रामचिरतमानस - 1 - बालकांड
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गोःवामी तुलसीदास
िवरिचत
रामचिरतमानस
बालकाण्ड
Sant Tulsidas’s
Rāmcharitmānas
...
रामचिरतमानस - 2 - बालकांड
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RAMCHARITMANAS: AN INTRODUCTION
Ramayana, considered part of Hindu Smriti, w...
रामचिरतमानस - 3 - बालकांड
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ौीगणेशाय नमः
ौीरामचिरतमानस ूथम सोपान
बालकाण्ड
ोक
वणानामथसंघानां रसानां छन्दस...
रामचिरतमानस - 4 - बालकांड
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महामोह तम पुंज जासु बचन रिब कर िनकर ॥५॥
बंदउ गु पद पदम परागा ।ु सु िच सुबास ...
रामचिरतमानस - 5 - बालकांड
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बालमीक नारद घटजोनी । िनज िनज मुखिन कह िनज होनी ॥
जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़...
रामचिरतमानस - 6 - बालकांड
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बंदउँ संत अस जन चरना । दखूदु उभय बीच कछु बरना ॥
िबछु रत एक ूान हिर लेह ं । ि...
रामचिरतमानस - 7 - बालकांड
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धूम कु संगित कािरख होई । िल खअ पुरान मंजु मिस सोई ॥
सोइ जल अनल अिनल संघाता ।...
रामचिरतमानस - 8 - बालकांड
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ूभु पद ूीित न सामु झ नीक । ितन्हिह कथा सुिन लागिह फ क ॥
हिर हर पद रित मित न ...
रामचिरतमानस - 9 - बालकांड
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मिन मािनक मुकु ता छिब जैसी । अिह िगिर गज िसर सोह न तैसी ॥
नृप िकर ट त नी तनु...
रामचिरतमानस - 10 - बालकांड
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सो के वल भगतन िहत लागी । परम कृ पाल ूनत अनुरागी ॥
जेिह जन पर ममता अित छोह ।...
रामचिरतमानस - 11 - बालकांड
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बंदउँ िबिध पद रेनु भव सागर जेिह क न्ह जहँ ।
संत सुधा सिस धेनु ूगटे खल िबष ब...
रामचिरतमानस - 12 - बालकांड
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ूनवउँ पिरजन सिहत िबदेह । जािह राम पद गूढ़ सनेहू ू ॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई । ...
रामचिरतमानस - 13 - बालकांड
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जान आिदकिब नाम ूतापू । भयउ सु किर उलटा जापू ॥
सहस नाम सम सुिन िसव बानी । जि...
रामचिरतमानस - 14 - बालकांड
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नाम जीहँ जिप जागिहं जोगी । िबरित िबरंिच ूपंच िबयोगी ॥
ॄ सुखिह अनुभविहं अनूप...
रामचिरतमानस - 15 - बालकांड
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दोहरा
सबर गीध सुसेवकिन सुगित द न्ह रघुनाथ ।
नाम उधारे अिमत खल बेद िबिदत गुन...
रामचिरतमानस - 16 - बालकांड
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नाम कामत काल कराला । सुिमरत समन सकल जग जाला ॥
राम नाम किल अिभमत दाता । िहत ...
रामचिरतमानस - 17 - बालकांड
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दोहरा
ूभु त तर किप डार पर ते िकए आपु समान ॥
तुलसी कहँ न राम से सािहब सीलिनध...
रामचिरतमानस - 18 - बालकांड
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िसवूय मेकल सैल सुता सी । सकल िसि सुख संपित रासी ॥
सदगुन सुरगन अंब अिदित सी ...
रामचिरतमानस - 19 - बालकांड
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दोहरा
राम अनंत अनंत गुन अिमत कथा िबःतार ।
सुिन आचरजु न मािनहिहं जन्ह क िबमल...
रामचिरतमानस - 20 - बालकांड
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संभु ूसाद सुमित िहयँ हलसी । रामचिरतमानसु किब तुलसी ॥
करइ मनोहर मित अनुहार ।...
रामचिरतमानस - 21 - बालकांड
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अित खल जे िबषई बग कागा । एिहं सर िनकट न जािहं अभागा ॥
संबुक भेक सेवार समाना...
रामचिरतमानस - 22 - बालकांड
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उमा महेस िबबाह बराती । ते जलचर अगिनत बहभाँती ॥ु
रघुबर जनम अनंद बधाई । भवँर ...
रामचिरतमानस - 23 - बालकांड
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राम सुूेमिह पोषत पानी । हरत सकल किल कलुष गलानौ ॥
भव ौम सोषक तोषक तोषा । समन...
रामचिरतमानस - 24 - बालकांड
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संत कहिह अिस नीित ूभु ौुित पुरान मुिन गाव ।
होइ न िबमल िबबेक उर गुर सन िकएँ...
रामचिरतमानस - 25 - बालकांड
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तेिह अवसर भंजन मिहभारा । हिर रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥
िपता बचन त ज राजु उदासी ...
रामचिरतमानस - 26 - बालकांड
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िबंनु जो सुर िहत नरतनु धार । सोउ सब य जथा िऽपुरार ॥
खोजइ सो िक अ य इव नार ।...
रामचिरतमानस - 27 - बालकांड
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सती क न्ह चह तहँहँ दराऊ । देखह नािर सुभावु ुु ूभाऊ ॥
िनज माया बलु हृदयँ बखा...
रामचिरतमानस - 28 - बालकांड
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सतीं समु झ रघुबीर ूभाऊ । भय बस िसव सन क न्ह दराऊ ॥ु
कछु न पर छा ली न्ह गोसा...
रामचिरतमानस - 29 - बालकांड
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दोहरा
सती बसिह कै लास तब अिधक सोचु मन मािहं ।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम िदव...
रामचिरतमानस - 30 - बालकांड
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सतीं िबलोके योम िबमाना । जात चले सुंदर िबिध नाना ॥
सुर सुंदर करिहं कल गाना ...
Bal kand
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  1. 1. रामचिरतमानस - 1 - बालकांड www.swargarohan.org गोःवामी तुलसीदास िवरिचत रामचिरतमानस बालकाण्ड Sant Tulsidas’s Rāmcharitmānas Bāl Kānd
  2. 2. रामचिरतमानस - 2 - बालकांड www.swargarohan.org RAMCHARITMANAS: AN INTRODUCTION Ramayana, considered part of Hindu Smriti, was written originally in Sanskrit by Sage Valmiki (3000 BC). Contained in 24,000 verses, this epic narrates Lord Ram of Ayodhya and his ayan (journey of life). Over a passage of time, Ramayana did not remain confined to just being a grand epic, it became a powerful symbol of India's social and cultural fabric. For centuries, its characters represented ideal role models - Ram as an ideal man, ideal husband, ideal son and a responsible ruler; Sita as an ideal wife, ideal daughter and Laxman as an ideal brother. Even today, the characters of Ramayana including Ravana (the enemy of the story) are fundamental to the grandeur cultural consciousness of India. Long after Valmiki wrote Ramayana, Goswami Tulsidas (born 16th century) wrote Ramcharitamanas in his native language. With the passage of time, Tulsi's Ramcharitmanas, also known as Tulsi-krita Ramayana, became better known among Hindus in upper India than perhaps the Bible among the rustic population in England. As with the Bible and Shakespeare, Tulsi Ramayana’s phrases have passed into the common speech. Not only are his sayings proverbial: his doctrine actually forms the most powerful religious influence in present-day Hinduism; and, though he founded no school and was never known as a Guru or master, he is everywhere accepted as an authoritative guide in religion and conduct of life. Tulsi’s Ramayana is a novel presentation of the great theme of Valmiki, but is in no sense a mere translation of the Sanskrit epic. It consists of seven books or chapters namely Bal Kand, Ayodhya Kand, Aranya Kand, Kiskindha Kand, Sundar Kand, Lanka Kand and Uttar Kand containing tales of King Dasaratha's court, the birth and boyhood of Rama and his brethren, his marriage with Sita - daughter of Janaka, his voluntary exile, the result of Kaikeyi's guile and Dasaratha's rash vow, the dwelling together of Rama and Sita in the great central Indian forest, her abduction by Ravana, the expedition to Lanka and the overthrow of the ravisher, and the life at Ayodhya after the return of the reunited pair. Ramcharitmanas is written in pure Avadhi or Eastern Hindi, in stanzas called chaupais, broken by 'dohas' or couplets, with an occasional sortha and chhand. Here, you will find the text of Bal Kand, 1st chapter of Ramcharitmanas. ☼ ☼ ☼ ☼ ☼
  3. 3. रामचिरतमानस - 3 - बालकांड www.swargarohan.org ौीगणेशाय नमः ौीरामचिरतमानस ूथम सोपान बालकाण्ड ोक वणानामथसंघानां रसानां छन्दसामिप । म गलानां च क ारौ वन्दे वाणीिवनायकौ ॥१॥ भवानीश करौ वन्दे ौ ािव ास िपणौ । या यां िवना न पँय न्त िस ाःःवान्तःःथमी रम ॥् २॥ वन्दे बोधमयं िन यं गु ं श कर िपणम ् । यमािौतो िह वबोऽिप चन्िः सवऽ वन् ते ॥३॥ सीताराम गुणमाम पुण्यारण्य िवहािरणौ । वन्दे िवशु िव ानौ कबी र कपी रौ ॥४॥ उ व ःथितसंहारकािरणीं लेशहािरणीम ् । सवौेयःकर ं सीतां नतोऽहं रामव लभाम ॥् ५॥ यन्मायावशवित िव म खलं ॄ ािददेवासुरा य स वादमृषैव भाित सकलं र जौ यथाहेॅमः । य पाद लवमेकमेव िह भवा भोधे ःततीषावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामा यमीशं हिरम ॥् ६॥ नानापुराण िनगमागम स मतं य रामायणे िनगिदतं विचदन्यतोऽिप । ःवान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषा िनबन्धमितम जुलमातनोित ॥७॥ सोरठा जो सुिमरत िसिध होइ गन नायक किरबर बदन । करउ अनुमह सोइ बुि रािस सुभ गुन सदन ॥१॥ मूक होइ बाचाल पंगु चढइ िगिरबर गहन । जासु कृ पाँ सो दयाल िवउ सकल किल मल दहन ॥२॥ नील सरो ह ःयाम त न अ न बािरज नयन । करउ सो मम उर धाम सदा छ रसागर सयन ॥३॥ कुं द इंद सम देह उमा रमन क ना अयन ।ु जािह द न पर नेह करउ कृ पा मदन मयन ॥४॥ बंदउ गु पद कं ज कृ पा िसंधु नर प हिर ।
  4. 4. रामचिरतमानस - 4 - बालकांड www.swargarohan.org महामोह तम पुंज जासु बचन रिब कर िनकर ॥५॥ बंदउ गु पद पदम परागा ।ु सु िच सुबास सरस अनुरागा ॥ अिमय मूिरमय चूरन चा । समन सकल भव ज पिरवा ॥१॥ सुकृ ित संभु तन िबमल िबभूती । मंजुल मंगल मोद ूसूती ॥ जन मन मंजु मुकु र मल हरनी । िकएँ ितलक गुन गन बस करनी ॥२॥ ौीगुर पद नख मिन गन जोती । सुिमरत िद य िि िहयँ होती ॥ृ दलन मोह तम सो सूकासू । बड़े भाग उर आवइ जासू ॥३॥ उघरिहं िबमल िबलोचन ह के । िमटिहं दोष दख भव रजनी के ॥ु सूझिहं राम चिरत मिन मािनक । गुपुत ूगट जहँ जो जेिह खािनक ॥४॥ दोहरा जथा सुअंजन अं ज ग साधक िस सुजान । कौतुक देखत सैल बन भूतल भूिर िनधान ॥१॥ गु पद रज मृद मंजुल अंजन ।ु नयन अिमअ ग दोष िबभंजन ॥ तेिहं किर िबमल िबबेक िबलोचन । बरनउँ राम चिरत भव मोचन ॥१॥ बंदउँ ूथम मह सुर चरना । मोह जिनत संसय सब हरना ॥ सुजन समाज सकल गुन खानी । करउँ ूनाम सूेम सुबानी ॥२॥ साधु चिरत सुभ चिरत कपासू । िनरस िबसद गुनमय फल जासू ॥ जो सिह दख परिछि दरावा । बंदनीय जेिहं जग जु ु स पावा ॥३॥ मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥ राम भि जहँ सुरसिर धारा । सरसइ ॄ िबचार ूचारा ॥४॥ िबिध िनषेधमय किल मल हरनी । करम कथा रिबनंदिन बरनी ॥ हिर हर कथा िबराजित बेनी । सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥५॥ बट िबःवास अचल िनज धरमा ।ु तीरथराज समाज सुकरमा ॥ सबिहं सुलभ सब िदन सब देसा । सेवत सादर समन कलेसा ॥६॥ अकथ अलौिकक तीरथराऊ । देइ स फल ूगट ूभाऊ ॥७॥ दोहरा सुिन समुझिहं जन मुिदत मन म जिहं अित अनुराग । लहिहं चािर फल अछत तनु साधु समाज ूयाग ॥२॥ म जन फल पे खअ ततकाला । काक होिहं िपक बकउ मराला ॥ सुिन आचरज करै जिन कोई । सतसंगित मिहमा निहं गोई ॥१॥
  5. 5. रामचिरतमानस - 5 - बालकांड www.swargarohan.org बालमीक नारद घटजोनी । िनज िनज मुखिन कह िनज होनी ॥ जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़ चेतन जीव जहाना ॥२॥ मित क रित गित भूित भलाई । जब जेिहं जतन जहाँ जेिहं पाई ॥ सो जानब सतसंग ूभाऊ । लोकहँ बेद न आनु उपाऊ ॥३॥ िबनु सतसंग िबबेक न होई । राम कृ पा िबनु सुलभ न सोई ॥ सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल िसिध सब साधन फू ला ॥४॥ सठ सुधरिहं सतसंगित पाई । पारस परस कु धात सुहाई ॥ िबिध बस सुजन कु संगत परह ं । फिन मिन सम िनज गुन अनुसरह ं ॥५॥ िबिध हिर हर किब कोिबद बानी । कहत साधु मिहमा सकु चानी ॥ सो मो सन किह जात न कै स । साक बिनक मिन गुन गन जैस ॥६॥ दोहरा बंदउँ संत समान िचत िहत अनिहत निहं कोइ । अंजिल गत सुभ सुमन जिम सम सुगंध कर दोइ ॥३(क)॥ संत सरल िचत जगत िहत जािन सुभाउ सनेह ।ु बालिबनय सुिन किर कृ पा राम चरन रित देह ॥ु ३(ख)॥ बहिर बंु िद खल गन सितभाएँ । जे िबनु काज दािहनेह बाएँ ॥ु पर िहत हािन लाभ जन्ह के र । उजर हरष िबषाद बसेर ॥१॥ हिर हर जस राके स राह से । पर अकाजु भट सहसबाह से ॥ु जे पर दोष लखिहं सहसाखी । पर िहत घृत जन्ह के मन माखी ॥२॥ तेज कृ सानु रोष मिहषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ उदय के त सम िहत सबह के । कुं भकरन सम सोवत नीके ॥३॥ पर अकाजु लिग तनु पिरहरह ं । जिम िहम उपल कृ षी दिल गरह ं ॥ बंदउँ खल जस सेष सरोषा । सहस बदन बरनइ पर दोषा ॥४॥ पुिन ूनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना ॥ बहिर सब सम िबनवउँ तेह । संतत सुरानीकु िहत जेह ॥५॥ बचन बळ जेिह सदा िपआरा । सहस नयन पर दोष िनहारा ॥६॥ दोहरा उदासीन अिर मीत िहत सुनत जरिहं खल र ित । जािन पािन जुग जोिर जन िबनती करइ सूीित ॥४॥ म अपनी िदिस क न्ह िनहोरा । ितन्ह िनज ओर न लाउब भोरा ॥ बायस पिलअिहं अित अनुरागा । होिहं िनरािमष कबहँ िक कागा ॥ु १॥
  6. 6. रामचिरतमानस - 6 - बालकांड www.swargarohan.org बंदउँ संत अस जन चरना । दखूदु उभय बीच कछु बरना ॥ िबछु रत एक ूान हिर लेह ं । िमलत एक दख दा न देह ंु ॥२॥ उपजिहं एक संग जग माह ं । जलज ज क जिम गुन िबलगाह ं ॥ सुधा सुरा सम साधू असाधू । जनक एक जग जलिध अगाधू ॥३॥ भल अनभल िनज िनज करतूती । लहत सुजस अपलोक िबभूती ॥ सुधा सुधाकर सुरसिर साधू । गरल अनल किलमल सिर याधू ॥४॥ गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेिह भाव नीक तेिह सोई ॥५॥ दोहरा भलो भलाइिह पै लहइ लहइ िनचाइिह नीचु । सुधा सरािहअ अमरताँ गरल सरािहअ मीचु ॥५॥ खल अघ अगुन साधू गुन गाहा । उभय अपार उदिध अवगाहा ॥ तेिह त कछु गुन दोष बखाने । संमह याग न िबनु पिहचाने ॥१॥ भलेउ पोच सब िबिध उपजाए । गिन गुन दोष बेद िबलगाए ॥ कहिहं बेद इितहास पुराना । िबिध ूपंचु गुन अवगुन साना ॥२॥ दख सुख पाप पुन्य िदन राती ।ु साधु असाधु सुजाित कु जाती ॥ दानव देव ऊँ च अ नीचू । अिमअ सुजीवनु माह मीचूु ॥३॥ माया ॄ जीव जगद सा । ल छ अल छ रंक अवनीसा ॥ कासी मग सुरसिर बमनासा । म मारव मिहदेव गवासा ॥४॥ सरग नरक अनुराग िबरागा । िनगमागम गुन दोष िबभागा ॥५॥ दोहरा जड़ चेतन गुन दोषमय िबःव क न्ह करतार । संत हंस गुन गहिहं पय पिरहिर बािर िबकार ॥६॥ अस िबबेक जब देइ िबधाता । तब त ज दोष गुनिहं मनु राता ॥ काल सुभाउ करम बिरआई । भलेउ ूकृ ित बस चुकइ भलाई ॥१॥ सो सुधािर हिरजन जिम लेह ं । दिल दख दोष िबमल जसु देह ं ॥ु खलउ करिहं भल पाइ सुसंगू । िमटइ न मिलन सुभाउ अभंगू ॥२॥ ल ख सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष ूताप पू जअिहं तेऊ ॥ उधरिहं अंत न होइ िनबाह । कालनेिम जिम रावन राह ॥ू ू ३॥ िकएहँ कु बेष साधुु सनमानू । जिम जग जामवंत हनुमानू ॥ हािन कु संग सुसंगित लाह । लोकहँ बेद िबिदतू ु सब काह ॥ू ४॥ गगन चढ़इ रज पवन ूसंगा । क चिहं िमलइ नीच जल संगा ॥ साधु असाधु सदन सुक सार ं । सुिमरिहं राम देिहं गिन गार ॥५॥
  7. 7. रामचिरतमानस - 7 - बालकांड www.swargarohan.org धूम कु संगित कािरख होई । िल खअ पुरान मंजु मिस सोई ॥ सोइ जल अनल अिनल संघाता । होइ जलद जग जीवन दाता ॥६॥ दोहरा मह भेषज जल पवन पट पाइ कु जोग सुजोग । होिह कु बःतु सुबःतु जग लखिहं सुल छन लोग ॥७(क)॥ सम ूकास तम पाख दहँ नाम भेद िबिध क न्हु ु । सिस सोषक पोषक समु झ जग जस अपजस द न्ह ॥७(ख)॥ जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जािन । बंदउँ सब के पद कमल सदा जोिर जुग पािन ॥७(ग)॥ देव दनुज नर नाग खग ूेत िपतर गंधब । बंदउँ िकं नर रजिनचर कृ पा करह अब सब ॥ु ७(घ)॥ आकर चािर लाख चौरासी । जाित जीव जल थल नभ बासी ॥ सीय राममय सब जग जानी । करउँ ूनाम जोिर जुग पानी ॥१॥ जािन कृ पाकर िकं कर मोह । सब िमिल करह छािड़ छलू ु छोह ॥ू िनज बुिध बल भरोस मोिह नाह ं । तात िबनय करउँ सब पाह ॥२॥ करन चहउँ रघुपित गुन गाहा । लघु मित मोिर चिरत अवगाहा ॥ सूझ न एकउ अंग उपाऊ । मन मित रंक मनोरथ राऊ ॥३॥ मित अित नीच ऊँ िच िच आछ । चिहअ अिमअ जग जुरइ न छाछ ॥ छिमहिहं स जन मोिर िढठाई । सुिनहिहं बालबचन मन लाई ॥४॥ जौ बालक कह तोतिर बाता । सुनिहं मुिदत मन िपतु अ माता ॥ हँिसहिह कू र कु िटल कु िबचार । जे पर दषन भूषनधारू ॥५॥ िनज किवत के िह लाग न नीका । सरस होउ अथवा अित फ का ॥ जे पर भिनित सुनत हरषाह । ते बर पु ष बहत जग नाह ंु ॥६॥ जग बह नर सर सिर सम भाई । जे िनज बािढ़ु बढ़िहं जल पाई ॥ स जन सकृ त िसंधु सम कोई । दे ख पूर िबधु बाढ़इ जोई ॥७॥ दोहरा भाग छोट अिभलाषु बड़ करउँ एक िबःवास । पैहिहं सुख सुिन सुजन सब खल करहिहं उपहास ॥८॥ खल पिरहास होइ िहत मोरा । काक कहिहं कलकं ठ कठोरा ॥ हंसिह बक दादरु चातकह । हँसिहं मिलन खल िबमल बतकह ॥१॥ किबत रिसक न राम पद नेह । ितन्ह कहँ सुखदू हास रस एह ॥ू भाषा भिनित भोिर मित मोर । हँिसबे जोग हँस निहं खोर ॥२॥
  8. 8. रामचिरतमानस - 8 - बालकांड www.swargarohan.org ूभु पद ूीित न सामु झ नीक । ितन्हिह कथा सुिन लागिह फ क ॥ हिर हर पद रित मित न कु तरक । ितन्ह कहँ मधुर कथा रघुवर क ॥ु ३॥ राम भगित भूिषत जयँ जानी । सुिनहिहं सुजन सरािह सुबानी ॥ किब न होउँ निहं बचन ूबीनू । सकल कला सब िब ा ह नू ॥४॥ आखर अरथ अलंकृ ित नाना । छंद ूबंध अनेक िबधाना ॥ भाव भेद रस भेद अपारा । किबत दोष गुन िबिबध ूकारा ॥५॥ किबत िबबेक एक निहं मोर । स य कहउँ िल ख कागद कोरे ॥६॥ दोहरा भिनित मोिर सब गुन रिहत िबःव िबिदत गुन एक । सो िबचािर सुिनहिहं सुमित जन्ह क िबमल िबवेक ॥९॥ एिह महँ रघुपित नाम उदारा । अित पावन पुरान ौुित सारा ॥ मंगल भवन अमंगल हार । उमा सिहत जेिह जपत पुरार ॥१॥ भिनित िबिचऽ सुकिब कृ त जोऊ । राम नाम िबनु सोह न सोऊ ॥ िबधुबदनी सब भाँित सँवार । सोन न बसन िबना बर नार ॥२॥ सब गुन रिहत कु किब कृ त बानी । राम नाम जस अंिकत जानी ॥ सादर कहिहं सुनिहं बुध ताह । मधुकर सिरस संत गुनमाह ॥३॥ जदिप किबत रस एकउ नाह । राम ूताप ूकट एिह माह ं ॥ सोइ भरोस मोर मन आवा । के िहं न सुसंग बड पनु पावा ॥४॥ धूमउ तजइ सहज क आई । अग ूसंग सुगंध बसाई ॥ भिनित भदेस बःतु भिल बरनी । राम कथा जग मंगल करनी ॥५॥ छंद मंगल करिन किल मल हरिन तुलसी कथा रघुनाथ क ॥ गित कू र किबता सिरत क य सिरत पावन पाथ क ॥ ूभु सुजस संगित भिनित भिल होइिह सुजन मन भावनी ॥ भव अंग भूित मसान क सुिमरत सुहाविन पावनी ॥ दोहरा िूय लािगिह अित सबिह मम भिनित राम जस संग । दा िबचा िक करइ कोउ बंिदअ मलय ूसंग ॥१०(क)॥ ःयाम सुरिभ पय िबसद अित गुनद करिहं सब पान । िगरा मा य िसय राम जस गाविहं सुनिहं सुजान ॥१०(ख)॥
  9. 9. रामचिरतमानस - 9 - बालकांड www.swargarohan.org मिन मािनक मुकु ता छिब जैसी । अिह िगिर गज िसर सोह न तैसी ॥ नृप िकर ट त नी तनु पाई । लहिहं सकल सोभा अिधकाई ॥१॥ तैसेिहं सुकिब किबत बुध कहह ं । उपजिहं अनत अनत छिब लहह ं ॥ भगित हेतु िबिध भवन िबहाई । सुिमरत सारद आवित धाई ॥२॥ राम चिरत सर िबनु अन्हवाएँ । सो ौम जाइ न कोिट उपाएँ ॥ किब कोिबद अस हृदयँ िबचार । गाविहं हिर जस किल मल हार ॥३॥ क न्ह ूाकृ त जन गुन गाना । िसर धुिन िगरा लगत पिछताना ॥ हृदय िसंधु मित सीप समाना । ःवाित सारदा कहिहं सुजाना ॥४॥ ज बरषइ बर बािर िबचा । होिहं किबत मुकु तामिन चा ॥५॥ दोहरा जुगुित बेिध पुिन पोिहअिहं रामचिरत बर ताग । पिहरिहं स जन िबमल उर सोभा अित अनुराग ॥११॥ जे जनमे किलकाल कराला । करतब बायस बेष मराला ॥ चलत कु पंथ बेद मग छाँड़े । कपट कलेवर किल मल भाँड़ ॥१॥ बंचक भगत कहाइ राम के । िकं कर कं चन कोह काम के ॥ ितन्ह महँ ूथम रेख जग मोर । धींग धरम वज धंधक धोर ॥२॥ ज अपने अवगुन सब कहऊँ । बाढ़इ कथा पार निहं लहऊँ ॥ ताते म अित अलप बखाने । थोरे महँु जािनहिहं सयाने ॥३॥ समु झ िबिबिध िबिध िबनती मोर । कोउ न कथा सुिन देइिह खोर ॥ एतेह पर किरहिहं जेु असंका । मोिह ते अिधक ते जड़ मित रंका ॥४॥ किब न होउँ निहं चतुर कहावउँ । मित अनु प राम गुन गावउँ ॥ कहँ रघुपित के चिरत अपारा । कहँ मित मोिर िनरत संसारा ॥५॥ जेिहं मा त िगिर मे उड़ाह ं । कहह तूल के िह लेखे माह ं ॥ु समुझत अिमत राम ूभुताई । करत कथा मन अित कदराई ॥६॥ दोहरा सारद सेस महेस िबिध आगम िनगम पुरान । नेित नेित किह जासु गुन करिहं िनरंतर गान ॥१२॥ सब जानत ूभु ूभुता सोई । तदिप कह िबनु रहा न कोई ॥ तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन ूभाउ भाँित बहु भाषा ॥१॥ एक अनीह अ प अनामा । अज स चदानंद पर धामा ॥ यापक िबःव प भगवाना । तेिहं धिर देह चिरत कृ त नाना ॥२॥
  10. 10. रामचिरतमानस - 10 - बालकांड www.swargarohan.org सो के वल भगतन िहत लागी । परम कृ पाल ूनत अनुरागी ॥ जेिह जन पर ममता अित छोह । जेिहं क ना किर क न्ह न कोहू ू ॥३॥ गई बहोर गर ब नेवाजू । सरल सबल सािहब रघुराजू ॥ बुध बरनिहं हिर जस अस जानी । करिह पुनीत सुफल िनज बानी ॥४॥ तेिहं बल म रघुपित गुन गाथा । किहहउँ नाइ राम पद माथा ॥ मुिनन्ह ूथम हिर क रित गाई । तेिहं मग चलत सुगम मोिह भाई ॥५॥ दोहरा अित अपार जे सिरत बर ज नृप सेतु करािहं । चिढ िपपीिलकउ परम लघु िबनु ौम पारिह जािहं ॥१३॥ एिह ूकार बल मनिह देखाई । किरहउँ रघुपित कथा सुहाई ॥ यास आिद किब पुंगव नाना । जन्ह सादर हिर सुजस बखाना ॥१॥ चरन कमल बंदउँ ितन्ह के रे । पुरवहँ सकल मनोरथ मेरे ॥ु किल के किबन्ह करउँ परनामा । जन्ह बरने रघुपित गुन मामा ॥२॥ जे ूाकृ त किब परम सयाने । भाषाँ जन्ह हिर चिरत बखाने ॥ भए जे अहिहं जे होइहिहं आग । ूनवउँ सबिहं कपट सब याग ॥३॥ होहु ूसन्न देह बरदानू । साधु समाज भिनित सनमानू ॥ु जो ूबंध बुध निहं आदरह ं । सो ौम बािद बाल किब करह ं ॥४॥ क रित भिनित भूित भिल सोई । सुरसिर सम सब कहँ िहत होई ॥ राम सुक रित भिनित भदेसा । असमंजस अस मोिह अँदेसा ॥५॥ तु हर कृ पा सुलभ सोउ मोरे । िसअिन सुहाविन टाट पटोरे ॥६॥ दोहरा सरल किबत क रित िबमल सोइ आदरिहं सुजान । सहज बयर िबसराइ िरपु जो सुिन करिहं बखान ॥१४(क)॥ सो न होइ िबनु िबमल मित मोिह मित बल अित थोर । करह कृ पा हिर जस कहउँ पुिन पुिन करउँु िनहोर ॥१४(ख)॥ किब कोिबद रघुबर चिरत मानस मंजु मराल । बाल िबनय सुिन सु िच ल ख मोपर होह कृ पाल ॥ु १४(ग)॥ सोरठा बंदउँ मुिन पद कं जु रामायन जेिहं िनरमयउ । सखर सुकोमल मंजु दोष रिहत दषन सिहत ॥ू १४(घ)॥ बंदउँ चािरउ बेद भव बािरिध बोिहत सिरस । जन्हिह न सपनेहँु खेद बरनत रघुबर िबसद जसु ॥१४(ङ)॥
  11. 11. रामचिरतमानस - 11 - बालकांड www.swargarohan.org बंदउँ िबिध पद रेनु भव सागर जेिह क न्ह जहँ । संत सुधा सिस धेनु ूगटे खल िबष बा नी ॥१४(च)॥ दोहरा िबबुध िबू बुध मह चरन बंिद कहउँ कर जोिर । होइ ूसन्न पुरवह सकल मंजु मनोरथ मोिर ॥ु १४(छ)॥ पुिन बंदउँ सारद सुरसिरता । जुगल पुनीत मनोहर चिरता ॥ म जन पान पाप हर एका । कहत सुनत एक हर अिबबेका ॥१॥ गुर िपतु मातु महेस भवानी । ूनवउँ द नबंधु िदन दानी ॥ सेवक ःवािम सखा िसय पी के । िहत िन पिध सब िबिध तुलसीके ॥२॥ किल िबलोिक जग िहत हर िगिरजा । साबर मंऽ जाल जन्ह िसिरजा ॥ अनिमल आखर अरथ न जापू । ूगट ूभाउ महेस ूतापू ॥३॥ सो उमेस मोिह पर अनुकू ला । किरिहं कथा मुद मंगल मूला ॥ सुिमिर िसवा िसव पाइ पसाऊ । बरनउँ रामचिरत िचत चाऊ ॥४॥ भिनित मोिर िसव कृ पाँ िबभाती । सिस समाज िमिल मनहँ सुराती ॥ु जे एिह कथिह सनेह समेता । किहहिहं सुिनहिहं समु झ सचेता ॥५॥ होइहिहं राम चरन अनुरागी । किल मल रिहत सुमंगल भागी ॥६॥ दोहरा सपनेहँ साचेहँ मोिह पर ज हर गौिर पसाउ ।ु ु तौ फु र होउ जो कहेउँ सब भाषा भिनित ूभाउ ॥१५॥ बंदउँ अवध पुर अित पाविन । सरजू सिर किल कलुष नसाविन ॥ ूनवउँ पुर नर नािर बहोर । ममता जन्ह पर ूभुिह न थोर ॥१॥ िसय िनंदक अघ ओघ नसाए । लोक िबसोक बनाइ बसाए ॥ बंदउँ कौस या िदिस ूाची । क रित जासु सकल जग माची ॥२॥ ूगटेउ जहँ रघुपित सिस चा । िबःव सुखद खल कमल तुसा ॥ दसरथ राउ सिहत सब रानी । सुकृ त सुमंगल मूरित मानी ॥३॥ करउँ ूनाम करम मन बानी । करह कृ पाु सुत सेवक जानी ॥ जन्हिह िबरिच बड़ भयउ िबधाता । मिहमा अविध राम िपतु माता ॥४॥ सोरठा बंदउँ अवध भुआल स य ूेम जेिह राम पद । िबछु रत द नदयाल िूय तनु तृन इव पिरहरेउ ॥१६॥
  12. 12. रामचिरतमानस - 12 - बालकांड www.swargarohan.org ूनवउँ पिरजन सिहत िबदेह । जािह राम पद गूढ़ सनेहू ू ॥ जोग भोग महँ राखेउ गोई । राम िबलोकत ूगटेउ सोई ॥१॥ ूनवउँ ूथम भरत के चरना । जासु नेम ॄत जाइ न बरना ॥ राम चरन पंकज मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥२॥ बंदउँ लिछमन पद जलजाता । सीतल सुभग भगत सुख दाता ॥ रघुपित क रित िबमल पताका । दंड समान भयउ जस जाका ॥३॥ सेष सह सीस जग कारन । जो अवतरेउ भूिम भय टारन ॥ सदा सो सानुकू ल रह मो पर । कृ पािसंधु सौिमिऽ गुनाकर ॥४॥ िरपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी ॥ महावीर िबनवउँ हनुमाना । राम जासु जस आप बखाना ॥५॥ सोरठा ूनवउँ पवनकु मार खल बन पावक यानधन । जासु हृदय आगार बसिहं राम सर चाप धर ॥१७॥ किपपित र छ िनसाचर राजा । अंगदािद जे क स समाजा ॥ बंदउँ सब के चरन सुहाए । अधम सर र राम जन्ह पाए ॥१॥ रघुपित चरन उपासक जेते । खग मृग सुर नर असुर समेते ॥ बंदउँ पद सरोज सब के रे । जे िबनु काम राम के चेरे ॥२॥ सुक सनकािद भगत मुिन नारद । जे मुिनबर िब यान िबसारद ॥ ूनवउँ सबिहं धरिन धिर सीसा । करह कृ पा जन जािन मुनीसाु ॥३॥ जनकसुता जग जनिन जानक । अितसय िूय क ना िनधान क ॥ ताके जुग पद कमल मनावउँ । जासु कृ पाँ िनरमल मित पावउँ ॥४॥ पुिन मन बचन कम रघुनायक । चरन कमल बंदउँ सब लायक ॥ रा जवनयन धर धनु सायक । भगत िबपित भंजन सुख दायक ॥५॥ दोहरा िगरा अरथ जल बीिच सम किहअत िभन्न न िभन्न । बदउँ सीता राम पद जन्हिह परम िूय खन्न ॥१८॥ बंदउँ नाम राम रघुवर को । हेतु कृ सानु भानु िहमकर को ॥ िबिध हिर हरमय बेद ूान सो । अगुन अनूपम गुन िनधान सो ॥१॥ महामंऽ जोइ जपत महेसू । कासीं मुकु ित हेतु उपदेसू ॥ मिहमा जासु जान गनराउ । ूथम पू जअत नाम ूभाऊ ॥२॥
  13. 13. रामचिरतमानस - 13 - बालकांड www.swargarohan.org जान आिदकिब नाम ूतापू । भयउ सु किर उलटा जापू ॥ सहस नाम सम सुिन िसव बानी । जिप जेई िपय संग भवानी ॥३॥ हरषे हेतु हेिर हर ह को । िकय भूषन ितय भूषन ती को ॥ नाम ूभाउ जान िसव नीको । कालकू ट फलु द न्ह अमी को ॥४॥ दोहरा बरषा िरतु रघुपित भगित तुलसी सािल सुदास ॥ राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥१९॥ आखर मधुर मनोहर दोऊ । बरन िबलोचन जन जय जोऊ ॥ सुिमरत सुलभ सुखद सब काह । लोक लाह परलोक िनबाहू ु ू ॥१॥ कहत सुनत सुिमरत सुिठ नीके । राम लखन सम िूय तुलसी के ॥ बरनत बरन ूीित िबलगाती । ॄ जीव सम सहज सँघाती ॥२॥ नर नारायन सिरस सुॅाता । जग पालक िबसेिष जन ऽाता ॥ भगित सुितय कल करन िबभूषन । जग िहत हेतु िबमल िबधु पूषन ॥३॥ ःवाद तोष सम सुगित सुधा के । कमठ सेष सम धर बसुधा के ॥ जन मन मंजु कं ज मधुकर से । जीह जसोमित हिर हलधर से ॥४॥ दोहरा एकु छऽु एकु मुकु टमिन सब बरनिन पर जोउ । तुलसी रघुबर नाम के बरन िबराजत दोउ ॥२०॥ समुझत सिरस नाम अ नामी । ूीित परसपर ूभु अनुगामी ॥ नाम प दइ ईस उपाधी । अकथ अनािद सुसामु झ साधीु ॥१॥ को बड़ छोट कहत अपराधू । सुिन गुन भेद समु झहिहं साधू ॥ दे खअिहं प नाम आधीना । प यान निहं नाम िबह ना ॥२॥ प िबसेष नाम िबनु जान । करतल गत न परिहं पिहचान ॥ सुिमिरअ नाम प िबनु देख । आवत हृदयँ सनेह िबसेष ॥३॥ नाम प गित अकथ कहानी । समुझत सुखद न परित बखानी ॥ अगुन सगुन िबच नाम सुसाखी । उभय ूबोधक चतुर दभाषीु ॥४॥ दोहरा राम नाम मिनद प ध जीह देहर ार । तुलसी भीतर बाहेरहँ ज चाहिस उ जआर ॥ु २१॥
  14. 14. रामचिरतमानस - 14 - बालकांड www.swargarohan.org नाम जीहँ जिप जागिहं जोगी । िबरित िबरंिच ूपंच िबयोगी ॥ ॄ सुखिह अनुभविहं अनूपा । अकथ अनामय नाम न पा ॥१॥ जाना चहिहं गूढ़ गित जेऊ । नाम जीहँ जिप जानिहं तेऊ ॥ साधक नाम जपिहं लय लाएँ । होिहं िस अिनमािदक पाएँ ॥२॥ जपिहं नामु जन आरत भार । िमटिहं कु संकट होिहं सुखार ॥ राम भगत जग चािर ूकारा । सुकृ ती चािरउ अनघ उदारा ॥३॥ चह चतुरू कहँ नाम अधारा । यानी ूभुिह िबसेिष िपआरा ॥ु चहँ जुग चहँ ौुित ना ूभाऊु ु । किल िबसेिष निहं आन उपाऊ ॥४॥ दोहरा सकल कामना ह न जे राम भगित रस लीन । नाम सुूेम िपयूष हद ितन्हहँ िकए मन मीन ॥ु २२॥ अगुन सगुन दइ ॄ सु पा । अकथ अगाध अनािद अनूपा ॥ मोर मत बड़ नामु दह त । िकए जेिहं जुग िनज बस िनजु ू बूत ॥१॥ ूोिढ़ सुजन जिन जानिहं जन क । कहउँ ूतीित ूीित िच मन क ॥ एकु दा गत दे खअ एकू । पावक सम जुग ॄ िबबेकू ॥२॥ उभय अगम जुग सुगम नाम त । कहेउँ नामु बड़ ॄ राम त ॥ यापकु एकु ॄ अिबनासी । सत चेतन धन आनँद रासी ॥३॥ अस ूभु हृदयँ अछत अिबकार । सकल जीव जग द न दखार ॥ु नाम िन पन नाम जतन त । सोउ ूगटत जिम मोल रतन त ॥४॥ दोहरा िनरगुन त एिह भाँित बड़ नाम ूभाउ अपार । कहउँ नामु बड़ राम त िनज िबचार अनुसार ॥२३॥ राम भगत िहत नर तनु धार । सिह संकट िकए साधु सुखार ॥ नामु सूेम जपत अनयासा । भगत होिहं मुद मंगल बासा ॥१॥ राम एक तापस ितय तार । नाम कोिट खल कु मित सुधार ॥ िरिष िहत राम सुके तुसुता क । सिहत सेन सुत क न्ह िबबाक ॥२॥ सिहत दोष दख दास दरासा । दलइु ु नामु जिम रिब िनिस नासा ॥ भंजेउ राम आपु भव चापू । भव भय भंजन नाम ूतापू ॥३॥ दंडक बनु ूभु क न्ह सुहावन । जन मन अिमत नाम िकए पावन ॥ । िनिसचर िनकर दले रघुनंदन । नामु सकल किल कलुष िनकं दन ॥४॥
  15. 15. रामचिरतमानस - 15 - बालकांड www.swargarohan.org दोहरा सबर गीध सुसेवकिन सुगित द न्ह रघुनाथ । नाम उधारे अिमत खल बेद िबिदत गुन गाथ ॥२४॥ राम सुकं ठ िबभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ॥ नाम गर ब अनेक नेवाजे । लोक बेद बर िबिरद िबराजे ॥१॥ राम भालु किप कटकु बटोरा । सेतु हेतु ौमु क न्ह न थोरा ॥ नामु लेत भविसंधु सुखाह ं । करह िबचा सुजन मन माह ंु ॥२॥ राम सकु ल रन रावनु मारा । सीय सिहत िनज पुर पगु धारा ॥ राजा रामु अवध रजधानी । गावत गुन सुर मुिन बर बानी ॥३॥ सेवक सुिमरत नामु सूीती । िबनु ौम ूबल मोह दलु जीती ॥ िफरत सनेहँ मगन सुख अपन । नाम ूसाद सोच निहं सपन ॥४॥ दोहरा ॄ राम त नामु बड़ बर दायक बर दािन । रामचिरत सत कोिट महँ िलय महेस जयँ जािन ॥२५॥ मासपारायण, पहला िवौाम नाम ूसाद संभु अिबनासी । साजु अमंगल मंगल रासी ॥ सुक सनकािद िस मुिन जोगी । नाम ूसाद ॄ सुख भोगी ॥१॥ नारद जानेउ नाम ूतापू । जग िूय हिर हिर हर िूय आपू ॥ नामु जपत ूभु क न्ह ूसादू । भगत िसरोमिन भे ूहलादू ॥२॥ ीुवँ सगलािन जपेउ हिर नाऊँ । पायउ अचल अनूपम ठाऊँ ॥ सुिमिर पवनसुत पावन नामू । अपने बस किर राखे रामू ॥३॥ अपतु अजािमलु गजु गिनकाऊ । भए मुकु त हिर नाम ूभाऊ ॥ कह कहाँ लिग नाम बड़ाई । रामु न सकिहं नाम गुन गाई ॥४॥ दोहरा नामु राम को कलपत किल क यान िनवासु । जो सुिमरत भयो भाँग त तुलसी तुलसीदासु ॥२६॥ चहँ जुग तीिन काल ितहँ लोका । भए नाम जिपु ु जीव िबसोका ॥ बेद पुरान संत मत एह । सकल सुकृ त फल राम सनेहू ू ॥१॥ यानु ूथम जुग मखिबिध दज । ापर पिरतोषत ूभु पूज ॥ू किल के वल मल मूल मलीना । पाप पयोिनिध जन जन मीना ॥२॥
  16. 16. रामचिरतमानस - 16 - बालकांड www.swargarohan.org नाम कामत काल कराला । सुिमरत समन सकल जग जाला ॥ राम नाम किल अिभमत दाता । िहत परलोक लोक िपतु माता ॥३॥ निहं किल करम न भगित िबबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥ कालनेिम किल कपट िनधानू । नाम सुमित समरथ हनुमानू ॥४॥ दोहरा राम नाम नरके सर कनककिसपु किलकाल । जापक जन ूहलाद जिम पािलिह दिल सुरसाल ॥२७॥ भायँ कु भायँ अनख आलसहँ । नाम जपत मंगल िदिस दसहँू ू ॥ सुिमिर सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथिह माथा ॥१॥ मोिर सुधािरिह सो सब भाँती । जासु कृ पा निहं कृ पाँ अघाती ॥ राम सुःवािम कु सेवकु मोसो । िनज िदिस दै ख दयािनिध पोसो ॥२॥ लोकहँ बेद सुसािहब र तीं । िबनय सुनत पिहचानत ूीतीु ॥ गनी गर ब मामनर नागर । पंिडत मूढ़ मलीन उजागर ॥३॥ सुकिब कु किब िनज मित अनुहार । नृपिह सराहत सब नर नार ॥ साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस अंस भव परम कृ पाला ॥४॥ सुिन सनमानिहं सबिह सुबानी । भिनित भगित नित गित पिहचानी ॥ यह ूाकृ त मिहपाल सुभाऊ । जान िसरोमिन कोसलराऊ ॥५॥ र झत राम सनेह िनसोत । को जग मंद मिलनमित मोत ॥६॥ दोहरा सठ सेवक क ूीित िच र खहिहं राम कृ पालु । उपल िकए जलजान जेिहं सिचव सुमित किप भालु ॥२८(क)॥ हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास । सािहब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥२८(ख)॥ अित बिड़ मोिर िढठाई खोर । सुिन अघ नरकहँ नाक सकोर ॥ु समु झ सहम मोिह अपडर अपन । सो सुिध राम क न्ह निहं सपन ॥१॥ सुिन अवलोिक सुिचत चख चाह । भगित मोिर मित ःवािम सराह ॥ कहत नसाइ होइ िहयँ नीक । र झत राम जािन जन जी क ॥२॥ रहित न ूभु िचत चूक िकए क । करत सुरित सय बार िहए क ॥ जेिहं अघ बधेउ याध जिम बाली। िफिर सुकं ठ सोइ क न्ह कु चाली ॥३॥ सोइ करतूित िबभीषन के र । सपनेहँ सो न राम िहयँ हेरु ॥ ते भरतिह भटत सनमाने । राजसभाँ रघुबीर बखाने ॥४॥
  17. 17. रामचिरतमानस - 17 - बालकांड www.swargarohan.org दोहरा ूभु त तर किप डार पर ते िकए आपु समान ॥ तुलसी कहँ न राम से सािहब सीलिनधान ॥ू २९(क)॥ राम िनका रावर है सबह को नीक । ज यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥२९(ख)॥ एिह िबिध िनज गुन दोष किह सबिह बहिर िस नाइ ।ु बरनउँ रघुबर िबसद जसु सुिन किल कलुष नसाइ ॥२९(ग)॥ जागबिलक जो कथा सुहाई । भर ाज मुिनबरिह सुनाई ॥ किहहउँ सोइ संबाद बखानी । सुनहँ सकल स जन सुखु मानीु ॥१॥ संभु क न्ह यह चिरत सुहावा । बहिर कृ पा किर उमिह सुनावा ॥ु सोइ िसव कागभुसुंिडिह द न्हा । राम भगत अिधकार चीन्हा ॥२॥ तेिह सन जागबिलक पुिन पावा । ितन्ह पुिन भर ाज ूित गावा ॥ ते ौोता बकता समसीला । सवँदरसी जानिहं हिरलीला ॥३॥ जानिहं तीिन काल िनज याना । करतल गत आमलक समाना ॥ औरउ जे हिरभगत सुजाना । कहिहं सुनिहं समुझिहं िबिध नाना ॥४॥ दोहरा मै पुिन िनज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत । समुझी निह तिस बालपन तब अित रहेउँ अचेत ॥३०(क)॥ ौोता बकता यानिनिध कथा राम कै गूढ़ । िकिम समुझ मै जीव जड़ किल मल मिसत िबमूढ़ ॥३०(ख) तदिप कह गुर बारिहं बारा । समु झ पर कछु मित अनुसारा ॥ भाषाब करिब म सोई । मोर मन ूबोध जेिहं होई ॥१॥ जस कछु बुिध िबबेक बल मेर । तस किहहउँ िहयँ हिर के ूेर ॥ िनज संदेह मोह ॅम हरनी । करउँ कथा भव सिरता तरनी ॥२॥ बुध िबौाम सकल जन रंजिन । रामकथा किल कलुष िबभंजिन ॥ रामकथा किल पंनग भरनी । पुिन िबबेक पावक कहँ अरनीु ॥३॥ रामकथा किल कामद गाई । सुजन सजीविन मूिर सुहाई ॥ सोइ बसुधातल सुधा तरंिगिन । भय भंजिन ॅम भेक भुअंिगिन ॥४॥ असुर सेन सम नरक िनकं िदिन । साधु िबबुध कु ल िहत िगिरनंिदिन ॥ संत समाज पयोिध रमा सी । िबःव भार भर अचल छमा सी ॥५॥ जम गन मुहँ मिस जग जमुना सी । जीवन मुकु ित हेतु जनु कासी ॥ रामिह िूय पाविन तुलसी सी । तुलिसदास िहत िहयँ हलसी सीु ॥६॥
  18. 18. रामचिरतमानस - 18 - बालकांड www.swargarohan.org िसवूय मेकल सैल सुता सी । सकल िसि सुख संपित रासी ॥ सदगुन सुरगन अंब अिदित सी । रघुबर भगित ूेम परिमित सी ॥७॥ दोहरा राम कथा मंदािकनी िचऽकू ट िचत चा । तुलसी सुभग सनेह बन िसय रघुबीर िबहा ॥३१॥ राम चिरत िचंतामिन चा । संत सुमित ितय सुभग िसंगा ॥ जग मंगल गुन माम राम के । दािन मुकु ित धन धरम धाम के ॥१॥ सदगुर यान िबराग जोग के । िबबुध बैद भव भीम रोग के ॥ जनिन जनक िसय राम ूेम के । बीज सकल ॄत धरम नेम के ॥२॥ समन पाप संताप सोक के । िूय पालक परलोक लोक के ॥ सिचव सुभट भूपित िबचार के । कुं भज लोभ उदिध अपार के ॥३॥ काम कोह किलमल किरगन के । के हिर सावक जन मन बन के ॥ अितिथ पू य िूयतम पुरािर के । कामद घन दािरद दवािर के ॥४॥ मंऽ महामिन िबषय याल के । मेटत किठन कु अंक भाल के ॥ हरन मोह तम िदनकर कर से । सेवक सािल पाल जलधर से ॥५॥ अिभमत दािन देवत बर से । सेवत सुलभ सुखद हिर हर से ॥ सुकिब सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥६॥ सकल सुकृ त फल भूिर भोग से । जग िहत िन पिध साधु लोग से ॥ सेवक मन मानस मराल से । पावक गंग तंरग माल से ॥७॥ दोहरा कु पथ कु तरक कु चािल किल कपट दंभ पाषंड । दहन राम गुन माम जिम इंधन अनल ूचंड ॥३२(क)॥ रामचिरत राके स कर सिरस सुखद सब काह ।ु स जन कु मुद चकोर िचत िहत िबसेिष बड़ लाह ॥ु ३२(ख)॥ क न्ह ूःन जेिह भाँित भवानी । जेिह िबिध संकर कहा बखानी ॥ सो सब हेतु कहब म गाई । कथाूबंध िबिचऽ बनाई ॥१॥ जेिह यह कथा सुनी निहं होई । जिन आचरजु कर सुिन सोई ॥ कथा अलौिकक सुनिहं जे यानी । निहं आचरजु करिहं अस जानी ॥२ ॥ रामकथा कै िमित जग नाह ं । अिस ूतीित ितन्ह के मन माह ं ॥ नाना भाँित राम अवतारा । रामायन सत कोिट अपारा ॥३॥ कलपभेद हिरचिरत सुहाए । भाँित अनेक मुनीसन्ह गाए ॥ किरअ न संसय अस उर आनी । सुिनअ कथा सारद रित मानी ॥४॥
  19. 19. रामचिरतमानस - 19 - बालकांड www.swargarohan.org दोहरा राम अनंत अनंत गुन अिमत कथा िबःतार । सुिन आचरजु न मािनहिहं जन्ह क िबमल िबचार ॥३३॥ एिह िबिध सब संसय किर दर । िसर धिर गुर पद पंकज धूर ॥ू पुिन सबह िबनवउँ कर जोर । करत कथा जेिहं लाग न खोर ॥१॥ सादर िसविह नाइ अब माथा । बरनउँ िबसद राम गुन गाथा ॥ संबत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हिर पद धिर सीसा ॥२॥ नौमी भौम बार मधु मासा । अवधपुर ं यह चिरत ूकासा ॥ जेिह िदन राम जनम ौुित गाविहं । तीरथ सकल तहाँ चिल आविहं ॥३॥ असुर नाग खग नर मुिन देवा । आइ करिहं रघुनायक सेवा ॥ जन्म महो सव रचिहं सुजाना । करिहं राम कल क रित गाना ॥४॥ दोहरा म जिह स जन बृंद बह पावन सरजू नीर ।ु जपिहं राम धिर यान उर सुंदर ःयाम सर र ॥३४॥ दरस परस म जन अ पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥ नद पुनीत अिमत मिहमा अित । किह न सकइ सारद िबमलमित ॥१॥ राम धामदा पुर सुहाविन । लोक समःत िबिदत अित पाविन ॥ चािर खािन जग जीव अपारा । अवध तजे तनु निह संसारा ॥२॥ सब िबिध पुर मनोहर जानी । सकल िसि ूद मंगल खानी ॥ िबमल कथा कर क न्ह अरंभा । सुनत नसािहं काम मद दंभा ॥३॥ रामचिरतमानस एिह नामा । सुनत ौवन पाइअ िबौामा ॥ मन किर िवषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौ एिहं सर परई ॥४॥ रामचिरतमानस मुिन भावन । िबरचेउ संभु सुहावन पावन ॥ िऽिबध दोष दख दािरद दावन । किल कु चािल कु िल कलुष नसावनु ॥५॥ रिच महेस िनज मानस राखा । पाइ सुसमउ िसवा सन भाषा ॥ तात रामचिरतमानस बर । धरेउ नाम िहयँ हेिर हरिष हर ॥६॥ कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई । सादर सुनह सुजन मन लाईु ॥७॥ दोहरा जस मानस जेिह िबिध भयउ जग ूचार जेिह हेतु । अब सोइ कहउँ ूसंग सब सुिमिर उमा बृषके तु ॥३५॥
  20. 20. रामचिरतमानस - 20 - बालकांड www.swargarohan.org संभु ूसाद सुमित िहयँ हलसी । रामचिरतमानसु किब तुलसी ॥ करइ मनोहर मित अनुहार । सुजन सुिचत सुिन लेह सुधारु ॥१॥ सुमित भूिम थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदिध घन साधू ॥ बरषिहं राम सुजस बर बार । मधुर मनोहर मंगलकार ॥२॥ लीला सगुन जो कहिहं बखानी । सोइ ःव छता करइ मल हानी ॥ ूेम भगित जो बरिन न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥३॥ सो जल सुकृ त सािल िहत होई । राम भगत जन जीवन सोई ॥ मेधा मिह गत सो जल पावन । सिकिल ौवन मग चलेउ सुहावन ॥४॥ भरेउ सुमानस सुथल िथराना । सुखद सीत िच चा िचराना ॥५॥ दोहरा सुिठ सुंदर संबाद बर िबरचे बुि िबचािर । तेइ एिह पावन सुभग सर घाट मनोहर चािर ॥३६॥ स ूबन्ध सुभग सोपाना । यान नयन िनरखत मन माना ॥ रघुपित मिहमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बािर अगाधा ॥१॥ राम सीय जस सिलल सुधासम । उपमा बीिच िबलास मनोरम ॥ पुरइिन सघन चा चौपाई । जुगुित मंजु मिन सीप सुहाई ॥२॥ छंद सोरठा सुंदर दोहा । सोइ बहरंग कमल कु ल सोहा ॥ु अरथ अनूप सुमाव सुभासा । सोइ पराग मकरंद सुबासा ॥३॥ सुकृ त पुंज मंजुल अिल माला । यान िबराग िबचार मराला ॥ धुिन अवरेब किबत गुन जाती । मीन मनोहर ते बहभाँतीु ॥४॥ अरथ धरम कामािदक चार । कहब यान िब यान िबचार ॥ नव रस जप तप जोग िबरागा । ते सब जलचर चा तड़ागा ॥५॥ सुकृ ती साधु नाम गुन गाना । ते िबिचऽ जल िबहग समाना ॥ संतसभा चहँ िदिसु अवँराई । ौ ा िरतु बसंत सम गाई ॥६॥ भगित िन पन िबिबध िबधाना । छमा दया दम लता िबताना ॥ सम जम िनयम फू ल फल याना । हिर पत रित रस बेद बखाना ॥७॥ औरउ कथा अनेक ूसंगा । तेइ सुक िपक बहबरन िबहंगा ॥ु ८॥ दोहरा पुलक बािटका बाग बन सुख सुिबहंग िबहा । माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चा ॥३७॥ जे गाविहं यह चिरत सँभारे । तेइ एिह ताल चतुर रखवारे ॥ सदा सुनिहं सादर नर नार । तेइ सुरबर मानस अिधकार ॥१॥
  21. 21. रामचिरतमानस - 21 - बालकांड www.swargarohan.org अित खल जे िबषई बग कागा । एिहं सर िनकट न जािहं अभागा ॥ संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न िबषय कथा रस नाना ॥२॥ तेिह कारन आवत िहयँ हारे । कामी काक बलाक िबचारे ॥ आवत एिहं सर अित किठनाई । राम कृ पा िबनु आइ न जाई ॥३॥ किठन कु संग कु पंथ कराला । ितन्ह के बचन बाघ हिर याला ॥ गृह कारज नाना जंजाला । ते अित दगम सैल िबसालाु ॥४॥ बन बह िबषम मोह मद माु ना । नद ं कु तक भयंकर नाना ॥५॥ दोहरा जे ौ ा संबल रिहत निह संतन्ह कर साथ । ितन्ह कहँ मानस अगम अितु जन्हिह न िूय रघुनाथ ॥३८॥ ज किर क जाइ पुिन कोई । जातिहं नींद जुड़ाई होई ॥ जड़ता जाड़ िबषम उर लागा । गएहँ न म जन पाव अभागाु ॥१॥ किर न जाइ सर म जन पाना । िफिर आवइ समेत अिभमाना ॥ ज बहोिर कोउ पूछन आवा । सर िनंदा किर तािह बुझावा ॥२॥ सकल िब न यापिह निहं तेह । राम सुकृ पाँ िबलोकिहं जेह ॥ सोइ सादर सर म जनु करई । महा घोर ऽयताप न जरई ॥३॥ ते नर यह सर तजिहं न काऊ । जन्ह के राम चरन भल भाऊ ॥ जो नहाइ चह एिहं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥४॥ अस मानस मानस चख चाह । भइ किब बुि िबमल अवगाह ॥ भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ ूेम ूमोद ूबाहू ॥५॥ चली सुभग किबता सिरता सो । राम िबमल जस जल भिरता सो ॥ सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कू ला ॥६॥ नद पुनीत सुमानस नंिदिन । किलमल तृन त मूल िनकं िदिन ॥७॥ दोहरा ौोता िऽिबध समाज पुर माम नगर दहँ कू ल ।ु ु संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल ॥३९॥ रामभगित सुरसिरतिह जाई । िमली सुक रित सरजु सुहाई ॥ सानुज राम समर जसु पावन । िमलेउ महानद सोन सुहावनु ॥१॥ जुग िबच भगित देवधुिन धारा । सोहित सिहत सुिबरित िबचारा ॥ िऽिबध ताप ऽासक ितमुहानी । राम स प िसंधु समुहानी ॥२॥ मानस मूल िमली सुरसिरह । सुनत सुजन मन पावन किरह ॥ िबच िबच कथा िबिचऽ िबभागा । जनु सिर तीर तीर बन बागा ॥३॥
  22. 22. रामचिरतमानस - 22 - बालकांड www.swargarohan.org उमा महेस िबबाह बराती । ते जलचर अगिनत बहभाँती ॥ु रघुबर जनम अनंद बधाई । भवँर तरंग मनोहरताई ॥४॥ दोहरा बालचिरत चह बंधु के बनज िबपुल बहरंगु ु । नृप रानी पिरजन सुकृ त मधुकर बािरिबहंग ॥४०॥ सीय ःवयंबर कथा सुहाई । सिरत सुहाविन सो छिब छाई ॥ नद नाव पट ूःन अनेका । के वट कु सल उतर सिबबेकाु ॥१॥ सुिन अनुकथन परःपर होई । पिथक समाज सोह सिर सोई ॥ घोर धार भृगुनाथ िरसानी । घाट सुब राम बर बानी ॥२॥ सानुज राम िबबाह उछाह । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ू ॥ कहत सुनत हरषिहं पुलकाह ं । ते सुकृ ती मन मुिदत नहाह ं ॥३॥ राम ितलक िहत मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥ काई कु मित के कई के र । पर जासु फल िबपित घनेर ॥४॥ दोहरा समन अिमत उतपात सब भरतचिरत जपजाग । किल अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग ॥४१॥ क रित सिरत छहँ िरतु र । समय सुहाविन पाविन भूर ॥ू िहम िहमसैलसुता िसव याह । िसिसर सुखद ूभु जनम उछाहू ू ॥१॥ बरनब राम िबबाह समाजू । सो मुद मंगलमय िरतुराजू ॥ मीषम दसह राम बनगवनू । पंथकथा खर आतप पवनूु ॥२॥ बरषा घोर िनसाचर रार । सुरकु ल सािल सुमंगलकार ॥ राम राज सुख िबनय बड़ाई । िबसद सुखद सोइ सरद सुहाई ॥३॥ सती िसरोमिन िसय गुनगाथा । सोइ गुन अमल अनूपम पाथा ॥ भरत सुभाउ सुसीतलताई । सदा एकरस बरिन न जाई ॥४॥ दोहरा अवलोकिन बोलिन िमलिन ूीित परसपर हास । भायप भिल चह बंधु क जल माधुर सुबास ॥ु ४२॥ आरित िबनय द नता मोर । लघुता लिलत सुबािर न थोर ॥ अदभुत सिलल सुनत गुनकार । आस िपआस मनोमल हार ॥१॥
  23. 23. रामचिरतमानस - 23 - बालकांड www.swargarohan.org राम सुूेमिह पोषत पानी । हरत सकल किल कलुष गलानौ ॥ भव ौम सोषक तोषक तोषा । समन दिरत दख दािरद दोषाु ु ॥२॥ काम कोह मद मोह नसावन । िबमल िबबेक िबराग बढ़ावन ॥ सादर म जन पान िकए त । िमटिहं पाप पिरताप िहए त ॥३॥ जन्ह एिह बािर न मानस धोए । ते कायर किलकाल िबगोए ॥ तृिषत िनर ख रिब कर भव बार । िफिरहिह मृग जिम जीव दखारु ॥४॥ दोहरा मित अनुहािर सुबािर गुन गिन मन अन्हवाइ । सुिमिर भवानी संकरिह कह किब कथा सुहाइ ॥४३(क)॥ अब रघुपित पद पंक ह िहयँ धिर पाइ ूसाद । कहउँ जुगल मुिनबज कर िमलन सुभग संबाद ॥४३(ख)॥ भर ाज मुिन बसिहं ूयागा । ितन्हिह राम पद अित अनुरागा ॥ तापस सम दम दया िनधाना । परमारथ पथ परम सुजाना ॥१॥ माघ मकरगत रिब जब होई । तीरथपितिहं आव सब कोई ॥ देव दनुज िकं नर नर ौेनी । सादर म जिहं सकल िऽबेनीं ॥२॥ पूजिह माधव पद जलजाता । परिस अखय बट हरषिहं गाता ॥ु भर ाज आौम अित पावन । परम र य मुिनबर मन भावन ॥३॥ तहाँ होइ मुिन िरषय समाजा । जािहं जे म जन तीरथराजा ॥ म जिहं ूात समेत उछाहा । कहिहं परसपर हिर गुन गाहा ॥४॥ दोहरा ॄ िन पम धरम िबिध बरनिहं त व िबभाग । कहिहं भगित भगवंत कै संजुत यान िबराग ॥४४॥ एिह ूकार भिर माघ नहाह ं । पुिन सब िनज िनज आौम जाह ं ॥ ूित संबत अित होइ अनंदा । मकर म ज गवनिहं मुिनबृंदा ॥१॥ एक बार भिर मकर नहाए । सब मुनीस आौमन्ह िसधाए ॥ जगबािलक मुिन परम िबबेक । भर दाज राखे पद टेक ॥२॥ सादर चरन सरोज पखारे । अित पुनीत आसन बैठारे ॥ किर पूजा मुिन सुजस बखानी । बोले अित पुनीत मृद बानीु ॥३॥ नाथ एक संसउ बड़ मोर । करगत बेदत व सबु तोर ॥ कहत सो मोिह लागत भय लाजा । जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥४॥ दोहरा
  24. 24. रामचिरतमानस - 24 - बालकांड www.swargarohan.org संत कहिह अिस नीित ूभु ौुित पुरान मुिन गाव । होइ न िबमल िबबेक उर गुर सन िकएँ दराव ॥ु ४५॥ अस िबचािर ूगटउँ िनज मोह । हरह नाथ किर जन पर छोहू ु ू ॥ रास नाम कर अिमत ूभावा । संत पुरान उपिनषद गावा ॥१॥ संतत जपत संभु अिबनासी । िसव भगवान यान गुन रासी ॥ आकर चािर जीव जग अहह ं । कासीं मरत परम पद लहह ं ॥२॥ सोिप राम मिहमा मुिनराया । िसव उपदेसु करत किर दाया ॥ रामु कवन ूभु पूछउँ तोह । किहअ बुझाइ कृ पािनिध मोह ॥३॥ एक राम अवधेस कु मारा । ितन्ह कर चिरत िबिदत संसारा ॥ नािर िबरहँ दखु लहेउ अपारा । भयह रोषु रन रावनु माराु ु ॥४॥ दोहरा ूभु सोइ राम िक अपर कोउ जािह जपत िऽपुरािर । स यधाम सब य तु ह कहहु िबबेकु िबचािर ॥४६॥ जैसे िमटै मोर ॅम भार । कहह सो कथाु नाथ िबःतार ॥ जागबिलक बोले मुसुकाई । तु हिह िबिदत रघुपित ूभुताई ॥१॥ राममगत तु ह मन बम बानी । चतुराई तु हार म जानी ॥ चाहह सुनै राम गुन गूढ़ा । क न्हहु ु ूःन मनहँ अित मूढ़ाु ॥२॥ तात सुनह सादर मनु लाई । कहउँ राम कै कथा सुहाईु ॥ महामोह मिहषेसु िबसाु ला । रामकथा कािलका कराला ॥३॥ रामकथा सिस िकरन समाना । संत चकोर करिहं जेिह पाना ॥ ऐसेइ संसय क न्ह भवानी । महादेव तब कहा बखानी ॥४॥ दोहरा कहउँ सो मित अनुहािर अब उमा संभु संबाद । भयउ समय जेिह हेतु जेिह सुनु मुिन िमिटिह िबषाद ॥४७॥ एक बार ऽेता जुग माह ं । संभु गए कुं भज िरिष पाह ं ॥ संग सती जगजनिन भवानी । पूजे िरिष अ खलेःवर जानी ॥१॥ रामकथा मुनीबज बखानी । सुनी महेस परम सुखु मानी ॥ िरिष पूछ हिरभगित सुहाई । कह संभु अिधकार पाई ॥२॥ कहत सुनत रघुपित गुन गाथा । कछु िदन तहाँ रहे िगिरनाथा ॥ मुिन सन िबदा मािग िऽपुरार । चले भवन सँग द छकु मार ॥३॥
  25. 25. रामचिरतमानस - 25 - बालकांड www.swargarohan.org तेिह अवसर भंजन मिहभारा । हिर रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥ िपता बचन त ज राजु उदासी । दंडक बन िबचरत अिबनासी ॥४॥ दोहरा अदयँ िबचारत जात हर के िह िबिध दरसनु होइ । गु प अवतरेउ ूभु गएँ जान सबु कोइ ॥४८(क)॥ सोरठा संकर उर अित छोभु सती न जानिहं मरमु सोइ ॥ तुलसी दरसन लोभु मन ड लोचन लालची ॥४८(ख)॥ रावन मरन मनुज कर जाचा । ूभु िबिध बचनु क न्ह चह साचा ॥ ज निहं जाउँ रहइ पिछतावा । करत िबचा न बनत बनावा ॥१॥ एिह िबिध भए सोचबस ईसा । तेिह समय जाइ दससीसा ॥ लीन्ह नीच मार चिह संगा । भयउ तुरत सोइ कपट कु रंगा ॥२॥ किर छलु मूढ़ हर बैदेह । ूभु ूभाउ तस िबिदत न तेह ॥ मृग बिध बन्धु सिहत हिर आए । आौमु दे ख नयन जल छाए ॥३॥ िबरह िबकल नर इव रघुराई । खोजत िबिपन िफरत दोउ भाई ॥ कबहँ जोग िबयोग न जाक । देखाू ूगट िबरह दख ताकु ॥४॥ दोहरा अित िविचऽ रघुपित चिरत जानिहं परम सुजान । जे मितमंद िबमोह बस हृदयँ धरिहं कछु आन ॥४९॥ संभु समय तेिह रामिह देखा । उपजा िहयँ अित हरपु िबसेषा ॥ भिर लोचन छिबिसंधु िनहार । कु समय जािनन क न्ह िचन्हार ॥१॥ जय स चदानंद जग पावन । अस किह चलेउ मनोज नसावन ॥ चले जात िसव सती समेता । पुिन पुिन पुलकत कृ पािनके ता ॥२॥ सतीं सो दसा संभु कै देखी । उर उपजा संदेह िबसेषी ॥ु संक जगतबं जगद सा । सुर नर मुिन सब नावत सीसा ॥३॥ ितन्ह नृपसुतिह नह परनामा । किह स चदानंद परधमा ॥ भए मगन छिब तासु िबलोक । अजहँ ूीित उर रहित न रोकु ॥४॥ दोहरा ॄ जो यापक िबरज अज अकल अनीह अभेद । सो िक देह धिर होइ नर जािह न जानत वेद ॥५०॥
  26. 26. रामचिरतमानस - 26 - बालकांड www.swargarohan.org िबंनु जो सुर िहत नरतनु धार । सोउ सब य जथा िऽपुरार ॥ खोजइ सो िक अ य इव नार । यानधाम ौीपित असुरार ॥१॥ संभुिगरा पुिन मृषा न होई । िसव सब य जान सबु कोई ॥ अस संसय मन भयउ अपारा । होई न हृदयँ ूबोध ूचारा ॥२॥ ज िप ूगट न कहेउ भवानी । हर अंतरजामी सब जानी ॥ सुनिह सती तव नािर सुभाऊ । संसय अस न धिरअ उर काऊ ॥३॥ जासु कथा कु भंज िरिष गाई । भगित जासु म मुिनिह सुनाई ॥ सोउ मम इ देव रघुबीरा । सेवत जािह सदा मुिन धीरा ॥४॥ छंद मुिन धीर जोगी िस संतत िबमल मन जेिह यावह ं । किह नेित िनगम पुरान आगम जासु क रित गावह ं ॥ सोइ रामु यापक ॄ भुवन िनकाय पित माया धनी । अवतरेउ अपने भगत िहत िनजतंऽ िनत रघुकु लमिन ॥ सोरठा लाग न उर उपदेसु जदिप कहेउ िसवँ बार बह ।ु बोले िबहिस महेसु हिरमाया बलु जािन जयँ ॥५१॥ ज तु हर मन अित संदेह । तौ िकनू जाइ पर छा लेह ॥ू तब लिग बैठ अहउँ बटछािहं । जब लिग तु ह ऐहह मोिह पाहु ॥१॥ जैस जाइ मोह ॅम भार । करेह सो जतनु िबबेक िबचार ॥ु चलीं सती िसव आयसु पाई । करिहं िबचा कर का भाई ॥२॥ इहाँ संभु अस मन अनुमाना । द छसुता कहँ निहंु क याना ॥ मोरेह कह न संसय जाह ं । िबधी िबपर त भलाई नाह ंु ॥३॥ होइिह सोइ जो राम रिच राखा । को किर तक बढ़ावै साखा ॥ अस किह लगे जपन हिरनामा । गई सती जहँ ूभु सुखधामा ॥४॥ दोहरा पुिन पुिन हृदयँ िवचा किर धिर सीता कर प । आग होइ चिल पंथ तेिह जेिहं आवत नरभूप ॥५२॥ लिछमन द ख उमाकृ त बेषा चिकत भए ॅम हृदयँ िबसेषा ॥ किह न सकत कछु अित गंभीरा । ूभु ूभाउ जानत मितधीरा ॥१॥ सती कपट जानेउ सुरःवामी । सबदरसी सब अंतरजामी ॥ु सुिमरत जािह िमटइ अ याना । सोइ सरब य रामु भगवाना ॥२॥
  27. 27. रामचिरतमानस - 27 - बालकांड www.swargarohan.org सती क न्ह चह तहँहँ दराऊ । देखह नािर सुभावु ुु ूभाऊ ॥ िनज माया बलु हृदयँ बखानी । बोले िबहिस रामु मृद बानीु ॥३॥ जोिर पािन ूभु क न्ह ूनामू । िपता समेत लीन्ह िनज नामू ॥ कहेउ बहोिर कहाँ बृषके तू । िबिपन अके िल िफरह के िह हेतूु ॥४॥ दोहरा राम बचन मृद गूढ़ सुिन उपजा अित संकोचुु । सती सभीत महेस पिहं चलीं हृदयँ बड़ सोचु ॥५३॥ म संकर कर कहा न माना । िनज अ यानु राम पर आना ॥ जाइ उत अब देहउँ काहा । उर उपजा अित दा न दाहा ॥१॥ जाना राम सतीं दखु पावा । िनज ूभाउ कछु ूगिट जनावा ॥ु सतीं द ख कौतुकु मग जाता । आग रामु सिहत ौी ॅाता ॥२॥ िफिर िचतवा पाछ ूभु देखा । सिहत बंधु िसय सुंदर वेषा ॥ जहँ िचतविहं तहँ ूभु आसीना । सेविहं िस मुनीस ूबीना ॥३॥ देखे िसव िबिध िबंनु अनेका । अिमत ूभाउ एक त एका ॥ बंदत चरन करत ूभु सेवा । िबिबध बेष देखे सब देवा ॥४॥ दोहरा सती िबधाऽी इंिदरा देखीं अिमत अनूप । जेिहं जेिहं बेष अजािद सुर तेिह तेिह तन अनु प ॥५४॥ देखे जहँ तहँ रघुपित जेते । सि न्ह सिहत सकल सुर तेते ॥ जीव चराचर जो संसारा । देखे सकल अनेक ूकारा ॥१॥ पूजिहं ूभुिह देव बह बेषा । राम प दसर निहंु ू देखा ॥ अवलोके रघुपित बहतेरे । सीता सिहत न बेष घनेरेु ॥२॥ सोइ रघुबर सोइ लिछमनु सीता । दे ख सती अित भई सभीता ॥ हृदय कं प तन सुिध कछु नाह ं । नयन मूिद बैठ ं मग माह ं ॥३॥ बहिर िबलोके उ नयन उघार । कछु न द ख तहँ द छकु मार ॥ु पुिन पुिन नाइ राम पद सीसा । चलीं तहाँ जहँ रहे िगर सा ॥४॥ दोहरा गई समीप महेस तब हँिस पूछ कु सलात । लीन्ह पर छा कवन िबिध कहह स य सब बात ॥ु ५५॥ मासपारायण, दसरा िवौामू
  28. 28. रामचिरतमानस - 28 - बालकांड www.swargarohan.org सतीं समु झ रघुबीर ूभाऊ । भय बस िसव सन क न्ह दराऊ ॥ु कछु न पर छा ली न्ह गोसाई । क न्ह ूनामु तु हािरिह नाई ॥१॥ जो तु ह कहा सो मृषा न होई । मोर मन ूतीित अित सोई ॥ तब संकर देखेउ धिर याना । सतीं जो क न्ह चिरत सब जाना ॥२॥ बहिर राममायिह िस नावा । ूेिर सितिह जेिहं झूँठ कहावाु ॥ हिर इ छा भावी बलवाना । हृदयँ िबचारत संभु सुजाना ॥३॥ सतीं क न्ह सीता कर बेषा । िसव उर भयउ िबषाद िबसेषा ॥ ज अब करउँ सती सन ूीती । िमटइ भगित पथु होइ अनीती ॥४॥ दोहरा परम पुनीत न जाइ त ज िकएँ ूेम बड़ पापु । ूगिट न कहत महेसु कछु हृदयँ अिधक संतापु ॥५६॥ तब संकर ूभु पद िस नावा । सुिमरत रामु हृदयँ अस आवा ॥ एिहं तन सितिह भेट मोिह नाह ं । िसव संक पु क न्ह मन माह ं ॥१॥ अस िबचािर संक मितधीरा । चले भवन सुिमरत रघुबीरा ॥ चलत गगन भै िगरा सुहाई । जय महेस भिल भगित ढ़ाई ॥२॥ अस पन तु ह िबनु करइ को आना । रामभगत समरथ भगवाना ॥ सुिन नभिगरा सती उर सोचा । पूछा िसविह समेत सकोचा ॥३॥ क न्ह कवन पन कहहु कृ पाला । स यधाम ूभु द नदयाला ॥ जदिप सतीं पूछा बह भाँती । तदिप न कहेउु िऽपुर आराती ॥४॥ दोहरा सतीं हृदय अनुमान िकय सबु जानेउ सब य । क न्ह कपट मु संभु सन नािर सहज जड़ अ य ॥५७॥ हृदयँ सोचु समुझत िनज करनी । िचंता अिमत जाइ निह बरनी ॥ कृ पािसंधु िसव परम अगाधा । ूगट न कहेउ मोर अपराधा ॥१॥ संकर ख अवलोिक भवानी । ूभु मोिह तजेउ हृदयँ अकु लानी ॥ िनज अघ समु झ न कछु किह जाई । तपइ अवाँ इव उर अिधकाई ॥२॥ सितिह ससोच जािन बृषके तू । कह ं कथा सुंदर सुख हेतू ॥ बरनत पंथ िबिबध इितहासा । िबःवनाथ पहँचे कै लासाु ॥३॥ तहँ पुिन संभु समु झ पन आपन । बैठे बट तर किर कमलासन ॥ संकर सहज स प स हारा । लािग समािध अखंड अपारा ॥४॥
  29. 29. रामचिरतमानस - 29 - बालकांड www.swargarohan.org दोहरा सती बसिह कै लास तब अिधक सोचु मन मािहं । मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम िदवस िसरािहं ॥५८॥ िनत नव सोचु सतीं उर भारा । कब जैहउँ दख सागर पारा ॥ु म जो क न्ह रघुपित अपमाना । पुिनपित बचनु मृषा किर जाना ॥१॥ सो फलु मोिह िबधाताँ द न्हा । जो कछु उिचत रहा सोइ क न्हा ॥ अब िबिध अस बू झअ निह तोह । संकर िबमुख जआविस मोह ॥२॥ किह न जाई कछु हृदय गलानी । मन महँु रामािह सुिमर सयानी ॥ जौ ूभु द नदयालु कहावा । आरती हरन बेद जसु गावा ॥३॥ तौ म िबनय करउँ कर जोर । छू टउ बेिग देह यह मोर ॥ ज मोरे िसव चरन सनेह । मनू बम बचन स य ॄतु एहू ॥४॥ दोहरा तौ सबदरसी सुिनअ ूभु करउ सो बेिग उपाइ । होइ मरनु जेह िबनिहं ौम दसह िबपि िबहाइ ॥ु ५९(क)॥ सोरठा जलु पय सिरस िबकाइ देखह ूीितु िक र ित भिल । िबलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुिन ॥५९(ख)॥ एिह िबिध द खत ूजेसकु मार । अकथनीय दा न दखु भार ॥ु ु बीत संबत सहस सतासी । तजी समािध संभु अिबनासी ॥१॥ राम नाम िसव सुिमरन लागे । जानेउ सतीं जगतपित जागे ॥ जाइ संभु पद बंदनु क न्ह । सनमुख संकर आसनु द न्हा ॥२॥ लगे कहन हिरकथा रसाला । द छ ूजेस भए तेिह काला ॥ देखा िबिध िबचािर सब लायक । द छिह क न्ह ूजापित नायक ॥३॥ बड़ अिधकार द छ जब पावा । अित अिभमानु हृदयँ तब आवा ॥ निहं कोउ अस जनमा जग माह ं । ूभुता पाइ जािह मद नाह ं ॥४॥ दोहरा द छ िलए मुिन बोिल सब करन लगे बड़ जाग । नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग ॥६०॥ िकं नर नाग िस गंधबा । बधुन्ह समेत चले सुर सबा ॥ िबंनु िबरंिच महेसु िबहाई । चले सकल सुर जान बनाई ॥१॥
  30. 30. रामचिरतमानस - 30 - बालकांड www.swargarohan.org सतीं िबलोके योम िबमाना । जात चले सुंदर िबिध नाना ॥ सुर सुंदर करिहं कल गाना । सुनत ौवन छू टिहं मुिन याना ॥२॥ पूछेउ तब िसवँ कहेउ बखानी । िपता ज य सुिन कछु हरषानी ॥ ज महेसु मोिह आयसु देह ं । कु छ िदन जाइ रह िमस एह ं ॥३॥ पित पिर याग हृदय दखु भार ।ु कहइ न िनज अपराध िबचार ॥ बोली सती मनोहर बानी । भय संकोच ूेम रस सानी ॥४॥ दोहरा िपता भवन उ सव परम ज ूभु आयसु होइ । तौ मै जाउँ कृ पायतन सादर देखन सोइ ॥६१॥ कहेह नीक मोरेहँ मन भावा । यह अनुिचत निहं नेवत पठावाु ु ॥ द छ सकल िनज सुता बोलाई । हमर बयर तु हउ िबसराई ॥१॥ ॄ सभाँ हम सन दखु माना । तेिह त अजहँ करिहं अपमाना ॥ु ु ज िबनु बोल जाह भवानी । रहइ नु सीलु सनेह न कानीु à

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