस।। ृ 'महद तू अन्म सफ ऩाद्धऩमों से बी अगधक ऩाऩ कयने वारा है , तो बी तू ऻानरूऩ नौका द्राया नन्सन्दे ह सॊऩूणश ऩाऩ-सभुद्र से बरी-बाॉनत तय जामेगा।' (बगवद् गीता् 4.36) हे साधक ! इस जन्भाद्शभी क प्रसॊग ऩय तेजस्वी ऩूणाशवताय श्रीकृष्ण की जीवन-रीराओॊ े से, उऩदे र्ों से औय श्रीकृष्ण की सभता औय साहसी आचयणों से सफक सीख, सभ यह, प्रसन्न यह, र्ाॊत हो, साहसी हो, सदाचायी हो। आऩ धभश भें जस्थय यह, औयों को धभश क भागश भें रगाता े यह। भस्कयाते हुए आध्माजत्भक उन्ननत कयता यह। औयों को सहाम कयता यह। कदभ आगे यख। ु हहम्भत यख। द्धवजम तेयी है । सपर जीवन जीने का ढॊ ग मही है ।
  • 14. जम श्रीकृष्ण ! कृष्ण कन्है मारार की जम....! अनुक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ श्रीकृष्ण औय रूजमभणी उदासीना वमॊ नूनॊ न स््माऩत्माथशकाभुका्। आत्भरब्ध्माऽऽस्भहे ऩूणाश गेहमोज्मशनतयकक्रमा्।। 'ननद्ळम ही हभ उदासीन हैं। हभ स्त्री, सॊतान औय धन क रोरुऩ नहीॊ हैं। ननजष्क्रम औय े दे ह-गेह से सम्फन्धयहहत हैं दीऩसर्खा क सभान साऺी भात्र हैं। हभ अऩने आत्भा क साऺात्काय े े से ही ऩूणकाभ हैं।' श (श्रीभद् बागवत् 10.60.20) बगवान श्रीकृष्ण रुजमभणी से कह यहे हैं। रुजमभणी ने श्रीकृष्ण को ऩत्र सरखा था। साध- ब्राह्मणों से रुजमभणी ने श्रीकृष्ण ने गुण, ु मर्, ऩयाक्रभ, चातुम, सहजता, सयरता, ननद्रश न्द्रता, ननयाभमता आहद सदगुण सुनकय भन ही भन श सॊकल्ऩ ककमा कक वरूगी तो गगयधय गोऩार को ही। उसक बाई रुजमभ, द्धऩता, बीष्भक तथा अन्म ॉ े रोगों की भजी सर्र्ुऩार क साथ उसका द्धववाह कयने की थी, जफकक रुजमभणी की भजी श्रीकृष्ण े क साथ द्धववाह कयने की थी। े जीव जफ बगवान की सहजता, आनन्द, भुिता, यसभमता जानता है तो वह बी इच्छा कयता है कक भैं बगवान को ही प्राद्ऱ हो जाऊ। जैसे श्रीकृष्ण को सन्दे र्ा ऩहुॉचाने क सरए ॉ े रुजमभणी को ब्राह्मण की जरूयत ऩडी थी ऐसे ही जीव को ब्रह्मवेर्त्ा सदगुरू की आवश्मकता ऩडती है कक ऩयभात्भ-स्वरूऩ भें सन्दे र्ा ऩहुॉचा दें । रुजमभणी ने ऩत्र सरखकय श्रीकृष्ण को ऩहुॉचाने क सरए एक ब्राह्मण को द्रारयका बेजा। े ब्राह्मणदे व द्रारयका ऩहुॉचे औय ऩत्र दे हदमा। उस ऩत्र भें रुजमभणी ने श्रीकृष्ण को द्धवनती की थी कक भेये कटुम्फीजन भेया द्धववाह ऐहहक भोह-भामा भें ऩडे हुए, वासना क कीडे सभान याजाओॊ से ु े कयना चाहते हैं रेककन भैं आऩको हदर से वय चकी। ु रुजमभणी की तयह जस्त्रमाॉ जफ जजऻासु फनती हैं तफ सोचती हैं कक सॊसाय का वय हभको छोडकय चरा जाम तो हभ द्धवधवा हो जाती है अथवा हभ उसको छोडकय चरी जामें तो दसये ू जन्भ भें दसये वय को वयना ऩडता है । इस दे ह क वय तो ककतने ही जन्भों भें ककतने ही फदरे ू े औय इस जन्भ भें बी न जाने कौन ककतना ककसक साथ यहे गा, कोई ऩता नहीॊ। इन वयों क साथ े े यहते हुए बी जो भहहराएॉ आत्भवय को वयने क सरए तत्ऩय यहती हैं वे जजऻासु कही जाती है । े भैं तो वरू भेये गगयधय गोऩार को ॉ ,
  • 15. भेयो चुडरो अभय हो जाम। रुजमभणी श्रीकृष्ण को वयना चाहती है । मह जीव जफ अऩने र्ुि, फुि चैतन्म स्वरूऩ को वयना चाहता है तो वह प्रेभ भें चढ़ता है । जीव ककसी हाड-भाॊस क ऩनत मा ऩत्नी को वयकय द्धवकायी सुख बोगना चाहता है तफ वह प्रेभ े भें ऩडता है । र्यीय क द्राया जफ सुख रेने की रारच होती है तो प्रेभ भें ऩडता है औय अन्तभुख े श होकय जफ ऩयभ सुख भें गोता भायने की इच्छा होती है तफ वह प्रेभ भें चढ़ता है । प्रेभ ककमे फना तो कोई यह ही नहीॊ सकता। कोई प्रेभ भें ऩडता है तो कोई प्रेभ भें चढ़ता है । प्रेभ भें जो ऩडे वह सॊसाय है ....... प्रेभ भें जो चढ़े वह साऺात्काय है । रुजमभणी का सन्दे र्ा ऩाकय श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए कक मह जीव भझे वयना चाहता है । ईद्वय ु का मह सहज स्वबाव है कक अगय कोई उन्हें ऩाना चाहे तो वे उसका हाथ ऩकड रेते हैं। ककसी बी सभम, कसा बी प्रमोग कयक जीव का हाथ ऩकड ही रेते हैं। ै े जीव जफ ईद्वय का साऺात्काय कयने चरता है तफ दे वता रोग प्रसन्न नहीॊ होते, ममोंकक जीव होगा तो जन्भेगा, मऻ होभ-हवन-ऩूजन कये गा, बोग चढ़ामेगा, दे वताओॊ आहद का गाडा चरता यहे गा। जीव अगय साऺात्काय कये गा तो उनक साये प्रबावों से अरग हो जामेगा, ऊऩय उठ े जामगा। दे वी-दे वता तो नहीॊ चाहते कक तुभ साऺात्काय कय रो, तुम्हाये कटुम्फीजन बी नहीॊ ु चाहते, तुम्हायी ऩत्नी बी नहीॊ चाहती औय तुम्हाया ऩनत बी नहीॊ चाहता। अगय तुभ थोडा-सा ही साऺात्काय क भागश ऩय आगे फढ़े तो टाॉग खीॊचने वारे तैमाय ही हैं। े बक्ति क भागश ऩय, ईद्वय क भागश ऩय नहीॊ चरोगे तो रोग फोरेंगे नाजस्तक है । थोडा सा े े चरोगे औय सवशसाभान्म ढॊ ग से भॊहदय गमे, घॊटनाद कय हदमा, आयती कय दी, टीरा-टऩका कय हदमा, ककसी सॊप्रदाम का बि कहरा हदमा....... तफ तक तो ठीक है । जफ आत्भा-ऩयभात्भा की एकता की तयप आगे कदभ यखोगे तो कटुम्फी रोग तुभको द्धवघ्न डारें गे। जो तुभको ध्मान ु ससखाते थे, जो तुभको भॊहदय भें , आश्रभ भें रे गमे वे ही तुम्हें कपय सभझाएॉगे कक, 'इतनी सायी बक्ति ममा कयना ? हभ बी तो बि हैं, हभ बी तो फाऩू क सर्ष्म हैं। आऩ जया ध्मान बजन े कयना कभ कयो कभ.... ऐसे कछ चरता है ममा ?' ु जो भाॉ ध्मान ससखाती थी वही भाॉ आसुभर को सभझाने रगी थी कक, 'फेटा इतना साया बजन नहीॊ कयना चाहहए। भुझे ऩडोसी भाई फोरती है कक तुम्हाया फेटा प्रबात भें बगवान के ध्मान भें फैठा यहता है , यात को बी घण्टों तक फैठा यहता है । वह फहुत बजन कयता है तो बगवान को फाय-फाय द्धवऺेऩ होता होगा। रक्ष्भी जी की सेवा रेना छोडकय उन्हें फाय-फाय बगत के ऩास आना ऩडता होगा तो रक्ष्भी जी रूठ जामेगी तुम्हाये घय से। अत् फेटा ! ज्मादा ध्मान बजन कयना ठीक नहीॊ।' बोरी भाॉ ने हभें सभझामा कक ज्मादा बक्ति नहीॊ कयना, र्ामद रक्ष्भी रूठ जाम तो ?
  • 16. जो रोग आऩको ईद्वय क भागश रे जाते हैं वे ही रोग आऩको योकगे, महद आऩकी साधना े ें की गाडी ने जोय ऩकडा तो। अगय वे रोग नहीॊ योकते अथवा उनक योकने से आऩ नहीॊ रुक तो े े दे वता रोग कछ न कछ प्ररोबन बेजेंगे। अथवा मर् आ जामगा, रयद्धि-ससद्धि आ जामेगी, सत्म- ु ु सॊकल्ऩ ससद्धि आ जामगी। भहसूस कयोगे कक भैं जो सॊकल्ऩ कयता हूॉ वह ऩूणश होने रगता है । अऩने आश्रभ क एक साधक ने ऩॊचड (यतराभ) क आश्रभ भें यहकय साठ हदन का े े े अनुद्षान ककमा। छोटी-भोटी कछ इच्छा हुई औय जया सा ऐसा हो गमा। उसने गाॉठ फाॉध री कक ु भेये ऩास सत्म-सॊकल्ऩ ससद्धि आ गमी। अये बाई ! इतने भें ही सॊतद्श हो गमे ? साधना भें रुक ु गमे ? ससतायों से आगे जहाॉ कछ औय है । ु इश्क क इम्तीहाॉ कछ औय हैं ।। े ु आगे फढ़ो। मह तो कवर र्रूआत है । थोडी सी सॊसाय की रोरऩता कभ होने से े ु ु अन्त्कयण र्ि होता है । अन्त्कयण र्ि होता है तो कछ-कछ आऩक सॊकल्ऩ पसरत होते हैं। ु ु ु ु े सॊकल्ऩ पसरत हुआ औय उसक बोग भें आऩ ऩड गमे तो आऩ प्रेभ भें ऩड जामेंगे। अगय े सॊकल्ऩ-पर क बोग भें नहीॊ ऩडे औय ऩयभात्भा को ही चाहा तो आऩ प्रेभ से चढ़ जाओगे। प्रेभ े भें ऩडना एक फात है औय प्रेभ भें चढ़ना कोई ननयारी ही फात है । थोडी फहुत साधना कयने से ऩुण्म फढ़ते हैं, सुद्धवधाएॉ आ जाती है , जो नहीॊ फुराते थे वे फुराने रगें गे, ककन्तु भनुष्म जन्भ कवर इसीसरए नहीॊ है कक रोग भान से दे खने रग जाएॉ। े जजसको वे दे खेंगे वह (दे ह) बी तो स्भर्ान भें जरकय खाक हो जामेगा बाई ! भनुष्म जन्भ इससरए बी नहीॊ है कक फहढ़मा भकान सभर जाम यहने को। 'हभें तो ठाठ से यहना है .....।' मह तो अहॊ काय ऩोसने की फात है । न ठाठ से यहना ठीक है न फाट से यहना ठीक है, जजससे यहने का द्धवचाय उत्ऩन्न होता है वह अन्त्कयण जजससे सॊचासरत होता है उस तत्त्व को अऩने आत्भा क रूऩ भें जानना अथाशत ् आत्भ-साऺात्काय कयना ही ठीक है , फाकी सफ भन की े कल्ऩना है । स्वाभी याभतीथश ने फहुत फहढ़मा फात कही। वे फोरते हैं- कोई हार भस्त, कोई भार भस्त, कोई तूती भैना सूए भें । कोई खान भस्त, ऩहयान भस्त, कोई याग यागगनी दोहे भें ।। कोई अभर भस्त, कोई यभर भस्त, कोई र्तयॊ ज चौऩड जूए भें । इक खुद भस्ती त्रफन औय भस्त, सफ ऩडे अद्धवद्या कए भें ।। ू कोई अकर भस्त, कोई र्मर भस्त, कोई चॊचरताई हाॊसी भें । कोई वेद भस्त, ककतेफ भस्त, कोई भमक भें कोई कार्ी भें ।। े कोई ग्राभ भस्त, कोई धाभ भस्त, कोई सेवक भें कोई दासी भें । इक खद भस्ती त्रफन औय भस्त, सफ फॊधे अद्धवद्या पाॉसी भें ।। ु
  • 17. कोई ऩाठ भस्त, कोई ठाट भस्त, कोई बैयों भें, कोई कारी भें । कोई ग्रॊथ भस्त, कोई ऩन्थ भस्त, कोई द्वेत ऩीतयॊ ग रारी भें ।। कोई काभ भस्त, कोई खाभ भस्त, कोई ऩूयन भें, कोई खारी भें । इक खुद भस्ती त्रफन औय भस्त सफ फॊधे अद्धवद्या जारी भें ।। कोई हाट भस्त, कोई घाट भस्त, कोई फन ऩवशत ऊजाया1 भें । कोई जात भस्त, कोई धभश भस्त, कोई भसजजद ठाकयद्राया भें । ु इक खद भस्ती त्रफन औय भस्त, सफ फहे अद्धवद्या धाया भें ।। ु कोई साक2 भस्त, कोई खाक भस्त, कोई खासे भें कोई भरभर भें । कोई मोग भस्त, कोई बोग भस्त, कोई जस्थनत भें, कोई चरचर भें ।। कोई ऋद्धि भस्त, कोई ससद्धि भस्त, कोई रेन दे न की करकर भें । इक खद भस्ती त्रफन औय भस्त, सफ पसे अद्धवद्या दरदर भें ।। ु ॉ कोई ऊध्वश भस्त, कोई अध् भस्त, कोई फाहय भें कोई अॊतय भें । कोई दे र् भस्त, द्धवदे र् भस्त, कोई औषध भें, कोई भन्तय भें ।। कोई आऩ भस्त, कोई ताऩ भस्त, कोई नाटक चेटक तन्तय भें । इक खुद भस्ती त्रफन, औय भस्त, सफ पसे अद्धवद्या जन्तय भें ।। ॉ कोई र्ुद्श3 भस्त, कोई तुद्श4 भस्त, कोई दीयध भें कोई छोटे भें । कोई गुपा भस्त, कोई सुपा भस्त, कोई तूॊफे भें कोई रोटे भें।। कोई ऻान भस्त, कोई ध्मान भस्त, कोई असरी भें कोई खोटे भें । इक खुद भस्ती त्रफन, औय भस्त, सफ यहे अद्धवद्या टोटे भें ।। 1 उजाड त्रफमावान 2 रयश्तेदायी 3 खारी 4 प्रसन्नगचर्त् ऐसा यहने का हो, ऐसा खाने का हो, ऐसी इज्जत-आफरू हो ऐसा जीवन हो तो भजा है । I am very happy. I am very lucky. अगरे जन्भ मा इस जन्भ का थोडा फहुत ध्मान-बजन-जऩ-तऩ-ऩण्म, जाने अनजाने कोई ु एकाग्रता परी है तो आऩ जया सा सखी हैं, ऐहहक जगत भें साभान्म जीवन जीनेवारों से आऩका ु जीवन थोडा ऐर्-आयाभवारा होगा, जया ठीक होगा। इसभें अगय आऩ सन्तद्श होकय फैठ गमे, ु जीवन की साथशकता सभझकय फैठ गमे तो आऩ अऩने ऩैय ऩय कल्हाडा भाय यहे हैं, आऩ कृष्ण ु का वयण नहीॊ कयना चाहते हैं। रुजमभणी क ऩास याजा की यानी होने का जीवन साभने था। सर्र्ऩार जैसे याजा थे जो े ु सर्र्ुओॊ क, फच्चों क ऩारन-ऩोषण भें रगे यहें , स्त्री का आऻा भानें , स्त्री क सरए छटऩटामें ऐसे े े े काभुक रोग रुजमभणी को सभर यहे थे। प्रेभ भें ऩडने क सरए उसक ऩास ऩूया भाहौर था। रेककन े े रुजमभणी जी प्रेभ भें नहीॊ ऩडी। वह प्रेभ भें चढ़ना चाहती थी।
  • 18. ऐसे ही तुम्हायी फुद्धिभाती रुजमभणी सॊसाय की सुद्धवधाओॊ भें अगय तन्भम हो जाती है तो वह रुजमभणी सर्र्ुऩार क हाथ चरी जामगी। े अगय वह फुद्धिरूऩी रुजमभणी कृष्ण को ही वयना चाहती है , आत्भा को ही वयना चाहती है तो कपय ब्रह्मवेर्त्ा को खोजेगी, छऩकय ऩत्र दे गी। फुद्धि रृदमऩूवक प्राथशना कये गी औय ब्रह्मवेर्त्ारूऩी ु श ब्राह्मण को ऩत्र दे गी कक् 'हे गुरू भहायाज ! भुझे तो चायों ओय से गगयाने वारे, घसीटने वारे हैं। आऩ भेया सन्दे र्ा ऩहुॉचा दो। भुझे बगवान ही वयें , औय कोई न वये । भैं बगवान क मोग्म हूॉ औय े बगवान भेये सरमे मोग्म वय हैं। सच ऩछो तो प्राणीभात्र का मोग्म वय तो ऩयभात्भा है , फाकी सफ गड्डा-गड्डी है । ू ु ु रुजमभणी का दसया अथश है प्रकृनत। प्रकृनत का मोग्म वय तो ऩरूष ही है । ू ु प्रकृनत क दे ह को जफ हभ 'भैं' भानते हैं तो हभ सफ दाढ़ी-भॉछवारे रूजमभणी हैं। कोई े ू दाढ़ी-भॉछवारी रुजमभणी तो कोई कभ दाढ़ी-भॉछवारी रुजमभणी तो कोई त्रफना दाढ़ी-भॉछवारी ू ू ू रुजमभणी तो कोई चक्तडमों वारी रुजमभणी। हभ रोग सफ रुजमभणी हैं अगय प्राकृनतक र्यीय को 'भैं' ू भानकय प्राकृनतक ऩदाथश ऩय ही आधारयत यहते हैं तो। रुजमभणी को अगय फुद्धि की जगह ऩय यखें तो जजसकी फुद्धि सॊसाय का सुख चाहती है वह प्रेभ भें ऩडती है औय जजसकी फुद्धि आत्भसुख चाहती है , र्ुि सुख चाहती है वह रुजमभणी कृष्ण को वयती है । अफ, हभायी रुजमभणी कहाॉ है ? हभायी फुद्धिरूऩी रुजमभणी सुख-सुद्धवधाओॊ भें तन्भम हो जाती है कक सुखों को नद्वय सभझकय, साऩेऺ सभझकय, कजल्ऩत सभझकय सत्म की खोज कयना चाहती है ? फुद्धि अगय सूक्ष्भ है तो सत्म की खोज कये गी। उसभें द्धववेक-वैयाग्म होगा, भोऺ की इच्छा होगी। अगय फुद्धि सूक्ष्भ है तो आत्भ द्धवचाय कयना चाहहए। फुद्धि आत्भ-ध्मान क बी मोग्म नहीॊ े है , सूक्ष्भ नहीॊ है , ऩद्धवत्र नहीॊ है तो कपय बी बगवान क गुणानुवाद गाते हुए श्रीभद् बगवद गीता, े श्रीभद् बागवत आहद ग्रन्थों का ऩायामण कयना चाहहए, अवरोकन कयना चाहहए। अगय उन ग्रॊथों को बी नहीॊ सभझ सकते हैं तो कथा औय सत्सॊग क द्राया फुद्धि को सूक्ष्भ फनाना चाहहए ताकक े मह फुद्धिरूऩी रुजमभणी कृष्ण को ही वये औय कृष्ण आकय रुजमभणी का हाथ ऩकडकय अऩनी फना रें। अऩनी फुद्धिरूऩी रुजमभणी को ब्रह्मरूऩी कृष्ण हाथ ऩकडकय अऩनी फना रें । जफ ऩयभात्भा तुम्हायी फुद्धि को अऩनी फना रें गे तो वह तुम्हायी फुद्धि भन की दासी नहीॊ फनेगी, इजन्द्रमों की गुराभ नहीॊ फनेगी। जो फुद्धि भन की दासी मा इजन्द्रमों को गुराभ नहीॊ फनती। उस फुद्धि फाई के आगे भन-इजन्द्रमा आऻाकायी चाकय हो जाते हैं। साये सुख-सुद्धवधाएॉ उसक आगे भॉडयाते हैं। फद्धि े ु उसका मथामोग्म थोडा-फहुत उऩमोग कयक फाकी का सभम फचाकय अऩने ब्रह्मस्वरूऩ श्रीकृष्ण भें े खेरने रगती है ।
  • 19. श्रीकृष्ण जफ रुजमभणी का हाथ ऩकड रेते हैं तफ एक तेजऩु्ज प्राद्ऱ होता है । श्रीभद् बागवत की कथा कहती है कक रुजमभणी जफ श्रीकृष्ण को प्राद्ऱ हुई तफ सभम ऩाकय तेजस्वी ऩुत्र प्रद्युम्न का जन्भ हुआ। साधक की फुद्धि को जफ ऩयभात्भा ऩकड रेते हैं तफ फुद्धि भें ननभशर तेज प्रकट होता है । सच्चे बिो को सोचने की पयसत नहीॊ होती कक रोग ममा कहें गे। जो रोग अगधक ु वाचार होते हैं, अगधक फोरते हैं , चें .....चें , कयते यहते हैं वे आध्माजत्भक भागश भें जल्दी से सपर नहीॊ होते। रुजमभणी ऩत्र भें सरखती है कक भैं अऩने कर दे वी क दर्शन कयने जाऊगी, व्रत यखगी ु े ॉ ॉू औय हे नाथ ! गाॉव क फाहय करदे वी क भॊहदय भें जाते सभम आऩ भेया हाथ ऩकड रेना। े ु े ऐसे ही हभ साधक अऩने व्मवहाय, अऩने भोह-भभता भें सम्फन्धों से ऩये , कछ दयी ऩय ु ू चरे जामें औय आयाधना, उऩासना कयें उस सभम हे दे व ! हे ऩयब्रह्म ऩयभात्भा ! हभायी फद्धिरूऩी ु रुजमभणी का हाथ ऩकडोगे तो आसानी हो जामेगी। आऩ रोग आज घय-फाय सफ छोडकय, र्हय से दय आश्रभ भें आमे हो तो अबी तम्हायी ू ु फुद्धिरूऩी रुजमभणी श्रीकृष्ण से सभरने भें सुद्धवधा का अनुबव कये गी। अगय बीड-बडाक भें मह े कथा हो मा इसकी कसेट सुन रो तो वह भजा नहीॊ आमेगा जो अबी आ यहा है । े इससरए साधक को चाहहए कक कबी ऐसा सभम ननकारकय रुजमभणी की तयह कटुम्फ- ु ऩरयवाय से थोडा सभम अरग होकय एकाॊत भें ननजशन जगह ऩय जाए। रुजमभणी ऩूजा की थारी सरमे जा यही है । उसकी दृद्धद्श नासाग्र दृद्धद्श है । फीच भें बाई रुजमभ आता है , दसये रोग आते हैं तो उनसे अगय फात कयनी ऩडती है तो सॊऺेऩ भें ही फात कयक ू े भॊहदय की ओय आगे फढ़ती है । फाहय से तो हाथ भें ऩूजा की थारी है औय भॊहदय की तयप आगे फढ़ यही है ऩय बीतय से जजऻासा भें ऐसी तीव्रता है कक रृदमभॊहदय का स्वाभी कहाॉ से आमेगा.... कसे फुराएगा.... कसे ै ै उठामेगा !! रुजमभणी क रृदम भें फडी उत्सुकता है । े जीव जफ ईद्वय को आभॊत्रत्रत कयता है तफ ईद्वय उसका हाथ ऩकडते हैं। नहीॊ तो चरो, खेरते हो तो खेरो। श्रीकृष्ण ने जफ रुजमभणी क प्राथशना-ऩत्र क अनुसाय रुजमभणी को स्वीकाय ककमा तफ े े रुजमभणी का बाई रुजमभ तथा अन्म रोग आमे। वे रोग उहद्रग्न हुए। यास्ते भें द्धवयोध कयने आमे। रुजमभ क हगथमाय बगवान ने नद्श कय हदमे। वह खड्ग रेकय आमा तो उसको बी हठकाने े रगा हदमा। बगवान उसको सजा दे ने जाने रगे, वध कयने जाने रगे। रुजमभणी क चेहये ऩय े दे खा तो वह ढीरा-ढारा हो यहा था। बि कसा बी हो, जफ वह ऩरयवाय क तयप दे खता है तो बि का रृदम बी ढीरा-ढारा हो ै े जाता है ।
  • 20. वहाॉ फरयाभ रुजमभणी को सभझाते हैं कक तुभने ककसको वया है । तेया तो स्वाभी ऩयभात्भा है , कपय कटुम्फ क भोह भें गगयती है ? ु े फरयाभ याभावताय रक्ष्भण रूऩ थे औय कृष्णावताय भें फरयाभ रूऩ थे। वे र्ेषावताय हैं। 'नेनत....नेनत...' कयक जो फच जाम वह र्ेष। र्ेष ने न यासरीरा भें बाग भें सरमा न भहाबायत े क सॊग्राभ भें बाग सरमा। ममोंकक र्ेष जो ठहये , उऩयाभ। र्ेष बोरा-बारा, सीधा-सादा। र्ेष े श्रीकृष्ण की अऩेऺा थोडा सा अऩने ढॊ ग का था। श्रीकृष्ण ने रुजमभणी क बाई रुजमभ को फाॉध हदमा। उसक फार काट हदमे। दाढ़ी-भॉछ का े े ू भॊडन कय हदमा। उस जभाने भें दाढ़ी-भॉछ त्रफना क रोगों की भश्कयी होती थी। उससे फचने क ु ू े े सरए रोग भयना ऩसॊद कयते थे रेककन दाढ़ी-भॉछ क यहना ऩसन्द नहीॊ कयते थे। रुजमभ अऩने ू े नगय नहीॊ गमा। अऩना दसया गाॉव बोजकट फसा सरमा। ू ऐसे ही तम्हायी फद्धिरूऩी रुजमभणी जफ बगवान को वयण कयने जाती है तो अहॊ काय रूऩी ु ु रुजमभ फीच भें द्धवघ्न कयता है । उसको जफ बगवान भायने को उद्यत होते हैं तफ आऩको रगता है कक बगवान भुझे सभरे तो सही रेककन भेया Ego (अहॊ ) न भये । अहॊ नहीॊ भये तो बगवान उसकी दाढ़ी-भॉूछ काटकय सॊन्मासी फना दे ते हैं। सॊन्मासी अऩने गाॉव भें , अऩने ऩरयवाय भें , अऩने घय भें नहीॊ यहते। कपय नमा भठ-भॊहदय-आश्रभ फसाते हैं। बगवान की कथा से तत्त्वऻान सभझने मोग्म है । ब्रह्म औय फुद्धि का जफ सभरन होता है तफ एक तेजऩुॊज साधक क जीवन भें प्रकट होता े है । उस तेज को अगय ठीक न सॉबारा तो तेज कपय प्रेभ भें ऩड जाता है । बगवान श्रीकृष्ण रुजमभणी को रे गमे औय सभम ऩाकय फडा तेजस्वी ऩुत्र प्रद्युम्न का जन्भ हुआ। र्ॊफयासुय प्रद्युम्न को चयाकय सभुद्र भें डार दे ता है । सभुद्र भें भछरी प्रद्युम्न को ननगर ु जाती है । याजा का भछआ भछरी ऩकडकय यसोईघय भें दे ता है । यसोई फनानेवारी भहहरा ु भामावती जफ भछरी को चीयती है तो कोई सुन्दय फारक ! फडा तेजस्वी! उसको दे खकय उसका भन भोहहत हो गमा् "तुभ तो साऺात ् काभदे व हो औय भैं आऩकी ऩत्नी यनत हूॉ।" यनत ने उसको भहाभामारुऩी द्धवद्या ससखामी। उस द्धवद्या क फर से प्रद्युम्न ने र्ॊफयासुय का े द्धवनार् कय हदमा। कपय यनत क साथ आकार् भागश से जाकय अऩने भाता-द्धऩता से सभरे। रुजमभणी े ने अऩने फेटे औय फहू को ऩहचान सरमा। मह कथा दसयी एक कथा से जुडी है । बगवान सर्व जफ आत्भयभण कय यहे थे, ू ननष्करॊक नायामण तत्त्व भें सभागधस्थ थे तफ काभदे ने सर्वजी को फाण भाया। सर्वजी ननद्धवशकल्ऩ तत्त्व भें थे। वहाॉ वासना का फाण असय नहीॊ कयता। काभदे व ने दो-तीन फाय प्रमास ककमा। सर्वजी क सभाधी खरी। उन्होंने तीसया नेत्र खोरा तो काभदे व जरकय बस्भ हो गमे। ु काभ की ऩत्नी यनत योती-योती आमी्
  • 21. "भेये ऩनत बस्भ हो गमे अफ भेया ममा होगा ?" ऩनत भय गमे उसकी गचन्ता ऩत्नी को नहीॊ होती। भेया ममा होगा इसी फात से गचजन्तत होकय योती है । जो आत्भायाभी हैं बगवान साम्फ सदासर्व, त्रत्रनेत्रधायी, उनका कोऩ कोई अऻाननमों की तयह नहीॊ होता। वह तो आ गमा था ऺणबय क सरए, फहते हुए ऩानी भें रकीय जैसा। नायाज हो े गमे तो बस्भ कय हदमा। कपय यनत ने हाथ जोडकय प्राथशना की तो याजी हो गमे। फोरे् "तेया ऩनत काभदे व अफ अव्मि रूऩ भें यहे गा।" "प्रबो ! वे अव्मि तो यहें गे रेककन भैं ऩनत को कसे ऩाऊ ?" ै ॉ "वही कृष्णावताय भें कृष्ण का ऩत्र प्रद्यम्न होकय आमेगा औय तझे सभरेगा।" ु ु ु मह वयदान बी सच्चा हो गमा। ऩयभात्भा की रीरा, ऩयभात्भा की र्क्तिमाॉ, कराएॉ जजसभें जजतनी द्धवकससत होती हैं उतना ही उनका सॊकल्ऩ द्धवकससत होता है ऐसी कपय व्मवस्था हो जाती है । दे र् क सॊसद क रोग मा याज्म की द्धवधानसबा क रोग जो कछ कामदा-कानून फनाते हैं े े े ु उसक भतात्रफक व्मवस्था हो जाती हैं। रौककक सयकाय क फनामे हुए कामदे दे र्बय भें पर जाते े ु े ै हैं ऐसे ही सयकायों की बी जो सयकाय है , जजनभें कराएॉ द्धवकससत हुई हैं ऐसे बगवान सर्व, बगवान कृष्ण मा बगवान क ऩयभ प्माये ब्रह्मवेर्त्ा, सॊत भहाऩुरूष रोग जो सॊकल्ऩ कयते हैं, दे य- े सवेय उसक भुतात्रफक घटना घटती है । े स्वामॊबुव भनु क मुग भें सुतऩा प्रजाऩनत थे, ऩष्णी उनकी ऩत्नी थी। ब्रह्माजी ने सद्धद्श े ृ ृ फढ़ाने का सॊकल्ऩ ककमा औय ऩनत-ऩत्नी को आर्ीवाशद हदमा कक प्रजा का द्धवकास हो ऐसा कछ ु कयो। वे तऩ कयने रगे। दे वकी क घय जफ कृष्ण प्रकट हुए तो ऩहरे चतुबुज रूऩ भें जेर भें बगवान ने दर्शन े श हदमा् "हे भाता ! हे वसुदेव ! भैंने तुम्हें वचन हदमा था। तुभने भन्वन्तय क प्रायॊ ब भें अऩना े जीवन सादा-सीधा, सॊमभ से गुजाया था। गभी सहने भें तुभ ऩीछे नहीॊ हटे । सदी बी तुभ ऩचा रेते थे। बूख-प्मास को बी ऩचा रेते थे, भान अऩभान को बी ऩचा रेते थे। जैसे अनन्त-अनन्त सद्धद्शमों की उत्ऩद्धर्त् होती है , जस्थनत होती है , प्ररम होता है , आॉधी तूपान आते-जाते हैं, उन ृ सफको ब्रह्म ऩचा रेता है , जैसे आकार् सफ कोराहर को अऩने भें ऩचा रेता है औय ऐसे ही हे द्धऩता भाता ! आऩने सफ कछ ऩचा सरमा था औय आऩकी ऐसी हदव्म मोग्मता हुई कक दे वों क ु े फायह हजाय वषश आऩने वैसी उग्र तऩस्मा की। उस सभम तुम्हाया भन हभेर्ा भुझभें डूफा यहता था। भैं तुभ ऩय प्रसन्न होकय वयदान दे ने आमा तो भेयी मोगभामा ने आऩकी फुद्धि को, आऩकी रुजमभणी को भेये सगुण अवताय की तयप आकद्धषशत कय हदमा। भेये स्वरूऩ भें द्धवश्राॊनत ऩाकय भुक्ति क फजाम तुभने भुझे अऩने ऩुत्र रूऩ भें भाॉगा। तो तुम्हाये तऩ, तुम्हायी सहनर्क्ति, तुम्हायी े सच्चाई, तम्हाये ऩयद्ख कातयता क स्वबाव औय तम्हाये ध्मान-बजन औय एकान्त गचन्तन ने ु ु े ु
  • 22. भुझे इतना प्रसन्न ककमा कक भैंने कहा् भैं एक फाय नहीॊ, तीन-तीन फाय तुम्हाया फेटा होऊगा, ॉ तुभ सॊकोच भत कयो। हे भाता ! तू जफ ऩष्णी औय द्धऩता सुतऩा नाभ क थे उस सभम सतमुग भें भैं अवतयनत ृ े हुआ तो भैंने ऩष्णीगबश नाभ धायण ककमा था। कपय तुभ अहदनत औय कश्मऩ फने थे तफ भैं ृ उऩेन्द्र नाभ से वाभन बगवान होकय आमा था। अबी तुभ दे वकी औय वसुदेव फने हो औय भैं श्रीकृष्ण फन कय आ यहा हूॉ। मह भेया चतुबुज रूऩ भैं इससरए हदखा यहा हूॉ कक तुभ भानो कक श भैंने जो वयदान हदमा था उसक भतात्रफक तम्हाया ऩत्र होकय तम्हाया प्रेभ सॊऩादन कयने आमा हूॉ े ु ु ु ु औय मह तम्हाया आणखयी जन्भ है । कपय तभ भेये रोक को प्राद्ऱ होगे।" ु ु ऐसा कहकय बगवान नन्हें भन्ने फार-गोऩार हो गमे। ु बगवान वह है जो अन्धकाय भें प्रकार् कय दे , फन्धे हुए को छडा दे , हाये हुए को ु आद्वासन दे दे , गगये हुए को उठा रे, सदाचायी की सतचेतना को फढ़ा दे औय दयाचायी को बी ु सभरने भें इन्काय न कये । मह बगवान का बगवतत्त्व है । अद्धऩ चेदसस ऩाऩेभ्म् सवेभ्म् ऩाऩकृर्त्भ्। सवां ऻानप्रवेनैव वजजनॊ सॊतरयष्मसस।। ृ 'महद तू अन्म सफ ऩाद्धऩमों से बी अगधक ऩाऩ कयने वारा है , तो बी तू ऻानरूऩी नौका द्राया नन्सन्दे ह सम्ऩूणश ऩाऩ-सभुद्र से बरी-बाॉनत तय जामेगा।' (बगवद् गीता् 4.36) बूतकार भें कसा बी ऩाऩ हो गमा हो, दयाचाय हो गमा हो, उस ऩाऩ औय दयाचाय को ै ु ु तथा उसक गचॊतन को छोडकय अगय तुम्हायी भनतरूऩी रुजमभणी अबी कृष्ण को वयना चाहती है े तो श्रीकृष्ण साये द्धवघ्न-फाधाओॊ को चीयते हुए तुम्हाया हाथ ऩकड रेते हैं। तुम्हायी भनत जफ बगवान की हो जाती है तफ तेजऩुॊजरूऩी फारक का जन्भ होता है , साभथ्मश का जन्भ होता है । उसको कपय इच्छा-वासनारूऩी याऺस रे जाता है औय सॊसाय सभुद्र भें पकता है । वहाॉ कोई भछरी ें अथाशत ् कोई भान्मता उसे ननगर जाती है । जैसे, 'भैं जगत का सुधाय करूगा.... इस्राभ खतये भें ॉ है उसे ननकारॉ ूगा..... धभश कहीॊ पस गमा है उसे ननकारॉ ूगा.... उसको ऐसे करूगा वैसे करूगा....।' ॉ ॉ ॉ फुद्धि जफ ईद्वय को सभरने क कयीफ होती है तो जो प्रबाव औय तेज आता है उसकी अगय े सुयऺा नहीॊ की तो उसको जया चमकय भें ऩडना ऩडता है । रुजमभणी अऩने ऩुत्र-ऩुत्रवधू को ऩाकय फडी प्रसन्न हुई। सभम फीतता चरा गमा। अबी प्रायॊ ब भें आमे हुए द्ऴोक की बूसभका फन यही है । ऐसा कोई कामश नहीॊ जजसभें श्रीकृष्ण ऩीछे यहे हों। मुि भें बी उनका ऩहरा नॊफय औय यणभैदान छोडकय बागने भें बी उनका ऩहरा नॊफय। सर्ष्म फनने भें ऩहरा नॊफय औय गुरू फनने भें ऩहरा नॊफय। 'फायह सार व्रत यखो, उऩवास कयो, ननमभ कयो कपय उऩदे र् सभरेगा, ऻान सभरेगा.....' ऐसा नहीॊ। मि क भैदान भें बी अगय जरूयी है तो उऩदे र् चार। नहीॊ तो ब्रह्मद्धवद्या ु े ू
  • 23. का उऩदे र् ? ऩयॊ ऩया तो मह है कक द्धववेक हो, वैयाग्म हो, षटसॊऩद्धर्त् हो, भोऺ की तीव्र इच्छा हो, वह अगधकायी है । उसक आगे आत्भऻान का उऩदे र् कयना चाहहए। सोरह करा क ऩणाशवताय भें े े ू बगवान कबी-कबी इस साभान्म ननमभ को ककनाये यख दे ते हैं। साभान्म ननमभ दे र् , कार, व्मक्ति क सरए है औय जो दे र्ातीत है , कारातीत है , व्मक्तित्व से ऩये है ऐसे ऩूणाशवताय क सरए मे े े ननमभ नन्हें हो जाते हैं। कबी-कबी सभाज का हहत होता है तो अऩना ननमभ तोड दे ना ऩडता है। अऩना कोई छोटा-भोटा प्रण फहुजनहहताम फहुजनसखाम वाऩस रे रेना ऩडता है । ऐसा कयने भें बगवान ु ऩीछे नहीॊ हटे हैं। वे यण छोडकय बागे हैं तो बी 'यणछोडयाम की जम....!' बागते सभम रृदम भें कामयता नही रेककन महाॉ बागना व्मवस्था क अनकर है , वयदानों क अनकर है तो बागने े ु ू े ु ू भें बी ऩीछे नहीॊ यहे । वे ककसी बी काभ भें ऩीछे नहीॊ यहे । गरू दे खो तो श्रीकृष्ण अव्वर नॊफय क औय सर्ष्म दे खो तो आहाहा.....! साॊदीऩनन ऋद्धष क ु े े आश्रभ भें औय घोय आॊगगयस भनन क ऩास बगवान ब्रह्मद्धवद्या की चचाश सनते हैं मा भनन कयते हैं ु े ु तफ ऩूया सर्ष्मत्व ननबाते हैं। गुरू का रृदम तो जीत रेते हैं, गुरूऩत्नी की सेवा कयक बी उनका े आर्ीवाशद ऩाने भें ऩीछे नहीॊ हटते हैं। खेरकद भें बी श्रीकृष्ण अव्वर नॊफय। कबी गोऩी की चोटी खीॊचकय बी उसका भन अऩने ू तत्त्व की तयप आकद्धषत कयना तो कबी गामों क फछडे खोरकय बी उन ननदोष फछडों को ऩोषण श े दे ना औय अहॊ कायी, प्रजा-र्ोषक कस क दध-भमखन भें गडफड कय दे ना। ॊ े ू उऩदे र्कों भें बी श्रीकृष्ण अव्वर नॊफय औय प्रेभाबक्ति भें बी अव्वर नॊफय। प्रेभ की नजय से ननहायते हुए जया-सी फॉसी पक दे ते हैं तो रोगों क रृदम ऩुरककत हो जाते हैं। ॉू े सॊसायी रोग ऩत्नी आती है तफ प्रेभ भें ऩड जाते हैं ऐसे श्रीकृष्ण अगय प्रेभ भें ऩडे होते तो सर्र्ुऩार ने उन्हें व्मसबचायी कहा होता। सर्र्ुऩार ने श्रीकृष्ण को सौ-सौ गासरमाॉ दी ऩय उन्हें व्मसबचायी नहीॊ कहा, मह गारी नहीॊ दी। अगय वे काभासि हुए होते तो ऐसी गारी दे ने भें सर्र्ुऩार ममों रुकता ? उसने मह नहीॊ कहा कक तुभ दयाचायी हो, व्मसबचायी हो। ु श्रीकृष्ण प्रेभ भें ऩडे नहीॊ हैं रेककन प्रेभ भें ऩडे हुए रोगों को उठामा है । इसीसरए बगवान ऩूणाशवताय हैं। प्रेभ भें ऩडे वह जीव। प्रेभ भें तये वह साधक औय प्रेभ भें ताये वह ससि। रुजमभणी बगवान क प्रेभ भें चढ़ना चाहती थी। जीव का स्वबाव है कक प्रेभ भें चढ़ते- े चढ़ते कबी प्रेभ भें ऩड बी जाता है । रुजमभणी क भन भें हुआ कक भैं ककतनी गोयी हूॉ ! ककतनी े सुन्दय हूॉ ! बगवान रुजमभणी क भनोबावों को सभझ गमे। जीव की औय कोई अॊगडाई हो तो ईद्वय े सह रेते हैं रेककन जीव का अहॊ काय ईद्वय नहीॊ सहते, गुरू नहीॊ सहते। अहॊ काय फडी फाधा है ।
  • 24. रुजमभणी क अहॊ काय को ननवर्त् कयने क सरए श्रीकृष्ण फात फात भें रुजमभणी को कहते े ृ े हैं- "हभाया कजोडा हुआ है । तू गौयवणश है , सुन्दय है औय भैं साॊवरा हूॉ, श्माभवणश हूॉ। कहाॉ तू याजकन्मा औय कहाॉ हभ चयवाहे ! फचऩन भें गामें चयाने का धॊधा ककमा। मुवावस्था भें यथ चरामा। जयासॊध आहद याजाओॊ से बम ऩाकय द्रारयका जा फसे औय हभायी नगयी का भागश कोई जानता ही नहीॊ। हभ ऐसी नगयी भें फसे हैं। तुभ तो द्धवदबशनये र् बीष्भक की ऩुत्री, रुजमभ की फहन, तुम्हाये सरए सर्र्ुऩार औय दसये ू बोगी याजा तैमाय थे। हभाये ऩास तो बोग क साधन बी नहीॊ औय हभें बोग की रुगच बी नहीॊ। े हभ तो आत्भयस भें तद्ऱ यहने वारे हैं। ऩत्र भें , ऩरयवाय भें उदासीन यहने वारे हैं। ऐसे हभाये जैसे ृ ु को वयकय तभने फडी गरती की।" महाॉ श्रीकृष्ण रुजमभणी से कहते हैं- ु उदासीना वमॊ नूनॊ न स््माऩत्माथशकाभुका्। आत्भरब्ध्माऽऽस्भहे ऩूणाश गेहज्मोनतयकक्रमा्।। 'ननद्ळम ही हभ उदासीन हैं। हभ स्त्री, सॊतान औय धन रोरऩ नहीॊ हैं। ननजष्क्रम औय दे ह- ु गेह से सम्फन्धयहहत हैं। दीऩसर्खा क सभान साऺी भात्र हैं। हभ अऩने आत्भा क साऺात्काय से े े ही ऩूणकाभ हैं।' श "हभ प्रेभ भें ऩडने वारे नहीॊ हैं। तुभने हभाया वयण कयने भें जया जल्दफाजी कय सरमा। खैय, अबी बी कोई फात फीती नहीॊ। अबी अऩने मोग्म ककसी याजा को तुभ वय सकती हो।" जीव क बीतय कोई फात छऩी हुई होती है तो उसे ऐसी वैसी फात कहकय उसक े ु े अन्त्कयण से फात ननकारने क सरए ईद्वय औय गुरू ऐसी रीरा ककमा कयते हैं। े श्रीकृष्ण ने रुजमभणी को जफ मह फात कही तो वह फेहोर् हो गई। वह बगवान की बि तो थी ही। ऩद्धवत्र फुद्धि को थोडा सा बी कह दो तो वह सचेत हो जाती है । रुजमभणी बगवान को ऩॊखा झरते-झरते फेहोर् हो गई तो बगवान ऩरॊग से नीचे उतये औय अऩने ऩीताॊफय से रुजमभणी को ऩॊखा झरने रगे, भॉुह ऩय ऩानी नछडका। उसे जगाने रगे् "ऐ रुजमभणी ! रुजमभणी ! तू ममा कयती है ? गहस्थ जीवन भें कबी-कबी द्धवनोद, ृ आनन्द-प्रभोद कयने क सरए ऐसी फातचीत होती है । तेये अॊतय क बावों को ननहायने क सरए औय े े े द्धवनोद क सरए भैंने ऐसा कहा। तेया भेये प्रनत ककतना स्नेह है , भैं जानता हूॉ। तू धन्म है । तेये े सरए इतनी-इतनी सुख-सुद्धवधाएॉ थी, याजसुख था, तुझे वयण कयने क सरए इतने याजा उत्सुक थे े कपय बी तूने भेया वयण ककमा, तुझे धन्मवाद है । भैं तुझे ऩहचानता हूॉ। इसीसरए तो भैं बागा- बागा तेया हाथ ऩकडने को आमा था। रुजमभणी ! भैंने तो मह द्धवनोद भात्र ककमा था। तू सच्चा सभझकय फेहोर् हो गई ? मह साया सॊसाय द्धवनोद भात्र है औय भेयी इस फात को सच्ची सभझकय तू फेहोर् होती है ? हे रुजमभणी ! तू अऩने होर् भें आ जा।" अथाशत ् हे फुद्धि ! तू अऩने र्ुि होर् भें आ जा। सॊसाय की फातों भें फेहोर् भत हो।
  • 25. तुम्हायी फुद्धि, तुम्हायी रुजमभणी होर् भें आ जाम ऐसी श्रीकृष्ण की औय सदगुरूओॊ की इच्छा है । रुजमभणी सचेत हुई। जाग्रत होकय बगवान से फोरी् ''स्वाभी ! आऩ जो कहते हैं वह त्रफल्कर मथाथश कहते हैं। हभाया कजोडा हुआ है । कहाॉ तो ु भैं हाड-भाॊस की दे ह भें यभण कयने वारी औय कहाॉ आऩ आत्भायाभी..... ननष्करॊक ननजानन्द भें यभण कयने वारे ? आऩ कहते हैं कक हभाये नगय का यास्ता कोई नहीॊ जानता। हे प्रबु ! आऩ अॊतमाशभी सवश ननमॊता हैं औय रृदम-गहा भें यहते हैं। इससरए यजोगणी तभोगणी याजा औय ु ु ु भोहऩार् भें फॊधे हुए जीव आऩक गाॉव का भागश नहीॊ जानते हैं। कोई द्धवयरा जजऻासु गरू प्रसाद े ु से आऩक गाॉव ऩहुॉचने का प्रमास कयता है तफ द्रायका से ननकरकय कृऩा कयक उसका हाथ े े ऩकडते हो तबी भराकात होती है । आऩने मथाथश कहा है दे व ! ु आऩका हभाया कजोडा हुआ है इसभें दसयी फात मह है कक हे प्रबु ! भैं भनत, छोटी-छोटी ू फातों भें उरझने वारी औय आऩ भनत क साऺी, अनन्त-अनन्त भनतमाॉ जजससे प्रकट हो-होकय े रीन हो जाम। कहाॉ एक फॉूद औय कहाॉ भहासागय ! मह तो कजोडा ही हुआ है रेककन आऩकी उदायता से सुन्दय जोडा फना सरमा है तो हे नाथ ! मह सजोडा फना ही यहे ऐसी कृऩा कयना। हे स्वाभी ! आऩने कहा कक याजा आऩका द्रोह कयते हैं। हे प्रबु ! आऩकी मह फात बी मथाथश है । जो धन क भद भें है , सर्त्ा क भद भें हैं वे सजच्चदानॊद ऩयभात्भ-यस से द्धवभुख हैं, वे े े आऩका द्रोह कयते हैं। हे नाथ ! आऩ कहते हैं कक हभ एकाकी आत्भायाभी हैं। तो आऩ एकाकी हैं , अनेकों भें बी सफ आऩ ही हदखते हैं। अनेक अन्त्कयणों भें , अनेक भनों भें बी सफ आऩ ही हदखते हैं। अनेक अन्त्कयणों भें , अनेक भनों भें , अनेक आॉखों भें आऩ एकाकी सत ् गचत ् आनन्द स्वरूऩ दे खने वारे हैं। अनेक भें आऩ ही तो हैं। अनेक वऺों भें यस रेने की सर्त्ा आऩ हैं, अनेक ऩक्षऺमों भें ृ ककरोर कयने की सर्त्ा आऩ हैं। अनेक आॉखों भें दे खने की सर्त्ा आऩ ही की है । अनेक भनों भें सॊकल्ऩ-द्धवकल्ऩ क साऺी आऩ हैं। अनेक फुद्धिमों क उदबवस्थान आऩ हैं । अनेक सद्धद्शमों की े े ृ उत्ऩद्धर्त्, जस्थनत औय प्ररम क आधायबत अगधद्षान आऩ हैं। इससरए आऩ एकाकी हैं। े ू श्रीकृष्ण ने कहा था कक हभ तो उदासीन हैं। स्त्री, ऩुत्र-ऩरयवाय, धन आहद से अनासि हैं। साधक को चाहहए की वह स्त्री का ऩारन ऩोषण तो कये , फच्चों को ठीक से दे खबार, ऩढ़ाई-सरखाई कये , कयवाम भगय बीतय से उदासीन बी यहे । उद्=ऊचा अथाशत ् ऩयभात्भा। उस ॉ ऩयभात्भा भें आसीन हुआ कये । जफ साधक की भनत उदासीन होगी, ऩयभात्भा भें आसीन होगी तफ उसकी भनत से ऩुकाय होगी कक् "हे ऩयभात्भा ! भैं तो तुझे ही वरू, तुझे ही ऩाऊ।" ॉ
  • 26. बगवान कहते हैं- "हे रुजमभणी ! भैं तुझे वयदान दे ता हूॉ। श्रेद्ष से श्रेद्ष है 'वयदान'। वय भाना अबीद्श। अबीद्श का दान = वयदान। भैं तुझे वयदान दे ता हूॉ औय वयदान भें श्रेद्ष से श्रेद्ष होता है अऩने आऩको दे डारना। भैं तुझे अऩने आऩका ही दान दे डारता हूॉ।" श्रीकृष्ण की याजनीनत से औय श्रीकृष्ण क व्मवहाय से बायत ने अगय ठीक से प्रेयणा ऩा े री होती तो अबी 41 सार भें द्धवद्वबय की भहान ् सर्त्ाओॊ भें ऩहरा नॊफय होता अऩने बायत दे र् का। श्रीकृष्ण का जीवन ऐसा था। हभ रोगों ने ममा ककमा ? कृष्ण कन्है मे को भमखन धय हदमा् "कृ ष्ण कन्है मा की जम.....।" कपय भमखन फाॉटा तो जो अऩना कीका है उधय हाथ ज्मादा गमा, ऩडोसी क कीक की तयप हाथ कभ गमा। 'हभ बगत हैं' ऐसा कहराने की रारच हो गई। े े हभ 'उदासीन' नहीॊ हुए, आसि हो गमे। भामा भें ऩड गमे। तरसीदास जी भहायाज कहते हैं ु भोहननर्ा सफ सोवनहाया। दे खहहॊ सऩने अनेक प्रकाया।। सॊमभभूनतश बीष्भ गॊगाऩुत्र बीष्भ द्धऩताभह गॊगाद्राय-हरयद्राय भें तऩ कयने गमे। तऩ कयते-कयते उनका तन कृर् हो गमा। उनका प्रेभ सॊसाय की तयप न ऩडते हुए ऊऩय की ओय उठा, ऩयभात्भा क तयप े गमा। मोग साधकों औय मोगी ऩरुषों का अनबव होता है कक भन औय प्राण जफ ऊऩय क कन्द्रों ु ु े े भें होते हैं तफ ननबीक औय सत्म-सॊकल्ऩ क साभथ्मशवान होने रगते हैं। ऺुद्र आकाॊऺाओॊ से भन े औय प्राण नीचे क कन्द्रों भें यहते हैं। जफ काभ-वासना होती है तफ भन औय प्राण नीचे क कन्द्रों े े े े भें आ जाते हैं। जफ आऩ र्ि बाव भें होते हो तफ ऊऩय क कन्द्रों भें होते हो। ु े े उऩवास आहद भन औय प्राण को ऊऩय उठाने भें सहमोगी हैं। र्यीय भें दोष न हो तो उऩवास से गचर्त् एकाग्र होता है । अरफर्त्ा, उऩवास मथामोग्म कयना चाहहए। उऩवास, प्राणामाभ, धायणा, ध्मान आहद कयक गॊगाऩुत्र बीष्भ ने गॊगाद्राय-हरयद्राय भें े तऩस्मा की। तऩस्मा का मह भतरफ नहीॊ कक नॊगे ऩैय चरना, ऩानी उफारकय ऩीना। तऩस्माएॉ कई प्रकाय की होती हैं- र्ायीरयक तऩ, भानससक तऩ आहद। सफ तऩों भें श्रेद्ष तऩ भाना गमा है एकाग्रता। श्रीभद् आद्य र्ॊकयाचामश ने कहा् 'भन-इजन्द्रमों को सॊमत कयक एकाग्रगचर्त् होना सफ धभों भें श्रेद्ष धभश है , तफ तऩों भें श्रेद्ष े तऩ है । तऩ् सु सवेषु एकाग्रता ऩयॊ तऩ्।
  • 27. बीष्भ ने एकाग्रताऩूवक सभागध की। उनका सॊकल्ऩ था कक बगवान ब्रह्मा जी प्रसन्न हों। श सॊकल्ऩ क अनुसाय आऩका गचर्त् जफ एकाकाय होता है तफ जजसक प्रनत आऩका सॊकल्ऩ होता है े े उसको सॊकल्ऩऩूनतश क सरए आभॊत्रत्रत कय दे ता है । े बगवान ब्रह्माजी ने अऩने भानस ऩुत्र ऩुरस्म को फुरामा। आदे र् हदमा कक् "गॊगाऩुत्र गॊगाद्राय भें तऩ कय यहे हैं। उनकी सफ भनोकाभना ऩूणश कयने का वयदान दे आओ। वे जो चाहते हैं वह जाकय दे आओ।" आकार् भागश से भहातेजवान बगवान ब्रह्मजी क भानस ऩत्र ऩरस्त्म ऋद्धष आमे औय े ु ु गॊगाऩत्र को कहा् ु "हभाये द्धऩता ब्रह्माजी आऩक तऩ से खफ प्रसन्न हैं। आऩ ममा चाहते हैं ?" े ू तफ बीष्भ कहते हैं- "हभ चाहते हैं कक हभको सत्सॊग सभर जामे।" जीव क ऩास धन न हो, सर्त्ा न हो औय उसको तयना हो तो ममा कये ? व्रत बी एक फडा े साधन है , बगवन्नाभ का जऩ बी एक फडा साधन है । जीव को जल्दी भोऺ चाहहए तो वह ममा कये ? याजनीनत क प्रद्ल, सभाज क उिाय क प्रद्ल औय जीव क भुि होने क प्रद्ल, तभाभ प्रकाय े े े े े क प्रद्ल बीष्भ ने ऩूछे औय सत्सॊगनत की। े मह प्रद्लोर्त्य ऩद्म ऩुयाण भें एकत्रत्रत है । बीष्भ की तऩस्मा से साधकों को प्रकार् सभरता है कक अगय ककसी सत्सॊग भें आत्भऻान का सूक्ष्भ यहस्म सभर जाम, ऻान-प्रकार् सभर जाम तो ठीक है , अन्मथा सत्सॊग प्रानद्ऱ क सरए े तऩ कयना चाहहए औय तऩ से सॊतुद्श होकय बगवान ककसी न ककसी अऩने सॊत को बेजकय आऩके जीवन भें ऻान का प्रकार् कय दे ते हैं। सत्सॊगनत से गॊगाऩुत्र बीष्भ क जीवन भें ऐसा ऻान का प्रकार् हो गमा कक भहाबायत क े े मुि क फाद फावन हदन तक फाणों की र्य्मा ऩय यह सक। े े बीष्भ द्धऩताभह जफ प्राणों की र्य्मा ऩय ऩडे थे तफ धभशयाज मुगधद्धद्षय श्रीकृष्ण क दर्शन े कयने गमे। दे खा तो श्रीकृष्ण ध्मानभग्न हैं। मुगधद्धद्षय चककत हो गमे कक त्रत्ररोकी जजनका ध्मान कयती हैं ऐसे ऩूणाशवताय त्रत्ररोकीनाथ बगवान श्रीकृष्ण ककनका ध्मान कय यहे हैं। बगवान जफ ध्मान से उठे तो मुगधद्धद्षय फोरे् "बगवान ! भैं जो ऩूछने आमा हूॉ वह तो फाद भें ऩूछ रॉ ूगा ऩय अफ भेया प्रद्ल है कक आऩ ककसका ध्मान कय यहे थे ?" "भैं ध्मान कय यहा था बीष्भ द्धऩताभह का। वे अबी फाणों की र्य्मा ऩय ऩडे हैं औय अन्त्कयण ऩूवक भेया ध्मान कय यहे हैं। हे मुगधद्धद्षय ! इस सभम ऩथ्वी ऩय बीष्भ जैसा श ृ याजनीनतऻ दसया कोई नहीॊ, बीष्भ जैसा धभश-धयॊधय कोई नहीॊ, बीष्भ जैसा वीय कोई ऺत्रत्रम ू ु
  • 28. नहीॊ, बीष्भ जैसा इस रोक औय ऩयरोक क कल्माण क भागश का ऻाता कोई नहीॊ। अबी बीष्भ े े का अन्त सभम है इससरए तुभ वहाॉ चरो औय बीष्भ से कछ ऻान ऩा रो।" ु श्रीकृष्ण सराह दे यहे हैं धभशयाज मुगधद्धद्षय को। मुगधद्धद्षय कहने रगे कक् "बीष्भ द्धऩताभह अऩने प्रनतऩऺ भें थे। हभाये सैन्म ने उन्हें फाणों से फीॊधा है । हभ उनक ऩास जाएॉगे तो कद्धऩत हो जाएॉगे। औय र्ाऩ दे दें गे।" े ु "नहीॊ, वे कद्धऩत नहीॊ होंगे। वे जानते हैं कक जो होने वारा था वही हुआ। वे याग-द्रे ष से ु यहहत भहाऩरूष हैं।" ु मि क ऩहरे श्रीकृष्ण सॊगध-दत फनकय गमे थे। सॊगध कयाने भें असपर यहे , ममोंकक जो ु े ू होने वारा था उस तयतीव्र को कौन योक ? श्रीकृष्ण को उद्रे ग नहीॊ हुआ कक हाम ये हाम ! भैं े असपर हो गमा। 'नयो वा कजयो वा' क प्रसॊग भें सपर यहे , भहाबायत क मि भें सपर हुए तो ॊु े े ु श्रीकृष्ण को ऐसा नहीॊ हुआ कक वाह वाह ! हभ सपर हो गमे। जीव जया सी फात भें ननष्पर होता है तो ऩॊद्रह सोऩान गगय जाता है । चाय ऩैसे कभाने भें सपर होता है , चाय ऩैसे का पनीचय फनाने भें सपर हो जाता है , जीवन भें अगय चाय कभये फना रेता है तो फडे-फडे रोगों को उदघाटन भें फुराकय हदखाता है कक भैंने मह सफ फनामा है । वास्तुऩूजा भें जजनको फुरामा है वे भकान से प्रबाद्धवत हों औय अऩना अहॊ ऩोद्धषत हो, प्राम् गहयाई भें मह होता है । मह जीव का स्वबाव है । श्रीकृष्ण कहते हैं- "बीष्भ हाय औय जीत को, सुख औय द्ख को, सपरता औय द्धवपरता ु को ननमनत भानते हैं। वे अच्छे धभश धयॊधय हैं। अत् हे धभशयाज ! तुभ चरो, उनसे कछ जान ु ु रो। वे तुम्हें नहीॊ डाॉटेंगे, कछ नहीॊ कहें गे।" ु दोनों बीष्भ क ऩास ऩहुॉच। बीष्भ ने श्रीकृष्ण को प्रणाभ कयक कहा् "बगवान ! आऩ े े े कहते हैं तो धभशयाज को उऩदे र् दॉ गा। ककन्तु भैं अबी फाणों की र्य्मा ऩय ऩडा हूॉ। भैंने इस जन्भ ू भें तो ऐसा कोई ऩाऩ नहीॊ ककमा। भैं मह बी जानता हूॉ कक कोई ककसी क सुख औय द्ख का े ु दाता नहीॊ। अऩने ही कभों का पर सभरता है । आदभी ऐसा कोई दद्श काभ कयता है कक उसे ु द्ख सभरते हैं। उसी क ही सुकृत साभने वारे क रृदम भें स्परयत होकय सुख दे ते हैं। अऩने ही ु े े ु कभों का प्रनतत्रफम्फ ऩडता है । वही सुख-द्ख होकय आता है कपय बी भैं दे खता हूॉ कक 73 जन्भ ु भें भैंने ऐसा कोई कभश नहीॊ ककमा कक भुझे फाणों की र्य्मा ऩय सोना ऩडे। श्रीकृष्ण भुस्कयाकय फोरे् "हे सॊमभभूनतश बीष्भ ! 73 जन्भ तक आऩ ध्मान क द्राया े अऩनी स्भनत को रे गमे, एक जन्भ औय ऩीछे रे जाते तो ऩता चर जाता। 74वें जन्भ भें आऩ ृ ककर्ोय थे। वन भें घूभने गमे। आक क ऩर्त्े ऩय फैठी हटड्डी क र्यीय भें फफूर का र्ूर चबामा े े ु था। उस क्रय कभश का पर घूभते-कपयते अफ सभर यहा है ।" ू छ् सार भें दगना, फायह सार भें चाय गुना, अठायह सार भें आठ गुना औय चौफीस सार ु भें सोरह गना – इस प्रकाय चक्रवद्धि सद क साथ कभों का पर सभरता है । ु ृ ू े
  • 29. इससरए कृऩानाथ ! आऩ जफ कर्त्ाश होकय कभश कयते हैं तो कभश कयने से ऩहरे चाय कदभ सोच रेना कक, इस कभश का पर ममा ? इससे ममा चीज सभरेगी ? कफ तक हटकगी ? ऩाऩ े ममों करू ? सत्कभश कयता हूॉ तो इसका पर नद्वय चाहूॉ मा र्ाद्वत चाहूॉ ? इस प्रकाय अगय ॉ आऩकी फुद्धि भें प्रकार् होगा तो आऩकी रुजमभणी कृष्ण-साऺात्काय का वयदान ऩचा सकगी,े सॊसाय क प्रेभ भें नहीॊ ऩडेगी। े बीष्भ ने मुगधद्धद्षय को उऩदे र् हदमा। वह भहाबायत भें र्ाॊनतऩवश कहराता है । वह ऻान सभझने जैसा है । अनक्रभ ु ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ हययामदासजी भहायाज औय फादर्ाह ससमखों क सातवें गुरू हययामदासजी भहायाज ऻान भें इतने ननऩुण कक हॉ सते-हॉ सते बिों े क गचर्त् को ऩढ़ रेते औय हॉ सते-हॉसते उनक प्रद्लों क उर्त्य दे दे ते। फोरने की छटा ऐसी अदबुत े े े कक सुनने वारा कबी ऊफता नहीॊ। सबा भें आणखयी फुद्धि का आदभी औय अव्वर फुद्धि का आदभी, दोनों यसऩान कय सक, सभझ ऩामें ऐसा विृत्व उनक ऩास था। विा की कर्रता मह है ें े ु कक सबा भें जफ वह फैठे तो उसकी वाणी क द्राया, उसक आध्माजत्भक प्रबाव द्राया सबाजनों का े े गचर्त् तदाकाय हो जाम। सबा क छोटे से छोटे आदभी को बी कछ घूॉट सभरता जाम, भध्मभ को े ु बी सभरता जाम, ऊचे को बी सभरता जाम औय ऊचे औय नीचे, छोटे औय भोटे से बी जो ऩाय ॉ ॉ होने की मोग्मता वारे हैं उनको बी यस सभर जाम, मह ब्रह्मवेर्त्ा विा क विृत्व की कर्रता है । े ु हययाम साहफ ऐसे कर्र थे। ु एक फाय वे बिों क फीच अऩनी ऻानगॊगा फहा यहे थे। ककसी सूक्ष्भ द्धवषम की व्माख्मा े कय यहे थे, तत्त्वचचाश कय यहे थे, ककसी क प्रद्ल का उर्त्य दे यहे थे। इतने भें तुकस्तान का े श फादर्ाह वहाॉ आमा जो उनकी ख्मानत सुनकय अऩने र्ॊका-सभाधान क सरए आमा था। दे खा कक े हययामदासजी की वाणी भें कछ आकषशण है , कछ अनुबव है , कछ सच्चाई है , कछ यस है । ु ु ु ु प्रद्लोर्त्य सभाद्ऱ हुए तो तुकनये र् ने हाथ जोडकय प्राथशना की् श "हे सॊतप्रवय ! भैं आऩका नाभ सुनकय आमा हूॉ।" प्रद्लोर्त्य होने का भौका ऩाकय भैं अऩने को फडा बाग्मवान भानता हूॉ। वषों से भेये गचर्त् को एक प्रद्ल सता यहा है । कई भल्रा-भौरद्धवमों ु से, उऩदे र्कों से उसका ननयाकयण ऩछता आमा हूॉ। आज तक भझे सॊतोष नहीॊ हुआ है । भेये प्रद्ल ू ु का उर्त्य नहीॊ सभरा है । हे सॊतप्रवय ! हे बगवत्स्वरूऩ ! आऩ खदातारा क खास इन्सान हैं। आऩ अगय इजाजत दें ु े तो भैं अऩना प्रद्ल ऩछकय अऩना हदर हल्का कयना चाहता हूॉ। ू
  • 30. "ऩूछो.... ऩूछो, नन्सॊकोच होकय ऩूछो।" हययामजी ने कहा। फादर्ाह फोरा् "भहॊ भद ऩैगम्फय हो गमे, जन्नेद हो गमे, कई अवताय हहन्दओॊ भें हो गमे, ु ु ककतने ऩीय हो गमे, ककतने पकीय हो गमे, ककतने ऩैगम्फय हो गमे, ककतने जनत हो गमे, ककतने जोगी हो गमे। भेया प्रद्ल मह है कक खदातारा ज्मादा से ज्मादा ससपारयर् ककसकी भानता है , ऩीयों ु की ससपारयर् भानता है कक ऩैगम्फयों की भानता है कक पकीयों की भानता है कक बिों की भानता है कक मोगगमों की भानता है ? अगय ऩैगम्फयों की भानता है तो उसभें कौन से ऩैगम्फय की भानता है ? जजसकी ज्मादा से ज्मादा ससपारयर् चरती हो उसका नाभ फताइमे ताकक भैं उसको याजी कय रॉ ू औय अऩना काभ फना रॉ ।" ू इस प्रद्ल से सबा भें सन्नाटा छा गमा। हययामजी बी र्ाॊत हो गमे घडीबय औय जहाॉ बगवान मोगेद्वय आत्भ-द्धवश्राॊनत ऩाते हैं, जहाॉ से साया ऻान, साया प्रकार्, साया प्रेभ औय साये हदव्म गण स्परयत होते हैं उस हदव्म स्वरूऩ भें ध्मानस्थ हो गमे। कपय कहा् ु ु "बाई बाई ! बगवान ककसी ऩीय ऩैगम्फय, ककसी जानत-सती की ससपारयर् से ही सभरें ऐसा कोई जरूयी नहीॊ। बगवान का घट-घट वास है । हय व्मक्ति जजतनी सच्चाई से, उत्साह से, ईभानदायी से उनको ऩुकायता है , प्माय कयता है औय उनक सरमे जीता है उतना ही वे उसक े े यास्ते का प्रकार् फढ़ाते जाते हैं औय उतना ही वे जल्दी सभरते हैं। जजसकी जजऻासा तीव्र है , जजसकी साधना तीव्र है , जजसकी तत्ऩयता तीव्र है उस साधक को तो सॊतों क द्राया बी बगवान प्रकार् दे ते हैं। अॊदय अॊतमाशभी होकय बी प्रकार् दे ते हैं। े ककसी की ससपारयर् क इन्तजाय की तुम्हें जरूयत नहीॊ। तुभ जो व्मवहाय कयते हो, प्रजा े का ऩारन कयते हो तो 'प्रजा क अन्दय छऩे हुए अन्तमाशभी ऩयभात्भा भुझे दे ख यहे हैं' ऐसा े ु सोचकय काभ कयो औय ऩुत्र-ऩरयवाय से सभरते हो तो.... नन्स्नेह् ऩुत्रदायादौ ननष्काभो द्धवषमेषु च। ननजद्ळन्त् स्वर्यीये ऽद्धऩ ननयार्् र्ोबते फुध्।। 'ऩुत्र औय स्त्री आहदकों भें स्नेहयहहत औय द्धवषमों भें काभनायहहत औय अऩने र्यीय भें गचन्तायहहत ऻानी ननयार् होकय ही र्ोबामभान होता है ।' (अद्शावक्रगीता् 18.84) इजन्द्रमाथेषु वैयाग्मॊ अनहॊ काय एव च। जन्भभत्मुजयाव्मागधद्खदोषानुदर्शनभ ्।। ृ ु 'इस रोक औय ऩयरोक क सम्ऩूणश बोगों भें आसक्ति का अबाव औय अहॊ काय का बी े अबाव, जन्भ, भत्मु, जया औय योग आहद भें द्ख औय दोषों का फाय-फाय द्धवचाय कयना (मह ृ ु ऻान है )।' (बगवद गीता् 13.8)
  • 31. इजन्द्रमों क अथश भें वैयाग्म कयो। आॉखों को फताओ कक अफ ककतना-ककतना दे खोगे ? ममा- े ममा दे खोगे ? आॉखें कची जैसी घूभती यहती हैं। बय हदमा सफ खोऩडी भें , अफ ममा दे खना है ? ैं व्मथश का दे खने से, व्मथश का सुनने से फुद्धि स्थर हो जाती है । इधय-उधय क ककस्से ू े कहाननमाॉ भजस्तष्क भें बयकय फुद्धि कटकय बय जाता है । अगय सॊमभ कये गा तो फुद्धि सूक्ष्भ होगी ू औय खद ही यभ यहा है उस खदा क द्धवषम भें तुम्हायी रुजमभणी (फुद्धि) सोचने रगी। खदा क ु ु े ु े गुणों का ऻान होगा। कपय गुरूरूऩी ब्राह्मण को ऩत्र दे गी औय वह अन्तमाशभी कृष्ण इस फुद्धि का हाथ ऩकडकय अऩनी बामाश फना रेंगे। तस्म प्रऻा प्रनतद्धद्षता। फद्धि कपय कृष्ण तत्त्व भें , ब्रह्मतत्त्व भें प्रनतद्धद्षत हो जामेगी। ससपारयर् चरती है मह प्रद्ल ु नहीॊ है । कौन से साधक की ककतनी तीव्रता है , ककतनी ईभानदायी है , ककतनी फद्धि की सक्ष्भता है ु ू मह भहत्त्वऩभश है । ू जजतनी फद्धि की सक्ष्भता होगी, साधना भें जजतनी तत्ऩयता होगी उतना ही साध्म जल्दी ु ू से प्रकट हो जामगा। आऩ प्रद्ल का ऐसा मुक्तिमुि, र्ास्त्र-सम्भत औय अनुबवसम्ऩन्न उर्त्य सुनकय फादर्ाह का रृदम धन्मवाद से बय गमा। भहाऩुरूष क चयणों भें झक-झुककय प्रणाभ ककमे। े ु वषों तक की भजदयी से नहीॊ सभरता वह प्रकार् हॉ सते-हॉ सते सभरता है । धन्म है वह ू सत्सॊग ! ऐसा सत्सॊग ऩाने क सरए बीष्भ ने तऩ ककमा था। े बीष्भ क तऩ से ससि होता है कक अगय तत्त्वऻान का सूक्ष्भ सत्सॊग न सभरे तो ध्मान े बजन, जऩ-तऩ कयक बी आत्भऻान का सत्सॊग ऩाने का ही मत्न कयो, ममोंकक सवोऩरय े आत्भऻान है । आत्भराबात ् ऩयॊ राबॊ न द्धवद्यते। आत्भसुखात ् ऩयॊ सुखॊ न द्धवद्यते।। मह अद्रै तऻान है । इससे साये सदगुण ऩैदा होते हैं। द्धवद्वबय की र्ॊकाओॊ का सभाधान कवर वेदान्त क ऻान से ही आता है । द्धवद्वबय क बगवानों, अवतायों, ऩीय-ऩैगम्फयों का े े े आधायबूत ऻान अद्रै त से ही प्रकासर्त हुआ। इससरए अद्रै तऻान, एकात्भवाद का जो प्रकार् है वह जीवन भें सुख-र्ाॊनत दे ता है । भयने क फाद भुक्ति नहीॊ, उधायी भुक्ति नहीॊ, जीते जी अऩने र्ुि, े फुि, भुि स्वरूऩ का साऺात्काय कया दे ता है । इससरए बगवान महाॉ कहते हैं- उदासीना वमॊ नूनॊ स््माऩत्माथशकाभुका्। आत्भरब्ध्माऽऽस्भहे ऩूणाश गेहमोज्मोनतयकक्रमा्।। 'ननद्ळम ही हभ उदासीन हैं। हभ स्त्री, सॊतान औय धन क रोरुऩ नहीॊ हैं। हभ ननजष्क्रम हैं े अथाशत ् आत्भा कछ कयता नहीॊ है , ऐसे हभ आत्भा हैं। हभ दे ह-गेह से सम्फन्धयहहत हैं। दे ह औय ु घय से तो भभता का सम्फन्ध है । भभता फढ़ी मा कभ हुई, उसको हभ दे खने वारे हैं।'
  • 32. जैसे बगवान भभता को दे खने वारे हैं ऐसे ही अन्तमाशभी रूऩ भें आऩ बी तो भभता को दे खने वारे हैं। आऩ नाहक भभता से जड जाते हैं कक भेया घय से सम्फन्ध है , भेया पमरी से ु ै सम्फन्ध है । तुम्हाया घय से, पमरी से, ऑकपस से, दकान से सम्फन्ध नहीॊ है । अगय तुम्हाया ै ु उनसे सच्चा सम्फन्ध होता तो तुम्हाये चरे जाने से घय-पमरी-ऑकपस-दकान को तुम्हाये साथ ही ै ु स्भर्ान भें यवाना कय हदमा जाता। तुम्हाया इन चीजों से सम्फन्ध भाना हुआ है । ऩयभात्भा के साथ तुम्हाया सम्फन्ध वास्तद्धवक भें है । जो भाना हुआ सम्फन्ध है उससे भभता हटाओ। व्मवहाय चराओ औय जो सचभच भें ु सम्फन्ध है उसको जानकय तभ भक्ति का अनबव कय रो। ु ु ु जैसे बागवत क इस द्ऴोक भें बगवान श्रीकृष्ण रुजमभणी को अऩना अनबव फताते हैं ऐसे े ु ही एक हदन आऩ बी अऩनी रुजमभणी को अऩना अनबव फता सकते हो औय उसक ऩडोससमों को ु े बी फता सकते हो कक् "घय भें , ऩत्र भें , ऩरयवाय भें हभायी आसक्ति नहीॊ है , रोरऩता नहीॊ है । मह ु ु र्यीय बी हभाया नहीॊ, उसक सम्फन्ध बी हभाये नहीॊ। मे भामा भात्र हैं। हभ तो दीऩसर्खावत ् े साऺी हैं, दृद्शा हैं, असॊग हैं, ननत्म भुि हैं। ऩहरे हभको ऩता नहीॊ था, अफ सत्सॊग का प्रकार् हुआ तो ऩता चरा कक हजायों-हजायों जन्भ हुए र्यीय क, हजायों-हजायों र्यीय भय गमे कपय बी े हभ नहीॊ भये इससरए महाॉ हैं। हजायों द्ख आमे औय गमे, हभ नहीॊ गमे। हजायों सख आमे, चरे ु ु गमे हभ नहीॊ गमे। सैंकडों भान क प्रसॊग आमे, चरे गमे, अऩभान क प्रसॊग आमे चरे गमे। इन े े सफको दीऩसर्खावत ् प्रकार्ते हुए हभ चैतन्म, साऺी, कृष्णतत्त्व, अॊतमाशभी आत्भा हैं। 'सोऽहभ ्...' इस प्रकाय का आऩका अनुबव प्रकट हो जाम, आसायाभ की ऐसी आर्ा है । अनुक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जीवनमोग तस्भात ् मुिजन्द्रमग्राभो मुिगचर्त् इदॊ जगत ्। े आत्भनीऺस्व द्धवततॊ आत्भानॊ भय्मधीद्वये ।। 'इससरए गचर्त् औय इजन्द्रमों का सॊमभ कयक जगत को अऩने भें दे खना औय अऩने े व्माऩक आत्भा को ऩयभात्भा भें दे खना चाहहए।' (श्रीभद् बागवत् 11.7.9) श्रीभद् बागवत भें बगवान उिव से कहते हैं- जो उन्नत द्धवचाय क आदभी हैं वे अऩने े गचर्त् औय इजन्द्रमों को सॊमत कयें । जगत को अऩने भें दे खें। अऩने आत्भा को आनजन्दत कयें , अऩने आत्भ-स्वबाव को जगामें।
  • 33. सच्ची ऩत्नी वह है जो ऩनत को सहमोग दे औय सच्चा ऩनत वह है जो ऩत्नी को सहमोग दे । सच्चा सभत्र वह है जो सभत्र को सहमोग दे । सच्चा सहमोग वह है जो उनको स्वतन्त्र कय दे । सच्ची स्वतॊत्रता वह है जजसभें त्रफना द्धवषम क, त्रफना द्धवकायों क, त्रफना ऩाऩ औय ताऩ क े े े सुखी यह सक। ें मही सच्ची स्वतन्त्रता है औय इसी स्वतन्त्रता भें ऩहुॉचाने वारा सहमोग सच्चा सहमोग है । जो स्त्री अऩने ऩनत को अऩने दे ह भें कजन्द्रत कयक सख दे ना चाहती है , जो ऩनत अऩनी े े ु ऩत्नी का दे ह नोचकय ही सखी यहना चाहता है , वास्तव भें वे दोनों एक दसये क हहतैषी नहीॊ हैं, ु ू े कल्माण कायी नहीॊ हैं, एक दसये क र्त्रु ही हैं। ू े सच्ची ऩत्नी वह है जो ऩनत को प्रेभ दे कय उसक प्रेभ को ऩयभात्भा भें ऩहुॉचाने का प्रमत्न े कये । सच्चा ऩनत वह है जो ऩत्नी को सभझ दे कय, उसकी सभझ जहाॉ से स्परयत होती है उस ु अगधद्षान की तयप से जाने भें सहमोग कये । ऐसे ऩनत-ऩत्नी एक दसये क ऩयभ हहतैषी हैं , एक ू े दसये क ऩयभ कल्माणकायी हैं। ू े फारक स्नेह कयता है , स्नेह फयसाता है । वह नही दे खता तुम्हाये धन को, नहीॊ दे खता तुम्हाये ऩद प्रनतद्षा को, नहीॊ दे खता तुम्हायी कससशमों को। वह तो प्रेभ फाॉटता है । उस फारक से ु प्रेभ कयना सीखो। उन सर्ष्मों से बी सीखो जो ननदोष प्रेभ फाॉटकय अऩनी दृद्धद्श द्धवद्वव्माऩी फनाते हैं। जागनतक वस्तुओॊ क त्रफना आऩका व्मवहाय तो नहीॊ चरता। तो ममा कयें ? जागनतक े वस्तुओॊ से, द्धवषमों से औय जागनतक सम्फन्धों से जो आऩको हषश आता है , आनॊद आता है उस हषश औय आनॊद को आऩ बीतय रे जाओ औय बीतय क सच्चे आनन्द का प्रकटाकय द्धवद्व भें े व्माऩक कय दो.... आऩकी दृद्धद्श व्माऩक हो जामेगी, ब्रह्माकाय फन जामेगी। सॊसाय की वस्तुओॊ का अत्मॊत अनादय नहीॊ कय सकते, सॊसाय क व्मवहाय का अत्मॊत े अनादय नहीॊ कय सकते। साथ ही साथ सॊसाय क सम्फन्धों भें , व्मवहाय भें , वस्तुओॊ भें आसक्ति े कयक अऩने द्धवनार् बी तो नहीॊ कयना चाहहए। े सॊसाय क सम्फन्ध हों, अच्छा है । ऩनत-ऩत्नी का सम्फन्ध हो, अच्छा है । द्धऩता-ऩुत्र का े सम्फन्ध हो, अच्छा है । भाॉ-फेटे का सम्फन्ध हो, अच्छा है । बाई-फहन का सम्फन्ध हो, अच्छा है । सभत्र-सभत्र का सम्फन्ध हो, अच्छा है । रेककन.... आदभी जफ इन सम्फन्धों भें ऩूणश रूऩ से उरझ जाता है तफ मे ही सम्फन्ध उसक सरए े नयक क द्राय खोर दे ते हैं। जीते जी अर्ाॊनत, करह औय द्धवद्रोह की आग भें जरना ऩडता है औय े भयने क फाद नयकों की मात्रा कयनी ऩडती है । मह प्रकृनत का अकाट्म ननमभ है । े
  • 34. तुम्हाये बीतय छऩे हुए स्नेह औय आनन्द को जगाने क सरए तुम्हें फाहय क पर, फाहय ु े े ू क पर, फाहय की हवाएॉ, फाहय की सुद्धवधाएॉ, फाहय क सम्फन्ध, फाहय क स्नेही-सभत्र-ऩडोसी हदमे े े े जाते हैं ताकक तुभ बीतय क स्नेह औय आनॊद तक, बीतय क ऩयभ स्नेही औय सभत्र तक ऩहुॉच े े जाओ, बीतय की सुवास तक ऩहुॉच जाओ औय आत्भानॊद क पर को ऩा रो। तुभ फाहय से बीतय े जा सको। इसीसरए प्रकृनत ने मह सफ व्मवस्था की है । रेककन..... तभ फाहय क सहायों भें उरझ जाते हो। जैसे, फच्चा भेज क सहाये खडा है । भेज हटा ु े े हदमा जाता है तो फच्चा गगय जाता है । प्रकृनत बी तम्हें फाहय क सहाये दे ती है ताकक तभ उनक ु े ु े द्राया खडे होकय कपय आत्भननबशय फन जाओ, ऩयन्तु तभ उन सहायों भें उरझ जाते हो। ु आत्भननबशय होने क फजाम ऩयाधीन फन जाते हो। सख क सरए फाह्य ऩदाथों, वस्तओॊ, व्मक्तिमों े ु े ु की तयप ताकते यहते हो। रेककन प्रकृनत भाता फडी दमारु है । हदमे हुए सहाये हटाकय तम्हें ु सावधान कयती यहती है । तुभ फाहय क पर-पर, चीज-वस्तुए, स्नेही सभत्र, सम्फन्धों क सहाये हो जाते हो तो े ू ॉ े सभम ऩाकय वे सहाये ही तुम्हे नन्सहाम फनाने रगते हैं। तुम्हाये सभत्र ही र्त्रता कयने रगते हैं, ु सपरता असपरता का रूऩ धायण कयने रगती है । मह प्रकृनत का त्रफल्कर अकाट्म ननमभ है । ु ज्मों ही तुभने उन चीजों ऩय अऩना आत्भकन्द्र यखा, उन चीजों ऩय बयोसा ककमा, उन सम्फन्धों े ऩय बयोसा ककमा, उनक सहाये ही खडे यहे त्मों ही वे सफ सहाये एक-एक कयक हटा हदमे जामेंगे। े े द्धप्रम ऩदाथश छीन सरमे जाएॉगे। सम्फन्ध खट्टे होने रग जामेंगे। प्रकृनत भाता आऩकी उन्ननत क सरए हय चीज दे ती है । जैसे, भाॉ फच्चें को चरना ससखाने े क सरए गाडी दे ती है । अगय फच्चा गाडी से गचऩका ही यहे तो भाॉ थप्ऩड भाय कय गाडी छडा दे ती े ु है । फच्चा छोटा है तो भाॉ गोद भें सुराकय ऩम्ऩान कयाती है ऩयन्तु वही भाॉ सभम आने ऩय नीभ का यस अथवा कोई कडुवा यस स्तन ऩय रगाकय ऩम्ऩान छडाती बी है । ु ऐसे ही फाहय क सम्फन्धों की प्रायॊ सबक अनुकरता क द्राया तुभ ऩा ऩा ऩगरी चरो, े ू े चारनगाडी क सहाये चरो। ऩनत-ऩत्नी क द्राया, ऩुत्र-ऩरयवाय क द्राया जो यस आता है उसक सहाये े े े े अऩना बीतयी प्रेभ प्रकटाने क सरए तैमाय हो जाओ। इसीसरए मह सॊसायरूऩी फारभॊहदय है । उसभें े आसक्ति कयक गचऩकने क सरए औय उसक ऩयाधीन होने क सरए नहीॊ है । े े े े ज्मों ही उन सहायों ऩय आधारयत हुए कक धोखा खामा। जो ईद्वय ऩय बयोसा यखना चाहहए वह अगय सभत्र ऩय यखा तो वह सभत्र जरूय तुम्हाया र्त्रु हो जामगा मा धोखा कये गा मा तुभसे ऩहरे चर फसेगा। आणखय तुभको योना ही ऩडेगा। फाहय क धन का थोडा-फहुत उऩमोग कय रो, कोई भना नहीॊ, फाहय क वस्त्रों का उऩमोग े े कय रो, कोई भना नहीॊ। ककन्तु ज्मों ही तुम्हाया सख उन वस्त्रों ऩय आधारयत फनेगा त्मों ही ु वस्त्रों क ननसभर्त् तम्हें अर्ाॊनत ऩैदा होगी। भोटय गाडी का उऩमोग कयो रेककन ज्मों ही उसक े ु े
  • 35. आधाय ऩय तुम्हायी प्रनतद्षा फनेगी, जीवन सुखी बासेगा त्मों ही कछ न कछ गाडी द्धवषमक गडफड ु ु होगी। ईद्वय क ससवाम कहीॊ बी भन हटकामा तो कछ न कछ द्धवघ्न-फाधाएॉ आमेंगे ही। .....औय े ु ु आने ही चाहहए। इसी भें तुम्हाया हहत छऩा है । ु भानव ! तुझे नहीॊ माद ममा ? तू ब्रह्म का ही अॊर् है । कर गोत्र तेया ब्रह्म है, सदब्रह्म तेया वॊर् है ।। ु चैतन्म है तू अज अभर है, सहज ही सुख यासर् है । जन्भें नहीॊ, भयता नहीॊ, कटस्थ है अद्धवनार्ी है ।। ू तम्हाये कर-वॊर्-ऩयॊ ऩया दे खें तो भरत् ब्रह्म है , हाड-भाॊस-चाभ आहदवारे भाता-द्धऩता नहीॊ। ु ु ू हाड-भाॊस क भाता-द्धऩता जजससे स्परयत हुए, सद्धद्श का जो आहद कायण है , अबी बी सद्धद्श का जो े ु ृ ृ आधाय है , प्ररम क फाद बी जो यहता है वह सजच्चदानॊद ऩयब्रह्म ऩयभात्भा ही तम्हाया आहद े ु उदबव स्थान है । ब्रह्म की जात ही तम्हायी जात है । तम्हें गोद्धवन्दबाई कहना, भोती बाई कहना, ु ु तम्हें भनष्म कहना.... भझे रगता है कक भैं ईद्वय का अऩभान कय यहा हूॉ। तम्हें अगय ऩटे र ु ु ु ु कहता हूॉ तो भुझे रगता है भैं ईद्वय को गारी दे यहा हूॉ। तुम्हें एक व्मक्ति कहता हूॉ तो रगता है ऩयभात्भा का अनादय कय यहा हूॉ। वास्तव भें व्मक्ति मह र्यीय है । जजस हदन से तुभ इस र्यीय ऩय आधारयत हो गमे उसी हदन मह र्यीय तुम्हें द्ख, गचन्ता औय बम भें घेय रेता है । ु र्यीय तुम्हाया एक साधन है । ऐसे साधन तुम्हें हय जन्भ भें सभरते यहे हैं। न जाने ककतने-ककतने साधन आज तक तुम्हें सभरे। साधन को जफ तुभ साध्म-फुद्धि से ऩकड रेते हो तफ वही साधन तुम्हाये सरए पाॉसी फन जाता है । अथवशवेद क 31वें अध्माम का ऩहरा द्ऴोक है ् े ईर्ावास्मसभदॊ सवां मजत्क च जगत्माॊ जगत ्। ॊ तेन त्मिन बुॊजीथा भा गध् कस्म े ृ जस्विनभ ्।। 'इस जगत भें जो बी नाभ-रूऩात्भक स्थावय-जॊगभ ऩदाथश हैं वे सफ ईद्वय क द्राया े आच्छादनीम हैं। उस नाभ-रूऩात्भक प्रऩॊच का त्माग कयक अऩने वास्तद्धवक स्वरूऩ आत्भा का े ऩारन कयो। गीध क सभान रोरुऩ न फनो। मह धन ककसी का नहीॊ है ।' े (ईर्ावास्मोऩननषद्1) मह साया जगत उस ऩयब्रह्म ऩयभात्भा की सर्त्ा से ओतप्रोत है । उसे त्माग से बोगो, आसक्ति से नहीॊ। ठण्डी सभटाने क सरए तुम्हाये ऩास वस्त्र हो, कोई हयकत नहीॊ। र्यीय को ननवास े की आवश्मकता हो तो सीधा-सादा घय हो, साप-सुथया छोटा-सा घय हो तो काभ चर जामगा। अगय चाहा कक, "फहढ़मा इभायत फनवाऊ, रोगों को हदखाऊ, ठाठ से यहूॉ....' तो वही इभायत ॉ ॉ तुम्हायी खोऩडी क सरए भजदयी फन जामेगी। ठण्डी गभी से र्यीय की यऺा कयने क सरए सादे - े ू े सीधे वस्त्र हों तफ तक तो ठीक है ऩय जफ तुभ वस्त्रों ऩय आधारयत हो जाते तो वे ही वस्त्र तुम्हाये सभम औय र्क्ति को खा जाते हैं , तुम्हायी चेतना को त्रफखेय दे ते हैं। ऐसे ही र्यीय की तॊदरूस्ती ु
  • 36. क सरए बोजन कयते हो तफ तक तो ठीक है रेककन बोजन क द्राया भजा रेने रग गमे तो वही े े बोजन कपय योग का कायण फन जाता है । ज्मों ही तुभने फाहय क साधनों ऩय सुख-फुद्धि की, सुख क ननसभर्त् उन्हें ऩकडना चारू े े ककमा त्मों ही वे साधन तुम्हाये हाथ से णखसकना र्ुरू कयें गे। अथवा, मे साधन तुम्हें गचन्ता, बम, सॊघषश, र्ोक औय अर्ाॊनत की आग भें झोंकने रगें गे। इसीसरए् तेन त्मिन बुॊजीथा। े त्माग से बोगो। फरफर गीत गा यही है.... कोमर गीत गा यही है... सन सरमा, ठीक है । ु ु ु रेककन हययोज फरफर गाती यहे , कोमर बी गीत गाती यहे , पर णखरे हुए सभरें, भन्द-भन्द ु ु ू भधय हवामें चरती यहें , अभक सभत्र सदा सभरता ही यहे , अभक कसी सदा फनी यहे , सदा भान ु ु ु ु सभरता यहे , अभक कटुम्फीजन ऐसा ही व्मवहाय कयता यहे , ऐसा आग्रह हदर भें आ गमा तो ु ु सभझो वे ऩरयजस्थनतमाॉ अवश्म फदरेंगी, चीजें छीन री जामेगी, व्मक्तिमों का स्वबाव औय व्मवहाय तम्हाये प्रनत फदर जामगा। उन वस्तओॊ, व्मक्तिमों औय ऩरयस्थनतमों क ननसभर्त् कोई न ु ु े कोई आऩदा तुम्हें सहनी ऩडेगी। जो प्माय ईद्वय को दे ना चाहहए, जो आधाय ईद्वय ऩय यखना चाहहए वह आधाय अगय ककसी वस्तु, व्मक्ति, ऩरयजस्थनत, सभाज मा सर्त्ा ऩय यखा मा कसी ऩय ु यखा तो धोखा खाओगे ही। कसी नसीन को हटामा जाता है , गगयामा जाता है अथवा उस कसी क ु ु े कायण अऩनी र्ाॊनत का बॊग हो जाता है । मह प्रकृनत का अकाट्म ससिान्त है । हभ द्खी ममों हैं ? ु द्ख न बगवान फनाता है न प्रकृनत फनाती है । द्ख फनाती है हभायी फेवकपी। द्ख ु ु ू ु फनाती है हभायी नासभझी। जो प्माय हभें ऩयभात्भा क प्रनत फहाना चाहहए वह महद साधनों क े े प्रनत गचऩकामा तो द्ख घेयेंगे ही। जो साधन का जजस ढॊ ग से उऩमोग कयना चाहहए वह नहीॊ ु ककमा औय उसक आधीन हो गमे तो वही साधन हभाये सरए द्ख का साधन फन जाता है । कआॉ े ु ु फनामा है र्ीतर जर क औय कोई उसभें गगयकय भये तो भजी उसकी। सरयता फह यही है । वह े ससॊह को बी ऩानी ऩीने दे ती है औय गाम को बी। कोई उसभें कदकय भये तो भजी उसकी। ू सॊसायरूऩी सरयता से थोडा जर ऩीकय हभें अऩना बीतय का सुख जगाना है । हभ जफ ऩानी क सरए फोरयॊग कयते हैं तो प्रायॊ ब भें नदी से, ताराफ से मा ककसी क कएॉ से ऩानी राकय े े ु डारना ऩडता है , खदाई कयनी ऩडती है । ऩानी डारते हुए, खदाई कयते हुए जफ गहये ऩहुॉच जाते ु ु हैं तो बीतय से ऩानी अऩने आऩ उछरने रगता है । अऩने फोय का ऩानी प्रकटाने क सरए ऩहरे दसयों क फोय का ऩानी राते हैं ऐसे ही े ू े द्धवधाता ने अऩने बीतय का आनॊद छरकाने क सरए सॊसाय क सुखों की सुद्धवधा की है । सॊसाय का े े जो सुख है , ऩनत मा ऩत्नी का जो प्रेभ है , नन्हें भुन्ने सर्र्ु का जो ननदोष हास्म है , भधय ु भुस्कान है वह ननदोष ब्रह्म भें जाने क सरए सभरी है । े
  • 37. ऩत्नी जफ ऩनत क स्नेह को द्धवकायों भें ही फाॉध यखने की इच्छा द्धवस्तत कय रेती है तो े ृ वह ऩत्नी ऩनत क सरए र्त्रु हो जाती है । ऐसे ही ऩनत अगय ऩत्नी क प्रेभ को द्धवकायों क दामये भें े े े कजन्द्रत कय रेता है तो वह ऩत्नी का र्त्रु हो जाता है । े सभत्र का प्रेभ ऩयभ सभत्र ऩयभात्भा को सभरने क सरए फडा सहमोगी फन सकता है रेककन े सभत्र चाहे कक सभत्र भुझसे ही सभरता यहे , भेयी तुच्छ, हल्की, ननम्न इच्छाओॊ को ऩूणश कयता यहे , भेया दे हाध्मास फढ़ाने भें सहमोग दे ता यहे तो वे ही सभत्र एक दसये को खड्डे भें रे जाने वारे हो ू जाते हैं। उन्हीॊ रोगों क फेटे प्राम् रच्चे, फदभार्, बगेडु होते हैं जो रोग अऩने कटुम्फ क अन्दय े ु ु े छोटे -से दामये भें ही प्रीनत कयते हैं। जो रोग अऩने प्रेभ को व्माऩक नहीॊ फनाते, अऩने तन-भन- जीवन को 'फहु जनहहताम.... फहुजनसखाम' प्रवद्धर्त् भें नहीॊ रगाते अद्धऩतु ऩत्नी-ऩत्र-ऩरयवाय क इदश - ु ृ ु े गगदश ही कजन्द्रत कयते हैं, अऩने ऩरयवाय से अनत भोह कयते हैं औय दसये ऩरयवायों का र्ोषण े ू कयते हैं वे ही रोग आणखय अऩने ऩरयवायों से दतकाये जाते हैं, उन्हीॊ क फच्चे बाग जाते हैं, उन्हीॊ ु े क फच्चे उनका द्धवयोध कयते हैं , उन्हीॊ क फच्चे उनकी अर्ाॊनत का कायण फनते हैं। े े जो प्रेभ ऩयभात्भा को कयना चाहहए वह प्रेभ अगय भोहवर् होकय कटुम्फ भें कजन्द्रत ु े ककमा तो कटुम्फ तुम्हें धोखा दे गा। जो कभश ऩयभात्भा क नाते कयना चाहहए वे ही कभश अगय ु े अहॊ काय ऩोसने क सरए ककमे तो जजनक वास्ते ककमे वे रोग ही तुम्हाये र्त्रु फन जाएॉगे। जो े े जीवन जीवनदाता को ऩाने क सरए सभरा है , वह अगय हाड-भाॊस क सरए खचश ककमा तो वही े े जीवन फोझीरा हो जाता है । इसीसरए ऋद्धष कहते हैं- तस्भात ् जागहह जागहह। ृ ृ 'इससरए तुभ जागो..... जागो......।' तुरसीदास जी कहते हैं- भोहननर्ा सफ सोवनहाया। दे खहहॊ सऩने अनेक प्रकाया।। भोह से आदभी अनेक प्रकाय क स्वप्न दे खता है । अहॊ काय फढ़ाऊगा, सजाऊगा....। े ॉ ॉ दमोधन, द्र्ासन, धतयाद्स, धभशयाज मुगधद्धद्षय औय अजन क जीवन भें तुभ ममा दे खते हो ? ु ु ृ ुश े गाॊधायी सत्म ऩय है रेककन आधाय सरमा है कऩट का। उसका ऩनत अन्ध धतयाद्स है जया ृ ऐसा, बीतय एक, फाहय दसया। यात को नीॊद नहीॊ आती। फेचन यहता है । आॉखों से हदखता नहीॊ ू ै कपय बी अॊदय कऩट क कायण ककतना द्खी ! ककतना अर्ाॊत ! जो प्रेभ ऩयभात्भा को कयना े ु चाहहए, धभश को कयना चाहहए, सत्म को कयना चाहहए वह प्रेभ अगय भोहवर् होकय दमोधन को ु कयता है तो धतयाद्स की नीॊद हयाभ हो जाती है । ृ जो प्रीनत जीवनदाता को कयनी चाहहए वह प्रीनत कसी को कयता है ु तो दमोधन राऺागह ु ृ फनाता है । उसका भाभा र्कनन ककतने-ककतने षडमॊत्र यचता है कपय बी सपर नहीॊ होता ममोंकक ु
  • 38. प्रकृनत ककसी व्मक्ति क अधीन नहीॊ चरती, सत्म ककसी व्मक्ति क अधीन नहीॊ चरता। तुम्हाया े े प्रायब्ध ककसी व्मक्ति क अधीन नहीॊ फनता। तुम्हाये कभों औय तुम्हायी भान्मताओॊ क भुतात्रफक े े प्रायब्ध का सजशन होता है । आचामश द्धवनोफा बावे बूदान मऻ कयते-कयते अजभेय ऩहुॉचे थे तफ की फात है । साभाजजक कामश कयने वारा कोई अभेरयकन टूरयस्ट द्धवनोफाजी से सभरने आमा। कछ हदन उनक साथ ु े गुजाये । वह जफ द्धवदा हो यहा था तफ फोरा् "हभाये अभेरयका क सरए आऩ जैसे ऩद्धवत्र ऩरूषों का कोई सन्दे र् हो तो भझे दीजजए।" े ु ु आचामश फोरे् "भेये जैसा छोटा आदभी तम्हाये अभेरयका जैसे फडे दे र् क सरए ममा सन्दे र् ु े दे ? भैं तो साधायण आदभी ऩैदर चरने वारा..... भाॉगकय खाने वारा.....।" "नहीॊ भहायाज ! आऩकी प्रनतबा भैं जानता हूॉ। आऩका सन्दे र् हभाये दे र् क सरए फडा े हहतकय ससि होगा। आऩ ननयऩेऺ हो, बगवान क प्रनत आऩकी आस्था है औय आॊतय सख भें े ु आऩकी गनत है ।" आॊतय सुख भें जजसकी गनत होती है उसकी सराह-ऩयाभर्श अनेकों को उऩमोगी होती है । जहाॉ उसकी हाजजयी होती है उस जगह क ऩयभाणु (वामब्रेर्न) ऩद्धवत्र फन जाते हैं। वह जगह े ऩद्धवत्र तीथश हो जाती है । तो वह स्वमॊ ककतना ऩद्धवत्र होता होगा ! वह अभेरयकन कहने रगा् भहायाज ! हभाये दे र् क सरए आऩका कल्माणकायी सन्दे र् े दीजजए। द्धवनोफाजी दो सभनट क सरए एकदभ र्ाॊत हो गमे। ऐसा ऩुरूषों को कोई स्करी ककताफ मा े ू ऩुयाण-कयान नहीॊ खोरने ऩडते। उनका द्धवद्वप्रेभ मा द्धवद्वननमॊता भें गोता भायना ही सायी ककताफों ु का यहस्म रे जाता है । द्धवनोफाजी ने कहा् "तुम्हाये दे र् भें अस्त्र-र्स्त्र खफ फनते हैं। अऩने दे र्वाससमों को कहो् मुि क अस्त्र-र्स्त्र ू े सयॊ जाभ खफ फनाओ, उत्साह से फनाओ, कोई भना नहीॊ। 364 हदन तक ननयॊ तय फनाते ही यहो। ू कपय 365 वें हदन साये क साये र्स्त्र दरयमा भें पक दो। फस इसी भें दे र् की उन्ननत है । द्धवद्व से े ें प्रेभ कयने का मही तयीका है तुम्हाये सरए। त्रफना प्रेभ क ककसी दे र् की सच्ची उन्ननत नहीॊ े होती।" उन रोगों ने ककतनी फात भानी मह तो वे रोग जानें रेककन इन प्माये सॊत ने सराह तो फहुत प्मायी दी। सारबय खफ र्स्त्र फनाओ औय आणखयी हदन जफ सभुद्र भें डार दो। ममोंकक ू सारबय र्स्त्र नहीॊ फनाएॉगे, काभ नहीॊ कयें गे तो आरसी हो जाएॉगे, कायखाने फन्द हो जाएॉगे, फेयोजगायी हो जामेगी। याजसी औय ताभसी आदभी को तो प्रवद्धर्त् होनी ही चाहहए। साजत्वक ृ आदभी ननवत होकय सभागध कये तो ठीक है रेककन यजस प्रधान व्मक्ति को तो प्रवद्धर्त् होनी ही ृ ृ चाहहए। उसको अगय अवकार् हदमा जामेगा, आधा र्ननवाय मा ऩूया र्ननवाय छट्टी दी जामेगी तो ु
  • 39. उत्ऩात कये गा, कभय कभजोय कये गा, द्धवरास भें ग्रस्त होगा। उसको तो काभ भें रगामे यखना चाहहए। हदन भें तुभ प्रवद्धर्त् कयो, खफ कयो। 23 घण्टे तक व्मवहाय क सफ सम्फन्ध ननबाओ ृ ू े रेककन 24वाॉ घण्टा ऐसे ननवर्त् हो जाओ, सायी प्रवद्धर्त् औय साये सम्फन्धों ऩय ऐसा रै मटय घुभा दो ृ ृ कक फस.... साये सम्फन्ध जजसकी सर्त्ा से हो यहे हैं उस सवशसर्त्ाधीर् भें सफ स्वाहा..... गचर्त् भें आत्भ-द्धवश्राॊनत छा जाम ! गचर्त् भें जो आसक्तिमाॉ हैं उन आसक्तिमों क कायण ही बम होता है । सर्त्ावान को कसी े ु चरे जाने का बम, फरवान को फर चरा जाने का बम, धनवान को धन चरा जाने का बम तफ होता है जफ ईद्वय क फदरे इन सफको प्रेभ कयते हैं, इनक सहाये अऩना जीवन फनाते हैं। सवश े े सहायों क सहाये ईद्वय का बयोसा छोडकय जड, ननयाधाय चीजों भें बयोसा कयते हैं इसीसरए बम, े र्ोक, गचन्ता, ईष्माश, स्ऩधाश होती है । आऩको होगा् "भहायाज ! हभ तो गहस्थी हैं...... सॊसायी हैं। आऩ जैसे फाफाजी तो हैं नहीॊ ृ कक फैठे यहे कहटमा भें । जफ भौज आमी तफ फाहय ननकरे। हभको तो धभाधभ प्रवद्धर्त् कयनी ु ृ ऩडती है ममोंकक हभ सॊसायी हैं, गहस्थी हैं।" ृ मे सफ कवर तुम्हायी भान्मताएॉ हैं। वास्तव भें तुभ वही हो जो श्रीकृष्ण का आत्भा है , े जो याभजी का आत्भा है , जो सर्वजी का आत्भा है । ऐसा अऩना ऊचा अगधकाय छोडकय तुम्हें ॉ गरफा वाघयी क ऩडोसी फनने की आवश्मकता नहीॊ है औय मह र्यीय गरफा वाघयी से जया बी े फहढ़मा नहीॊ है । वाघयी वाड भें जैसी गॊदगी होती है वैसी ही र्यीय भें है । सीधी औय टे ढ़ी हड्क्तडमाॉ... उनक फीच भाॊस क रोचे। ऩोरी जगह भें वात-द्धऩत-कप-भर-भूत्र। इस र्यीय को भैं े े भानकय, सयकने वारी चीजों को भेयी भानकय, अऩने को सॊसायी-गहस्थी भानकय भुसीफतें उठाते ृ ही चरो तो भजी हो नहीॊ। तुभ तो सयकने वारे र्यीय औय सॊसाय को दे खने वारे हो। तुभ र्यीय से न्माये , र्यीय क स्वाभी हो। तुभ सॊकल्ऩ कयते हो तफ हाथ उठता है , नहीॊ तो हाथ की ममा े ताकत की उठे ? तुभ सॊकल्ऩ कयते हो तो आॉख की ऩरक उठती हैं, गगयती हैं। तुभ ऩैयों को ें जजधय जाने का आदे र् दो वहाॉ जाने क सरए तत्ऩय हैं। तुभ दे ह क औय भन क स्वाभी हो भगय े े े उन ऩय तुभ आधारयत हो जाते हो तो मे तुम्हाये स्वाभी हो जाते हैं। तुभ इनक चाकय क बी े े चाकय हो जाते हो। फुयी हारत हो जाती है । एक द्धवद्याथी द्धवदे र् भें ऩढ़ यहा था। फडा सुखी घय का मुवक था। उसक द्धऩता फैरयस्टय थे। े ऩुत्र को खचश बेजते थे। एक फाय द्धऩता ने फेटे को ऩत्र भें सरखा् "तुभ ममा-ममा खचश कयते हो, इतने ऩैसे कहाॉ- कहाॉ रगाते हो इसका हहसाफ भुझे बेजो।"
  • 40. उस स्वासबभानी द्धवद्याथी ने दे खा कक् "द्धऩता को भुझ ऩय द्धवद्वास नहीॊ यहा अथवा भेये आत्भगौयव को हानन ऩहुॉचाने क सरए ऩत्र सरखा है । ऐसा है तो अफ द्धऩता क आधाय ऩय ममा े े जीना ? छोटी-छोटी चीजों का हहसाफ बेजॉ ू ! कछ बी हो, भैं अऩना गुजाया आऩ कय रॉ ूगा।" ु उसने ननणशम कय सरमा औय द्धऩता को सरख हदमा् "भुझे रगता है कक आऩका भेये प्रनत द्धवद्वास उठ गमा है , इसीसरए हहसाफ भाॉग यहे हैं। कृऩमा, आऩ भुझे खचश नहीॊ बेजें। भैं अऩने ढॊ ग से जी रॉ ूगा औय ऩढ़कय ही दे र् रौटूॉगा।" द्धऩता ने ऩत्र ऩढ़ा। वे फद्धिभान थे, मोगी औय साधओॊ का सॊग कयते थे। दे खा कक फेटे ने ु ु थोडा गरत अथश रगामा है , कोई फात नहीॊ। फेटा आत्भननबशय तो हो गमा, फहढ़मा फात है । वे प्रसन्न हो गमे। फेटे को स्नेह बये र्ब्दों भें ऩत्र सरखा् "तेयी आत्भननबशयता फताता हुआ ऩत्र ऩढ़कय भैं फडा प्रसन्न हुआ हूॉ। .....औय वत्स ! भेया बाव मह नहीॊ था कक तू कहीॊ गरत जगह ऩय खचश कय यहा है । कवर तेयी हदनचमाश औय आगथशक व्मवहाय जानने क सरए सहज स्वबाव भें सरखा था। सन्दे ह े े होने का कोई प्रद्ल ही नहीॊ है फेटे...." आहद-आहद प्रेभबये वचन सरख हदमे। ऩुत्र को जो थोडा-फहुत द्ख हुआ था वह द्धऩता का ऩत्र ऩढ़ कय दय हो गमा। वह ऩुत्र था ु ू स्वतॊत्र बायत क प्रथभ प्रधानभॊत्री श्री जवाहयरार नेहरू औय द्धऩता थे श्री भोतीरार नेहरू। े मह घटना आऩको इससरए सुना यहा हूॉ कक द्धऩता खचश बेजे औय ऩुत्र खचश कये , ठीक है , रेककन कबी द्धऩता न बी बेजे तो बी ऩुत्र फेऩयवाह है । ऐसे ही द्धऩताओॊ का बी द्धऩता ब्रह्म ऩयभात्भा तुम्हें सुख-सुद्धवधा दे ता है । सुख-सुद्धवधा कबी कभ हो मा न बी हो तो तुभ उनको कहो कक नहीॊ बेजो तो बी कोई फात नहीॊ। हभको जीने की करा आ गई है । हभ अऩने ऩैयों ऩय खडे हैं, आत्भननबशय हैं। वह द्धऩता आऩ ऩय ज्मादा प्रसन्न यहे गा, ज्मादा बेजेगा। ऐसे फच्चों को भैं जानता हूॉ जो उसको फोरते हैं कक हभें कोई जरूयत नहीॊ है , तुम्हें गयज हो तो बेजो। वह प्माया ऩयभात्भा इतना बेजता है कक वे खाते-खाते ऊफ जाएॉ औय अन्म हजायों रोगों को णखरा सकें कपय बी वह बेजना कभ नहीॊ कयता, फढ़ाता ही चरा जाता है । ऐसे ऩुत्रों को भैं जानता हूॉ। र्ामद तुभ बी जानते होगे। सोचा भैं नहीॊ कहीॊ जाऊगा महीॊ फैठकय अफ खाऊगा। ॉ ॉ जजसको गयज होगी आमेगा सद्धद्शकर्त्ाश खुद रामेगा।। ृ ऐसा द्धवर्ार होना चाहहए। मह ममा, दो योटी क टुकडों क ऩीछे हाम हाम ? कोई भान दे े े तो बागे भोटय को ऩेरोर जराते हुए उसक वहाॉ उदघाटन कयने। भान क सरए बागते कपयें , जया- े े सा सुख ऩाने क सरए बागते कपयें इसभें अऩनी भहर्त्ा कभ हो जाती है । आऩ अऩने आत्भा भें े यहो। स्थानभ्रद्शा न र्ोबन्ते दन्ता कर्ा नखा नया्।। े
  • 41. दाॉत अऩनी जगह ऩय हैं तो उनकी कीभत है , र्ोबा है । वे अऩनी जगह से च्मुत हो जामें, गगय जामें तो चाहे ककतने बी फडे आदभी क हों, उनकी कोई कीभत नहीॊ। छोटे से छोटे आदभी े क दाॉत बी अगय अऩनी जगह ऩय हैं तो र्ोबा दे ते हैं। ऐसा ही फार औय नाखन क फाये भें है । े ू े भनुष्म अऩने स्थान भें डटा यहता है तो र्ोबता है । अऩनी जगह से गगया, स्थानभ्रद्श हुआ तो तुच्छ हो जाता है , सायी र्ोबा खो दे ता है । वह जफ अऩना आनन्द-स्वरूऩ आत्भ-ससॊहासन छोडकय गगडगगडाने रगता है कक, 'हे कसी ! तू भुझे सुख दे .... हे ऩत्नी क हाड-भाॊस ! तू भुझे सुख दे .... ु े हे ऩनत क हाड-भाॊस ! तू भझे सख दे ...... हे फाहय की वाहवाही ! तू भझे सख दे ....' तफ वह े ु ु ु ु राचाय हो जाता है , दो कौडी का हो जाता है । आऩ अऩने स्थान ऩय यहो, आत्भस्वरूऩ भें जगो। सच्चा बि सख का आकाॊऺी नहीॊ होता, वह तो सख का दाता होता है । प्रेभ का दाता ु ु होता है , कृऩा का दाता होता है । आऩ बि फनकय जीवन गजायो। ु "भहायाज ! हभ तो गहस्थी हैं ......।" ृ हाॉ, भैं तम्हाये सरए ही कह यहा हूॉ, कोई हौवा क सरए, कौवा क सरए नहीॊ कह यहा हूॉ। ु े े हभ जो बी सत्सॊग-प्रवचन कयते हैं, ऩहरे ध्मान-बजन कयक सोचते हैं, द्धवचायते हैं कक हभाये े फोरने से आऩका हहत हो, आऩको जीवन भें काभ आमे, वही हभ फोरें गे। द्धवद्याथी हों फारभॊहदय क तो दसवीॊ कऺा क ऩोथे रेकय थोडे ही फैठेंगे ! द्धवद्याथी हों े े एस.एस.सी. क तो ऩी.एच.डी. का कोसश थोडे ही चराएॉगे ! े "फाफाजी ! हभ सादे कसे यहें ? हभ तो ठहये सॊसायी। सादा घय हो, सादे कऩडे हों, ै पनीचय कभ हो मा कसे चरे ? हभें तो जया व्मवजस्थत चाहहए। टी.वी. चाहहए, वी.सी.आय. ै चाहहए, भारूनत चाहहए। घय भें कोई आमे तो जया अच्छा हदखे। स्वाभी जी ! मे सुख-सुद्धवधा की चीजें हभाये सरए नहीॊ चाहहए। मह सफ कछ अऩने सरए नहीॊ कयते भहायाज ! रेककन फच्चे फडे ु हुए हैं उनकी र्ादी का सवार है । रडकी ककसी क घय दे नी है तो कोई रोग घय दे खने आते हैं। े भहायाज ! आऩ तो फाफाजी हैं.....।" हभ फाफाजी तो हैं रेककन ऩागर जी नहीॊ हैं। आऩको हानन ऩहुॉचामे ऐसा उऩदे र् दें ऐसे नहीॊ हैं। ऊची-ऊची दीवायें , भूल्मवान गाक्तडमाॉ अथवा कड-कऩट-धोखा-धडी कयक, गचन्ताओॊ क ऩोटरे ॉ ॉ ू े े उठा-उठाकय जो पनीचय इकट्ठा ककमा है औय घय को गोडाउन फना हदमा है वह सफ आऩक घय े आने वारे अनतगथमों को प्रसन्न कय दे गा ऐसी फात नहीॊ है । हय व्मक्ति अऩना ननजी जीवन जीने क सरए स्वतॊत्र है । आऩ काका सभटकय बतीजा होने े की गडफड भें ऩडो ही भत। आऩ सुन्दय, सुहावनी, फहढ़मा चाॉदी की थारी भें ककसी को बोजन कया दो, भखभर की गहद्दमाॉ दे दो, वी.सी.आय. – टी.वी. सजाओ, पनीचय सजाओ, आने वारे अनतगथ को ऐहहक सुख-सुद्धवधाओॊ भें गयकाव कय दो रेककन 'टै न्र्न' से, फेईभानी से एकत्रत्रत की
  • 42. हुई चीजों से आऩका रृदम भुयझामा हुआ सभरेगा तो उस अनतगथ को वह आनन्द, वह सुख औय वह प्रेभ नहीॊ सभरेगा। भैं आऩको कछ नहीॊ दे ता। न महाॉ वी.सी.आय. की व्मवस्था है न टी.वी. की व्मवस्था है ु न डनरोऩ की गद्दी की व्मवस्था है – मे न ऩानी का गगरास बयकय साभने यखने की व्मवस्था है – मे सायी असुद्धवधाएॉ सहकय बी तुभ रोग हजायों की सॊख्मा भें बागे-बागे आते हो ककससरए ? भैं कवर एक भीठी भुस्कान दे दे ता हूॉ, तुम्हाया रृदम ऩुरककत हो जाता है , तुभ उन्नत हो जाते े हो, आनॊहदत हो जाते हो। आऩक घय आमे हुए अनतगथ बी आऩकी एक भीठी ननगाह, भीठी भस्कान से ऩरककत हो े ु ु जाम, उन्नत हो जाम, आनजन्दत हो जामे, जैसा आमा था वैसे का वैसा आऩक घय से न रौटे , े उन्नत होकय रौटे । अनतगथ द्धवरासी सॊस्काय रेकय तम्हाये घय भें आवे औय वहाॉ बी द्धवरासी ु सॊस्काय फढ़ें तो उनका ऩतन हो गमा। जैसा आमा था उससे उन्नत औय स्वतॊत्र होकय रौटे , सोचे कक इनक ऩास चीजें कभ हैं कपय बी सखी हैं औय हभाये ऩास इतना साया वैबव का कचया है े ु कपय बी रृदम भें होरी ? रोग आऩक घय से रौटे तफ आऩक व्मवहाय से सभरी हुई र्ाॊनत-सुख-स्वातॊत्र्म क गीत े े े गुॊजाते हुए अऩने घय जामें तबी तुम्हायी भुराकात की भहर्त्ा है । तबी तुम्हायी वाणी औय दर्शन का भूल्म है । अऩने घय आमे हुए अनतगथ की मही सच्ची सेवा है । ऩत्नी साक्तडमो की गुराभ न यहे , ऩनत ऩेन्टों का गराभ न यहे , ऩुत्र मुननपाभश का गुराभ न ु यहे , ऩुत्रत्रमाॉ ऩप-ऩावडय-सरऩजस्टक की गुराभ न यहे । सादे , साप-सुथये अच्छे कऩडे हों, सादा औय ऩौद्धद्शक बोजन हो मह ऩमाशद्ऱ है । जाडा-भोटा खाना औय जाडा-भोटा ऩहनना र्यीय को तन्दरूस्त ु यखता है । जगत क जो भहान ऩुरूष हो गमे हैं, जो सादे यहे हैं, जजन्होंने फडी-फडी हवेसरमाॉ नहीॊ े फनामी, फडे-फडे भकान नहीॊ फनामे, जो अऩनी आवश्मकताएॉ कभ कयक जी ऩामे उन्होंने ही जगत े को बक्तिर्ास्त्र हदमा है । उन्होंने ही द्धवद्व को प्रेभाबक्ति का दान हदमा है । उन्होंने ही द्धवद्व को दर्शनर्ास्त्र हदमा है । बगवान वेदव्मासजी भहायाज आठ घण्टे ध्मान भें यहते थे। फाहय की चीजों भें सभम नहीॊ रगाते थे। ध्मान से उठते, बूख रगती तो फहद्रकाश्रभ भें साभने कछ फेय (फदयी) क ऩेड थे, फेय ु े रेकय खा रेते। इसी ऩय से उनका नाभ फादयामण बी है । उन्होंने ऐसे-ऐसे ग्रन्थ फनामे कक अबी तक उनकी फयाफयी कयने वारा द्धवद्व भें कोई ऩैदा नहीॊ हुआ। सादा जीवन था उनका। बिभार क यचनमता नाबा जी भहायाज का जीवन बी फहुत सादा, सयर था। याभामण क े े यचनमता तुरसीदास जी का जीवन सयर था।
  • 43. द्धवदे र्ों भें बी कई अच्छे -अच्छे द्धवद्रान, तत्त्वगचॊतक हो गमे जजनका जीवन फहुत सादा था। कोई-कोई तो एक छोटे -से फमसे भें जीवन गुजायने वारे बी थे। उन्होंने वहाॉ क रोगों को कसे- े ै कसे र्ास्त्र हदमे ! ै वैर्द्धषक दर्शन क यचनमता कणाद भुनन खेतों भें गगये हुए कण चनकय गुजाया चरा रेते े े ु थे। इसी से उनका नाभ कणाद ऩडा। र्ुि फुद्धि से गचन्तन कयते-कयते दय क, दे र्-दे र्ान्तय क ू े े द्धवद्रान उनक दर्शन कयने आते थे। तफ वहाॉ क याजा की आॉख खरी कक हभाये याज्म क अयण्म े े ु े भें ऐसे भहान कणाद भनन यहते हैं जो एक-एक कण चनकय गजाया कय रेते हैं। ु ु ु सवणशभद्राओॊ का थार बयकय, पर-फ्रट, सखे भेवे, सभठाई आहद क टोकये बयकय याजा ु ु ू ू े उनक ऩास गमा् े "भहायाज ! स्वीकाय कयो औय भझे ऺभा कयो। आऩ जैसी भहान ् द्धवबनत भेये याज्म भें ..... ु ू औय भैंने आऩकी सॉबार नहीॊ री।" "कोई फात नहीॊ, ऺभा है । भैं प्रसन्न हूॉ।" "भहायाज ! भेयी दसयी प्राथशना मह है कक आऩ भेये भहर भें ऩधायो। भहर का एक बाग ू आऩक सरए खारी कयवा हदमा है । दास-दाससमाॉ आऩकी चाकयी भें होंगी। फादाभ योगन रगाकय े चॊऩी होगी, गाम का दध होगा, घी-भमखन होगा, नौकय-चाकय होंगे, र्ाभ को सैय कयने क सरए ू े यथ होगा। यात को अरग र्मनकऺ होगा। भाताजी क सरए यसोईघय बी फहढ़मा होगा।" े कणाद भुनन फोरे् " एक भैंने तुम्हायी भान री। अफ तुभ भेयी फात भान रो।" "भहायाज ! आऻा कीजजए।" याजा खर् होकय फोरा। ु "अबी चरे जाओ औय कपय कबी न आना।" "भहायाज ! ममों आऩ नायाज हैं ?" "जफ तुम्हाये दास-दाससमों से ऩैयचम्ऩी कयवाऊगा, प्रजा का र्ोषण कयक फनामे हुए भहरों ॉ े भें यहूॉगा तो ईद्वय क गीत गाऊगा कक तुम्हाये गीत गाऊगा औय चाऩरूसी करूगा ? इससरए े ॉ ॉ ॉ हभायी आवश्मकताएॉ हभें नहीॊ फढ़ानी हैं कक याजसी वस्तुओॊ की राचायी कयें औय भहरों भें यहें ।" वास्तव भें अन्न का प्रबाव भन ऩय ऩडता ही है । बीष्भ द्धऩताभह जैसे दमोधन क अन्न ु े से प्रबाद्धवत होकय ऩाॊडवों क द्धवऩऺी फन फैठे। े यहन-सहन का बी गचर्त् ऩय प्रबाव ऩडता है । आऩक घय भें अगय Luxurious Life भौज- े र्ौक का, ऐर् आयाभ का, द्धवरासी जीवन है तो आऩक कटुम्फीजनों का भन नीचे क कन्द्रों भें े ु े े यहे गा। छोटी-भोटी असुद्धवधा मा छोटी-भोटी फात ऩय जल्दी अर्ाॊत, उहद्रग्न होने रगें गे। सॊसाय की चीजें तुभसे छडवाई जामेंगी। मे तुभसे छडवाई जाएॉ उससे ऩहरे इनकी आसक्ति ु ु छडवाने का भैं प्रमत्न कय यहा हूॉ। इन चीजों क सरए योना ऩडे इससे मे चीजें तुम्हाये सरए योती ु े यहें ऐसे तुभ भहान फन जाओ, ऐसी आसायाभ की आर्ा है ।
  • 44. रोग सॊसाय की चीजों भें प्रीनत कयते हैं। जो प्रीनत द्धप्रमतभ ऩयभात्भा भें रगाने क सरए है े वह प्रीनत व्मक्ति भें , चीज-वस्तु भें , सम्फन्धों भें रगाता है उसका आॊतय-सुख ऺीण हो जाता है । जो फाहय की प्रीनत को बीतय रे जाकय बीतय की प्रीनत द्धवकससत कयता है औय द्धवद्व भें फाॉटता है वह प्रेभऩात्र हो जाता है । वास्तव भें आऩ ईद्वय से द्धवबि नहीॊ हैं, दय नहीॊ हैं रेककन अबागी इजन्द्रमों क साथ, ू े अबागे र्यीय क साथ, अबागे द्धवषमों क साथ इतना गचऩक जाते हैं कक आऩ ईद्वय से द्धवबि न े े होते हुए बी द्धवबि जैसा ही जीवन त्रफता यहे हैं। आऩ ईद्वय से अरग नहीॊ हो सकते हैं, कपय बी इन अबागे आकषशणों क कायण आऩको े रगता है कक ईद्वय कोई दय दे र् की चीज है , ईद्वय कोई भयने क फाद सभरने वारी चीज है ू े अथवा ईद्वय कोई फडी तऩस्मा, भजदयी कयने क फाद सभरने वारी चीज है । ू े हकीकत भें ईद्वय क सरए तऩस्मा नहीॊ कयनी ऩडती, ईद्वय क सरए भजदयी नहीॊ कयनी े े ू ऩडती, ईद्वय क सरए इन्तजाय बी नहीॊ कयना ऩडता, कपय बी इन्तजाय कयना ऩडता है , कपय बी े भजदयी कयनी ऩडती है , सभम का बोग दे ना ऩडता है । इसका कायण मह है कक हभाया प्रेभ फाह्या ू चीजों भें अटक गमा है । इस गरती को दय कयने क सरए बजन कयना ऩडता है । आसक्ति हटाने ू े क सरए तऩस्मा कयनी ऩडती है । ईद्वय को ऩाने क सरए तऩ कयने की जरूयत नहीॊ है कपय बी े े तऩ कयने की जरूयत है , ध्मान कयने की जरूयत है ममोंकक ध्मान गैय जगह चरा गमा है , वहाॉ से हटाने क सरमे महाॉ राना ऩडता है । गैय चीजों क सरए तऩ यहे हैं इससरए चरो, बगवान क े े े सरए ही तऩ कयो। काॉटे से काॉटा ननकारो। तुम्हाये र्यीय भें जान फूझकय काॉटा चबाने की कोई ु आवश्मकता नहीॊ है रेककन ऩहरे अनजाने भें जो चब गमा है उसे ननकारने क सरए दसया काॉटा ु े ू चबाना ऩडता है । ु नहीॊ तो, वह द्धप्रमतभ औय भजदयी कयवा कय सभरे ? प्राणी भात्र का ऩयभ सुरृद औय हभें ू तऩा-तऩाकय कपय सभरे ? 'सुरृदॊ सवशबूतानाॊ' प्राणीभात्र का ऩयभहहतैषी है , ऩयभ सुरृद हूॉ ऐसा बगवान स्वमॊ कहते हैं। जो सुरृद है , ऩयभ सभत्र है वह तऩा-तऩाकय सभरे, बूखा भायकय, उऩवास कयाकय सभरे तो वह सुरृद कसा ? सभत्र कसा ? ऐसा अन्माम वह कयता है ? ै ै वास्तव भें वह बूखा नहीॊ भयवाता। हभायी मोग्मताएॉ खा-खाकय ऺीण हो गईं, अजीणश की फीभायी रगी इससरए उऩवास कयो। आसक्ति हो गमी इससरए त्माग कयो। भोह हो गमा इससरए एकान्त भें जाओ। फहहभुख हो गमे इससरए अॊतभुख हो जाओ। मह सफ गरनतमों को ननवर्त् श श ृ कयने क सरए है । े कऩडों की द्धऩटाई ममों कयते हो ? कऩडों से तुम्हायी दश्भनी है ? नहीॊ... कऩडे भैरे हो ु गमे, उनभें गन्दगी हो गई इससरए सोडाखाय, साफुन आहद डारकय द्धऩटाई कयते हैं ताकक साप सुथये हो जामें, उनभें कसूडे का यॊ ग रग जाम। े
  • 45. ऐसे ही अन्त्कयण को जऩ तऩ धायणा ध्मान कया क आसक्ति का कचया ननकार दे ते हैं े ताकक अन्त्कयण भें चैतन्म का यॊ ग फयाफय प्रकट हो जाम। जो रोग अऩने भन का, इजन्द्रमों का थोडा सॊमभ कय दे ते हैं उनका आत्भफर जगता है । फाहय की चीजों क सरए जजतना-जजतना आग्रह टूटता जाता है उतना-उतना प्रेभ व्माऩक होता े जाता है । साफयभती क गाॉधी आश्रभ की घटना है । ककसी यात्रत्र को आश्रभ भें चोय घुसा। वह कछ े ु भार-साभान की, चीज-वस्तओॊ की सपाई कये , चोयी कये उससे ऩहरे ककसी आश्रभवासी की नजय ु ऩड गई। वह सोमा-सोमा ननहायता था। दे खा कक वास्तव भें चोय है । धीये से साथी को जगामा, दसये को जगामा, तीसये को जगामा। चाय-ऩाॉच सभत्र जगे औय चोय को घेयकय ऩकड सरमा। थाऩा- ू थऩी कयक कभये भें फन्द कय हदमा। ू े सफह भें प्राथशना ऩयी हुई, नास्ता आहद सफ हो गमा। कपय उस चोय को ननकार कय गाॉधी ु ू जी क ऩास रामे। आश्रभ क सॊचारक आहद ने सोचा था कक फाऩू चोय को कछ सजा दें गे मा े े ु ऩुसरस भें सबजवा दें गे। गाॉधी जी क साभने चोय को खडा कय हदमा। यात की घटना फतामी। े सफ सोच यहे थे कक गाॉधी जी अफ इसको डाॉटेंगे अथवा कछ सीख दें गे मा प्रामजद्ळत ु कयामेंगे, ऩयॊ तु गाॉधीजी ने जो कहा वह आद्ळमशजनक था। उन्होंने सॊचारक से ऩूछा् "इसने नास्ता ककमा है कक नहीॊ ककमा ?" "फाऩू ! मह चोय है ।" "चोय तो है रेककन भनुष्म तो है न ? मह ऩहरे भनुष्म है कक ऩहरे चोय है ? ऩहरे मह भनुष्म है । इसको बूख रगी होगी। इसको रे जाओ, नास्ता कयाओ। फेचाये को बूख रगी होगी।" फाहय की प्रीनत की चीजें तुम्हें अन्दय क याभ क साथ प्रीनत जोडने को कहती हैं औय े े अन्दय क याभ की प्रीनत कपय चोय का बी कल्माण कयने रगती है । उनक द्राया साहूकाय का े े कल्माण हो जाम इसभें ममा फडी फात है ? वह चोय पट-पटकय योने रगा। ऩछतावा कयने रगा। न डॊडे की जरूयत ऩडी, न ऩुसरस ू ू की जरूयत ऩडी न रयभान्ड की जरूयत ऩडी। वह चोय सुधय गमा। प्रेभ ऐसी चीज है । अन्मथा, गाॉधी जी क ऩास कौन-सा आडम्फय औय पनीचय था कक े रोग सधय जाते मा उनका कहना भानते, उनक अनुगाभी फनते ? अत्मॊत सादा जीवन था गाॉधी ु े जी का। वे अऩने ऩय आधारयत थे। आऩ जजतना सादा जीवन जीते हैं औय आत्भननबशय होते हैं उतना आऩका आत्भप्रेभ, आत्भयस जगता है । आऩ जजतने फाहय की चीजों ऩय आधारयत यहते है उतने बीतय से फेईभान होते चरे जाते हैं। अगय आऩ सच्चे रृदम से प्माय कयो तो आऩकी एक भुस्कान हजायों आदसभमों को उन्नत कय दे गी। आऩका ननदोष, ननष्कऩट हास्म ऩूयी सबा को उन्नत कय दे गा। सफकी र्ायीरयक, भानससक औय आध्माजत्भक उन्ननत होगी। आऩका हास्म भात्र ऩमाशद्ऱ है ।
  • 46. जजन भहाऩुरूषों से राखों रोग राबाजन्वत होते हैं , उन ऩुरूषों ने ममा तुम्हें ऐहहक वस्तुओॊ की सुद्धवधा दे कय, चाऩरूसी कयक राबाजन्वत ककमा है ? नहीॊ। वे ऩुरूष आत्भननबशय यहे है , स्वतॊत्र े आत्भसुख भें प्रद्धवद्श हुए हैं औय वह आत्भसुख फाॉटने की मोग्मता उनभें द्धवकससत हो गई है । वे आत्भसुख से स्वमॊ सयाफोय यहते हैं औय उसी भें गोता रगाकय ननगाह डार दे ते हैं मा दो र्ब्द फोर दे ते हैं तो हजायों-हजायों हदर उनक हो जाते हैं। साया सॊसाय उनक सरए फदरा हुआ सभरता े े है । भयने क सफ इयादे जीने क काभ आमे। े े हभ बी तो हैं तुम्हाये कहने रगे ऩयामे।। तभ ईद्वय क सरए अगय फाह्य सफ चीजों का आकषशण छोड दे ते हो, ईद्वय प्रानद्ऱ क सरए ु े े भयने को बी तैमाय हो जाते हो तो तम्हायी भौत नहीॊ होगी। तम्हाये भयने क सफ इयादे जीवन भें ु ु े फदर जाएॉगे, सफ द्ख सख भें फदर जाएॉगे। कवर जीवन जीने का ढॊ ग हभ जान रें । वह ढॊ ग ु ु े हभें र्ास्त्र ससखाते हैं। र्ास्त्र का भतरफ है ् "र्ासनात ् र्ास्त्रभ ् – जो र्ासन कये , कहे कक मह कयो, मह भत कयो, वह र्ास्त्र कहराता है । भन ऩय, इजन्द्रमों ऩय र्ासन कयक, सफ स्थानों से आसक्ति छडवाकय हभें अऩने घय ऩहुॉचा े ु दें , अऩने आत्भऩद भें रा दें वे हैं र्ास्त्र। र्ास्त्र कोई फोझ ढोने क सरए नहीॊ हैं। े आज सॊस्कृत क एक फडे द्धवद्रान आमे थे। आचामश थे। ऩहरे कार्ी भें यहते थे, आजकर े अहभदाफाद की ककसी सॊस्था भें यहते हैं। आश्रभ क फारमोगी नायामण को बायतीम तकर्ास्त्र, े श न्मामदर्शन आहद ऩढ़ाने क सरए सोचा था इस ससरससरे भें आमे थे। वे कहने रगे् "इनको रघु े कौभुदी औय भध्मभा तक ऩढ़ाओ। मह सफ यटें गे तफ न्मामर्ास्त्र आहद ऩढ़ें गे। र्ास्त्र यटना बी तो बजन है ।" भैंने सोचा मह फात तो ठीक है रेककन यटने का बजन नहीॊ कयवाना है , अफ तो यसभम बजन कयवाना है । र्ास्त्र यट-यटकय तो कई खोऩक्तडमाॉ बयी हुई हैं। एक खोऩडी भें नहीॊ यटा जामगा तो बी काभ चर जामेगा। कोई सोचता है हभ इतने र्ास्त्र यट रेंगे, इतने प्रभाणऩत्र ऩा रेंगे तो हभाया प्रबाव ऩडेगा, हभ आचामश फन जाएॉगे, वेदान्ताचामश, दर्शनाचामश आहद। आचामश कहराने क सरए र्ास्त्र ऩढ़ो, े भजदयी कयो, इससे तो न ऩढ़ो वह अच्छा है । सेठ कहराकय भान ऩाने क सरए धन कभाओ, ू े भजदयी कयो इससे तो धन थोडा कभ यहे तो बी अच्छा है । साहफ कहराने क सरए, प्रभोर्न ू े ऩाने क सरए गचॊनतत यहो इससे तो जहाॉ हो वहीॊ अच्छे हो। े 'भेया ऩनत अच्छा है ममोंकक गहने औय वस्त्र-आबूषण अच्छे रा दे ता है ....' ऐसा कहरवाने क सरए रा दे ते हो तो कोई आवश्मकता नहीॊ राने की। े
  • 47. 'भेयी ऩत्नी अच्छी है ....' मह कहरवाने क सरए सबन्न-सबन्न प्रकाय क गयभागयभ चयऩये े े व्मॊजन-ऩकवान-वानगगमाॉ, अगधक तेर-सभचश-भसारेवारे ऩदाथश ऩनत को णखराओगे तो इससे ऩनत का बी सत्मानार् होगा औय ऩत्नी का बी सत्मानार् होगा। ऩरयवाय भें आऩ एक दसये क आध्माजत्भक साथी फन जाओ, आत्भसुख की ओय उन्ननत ू े कयने क सरए एक दसये को सहमोग दो। एक दसये क सच्चे सुरृद, सच्चे हहतैषी हो जाओ। ऩत्नी े ू ू े सोचे कक कौन-से बोजन से भेये ऩनत का स्वास्थ्म अच्छा यहे गा, कपय वैसा ही बोजन फनामा कये । जो ऩत्नी चाहे कक अऩने ऩनत का स्वास्थ्म अच्छा यहे , भनोफर द्धवकससत हो, द्धवचायफर द्धवकससत हो, प्राणफर द्धवकससत हो, ऩनत की साधना भें उन्ननत हो, औय उसक अनरूऩ आचयण े ु कये तो वह ऩत्नी क साथ-साथ श्रेद्ष सभत्र बी हैं औय श्रेद्ष गरू बी है । े ु जो ऩनत चाहे कक ऩत्नी आत्भननबशय यहे , द्धवकायी सख नहीॊ अद्धऩतु ननद्धवशकायी आत्भसख की ु ु ओय चरे, इसक सरए उसे ऩद्धवत्र स्थानों भें रे जाम, ऩद्धवत्र गचन्तन कयामे, आत्भसख भें प्रीनत े ु जगामे, हल्क द्धवचाय कभ कयने भें सहमोग दे वह ऩनत उस नायी क सरए ऩनत बी है , गरू बी है े े ु औय ऩयभात्भा बी है । ऩयस्ऩय हहतैषी हो जाओ, फस। जो प्रेभ व्मक्ति भें कजन्द्रत यह जाता है वह आत्भ-कजन्द्रत े े हो जाम, फस। आत्भ-कजन्द्रत भाने ममा ? स्व-कजन्द्रत मा स्वाथी ? नहीॊ। जो प्रेभ र्यीय भें है वह े े र्यीय जजससे प्रेभास्ऩद रगता है उसकी तयप प्रेभ हो तो ऩनत-ऩत्नी का सम्फन्ध फडा भधय ु सम्फन्ध है । बायत क दयदर्ी, ऩयभ हहतैषी भहान ् आत्भाओॊ का कहना है कक र्ादी कयनी े ू चाहहए, दो चाय फच्चों को जन्भ दे ना चाहहए। जो रोग र्याफी कफाफी हैं वे रोग चाहे भॉगनी से ऩहरे ऑऩये र्न कया रें ककन्तु जो रोग बगवान का बजन कयते है , जऩ कयते हैं, ध्मान कयते हैं उन्हें कबी ऑऩये र्न नहीॊ कयाना चाहहए। उन्हें सॊमभी जीवन जीना चाहहए। दो-चाय फच्चे हों। एकाध दे र् की सीभा ऩय हो, पौज भें काभ आ जाम, एकाध सभाजसेवा भें हो। दे र् को ऐसे फच्चों की जरूयत है । हदव्म आत्भाएॉ धयती ऩय आना चाहती हैं रेककन हभाये अन्त्कयण हदव्म हों तफ न ? आऩ जजतना-जजतना उन वस्तुओॊ से उऩयाभ होते जाते हो उतना-उतना अन्त्कयण उन्नत होता जाता है औय उतनी उन्नत आत्भाएॉ आऩक घय अवतरयत होने को तैमाय होती हैं। ऐसी ऩद्धवत्र े आत्भाएॉ आभॊत्रत्रत कयने से ही दे र् की सच्ची सेवा हो सकती है , द्धवद्व की सेवा हो सकती है । नायामण.... नायामण..... नायामण..... नायामण....। श्रीभद् बागवत भें आमा है कक आचामश भें सफ दे वों का ननवास होता है । आचामश कौन हैं ? जो तुम्हाये भन को ईद्वय की तयप रगा दें , तुम्हायी ननम्न वासनाओॊ को हटाकय द्धप्रमतभ ऩयभात्भा की तयप भोड दें ।
  • 48. आचामश भें ऩूज्मफुद्धि होने से तुम्हाया अन्त्कयण ऩावन फनता है । आचामश क उऩदे र् को े आदय से, स्नेह से सुनकय अऩने जीवन भें राने का जीवन उन्नत होता है । बगवान ने बागवत भें कहा है ् आचामां भाॊ द्धवजानीमात ्।। (11.17.26) 'भुझे ही आचामश जानो।' उन आचामों का ऩवजीवन दे खो तो उन्होंने सॊध्मा-उऩासना-जऩ-तऩ-मऻमागाहद ककमे हैं, ू श ऩण्म कभश ककमे हैं। धायणा-ध्मान-सभागध आहद मोगाभ्मास ककमा है , उन्नत फने हैं, तबी वे ु आचामश हुए हैं। उन्ननत ककसी व्मक्ति क ऩास, ककसी दामये भें , ककसी सम्प्रदाम भें मा सभाज भें ही होती े है ऐसी फात नहीॊ है । उन्ननत तो जो चाहे कय सकता है । आऩक अन्दय जो उन्ननत कयने क दृढ़ े े सॊकल्ऩ हैं वे ही सॊकल्ऩ दे य-सवेय आऩक सरमे उन्ननत की साभग्री ऩयी कयें गे। हाॉ, अगय आऩ े ू सचभुच उन्नत होना चाहो तो। आऩ द्धवरासी जीवन जीकय सुखी होने की गडफड कयते हो तो वैसी जगह आऩको सभरेगी। आऩ हदव्म जीवन जीना चाहते हो तो वैसी जगह आऩको सभरेगी। आऩ हदव्म जीवन जीना चाहते हो तो दे य-सवेय वही वातावयण औय वही साभग्री णखॊचकय आमेगी ममोंकक तुम्हाया भन सत्म-सॊकल्ऩ आत्भा से स्परयत होता है । इससरए कृऩानाथ ! जो बी सॊकल्ऩ ु कयो वह द्धवराससमों को दे खकय नहीॊ, आडम्फरयमों को दे खकय नहीॊ, द्धवकयारयमों को दे खकय नहीॊ, फाहय से जो खर्हार नजय आते हैं औय बीतय से गचन्ता की आग भें ऩचते हैं ऐसे रोगों को ु दे खकय नहीॊ, द्धवकारयमों को दे खकय नहीॊ, फाहय से जो खर्हार नजय आते हैं औय बीतय से ु गचन्ता की आग भें ऩचते हैं ऐसे रोगों को दे खकय नहीॊ। आऩ तो र्ॊकयाचामश को, कफीयजी को, नानकजी को, फुि को, भहावीय को, र्फयी को, भीया को, गागी को, भदारसा को, याभतीथश को, याभकृष्ण को, यभण भहद्धषश को, रीरार्ाह बगवान को माद कयक अऩना सॊकल्ऩ कयो कक भेये े ऐसे हदन कफ आएॉगे जफ भैं आत्भननबशय हो जाऊगा। कोई वस्त्र नहीॊ कपय बी कोई ऩयवाह नहीॊ ॉ गागी को। र्ुकदे व जी की कौऩीन का हठकाना नहीॊ, ऐसे फेऩयवाह औय आत्भसुख भें डूफे हुए सात हदन भें ऩयीक्षऺत को आत्भ-साऺात्काय कया हदमा। जनक क ऩास इतनी सायी साभग्री है कपय बी कोई आसक्ति नहीॊ। त्रफल्कर अनासि मोग। े ु वस्तुएॉ त्मागने को भैं नहीॊ कहता। वस्तएॉ फढ़ाने को बी भैं नहीॊ कहता। भैं कहता हूॉ कक ु तुम्हाया औय वस्तुओॊ का ऐसा सम्फन्ध है कक जैसे फच्चे को चारनगाडी दी जाती है । तुम्हाया औय सॊसाय का ऐसा सम्फन्ध है कक जैसा तुम्हाये र्यीय औय कऩडों का। कऩडे तुम्हाये सरए हैं, तुभ कऩडों क सरए नहीॊ हो। वस्तुएॉ तुम्हाये सरए हैं, तुभ वस्तुओॊ े क सरए नहीॊ हो। बगवान का बि होकय टुकडों की गचन्ता कये ? े
  • 49. आज भनुष्म की इतनी फेईज्जती हो गई है कक ममा फताएॉ....। भुगी क फच्चे फढ़ाने क े े सरए दे र् राखों-कयोडों रूऩमे खचश कय यहा है । भछरी क फच्चों का द्धवकास कयने क सरए कयोडों े े रूऩमे हदमे जा यहे हैं रेककन भनुष्म क फच्चों का नार् कयने क सरए कयोडों रूऩमे रगामे जा यहे े े हैं। भुगी क फच्चे चाहहए, भछरी क फच्चे चाहहए रेककन भनुष्म क फच्चों का कोई भूल्म नहीॊ े े े है । भनुष्म इतना तच्छ हो गमा ? इतना असॊमभी, द्धवरासी हो गमा ? उसको जन्भ रेने से ु योकने क सरए कयोडों रूऩमे खचश कयना ऩडे ? इन्सान क फच्चे की कीभत नहीॊ यही। े े ममों ? ममोंकक इन्सान अऩने सॊमभ से, अऩने सदाचाय से, अऩने आत्भसख औय आत्भऻान क ु े भागश से च्मत हो गमा, गगय गमा। सयकाय फेचायी ममा कये ? नायामण..... नायामण...... ु नायामण....। बगवान भहावीय क जभाने भें ऩष्म नाभ का एक फडा सप्रससि ज्मोनतषी हो गमा। उसका े ु ु ज्मोनतष इतना फहढ़मा यहता था कक उसको अऩने ज्मोनतष द्धवषम ऩय ऩया द्धवद्वास था। ू दे र्दे र्ान्तय से रोग उससे ऩूछने आते थे। वह जो कह दे ता, अऺयर्् सच्चा ऩड जाता। रोगों के ऩदगचह्न की ये खाएॉ दे खकय बी वह रोगों की जस्थनत फता सकता था। ऐसा फहढ़मा कर्ाग्र ु ज्मोनतषी था। उन हदनों भें वधशभान (फाद भें भहावीय हुए) घय छोडकय हदन भें तो द्धवचयण कयते औय सॊध्मा होती, यात ऩडती तो एकान्त खोजकय फैठ जाते। थोडी दे य आयाभ कय रेते कपय सन्नाटे फैठ जाते चऩचाऩ, ध्मान भें जस्थय हो जाते। ु ऩुष्म ज्मोनतषी ने दे खा कक ये त ऩय ककसी क ऩदगचह्न हैं। ऩदगचह्नों को ज्मोनतष द्धवद्या से े ऩयखा तो जाना कक मे तो चक्रवती क हैं। चक्रवती अगय महाॉ से गुजया है तो साथ भें भॊत्री होने े चाहहए। सगचव होने चाहहए, अॊगयक्ष्क होने चाहहए, ससऩाही होने चाहहए। ऩदगचह्न चक्रवती क औय े साथ भें कोई झभेरा नहीॊ मह सम्बव नहीॊ हो सकता। ऩुष्म ज्मोनतषी को अऩनी ज्मोनतष द्धवद्या ऩय ऩया बयोसा था। उसकी नीॊद हयाभ हो गमी। चाॉदनी यात थी। जहाॉ तक चर सका ऩदगचह्न ू दे खता हुआ चरा, कपय वहाॉ ठहय गमा। कपय सुफह-सुफह जल्दी चरना चारू ककमा। खोजना था, ऩदगचह्न कहाॉ जा यहे हैं। दे खा कक त्रफना कोई साधन क , एक व्मक्ति र्ाॊत बाव भें फैठा हुआ है । े ऩदगचह्न वहीॊ ऩूये होते हैं। इदश गगदश दे खा, चेहये ऩय दे खा। भहावीय की आॉख खरी। ज्मोनतषी गचन्ता ु भें डूफता जा यहा था। भहावीय से ऩूछा् "मे ऩदगचह्न तो आऩक भारूभ होते हैं ?" े "हाॉ।" "भुझे अऩने ज्मोनतष ऩय बयोसा है । आज तक भेया ज्मोनतष झठा नहीॊ ऩडा। ऩदगचह्नों से ू रगता है कक आऩ चक्रवती सम्राट हो। रेककन आऩका फेहार दे खकय दमा आती है कक आऩ सबऺुक हो। भेयी द्धवद्या आज झठी कसे ऩडी ?" ू ै
  • 50. भहावीय भुस्कयाकय फोरे् "तुम्हायी द्धवद्या झठी नहीॊ है , सच्ची है । चक्रवती को ममा होता ू है ?" "उसक ऩास ध्वजा होती है , कोष होता है , उसक ऩास सैन्म होता है । आऩ तो ठनठनऩार े े हैं।" "धभश की ध्वजा भेये ऩास है । कऩडे की ध्वजा ही सच्ची ध्वजा नहीॊ है । सच्ची ध्वजा तो धभश की ध्वजा है । भेये ऩास सदद्धवचायरूऩी सैन्म है जो कद्धवचायों को भाय बगाता है । ऺभा भेयी ु यानी है । चक्रवती क आगे चक्र होता है तो सभता भेया चक्र है , ऻान का प्रकार् भेया चक्र है । े ज्मोनतषी ! ममा मह जरूयी है कक फाहय का चक्र ही चक्रवती क ऩास हो ? फाहय की ही ध्वजा हो े ? धभश की बी ध्वजा हो सकती है । धभश का बी कोष हो सकता है । ध्मान औय ऩण्मों का बी ु कोई खजाना होता है । याजा वह जजसक ऩास बसभ हो, सर्त्ा हो। सफह जो सोचे तो र्ाभ को ऩरयणाभ आ जाम। े ू ु ऻानयाज्म भें भेयी ननद्षा है । जो बी भेये भागश भें प्रवेर् कयता है , सफह को ही चरे तो र्ाभ को ु र्ाॊनत का एहसास हो जाता है , थोडा फहुत ऩरयणाभ आ जाता है । मह भेयी ऻान की बूसभ है ।" जो ज्मोनतषी हाया हुआ ननयार् होकय जा यहा था वह सन्तुद्श होकय, सभाधान ऩाकय प्रणाभ कयता हुआ फोरा् "हाॉ भहायाज ! इस यहस्म का भुझे आज ऩता चरा। भेयी द्धवद्या बी सच्ची औय आऩका भागश बी सच्चा है ।" कबी-कबी रोग अऩने हाथ हदखाते हैं कक भुझे बगवत्प्रानद्ऱ होगी कक नहीॊ। बगवत्प्रानद्ऱ हाथ ऩय नहीॊ सरखी होती। भेये गुरूदे व फडे द्धवनोदी स्वबाव क थे। एक फाय फम्फई भें सभुद्र ककनाये सुफह को घूभ ने े ननकरे। कोई ज्मोनतषी अऩने ग्राहक को ऩटा यहा था। फाफाजी बी ग्राहक होकय फैठ गमे् बाई, भेया हाथ बी दे ख रे। भौज पकीयों की बी ! वह ज्मोनतषी फोरता था कक तुभ अऩने भन भें ककसी बी पर का स्भयण कयो। भैं ू आऩको मह पर फता दॉ । वह फता दे ता था औय साभने वारे को श्रिा हो जाती थी। कपय वह जो ू ू फोरता था वह साभने वारे को रगता था कक सच्चा है । दो फातें ज्मोनतषी की मा औय ककसी की अगय सच्ची रग जाती है तो तीन फातें उसभें औय बी सभगश्रत हो सकती हैं। गगयनाय क भेरे भें कई सबखभॊगे ज्मोनतषी फन जाते हैं। वेर् फना रेते हैं, दाढ़ी-फार फढ़ा े रेते हैं, जोगी का रूऩ धायण कय रेते हैं। ऩावक्तडमा चडते हुए ककसी को फोरते हैं- "बगत ! बगवान ने हदर हदमा रेककन दौरत नहीॊ हदमा। जजसकी तुभ बराई कयते हो, वहाॉ से फदरा फहढ़मा नहीॊ आता है ।"
  • 51. सवश साधायण मह फात है । सफ चाहते हैं कक बराई थोडी कयें फदरा ज्मादा सभरे। ऐसा तो होती नहीॊ। 'हदर है , दौरत नहीॊ....' अगय दौरत होती तो ऩैदर हाॉपता-हाॉपता ममों जाता ? कऩडों से ही ऩता चरा जाता है कक, 'हदर हदमा है , दौरत नहीॊ हदमा।' रोग ऐसे पटऩाथी ु ज्मोनतद्धषमों क ग्राहक फन जाते हैं। ऐसे ज्मोनतषी तोते-भैना-काफयों को, गचक्तडमाओॊ को ऩारकय े द्धऩॊजये भें यखते हैं। सरपापों भें अरग-अरग फातें जो सवश साधायण सफ भनुष्मों की होती हैं वे सरखी हुई होती हैं। तुम्हायी यासर् ऐसी है ..... अभुक ग्रह की कहठनाई है .... ऐसा-ऐसा कयो तो ठीक हो जामेगा..... आहद आहद। उस ज्मोनतषी ने फाफाजी से कहा् "भहायाज ! अऩने भन भें ककसी पर की धायणा कय ू रो।" "हाॉ, कय री।" "भहायाज ! आऩक भन भें गराफ का पर है ।" े ु ू "ज्मोनतषी भहायाज ! त्रफल्कर सच्ची फात है ।" ु गुरूदे व ने सचभुच भें गुराफ को माद ककमा था। रोग गुराफ को माद कयें मह स्वाबाद्धवक है । परों को माद कयो तो ऩहरे गुराफ आ जामेगा। ू ऐसे ही साधक अगय ककसी को माद कये तो गुराफों का गुराफ ऩयभात्भा माद आ जाम। कछ बी कयना है तो ऩयभात्भा को ऩाने क सरए कयें , उसको सॊतुद्श कयने क सरए कयें । ....तो ु े े उसक सरए ऩयभात्भा दरब नहीॊ। े ु श तस्माहॊ सुरब् ऩाथश। 'हे ऩाथश ! ऐसों क सरए भैं सुरब हूॉ।' े ज्मोनतषी ने फडी सूक्ष्भता से फाफाजी का हाथ दे खकय फतामा कक् "आऩ बगवान क सरए े साधू फने हो, खफ तऩ ककमा है कपय बी अबी तक बगवान सभरे नहीॊ हैं। आऩ तऩस्मा चारू ू यखोगे तो सपर हो जाओगे।" गुरूदे व फोरे् "बगवान सभरा नहीॊ ममा ? बगवान तो हभाया अऩना आऩा है ।" बगवान की भुराकात तो गुरूदे व को कयीफ ऩचास वषश ऩहरे हो चकी थी, आत्भ- ु साऺात्काय हो चका था, बगवत्प्रानद्ऱ हो चकी थी। हाथ दे खकय ज्मोनतषी अबी फता यहा है कक, ु ु 'बगवान सभरे नहीॊ हैं। तऩस्मा चारू यखोगे सभर जाएॉगे।' कहने का तात्ऩमश मह है कक बगवत्प्रानद्ऱ हो गई है कक नहीॊ, मह हाथ ऩय नहीॊ सरखा होता अथवा रराट से नहीॊ हदखेगा। हस्तये खाओॊ से मह फात नहीॊ जानी जाती। अगय ईद्वय-प्रानद्ऱ की तत्ऩयता है , तीव्र रगन है तो ईद्वय-प्रानद्ऱ जरूय हो जामेगी। सॊसाय की तुच्छ चीजें सॉबारने की तत्ऩयता है तो ईद्वय-प्रानद्ऱ नहीॊ होगी। वास्तव भें बगवान की अप्रानद्ऱ है ही नहीॊ। बगवान तो अऩना आऩा है । सॊसाय की आसक्ति सभटी तो वह प्रकट हो गमा। सॊसाय की आसक्ति फनी यही तो जीव पसा यहा। कोई ॉ
  • 52. ज्मोनतषी आऩका हाथ दे खकय फता दे कक बगवत्प्रानद्ऱ होगी मा नही होगी तो मह त्रफल्कर ु फेवकपी की फात है । ज्मोनतषी का दभ नही मह फता दे ने का। वहाॉ ज्मोनतष द्धवद्या की गनत नहीॊ ू है । ईद्वय-प्रानद्ऱ द्धवषमक जानने क सरए ज्मोनतद्धषमों को अऩनी हस्तये खाएॉ फताने की कोई जरूयत े नहीॊ है । बगवान हभें सभरेंगे ही मह दृढ़ द्धवद्वास, सॊकल्ऩ औय श्रिा यखकय साधना कयो, बगवान क सरए ही कामश कयो, उसको रयझाने क सरए ही जीवन जजमो, उसको ऩाने क सरए ही आमु े े े त्रफताओ। फस, तम्हायी मह दृढ़ता ही बगवत्प्रानद्ऱ का कायण है । बगवत्प्रानद्ऱ को ज्मोनतष से कोई ु भतरफ नहीॊ, उसे तो तम्हायी तत्ऩयता से, दृढ़ता से औय तीव्र जजऻासा से भतरफ है । ु ईद्वय क नाते आऩ जजओ। ऩत्नी से स्नेह कयो रेककन ईद्वय क नाते स्नेह कयो। ऩनत से े े स्नेह कयो रेककन ईद्वय क नाते स्नेह कयो। दोनों की उन्ननत हो इस बावना से स्नेह कयो। फेटे े से खफ स्नेह कयो, फेटी से बी स्नेह कयो रेककन स्नेह कयते-कयते स्नेह जहाॉ से ऩनऩता है , प्रकट ू होता है उस स्नेह-स्वरूऩ प्रबु भें बी जया गोता भायो तो फेटी की बी उन्ननत, भाॉ की बी उन्ननत, फेटे की बी उन्ननत, फाऩ की बी उन्ननत, औय फाऩ क फाऩ की बी उन्ननत, सफकी उन्ननत हो े जामगी। उन्ननत जीवन जीने का तयीका मह है । ....तो आज का बागवत का द्ऴोक कहता है ् 'गचर्त् औय इजन्द्रमों का सॊमभ कयक जगत को अऩने भें दे खना औय अऩने व्माऩक आत्भा े को ऩयभात्भा भें दे खना चाहहए।' जैसे फाहय का ऩानी अऩने फोय भें डारो, फोय गहना फनाओ, कपय अऩने फोय का ऩानी फाहय द्धवस्तत कय दो। ऐसे ही जगत को प्रेभ से अऩने भें दे खो औय अऩना प्रेभ इतना व्माऩक ृ कयो कक ऩूये जगत भें परे जामे। रोग चोय को ऩकडकय रामे हैं तो गाॉधी फोरते हैं, इसने ै नास्ता ककमा है कक नहीॊ ? इसे नास्ता कयाओ, फाद भें दसयी फात। ू मह प्रेभ है । अनुक्रभ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ वेदभासर ब्राह्मण की आत्भोऩरजब्ध यै वत भन्वॊतय की फात है । वेदभासर नाभ का एक ब्राह्मण वेदाध्ममन कयक अऩने गहस्थ जीवन भें प्रद्धवद्श हुआ। े ृ वेदाध्ममन ककमा था, गरू की सेवा की थी, र्ास्त्रों को ठीक से सभझा था। उसका जीवन थोडा- ु फहुत ऩयहहत भें ऩनऩने रगा। सभम ऩाकय उसको दो फेटे हुए् सभासर औय मऻभासर। ु
  • 53. वेदभासर ब्राह्मण गुरू क द्राय ऩय था तफ ठीक था, र्ादी की तफ ठीक था ऩय जफ फेटे हुए े तफ, जो प्रेभ ऩयभात्भा क नाते कयना चाहहए वह बूर गमा। 'भेये फेटे....।' भोह ठोस हो गमा। े 'भेये फेटों को इतना धन हो.... इतना धन हो कक वे धनवान कहराएॉ....' कवर इस छोटी सी े तष्णा ने उस ब्राह्मण क ऻान को ढॉ क हदमा। ृ े वेदभासर बागवत की कथा कयता। कथा भें अगधक धन सभरे इससरए कथा क द्धवसबन्न े प्रसॊगों को फडी धभधाभ से भनवाता था। ू कोई बी कथाकाय याभामण की कथा कयता है तो जानकी द्धववाह क प्रसॊग भें कन्माऩऺ े औय वयऩऺ खडे हो जाते हैं। जफ याभ-वनवास का प्रसॊग आता है तफ कोई सेहठमा बी साथ नहीॊ दे ता औय कोई ब्राह्मण बी वनवास भें याभ क साथ नहीॊ जाता। मह कथा क साथ फेईभानी है । े े वेदभासर ब्राह्मण कथा को फेचने की धयती ऩय उतय आमा। अथी दोषो न ऩश्मनत। वास्तव भें र्ास्त्र भन-फद्धि को सॊमत कयक ऩयभात्भा भें रगाने क सरए है । कथा कयने ु े े वारे को व्मास कहा जाता है । व्मास का भतरफ है हभायी त्रफखयी हुई वद्धर्त्मों को व्मवजस्थत ृ कयक उस ऩयभात्भा की तयप रे जाम। जो हभायी वद्धर्त्मों को आध्माजत्भक आचयण कयाने का े ृ साभथ्मश यखते हैं उनको आचामश कहा जाता है । जो हभें ऩयभात्भा क साथ सभराने का काभ कयें े उनको सदगुरू कहा जाता है । जीवात्भा को ऩयभात्भा से सभराने का साभथ्मश यखते हैं वे सदगुरू हैं। जो आध्माजत्भक अनुबव कया दें वे गुरू हैं। कोई गुरू होते हैं, कोई आचामश होते हैं, कोई व्मास होते हैं। कबी-कबी एक ही व्मक्ति भें व्मासत्व बी हदखता है , आचामशत्व बी हदखता है औय गुरूत्व बी हदखता है । मह उन्ही ऩुरूषों भें हदखता है जो कथा को, र्ास्त्र को कथा औय र्ास्त्र ही यखते हैं, र्स्त्र नहीॊ फनाते हैं। कई रोग कथा औय र्ास्त्र को र्स्त्र फना रेते हैं – धन कभाने का र्स्त्र, प्रनतद्षा कभाने का र्स्त्र। ऐसे रोग सदगुरू नहीॊ हैं। सदगुरू वे होते हैं जो फयाफय व्मवस्था कयक अऩना जीवन े उन्नत यखें औय दसयों का जीवन बी उन्नत कय दें । ऐसे सदगुरू हैं बगवान वेदव्मासजी, कफीय, ू नानक, रीरार्ाह बगवान, औय कई नाभी-अनाभी, प्रससि-अप्रससि ब्रह्मवेर्त्ा भहाऩुरूष। वेदभासर ब्राह्मण व्मासऩीठ ऩय तो फैठता था रेककन ठीक व्मास नहीॊ फन ऩामा। उसकी दृद्धद्श अथशरोरुऩ हो गई। जैसे, गीध खफ ऊचा उडे रेककन उसकी ननगाह धयती ऩय भये हुए ऩर्ु ू ॉ को खोजे ऐसे ही वेदभासर फातें ऊची-ऊची सुना दे ता था रेककन कथा भें रक्ष्म द्धवसबन्न ननसभर्त्ों ॉ ॉ से धन-सॊचम फढ़ाने का यहता था। जैसे, जानकी द्धववाह भें इतना कन्मादान दो..... इतनी यकभ दे कय आयती कयवाओ.....रुजमभणी की चक्तडमाॉ औय कहटभेखरा क सरए इतना सोना दो..... कृष्ण ू े कन्है मा क सरए चाॉदी का भुकट फनवाओ.....' आहद आहद। इस प्रकाय कथा को साधन फनाकय े ु वेदभासर ब्राह्मण अऩनी धन रोरुऩता को ऩोसने रगा। धीये -धीये उसने अऩने व्रत बी फेच हदमे, अऩने ननमभ बी फेच हदमे। प्रचय भात्रा भें धन इकट्ठा कय सरमा। ु
  • 54. धन फढ़ने से अगय सुख फढ़ जाता तो धनवान सफ सुखी होते। धन फढ़ने से अगय भुक्ति सभर जाती तो सफ धनवानों का भोऺ हो जाता। हभने सुना है कक आदभी ईद्वय का यास्ता नहीॊ ऩकडता है तो धन से योग, गचन्ता, दश्भनी फढ़ती है औय नकों भें जाने का नेर्नर हाइवे फनता ु है । अगय धन औय सर्त्ा से भुक्ति सभरती तो यावण औय दसये रोगों को अर्ाॊनत नहीॊ होनी ू चाहहए। धन फया बी नहीॊ औय अच्छा बी नहीॊ। उसभें कछ फयाइमाॉ कछ अच्छाइमाॉ दोनों छऩी हैं। ु ु ु ु ु आऩ अगय सत्सॊग से राबाजन्वत होते हो तो धन की अच्छाइमों का पामदा उठाकय अच्छे भें अच्छा जो ऩयभात्भा है वहाॉ तक ऩहुॉचते हो औय आऩ सत्सॊग क भागश ऩय नहीॊ है औय फाह्य े चीजों को भहत्त्व दे ते हो तो वे चीजें आऩकी र्ाॊनत को, आऩक ऻान को, आऩकी द्धवद्रता को, े सफको दफाकय आऩको गराभ फना दे ती हैं। ु वेदभासर क गचर्त् भें धन की रोरुऩता फढ़ती गई। े रोग सभझते हैं कक इतना धन हो जामगा कपय र्ाॊनत सभर जामगी, हभायी इच्छा ऩूयी हो जामगी। नहीॊ, इतना सभरने ऩय इच्छा कपय औय फढ़ जाती है । 'इतना भकान हो जाम, दो कभये औय एक यसोईघय, कपय आयाभ।' अगय इतना हो जाने क फाद आयाभ हो जाता हो तो आऩक ऩैय े े छ रॉ ू, रेककन आयाभ नहीॊ होता, र्ाॊनत नहीॊ होती। जफ तक उतना नहीॊ हुआ तफ तक रगता है ू कक हो जामगा तफ र्ाॊनत होगी। जफ उतना हो जाता है तफ पनीचय आवे तो र्ाॊनत। पनीचय आता है , ज्मादा फढ़ जाता है तफ रगता है एक कभया अगधक हो जाम तो र्ाॊनत। एक कभया फढ़ा हदमा कपय छत ऩय कभये फन जामें तो र्ाॊनत। ऐसा भनुबाई (भन) का खेर है । भामा ऐसी नागगनी जगत यही सरऩटाम। जो उसकी सेवा कये नतस को ही कपय खाम।। वेदभासर ब्राह्मण की तष्णा हदन दना यात चौगुना फढ़ती गई। धन खफ इकट्ठा हुआ। एक ृ ू ू हदन सभम ननकारकय अऩना कोष दे खने रगा। फच्चों को भाभा क घय बेज हदमा। जाॉचने रगा े कक ककतने भुकट एकत्रत्रत हुए, ककतनी अॉगूहठमाॉ एकत्रत्रत हुईं, ककतनी रूजमभणी की चक्तडमाॉ आमीॊ, ु ू आहद आहद। मे रूजमभणी की चक्तडमाॉ खाक हैं ? अफ तो हभायी हैं। ू 'इतना सोना, इतना चाॉदी, इतना जवाहयात, इतने रूऩमे-ऩैसे, आहाहा... फहुत धन.... फहुत धन....।' उन हदनों भें इन्कभटे मस क चोऩडे नहीॊ यखने ऩडते थे। े वेदभासर क हदर भें हुआ कक आहाहा..... ! खफ धन कभामा। हार् ! इतना साया धन है ! े ू ऩूवश कार भें उसने गुरू क चयणों भें फैठकय वेदों का अध्ममन ककमा था, र्ास्त्रों का द्धवचाय े ककमा था। थोडा र्ाॊत हुआ तो अनजाने भें उसकी वद्धर्त् थोडी गहयी चरी गई। सोचा कक् ृ
  • 55. "इतना धन तो है रेककन मह धन....? भेये साथ तो नहीॊ चरेगा। इतनी सायी चक्तडमाॉ... ू इतने साये भुकट.... इतनी सायी अॉगूहठमाॉ...... इतना साया सोना.... इतना साया जवाहयात..... ु आहाहा....!!" गहयाई भें अजासभर की तयह कछ ऩुण्म-ऩु्ज बी था औय कछ सन्नाटा सभर गमा, ऩुत्र- ु ु ऩरयवाय से अरग होकय, छऩकय धन गगनने का प्रोग्राभ था। ु "अहाहा....! इतने साये चाॉदी क रूऩमे.....!! रेककन मे भेये साथ तो नहीॊ आमेंगे। भरूगा तो े ॉ भैं अकरा भरूगा। रोग अथी उठाकय ऐसा नहीॊ फोरें गे कक् "इतना सोना सॊग है .... इतनी े ॉ अॉगहठमाॉ सॊग हैं.... इतने चाॉदी क रूऩमे सॊग हैं....।" नहीॊ। रोग फोरेंगे-' याभनाभ सॊग है .... ू े सतनाभ सॊग है ....। याभनाभ सत है .... आणखय मही गत है । 'भैं भरूगा तो रोग भझे सनाएॉगे कक ॉ ु ु आणखय मह गत है ।' अये येये.....! भैंने वेद को, बागवत को, याभामण को, ऻान को, बक्ति को फेच हदमा। नद्वय चीजें कभामा औय आमु फीत गई। छप्ऩन वषश हो गमे।" ऩचास क फाद तो वनवास-जीवन होना चाहहए् एकावन..... फावन..... आहद अॊक मही े प्रेयणा दे ते हैं। कफ तक सॊसाय भें कचराते यहोगे ? 'इसक सरमे काभ कयना है .... उसक सरमे ु े े प्रचाय कयना है .... चनाव आ यहा है ....' अये भयने दो चनाव को। चनाव तो आता यहे गा औय ु ु ु जाता यहे गा। एक हदन मह र्यीय नहीॊ यहे गा उसका ममा ? 'पराने बाई को चनाव भें जजताना है ...... हभायी ऩाटीवारा है .....' अये , तुम्हायी ऩाटीवारा ु ब्रह्म है , ऩयभात्भा है । ऩहरे उसका आदय कयो, फाद भें औय सफ। सॊसायीजन तो सदा आऩको सॊसाय की भजदयी भें ही रगामे यखें गे। कबी नहीॊ छोडेंगे भुि होने क सरए। ू े आज की ऩत्नी कहती है ् You are my husband. तुम्हायी सॊऩद्धर्त् औय आम की भैं अधाांगगनी हूॉ। भैं तुम्हायी ऩत्नी हूॉ। तुम्हायी सभजल्कमत भें भेया हहस्सा है । ऩनत फोरता है ् तू भेयी ऩत्नी है । सेवा कयना तेया पजश है । सभम ऩय बोजन औय कऩडे तैमाय यखो। फेटा फोरता है ् भैं तम्हाया ऩुत्र ु हूॉ। तुम्हायी सॊऩद्धर्त् का वारयस भैं हूॉ, भुझे दो। सभत्र फोरता है ् तुभ भेये साथी हो। भेये सरए भय सभटो। भेयी इच्छाओॊ को ऩूयी कयने भें अऩना सभम स्वाहा कय दो। ऩाटी वारे फोरते हैं- तुभ हभायी ऩाटी क हो। हभायी ऩाटी का प्रचाय कयो, हभायी ऩाटी भें चाहे ककतने ही डाक छऩे हों, कोई े ू ु फात नहीॊ। प्रचाय हभायी ऩाटी का ही कयो। भजहफवादी फोरते हैं कक् तुभ हभाये भजहफ क हो। े चाहे हभाये भजहफ भें ककतने ही आतॊकवादी हों कपय बी 'इस्राभ खतये भें है ....' कयक उठाओ े डॊडा। हभाये भजहफ ऩय चरो। दसये चाहे कसे बी हों, कहीॊ क बी हों। ऩौयाणणक रोग फोरते हैं ू ै े कक् तुभ जीव हो औय हभाये सम्प्रदाम क हो। तुभ र्ैव हो, र्ाि हो, तुभ वैष्णव हो, तुभ हवेरी े वारे हो, तुभ हभाये धभशवारे हो..... इससरए तुम्हाया धभश है कक सार भें अभुक दक्षऺणा इधय दो। रेककन बगवान कहते हैं- तुभ भेया अॊर् हो। भभैवाॊर्ो जीवरोक जीवबूत् सनातन्। े 'इस दे ह भें मह सनातन जीवात्भा भेया ही अॊर् है ।'
  • 56. (बगवद् गीता् 15.7) ब्रह्मवेर्त्ा सदगुरू फोरते हैं- हे चेतन ! तुभ आत्भा हो, अभय हो। अऩने आत्भा-ऩयभात्भा को ऩहचान कय सदा क सरए भुि हो जाओ। े अफ तुभ चाहे बगवान औय बगवत्प्राद्ऱ सदगुरू की फात भानकय, ऻान ऩाकय भुक्ति का अनुबव कयो अथवा श्रीभती की फात भानकय गाडी खीॊचो अथवा ऩनत की फात भानकय बोग की भर्ीन फन जाओ। अथवा नेताओॊ की फात भानकय इन्कराफ जजन्दाफाद कयो। अथवा भजहफ की फात भानकय डॊडे उठाते घभो। भजी तम्हायी है । ू ु रेककन वेदान्त सत्म कहता है कक न तभ ऩत्नी क हो न तभ ऩनत क हो, न तभ फच्चों ु े ु े ु क हो न तभ ऩाटी क हो न तभ भजहफ क हो। तभ तो हो ऩयभात्भा क औय ऩयभात्भा है े ु े ु े ु े तम्हाया। उसकी एक फाय भराकात कय रो कपय तभ सफक हो औय सफ तम्हाये हैं। ु ु ु े ु भझे तो मह ऻान सच्चा रगता है , अच्छा रगता है । आऩको जो सच्चा रगे, अच्छा रगे, ु आऩ स्वतॊत्र हैं। वेदभासर ब्राह्मण सोच यहा है कक आणखय मह सफ भार छोडकय भयना ऩडेगा। अफ ममा करू ? ॉ उसने ऩुत्रों को फुरामा। धन-सॊऩद्धर्त् क चाय हहस्से ककमे। एक हहस्सा ऩुत्र को हदमा, दसया े ू हहस्सा दसये को दो। दो हहस्से अऩने सरए यखे। कछ फोझ हरका हुआ तो रगा कक हार् ! इतनी ू ु गचन्ता सभटी। द्धवद्याध्ममन क सभम ककसी आचामश क चयणों भें फैठा था न ! े े ऩूवश का सदद्धवचाय जग आमा। बागवत भें अजासभर की कथा आती है । उसने ऩूवश जीवन भें सत्कभश ककमे थे, फाद भें दयाचायी हो गमा था। सॊतों क वचन से अऩने फेटे का नाभ नायामण यखा। भयते सभम ु े 'नायामण.... नायामण....' कयते उसक ऩूवश क सत्कभों की ऩॉजी कपय से णखरी। े े ू आऩने ऩहरे धन कभामा कपय धन चरा गमा। तो जरूयी नहीॊ कक भयते सभम धन आ जाम। ऩहरे सर्त्ावान थे, सर्त्ा चरी गई तो भयते सभम कपय कसी सभर जाम मह असॊबव है । ु नेता सोचे कक हभ फीस सार तक उसी कसी ऩय यहे , सभाज की सेवा की। अफ कसी नहीॊ यही ु ु तो भयते सभम वह आ जाम मह सॊबव नहीॊ। रेककन आऩने ऩहरे बजन ककमा, जऩ तऩ ककमे, साधना की, मोगाभ्मास ककमा। कपय फीच भें सफ छट गमा तो भयते सभम बी बजन का प्रबाव आकय खडा हो जाता है । मह बजन ू का प्रबाव है , बगवान की भहहभा है । जीवनबय हभ धनाढम यहे रेककन फुढ़ाऩे भें गयीफ हो गमे तो भयते सभम कपय धन की नतजोरयमाॉ आकय खडी हो जामें मह असॊबव है । जीवनबय आऩ दाता यहे , अॊनतभ सभम भें कगार हो गमे तो भयते सभम दान दे ने क ॊ े सरमे, दाता फनने क सरए कपय धन आ जाम मह सॊबव नहीॊ। े
  • 57. जीवनबय आऩने बजन ककमा। कपय आऩ दयाचाय भें आ गमे। भयते सभम ऩूवश भें जो ु बजन ककमा है उसका प्रबाव जरूय प्रकट हो जाता है । अऩनी बराई ककसभें है मह आऩ अफ ठीक से सभझ गमे। हभें मह कहने की जरूयत नहीॊ कक तुभ बजन की ऩॉूजी कभाओ। हभें मह कहने की जरूयत नहीॊ कक तुभ चैतन्म हो औय ऩयभात्भा को सभरने क सरए आमे हो। ममोंकक े मह सच्ची फात है । नहीॊ कहूॉ तबी बी आऩ सभझते हो। भैंने तो कवर इर्ाया कय हदमा। अफ.... े मथेच्छसस तथा करू। ु जैसी आऩकी इच्छा हो वैसा कयो। हभ ककसी ऩय दफाव नहीॊ डारते हैं। हभ तो कवर े तम्हें जगाते हैं। कपय खड्डे भें गगयो ऐसा हभ ममों कहें ? खड्डे से फच ननकरो् ऐसा बी ममों ु कहें ? आॉखें तम्हाये ऩास हैं, दीमा तम्हाये ऩास है औय भझे तभ ऩय बयोसा है । खड्डों को तभ ु ु ु ु ु दे ख सकते हो, सही यास्तों को तभ दे ख सकते हो। इससरए फाॉहें चढ़ाकय अऩने को सताने क ु े सरए खड्डों भें नहीॊ गगयोगे। "कहाॉ जा यहे हो बाई !" "फस जा यहे हैं, उसकी टाॉग खीॊचने क सरए।'' े अये बाई ! जानफूझकय खड्डों भें ममों गगयना ? हभें तो सभम फचाकय ऊचे सर्खय सय ॉ कयने हैं। वेदभासर ब्राह्मण ने अऩना फोझ थोडा उताय हदमा। दो हहस्से फच्चों को दे हदमे , दो हहस्से अऩने ऩास यखे। कपय सोचा् मह धन कभाने भें जो ऩाऩ हुआ, इसको एकत्रत्रत कयने भें जो सभम का बोग हदमा उसका उऩाम सोचना चाहहए। दो हहस्सों भें ऐसा पामदा उठाना चाहहए कक खोमी हुई बीतयी ऩॉूजी ऩुन् हाससर कय सक। ॉू वेदभासर ब्राह्मण आधी सम्ऩद्धर्त् फच्चों को फाॉट गमा, आधी अऩने साथ रेकय घय से ननकर ऩडा। कछ सभत्रों क ऩास यख दी, फाकी की साथ री। गॊगा ककनाये मात्रा कयता-कयता वह ु े हरयद्राय से कछ ऊऩय औय ऋद्धषकर् से कछ नीचे एक आश्रभ भें ऩहुॉचा। उस आश्रभ की र्ोबा ु े ु दे खते ही फनती थी। कछ हदन वहाॉ यहा। मथामोग्म सेवा री औय मथामोग्म सेवा की। कपय आगे ु चरा। चरते-चरते वेदभासर ब्राह्मण जानजन्त भुनन क आश्रभ भें ऩहुॉचा। गॊगा क ककनाये , े े ऩवशतभाराओॊ क फीच सुन्दय, सुहावना, द्धवर्ार वह आश्रभ था। परों से रदे हुए वऺ आश्रभ की े ृ र्ोबा फढ़ा यहे थे। ऩक्षऺमों की भधय ककरोर हो यही थी। ऋद्धष-भुनन अऩना वेदाध्ममन कयते थे। ु तऩस्वी अऩना तऩ कयते थे। वेदऩाठी वेदऩाठ कयते थे। सफका अऩना अरग-अरग द्धवबाग था। सुफह औय र्ाभ सफ रोग एकत्रत्रत होते थे। सुफह ब्रह्मद्धवचाय होता था, ब्रह्मसूत्र की चचाश चरती थी औय र्ाभ को हरयचचाश औय ऩुयाणों की कथा चरती। कबी बाव द्धवकससत होता है कबी प्रेभ द्धवकससत होता है कबी तत्त्वऻान का प्रकार् होता है , ममोंकक भन का स्वबाव है । सदा एक जैसा होता है तो भन ऊफता है । इसीसरए बोजन भें बी
  • 58. कबी योटी-सब्जी तो कबी चावर-दार, कबी खीय-ऩूडी तो कबी पराहाय। आणखय ऩेट बयना, रेककन वेयाइटी भन का स्वबाव है । ऐसे ही जानजन्त भुनन अरग-अरग साधना प्रवद्धर्त् की ृ वेयाइहटमाॉ दे कय अऩने प्माये सर्ष्मों की उन्ननत कय यहे थे। ऐसे अनेकों की उन्ननत भें सॊरग्न जानजन्त भुनन क श्रीचयणों भें ऩहुॉचने का सौबाग्म वेदभासर ब्राह्मण को सभर गमा। े वेदभासर कथा तो स्वमॊ बी कयता था, विा था, रोगों को सुनाता था रेककन भुनीद्वय के चयणों भें फैठने से जो र्ाॊनत सभरी, कथा का यहस्म खरने रगा वह कछ ननयारा था ममोंकक ु ु भनन कथा को फेचते नहीॊ थे। भनन तो रृदम भें छऩे हुए ऩाऩों को फेच डारते थे, अहॊ काय को ु ु ु द्धवसजजशत कयते थे। वे धन कभाने क सरए कथा नहीॊ कयते थे, मर् ऩाने क सरए कथा नहीॊ कयते े े थे, कथा क सरए ही कथा कयते थे इससरए उनकी कथा यसप्रद होती थी, बीतय का प्रकार् दे ने े वारी होती थी। वेदभासर ब्राह्मण ने सॊकल्ऩ ककमा कक इन भनीद्वय का सर्ष्म फन जाऊ। भु नीद्वय ने कहा् ु ॉ "फैठो, यहो। सर्ष्म फनने की जल्दी नहीॊ, ममोंकक गरू फनने का भझे र्ौक नहीॊ है ।" ु ु गुरू फनने भें बी फहुत कछ दे ना ऩडता है । गुरू सर्ष्म को दीऺा दे ते हैं। दीऺा = दी = ु जो हदमा जाता है । ऺा = जो ऩचामा जाता है । आध्माजत्भक र्क्ति दे ने का जो साभथ्मश यखे, हभाये रृदम भें हदव्म र्क्ति का सॊचाय कयने की र्क्ति यखे उनको गुरू कहा जाता है । आध्माजत्भक र्क्ति को ऩचाने की जजसभें मोग्मता हो उसको सर्ष्म कहा जाता है । ककसान चाय ऩैसे क दाने बी जभीन भें तफ पकता है जफ ऊवशय बूसभ दे खता है । सडक े ें ऩय तो नहीॊ पकगा, ममोंकक जानता है कक वहाॉ नहीॊ ऊगें गे, व्मथश जाएॉगे। ऐसे ही गुरू रोग बी ें े सर्ष्मों की मोग्मता, उनकी तत्ऩयता, उनकी श्रिा, उनका सभऩशण, उनकी सेवा औय सहनर्क्ति दे खते हैं। भुनीद्वय ने कहा् "हे ब्राह्मण दे व ! तुभ कछ हदन यहो, ममोंकक तुभने कथाएॉ की हैं। तुभ ु फहुत चतुय हो। तुभको यॊ ग रगने भें दे य रगेगी।" जैस, नेता को कथा का यॊ ग रगना फडा कहठन है ममोंकक वह स्वमॊ बाषण कयता है तो े गुरू भहायाज क सत्सॊग को बी बाषण गगन सकता है । इससरए नेताओॊ को आध्माजत्भक यॊ ग े इतना जल्दी नहीॊ रग सकता जजतना अन्म रोगों को रग सकता है । ऐसे ही कथाकाय को इतना यॊ ग नहीॊ रग सकता जजतना आभजनता को रग सकता है । कथाकाय अगय सदगुरू क चयणों भें जाकय कथा सुने , सत्सॊग सुने तो इतना जल्दी यॊ ग े नहीॊ रगेगा। वह तो सत्सॊग भें से ऩोइन्ट नोट कये गा औय दसये रोगों को कथा सुनाने की अऩनी ू मोग्मता फढ़ामेगा। र्ाॊनत ऩाने की मोग्मता तो सर्ष्म क अन्दय आती है । कथाकाय क अन्दय तो े े कथा कयने की मोग्मता का द्धवकास होता है । हाॉ, कोई कथाकाय बी हो, बगवान का बि बी हो, सदगुरू का सर्ष्म बी हो उसको तो खफ-खफ धन्मवाद है । ू ू
  • 59. वेदभासर ब्राह्मण कछ हदन यहा। ऩूवकार भें ककमे हुए सॊध्मा-वन्दन, जऩ-तऩ, ऩूजा-प्राथशना, ु श स्वाध्माम औय वेदाध्ममन अन्त्कयण को ननभशर कयने भें सहमोगी फने। एक हदन गुरूदे व क े चयण ऩकडकय प्राथशना कयने रगा कक गुरूदे व भुझे कोई द्धवर्ेष उऩदे र् दो। जानजन्त भुनन इस ब्राह्मण ऩय प्रसन्न थे। इसका रृदम र्ुि हुआ था इससरए तत्त्वजजऻासा जागी थी। भुनीद्वय ने अऩने गचर्त् को ऺणबय भें अऩने चैतन्म स्वरूऩ ऩयभात्भा भें डुफा हदमा। कपय ब्राह्मण ऩय आजत्भक प्मायबयी ननगाहें डारते हुए भधय वाणी से फोरे् ु "हे वेदभासर ब्राह्मण ! तू अऩने को ब्राह्मण भानता है रेककन 'भैं ब्राह्मण हूॉ' मह तेये भन की भान्मता है । ब्राह्मण कर भें तेये र्यीय का जन्भ हुआ है , तेया जन्भ नहीॊ हुआ है । हे वेदभासर ु ब्राह्मण ! तू अऩने गचर्त् को सफह-सफह भें उस चैतन्म ऩयभात्भा क गचन्तन भें रगामा कय। ु ु े प्रबात का गचन्तन हदनबय की तेयी भनोदर्ाओॊ को उन्नत कये गा। हे द्धवप्र ! जानजन्त भनन इस र्यीय का नाभ है । भैं तो वह हूॉ जजसभें अनॊत अनॊत ऋद्धष- ु भुनन, दे व-दानव, मऺ-गन्धवश-ककन्नय औय ऩाॉचों बूत उत्ऩन्न हो-होकय रीन हो जाते हैं। वह भैं र्ुि चैतन्म गचदाकार् ऩयब्रह्म हूॉ। हे वेदभासर ब्राह्मण ! ककसी की बी ननन्दा न कयना। ककसी की उन्ननत कयने क सरए े उसको टोक दे ना, ऩय रृदम भें प्माय बया हो, तो उसकी बी उन्ननत औय तुम्हाये अन्त्कयण की बी ऩद्धवत्रता। अगय घणाबाव से मा ननन्दाबाव से ककसी को कछ कहोगे तो उसकी उन्ननत बी ृ ु उतनी नहीॊ होगी औय आऩकी बी नहीॊ होगी। जो दसयों की ननन्दा नहीॊ कयता, दसयों का धन नहीॊ हडऩता, दसयों का द्ख दय कयने क ू ू ू ु ू े सरए जो फोरता है उसकी वाणी तऩ फन जाती है । जो दसयों को दे खते सभम दसये जजससे दे खते ू ू हैं उस ऩयभात्भा की माद कय रेता है उसका दसयों क गचर्त् ऩय फडा प्रबाव ऩडता है । ू े हे वेदभासर ! प्रात्कार भें , ब्रह्मभुहूतश भें ब्रह्मगचन्तन कयना चाहहए। अऩने ऩुरूषाथश के अनुकर सॊकल्ऩ औय गचन्तन कय रेना चाहहए। ककन कायणों से भेया र्यीय योगी फनता है , ककन ू कायणों से नीयोगी होता है इसका बी प्रात्कार भें थोडा सा अध्ममन कय रेना चाहहए। ककन कायणों से गचर्त् भें र्ाॊनत आती है औय ककन कायणों से अर्ाॊनत आती है , णखन्नता घेय रेती है उसका बी सुफह-सुफह कछ अध्ममन स्वमॊ कय रेना चाहहए। गचन्तन कयक र्ाॊत हो जाना ु े चाहहए। भध्माह्न क सभम बी भध्माह्न सॊध्मा कय रेनी चाहहए। दस सभनट की भध्माह्न सॊध्मा ऩाऩों े का नार् कयने वारी है । तुभ तो ब्राह्मण हो, जानते हो। सॊध्मा भें प्राणामाभ ककमे जाते हैं औय प्राणामाभ से प्राणर्क्ति सूक्ष्भ होती है । प्राणर्क्ति सूक्ष्भ होने से भन ऩद्धवत्र होता है , भन स्वस्थ औय र्ाॊत होता है , फुद्धि का द्धवकास होता है । कपय वही सूक्ष्भ फद्धि सूक्ष्भानतसूक्ष्भ ऩयब्रह्म ु ऩयभात्भ-तत्त्व का द्धवचाय कयने भें सपर होती है ।"
  • 60. जानजन्त भुनन आगे कहने रगे् "हे वेदभासर ! 'दो ऩुत्र भेये हैं , ऩत्नी भेयी है , मह घय भेया है ' – ऐसा कयक अऩने प्रेभ को े कजण्ठत कय हदमा। इस कायण औयों का र्ोषण कयक तुभने तऩ को, कथा को औय उम्र को फेच ु े हदमा। रेककन ऩहरे ककमा हुआ वेदाध्ममन तुम्हाये रृदम भें स्परयत हो आमा है । इससरए तुभ इस ु भोहभामा को जीतने क सरए सत्सॊगनत भें आ गमे हो। अफ महाॉ सत्सॊगनत भें बी अऩनी साधना े भें अनुकर चरने वारे साधकों का ही सॊग कयना। जो भूखश हों, ऩाभय हों, सॊसाय की रोरुऩता से ू जजनका गचर्त् आक्राॊत हो ऐसे रोगों का सॊग नहीॊ कयना, ममोंकक तम्हाया जीवन अफ थोडा ही है । ु उम्र फढ़ गई है । छ्पप्ऩन वषश ऩये हो यहे हैं, सर्त्ावनवाॉ वषश आ यहा है । कफ साठ ऩये हो जाएॉ औय ू ू एकसठवें वषश भें चर फसो मा फासठवें वषश भें चर फसो, कोई ऩता नहीॊ। सोभवाय को जाओ मा र्क्रवाय को जाओ। सात हदनों भें से एक हदन तो अवश्म जाओगे। इस र्यीय की भत्मु हो जामे ु ृ उसक ऩहरे र्यीय क असबभान को त्माग दे औय र्यीय की आसक्ति छोड दे कक भेया ममा होगा। े े हे हद्रज ! जीव ऩैदा होता है उसक साथ ही उसका ननद्ळम हो जाता है कक कफ इसको े भयना है औय ककस घटना से भयना है । ककस भाता क उदय से इसको जन्भ रेना है औय ककस े कन्मा से इसको पये कपयने हैं मह ऩहरे से ही उसका ननजद्ळत होता है । जीव नाहक क सॊकल्ऩ- े े द्धवकल्ऩ कयक अऩना प्रायब्ध उरझा हुआ फना दे ता है । अगय जीव को ऩुरूषाथश कयना है तो ऩयभ े ऩद को ऩाने का ऩुरूषाथश कयना चाहहए। दो योटी क टुकडों क सरए अनत ऩुरूषाथश कयने की े े आवश्मकता नहीॊ है । मथामोग्म ऩुरूषाथश कयक कपय फाकी क सभम भें वेदऻान क अभत भें गोता े े े ृ भायना चाहहए। हे वेदभासर ब्राह्मण ! अफ ध्मान कये गा तो घय माद आमगाष ऩत्नी माद आमगी, फेटे माद आमेंगे। फेटों को जो हहस्सा हदमा है उसका सदऩमोग होता होगा कक नहीॊ होता होगा, ऐसा तेये ु गचर्त् भें आमगा। इससरए हे द्धवप्र ! तू द्धवचाय कयना कक तू रामा था ममा ? ऩत्नी औय ऩुत्र तेये साथ नहीॊ आमे थे। ऩत्नी बी तुझे महाॉ सभरी, ऩुत्र बी तुझे महाॉ सभरे औय धन बी महीॊ सभरा। मे सफ बी महाॉ त्रफछडे। तेये साथ तो तेया ऩुण्म आमा था, तेये साथ बी तेयी सभझ आमी थी, तेये साथ तो तेया ऩयभात्भा था, वह वेदाध्ममन क सभम बी था औय अबी बी है । तू ऩत्नी क साथ े े था तफ बी ऩयभात्भा था रेककन ढका हुआ था। "अफ तू भोह को ज्मों-ज्मों ननवर्त् कयता जामेगा, ऩदाश ज्मों-ज्मों धधरा होता जाएगा त्मों- ृ ुॉ त्मों आत्भ-प्रकार् फढ़ता जाएगा।" कथा कहती है कक ननत्म इस प्रकाय भुनीद्वय जानजन्त क अनुबवमुि वचन सुनते-सुनते े वेदभासर ब्राह्मण का श्रवण क साथ भनन होता था, साथ ही साथ ननहदध्मासन बी होता जाता े था। कबी-कबी उसक र्यीय भें मकामक झटका सा आ जाता था, प्राणोत्थान होने रगता थाष े कबी-कबी कीतशन भें , ध्मान भें वह बावद्धवबोय हो जाता था। अद्श प्रकाय क साजत्त्वक बावों भें से े ककसी न ककसी बाव से उसका गचर्त् बय जाता था। अश्रऩात होना, रूदन होना, योभाॊच होना, ु
  • 61. हास्म होना, र्यीय भें कऩन होना, बावावेर् होना इस प्रकाय कबी ककसी बाव भें कबी ककसी बाव ॊ भें उसका गचर्त् यभण कयता था। भुनीद्वय की कथा सुनते-सुनते वेदभासर को फडा यस आता था। यस स्वरूऩ ऩयभात्भा भें गोता भायकय उसकी वद्धर्त् थोडी-थोडी व्माऩक होती जाती थी। ऩहरे तो दो फेटे औय ऩत्नी की ृ तयप ही अऩना जीवन कजन्द्रत था। अफ आश्रभ क जो रोग थे उनक प्रनत वद्धर्त् व्माऩक हो गई े े े ृ कक मे सफ हभाये ही हैं। कपय धीये -धीये गॊगा ककनाये मात्रा कयने वारों भें उसका अऩनाऩन जडा ु औय ऐसा कयते-कयते उसका अऩनत्व सायी सद्धद्श भें परने रगा। उसका दे हाध्मास कभ होने ृ ै रगा, रृदम की ग्रजन्थमाॉ खरने रगा। ु अऩने प्रेभ को जजतना-जजतना द्धवस्तत कयते हो उतना-उतना आऩ उन्नत होते जाते हो। ृ जजतना-जजतना प्रेभ को कजण्ठत कयते हो, र्यीय भें आफि कयते हो उतना-उतना अऩनी ऩार्वी ु मोननमों क सरए तैमायी कयते हो। े प्रेभ को जजतना-जजतना फहुजनहहताम.... फहुजनसुखाम द्धवकससत कयते हो उतना-उतना आऩ ऩयभात्भ-स्वबाव को जगाते हो। वेदभासर ब्राह्मण अऩने ऩयभात्भा-स्वबाव को जगाते-जगाते एक ऐसी ऊचाई ऩय ऩहुॉचा कक ॉ उसको वऺों भें बी अऩना चैतन्म वऩु हदखाई दे ने रगा। ऩक्षऺमों की ककरोर भें बी अऩना ृ द्धप्रमतभ ककरोर कयता हदखाई दे ने रगा। ऩर्ुओॊ की हॉ बाय भें औय गधे क यें कने भें बी चैतन्म े की सर्त्ा की दीदाय होने रगा। परों का णखरना, हवाओॊ का चरना आनन्ददामक रगता। उस ू चैतन्म क प्रसाद को वह अन्दय रे जाता औय अऩने आत्भयस से बयी हुई आॉखों से अऩने गुरूदे व े को बावऩूवक ननहायता। वह अहोबाव से गुरूदे व को ननहायता तो गुरूदे व कृऩाऩूणश अन्त्कयण से श सर्ष्म क तयप ननहायते। े इस प्रकाय सर्ष्म क फन्धन धीये -धीये कटते गमे। सर्ष्म सर्ष्म न फचा औय गुरू गुरू न े यहे । दो दीमे जगभगामे। दोनों दीमों क जगभगाहट से कभये भें जो योर्नी होती है तो कौन-से े दीमे की कौन सी योर्नी है मह कहना भुजश्कर है । ऐसे ही गुरू का आनन्द औय सर्ष्म का आनन्द एक ब्रह्मानन्द भें फदर गमा। वेदभासर ब्राह्मण को आत्भ-साऺात्काय हो गमा। आऩ बी अऩने प्रेभ को प्रकटाते जाओ, अऩने द्धप्रमतभ ऩयभात्भा को स्नेह कयते जाओ। जो ऩक्षऺमों भें ककरोर कय यहा है वह तुम्हाया ही याभ है औय जो ऩर्ुओॊ भें चर कपय यहा है वह बी तुम्हाया चैतन्म है । जो परों भें णखर यहा है , हवाओॊ भें झूभ यहा है वह बी तुम्हाया है औय ू जो हदर की धडकनें चरा यहा है वह बी तुम्हाया है । गुरू फनकय उऩदे र् दे यहा है वह बी तुम्हाया द्धप्रमतभ ऩयभात्भा है औय साधक फनकय सुन यहा है वह बी तुम्हाया माय ऩयभात्भा ही फैठा है । उस सवशननमॊता जगदीद्वय को हभ प्माय कयते हैं। उसी ऩयभेद्वय का हभ ध्मान कयते हैं जो प्राणीभात्र क रृदम का रृदमेद्वय है । े अनक्रभ ु
  • 62. ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अदबुत प्राणोऩासना श्रीमोगवासर्द्ष भहायाभामण भें श्री वसर्द्षजी भहायाज कहते हैं- "जो अऩने आत्भदे व भें स्पयण ऩैदा होता है वह ऺण भात्र भें मोजन ऩमांत जाता है । उस ु स्पयण क आधाय को जानकय हे याभ जी ! तभ जस्थय हो जाओ।" ु े ु फहुत ऊची फात है । हभ महाॉ होते हैं औय भीरों दय हभाया भन जाता है । .....वाऩस आता ॉ ू है .... दसयी जगह जाता है.... वाऩस आता है ....तीसयी जगह जाता है । अबी भन भें कछ द्धवचाय ू ु चर यहे हैं, दस सभनट क फाद कौन-से द्धवचाय आमेंगे कोई ऩता नहीॊ। इस प्रकाय असॊख्म द्धवचाय े भन से फहते यहते हैं... असॊख्म। जैसे सयोवय मा सागय क जर भें तयॊ ग उठते हैं वैसे ही हभाये े र्ुि आत्भदे व की सर्त्ा रेकय भन भें असॊख्म द्धवचाय तयॊ ग उठते हैं जजसे भन का स्पयण कहा ु जाता है । जहाॉ से मह स्पयण उठता है उस आत्भदे व को ससप तीन सभनट क सरए बी अगय ु श े कोई जान रेता है तो वह धभश क पर को प्राद्ऱ कय रेता है । वह मोगी हो तो उसका मोग ससि े हो जाता है , तऩस्वी हो तो उसका तऩ सपर हो जाता है , जऩी हो तो उसका जऩानुद्षान साथशक हो जाता है , वह त्मागी हो तो उसका त्माग ऩूणत्व को ऩा रेता है । ऐसा ऊचा अनुबव होता है । श ॉ ऐसी फात ऩढ़ जाते हैं, सुन रेते हैं रेककन सूक्ष्भता से मह फात अगय ऩकड भें आ जाम तो ननहार हो जामें, फेडा ऩाय हो जाम। ऐसी फातें सूक्ष्भता से ऩकड नहीॊ ऩाते इसका ममा कायण है ? कायण मह है कक अऩने गचर्त् भें त्रफन जरूयी कचया खफ बय रेते हैं। इससरए सूक्ष्भ सत्त्व, सूक्ष्भ तत्त्व भें हभाया गचर्त् ू प्रवेर् नहीॊ कय ऩाता। वह सत्त्व उऩासकों का ईद्वय होकय हदखता है , बिों का बगवान होकय हदखता है । र्क्ति क उऩासक उसको र्क्ति भानते हैं , जगदम्फा क आयाधक उसे भाॉ भानते हैं , े े गुरूबि उसे गुरू भानते हैं। है वही एक ही सत्त्व। र्ुि चैतन्म भें से जो स्ऩन्दन ऩैदा होते हैं वे स्ऩन्दन फेभाऩ होते हैं। अगय चैतन्म की स्ऩन्दनयहहत अवस्था भें ऩहुॉच जामें तो फेडा ऩाय हो जाम। नहीॊ जा ऩाते, इसका कायण मह है कक उसक सरए तत्ऩयता नहीॊ है । वहाॉ रे जाने वारे भहाऩुरूषों का सभागभ जल्दी से हो नहीॊ े ऩाता। भहाऩुरूष बी सभर गमे औय थोडी फहुत तत्ऩयता बी है रेककन गचर्त् भें त्रफनजरूयी कचया बयने की आदत ऩयानी है । ु आधननक मग क चाणमम नीनत वारे, भानो आधननक चाणमम सयदाय वल्रबाई ऩटे र ु ु े ु ककर्ोयावस्था भें नक्तडमाद की स्कर भें ऩढ़ते थे तफ की घटना है । एक हदन स्कर भें भास्टय ू ू कछ फोरे जा यहे थे। वल्रब को रगा कक सफ व्मथश प्रराऩ हो यहा है । वे सना-अनसना कयक ु ु ु े
  • 63. भीठी नीॊद रेने रगे। भास्टय को रगा कक भैं छात्रों को ऩढ़ा यहा हूॉ, फोरे जा यहा हूॉ औय उद्दण्ड रडका सो यहा है फेऩयवाह होकय ? जगाकय धभकामा् "ऐ रडक ! ममा कय यहा है ? भैं इतना ससखा यहा हूॉ औय तू खयाशटे बय यहा है , े फदतभीज !" द्धववेकी औय अऩने भजस्तष्क भें व्मथश फातें नहीॊ बयने वारे वल्रब ने फहढ़मा जवाफ हदमा् "भास्टय जी ! फुया न भानना। आऩ जो फोरते हैं वह सफ अऩने हदभाग भें बयता यहूॉ तो आऩ जो नहीॊ जानते हैं वह बयने क सरए जगह कहाॉ से राऊ ? इससरए जानफझकय हदभाग को े ॉ ू द्धवश्राॊनत दे यहा हूॉ।" ऐसे रोगों भें आत्भद्धवद्वास होता है । व्मथश फातें अऩनी खोऩडी भें नहीॊ बयो। साभने वारा जो जानता है वह सफ अऩनी खोऩडी भें बयना है ? हरवाई की दकान ऩय जाकय सफ सभठाई ु रेने की है ? ककयाने की दकान ऩय जाओ तो सायी चीजें रे रोगे ? ु तभ कहीॊ बी जाते हो, वहाॉ जो कछ सभरता है, अऩने गचर्त् भें बयते यहते हो। फस भें फैठे ु ु तो सफ द्धवऻाऩन क गचत्रों को दे खने रग गमे। इधय मह दे खा, उधय वह दे खा, मह सुना, वह े सुना। सफ हदभाग भें बयते गमे। फाहय ननकारकय खारी हो जाने की तो फात ही नहीॊ। ....तो कपय जगत क रोग जो ऻान नहीॊ जानते उसको तो अऩने गचर्त् भें प्रवेर् ही नहीॊ े सभरेगा No Entry तत्त्वऻा की फात क सरए अऩने हदभाग भें No Entry है । हदभाग ऩूया बया हुआ े है सॊसाय क कचये से। इसीसरए तत्त्वऻान की सूक्ष्भ फातें ग्रहण नहीॊ कय ऩाते। गचर्त् र्ाॊत जस्थय े नहीॊ हो ऩाता। बगवान फुि क ऩास कोई सेठ गमा। कहने रगा् े "बन्ते ! अफ भुझे ऩचास वषश ऩूये हुए हैं। अफ वन भें जाने का प्रायम्ब हुआ है , एकावन.... फावन.... आहद। कृऩा कयक आऩ भुझे अऩने जीवन का अनुबव फताएॉ। दो वचन े सुनाएॉ जजससे भेया उिाय हो।" तफ तक सेठ ने इधय नजय घुभाई, उधय दृद्धद्श की। अऩनी अॉगूठी की ओय दे खा। कछ की कछ प्रवद्धर्त्माॉ कय डारी। ु ु ृ फुि सभझ गमे कक गचर्त् भें फहुत कचया उबया हुआ है । अबी ससप दवाई दे ने से योग श सभटे गा नहीॊ, ऑऩये र्न कयना ऩडेगा। वे फोरे् "बाई ! हभने इतनी सायी भेहनत की, वषों तक बूख, प्मास औय कद्श सहे औय जो अनुबव ऩामा वह मों ही भुफ्त भें तुम्हें दे दें ? त्रफना सेवा क ऻान ऩचेगा कसे ? सेवा कयो े ै सेवा।" "बन्ते ! आऻा कीजजए।" "आऻा ममा कयें ? साध-सॊतों को बोजन कयाओ।" ू "आऩ हभाये घय बोजन रेंगे ?"
  • 64. "ममों नहीॊ ? तुभने ननभॊत्रण तो हदमा नहीॊ। सेवा तो ककमा नहीॊ, कवर रूटने को आमे े हो। हभ ऐसे ऩागर थोडे ही हैं कक रूटे जाएॉ ?" फुि मह सफ उस व्मक्ति को दे खकय कहते हैं। स्वमॊ को खाने की कोई इच्छा नहीॊ, कछ ु रेने की इच्छा नहीॊ। रेककन उसको कछ अनुबव कयाना है । ु "आऩ भेये घय सबऺा ग्रहण कयने आमेंगे ! फडी खर्ी की फात है ।" सेठ खर् हो गमे। ु ु साया इन्तजाभ कयने रगे। यसोइमों को फुरामा, सभत्रों से फात की। 'बगवान फुि सबऺा ग्रहण कयने आने वारे हैं ! याजकभाय भें से साधू फने थे, कोई साधायण साधू तो थे नहीॊ। खफ ु ू तैमारयमाॉ की, खीय फनामी, ऩडी फनामी, भारऩआ फनामाष, ममा-ममा ऩकवान फनामे, व्मॊजन ू ू फनामे। 'हभाये द्राय ऩय सॊत आने वारे हैं.....!' सबऺा का सभम हुआ औय फि सबऺाऩात्र उठाकय चर हदमे। यास्ते भें कछ साभान ढूॉढते ु ु चरे। उनकी नजय भें ऩड गमा ककसी गाम का गोफय। उठाकय अऩना सबऺाऩात्र बय सरमा। सेठ क द्राय ऩय ऩहुॉचे तो सेठ रे आमा सफ बोजन साभग्री। े "भहायाज ! रो।" गोफय से बया हुआ सबऺाऩात्र आगे फढ़ाते हुए फुि फोरे् "डार दो इसभें ।" "बन्ते ! मह तो गोफय से बया है ।" "बया है तो बया है , तुभ अऩनी खीय उसभें डार दो।" "स्वाभी ! खीय आऩको काभ नहीॊ रगेगी औय भेयी खीय खयाफ होगी।" "सबऺा रेने फुरामा है तो सबऺा दो न !" "दॉ ू तो सही रेककन अऩना सबऺाऩात्र भुझे दो। गोफय ननकार कय कपय ठीक से धो रॉ ू , फाद भें सबऺा दॉ ।" ू "तुभ चाय ऩैसे की खीय डारने से ऩहरे फतशन साप कयते हो तो भैं अऩना ब्रह्मयस तुम्हाये अन्त्कयण भें बयने से ऩहरे तुम्हाया अन्त्कयण साप करू कक नहीॊ ?" ॉ प्रायम्ब भें जो मोगवासर्द्ष की फात आमी थी वह फहुत सूक्ष्भ थी रेककन अऩने कानों से टकयाकय चरी गई, अऩनी नहीॊ यही। ममों ? ममोंकक जगत का गोफय अऩने अन्त्कयण भें बया हुआ है न ! सूक्ष्भ फुद्धि क आदभी को इर्ाये से कह दो, वह काभ फहढ़मा कय दे ता है रेककन भोटी े फुद्धि क आदभी को फाय-फाय कहो तो बी सभझ भें नहीॊ आता। े कफीयजी की ऩत्नी फडी सूक्ष्भ फुद्धि की थी। कफीय जी ने कहा् "रोई ! एक फात सुन। भैं एक प्रऻाचऺु (अॊध) व्मक्ति को बोजन का ननभॊत्रण दे आमा हूॉ। अऩना बोजन फने, साथ-साथ उस व्मक्ति का बोजन बी फना दे ना।"
  • 65. रोई ने बोजन फनामा। प्रऻाचऺु व्मक्ति आमे उसक ऩहरे दो थासरमाॉ बोजन ऩयोसकय े तैमाय कय हदमा। ऩहरे अनतगथ बोजन कय रें फाद भें घयवारे सफ। कफीयजी ने दो थासरमाॉ दे खकय ऩछा् ू "दो थासरमाॉ ममों ? एक ही व्मक्ति आने वारा है तो अगधक बोजन ममों फनामा ?" "एक ही व्मक्ति आने वारे थे औय आऩने कहा कक प्रऻाचऺु (अॊध) हैं तो अकरे तो आमेंगे े नहीॊ, ककसी को साथ भें रेकय आमेंगे इससरए दो थासरमाॉ ऩयोसी हैं।" कफीयजी फडे प्रसन्न हुए की आणखय तो रोई कफीय की ऩत्नी है । व्मवहाय भें आदभी अनभान रगाकय ककसी द्धवषम भें ऩवश तैमायी कय रेता है ऐसे ही ु ू आमष्म ऩया होगा तो तन औय भन कहीॊ चरे जामें उसकी अऩेऺा ऩहरे से ही तैमायी यखें । ु ू पयने जहाॉ से उत्ऩन्न होते हैं, सॊकल्ऩ औय द्धवकल्ऩ जहाॉ से उठते हैं औय मोजनों तक ु चरे जाते हैं, वाऩस आते है , फाय-फाय आते जाते हैं, उसको जो दे खता है उस अगधद्षान को जानने क सरए जो मत्न कयता है ...... अहाहा....! उसकी सायी ऩजाएॉ सपर हो गईं। उसको कपय आकार् े ू से बगवान को फुराने की जरूयत नहीॊ ऩडेगी। भयकय बगवान क ऩास जाने की जरूयत नहीॊ े ऩडेगी। वह स्वमॊ बगवन्भम हो जामगा, साऺात ् नायामण का स्वरूऩ हो जामगा। जहाॉ से पयना उठता है औय भीरों तक चरा जाता है उसभें थोडी द्धवश्राॊनत सभर जाम। ु इस द्धवश्राॊनत भें आरस्म नहीॊ, प्रभाद नहीॊ, भनोयाज्म नहीॊ, ननद्रा नहीॊ। इसभें थोडी सूक्ष्भता, तत्ऩयता औय गुरूकृऩा। मह भौका अगय सभर जाम तो घोडे क यकाफ भें ऩैय डारते-डारते आत्भ- े साऺात्काय हो जाता है , ईद्वय की प्रानद्ऱ हो जाती है । अन्मथा, वषों तक कयता यहे कपय बी ऩणश ू नहीॊ होता। वषों तक कयक बी फुद्धि सूक्ष्भ फनाकय कपय महीॊ आना है । सॊसाय क सफ व्मवहाय े े कयक बी इसी जन्भ भें मा हजायों जन्भ क फाद बी महाॉ तो आना ही ऩडेगा। े े आऩका सॊकल्ऩ, पयना उठकय चरता है , ऺणबय भें भीरों तक जाता है , कपय दसया उठता ु ू है ... तीसया उठता है ....। तो पयना मा सकल्ऩ जहाॉ से उठता है उसभें जया हटक जामें, फस। एक ु द्धवचाय उठा.... दसया अबी उठने को है , दोनों क भध्म भें रूक जामें, फेडा ऩाय हो जाम। मह ू े रूकना इतना जरूयी है जजतना नवजात सर्र्ु को भाॉ का दध जरूयी है मा हभाये र्यीय को प्राण ू जरूयी है । भुक्ति क सरए पयनों क अगधद्षान भें रूकना, वहाॉ द्धवश्राॊनत ऩाना अननवामश है । त्रफना प्राण े ु े का र्यीय व्मथश है ऐसे ही त्रफना द्धवश्राॊनत क, फाकी की सायी उऩरजब्धमाॉ व्मथश हैं। इसीसरए नयससॊह े भेहता ने ठीक कहा् ज्मों रगी आत्भातत्त्व चीन्मो नहीॊ त्माॊ रगी साधना सवश जूठी। , अथाशत ् तफ तक ककसी साधन भें रूक न जाएॉ, चरते ही जाएॉ, ऊऩय उठते ही जाएॉ, आगे फढ़ते ही जाएॉ। अगय इस साधन भें गनत हो गई तो दसये सफ साधन हो गमे सपर। ू भन को, फुद्धि को बागने की, दौडने की आदत ऩुयानी है औय आऩ उनसे जड जाते हो ु मही बी आदत ऩयानी है । इसीसरए फहुत कहठन बी रगता है । ु
  • 66. अगय डटकय फैठ जामें औय मही कयें तो उर्त्भ जजऻासु को ज्मादा सभम नहीॊ रगता। सत्ऩात्र हो, ब्रह्मचमश व्रत का ऩारन कयता हो, सदाचायी हो, गुरूआऻा सर्योधामश कयता हो, सॊसाय की रोरुऩता न हो साधक क सरए ईद्वय तो अऩने घय की चीज है । े हदरे तस्वीय है माय। जफकक गयदन झुका री, भुराकात कय री।। उसक सरए मह चीज है । जैसे सुन्दयी को अऩना भुख दे खने भें ककतनी दे य ? अये , झट े ऩसश से आमना ननकरा, भख दे ख सरमा। ु जैसे व्मक्ति आमने भें अऩना भख दे खने भें दे य नहीॊ कयता ऐसे ही जजसक ऩास हदर का ु े आमना है वह हदरफय को जफ चाहे , जजतनी फाय चाहे , दे ख सकता है । ककसी वेदाजन्तक सॊत ने ठीक ही कहा है ् ऐ तासरफे भॊजजर तू भॊजजर ककधय दे खता है । हदर ही तेयी भॊजजर है तू अऩने हदर की ओय दे ख।। एक द्धवचाय उठा.... दसया उठने को है ..... उसक फीच की अवस्था को दे ख। अऩने बीतय ू े उठते हुए सॊकल्ऩों को सूक्ष्भता से दे ख। कई रोगों ने तऩ ककमा, जऩ ककमा, कई घय छोडकय हहभारम गमे, कोई नहीॊ गमा कोई नहीॊ गमा, इस दे व को रयझामा, उस दे व को रयझामा। अॊत भें जजस ककसी को बी ईद्वय-प्रानद्ऱ हुई तो अऩने रृदम भें ही हुई। चाहे याभ जी क उऩासक हो चाहें कृष्णजी क हों चाहे सर्वजी क हों े े े चाहे कारीजी क हों चाहे गुरूजी क हों अथवा औय ककसी क हों रेककन ईद्वय जफ सभरा है तफ े े े हदर भें ही सभरा है । अॊतमाशभी दे व को छोडकय जो फाहय क दे व को ऩूजता कपयता है वह तो कभशरेढ़ी कहा े जाता है । जैसे, हाथ भें भमखन का द्धऩण्ड आमे उसको गगयाकय छाछ चाटने रग जाम, ऐसे ही अॊतयतभ चैतन्म आत्भदे व का यस, सुख औय आनन्द छोडकय फाहय ककसी वस्तु मा व्मक्ति को रयझाने भें रग जाम उसको ममा कहें गे ? 'मह सभरे तो सुखी हो जाऊ, वह सभरे तो सुखी हो ॉ जाऊ, मह दे व आवे तो वयदान दे , वह दे व आवे तो सहाम कये ....' वह दे व बी इस आत्भदे व भें ॉ भन रगेगा तफ णखॊचकय आमेगा, नहीॊ तो सफक ऩास ममों नहीॊ जाता ? फुराते तो कई हैं ! े कारी आ जाम, श्रीकृष्ण आ जामें, सर्वजी आ जामें, याभ जी आ जामें, यहे भान आ जा’