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Rheumatoid arthritis

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  • 1. 1 | P a g e �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ एक दीघर्कािलक स्-प्रितरि (Autoimmune) रोग है जो शरीर के जोड़ों और अन् ऊतकों में िव कृित पैदा करता है। इस रोग में हाथ और पैरों के जोड़ प्रदा( Inflammed) हो जाते है, िजसके फलस्व�प उनमेंसूजन और ददर् होता है और ध-धीरे जोड़ों में �ित होने लगती है • शरीर क� प्रितर�ा प्रणाली जोड़ोंऔर संयोजी(Connective Tissue) को न� करते हैं। • सुबह उठने पर या िवश्राम के बाद जोड़(सामान्यतः हाथ और पैरों के छोटे जो) में ददर् और जकड़ होती है जो एक घंटे से अिधक समय तक रहती है। • बुखार, कमजोरी और अन्य अंगों में �ित हो सकती ह • इस रोग का िनदान मुख्यतः रोगी में ल�णों के आधार पर िकया जाता, लेिकन र� में �रयुमेटॉयड फे क्टर क� जांच और एक-रे भी िनदान में सहायक होते हैं • इस रोग के उपचार में कसर, िस्प्ल, दवाइयों(नॉन-स्टीरॉयडल एंट-इन्फ्लेमेट्री दवा, एंटी�मेिटक दवाइयां और इम्युनोसप्रेिसव दवाइ) और शल्य िचिकत्सा क� मदद ली जाती है िव� क� 1% आबादी �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस का िशकार बनती है। ि�यों में इस रोग का आघटन पु�षों से तीन गुना अिधक होता है। वैसे तो यह रोग िकसी भी उम्र में हो सकता, लेिकन इसक� शु�आत प्राय35 से 50 वषर् के बीच होती है। इस रोग का एक प्रा�प छोटे बच्चों में भी ह, िजसे जुिवनाइल इिडयोपेिथक आथ्रार्इि (Juvenile Idiopathic Arthritis) कहते हैं। इस रोग का कारण अभी तक अ�ात है, लेिकन इसे स्-प्रितरि रोग (Autoimmune Disease) माना जाता है। प्रितर�ा प्रणाली जोड़ों के या खोल (Synovial Membrane) पर प्रहार करती , साथ में शरीर के अन् अंगों के संयोजी ऊतक जैसे र�वािहकाएं और फेफड़े भी �ितग्रस्त होने लगते हैं। और इस तरह जोड़ कािटर्ले, अिस्थयां और िलगामेन्ट्स का �रण होने लगता , िजससे जोड़ िवकृत, अिस्थ, खराब और दागदार हो जाते है। जोड़ों के �ितग्रस्त होने क� गित आनुवंिशक समेत कई पहलुओं पर िनभर्र करती
  • 2. 2 | P a g e ल�ण आमतौर पर �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस क� शु�आत धीरे धीरे होती है। -बीच में रोग के ल�ण भड़कते ह, िजसके बाद लम्बे अंतराल तक रोगी ल�णहीन रहता है और रोग िनिष्क्रय अवस्था में रहता है। या रोगी में ल�ण त अथवा धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं। कभी �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ अचानक कई जोड़ों पर एक साथ धावा बोलता है। कई बार यह बह�त धीरे से शु� होता है, और मुख्तिलफ जोड़ों पर असर करता चलता है। यह रोग प्रायः दोनों के जोड़ों पर असर करता है और मुख्यत अंगुिलयां, हाथ, पैर, कलाई, कोहनी, टखना आिद छोटे जोड़ों पर पहले प्रहार करता है। प्रदाह जोड़ में सुबह उठने पर या आराम के बाद प्रायः द और जकड़न होती है जो एक घंटे से अिधक समय तक रहती है। यह �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस िविश� ल�ण है। कु छ रोगी दोपहर में थकावट और कमजोरी महसूस करते हैं। रोगी को भूख न लगन, वजन कम होने और हल्का बुखार बने रहने क� तकलीफ भी हो सकती है। प्रभािवत जोड़ प्रदाह के कारण न, गमर, लाल और बड़ा महसूस होता है। कई बार जोड़ में पानी भर जाता है। जल्दी ही जोड़ िवकृत और कु�प हो जाता है। इसके बाद जोड़ में जकड़न बढ़ने लगती है और उसे धुमाना य िहलाना डुलाना मुिश्कल हो जाता है। कई बार अंगुिलयां उतर कर छोटी अंगुली किन�ा क� तरफ झुक जाती है िजससे उनके टेन्डन भी उतर जाते हैं सूजे ह�ए जोड़ नाड़ी पर दबाव डालते है, िजससे संवेदनशून्यता और िसरहन होती है। कई बार घुटनें के पीछे पुिटक (Cyst) बन जाती है, िजसके फू टने पर टांग में ददर् होता है औरसूजन आ जाती है �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस 30% रोिगयों में त्वचा के नी(जहाँ दबाव अिधक पड़ता है जैसे कोहनी) कठोर गांठें बन जाती ह, िजन्हे �रयुमेटॉयड नोड्यूल्स कहते हैं। इनके अलावा त्वचा में पायो, स्वीट्स िसन्ड, ऐरीिदमा नोडोसम, लोब्युलर पेिनकु लाइिटस, पामर ऐरीिदमा आिद िवकार हो सकते हैं। कदािचत �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस र�वािहकाओं को प्रदाह ग्रस्त कर देता है। इसक� वजह से ऊतकों आपूितर् कम होती जाती ह, और नाड़ी क� �ित या पैर में छाले हो सकते हैं। फेफड़े के बाहरी आवर( Plura) या �दय के आवरण ( Pericardium) या फे फड़े अथवा �दय के प्रदाह और स्का�रंग के कारण छाती में ददर �ासक� हो सकता है। �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस में ऐथेरोिस्क्, हाटर् अटेक और स्ट्रोक का जोिखम अ रहता है। कभी कभार पेरीकाड�इिटस, एंडोक्रेडाइि, लेफ्ट वेन्ट्रीकल फ, वाल्वलाइिटस और फाइब्रोिस आिद �दय िवकार हो सकते हैं।
  • 3. 3 | P a g e दीघर्कालीन प्रदाह के कारण फेफड़े में फाइब्रोिसस और वृक्क में एमाइलोडोिसस हो सकता है। कुछ रो िलम्फनोड्स मेंसूजन आ सकती है। शोिग्रन्ज िसन्ड्रोम नामक रोग में जोड़ में प्रदा, योिन या मुँह में खुश्क� रहती है। साथ ही कुछ रोिगयों में इिपिस्क्लर, ऐनीिमया, न्यूट्रोपीि, थ्रोम्बोसाइटो, पेरीफ्र न्युराइिट, िलम्फोमा आिद िवकार हो सकते हैं िनदान �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ के िनदान में इसके िविश� स्व�प और ल�णों के साथ प्रयोगशाला के , जोड़ के द्रव क�सू�मदश� जांच और बायोप्सी से बह�त मदद िमलती है। रोग क� प्रारंिभक अवस्था -रे में कोई प�रवतर्न देखने को नहीं िमलते हैं। लेिकन बाद में जोड़ के आसपास अिस्थ ऊतक कम ( Juxta-articular Osteopenia), सूजन और जोड़ में जगह कम होना आिद प�रवतर्न साफ िदखाई देते हैं। जैसे जैसे रोग बढ़ता हड्िडयों का �रण और जोड़ों का ढीला देखा जा सकता है। .आर.आई. से जोड़ों क� बड़ी स्प� और सा तस्वीरे प्रा� होती, लेिकन िनदान हेतु प्रायः .आर.आई. करने क� ज�रत नहीं पड़ती है। 10 में से9 रोिगयों काई.एस.आर. बढ़ा ह�आ िमलता है, जो प्रदाह क� उपिस्थित को इंिगत करता है। हालांिक अन्य रोगों में भ.एस.आर. बढ़ा रहता है, लेिकन िफर भी इसका बढ़ना रोग क� सिक्रयता को दशार्ता है। आमव के 70 % रोिगयों के र� में खास तरह क�एंटीबॉडीज जैस �रयुमेटॉयड फे क्टर पाई जाती हैं। �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ के रोिगयों में �रयुमेटॉयड फेक्टर के स्तर का रोग क� गंभीरता से सीधा गुणात्मक सम्बन्ध होता जोड़ों में प्रदाह कम होत, तो �रयुमेटॉयड फे क्टर का स्तर घटने लगता है। लेिकन �रयुमेटॉयड फेक्टर कुछ अ रोगों जैसे िहपेटाइिटस के रोिगयों में भी िमलता है। कई बार स्वस्थ व्यि�यों में भी �रयुमे टॉयड फेक्टर उ सकता है। �रयुमेटॉयड आथ्रार्इिटस 96% रोिगयों मे एंटी-िसट्र�िलनेटेडपेप्टा(anti-CCP) एंटीबॉडीज पाई जाती हैं और िजन्हें यह रोग नहीं होता है उनमें ये एंटीबॉडीज कभी नहीं िमलती हैं। इसिलए आजकल िचिकत्स जांच करवाने लगे हैं। अिधकांश रोिगयों में र� क� मामूली कम( ऐनीिमया - लाल र� कोिशकाओंक� कमी) होती है। कभी-कभार �ेत र� कोिशकाओंक� गणना (TLC) कम हो सकती हैं। यिद �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ के रोगी में ट.एल.सी. कम हो, यकृत में नोड्यूलर हाइपरप्लेिजय(कु प्फर सेल्स क� सिक्रयता बढ़ने के ) और ितल्ली बढ़ी ह�ई हो तो इस रोग समूह को फे ल्टीज़ िसन्ड्(Felty's syndrome) कहते हैं। फलानुमान �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ क� प्रगित अिनयिमत और अप्रत्यािशत होती है। यह रोग शु� के छ सालों में और पर पहले साल में तेजी से बढ़ता है।10 साल के भीतर 80% रोिगयों के जोड़ों में स्थाई अपंगता आ ही जाती रोिगयों के औसत जीवन मे3-7 वषर् क� कमी आती है। �दय रो, संक्र, आहार पथ में र�स्, औषिधयां और कै ंसर िस्थित को और जिटल बना देते हैं। कभी कभार रोगी अकस्मात ठीक भी हो जाता
  • 4. 4 | P a g e 75% रोिगयों में उपचार से फायदा होता है। इन सारे तामझाम और इलाज के बावजू10 % रोगीयों में तोगंभी अ�मता और अपंगता आ ही जाती है। िनम्न पहलू खराब फलानुमान को इंिगत करते हैं • �ेत नस्ल के रोग, �ी या दोनों • िजन रोिगयों मे�रयुमेटॉयड नोड्यूल बने हो • रोग क� शु�आत अिधक उम्र में ह�ई • िजनके 20 या अिधक जोड़ों में तकलीफ • िजनका ई.एस.आर. ज्यादा ह • िजनमें�रयुमेटॉयड फे क्टर याAnti-CCP का स्तर अिधक ह उपचार �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ के उपचार में औषिधयों और शल्य िचिकत्सा के साथ कुछ साधारण उपाय जैसे , स्वस्थ आहार आिद शािमल िकये गये हैं। िडजीज मोडीफाइंग एंटी�र�ुमेिटक औषिधय (DMARDs) वास्तव मे रोग के िवकास और िवस्तार को धीमा करते हैं और तकलीफ में आराम िदलाते हैं। इसिलए जैसे ही रोग का िन हो, इन्हें शु� कर िदया जाता है गंभीर �प से प्रद-ग्रस्त जोड़ को आराम देना ज�री, क्योंिक यिद प्-ग्रस्त जोड़ कायर् करता रहेगा तो प और तकलीफ बढ़ती रहेगी। जोड़ को िनयिमत आराम िमलने से ददर् में राहत िमलती है और रोग क� सिक्रय अव जल्दी ठीक होती है। जोड़ों को िवश्राम देने और िस्थर करने के प्रयोजन से एक या कई जोड़ोंपर िस्प् जाते हैं। लेिकन जोड़ों के थोड़ी हरकत ज�री होती है तािक मा-पेिशयां कमजोर न पड़ें और जोड़ में जकड़न नह हो पायें। औषिधयों में न-स्टीरॉयडल एंटीइन्फ्लेमेट्री दवा( NSAIDs), िडजीज मोडीफाइंग एंटी�र�ुमेिटक औषिधयां (DMARDs), कोिटर्कोस्टीरॉयड, इम्युनोसप्रेिसव दवाइयां आिद प्रमुख हैं। नईदवाओं में लेफ्, एनािकनरा (an interleukin-1 receptor antagonist), ट्यूमर नेक्रोिसस फेक्टर इिन्हबीटसर् आिद प्रम �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ में कई दवाइयों कोसंयु� �प से देने का प्रचलन है नॉन-स्टीरॉयडल एंटीइन्फ्लेमेट्री दवा(NSAIDs) �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ में ये दवाइयां ददर् और प्रदाह में तो फायदा पह�ँचा, लेिकन रोग के िवकास, िवस्तार और जोड़ के �यन को रोकने में प्रभावशून्य हैं। एिस्प�रन इस रोग में प्रयोग नहीं क� NSAIDs का पूरा असर आने में2 हफ्ते लगते हैं। इसिलए इनक� मात्रा बढ़ाने में जल्दबाजी नहीं करनी च NSAIDs साइक्लोऑक्सीजने(COX) एंजाइम्स का बािधत करते हैं और इस तरह प्रोस्टाग्लेंिडन्स के िनमार करते हैं। कुछ प्रोस्टाग्ले COX-1 से िनयंित्रत होते , जो शरीर में कई महत्वपूणर् का(जैसे आमाशय क� �ेष्मा(Mucosa) को सुरि�त रखना और िबंबाणुओंका िचपिचपापन कम करना) करते हैं। दूसरे प्रदाहका प्रोस्टाग्ले होते हैं जो COX-2 सी सहायता से िनिमर्त होते हैं। खा COX-2 इिन्हबीटर श्रे(जैसे
  • 5. 5 | P a g e सेलीकोिक्स) क� दवाइयों के आहा-पथ पर कु प्रभाव कम होते हैं। इसिलए दूस NSAIDs के पेिप्टक अल्स और अपच के रोगी को नहीं देना चािहये। NSAIDs के दूसरे कु प्रभाव िसरद, सूजन, भ्र( Confusion), केंद्रीय नाड़ी तंत्, र�चाप बढ़ना, िबंबाणु (Platelets) क� गितिविध कम होना आिद हैं। इनके �दय पर कोई स्प� कुप्रभाव नहीं हैं। कभी कभार िक्र बढ़ सकता है या इंटरिस्टिशयल नेफ्रोइिटस हो सकती ह कोिटर्कोिस्टरॉयड्– कोिटर्कोिस्टरॉयड्स अन्य औषिधयों क� अपे�ा प्रदाह और दूसरी तकलीफों को शी को शांत करते हैं। ये हड्िडयों के �रण को िशिथल करते हैं। परन्तु ये जोड़ को �ितग्रस्त होने से नहीं रोक और इनका असर धीरे धीरे कम होता जाता है। दूसरा कई बार इनको बंद करने के बाद रोग बह�त भड़क सकता है। इनके दीघर्कालीन कुप्रभाव को देखते ह�ए कई िचिकत्सक इनकेDMARDs का असर आने तक देते हैं। कोिटर्कोिस्टरॉयड्स का प्रयोग तभी िकया जाता है जब जोड़ बह�त �ितग्रस्त हो गये हो या रोग अन्य स्था फै ल गया हो। पेिप्टक अल्, र�चाप, डायिबटीज, ग्लूकोमा और तीव्र संक्रमण में इनका प्रयोग न इन्ट-आिटर्कुलर इंजेक्श– जोड़ में कोिटर्कोिस्टरॉयड्स के िडपो इंजेक्शन लगाने से ददर्और सूजन में राहत िमलती है। ट्रायमिसनोलोन हेग्जासीटोनाइड लम्बे समय तक प्रदाह को िनयंत्रण में रखता है। ट्र सीटोनाइड और िमथाइल प्रेडिनसोलोन एसीटेट भी प्रभावी हैं। िकसी भी जोड़ में िस्टरॉयड के इंजेक्शन3- 4 बार से ज्यादा नहीं देने चािह, क्योंिक जोड़ के खराब होने का खतरा रहता है। हालांिक जोड़ में संक्रम खतरा 2% से कम रहता है, लेिकन जोड़ में24 घंटे के बाद भी ददर् का होना संक्रमण को इंिगत करता ह हाइड्रोक्सीक्रोरो– इस रोग के तकलीफ में राहत देती है। इसे शु� करने से पहले और हर साल रोगी क� आँख के फं डस और िवजुअल फ�ल्ड्स क� जांच होनी चािहये। यिद9 महीने में कोई फायदा नहीं िदखे तो इसेबं कर देना चािहये। सल्फासेलेजीन– यह इस रोग के ल�ण में फायदा करती है और रोग को बढ़ने से भी रोकती है। इसका असर आने में3 महीने लगते हैं। इसक� एन्टे�रक कोटेड गोिलयां दी जाती हैं। इसे शु� करने 1-2 हफ्ते के बाद और हर12 हफ्ते में .बी.सी. करवा लेना चािहये। हर 6 महीने में या जब भी मात्रा बढ़ानी हो तब.जी.पी.टी. और एस.जी.ओ.टी. करवा लेना चािहये। लेफ्युनोमाइड– यह नई दवा है और पाइरीिमिडन चयापचय के एक एंजाइम क� गितिविध में व्यवधान पैदा करत है। यह मीथोट्रेक्सेट िजतनी ही असरदार है और न बेनमेरो का दमन करती, न यकृत को नुकसान बह�ँचाती है और न ही फे फड़ों मेंसंक्रमण करती मीथोट्रेक्स– यह फोलेट िवरोधी ( Folate Antagonist) है और अिधक मात्रा में देने पर र�ाप्रणाली का (Immunosuppressive) करती है। कम मात्रा में यह एंटीइन्फ्लेमे ट्री के �प में कायर् करत �रयुमेटॉयड आथ्रार्इ में बह�त प्रभावी है और अपे�ाकृत जल( 3 से 4 हफ्ते म) असर करती है। यकृत और वृक्क रोग मे
  • 6. 6 | P a g e इसका प्रयोग बह�त सावधानी से करना चािहये। इसके सेवन के दौरान मिदरा सेवन को टालना ही श्रेयस्कर इसके साथ 1 िमिलग्राम फोलेट प्रित िदन का सेवन करने से मीथोट्रेक्सेट के कुप्रभाव कम होते हैं मीथोट्रेक्सेट, फोलेट नहीं दें। ह8 हफ्ते में .बी.सी., एस.जी.पी.टी., एस.जी.ओ.टी., एल्ब्युि, िक्रयेिटनी क� जांच करनी चािहये। यिद यकृत के एंजाइम्स का स्तर िनरंतर दो गुना या अिधक बना रहे तो यकृत क� बायोप् क� जानी चािहये और मीथोट्रेक्सेट बंद कर देनी चािहये। मीथोट्रेक्सेट बंद करने के बाद कई बार रोग बह� सकता है। कई बार मीथोट्रेक्सेट के प्रयो�रयुमेटॉयड नोड्यूल्स बड़े हो सकते हैं इम्युनोमोड्यूलेट, साइटोटॉिक्सक और इम्युनोमोसप्रेिसव दवाइ – ऐजाथायप्र, साइक्लोस्पोरी (इम्युनोमोड्यूलेट) या साइक्लोफोस्फेमाइड का अस DMARDs के जैसा ही है। लेिकन ये दवाइयां िवशेष तौर पर साइक्लोफोस्फेमाइड अिधक टॉिक्सक है। इसि DMARDs असर नहीं करे या िस्टरॉयड्स के प्रयोग बचना हो तभी इनका प्रयोग िकया जाना चािहये। इनका प्रयोग प्रायः तभी िकया जाता है जब रोग जो अलावा अन्य स्थानों में भी फैल गया हो। मेन्टेने न्स के िलए ऐजाथायप्रीन क� न्यूनतम मात्रा प्रयोग साइक्लोस्पोरीन कम मात्रा मे ं अकेले या मीथोट्रे क्सेट के साथ दी जाती है। यह ऐजाथा साइक्लोफोस्फेमाइड से कम खतरनाक मानी गई है बॉयोलोिजक एजेंट्स- TNF-α antagonists को छोड़ कर बी-कोिशका या टी-कोिशका को लि�त करने के िलए ऐबाटासेप्, �रटुक्सीमे, ऐनािकनरा आिद बॉयोलोिजक रेस्पॉन्स मोडीफायसर् प्रयोग िकये जाते टीएनएफ-अल्फा एंटागोिनस्– (जैसे ऐडािलमुमेब, इटानरसेप्ट और इिन्फक्सी) जोड़ों को �ितग्रस्त होने रोकते हैं। कुछ रोिगयों में इनका अच्छा असर होता है। इन्हें मीथोट्रेक्सेट के साथ प्रयोग िकय �रयुमेटॉयड आथ्रार्इि– औषिधयां दवा मात् कु प्रभ िडजीज मोडीफाइंग एंटी�र�ुमेिटक औषिधयां (DMARDs) हाइड्रोक्सीक्लोरोक (Hydroxychloroquin e) शु� में400-600 िमिलग्राम प्रित िदन भ या दूध के साथ दी जाती हैं। इसक� मात्रा ध- धीरे बढ़ाई जाती है जब तक वांिछत लाभ नहीं िमल जाता है। 4-12 हफ्ते बाद मात्रा घटा 200-400 ग्राम प्रित िदन कर देते मामूली डम�टाइिटस. मायोपेथी, कोिनर्या में ओपेिस, कभी कभार रेटीना में स्थाई �य लेफ्यूनोमाइड (Leflunomide) 20 िमिलग्र/िदन लेिकन यिद कोई कु प्रभा हो तो मात्रा घटा क10 िमिलग्र/िदन कर दें त्वचा में �रयेक, यकृत रोग मीथोट्रेक्स (Methotrexate) 7.5 िमिलग्राम हफ्ते में एक बा, धीरे-धीरे मात्र25 िमिलग्राम तक बढ़ाई जा सकती है यकृत में फाइब्रो, उबकाई, बोनमेरो का दमन, मुँह में छाल,
  • 7. 7 | P a g e 20 िमिलग्र/स�ाह से ज्यादा मात्रा त्वचा नीचे (SC) दी जा सकती है। न्युमोनाइिटस सल्फासेलेजीन (Sulfasalazine) शु� में0.5 से 1 ग्राम प्रित िदन दी जात, िजसे हर हफ्ते बढ़ा कर2 ग्राम प्रित िदन ले जाते हैं। इस मात्रा को दो खुराक िवभािजत करके सुबह और शाम देना चािहये। आिधकतम मात्र3 ग्राम प्रित िदन है बोनमेरो का दमन, पाचन िवकार, न्यूट्रोपीि, हीमोलाइिसस, िहपेटाइिटस कोिटर्कोस्टीरॉयड्(Corticosteroids) प्रेडिनसोलो (Prednisone) 7.5 िमिलग्राम िदन में एक ब वजन बढ़ना, डायिबटीज, उच्च र�चाप, अिस्थ�यन (Osteoporosis) इम्युनोमोड्यूलेट, साइटोटॉिक्सक और इम्युनोमोसप्रेदवाइयाँ Azathioprine 1 िमिलग्र/िकलो (50–100 िमिलग्र) िदन में एक या दो बा, 6-8 हफ्ते बाद0.5 िमिलग्र /िकलो/िदन के िहसाब से मात्र बढ़ाएं िफर हर 4 हफ्ते में मात्रा ब । अिधकतम मात्र 2.5 िमिलग्र/िकलो/िदन है। यकृत में खराब, बोनमेरो का दमन, साइक्लोस्पो�रन क प्रयोग से कैंसर खतरा, गुद� कमजोार होना Cyclophosphamid e 2–3 िमिलग्र/िकलो रोजाना गोली के �प में या आई.वी. पल्स थेरेप : 0.75 ग्र/मीटर2 हर माह (मात्रा क1 ग्र/मीटर2 /माह के िहसाब से बढ़ा कर 6 माह तक दी जाती है यिद टी.एल.सी. 3000/µL से अिधक बना रहे ), इसे 30-60 िमनट में धीर-धीरे िदया जाता है। साथ में मुँह या आ.वी. द्वार तरल िदये जाते हैं। साइक्लोस्पोरी (Cyclosporine) 50 िमिलग्राम प्रित , अिधकतम मात्र 1.75 िमिलग्रा /िकलो सुबह शाम बायोलोिजक एजेन् अबाटासेप्ट (Abatacept) शु� में 750 िमिलग्रामइंजेक् आइ.वी. िदया जाता है, िफर 2 हफ्ते बाद, 4 हफ्ते बाद और िफर हर4 हफ्ते बाद इंजेक्शिदया जाता है। फे फड़े में खराबी संक्रमण का जो, िसरददर, यू.आर.आई., गले में खा�र, उबकाई �रटुक्सीमेब (Rituximab) 1 ग्रामइंजेक्शन.वी. िदया जाता है, िफर 2 हफ्ते बा, 4 हफ्ते बाद इंजेक्शन देते समय – इंजेक्शन क� जगह पर चक�े बन जाना, कमर ददर, बुखार, उच्च र�चाप या र�चाप
  • 8. 8 | P a g e और िफर हर 4 हफ्ते बाद एक इंजेक्शनिदया जाता है। कम हो जाना, संक्रमण या कैंसर का ख, बोनमेरो का दमन IL-1 �रसेप्टर िवरोधी ऐनािकनरा (Anakinra) 100 िमिलग्रामइंजेक्शन रोज त् के नीचे (SC) लगाये इंजेक्शन क� जगह �रयेक्, र�ाप्रणाली का द और बोनमेरो का दमन टी एन एफ - α िवरोधी एडाािलमुमेब (Adalimumab) 40 िमिलग्राम काइंजेक्शन रोज त्वचा के (SC) हर 1 या 2 हफ्ते में लगाव संक्रम(संभवतः टी.बी.) या कै ंसर का जोखम, िलम्फोम, बोनमेरो दमन, यकृत में खराबी, नाड़ी िवकार एए इ एटानरसेप्ट (Etanercept) 25 िमिलग्राम काइंजेक्शन रोज त्वचा के नीचे स�ाह में दो बा50 िमिलग्राम काइंजेक्शन रोज त्वचा के नीचे प्रि इिन्फक्सीमे (Infliximab) 3 िमिलग्र/िकलो सेलाइन में िमला कर आ.वी. दी जाती है। इसके 2 और 6 स�ाह बाद दूसरी और तीसरी िड्रप दी जाती है। िफर ह8 हफ्ते में एक िड्रप दी जाती (मात्र10 िमिलग्राम िकलो के िहसा बढ़ाई जा सकती है)

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