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Gurutva jyotish mar 2012
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Hindu Festivals, Panchang,Calander,Indian Hindu Calendar 2012. India Festival Calendar 2012, Festivals of India 2012. Calendar of Indian festivals in 2012. Know about Hindu festivals, Indian rituals, Indian Festival calendar for 2012. Festivals of India What are the scientific method of calculating calendar?, Vikrama era, did the origin of calendar age?, In ancient times used to calculate the calendar?, The history of the Vedic calendar? Calendar and Almanac What are the differences? Almanac of the original base, different regions of the country early in the new year, astrology Anushar good - the effects of bad moment?, Bhadra, thoughts, ideas Dishasul, Dishasul important, or duty is important, the glory of satsang, March 21 - 2012, National (Shaliwahn) doubt Snwant 1934 began, 23 March - the 2012 Vikram Samwatsr (Chandrawars) 2069 began, 14 April - the 2012 Bengali New Year 1419 began, 16 April - 2012, Srivllb Snwant 535 starts, 26 April - 2012, proto-Shankar Snwant early 2519, May 2 - 2012, Srihit Snwant start 539, May 6 - 2012, Buddha Parinirvana Snwant early 2556, 2 June - 2012, Shivraj doubt start Snwant 339, 3 July - 2012, Methil years beginning in 1420, 1 October - 2012 crop year beginning 1420, November 14 - 2012, Buddha Parinirvana Snwant early 2556, November 14 - 2012, Nepalese Snwant early 1133, November 14 - 2012, Gujarati Samwatsr early 2069, November 16 - 2012, Islamic Hijri year (Musl) starting 1434, 15, beasts - 2012, Pongal (Tamil New Year), 23, March - 2012, Ugadi (Andhra Pradesh), 23, March - 2012, Goody Padava (Maharashtra), 24, March - 2012 - Teal moon (Sindhis) 13, April - 2012, Vishu (Tamil New Year), 14, April - 2012, Chieti Vishu (Kerala year), 14, April - 2012, Rongali Bihu (Assam)


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  • 1. Font Help >> http://gurutvajyotish.blogspot.comगुरुत्व कार्ाालर् द्वारा प्रस्तुत मासिक ई-पत्रिका मार्ा- 2012 NON PROFIT PUBLICATION .
  • 2. FREE E CIRCULAR गुरुत्व ज्र्ोसतष पत्रिका मार्ा 2012िंपादक सर्ंतन जोशी गुरुत्व ज्र्ोसतष त्रवभागिंपका गुरुत्व कार्ाालर् 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIAफोन 91+9338213418, 91+9238328785, gurutva.karyalay@gmail.com,ईमेल gurutva_karyalay@yahoo.in, http://gk.yolasite.com/वेब http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/पत्रिका प्रस्तुसत सर्ंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशीफोटो ग्राफफक्ि सर्ंतन जोशी, स्वस्स्तक आटाहमारे मुख्र् िहर्ोगी स्वस्स्तक.ऎन.जोशी (स्वस्स्तक िोफ्टे क इस्डिर्ा सल) ई- जडम पत्रिका E HOROSCOPE अत्र्ाधुसनक ज्र्ोसतष पद्धसत द्वारा Create By Advanced उत्कृ ष्ट भत्रवष्र्वाणी क िाथ े Astrology Excellent Prediction १००+ पेज मं प्रस्तुत 100+ Pages फहं दी/ English मं मूल्र् माि 750/- GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  • 3. अनुक्रम पंर्ांग त्रवशेष पंर्ांग गणना की वैज्ञासनक पद्धसत क्र्ा हं ? 6 दे श क त्रवसभडन प्रांतो मं नववषा का प्रारं भ े 25 कलेण्िर र्ुग की उत्पत्रि कब हुई ? ै 13 ज्र्ोसतष क अनुशार शुभ-अशुभ मुहूता का प्रभाव? े 26 पौरास्णक काल मं पंर्ांग गणना किे होती थी? ै 15 भद्रा त्रवर्ार 28 वैफदक पंर्ांग का इसतहाि? 18 फदशाशूल त्रवर्ार 31 कलंिर व पंर्ांग मं क्र्ा अंतर हं ? ै 21 फदशाशूल महत्वपूणा र्ा कताव्र् महत्वपूणा है ? 32 पंर्ांग का मूल आधार? 24 ितिंग की मफहमा 33 नवराि त्रवशेष नव िंवत्िर का पररर्र् 35 भवाडर्ष्टकम ् 48 त्रवश्वाविु िंवत्िर मं जडम लेने वालं का भत्रवष्र् 36 क्षमा-प्राथाना 48 फल र्ैि नवराि मं नवदगाा आराधना त्रवशेष फलदार्ी ु 37 दगााष्टोिर शतनाम स्तोिम ् ु 49 र्ैि नवराि व्रत त्रवशेष लाभदार्ी होता हं । 39 त्रवश्वंभरी स्तुसत 50 किे करे नवराि व्रत ? ै 42 मफहषािुरमफदासनस्तोिम ् 51 नवराि मं दे वी उपािना िे मनोकामना पूसता 43 दवाा पूजन मं रखे िावधासनर्ां ु 53 िप्तश्र्ललोकी दगाा ु 44 श्रीदगााअष्टोिर शतनाम पूजन ु 54 दगाा आरती ु 44 परशुराम कृ त श्रीदगाास्तोि ु 57 दगाा र्ालीिा ु 45 श्री दगाा कवर्म ् (रुद्रर्ामलोक्त) ु 61 श्रीकृ ष्ण कृ त दे वी स्तुसत 46 श्री माकण्िे र् कृ त लघु दगाा िप्तशती स्तोिम ् ा ु 62 ऋग्वेदोक्त दे वी िूक्तम ् 46 नव दगाा स्तुसत ु 63 सिद्धकस्जकास्तोिम ् ुं 47 नवदगाा रक्षामंि ु 63 दगााष्टकम ् ु 47 हमारे उत्पाद दगाा बीिा र्ंि ु 14 मंि सिद्ध दै वी र्ंि िूसर् 38 भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी 56 पढा़ई िंबंसधत िमस्र्ा 79मंगल र्ंि िे ऋणमुत्रक्त 20 मंिसिद्ध लक्ष्मी र्ंििूसर् 38 नवरत्न जफित श्री र्ंि 64 िवा रोगनाशक र्ंि/ 84 द्वादश महा र्ंि 23 मंि सिद्ध दलभ िामग्री 43 िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् ु ा 65 मंि सिद्ध कवर् 86मंिसिद्ध स्फफटक श्रीर्ंि 27 दस्क्षणावसता शंख 40 जैन धमाक त्रवसशष्ट र्ंि े 66 YANTRA 87 शसन पीिा सनवारक र्ंि 32 रासश रत्न 41 अमोद्य महामृत्र्ुंजर् कवर् 68 GEMS STONE 89 मंि सिद्ध रूद्राक्ष 34 कनकधारा र्ंि 53 राशी रत्न एवं उपरत्न 68 घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि 67 मंि सिद्ध िामग्री- 24, 31 77, स्थार्ी और अडर् लेख िंपादकीर् 4 दै सनक शुभ एवं अशुभ िमर् ज्ञान तासलका 80 मार्ा मासिक रासश फल 69 फदन-रात क र्ौघफिर्े े 81 मार्ा 2012 मासिक पंर्ांग 73 फदन-रात फक होरा - िूर्ोदर् िे िूर्ाास्त तक 82 मार्ा 2012 मासिक व्रत-पवा-त्र्ौहार 75 ग्रह र्लन मार्ा-2012 83 मार्ा 2012 -त्रवशेष र्ोग 80 हमारा उद्दे श्र् 90
  • 4. GURUTVA KARYALAY िंपादकीर् त्रप्रर् आस्त्मर् बंधु/ बफहन जर् गुरुदे व आज िमाज मं हर क्षेि मं पस्िमी िंस्कृ सत का प्रभाव असधक तीव्र होता जा रहा हं । ऐिा नहीं हं , फक सिफा भारतीर् लोग अपनी िंस्कृ सत एवं परं परा िे फकनारा कर पस्िमी िंस्कृ सत को अपना रहे हं ?, बस्ल्क िंपूणा दसनर्ा मं ु लोग अपनी िंस्कृ सत एवं परं परा को भूलते जा रहे हं । ऐिी त्रवषम पररस्स्थसत मं भी ऐिे कछ िंस्कारी लोग हं , स्जडहं ु ने पूणा दृढ़ता एवं इमानदारी क िाथ अपने पूवजो द्वारा प्राप्तअपनी बहुमल्र् िंस्कृ सत एवं परं परा को िंजोर्े रखा हं । े ा ू िैकिो वषा पूवाा मनुष्र् ने जब अपनी आंखं खोली तो उिे िूर्ा व र्डद्रमा अत्र्सधक प्रकाशमान फदखे होगं। िमर् के िाथ िाथ उिक सनरं तर अपने प्रर्ािो एवं अनुभवो िे अपनी स्जज्ञािा िे िमर् का आकलन आफद का कार्ा प्रारं भ े करफदर्ा था। प्रार्ीन भारतीर् ग्रंथं मं कालगणना क त्रवषर् मं त्रवसभडन उल्लेख समलता है, स्जििे सिद्ध होता है फक े हजारो वषा पूवा भी भारतीर् ऋषीमुसन अडर् िभ्र्ता एवं िंस्कृ सत क त्रवद्वानो िे इि त्रवषर् मं उनिे कहीं ज्र्ादा िजग े थे। ऋग्वेद, ब्रह्मांि पुराण, वार्ु पुराण आफद पौरास्णक ग्रंथो मं कालगणना र्ा िंवत्िर का उल्लेख समलता हं । त्रवद्वानो क मत िे ईस्वी िन ् िे कई शतास्ब्दर्ं पूवा ज्र्ोसतष को काल स्वरूप माना जाता था। इि सलए ज्र्ोसतष को वेद िे े जोिकर वेदांगं मं िस्ममसलत फकर्ा गर्ा था। तब िे लेकर आज तक त्रवसभडन त्रवद्वानो ने कालगणना मं अपना महत्वपूणा र्ोगदान फदर्ा स्जिक फलस्वरुप प्रार्ीन काल िे आज तक अनेकं िंवतं का उल्लेख त्रवसभडन ग्रडथं िे े प्राप्त होता है । भारतीर् िभ्र्ता एवं िंस्कृ सत मं त्रवसभडन धमा एवं िंप्रदार् क लोग बिते हं िबकी अपने धमा र्ा े िमुदार् क त्रवद्वानं र्ा पूवजो पर अटू ट श्रद्धा एवं त्रवश्वाि हं । स्जिक फल स्वरुप वहँ लोग अपनी माडर्ता एवं िंस्कारं े ा े क आधार पर अपनी िंस्कृ सत एवं िभ्र्ता को कार्म रखने क सलए अपनी माडर्ता एवं िंस्कृ सत क अनुशार वषा की े े े गणना अलग-अलग िंवत ् क रुप मं करते हं । े फहडद ु िंस्कृ सत क त्रवद्वानो क मत िे त्रवक्रम िंवत बहुजत लोगो द्वारा माडर्ता प्राप्त है , इि सलए असधकतर लोग े े त्रवक्रम िंवत को मानते हं । गुजरात मं त्रवक्रम िंवत कासताक शुक्ल प्रसतपदा िे प्रारमभ होता है । लेफकन उिरी भारत मं त्रवक्रम िंवत र्ैि शुक्ल प्रसतपदा िे प्रारमभ होता है । इिक अलावा भारत मं े स्कडद िंवत ् तथा शक् िंवत ् अथाात शासलवाहन िंवत ् तथा िातवाहन िंवत ्, हषा िंवत ्। करल मं काल्लम अथवा े मालाबार िंवत ्। कश्मीर मं िप्तऋत्रष िंवत ् अथाात लौफकक िंवत ्। लक्ष्मण िंवत ्। गौतम बुद्ध िंवत ्। वधामान महावीर िंवत ्।सनमबाक िंवत ्। बंगाली आिामी िंवत ्। पारिी शहनशाही िंवत ्। र्हूदी िंवत ्। बहास्पत्र् वषा इत्र्ाफद िंवत ् का ा प्रर्लन रहा है । पंर्ांग सनमााण हे तु भारतीत गस्णतज्ञ आर्ाभट्ट ने अपने अनुभवं एवं शोधनकार्ा िे आर्ाभट्ट सिद्धांत नामक ग्रंथ की रर्ना की स्जि मं दै सनक खगोलीर् गणना और अनुष्ठानं क सलए शुभ मुहूता इत्र्ाफद का िमावेश फकर्ा गर्ा। े त्रवद्वानं क मत िे आर्ाभट्ट सिद्धांत को र्ारं ओर िे स्वीकृ सत समली थी। क्र्ोफक आर्ाभट्ट अपने िमर् क िबिे बिे े े गस्णतज्ञ थे।
  • 5. आर्ाभट्ट सिद्धांत की लोकत्रप्रर्ता एवं प्रामास्णकता सिद्ध होते ही भारतीर् पंर्ांग की गणना एवं सनधाारण मंत्रवशेष महत्व एवं र्ोगदान रहा हं । आर्ाभट्ट क िमर् िे लेकर आजक आधुसनक र्ुग मं भी इि सिद्धांत को े ेव्र्ावहाररक उद्दे श्र्ं िे भारत एवं त्रवदे शं मं सनरं तर इस्तेमाल मं रहा हं । आर्ार्ा लगध द्वारा रसर्त ग्रंथ वेदांग ज्र्ोसतष मं वस्णात िूर्ा सिद्धांत की प्रामास्णकता सिद्ध होने पर पंर्ांगगणना मं िुलभता होने लगी। स्जि मं आगेर्लकर आर्ाभट्ट, वराहसमफहर और भास्कर ने अपने र्ोगदान िे पंर्ांगगणना पद्धसत िे जुिे ग्रंथो मं व्र्ापक िुधार फकए।त्रवसभडन प्रदे शो एवं िंस्कृ सत की सभडनता क कारण पंर्ांगं की गणनाओं मं अंतर हो जाता है , लेफकन कछ तथ्र् प्रार्ः े ुिभी पंर्ांगं मं िमान होते हं ।िभी पंर्ांगं क मुख्र् पाँर् अंग: सतसथ, वार, नक्षि, र्ोग और करण। ेपंर्ांग क त्रवषर् मं र्जुवद काल मं उल्लेख समलत हं की उि काल मं भारतीर्ं ने मािं क 12 नाम क्रमशः मधु, े े ेमाधव, शुक्र, शुसर्, नभ, नभस्र्, इष, ऊजा, िह, िहस्र, तप तथा तपस्र् रखे थे। मधुि माधवि शुक्रि शुसर्ि नभि नभस्र्िेषिोजाि िहि िहस्र्ि तपि तपस्र्िोपर्ामगृहीतोसि िहं िवोस्र्हं हस्पत्र्ार् त्वा॥ (सतत्रिर िंफहता 1.4.14) र्जुवेद क ऋत्रष थे वैशमपार्न क सशष्र् क सशष्र् सतत्रिर िंफहता (उपसनषर्) मं िंवत्िर क मािं क 13 े े े े ेमफहनो क नाम े क्रमशः– अरुण, अरुणरज, पुण्िरीक, त्रवश्वस्जत ्, असभस्जत ्, आद्रा , त्रपडवमान ्, अडनवान ्, रिवान ्,इरावान ्, िवौषध, िंभर, महस्वान ् थे। बाद मं र्ही नाम पूस्णामा क फदन र्ंद्रमा क नक्षि क आधार पर र्ैि, वैशाख, े े ेज्र्ेष्ठ, आषाढ़, भाद्रपद, आस्श्वन, कासताक, मागाशीषा, पौष, माघ तथा फाल्गुन हो गए। पंर्ांग त्रवशेष अंक मं त्रवसभडन ग्रंथ एवं धमाशास्त्रों िे उल्लेस्खत प्रामास्णक कालगणना अथाात पंर्ांग िे जुिीमहत्वपूणा जानकारीर्ं क अंश प्रकासशत फकर्े गर्े हं । पाठको की पंर्ांग क त्रवषर् िे जुिी धारणाएं स्पष्ट हं। उनक े े ेज्ञान की वृत्रद्ध एवं जानकारी क उद्दे श्र् िे पंर्ांग िे िंबंसधत जानकारीर्ं को इि त्रवशेषांक को प्रस्तुत करने का प्रर्ाि ेफकर्ा गर्ा हं ।नोट: र्ह अंक मं पंर्ंग िे िंबंसधत िारी जानकारी र्ा िामाडर् व्र्त्रक्त को दै सनक जीवन मं उपर्ोगी हो इि उद्दे श्र् िेदी गई हं । कालगणना िे िंबसधत त्रवषर्ं मं रुसर् रखने वाले पाठक बंधु/बहनो िे त्रवशेष अनुरोध हं की फकिी भी ंकालगणना र्ा पंर्ांग िे सतसथ सनधाारण र्ा व्रत-त्र्ौहार का सनणार् करने िे पूवा अपने धमा क व्रत, पवा, िंवत्िर र्ा ेिमप्रदार् क प्रधान आर्ार्ा, गुरु, िुर्ोगर् त्रवद्वान र्ा जानकार िे परामशा करक मनार्ं क्र्ंफक स्थानीर् प्रथाओं एवं े ेत्रवसभडन पंर्ांगं की गणना करने की पद्धसतर्ं मं भेद होने क कारण कभी-कभी त्रवशेष मं अंतर हो िकता है । ेइि अंक की प्रस्तुसत कवल पाठको क ज्ञानवधान क उद्दे श्र् की गई हं । पत्रिका मं प्रकासशत िभी जानकारीर्ां त्रवसभडन े े ेग्रंथ, वेद, पुराण आफद पुरास्णक माध्र्म िे प्राप्त हं । स्जिे अत्र्ंत िावधानीपूवक िंग्रह कर प्रस्तुत फकर्ा गर्ा हं । फफर ाभी र्फद पत्रिका मं प्रकासशत फकिी लेख मं फकिी धमा/िंिकृ सत/िभ्र्ता क पवा सनणार्/नववषा को दशााने मं, दशाार्े ेगए क िंकलन, प्रमाण पढ़ने, िंपादन मं, फिजाईन मं, टाईपींग मं, त्रप्रंफटं ग मं, प्रकाशन मं कोई िुफट रह गई हो, तो ेउिे त्रवद्वान पाठक स्वर्ं िुधार लं। िंपादक एवं लेखक एवं गुरुत्व कार्ाालर् पररवार क िदस्र्ं की इि िंदभा मं कोई ेस्जममेदारी र्ा जवाबदे ही नहीं रहे गी। सर्ंतन जोशी
  • 6. 6 मार्ा 2012 पंर्ांग गणना की वैज्ञासनक पद्धसत क्र्ा हं ?  सर्ंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी भारतीर् पंर्ांग का इसतहाि अत्र्ंत प्रासर्न हं । कालज्ञानं प्रर्क्ष्र्ासम लगधस्र् महात्मनः। भारत मं त्रवसभडन प्रादे सशक पंर्ांग मं कालज्ञान बोधक ज्र्ोसतषशास्त्रो का वतामान त्रवकसित क्रमश सतसथ, वार, नक्षि, र्ोग और स्वरुप आर्ार्ा लगध मुसन की दे न हं । करण र्ह पांर् प्रमुख अंग होते हं । िमर् के िाथ-िाथ आर्ाभट्ट की खगोलीर् क्र्ोफक, इिी पांर् गणना की त्रवसधर्ां भी बहुत प्रभावशाली िात्रबत हुई, फक अंगं को समलाकर उनक द्वारा प्रर्ोग फकए गए सिद्धांत त्रवश्व की अडर् े भारतीर् सतसथपि िभ्र्ता एवं िंस्कृ सतर्ं मं भी नजर आने लगे थे। 11वीं अथाात ् फदनदसशाका िदी मं स्पेन के मिहूर वैज्ञासनक अल झकााली अथाात ् कलंिर ै को (Al Zarkali) ने भी अपने कार्ं मं आर्ाभट्ट की पंर्ांग कहा जाता हं । खगोलीर् गणना िे मेलखाती हुई प्रणाली को तोलेिो पुरातन काल (Toledo) नाम फदर्ा। करीब 11वीं- 12वीं िदी िे लेकरिे लेकर आज क आधुसनक र्ुग मं पंर्ांग की पौरास्णक े कई िदीर्ं तक मं र्ूरोपीर्न दे शं मं तोलेिो प्रणाली कोगणना एवं सनमााण पद्धसत मं िमर्-िमर् पर िुधार र्ा िवाासधक िूक्ष्म गणना क तौर पर फकर्ा जाता था। ेिुक्ष्मता आती रही हं । क्र्ोफक, पंर्ांग का मुख्र् उद्दे श्र् भारतीत गस्णतज्ञ आर्ाभट्ट ने अपने अनुभवं एवंमानव जीवन को प्रभात्रवत करने वाले ग्रह, नक्षि आफद शोधनकार्ा िे आर्ाभट्ट सिद्धांत नामक ग्रंथ की रर्नाब्रह्मांफिर् शत्रक्त की स्टीक गणना कर मानव िमाज के की स्जि मं दै सनक खगोलीर् गणना और अनुष्ठानं केिममुख प्रस्तुत करना एवं उनको लाभांत्रवत करना हं , इि सलए शुभ मुहूता इत्र्ाफद का िमावेश फकर्ा गर्ा। त्रवद्वानंसलए पंर्ांग मं नए शोध एवं आधुसनक पररक्षण द्वार क मत िे आर्ाभट्ट सिद्धांत को र्ारं ओर िे स्वीकृ सत ेपंर्ांग गणना मं स्टीकता आसत रही हं । इि पररणाम हं समली थी। क्र्ोफक आर्ाभट्ट अपने िमर् क िबिे बिे ेकी, आज हमारे पाि पंर्ांग गणना एवं सनमााण क िशक्त े गस्णतज्ञ थे।माध्र्म उपलब्ध है । आज भारत भर मं राष्ट्रीर् पंर्ांग के आर्ाभट्ट सिद्धांत की लोकत्रप्रर्ता एवं प्रामास्णकताक िाथ-िाथ कई क्षेिीर् पंर्ांग उपलब्ध हं । े सिद्ध होते ही भारतीर् पंर्ांग की गणना एवं सनधाारण मं अंदाजन ई.500 क करीब आर्ार्ा लगध का े त्रवशेष महत्व एवं र्ोगदान रहा हं । आर्ाभट्ट क िमर् िे ेवेदांग-ज्र्ोसतष (ॠक् व र्ाजुष ्) की रर्ना की थी। स्जि लेकर आजक आधुसनक र्ुग मं भी इि सिद्धांत को ेमं वस्णात हं की पांर् वषा का एक र्ुग, 366 फदनं का व्र्ावहाररक उद्दे श्र्ं िे भारत एवं त्रवदे शं मं सनरं तरवषा होता हं । इस्तेमाल मं रहा हं । 11 वीं िदी िे पूवकाल मं असधकतर भारतीर् ा आर्ार्ा लगध द्वारा रसर्त ग्रंथ वेदांग ज्र्ोसतष मंपंर्ांग की गणना आर्ार्ा लगध द्वारा रसर्त ग्रंथ वेदांग वस्णात िूर्ा सिद्धांत की प्रामास्णकता सिद्ध होने पर पंर्ांगज्र्ोसतष मं उल्लेस्खत तथ्र्ं पर आधाररत होती थी। गणना मं िुलभता होने लगी। स्जि मं आगेर्लकरशास्त्रों मं कहाँ गर्ा हं ।
  • 7. 7 मार्ा 2012आर्ाभट्ट, वराहसमफहर और भास्कर ने अपने र्ोगदान िे वैफदक पंर्ांग मं 30 सतसथर्ां होती हं । स्जिमं 15पंर्ांग गणना पद्धसत िे जुिे ग्रंथो मं व्र्ापक िुधार फकए। सतसथर्ां कृ ष्ण पक्ष की तथा 15 शुक्ल पक्ष की होती हं ।त्रवसभडन प्रदे शो एवं िंस्कृ सत की सभडनता क कारण े लेफकन र्ंद्र की गसत मं सभडनता होने क कारण सतसथ क े ेपंर्ांगं की गणनाओं मं अंतर हो जाता है , लेफकन कछ ु मान मं डर्ूना एवं सधकता बनी रहती है ।तथ्र् प्रार्ः िभी पंर्ांगं मं िमान होते हं । िंपूणा भर्क्र की 360 फिग्री को 30 सतसथर्ं कोिभी पंर्ांगं क मुख्र् पाँर् अंग: सतसथ, वार, नक्षि, े 360 ÷ 30 =12 शेष बर्ते हं । र्ंद्र अपने पररक्रमा पथर्ोग और करण। पर एक फदन मं लगभग 13 अंश बढ़ता है । िूर्ा भी पृथ्वी क िंदभा मं एक फदन मं 1° र्ा 60 कला आगे बढ़ता हं । ेवृहदवकहिार्क्रम, पंर्ांग प्रकरण, श्लोक 1 मं कहा इि सलए एक फदन मं र्ंद्र की कल बढ़त 13 अंश िे िूर्ा ुगर्ा है - की बढ़त क 1 अंश घटाने पर 12 अंश (13°-1°=12°) े शेष रह जाते हं । शेष बर्ी बढ़त ही िूर्ा और र्ंद्र की सतसथ वाररि नक्षिां र्ोग करणमेव र्। गसत का अंतर होती हं । एतेषां र्िा त्रवज्ञानं पंर्ांग तस्डनगद्यते॥ अमावस्र्ा क फदन िूर्ा और र्ंद्र एक िाथ एक े ही रासश व एक ही अंशं मं स्स्थत होते हं । दोनं क बीर् े फकिी भी त्रवशुद्ध पंर्ांग को फकिी स्थान त्रवशेष के का रासश अंतर शूडर् होता हं , इिसलए र्ंद्र फदखाई नहींअक्षांश और रे खांश पर सनधााररत फकर्ा जाता हं । फकिी दे ता हं । जब दोनं का अंतर शूडर् िे बढ़ने लगता हं तबपंर्ांग क सनमााण क सलए फकिी सनधााररत स्थान त्रवशेष े े शुक्ल प्रसतपदा सतसथ का उदर् (प्रारं भ) होने लगता हं ।क अक्षांश रे खांश का स्पष्ट उल्लेख फकर्ा जाता हं । े िमर् क िाथ जब र्ह अंतर बढ़ते-बढ़ते 12° अंश का हो े मुख्र्तः पंर्ांग प्रस्तुसत की दो मुख्र् पद्धसतर्ां जाता है , तब प्रसतपदा सतसथ पूणा होकर फद्वतीर्ा सतसथ कामानी जाती हं । एक हं सनरर्न और और दिरी हं िार्न। ू उदर् होता है । र्ूंफक प्रसतपदा सतसथ क फदन भी र्ंद्र िूर्ा ेभारतीर् क पंर्ांग मं ज्र्ादातर सनरर्न पद्धसत असधक े िे कवल 12 अंश ही आगे सनकलता है , इिसलए प्रसतपदा ेप्रर्सलत हं और पािात्र् दे शं मं िार्न पद्धसत असधक सतसथ को भी आकाश मं र्ंद्रदशान नहीं होते हं । इिीप्रर्सलत हं । प्रकार िूर्-र्ंद्र क रासश अतर िे फकिी सतसथ त्रवशेष का ा ेसतसथ : सनधाारण फकर्ा जाता हं । करीबन पंद्रह फदन बाद मं जब र्ंद्र की एक कला को सतसथ कहा जाता हं । कला र्ंद्र का अंतर िूर्ा िे 180 अंश होता हं (12 x15=180)का मान िूर्ा और र्ंद्र क अंतरांशं पर सनधााररत फकर्ा े आगे होता है , तब पूस्णामा सतसथ की िमासप्त होती हं तथाजाता हं । कृ ष्णपक्ष की प्रसतपदा सतसथ का उदर् होता हं । पुनः जबसतसथ सनधाारण क त्रवषर् मं शास्त्रो मं वस्णात हं । े िूर्ा और र्ंद्र का अंतर 360 अंश अथाात शूडर् होता हं अकााफद्वसनिृजः प्रार्ीं र्द्यात्र्हरहः शषी। तब कृ ष्ण पक्ष की अमावस्र्ा सतसथ िमाप्त होती हं । तच्र्ाडद्रमानमंषैस्तु ज्ञेर्ा द्वादषसभस्स्तसथः॥ अपनी जडम किली िे िमस्र्ाओं ुं (श्लोक 13:मानाध्र्ार्:िूर्ा सिद्धांत:) वैफदक ज्र्ोसतष मं रासशर्ो को 360 फिग्री को 12 का िमाधान जासनर्े माि RS:- 450भागो मं बांटा गर्ा है स्जिे भर्क्र कहते हं । िंपक करं : Call us: 91 + 9338213418, ा 91 + 9238328785,
  • 8. 8 मार्ा 2012वार: बृहतिंफहता मं र्ंद्र का नक्षिं िे र्ोग बताते हुए ् भारतीर् ज्र्ोसतष मं एक वार एक िूर्ोदर् िे उल्लेख फकर्ा गर्ा हं :-दिरे िूर्ोदर् तक रहता हं । ू षिनागतासनपौष्णाद् द्वादशरौद्राच्र्मध्र्र्ोगीसन।वार को पररभात्रषत करते हुए शास्त्रों मं उल्लेख फकर्ा जेष्ठाद्यासननवक्षााण्र्फिु पसतनातीत्र् र्ुज्र्डते॥गर्ा हं इि श्लोक क अनुिार भी 27 नक्षिं वाला मत े उदर्ातउदर्ं वारः। ् प्रामास्णक माना जाता हं । ज्र्ोसतष मं 27 नक्षिं को 12 रासशर्ं मंवार को पौरास्णक ज्र्ोसतष मं िावन फदन र्ा अहगाण के त्रवभास्जत फकर्ा जाता हं । प्रत्र्ेक नक्षि क र्ार र्रण ेनाम िे भी जाना जाता हं । वारं का प्रर्सलत क्रम पुरे (भाग) फकए गए हं । स्जििे प्रत्र्ेक र्रण का मान 13त्रवश्व मं एक िमान है । अंश 20 कला माना गर्ा हं स्जिे उिक र्ार र्रण िे े िात वारं क नाम िात ग्रहं क नाम पर रखे गए े े भाग दे ने पर 3 अंश 20 कला शेष बर्ती हं । (13 अंशहं । इन िात वारं का क्रम होरा क्रम क आधार पर रखे े 20 ÷ 4 = 3 अंश 20 कला)गए है और होरा क्रम ब्रह्मांि मं स्स्थत िूर्ााफद ग्रहं के इि प्रकार 27 नक्षिं मं कल 108 र्रण होते हं । ुकक्ष क्रम क अनुिार सनधााररत फकए गए हं । े वृहज्जातकम ् क अनुिार प्रत्र्ेक रासश मं 108 े र्रण को 12 रासश मं भाग दे ने िे 9 र्रण हंगे। (108÷नक्षि : 12 = 9) त्रवद्वानो क मत िे र्ंद्र लगभग 27 फदन 7 घंटे े ज्र्ोसतष शास्त्रो मं 12 रासशर्ां अथाात भर्क्र 360 43 समनट मं 27 नक्षि की पररक्रमा पूणा कर लेता हं ।अंश को 27 नक्षिं क 27 े भागं मं बांटा गर्ा हं । हर इि सलए र्ंद्र लगभग 1 फदन (60 घटी) मं एक नक्षि मंभाग एक नक्षि का कारक है और हर एक भाग को भ्रमण करता हं । लेफकन अपनी गसत कम-ज्र्ादा होनेनक्षिं का एक सनधााररत नाम फदर्ा गर्ा है । कारण र्ंद्र एक नक्षि को अपनी कम िे पार करने मं कछ त्रवद्वानो क मतानुशार 27 नक्षिं क असतररक्त ु े े लगभग 67 घटी एवं अपनी असधकतम गसत िे पारएक और नक्षि हं स्जिे असभस्जत नक्षि क नाम िे े करने मं लगभग 52 घटी का िमर् लेता हं ।जाना जाता हं इि सलए उनक मत िे कल समलाकर 28 े ु र्ोग :होते हं । पंर्ांग मं मुख्र्तः र्ोग दो प्रकार क माने गए हं े िूर्ा सिद्धांत क अनुिार एक नक्षि का मान 360 े (१) आनंदाफद र्ोग औरअंश /27 नक्षि अथाात एक नक्षि क सलए 13 अंश 20 े (२) त्रवष्कभाफद र्ोग ंकला शेष रहता हं । स्जि प्रकार िूर्ा और र्ंद्र क रासश अंतर िे सतसथ े त्रवद्वानं क कथन अनुिार उिराषाढ़ा नक्षि की े का सनधाारण होता हं , उिी प्रकार िूर्ा और र्ंद्र क रासश ेअंसतम 15 तथा श्रवण नक्षि की प्रथम 4 घफटर्ां क त्रबर् े अंतर क र्ोग करने िे त्रवष्कभाफद र्ोग का सनधाारण े ंका काल असभस्जत नक्षि की होती हं । इि तरह होता हं । र्हां स्पष्ट फकर्ा जा रहा हं , की र्ोग ब्रह्मांि केअसभस्जत नक्षि का मान कल समलाकर 19 है । लेफकन ु फकिी प्रकार क तारा िमूह अथाात ग्रह नक्षि नहीं हं । ेप्रार्ः पंर्ांगं मं इि नक्षि की गणना दे खने को नहीं वरन र्ंद्र एवं िूर्ा क अंतर का र्ोग सनधाारण की स्स्थती ेसमलती हं । का नाम हं ।
  • 9. 9 मार्ा 2012 आकाश मं सनरर्न इत्र्ाफद त्रबंदओं िे िूर्ा और ु अंतर शूडर् होता हं , तो प्रसतपदा सतसथ क िाथ ही स्स्थर ेर्ंद्र को िंर्ुक्त रूप िे 13 अंश 20 कला अथाात 800 फकस्तुन करण का शुरु होता हं । जब र्ंद्र गसत िूर्ा िे 6 ंकला का पूरा भोग करने मं स्जतना िमर् लगता है , अंश आगे सनकल जाती हं , तब फकस्तुन करण की ंवह र्ोग कहलाता है । इि प्रकार क फकिी भी एक र्ोग े िमासप्त होती हं । अथाात िूर्ा और र्ंद्र मं 6 अंश काका मान नक्षि की भांसत 800 कला होता हं । अंतर होने मं जो िमर् लगता हं , उिे फकस्तुन करण ंत्रवष्कभाफद र्ोगं की कल िंख्र्ा 27 हं । ं ु कहा जाता हं । इिी प्रकार क्रमशः 6-6 अंश क अंतर पर े र्ोग का दै सनक मान लगभग 60 घटी 13 पल करण बदल जाते हं ।होता है । िूर्ा और र्ंद्र की गसतर्ं की अिमानता के करण सतसथ का आधा भाग होता हं ।कारण मध्र्म मान मं डर्ूनता एवं सधकता बनती हं । इन सतसथ क पूवााद्धा अथाात पहले आधे भाग मं एक ेर्ोगं मं वैधसत एवं व्र्सतपात नामक र्ोगं को महापातक ृ करण, उिराद्धा अथाात दिरे आधे भाग का एक करण। ूकहते हं । इि प्रकार एक सतसथ मं 2 करण होते हं । वार और नक्षि क िंर्ोग िे तात्कासलक आनंदाफद े िूर्ा और र्डद्रमा क बीर् 6º अंश े का अडतरर्ोग बनते हं । पौरास्णक ग्रथं मं इनकी िंख्र्ा 28 दशााई होने िे एक करण होता हं । ज्र्ोसतष शास्त्रो क अनुिार ेहै । इडहं स्स्थर र्ोग भी कहते हं । इनकी गस्णतीर् फक्रर्ा करण की कल िंख्र्ा 11 होती हं । 11 र्रण को दो भागो ुनहीं है । र्े र्ोग िूर्ोदर् िे अगले िूर्ोदर् तक रहते हं । मं बाटा गर्ा हं र्र करण और स्स्थर करण।इन र्ोगं का सनधाारण वार त्रवशेष को सनफदा ष्ट नक्षि िे र्र करण मंत्रवद्यमान नक्षि (असभस्जत नक्षि क िाथ) तक की े 1) बवगणना द्वारा होता है । 2) बालव 3) कौलवकरण: 4) तैसतल फकिी भी सतसथ का आधा भाग करण कहलाता हं । 5) गरिूर्ा और र्ंद्र मं 60 अंश का अंतर होने मं स्जतना 6) वस्णजिमर् लगता उि अंतर िे करण का सनधाारण फकर्ा 7) त्रवत्रष्ट का िमावेश फकर्ा गर्ा हं ।जाता हं । फकिी-फकिी पंर्ांगं मं करण का वणान कवल े स्स्थर करण मंिूर्ोदर्कालीन िमर् िे फकर्ा जाता हं , तो फकिी-फकिी 1) शकसन ुपंर्ांगं मं सतसथ की िंपूणा अवसध को दो िमान भाग 2) र्तुष्पदकरक त्रवशेश तौर पर करणं का सनधाारण कर दे ते हं । े 3) नागएक सतसथ मं दो करण होते हं । इनकी कल िंख्र्ा ११ है । ु 4) फकस्तुध्न का िमावेश फकर्ा गर्ा हं ।करण को दो भागं मं बांटा गर्ा हं र्र और स्स्थर। बव, बालव, कौलव, तैत्रिल, गर, वस्णज एवं त्रवत्रष्ट जब िूर्ा और र्डद्रमा की गसत मं 13º-20 का(भद्रा) र्र और फकस्तुन, शकसन, र्तुष्पद एवं नाग स्स्थर ं ु अडतर होने िे एक र्ोग होता हं । कल समला कर 27 ुिंज्ञक करण हं । र्ोग होते हं आकाश की स्स्थसत िे इन र्ोगो का कोइ करण की शुरुआत स्स्थर करण अथाात फकस्तुन िे ं िमबडध नहीं हं । वैिे भी र्ोगो की आवश्र्कता त्रवशेषहोती हं जब भर्क्र मं िूर्ा और र्ंद्र क बीर् अंश का े रुप िे र्ािा, मुहुता इत्र्ाफद प्रिंगं मं पिती हं ।
  • 10. 10 मार्ा 2012र्ोगो क नाम े एक ही स्थान परहोते हं अथाात 0º का अडतर होता हं तो1) त्रवष्कमभ ु 15) वज्र अमावस्र्ा सतसथ कहते हं । भर्क्र का कलमान 360º हं , ु2) प्रीसत 16) सित्रद्ध तो एक सतसथ= 360÷ 30=12º अथाात िूर्-र्डद्र मं 12º ा3) आर्ुष्मान 17) व्र्तीपात का अडतर पिने पर एक सतसथ होती हं ।4) िौभाग्र् 18) वरीर्ान5) शोभन 19) पररध उदाहरण स्वरुप:6) असतगि 20) सशव 0º िे 12º तक शुक्ल पक्ष की प्रसतपदा 12º िे 24º तक7) िुकमाा 21) सिद्ध फद्वतीर् तथा क्रमशः सतसथ वृत्रद्ध होकर अंत मं 330º िे8) घृसत 22) िाध्र् 360º तक कृ ष्ण पक्ष की अमावस्र्ा को अंत होती हं ।9) शूल 23) शुभ भारतीर् ज्र्ोसतष की परमपरा मं सतसथ की वृत्रद्ध10) गंि 24) शुक्ल एवं सतसथ का क्षर् भी होता हं । र्फद फकिी सतसथमं दो11) वृत्रद्ध 25) ब्रह्म बार िूर्ोदर् हो जाता हं , तो उिे सतसथ वृत्रद्ध कहलाती हं12) ध्रुव 26) ऎडद्र तथा स्जि सतसथ मं िूर्ोदर् न हो तो उिे सतसथका क्षर्13) व्र्ाघात 27) वैधसत ृ हो जाना कहा जाता हं ।14) हषाण उदाहरण क सलए एक सतसथ िूर्ोदर् िे पूवा े प्रारमभ होती हं तथा िंपूणा फदन रहकर अगले फदनर्ाडद्र माि िूर्ोदर् क 2 घंटे पिात तक भी रहती हं तो र्ह सतसथ ेर्ाडद्र माि मं कल 30 सतसथर्ाँ होती हं स्जनमं 15 ु दो िूर्ोदर् को स्पशा कर लेती हं ।सतसथर्ाँ शुक्ल पक्ष की और 15 कृ ष्ण पक्ष की होती हं । इिसलए इि सतसथमं वृत्रद्ध हो जाती हं । इिी प्रकारसतसथर्ाँ सनमन प्रकार की हं । एक अडर् सतसथ िूर्ोदर् क पिात प्रारमभ होती है तथा े1) प्रसतपदा 9) नवमी दिरे फदन िूर्ोदर् िे पहले िमाप्त हो जाती हं , तो र्ह ू2) फद्वतीर्ा 10) दशमी सतसथ एक भी िूर्ोदर् को स्पशा नहीं करती इि कारण3) तृतीर्ा 11) एकादशी उिे क्षर् होने िे सतसथक्षर् कहा जाता हं ।4) र्तुथी 12) द्वादशी5) पंर्मी 13) िर्ोदशी रत्न-उपरत्न एवं रुद्राक्ष6) षष्टी 14) र्तुदाशी हमारे र्हां िभी प्रकार क रत्न-उपरत्न एवं रुद्राक्ष े7) िप्तमी 15) पूस्णामा व्र्ापारी मूल्र् पर उपलब्ध हं । ज्र्ोसतष कार्ा िे8) अष्टमी 30) अमावस्र्ा जुिे़ बधु/बहन व रत्न व्र्विार् िे जुिे लोगो के सतसथर्ाँ शुक्लपक्ष की प्रसतपदा िे सगनी जाती हं । सलर्े त्रवशेष मूल्र् पर रत्न व अडर् िामग्रीर्ा वपूस्णामा को 15 तथा अमावस्र्ा को 30 सतसथ कहते हं । अडर् िुत्रवधाएं उपलब्ध हं ।स्जि फदन िूर्ा व र्डद्रमा मं 180º अंश का अडतर (दरी) ू गुरुत्व कार्ाालर् िंपक: ाहोता हं अथाात िूर्ा व र्डद्र आमने-िामने हो जाते हं तो 91+ 9338213418,उिे पूस्णामा सतसथ कहा जाता हं और जब िुर्ा व र्डद्रमा 91+ 9238328785,
  • 11. 11 मार्ा 2012 पत्रिका िदस्र्ता (Magazine Subscription) आप हमारे िाथ जुि िकते हं । आप हमारी मासिक पत्रिका आप हमारे िाथ त्रवसभडन िामास्जक नेटवफकग िाइट क माध्र्म िे भी जुि िकते हं । ं े सनशुल्क प्राप्त करं । हमारे िाथ जुिने क सलए िंबंसधत सलंक पर स्क्लक करं । ेर्फद आप गुरुत्व ज्र्ोसतष मासिक पत्रिका अपने ई-मेल We Are Also @पते पर प्राप्त करना र्ाहते हं ! तो आपना ई-मेल पता नीर्े Google Groupदजा करं र्ा इि सलंक पर स्क्लक करं Google PlusGURUTVA JYOTISH Groups yahoo क िाथ जुिं. े Yahoo Group Orkut CommunityIf You Like to Receive Our GURUTVA JYOTISHMonthly Magazine On Your E-mail, Enter Your E- Twittermail Below or Join GURUTVA JYOTISH Groups Facebookyahoo Wordpress Scribd Click to join gurutvajyotish उत्पाद िूर्ी हमारी िेवाएं आप हमारे िभी उत्पादो आप हमारी िभी भुगतान िेवाएं की जानकारी एवं िेवा की िूसर् एक िाथ दे ख शुल्क िूसर् की जानकारी दे ख िकते हं और िाउनलोि िकते और िाउनलोि कर कर िकते हं । िकते हं ।मूल्र् िूसर् िाउनलोि करने क सलए कृ प्र्ा इि सलंक पर े मूल्र् िूसर् िाउनलोि करने क सलए कृ प्र्ा इि सलंक पर ेस्क्लक करं । Link स्क्लक करं । LinkPlease click on the link to download Price List. Link Please click on the link to download Price List. Link
  • 12. 12 मार्ा 2012 Shortly GURUTVA JYOTISH Weekly E-Magazine Publishing In English Power By: GURUTVA KARYALAY Don’t Miss to Collect Your Copy Book Your Copy Now For More Information Email UsGURUTVA JYOTISH Weekly E-Magazine Fully Designed For PeopleConvenience who may interested in Astrology, Numerology, Gemstone,Yantra, Tantra, Mantra, Vastu ETC Spiritual Subjects.You can now Send Us Your articles For Publish In Our WeeklyMagazine For More Information Email UsContect: GURUTVA KARYALAY gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  • 13. 13 मार्ा 2012 कलेण्िर र्ुग की उत्पत्रि कब हुई ? ै  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी िाधारणतः कलेण्िर का उपर्ोग फदनांकं (तारीखं) ै तो उिक बाद वे फिलं की बोआई करते थे। बाढ़ आने ेमफहने, वषा का फहिाब रखने क सलए फकर्ा जाता हं । े क बाद जब नील नदी मं दबारा बाढ़ आती थी तो उडहंने े ुकलेण्िर का उद्गम कब हुवा और कलेण्िर का उपर्ोग ै ै दे खा फक उि दौरान र्ांद 12 बार उगता था। र्ानी, 12मानव िमाज कब िे कर रहा हं र्ह दावे क िाथ कोई े र्ंद्र-माहं क बाद बाढ़ आती थी और तब वे फिल की ेनहीं कह िकता! क्र्ोफक, जब पौरास्णक काल मं जब बोआई करते थे। समस्र क कछ त्रवद्वानो ने दे खा फक जब े ुआफद मानव वन-बीहिं और गुफाओं मं रहते थे तो, र्हं बाढ़ आती है तो आिमान मं एक तेज र्मकदार तारा भीदे ख कर अवश्र् आिर्ार्फकत हुए हंगे फक, प्रसतफदन फदखाई दे ने लगता है । उडहंने गणना की तो पता लगािूरज उदर् होता हं और शाम को अस्त हो जाता हं , र्ांद फक 365 फदन-रात क बाद फफर ऐिा ही होता है । फफर ेसनकलता है और छप जाता हं । कभी भर्ंकर गमी पिती ू तारा र्मकने लगता है । समस्र क सनवासिर्ं ने 365 फदन ेहं , तो कभी जोरं की वषाा होने लगती हं । और फफर, क वषा को 30 फदन क 12 महीनं मं बांट फदर्ा। वषा क े े ेकभी फहला कर रख दे ने वाली ठं ि पिने लगती हं। उिने अंत मं पांर् फदन बर् गए। इि तरह समस्र क सनवासिर्ं ेजरूर िोर्ा होगा फक प्रकृ सत मं िमर्-िमर् पर ऐिे ने कलंिर का आत्रवष्कार कर सलर्ा होगा। ैबदलाव क्र्ं होते हं ? क्र्ं ऋतुएं आती-जाती हं ? अभी तक हुए ऐसतहासिक शोध िे जुसलर्न और जब आफद मानव ने खेती करना शुरू फकर्ा होगा ग्रेगोरीर्न कलंिर ै महत्वपूणा माने जाते हं । जुसलर्नतब, उिने जमीन मं बीज बोर्े हंगे तो उिने दे खा होगा कलंिर ै रोम क शािक जुसलर्ि िीजर ने तैर्ार फकर्ा ेफक फिल उगती हं , बढ़ती है और िमर् क िाथ-िाथ े था। आगे र्ल कर पोप ग्रेगोरी तेरहवं ने इि कलेण्ि मं ैपक जाती है । फफर उि फिल की कटाई कर लेता होगा। िुधार करक ग्रेगोरीर्न कलंिर तैर्ार फकर्ा था। े ैपुनः बीज बोने का िमर् आने पर फफर िे बीज बोए 45 ईस्वी पूवा िे अथाात इि िमर् िे पहले तकहंगे। इि तरह फिल की बोआई-कटाई का क्रम र्लता रोम िाम्राज्र् मं रोमन कलंिर ै प्रर्सलत था। रोमनरहा होगा। इि क्रम िे शार्द उिने पहली बार इि बात कलंिर ै मं वषा का प्रारं भ 1 मार्ा िे होता था। प्रारं भ मंका अंदाजा लगाना शुरू फकर्ा होगा फक फिल बोने के रोमन कलंिर ै मं वषा 10 माह का होता था फफर उिे 12फकतने िमर् बाद फफर िे नई फिल क बीज बोने हं । े मफहनो का फकर्ा गर्ा।धीरे -धीरे आफद मानव नं इि तरह शार्द पहली बार पूरे जब रोमन कलंिर ै मं 10 माह होते थे तो उि मंवषा का फहिाब लगार्ा होगा। आफद काल िे ही फकिी 10 माह क्रमशः माफटा अि, एत्रप्रसलि, मेअि, जूसनअि,भी तरह त्रवश्व की त्रवसभडन िभ्र्ताओं ने सनस्ित तौर पर स्क्वंफटसलि, िैस्क्िफटसलि, िेप्टं बर, अक्टू बर, नवंबर तथाअपने-अपने ढं ग िे िमर् का फहिाब लगार्ा होगा। फदिंबर। रोमन कलंिर ै को 10 माह िे जब 2 माह समलासमस्रवािीर्ं क मत िे: े कर उिे 12 मफहनो का फकर्ा गर्ा तो उि मं 12 माहअनुमासनक तौर पर एिा माना जाता हं की वषा का क्रमशः लाडर्ुआरीअि, फब्रुआरीअि, माफटा अि, एत्रप्रसलि, ेपहला फहिाब िबिे 6,000 वषा पहले समस्र क सनवासिर्ं े मेअि, जूसनअि, स्क्वंफटसलि, िैस्क्िफटसलि, िेप्टं बर,ने लगार्ा था। हर िाल जब नील नदी मं बाढ़ आती थी अक्टू बर, नमबबर तथा फदिबबर थे।
  • 14. 14 मार्ा 2012 रोमन कलंिर ै क 10 महीनं क वषा मं कवल े े े पूवा मं िम्राट ऑगस्टि क नाम पर िेक्िफटसलि माह े304 फदन होते थे। एिा माना जाता है फक रोम क िम्राट े का नाम ‘अगस्त’ रख फदर्ा गर्ा।‘नुमा पोस्मपसलअि’ ने फदिंबर और मार्ा महीनं क बीर् े माना जाता हं की जूसलर्न कलंिर ै क अनुशार ेफरवरी और जनवरी माह जोिे । स्जििे वषा 354 र्ा 355 ईस्टर का त्र्ौहार और अडर् धासमाक सतसथर्ां िंबंसधतफदनं का हो गर्ा। हर दो वषा बाद असधमाि जोि कर ऋतुओं मं िही िमर् पर नहीं आती थीं। स्जििे कलंिर ै366 फदन का वषा मान सलर्ा जाता था। िमर् क िाथ- े मं असतररक्त फदन जमा हो गए थे। पोप ग्रेगोरी 1572 िेिाथ इिमं िुधार होते रहे । 1585 तक तेरहवं पोप रहे । िन ् 1582 तक वनाल स्जििे कलंिर ै की गणनाएं र्ंद्रमा क बजार् े इस्क्वनॉक्ि 10 फदन त्रपछि र्ुका था।फदनं क आधार पर होने लगीं। पृथ्वी द्वारा िूर्ा की े पोप ग्रेगोरी तेरहवं ने जूसलर्न कलंिर ै की 10पररक्रमा की गणना क आधार पर वषा मं फदनं की े फदनं की िुफट को िुधारने क सलए उि वषा 5 अक्टू बर ेिंख्र्ा 365.25 हो गई। इि िवा अथाात ् एक र्ौथाई की सतसथ को 15 अक्टू बर मानने का िुझाव फदर्ा।फदन िे गणना मं बिा भ्रम पैदा होने लगा। स्जिक फलस्वरुप जूसलर्न कलंिर े ै मं िे 10 फदन घटा उि िमर् रोम क शािक जुसलर्ि िीजर ने े फदए गए। उि िमर् लीप वषा शताब्दी क अंत मं रखा ेरोमन कलंिर ै मं त्रवशेष िुधार फकर्ा। ईस्वी पूवा 44 मं गर्ा बशते वह 400 की िंख्र्ा िे त्रवभास्जत होता हो।स्क्वंफटसलि माह का नाम बदल कर जूसलर्ि िीजर के इिीसलए 1700, 1800 और 1900 लीप वषा नहीं थेिममान मं ‘जुलाई’ रख फदर्ा गर्ा। जुसलर्ि िीजर ने जबफक वषा 2000 लीप वषा था। इि िंशोधन िे ग्रेगोरीर्कलंिर ै को िुधारने मं समस्र क खगोलत्रवद िोसिजेनीज े कलंिर ै की शुरूआत हुई स्जिे आज त्रवश्व क असधकांश ेकी मदद ली। फफर वषा 1 जनवरी िे शुरू फकर्ा गर्ा। दे शं मं अपनार्ा जा रहा है ।स्जि मं हर र्ौथे वषा को छोि कर प्रत्र्ेक वषा 365 फदन इिक बावजूद त्रवश्व क कई दे श िमर् की गणना े ेका होगा। र्ौथा वषा लीप वषा होगा और उिमं 366 फदन क सलए अभी भी अपने परं परागत पंर्ांग र्ा कलंिर े ै काहंगे। फरवरी को छोि कर प्रत्र्ेक माह मं 31 र्ा 30 उपर्ोग कर रहे हं । फहडद , र्ीनी, इस्लामी र्ा फहजरी और ुफदन हंगे। फरवरी मं 28 फदन हंगे लेफकन लीप वषा मं र्हूदी कलंिर इिक प्रमुख उदाहरण हं । ै ेफरवरी मं 29 फदन माने जाएंग। अनुमान है फक 8 ईस्वी े दगाा बीिा र्ंि ु शास्त्रोोक्त मत क अनुशार दगाा बीिा र्ंि दभााग्र् को दर कर व्र्त्रक्त क िोर्े हुवे भाग्र् को जगाने वाला माना े ु ु ू े गर्ा हं । दगाा बीिा र्ंि द्वारा व्र्त्रक्त को जीवन मं धन िे िंबंसधत िंस्र्ाओं मं लाभ प्राप्त होता हं । जो व्र्त्रक्त ु आसथाक िमस्र्ािे परे शान हं, वह व्र्त्रक्त र्फद नवरािं मं प्राण प्रसतत्रष्ठत फकर्ा गर्ा दगाा बीिा र्ंि को स्थासप्त ु कर लेता हं , तो उिकी धन, रोजगार एवं व्र्विार् िे िंबंधी िभी िमस्र्ं का शीघ्र ही अंत होने लगता हं । नवराि क फदनो मं प्राण प्रसतत्रष्ठत दगाा बीिा र्ंि को अपने घर-दकान-ओफफि-फक्टरी मं स्थात्रपत करने िे त्रवशेष े ु ु ै लाभ प्राप्त होता हं , व्र्त्रक्त शीघ्र ही अपने व्र्ापार मं वृत्रद्ध एवं अपनी आसथाक स्स्थती मं िुधार होता दे खंगे। िंपूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा र्ैतडर् दगाा बीिा र्ंि को शुभ मुहूता मं अपने घर-दकान-ओफफि मं स्थात्रपत करने िे ु ु त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र्: Rs.550 िे Rs.8200 तक
  • 15. 15 मार्ा 2012 पौरास्णक काल मं पंर्ांग गणना किे होती थी? ै  सर्ंतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशीर्जुवेद काल मं भारतीर्ं ने मािं क 12 नाम क्रमशः े वेदांग ज्र्ोसतष क अनुिार पाँर् वषं का एक र्ुग माना ेमधु, माधव, शुक्र, शुसर्, नभ, नभस्र्, इष, ऊजा, िह, गर्ा है , स्जिमं 1830 माध्र् िावन फदन, 62 र्ांद्र माि,िहस्र, तप तथा तपस्र् रखे थे। 1860 सतसथर्ाँ तथा 67 नाक्षि माि होते हं । मधुि माधवि शुक्रि शुसर्ि नभि नभस्र्िेषिोजाि िहि र्ुग क पाँर् वषं क नाम: े े िहस्र्ि तपि तपस्र्िोपर्ामगृहीतोसि  िंवत्िर, िहं िवोस्र्हं हस्पत्र्ार् त्वा॥  पररवत्िर, (सतत्रिर िंफहता 1.4.14)  इदावत्िर,  अनुवत्िर तथा र्जुवेद क ऋत्रष थे वैशमपार्न क सशष्र् क सशष्र् े े े  इद्ववत्िर।सतत्रिर िंफहता (उपसनषर्) मं िंवत्िर क मािं क 13 े ेमफहनो क नाम े क्रमशः– अरुण, अरुणरज, पुण्िरीक, इिक अनुिार सतसथ तथा र्ांद्र नक्षि की गणना होती ेत्रवश्वस्जत ्, असभस्जत ्, आद्रा , त्रपडवमान ्, अडनवान ्, रिवान ्, थी। इिक अनुिार मािं क माध्र् िावन फदनं की े ेइरावान ्, िवौषध, िंभर, महस्वान ् थे। गणना भी की गई है । वेदांग ज्र्ासतष मं महत्वपूणा बाद मं र्ही नाम पूस्णामा क फदन र्ंद्रमा क नक्षि े े जानकारी समलती है वह र्ुग की कल्पना, स्जिमं िूर्ाक आधार पर र्ैि, वैशाख, ज्र्ेष्ठ, आषाढ़, भाद्रपद, े और र्ंद्रमा क प्रत्र्क्ष वेधं क आधार पर मध्र्म गसत े ेआस्श्वन, कासताक, मागाशीषा, पौष, माघ तथा फाल्गुन हो ज्ञात करक इष्ट सतसथ आफद सनकाली गई है । आगे ेगए। आनेवाले सिद्धांत ज्र्ोसतष क ग्रंथं मं इिी प्रणाली को े र्जुवेद मं नक्षिं की पूरी िंख्र्ा तथा उनकी अपनाकर मध्र्म ग्रह सनकाले गए हं ।असधष्टािी दे वताओं क नाम का उल्लेख फकर्ा गर्ा हं । े वेदांग ज्र्ोसतष और सिद्धांत ज्र्ोसतष काल केर्जुवेद मं सतसथ तथा पक्षं, उिर तथा दस्क्षण अर्न और भीतर कोई ज्र्ोसतष काल क भीतर कोई ज्र्ोसतष गणना ेत्रवषुव फदन का भी उल्लेख समलता है । त्रवषुव फदन वह है का ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता। फकतु इि बीर् क िाफहत्र् ं ेस्जि फदन िूर्ा त्रवषुवत ् तथा क्रांसतवृि क िंपात मं रहता े मं ऐिे प्रमाण समलते हं स्जनिे र्ह स्पष्ट है फक ज्र्ोसतषहै । क ज्ञान मं वृत्रद्ध अवश्र् होती रही है , उदाहरण क सलर्े, े े त्रवद्वानो क मतानुिार र्जुवेद कासलक आर्ं को े महाभारत मं कई स्थानं पर ग्रहं की स्स्थसत, ग्रहर्ुसत,गुरु, शुक्र तथा राहु कतु का ज्ञान था। र्जुवेद क े े ग्रहर्ुद्ध आफद का वणान है । इििे इतना स्पष्ट है फकरर्नाकाल क त्रवषर् मं त्रवद्वानं मं मतभेद होने क उपरांत े े महाभारत क िमर् मं भारतवािी ग्रहं क वेध तथा े ेभी र्फद हम पािात्र् पक्षपाती, कीथ का मत भी लं तो उनकी स्स्थसत िे पररसर्त थे।र्जुवेद की रर्ना 600 वषा ईिा पूवा हो र्ुकी थी। इिके सिद्धांत ज्र्ोसतष प्रणाली िे सलखा हुआ प्रथमपिात ् वेदांग ज्र्ोसतष का काल आता है , जो ई. पू. 400 पौरुष ग्रंथ आर्ाभट प्रथम की आर्ाभटीर्म ् (शक िं.वषं िे लेकर ई. पू. 1,400 वषा तक है । 421) है । तत्पिात ् वराहसमफहर (शक िं.427) द्वारा
  • 16. 16 मार्ा 2012िंपाफदत सिद्धांतपंसर्का है , स्जिमं पेतामह, वासिष्ठ, मधुि माधवि वािस्डतकावृतू शुक्रि शुसर्ि ग्रैष्मावृतूरोमक, पुसलश तथा िूर्सिद्धांतं का िंग्रह है । इििे र्ह ा नभि नभस्र्ि वात्रषाकावृतू इषिोजाि शारदावृतू िहितो पता र्लता है फक वराहसमफहर िे पूवा र्े सिद्धांतग्रंथ िहस्र्ि है मस्डतकावृतू तपि तपस्र्ि शैसशरावृतू।प्रर्सलत थे, फकतु इनक सनमााणकाल का कोई सनदे श नहीं ं े (सतत्रिर िंफहता 4.4.11)है । िामाडर्त: भारतीर् ज्र्ोसतष ग्रंथकारं ने इडहं अद्भत ु अथाात: मधु और माधव विंत ऋतु, शुक्र और शुसर्माना हं । आधुसनक त्रवद्वानं ने अनुमानं िे इनक कालं े ग्रीष्म ऋतु, नभि ् और नभस्र् वषाा ऋतु, इष और उजाको सनकाला है, और र्े परस्पर सभडन हं । इतना सनस्ित शरद् ऋतु, िहि और िहस्र् हे मंत ऋतु एवं तपि औरहै फक र्े वेदांग ज्र्ोसतष तथा वराहसमफहर क िमर् क े े तपस्र् सशसशर ऋतुवाले माि हं ।भीतर प्रर्सलत हो र्ुक थे। इिक बाद सलखे गए े ेसिद्धांतग्रंथं मं मुख्र् हं : ब्रह्मगुप्त (शक िं. 520) का तैत्रिरीर् ब्राह्मण क अनुशार: ेब्रह्मसिद्धांत, लल्ल (शक िं. 560) का सशष्र्धीवृत्रद्धद, तस्र् ते विंतः सशरः। ग्रीष्मो दस्क्षणः पक्षः।श्रीपसत (शक िं. 961) का सिद्धांतशेखर, भास्करार्ार्ा वषा पुच्छम ्। शरदिरः पक्ष। हे मंतो मध्र्म ्। ु(शक िं. 1036) का सिद्धांत सशरोमस्ण, गणेश (1420 (तैसतर ब्राह्मण 3.10.4.1)शक िं.) का ग्रहलाघव तथा कमलाकर भट्ट (शक िं. अथाात: वषा का सिर विंत, दाफहना पंख ग्रीष्म, बार्ां पंख1530) का सिद्धांत-तत्व-त्रववेक। शरद, पूंछ वषाा और हे मंत को मध्र् भाग कहा गर्ा हं । इि का तात्पर्ा हं की तैत्रिरीर् ब्राह्मण काल मं वषा कोप्रश्नव्र्ाकरणांग मं बारह मफहनो की बारह पूणमािी और ा पक्षी क रुप मं माना गर्ा हं और ऋतुओं को उिका ेबारह अमावस्र्ाओं क नाम और उनक फल इि प्रकार िे े े त्रवसभडन अंग बतलार्ा हं ।बतार्े हं ।ता कहं ते पुण्णमािी आफहतेसत वदे ज्जा तत्थ खलु इमातो इिी प्रकार ऋग्वेद मं ऋतु शब्द का प्रर्ोग कईबारि पुण्णमािीओ बारि अमाविाओ पण्णिाओ तं जहा स्थान पर फकर्ा गर्ा हं । ऋतु शब्द का प्रर्ोग वहां वषा िंत्रवट्ठी, पोट्ठवती, आिोई, कत्रिर्ा, मगसिरा, पोिी, क रुप मं हुवा हं । ऎतरे र् ब्राह्मण मं पांर् ही ऋतु बतार्ी े माही, फग्गुणी, र्ेिी, त्रविाही, जेट्ठामुला, अिाढी॥ गई हं । उिमं हे मंत और सशसशर इन दोनं ऋतुओं कोअथाात: श्रावण माि की श्रत्रवष्ठा, भाद्रपद् की पौष्ठवती, एक ही रुप मं माना गर्ा हं ।आस्श्वन की अिोई, कासताक की, कृ त्रिका, मागाशीषा की द्वादशमािाः पच्र्तावो हे मंतसशसशरर्ोः िमािेन।मृगसशरा, पौष की पौषी, माघ की माघी, फाल्गुन की (ऎतरे र् ब्राह्मण 1.1)फाल्गुनी, र्ैि की र्ैिी, वैशाख की वैशाखी, ज्र्ेष्ठ कीमूली एवं अषाढ़ की आषाढ़ी पूस्णामा बतार्ी गर्ी हं । त्रवषुवद् वृि का महत्व: त्रवषुवद् वृि मं एक िमगसत िे र्लनेवाले मध्र्म िूर्ाकहीं-कहीं पूणमासिर्ं क नामं क आधारप मािं क नाम ा े े े (लंकोदर्ािडन) क एक िूर्ोदर् िे दिरे िूर्ोदर् तक े ूभी सलए गए हं । एक मध्र्म िावन फदन होता है । र्ह वतामान कासलकऋतु त्रवर्ार: अंग्रेजी क सित्रवल िे जैिा है । एक िावन फदन मं 60 ेई.पू. 8000 मं विडत ऋतु ही प्रारं सभक ऋतु मानी जाती घटी; 1 घटी 24 समसनट िाठ पल; 1 पल 24 िंकि 60 ेथी, लेफकन ई.पू. 500 मं प्रारं सभक ऋतु वषाा ऋतु मानी त्रवपल तथा 2 1/2 त्रवपल 1 िंकि होते हं । िूर्ा क फकिी ं ेजाने लगी थी। तैत्रिरीर् िंफहता मं कहा गर्ा हं ।
  • 17. 17 मार्ा 2012स्स्थर त्रबंद ु (नक्षि) क िापेक्ष पृथ्वी की पररक्रमा क काल े े र्ुग प्रणाली इि प्रकार है :को िौर वषा कहते हं । र्ह स्स्थर त्रबंद ु मेषाफद है । ईिा के  कृ तर्ुग (ित्र्र्ुग) 17,28,000 वषापाँर्वे शतक क आिडन तक र्ह त्रबंद ु कांसतवृि तथा े  द्वापर 12,96,000 वषात्रवषुवत ् क िंपात मं था। े  िेता 8, 64,000 वषा अब र्ह उि स्थान िे लगभग 23 पस्िम हट  कसल 4,32,000 वषागर्ा है , स्जिे अर्नांश कहते हं । अर्नगसत त्रवसभडन ग्रंथं  र्ोग महार्ुग 43,20,000 वषामं एक िी नहीं है । र्ह लगभग प्रसत वषा 1 कला मानी  कल्प 1000 महार्ुग 4,32,00,00,000 वषागई है । वतामान िूक्ष्म अर्नगसत 50.2 त्रवकला है ।सिद्धांतग्रथं का वषामान 365 फदo 15 घo 31 पo 31 त्रवo िूर्ा सिद्धांत मं बताए आँकिं क अनुिार कसलर्ुग का े24 प्रसत त्रवo है । र्ह वास्तव मान िे 8।34।37 पलाफद आरं भ 17 फरवरी, 3102 ईo पूo को हुआ था। र्ुग िेअसधक है । इतने िमर् मं िूर्ा की गसत 8.27 होती है । अहगाण (फदनिमूहं) की गणना प्रणाली, जूसलर्न िे नंबरइि प्रकार हमारे वषामान क कारण ही अर्नगसत की े क फदनं क िमान, भूत और भत्रवष्र् की िभी सतसथर्ं े ेअसधक कल्पना है । की गणना मं िहार्क हो िकती है । वषं की गणना क सलर्े िौर वषा का प्रर्ोग फकर्ा ेजाता है । मािगणना क सलर्े र्ांद्र मािं का। िूर्ा और े गस्णत ज्र्ोसतष क ग्रंथं क दो वगीकरण हं : े ेर्ंद्रमा जब राश्र्ाफद मं िमान होते हं तब वह अमांतकाल सिद्धांतग्रंथ तथा करणग्रंथ। सिद्धांतग्रंथ र्ुगाफदतथा जब 6 रासश क अंतर पर होते हं तब वह े अथवा कल्पाफद पद्धसत िे तथा करणग्रंथ फकिी शक केपूस्णामांतकाल कहलाता है । आरं भ की गणनापद्धसत िे सलखे गए हं । गस्णत ज्र्ोसतष एक अमांत िे दिरे अमांत तक एक र्ांद्र माि ू ग्रंथं क मुख्र् प्रसतपाद्य त्रवषर् है : मध्र्म ग्रहं की ेहोता है , फकतु शता र्ह है फक उि िमर् मं िूर्ा एक ं गणना, स्पष्ट ग्रहं की गणना, फदक् , दे श तथा काल, िूर्ारासश िे दिरी रासश मं अवश्र् आ जार्। स्जि र्ांद्र माि ू और र्ंद्रगहण, ग्रहर्ुसत, ग्रहच्छार्ा, िूर्ा िांसनध्र् िे ग्रहंमं िूर्ा की िंक्रांसत नहीं पिती वह असधमाि कहलाता है । का उदर्ास्त, र्ंद्रमा की श्रृगोडनसत, पातत्रववेर्न तथा ंऐिे वषा मं 12 क स्थान पर 13 माि हो जाते हं । े वेधर्ंिं आफद की त्रववेर्ना की गई हं । इिी प्रकार र्फद फकिी र्ांद्र माि मं दो िंक्रांसतर्ाँ पोरास्णक शास्त्रों मं उल्लेख हं :पि जार्ँ तो एक माि का क्षर् हो जाएगा। इि प्रकार िप्त र् वै शतासन त्रवशसति िंवत्िरस्र्ाहोरार्र्ः।मापं क र्ांद्र रहने पर भी र्ह प्रणाली िौर प्रणाली िे े अथाात: वषा मं िात िौ बीि फदन और रात होते हं ।िंबंद्ध है । र्ांद्र फदन की इकाई को सतसथ कहते हं । र्ह िूर्ा जानकारं का कथन हं की इश्वर द्वारा स्थात्रपत काल केऔर र्ंद्र क अंतर क 12वं भाग क बराबर होती है । हमारे े े े पफहर्े का बारह माि क रुप मं बारह अरं वाला र्क्र ेधासमाक फदन सतसथर्ं िे िंबद्ध है 1 र्ंद्रमा स्जि नक्षि मं सनरडतर िूर्ा क र्ारं ओर घूम रहा है । इिमं फदन-रात ेरहता है उिे र्ांद्र नक्षि कहते हं । क जोिे रूप पुि िात िौ बीि त्रवद्यमान रहते हं , अथाात ् े असत प्रार्ीन काल मं वार क स्थान पर र्ांद्र े एक वषा मं बारह महीने होते हं और 360 फदन तथानक्षिं का प्रर्ोग होता था। काल क बिे मानं को व्र्क्त े 360 रातं समलकर 720 अहोराि सनरडतर गसत करतेकरने क सलर्े र्ुग प्रणाली अपनाई जाती है । े रहते हं ।
  • 18. 18 मार्ा 2012 वैफदक पंर्ांग का इसतहाि?  सर्ंतन जोशी भारतीर् ज्र्ोसतष ग्रहनक्षिं की गणना की अत्र्ंत अथाातः िमग्र वेदं का मूल तात्पर्ा र्ज्ञ कमो िे है , र्ज्ञंशूक्ष्म पद्धसत है स्जिका भारत मं उद्गम एवं त्रवकाि हुवा का िंपादन शुभ िमर् मं होता है । इि सलए शुभ िमर्हं । आजकल भी फहडद ु िंस्कृ सत मं इिी पद्धसत िे पंर्ांग र्ा अशुभ िमर् का ज्ञान ज्र्ोसतष शास्त्रो द्वारा ही िंभवबनाएं जाते हं । स्जनक आधार पर दे श भर मं धासमाक े होने िे ज्र्ोसतष शास्त्रो का नाम वेदांग ज्र्ोसतष कहाकार्ं िंपडन फकए जाते तथा त्रवसभडन व्रत-पवा-त्र्ौहार जाता है । वेद रूप को वेद पुरुष क मुख्र् छ: अंगं मं ेमनाए जाते हं । भारतीर् िंस्कृ सत मं वतामान िमर् मं व्र्ाकरण शास्त्रो वेद का मुख ज्र्ोसतष शास्त्रो दोनो नेिअसधकांश पंर्ांग िूर्सिद्धांत, ग्रह िारस्णर्ं तथा ग्रहलाघव ा सनरुक्त दोनो कान कल्प शास्त्रो दोनो हाथ सशक्षा शास्त्रोकी त्रवसध िे प्रस्तुत फकए जाते हं । कछ ऐिे भी पंर्ांग ु वेद की नासिका और छडद शास्त्रो वेद पुरुष क दोनो पैर ेबनते हं अडर् पद्धसत क आधार पर प्रस्तुत फकर्ा जाता े कहे गर्े हं । लेफकन पुरुष रूप मं वेदशास्त्रो का ज्र्ोसतषहं , प्रार्: इडहं भारतीर् सनरर्ण पद्धसत क अनुकल बना े ू शास्त्रो नेि िमान स्थानीर् होने िे ज्र्ोसतष शास्त्रो ही वेदफदर्ा जाता हं । का मुख्र् अंग हो जाता है ।हाथ पैर कान आफद िमस्त फहडद ु पंर्ांग अथाात फहडद ु कलंिर ै क बारे मं े इस्डदर्ं की स्स्थसत क उपरांत नेि स्थानीर् ज्र्ोसतष ेत्रवस्तार िे जानते हं । हमारे दे श मं लगभग 5,000 वषा शास्त्रो की अनसभज्ञता फकिी की नही होती इिसलएपूवा िे ही ग्रह, नक्षि, आफद क आधार पार काल अथाात े िवाशास्त्रों क अध्र्र्न की ििा होते हुवे भी ज्र्ोसतष ेिमर् की िूक्ष्म गणना की जाती थी। उि काल मं हमारं शास्त्रो मं ज्ञान की पररपक्वता िे वेदोक्त धमा और कमात्रवद्वान आर्ार्ं को इि बात का ज्ञान हो र्ुका था की नीसत भूत-भत्रवष्र्ाफद ज्ञान क िाथ सनस्ित रूप िे धमा ेएक र्ंद्र-माि मं ठीक 30 फदन नहीं होते, इि सलए एक अथा काम और मोक्ष की प्रासप्त होती है ।र्ांद्र वषा मं 360 िे कछ कम फदन होते हं । ु अतः र्ज्ञं क त्रवसशष्ट फल प्राप्त करने क सलर्े े े आज क आधुसनक र्ुग मं भारतीर् पंर्ांग क े े र्ज्ञं का सनधााररत िमर् पर होना आवश्र्क था इिसलर्ेत्रवषर् मं वैज्ञासनक मत हं , की भारत का प्रार्ीनतम वैफदककाल िे ही भारतीर्ं ने वेधं द्वारा िूर्ा और र्ंद्रमाउपलब्ध िाफहत्र् वैफदक िाफहत्र् हं । त्रवद्वानो क का मत े की स्स्थसतर्ं िे काल का ज्ञान प्राप्त करना शुरू करहं की वैफदक कालीन भारतीर् ऋत्रष-मुसन र्ज्ञ फकर्ा करते सलर्ा था। भारतीर् पंर्ांग िुधारिसमसत क आख्र्ा मं ेथे। फदए गए त्रववरण क अनुिार ऋग्वेद काल मं भारतीर् े आर्ार्ं ने र्ांद्र िौर वषा गणना पद्धसत का ज्ञान प्राप्त करइि त्रवषर् मं शास्त्रोोक्त मत इि प्रकार हं : - सलर्ा था। उि काल िे वे 12 र्ांद्र माि तथा र्ांद्र मािं वेदास्तावद र्ज्ञकमाप्रवृता: र्ज्ञा प्रोक्तास्ते तु कालाश्रर्ेण, को िौर वषा िे िामंजस्र् स्थात्रपत करनेवाले असधमािशास्त्रोादस्मात काबोधो र्त: स्र्ाद वेदांगत्वम ् ज्र्ोसतषस्र्ोक्तमस्िात ्।शब्दशास्त्रोम ् मुखम ् ज्र्ोसतषम ् र्क्षुषी श्रोिमुक्तम ् सनरुक्तम ् कल्प: करौ, को भी जानते थे। फदन को र्ंद्रमा क नक्षि िे दशााते थे। े र्ा तु सशक्षास्र् वेदस्र् नासिका पादपद्मद्वर्म ् छडदम ् आद्यैबध:॥ ुा ै उडहं र्ंद्रगसतर्ं क ज्ञान उपर्ोगी र्ंद्र रासशर्क्र का ज्ञान ेवेदर्क्षु: फकलेदम ् स्मृतम ् ज्र्ौसतषम ् मुख्र्ता र्ाडगमध्र्ेस्र् तेनोच्र्ते , था। वषा क फदनं की िंख्र्ा 366 थी, स्जनमं िे र्ांद्र वषा े िंर्तोपीतरै : कणानािाफदसभिक्षुषागंन हीनो न फकसर्त कर:। ु ं क सलर्े 12 फदन घटा दे ते थे। जानकारो क अनुिार े े तस्मात फद्वजैध्र्ार्नीर्मेतत पुण्र्म ् रहस्र्म ् परमडर् तत्वम, र्ो ज्र्ोसतषाम ् वेत्रि नर: ि िमर्क धमााथकामान लभते र्शि॥ ा
  • 19. 19 मार्ा 2012ऋग्वेद कालीन आर्ं का िमर् कम िे कम 1,200 वषा का िुधार’, ‘त्रवश्व कलंिर ै र्ोजना’ इत्र्ाफद लेखईिा पूवा अवश्र् होना र्ाफहए। प्रकासशत हुए। ‘प्रार्ीन एवं मध्र्र्ुगीन भारत मं काल अडर् त्रवद्वानो का कथ हं , फहडद ु ज्र्ोसतष मं एक सनधाारण की त्रवसभडन त्रवसधर्ां तथा शक िंवत ् कीिूर्ोदर् िे दिरे िूर्ोदर् तक का िमर् िावन फदन ू उत्पत्रि’, ‘शक िंवत ् की शुरुआत’ इत्र्ाफद लेखो परकहलाता हं । उि िमर् उडहे िावन माि और र्ांद्र माि व्र्ाख्र्ान फदर्ा। इन प्रर्ािं क पररणामस्वरूप 1952 मं ेका भी त्रवशेष ज्ञान प्राप्त हो र्ुका था। िमर् क िाथ े वैज्ञासनक एवं औद्योसगक अनुिंधान पररषद् ने एक कलंिर ैउडहं नक्षि और फफर सतसथ का ज्ञान प्राप्त हुआ। िुधार िसमसत गफठत की। िसमसत को दे श क त्रवसभडन े एिा अनुमान है की शक िंवत ् िे लगभग 1400 प्रांतं मं प्रर्सलत पंर्ांगं का अध्र्र्न करक िरकार को ेवषा पूवा तक सतसथ और नक्षि, िमर् क इन दो अंगं का े िटीक वैज्ञासनक िुझाव दे ने की स्जममेदारी िंपी गईही ज्ञान था। उिक बाद करण, र्ोग और वार का ज्ञान े ताफक पूरे दे श मं एक िमान नागररक कलंिर ै लागूप्राप्त हुआ होगा! स्जिक बाद सतसथ, नक्षि, वार, करण े फकर्ा जा िक। प्रो. मेघनाद िाहा इि कलंिर े ै िुधारऔर र्ोग, िमर् क इन पांर् अंगं िे ‘पंर्ांग’ अथाात े िसमसत क अध्र्क्ष सनर्ुक्त फकए गए। िसमसत क प्रमुख े ेकलंिर का त्रवकाि हुआ होगा। ै िदस्र् मं ए.िी.बनजी, क.क.दफ्तरी, जे.एि.करं िीकर, े े अपनी िभ्र्ता एवं िंस्कृ सत की आवश्र्कताओं गोरख प्रिाद, आर.वी.वैद्य तथा एन.िी. लाफहिी िासमलऔर धासमाक सतसथर्ं की गणना क सलए दे श क त्रवसभडन े े थे।प्रांतं मं कई प्रकार क पंर्ांग बनाए गए स्जनमं िे अनेक े पंर्ांगं मं िबिे प्रमुख िुफट थी वषा मं फदन कीपंर्ांग आज भी प्रर्सलत हं । लेफकन, प्रशािसनक तथा असधकता। पंर्ांग प्रार्ीन ‘िूर्ा सिद्धांत’ पर आधाररत होनेमानव िमाज िे िंबंधी त्रवशेष उद्दे श्र् क सलए िंशोसधत े क कारण वषा क कल फदन 365.258756 फदन होते है । े े ुऔर मानक भारतीर् राष्ट्रीर् कलंिर ै का प्रर्ोग फकर्ा वषा की 0.258756 र्ह असधकता वैज्ञासनक गणना परजाता है । आधाररत िौर वषा िे .01656 फदन असधक हं । प्रार्ीन भारतीर् राष्ट्रीर् कलंिर का सनमााण मं प्रोफिर ै े सिद्धांत अपनाने क कारण ईस्वी िन ् 500 िे वषा 23.2 ेमेघनाद िाहा जैिे िमत्रपात वैज्ञासनक क ितत प्रर्ािं े फदन आगे बढ़ र्ुका है । भारतीर् िौर वषा ‘विंत त्रवषुव’का फल माना जाता है । क्र्ोफक, कलंिर ै िुधार का औितन 21 मार्ा क अगले फदन मतलब 22 मार्ा िे शुरु ेिामास्जक, िांस्कृ सतक और धासमाक त्रवश्वािं पर िीधा होने क बजार् 13 र्ा 14 अप्रैल िे शुरु होता है । इिी ेप्रभाव पिने का खतरा मोल लेते हुए भी उडहंने कलंिर ै तौर पर र्ूरोप मं जूसलर्ि िीजर द्वारा शुरू फकए गएमं वैज्ञासनक िुधार का बीिा उठार्ा और हमारे कलंिर ै ‘जुसलर्न कलंिर ’ मं भी वषा मं कल 365.25 फदन ै ुको वैज्ञासनक और प्रामास्णक आधार प्रदान फकर्ा। सनधााररत फकए गए थे, स्जिक कारण 1582 ईस्वी आते- े प्रोफिर मेघनाद िाहा ने भारतीर् पंर्ांगं और े आते 10 फदन की िुफट हो र्ुकी थी। तब पोप ग्रेगरीकलंिर ै िुधार की आवश्र्कता पर त्रवसभडन प्रसिद्ध तेरहवं ने कलंिर ै िुधार क सलए आदे श दे फदर्ा फक उि ेत्रवज्ञान पत्रिकाओं मं लेख सलख कर इि त्रवषर् की ओर वषा 5 अक्टू बर को 15 अक्टू बर घोत्रषत कर फदर्ा जाए।िरकार और आम लोगं का ध्र्ान आकत्रषात फकर्ा। लीप वषा भी स्वीकार कर सलर्ा गर्ा। लेफकन, भारत मंकलंिर िे िंबंसधत उनक कछ प्रमुख लेख इि प्रकार थेः ै े ु िफदर्ं िे पंर्ांग र्ानी कलंिर ै मं इि प्रकार का कोईकलंिर ै (पंर्ांग) िुधार की आवश्र्कता, ‘कालांतर मं िंशोधन नहीं हुआ था।िंशोसधत कलंिर ै तथा ग्रेगोरीर् कलंिर ‘भारतीर् कलंिर ै ै
  • 20. 20 मार्ा 2012 कलंिर ै िुधार िसमसत क िदस्र्ं ने त्रवश्व कलंिर े ै र्ैि, वैिाख, ज्र्ेष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्र, आस्श्वन,र्ोजना का भी िुझाव फदर्ा और 1954 मं जेनेवा मं कासताक, अग्रहार्ण, पौष, माघ और फाल्गुन।आर्ोस्जत र्ूनेस्को क 18वं असधवेशन मं ‘त्रवश्व कलंिर ’ े ै िसमसत ने र्ह भी सिफाररशं की फक वषा कािुधार क सलए प्रस्ताव भेजा। कलंिर े ै िुधार िसमसत ने प्रारं भ विंत त्रवषुव क अगले फदन िे होना र्ाफहए। कलंिर े ै1955 मं अपनी ररपोटा प्रकासशत की। िसमसत ने मं र्ैि माि वषा का प्रथम माि होगा। र्ैि िे भाद्र तकप्रशािसनक तथा नागररक कलंिर ै क सलए महत्वपूणा े प्रत्र्ेक माि मं 31 फदन और आस्श्वन िे फाल्गुन तकिुझाव फदए। इन िुझावं क अनुिार राष्ट्रीर् कलंिर े ै मं प्रत्र्ेक माि मं 30 फदन हंगे। लीप वषा मं, र्ैि माि मंशक िंवत ् का प्रर्ोग फकर्ा जाना र्ाफहए। स्जि कारण 31 फदन हंगे अडर्था िामाडर् वषं मं 30 फदन ही रहं गे।इिकी गणनाएं शक िंवत ् िे की जाती हं । शक िंवत ् लीप वषा मं र्ैि माि की प्रथम सतसथ 22 मार्ा क बजार् ेकी प्रथम सतसथ ईस्वी िन ् 79 क विंत त्रवषुव िे प्रारं भ े 21 मार्ा होगी। िसमसत ने कहा फक जो उत्िव और अडर्होती हं । हमारे राष्ट्रीर् कलंिर ै मं शक िंवत ् 1879 महत्वपूणा सतसथर्ां 1400 वषा पहले स्जन ऋतुओं मं(अठारह िौ उनािी) क र्ैि माि की प्रथम सतसथ को े मनाई जाती थीं, वे 23 फदन पीछे हट र्ुकी हं । फफर भीआधार माना गर्ा हं , जो ग्रेगोरीर् कलंिर ै की गणना धासमाक उत्िवं की सतसथर्ां परं परागत पंर्ांगं िे ही तर्क अनुिार 22 मार्ा ईस्वी िन ् 1957 है । र्ानी, हमारा े की जा िकती हं । िसमसत ने धासमाक पंर्ांगं क सलए भी ेिंशोसधत राष्ट्रीर् कलंिर ै 22 मार्ा 1957 िे शुरू होता है । फदशा सनदे श फदए। र्े पंर्ांग िूर्ा और र्ंद्रमा की गसतर्ंिुधार िसमसत ने िुझाव फदर्ा फक वषा मं 365 फदन तथा की गणनाओं क आधार पर तैर्ार फकए जाते हं । भारतीर् ेलीप वषा मं 366 फदन हंगे। लीप वषा की पररभाषा दे ते मौिम त्रवज्ञान त्रवभाग प्रसत वषा भारतीर् खगोल पंर्ांगहुए िुझाव फदर्ा गर्ा फक शक िंवत ् मं 78 जोिने पर प्रकासशत करता है । छस्ट्टर्ं की सतसथर्ं की गणना इिी ुजो िंख्र्ा समले वह अगर 4 िे त्रवभास्जत हो जाए तो क आधार पर की जाती है । हमारे राष्ट्रीर् कलंिर े ै क लीप ेवह लीप वषा होगा। लेफकन, अगर वषा 100 का गुणज तो वषा त्रवश्व भर मं प्रर्सलत ग्रेगोरी कलंिर ै क िमान हं । ेहै लेफकन 400 का गुणज नहीं है तो वह लीप वषा नहीं ग्रेगोरीर् कलंिर ै मं 21 मार्ा की सतसथ विंत त्रवषुव र्ानीमाना जाएगा। राष्ट्रीर् परं परागत भारतीर् माि 12 हं : वनाल इस्क्वनॉक्ि मानी गई है । मंि सिद्ध मूंगा गणेश मूंगा गणेश को त्रवध्नेश्वर और सित्रद्ध त्रवनार्क क रूप मं जाना जाता हं । इि क पूजन िे जीवन मं िुख े े िौभाग्र् मं वृत्रद्ध होती हं ।रक्त िंर्ार को िंतुसलत करता हं । मस्स्तष्क को तीव्रता प्रदान कर व्र्त्रक्त को र्तुर बनाता हं । बार-बार होने वाले गभापात िे बर्ाव होता हं । मूंगा गणेश िे बुखार, नपुंिकता , िस्डनपात और र्ेर्क जेिे रोग मं लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् Rs: 550 िे Rs: 8200 तक मंगल र्ंि िे ऋण मुत्रक्त मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररक्त व्र्त्रक्त को े े ेऋण मुत्रक्त हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए े ेमंगल र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । प्राण प्रसतत्रष्ठत मंगल र्ंि क पूजन िे भाग्र्ोदर्, शरीर मं खून की ेकमी, गभापात िे बर्ाव, बुखार, र्ेर्क, पागलपन, िूजन और घाव, र्ौन शत्रक्त मं वृत्रद्ध, शिु त्रवजर्, तंि मंि क दष्ट प्रभा, भूत-प्रेत े ुभर्, वाहन दघटनाओं, हमला, र्ोरी इत्र्ादी िे बर्ाव होता हं । ु ा मूल्र् माि Rs- 550
  • 21. 21 मार्ा 2012 कलंिर व पंर्ांग मं क्र्ा अंतर हं ? ै  आलोक शमाा आधुसनक (ग्रेगोररर्न) कलंिर मं वार, फदनांक माि, ै िूर्ा क िीधे िामने रहता है वहां गमी रहती है । क्र्ंफक ेवषा का िमावेश होता हं । आधुसनक कलंिर मं हर र्ार िाल ै ऋतु मं अंतर अर्न व िूर्ोदर् इत्र्ाफद पृथ्वी क झुकाव ेक बाद एक लीप वषा होता है, लीप वषा 100 वषा पिात नहीं े िे होने वाले बदलाव क कारण होते हं । पृथ्वी की ेहोता एवं 400 वषा क बाद पुनः लीप वषा होता हं । इि प्रकार े पररक्रमा क कारण ऋतु मं अंतर नहीं पिता ऋतु मं ेकलंिर मं एक वषा मं कल 365.2425 फदन होते है जो फक ै ु अंतर पृथ्वी क झुकाव क कारण पिता हं । इि सलए े ेिार्न कलंिर क एक वषा क कल 365.2422 फदन क असधक ै े े ु े िार्न कलंिर बनार्ा जाता हं । ैकरीब है और स्जि कारण करीबन 3000 वषं बाद दोनं पृथ्वी का भूमध्र् भाग एकसलस्प्टक (Ecliptic) केकलंिरं मं 1 फदन का अंतर आता है । ै िाथ एक रे खा पर काटता है , स्जिका एक त्रबंद ु विंत आधुसनक कलंिर की तुलना मं भारतीर् पंर्ांग मं ै त्रवषुव व दिरा शरद त्रवषुव कहलाता है । र्ह रे खा पृथ्वी ूसतसथ, वार, नक्षि, र्ोग और करण आफद पांर् प्रमुख की धुरी क दोलन क कारण वह 50.3 प्रसतवषा की गसत े ेअंगं का िमावेश होता हं । इिक उपरांत एक एक उडनत े िे पस्िम की ओर स्खिकती है । पृथ्वी क पूणा 360 ेकलंिर मं िूर्ोदर्-िूर्ाास्त िमर् ज्ञान, िूर्, र्ंद्र आफद ै ा फिग्री र्लने को सनरर्ण और उिक पुनः उिी झुकाव मं ेग्रहं का रासश प्रवेश, शुभ-अशुभ मुहूता, आफद त्रवशेष आने को िार्न वषा कहते हं । इि कारण शरद त्रवषुव परजानकारीर्ां िमाफहत होती हं । पृथ्वी को पुनः आने मं 360 फिग्री िे लगभग 50" कम ज्र्ोसतष शास्त्रो क अनुशार सनरर्ण वषा मे कल े ु घुमना पिता है । र्ह अंतर ही अर्नांश कहलाता है ।365.2563 फदन होते है जो फक िूर्ा क एक रासश मं े एिा माना जाता हं की िार्न कलंिर व सनरर्ण ैप्रवेश िे अगले वषा उिी रासश मं प्रवेश का िमर् होता पंर्ांग 23 मार्ा 285 को एक िमान थे। तब िे लेकरहं । सनरर्ण वषा िार्न वषा िे 0.0142 फदन बिा है । इि आज तक अंदाजन दोनो मं 24 फदनं का अंतर हो गर्ासलए 100 वषं मं 1.42 फदनं का अंतर हो जाता है । इि है ।कारण पंर्ांग प्रसत 100 वषं िे कलंिर िे लगभग िे ढ़ ै इि सलए र्ैि माि, जो पहले फरवरी व मार्ा मंफदन आगे सनकल जाता है । इि कारण मकर िंक्रांसत आता था, अब र्ैि माि मार्ा व अप्रैल मं पिता हं । इिआफद फदनांक, सतसथ, िूर्रासश क अनुरुप मनाए जाने ा े सलए क्रमशः िभी माि मं अंतर हो गर्ा हं । स्जििे िभीवाले त्र्ौहारं मं अंतर आ जाता है और फहं द ू पवा, जो ऋतुओं एवं मफहनं मं अंतर होने लगे हं ।सतसथ क अनुिार मनाए जाते हं , धीरे -धीरे आगे सनकलते े िाधारणतः र्ह प्रश्न उठता हं की क्र्ाजाते हं । सनरर्ण पंर्ांग और िार्न कलंिर को एक िमान कर ैिार्न व सनर्रण गणना क्र्ा हं ? और दोनं मं क्र्ा दे ना र्ाफहए?अंतर हं ? इि पर त्रवद्वानो का एकमत उिर नहीं होगा,पृथ्वी अपनी धुरी पर िूर्ा की पररक्रमा एकसलस्प्टक क्र्ोफक दोनं सनरर्ण पंर्ांग और िार्न कलंिर अपने ै(Ecliptic) पर लगाती है । लेफकन र्ह लगभग 23.4 फिग्री स्थान पर ठीक हं ।झुकी होती है । पृथ्वी क इि झुकाव क कारण ही पृथ्वी े े कलंिर का सनमााण आम लोगो की िुत्रवधा एवं ैपर गमी व िदी पिती हं । झुकाव िे पृथ्वी का जो भाग आवश्र्क्ता क अनुरुप फकर्ा गर्ा है , इि सलए उिका े
  • 22. 22 मार्ा 2012िार्न होना ही ठीक है । इि कारण ऋतुएं व िूर्ोदर् कोई ठोि आधार नहीं हो िकता, लेफकन गस्णत केआफद स्स्थतीर्ां तारीख क अनुिार एक िमान बने रहते े आधार पर ही फसलत क प्रमुख िूि िुसनस्ित फकए जाने ेहं । र्ाफहए। पंर्ांग धासमाक कार्ं िे जुिे लोग, पंफित व त्रवद्वानो क मत िे िभी पंर्ांगं को अंतरााष्ट्रीर् ेज्र्ोसतषं आफद क सलए हं , क्र्ोफक पंर्ांग िे सतसथ, ग्रह, े मानक प्राप्त ग्रह स्पष्ट करने वाले कमप्र्ूटर प्रोग्राम िेनक्षि र्ोग आफद िे ग्रहं की स्पष्ट स्स्थसत जानी जाती है गणना करनी र्ाफहए, स्जििे दे श क त्रवसभडन धासमाक ेव शुद्ध गणना की जा िकती है । ग्रहं की स्स्थसत रासश एवं स्थानीर् पंर्ांगं मं अंतर िमाप्त हो और िावाजसनकअनुिार ही जानी जाती है , इि सलए गणना का सनरर्ण तौर पर मानव जासत को इि पंर्ांग िे लाभ प्राप्त होहोना िहज है । और पौरास्णक भ्रसमत करने वाली धारणाए िमाप्त हो। इि सलए इिे िार्न नहीं कर िकते। इिी कारण त्रवसभडन अर्नांश मं मतभेद िे ही ग्रह स्पष्ट एकिभी पंर्ांग सनरर्ण ही होते हं । ग्रहं की गणना क सलए े िमान नही होते। लेफकन आज जब सिफ िार्न और ािूर्ा को आधार लेकर फफर अर्नांश घटाकर ग्रह स्पष्ट सनरर्ण क भेद मं उलझे रहं गे, तो अर्नांश मं मतभेद ेकरना असत िुलभ होता है । अतः गणना क सलए प्रथम े रखने िे क्र्ा फार्दा। एिा मानाजाता हं की कछ ुिार्न गणना कर अर्नांश घटाकर सनरर्ण गणना कर अर्नांश कवल नाम क कारण र्लन मं हं । उनमं अंतर े ेली जाती है । ग्रह स्पष्ट की िार्न िारस्णर्ां उपल्बध इतने कम हं फक ज्र्ोसतष क द्वारा इिका ित्र्ापन करना ेहोती हं । लेफकन इिका तात्पर्ा र्ह नहीं है फक ग्रह अत्र्ंत दस्िाध्र् हं । ुिार्न गणनानुिार रासश मं भ्रमण करते हं । िभी ग्रह इि सलए मतभेद को त्र्ागकर गणना क सलए ेआकाश मंिल मं सनरर्ण गसत क अनुिार ही र्लते हं े सर्िापक्षीर् अथाात लहरी अर्नांश ही अपनाना र्ाफहए।और ज्र्ोसतष, जो फक रासशर्ं, नक्षिं पर आधाररत है , फसलत कथन क सलए ज्र्ोसतषी क अपने-अपने सनणार् हो े ेपूणतर्ा सनरर्ण ही है । इि सलए जो गणनाएं की जा रही ा िकते हं व उिक सलए कछ भी जोिा र्ा घटार्ा जा े ुहं , वे पूणा ित्र् हं , उडहं गलत मानकर फरबदल करने िे े िकता है ।अनेको भ्रामक स्स्थसतर्ां उत्पडन हो िकती हं । इि सलएकलंिर व पंर्ांग मं मतभेद एक स्वाभात्रवक स्स्थती है । ै पंर्ांग की सभडनता: पंर्ांग की सभडनता का प्रमुख कारण हं सतसथपंर्ांग सनमााण मं आधुसनक प्रणाली आवश्र्क? सनणार् मं की अलग-अलग त्रवसध। स्जिक कारण पवं को े पंर्ांगं क िमान होने मं मुख्र् आवश्र्क्ता होती े लेकर दे श क त्रवसभडन स्थानो मं क लोगं की अलग- े ेहं , ग्रह स्पष्ट सिद्धांत को एक करना। दे श मं कछ ु अलग माडर्ता हं ।स्नानीर् पंर्ांग पौरास्णक िूर्ा सिद्धांत र्ा अडर् सिद्धांतं िाधारणतः सतसथ सनणार् मं िूर्ोदर् की भूसमकाक आधार पर ही गणना करते हं , लेफकन आज क े े प्रमुख होती हं । अलग-अलग स्थान क अनुिार िूर्ोदर् ेआधुसनक र्ुग मं आधुसनक गणना को गलत मानना का िमर् बदल जाता है । र्फद िूर्ोदर् िमर् केकवल परमपरासनष्ठता है । स्जि कारण ज्र्ोसतष क फसलत े े आिपाि सतसथ बदल रही हो, तो स्थान क अनुिार सतसथ ेमं गणनाओं का गलत आना प्रमुख कारण होता हं । इिमं मं पररवतान हो जाता है और पंर्ांग मं भी अंतर होता हं ।हमं कवल फसलत क सिद्धांतं मं बदलाव लाने र्ाफहए े े स्जििे सतसथ पर सनधााररत पवं मं भी अंतर आ जाता है ।गस्णत सिद्धांतो मं नहीं। त्रवशेष कर फसलत गस्णत का
  • 23. 23 मार्ा 2012इि सलए पंर्ांग की गणना स्थानीर् िूर्ोदर् िमर् के अतः गणना क सलए कवल सतसथ क अनुिार पवा े े ेअनुरुप सतसथ का सनणार् कर पवा की गणना होती हं । की गणना कर दे ने क कारण र्ह अंतर आता है । र्फद े कभी-कभी एक पवा दो तारीखं को पिता है । ऐिा पवा की गणना त्रवसधवत्की जाए, तो इि प्रकार क अंतर ेअक्िर जडमाष्टमी व दीपावली क िाथ होता है । कारण है े नहीं आएंगे। फहं द ू धमा ग्रंथं मं पवा गणना क सलए ेदोनं पवं मं मध्र्रात्रि कालीन सतसथ, नक्षि आफद का त्रवस्तृत िूि उपलब्ध हं , स्जििे गणना मं कोई िंदेहसलर्ा जाना। प्रार्ः प्रातःकाल मं सतसथ दिरी होती है । ू मुमफकन नहीं है । पंर्ांग मं असधक माि क्र्ा हं ? त्रवद्वानो क मतानुशार एक िौर वषा और र्ांद्र वषा क त्रबर् मं िामंजस्र् स्थात्रपत करने क सलए हर तीिरे वषा े े ेपंर्ांगं मं एक र्ाडद्रमाि की वृत्रद्ध होती है । इिी को असधक माि र्ा असधमाि र्ा मलमाि कहते हं । िौर वषा का मान365 फदन, 15 घिी, 22 पल और 57 त्रवपल हं । जबफक र्ांद्रवषा 354 फदन, 22 घिी, 1 पल और 23 त्रवपल का होताहै । इि प्रकार दोनं वषामानं मं प्रसतवषा 10 फदन, 53 घटी, 21 पल (अथाात लगभग 11 फदन) का अडतर पिता है । इिअडतर मं िमानता लाने क सलए र्ांद्रवषा 12 मािं क स्थान पर 13 माि का हो जाता है । वास्तव मं र्ह स्स्थसत स्वर्ं े ेही उत्त्पडन हो जाती है , क्र्ंफक स्जि र्ंद्रमाि मं िूर्ा िंक्रांसत नहीं पिती, उिी को असधक माि की िंज्ञा दे दी जाती हैतथा स्जि र्ंद्रमाि मं दो िूर्ा िंक्रांसत का िमावेश हो जार्, उिे क्षर्माि कहाँ जाता है । क्षर्माि कासताक, मागा वपौि मािं मं होता है । स्जि वषा क्षर् माि पिता है , उिी वषा असध-माि भी पिता है परडतु र्ह स्स्थसत 19 वषं र्ा141 वषं क पिात ् आती है । जैिे त्रवक्रमी िंवत 2020 एवं 2039 मं क्षर्मािं का आगमन हुआ तथा भत्रवष्र् मं ेिंवत 2057, 2150 मं पिने की िंभावना हं । द्वादश महा र्ंि र्ंि को असत प्रासर्न एवं दलभ र्ंिो क िंकलन िे हमारे वषो क अनुिंधान द्वारा बनार्ा गर्ा हं । ु ा े े  परम दलभ वशीकरण र्ंि, ु ा  िहस्त्रोाक्षी लक्ष्मी आबद्ध र्ंि  भाग्र्ोदर् र्ंि  आकस्स्मक धन प्रासप्त र्ंि  मनोवांसछत कार्ा सित्रद्ध र्ंि  पूणा पौरुष प्रासप्त कामदे व र्ंि  राज्र् बाधा सनवृत्रि र्ंि  रोग सनवृत्रि र्ंि  गृहस्थ िुख र्ंि  िाधना सित्रद्ध र्ंि  शीघ्र त्रववाह िंपडन गौरी अनंग र्ंि  शिु दमन र्ंि उपरोक्त िभी र्ंिो को द्वादश महा र्ंि क रुप मं शास्त्रोोक्त त्रवसध-त्रवधान िे मंि सिद्ध पूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत एवं र्ैतडर् र्ुक्त फकर्े े जाते हं । स्जिे स्थापीत कर त्रबना फकिी पूजा अर्ाना-त्रवसध त्रवधान त्रवशेष लाभ प्राप्त कर िकते हं । GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 24. 24 मार्ा 2012 पंर्ांग का मूल आधार?  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, त्रवजर् ठाकुर फहडद ू िंस्कृ सत मं पंर्ांग का त्रवशेष महत्व है । भारसतर् िंस्कृ सत मे मुहूता का महत्वहमारे र्हां पंर्ांग मं वस्णात सतसथ, पक्ष, ग्रह, नक्षि आफद भारसतर् िंस्कृ सत मे मुहूता का त्रवशेष महत्व हं ।की स्स्थती क आधार पर जीवन क त्रवसभडन 16 िंस्कारं े े हमारे ऋत्रष-मुसन त्रवद्वान आर्ार्ं ने जडम िे अंत्र्ेत्रष्ट(मृतिे लेकर र्ािा इत्र्ाफद कार्ं हे तु भी शुभ मुहूता का र्र्न व्र्त्रक्त फक अंसतम फक्रर्ा) तक िभी िंस्कारं एवं अडर्करने पर त्रवशेष जोर फदर्ा जाता हं । िभी मांगसलक कार्ं क सलए मुहूता का त्रवधान आवश्र्क े शुभ मुहूता दे खने का मुख्र् उद्दे श्र् होता हं की बतार्ा गर्ा हं ।फकिी कार्ा त्रवशेष मं िफलता फक प्तासप्तव्र्त्रक्त को अपने शुभ कार्ा मे सनस्ित िफलता प्राप्त हो हे तु सनस्ित मुहूता का र्ुनाव फकर्ा जाता हं । भारतीर्िक मुख्र्तः अर्न, त्रवषुव, ऋतु, िूर्ा एवं र्ंद्र, पक्ष, े ज्र्ोसतष सिद्धाडत क अनुशार हर मुहूता का अपना ेसतसथ, नक्षि, करण, र्ोग, िूर्ोदर् व र्ंद्रोदर्, फदनमान, वैज्ञासनक प्रभाव एवं महत्व हं । कोई भी व्र्त्रक्त इन मुहूतारात्रिमान और पंर्ांग क मुख्र् अंग माने जाते हं । उपरोक्त े क प्रभाव एवं महत्व क बारे मे पूणा जानकारी प्राप्त कर े ेिभी महत्वपूणा स्स्थतीर्ं का गस्णत क आधार पर िूक्ष्म े व्र्त्रक्त अपने फकिी भी कार्ा उद्दे श्र् मं त्रवशेष िफलतात्रवश्लेषण फकर्ा जाता है । प्रासप्त हे तु उसर्त मुहूता का र्ुनाव कर िफलता प्रासप्त फक त्रवद्वानो क मत िे वैफदक प्रणाली मं इनका कोई े िंभावना बढा िकते हं । एवं ज्र्ोसतषीर् मत िे शुभ फलत्रवशेष सनदे श नहीं है । लेफकन कालगणना मं पररशुद्धता के प्रदान करने वाले मुहूता मं फकर्े गर्े कार्ो मं उि कार्ासलए इडहं अपनार्ा जाता हं । की िफलता की िंभावना कई गुणा बढ़ जाती है । पृथ्वी िूर्ा क आकषाण िे सनधााररत एक सनर्त े प्रार्ः हर मुहूता का सनणार् ब्रह्मांि मं स्स्थत ग्रहोमागा मं ितत भ्रमण करती है । िाधारणतः पृथ्वी िे िूर्ा फक स्स्थसतर्ं फक गणना कर फकर्ा जाता हं । भारसतर्स्जि मागा पर र्लता हुआ प्रतीत होता है , उिे ज्र्ोसतष िंस्कृ सत मं प्रार्ः हर शुभ कार्ा मं भारत क प्रमुख 16 ेकी पाररभात्रषक शब्दावली मं क्रांसतवृि अथाात एकसलस्प्टक िंस्कारो को िंपडन करने हे तु मुहूता का र्ुनाव असत(Ecliptic) कहते हं । इि क्रांसतवृि मागा क 9 अंश िे बने े आवश्र्क माना गर्ा हं । क्र्ोफक शुभा मुहूता मं फकर्े गर्ेत्रवस्तार को भर्क्र कहते हं । पृथ्वी की सनर्त गसत के हर शुभ कार्ा अत्र्ासधक शुभ फल प्रदान करने वाले होते हं ।कारण ही अर्न, त्रवषुव, ऋतु एवं फदन-रात होते हं । िंक्रांसत सनधाारण और पंर्ांग की पररशुद्धता मं गणेश लक्ष्मी र्ंि: प्राण-प्रसतत्रष्ठत गणेश लक्ष्मीअर्न और त्रवषुव सतसथर्ं की भूसमका प्रमुख मानी जाती र्ंि को अपने घर-दकान-ओफफि-फक्टरी मं पूजन स्थान, ु ैहं । स्जि प्रकार पृथ्वी का िंबंध िूर्ा क्रांसतवृि िे रहता गल्ला र्ा अलमारी मं स्थात्रपत करने व्र्ापार मं त्रवशेषहै उिी प्रकार पृथ्वी का िंबंध िे र्ंद्र अपने सनस्ित माग्र लाभ प्राप्त होता हं । र्ंि क प्रभाव िे भाग्र् मं उडनसत, ेमं भ्रमण करता है । अडर् ग्रहो की अपेक्षा र्ंद्र असत शीघ्र मान-प्रसतष्ठा एवं व्र्ापर मं वृत्रद्ध होती हं एवं आसथाकगसत करता है इि सलए र्ंद्र जब िूर्ा िे 12 अंशं के स्स्थमं िुधार होता हं । गणेश लक्ष्मी र्ंि को स्थात्रपतअंतर पर आता है , तब एक सतसथ का क्रम पूरा हो जाता करने िे भगवान गणेश और दे वी लक्ष्मी का िंर्ुक्तहै । इि प्रकार क्रमशः 12-12 अंशं क अंतर िे सनर्समत े आशीवााद प्राप्त होता हं । Rs.550 िे Rs.8200 तकसतसथर्ां बदलती हं ।
  • 25. 25 मार्ा 2012 दे श क त्रवसभडन प्रांतो मं नववषा का प्रारं भ े  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी भारत मं प्रर्लीत त्रवसभडन कलंिर एवं नववषा ै फदनांक नाम वषा 21 मार्ा राष्ट्रीर् (शासलवाहन) शक िंवंत 1934 प्रारं भ 23 मार्ा- त्रवक्रम िमवत्िर (र्ाडद्रवषा) 2069 प्रारं भ 14 अप्रैल बंगाली नववषा 1419 प्रारं भ 16 अप्रैल श्रीवल्लभ िंवंत 535 प्रारं भ 26 अप्रैल आद्य शंकर िंवंत 2519 प्रारं भ 2 मई श्रीफहत िंवंत 539 प्रारं भ 6 मई बुद्ध पररसनवााण िंवंत 2556 प्रारं भ 2 जून सशवराज शक िंवंत 339 प्रारं भ 3 जुलाई मैसथल िाल 1420 प्रारं भ 1 अक्टू बर फिली िन 1420 प्रारं भ 14 नवंबर बुद्ध पररसनवााण िंवंत 2556 प्रारं भ 14 नवंबर नेपाली िंवंत 1133 प्रारं भ 14 नवंबर गुजराती िमवत्िर 2069 प्रारं भ 16 नवंबर इस्लामी फहजरी िन (मुि.) 1434 प्रारं भ दे श क त्रवसभडन प्रांतं मं मनार्े जाने वाले नववषा े 15, जानवरी पंगल (तसमल नववषा) 23, मार्ा उगाफद (आंध्रप्रदे श) 23, मार्ा गुिी पिवा (महाराष्ट्र) 24, मार्ा र्ैती र्ाँद (सिंधी) 13, अप्रेल त्रवशु (तसमल नव वषा) 14, अप्रेल त्रवशु (करला वषा) े 14, अप्रेल रंगाली त्रबहू (आिाम)लेख को पाठको क ज्ञानवधान क उद्दे श्र् िे प्रकासशत फकर्ा गर्ा हं । उपरोक्त वस्णाक जानकारीर्ां त्रवसभडन माध्र्म िे े ेप्राप्त हं । स्जिे अत्र्ंत िावधानीपूवक िंग्रह कर प्रस्तुत फकर्ा गर्ा हं । फफर भी र्फद िंबंसधत धमा/िंिकृ सत/िभ्र्ता क ा ेपवा सनणार्/नववषा को दशााने मं, दशाार्े गए क िंकलन, प्रमाण पढ़ने, िंपादन, फिजाईन, टाईप, त्रप्रंफटं ग ्, प्रकाशन मं ेकोई िुफट रह गई हो, तो उिे त्रवद्वान पाठक स्वर्ं िुधार लं। िंपादक एवं लेखक एवं गुरुत्व कार्ाालर् पररवार केिदस्र्ं की इि िंदभा मं कोई स्जममेदारी र्ा जवाबदे ही नहीं रहे गी।
  • 26. 26 मार्ा 2012 ज्र्ोसतष क अनुशार शुभ-अशुभ मुहूता का प्रभाव? े  राकेश पंिा आज की अत्र्ाधुसनक वैज्ञासनक पद्धसत क अनुिार े उडहंने िबिे महत्त्वपूण्ाा बात र्ह िमझी फकब्रह्माणि मं िमर् अथाात काल व अनंत आकाश क असतररक्त े मनुष्र् आकाशीर् त्रपंिं के िहर्ोग िे फकतनेिमस्त वस्तुएं मर्ाादा र्ुक्त हं । इि सलए िमर् का न ही कोई आिर्ाजनक रुप िे अपने महत्वपूणा कार्ं मं िफलताप्रारं भ है न ही कोई अंत है । अडर् शब्दं मं िमझे तो हम एिे प्रासप्त क सलए एवं जीवन क्रम को अथाात अपने भत्रवष्र् ेकोई भी त्रवशेष क्षण को सर्स्डहत नहीं कह िकते फक कब को उज्जवल कर िकता हं । एक शुभ मुहूता मं प्रारं भिमर् अस्स्तत्व मं आर्ा र्ा िमर् इि क्षण िे आरं भ होता फकर्ा गर्ा कोभी कार्ा मनुश्र् को शीघ्र ही जीवन मंहै । इिी तरह हम र्ह भी नहीं कह िकते है फक, इि क्षण के िभी प्रकार िुख को प्राप्त कर अनेको उपलस्ब्धर्ां फदलानेबाद िमर् का अस्स्तत्व िमाप्त हो जाएगा?, र्ा िमर् मं िमथा होता हं ।र्हाँ रुक जाएगा। मुहूता हमारे त्रवद्वानो द्वारा खोज की गई िवाासधक क्र्ोफक अनंत आकाश की िमर् की तरह कोई महत्त्वपूण्ाा पररकल्पना है । मुहूता का अथा है फकिी भीमर्ाादा नहीं है, इि सलए तो इिका कहीं भी प्रारं भ र्ा कार्ा को करने क सलए िबिे िवाासधक उिम िमर् र्ा ेअंत नहीं होता हं । शुभ िमर् व सतसथ का र्र्न करना। आधुसनक मानव ने इन दोनं तत्वं को हमेशा कार्ा पूण्ाातः फलदार्क हो इिक सलए िमस्त ेिमझने का व अपने अनुिार इनमं त्रवर्रण करने का ग्रहं व अडर् ज्र्ोसतष तत्वं का िूक्ष्म त्रवश्लेषण फकर्ाप्रर्ाि फकर्ा है , लेफकन उिे भी तक कोई िफलता प्राप्त जाता है फक वे दष्प्रभावं को त्रवफल कर दे ते है । वे ुनहीं हुई है । मनुष्र् की जडम कण्िली की िमस्त बाधाओं को दर ु ू र्े दोनं तत्व त्रवसभडन रुपंमं अपना महातमर् करने मं व दर्ोगं को हटाने मं िहार्क होते हं । ुमनुष्र् पर जमाते आए है । र्ह दोनं तत्व मानव जीवन मुहूता मनुष्र् क सलए ग्रह, नक्षि एवं र्ोग का ेको अत्र्ंत ही महत्वपूण्ाा तरीक िे मानुष्र् को प्रभात्रवत े ऎिा अनूठा िंगम है फक वह कार्ा करने वाले मनुष्र् कोकरते है । पूण्ाातः िफलता की ओर उडमुख कर दे ता है । प्रार्ीन ऋषी-मुसनर्ं को इन दोनं तत्वं का भली इि सलए त्रवद्वानो का मत हं की मनुष्र् जब भीभांसत बोध था। इि सलए उडहंने अपने आत्मीर् एवं अपने जीवन मं ऎिा महत्वपूणा कार्ा करने जा रहा हं,मनोबलि िे िामथ्र्ा, सर्ि की एकाग्रता व कस्डद्रत े स्जिमं उिका असधक िमर् व शत्रक्त प्रर्ोग मं हुवा होध्र्ान िे, पूण्ाा र्ैतडर् व अद्धा र्ैतडर् शत्रक्त व बल िे एवं अथवा इि कार्ा का मनुष्र् क जीवन पर काफी िमर् ेउच्र्कोफट क ज्ञान व अपनी फदव्र् ज्ञानर्क्षु िे इन तत्वं े तक प्रभाव रहने वाला हो, तब उिे र्ह कार्ा शुभ मुहूताको िमझ सलर्ा था जो फक आज फक अत्र्ाधुसनक मं ही करना र्ाफहए। स्जििे र्ह कार्ा असत शीघ्रतकनीक िे कोिं दर हं । ू फलदार्क होगा व वहँ असधक िुखमर्ी व िंतुष्ट जीवन उडहंने दे खा व जाना किे िमर् व अनंत ब्रह्मांि ै व्र्तीत कर िक। ेफक शत्रक्तर्ां हमं प्रभात्रवत करती है , किे नक्षिा व ग्रहं ै ज्र्ोसतष त्रवद्या मं कार्ा का प्रारं भ िमर्, कण्िली ुका मेल हमारे जीवन को महत्त्वपूण्ाा फदशा व पररवतान व उिकी गणना करक फकर्ा जाता है । इि सलए फकिी ेदे ता है । भी शुभकार्ा करने क सलए उिक प्रारं भ करने का िमर् े े
  • 27. 27 मार्ा 2012अथाात मुहूता असत महत्वपूण्ाा होता है । मनुष्र् का भत्रवष्र् र्ोगाफद क शुभत्व का िूक्ष्म अध्र्र्न करक कछ र्ोग े े ुएवं जीवन की महत्वपूणा घटनाएँ इि बात पर सनभार ऎिे भी होते हं जो फक फकिी दोष त्रवशेषं को हटाने वालेकरती हं फक उिका जडम फकि िमर् हुआ था। लेफकन र्ोगं होते हं , जो हजारं बुरे प्रभाव हटा दे ते है । इि तरहमनुष्र् फक त्रविमबना तो र्ह है फक मनुष्र् का स्वर्ं के िे, पंर्ांग तत्त्वं क शुभत्व क असतररक्त भी वे िमस्त े ेजडम िमर् पर कोई सनर्ंिण नहीं है । लेफकन जीवन के घटक फक अवश्र् जाँर् करनी र्ाफहए, जो मुहूता पर शुभअडर् फक्रर्ा-कलापं पर उिका पूण्ाा सनर्ंिरण है । इि प्रभाव िालते हं ।सलए वह कार्ा करने का िमर् स्वर्ं िुसनस्ित कर अशुभ र्ोगिकता है । र्ही मुहूता की पररभाषा है । र्फद कार्ा प्रारं भ जैिा की हमने बतार्ा की अशुभ तत्त्व भी हमेशा हीका िमर् शुभ हं तो कार्ाफल सनस्ित रुप िे फलदार्क मौजूद होते हं । आवश्र्कता है फकिी एिी र्ुत्रक्त की जोएवं इस्च्छत होगा। इि सलए तो कहाँ जाता हं की शुभ अशुभ घटकं को असधक िे असधक कम कर िकए ेप्रारं भ अथाात आधा कार्ा स्वतः पूण्ाा होना। असधक अशुभ घटकं को हटा िक तथा उपस्स्थत अशुभ ेशुभ र्ोग घटकं को प्रभावहीन कर िक। अतः अशुभ व दोषपूणा िंर्ोजन ेमुहूता अच्छे व बुरे दोनं र्ोगं का समश्रण है । कोई भी को दे ख ही फकिी मुहूता का र्र्न करना र्ाफहए, इि प्रकार िभीमुहूता अपने आप मं पूणा रुप िे शुभ नहीं होता है , स्जि पररस्स्थसतर्ं का पूणा अध्र्र्न करना आवश्र्क होता है ।पर कोई भी बुरा प्रभाव न हो। लेफकन ग्रहं क त्रवशेष े मंि सिद्ध स्फफटक श्री र्ंि "श्री र्ंि" िबिे महत्वपूणा एवं शत्रक्तशाली र्ंि है । "श्री र्ंि" को र्ंि राज कहा जाता है क्र्ोफक र्ह अत्र्डत शुभ फ़लदर्ी र्ंि है । जो न कवल दिरे र्डिो िे असधक िे असधक लाभ दे ने मे िमथा है एवं िंिार क हर व्र्त्रक्त क सलए फार्दे मंद िात्रबत होता े ू े े है । पूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा र्ैतडर् र्ुक्त "श्री र्ंि" स्जि व्र्त्रक्त क घर मे होता है उिक सलर्े "श्री र्ंि" अत्र्डत फ़लदार्ी े े सिद्ध होता है उिक दशान माि िे अन-सगनत लाभ एवं िुख की प्रासप्त होसत है । "श्री र्ंि" मे िमाई अफद्रसतर् एवं अद्रश्र् शत्रक्त े मनुष्र् की िमस्त शुभ इच्छाओं को पूरा करने मे िमथा होसत है । स्जस्िे उिका जीवन िे हताशा और सनराशा दर होकर वह ू मनुष्र् अिफ़लता िे िफ़लता फक और सनरडतर गसत करने लगता है एवं उिे जीवन मे िमस्त भौसतक िुखो फक प्रासप्त होसत है । "श्री र्ंि" मनुष्र् जीवन मं उत्पडन होने वाली िमस्र्ा-बाधा एवं नकारात्मक उजाा को दर कर िकारत्मक उजाा का ू सनमााण करने मे िमथा है । "श्री र्ंि" की स्थापन िे घर र्ा व्र्ापार क स्थान पर स्थात्रपत करने िे वास्तु दोष र् वास्तु िे े िमबस्डधत परे शासन मे डर्ुनता आसत है व िुख-िमृत्रद्ध, शांसत एवं ऐश्वर्ा फक प्रसप्त होती है । गुरुत्व कार्ाालर् मे "श्री र्ंि" 12 ग्राम िे 2250 Gram (2.25Kg) तक फक िाइज मे उप्लब्ध है . मूल्र्:- प्रसत ग्राम Rs. 8.20 िे Rs.28.00 GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
  • 28. 28 मार्ा 2012 भद्रा त्रवर्ार  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी एिी पौरास्णक माडर्ता हं की पुवा काल मं दे व का प्रस्ताव रखा, िभी ने उनक प्रस्ताव ठु करा फदर्ा। र्हां ेदानव र्ुद्ध मं सशव शंकर क दे ह िे र्ह भद्रा उत्पडन हुई े तक फक भद्रा ने िूर्ा दे व द्वारा बनवार्े गर्े अपने त्रववाहहं । अडर् माडर्ता क अनुशार भद्रा भगवान िूर्ा दे व की े मण्िप, तोरण आफद नष्ट कर फदर्ा तथा िभी लोगं कोपुिी और शसनदे व की बहन है । शसन की तरह ही इिका और भी असधक कष्ट दे ने लगी।स्वभाव भी क्रर माना गर्ा है । इि उग्र स्वभाव को ू उिी िमर् दे व-दानव-मानव क दःख को दे खकर े ुसनर्ंत्रित करने के सलए ही भगवान ब्रह्मा ने उिे ब्रह्मा जी िूर्ा क पाि आर्े। िूर्ा िे अपनी कडर्ा को ेकालगणना अथाात पंर्ाग क एक प्रमुख अंग करण मं े िडमागा पर लाने क सलए ब्रह्मा जी िे उसर्त परामशा दे ने ेस्थापीत फकर्ा। को कहा। तब ब्रह्मा जी ने त्रवत्रष्ट को बुलाकर कहा- भद्रे , भद्रा की उत्पत्रि क त्रवषर् मं एिा माना जाता हं े बव, बालव, कौलव आफद करणं क अंत मं तुम सनवाि ेकी दै त्र्ं को मारने क सलर्े भद्रा गदा भ (गधा) क मुख े े करो और जो व्र्त्रक्त र्ािा, गृह प्रवेश तथा अडर्और लंबे पुछँ िफहत और तीन पैर र्ुक्त उत्पडन हुई है । मांगसलक कार्ा तुमहारे िमर् क दौरान करे , तो तुम ेसिंह जैिी मुदे पर र्ढी हुई िात हाथ और शुष्क पेटवाली उडहीं मं त्रवघ्न करो, जो तुमहारा आदर न करे , उनकामहाभर्ंकर, त्रवकराल मुखी, कार्ा का नाश करने वाली, कार्ा तुम त्रबगाि दे ना। इि प्रकार त्रवत्रष्ट को उपदे श दे करअस्ग्न, ज्वाला िफहत दे वं द्वारा भेजी गई भद्रा पृथ्वी पर ब्रह्मा जी अपने लोग र्ले गर्े।उतरी है । अतः शुभ कार्ं मं भद्रा त्र्ागना ही िवाश्रष्ठ है । े ब्रह्माजी क बात िुनकर त्रवत्रष्ट अपने िमर् मं दे व- े भद्रा पंर्ांग क पांर् अंगं मं िे एक अंग-करण े दानव-मानव िमस्त प्रास्णर्ं को कष्ट दे ती हुई घूमनेपर आधाररत है र्ह एक अशुभ र्ोग है । भद्रा (त्रवत्रष्ट लगी। इि प्रकार भद्रा की उत्पत्रि हुई।करण) मं अस्ग्न लगाना, फकिी को दण्ि दे ना इत्र्ाफद भद्रा का दिरा नाम त्रवष्टी करण हं । ुिमस्त दष्ट कमा तो फकर्े जा िकते हं फकतु फकिी भी ु ं कृ ष्णपक्ष की तृतीर्ा, दशमी और शूक्ल पक्ष की र्तुथीमांगसलक कार्ा क सलए भद्रा िवाथा त्र्ाज्र् है । े एकादशी क उिराधा मं एवं कृ ष्णपक्ष की िप्तमी, र्तुदाशी, े पौरास्णक कथा क अनुिार भद्रा भगवान िूर्ा े शुक्लपक्ष की अष्टमी, पुस्णामा क पुवााधा मं भद्रा रहती है । ेनारार्ण की कडर्ा है , भद्रा िूर्ा की पत्नी छार्ा िे स्जि भद्रा क िमर् र्ँद्रमा मेष, वृष, समथुन, वृस्िक ेउत्पडन है । भद्राका स्वरुप काले वणा, लंबे कश तथा बिे - े रासश मं स्स्थत हो तो भद्रा सनवाि स्वगा मं रहता है ।बिे दांतं वाली तथा भर्ंकर रूप वाली कडर्ा है । र्ंद्रमा कडर्ा,तुला, धनु, मकर रासश मं हो तो भद्रा जडम लेते ही भद्रा र्ज्ञं मं त्रवघ्न-बाधा पहुंर्ाने पाताल मं वाि करती हं और कक, सिंह, कभ, मीन राशी ा ुंलगी और उत्िवं तथा मंगल-र्ािा आफद मं उपद्रव करने का र्ंद्रमा हो तो भद्रा का भुलोक पर सनवाि रहता है ।लगी तथा िंपूणा जगत को पीिा पहुंर्ाने लगी। उिक दष्ट े ु शास्त्रों क अनुिार भुलोक की भद्रा ही अशुभ मानी जाती ेस्वभाव को दे ख िूर्ा को उिक त्रववाह की सर्ंता होने े है । सतथी क पुवााधा मं (कृ ष्णपक्ष की िप्तमी एवं र्तुदाशी ेलगी और वे िोर्ने लगे फक इि स्वेच्छा र्ाररणी, दष्टा, ु और शुक्लपक्ष की अष्टमी पूस्णामा सतथी ) फदन की भद्राकरुपा कडर्ा का त्रववाह फकिक िाथ फकर्ा जार्। िूर्ा ने ु े कहलाती है । सतथी क उिराधा की (कृ ष्णपक्ष की तृतीर्ा ेस्जि-स्जि दे वता, अिुर, फकडनर आफद िे भद्रा क त्रववाह े एवं दशमी और शुक्लपक्ष की र्तुथी एवं एकादशी) की
  • 29. 29 मार्ा 2012भद्रा रािी की भद्रा कहलाती है । र्फद फदन की भद्रा रािी  गुरुवार की भद्रा को पुण्र्ैवती,क िमर् और रािी की भद्रा फदन क िमर् आ जार्े तो े े  रत्रववार, बुधवार और मंगलवार की भद्रा कोउिे त्रवद्वानो ने शुभ माना है । असत आवश्र्क कार्ा आ भफद्रका माना हं ।जाए तो भद्रा की प्रारमभ की 5 घटी जो भद्रा का मुख  त्रवशेष कर शसनवार की भद्रा अशुभ मानी जातीहोती है , अवश्र् ही त्र्ागनी र्ाफहए। श्रेष्ठ तो र्ही है की हं ।भद्रा को त्र्ाग करक ही मांगलीक कार्ा िमपडन करने ेर्ाफहए। भद्रा व्रतभद्रा फल भद्रा क अशुभ प्रभाव िे रक्षा क सलए व्रत आफद े ेभद्रा का मुख और पूंछ: क त्रवधान बताए गए हं , फकतु आिान उपार्ं हं , िुबह े ंभद्रा पांर् घिी मुख मं, दो घिी कण्ठ मं, ग्र्ारह घिी भद्रा क द्वादश नाम अथाात 12 नाम मंि का स्मरण ेहृदर् मं, र्ार घिी पुच्छ मं स्स्थत रहती है । कार्ासित्रद्ध क िाथ त्रवघ्न, रोग, भर् को दर कर ग्रहदोषं े ू को भी शांत करने वाला माना गर्ा है ।शास्त्रोोक्त मत िे भद्रा र्ोग मं कार्ा सित्रद्ध क सलए प्रर्ोग फकए जाने वाला े जब भद्रा मुख मं रहती है तो कार्ा का नाश होता हं । मंि: जब भद्रा कण्ठ मं रहती है तो धन का नाश होता हं । धडर्ा दसधमुखी भद्रा महामारी खरानना। जब भद्रा हृदर् मं रहती है तो प्राण का नाश होता हं । कालरात्रिमाहारुद्रा त्रवत्रष्टि कलपुत्रिका॥ ु जब भद्रा नासभ मं रहती है तो कलह होता हं । भैरवी र् महाकाली अिुराणां क्षर्ंकरी। जब भद्रा कफट मं रहती है तो अथानाश होता हं । द्वादशैव तु नामासन प्रातरुत्थार् र्: पठे त ्॥ लेफकन जब भद्रा पुच्छ मं होती हं , तो त्रवजर् की प्राप्त न र् व्र्ासधभावेत ् तस्र् रोगी रोगात्प्रमुच्र्ते। एवं कार्ा सिद्ध होते है । ग्रह्य: िवेनुकला: स्र्ुना र् त्रवघ्राफद जार्ते॥ ू ज्र्ोसतष क अनुशार त्रवत्रष्ट करण को र्ार भागं मं ेत्रवभास्जत करक भद्रा मुख और पूंछ िरलता िे ज्ञात े शास्त्रोोक्त मत हं , की जो व्र्त्रक्त प्रातः भद्रा क इन ेफकर्ा जा िकता हं । बारह नामं का स्मरण करता है उिे फकिी भी व्र्ासध का भद्राकी प्रकृ सत असत दष्ट है इिसलए मांगसलक कार्ं मं ु भर् नहीं होता और उिक िभी ग्रह अनुकल हो जाते हं । े ूभद्राकाल का अवश्र् ही त्र्ाग करना र्ाफहए। उिक कार्ं मं कोई त्रवघ्न नहीं होता। र्ुद्ध मं वह त्रवजर् ेभद्राकाल मं त्रववाह, मुंिन, गृहप्रवेश, र्ज्ञोपत्रवत, रक्षाबंधन प्राप्त करता है , जो त्रवसध पूवक त्रवत्रष्ट का पूजन करता है , ार्ा कोई भी नर्ा काम शुरू करना वस्जात माना गर्ा है । सनःिंदेह उिक िभी कार्ा सिद्ध हो जाते हं । ेलेफकन भद्राकाल मं तंि कार्ा, ऑपरे शन करना, मुकदमाकरना, राजनैसतक र्ुनाव, फकिी वस्तु का कटना, र्ज्ञ भद्रा क व्रत की शास्त्रोोक्त त्रवसध : ेकरना, वाहन खरीदना आफद कमा शुभ माने गए हं । स्जि फदन भद्रा हो, उि फदन व्रत-उपवाि करना र्ाफहए। र्फद रात्रि क िमर् भद्रा हो तो दो फदन तक ेत्रवद्वानो क मत िे: े उपवाि करना र्ाफहए। स्त्रोी अथवा पुरुष दोनो क सलए व्रत े  िोमवार और शुक्रवार की भद्रा को कल्र्ाणी, असधक उपर्ुक्त होता हं ।  शसनवार की भद्रा को वृस्िकी,
  • 30. 30 मार्ा 2012 व्रत क फदन व्रती को िवोषसध र्ुक्त जल िे स्नान े इि प्रकार ििह भद्राव्रत करने क पिर्ात अंत मं ेकरना र्ाफहए र्ा नदी पर जाकर त्रवसध पूवक स्नान ा उद्यापन करना र्ाफहए। लोहे की पीठ पर भद्रा की मूसताकरना र्ाफहए। दे वता तथा त्रपतरं का तपाण एवं पूजन स्थात्रपत करनी र्ाफहए, काला वस्त्रो अत्रपात करक गडध, ेकर कशा की भद्रा की मूसता बनार्ं और गंध, पुष्प, धूप, ु पुष्प आफद िे त्रवसधवत पूजन कर प्राथाना करनी र्ाफहए।दीप, नैवेद्य आफद िे उिकी पूजन करना र्ाफहए। भद्रा के लोहा, बैल, सतल, बछिा िफहत काली गार्, काला कबल ंबारह नामं िे 108 बार हवन करके ब्राह्मण को भोजन और र्थाशत्रक्त दस्क्षणा क िाथ वह मूसता ब्राह्मण को दान ेकरवाना र्ाफहए स्वर्ं भी सतल समसश्रत भोजन ग्रहण करनी र्ाफहए र्ा उिका त्रविजान कर दं । इि प्रकार जोकरना र्ाफहए। भी व्र्त्रक्त भद्रा व्रत एवं तदं तर त्रवसध पूवक व्रत का ा उद्यापन करता है उिक फकिी भी कार्ा मं त्रवघ्न नहीं ेपूजन की िमाप्ती पर इि मडि िे प्राथाना करनी र्ाफहए। पिता तथा उिे प्रेत, ग्रह, भूत, त्रपशार्, िाफकनी, शाफकनी, छार्ा िूर्िुते दे त्रव त्रवत्रष्टररष्टाथा दासर्नी। ा र्क्ष, गंधवा, राक्षि आफद आिुरी शत्रक्त िे फकिी प्रकार का पूस्जतासि र्थाशक्त्र्ा भद्रे भद्रप्रदा भव॥ कष्ट नहीं हो िकता। 100 िे असधक जैन र्ंि हमारे र्हां जैन धमा क िभी प्रमुख, दलभ एवं शीघ्र प्रभावशाली र्ंि ताम्र पि, े ु ा सिलवर (र्ांदी) ओर गोल्ि (िोने) मे उपलब्ध हं । मंि सिद्ध र्ंिगुरुत्व कार्ाालर् द्वारा त्रवसभडन प्रकार क र्ंि कोपर ताम्र पि, सिलवर (र्ांदी) ओर गोल्ि (िोने) मे त्रवसभडन ेप्रकार की िमस्र्ा क अनुिार बनवा क मंि सिद्ध पूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत एवं र्ैतडर् र्ुक्त फकर्े जाते है . स्जिे े ेिाधारण (जो पूजा-पाठ नही जानते र्ा नही किकते ) व्र्त्रक्त त्रबना फकिी पूजा अर्ाना-त्रवसध त्रवधान त्रवशेषलाभ प्राप्त कर िकते है . स्जि मे प्रसर्न र्ंिो िफहत हमारे वषो क अनुिंधान द्वारा बनाए गर्े र्ंि भी िमाफहत ेहै . इिक अलवा आपकी आवश्र्कता अनुशार र्ंि बनवाए जाते है . गुरुत्व कार्ाालर् द्वारा उपलब्ध करार्े गर्े ेिभी र्ंि अखंफित एवं २२ गेज शुद्ध कोपर (ताम्र पि)- 99.99 टर् शुद्ध सिलवर (र्ांदी) एवं 22 करे ट गोल्ि े(िोने) मे बनवाए जाते है . र्ंि क त्रवषर् मे असधक जानकारी क सलर्े हे तु िमपक करे े े ा GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 31. 31 मार्ा 2012 फदशाशूल त्रवर्ार  त्रवजर् ठाकुरफदशाशूल क त्रवषर् मं शास्त्रोोक्त मत: े फदशाशूल पररहार क सलए े शनौ र्डद्रे त्र्जेत्पूवाा, दस्क्षणां र् फदशां गुरौ।  रत्रववार को घी पीकर। िूर्े शुक्र पस्िमामर्, बुधे भौमे तथोिरम ्॥ े  िोमवार को दध पीकर। ूअथाात: शसनवार और र्डद्रवार अथाात िोमवार को पूवा  मंगलवार को गुि खाकर।फदशा को फदशाशूल होती हं । बृहस्पसतवार (गुरुवार) को  बुधवार को सतल खाकर।दस्क्षण फदशा मं, इतवार (रत्रववार) और शुक्रवार को  गुरुवार को दही खाकर।पस्िम मं और मंगल तथा बुधवार को उिर फदशा मं शूल  शुक्रवार को जौ खाकर।होती हं । इि सलर्े स्जि वार को स्जि फदशा मं फदशाशूल  शसनवार को उिद खाकर र्ािा करने िे फदशाशूलहो उि फदशा मं र्ािा नहीं करनी र्ाफहर्े। का दोष पररहार माना जाता हं ।अडर् मत िे: फदशाशूल पररहार क अडर् उपार् े िोम शसनर्र पूरब ना र्ालू। मंगल बुध उिरफदसिकाल॥  फदशाशूल पररहार क सलए ेरत्रव शुक्र जो पस्िम जार्। हासन होर् पथ िुख नफहं पार्॥  रत्रववार को पान का दान।गुरौ दस्क्खन करे पर्ाना, फफर नहीं िमझो ताको आना॥  िोमवार को र्ंदन का दान।अथाात: िोमवार एवं शसनवार को पूरब फदशा मं तथा  मंगलवार को छाछ का दान।मंगल एवं बुधवार को उिर फदशा मं र्ािा नहीं करनी  बुधवार को पुष्प का दान।र्ाफहर्े। रत्रववार एवं शुक्रवार को पस्िम फदशा मं र्ािा  गुरवार को दही का दान।करना िवादा हासनकारक होता है । गुरूवार क फदन तो े  शुक्रवार को धृत (घी) का दान।दस्क्षण फदशा मं र्ािा करना अशुभ है । र्े फदशाशुल  शसनवार को काले सतल का दान करने िेकहलाते है । शास्त्रोोक्त माडर्ता क अनुशार फदशाशूल वाली े फदशाशूल पररहार हो जाता हं ।फदशा मं र्ािा करने िे कार्ा सिद्धी नहीं होता| *** अिली 1 मुखी िे 14 मुखी रुद्राक्षगुरुत्व कार्ाालर् मं िंपूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत एवं अिली 1 मुखी िे 14 मुखी तक क रुद्राक्ष उपलब्ध हं । ज्र्ोसतष कार्ा िे जुिे़ ेबंधु/बहन व रत्न व्र्विार् िे जुिे लोगो क सलर्े त्रवशेष मूल्र् पर रत्न, उपरत्न र्ंि, रुद्राक्ष व अडर् दलभ िामग्रीर्ां एवं े ु ाअडर् िुत्रवधाएं उपलब्ध हं । रुद्राक्ष क त्रवषर् मं असधक जानकारी क सलए कार्ाालर् मं िंपक करं । े े ात्रवशेष र्ंि : हमारं र्हां िभी प्रकार क र्ंि िोने-र्ांफद-तामबे मं आपकी आवश्र्क्ता क अनुशार फकिी भी भाषा/धमा े े क र्ंिो को आपकी आवश्र्क फिजाईन क अनुशार २२ गेज शुद्ध तामबे मं अखंफित बनाने की त्रवशेष िुत्रवधाएं उपलब्ध े े हं । असधक जानकारी क सलए कार्ाालर् मं िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY BHUBNESWAR-751018, (ORISSA), Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  • 32. 32 मार्ा 2012 फदशाशूल महत्वपूणा र्ा कताव्र् महत्वपूणा है ?  त्रवजर् ठाकुर एक बार एक राजा क ऊपर उिक प्रसतद्वं दी राजा े े फदशा मं तो मंने जब होश िमभाला हं अपने खेत परने हमला कर फदर्ा। राजा ने राज ज्र्ोसतषी को बुलार्ा जाता रहा हूँ और मेरे त्रपताजी िे लेकर दादा परदादा भीऔर उनिे पूछा फक इि वक्त हमं क्र्ा करना र्ाफहए। जाते रहे हं । ज्र्ोसतषी ने कहा अच्छा अपना हाथ फदखा।ज्र्ोसतषी ने उिर फदर्ा महाराज स्जि फदशा िे हमला फकिान ने ज्र्ोसतषी को अपना हाथ उलटा फदखार्ाहुआ हे वह फदशा पूवा हं और आज उि फदशा मं फदशाशूल ज्र्ोसतषी ने कहा िीधा कर क फदखाओ। ेहे , आज हमं उि फदशा मं नहीं जाना र्ाफहर्े। ज्र्ोसतषी फकिान बोला हम सभखारी नही हं जो हाथकी बात को व़जीर बीर् मं काट कर बराबर कह रहा हे फलाए। हमारे क्षेि मे िाक्षात सशवजी का वाि हे हम को ेफक महाराज फौरन हमला करो। राजा ने कहा नहीं हम फकिी सर्ज का िर नहीं हं । वह फकिान जर् महाकालको ज्र्ोसतषी की बात मननी है । ज्र्ोसतशी ने कहा हम बोल कर र्ला गर्ा।को इि िमर् उलटी फदशा मं अथाात पस्िम फदशा मं फकिान की बात िे राजा को भी अकल आइ औरजाना र्ाफहए। और वो पस्िम की और र्ल फदए। उिने मंिी िे कहा वापि र्लो और हमला बोलो, राजा रास्ते मं उनका व़जीर बार-बार कह रहा था ने भी जर् महकाल का नारा लगा कर हमला बोल फदर्ामहारज हमला करो। लेफकन व़जीर की बात को राजा ने और जीत गर्ा।नहीं िुना। नोट: फदशाशूल माि िे अपने कताव्र् िे पीछे हटना कोरीरािते मं उडहं एक फकिान समला जो पूवा फदशा की और मूखत होती हं । इि सलए आकस्स्मक प्रिंगो एवं घटनाओं ाजा रह था। ज्र्ोसतषी ने उिे रोका और कहाँ आज इधर िे सनपटने क सलए फदशाशूल का त्रवर्ार त्र्ाग कर अपनी ेफदशाशूल है इधर मत जाओ । फकिान बोला पंफितजी इि बुत्रद्ध एवं त्रववेक िे कार्ा करना र्ाफहए। शसन पीिा सनवारक िंपूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत 22 गेज शुद्ध स्टील मं सनसमात अखंफित पौरुषाकार शसन र्ंिपुरुषाकार शसन र्ंि (स्टील मं) को तीव्र प्रभावशाली बनाने हे तु शसन की कारक धातु शुद्ध स्टील(लोहे ) मं बनार्ा गर्ाहं । स्जि क प्रभाव िे िाधक को तत्काल लाभ प्राप्त होता हं । र्फद जडम किली मं शसन प्रसतकल होने पर व्र्त्रक्त को े ुं ूअनेक कार्ं मं अिफलता प्राप्त होती है , कभी व्र्विार् मं घटा, नौकरी मं परे शानी, वाहन दघटना, गृह क्लेश आफद ु ापरे शानीर्ां बढ़ती जाती है ऐिी स्स्थसतर्ं मं प्राणप्रसतत्रष्ठत ग्रह पीिा सनवारक शसन र्ंि की अपने को व्र्पार स्थान र्ाघर मं स्थापना करने िे अनेक लाभ समलते हं । र्फद शसन की ढै ़र्ा र्ा िाढ़े िाती का िमर् हो तो इिे अवश्र् पूजनार्ाफहए। शसनर्ंि क पूजन माि िे व्र्त्रक्त को मृत्र्ु, कजा, कोटा कश, जोिो का ददा , बात रोग तथा लमबे िमर् क िभी े े ेप्रकार क रोग िे परे शान व्र्त्रक्त क सलर्े शसन र्ंि असधक लाभकारी होगा। नौकरी पेशा आफद क लोगं को पदौडनसत े े ेभी शसन द्वारा ही समलती है अतः र्ह र्ंि असत उपर्ोगी र्ंि है स्जिक द्वारा शीघ्र ही लाभ पार्ा जा िकता है । े मूल्र्: 1050 िे 8200
  • 33. 33 मार्ा 2012 ितिंग की मफहमा  श्रेर्ा.ऐि.जोशी फकिी नगर क बाहर जंगल मं कोई िाधु िंत े मंिी होगा है , इि सलए इिे रोकने पर नाराज होकर ऐिाआकर ठहरे । िंत की ख्र्ासत नगर मं फली तो लोग दर- ै ू कह रहा है । प्रहररर्ं ने उिे त्रबना और पूछताछ फकएदर िे आकर समलने लगे। िंत क प्रवर्नं का दौर शुरू ू े भीतर जाने फदर्ा।हो गर्ा। वहाँ िे र्लने पर र्ोर का आत्म त्रवश्वाि और बढ़ िंत की ख्र्ासत भी फदन-प्रसतफदन दर-दर तक ू ू गर्ा। महल मं पहुंर् गर्ा। महल मं दाि-दासिर्ं ने भीफलने लगी। फदनभर लोगो का जमाविा िंत क करीब ै े उिे रोका। उिे पूछा कोन झो तूं र्ोर फफर ित्र् बोलारहता था। उनमं िे एक र्ोर भी दर सछपकर िंत क ू े फक मं र्ोर हूं, र्ोरी करने आर्ा हूं। दाि-दासिर्ं ने भीप्रवर्नो को िुनता था। रात को र्ोरी करता और फदन मं उिे वही िोर्कर जाने फदर्ा जो प्रहररर्ं ने िोर्ा था।लोगं िे सछपने क सलए जंगल मं आ जाता। उिने िुना े राजा का कोई खाि दरबारी होगा। अब तो र्ोर काकी िंत लोगं िे रोज कहते हं फक ित्र् बोसलए। ित्र् त्रवश्वाि िातवं आिमान पर पहुंर् गर्ा था, राहमहल मंबोलने िे जीवन िरल हो जाता है । िंत क मुख िे बार- े वहँ स्जििे भी समलता उििे ही कहता फक मं र्ोर हूं।बार एक फह बात िुन-िुन क एक फदन र्ोर िे रहा नहीं े फफर भी वहँ पहुंर् गर्ा महल क भीतर। ेगर्ा, लोगं क जाने क बाद उिने अकले मं िंत िे पूछा े े े र्ोर ने वहाँ िे कछ कीमती िामान िोने क ु ेआप रोजाना कहते हो फक ित्र् बोलना र्ाफहए, उििे आभूषण, हीरे -जवाहरात आफद उठार्े और बाहर की ओरलाभ होता है लेफकन मं किे ित्र् बोल िकता हूं। िंत ै र्ल फदर्ा। जाते िमर् रानी ने दे ख सलर्ा। राजा केने पूछा-तुम कौन हो भाई? र्ोर ने कहा मं एक र्ोर हूं। आभूषण लेकर कोई आदमी जा रहा है । उिने पूछा ऐिंत बोले तो क्र्ा हुआ। ित्र् का लाभ िबको समलता कौन हो तुम, राजा क आभूषण लेकर कहां जा रहे हो। ेहै । तुम भी परख कर दे ख लो। र्ोर फफर िर् बोला र्ोर हूं, र्ोरी करने आर्ा था, मं िंत की बात िुनकर र्ोर ने सनणार् सलर्ा की र्ोरी करक ले जा रहा हूं। रानी िोर् मं पि गई, भला ेआज र्ोरी करते िमर् िभी िे िर् बोलूंगा। दे खता हूं कोई र्ोर ऐिा किे बोल िकता है , उिक र्ेहरे पर तो ै ेिर् बोलने िे क्र्ा लाभ समलता है । उि रात र्ोर र्ोरी भर् भी नहीं है । जरूर महाराज ने ही इिे र्े आभूषणकरने राजमहल मं पहुंर्ा। महल क मुख्र् दरवाजे पर े कछ अच्छा काम करने पर भंट स्वरूप पुरस्कार क रूप ु ेपहुंर्ते ही उिने दे खा दो प्रहरी पहरा दे रहे हं । प्रहररर्ं मं फदए हंगे। रानी ने भी र्ोर को जाने फदर्ा। जाते-जातेने उिे रोका ऐ कौन है तूं। और इतनी रात मं फकधर जा रास्ते मं राजा िे भी िामना हो गर्ा। राजा ने पूछा ऐरहे हो। मेरे आभूषण लेकर कहां जा रहे हो, और कौन हो तुम? र्ोर ने सनिरता िे कहा मं एक र्ोर हूं, और मं र्ोर फफर बोला मं र्ोर हूं, र्ोरी करने आर्ा हूं। राजा नेर्ोरी करने जा रहा हूं। प्रहररर्ं ने िोर्ा कोई र्ोर ऐिा िोर्ा इिे रानी ने भंट दी होगी। राजा ने उििे कछ नहीं ुनहीं बोल िकता। र्ह जरूर राज दरबार का कोई खाि कहा, और एक िेवक को उिक िाथ कर फदर्ा। िेवक े
  • 34. 34 मार्ा 2012िामान उठाकर उिे आदर िफहत महल क बाहर तक े भर जाएगा। र्ोर भागता-दौिता िंत क पाि आर्ा और ेछोि गर्ा। पैरं मं सगर पिा। राजमहल की िारी घटना उिने िंत अब तो र्ोर क आिर्ा का फठकाना न रहा। उिने े को बताई। उिक भीतर की र्ेतना शत्रक्त जाग्रत हो गई ेिोर्ा झूठ बोल-बोलकर मंने जीवन क फकतने फदन र्ोरी े उिने र्ोरी करना छोि फदर्ा और उिी िंत को अपनाकरने मं बरबाद कर फदए। अगर र्ोरी करक िर् बोलने े गुरू बनाकर उडहीं क िाथ रहकर उनकी िेवा करने ेपर परम त्रपता परमात्मा मैरा इतना िाथ दे ता है तो लगा।महापुरुषो ने िर् ही कहा हं , फक जो िच्र्े िंतफफर अच्छे कमा करने पर तो जीवन फकतना आनंद िे होता है वह हर जगह अपना प्रभाव छोिते है । मंि सिद्ध रूद्राक्ष Rate In Rate In Rudraksh List Rudraksh List Indian Rupee Indian Rupee एकमुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2800, 5500 आठ मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 820,1250 एकमुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 750,1050, 1250, आठ मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 1900 दो मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 30,50,75 नौ मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 910,1250 दो मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, नौ मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2050 दो मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 450,1250 दि मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 1050,1250 तीन मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 30,50,75, दि मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2100 तीन मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, ग्र्ारह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 1250, तीन मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 450,1250, ग्र्ारह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2750, र्ार मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 25,55,75, बारह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 1900, र्ार मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, बारह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 2750, पंर् मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 25,55, तेरह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 3500, 4500, पंर् मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 225, 550, तेरह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 6400, छह मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 25,55,75, र्ौदह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 10500 छह मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 50,100, र्ौदह मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 14500 िात मुखी रूद्राक्ष (हररद्रार, रामेश्वर) 75, 155, गौरीशंकर रूद्राक्ष 1450 िात मुखी रूद्राक्ष (नेपाल) 225, 450, गणेश रुद्राक्ष (नेपाल) 550 िात मुखी रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 1250 गणेश रूद्राक्ष (इडिोनेसशर्ा) 750 रुद्राक्ष क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY, 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA), Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 35. 35 मार्ा 2012 नव िंवत्िर का पररर्र्  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी फहडद ू पंर्ांग क अनुशार इि वषा नव वषा र्ैि े आफद की घटनार्ं असधक मािा मं हो िकती हं । िौडदर्ाशुक्ल प्रसतपदा 22-मार्ा-2012 की रात 07:10 बजे िे प्रिाधन, खाध तेल आफद की कीमतं जन मानि कोशुरू होने वाले त्रवक्रम िंवत 2069 का प्रारं भ कडर्ा लग्न असधक प्रभात्रवत करं गी।मं होगा। इर वषा त्रवश्वाविु नाम का िंवत्िर रहे गा। इि वषा रोफहणी का वाि इि िंवत मे पवात परत्रवश्वाविु िंवत्िर का स्वामी राहु हं । इि वषा का राजा है इि सलए वषा मे जल िंबंसधत िमस्र्ा अथाात बषाा काऔर मंिी दै त्र्गुरु शुक्र हंगे। ज्र्ोसतषीर् गणना एवं कम होना तथा कृ त्रष र्ोग्र् उपर्ोगी वषाा मे कमी आशास्त्रोोक्त मत क आधार पर नव िंवत्िर क फदन ग्रहो की े े िकती हं । लेफकन इि वषा कहीं -कहीं परस्स्थती क अनुशार र्ह िंवतिर वषा े बाढ़ की स्स्थती भी िंभव हं ।भर लोगं को त्रवसभडन िमस्र्ाओं जीवन उपर्ोगी वस्तुओं की मूल्र्मे उलझार्ेगा वषाा मे कमी हो वृत्रद्ध मे उतार-र्ढ़ाव बना रहे गा।िकती हं , इिक अलावा खाद्य पदाथा े इि िंवत का वाि कमहार ुअथाात अडन की कमी हो िकती है क घर है इि सलए कृ त्रष र्ोग्र् भूसम ेदे श मे राजस्व की कमी की भी और भूसम-भवन आफद क बाजार मे ेसिथसतर्ां आिकती हं । त्रवक्रम िंवत असधकासधक तेजी आर्गी। वषाा की कमी2069 का स्वामी शुक्र है जोफक िुख- क पूणा िंकत हं । इि वषा लघु उधोग, दर े े ूिमृत्रि का कारक होगा। स्जििे नर्ा िंर्ार क िाधनं मे भारी मािा मं वृत्रद्ध ेिंवत आधुसनक तकनीक व नवीन हंगी। इि वषा िंवत क राजा शुक्र वाहन ेआत्रवष्कार दे ने वाला रहे गा। मेढ़क हं । वाहन मेढ़क होने क कारण कछ े ु त्रवद्वानो क मत िे ज्र्ोसतष े प्रदे शं मे भारी वषाा िे बाढ़ जैिे प्राकृ सतकक अनुिार शुक्र को राजा और मंिी े आपदा स्स्थतीर्ं का िामना करना पि िकता है ।दोनं पद समलने वाला िंर्ोग असत दलभ है । एिा िंर्ोग ु ा नविंवत मं ग्रहो का फल:फफर िे 16 िाल बाद अथाात िंवत 2086 मं वापि शुक्र:आर्ेगा, जब शुक्र को राजा व मंिी क पद पर रहने का े शुक्र वषा का राजा और मंिी हं शुक्र को रिीले पदाथं काअविर समलेगा। जानकारं की माने तो त्रवश्वाविु नाम का स्वामी माना गर्ा हं । इि सलए इि वषा रिीले फलं कीर्ह िंवत्िर लोगो मं आध्र्ास्त्मक रूसर् व आस्था बढ़ाने उपज अच्छी रहे गी। भौसतक िुख-िाधनं मे वृत्रद्ध की होनेवाला िात्रबत होगा। वहीं लोगं मं राजनैसतक ििा के क अच्छे िंकत हं । व्र्विासर्क कार्ं िे जुिे लोगो को े ेप्रसत आक्रोश रहे गा। बहुमूल्र् धातुओं मं तेजी, आसथाक धनलाभ समलता रहे गा। िामास्जक कार्ा िे जुिेलोगं मंस्स्थसत मं िुधार करने वाला और िुख-शांसत दे ने वाला मफहला वगा का वर्ास्व असधक प्रबल रहे गा। मनोरं जनरहे गा। उधोग, िौडदर्ा प्रिाधन इत्र्ाफद शुक्र िे िंबंसधत कार्ा कडर्ा लग्न मे ही वषा की शुरुआत होने िे दे श त्रवशेष मे लाभ की स्स्थती बनेगी।मे कहीं पर राज्र् भंग तथा कहीं कहीं पर दं गे-फिाद
  • 36. 36 मार्ा 2012िूर्ा: त्रवलाि और उपर्ोगी वस्तुओं मं वृत्रद्ध करवाते हं ।िूर्ा नीरिेश (धातुओं का असधपसत)हं इि सलए िोना, बृहस्पसत लोगो मं धमा, शास्त्रो आफद आध्र्ास्त्मक ज्ञानर्ांदी, पीतल, तांबा, रत्न आफद की कीमतं मे तेजी िे को भी बढाते हं ।वृत्रद्ध होगी हं । िूर्ा उच्र् वगा क व्र्ापाररर्ं क सलए धन े े शसन:वृत्रद्धए एवं व्र्ापार मं असधक लाभ क िंकत दे ता हं और े े धाडर्ेश (शीतकालीन फिलं-खरीफ का स्वामी) शसन होनेछोटे वगा क व्र्ापारीर्ं क सलर्े धन हानी क िंकत दे ता े े े े िे वषा भर जल िंिाधनं मे कमी हो िकती हं । दे श कीहं । क्रर्-त्रवक्रर् िे जुिे लोगो क कारोबार का त्रवस्तार े आसथाक स्स्थती सर्ंताजनक हो िकती हं, र्ुद्ध कीहोगा। िूर्ा की उच्र् असधकारी तथा उधोगपसतर्ं पर पररस्स्थर्ां भी सनसमात हो िकती हं गृह र्ुद्ध भी होत्रवशेष कृ पा रहे गी। िकता है । जानकारो क मत िे शसन की स्स्थती दे श क े ेर्डद्र: फकिी त्रवसशष्ट व्र्फकत की मृत्र्ु क िंकत हं । े ेिस्र्ेश(ग्रीष्मकालीन फिलं-रबी का स्वामी) र्डद्रमा होने इि वषा दगि (रक्षामंिी) बृहस्पसत है जो राजकीर् ु ेक कारण लोगं क भौसतक िंिाधनं की वृत्रद्ध होगी और े े कार्ं िे जुिे लोगं क सलर्े उडनत डर्ार् व्र्वस्था का ेलोग धनधाडर् िे िमपडन हंगे। िूर्क हं । बृहस्पसत डर्ार्त्रप्रर् और धमात्रप्रर् है इि सलर्े डर्ार् और धमा की रक्षा क सलए दे श मं िंघषा का ेमंगल: वातावरण भी बन िकता हं ।मंगल की स्स्थती िे दे श मे वषाा की कमी क कारण े नोट:बनते हं िामास्जक भाईर्ारे मे त्रबखराव की सिथसत पैदाहो िकती हं । मंगल क कारण राजकीर् शािन-प्रशािन े जानकारं की माने तो त्रवश्वाविु िंवतिर मे फकिी भीतथा राजनेताओं क प्रसत जनता मे आक्रोि की स्स्थती े वस्तु की नाहीं असधकता रहती नाहीं कमी रहती हं । प्रार्ःभी िंभव होती हं । िबकछ मध्र्म रहता है अथाात वषाा मध्र्म, आसथाक ु अपराधो मं वृत्रद्ध, लालर् की असधकता िे लोगं कोबृहस्पसत:बृहस्पसत की स्स्थती िे असधक वषाा के िंकेत परे शान होना पि िकता हं ।हं , इि स्थान मं बृहस्पसत लोगं क िुख-िाधन, भोग े त्रवश्वाविु िंवत्िर मं जडम लेने वालं का भत्रवष्र् फल र्फद आपका जडम त्रवश्वाविु िंवत्िर मं हुआ है । स्जि प्रकार नाम िे त्रवश्वाविु ज्ञात होता है , आप जीवन मं प्रार्ः भाग्र्शाली हंगे और अपने िभी कामं मं िफल होगं। आप असधक बुत्रद्धमान, ज्ञानी, धासमाक तथा िदार्ारी होगं और हमंशा प्रशंिनीर् कार्ं को करने मं रत रहे गं। आप भारी मािा मं धन िंग्रह करे गं और अपने जीवन िाथी और िंतान को जीवन क िभी िुख एवं ऐश्वर्ाप्रद िामग्रीर्ं क िाथ आनंद े े िे रहं गे। आप धैर्ा और सनरं तर पररश्रम की एक प्रसतमूसता होगं और िफहष्णुता तथा क्षमाशीलता क गुणं े िे पररपूणा होगं। अपने शानदार आर्रण क कारण आप त्रवख्र्ात होगं और अपने िराहनीर् कामं क े े कारण आपको िमाज मं त्रवशेष पहर्ान समलेगी।
  • 37. 37 मार्ा 2012 र्ैि नवराि मं नवदगाा आराधना त्रवशेष फलदार्ी ु  सर्ंतन जोशी नमो दे व्र्ै महादे व्र्ै सशवार्ै िततं नम:। इि मंि क जप िे माँ फक शरणागती प्राप्त होती हं । े नम: प्रकृ त्र्ै भद्रार्ै सनर्ता: प्रणता: स्मताम ्॥ स्जस्िे मनुष्र् क जडम-जडम क पापं का नाश होता है । े ेअथाात: दे वी को नमस्कार हं , महादे वी को नमस्कार हं । मां जननी िृत्रष्ट फक आफद, अंत और मध्र् हं ।महादे वी सशवा को िवादा नमस्कार हं । प्रकृ सत एवं भद्रा को मेरा दे वी िे प्राथाना करं –प्रणाम हं । हम लोग सनर्मपूवक दे वी जगदमबा को नमस्कार ाकरते हं । शरणागत-दीनाता-पररिाण-परार्णे िवास्र्ासतंहरे दे त्रव नारार्स्ण नमोऽस्तुते॥उपरोक्त मंि िे दे वी दगाा का स्मरण कर प्राथाना करने माि िे ु अथाात: शरण मं आए हुए दीनं एवं पीस़्ितं की रक्षा मं िंलग्नदे वी प्रिडन होकर अपने भक्तं की इच्छा पूणा करती हं । िमस्त रहने वाली तथा िब फक पीिा दर करने वाली नारार्णी दे वी ूदे व गण स्जनकी स्तुसत प्राथना करते हं । माँ दगाा अपने भक्तो ु आपको नमस्कार है ।की रक्षा कर उन पर कृ पा द्रष्टी वषााती हं और उिको उडनतीक सशखर पर जाने का मागा प्रिस्त करती हं । इि सलर्े े रोगानशेषानपहं सि तुष्टाईश्वर मं श्रद्धा त्रवश्वार रखने वाले िभी मनुष्र् को दे वी की रूष्टा तु कामान िकलानभीष्टान ्।शरण मं जाकर दे वी िे सनमाल हृदर् िे प्राथाना करनी र्ाफहर्े। त्वामासश्रतानां न त्रवपडनराणां त्वामासश्रता हाश्रर्तां प्रर्ास्डत। दे वी प्रपडनासताहरे प्रिीद प्रिीद मातजागतोsस्खलस्र्। अथाातः दे वी आप प्रिडन होने पर िब रोगं को नष्ट कर दे ती पिीद त्रवश्वेतरर पाफह त्रवश्वं त्वमीिरी दे वी र्रार्रस्र्। हो और कत्रपत होने पर मनोवांसछत िभी कामनाओं का नाश ुअथाात: शरणागत फक पीिा दर करने वाली दे वी आप हम पर ू कर दे ती हो। जो लोग तुमहारी शरण मं जा र्ुक है । उनको ेप्रिडन हं। िंपूणा जगत माता प्रिडन हं। त्रवश्वेश्वरी दे वी त्रवश्व त्रवपत्रि आती ही नहीं। तुमहारी शरण मं गए हुए मनुष्र् दिरं ूफक रक्षा करो। दे वी आप फह एक माि र्रार्र जगत फक को शरण दे ने वाले हो जाते हं ।असधश्वरी हो। िवाबाधाप्रशमनं िेलोक्र्स्र्ास्खलेश्वरी। िवामंगल-मांगल्र्े सशवेिवााथिासधक । ा े एवमेव त्वर्ा कार्ामस्र्ध्दै ररत्रवनाशनम ्। शरण्र्े िर्मबक गौरर नारार्स्ण नमोऽस्तुते॥ े अथाातः हे िवेश्वरी आप तीनं लोकं फक िमस्त बाधाओं को िृत्रष्टस्स्थसत त्रवनाशानां शत्रक्तभूते िनातसन। शांत करो और हमारे िभी शिुओं का नाश करती रहो। गुणाश्रर्े गुणमर्े नारार्स्ण नमोऽस्तुते॥अथाात: हे दे वी नारार्णी आप िब प्रकार का मंगल प्रदान शांसतकमास्ण िवाि तथा द:स्वप्रदशाने। ुकरने वाली मंगलमर्ी हो। कल्र्ाण दासर्नी सशवा हो। िब ग्रहपीिािु र्ोग्रािु महात्मर्ं शणुर्ात्मम।पुरूषाथं को सिद्ध करने वाली शरणा गतवत्िला तीन नेिं अथाातः िवाि शांसत कमा मं, बुरे स्वप्न फदखाई दे ने पर तथावाली गौरी हो, आपको नमस्कार हं । आप िृत्रष्ट का पालन और ग्रह जसनत पीिा उपस्स्थत होने पर माहात्मर् श्रवण करनािंहार करने वाली शत्रक्तभूता िनातनी दे वी, आप गुणं का र्ाफहए। इििे िब पीिाएँ शांत और दर हो जाती हं । ूआधार तथा िवागुणमर्ी हो। नारार्णी दे वी तुमहं नमस्कारहै । ***
  • 38. 38 मार्ा 2012 मंि सिद्ध त्रवशेष दै वी र्ंि िूसर्आद्य शत्रक्त दगाा बीिा र्ंि (अंबाजी बीिा र्ंि) ु िरस्वती र्ंिमहान शत्रक्त दगाा र्ंि (अंबाजी र्ंि) ु िप्तिती महार्ंि(िंपूणा बीज मंि िफहत)नव दगाा र्ंि ु काली र्ंिनवाणा र्ंि (र्ामुंिा र्ंि) श्मशान काली पूजन र्ंिनवाणा बीिा र्ंि दस्क्षण काली पूजन र्ंिर्ामुंिा बीिा र्ंि ( नवग्रह र्ुक्त) िंकट मोसर्नी कासलका सित्रद्ध र्ंित्रिशूल बीिा र्ंि खोफिर्ार र्ंिबगला मुखी र्ंि खोफिर्ार बीिा र्ंिबगला मुखी पूजन र्ंि अडनपूणाा पूजा र्ंिराज राजेश्वरी वांछा कल्पलता र्ंि एकांक्षी श्रीफल र्ंि मंि सिद्ध त्रवशेष लक्ष्मी र्ंि िूसर्श्री र्ंि (लक्ष्मी र्ंि) महालक्ष्मर्ै बीज र्ंिश्री र्ंि (मंि रफहत) महालक्ष्मी बीिा र्ंिश्री र्ंि (िंपूणा मंि िफहत) लक्ष्मी दार्क सिद्ध बीिा र्ंिश्री र्ंि (बीिा र्ंि) लक्ष्मी दाता बीिा र्ंिश्री र्ंि श्री िूक्त र्ंि लक्ष्मी गणेश र्ंिश्री र्ंि (कमा पृष्ठीर्) ु ज्र्ेष्ठा लक्ष्मी मंि पूजन र्ंिलक्ष्मी बीिा र्ंि कनक धारा र्ंिश्री श्री र्ंि (श्री श्री लसलता महात्रिपुर िुडदर्ै श्री वैभव लक्ष्मी र्ंि (महान सित्रद्ध दार्क श्री महालक्ष्मी र्ंि)महालक्ष्मर्ं श्री महा र्ंि)अंकात्मक बीिा र्ंि ताम्र पि पर िुवणा पोलीि ताम्र पि पर रजत पोलीि ताम्र पि पर (Gold Plated) (Silver Plated) (Copper) िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् 2” X 2” 640 2” X 2” 460 2” X 2” 370 3” X 3” 1250 3” X 3” 820 3” X 3” 550 4” X 4” 1850 4” X 4” 1250 4” X 4” 820 6” X 6” 2700 6” X 6” 2100 6” X 6” 1450 9” X 9” 4600 9” X 9” 3700 9” X 9” 2450 12” X12” 8200 12” X12” 6400 12” X12” 4600र्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
  • 39. 39 मार्ा 2012 र्ैि नवराि व्रत त्रवशेष लाभदार्ी होता हं ।  सर्ंतन जोशी फहडद ु िंिकृ सत क अनुशार नववषा का शुभारं भ र्ैि माि क शुक्ल पक्ष की प्रथम सतसथ िे होता है । े ेइि फदन िे विंतकालीन नवराि की शुरुआत होती हं ।त्रवद्वानो क मतानुशार र्ैि माि क कृ ष्ण पक्ष की िमासप्त क िाथ भूलोक क पररवेश मं एक त्रवशेष पररवतान दृत्रष्टगोर्र े े े ेहोने लगता हं स्जिक अनेक स्तर और स्वरूप होते हं । े इि दौरान ऋतुओं क पररवतान क िाथ नवरािं का तौहार े े मनुष्र् क जीवन मं बाह्य और आंतररक पररवतान मं एक त्रवशेष े िंतुलन स्थात्रपत करने मं िहार्क होता हं । स्जि तरह बाह्य जगत मं पररवतान होता है उिी प्रकार मनुष्र् क शरीर मं भी पररवतान होता है । े इि सलर्े नवराि उत्िव को आर्ोस्जत करने का उद्दे श्र् होता हं की मनुष्र् क भीतर मं उपर्ुक्त पररवतान कर उिे बाह्य पररवतान क े े अनुकल बनाकर उिे स्वर्ं क और प्रकृ सत क बीर् मं िंतुलन बनार्े ू े े रखना हं । नवरािं क दौरान फकए जाने वाली पूजा-अर्ाना, व्रत इत्र्ाफद िे े पर्ाावरण की शुत्रद्ध होती हं । उिीक िाथ-िाथ मनुष्र् क शरीर और े े भावना की भी शुत्रद्ध हो जाती हं । क्र्ोफक व्रत-उपवाि शरीर को शुद्ध करने का पारं पररक तरीका हं जो प्राकृ सतक-सर्फकत्िा का भी एक महत्वपूणा तत्व है । र्ही कारण हं की त्रवश्व क प्रार्ः िभी प्रमुख धमं े मं व्रत का महत्व हं । इिी सलए फहडद ू िंस्कृ सत मं र्ुगो-र्ुगो िे नवरािंक दौरान व्रत करने का त्रवधान हं । क्र्ोकी व्रत क माध्र्म िे प्रथम मनुष्र् का शरीर शुद्ध होता हं , शरीर शुद्ध होतो े ेमन एवं भावनाएं शुद्ध होती हं । शरीर की शुत्रद्ध क त्रबना मन व भाव की शुत्रद्ध िंभव नहीं हं । र्ैि नवरािं क दौरान े ेिभी प्रकार क व्रत-उपवाि शरीर और मन की शुत्रद्ध मं िहार्क होते हं । े नवरािं मं फकर्े गर्े व्रत-उपवाि का िीधा अिर हमारे अच्छे स्वास्थ्र् और रोगमुत्रक्त क सलर्े भी िहार्क होता ेहं । बिी धूम-धाम िे फकर्ा गर्ा नवरािं का आर्ोजन हमं िुखानुभसत एवं आनंदानुभसत प्रदान करता हं । ू ू मनुष्र् क सलए आनंद की अवस्था िबिे अच्छी अवस्था हं । जब व्र्त्रक्त आनंद की अवस्था मं होता हं तो उिक े ेशरीर मं तनाव उत्पडन करने वाले िूक्ष्म कोष िमाप्त हो जाते हं और जो िूक्ष्म कोष उत्िस्जता होते हं वे हमारे शरीरक सलए अत्र्ंत लाभदार्क होते हं । जो हमं नई व्र्ासधर्ं िे बर्ाने क िाथ ही रोग होने की दशा मं शीघ्र रोगमुत्रक्त े ेप्रदान करने मं भी िहार्क होते हं । नवराि मं दगाािप्तशती को पढने र्ा िुनने िे दे वी अत्र्डत प्रिडन होती हं एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं । िप्तशती का पाठ ुउिकी मूल भाषा िंस्कृ त मं करने पर ही पूणा प्रभावी होता हं ।
  • 40. 40 मार्ा 2012 व्र्त्रक्त को श्रीदगाािप्तशती को भगवती दगाा का ही स्वरूप िमझना र्ाफहए। पाठ करने िे पूवा श्रीदगाािप्तशती फक पुस्तक ु ु ुका इि मंि िे पंर्ोपर्ारपूजन करं - नमोदे व्र्ैमहादे व्र्ैसशवार्ैिततंनम:। नम: प्रकृ त्र्ैभद्रार्ैसनर्ता:प्रणता:स्मताम ्॥जो व्र्त्रक्त दगाािप्तशतीक मूल िंस्कृ त मं पाठ करने मं अिमथा हं तो उि व्र्त्रक्त को िप्तश्लोकी दगाा को पढने िे लाभ प्राप्त ु े ुहोता हं । क्र्ोफक िात श्लोकं वाले इि स्तोि मं श्रीदगाािप्तशती का िार िमार्ा हुवा हं । ुजो व्र्त्रक्त िप्तश्लोकी दगाा का भी न कर िक वह कवल नवााण मंि का असधकासधक जप करं । ु े ेदे वी क पूजन क िमर् इि मंि का जप करे । े े जर्डती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपासलनी। दगाा क्षमा सशवा धािी स्वाहा स्वधानमोऽस्तुते॥ ुदे वी िे प्राथाना करं - त्रवधेफहदे त्रव कल्र्ाणंत्रवधेफहपरमांसश्रर्म ्।रूपंदेफहजर्ंदेफहर्शोदे फहफद्वषोजफह॥अथाातः हे दे त्रव! आप मेरा कल्र्ाण करो। मुझे श्रेष्ठ िमपत्रि प्रदान करो। मुझे रूप दो, जर् दो, र्श दो और मेरे काम-क्रोध इत्र्ाफदशिुओं का नाश करो।त्रवद्वानो क अनुशार िमपूणा नवरािव्रत क पालन मं जो लोगं अिमथा हो वह नवराि क िात रािी,पांर् रािी, दं रािी और े े ेएक रािी का व्रत भी करक लाभ प्राप्त कर िकते हं । नवराि मं नवदगाा की उपािना करने िे नवग्रहं का प्रकोप शांत होता हं । े ु दस्क्षणावसता शंख आकार लंबाई मं फाईन िुपर फाईन स्पेशल आकार लंबाई मं फाईन िुपर फाईन स्पेशल 0.5" ईंर् 180 230 280 4" to 4.5" ईंर् 730 910 1050 1" to 1.5" ईंर् 280 370 460 5" to 5.5" ईंर् 1050 1250 1450 2" to 2.5" ईंर् 370 460 640 6" to 6.5" ईंर् 1250 1450 1900 3" to 3.5" ईंर् 460 550 820 7" to 7.5" ईंर् 1550 1850 2100 हमारे र्हां बिे आकार क फकमती व महं गे शंख जो आधा लीटर पानी और 1 लीटर पानी िमाने े की क्षमता वाले होते हं । आपक अनुरुध पर उपलब्ध कराएं जा िकते हं । े  स्पेशल गुणविा वाला दस्क्षणावसता शंख पूरी तरह िे िफद रं ग का होता हं । े  िुपर फाईन गुणविा वाला दस्क्षणावसता शंख फीक िफद रं ग का होता हं । े े  फाईन गुणविा वाला दस्क्षणावसता शंख दं रं ग का होता हं । GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 923832878 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Visit Us: http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
  • 41. 41 मार्ा 2012 रासश रत्न मूंगा हीरा पडना मोती माणेक पडना Naturel Pearl Ruby Red Coral Diamond Green Emerald Green Emerald (Special) (Special) (Old Berma) (Special) (Special) (Special) (Special)5.25" Rs. 1050 10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 9100 5.25" Rs. 910 2.25" Rs. 12500 5.25" Rs. 91006.25" Rs. 1250 20 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 12500 6.25" Rs. 1250 3.25" Rs. 15500 6.25" Rs. 125007.25" Rs. 1450 30 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 14500 7.25" Rs. 1450 4.25" Rs. 28000 7.25" Rs. 145008.25" Rs. 1800 40 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 19000 8.25" Rs. 1900 5.25" Rs. 46000 8.25" Rs. 190009.25" Rs. 2100 50 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 23000 9.25" Rs. 2300 6.25" Rs. 82000 9.25" Rs. 2300010.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs. 28000 All Diamond are Full** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati White Colour. तुला रासश: वृस्िक रासश: धनु रासश: मकर रासश: कभ रासश: ुं मीन रासश: हीरा मूंगा पुखराज नीलम नीलम पुखराज Diamond Red Coral Y.Sapphire B.Sapphire B.Sapphire Y.Sapphire (Special) (Special) (Special) (Special) (Special) (Special)10 cent Rs. 4100 5.25" Rs. 1050 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 30000 5.25" Rs. 3000020 cent Rs. 8200 6.25" Rs. 1250 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 37000 6.25" Rs. 3700030 cent Rs. 12500 7.25" Rs. 1450 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 55000 7.25" Rs. 5500040 cent Rs. 18500 8.25" Rs. 1800 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 73000 8.25" Rs. 7300050 cent Rs. 23500 9.25" Rs. 2100 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 9.25" Rs. 91000 10.25" Rs. 2800 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000 10.25" Rs.108000All Diamond are Full ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati ** All Weight In Rati White Colour.* उपर्ोक्त वजन और मूल्र् िे असधक और कम वजन और मूल्र् क रत्न एवं उपरत्न भी हमारे र्हा व्र्ापारी मूल्र् पर ेउप्लब्ध हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 42. 42 मार्ा 2012 किे करे नवराि व्रत ? ै  स्वस्स्तक.ऎन.जोशी नव फदनं तक र्लने वाले इि पवा पर हम व्रत रखकर मां क नौ अलग-अलग रूप की पूजा फकजाती हं । इि दौरान घर मं ेफकर्ा जाने वाला त्रवसधवत हवन भी स्वास्थ्र् क सलए अत्र्ंत लाभप्रद हं । हवन िे आस्त्मक शांसत और वातावरण फक शुत्रद्ध क े ेअलावा घर नकारात्मक शत्रक्तर्ं का नाश हो कर िकारात्मक शत्रक्तर्ो का प्रवेश होता हं ।नवराि व्रतनवराि मं नव राि िे लेकर िात रािी,पांर् रािी, दं रािी और एक रािी व्रत करने का भी त्रवधान हं ।नवराि व्रत क धासमाक महत्व क अलावा वैज्ञासनक महत्व हं , जो स्वास्थ्र् की दृत्रष्ट िे काफी लाभदार्क होता हं । व्रत करने िे े ेशरीर मं र्ुस्ती-फती बनी रहती हं । रोजाना कार्ा करने वाले पार्न तंि को भी व्रत क फदन आराम समलता हं । बच्र्े, बुजुग, ु े ाबीमार, गभावती मफहला को नवराि व्रत का नहीं रखना र्ाफहए।नवराि व्रत िे िंबंसधत उपर्ोगी िुझाव  व्रत क दौरान असधक िमर् मौन धारण करं । े  व्रत क शुरुआत मं भूख काफी लगती हं । ऐिे मं नींबू पानी त्रपर्ा जा िकता है । इििे भूख को सनर्ंत्रित रखने मं मदद े समलेगी।  जहा तक िंभव हो सनजाला उपवाि न रखं। इििे शरीर मं पानी फक कमी हो जाती हं और अपसशष्ट पदाथा शरीर क बाहर े नहीं आ पाते। इििे पेट मं जलन, कब्ज, िंक्रमण, पेशाब मं जलन जैिी कई िमस्र्ाएं पैदा हो िकती हं ।  एक िाथ खूब िारा पानी पीने क बजाए फदन मं कई बार नींबू पानी त्रपएं। े  ज्र्ादातर लोगो को उपवाि मं अक्िर कब्ज की सशकार्त हो जाती हं । इिसलए व्रत शुरू करने क पहले त्रिफला, आंवला, े पालक का िूप र्ा करे ले क रि इत्र्ाफद पदाथो का िेवन करं । इििे पेट िाफ रहता है । े  व्रत क दौरान र्ार्, काफी का िेवन काफी बढ़ जाता है । इि पर सनर्ंिण रखं। ेव्रत क दौरान कौनिे खाद्य पदाथा ग्रहण करं ? े  व्रत मं अडन का िेवन वस्जात हं । स्जि कारण शरीर मं ऊजाा की कमी हो जाती हं ।  अनाज फक जगह फलं व िस्ब्जर्ं का िेवन फकर्ा जा िकता हं । इििे शरीर को जरुरी ऊजाा समलती हं ।  िुबह क िमर् आलू को फ्राई करक खार्ा जा िकता हं । आलू मं काबोहाइड्रे ट प्रर्ुर मािा मं होता है । इि सलए आलू े े खाने िे शरीर को ताकत समलती है ।  िुबह एक सगलाि दध त्रपलं। दोपहर क िमर् फल र्ा जूि लं। शाम को र्ार् पी िकते हं । ू ेकई लोग व्रत मं एक बार ही भोजन करते हं । ऐिे मं एक सनस्ित अंतराल पर फल खा िकते हं । रात क खाने मं सिंघािे क आटे िे े ेबने पकवान खा िकते हं ।
  • 43. 43 मार्ा 2012 नवराि मं दे वी उपािना िे मनोकामना पूसता  स्वस्स्तक.ऎन.जोशीदे वी भागवत क आठवं स्कध मं दे वी उपािना का त्रवस्तार िे वणान है । दे वी का पूजन-अर्ान-उपािना-िाधना इत्र्ाफद े ंक पिर्ात दान दे ने पर लोक और परलोक दोनं िुख दे ने वाले होते हं । े प्रसतपदा सतसथ क फदन दे वी का षोिशेपर्ार िे पूजन करक नैवेद्य क रूप मं दे वी को गार् का घृत (घी) अपाण करना े े े र्ाफहए। मां को र्रणं र्ढ़ार्े गर्े घृत को ब्रामहणं मं बांटने िे रोगं िे मुत्रक्त समलती है । फद्वतीर्ा सतसथ क फदन दे वी को र्ीनी का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। र्ीनी का भोग लागाने िे व्र्त्रक्त े दीघाजीवी होता हं । तृतीर्ा सतसथ क फदन दे वी को दध का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। दध का भोग लागाने िे व्र्त्रक्त को े ू ू दखं िे मुत्रक्त समलती हं । ु र्तुथी सतसथ क फदन दे वी को मालपुआ भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। मालपुए का भोग लागाने िे व्र्त्रक्त े फक त्रवपत्रि का नाश होता हं । पंर्मी सतसथ क फदन दे वी को कले का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। कले का भोग लागाने िे व्र्त्रक्त फक े े े बुत्रद्ध, त्रववेक का त्रवकाि होता हं । व्र्त्रक्त क पररवारीकिुख िमृत्रद्ध मं वृत्रद्ध होती हं । े षष्ठी सतसथ क फदन दे वी को मधु (शहद, महु, मध) का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। मधु का भोग लागाने े िे व्र्त्रक्त को िुदर स्वरूप फक प्रासप्त होती हं । ं िप्तमी सतसथ क फदन दे वी को गुि का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। गुि का भोग लागाने िे व्र्त्रक्त क े े िमस्त शोक दर होते हं । ू अष्टमी सतसथ क फदन दे वी को श्रीफल (नाररर्ल) का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। गुि का भोग लागाने े िे व्र्त्रक्त क िंताप दर होते हं । े ू नवमी सतसथ क फदन दे वी को धान क लावे का भोग लगाकर दान करना र्ाफहए। धान क लावे का भोग लागाने े े े िे व्र्त्रक्त क लोक और परलोक का िुख प्राप्त होता हं । े मंि सिद्ध दलभ िामग्री ु ा हत्था जोिी- Rs- 370 घोिे की नाल- Rs.351 मार्ा जाल- Rs- 251 सिर्ार सिंगी- Rs- 370 दस्क्षणावती शंख- Rs- 550 इडद्र जाल- Rs- 251 त्रबल्ली नाल- Rs- 370 मोसत शंख- Rs- 550 धन वृत्रद्ध हकीक िेट Rs-251 GURUTVA KARYALAY Call Us: 91 + 9338213418, 91 + 9238328785, Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  • 44. 44 मार्ा 2012 िप्तश्र्ललोकी दगाा ु दगाा आरती ुदे त्रव त्वं भक्तिुलभे िवाकार्ात्रवधासर्नी।कलौ फह कार्ासिद्धर्थामुपार्ं ब्रूफह र्ितः॥ जर् अमबे गौरी मैर्ा जर् श्र्ामा गौरी। तुमको सनिफदन ध्र्ावत हरर ब्रमहा सशवरी॥१॥दे व उवार्:श्रृणु दे व प्रवक्ष्र्ासम कलौ िवेष्टिाधनम। ् मांग सिंदर त्रवराजत टीको मृगमदको। ूमर्ा तवैव स्नेहेनाप्र्मबास्तुसतः प्रकाश्र्ते॥ उज्जवल िे दोऊ नैना र्डद्रवदन नीको॥२॥त्रवसनर्ोगः कनक िमान कलेवर रक्तामबर राजे।ॐ अस्र् श्री दगाािप्तश्लोकीस्तोिमडिस्र् ु रक्त पुष्प गल माला कण्ठन पर िाजे॥३॥नारार्ण ऋत्रषः अनुष्टपछडदः, ् कहरर वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी। ेश्रीमह्मकाली महालक्ष्मी महािरस्वत्र्ो दे वताः, िुर नर मुसन जन िेवत सतनक दःख हारी॥४॥ े ुश्रीदगााप्रीत्र्थं िप्तश्लोकीदगाापाठे त्रवसनर्ोगः। ु ु कानन किल शोसभत नािाग्रे मोती। ुंॐ ज्ञासननामत्रप र्ेतांसि दे वी भगवती फहिा। कोफटक र्ंद्र फदवाकर राजत िम ज्र्ोसत॥५॥बलादाकृ ष्र् मोहार् महामार्ा प्रर्च्छसत॥ शुभ सनशंभु त्रवदारे मफहषािुरधाती। ंदगे स्मृता हरसि भीसतमशेषजडतोः ु धूम्रत्रवलोर्न नैना सनशफदन मदमाती॥६॥स्वस्थैः स्मृता मसतमतीव शुभां ददासि। र्ण्ि मुण्ि िंहारे शोस्णत बीज हरे ।दाररद्रर्दःखभर्हाररस्ण त्वदडर्ा ु मधु कटभ दोउ मारे िुर भर्हीन करे ॥७॥ ैिवोपकारकरणार् िदाद्रा सर्िा॥ ब्रमहाणी रुद्राणी तुम कमलारानी।िवामंगलमंगल्र्े सशवे िवााथिासधक। ा े आगम सनगम बखानी तुम सशव पटरानी॥८॥शरण्र्े त्र्र्मबक गौरर नारार्स्ण नमोऽस्तुते॥ े र्ौिंठ र्ोसगनी गावत नृत्र् करत भैरुँ।शरणागतदीनातापररिाणपरार्णे। बाजत ताल मृदंगा अरु िमरुँ ॥९॥िवास्र्ासताहरे दे त्रव नारार्स्ण नमोऽस्तुते॥ तुम ही जग की माता तुम ही हो भरता।िवास्वरूपे िवेशे िवाशत्रक्तिमस्डवते। भक्तन की दःखहताा िुख िमपत्रि कताा॥१०॥ ुभर्ेभ्र्स्त्रोाफह नो दे त्रव दगे दे त्रव नमोऽस्तुते॥ ु भुजा र्ार असत शोसभत वर मुद्रा धारी।रोगानशोषानपहं सि तुष्टा रूष्टा तु कामान ् िकलानभीष्टान। ् मनवांस्च्छत फल पावे िेवत नर नारी॥११॥त्वामासश्रतानां न त्रवपडनराणां त्वामासश्रता ह्माश्रर्तां प्रर्ास्डत॥ कर्न थाल त्रवराजत अगर कपुर बािी। ं श्री माल कतु मं राजत कोफट रतन ज्र्ोती॥१२॥ ेिवााबाधाप्रशमनं िैलोक्र्स्र्ास्खलेश्र्लवरर।एवमेव त्वर्ा कार्ामस्र्द्वै ररत्रवनाशनम॥ ् माँ अमबे जी की आरती जो कोई नर गार्े।॥ इसत श्रीिप्तश्लोकी दगाा िंपूणम ् ॥ ु ा कहत सशवानंद स्वामी िुख िंपत्रि पार्े॥१३॥
  • 45. 45 मार्ा 2012 ॥दगाा र्ालीिा॥ ुनमो नमो दगे िुख करनी। ु मफहमा असमत नजात बखानी॥१४॥ ध्र्ावे तुमहं जो नर मन लाई।नमो नमो दगे दःख हरनी ॥१॥ ु ु मातंगी अरु धूमावसत माता। जडम-मरण ताकौ छफट जाई॥२८॥ ुसनरं कार है ज्र्ोसत तुमहारी। भुवनेश्वरी बगला िुख दाता॥१५॥ जोगी िुर मुसन कहत पुकारी।सतहूँ लोक फली उस्जर्ारी ॥२॥ ै र्ोगन हो त्रबन शत्रक्त तुमहारी॥२९॥ श्री भैरव तारा जग ताररणी।शसश ललाट मुख महात्रवशाला। शंकर आर्ारज तप कीनो। सछडनभालभव दःखसनवाररणी॥१६॥ ुनेि लाल भृकफट त्रवकराला ॥३॥ ु कामअरु क्रोधजीसत िब लीनो॥३०॥ कहरर वाहन िोह भवानी। ेरूप मातु को असधक िुहावे। लांगुर वीर र्लत अगवानी॥१७॥ सनसशफदन ध्र्ान धरो शंकर को।दरशकरत जन असत िुखपावे ॥४॥ कर मं खप्पर खड्ग त्रवराजै। काहुकाल नफहं िुसमरो तुमको॥३१॥तुम िंिार शत्रक्त लै कीना। जाको दे ख काल िर भाजै॥१८॥ शत्रक्त रूप का मरम न पार्ो।पालन हे तु अडन धन दीना ॥५॥ िोहै अस्त्रो और त्रिशूला। शत्रक्त गई तब मन पसछतार्ो॥३२॥अडनपूणाा हुई जग पाला। जाते उठत शिु फहर् शूला॥१९॥ शरणागत हुई कीसता बखानी।तुम ही आफद िुडदरी बाला ॥६॥ नगरकोट मं तुमहीं त्रवराजत। जर् जर् जर् जगदमबभवानी॥३३॥प्रलर्काल िब नाशन हारी। सतहुँलोक मं िं का बाजत॥२०॥ भई प्रिडन आफद जगदमबा।तुम गौरी सशवशंकर प्र्ारी ॥७॥ दई शत्रक्त नफहं कीन त्रवलमबा॥३४॥ शुमभ सनशुमभ दानव तुम मारे ।सशव र्ोगी तुमहरे गुण गावं। मोको मातु कष्ट असत घेरो। रक्तबीज शंखन िंहारे ॥२१॥ब्रह्मा त्रवष्णु तुमहं सनत ध्र्ावं ॥८॥ तुम त्रबन कौन हरै दःख मेरो॥३५॥ ु मफहषािुर नृप असत असभमानी।रूप िरस्वती को तुम धारा। आशा तृष्णा सनपट ितावं। जेफह अघ भार मही अकलानी॥२२॥ ुदे िुबुत्रद्ध ऋत्रष मुसनन उबारा ॥९॥ मोह मदाफदक िब त्रबनशावं॥३६॥ रूप कराल कासलका धारा।धरर्ो रूप नरसिंह को अमबा। शिु नाश कीजै महारानी। िेन िफहत तुम सतफह िंहारा॥२३॥परगट भई फािकर खमबा ॥१०॥ िुसमरं इकसर्त तुमहं भवानी॥३७॥ परी गाढ़ िडतन पर जब जब। करो कृ पा हे मातु दर्ाला।रक्षा करर प्रह्लाद बर्ार्ो। भईिहार् मातु तुम तब तब॥२४॥ ऋत्रद्ध-सित्रद्ध दै करहु सनहाला।३८॥फहरण्र्ाक्ष को स्वगा पठार्ो॥११॥ अमरपुरी अरु बािव लोका। जब लसग स्जऊ दर्ा फल पाऊ। ँ ँलक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। तब मफहमा िब रहं अशोका॥२५॥ तुमहरो र्श मं िदा िुनाऊ॥३९॥ ँश्री नारार्ण अंग िमाहीं॥१२॥ ज्वाला मं है ज्र्ोसत तुमहारी। श्री दगाा र्ालीिा जो कोई गावै। ुक्षीरसिडधु मं करत त्रवलािा। तुमहं िदा पूजं नर-नारी॥२६॥ िब िुख भोग परमपद पावै॥४०॥दर्ासिडधु दीजै मन आिा॥१३॥ प्रेम भत्रक्त िे जो र्श गावं। दोहा: दे वीदाि शरण सनज जानी।फहं गलाज मं तुमहीं भवानी। दःख दाररद्र सनकट नफहं आवं॥२७॥ ु करहु कृ पा जगदमब भवानी॥
  • 46. 46 मार्ा 2012 श्रीकृ ष्ण कृ त दे वी स्तुसत नवराि मं श्रद्धा और प्रेमपूवक महाशत्रक्त भगवती दे वी की पूजा-उपािना करने िे र्ह सनगुण स्वरूपा दे वी पृथ्वी क िमस्त ा ा ेजीवं पर दर्ा करक स्वर्ं ही िगुणभाव को प्राप्त होकर ब्रह्मा, त्रवष्णु और महे श रूप िे उत्पत्रि, पालन और िंहार कार्ा करती हं । ेश्रीकृ ष्ण उवार्त्वमेव िवाजननी मूलप्रकृ सतरीश्वरी। त्वमेवाद्या िृत्रष्टत्रवधौ स्वेच्छर्ा त्रिगुणास्त्मका॥१॥कार्ााथे िगुणा त्वं र् वस्तुतो सनगुणा स्वर्म ्। परब्रह्मास्वरूपा त्वं ित्र्ा सनत्र्ा िनातनी॥२॥ ातेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहत्रवग्रहा। िवास्वरूपा िवेशा िवााधारा परात्पर॥३॥िवाबीजस्वरूपा र् िवापूज्र्ा सनराश्रर्ा। िवाज्ञा िवातोभद्रा िवामंगलमंगला॥४॥अथाातः आप त्रवश्वजननी मूल प्रकृ सत ईश्वरी हो, आप िृत्रष्ट की उत्पत्रि क िमर् आद्याशत्रक्त क रूप मं त्रवराजमान रहती हो और े ेस्वेच्छा िे त्रिगुणास्त्मका बन जाती हो।र्द्यत्रप वस्तुतः आप स्वर्ं सनगुण हो तथात्रप प्रर्ोजनवश िगुण हो जाती हो। आप परब्रह्म स्वरूप, ित्र्, सनत्र् एवं िनातनी हो। ापरम तेजस्वरूप और भक्तं पर अनुग्रह करने आप शरीर धारण करती हं। आप िवास्वरूपा, िवेश्वरी, िवााधार एवं परात्पर हो। आपिवााबीजस्वरूप, िवापूज्र्ा एवं आश्रर्रफहत हो। आप िवाज्ञ, िवाप्रकार िे मंगल करने वाली एवं िवा मंगलं फक भी मंगल हो। ऋग्वेदोक्त दे वी िूक्तम ्अहसमत्र्ष्टर्ास्र् िूक्त स्र् वागामभृणी ऋत्रष: िस्च्र्त्िुखात्मक: िवागत: परमात्मा दे वता,फद्वतीर्ार्ा ऋर्ो जगती, सशष्टानां त्रिष्टु प ् छडद:, दे वीमाहात्मर् पाठे त्रवसनर्ोगः।ध्र्ानम ्सिंहस्था शसशशेखरा मरकतप्रख्र्ैितुसभाभजै: शङ्खं र्क्रधनु:शरांि दधती नेिैस्स्त्रोसभ: शोसभता। ुाआमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्र्ीरणडनूपुरा दगाा दगसतहाररणी भवतु नो रत्नोल्लित्कण्िला॥ ु ु ा ुदे वीिूक्तम ्अहं रुद्रे सभवािसभिरामर्हमाफदत्र्ैरुत त्रवश्वदे वः। अहं समिावरुणोभा त्रबभमर्ाहसमडद्राग्नी अहमसश्र ्वनोभा॥१॥ ु ैअहं िोममाहनिं त्रबभमर्ाहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम ्। अहं दधासम द्रत्रवणं हत्रवष्मते िुप्राव्र्े र्जमानार् िुडवते॥२॥अहं राष्ट्री िंगमनी विूनां सर्फकतुषी प्रथमा र्स्ज्ञर्ानाम ्। तां मा दे वा व्र्दधु: पुरुिा भूररस्थािां भूय्र्र्ावेशर्डतीम ्॥३॥मर्ािो अडनमत्रि र्ोत्रवपश्र्सत र्: प्रास्णसत र्ईश्रृणोत्र्ुक्त म ्। अमडतवो मां तउप स्क्षर्स्डत श्रुसधश्रुत श्रत्रद्धवं ते वदासम॥४॥अहमेव स्वर्समदं वदासम जुष्टं दे वेसभरुत मानुषसभः। र्ं कामर्े तं तमुग्रं कृ णोसम तं ब्रह्माणं तमृत्रषं तं िुमेधाम ्॥५॥ ेअहं रुद्रार् धनुरा तनोसम ब्रह्मफद्वषे शरवे हडतवा उ। अहं जनार् िमदं कृ णोमर्हं द्यावापृसथवीआत्रववेश॥६॥अहं िुवे त्रपतरमस्र् मूधडमम र्ोसनरप्स्वडत: िमुद्रे। ततो त्रव सतष्ठे भुवनानु त्रवश्वोतामूं द्यां वष्माणोप स्पशसम॥७॥ ाअहमेव वात इव प्रवामर्ारभमाणा भुवनासन त्रवश्वा। परो फदवा पर एना पृसथव्र्ैतावती मफहना िंबभूव॥८॥
  • 47. 47 मार्ा 2012 ॥ सिद्धकस्जकास्तोिम ् ॥ ुंसशव उवार् ऐंकारी िृत्रष्टरूपार्ै ह्रींकारी प्रसतपासलका।शृणु दे त्रव प्रवक्ष्र्ासम कस्जकास्तोिमुिमम। ुं ् क्लींकारी कामरूत्रपण्र्ै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥र्ेन मडिप्रभावेण र्ण्िीजापः शुभो भवेत॥१॥ ् र्ामुण्िा र्ण्िघाती र् र्ैकारी वरदासर्नी॥४॥न कवर्ं नागालास्तोिं कीलक न रहस्र्कम। ं ् त्रवच्र्े र्ाभर्दा सनत्र्ं नमस्ते मंिरूत्रपस्ण।न िूक्त नात्रप ध्र्ानं र् न डर्ािो न र् वार्ानम॥२॥ ं ् धां धीं धूं धूजटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी॥५॥ ाकस्जकापाठमािेण दगाापाठफलं लभेत। ुं ु ् क्रां क्रीं क्र कासलका दे त्रव शां शीं शूं मे शुभं करु॥६॥ ूं ुअसत गुह्यतरं दे त्रव दे वानामत्रप दलभम॥३॥ ु ा ् हंु हुं हुंकाररूत्रपण्र्ै जं जं जं जमभनाफदनी।गोपनीर्ं प्रर्त्नेन स्वर्ोसनररव पावासत। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवाडर्ै ते नमो नमःमारणं मोहनं वश्र्ं स्तमभनोच्र्ाटनाफदकम। ् अं क र्ं टं तं पं र्ं शं वीं दं ु ऐं वीं हं क्षं॥७॥ ंपाठमािेण िंसिद्धर्ेत ् कस्जकास्तोिमुिमम॥४॥ ुं ् सधजाग्रं सधजाग्रं िोटर् िोटर् दीप्तं करु करु स्वाहा॥ ु ुअथ मंि पां पीं पूं पावाती पूणाा खां खीं खूं खेर्री तथा ॥८॥ॐ ऐं ह्रीं क्लीं र्ामुण्िार्ै त्रवच्र्े। ॐ ग्लं हंु क्लीं जूं िः िां िीं िूं िप्तशती दे व्र्ा मंिसित्रद्धं करुष्व मे॥ ुज्वालर् ज्वालर् ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं इदं तु कस्जकास्तोिं मंिजागसताहेतवे। ुंर्ामुण्िार्ै त्रवच्र्े ज्वल हं िं लं क्षं फट् स्वाहा अभक्त नैव दातव्र्ं गोत्रपतं रक्ष पावासत॥ ेइसत मंिः र्स्तु कस्जकर्ा दे त्रव हीनां िप्तशतीं पठे त। ुं ्नमस्ते रुद्ररूत्रपण्र्ै नमस्ते मधुमफदासन। न तस्र् जार्ते सित्रद्धररण्र्े रोदनं र्था॥नमः कटभहाररण्र्ै नमस्ते मफहषाफदासन॥१॥ ै । इसत श्री कस्जकास्तोिम ् िंपूणम ् । ुं ानमस्ते शुमभहडत्र्र्ै र् सनशुमभािुरघासतसन।जाग्रतं फह महादे त्रव जपं सिद्धं करुष्व मे॥२॥ ु दगााष्टकम ् ुदगे परे सश शुभदे सश परात्परे सश। ु पूज्र्े महावृषभवाफहसन मंगलेसश। मोक्षेऽस्स्थरे त्रिपुरिुडदररपाटलेसश।वडद्ये महे शदसर्तेकरुणाणावेसश। पद्मे फदगमबरर महे श्वरर काननेसश। माहे श्वरर त्रिनर्ने प्रबले मखेसश।स्तुत्र्े स्वधे िकलतापहरे िुरेसश। रमर्ेधरे िकलदे वनुते गर्ेसश। तृष्णे तरं सगस्ण बले गसतदे ध्रुवेसश।कृ ष्णस्तुते करु कृ पां लसलतेऽस्खलेसश॥१॥ ु कृ ष्णस्तुते करु कृ पा लसलतेऽस्खलेसश॥४॥ ु कृ ष्णस्तुते करु कृ पां लसलतेऽस्खलेसश॥७॥ ुफदव्र्े नुते श्रुसतशतैत्रवामले भवेसश। श्रद्धे िुराऽिुरनुते िकले जलेसश। त्रवश्वमभरे िकलदे त्रवफदते जर्ेसश।कडदपादारशतर्ुडदरर माधवेसश। गंगे सगरीशदसर्ते गणनार्कसश। े त्रवडध्र्स्स्थते शसशमुस्ख क्षणदे दर्ेसश।मेधे सगरीशतनर्े सनर्ते सशवेसश। दक्षे स्मशानसनलर्े िुरनार्कसश। े मातः िरोजनर्ने रसिक स्मरे सश। ेकृ ष्णस्तुते करु कृ पां लसलतेऽस्खलेसश॥२॥ ु कृ ष्णस्तुते करु कृ पां लसलतेऽस्खलेसश॥५॥ ु कृ ष्णस्तुते करु कृ पां लसलतेऽस्खलेसश॥८॥ ुरािेश्वरर प्रणततापहरे कलेसश। ु तारे कृ पाद्रानर्ने मधुकटभेसश। ै दगााष्टक पठसत र्ः प्रर्तः प्रभाते ु ंधमात्रप्रर्े भर्हरे वरदाग्रगेसश। त्रवद्येश्वरे श्वरर र्मे सनखलाक्षरे सश। िवााथदं हररहराफदनुतां वरे ण्र्ाम। ा ्वाग्दे वते त्रवसधनुते कमलािनेसश। ऊजे र्तुःस्तसन िनातसन मुक्तकसश। े दगां िुपूज्र् मफहतां त्रवत्रवधोपर्ारै ः ुकृ ष्णस्तुतेकरु कृ पां लसलतेऽस्खलेसश॥३॥ ु कृ ष्णस्तुते करु कृ पां लसलतऽस्खलेसश॥६॥ ु प्राप्नोसत वांसछतफलं न सर्राडमनुष्र्ः॥९॥ ॥ इसत श्री दगााष्टक िमपूणम ् ॥ ु ं ा
  • 48. 48 मार्ा 2012 ॥ भवाडर्ष्टकम ् ॥न तातो न माता न बडधुना दाता ककमी किंगी कबुत्रद्ध कदािः ु ु ु ुन पुिो न पुिी न भृत्र्ो न भताा। कलार्ारहीनः कदार्ारलीनः। ुन जार्ा न त्रवद्या न वृत्रिमामैव कदृत्रष्टः कवाक्र्प्रबंधः िदाऽह ु ुगसतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥१॥ गसतस्त्व गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥५॥भवाब्धावपारे महादःखभीरुः ु प्रजेशं रमेशं महे शं िुरेशंपपात प्रकामी प्रलोभी प्रमिः। फदनेशं सनशीथेश्वरं वा कदासर्त। ्किंिार-पाश-प्रबद्धः िदाऽहं ु न जानासम र्ाऽडर्त ् िदाऽहं शरण्र्ेगसतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥२॥ गसतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥६॥न जानासम दानं न र् ध्र्ान-र्ोगं त्रववादे त्रवषादे प्रमादे प्रवािेन जानासम तंि न र् स्तोि-मडिम। ् जले र्ाऽनले पवाते शिुमध्र्े।न जानासम पूजां न र् डर्ािर्ोगं अरण्र्े शरण्र्े िदा मां प्रपाफहगसतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥३॥ गसतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥७॥न जानासम पुण्र्ं न जानासन तीथं अनाथो दररद्रो जरा-रोगर्ुक्तोन जानासम मुत्रक्त लर्ं वा कदासर्त। ं ् महाक्षीणदीनः िदा जाड्र्वक्िः।न जानासम भत्रक्त व्रतं वाऽत्रप मात- त्रवपिौ प्रत्रवष्टः प्रणष्टः िदाऽहंगासतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥४॥ गसतस्त्वं गसतस्त्वं त्वमेका भवासन॥८॥ ॥ इसत श्रीभवाडर्ष्टक िंपूणम ् ॥ ं ा क्षमा-प्राथाना अपराधिहस्त्रोास्ण फक्रर्डतेऽहसनाशं मर्ा। दािोऽर्समसत मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरर॥१॥ आवाहनं न जानासम न जानासम त्रविजानम ्। पूजां र्ैव न जानासम क्षमर्तां परमेश्वरर॥२॥ मडिहीनं फक्रर्ाहीनं भत्रक्तहीनं िुरेश्वरर। र्त्पूस्जतं मर्ा दे त्रव पररपूणा तदस्तु मे॥३॥ अपराधशतं कृ त्वा जगदमबेसत र्ोच्र्रे त ्। र्ां गसतं िमवापनेसत न तां ब्रह्मादर्: िुराः॥४॥ िापराधोऽस्स्म शरणं प्राप्तस्त्वां जगदस्मबक। इदानीमनुकमप्र्ोऽहं र्थेच्छसि तथा करु॥५॥ े ु अज्ञानाफद्वस्मृतेभ्रराडत्र्ा र्डडर्ूनमसधक कृ तम ्। तत्िवा क्षमर्तां दे त्रव प्रिीद परमेश्वरर॥६॥ ं कामेश्वरर जगडमात: िस्च्र्दानडदत्रवग्रहे । गृहाणार्ाासममां प्रीत्र्ा प्रिीद परमेश्वरर॥७॥ गुह्यासतगुह्यगोप्िी त्वं गृहाणास्मत्कृ तं जपम ्। सित्रद्धभावतु मे दे त्रव त्वत्प्रिादात्िुरेश्वरर॥८॥
  • 49. 49 मार्ा 2012 दगााष्टोिर शतनाम स्तोिम ् ुशतनाम प्रवक्ष्र्ासम शृणुष्व कमलानने। अनेकशस्त्रोहस्ता र् अनेकास्त्रोस्र् धाररणी।र्स्र् प्रिादमािेण दगाा प्रीता भवेत ् िती॥१॥ ु कमारी र्ैककडर्ा र् कशोरी र्ुवती र्सतः॥१२॥ ु ैिती िाध्वी भवप्रीता भवानी भवमोर्नी। अप्रौढा र्ैव प्रौढा र् वृद्धमाता बलप्रदा।आर्ाा दगाा जर्ा र्ाद्या त्रिनेिा शूलधाररणी॥२॥ ु महोदरी मुक्त कशी घोररूपा महाबला॥१३॥ ेत्रपनाकधाररणी सर्िा र्ण्िघण्टा महातपाः। अस्ग्नज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्स्वनी।मनो बुत्रद्धरहं कारा सर्िरूपा सर्ता सर्सतः॥३॥ नारार्णी भद्रकाली त्रवष्णुमार्ा जलोदरी॥१४॥िवामडिमर्ी ििा ित्र्ानडदस्वरूत्रपणी। सशवदती कराली र् अनडता परमेश्वरी। ूअनडता भात्रवनी भाव्र्ा भव्र्ाभव्र्ा िदागसतः॥४॥ कात्र्ार्नी र् िात्रविी प्रत्र्क्षा ब्रह्मवाफदनी॥१५॥शामभवी दे वमाता र् सर्डता रत्नत्रप्रर्ा िदा। र् इदं प्रपठे स्डनत्र्ं दगाानामशताष्टकम ्। ुिवात्रवद्या दक्षकडर्ा दक्षर्ज्ञत्रवनासशनी॥५॥ नािाध्र्ं त्रवद्यते दे त्रव त्रिषु लोकषु पावासत॥१६॥ ेअपणाानेकवणाा र् पाटला पाटलावती। धनं धाडर्ं िुतं जार्ां हर्ं हस्स्तनमेव र्।पट्टामबरपरीधाना कलमञ्जीररस्ञ्जनी॥६॥ र्तुवगा तथा र्ाडते लभेडमुत्रक्त र् शाश्वतीम ्॥१७॥ ा ंअमेर्त्रवक्रमा क्ररा िुडदरी िुरिुडदरी। ू कमारीं पूजसर्त्वा तु ध्र्ात्वा दे वीं िुरेश्वरीम ्। ुवनदगाा र् मातङ्गी मतङ्गमुसनपूस्जता॥७॥ ु पूजर्ेत ् परर्ा भक्त्र्ा पठे डनामशताष्टकम ्॥१८॥ब्राह्मी माहे श्वरी र्ैडद्री कौमारी वैष्णवी तथा। तस्र् सित्रद्धभावेद् दे त्रव िवै: िुरवरै रत्रप।र्ामुण्िा र्ैव वाराही लक्ष्मीि पुरुषाकृ सतः॥८॥ राजानो दाितां र्ास्डत राज्र्सश्रर्मवापनुर्ात ्॥१९॥त्रवमलोत्कत्रषाणी ज्ञाना फक्रर्ा सनत्र्ा र् बुत्रद्धदा। गोरोर्नालक्त ककङ्कमेन सिडदरकपूरमधुिर्ेण। ु ु ू ाबहुला बहुलप्रेमा िवावाहनवाहना॥९॥ त्रवसलख्र् र्डिं त्रवसधना त्रवसधज्ञो भवेत ् िदा धारर्तेसनशुमभशुमभहननी मफहषािुरमफदा नी। पुराररः॥२०॥मधुकटभहडिी र् र्ण्िमुण्ित्रवनासशनी॥१०॥ ै भौमावास्र्ासनशामग्रे र्डद्रे शतसभषां गते।िवाािुरत्रवनाशा र् िवादानवघासतनी। त्रवसलख्र् प्रपठे त ् स्तोिं ि भवेत ् िमपदां पदम ्॥२१॥िवाशास्त्रोमर्ी ित्र्ा िवाास्त्रोधाररणी तथा॥११॥ शादी िंबंसधत िमस्र्ा क्र्ा आपक लिक-लिकी फक आपकी शादी मं अनावश्र्क रूप िे त्रवलमब हो रहा हं र्ा उनक वैवाफहक े े े जीवन मं खुसशर्ां कम होती जारही हं और िमस्र्ा असधक बढती जारही हं । एिी स्स्थती होने पर अपने लिक-लिकी फक किली का अध्र्र्न अवश्र् करवाले और उनक वैवाफहक िुख को कम करने े ुं े वाले दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे जनकारी प्राप्त करं । े े े GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 50. 50 मार्ा 2012 त्रवश्वंभरी स्तुसत त्रवश्वंभरी स्तुसत मूल रुपिे गुजराती मं वल्लभ भट्ट द्वारा सलखी गई हं । स्वस्स्तक.ऎन.जोशीत्रवश्वंभरी अस्खल त्रवश्वतणी जनेता। रे रे भवानी बहु भूल थई ज मारी।त्रवद्या धरी वदनमां विजो त्रवधाता॥ आ स्जंदगी थई मने असतशे अकारी॥दबुत्रद्ध दर करी िद्दबुत्रद्ध आपो। ु ा ु दोषो प्रजासळ िधळा तव छाप छापो।माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥१॥ ु माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥७॥ ुभूलो पफि भवरने भटक भवानी। ुं खाली न कोइ स्थळ छे त्रवण आप धारो।िुझे नफह लगीर कोइ फदशा जवानी॥ ब्रह्मांिमां अणु-अणु महीं वाि तारो॥भािे भर्ंकर वळी मनना उतापो। शत्रक्त न माप गणवा अगस्णत मापो।माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥२॥ ु माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥८॥ ुआ रं कने उगरवा नथी कोइ आरो। पापो प्रपंर् करवा बधी रीते पूरो।जडमांध छ जननी हु ग्रही हाथ तारो॥ ु खोटो खरो भगवती पण हुं तमारो॥ना शुं िुणो भगवती सशशुना त्रवलापो। जािर्ांधकार करी दर िुबुत्रद्ध स्थापो। ूमाम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥३॥ ु माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥९॥ ुमा कमा जडम कथनी करतां त्रवर्ारु। शीखे िुणे रसिक छं द ज एक सर्िे।आ िृत्रष्टमां तुज त्रवना नथी कोइ मारु॥ तेना थकी त्रित्रवध ताप टळे खसर्ते॥कोने कहुं कठण काळ तणो बळापो। बुत्रद्ध त्रवशेष जगदं ब तणा प्रतापो।माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥४॥ ु माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥१०॥ ुहुं काम क्रोध मध मोह थकी भरे लो। श्री िदगुरु शरनमां रहीने र्जुं छंु ।आिं बरे असत धणो मद्थी छकलो॥ े रात्रि फदने भगवती तुजने भजुं छ॥ ुदोषो बधा दर करी माफ पापो। ू िदभक्त िेवक तणा पररताप र्ापो।माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥५॥ ु माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥११॥ ुना शास्त्रोना श्रवणनु पर्ःपान पीधु। अंतर त्रवषे असधक उसमा थतां भवानी।ना मंि क स्तुसत कथा नथी काइ कीधु॥ े गाऊ स्तुसत तव बळे नमीने मृिानी॥श्रद्धा धरी नथी कर्ाा तव नाम जापो। िंिारना िकळ रोग िमूळ कापो।माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥६॥ ु माम ् पाफह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥१२॥ ु
  • 51. 51 मार्ा 2012 मफहषािुरमफदासनस्तोिम ्||भगवतीपद्यपुष्पांजसलस्तोि मफहषािुरमफदा सनस्तोिम ् || श्री त्रिपुरिुडदर्ै नमः ||भगवती भगवत्पदपङ्कजं भ्रमरभूतिुरािुरिेत्रवतम ् | िुजनमानिहं िपररस्तुतं कमलर्ाऽमलर्ा सनभृतं भजे ||१|| ते उभेअसभवडदे ऽहं त्रवघ्नेशकलदै वते ु | नरनागाननस्त्वेको नरसिंह नमोऽस्तुते ||२|| हररगुरुपदपद्मं शुद्धपद्येऽनुरागाद्त्रवगतपरमभागे िस्डनधार्ादरे ण | तदनुर्रर करोसम प्रीतर्े भत्रक्तभाजां भगवसत पदपद्मे पद्यपुष्पाञ्जसलं ते ||३|| कनैते ेरसर्ताः कतो न सनफहताः शुमभादर्ो दमदाः कनैते तव पासलता इसत फह तत ् प्रश्ने फकमार्क्ष्महे | ब्रह्माद्या अत्रप शंफकताः ु ु ा ेस्वत्रवषर्े र्स्र्ाः प्रिादावसध प्रीता िा मफहषािुरप्रमसथनीच््द्यादवद्यासन मे ||४|| पातु श्रीस्तु र्तुभजा ुा फकमुर्तुबााहोमाहौजाडभुजान ् धिेऽष्टादशधा फह कारणगुणाडकार्े गुणारमभकाः | ित्र्ं फदक्पसतदस्डतिंख्र्भुजभृच्छमभुः स्वय्ममभूःस्वर्ं धामैकप्रसतपिर्े फकमथवा पातुं दशाष्टौ फदशः ||५|| प्रीत्र्ाऽष्टादशिंसमतेषु र्ुगपद्द्वीपेषु दातुं वरान ् िातुं वा भर्तोत्रबभत्रषा भगवत्र्ष्टादशैतान ् भुजान ् | र्द्वाऽष्टादशधा भुजांस्तु त्रबभृतः काली िरस्वत्र्ुभे मीसलत्वैकसमहानर्ोः प्रथसर्तुं िात्वं रमे रक्षमाम ् ||६|| असर् सगररनंफदसन नंफदतमेफदसन त्रवश्वत्रवनोफदसन नंदनुते सगररवर त्रवंध्र् सशरोसधसनवासिसनत्रवष्णुत्रवलासिसन स्जष्णुनुते | भगवसत हे सशसतकण्ठकटु ं त्रबसन भूरर कटु ं त्रबसन भूरर कृ ते जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन ु ुरमर्कपफदा सन शैलिुते ||१||||७|| िुरवरवत्रषास्ण दधरधत्रषास्ण ु ा दमुखमत्रषास्ण ु ा हषारते त्रिभुवनपोत्रषस्ण शंकरतोत्रषस्णफकस्ल्बषमोत्रषस्ण घोषरते | दनुज सनरोत्रषस्ण फदसतिुत रोत्रषस्ण दमद शोत्रषस्ण सिडधुिुते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन ु ारमर्कपफदा सन शैलिुते ||२||||८|| असर् जगदं ब मदं ब कदं ब वनत्रप्रर् वासिसन हािरते सशखरर सशरोमस्ण तुङ्ग फहमालर्शृग सनजालर् मध्र्गते | मधु मधुरे मधु कटभ गंस्जसन कटभ भंस्जसन रािरते जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन ं ै ैरमर्कपफदा सन शैलिुते ||३||||९|| असर् शतखण्ि त्रवखस्ण्ित रुण्ि त्रवतुस्ण्ित शुण्ि गजासधपते ररपु गज गण्ि त्रवदारणर्ण्ि पराक्रम शुण्ि मृगासधपते | सनज भुज दण्ि सनपासतत खण्ि त्रवपासतत मुण्ि भटासधपते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सनरमर्कपफदा सन शैलिुते ||४||||१०|| असर् रण दमद शिु वधोफदत दधर सनजार शत्रक्तभृते र्तुर त्रवर्ार धुरीण महासशव ु ा ु ादतकृ त प्रमथासधपते | दररत दरीह दराशर् दमसत दानवदत कृ तांतमते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदासन ू ु ु ु ु ा ूशैलिुते ||५||||११|| असर् शरणागत वैरर वधूवर वीर वराभर् दार्करे त्रिभुवन मस्तक शूल त्रवरोसध सशरोसध कृ तामलशूलकरे | दसमदसम तामर दं दसभनाद महो मुखरीकृ त सतग्मकरे जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन रमर्कपफदा सन शैलिुते ु ु ु ु||६||||१२|| असर् सनज हुँकृसत माि सनराकृ त धूम्र त्रवलोर्न धूम्र शते िमर त्रवशोत्रषत शोस्णत बीज िमुद्भव शोस्णत बीजलते | सशव सशव शुभ सनशुभ महाहव तत्रपात भूत त्रपशार्रते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ं ं||७||||१३|| धनुरनु िंग रणक्षणिंग पररस्फर दं ग नटत्कटक कनक त्रपशंग पृषत्क सनषंग रिद्भट शृग हतावटु क | कृ त ु े ं ेर्तुरङ्ग बलस्क्षसत रङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटु के जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१४||
  • 52. 52 मार्ा 2012िुरललनाततथेसर्तथेसर्तथासभनर्ोिरनृत्र्रते हाित्रवलािहुलािमसर् प्रणताताजनेऽसमतप्रेमभरे |सधसमफकटसधक्कटसधकटसधसमध्वसनघोरमृदंगसननादरते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||८||||१५||जर् जर् जप्र् जर्ेजर् शब्द परस्तुसत तत्पर त्रवश्वनुते झण झण स्झस्ञ्जसम स्झंकृत नूपुर सिंस्जत मोफहत भूतपते |नफटत नटाधा नटीनट नार्क नाफटत नाट्र् िुगानरते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदासन शैलिुते ||९||||१६||असर् िुमनः िुमनः िुमनः िुमनः िुमनोहर कांसतर्ुते सश्रत रजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्िवृते | िुनर्नत्रवभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमरासधपते जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन रमर्कपफदासन शैलिुते ||१०||||१७|| िफहत महाहवमल्लम तस्ल्लक मस्ल्लत रल्लक मल्लरते त्रवरसर्त वस्ल्लक पस्ल्लक मस्ल्लक स्झस्ल्लक सभस्ल्लक वगा वृते | सितकृ तफस्ल्लिमुल्ल सितारुण तल्लज पल्लव िल्लसलते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदासन शैलिुते ||११||||१८|| ुअत्रवरल गण्ि गलडमद मेदर मि मतङ्गज राजपते त्रिभुवन भूषण भूत कलासनसध रूप पर्ोसनसध राजिुते | असर् िुद ुतीजन लालिमानि मोहन मडमथ राजिुते जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन रमर्कपफदासन शैलिुते ||१२||||१९|| कमलदलामल कोमल कांसत कलाकसलतामल भाललते िकल त्रवलाि कलासनलर्क्रम कसल र्लत्कल हंि कले | असलकल े ु ुिङ्कल कवलर् मण्िल मौसलसमलद्भकलासल कले जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१३||||२०|| कर ु ु ु ुमुरली रव वीस्जत कस्जत लस्ज्जत कोफकल मञ्जुमते समसलत पुसलडद मनोहर गुस्ञ्जत रं स्जतशैल सनकञ्जगते | सनजगुण ू ुभूत महाशबरीगण िद्गण िंभत कसलतले जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१४||||२१|| कफटतट पीत ु ृ ेदकल त्रवसर्ि मर्ूखसतरस्कृ त र्ंद्र रुर्े प्रणत िुरािुर मौसलमस्णस्फर दं शल िडनख र्ंद्र रुर्े | स्जत कनकार्ल ु ू ु ुमौसलपदोस्जात सनभार कजर कभकर्े जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१५||||२२|| त्रवस्जत ुं ुं ुिहस्रकरै क िहस्रकरै क िहस्रकरै कनुते कृ त िुरतारक िङ्गरतारक िङ्गरतारक िूनुिुते | िुरथ िमासध िमानिमासधिमासधिमासध िुजातरते जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन रमर्कपफदासन शैलिुते ||१६||||२३|| पदकमलं करुणासनलर्ेवररवस्र्सत र्ोऽनुफदनं ि सशवे असर् कमले कमलासनलर्े कमलासनलर्ः ि कथं न भवेत ् | तव पदमेवपरं पदसमत्र्नुशीलर्तो मम फक न सशवे जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१७||||२४|| कनकलित्कल ंसिडधु जलैरनु सिस्ञ्र्नुते गुण रङ्गभुवं भजसत ि फक न शर्ीकर् कभ तटी परररं भ िुखानुभवम ् | तव र्रणं शरणं ं ु ुंकरवास्ण नतामरवास्ण सनवासि सशवं जर् जर् हे मफहषािुरमफदासन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१८||||२५|| तव त्रवमलेडदकलं ु ुवदनेडदमलं िकलं ननु कलर्ते फकमु पुरुहूत पुरीडदमुखी िुमुखीसभरिौ त्रवमुखीफक्रर्ते | मम तु मतं सशवनामधने भवती ु ू ुकृ पर्ा फकमुत फक्रर्ते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||१९||||२६|| असर् मसर् दीनदर्ालुतर्ा कृ पर्ैवत्वर्ा भत्रवतव्र्मुमे असर् जगतो जननी कृ पर्ासि र्थासि तथाऽनुसमतासिरते | र्दसर्तमि ु भवत्र्ुरररकरुतादरुतापमपाकरुते जर् जर् हे मफहषािुरमफदा सन रमर्कपफदा सन शैलिुते ||२०||||२७|| स्तुसतसमतस्स्तसमतः िुिमासधना ु ु ुसनर्मतोऽर्मतोऽनुफदनं पठे त ् | परमर्ा रमर्ात्रप सनषेव्र्ते पररजनोऽररजनोऽत्रप र् तं भजेत ् ||२८|| रमर्सत फकलकषास्तेषु सर्िं नराणामवरजवर र्स्माद्रामकृ ष्णः कवीनाम ् | अकृ त िुकृसतगमर्ं रमर्पद्दै कहमर्ं स्तवनमवनहे तुं प्रीतर्ेत्रवश्वमातुः ||२९|| इडदरमर्ो मुहुत्रबाडदरमर्ो मुहुत्रबाडदरमर्ो र्तः िोऽनवद्यः स्मृतः | श्रीपतेः िूनूना काररतो र्ोऽधुना ु ु ुत्रवश्वमातुः पदे पद्यपुष्पाञ्जसलः ||३०|| || इसत श्रीभगवतीपद्यपुष्पाञ्जसलस्तोिम ् ||
  • 53. 53 मार्ा 2012 दवाा पूजन मं रखे िावधासनर्ां ु  सर्ंतन जोशी  माता दगाा की पूजा करने वाले िाधकं को उपािना िंबंधी इन बातं का ध्र्ान रखना लाभदार्क रहता हं । ु त्रवद्वानो क मत मं शास्त्रोोक्त त्रवधान िे एक ही घर मं तीन शत्रक्तर्ं की पूजा करना वस्जात हं । े  दे वीपीठ पर वाद्य-शहनाई का वादन नहीं करं ।  भगवती दगाा का आह्वान त्रबल्व पि, त्रबल्व शाखा र्ा त्रिशूल पर ही फकर्ा जाना र्ाफहए। ु  दे वी दगाा को कवल लाल कनेर और िुगंसधत पुष्प असत त्रप्रर् हं । इि सलर्े आराधना मं िुगंसधत पुष्प ही ु े लं।  नवराि मं कलश की स्थापना कवल फदन मं करनी र्ाफहए। े  मां भगवती की प्रसतमा हमेशा लाल वस्त्रो िे त्रबराजीत रहे ।  दे वी को भी लाल रं ग की र्ुनरी र्ढाएं। नवराि मं नवाणा मंि जप दे वी मां क िामने लाल आिन पर बैठकर लाल र्ंदन की माला िे करना लाभ े प्रद होता हं । कनकधारा र्ंिआज क र्ुग मं हर व्र्त्रक्त असतशीघ्र िमृद्ध बनना र्ाहता हं । धन प्रासप्त हे तु प्राण-प्रसतत्रष्ठत कनकधारा र्ंि क े ेिामने बैठकर कनकधारा स्तोि का पाठ करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । इि कनकधारा र्ंि फक पूजाअर्ाना करने िे ऋण और दररद्रता िे शीघ्र मुत्रक्त समलती हं । व्र्ापार मं उडनसत होती हं , बेरोजगार को रोजगारप्रासप्त होती हं ।श्री आफद शंकरार्ार्ा द्वारा कनकधारा स्तोि फक रर्ना कछ इि प्रकार फक हं , स्जिक श्रवण एवं पठन करने िे ु ेआि-पाि क वार्ुमिल मं त्रवशेष अलौफकक फदव्र् उजाा उत्पडन होती हं । फठक उिी प्रकार िे कनकधारा र्ंि े ंअत्र्ंत दलाभ र्ंिो मं िे एक र्ंि हं स्जिे मां लक्ष्मी फक प्रासप्त हे तु अर्ूक प्रभावा शाली माना गर्ा हं । ुकनकधारा र्ंि को त्रवद्वानो ने स्वर्ंसिद्ध तथा िभी प्रकार क ऐश्वर्ा प्रदान करने मं िमथा माना हं । जगद्गरु े ुशंकरार्ार्ा ने दररद्र ब्राह्मण क घर कनकधारा स्तोि क पाठ िे स्वणा वषाा कराने का उल्लेख ग्रंथ शंकर े ेफदस्ग्वजर् मं समलता हं । कनकधारा मंि:- ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं-श्रीं क्लीं कनक धारर्ै स्वाहा मूल्र्: Rs.550 िे Rs.8200 तक गुरुत्व कार्ाालर् िंपक : ा 91+ 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 54. 54 मार्ा 2012 श्रीदगााअष्टोिर शतनाम पूजन ु  त्रवजर् ठाकुरिंकल्पः ऋष्र्ाफद डर्ािःॐ तत्ित ् अद्यैतस्र् ब्रह्मणोफि फद्वतीर् प्रहराद्धे श्वेत वराह श्रीनारद-ऋषर्े नमः। सशरसि, गार्िी छडदिे नमः। मुख, ेकल्पे जमबू-द्वीपे भरत खण्िे आर्ाावता दे शे अमुक पुण्र् श्रीदगाा दे वतार्ै नमः। हृफद, दं ु बीजार् नमः। गुह्य, ह्रीं ु ेक्षेिे कसलर्ुगे कसल प्रथम र्रणे अमुक िमवत्िरे अमुक शक्तर्े नमः। पादर्ो, ॐ कीलकार् नमः। नाभौ, श्रीदगाा- ुमािे अमुक पक्षे अमुक सतथौ अमुक वािरे अमुक गोिो प्रीत्र्थं श्रीदगाा अष्टोिर शत नाम पूजने त्रवसनर्ोगार् ुअमुक (शमाा, वमाा अपने र्ा स्जिक सलर्े अनुष्ठान कर े नमः। िवांगे।रहे हो उनक नाम का उच्र्ारण करं ।) अहं श्रीदगाा-प्रीत्र्थे े ुअष्टोिर शत नाम मडिैः र्था शत्रक्त र्जनं कररष्र्े। षिङ्ग डर्ाि:(अमुक क स्थान पर अपना वतामान स्थान-िंवत्ि-माि- े ह्रां ॐ ह्रीं दं ु दगाार्ै। ह्रीं ॐ ह्रीं दं ु दगाार्। ह्रूं ॐ ह्रीं दं ु ु ुपक्ष-सतसथ-वाि- का उर्ारण करं और अमुक गोिो व दगाार्। ह्रं ॐ ह्रीं दं ु दगाार्। ह्रं ॐ ह्रीं दं ु दगाार्। ह्रः ॐ ु ु ुनाम क स्थान पर स्जिक सलर्े जप फकर्ा जा रहा हो े े ह्रीं दं ु दगाार्। ुउि व्र्त्रक्त क गोि व नाम का उर्ारण करना र्ाफहए ेर्फद स्वर्ं जप कर रहे हो तो स्वर्ंका गोि नाम लं) कर डर्ाि: अंगुष्ठाभ्र्ां नमः। तजानीभ्र्ां नमः। मध्र्माभ्र्ां नमः।त्रवसनर्ोगः अनासमकाभ्र्ां हुम। कसनत्रष्ठकाभ्र्ां वौषट। करतल-कर-ॐ अस्र् श्रीदगाा अष्टोिर शतनाम माला मडिस्र् श्रीनारद ु पृष्ठाभ्र्ां फट्।ऋत्रषः, गार्िी छडदः, श्रीदगाा दे वता, दं ु बीजं, ह्रीं शत्रक्तः, ुॐ कीलक, श्रीदगाा प्रीत्र्थं श्रीदगाा अष्टोिर शत नाम ं ु ु अंग डर्ाि:पूजने त्रवसनर्ोगः। हृदर्ार् नमः। सशरिे स्वाहा। सशखार्ै वषट्। कवर्ार् हुम ्। नेि-िर्ार् वौषट। अस्त्रोार् फट्।नोट: ध्र्ानःश्रीदगाा अष्टोिर नामावली क मडिं िे पूजन करते ु े सिंहस्था शसश-शेखरा मरकत-प्रख्र्ा र्तुसभाभजैः। ुािमर् उक्त मडि का उच्र्ारण कर त्रवसनर्ोग करना शंख र्क्र-धनुः-शरांि दधती नेिैस्स्त्रोसभः शोसभता॥र्ाफहर्े। र्फद सिफ नाम अथाात मडिं क द्वारा जप ा े आमुक्तांगद-हार-ककण-रणत ्-काञ्र्ी-क्वणन ्-नूपुरा। ंकरना हो, तो पूजने त्रवसनर्ोग। क स्थान पर जपे े दगाा दगसत-हाररणी भवतु वो रत्नोल्लित ्-कण्िला॥ ु ु ा ुत्रवसनर्ोगः। का उर्ारण करं और र्फद पूजन क िाथ ेत्रवसधवत तपाण करना हो, तो पूजने तपाणे र्त्रवसनर्ोगः। का उर्ारण करं । नाम मडिं का होम उक्त प्रकार ‘ध्र्ान’ करने क बाद माँ दगाा का मानसिक े ुकरना हो, तो होमे त्रवसनर्ोगः। का उर्ारण करं । पूजन करं ।ऋष्र्ाफद डर्ाि मं भी उपरोक्त त्रवसध िे र्ोजन करं ।
  • 55. 55 मार्ा 2012मानि पूजनः ॐ ह्रीं दं ु श्रीित्र्ानडद-स्वरुत्रपण्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्मकम ् गडधम ् श्रीजगदमबा दगाा प्रीतर्े ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीअनडतार्ै पूजर्ासम नमः।िमपार्ासम नमः॥ ॐ हं आकाश तत्त्वात्मकम ् पुष्पं ॐ ह्रीं दं ु श्रीभात्रवडर्ै पूजर्ासम नमः।श्रीजगदमबा दगाा प्रीतर्े िमपार्ासम नमः॥ ॐ र्ं वार्ु ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीभाव्र्ार्ै पूजर्ासम नमः।तत्त्वात्मक धूपं श्रीजगदमबा दगाा प्रीतर्े घपाार्ासम नमः॥ ॐ ं ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीअभव्र्ार्ै पूजर्ासम नमः।रं अस्ग्न-तत्त्वात्मक दीपं श्रीजगदमबा-दगाा-प्रीतर्े दशार्ासम ं ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीिदा-गत्र्ै पूजर्ासम नमः।नमः॥ ॐ वं जल तत्त्वात्मक नैवेद्य श्रीजगदमबा दगाा प्रीतर्े ं ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीशामभव्र्ै पूजर्ासम नमः।सनवेदर्ासम नमः॥ ॐ शं िवा तत्त्वात्मकं तामबूलम ् ॐ ह्रीं दं ु श्रीदे व-मातार्ै पूजर्ासम नमः।श्रीजगदमबा दगाा प्रीतर्े िमपार्ासम नमः॥ ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीसर्डतार्ै पूजर्ासम नमः।उक्त मडि क उर्ारण क बाद मं दगाा अष्टोिर शत े े ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीरत्न-प्रर्ार्ै पूजर्ासम नमः।नामावली का पाठ करं । ॐ ह्रीं दं ु श्रीिवा-त्रवद्यार्ै पूजर्ासम नमः।त्रिबीज र्ुक्त र्तुथ्र्ाडत अष्टोिर शत नामावली ॐ ह्रीं दं ु श्रीदक्ष-कडर्ार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीित्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीदक्ष-र्ज्ञ-त्रवनासशडर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीिाध्व्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीअपणाार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीभव-प्रीतार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीअनेक-वणाार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीभवाडर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीपाटलार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीभव-मोसर्डर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीपाटलावत्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीआर्ाार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीपटामबर-परीधानार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीदगाार्ै पूजर्ासम नमः। ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीकल-मञ्जीर-रस्ञ्जडर्ै नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीजर्ार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीअमेर्-त्रवक्रमार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीआद्यार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीक्ररार्ै पूजर्ासम नमः। ूॐ ह्रीं दं ु श्रीत्रि-नेिार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीिुडदर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीशूल-धाररण्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीिुर-िुडदर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीत्रपनाक-धाररण्र्े पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीवन-दगाार्ै पूजर्ासम नमः। ुॐ ह्रीं दं ु श्रीसर्िार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीमातंगर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीर्ण्ि-घण्टार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीमतंग-मुसन-पूस्जतार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीमहा-तपार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीब्राह्मर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीमनो-रुपार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीमाहे श्वर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीबुद्धर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीऐडद्रर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीअहं कारार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीकौमार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीसर्ि-रुपार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीवैष्णव्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीसर्तार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीर्ामुण्िार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीसर्त्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीवाराह्यै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीिवा-मडि-मय्मर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीलक्ष्मर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीसनत्र्ार्ै पूजर्ासम नमः।
  • 56. 56 मार्ा 2012ॐ ह्रीं दं ु श्रीपुरुषाकृ त्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीर्त्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीत्रवमलार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीअप्रौढार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीउत्कत्रषाण्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीप्रौढार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीज्ञानार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीवृद्ध-मातार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीफक्रर्ार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीबल-प्रदार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीित्र्ार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीमहा-दे व्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीबुत्रद्धदार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीमुक्त-कश्र्ै पूजर्ासम नमः। ेॐ ह्रीं दं ु श्रीबहुलार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीघोर-रुपार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीबहुल-त्रप्रर्ार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीमहा-बलार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीिवा-वाहनार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीअस्ग्न-ज्वालार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीसनशुमभ-शुमभ-हनडर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीरौद्र-मुख्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीमफहषािुर-मफदा डर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीकाल-रात्र्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीमधु-कटभ-हडत्र्र्ै पूजर्ासम नमः। ै ॐ ह्रीं दं ु श्रीतपस्स्वडर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीर्ण्ि-मुण्ि-त्रवनासशडर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीनारार्ण्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीिवाािुर-त्रवनाशार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीभद्रकाल्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीिवा-दानव-घासतडर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीत्रवष्णु-मार्ार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीिवा-शास्त्रो-मय्मर्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीजलोदर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीत्रवद्यार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीसशव-दत्र्ै पूजर्ासम नमः। ूॐ ह्रीं दं ु श्रीिवाास्त्रो-धाररण्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीकराल्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीअनेक-शस्त्रो-हस्तार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीअनडतार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीअनेकास्त्रो-त्रवधाररण्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीपरमेश्वर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीकमार्ै पूजर्ासम नमः। ु ॐ ह्रीं दं ु श्रीकात्र्ार्डर्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीकडर्ार्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीिात्रवत्र्र्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीकशोर्ै पूजर्ासम नमः। ै ॐ ह्रीं दं ु श्रीप्रत्र्क्षार्ै पूजर्ासम नमः।ॐ ह्रीं दं ु श्रीर्ुवत्र्ै पूजर्ासम नमः। ॐ ह्रीं दं ु श्रीब्रह्म-वाफदडर्ै पूजर्ासम नमः। भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी िुख-शास्डत-िमृत्रद्ध की प्रासप्त क सलर्े भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी :- स्जस्िे धन प्रसप्त, त्रववाह र्ोग, े व्र्ापार वृत्रद्ध, वशीकरण, कोटा कर्ेरी क कार्ा, भूतप्रेत बाधा, मारण, िममोहन, तास्डिक े बाधा, शिु भर्, र्ोर भर् जेिी अनेक परे शासनर्ो िे रक्षा होसत है और घर मे िुख िमृत्रद्ध फक प्रासप्त होसत है , भाग्र् लक्ष्मी फदब्बी मे लघु श्री फ़ल, हस्तजोिी (हाथा जोिी), सिर्ार सिडगी, त्रबस्ल्ल नाल, शंख, काली-िफ़द-लाल गुंजा, इडद्र जाल, मार् जाल, पाताल तुमिी े जेिी अनेक दलभ िामग्री होती है । ु ा मूल्र्:- Rs. 910 िे Rs. 8200 तक उप्लब्द्ध . गुरुत्व कार्ाालर् िंपक : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785 ा c
  • 57. 57 मार्ा 2012 परशुराम कृ त श्रीदगाास्तोि ु  आलोक शमाा॥ परशुराम उवार् ॥ सशवे सशवास्वरूपा त्वं लक्ष्मीनाारार्णास्डतक। ेश्रीकृ ष्णस्र् र् गोलोकपररपूणतमस्र् े ा र्ः। िरस्वती र् िात्रविी वेदिूब्राह्मणः त्रप्रर्ा॥आत्रवभूता ा त्रवग्रहतः, परा िृष्ट्र्ुडमुखस्र् र्॥ राधा रािेश्वरस्र्ैव पररपूणतमस्र् ा र्।िूर्-कोफट-प्रभा-र्ुक्ता, ा वस्त्रोालंकार भूत्रषता। परमानडद-रूपस्र् परमानडदरूत्रपणी॥वफि शुद्धांशकाधाना ु िुस्स्मता, िुमनोहरा॥ त्वत्कलांशांशकलर्ा दे वानामत्रप र्ोत्रषतः॥नव र्ौवन िमपडना सिडदर ू त्रवडद ु शोसभता। त्वं त्रवद्या र्ोत्रषतः िवाास्त्वं िवाबीजरूत्रपणी।लसलतं कबरीभारं मालती माल्र् मस्ण्ितम ्॥ छार्ा िूर्स्र् ा र्डद्रस्र् रोफहणी िवामोफहनी॥अहोसनवार्नीर्ा त्वं, र्ारुमूसता र् त्रबभ्रती। शर्ी शक्रस्र् कामस्र् कासमनी रसतरीश्वरी।मोक्षप्रदा मुमक्षूणां, ु महात्रवष्णोत्रवासधः स्वर्म ्॥ वरुणानी जलेशस्र् वार्ोः स्त्रोी प्राणवल्लभा॥मुमोह क्षणमािेण दृष्ट्वा, त्वां िवामोफहनीम ्। विे ः त्रप्रर्ा फह स्वाहा र् कबेरस्र् ु र् िुडदरी।बालैः िमभूर् िहिा, िस्स्मता धात्रवता पुरा॥ र्मस्र् तु िुशीला र् नैऋतस्र् ा र् कटभी॥ ैित्रद्भः ख्र्ाता तेन, राधा मूलप्रकृ सतरीश्वरी। ईशानस्र् शसशकला शतरूपा मनोः त्रप्रर्ा।कृ ष्णस्त्वां िहिाहूर्, वीर्ााधानं र्कार ह॥ दे वहूसतः कदा मस्र् वसिष्ठस्र्ाप्र्रुडधती॥ततो फिमभं महज्जज्ञे, ततो जातो महात्रवराट्। लोपामुद्राप्र्गस्त्र्स्र् दे वमाताफदसतस्तथा। अहल्र्ार्स्र्ैव लोमकपेष, ू ु ब्रह्माण्िाडर्स्खलासन र्॥ गौतमस्र्ात्रप िवााधारा विुडधरा॥तच्छंृ गारक्रमेणैव त्वस्डनःश्वािो बभूव ह। गंगा र् तुलिी र्ात्रप पृसथव्र्ां र्ाः िररद्वराः।ि सनःश्वािो महावार्ुः ि त्रवराड् त्रवश्वधारकः॥ एताः िवााि र्ा ह्यडर्ाः िवाास्त्वत्कलर्ास्मबक॥ ेतव घमाजलेनैव पुप्लुवे त्रवश्वगोलकम ्। गृहलक्ष्मीगृहे नृणांराजलक्ष्मीि राजिु।ि त्रवराड् त्रवश्वसनलर्ो जलरासशबाभूव ह॥ तपस्स्वनां तपस्र्ा त्वं गार्िी ब्राह्मणस्र् र्॥ततस्त्वं पञ्र्धाभूर् पञ्र्मूतीि त्रबभ्रती। ितां ित्त्वस्वरूपा त्वमितां कलहांकरा। ुप्राणासधष्ठातृमूत्रिार्ाा कृ ष्णस्र् परमात्मनः॥ ज्र्ोतीरूपा सनगुणस्र् ा शत्रक्त स्त्वं िगुणस्र् र्॥कृ ष्णप्राणासधकां राधां तां वदस्डत पुरात्रवदः॥ िूर्े प्रभास्वरूपा त्वं दाफहका र् हुताशने।वेदासधष्ठािीमूसतार्ां वेदाशास्त्रोप्रिूरत्रप। जले शैत्र्स्वरूपा र् शोभारूपा सनशाकरे ॥तं िात्रविीं शुद्धरूपां प्रवदस्डत मनीत्रषणः॥ त्वं भूमौ गडधरूपा र् आकाशे शब्दरूत्रपणी।ऐश्वर्ाासधष्ठािीमूसताः शास्डति शाडतरूत्रपणी। क्षुस्त्पपािादर्स्त्वं र् जीत्रवनां िवाशक्तर्ः॥लक्ष्मीं वदस्डत िंतस्तां शुद्धां ित्त्वस्वरुत्रपणीम ् ॥ िवाबीजस्वरूपा त्वं िंिारे िाररूत्रपणी।रागासधष्ठािी र्ा दे वी, शुक्लमूसताः ितां प्रिूः। स्मृसतमेधा र् बुत्रद्धवाा ज्ञानशत्रक्त त्रवापस्िताम ्॥िरस्वतीं तां शास्त्रोज्ञां प्रवदस्डत बुधा भुत्रव॥ कृ ष्णेन त्रवद्या र्ा दिा िवाज्ञानप्रिूः शुभा।बुत्रद्धत्रवाद्या िवाशत्रक्तज्र्ाा मूसतारसधदे वता। शूसलने कृ पर्ा िा त्वं र्तो मृत्र्ुञ्जर्ः सशवः॥िवामंगलमंगल्र्ा िवामगलरूत्रपणी॥ ं िृत्रष्टपालनिंहारशक्त र्स्स्त्रोत्रवधाि र्ाः।िवामंगलबीजस्र् सशवस्र् सनलर्ेधुना॥ ब्रह्मत्रवष्णुमहे शानां िा त्वमेव नमोस्तु ते॥
  • 58. 58 मार्ा 2012मधुकटभभीत्र्ा ै र् िस्तो धाता प्रकस्मपतः। इत्र्ुक्त्वा पावाती तुष्टा दत्त्वा रामं शुभासशषम ्।स्तुत्वा मुमोर् र्ां दे वीं तां मूध्नाा प्रणमामर्हम ्॥ जगामाडतःपुरं तूणं हररशब्दो बभूव ह॥मधुकटभर्ोर्ुद्धे ै ा िातािौ त्रवष्णुरीश्वरीम ्। ॥फल-श्रुसत॥बभूव शत्रक्तमान ् स्तुत्वा तां दगां ु प्रणमामर्हम ्॥ स्तोिम ् वै काण्वशाखोक्तम ् पूजाकाले र् र्ः पठे त ्।त्रिपुरस्र् महार्ुद्धे िरथे पसतते सशवे। र्ािाकाले र् प्रातवाा वास्ञ्छताथं लभेद्ध्रुवम॥र्ां तुष्टुवुः िुराः िवे तां दगां ु प्रणमामर्हम ्॥ पुिाथी लभते पुिं कडर्ाथी कडर्कां लभेत ्।त्रवष्णुना वृषरूपेण स्वर्ं शमभुः िमुस्त्थतः। त्रवद्याथी लभते त्रवद्यां प्रजाथी र्ाप्नुर्ात ् प्रजाम ्॥जघान त्रिपुरं स्तुत्वा तां दगां ु प्रणमामर्हम ्॥ भ्रष्टराज्र्ो लभेद् राज्र्ं नष्टत्रविो धनं लभेत ्॥र्दाज्ञर्ा वासत वातः िूर्स्तपसत ा िंततम ्। र्स्र् रुष्टो गुरुदे वो राजा वा बाडधवोथवा।वषातीडद्रो दहत्र्स्ग्नस्तां दगां ु प्रणमामर्हम ्॥ तस्र् तुष्टि वरदः स्तोिराजप्रिादतः॥र्दाज्ञर्ा फह कालि शश्वद् भ्रमसत वेगतः। दस्र्ुग्रस्तोफहग्रस्ति शिुग्रस्तो भर्ानकः।मृत्र्ुिरसत जडत्वोघे तां दगां ु प्रणमामर्हम ्॥ व्र्ासधग्रस्तो भवेडमुक्तः स्तोिस्मरणमाितः॥स्त्रोष्टा िृजसत िृत्रष्टं र् पाता पासत र्दाज्ञर्ा। राजद्वारे श्मशाने र् कारागारे र् बडधने।िंहताा िंहरे त ् काले तां दगां ु प्रणमामर्हम ्॥ जलराशौ सनमगडि मुक्त स्तत्स्मृसतमाितः॥ज्र्ोसतःस्वरूपो भगवाञ्रीकृ ष्णो सनगुणः ा स्वर्म ्। स्वासमभेदे पुिभेदे समिभेदे र् दारुणे।र्र्ा त्रवना न शक्ति िृत्रष्टं किुं नमासम ताम ्॥ स्तोिस्मरणमािेण वास्ञ्छताथं लभेद् ध्रुवम॥रक्ष रक्ष जगडमातरपराधं क्षमस्व मे। कृ त्वा हत्रवष्र्ं वषं र् स्तोिराजं श्रृणोसत र्ा।सशशूनामपराधेन कतो ु माता फह कप्र्सत॥ ु भक्तर्ा दगां ु र् िमपूज्र् महावडध्र्ा प्रिूर्ते॥इत्र्ुिवा पशुरामि ा प्रणमर् तां रुरोद ह। लभते िा फदव्र्पुिं ज्ञासननं सर्रजीत्रवनम ्।तुष्टा दगाा ु िमभ्रमेण र्ाभर्ं र् वरं ददौ॥ अिौभाग्र्ा र् िौभाग्र्ं षण्मािश्रवणाल्लभेत ् ॥अमरो भव हे पुि वत्ि िुस्स्थरतां व्रज। नवमािं काकवडध्र्ा मृतवत्िा र् भत्रक्ततः।शवाप्रिादात ् िवाि ज्र्ोस्तु तव िंततम ्॥ स्तोिराजं र्ा श्रृणोसत िा पुिं लभते ध्रुवम ्॥िवााडतरात्मा भगवांस्तुष्टोस्तु िंततं हररः। कडर्ामाता पुिहीना पञ्र्मािं श्रृणोसत र्ा।भत्रक्तभावतु ते कृ ष्णे सशवदे र् सशवे गुरौ॥ घटे िमपूज्र् दगां ु र् िा पुिं लभते ध्रुवम ्॥इष्टदे वे गुरौ र्स्र् भत्रक्तभावसत शाश्वती। . भावाथाःतं हडतु न फह शक्ताि रुष्टाि िवादेवताः॥ परशुराम ने कहाः पोरास्णक काल की बात हं ; गौ-लोक मंश्रीकृ ष्णस्र् र् भक्तस्त्वं सशष्र्ो फह शंकरस्र् र्। जब िभी तरह िे श्रीकृ ष्ण िृत्रष्टरर्ना क सलए तैर्ार हुए, ेगुरुपत्नीं स्तौत्रष र्स्मात ् कस्त्वां हडतुसमहे श्वरः॥ उि िमर् उनक शरीर िे आपका प्राकटर् हुआ था। ेअहो न कृ ष्णभक्तानामशुभं त्रवद्यते क्वसर्त ्। आपकी कास्डत करोिं िूर्ो क िमान थी। आप वस्त्रो और ेअडर्दे वेषु र्े भक्ता न भक्ता वा सनरे डकशाः ु ॥ अलंकारं िे त्रवभूत्रषत थीं। आपक शरीर पर अस्ग्न मं ेर्डद्रमा बलवांस्तुष्टो र्ेषां भाग्र्वतां भृगो। तपाकर शुद्ध की हुई िािी का पररधान था। नव तरुणतेषां तारागणा रुष्टाः फकं कवास्डत ु र् दबलाः ु ा ॥ अवस्था थी। ललाट पर सिंदर का फटका शोसभत हो रहा ूर्स्र् तुष्टः िभार्ां र्ेडनरदे वो महान ् िुखी। था। मालती क फलो की मालाओं िे मस्ण्ित गुँथी हुई े ूतस्र् फकं वा कररष्र्स्डत रुष्टा भृत्र्ाि दबलाः॥ ु ा िुडदर कश थे। बिा ही मनोहर रूप था। मुख पर मडद े
  • 59. 59 मार्ा 2012मुस्कान थी। अहो ! आपकी मूसता बिी िुडदर थी, उिका दे वाडगनाएँ भी आपक कलांश की अंशकला िे प्रादभूत े ु ावणान करना कफठन हं । आप मुमुक्षुओं को मोक्ष प्रदान हुई हं । िारी नाररर्ाँ आपकी त्रवद्यास्वरूपा हं और आपकरने वाली तथा स्वर्ं महात्रवष्णु की त्रवसध हो। िबकी कारणरूपा हो। अस्मबक ! िूर्ा की पत्नी छार्ा, ेबाले ! आप िबको मोफहत कर लेने वाली हो। आपको र्डद्रमा की भार्ाा िवामोफहनी रोफहणी, इडद्र की पत्नीदे खकर श्रीकृ ष्ण उिी क्षण मोफहत हो गर्े। तब आप शर्ी, कामदे व की पत्नी ऐश्वर्ाशासलनी रसत, वरुण कीउनिे िमभात्रवत होकर िहिा मुस्कराती हुई भाग र्लीं। पत्नी वरुणानी, वार्ु की प्राणत्रप्रर्ा स्त्रोी, अस्ग्न की त्रप्रर्ाइिी कारण ित्पुरुष आपको मूलप्रकृ सत ईश्वरी राधा कहते स्वाहा, कबेर की िुडदरी भार्ाा, र्म की पत्नी िुशीला, ुहं । उि िमर् िहिा श्रीकृ ष्ण ने आपको बुलाकर वीर्ा का नैऋत की जार्ा कटभी, ईशान की पत्नी शसशकला, मनु ा ैआधान फकर्ा। उििे एक महान ् फिमब उत्पडन हुआ। उि की त्रप्रर्ा शतरूपा, कदा म की भार्ाा दे वहूसत, वसिष्ठ कीफिमब िे महात्रवराट् की उत्पत्रि हुई, स्जिक रोमकपं मं े ू पत्नी अरुडधती, दे वमाता अफदसत, अगस्त्र् मुसन कीिमस्त ब्रह्माण्ि स्स्थत हं । फफर राधा क श्रृगार क्रम िे े ं त्रप्रर्ा लोपामुद्रा, गौतम की पत्नी अफहल्र्ा, िबकीआपका सनःश्वाि प्रकट हुआ। वह सनःश्वाि महावार्ु हुआ आधाररूपा विुडधरा, गंगा, तुलिी तथा भूतल की िारीऔर वही त्रवश्व को धारण करने वाला त्रवराट् कहलार्ा। श्रेष्ठ िररताएँ-र्े िभी तथा इनक असतररत्रक्त जो अडर् ेआपक पिीने िे त्रवश्वगोलक त्रपघल गर्ा। तब त्रवश्व का े स्स्त्रोर्ाँ हं , वे िभी आपकी कला िे उत्पडन हुई हं । आपसनवािस्थान वह त्रवराट् जल की रासश हो गर्ा। तब मनुष्र्ं क घर मं गृहलक्ष्मी, राजाओं क भवनं मं े ेआपने अपने को पाँर् भागं मं त्रवभक्त करक पाँर् मूसता े राजलक्ष्मी, तपस्स्वर्ं की तपस्र्ा और ब्राह्मणं की गार्िीधारण कर ली। उनमं परमात्मा श्रीकृ ष्ण की जो हो। आप ित्पुरुषं क सलए े ित्त्वस्वरूप और दष्टं क ु ेप्राणासधष्ठािी मूसता हं , उिे भत्रवष्र्वेिा लोग सलर्े कलह की अडकर हो। सनगुण की ज्र्ोसत और िगुण ु ाकृ ष्णप्राणासधका राधा कहते हं । जो मूसता वेद-शास्त्रों की की शत्रक्त आप ही हो।जननी तथा वेदासधष्ठािी हं , उि शुद्धरूपा मूसता को आप िूर्ा मं प्रभा, असगन ् मं दाफहका शत्रक्त, जल मंमनीषीगण िात्रविी नाम िे पुकारते हं । जो शास्डत तथा शीतलता और र्डद्रमा मं शोभा हो। भूसम मं गडध औरशाडतरूत्रपणी ऐश्वर्ा की असधष्ठािी मूसता हं , उि आकाश मं शब्द आपका ही रूप हं । आप भूख-प्र्ािित्त्वस्वरूत्रपणी शुद्ध मुसता को िंत लोग लक्ष्मी नाम िे आफद तथा प्रास्णर्ं की िमस्त शत्रक्त हो। िंिार मं िबकीअसभफहत करते हं । अहो ! जो राग की असधष्ठािी दे वी उत्पत्रि की कारण, िाररूपा, स्मृसत, मेधा, बुत्रद्ध अथवातथा ित्पुरुषं को पैदा करने वाली हं , स्जिकी मूसता त्रवद्वानं की ज्ञानशत्रक्त आप ही हो। श्रीकृ ष्ण ने सशवजी कोशुक्ल वणा की हं , उि शास्त्रो की ज्ञाता मूसता को शास्त्रोज्ञ कृ पापूवक िमपूणा ज्ञान की प्रित्रवनी जो शुभ त्रवद्या प्रदान ािरस्वती कहते हं । जो मूसता बुत्रद्ध, त्रवद्या, िमस्त शत्रक्त की की थी, वह आप ही हो; उिी िे सशवजी मृत्र्ुज्जर् हुएअसधदे वता, िमपूणा मंगलं की मंगलस्थान, हं । ब्रह्मा, त्रवष्णु और महे श की िृत्रष्ट, पालन और िंहारिवामंगलरूत्रपणी और िमपूणा मंगलं की कारण हं , वही करने वाली जो त्रित्रवध शत्रक्तर्ाँ हं , उनक रूप मं आप ही ेआप इि िमर् सशव क भवन मं त्रवराजमान हो। े त्रवद्यमान हो; अतः आपको नमस्कार हं ।आप ही सशव क िमीप सशवा अथाात पावाती, नारार्ण क े े जब मधु कटभ क भर् िे िरकर ब्रह्मा काँप उठे थे, उि ै ेसनकट लक्ष्मी और ब्रह्मा की त्रप्रर्ा वेदजननी िात्रविी और िमर् स्जनकी स्तुसत करक वे भर्मुक्त हुए थे; उि दे वी ेिरस्वती हो। जो पूररपूणातम एवं परमानडदस्वरूप हं , उन को मं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मधु-कटभ क र्ुद्ध ै ेरािेश्वर श्रीकृ ष्ण की आप परमानडदरूत्रपणी राधा हो। मं जगत क रक्षक र्े भगवान त्रवष्णु स्जन परमेश्वरी का े
  • 60. 60 मार्ा 2012स्तवन करक शत्रक्तमान हुए थे, उन दगाा को मं नमस्कार े ु भागाव ! भला, स्जन भाग्र्वानं पर बलवान ् र्डद्रमाकरता हूँ। त्रिपुर क महार्ुद्ध मं रथिफहत सशवजी क सगर े े प्रिडन हं तो दबल तारागण रुष्ट होकर उनका क्र्ा त्रबगाि ु ाजाने पर िभी दे वताओं ने स्जनकी स्तुसत की थी; उि िकते हं । िभा मं महान आत्मबल िे िमपडन िुखीदगाा को मं प्रणाम करता हूँ। स्जनका स्तवन करक ु े नरे श स्जिपर िंतुष्ट हं , उिका दबल भृत्र्वगा कत्रपत ु ा ुवृषरूपधारी त्रवष्णु द्वारा उठार्े गर्े स्वर्ं शमभु ने त्रिपुर होकर क्र्ा कर लेगा? र्ं कहकर पावाती हत्रषात होका िंहार फकर्ा था; उन दगाा को मं असभवादन करता हूँ। ु परशुराम को शुभ आशीवााद दे कर अडतःपुर मं र्ली गर्ींस्जनकी आज्ञा िे सनरडतर वार्ु बहती हं , िूर्ा तपते हं , । तब तुरंत हरर नाम का घोष गूँज उठा ।इडद्र वषाा करते हं और अस्ग्न जलाती हं ; उन दगाा को मं ु फलश्रुसत: जो मनुष्र् इि काण्वशाखोक्त स्तोि का पूजा केसिर झुकाता हूँ। स्जनकी आज्ञा िे काल िदा वेगपूवक ा िमर्, र्ािा क अविर पर अथवा प्रातःकाल पाठ करता ेर्क्कर काटता रहता हं और मृत्र्ु जीव-िमुदार् मं हं , वह अवश्र् ही अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेता हं ।त्रवर्रती रहती हं ; उन दगाा को मं नमस्कार करता हूँ। ु इिक पाठ िे पुिाथी को पुि, कडर्ाथी को कडर्ा, ेस्जनक आदे श िे िृत्रष्टकताा िृत्रष्ट की रर्ना करते हं , े त्रवद्याथी को त्रवद्या, प्रजाथी को प्रजा, राज्र्भ्रष्ट को राज्र्पालनकताा रक्षा करते हं और िंहताा िमर् आने पर और धनहीन को धन की प्रासप्त होती हं । स्जिपर गुरु ,िंहार करते हं ; उन दगाा को मं प्रणाम करता हूँ। स्जनक ु े दे वता, राजा अथवा बडधु-बाडधव क्रद्ध हो गर्े हं, उिक ु ेत्रबना स्वर्ं भगवान श्रीकृ ष्ण, जो ज्र्ोसतःस्वरूप एवं सलर्े र्े िभी इि स्तोिराज की कृ पा िे प्रिडन होकरसनगुण हं, िृत्रष्ट-रर्ना करने मं िमथा नहीं होते; उन दे वी ा वरदाता हो जाते हं । स्जिे र्ोर-िाकओं ने घेर सलर्ा हो, ुको मेरा नमस्कार हं । जगज्जननी, रक्षा करो, रक्षा करो; िाँप ने िि सलर्ा हो, जो भर्ानक शिु क र्ंगल मं फि े ु ँमेरे अपराध को क्षमा कर दो । भला, कहीं बच्र्े के गर्ा हो अथवा व्र्ासधग्रस्त हो; वह इि स्तोि क स्मरण ेअपराध करने िे माता कत्रपत होती हं । ु माि िे मुक्त हो जाता हं । राजद्वार पर, श्मशान मं,इतना कहकर परशुराम उडहं प्रणाम करक रोने लगे। तब े कारागार मं और बडधन मं पिा हुआ तथा अगाधदगाा प्रिडन हो गर्ीं और शीघ्र ही उडहं अभर् का वरदान ु जलरासश मं िू बता हुआ मनुष्र् इि स्तोि क प्रभाव िे ेदे ती हुई बोलीं- हे वत्ि ! तुम अमर हो जाओ। बेटा ! मुक्त हो जाता हं । स्वासमभेद, पुिभेद तथा भर्ंकर समिभेदअब शास्डत धारण करो। सशवजी की कृ पा िे िदा िवाि क अविर पर इि स्तोि क स्मरण माि िे सनिर् ही े ेतुमहारी त्रवजर् हो। िवााडतरात्मा भगवान ् श्रीहरर िदा अभीष्टाथा की प्रासप्त होती हं । जो स्त्रोी वषापर्ाडत भत्रक्ततुमपर प्रिडन रहं । श्रीकृ ष्ण मं तथा कल्र्ाणदाता गुरुदे व पूवक दगाा का भलीभाँसत पूजन करक हत्रवष्र्ाडन खाकर ा ु ेसशव मं तुमहारी िुदृढ भत्रक्त बनी रहे ; क्र्ंफक स्जिकी इि स्तोिराज को िुनती हं , वह महावडध्र्ा हो तो भीइष्टदे व तथा गुरु मं शाश्वती भत्रक्त होती हं , उि पर र्फद प्रिववाली हो जाती हं । उिे ज्ञानी एवं सर्रजीवी फदव्र् पुििभी दे वता कत्रपत हो जार्ँ तो भी उिे मार नहीं िकते। ु प्राप्त होता हं । छः महीने तक इिका श्रवण करने िेतुम तो श्रीकृ ष्ण क भक्त और शंकर क सशष्र् हो तथा े े दभगा िौभाग्र्वती हो जाती हं । जो काकवडध्र्ा और ु ामुझ गुरुपत्नी की स्तुसत कर रहे हो; इिसलए फकिकी मृतवत्िा नारी भत्रक्त पूवक नौ माि तक इि स्तोिराज ाशत्रक्त हं जो तुमहं मार िक। अहो ! जो अडर्ाडर् े को िुनती हं , वह सनिर् ही पुि पाती हं । जो कडर्ा कीदे वताओं क भक्त हं अथवा उनकी भत्रक्त न करक सनरं कश े े ु माता तो हं परं तु पुि िे हीन हं , वह र्फद पाँर् महीनेही हं , परं तु श्रीकृ ष्ण क भक्त हं तो उनका कहीं भी े तक कलश पर दगाा की िमर्क् पूजा करक इि स्तोि ु ेअमंगल नहीं होता। को श्रवण करती हं तो उिे अवश्र् ही पुि की प्रासप्त होती हं ।
  • 61. 61 मार्ा 2012 श्री दगाा कवर्म ् (रुद्रर्ामलोक्त) ु॥श्री भैरव उवार्॥ ॐ ऐं िौः क्लीं िौः पातु गुह्यं गुह्यकश्वरपूस्जता॥१६॥ ेअधुना दे त्रव वक्ष्र्ेऽहम ् कवर्ं मडिगभाकम ्। ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ह् िौः पार्ादरु मम मनोडमनी। ूदगाार्ाः िारिवास्वं कवर्ेश्वरिञ्ज्ञकम ्॥१॥ ु ॐ जूं िः िौः पातु जानू जगदीश्वरपूस्जता॥१७॥परमाथाप्रदं सनत्र्ं महापातकनाशनम ्। ॐ ऐं क्लीं पातु मे जंघे मेरुवासिनी।र्ोसगत्रप्रर्ं र्ोगीगमर्ं दे वानामत्रप दलभम ्॥२॥ ु ा ॐ ह्रीं श्रीं गीं िदा पातु गुल्फौ मम गणेश्वरी॥१८॥त्रवना दानेन मडिस्र् सित्रद्धदे त्रव कलौ भवेत ्। ॐ ह्रीं दँ ु पातु मे पादौ पावाती षोिशाक्षरी।धारणादस्र् दे वेसश सशवस्त्रोैलोक्र्नार्कः॥३॥ पूवे मां पातु ब्रह्माणी विौ माँ वैष्णवी तथा॥१९॥भैरवो भैरवेशासन त्रवष्णुनाारार्णो बली। दस्क्षणे र्स्ण्िका पातु नैऋते नारसिंफहका। ाब्रह्मा पावासत लोकशो त्रवघ्नध्वंशी गजाननः॥४॥ े पस्िमे पातु वाराही वार्व्र्े मापरास्जता॥२०॥िूर्स्तमोपहिडद्रो मडिामृतसनसधस्तथा। ा उिरे पातु कौमारी र्ैशाडर्ां शांभवी तथा।िेनानीि महािेनो स्जष्णुलेखषाभः॥५॥ ऊध्वा दगाा िदा पातु पात्वधस्तास्च्छवा िदा॥२१॥ ुबहुनोक्तन फक दे त्रव दगााकवर्धारणात ्। े ं ु प्रभाते त्रिपुरा पातु सनशीथे सछडनमस्तका।मत्र्ोऽप्र्मरतां र्ासत िाधको मडििाधकः॥६॥ सनशाडते भैरवी पातु िवादा भद्रकासलका॥२२॥॥त्रवसनर्ोग॥ अग्नेरमबा र् मां पातु जलाडमां जगदस्मबका।कवर्स्र्ास्र् दे वसश ऋत्रषः प्रोक्तो महे श्वरः। वार्ोमाा पातु वाग्दे वी वनाद् वनजलोर्ना॥२३॥छडदोऽनुष्टुप ् त्रप्रर्े दगाा दे वताष्टाक्षरा स्मृता॥७॥ ु सिंहात ् सिंहािना पातु िपाात ् िपााडतकािना।र्फक्रबीजं र् बीजं स्र्ाडमार्ाशत्रक्तररतीररता। रोगाडमां राजमातंगी भूताद् भूतेशवल्लभा॥२४॥ॐ मे पातु सशरो दगाा ह्रीं मे पातु ललाटकम ्॥८॥ ु र्क्षेभ्र्ो र्स्क्षणी पातु रक्षोभ्र्ो राक्षिाडतका।ॐ दँ ु नेिेऽष्टाक्षरा पातु र्क्री पातु श्रुती मम। भूतप्रेतत्रपशार्ेभ्र्ः िुमखी पातु मां िदा॥२५॥ ुमं ठं गण्िौ र् मे पातु दे वेसश रक्तकण्िला॥९॥ ु िवाि िवादा पातु ॐ ह्रीं दगाा नवाक्षरा। ुवार्ुनाािां िदा पातु रक्तबीजसनषूफदनी। इतीदं कवर्ं गुह्यं दगाा िवास्वमुिमम ्॥२६॥ ुलवणं पातु मे र्ोष्ठौ र्ामुण्िा र्ण्िघासतनी॥१०॥ ॥फल-श्रुसत॥भेकी बीजं िदा पातु दडताडमे रक्तदस्डतका। मडिगभा महे शासन कवर्ेश्वरिंज्ञकम ्।ॐ ह्रीं श्री पातु मे कण्ठं नीलकण्ठांकवासिनी॥११॥ त्रविदं पुण्र्दं पुण्र्ं वमा सित्रद्धप्रदं कलौ॥२७॥ॐ ऐं क्लीं पातु मे स्कडधौ स्कडदमाता महे श्वरी। वमा सित्रद्धप्रदं गोप्र्ं परापररहस्र्कम ्।ॐ िं क्लीं मे पातु बाहू दे वेशी बगलामुखी॥१२॥ श्रेर्स्करं मनुमर्ं रोगनाशकरं परम ्॥२८॥िं ऐं ह्रीं पातु मे हस्तौ वक्षो दे वता त्रवडध्र्वासिनी। महापातककोफटघ्नं मानदं र् र्शस्करम ्।ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पातु कस्क्षं मम मातंसगनी परा॥१३॥ ु अश्वमेधिहस्त्रोस्र् फलदं परमाथादम ्॥२९॥ॐ ह्रीं श्रीं ऐं पातु मे पाश्वे फहमार्लसनवासिनी। अत्र्डतगोप्र्ं दे वेसश कवर्ं मडिसित्रद्धदम ्।ॐ स्त्रोीं ह्रूँ ऐं पातु पृष्ठं मम दगसतनासशनी॥१४॥ ु ा पठनात ् सित्रद्धदं लोक धारणाडमुत्रक्तदं सशवे॥३०॥ ेॐ क्रीं ह्रूँ पातु मे नासभं दे वी नारार्णी िदा। रवौ भूजे सलखेद् श्रीमान ् कृ त्वा कमााफिक त्रप्रर्े। ंॐ ऐं क्लीं िौः िदा पातु कफटं कात्र्ार्नी मम॥१५॥ श्रीर्क्राग्रेऽष्टगडधेन िाधको मडिसिद्धर्े॥३१॥ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं पातु सशश्नं दे वी श्रीबगलामुखी। सलस्खत्वा धारर्ेद् बाहौ गुफटकां पुण्र्वसधानीम ्।
  • 62. 62 मार्ा 2012फक फक िाधर्ेल्लोक गुफटका वमाणोऽसर्रात ्॥३२॥ ं ं े अदातव्र्समदं वमा मडिगभा रहस्र्कम ्॥३७॥गुफटकां धारर्ेडमूस्ध्ना राजानं वशमानर्ेत ्। अवक्तव्र्ं महापुण्र्ं िवािारस्वतप्रदम ्।धनाथी धारर्ेत्कण्ठे पुिाथी कस्क्षमण्िले॥३३॥ ु अदीस्क्षतार् नो दद्यात ् कर्ैलार् दरात्मने॥३८॥ ु ु तामेव धारर्ेडमूस्ध्ना सलस्खत्वा भूजपिक। ा े अडर्सशष्र्ार् दष्टार् सनडदकार् कलासथानाम ्। ु ुश्वेतिूिेण िंवेष्टर् लाक्षर्ा पररवेष्टर्ेत ्॥३४॥ दीस्क्षतार् कलीनार् गुरुभत्रक्तरतार् र्॥३९॥ ुिुवणेनाथ िंवेष्टर् धारर्ेद् रक्तरञ्जुना। शाडतार् कलिक्तार् शाडतार् कलकासमने । ु ुगुफटका कामदा दे त्रव दे वनामत्रप दलभा॥३५॥ ु ा इदं वमा सशवे दद्यात्कलभागी भवेडनरः॥४॥ ुकवर्स्र्ास्र् गुफटकां धत्वा मुत्रक्तप्रदासर्नीम ्। इदं रहस्र्ं परमं दगााकवर्मुिमम ्। ुकवर्स्र्ास्र् दे वेसश वस्णातुं नैव शक्र्ते॥३६॥ गुह्यं गोप्र्तमं गोप्र्ं गोपनीर्ं स्वर्ोसनवत ्॥४१॥मफहमानं महादे त्रव स्जह्वाकोफटशतैरत्रप। ॥इसत रुद्रर्ामल तडिे, श्रीदे वीरहस्र्े दगााकवर्ं॥ ु श्री माकण्िे र् कृ त लघु दगाा िप्तशती स्तोिम ् ा ुॐ वींवींवीं वेणुहस्ते स्तुसतत्रवधवटु क हां तथा तानमाता, स्वानंदेमंदरुपे अत्रवहतसनरुते भत्रक्तदे मुत्रक्तदे त्वम ्। ेहं िः िोहं त्रवशाले वलर्गसतहिे सित्रद्धदे वाममागे, ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोक कष कष त्रवपुले वीरभद्रे नमस्ते॥१॥ ेॐ ह्रीं-कारं र्ोच्र्रं ती ममहरतु भर्ं र्मामुंिे प्रर्ंिे, खांखांखां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रफकते उग्ररुपे स्वरुपे।हुंहुंहुं-कार-नादे गगन-भुत्रव तथा व्र्ात्रपनी व्र्ोमरुपे, हं हंहं-कारनादे िुरगणनसमते राक्षिानां सनहं त्रि॥२॥ऐं लोक कीतार्ंती मम हरतु भर्ं र्ंिरुपे नमस्ते, घ्रां घ्रां घ्रां घोररुपे घघघघघफटते घघारे घोररावे। ेसनमांिे काकजंघे घसित-नख-नखा-धूम्र-नेिे त्रिनेि, हस्ताब्जे शूलमुंिे कलकलककले श्रीमहे शी नमस्ते॥३॥ े ु ु ुक्रीं क्रीं क्रीं ऐं कमारी कहकहमस्खले कोफकले, मानुरागे मुद्रािंज्ञत्रिरे खां करु करु िततं श्रीमहामारर गुह्ये। ु ु ु ु ुतेजंगे सित्रद्धनाथे मनुपवनर्ले नैव आज्ञा सनधाने, ऐंकारे रात्रिमध्र्े शसर्तपशुजने तंिकांते नमस्ते॥४॥ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कत्रवत्र्े दहनपुरगते रुक्मरुपेण र्क्र, त्रिःशक्त्र्ा र्ुक्तवणााफदककरनसमते दाफदवंपूणवणे। े ाह्रीं-स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वसलते कोसशतैस्तास्तुपिे स्वच्छं दं कष्टनाशे िुरवरवपुषे गुह्यमुंिे नमस्ते॥५॥ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुंिे घघघघघघघे घघाराडर्ांसघ्रघोषे, ह्रीं क्रीं द्रं द्रं र् र्क्र र र र र रसमते िवाबोधप्रधाने।द्रीं तीथे द्रीं तज्र्ेष्ठ जुगजुगजजुगे मलेच्छदे कालमुंिे, िवांगे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदं िे नमस्ते॥६॥ॐ क्रां क्रीं क्र वामसभिे गगनगिगिे गुह्यर्ोडर्ाफहमुिे, वज्रांगे वज्रहस्ते िुरपसतवरदे मिमातंगरुढे । ूं ंिूतेजे शुद्धदे हे लललललसलते छे फदते पाशजाले, किल्र्ाकाररुपे वृषवृषभहरे ऐंफद्र मातनामस्ते॥७॥ ुंॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी मांसि वैतालहस्ते, िुसिद्धषैः िुसित्रद्धढा ढढढढढढः िवाभक्षी प्रर्ंिी। ंजूं िः िं शांसतकमे मृतमृतसनगिे सनःिमे िीिमुद्रे, दे त्रव त्वं िाधकानां भवभर्हरणे भद्रकाली नमस्ते॥८॥ॐ दे त्रव त्वं तुर्हस्ते करधृतपररघे त्वं वराहस्वरुपे, त्वं र्ंद्री त्वं कबेरी त्वमसि र् जननी त्वं पुराणी महं द्री। ा ुऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वगामागे, पाताले शैलभृंगे हररहरभुवने सित्रद्धर्ंिी नमस्ते॥९॥हं सि त्वं शंिदःखं शसमतभवभर्े िवात्रवघ्नांतकार्े, गांगींगूंगंषिं गे गगनगफटतटे सित्रद्धदे सित्रद्धिाध्र्े। ुक्र क्र मुद्रागजांशो गिपवनगते त्र्र्क्षरे वै कराले, ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते॥१०॥ ूं ूं॥इसत माकण्िे र् कृ त लघु िप्तशती दगाा स्तोिम ्॥ ा ु
  • 63. 63 मार्ा 2012 नव दगाा स्तुसत ुअमर पसत मुकट र्ुस्मबत र्रणामबुज िकल भुवन िुख जननी। ु जर्सत मही मफहता िा सशव दत्र्ाख्र्ा प्रथम शत्रक्तः॥६॥ ूजर्सत जगदीश वस्डदता िकलामल सनष्कला दगाा॥१॥ ु मुक्ताट्टहाि भैरव दस्िह रव र्फकत िकल फदक् र्क्रा। ुत्रवकृ त नख दशन भूषण रुसधर विाच्क्षुररत खड्ग कृ त हस्ता। जर्सत भुजगेडद्र बडधन शोसभत कणाा महा रुण्िा॥७॥जर्सत नर मुण्ि मस्ण्ित त्रपसशत िुरािव रता र्ण्िी॥२॥ पटु पटह मुरज मदा ल झल्लरर काराव नसतातावर्वा।प्रज्वसलत सशस्ख गणोज्ज्वल त्रवकट जटा बद्ध र्डद्र मस्ण शोभा। जर्सत मधु वृत रुपा दै डर् हरी भ्रामरी दे वी॥८॥जर्सत फदगमबर भूषा सिद्ध वटे शा महा लक्ष्मीः॥३॥ शाडता प्रशाडत वदना सिंह रथा ध्र्ान र्ोग िस्डनष्ठा।कर कमल जसनत शोभा पद्मािन बद्ध वदना र्। जर्सत र्तुभज दे हा र्डद्र कला र्डद्र मंगला दे वी॥९॥ ुाजर्सत कमण्िलु हस्ता नडदा दे वी नतासता हरा॥४॥ पक्ष पुट र्ञ्र्ु घातैः िञ्र्ूस्णात त्रववुध शिु िंघाता।फदग ् विना त्रवकृ त मुखा फतकारोद्दाम पूररत फदगौघा। े जर्सत सशत शूल हस्ता बहु रुपा रे वती रौद्रा॥१०॥जर्सत त्रवकराल दे हा क्षेम करी रौद्र भावस्था॥५॥ पर्ाटसत शत्रक्त हस्ता त्रपतृ वन सनलर्ेषु र्ोसगनी िफहता।क्षोसभत ब्रह्माण्िोदर स्व मुख स्वर हुं कृ त सननादा। जर्सत हर सित्रद्ध नामनो हरर सित्रद्ध वस्डदता सिद्धै ः॥११॥ नवदगाा रक्षामंि ुॐ शैलपुिी मैर्ा रक्षा करो। ॐ कषमाणिा तुम ही रक्षा करो। ु ॐ कालरात्रि काली रक्षा करो।ॐ जगजनसन दे वी रक्षा करो। ॐ शत्रक्तरूपा मैर्ा रक्षा करो। ॐ िुखदाती मैर्ा रक्षा करो।ॐ नव दगाा नमः। ु ॐ नव दगाा नमः। ु ॐ नव दगाा नमः। ुॐ जगजननी नमः। ॐ जगजननी नमः। ॐ जगजननी नमः।ॐ ब्रह्मर्ाररणी मैर्ा रक्षा करो। ॐ स्कडदमाता माता मैर्ा रक्षा करो। ॐ महागौरी मैर्ा रक्षा करो।ॐ भवताररणी दे वी रक्षा करो। ॐ जगदमबा जनसन रक्षा करो। ॐ भत्रक्तदाती रक्षा करो।ॐ नव दगाा नमः। ु ॐ नव दगाा नमः। ु ॐ नव दगाा नमः। ुॐ जगजननी नमः। ॐ जगजननी नमः। ॐ जगजननी नमः।ॐ र्ंद्रघणटा र्ंिी रक्षा करो। ॐ कात्र्ासर्नी मैर्ा रक्षा करो। ॐ सित्रद्धरात्रि मैर्ा रक्षा करो।ॐ भर्हाररणी मैर्ा रक्षा करो। ॐ पापनासशनी अंबे रक्षा करो। ॐ नव दगाा दे वी रक्षा करो। ुॐ नव दगाा नमः। ु ॐ नव दगाा नमः। ु ॐ नव दगाा नमः। ुॐ जगजननी नमः। ॐ जगजननी नमः। ॐ जगजननी नमः।
  • 64. 64 मार्ा 2012 नवरत्न जफित श्री र्ंि शास्त्रो वर्न क अनुिार शुद्ध िुवणा र्ा े रजत मं सनसमात श्री र्ंि क र्ारं और र्फद े नवरत्न जिवा ने पर र्ह नवरत्न जफित श्री र्ंि कहलाता हं । िभी रत्नो को उिके सनस्ित स्थान पर जि कर लॉकट क रूप े े मं धारण करने िे व्र्त्रक्त को अनंत एश्वर्ा एवं लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । व्र्त्रक्त को एिा आभाि होता हं जैिे मां लक्ष्मी उिके िाथ हं । नवग्रह को श्री र्ंि क िाथ े . लगाने िे ग्रहं की अशुभ दशा का . धारणकरने वाले व्र्त्रक्त पर प्रभाव नहीं होता हं ।गले मं होने क कारण र्ंि पत्रवि रहता हं एवं स्नान करते िमर् इि र्ंि पर स्पशा कर जो ेजल त्रबंद ु शरीर को लगते हं , वह गंगा जल क िमान पत्रवि होता हं । इि सलर्े इिे िबिे ेतेजस्वी एवं फलदासर् कहजाता हं । जैिे अमृत िे उिम कोई औषसध नहीं, उिी प्रकार लक्ष्मीप्रासप्त क सलर्े श्री र्ंि िे उिम कोई र्ंि िंिार मं नहीं हं एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं । इि प्रकार ेक नवरत्न जफित श्री र्ंि गुरूत्व कार्ाालर् द्वारा शुभ मुहूता मं प्राण प्रसतत्रष्ठत करक बनावाए े ेजाते हं ।असधक जानकारी हे तु िंपक करं । ा GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 65. 65 मार्ा 2012 िवा कार्ा सित्रद्ध कवर्स्जि व्र्त्रक्त को लाख प्रर्त्न और पररश्रम करने क बादभी उिे मनोवांसछत िफलतार्े एवं फकर्े गर्े कार्ा ेमं सित्रद्ध (लाभ) प्राप्त नहीं होती, उि व्र्त्रक्त को िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् अवश्र् धारण करना र्ाफहर्े।कवर् क प्रमुख लाभ: िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् क द्वारा िुख िमृत्रद्ध और नव ग्रहं क नकारात्मक प्रभाव को े े ेशांत कर धारण करता व्र्त्रक्त क जीवन िे िवा प्रकार क द:ख-दाररद्र का नाश हो कर िुख-िौभाग्र् एवं े े ुउडनसत प्रासप्त होकर जीवन मे िसभ प्रकार क शुभ कार्ा सिद्ध होते हं । स्जिे धारण करने िे व्र्त्रक्त र्फद ेव्र्विार् करता होतो कारोबार मे वृत्रद्ध होसत हं और र्फद नौकरी करता होतो उिमे उडनसत होती हं ।  िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् क िाथ मं िवाजन वशीकरण कवर् क समले होने की वजह िे धारण करता े े की बात का दिरे व्र्त्रक्तओ पर प्रभाव बना रहता हं । ू  िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् क िाथ मं अष्ट लक्ष्मी कवर् क समले होने की वजह िे व्र्त्रक्त पर मां महा े े िदा लक्ष्मी की कृ पा एवं आशीवााद बना रहता हं । स्जस्िे मां लक्ष्मी क अष्ट रुप (१)-आफद े लक्ष्मी, (२)-धाडर् लक्ष्मी, (३)-धैरीर् लक्ष्मी, (४)-गज लक्ष्मी, (५)-िंतान लक्ष्मी, (६)-त्रवजर् लक्ष्मी, (७)-त्रवद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन िभी रुपो का अशीवााद प्राप्त होता हं ।  िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् क िाथ मं तंि रक्षा कवर् क समले होने की वजह िे तांत्रिक बाधाए दर े े ू होती हं , िाथ ही नकारत्मन शत्रक्तर्ो का कोइ कप्रभाव धारण कताा व्र्त्रक्त पर नहीं होता। इि ु कवर् क प्रभाव िे इषाा-द्वे ष रखने वाले व्र्त्रक्तओ द्वारा होने वाले दष्ट प्रभावो िे रक्षाहोती हं । े ु  िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् क िाथ मं शिु त्रवजर् कवर् क समले होने की वजह िे शिु िे िंबंसधत े े ु िमस्त परे शासनओ िे स्वतः ही छटकारा समल जाता हं । कवर् क प्रभाव िे शिु धारण कताा े व्र्त्रक्त का र्ाहकर कछ नही त्रबगि िकते। ुअडर् कवर् क बारे मे असधक जानकारी क सलर्े कार्ाालर् मं िंपक करे : े े ाफकिी व्र्त्रक्त त्रवशेष को िवा कार्ा सित्रद्ध कवर् दे ने नही दे ना का अंसतम सनणार् हमारे पाि िुरस्क्षत हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
  • 66. 66 मार्ा 2012 जैन धमाक त्रवसशष्ट र्ंिो की िूर्ी ेश्री र्ौबीि तीथंकरका महान प्रभात्रवत र्मत्कारी र्ंि श्री एकाक्षी नाररर्ेर र्ंिश्री र्ोबीि तीथंकर र्ंि िवातो भद्र र्ंिकल्पवृक्ष र्ंि िवा िंपत्रिकर र्ंिसर्ंतामणी पाश्वानाथ र्ंि िवाकार्ा-िवा मनोकामना सित्रद्धअ र्ंि (१३० िवातोभद्र र्ंि)सर्ंतामणी र्ंि (पंिफठर्ा र्ंि) ऋत्रष मंिल र्ंिसर्ंतामणी र्क्र र्ंि जगदवल्लभ कर र्ंिश्री र्क्रश्वरी र्ंि े ऋत्रद्ध सित्रद्ध मनोकामना मान िममान प्रासप्त र्ंिश्री घंटाकणा महावीर र्ंि ऋत्रद्ध सित्रद्ध िमृत्रद्ध दार्क श्री महालक्ष्मी र्ंिश्री घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि त्रवषम त्रवष सनग्रह कर र्ंि(अनुभव सिद्ध िंपूणा श्री घंटाकणा महावीर पतका र्ंि)श्री पद्मावती र्ंि क्षुद्रो पद्रव सननााशन र्ंिश्री पद्मावती बीिा र्ंि बृहच्र्क्र र्ंिश्री पाश्वापद्मावती ह्रंकार र्ंि वंध्र्ा शब्दापह र्ंिपद्मावती व्र्ापार वृत्रद्ध र्ंि मृतवत्िा दोष सनवारण र्ंिश्री धरणेडद्र पद्मावती र्ंि कांक वंध्र्ादोष सनवारण र्ंिश्री पाश्वानाथ ध्र्ान र्ंि बालग्रह पीिा सनवारण र्ंिश्री पाश्वानाथ प्रभुका र्ंि लधुदेव कल र्ंि ुभक्तामर र्ंि (गाथा नंबर १ िे ४४ तक) नवगाथात्मक उविग्गहरं स्तोिका त्रवसशष्ट र्ंिमस्णभद्र र्ंि उविग्गहरं र्ंिश्री र्ंि श्री पंर् मंगल महाश्रृत स्कध र्ंि ंश्री लक्ष्मी प्रासप्त और व्र्ापार वधाक र्ंि ह्रींकार मर् बीज मंिश्री लक्ष्मीकर र्ंि वधामान त्रवद्या पट्ट र्ंिलक्ष्मी प्रासप्त र्ंि त्रवद्या र्ंिमहात्रवजर् र्ंि िौभाग्र्कर र्ंित्रवजर्राज र्ंि िाफकनी, शाफकनी, भर् सनवारक र्ंित्रवजर् पतका र्ंि भूताफद सनग्रह कर र्ंित्रवजर् र्ंि ज्वर सनग्रह कर र्ंिसिद्धर्क्र महार्ंि शाफकनी सनग्रह कर र्ंिदस्क्षण मुखार् शंख र्ंि आपत्रि सनवारण र्ंिदस्क्षण मुखार् र्ंि शिुमुख स्तंभन र्ंिर्ंि क त्रवषर् मं असधक जानकारी हे तु िंपक करं । े ा GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 67. 67 मार्ा 2012 घंटाकणा महावीर िवा सित्रद्ध महार्ंि को स्थापीत करने िे िाधक की िवा मनोकामनाएं पूणा होती हं । िवा प्रकार क रोग भूत-प्रेत आफद उपद्रव िे रक्षण होता हं । े जहरीले और फहं िक प्राणीं िे िंबंसधत भर् दर होते हं । ू अस्ग्न भर्, र्ोरभर् आफद दर होते हं । ू दष्ट व अिुरी शत्रक्तर्ं िे उत्पडन होने वाले भर् ु िे र्ंि क प्रभाव िे दर हो जाते हं । े ू र्ंि क पूजन िे िाधक को धन, िुख, िमृत्रद्ध, े ऎश्वर्ा, िंतत्रि-िंपत्रि आफद की प्रासप्त होती हं । िाधक की िभी प्रकार की िास्त्वक इच्छाओं की पूसता होती हं । र्फद फकिी पररवार र्ा पररवार क िदस्र्ो पर े वशीकरण, मारण, उच्र्ाटन इत्र्ाफद जाद-टोने ू वाले प्रर्ोग फकर्े गर्ं होतो इि र्ंि क प्रभाव िे स्वतः नष्ट े हो जाते हं और भत्रवष्र् मं र्फद कोई प्रर्ोग करता हं तो रक्षण होता हं । कछ जानकारो क श्री घंटाकणा महावीर पतका ु े र्ंि िे जुिे अद्द्भत अनुभव रहे हं । र्फद घर मं श्री ु घंटाकणा महावीर पतका र्ंि स्थात्रपत फकर्ा हं और र्फद कोई इषाा, लोभ, मोह र्ा शिुतावश र्फद अनुसर्त कमाकरक फकिी भी उद्दे श्र् िे िाधक को परे शान करने का प्रर्ाि करता हं तो र्ंि क प्रभाव िे िंपूणा े ेपररवार का रक्षण तो होता ही हं , कभी-कभी शिु क द्वारा फकर्ा गर्ा अनुसर्त कमा शिु पर ही उपर ेउलट वार होते दे खा हं । मूल्र्:- Rs. 1450 िे Rs. 8200 तक उप्लब्द्ध िंपक करं । GURUTVA KARYALAY ा Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
  • 68. 68 मार्ा 2012 अमोद्य महामृत्र्ुंजर् कवर्अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवर् व उल्लेस्खत अडर् िामग्रीर्ं को शास्त्रोोक्त त्रवसध-त्रवधान िे त्रवद्वानब्राह्मणो द्वारा िवा लाख महामृत्र्ुंजर् मंि जप एवं दशांश हवन द्वारा सनसमात कवर् अत्र्ंतप्रभावशाली होता हं । अमोद्य् महामृत्र्ुंजर् कवर् अमोद्य् महामृत्र्ुजर् ं कवर् बनवाने हे तु: अपना नाम, त्रपता-माता का नाम, कवर् गोि, एक नर्ा फोटो भेजे दस्क्षणा माि: 10900 राशी रत्न एवं उपरत्न त्रवशेष र्ंि हमारं र्हां िभी प्रकार क र्ंि िोने-र्ांफद- े तामबे मं आपकी आवश्र्क्ता क अनुशार े फकिी भी भाषा/धमा क र्ंिो को आपकी े आवश्र्क फिजाईन क अनुशार २२ गेज े शुद्ध तामबे मं अखंफित बनाने की त्रवशेष िभी िाईज एवं मूल्र् व क्वासलफट के िुत्रवधाएं उपलब्ध हं । अिली नवरत्न एवं उपरत्न भी उपलब्ध हं ।हमारे र्हां िभी प्रकार क रत्न एवं उपरत्न व्र्ापारी मूल्र् पर उपलब्ध हं । ज्र्ोसतष कार्ा िे जुिे़ ेबधु/बहन व रत्न व्र्विार् िे जुिे लोगो क सलर्े त्रवशेष मूल्र् पर रत्न व अडर् िामग्रीर्ा व अडर् ेिुत्रवधाएं उपलब्ध हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  • 69. 69 मार्ा 2012 मासिक रासश फल  सर्ंतन जोशीमेष: 1 िे 15 मार्ा 2012: खर्ा आवश्र्क्ता िे असधक हो िकता हं खर्ा पर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं । आपके इष्ट समि एवं िाथी क कारण व्र्र् बढ िकते हं । नौकरी/व्र्विार् क महत्व पूणा कार्ो मं े े आपको असतररक्त िावधानी रखनी र्ाफहर्े अडर्था कछ कार्ो मं नुक्शान िंभव है । ु पररवार मं फकिी िदस्र् क स्वभाव क कारण आपक पररवार मं मानसिक अशांसत का े े े माहोल हो िकता है । 16 िे 31 मार्ा 2012: फकर्े गर्े पूंस्ज सनवेश द्वारा आकस्स्मक धन प्रासप्त क र्ोग है । े आपकी कार्ा शैली असधक िफक्रर् हो जाएगी। स्वास्थ्र् िुख मं वृत्रद्ध होगी फफर भी खाने- पीने का त्रवशेष ध्र्ान रखना फहतकारी रहे गा। आपका िामास्जक जीवन उच्र् स्तर का होिकता हं । पररवार मं खुसशर्ो का माहोल रहे गा। आपको शुभ िमार्ार प्राप्त हो िकर्े है ।वृषभ: 1 िे 15 मार्ा 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं बदलाव का त्रवर्ार कर िकते है । आसथाक लाभ िामाडर् रहे गा। उधारफदर्े धन की पुनः प्रासप्त मं हो िकती हं । भूसम-भवन-वाहन िे िंबंसधत कार्ं मं बाधाएंहो िकती हं । र्फद त्रववाफहत हं तो दांपत्र् िुख मं वृत्रद्ध होगी। र्फद अत्रववाफहत हं तोत्रववाह क र्ोग बन रहे हं । धासमाक र्ािा र्ा दरस्थ स्थानो की र्ािा होने क र्ोग हं । े ू े16 िे 31 मार्ा 2012 : धन लेन-दे ने िे बर्ं अडर्था धन र्ुकाने र्ा धन की पुनः प्रासप्त ेमं त्रवलंब हो िकता हं । गुप्त त्रवरोधी-शिुओं क कारण धन हासन हो िकती है । आपका ेव्र्वहार तीव्र एवं आक्रामकता िे र्ुक्त हो िकता हं अतः त्रवशेष कर जीवन िाथी क िाथ ेव्र्वहार कशल रहं । अपने खाने- पीने का ध्र्ान रखे। अपनी असधक खर्ा करने फक प्रवृत्रि ूपर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं ।समथुन: 1 िे 15 मार्ा 2012: आपको हर कदम पर िफलता प्राप्त होने के र्ोग हं । इि िमर् भारी मािा मं पूंस्ज सनवेश करने िे बर्े लेफकन आपका स्वभाव थोिा सर्िसर्िा बन िकता हं । अपने क्रोध पर सनर्ंिण रखे अडर्था आपका स्वभाव आपक त्रप्रर्जनो को त्रवशेष कष्ट दे िकता हं । े आपक उपर झूठे आरोप लग िकते हं । अपने खान-पान का ध्र्ान रखे आपका े स्वास्थ्र् िामाडर् रहे गा। 16 िे 31 मार्ा 2012 : नर्ा व्र्विार् र्ा नौकरी प्राप्त हो िकती हं र्ा आपक कार्ा े क्षेि मं नर्े बदलाव हो िकते हं । आलस्र् क कारण आपक महत्व पूणा कार्ा प्राभात्रवत े े होि अकते हं िावधानी वते। क्र्ोफक थोिे िे प्रर्ाि िे कार्ाक्षेि मं त्रवशेष िफलताएं प्राप्त होने क र्ोग बन रहे हं । शिु आपक उपर हात्रव होने का अिफल प्रर्ाि कर िकते े ेहं । दांपत्र् जीवन तनाव पूणा हो िकता हं ।
  • 70. 70 मार्ा 2012कक: 1 िे 15 मार्ा 2012: आकस्स्मक धन प्रासप्त व पुराने भुगताकी प्रासप्त हो िकती हं । आपकी आसथाक स्स्थती प्रबल ाहोने क र्ोग हं । प्रेम प्रिंग मं िफलता प्राप्त होगी, अनैसतक कमा व अनुसर्त कार्ो िे ेबर्े। भूसम-भवन वाहन िे िंबंसधत कार्ो मं त्रवशेष िफलताए प्राप्त होगी। अपने खाने-पीने का ध्र्ान रखे अडर्था स्वास्थर् िंबंसधत परे शानीर्ां िंभव हं ।16 िे 31 मार्ा 2012 : छोटी-छोटी िमस्र्ाए आने क उपरांत कमाक्षेि मं त्रवशेष पद ेप्रासप्त क र्ोग व धन वृत्रद्ध क र्ोग बन रहे हं । आपक िामास्जक मान-िममान और े े ेपद-प्रसतष्ठा मं वृत्रद्ध होगी। ग्रहं क प्रभाव िे अत्र्ासधक व्र्र् होने क र्ोग बन रहे हं । े ेर्फद आप अत्रववाफहत हं तो त्रववाह क उिम र्ोग बन रहे हं । दांपत्र् िुख मं वृत्रद्ध ेहोगी।सिंह: 1 िे 15 मार्ा 2012: भूसम-भवन िं िंबंसधत कार्ो मं त्रवशेष रुसर् रहे गी। एकासधक स्त्रोोत िे आसथाक लाभ होने क र्ोग बन रहे हं । स्थान पररवतान िे िंबंसधत सनणार्ो को िंभव हो, तो स्थसगत े करना उसर्त रहे गा। नौकरी-व्र्विार् िे िंबंसधत कार्ो मं िफलता क र्ोग हं । शिु एवं े त्रवरोधी पक्ष िे आपको परे शानी िंभव हं । दरस्थ स्थानो की धासमाक र्ािाएं िफल हो ू िकती हं । 16 िे 31 मार्ा 2012 : पुराने भुगतान की पुनः प्रासप्त िे आसथाक पक्ष िुधरे गा। भूसम- भवन िे िंबंसधअ मामलो मं िफलता समल िकती हं । आपकी मानसिक सर्ंताएं बढ़ िकती हं । शिु एवं त्रवरोधी आपको वाद-त्रववाद मं उलझा िकते हं । अतः िोर् त्रवर्ारकर सलर्ा गर्ा उसर्त सनणार् आपक फहत मं रहे गा। अपने क्रोध एवं गुस्िे पर सनर्ंिण रखने का प्रर्ाि करं । ेकडर्ा: 1 िे 15 मार्ा 2012: भूसम-भवन िे िंबंसधअ मामलं मं त्रवलंब िंभव हं ।कार्ाक्षेि मं अत्र्ासधक पररश्रम क उपरांत थोिी िफलता प्राप्त होगी। शिु एवं त्रवरोधी ेपक्ष िे अनावश्र्क वाद-त्रववाद िंभव हं । इष्ट समिं एवं त्रप्रर्जनो िे मतभेद इत्र्ादीिमस्र्ाएं हो िकती हं । अत्रववाफहत हं तो त्रववाह तर् होने क प्रबल र्ोग हं । स्वास्थ्र् ेिंबंसधत छोटी-छोटी िमस्र्ाए िंभव हं ।16 िे 31 मार्ा 2012 : कार्ाक्षेि मं उममीद िे कम लाभक र्ोग बन रहे हं । व्र्था क े ेखर्ो िे आसथाक पक्ष कमजोर हो िकता हं । शिु एवं त्रवरोधी पक्ष क कारण राजकीर् कार्ो िे परे शानी िंभव हं । थोिे ेिमर् क सलर्े पररवार मं अशास्डत का वातावरण हो िकता हं । दांपत्र् जीवन िुखमर् व्र्तीत होगा। वाहन िावधानी िे ेर्लार्े र्ा वाहन िे िावधान रहे आकस्स्मक दघटना हो िकती हं । ु ा
  • 71. 71 मार्ा 2012तुला: 1 िे 15 मार्ा 2012: आसथाक मामलं मं िमर् उतार-र्ढ़ाव वाला हो िकता है । पूंस्ज सनवेश इत्र्ाफद के सलएिमर् प्रसतकल हं इि सलए सनवेश करने िे परहे ज करं । आवश्र्कता िे असधक िंघषा करना पि िकता है । घरमं ू मांगसलक कार्ा िंपडन होने क र्ोग हं । पररवार मं फकिी िदस्र् क स्वभाव क कारण े े े आपक पररवार मं मानसिक अशांसत का माहोल हो िकता है । े 16 िे 31 मार्ा 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं अत्र्ासधक पररश्रम एवं मेहनत क उपरांत े बहुत मुस्श्कल िे धन लाभ प्राप्त कर िकते हं । अपनी असधक खर्ा करने फक प्रवृत्रि पर सनर्ंिण करने का प्रर्ाि करं । इष्ट समिं एवं पररवार क िदस्र्ं का पूणा िहर्ोग प्राप्त े होगा। आपका का स्वास्थ्र् नरम हो िकता है । प्रेम िंबंसधत मामलं मं िफलता प्राप्त होने क अच्छे िंकत हं । े ेवृस्िक: 1 िे 15 मार्ा 2012 : कार्ाक्षेि की िमस्र्ाकं दर करने मं आप पूणा रुप िे ूिमथा हंगे हं । व्र्विार्ीक कार्ो महत्वपूणा कार्ो मं असतररक्त िावधानी बता अडर्थाकछ कार्ो मं नुक्शान हो िकता है । पररवार क फकिी िदस्र्क िाथ मं मतभेद िंभव ु े ेहं । िंतान िंबंसधत सर्ंताओंका सनवारण होगा। त्रवपरीत सलंग क प्रसत आपका आकषाण ेअसधक रहे गा। स्वास्थ्र् िामाडर्तः उिम रहे गा।16 िे 31 मार्ा 2012 : व्र्वािार् िे जुिे हं और िाझेदारी की र्ोजना बना रहे हं तोिमर् प्रसतकल िात्रबत हो िकता हं । ऋण क लेन-दे ने िे बर्ने का प्रर्ाि करं अडर्था ू ेधन की पुनः प्रासप्त-भुगतान मं त्रवलंब हो िकता हं । नर्े लोगो िे समिता होगी। महत्वपूणा एवं घरे लू मामलो मंर्ुनौतीओं का िामना करना पि िकता हं । मौिम क पररवतान क िाथ-िाथ अपने खाने- पीने का त्रवशेष ध्र्ान रखना े ेफहतकारी रहे गा।धनु: 1 िे 15 मार्ा 2012 : व्र्ापार उद्योग िे जुिे़ लोगो को नर्े अविर प्राप्त हंगे। भूसम-भवन-वाहन िे िंबंसधत कार्ो मं लाभ प्राप्त होगा। कोटा -कर्हरी क कार्ो मं त्रवलंब हो िकता हं । अनार्श्र्क े खर्ा करने िे बर्े। इष्ट समिं क िहर्ोग िे नर्े समि बन िकते हं । प्रेम िंबंधं मं मतभेद े होने क र्ोग बन रहे हं । इि सलए धैर्ा और िंर्म िे काम ले जल्दबाजी परे शानी का े कारण बन िकती हं । 16 िे 31 मार्ा 2012 : नौकरी-व्र्विार् िे िंबसधत कार्ं क सलए र्ह िमर् आसथाक ं े लाभदे ने वाला रहे गा। आकस्स्मक धन प्रासप्त क र्ोग बनेगं स्जस्िे आसथाक स्स्थती मं ेिुधार होगा। पररजनो िे आपक ररश्तं मं कछ खटाि आ िकती है । इि सलए असधक िमर् अपने पररवार क िाथ त्रबताने े ु ेका प्रर्ाि करे । पररवार क फकिी िदस्र् का स्वास्थ्र् प्राभात्रवत हो िकता हं । े
  • 72. 72 मार्ा 2012मकर: 1 िे 15 मार्ा 2012 : आपको कार्ा क्षेि मं नर्े अविर प्राप्त अहो िकते हं । आकस्स्मक धन प्रासप्त के र्ोग बन रहे हं । आपक भौसतक िुख-िाधनो मं वृत्रद्ध होगी। पररवार मं मांगसलक कार्ा े िंपडन होने क अच्छे र्ोग हं । व्र्विासर्क र्ािा मं िफलता प्राप्त हो िकती है । खान- े पान का त्रवशेष ध्र्ान रखं अडर्था पूराने रोगो क कारण लंबे िमर् क सलए कष्ट िंभव े े हं । दांपत्र् जीवन िुखमर् रहे गा। 16 िे 31 मार्ा 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं आसथाक लेन-दे न िे िंबंसधत कार्ो मं त्रवशेष िावधानी बरते। भूसम-भवन-वाहन िे िंबंसधअ कार्ो िे लाभ प्रासप्त िंभव हं । शिुओं पर आपका प्रभाव रहे गा। आपक त्रवरोधी एवं शिु पक्ष परास्त हंगे। आपकी िामस्जक े प्रसतष्ठाभी इि अवसध मं बढे गी। अपने पररजनो का पूणा प्रेम व िहर्ोग आपको प्राप्तहोगा। अत्रववाफहत हं तो त्रववाह क र्ोग बन रहे हं । ेकभ: 1 िे 15 मार्ा 2012 : नौकरी-व्र्विार् िे िंबंसधत कार्ो मं िफलता के र्ोग ुंहं । धनलाभ क उिम र्ोग बन रहे हं िाथ ही अनावश्र्क खर्ा भी बढ़ िकता हं । ेमहत्व क कार्ो मं इष्ट समिं एवं िंबंधीर्ं िे िहर्ोग समलेगा। दांपत्र् जीवन मं थोिा ेतनाव िंभव हं । शिु आपक उपर हात्रव होने का अिफल प्रर्ाि कर िकते हं । दांपत्र् ेजीवन िुख मं वृत्रद्ध क अच्छे िंकत हं । े े16 िे 31 मार्ा 2012 : नौकरी-व्र्विार् मं उडनसत क र्ोग बन रहे हं । भूसम-भवन िे ेिंबंसधअ मामलो मं त्रवलंब हो िकता हं । दरस्थानो की व्र्विार्ीक र्ािाए स्थसगत ूकरनी पि िकती हं । दरस्थ स्थानो की धासमाक र्ािाएं िफल हो िकती हं । पररवार क ू ेफकिी िदस्र् का स्वास्थ्र् सर्ंताकारक हो िकता हं । जीवन िाथी िे िहर्ोग प्राप्त होगा। शुभ िमार्ार फक प्रासप्त होिकती हं ।मीन: 1 िे 15 मार्ा 2012 : नौकरी, व्र्ापार, पूंजी सनवेश इत्र्ाफद िे आकस्स्मक रुप िे धन प्रासप्त हो िकती हं ।आपकी कार्ा शैली असधक िफक्रर् हो जाएगी। अपनी लगन एवं मेहनत िे धन िंबंधी पूरानी िमस्र्ाओं का िमाधान िंभव हं । मनोनुकल जीवन िाथी फक प्रासप्त हे तु िमर् ू उिम िात्रबत हो िकता हं । पररवार क फकिी िदस्र् का स्वास्थ्र् कमजोर हो िकता े हं । 16 िे 31 मार्ा 2012 : आपक रुक हुए महत्वपूणा कार्ा पूरे हो िकते हं । प्रसतर्ोसगता े े क कार्ो मं बुत्रद्धमानी व र्तुरता िे शीघ्र लाभ और िफलता प्राप्त करं गे। शिुओं पर े आपका प्रभाव रहे गा। आपक त्रवरोधी एवं शिु पक्ष परास्त हंगे। अत्रववाह है तो त्रववाह े होने क र्ोग बन रहे हं । व्र्र् पर सनर्डिण रखने िे लाभ प्राप्त होगा। धासमाक र्ािा र्ा ेदरस्थ स्थानो की र्ािा होने क र्ोग हं । ु े
  • 73. 73 मार्ा 2012 मार्ा 2012 मासिक पंर्ांग र्ंद्रफद वार माह पक्ष सतसथ िमासप्त नक्षि िमासप्त र्ोग िमासप्त करण िमासप्त िमासप्त रासश1 गुरु फाल्गुन शुक्ल अष्टमी 19:55:29 रोफहस्ण 19:50:48 त्रवषकभ ुं 24:38:36 त्रवत्रष्ट 06:51:44 वृष -2 शुक्र फाल्गुन शुक्ल नवमी 21:34:45 मृगसशरा 21:59:08 प्रीसत 24:44:08 बालव 08:50:41 वृष 09:00:003 शसन फाल्गुन शुक्ल दशमी 22:28:04 आद्रा 23:25:16 आर्ुष्मान 24:14:01 तैसतल 10:07:27 समथुन -4 रत्रव फाल्गुन शुक्ल एकादशी 22:30:45 पुनवािु 24:02:38 िौभाग्र् 23:05:27 वस्णज 10:36:23 समथुन 17:58:005 िोम फाल्गुन शुक्ल द्वादशी 21:41:52 पुष्र् 23:49:22 शोभन 21:16:34 बव 10:11:52 कका -6 मंगल फाल्गुन शुक्ल िर्ोदशी 20:07:02 अश्लेषा 22:51:06 असतगंि 18:51:06 कौलव 09:00:29 कका 22:51:007 बुध फाल्गुन शुक्ल र्तुदाशी 17:52:49 मघा 21:16:16 िुकमाा 15:53:46 गर 07:04:04 सिंह -8 गुरु फाल्गुन शुक्ल पूस्णामा 15:10:28 पूवााफाल्गुनी 19:13:17 धृसत 12:32:02 बव 15:10:28 सिंह 24:39:009 शुक्र र्ैि कृ ष्ण एकम 12:06:33 उिराफाल्गुनी 16:52:29 शूल 08:54:22 कौलव 12:06:33 कडर्ा -10 फद्वतीर्ा- शसन र्ैि कृ ष्ण 08:56:04 हस्त 14:26:04 वृत्रद्ध 25:18:34 गर 08:56:04 कडर्ा 25:13:00 तृतीर्ा11 रत्रव र्ैि कृ ष्ण र्तुथी 26:44:38 सर्िा 12:02:27 ध्रुव 21:38:04 बव 16:12:45 तुला -12 िोम र्ैि कृ ष्ण पंर्मी 24:00:23 स्वाती 09:51:56 व्र्ाघात 18:08:49 कौलव 13:19:08 तुला 26:25:0013 मंगल र्ैि कृ ष्ण षष्ठी 21:38:37 त्रवशाखा 07:58:18 हषाण 14:57:22 गर 10:46:07 वृस्िक -14 बुध र्ैि कृ ष्ण िप्तमी 19:43:07 जेष्ठा 29:28:07 वज्र 12:07:29 त्रवत्रष्ट 08:37:29 वृस्िक 29:28:0015 गुरु र्ैि कृ ष्ण अष्टमी 18:14:47 मूल 28:54:09 सित्रद्ध 09:38:13 बालव 06:55:06 धनु -16 शुक्र र्ैि कृ ष्ण नवमी 17:14:34 पूवााषाढ़ 28:47:23 व्र्सतपात 07:32:23 गर 17:14:34 धनु -
  • 74. 74 मार्ा 201217 शसन र्ैि कृ ष्ण दशमी 16:41:33 उिराषाढ़ 29:05:55 पररग्रह 28:23:44 त्रवत्रष्ट 16:41:33 धनु 10:49:0018 रत्रव र्ैि कृ ष्ण एकादशी 16:34:46 श्रवण 29:48:50 सशव 27:19:46 बालव 16:34:46 मकर -19 िोम र्ैि कृ ष्ण द्वादशी 16:51:26 धसनष्ठा 30:55:11 सित्रद्ध 26:34:33 तैसतल 16:51:26 मकर 18:19:0020 मंगल र्ैि कृ ष्ण िर्ोदशी 17:32:28 धसनष्ठा 06:54:58 िाध्र् 26:07:09 वस्णज 17:32:28 कभ ुं -21 बुध र्ैि कृ ष्ण र्तुदाशी 18:37:52 शतसभषा 08:25:40 शुभ 25:59:25 शकसन ु 18:37:52 कभ ुं 27:47:0022 अमाव गुरु र्ैि कृ ष्ण 20:06:42 पूवााभाद्रपद 10:17:57 शुक्ल 26:10:27 र्तुष्पाद 07:19:50 मीन - स्र्ा23 शुक्र र्ैि शुक्ल एकम 22:00:51 उिराभाद्रपद 12:33:40 ब्रह्म 26:38:21 फकस्तुघ्न 09:00:51 मीन -24 शसन र्ैि शुक्ल फद्वतीर्ा 24:15:38 रे वसत 15:12:49 इडद्र 27:23:08 बालव 11:05:19 मीन 15:12:0025 रत्रव र्ैि शुक्ल तृतीर्ा 26:47:17 अस्श्वनी 18:08:51 वैधसत ृ 28:19:09 तैसतल 13:29:28 मेष -26 िोम र्ैि शुक्ल र्तुथी 29:28:18 भरणी 21:16:07 त्रवषकभ ुं 29:22:41 वस्णज 16:07:41 मेष 28:04:0027 मंगल र्ैि शुक्ल पंर्मी 32:08:24 कृ सतका 24:26:13 प्रीसत 30:25:16 बव 18:49:39 वृष -28 बुध र्ैि शुक्ल षष्ठी 08:08:11 रोफहस्ण 27:25:03 प्रीसत 06:25:03 बालव 08:08:11 वृष -29 गुरु र्ैि शुक्ल षष्ठी 10:33:16 मृगसशरा 29:59:31 आर्ुष्मान 07:17:20 तैसतल 10:33:16 वृष 16:47:0030 शुक्र र्ैि शुक्ल िप्तमी 12:27:26 आद्रा 32:00:14 िौभाग्र् 07:48:03 वस्णज 12:27:26 समथुन -31 शसन र्ैि शुक्ल अष्टमी 13:42:13 आद्रा 08:00:01 शोभन 07:50:39 बव 13:42:13 समथुन -क्र्ा आप फकिी िमस्र्ा िे ग्रस्त हं ? आपके पाि अपनी िमस्र्ाओं िे छटकारा पाने हे तु पूजा-अर्ाना, िाधना, ुमंि जाप इत्र्ाफद करने का िमर् नहीं हं? अब आप अपनी िमस्र्ाओं िे बीना फकिी त्रवशेष पूजा-अर्ाना, त्रवसध-त्रवधानक आपको अपने कार्ा मं िफलता प्राप्त कर िक एवं आपको अपने जीवन क िमस्त िुखो को प्राप्त करने का मागा े े ेप्राप्त हो िक इि सलर्े गुरुत्व कार्ाालत द्वारा हमारा उद्दे श्र् शास्त्रोोक्त त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण- ेप्रसतत्रष्ठत पूणा र्ैतडर् र्ुक्त त्रवसभडन प्रकार क र्डि- कवर् एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोर्ाने का हं । े े
  • 75. 75 मार्ा 2012 मार्ा-2012 मासिक व्रत-पवा-त्र्ौहारफद वार माह पक्ष सतसथ िमासप्त प्रमुख व्रत-त्र्ोहार1 गुरु फाल्गुन शुक्ल अष्टमी 19:55:29 श्रीदगााष्टमी व्रत, श्रीअडनपूणााष्टमी व्रत, तैलाष्टमी, ु2 शुक्र फाल्गुन शुक्ल नवमी 21:34:45 आनडद नवमी, ब्रजमं होली शुरू, लट्ठमार होली (बरिाना, मथुरा),3 शसन फाल्गुन शुक्ल दशमी 22:28:04 फागु दशमी, लट्ठमार होली, लट्ठमार होली, 3 फदन खाटू श्र्ाम मेला(राज)4 रत्रव फाल्गुन शुक्ल एकादशी 22:30:45 आमलकी (आंवला) एकादशीव्रत, रं गभरी एकादशी, लट्ठमार होली (मथुरा) श्रीजगडनाथ दशान, गोत्रवडद द्वादशी, नृसिंह द्वादशी व्रत, श्र्ामबाबा द्वादशी,5 िोम फाल्गुन शुक्ल द्वादशी 21:41:52 पापनासशनी द्वादशी, िुकृत द्वादशी, जर्ा द्वादशी, पुष्र् नक्षिर्ुक्त महाद्वादशी, भौम प्रदोष व्रत(ऋणमोर्न हे तु उिम), नंद िर्ोदशी व्रत, होसलकोत्िव6 मंगल फाल्गुन शुक्ल िर्ोदशी 20:07:02 (वृडदावन) महे श्वर व्रत, िवाासताहर व्रत, पूस्णामा व्रत, हुताशनी पूस्णामा, (होसलका-दहन िूर्ाास्त7 बुध फाल्गुन शुक्ल र्तुदाशी 17:52:49 िे रात्रि 11.39 क मध्र् शुभ काल), े स्नान-दान-व्रत हे तु उिम फाल्गुनी पूस्णामा, होली-रं गोत्िव (धुलैण्िी), दोल र्ािा,8 गुरु फाल्गुन शुक्ल पूस्णामा 15:10:28 श्रीर्ैतडर् महाप्रभु जर्ंती व्रतोत्िव, होलाष्टक िमाप्त, गणगौर पूजा प्रारं भ (राज) रसतकाम महोत्िव, विंतोत्िव, व्र्सतपात महापात प्रात:8.32 िे फदन 12.51 बजे9 शुक्र र्ैि कृ ष्ण एकम 12:06:33 तक, फद्वतीर्ा- भइर्ा दज, दमपत्रि टीका, विडत प्रारं भ, िंत तुकाराम जर्ंती, वन फदवि, सर्िगुप्त ू10 शसन र्ैि कृ ष्ण 08:56:04 तृतीर्ा पूजा,11 रत्रव र्ैि कृ ष्ण र्तुथी 26:44:38 िंकष्टी श्रीगणेश र्तुथी व्रत (र्ं.उ.रा. 9.18), छिपसत सशवाजी की जडमसतसथ,12 िोम र्ैि कृ ष्ण पंर्मी 24:00:23 श्रीपंर्मी, रं ग पंर्मी, फाग महोत्िव,13 मंगल र्ैि कृ ष्ण षष्ठी 21:38:37 श्रीएकनाथ षष्ठी, वृद्ध अंगारक पवा शीतला िप्तमी, शीतला-पूजा, सिलाहं की िप्तमी(पं), मीन-िंक्रास्डत क स्नान-दान े14 बुध र्ैि कृ ष्ण िप्तमी 19:43:07 का पुण्र्काल िूर्ोदर् िे िांर् काल 05:14 बजे तक, पूजा-िंकल्प हे तु विडत ऋतु प्रारं भ, मीन (खर) माि शुभ कार्ं मं वस्जात, शीतलाष्टमी, िंतानाष्टमी, कालाष्टमी व्रत, अष्टका श्राद्ध, ऋषभदेव जर्ंती,15 गुरु र्ैि कृ ष्ण अष्टमी 18:14:47 श्रीऋषभदे व जडमफदन(जैन)16 शुक्र र्ैि कृ ष्ण नवमी 17:14:34 वाराह नवमी, अडवष्टका नवमी, अडवष्टका श्राद्ध17 शसन र्ैि कृ ष्ण दशमी 16:41:33 दशमाता व्रत,
  • 76. 76 मार्ा 201218 रत्रव र्ैि कृ ष्ण एकादशी 16:34:46 पापमोसर्नी एकादशी व्रत,19 िोम र्ैि कृ ष्ण द्वादशी 16:51:26 िोम प्रदोष व्रत, मासिक सशवरात्रि व्रत, मधुकृष्ण िर्ोदशी, रं गतेरि, वारुणी पवा प्रात: 6.54 िे20 मंगल र्ैि कृ ष्ण िर्ोदशी 17:32:28 िार्ं 5.32 बजे तक, िूर्ा िार्न मेष रात्रष मं प्रात: 10.46 बजे, विडत िमपात ्, मां फहं गलाज पूजा कदार र्तुदाशी, सर्ि र्तुदाशी, रुद्रतीथा-स्नान,राष्ट्रीर् (शासलवाहन) शक िमवत ् े21 बुध र्ैि कृ ष्ण र्तुदाशी 18:37:52 1934 प्रारं भ, वैधसत महापात फदन 12.05 िे िार्ं 5.07 बजे तक, त्रवश्व वन ृ फदवि, अमावस्र्ा, त्रवक्रम.िं. 2068 पूण, स्नान-दान-श्राद्ध हे तु उिम र्ैिी अमावस्र्ा, थाल ा22 गुरु र्ैि कृ ष्ण अमावस्र्ा 20:06:42 भरुण फदवि, र्ैि नवरािारं भ, बिंत नवराि, घट स्थापना, त्रवश्वाविु’ नामक त्रवक्रम.िं.2069 प्रारं भ, बैठकी, नविंवत्िरोत्िव, नवपंर्ांग फल-श्रवण, ध्वजारोहण, वािंसतक नवराि23 शुक्र र्ैि शुक्ल एकम 22:00:51 शुरू, कलश( घट) स्थापना, सतलक व्रत, त्रवद्या व्रत, आरोग्र् व्रत, गुिी पिवा (महाराष्ट्र), िा.हे िगेवार जर्ंती, गौतम ऋत्रष जर्ंती, आर्ािमाज स्थापना फदवि, अभ्र्ंग स्नान, भगतसिंह- राजगुरु-िुखदे व शहीद फदवि24 शसन र्ैि शुक्ल फद्वतीर्ा 24:15:38 नवीन र्ंद्र-दशान, र्ैती र्ाँद-झूलेलाल जर्ंती (सिंधी), गौरी तृतीर्ा, गणगौर तीज व्रत, िौभाग्र् िुंदरी व्रत, मनोरथ तृतीर्ा व्रत, अरुं धती25 रत्रव र्ैि शुक्ल तृतीर्ा 26:47:17 व्रत, जसमफद उलावल, मत्स्र्ावतार जर्ंती,26 िोम र्ैि शुक्ल र्तुथी 29:28:18 वरदत्रवनार्क र्तुथी व्रत, दमनक र्तुथी, त्रवनार्की र्तुथी (र्ं.उ.रा.9.41), श्रीपंर्मी, लक्ष्मी-पूजा, श्रीराम राज्र्ासभषेक फदवि, हर्व्रत, अनंतनाग पंर्मी,27 मंगल र्ैि शुक्ल पंर्मी 32:08:24 पशुपतीश्वर-दशान (काशी),28 बुध र्ैि शुक्ल षष्ठी 08:08:11 र्ैती छठ का खरना, स्कडद (कमार) षष्ठी व्रत, ु िूर्षष्ठी व्रत (र्ैती छठ), र्मुना जर्ंती महोत्िव, वािंती दगाापूजा, त्रबल्वासभमंिण ा ु29 गुरु र्ैि शुक्ल षष्ठी 10:33:16 षष्ठी, अशोकाषष्ठी वािंती दगाापूजा प्रारं भ, महािप्तमी व्रत, कालरात्रि िप्तमी, महासनशा पूजा, कमला ु30 शुक्र र्ैि शुक्ल िप्तमी 12:27:26 िप्तमी, भास्कर िप्तमी, िूर्दमनक पूजा, ा दगााष्टमी-महाष्टमी व्रत, अशोकाष्टमी, अशोकाष्टमी (बंगाल), श्रीअडनपूणााष्टमी व्रत एवं ु31 शसन र्ैि शुक्ल अष्टमी 13:42:13 पररक्रमा (काशी), महासनशा पूजा, िांईबाबा उत्िव 3 फदन (सशरिी), मनिादेवी मेला(हररद्वार), बहुफोटा मेला (जममू), िम्राट अशोक जर्ंती,
  • 77. 77 मार्ा 2012 गणेश लक्ष्मी र्ंिप्राण-प्रसतत्रष्ठत गणेश लक्ष्मी र्ंि को अपने घर-दकान-ओफफि-फक्टरी मं पूजन स्थान, गल्ला र्ा अलमारी मं स्थात्रपत ु ैकरने व्र्ापार मं त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । र्ंि क प्रभाव िे भाग्र् मं उडनसत, मान-प्रसतष्ठा एवं े व्र्ापर मं वृत्रद्ध होतीहं एवं आसथाक स्स्थमं िुधार होता हं । गणेश लक्ष्मी र्ंि को स्थात्रपत करने िे भगवान गणेश और दे वी लक्ष्मी कािंर्ुक्त आशीवााद प्राप्त होता हं । Rs.550 िे Rs.8200 तक मंगल र्ंि िे ऋण मुत्रक्तमंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररक्त व्र्त्रक्त को ऋण े े ेमुत्रक्त हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए मंगल े ेर्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । प्राण प्रसतत्रष्ठत मंगल र्ंि क पूजन िे भाग्र्ोदर्, शरीर मं खून की ेकमी, गभापात िे बर्ाव, बुखार, र्ेर्क, पागलपन, िूजन और घाव, र्ौन शत्रक्त मं वृत्रद्ध, शिु त्रवजर्, तंि मंि क दष्ट प्रभा, े ुभूत-प्रेत भर्, वाहन दघटनाओं, हमला, र्ोरी इत्र्ादी िे बर्ाव होता हं । ु ा मूल्र् माि Rs- 550 कबेर र्ंि ुकबेर र्ंि क पूजन िे स्वणा लाभ, रत्न लाभ, पैतक िमपिी एवं गिे हुए धन िे लाभ प्रासप्त फक कामना करने वाले ु े ृव्र्त्रक्त क सलर्े कबेर र्ंि अत्र्डत िफलता दार्क होता हं । एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं । कबेर र्ंि क पूजन िे एकासधक े ु ु ेस्त्रोोि िे धन का प्राप्त होकर धन िंर्र् होता हं । ताम्र पि पर िुवणा पोलीि ताम्र पि पर रजत पोलीि ताम्र पि पर (Gold Plated) (Silver Plated) (Copper) िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् िाईज मूल्र् 2” X 2” 640 2” X 2” 460 2” X 2” 370 3” X 3” 1250 3” X 3” 820 3” X 3” 550 4” X 4” 1850 4” X 4” 1250 4” X 4” 820 6” X 6” 2700 6” X 6” 2100 6” X 6” 1450 9” X 9” 4600 9” X 9” 3700 9” X 9” 2450 12” X12” 8200 12” X12” 6400 12” X12” 4600 GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  • 78. 78 मार्ा 2012 नवरत्न जफित श्री र्ंिशास्त्रो वर्न क अनुिार शुद्ध िुवणा र्ा रजत मं सनसमात श्री र्ंि क र्ारं और र्फद नवरत्न जिवा ने पर र्ह नवरत्न े ेजफित श्री र्ंि कहलाता हं । िभी रत्नो को उिक सनस्ित स्थान पर जि कर लॉकट क रूप मं धारण करने िे व्र्त्रक्त को े े ेअनंत एश्वर्ा एवं लक्ष्मी की प्रासप्त होती हं । व्र्त्रक्त को एिा आभाि होता हं जैिे मां लक्ष्मी उिक िाथ हं । नवग्रह को ेश्री र्ंि क िाथ लगाने िे ग्रहं की अशुभ दशा का धारण करने वाले व्र्त्रक्त पर प्रभाव नहीं होता हं । गले मं होने क े ेकारण र्ंि पत्रवि रहता हं एवं स्नान करते िमर् इि र्ंि पर स्पशा कर जो जल त्रबंद ु शरीर को लगते हं , वह गंगाजल क िमान पत्रवि होता हं । इि सलर्े इिे िबिे तेजस्वी एवं फलदासर् कहजाता हं । जैिे अमृत िे उिम कोई ेऔषसध नहीं, उिी प्रकार लक्ष्मी प्रासप्त क सलर्े श्री र्ंि िे उिम कोई र्ंि िंिार मं नहीं हं एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं । इि ेप्रकार क नवरत्न जफित श्री र्ंि गुरूत्व कार्ाालर् द्वारा शुभ मुहूता मं प्राण प्रसतत्रष्ठत करक बनावाए जाते हं । े े अष्ट लक्ष्मी कवर्अष्ट लक्ष्मी कवर् को धारण करने िे व्र्त्रक्त पर िदा मां महा लक्ष्मी की कृ पा एवं आशीवााद बनारहता हं । स्जस्िे मां लक्ष्मी क अष्ट रुप (१)-आफद लक्ष्मी, (२)-धाडर् लक्ष्मी, (३)-धैरीर् लक्ष्मी, (४)- ेगज लक्ष्मी, (५)-िंतान लक्ष्मी, (६)-त्रवजर् लक्ष्मी, (७)-त्रवद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन िभीरुपो का स्वतः अशीवााद प्राप्त होता हं । मूल्र् माि: Rs-1050 मंि सिद्ध व्र्ापार वृत्रद्ध कवर्व्र्ापार वृत्रद्ध कवर् व्र्ापार क शीघ्र उडनसत क सलए उिम हं । र्ाहं कोई भी व्र्ापार हो अगर उिमं लाभ क स्थान पर े े ेबार-बार हासन हो रही हं । फकिी प्रकार िे व्र्ापार मं बार-बार बांधा उत्पडन हो रही हो! तो िंपूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत मंिसिद्ध पूणा र्ैतडर् र्ुक्त व्र्ापात वृत्रद्ध र्ंि को व्र्पार स्थान र्ा घर मं स्थात्रपत करने िे शीघ्र ही व्र्ापार वृत्रद्ध एवंसनतडतर लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् माि: Rs.370 & 730 मंगल र्ंि(त्रिकोण) मंगल र्ंि को जमीन-जार्दाद क त्रववादो को हल करने क काम मं लाभ दे ता हं , इि क असतररक्त व्र्त्रक्त को े े ेऋण मुत्रक्त हे तु मंगल िाधना िे असत शीध्र लाभ प्राप्त होता हं । त्रववाह आफद मं मंगली जातकं क कल्र्ाण क सलए े ेमंगल र्ंि की पूजा करने िे त्रवशेष लाभ प्राप्त होता हं । मूल्र् माि Rs- 550 GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
  • 79. 79 मार्ा 2012 त्रववाह िंबंसधत िमस्र्ाक्र्ा आपक लिक-लिकी फक आपकी शादी मं अनावश्र्क रूप िे त्रवलमब हो रहा हं र्ा उनक वैवाफहक जीवन मं खुसशर्ां कम े े ेहोती जारही हं और िमस्र्ा असधक बढती जारही हं । एिी स्स्थती होने पर अपने लिक -लिकी फक किली का अध्र्र्न े ुंअवश्र् करवाले और उनक वैवाफहक िुख को कम करने वाले दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे जनकारी प्राप्त े े े ेकरं । सशक्षा िे िंबंसधत िमस्र्ाक्र्ा आपक लिक-लिकी की पढाई मं अनावश्र्क रूप िे बाधा-त्रवघ्न र्ा रुकावटे हो रही हं ? बच्र्ो को अपने पूणा पररश्रम े ेएवं मेहनत का उसर्त फल नहीं समल रहा? अपने लिक-लिकी की किली का त्रवस्तृत अध्र्र्न अवश्र् करवाले और े ुंउनक त्रवद्या अध्र्र्न मं आनेवाली रुकावट एवं दोषो क कारण एवं उन दोषं क सनवारण क उपार्ो क बार मं त्रवस्तार िे े े े े ेजनकारी प्राप्त करं । क्र्ा आप फकिी िमस्र्ा िे ग्रस्त हं ?आपक पाि अपनी िमस्र्ाओं िे छटकारा पाने हे तु पूजा-अर्ाना, िाधना, मंि जाप इत्र्ाफद करने का िमर् नहीं हं ? े ुअब आप अपनी िमस्र्ाओं िे बीना फकिी त्रवशेष पूजा-अर्ाना, त्रवसध-त्रवधान क आपको अपने कार्ा मं िफलता प्राप्त ेकर िक एवं आपको अपने जीवन क िमस्त िुखो को प्राप्त करने का मागा प्राप्त हो िक इि सलर्े गुरुत्व कार्ाालत े े ेद्वारा हमारा उद्दे श्र् शास्त्रोोक्त त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत पूणा र्ैतडर् र्ुक्त त्रवसभडन प्रकार केर्डि- कवर् एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोर्ाने का हं । े ज्र्ोसतष िंबंसधत त्रवशेष परामशाज्र्ोसत त्रवज्ञान, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु एवं आध्र्ास्त्मक ज्ञान िं िंबंसधत त्रवषर्ं मं हमारे 30 वषो िे असधक वषा केअनुभवं क िाथ ज्र्ोसति िे जुिे नर्े-नर्े िंशोधन क आधार पर आप अपनी हर िमस्र्ा क िरल िमाधान प्राप्त कर े े ेिकते हं । GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com ओनेक्ि जो व्र्त्रक्त पडना धारण करने मे अिमथा हो उडहं बुध ग्रह क उपरत्न ओनेक्ि को धारण करना र्ाफहए। े उच्र् सशक्षा प्रासप्त हे तु और स्मरण शत्रक्त क त्रवकाि हे तु ओनेक्ि रत्न की अंगूठी को दार्ं हाथ की िबिे छोटी े उं गली र्ा लॉकट बनवा कर गले मं धारण करं । ओनेक्ि रत्न धारण करने िे त्रवद्या-बुत्रद्ध की प्रासप्त हो होकर स्मरण े मार्ा शत्रक्त का त्रवकाि होता हं ।
  • 80. 80 मार्ा 2012 मार्ा 2012 -त्रवशेष र्ोग कार्ा सित्रद्ध र्ोग 4/5 रात्रि 12.01 िे िूर्ोदर् तक 23 फदन 12.34 िे रातभर 5 िूर्ोदर् िे रात्रि 11.48 तक 25 िूर्ोदर् िे िार्ं 6.07 तक 6 िूर्ोदर् िे रात्रि 10.50 तक 27 िूर्ोदर् िे रात्रि 12.25 तक 18 प्रात: 5.04 िे िूर्ोदर् तक 28 िमपूणा फदन-रात अमृत र्ोग 4/5 रात्रि 12.01 िे िूर्ोदर् तक 23 फदन 12.34 िे रातभर फद्वपुष्कर (दोगुना फल) र्ोग 19 प्रात: 5.47 िे िूर्ोदर् तक त्रिपुष्कर (तीन गुना फल) र्ोग 4 रात्रि मं 10.29 िे रात्रि 12.01 तक रत्रव-पुष्र्ामृत र्ोग 4/5 रात्रि 12.01 िे िूर्ोदर् तकर्ोग फल :  कार्ा सित्रद्ध र्ोग मे फकर्े गर्े शुभ कार्ा मे सनस्ित िफलता प्राप्त होती हं, एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं ।  फद्वपुष्कर र्ोग मं फकर्े गर्े शुभ कार्ो का लाभ दोगुना होता हं । एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं ।  त्रिपुष्कर र्ोग मं फकर्े गर्े शुभ कार्ो का लाभ तीन गुना होता हं । एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं ।  रत्रव पुष्र्ामृत र्ोग एवं अमृत र्ोग शुभ कार्ा हे तु उिम माना जाता हं । दै सनक शुभ एवं अशुभ िमर् ज्ञान तासलका गुसलक काल र्म काल राहु काल (शुभ) (अशुभ) (अशुभ) वार िमर् अवसध िमर् अवसध िमर् अवसध रत्रववार 03:00 िे 04:30 12:00 िे 01:30 04:30 िे 06:00 िोमवार 01:30 िे 03:00 10:30 िे 12:00 07:30 िे 09:00 मंगलवार 12:00 िे 01:30 09:00 िे 10:30 03:00 िे 04:30 बुधवार 10:30 िे 12:00 07:30 िे 09:00 12:00 िे 01:30 गुरुवार 09:00 िे 10:30 06:00 िे 07:30 01:30 िे 03:00 शुक्रवार 07:30 िे 09:00 03:00 िे 04:30 10:30 िे 12:00 शसनवार 06:00 िे 07:30 01:30 िे 03:00 09:00 िे 10:30
  • 81. 81 मार्ा 2012 फदन क र्ौघफिर्े े िमर् रत्रववार िोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शसनवार 06:00 िे 07:30 उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ र्ल काल 07:30 िे 09:00 र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ 09:00 िे 10:30 लाभ शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग 10:30 िे 12:00 अमृत रोग लाभ शुभ र्ल काल उद्वे ग 12:00 िे 01:30 काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ र्ल 01:30 िे 03:00 शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ 03:00 िे 04:30 रोग लाभ शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत 04:30 िे 06:00 उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ र्ल काल रात क र्ौघफिर्े े िमर् रत्रववार िोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शसनवार 06:00 िे 07:30 शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ 07:30 िे 09:00 अमृत रोग लाभ शुभ र्ल काल उद्वे ग 09:00 िे 10:30 र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ 10:30 िे 12:00 रोग लाभ शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत 12:00 िे 01:30 काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ र्ल 01:30 िे 03:00 लाभ शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग 03:00 िे 04:30 उद्वे ग अमृत रोग लाभ शुभ र्ल काल 04:30 िे 06:00 शुभ र्ल काल उद्वे ग अमृत रोग लाभ शास्त्रोोक्त मत क अनुशार र्फद फकिी भी कार्ा का प्रारं भ शुभ मुहूता र्ा शुभ िमर् पर फकर्ा जार्े तो कार्ा मं िफलता ेप्राप्त होने फक िंभावना ज्र्ादा प्रबल हो जाती हं । इि सलर्े दै सनक शुभ िमर् र्ौघफिर्ा दे खकर प्राप्त फकर्ा जा िकता हं ।नोट: प्रार्ः फदन और रात्रि क र्ौघफिर्े फक सगनती क्रमशः िूर्ोदर् और िूर्ाास्त िे फक जाती हं । प्रत्र्ेक र्ौघफिर्े फक अवसध 1 ेघंटा 30 समसनट अथाात िे ढ़ घंटा होती हं । िमर् क अनुिार र्ौघफिर्े को शुभाशुभ तीन भागं मं बांटा जाता हं , जो क्रमशः शुभ, ेमध्र्म और अशुभ हं । र्ौघफिर्े क स्वामी ग्रह े * हर कार्ा क सलर्े शुभ/अमृत/लाभ का ेशुभ र्ौघफिर्ा मध्र्म र्ौघफिर्ा अशुभ र्ौघफिर्ा र्ौघफिर्ा उिम माना जाता हं ।र्ौघफिर्ा स्वामी ग्रह र्ौघफिर्ा स्वामी ग्रह र्ौघफिर्ा स्वामी ग्रहशुभ गुरु र्र शुक्र उद्बे ग िूर्ा * हर कार्ा क सलर्े र्ल/काल/रोग/उद्वे ग ेअमृत र्ंद्रमा काल शसन का र्ौघफिर्ा उसर्त नहीं माना जाता।लाभ बुध रोग मंगल
  • 82. 82 मार्ा 2012 फदन फक होरा - िूर्ोदर् िे िूर्ाास्त तक वार 1.घं 2.घं 3.घं 4.घं 5.घं 6.घं 7.घं 8.घं 9.घं 10.घं 11.घं 12.घं रत्रववार िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन िोमवार र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा मंगलवार मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र बुधवार बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल गुरुवार गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध शुक्रवार शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु शसनवार शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र रात फक होरा – िूर्ाास्त िे िूर्ोदर् तक रत्रववार गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध िोमवार शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगलवार शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुधवार िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरुवार र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्रवार मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसनवार बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगल िूर्ा शुक्र बुध र्ंद्र शसन गुरु मंगलहोरा मुहूता को कार्ा सित्रद्ध क सलए पूणा फलदार्क एवं अर्ूक माना जाता हं , फदन-रात क २४ घंटं मं शुभ-अशुभ िमर् े ेको िमर् िे पूवा ज्ञात कर अपने कार्ा सित्रद्ध क सलए प्रर्ोग करना र्ाफहर्े। ेत्रवद्वानो क मत िे इस्च्छत कार्ा सित्रद्ध क सलए ग्रह िे िंबंसधत होरा का र्ुनाव करने िे त्रवशेष लाभ े ेप्राप्त होता हं ।  िूर्ा फक होरा िरकारी कार्ो क सलर्े उिम होती हं । े  र्ंद्रमा फक होरा िभी कार्ं क सलर्े उिम होती हं । े  मंगल फक होरा कोटा-कर्ेरी क कार्ं क सलर्े उिम होती हं । े े  बुध फक होरा त्रवद्या-बुत्रद्ध अथाात पढाई क सलर्े उिम होती हं । े  गुरु फक होरा धासमाक कार्ा एवं त्रववाह क सलर्े उिम होती हं । े  शुक्र फक होरा र्ािा क सलर्े उिम होती हं । े  शसन फक होरा धन-द्रव्र् िंबंसधत कार्ा क सलर्े उिम होती हं । े
  • 83. 83 मार्ा 2012 ग्रह र्लन मार्ा-2012Day Sun Mon Ma Me Jup Ven Sat ah Ket Ua Nep Plu1 10:16:46 01:16:09 04:20:44 11:03:55 00:12:59 00:01:02 06:05:02 07:15:27 01:15:27 11:09:08 10:06:57 08:15:062 10:17:46 01:28:13 04:20:21 11:05:19 00:13:10 00:02:09 06:05:00 07:15:27 01:15:27 11:09:12 10:06:59 08:15:073 10:18:46 02:10:33 04:19:57 11:06:37 00:13:21 00:03:16 06:04:57 07:15:25 01:15:25 11:09:15 10:07:01 08:15:084 10:19:47 02:23:15 04:19:33 11:07:49 00:13:32 00:04:22 06:04:55 07:15:22 01:15:22 11:09:18 10:07:04 08:15:095 10:20:47 03:06:21 04:19:09 11:08:54 00:13:44 00:05:29 06:04:52 07:15:16 01:15:16 11:09:21 10:07:06 08:15:116 10:21:47 03:19:55 04:18:46 11:09:52 00:13:55 00:06:35 06:04:50 07:15:07 01:15:07 11:09:25 10:07:08 08:15:127 10:22:47 04:03:55 04:18:22 11:10:42 00:14:06 00:07:41 06:04:47 07:14:56 01:14:56 11:09:28 10:07:10 08:15:138 10:23:47 04:18:18 04:17:59 11:11:24 00:14:18 00:08:47 06:04:44 07:14:44 01:14:44 11:09:31 10:07:13 08:15:149 10:24:47 05:02:59 04:17:35 11:11:58 00:14:29 00:09:52 06:04:41 07:14:33 01:14:33 11:09:35 10:07:15 08:15:1510 10:25:47 05:17:48 04:17:12 11:12:23 00:14:41 00:10:57 06:04:38 07:14:23 01:14:23 11:09:38 10:07:17 08:15:1611 10:26:47 06:02:38 04:16:49 11:12:39 00:14:53 00:12:02 06:04:35 07:14:15 01:14:15 11:09:41 10:07:19 08:15:1712 10:27:46 06:17:21 04:16:26 11:12:46 00:15:04 00:13:07 06:04:32 07:14:10 01:14:10 11:09:45 10:07:21 08:15:1813 10:28:46 07:01:51 04:16:04 11:12:45 00:15:16 00:14:12 06:04:29 07:14:08 01:14:08 11:09:48 10:07:23 08:15:1914 10:29:46 07:16:04 04:15:42 11:12:35 00:15:28 00:15:16 06:04:25 07:14:07 01:14:07 11:09:52 10:07:26 08:15:1915 11:00:46 08:00:01 04:15:21 11:12:17 00:15:40 00:16:19 06:04:22 07:14:07 01:14:07 11:09:55 10:07:28 08:15:2016 11:01:46 08:13:40 04:15:00 11:11:51 00:15:53 00:17:23 06:04:19 07:14:07 01:14:07 11:09:58 10:07:30 08:15:2117 11:02:45 08:27:04 04:14:39 11:11:18 00:16:05 00:18:26 06:04:15 07:14:05 01:14:05 11:10:02 10:07:32 08:15:2218 11:03:45 09:10:13 04:14:19 11:10:39 00:16:17 00:19:29 06:04:11 07:14:00 01:14:00 11:10:05 10:07:34 08:15:2319 11:04:45 09:23:10 04:13:59 11:09:55 00:16:29 00:20:32 06:04:08 07:13:52 01:13:52 11:10:09 10:07:36 08:15:2320 11:05:45 10:05:55 04:13:40 11:09:07 00:16:42 00:21:34 06:04:04 07:13:42 01:13:42 11:10:12 10:07:38 08:15:2421 11:06:44 10:18:29 04:13:22 11:08:15 00:16:54 00:22:36 06:04:00 07:13:30 01:13:30 11:10:15 10:07:40 08:15:2522 11:07:44 11:00:52 04:13:04 11:07:22 00:17:07 00:23:37 06:03:56 07:13:17 01:13:17 11:10:19 10:07:42 08:15:2523 11:08:43 11:13:06 04:12:47 11:06:28 00:17:20 00:24:38 06:03:52 07:13:05 01:13:05 11:10:22 10:07:44 08:15:2624 11:09:43 11:25:09 04:12:30 11:05:34 00:17:32 00:25:39 06:03:49 07:12:55 01:12:55 11:10:26 10:07:46 08:15:2625 11:10:42 00:07:05 04:12:14 11:04:42 00:17:45 00:26:39 06:03:44 07:12:47 01:12:47 11:10:29 10:07:48 08:15:2726 11:11:42 00:18:55 04:11:59 11:03:52 00:17:58 00:27:39 06:03:40 07:12:41 01:12:41 11:10:33 10:07:50 08:15:2827 11:12:41 01:00:42 04:11:45 11:03:05 00:18:11 00:28:39 06:03:36 07:12:38 01:12:38 11:10:36 10:07:52 08:15:2828 11:13:41 01:12:29 04:11:31 11:02:22 00:18:24 00:29:38 06:03:32 07:12:37 01:12:37 11:10:39 10:07:54 08:15:2829 11:14:40 01:24:22 04:11:18 11:01:44 00:18:37 01:00:36 06:03:28 07:12:38 01:12:38 11:10:43 10:07:56 08:15:2930 11:15:39 02:06:24 04:11:06 11:01:11 00:18:50 01:01:35 06:03:24 07:12:39 01:12:39 11:10:46 10:07:58 08:15:2931 11:16:38 02:18:42 04:10:55 11:00:44 00:19:03 01:02:32 06:03:19 07:12:39 01:12:39 11:10:50 10:08:00 08:15:30
  • 84. 84 मार्ा 2012 िवा रोगनाशक र्ंि/कवर्मनुष्र् अपने जीवन क त्रवसभडन िमर् पर फकिी ना फकिी िाध्र् र्ा अिाध्र् रोग िे ग्रस्त होता हं । ेउसर्त उपर्ार िे ज्र्ादातर िाध्र् रोगो िे तो मुत्रक्त समल जाती हं , लेफकन कभी-कभी िाध्र् रोग होकर भी अिाध्र्ाहोजाते हं , र्ा कोइ अिाध्र् रोग िे ग्रसित होजाते हं । हजारो लाखो रुपर्े खर्ा करने पर भी असधक लाभ प्राप्त नहीं होपाता। िॉक्टर द्वारा फदजाने वाली दवाईर्ा अल्प िमर् क सलर्े कारगर िात्रबत होती हं , एसि स्स्थती मं लाभा प्रासप्त क े ेसलर्े व्र्त्रक्त एक िॉक्टर िे दिरे िॉक्टर क र्क्कर लगाने को बाध्र् हो जाता हं । ू े भारतीर् ऋषीर्ोने अपने र्ोग िाधना क प्रताप िे रोग शांसत हे तु त्रवसभडन आर्ुवेर औषधो क असतररक्त र्ंि, े ेमंि एवं तंि उल्लेख अपने ग्रंथो मं कर मानव जीवन को लाभ प्रदान करने का िाथाक प्रर्ाि हजारो वषा पूवा फकर्ा था।बुत्रद्धजीवो क मत िे जो व्र्त्रक्त जीवनभर अपनी फदनर्र्ाा पर सनर्म, िंर्म रख कर आहार ग्रहण करता हं , एिे व्र्त्रक्त ेको त्रवसभडन रोग िे ग्रसित होने की िंभावना कम होती हं । लेफकन आज क बदलते र्ुग मं एिे व्र्त्रक्त भी भर्ंकर रोग ेिे ग्रस्त होते फदख जाते हं । क्र्ोफक िमग्र िंिार काल क अधीन हं । एवं मृत्र्ु सनस्ित हं स्जिे त्रवधाता क अलावा े ेऔर कोई टाल नहीं िकता, लेफकन रोग होने फक स्स्थती मं व्र्त्रक्त रोग दर करने का प्रर्ाि तो अवश्र् कर िकता हं । ूइि सलर्े र्ंि मंि एवं तंि क कशल जानकार िे र्ोग्र् मागादशान लेकर व्र्त्रक्त रोगो िे मुत्रक्त पाने का र्ा उिक प्रभावो े ु ेको कम करने का प्रर्ाि भी अवश्र् कर िकता हं । ज्र्ोसतष त्रवद्या क कशल जानकर भी काल पुरुषकी गणना कर अनेक रोगो क अनेको रहस्र् को उजागर कर े ु ेिकते हं । ज्र्ोसतष शास्त्रो क माध्र्म िे रोग क मूलको पकिने मे िहर्ोग समलता हं , जहा आधुसनक सर्फकत्िा शास्त्रो े ेअक्षम होजाता हं वहा ज्र्ोसतष शास्त्रो द्वारा रोग क मूल(जि) को पकि कर उिका सनदान करना लाभदार्क एवं ेउपार्ोगी सिद्ध होता हं । हर व्र्त्रक्त मं लाल रं गकी कोसशकाए पाइ जाती हं , स्जिका सनर्मीत त्रवकाि क्रम बद्ध तरीक िे होता रहता हं । ेजब इन कोसशकाओ क क्रम मं पररवतान होता हं र्ा त्रवखंफिन होता हं तब व्र्त्रक्त क शरीर मं स्वास्थ्र् िंबंधी त्रवकारो े ेउत्पडन होते हं । एवं इन कोसशकाओ का िंबंध नव ग्रहो क िाथ होता हं । स्जस्िे रोगो क होने क कारणा व्र्त्रक्तक े े े ेजडमांग िे दशा-महादशा एवं ग्रहो फक गोर्र मं स्स्थती िे प्राप्त होता हं । िवा रोग सनवारण कवर् एवं महामृत्र्ुंजर् र्ंि क माध्र्म िे व्र्त्रक्त क जडमांग मं स्स्थत कमजोर एवं पीफित े ेग्रहो क अशुभ प्रभाव को कम करने का कार्ा िरलता पूवक फकर्ा जािकता हं । जेिे हर व्र्त्रक्त को ब्रह्मांि फक उजाा एवं े ापृथ्वी का गुरुत्वाकषाण बल प्रभावीत कताा हं फठक उिी प्रकार कवर् एवं र्ंि क माध्र्म िे ब्रह्मांि फक उजाा क े ेिकारात्मक प्रभाव िे व्र्त्रक्त को िकारात्मक उजाा प्राप्त होती हं स्जस्िे रोग क प्रभाव को कम कर रोग मुक्त करने हे तु ेिहार्ता समलती हं । रोग सनवारण हे तु महामृत्र्ुंजर् मंि एवं र्ंि का बिा महत्व हं । स्जस्िे फहडद ू िंस्कृ सत का प्रार्ः हर व्र्त्रक्तमहामृत्र्ुंजर् मंि िे पररसर्त हं ।
  • 85. 85 मार्ा 2012कवर् क लाभ : े  एिा शास्त्रोोक्त वर्न हं स्जि घर मं महामृत्र्ुंजर् र्ंि स्थात्रपत होता हं वहा सनवाि कताा हो नाना प्रकार फक आसध-व्र्ासध-उपासध िे रक्षा होती हं ।  पूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा र्ैतडर् र्ुक्त िवा रोग सनवारण कवर् फकिी भी उम्र एवं जासत धमा क लोग र्ाहे े स्त्रोी हो र्ा पुरुष धारण कर िकते हं ।  जडमांगमं अनेक प्रकारक खराब र्ोगो और खराब ग्रहो फक प्रसतकलता िे रोग उतपडन होते हं । े ू  कछ रोग िंक्रमण िे होते हं एवं कछ रोग खान-पान फक असनर्समतता और अशुद्धतािे उत्पडन होते हं । कवर् ु ु एवं र्ंि द्वारा एिे अनेक प्रकार क खराब र्ोगो को नष्ट कर, स्वास्थ्र् लाभ और शारीररक रक्षण प्राप्त करने हे तु े िवा रोगनाशक कवर् एवं र्ंि िवा उपर्ोगी होता हं ।  आज क भौसतकता वादी आधुसनक र्ुगमे अनेक एिे रोग होते हं , स्जिका उपर्ार ओपरे शन और दवािे भी े कफठन हो जाता हं । कछ रोग एिे होते हं स्जिे बताने मं लोग फहर्फकर्ाते हं शरम अनुभव करते हं एिे रोगो ु को रोकने हे तु एवं उिक उपर्ार हे तु िवा रोगनाशक कवर् एवं र्ंि लाभादासर् सिद्ध होता हं । े  प्रत्र्ेक व्र्त्रक्त फक जेिे-जेिे आर्ु बढती हं वैिे-विै उिक शरीर फक ऊजाा होती जाती हं । स्जिक िाथ अनेक े े प्रकार क त्रवकार पैदा होने लगते हं एिी स्स्थती मं उपर्ार हे तु िवारोगनाशक कवर् एवं र्ंि फलप्रद होता हं । े  स्जि घर मं त्रपता-पुि, माता-पुि, माता-पुिी, र्ा दो भाई एक फह नक्षिमे जडम लेते हं, तब उिकी माता क सलर्े े असधक कष्टदार्क स्स्थती होती हं । उपर्ार हे तु महामृत्र्ुंजर् र्ंि फलप्रद होता हं ।  स्जि व्र्त्रक्त का जडम पररसध र्ोगमे होता हं उडहे होने वाले मृत्र्ु तुल्र् कष्ट एवं होने वाले रोग, सर्ंता मं उपर्ार हे तु िवा रोगनाशक कवर् एवं र्ंि शुभ फलप्रद होता हं ।नोट:- पूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवं पूणा र्ैतडर् र्ुक्त िवा रोग सनवारण कवर् एवं र्ंि क बारे मं असधक जानकारी हे तु हम ेिे िंपक करं । ा Declaration Notice  We do not accept liability for any out of date or incorrect information.  We will not be liable for your any indirect consequential loss, loss of profit,  If you will cancel your order for any article we can not any amount will be refunded or Exchange.  We are keepers of secrets. We honour our clients rights to privacy and will release no information about our any other clients transactions with us.  Our ability lies in having learned to read the subtle spiritual energy, Yantra, mantra and promptings of the natural and spiritual world.  Our skill lies in communicating clearly and honestly with each client.  Our all kawach, yantra and any other article are prepared on the Principle of Positiv energy, our Article dose not produce any bad energy. Our Goal  Here Our goal has The classical Method-Legislation with Proved by specific with fiery chants prestigious full consciousness (Puarn Praan Pratisthit) Give miraculous powers & Good effect All types of Yantra, Kavach, Rudraksh, preciouse and semi preciouse Gems stone deliver on your door step.
  • 86. 86 मार्ा 2012 मंि सिद्ध कवर्मंि सिद्ध कवर् को त्रवशेष प्रर्ोजन मं उपर्ोग क सलए और शीघ्र प्रभाव शाली बनाने क सलए तेजस्वी मंिो द्वारा े ेशुभ महूता मं शुभ फदन को तैर्ार फकर्े जाते हं . अलग-अलग कवर् तैर्ार करने कसलए अलग-अलग तरह क े ेमंिो का प्रर्ोग फकर्ा जाता हं .  क्र्ं र्ुने मंि सिद्ध कवर्?  उपर्ोग मं आिान कोई प्रसतबडध नहीं  कोई त्रवशेष सनसत-सनर्म नहीं  कोई बुरा प्रभाव नहीं  कवर् क बारे मं असधक जानकारी हे तु े मंि सिद्ध कवर् िूसर्िवा कार्ा सित्रद्ध 4600/- ऋण मुत्रक्त 910/- त्रवघ्न बाधा सनवारण 550/-िवा जन वशीकरण 1450/- धन प्रासप्त 820/- नज़र रक्षा 550/-अष्ट लक्ष्मी 1250/- तंि रक्षा 730/- दभााग्र् नाशक ु 460/-िंतान प्रासप्त 1250/- शिु त्रवजर् 730/- * वशीकरण (२-३ व्र्त्रक्तक सलए) े 1050/-स्पे- व्र्ापर वृत्रद्ध 1050/- त्रववाह बाधा सनवारण 730/- * पत्नी वशीकरण 640/-कार्ा सित्रद्ध 1050/- व्र्ापर वृत्रद्ध 730/-- * पसत वशीकरण 640/-आकस्स्मक धन प्रासप्त 1050/- िवा रोग सनवारण 730/- िरस्वती (कक्षा +10 क सलए) े 550/-नवग्रह शांसत 910/- मस्स्तष्क पृत्रष्ट वधाक 640/- िरस्वती (कक्षा 10 तकक सलए) े 460/-भूसम लाभ 910/- कामना पूसता 640/- * वशीकरण ( 1 व्र्त्रक्त क सलए) े 640/-काम दे व 910/- त्रवरोध नाशक 640/- रोजगार प्रासप्त 370/-पदं उडनसत 910/- रोजगार वृत्रद्ध 550/-*कवर् माि शुभ कार्ा र्ा उद्दे श्र् क सलर्े े GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION) (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
  • 87. 87 मार्ा 2012 YANTRA LIST EFFECTS Our Splecial Yantra 1 12 – YANTRA SET For all Family Troubles 2 VYAPAR VRUDDHI YANTRA For Business Development 3 BHOOMI LABHA YANTRA For Farming Benefits 4 TANTRA RAKSHA YANTRA For Protection Evil Sprite 5 AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA For Unexpected Wealth Benefits 6 PADOUNNATI YANTRA For Getting Promotion 7 RATNE SHWARI YANTRA For Benefits of Gems & Jewellery 8 BHUMI PRAPTI YANTRA For Land Obtained 9 GRUH PRAPTI YANTRA For Ready Made House10 KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA - Shastrokt Yantra11 AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA Blessing of Durga12 BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL) Win over Enemies13 BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL) Blessing of Bagala Mukhi14 BHAGYA VARDHAK YANTRA For Good Luck15 BHAY NASHAK YANTRA For Fear Ending16 CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta) Blessing of Chamunda & Navgraha17 CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA Blessing of Chhinnamasta18 DARIDRA VINASHAK YANTRA For Poverty Ending19 DHANDA POOJAN YANTRA For Good Wealth20 DHANDA YAKSHANI YANTRA For Good Wealth21 GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra) Blessing of Lord Ganesh22 GARBHA STAMBHAN YANTRA For Pregnancy Protection23 GAYATRI BISHA YANTRA Blessing of Gayatri24 HANUMAN YANTRA Blessing of Lord Hanuman25 JWAR NIVARAN YANTRA For Fewer Ending JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA26 YANTRA For Astrology & Spritual Knowlage27 KALI YANTRA Blessing of Kali28 KALPVRUKSHA YANTRA For Fullfill your all Ambition29 KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA) Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga30 KANAK DHARA YANTRA Blessing of Maha Lakshami31 KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA -32 KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in work33  SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA For Successes in all work34 KRISHNA BISHA YANTRA Blessing of Lord Krishna35 KUBER YANTRA Blessing of Kuber (Good wealth)36 LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA For Obstaele Of marriage37 LAKSHAMI GANESH YANTRA Blessing of Lakshami & Ganesh38 MAHA MRUTYUNJAY YANTRA For Good Health39 MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA Blessing of Shiva40 MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA) For Fullfill your all Ambition41 MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA For Marriage with choice able Girl42 NAVDURGA YANTRA Blessing of Durga
  • 88. 88 मार्ा 2012 YANTRA LIST EFFECTS43 NAVGRAHA SHANTI YANTRA For good effect of 9 Planets44 NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA For good effect of 9 Planets45  SURYA YANTRA Good effect of Sun46  CHANDRA YANTRA Good effect of Moon47  MANGAL YANTRA Good effect of Mars48  BUDHA YANTRA Good effect of Mercury49  GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA) Good effect of Jyupiter50  SUKRA YANTRA Good effect of Venus51  SHANI YANTRA (COPER & STEEL) Good effect of Saturn52  RAHU YANTRA Good effect of Rahu53  KETU YANTRA Good effect of Ketu54 PITRU DOSH NIVARAN YANTRA For Ancestor Fault Ending55 PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA For Pregnancy Pain Ending56 RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA For Benefits of State & Central Gov57 RAM YANTRA Blessing of Ram58 RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA Blessing of Riddhi-Siddhi59 ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA For Disease- Pain- Poverty Ending60 SANKAT MOCHAN YANTRA For Trouble Ending61 SANTAN GOPAL YANTRA Blessing Lorg Krishana For child acquisition62 SANTAN PRAPTI YANTRA For child acquisition63 SARASWATI YANTRA Blessing of Sawaswati (For Study & Education)64 SHIV YANTRA Blessing of Shiv Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & 65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA) Peace 66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth 67 SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA For Bad Dreams Ending 68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA For Vehicle Accident Ending VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All 69 MAHALAKSHAMI YANTRA) Successes 70 VASTU YANTRA For Bulding Defect Ending 71 VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA For Education- Fame- state Award Winning 72 VISHNU BISHA YANTRA Blessing of Lord Vishnu (Narayan) 73 VASI KARAN YANTRA Attraction For office Purpose 74  MOHINI VASI KARAN YANTRA Attraction For Female 75  PATI VASI KARAN YANTRA Attraction For Husband 76  PATNI VASI KARAN YANTRA Attraction For Wife 77  VIVAH VASHI KARAN YANTRA Attraction For Marriage PurposeYantra Available @:- Rs- 190, 280, 370, 460, 550, 640, 730, 820, 910, 1250, 1850, 2300, 2800 and Above….. GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 09338213418, 09238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- chintan_n_joshi@yahoo.co.in, gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
  • 89. 89 मार्ा 2012 GURUTVA KARYALAY NAME OF GEM STONE GENERAL MEDIUM FINE FINE SUPER FINE SPECIAL Emerald (पडना) 200.00 500.00 1200.00 1900.00 2800.00 & above Yellow Sapphire (पुखराज) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Blue Sapphire (नीलम) 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above White Sapphire (िफ़द पुखराज) े 550.00 1200.00 1900.00 2800.00 4600.00 & above Bangkok Black Blue(बंकोक नीलम) 100.00 150.00 200.00 500.00 1000.00 & above Ruby (मास्णक) 100.00 190.00 370.00 730.00 1900.00 & above Ruby Berma (बमाा मास्णक) 5500.00 6400.00 8200.00 10000.00 21000.00 & above Speenal (नरम मास्णक/लालिी) 300.00 600.00 1200.00 2100.00 3200.00 & above Pearl (मोसत) 30.00 60.00 90.00 120.00 280.00 & above Red Coral (4 jrh rd) (लाल मूंगा) 75.00 90.00 12.00 180.00 280.00 & above Red Coral (4 jrh ls mij) (लाल मूंगा) 120.00 150.00 190.00 280.00 550.00 & above White Coral (िफ़द मूंगा) े 20.00 28.00 42.00 51.00 90.00 & above Cat’s Eye (लहिुसनर्ा) 25.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Cat’s Eye Orissa (उफििा लहिुसनर्ा) 460.00 640.00 1050.00 2800.00 5500.00 & above Gomed (गोमेद) 15.00 27.00 60.00 90.00 120.00 & above Gomed CLN (सिलोनी गोमेद) 300.00 410.00 640.00 1800.00 2800.00 & above Zarakan (जरकन) 350.00 450.00 550.00 640.00 910.00 & above Aquamarine (बेरुज) 210.00 320.00 410.00 550.00 730.00 & above Lolite (नीली) 50.00 120.00 230.00 390.00 500.00 & above Turquoise (फफ़रोजा) 15.00 30.00 45.00 60.00 90.00 & above Golden Topaz (िुनहला) 15.00 30.00 45.00 60.00 90.00 & above Real Topaz (उफििा पुखराज/टोपज) 60.00 120.00 280.00 460.00 640.00 & above Blue Topaz (नीला टोपज) 60.00 90.00 120.00 280.00 460.00 & above White Topaz (िफ़द टोपज) े 60.00 90.00 120.00 240.00 410.00& above Amethyst (कटे ला) 20.00 30.00 45.00 60.00 120.00 & above Opal (उपल) 30.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Garnet (गारनेट) 30.00 45.00 90.00 120.00 190.00 & above Tourmaline (तुमालीन) 120.00 140.00 190.00 300.00 730.00 & above Star Ruby (िुर्काडत मस्ण) ा 45.00 75.00 90.00 120.00 190.00 & above Black Star (काला स्टार) 15.00 30.00 45.00 60.00 100.00 & above Green Onyx (ओनेक्ि) 09.00 12.00 15.00 19.00 25.00 & above Real Onyx (ओनेक्ि) 60.00 90.00 120.00 190.00 280.00 & above Lapis (लाजवात) 15.00 25.00 30.00 45.00 55.00 & above Moon Stone (र्डद्रकाडत मस्ण) 12.00 21.00 30.00 45.00 100.00 & above Rock Crystal (स्फ़फटक) 09.00 12.00 15.00 30.00 45.00 & above Kidney Stone (दाना फफ़रं गी) 09.00 11.00 15.00 19.00 21.00 & above Tiger Eye (टाइगर स्टोन) 03.00 05.00 10.00 15.00 21.00 & above Jade (मरगर्) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above Sun Stone (िन सितारा) 12.00 19.00 23.00 27.00 45.00 & above 50.00 100.00 200.00 370.00 460.00 & above Diamond (हीरा) (Per Cent ) (Per Cent ) (PerCent ) (Per Cent) (Per Cent ) (.05 to .20 Cent )Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus
  • 90. 90 मार्ा 2012 िूर्ना पत्रिका मं प्रकासशत िभी लेख पत्रिका क असधकारं क िाथ ही आरस्क्षत हं । े े लेख प्रकासशत होना का मतलब र्ह कतई नहीं फक कार्ाालर् र्ा िंपादक भी इन त्रवर्ारो िे िहमत हं। नास्स्तक/ अत्रवश्वािु व्र्त्रक्त माि पठन िामग्री िमझ िकते हं । पत्रिका मं प्रकासशत फकिी भी नाम, स्थान र्ा घटना का उल्लेख र्हां फकिी भी व्र्त्रक्त त्रवशेष र्ा फकिी भी स्थान र्ा घटना िे कोई िंबंध नहीं हं । प्रकासशत लेख ज्र्ोसतष, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु, मंि, र्ंि, तंि, आध्र्ास्त्मक ज्ञान पर आधाररत होने क कारण े र्फद फकिी क लेख, फकिी भी नाम, स्थान र्ा घटना का फकिी क वास्तत्रवक जीवन िे मेल होता हं तो र्ह माि े े एक िंर्ोग हं । प्रकासशत िभी लेख भारसतर् आध्र्ास्त्मक शास्त्रों िे प्रेररत होकर सलर्े जाते हं । इि कारण इन त्रवषर्ो फक ित्र्ता अथवा प्रामास्णकता पर फकिी भी प्रकार फक स्जडमेदारी कार्ाालर् र्ा िंपादक फक नहीं हं । अडर् लेखको द्वारा प्रदान फकर्े गर्े लेख/प्रर्ोग फक प्रामास्णकता एवं प्रभाव फक स्जडमेदारी कार्ाालर् र्ा िंपादक फक नहीं हं । और नाहीं लेखक क पते फठकाने क बारे मं जानकारी दे ने हे तु कार्ाालर् र्ा िंपादक फकिी भी े े प्रकार िे बाध्र् हं । ज्र्ोसतष, अंक ज्र्ोसतष, वास्तु, मंि, र्ंि, तंि, आध्र्ास्त्मक ज्ञान पर आधाररत लेखो मं पाठक का अपना त्रवश्वाि होना आवश्र्क हं । फकिी भी व्र्त्रक्त त्रवशेष को फकिी भी प्रकार िे इन त्रवषर्ो मं त्रवश्वाि करने ना करने का अंसतम सनणार् स्वर्ं का होगा। पाठक द्वारा फकिी भी प्रकार फक आपिी स्वीकार्ा नहीं होगी। हमारे द्वारा पोस्ट फकर्े गर्े िभी लेख हमारे वषो क अनुभव एवं अनुशधान क आधार पर सलखे होते हं । हम फकिी भी व्र्त्रक्त े ं े त्रवशेष द्वारा प्रर्ोग फकर्े जाने वाले मंि- र्ंि र्ा अडर् प्रर्ोग र्ा उपार्ोकी स्जडमेदारी नफहं लेते हं । र्ह स्जडमेदारी मंि-र्ंि र्ा अडर् प्रर्ोग र्ा उपार्ोको करने वाले व्र्त्रक्त फक स्वर्ं फक होगी। क्र्ोफक इन त्रवषर्ो मं नैसतक मानदं िं , िामास्जक , कानूनी सनर्मं क स्खलाफ कोई व्र्त्रक्त र्फद नीजी स्वाथा पूसता हे तु प्रर्ोग कताा हं अथवा े प्रर्ोग क करने मे िुफट होने पर प्रसतकल पररणाम िंभव हं । े ू हमारे द्वारा पोस्ट फकर्े गर्े िभी मंि-र्ंि र्ा उपार् हमने िैकिोबार स्वर्ं पर एवं अडर् हमारे बंधुगण पर प्रर्ोग फकर्े हं स्जस्िे हमे हर प्रर्ोग र्ा मंि-र्ंि र्ा उपार्ो द्वारा सनस्ित िफलता प्राप्त हुई हं । पाठकं फक मांग पर एक फह लेखका पूनः प्रकाशन करने का असधकार रखता हं । पाठकं को एक लेख क पूनः े प्रकाशन िे लाभ प्राप्त हो िकता हं । असधक जानकारी हे तु आप कार्ाालर् मं िंपक कर िकते हं । ा (िभी त्रववादो कसलर्े कवल भुवनेश्वर डर्ार्ालर् ही माडर् होगा।) े े
  • 91. 91 मार्ा 2012 FREE E CIRCULAR गुरुत्व ज्र्ोसतष पत्रिका मार्ा -2012िंपादकसर्ंतन जोशीिंपकागुरुत्व ज्र्ोसतष त्रवभागगुरुत्व कार्ाालर्92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)INDIAफोन91+9338213418, 91+9238328785ईमेलgurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,वेबhttp://gk.yolasite.com/http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/
  • 92. 92 मार्ा 2012 हमारा उद्दे श्र्त्रप्रर् आस्त्मर् बंधु/ बफहन जर् गुरुदे व जहाँ आधुसनक त्रवज्ञान िमाप्त हो जाता हं । वहां आध्र्ास्त्मक ज्ञान प्रारं भ हो जाता हं , भौसतकता का आवरण ओढे व्र्त्रक्तजीवन मं हताशा और सनराशा मं बंध जाता हं , और उिे अपने जीवन मं गसतशील होने क सलए मागा प्राप्त नहीं हो पाता क्र्ोफक ेभावनाए फह भविागर हं , स्जिमे मनुष्र् की िफलता और अिफलता सनफहत हं । उिे पाने और िमजने का िाथाक प्रर्ाि ही श्रेष्ठकरिफलता हं । िफलता को प्राप्त करना आप का भाग्र् ही नहीं असधकार हं । ईिी सलर्े हमारी शुभ कामना िदै व आप क िाथ हं । आप ेअपने कार्ा-उद्दे श्र् एवं अनुकलता हे तु र्ंि, ग्रह रत्न एवं उपरत्न और दलभ मंि शत्रक्त िे पूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत सर्ज वस्तु का हमंशा ू ु ाप्रर्ोग करे जो १००% फलदार्क हो। ईिी सलर्े हमारा उद्दे श्र् र्हीं हे की शास्त्रोोक्त त्रवसध-त्रवधान िे त्रवसशष्ट तेजस्वी मंिो द्वारा सिद्धप्राण-प्रसतत्रष्ठत पूणा र्ैतडर् र्ुक्त िभी प्रकार क र्डि- कवर् एवं शुभ फलदार्ी ग्रह रत्न एवं उपरत्न आपक घर तक पहोर्ाने का हं । े े िूर्ा की फकरणे उि घर मं प्रवेश करापाती हं । जीि घर क स्खिकी दरवाजे खुले हं। े GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) Call Us - 9338213418, 9238328785 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/ Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION) (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
  • 93. 93 मार्ा 2012MAR2012