दर्शन सिद्धान्त
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  • 1. * दर्शन सिद्धान्त * भारतीय वैदिक दर्शन के मुख्य आधार
  • 2. विषय - सूची
    • सृष्टि - रचना के मूल तत्त्व
    • 3. परमात्मा
    • 4. जीवात्मा
    • 5. प्रकृति
    • 6. वेदों का ज्ञान
    • 7. सृष्टि के कारण
    • 8. सृष्टि - रचना 25 तत्त्व
    • 9. दर्शन शास्त्र
    • 10. दर्शनों में विवेचित विषय
    • ईश्वर स्तुति - प्रार्थना - उपासना
    • 11. स्तुति - प्रार्थना - उपासना का फल
    • 12. उपासना - योग
    • 13. उपासना कैसे करें ?
    • 14. समाधि हेतु प्राणायाम
    • 15. मोक्ष - मुक्ति
    • 16. मुक्ति का स्वरूप
    • 17. मुक्ति का समय
    • 18. मुक्ति के साधन
    • 19. मुक्ति के विशेष उपाय (1-6)
  • 20. सृष्टि - रचना के मूल तत्त्व
    • सृष्टि की यथार्थता की तात्त्विक व्याख्या के लिये ऋषियों ने तीन मूलभूत तत्त्वों का अस्तित्व स्वीकार किया है -
    1. ईश्वर - ( परमात्मा ) : अध्यात्म - चेतन तत्त्व , 2. जीव - ( आत्मा ) : अध्यात्म - चेतन तत्त्व , 3. प्रकृति - ( प्रधान ) : अधिभूत - जड़ तत्त्व .
    • सृष्टि रचना के ये तीन मूल कारण अनादि , अमूल और नित्य हैं।
    • 21. सृष्टि प्रवाह से अनादि है ; अर्थात् , सृष्टि के प्रलय और सर्ग काल , अनंत काल से आते - जाते रहे हैं : और इसी प्रकार चलते रहेंगे ।
  • 22. परमात्मा
    • अध्यात्म - चेतन तत्त्व, परम पुरुष, सबका दृष्टा.
    • 23. सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता .
    • 24. सृष्टि-रचना का मुख्य निमित्त कारण.
    • 25. प्रकृति एवं उसके विकार का प्रेरक, नियामक और अधिष्ठाता.
    • 26. जीवात्माओं को उनके अच्छे-बुरे कर्मानुसार फल देने वाला.
    • 27. सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं; उन सब का आदि मूल.
  • 28. जीवात्मा
    • अध्यात्म, चेतन तत्त्व - पुरुष; प्रकृति का एकमात्र दृष्टा व भोक्ता.
    • 29. आत्मा का स्वरूप -
      • नित्य - उत्पत्ति-विनाशहीन,अजर, अमर, अजन्मा, अनादि .
      • 30. शुद्ध - निर्विकार, पवित्र, अपरिणामी
      • 31. मुक्त - प्रकृति के सत्वरजस्तमोगुणों से सर्वथा भिन्न, निर्गुण
      • 32. बुद्ध - ज्ञान-अर्जन तथा अनुभव करने में समर्थ किंतु अल्पज्ञ.
      • 33. सक्रिय - गतिशील, लोक-लोकान्तरों गति-आगति में समर्थ
      • 34. अणु -अति सूक्ष्म, एकदेशीय
      • 35. अनेक - संख्या में अनेक किन्तु एकस्वरूप.
    • कर्ता- कर्म करने में स्वतंत्र किंतु कर्म-फल भोगने में परतंत्र.
    • 36. विश्व-रचना में जीवात्मा साधारण निमित्त कारण भी है .
  • 37. प्रकृति
    • सत्त्व , रजस् , तमस् इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति नाम से कहा जाता है।
    • 38. इसका कोई कारण न होने से इसे अलिंग या प्रधान भी कहते हैं।
    • 39. यह अधिभूत - अचेतन , जड़ तत्त्व अमूल ( इसका कोई कारण नहीं ) है।
    • 40. प्रकृति के विकार ( ये तीन गुण , विभिन्न अनुपातों में , परस्पर मिथिनीभूत होकर ) समस्त विश्व - रचना के उपादान कारण बनते हैं .
    • 41. प्रकृति से बनी सृष्टि - रचना को शास्त्रों में दृश्य कहा गया है।
    • 42. प्रकृति प्रवाह से अनादि , नित्य , किंतु परिवर्तनशील , परिणामी अर्थात् लगातार रूप बदलने वाली है।
  • 43. वेदों का ज्ञान
    • विश्व का आकल्पक , रचयिता , धारक , नियामक , संचालक , रक्षक और संहारक परमात्मा , सृष्टि के आरम्भ में ही , समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये वेदों का ज्ञान देता है।
    • 44. जैसे माता - पिता अपने संतानों पर कृपादृष्टि कर उनकी उन्नति चाहते हैं , वैसे ही परमात्मा ने सब मनुष्यों पर कृपा करके वेदों को प्रकाशित किया है ; जिससे मनुष्य अविद्यान्धकार एवं भ्रमजाल से छूटकर विद्या - विज्ञानरूप सूर्य को प्राप्तकर अत्यानन्द में रहें , और विद्या तथा सुखों की वृद्धि करते जाएँ।
    • 45. वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है . उसमें वर्णित ज्ञान नित्य है।
    • 46. चार वेद और उनमें वर्णित विषय हैं -
      • ऋग्वेद - ज्ञान काण्ड ,
      • 47. यजुर्वेद - कर्म काण्ड ,
      • 48. सामवेद - उपासना काण्ड , और
      • 49. अथर्ववेद - विज्ञान काण्ड .
  • 50. सृष्टि के कारण
    • निमित्त कारण - जिसके द्वारा बनाये जाने से ही कुछ बने , न बनाने से कुछ न बने। अपने आप स्वयं न बने , किंतु दूसरे को प्रकारांतर से बना दे . निमित्त कारण दो प्रकार के हैं -
      • मुख्य निमित्त कारण - सम्पूर्ण सृष्टि को , उपादान कारण - प्रकृति से बनाने , धारण करने और प्रलय करने ; तथा , सबकी व्यवस्था और नियंत्रण करने वाला - परमात्मा ।
      • 51. साधारण निमित्त कारण - परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेक प्रकार से नये कार्यों में बदलने वाला - जीव ।
    • उपादान कारण - जिसका उपयोग किये बिना कुछ न बने ; वही अवस्थांतर रूप होकर बने और बिगड़े भी - प्रकृति ।
    • 52. साधारण कारण - किसी वस्तु को बनाने में लगने वाले साधन - उपकरण , यंत्र , ज्ञान , बल , दर्शन , समय , ऊर्जा आदि ।
  • 53. सृष्टि - रचना के 24 अचेतन तत्त्व 1. समस्त कार्यों का मूल कारण ' प्रकृति ' ( प्रलय की अवस्था में सत्त्व, रजस्, तमस्, मूल तत्त्वों की साम्यावस्था)
    • नियंता परमात्मा की प्रेरणा ( ईक्षण ) से क्षोभ ( धुड़धुड़ी ) उत्पन्न होता है , जिससे वे तत्त्व सर्गोनुमुख हो जाते हैं . इस अवस्था को ' प्रतिभा '/ ' विद्युत ' / ' आपस '/ ' मनस् ' कहा गया है ।
    2. प्रकृति का प्रथम कार्य - ' महत् ' ( मनन करने वाला - निश्चयात्मक अथवा अध्यवसाय स्वरूप , इसी कारण इस तत्त्व का दूसरा नाम ' बुद्धि ' है। ) 3. उसके अनंतर का कार्य - ' अहंकार ' ( अभिमान वृत्ति वाला - अस्तित्व जताने वाला -' मैं हूँ ' )
  • 54. सृष्टि - रचना के 24 अचेतन तत्त्व 4. तामस अहंकार से उत्पन्न पाँच तन्मात्र या सूक्ष्मभूत - शब्द , स्पर्श , रूप , रस , गंध . 5. सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न पाँच ( बाह्य ) ज्ञानेन्द्रियाँ - श्रोत्र , त्वक , चक्षु , रसन , घ्राण . 6. सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न पाँच ( बाह्य ) कर्मेन्द्रियाँ - वाक् , पाणि , पाद , पायु , उपस्थ . 7. सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न एक आंतर इन्द्रिय - ' मन '. ( इन्द्रियाँ केवल विकार हैं , ये आगे किसी तत्त्वांतर को उत्पन्न नहीं करतीं ) 8. तन्मात्राओं वा सूक्ष्मभूत से उत्पन्न पाँच स्थूलभूत - आकाश , वायु , अग्नि , जल , पृथ्वी .
  • 55. सृष्टि - रचना के 25 तत्त्व
    • इससे अतिरिक्त पुरुष अर्थात् चेतन तत्त्व है ।
    • 56. चेतन तत्त्व दो वर्गों में विभक्त है-
      • परमात्मा - एक है ।
      • 57. जीवात्मा - अनेक अर्थात् संख्या की दृष्टि से अनन्त हैं ।
    • पृथिवी आदि स्थूल तत्त्व इन्द्रियगोचर हैं । अन्य सूक्ष्म, सूक्ष्मतर तत्त्वों का ग्रहण इन्द्रियों से नहीं होता।
    • 58. इनमें मूल प्रकृति केवल उपादान, तथा महत् आदि तेईस पदार्थ उसके विकार हैं । ये चौबीस अचेतन जगत हैं ।
    • 59. इसप्रकार चौबीस अचेतन और पच्चीसवां पुरुष चेतन है ।
    • 60. ये हैं वे समस्त तत्त्व जिनके वास्तविक स्वरूप को पहिचान कर चेतन तथा अचेतन के भेद का साक्षात्कार करना होता है आत्म-ज्ञान के लिये ।
  • 61. दर्शन शास्त्र
    • भारतीय दर्शन शास्त्रों, उनके आधारभूत वेद, तथा अन्य वैदिक साहित्य- उपनिषदों, स्मृतियों आदि में इन तत्त्वों का विषद विवेचन है-
      • पदार्थों की उपपत्ति (सिद्धि) के लिये प्रमाण, तर्क आदि.
      • 62. भौतिक, रसायन, तत्त्वों की रचना और उनके गुण आदि.
      • 63. सृष्टि-रचना के मूल कारण- ईश्वर, जीव, प्रकृति.
      • 64. जीव में स्थित बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की रचना और कार्य-प्रचालन .
      • 65. समाधि प्राप्त करने की विधि.
      • 66. बन्ध, मोक्ष और मोक्ष प्राप्ति के उपाय.
      • 67. जीवनयापन की शैली, यज्ञ आदि कर्म करने की विधि.
  • 68. दर्शन शास्त्रों के विषय दर्शन शास्त्र रचयिता
      • न्याय गोतम मुनि.
      • 69. वैशेषिक कणाद मुनि.
      • 70. सांख्य कपिल मुनि.
      • 71. योग पतंजलि मुनि.
      • 72. पूर्वमीमांसा जैमिनि मुनि.
      • 73. उत्तर मीमांसा व्यास मुनि. (वेदांत अथवा ब्रह्म सूत्र )
    विवेचित विषय प्रमाण , उपपत्ति , तर्क विज्ञान भौतिक - रसायन विज्ञान मोक्ष एवं सृष्टि - रचना विज्ञान समाधि - प्राप्ति विज्ञान यज्ञ - कर्म विज्ञान ब्रह्म ( ईश्वर ) विज्ञान
  • 74. ईश्वर स्तुति - प्रार्थना - उपासना स्तुति से ईश्वर में प्रीति , उसके गुण , कर्म , स्वभाव से अपने गुण , कर्म , स्वभाव का सुधरना होता है। * प्रार्थना से निरभिमानता , उत्साह और सहाय मिलता है। * उपासना से परब्रह्म से मेल और उसका साक्षात्कार होता है। ***
    • जिस परमात्मा ने इस जगत् के सब पदार्थ जीवों के सुख के लिये दे रक्खे हैं , उसका गुण भूल जाना , ईश्वर को ही न मानना , कृतघ्नता और मूर्खता है।
    • 75. इसलिये जो परमेश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना नहीं करता वह कृतघ्न और महामूर्ख भी होता है ,
  • 76. उपासना - योग - 1 समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयन्तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥ - यह मैत्रायणीय उपनिषत् का वचन है। जिस पुरुष के समाधियोग से अविद्यादि मल नष्ट होगये हैं , आत्मस्थ होकर परमात्मा में चित्त जिसने लगाया है , उसको जो परमात्मा के योग का सुख होता है - वह वाणी से कहा नहीं जासकता ; क्योंकि , उस आनन्द को जीवात्मा अपने अंतःकरण से ग्रहण करता है।
    • सर्वज्ञादि गुणों के साथ परमेश्वर की उपासना करनी सगुणोपासना ; कहलाती है ।
    • 77. द्वेष , रूप , रस , गन्ध , स्पर्शादि गुणों से पृथक् मान , अतिसूक्ष्म आत्मा के भीतर - बाहर व्यापक परमेश्वर में दृढ़ स्थित होजाना निर्गुणोपासना कहलाती है।
    • 78. उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है। अष्टांग [ यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , समाधि ] योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उसको सर्वव्यापी , सर्वान्तर्यामिरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो - जो काम करना होता है , वह - वह सब करना चाहिये।
  • 79. उपासना - योग – 2 तत्र अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रहा यमाः ॥ [ योग सूत्र साधनपाद सू .30]
    • जो उपासना का आरम्भ करना चाहे उसके लिये यही आरम्भ है कि वह
      • किसी से वैर न रक्खे ,
      • 80. सर्वदा सब से प्रीति रक्खे ,
      • 81. मिथ्या कभी न बोले ,
      • 82. चोरी न करे ,
      • 83. सत्य व्यवहार करे ,
      • 84. जितेन्द्रिय हो ,
      • 85. लम्पट न हो ,
      • 86. निरभिमानी हो ,
      • 87. अभिमान कभी न करे
      • 88. अनावश्यक संग्रह न करे ।
    • ये पाँच प्रकार के यम मिल के उपासना योग का प्रथम अंग है ।
  • 89. उपासना - योग - 3 शौच संतोष तपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ [ योग सूत्र साधनपाद । सू . 32 ]
    • उपासनायोग के दूसरे अंग में पाँच प्रकार के नियम हैं -
      • राग - द्वेष छोढ कर भीतर से और
      • 90. जलादि से बाहर से पवित्र रहे ,
      • 91. प्रसन्न होकर आलस्य छोढ सदा पुरुषार्थ किया करे ,
      • 92. धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे ,
      • 93. सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे , अधर्म का नहीं ,
      • 94. सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढे - पढाये
      • 95. सत्पुरुषों का संग करे ,
      • 96. ' ओ 3 म् ' इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार कर नित्य - प्रति लप किया करे ; और
      • 97. अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे ।
  • 98. उपासना कैसे करें ?
    • जब उपासना करना चाहें तब
      • एकांत शुद्ध देश में जाकर , आसन लगा ,
      • 99. प्राणायाम कर ,
      • 100. बाह्य विषयों से इन्द्रियों को रोक [ प्रत्याहार ],
      • 101. मन को नाभिप्रदेश में वा हृदय , कण्ठ , नेत्र , शिखा अथवा पीठ के मध्य हाड़ में किसी स्थान पर स्थिर [ धारणा ] कर ,
      • 102. अपने आत्मा और परमात्मा का विवेचन [ ध्यान ] करके ,
      • 103. परमात्मा में मग्न [ समाधिस्थ ] होकर संयमी होवें।
  • 104. स्तुति - प्रार्थना - उपासना का फल
    • पुरुष जब इन साधनों को करता है , तब
      • उसका आत्मा और अंतःकरण पवित्र होकर सत्य से पूर्ण होजाता है।
      • 105. नित्यप्रति ज्ञान - विज्ञान बढ़ाकर मुक्ति तक पहुँच जाता है।
    • जैसे शीत से आतुर पुरुष का अग्नि के पास जाने से शीत निवृत्त होजाता है ; वैसे ही परमेश्वर के समीप प्राप्त होने से सब दोष - दुःख छूटकर परमेश्वर के गुण , कर्म , स्वभाव के सदृश जीवात्मा के गुण , कर्म , स्वभाव पवित्र हो जाते हैं।
    • 106. इससे अतिरिक्त आत्मा का बल इतना बढ़ेगा कि वह पर्वत के समान दुःख प्राप्त होने पर भी न घबरावेगा और सबको सहन कर सकेगा। यह बहुत बड़ी बात है।
    • 107. इसलिये परमेश्वर की स्तुति - प्रार्थना और उपासना अवश्य करनी चाहिये।
    जो आठ प्रहर ( चौबीस घण्टे ) में एक घड़ी ( चौबीस मिनट ) भर भी इसप्रकार ध्यान करता है वह सदा उन्नति को प्राप्त होता जाता है। *** महर्षि दयानन्द सरस्वती रचित सत्यार्थ प्रकाश से
  • 108. प्राण
    • आत्मा के ज्ञान और कर्म के लिये साधनरूप
      • दस बाह्यकरण - पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों ; तथा ,
      • 109. चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार
    • इनके व्यापार को सुचारु रूप से चलाने के लिये शरीर में अनेक अंतः प्रणालियाँ कार्य कर रही है जिसका साधारण मनुष्य को भान नहीं होता।
    • 110. ये प्रणालियाँ हैं - श्वसन , रक्तसंचार , भोजनपाचन , मलोत्सर्जन , जीवोत्पादन , शरीररक्षण , स्नायुतन्त्र इत्यादि।
    • 111. इन प्रणालियों के बिना ये साधन कार्य नहीं कर सकते।
    • 112. शरीर की तत्कालिक स्थिति के अनुसार ये सभी प्रणालियाँ मस्तिष्क के नियंत्रण में , आपस में संचार व समन्वय रखते हुये , चौबीसों घण्टे कार्य करती रहती हैं।
    • 113. इन सभी प्रणालियों को जो संस्थान चला रहा है वह प्राण है जो कि प्राणमय कोश मे स्थित है ; और , स्थूल शरीर के अन्नमय कोश से सूक्ष्मतर है।
    • 114. शरीर के विभिन्न कार्यक्षेत्रों के अनुसार प्राणमय कोश में
      • पाँच प्राण हैं - प्राण , अपान , व्यान , समान , उदान और
      • 115. पाँच उपप्राण हैं - नाग , कूर्म , कृंकल , देवदत्त , धनञ्जय
  • 116. प्राण - जीवन का आधार
    • शरीर में स्थित विभिन्न आंतर - प्रणालियों को चलाने हेतु परमावश्यक है -
      • उन तक उनका भोजन व शुद्ध वायु - आक्सीजन का पहुँचना ; और ,
      • 117. विषैले पदार्थॉं यथा कार्बनडाइआक्साइड का बाहर निकलना।
    • श्वसन ( फेफड़े ) और रक्त - संचार ( हृदय ) प्रणाली द्वारा यह कार्य निरन्तर चलने वाली श्वास - प्रश्वास क्रिया से सम्पन्न होता है।
    • 118. यह तथ्य है कि यदि मानव मस्तिष्क को कुछ (2-3) मिनटों तक शुद्ध आक्सीजन युक्त प्राण वायु न मिले तो मस्तिष्क कार्य करना बन्द कर देगा।
    • 119. इससे विभिन्न प्रणालियों का आपसी तालमेल और उनका नियंत्रण समाप्त हो जाने से उसकी मृत्यु हो जासकती है ।
    • 120. मस्तिष्क ( स्नायु ) प्रणाली ही अन्य सारी प्रणालियों का प्रेरक , नियामक और संचालक है।
    • 121. सामान्यतः मनुष्य जब तक श्वास - प्रश्वास लेता रहता है अर्थात् जब तक शरीर में प्राण रहता है , तभी तक जीवन रहता है।
    • 122. अतः यह कहा जा सकता है कि प्राणमय कोश को स्वस्थ रखना मनुष्य जीवन के लिये अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है ; और , प्राण ही जीवन का आधार है।
  • 123. प्राणायाम
    • स्वरूप -
      • तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोः गति विच्छेदः प्राणायामः ॥ योगशास्त्र [2/49]
    श्वास - प्रश्वास में - सांस के लेने - छोड़ने में सामान्य क्रम और गति को रोक देना अथवा अंतर डाल देना प्राणायाम कहा जाता है।
    • उद्देश्य -
      • प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥ योगशास्त्र [1/34]
    प्राणमय कोश को स्वस्थ रखने के लिये और चित्त की एकाग्रता के लिये जो क्रिया अपनायी जाती है वह प्राणायाम है।
    • चार भेद -
      • बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥ योगशास्त्र [ 2/50]
      • 124. बाह्याभ्यंतरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥ योगशास्त्र [2/51]
    1. बाह्यवृत्ति - रेचक - वायु को बाहर निकालना ; 2. आभ्यंतरवृत्ति - पूरक - वायु को अन्दर लेना ; 3. स्तम्भवृत्ति - कुम्भक - वायु को जहाँ का तहाँ रोक देना ; 4. ' शुद्ध कुम्भक ' अथवा ' केवल कुम्भक ' जो बाह्य और आभ्यंतर को दूर रखता है , । .
    • परिमाण - देश , काल और संख्या द्वारा नापे जाने वाला दीर्घ और सूक्ष्म ( लम्बा व हल्का ) होता है।
  • 125. प्राणायाम के अनुष्ठान का फल
    • दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।
    तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ मनुस्मृति [6/71] जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर वे शुद्ध होते हैं , वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर इन्द्रियाँ निर्मल हो जाती हैं।
    • योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ योगशास्त्र [2/28]
    जब मनुष्य योगांगों ( प्राणायाम ) को करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और आत्मा में ज्ञान का प्रकाश निरंतर बढ़ता जाता है , जब तक कि विवेकख्याति ( होकर मुक्ति ) न हो जाय।
    • ततः क्षीयन्ते प्रकाशावरणम् ॥ योगशास्त्र [2/52]
    प्राणायाम के निरंतर अभ्यास व अनुष्ठान से प्रकाश ( आत्मसाक्षात्कार रूप विवेकज्ञान का ] का परदा दुर्बल व शिथिल हो जाता है।
    • धारणासु च योग्यता मनसः ॥ योगशास्त्र [2/53]
    प्राणायाम के अभ्यास से धारणा आदि योगांगों के सुविधापूर्वक अनुष्ठान में मन की क्षमता उभर आती है।
  • 126. समाधि हेतु प्राणायाम
  • 127. मोक्ष - मुक्ति
    • मानव जीवन का परम लक्ष्य अपवर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति है। .
      • ' मुञ्चन्ति पृथग्भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः '
    वह अवस्था जिसमें जीव सभी प्रकार के दु : खों और बन्धनों से छूटकर आनन्द को प्राप्त करते हैं - मोक्ष अथवा मुक्ति है ।
    • जीव का बन्धन में पड़ने का कारण अविद्या है।
    • 128. जो दुष्ट अर्थात् विपरीत ज्ञान है उसको अविद्या कहते हैं।
    • 129. इन्द्रियों और संस्कार के दोष से अविद्या उत्पन्न होती है।
    • 130. जो अदुष्ट अर्थात् यथार्थ ज्ञान है उसको विद्या कहते हैं।
    • 131. संसार में जीव सुख और दुःख से सदा ग्रस्त रहता है , क्योंकि शरीर सहित जीव की सांसारिक प्रसन्नता सदा नहीं रहती , उसकी निवृत्ति होती ही है |
    • 132. जो शरीररहित मुक्त जीवात्मा ब्रह्म में रहता है उसको सांसारिक सुख - दुःख का स्पर्श भी नहीं होता , किन्तु वह सदा आनन्द में रहता है।
  • 133. मुक्ति का स्वरूप
    • मुक्ति में जीव का लय अथवा नाश नहीं होता। जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है , उसी में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उसको कहीं कोई रुकावट नहीं ; विज्ञान व आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है।
    • 134. मोक्ष में भौतिक शरीर या इन्द्रियों के गोलक जीवात्माओं के साथ नहीं रहते , किंतु उसके अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण और सामर्थ्य रहते हैं।
    • 135. जैसे शरीर के आधार रहकर इन्द्रियों के गोलक द्वारा जीव स्वकार्य करता है , वैसे अपनी शक्ति से मुक्ति में जीव सब आनन्द भोग लेता है।
    • 136. जीव में मुख्य एक प्रकार की शक्ति है , परंतु उसमें निम्न चौबीस प्रकार के सामर्थ्य हैं जिनसे जीव मुक्ति में भी आनन्द का भोग करता है -
      • बल , पराक्रम , आकर्षण , प्रेरणा , गति , भीषण , विवेचन , क्रिया , उत्साह , स्मरण , निश्चय , इच्छा , प्रेम , द्वेष , संयोग , विभाग , संयोजक , विभाजक , श्रवण , स्पर्शन , दर्शन , स्वादन , गन्धग्रहण और ज्ञान ।
  • 137. मुक्ति का काल
    • मुक्ति अनंत काल के लिये नहीं होती ; क्योंकि , प्रथम तो जीव का सामर्थ्य शरीरादि पदार्थ और साधन परिमित हैं , पुनः उसका फल अनंत कैसे हो सकता है ! अनंत आनन्द को भोगने का असीम सामर्थ्य , कर्म और साधन भी जीवों में नहीं। इसलिये वे अनंत आनन्द नहीं भोग सकते।
    • 138. जीव मुक्ति में प्राप्त होकर ब्रह्म में आनन्द को परांतकाल तक भोगकर पुनः महाकल्प के पश्चात् मुक्तिसुख को छोड़कर संसार में आते हैं। परान्त काल -
      • तेंतालीस लाख बीस हज़ार पृथ्वी वर्षों की एक चतुर्युगी ,
      • 139. एक हज़ार चतुर्युगी का उत्पत्ति काल = 4 अरब 32 करोड़ वर्ष
      • 140. एक हज़ार चतुर्युगी का प्रलय काल = 4 अरब 32 करोड़ वर्ष
      • 141. एक अहोरात्र = एक सृष्टिकाल = उत्पत्ति + प्रलय काल
      • 142. = दो हज़ार चतुर्युगी = 8 अरब 64 करोड़ वर्ष का
      • 143. ऐसे तीस अहोरात्रों का एक महीना ,
      • 144. ऐसे बारह महीनों का एक वर्ष ,
      • 145. ऐसे सौ वर्षों का एक परांतकाल (30 X12X100=36000 अहोरात्रि ) होता है।
    = 36,000 बार [ सृष्टि ( उत्पत्ति + प्रलय ) काल ] = [36,000X आठ अरब चौंसठ करोड़ वर्ष ] मुक्ति का समय है।
    • परमात्मा जीव को मुक्ति में आनन्द भुगाकर पृथिवी में पुनः माता - पिता के सम्बन्ध में जन्म देकर माता - पिता का दर्शन कराता है।
  • 146. Calculation reg. Creation मानव - सृष्टि - रचना - गणना
    • One Chaturyugee (CY) ( group of four eons) consists of -
      • 1 Sata -yuga (SY) (4XKY) = 1,728,000 yrs.
      • 147. 1 Tretaa -yuga (TY) (3XKY) = 1,296,000 yrs.
      • 148. 1 Dvaapara -yuga (DY) (2XKY) = 864,000 yrs.
      • 149. 1 Kali-yuga (KY) = 432,000 yrs.
      • 150. ----------------------------------------------------------------------------------
      • 151. 1 Chaturyugee Period (CY)(10XKY) = 4,320,000 yrs.( 4.32 m yrs)
      • 152. ----------------------------------------------------------------------------------
    • One Manvantara (MN) = 71 Chaturygee
                    • = 71 x 4.32 m yrs.
                    • 153. = 306.32 m yrs
    • One SriShTi Kaal (Duration of Creation) = 14 MN + Transit Period Of 6 CY
                    • = (14X71 + 6) = 994+6 = 1,000 CY
                    • 154. = 1,000 X 4,32 m Yrs.
                    • 155. = 4,32 billion Yrs
    • One Pralay Kaal ( Dessolved Duration) = SriShTi Kaal
                    • = 4.32 b Yrs.
    • One Ahoraatra (1 SriShTi + 1 Pralay)
                    • = 8.64 b Yrs.
  • 156. Time Elapsed since this Human Creation मानव - सृष्टि - रचना में बीता समय
    • Since the present Creation
      • 6 manvantars have passed. We are at present in 7th manvantar.( Vaivaswat)
      • 157. In th on going 7 th Manvantar, 27 chaturyugees have passed .
      • 158. In the present 28 th chaturyugee, three yugas- satayug, dvaapar yug, and tretaa yug- have passed.
      • 159. Now we are in 1 st phase of Kaliyug, of which 5109 years have passed .
    • Time Elapsed since Present Creation-
      • = 6 MN +27 CY +( SY +DY+TY +5,109 yrs of KY) in 28 th CY
      • 160. = (6X71+27) CY+ 9KY+ 5,109Y = (426+27)CY+9KY +5,109
      • 161. = 453X4,320,000+9X432,000+5,109
      • 162. = 1,956,960,000+3,888,000+5109 = 1,960,853,109 Yrs~ 1.96 bY
    • Time remaining in present creation-
      • = 4,320,000,000- 1,960,853,109 = 2,359,146,891Yrs.~ 2.36 bY
    • This Period of Liberated soul ( Moksha)- Parant Kaal, Quite a long Period !!!
      • =100 Brahm varSh= 100X 12X30 Ahoratra= 36,000X (Brahm din+ Ratri)
      • 163. = 36,000X8.64 b Yrs
  • 164. मुक्ति के साधन
    • कोई भी मनुष्य क्षणमात्र भी कर्म , उपासना और ज्ञान से रहित नहीं होता। इसलिये
      • धर्मयुक्त सत्यभाषण आदि कर्म करना और मिथ्याभाषण आदि अधर्म को छोड़ देना ही मुक्ति का साधन है -
        • परमेश्वर की आज्ञा पालन करने ;
        • 165. अधर्म , अविद्या , कुसंग , कुसंस्कार , बुरे व्यसनों से अलग रहने ;
        • 166. सत्यभाषण , परोपकार , विद्या , पक्षपात - रहित न्याय , धर्म की वृद्धि करने ;
        • 167. परमेश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करने ;
        • 168. विद्या पढ़ने - पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करने ;
        • 169. सबसे उत्तम साधनों को करने ; और ,
        • 170. जो कुछ करे - वह सब पक्षपातरहित न्यायधर्मानुसार ही करे -
    इत्यादि साधनों से मुक्ति होती है ।
      • इनसे विपरीत ईश्वराज्ञाभंग करने आदि काम से बन्ध होता है।
    * मुमुक्षु नित्यप्रति न्यून से न्यून दो घण्टा पर्यन्त परमात्मा का ध्यान अवश्य करें।
  • 171. मुक्ति के विशेष उपाय (1)
    • जो मुक्ति चाहे वह जीवन्मुक्त बने ; अर्थात् जिन मिथ्याभाषणादि पापकर्मों का फल दुःख है , उनको छोड़कर सुखरूप फल को देनेवाले सत्यभाषणादि धर्माचरण अवश्य करे ; क्योंकि ,
    दुःख का पापाचरण , और सुख का धर्माचरण , मूल कारण है।
    • 1. विवेक -
      • सत्पुरुषों के संग से विवेक अर्थात् सत्यासत्य , धर्माधर्म , कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निश्चय अवश्य करें।
      • 172. जड़ और चेतन में भेद को समझें।
      • 173. शरीर की रचना और उसकी कार्य प्रणालियों को विस्तार से जानें -
        • शरीर की कार्यप्रणाली -
          • पञ्चकोशों [ अन्नमय , प्राणमय , मनोमय , विज्ञानमय , आनन्दमय ] जिनसे जीव सब प्रकार के कर्म , उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है , को जानें और उनका विवेचन करें।
        • शरीर की रचना -
          • [ स्थूल , सूक्ष्म , कारण , भौतिक , अभौतिक या स्वाभाविक , तुरीय ] की रचना को जानें और उनका विवेचन करें।
        • शरीर की अवस्थाओं -
          • [ जागृत , स्वप्न , सुषुप्ति ] को जानें और उनका विवेचन करें।
  • 174. मुक्ति के विशेष उपाय (2)
      • जीव - शरीर में भेद -
        • इन सब शरीर , कोष , अवस्थाओं से जीव पृथक् है ; क्योंकि , जब मृत्यु होता है तब सब कहते हैं कि जीव निकल गया।
        • 175. यही जीव सबका प्रेरक , सब का धर्त्ता , साक्षी , कर्त्ता - भोक्ता कहाता है।
        • 176. जो कोई ऐसा कहे कि ' जीव कर्त्ता - भोक्ता नहीं ', तो उसे अज्ञानी , अविवेकी मानना चाहिये ; क्योंकि , विना जीव के ये शरीर आदि सब जड़ पदार्थ हैं ; इसलिए , इनको सुख - दुःख का भोग अथवा पाप - पुण्य कर्तृत्व कभी नहीं हो सकता।
      • परमात्मा की शिक्षा -
        • जब इन्द्रियाँ अर्थों में , मन इन्द्रियों में और आत्मा मन के साथ संयुक्त होकर प्राणों को प्रेरणा करके अच्छे वा बुरे कर्मों में लगाता है , तभी वह बहिर्मुख होजाता है।
        • 177. उसी समय , अच्छे कर्मों में भीतर से आनन्द , उत्साह , निर्भयता ; और , बुरे कर्मों में भय , शंका , लज्जा उत्पन्न होती है। यह अंतर्यामी परमात्मा की शिक्षा है।
        • 178. जो कोई इस शिक्षा के अनुकूल वर्तता है वही मुक्तिजन्य सुखों को प्राप्त होता है ; और , जो विपरीत वर्तता है वह बन्धजन्य दुःख भोगता है।
  • 179. मुक्ति के विशेष उपाय (3)
    • 2. वैराग्य -
      • सत्पुरुषों के संग से प्राप्त विवेक से सत्यासत्य को जानकर उसमें से
        • सत्याचरण का ग्रहण और असत्याचरण का त्याग करना ; और ,
        • 180. पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के गुण , कर्म , स्वभाव जानकर
        • 181. उसकी आज्ञा - पालन और उपासना में तत्पर होना ,
        • 182. उसके विरुद्ध न चलना , सृष्टि से उपकार लेना वैराग्य है।
    • 3. षट्क सम्पत्ति -
      • छह प्रकार के कर्म करना -
        • शम - अपने आत्मा और अंतःकरण को अधर्माचरण से हटाकर धर्माचरण में सदा प्रवृत्त रखना।
        • 183. दम - श्रोत्रादि इन्द्रियों और शरीर को व्यभिचारादि बुरे कर्मों से हटा कर जितेन्द्रियत्वादि शुभ कर्मों में प्रवृत्त रखना।
        • 184. उपरति - दुष्ट कर्म करनेवालों से सदा दूर रहना।
        • 185. तितिक्षा - निन्दा , स्तुति , हानि , लाभ चाहे कितना ही क्यों न हो ; परन्तु , हर्ष - शोक को छोड़ कर मुक्ति - साधनों में सदा लगे रहना।
        • 186. श्रद्धा - वेदादि सत्य शास्त्र और इनके बोध से पूर्ण आप्त विद्वान सत्योपदेष्टा महाशयों के वचनों पर विश्वास करना।
        • 187. समाधान - चित्त की एकाग्रता रखना।
  • 188. मुक्ति के विशेष उपाय (4)
    • 4. मुमुक्षुत्व -
      • जैसे क्षुधा - तृषातुर को सिवाय अन्न - जल के दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता , वैसे ही मुमुक्षु का मुक्ति और मुक्ति के साधनों के अतिरिक्त अन्य किसी विषय में प्रीति न होना।
    • 5. अनुबन्ध –
      • चार साधनों के पश्चात् किये जाने वाले कर्म अनुबन्ध कहाते हैं। ये चार अनुबन्ध हैं -
        • अधिकारी - चार साधनों से युक्त पुरुष अधिकारी होता है ,
        • 189. सम्बन्ध - ब्रह्म की प्राप्तिरूप प्रतिपाद्य , और वेदादि शास्त्र प्रतिपादक को यथावत् समझकर अन्वित करना ,
        • 190. विषयी - सब शास्त्रों का प्रतिपादन विषय ब्रह्म , उसकी प्राप्तिरूप विषयवाले पुरुष का नाम विषयी है , और
        • 191. प्रयोजन - सब दुःखों की निवृत्ति और परमानन्द को प्राप्त होकर मुक्ति सुख का होना।
  • 192. मुक्ति के विशेष उपाय (5)
    • 5. श्रवणचतुष्टय -
      • सुन कर ज्ञानप्राप्त करने के लिये निम्न चार विभिन्न प्रक्रियाओं का पालन करें -
      • श्रवण -
        • जब कोई विद्वान उपदेश करे तब शांत रहना और ध्यान देकर सुनना। विशेष ब्रह्मविद्या सुनने में अत्यंत ध्यान देना चाहिये क्योंकि यह सब विद्याओं में सूक्ष्म विद्या है।
      • मनन -
        • सुनकर एकांत देश में बैठकर सुने हुए का विचार करना। जिस बात में शंका हो उसे पुनः पूछना।
        • 193. उपदेश सुनने के समय भी वक्ता और श्रोता उचित समझें तो पूछना और शंकाओं का समाधान करना।
      • निदिध्यासन -
        • जब सुनने और मनन करने से निस्सन्देह हो जाय तब समाधिस्थ होकर उस बात को देखना , समझना कि वह जैसा सुना था , विचार था , वैसा ही है वा नहीं ? इसे ध्यानयोग से देखना।
      • साक्षात्कार -
        • जैसा पदार्थ का स्वरूप , गुण और स्वभाव हो वैसा यथातथ्य जान लेना।
  • 194. मुक्ति के विशेष उपाय (6)
    • 6. स्थिरता -
      • सदा तमोगुण अर्थात् क्रोध , मलीनता , आलस्य , प्रमाद आदि ; और रजोगुण अर्थात् ईर्ष्या , द्वेष , काम , अभिमान , विक्षेप आदि दोषों से अलग होकर
      • 195. सत्त्व अर्थात् शांत प्रकृति , पवित्रता , विद्या , सुविचार आदि गुणों को धारण करे।
      • 196. इससे चित्त स्थिर और एकाग्र बनता है।
    • 7. प्रसन्नता -
      • चित्त को सदा प्रसन्न रखने के लिये विभिन्न प्रकार के व्यक्तिओं से संसर्ग होने पर मन में निम्न प्रकार के भाव रक्खे -
        • मैत्री - सुखी जनों के साथ मित्रता रखना ;
        • 197. करुणा - दुःखी जनों पर दया करना ;
        • 198. मुदिता - पुण्यात्माओं से मिल कर हर्षित होना ;
        • 199. उपेक्षा - दुष्टात्माओं में न प्रीति करना , न वैर करना ।
    • 8. योगाभ्यास -
      • श्रद्धा पूर्वक , निरन्तरता से , दीर्घकाल तक योगाभ्यास करके अविद्या आदि पाँच क्लेशों को छुड़ा कर , ब्रह्म को प्राप्त होकर , मुक्ति के परमानन्द को भोगना चाहिये।
    * * *
  • 200. पञ्चकोश और सूक्ष्मशरीर